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Swami Vivekananda's Kali the Mother ·

Kali the Mother: Readings from Swami Vivekananda's Poem : 16 Oct 2024

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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठ या राम कृष्णाय ते नमः जितने जिस दिन से हमने यह क्लास चालू किया है काली के ऊपर में मां काली के ऊपर में तब से प्रतिदिन बारिश हो रही है और बिजली गिर रही है रोज सुबह को टा को खास करके तो जैसे कि माहा काली भी अपनी प्रेजेंस दिखा रही है हमको कि हां मैं भी हूं और तुम लोग मेरे बारे में बात कर रहे हो मैं सुन रही हूं कल हमने देखा कि किस तरह से इवोल्यूशन और एक्सटिंक्शन यह दोनों ऑप्शन है हमारे सामने और किस तरह से मां काली या तो है कि प्राकृतिक प्रलय का स्वरूप धारण करके या तो फिर युद्ध और रेवोल्यूशन का स्वरूप धारण करके या तो फिर महामारी के रूप में हमारे सामने आती है तो यह महामारी के बारे में दो कहानियां है अपने संघ में एक बार राजा महाराज राजा महाराज अर्थात स्वामी ब्रह्मानंद रामकृष्ण संघ के प्रथम प्रेसिडेंट तो वह प्रेसिडेंट थे उस समय और काफी समय बलराम भवन में ताया करते थे बलराम मंदिर में बलराम मंदिर अर्थात कि जहां पर ठाकुर अपने प्रिय शिष्य बलराम बसु को मिलने के लिए जाते थे उनका घर बलराम बाबू का घर अर्थात बलराम मंदिर तो बलराम मंदिर में ही राजा महाराज काफी समय बीता थे क्योंकि बलराम भवन में देखेंगे कि बलराम बसु और उनके पुत्र रामकृष्ण उनका नाम था राम कृष्ण बलराम बाबू ने अपने पुत्र का नाम रखा था रामकृष्ण और और उनका परिवार सब लोग ठाकुर के इतने भक्त थे कि सिर्फ ठाकुर ही नहीं ठाकुर के जो त्यागी संतान थे उनका भी बड़े ही श्रद्धा पूर्वक उनका सम्मान करते थे और उनकी केयर करते थे तो राजा महाराज काफी समय बलराम भवन में बिताते थे अभी एक दिन ऐसा हुआ कि राजा महाराज वहां पर बैठे हुए हैं बलराम भवन में बलराम मंदिर में फर्स्ट फ्लोर पे फर्स्ट फ्लोर प जहां पर जिस कमरे में ठाकुर आकर के जब जब बात करते थे भक्तों के साथ में उस वहां पर बैठे हुए थे एकाएक उन्होंने देखा कि सीढ़ी है यदि आपने बलराम भवन का मुलाकात बलराम मंदिर में यदि आप गए होंगे तो आपने देखा होगा कि फर्स्ट फ्लोर पे जहां पर वह ठाकुर वाला पैसेज जो है बाहर में पैसेज है फिर भीतर में अभी तो श्राइन बनाया हुआ है तो यहां पर पैसेज में जद आप बैठे होंगे तो आपको वह सीढ़ी आपको दिखती है कि सीढ़ी से कैसे कोई ऊपर आता है और इस साइड में जदी ऐसा एक जनरल सेक्शन जैसा है कि सभी लोग बैठते हैं ठाकुर भी जाकर के बैठते थे तो उसके अपोजिट साइड में अ अंदर महल है अंतःपुर जिसको कहते हैं जहां पर स्त्रियां वगैरह रहती है तो राजा महाराज वहां पर बैठे हुए थे एकाएक उन्होंने देखा कि काले वर्ण की श्याम वर्ण की एक स्त्री उस सीढ़ी से चढ़ कर के वहां पर आई और सीधी देखा और उसका जो चेहरा था बड़ा ही विकृत था और घने काले बाल बेर बिखेर बाल थे उसके और एकदम कृष्ण वर्ण उसका श्याम घनीभूत काला उसका रंग शरीर का और चेहरा भी बड़ा ही भयावह जैसे ही राजा महाराज ने उसको देखा तो फिर देखा कि यह स्त्री जहां पर अंतःपुर है जहां पर स्त्रियों का निवास है वहां पर चली गई तो इसको देख कर के इस श्याम वर्णा स्त्री को देखकर करके ही राजा महाराज ने अपने सेवक को कहा कि चलो हम बेलूरमठ चलते हैं यहां पर नहीं रुकना है अभी सेवक महाराज भी साथ में ही बैठे थे और भी शायद दूसरे लोग होंगे और किसी को तो ऐसा कुछ दिखा नहीं वे लोग आश्चर्य चकित हो गए कि अरे राजा महाराज तो बलराम भवन में रहना काफी पसंद करते हैं यहां पर ही काफी दिन बिताते हैं एकाएक वो क्यों बेलर मट जाने की बात कर रहे हैं एक्चुअली ऐसा होता था कि बेलूरमठ वो बाबूराम महाराज अर्थात कि स्वामी प्रेमानंद बेलूरमठ के मैनेजर थे और बाबूराम महाराज को यदि राजा महाराज को बेलूरमठ बुलाना होता था तो जाकर के कितनी विनती करते काशी जाकर के ना कि फिर यह भुवनेश्वर जाकर केनी बलराम मंदिर आकर के तब कहीं जाकर के राजा महाराज बेलूरमठ आने को स्वीकृत होते थे यहां सामने से कह रहे हैं कि चलो बेलूरमठ चलते हैं तो अभी सेवक महाराज तो कुछ कहेंगे नहीं ना राजा महाराज ने जब कहा है चलना है तो चलो तो वहां से तो निकल गए फिर बाद ने पूछा कि महाराज जी आप तो बलराम मंदिर छोड़ना नहीं चाहते बेलूरमठ आना नहीं चाहते एकाएक आपने क्यों ऐसा कहा कि चलो ब बेलर मट चलते हैं तो राजा महाराज ने कहा कि इस तरह से मुझे दिखा कि एक घने कृष्ण वर्ण की स्त्री इस तरह से सीढ़ी चढ़कर के अंतपुर है वहां पर चली गई तो सेवक महाराज भी आश्चर्य चकित हो गए कि अरे यह कैसा दर्शन है फिर दूसरे दिन सुबह को पता चला बलराम मंदिर से न्यूज़ आया कि वहां पे अंतःपुर में कुछ-कुछ स्त्रियों को रात को ही कुछ कोलेरा न की ऐसी कोई बीमारी हो गई थी और बड़ी ही सीरियसली गंभीर रूप से वह बीमार हो गई थी तो देखिए कि राजा महाराज को यह बीमारी एक काली के रूप में काली कहो ना कि किसी भी कोई भी नाम दो वो शीतला कहो जो भी नाम दो इस स्त्री के रूप में कृष्ण वर्ण स्त्री के रूप में राजा महाराज को यह बीमारी नजरों से दिखी थी ऐसा ही ऐसी ही एक दूसरी घटना बेलूरमठ की है उस समय शरत महाराज अभी बेलूरमठ में आप यदि गए होंगे दर्शन किया होगा तो आपने देखा होगा कि पुराना मंदिर जो है जहां पर सबसे पहले ठाकुर के अस्थि स्थापित किए गए थे और जिस मंदिर में स्वामी विवेकानंद ने स्वयं ध्यान किया था वोह पुराना मंदिर जो कि फर्स्ट फ्लोर पे है और उसके साथ में ही फिर यह आज का जो मैनेजर महाराज का जो ऑफिस है और उसके फर्स्ट फ्लोर पर स्वामी जी के रहने का कमरा है स्वामी जी का शयन गृह है और उसके सामने एक चौक जैसा है चौक के चौक में वो आम का पेड़ है स्वामी जी का आम का पेड़ ऐसा हम कहते हैं क्योंकि उस पेड़ के नीचे में वो बेंच के ऊपर में स्वामी जी बैठ कर के उन्होंने काफी समय बिताया था तो स्वामी जी का आम का पेड़ ऐसा हम कहते हैं तो वहां पे शरत महाराज उस समय बैठे हुए थे ये भी उस बेलूरमठ के दिनों की ही बात है स्वामी जी के प्रयाण की ही बात होगी मोस्ट प्रोबेबली तो शरत महाराज वहां पर आम के पेड़ के नीचे में जनरली स्वामी विवेकानंद बैठा करते थे वहीं पर बैठे थे संध्या का समय था आरती हो चुकी थी और आज की तरह आज आप बेलूरमठ में यदि जाएंगे आरती के बाद में तो कितने हजारों हजारों लोग आपको देखने को मिलेंगे वहां मठ ऑफिस में ही वहीं पे उसी चौक में ही मठ ऑफिस है तो वहां पर भी कितने भक्त वहां पे वो बैठे होंगे कुछ ना कुछ काम के लिए या तो बात करनी है किसी के साथ में या तो कुछ गाइडेंस चाहिए वगैरह तो किंतु उस उस समय था कि संपूर्ण शांत नीरव हो जाता था बेलूरमठ संध्या के आरती के बाद में और आज की तरह इलेक्ट्रिक लाइट वगैरह तो थी नहीं कि चारों ओर लाइट लगा कर के उजला करके रखे तो ऑलमोस्ट संपूर्ण रूप से अंधेरा था कहीं-कहीं पे ये जो दिया वगैरह टमटम कर रहा होगा तो ऐसे अंधेरे में उजाले अंधेरे में वहां पर पास में ही गंगा बहती है आरती हो चुकी है मठ में शांत पवित्र वातावरण है शरद महाराज बैठे थे आम के पेड़ के नीचे में उस समय देखा कि ऐसा ही दृश्य कि एक कृष्ण वर्ण स्त्री वो जो बेलूरमठ का उस समय का जो गेट था व आज जब हम कहेंगे कि मंदिर से जो मुख्य मंदिर है वहां से वो मठ ऑफिस आने के लिए जो गेट है वहां पास में ही एक दूसरा गेट होगा उस समय तो उस गेट में से एक ऐसे ही कृष्ण वर्ण स्त्री ने प्रवेश किया और चेहरा बड़ा ही भयावह उसके बाल भी बिल्कुल बेर बिखेर वस्त्र भी नहीं और इस तरह की भयावह स्त्री आकर के सीधी शरत महाराज जहां पर बैठे हैं उसकी उ महाराज की ओर आने लगी अभी क्या था कि जहां पे अभी मठ ऑफिस वगैरह है मैनेजर महाराज वहां पर रहते हैं उसमें और जो मठ ऑफिस है वहां पर साधु निवास हुआ करता था तो उस साधु निवास की ओर सीधी जा रही है यह स्त्री तो इमीडिएट शरद महाराज ने खड़े होकर के अपने दोनों हाथ फैला कर के उस स्त्री को कहा कि मैं आपको यहां पर नहीं आने दूंगा तो महाराज ने जैसे ही ऐसा कहा तो वह स्त्री हंसने लगी और हंसते हंसते ही वो वहां से निकल गई मठ चौकी चौक जो है मठ का वहां से निकल गई और पास में ही ईटा भट्ठा है आज हम जहां पर वह तोतापुरी है तोतापुरी साधु निवास है और भक्तों के खाने के लिए आहार प्रसाद के लिए जो बड़ा ही भवन बनाया गया है वहां पर उस समय ईटा भट हुआ करता था और ईटा भट्ठा में बहुत सारे मजदूर कार्य काम करते थे तो उस ओर टे भट्ठे की ओर चली गई अभी दूसरे दिन सुबह को पता चला कि वहां पर कोलेरा न की ऐसी कोई महामारी फैल गई है और काफी लोग बड़े ही गंभीर रूप से बीमार हो गए हैं और मृत्यु भी होने वाला है तो देखिए कि दो इंस्टेंस है दो कहानियां ऐसी है जनरली हमारे संघ में आप नोट करेंगे एक चीज कि इस तरह की जिसको कि सुपर नेचरल इवेंट्स कहते हैं या तो फिर कोई भी सुपर नेचरल घटना कहते हैं इसको बहुत ज्यादा हम लोग कोई प्रमाण मान्यता या तो फिर उसको हम कोई बहुत ज्यादा यह इंपॉर्टेंस नहीं देते क्यों क्योंकि हम लोगों का कहना है कि यह जब ध्यान साधन भजन और यह अद्वैत वेदांत अर्थात कि आत्मा का अमरत्व यही एक यही मुख्य प्रिंसिपल्स है जो कि हमको आध्यात्मिक साधना में आगे ले जाएंगे और जैसे ही हमय ये सब सुपर नेचुरल घटनाओं के भीतर में जाएंगे तो वैसे ही हमारा किसी ना किसी तरह की एक ऑनेस्टी और इंटीग्रिटी में कुछ ना कुछ खामी आ जाएगी हमको लगेगा जैसे कि एक बार ठाकुर ने कहा था ना कि स्वामी जी ने कहा था मोस्ट प्रोबेबली कि जिसने भूत देखा है वो भी एक तरह से कहो कि फॉर्चूनेटली कुछ है उस परे उसको विश्वास है भगवान है आजकल ऐसा कोई सब लिप सर्विस ही देते हैं विश्वास कोई रखते नहीं है किंतु एटलीस्ट भूत देख लिया तो अभी तो लगेगा कि ना देर इज समथिंग व्हिच इज बियोंड ह्यूमन ये मनुष्य योनि है उससे परे भी कुछ है और यह भूत जदी होगा तो भगवान भी होंगे तो ऐसा अ बट दैट इज अ उसको पॉजिटिव स्पिन देने वाली बात हो गई ज्यादातर लोग इस तरह की घटनाओं में एक बार जाते हैं तो फिर पूरे नेगेटिविटी में चले जाते हैं फिर वो जो मैं दक्षिणेश्वर जाता हूं तो हर बार देखता हूं बड़े-बड़े होर्डिंग लगे हुए हैं वहां पे कोई तांत्रिक है ना कोई उपासक है किसी चीज का कहता है कि आपके जीवन के जितने भी दुख कष्ट है सब दूर कर देंगे बस हमको इतना दे दीजिए प्रणामी वगैरह हमको इतना रुपया दे दीजिए तो हमको प्रश्न होगा कि यदि तुम्हारे पास में ऐसी कोई विद्या है जैसे कि तुम लोगों का अंतराय यदि हटा सकते हो लोगों के ग्रह परिवर्तन कर सकते हो तो तुम अपना खुद का परिवर्तन क्यों नहीं करते खुद क्यों नहीं यशु आराम से जीते तुमको खुद को े होल्डिंग लगा कर के एडवर्टाइज करने की क्या जरूरत पड़ पड़ गई है तो किंतु ऐसी घटनाएं हैं तो और दूसरी बात कि इसको यदि लिपिबद्ध किया गया है इसका मतलब है कि यह इसमें सही में कुछ जेनुइन यह कुछ होगा भी सही ये कई बार ऐसा होता है कि हम लोग थर्ड सोर्स और थर्ड पर्सन फोर्थ पर्सन से ऐसे हवाहवा में ऐसी बातें सुनते रहते हैं तो जब हम सुनते हैं तो हमको आश्चर्य भी होता है कि अरे इस बात में सत्य और असत्य कितना है किसको पता किंतु यदि हमारे ही संघ के द्वारा छपी हुई पुस्तकों में इसको लिपिबद्ध किया गया है दैट मींस के किसी जेनुइन सोर्स के पास में ही लेखक ने यह कहानी सुनी होगी तो देखिए कि हमने देखा कि इंडिविजुअल लेवल पे और सोसाइटल लेवल पे सिविलाइजेशनल लेवल पे मृत्यु हमारे सामने प्रकट होता है तो अभी प्रश्न होगा कि यह मृत्यु जो है या तो महा भय जो है जो हमारे सामने प्रकट होता है यह किस रीजन से इसका प्रयोजन क्या है संहार क्या संहार का इस जगत में क्या प्रयोजन है तो यहां पर देखिए कि वेदांत के साथ में इस शक्ति तत्व को या तो फिर यह रुद्र तत्व को कंपेयर कीजिए कैसे हमको देखने को मिलता है वेदांत को देखिए कि वेदांत हमको आत्मा का अमरत्व एक लाइफ बियोंड डेथ चच इज पीसफुल समय अवकाश और काल इस सबके परे एक अनंत शांति मय जीवन है और यह जन्म मृत्यु जरा व्याधि के चक्र के परे एक अनंत आत्मन है अनंत कहां अनंत शब्द भी तो समय के विदन दिस फोर कॉर्नर्स ऑफ स्पेस एंड टाइम यह सब शब्द डेवलप हुए हैं जो कि समय के परे हैं उसके लिए हम अनंत शब्द भी किस तरह से व्यवहार करेंगे उसके लिए तो हम करेंगे अनादि और जिसका आ नहीं है जिसका अंत नहीं है तो इस तरह की जो आत्मन है उस आत्मन का हमको संदेश देता है वेदांत किंतु देखिए कि मनुष्य का स्वभाव जो है वह सिर्फ ऐसा कोई पॉजिटिव चीज देख कर के ही सिर्फ उसकी ओर धावित नहीं होता क्योंकि हमेशा देखिए कि हमारी इंद्रियों के पसंदीदा जो चीजें हैं जो भोग उपकरण है वह जैसे ही हमारी नजर के सामने आते हैं वैसे ही हम ईश्वर है आत्मन है ब्रह्मण है साधन भजन है सब छोड़ कर के उसमें डूब जाते हैं और यह देखिए कि इंद्रियों के उपभोग की चीजें कुछ-कुछ तो बड़ी ही स्थूल और ग्रोस होती है जैसे कि काम और कांचन ठाकुर जिसके बारे में कहते हैं किंतु इससे भी ज्यादा सूक्ष्म कितने ही पाश है जैसे कि पढ़ाई का एक यह होता है रीडिंग का एक हैबिट होता है मैं मेरी ही बात करता हूं शाम को मैं जद मंदिर से अपने घर में आऊंगा अपने रूम में आऊंगा तो दो ऑप्शन प्रेय और श्रेय दोनों मेरे सामने उपस्थित होते हैं एक बड़ी ही अच्छी किताब है जिसको कि मैं दोपहर को पढ़ रहा था तो उसको खत्म कर दे शाम को आरती के बाद में कि ना फिर वो बैठ कर के थोड़ा सा जब ध्यान करें उस समय यह पढ़ने का यह जो प्रलोभन है मेरा इतना स्ट्रांग है कि मोर देन 50 पर ऑफ टाइम में कुछ ना कुछ पढ़ता ही रहता हूं और ऐसा भी नहीं कोई धार्मिक साहित्य मुझे और भी बहुत सारे इंटरेस्ट है मेरे तो कुछ ना कुछ ऐसा ही कुछ मैं पढ़ता रहूंगा तो यह भी एक प्रचंड प्रलोभन है जो कि आपको साधन भजन के पथ के ऊपर में अग्रसर नहीं होने देता तो सिर्फ प्रलोभन ही कार्य नहीं करेगा आपको साधन राज्य में आगे चलाने के लिए आपको साथ में ही मृत्यु भय भी दिखना पड़ेगा मृत्यु भय भी दिखाना पड़ेगा यह जैसे कि स्टिक और कैरोट वाली बात है एक गधा है गधे को यदि आप चलाना चाहेंगे किसी स्थल के ऊपर में ले जाना चाहेंगे कहो कि वहां पर जाना है तो गधे का नेचर ही है कि वो वहां प खड़ा रहेगा वो मने उसकी अकल इतनी नहीं है तो फिर आप क्या करेंगे उसके सामने एक कैरोट अर्थात कि एक गाजर उसके सामने रख देंगे अब ये कैरोट जैसे ही उसके सामने रखेंगे तो उसके प्रलोभन से वह खाना चाहता है बोल कर के वो आगे-आगे जाता जाएगा और जैसे ही उसके सर पे ऐसा कैरोट लकड़ी बांध कर के कैरोट बांध दो तो हमेशा उसके सामने टता टकता हुआ रहेगा तो फिर वो कैरोट के लोभ से प्रलोभन से यह गधा आगे जाएगा किंतु गधे में इतना अकल है कि थोड़ा सा आगे चलकर के यदि कैरोट नहीं मिलता है तो वह लगेगा कि अरे छोड़ो यह सब चीजें और यहीं प रुक जाओ क्यों कुछ काम करने की जरूरत है फिर आपको गधे को लकड़ी मारनी होगी तो ये स्टिक एंड कैरोट दो रास्ते हैं गधे को लाने के लिए तो वैसे ही हमारे भीतर में जो तमस है या तो फिर रजस है इतना घनीभूत है कि सिर्फ आत्मन है आत्मन जद प्राप्त कर करेंगे तो अनंत शांति प्राप्त होगी मृत्यु भय से मुक्ति हो जाएगी फिर यह किसी भी तरह का टेंशन है किसी भी तरह की बीमारी है वह आपको स्पर्श नहीं करेगा देह को स्पर्श करेगा मन को स्पर्श नहीं करेगा और फिर पूरी गीता पढ़ लीजिए पूरे उपनिषद पढ़ लीजिए इतना करने के बावजूद यह जो सुबह शाम जितना भी समय मिले वह समय बैठ कर के स्थिर होकर के जब ध्यान करना वह सही में बड़ा ही दुष्कर है बड़ा ही मुश्किल है तो उस तमस या रजस में से मुक्ति पाने के लिए सिर्फ प्रलोभन कार्य नहीं करेगा हमको पनिशमेंट भी चाहिए और यह पनिशमेंट है यह कराल रूपी यह रुद्र स्वरूपिणी काली मृत्यु भय हमेशा हमारे सामने लगा ही रहता है यदि मृत्यु भय या तो ऐसा भय हमारे सामने नहीं होगा तो हम लोग एक एक के बाद एक प्रतिदिन अपने रजस या तमस को काट करके हम लोग साधन भजन करने के लिए तैयार नहीं होंगे और हम जैसे आम आदमियों की तो क्या बात है स्वामी जी का खुद का उदाहरण देखिए स्वामी जी को ईश्वरीय तत्व या तो फिर ऐसा कुछ जो कि बियोंड दिस वर्ल्ड हो उसके ऊपर में आकर्षण तो था ही उनका हृदय मन संस्कार परिशुद्ध तो थे ही इसलिए तो वह ठाकुर के पास में आए थे किंतु आकर के फिर ठाकुर के पास में जैसे ठाकुर कहते हैं ना कि आप समुंदर के जैसे ही पास में जाएंगे गंगा के जैसे ही पास में जाएंगे आपको बहुत सारी चीजें दिखाई देगी समुंदर में गंगा नदी में जहाज है लोग खड़े हैं किनारे पे लोग कोई नौका में क्रॉस कर रहे हैं गंगा कितनी सब चीजें आपको दिखाई देगी यदि गंगा के किनारे आप जाएंगे तो वैसे ही ठाकुर के पास आने से इतना सब कुछ ठाकुर के आसपास में एक सर्कस जैसा चलता रहता था वह हाजरा बैठा है फिर वो बाकी राजा महाराज है फिर गिरीश घोष है कितने लोग वहां पर आते रहते थे तो सिर्फ बात यह नहीं है कि ठाकुर सब समय ईश्वरीय चिंतन किया करते थे ठाकुर जैसे ही थोड़ा सा विश्राम लेने के लिए इधर-उधर जाएंगे तो बाकी दुनिया भर की बातें चालू हो जाती थी उसका एक उदाहरण कथामृत में ही है कि नरेण और मास्टर महाशय वहां पर वराम में खड़े होकर के वह स्कूल के बारे में बात कर रहे हैं आज के लड़कों के बारे में तो स्वामी जी कहते हैं कि मैंने देखा है कि कुछ-कुछ लड़के आजकल दुश्चिंता अभिभावक अर्थात कि उनके वाली उनके गार्डियन जो है वह उनको देखे तो अच्छा रहेगा तो मास्टर महाशय कहते हैं कि अरे मैं तो जब पढ़ाई कर रहा था तब तो मैंने ऐसा देखा नहीं था कि लड़कों को कॉलेज के लड़कों को दुश्चिंता हुए तो स्वामी जी अर्थात की उस समय के नरेण तो नरेण क्या कहता है कि बोध हो अपनी ततो मिस्ते ना अर्थात कि लगता है कि आप लोगों के साथ में इतनी बातें नहीं किया करते थे आपका जो मित्र सर्कल है फ्रेंड सर कल वो छोटा होगा इसीलिए आपको पता नहीं है किंतु पहले भी ऐसा होता था अभी भी ऐसा होता है अभी ये लोग ऐसी बात कर रहे हैं उसी में ठाकुर वहां पर आ गए आ कर के उन्होंने पूछा कि की रे तुम रा की बला बली कोने तुम लोग क्या बात कर रहे हो तो फिर मास्टर महाशय ने या नरेंद्र ने कहा होगा कि हम लोग इस तरह स्कूल के लड़कों के बारे में बात कर रहे हैं तो ठाकुर एकदम गंभीर हो गए और नरेंद्र को तो कुछ नहीं बोले मास्टर महाशय को डांट दिए बोला कि तुम तो बड़े हुए हो तुम तो उम्र में बड़े हो तुमको यह सब बातें उत्था पित करने की क्या आवश्यकता थी तुमको तो यह सब करने की जरूरत नहीं थी बोलक के मास्टर महाशय को डांट दिया तो नरेंद्र तो चुपचाप खड़ा रह गया उसको डांट नहीं मिली है वो बच गया है तो देखिए कि ये कितना ही सब कुछ वहां पे चलता रहता था नरेण आ करके हजरा के साथ में बात करेगा यानी कि एक तो है कि बड़ी ही सिंसेरिटी है कि जिसकी वजह से वह ठाकुर के पास आता था किंतु सिर्फ ठाकुर के पास आने से तो नहीं चलेगा जीवन सर्वस्व मां काली को अर्पित कर देना होगा वो क कब हुआ जब पिताजी की मृत्यु हुई और फिर घर में एक ऐसी परिस्थिति आ गई कि खाने का भी अभाव है मां है छोटे भाई बहन है उनको क्या आहार करवाएगा नरेंद्र बेचारा मारा मारा सब जगह पर घूम रहा है कहीं पर नौकरी मिल जाए कुछ समय ये विद्यासागर की स्कूल में भी उन्होंने शिक्षक करके देख ली टीचर का काम करके देख लिया फिर एक बार कहते हैं कि मैं वहां पर चला जाऊंगा और नॉर्थ ईस्ट में कहीं प चाय के बागान में मैनेजर की नौकरी मिलने वा ली थी तो यह सब कर रहे हैं तब उस समय फिर किंतु जब ठाकुर के पास में आते हैं और ठाकुर जब कहते हैं जाओ मां काली के पास में मांगो रोटी कपड़ा मकान का जो भी अभाव है पूर्ण हो जाएगा तब काली के पास जाकर के उनके मुंह में से किंतु रोटी कपड़ा और मकान की वजह ज्ञान भक्ति वैराग्य की ही बात उनके मुन से आ गई तो यह मृत्यु जो था उसका सामना करने के बाद में ही किंतु स्वामी जी के जीवन में एक बड़ा ही परिवर्तन इतना महत् परिवर्तन आया कि भविष्य के स्वामी विवेकानंद बनने की ओर उन्होंने आगे कदम करना शुरू कर दिया था तो देखिए कि एक कोई बड़ा शौक एक बड़ा एक अपने जीवन में एक ऐसी घटना कि जैसे कि हमको भीतर में से पूरा जमजो करके रख दे ठाकुर ने कहा ना कि जिस दिन किसी पत्नी और पति और पत्नी का पुत्र शोक हुआ है जिस दिन उनके बेटे की मृत्यु हुई है क्या उस दिन रमण सुख में प्रवृत्त होने की उनकी इच्छा होगी नहीं होगी क्यों क्योंकि रमण सुख में प्रवृत्त तभी होंगे जब मन शांत है फिर वह बाकी सब चीजें फेवरेबल है तब किंतु पुत्र का ही जिस दिन मृत्यु हुआ है उस दिन आप कैसे रमण में सुख में वो आप रमण का सुख उपभोग कर पाएंगे तो ठाकुर यह बात करते हैं अर्थात कि किसी भी तरह की एक ऐसी घटना कि हमको पूरा हिला कर के रख दे वो उस समय हमको सडन ऐसा लगता है कि अरे नहीं मैं किस रास्ते की ओर जा रहा हूं मैं कहां अपने समय को वेस्ट कर रहा हूं मेरे पास में ऐसे कितने ही दिन बीत गए हैं सुबह शाम जबकि मैं ठाकुर का नाम ईश्वर का नाम ले सकता था किंतु मैंने नहीं लिया ज्यादातर समय हमारा मन और कुछ ना कुछ करने की ओर दौड़ता है जैसे ही हम आंख बंद करके बैठने का प्रयास करेंगे वैसे ही देखेंगे कि कुछ ना कुछ आकर के हमको प्रलोभन करता है चलो यहां पर इसके साथ में बात कर लेते हैं इस यह काम है छोटा सा उसको निपटा देते हैं इसको थोड़ा सा पढ़ लेते हैं यह बात थोड़ा सा कर लेते हैं बाद में आकर के बैठेंगे या तो फिर यदि बैठे ही है तो फिर शरीर के कष्ट चालू हो जाएंगे कमर में दर्द चालू हो जाएगा या तो फिर ऐसा मन के भीतर में झंझावात खड़ा होगा कि खड़े होकर के हम दौड़ना शुरू कर देंगे बैठना शांति से बैठना वो बड़ा ही मुश्किल है प्रचंड विल पावर ले लेता है ठाकुर जब वो काली म मंदिर में प्रवेश करते थे ध्यान करने के लिए और या तो फिर पंचवटी में कि जहां पर भी बैठे हो ध्यान करने का जब प्रारंभ करेंगे तब अपने मन को क्या कहेंगे कि जो भैरव की मूर्ति है काली मंदिर के सामने आपने जद दक्षिणेश्वर काली मंदिर दर्शन किया होगा तो आपने देखा होगा मां काली का मंदिर जहां पर है उसके सामने ही नाट मंदिर है और मां काली को फेस करके ही नाट मंदिर के ऊपर में भैरव की एक पत्थर की मूर्ति है तो ठाकुर उस भैरव की पत्थर की मूर्ति को याद करके कहते थे कि जिस तरह से स्थिर होकर के वो भैरव जब ध्यान कर रहा है वैसे ही मुझे जब ध्यान करना है बिल्कुल पत्थर की तरह स्थिर होकर के बिल्कुल भी उसमें कोई भी विक्षेप नहीं आना चाहिए और सही सही में ऐसा होता था लीला प्रसंग में वर्णन है कि ठाकुर कहते हैं मैं जब जप करने के लिए बैठता था तो जैसे मेरे शरीर को जैसे कोई लॉक कर देता है ना ताला लगा देता है खटखट करके पैर है कमर है हाथ है गर्दन है सर है ऐसा कोई लॉक कर देता खटखट करके आवाज आती थी और सब कुछ जैसे ताला लगा दिया है ऐसे ही स्थिर हो जाता था शरीर और ऐसा ही स्थिर होकर के घंटों के घंटों भर तक बैठ कर के ठाकुर ध्यान किया करते थे हमारे साथ में तो क्या होता है यहां पर जब यज्ञ वगैरह कोई भी वो होता है इवेंट तो मैं देखता हूं काफी लोग सिंसियर होते हैं उसमें कोई प्रश्न ही नहीं किंतु देखूंगा कि व थोड़ी देर हुई 1015 मिनट हुई तो थोड़ा सा एक कोई खड़ा होकर के पानी पीने को जाएगा किसी को फिर बाथरूम करनी होती है किसी को बाहर आक के फिर सब लोग फिर रे व सोचते रहते हैं कि हमको कोई ड्यूटी मिले तो अच्छा है ड्यूटी मिलेगा तो ड्यूटी करने के लिए आप दौड़ कर के भाग जाएंगे वो बहुत सारे मैंने देखे हैं राजकोट में था तो कोई भी फंक्शन होगा और प्रवचन होगा चार पांच सन्यासी अपने संघ के अच्छे वक्ता वहां पर डास पर बैठे हैं उस समय किंतु ड्यूटी किसको करनी है वो वहां पर वो यह लाइन लग जाती थी कि हमको यह खाना परोसने का काम दो हमको यह काम दो मैं कभी-कभी सोचता हूं कि वहां पर एसी ऑडिटोरियम है वहां पर शांति से बैठ कर के घंटा एक वो सुंदर एक के बाद एक भजन चलेंगे हमारे राजकोट में तो गाने वाले सन्यासियों की कोई कमी नहीं है बड़े ही सुंदर गाना गाने वाले लोग थे तो कहां पे एक घंटा भजन सुनेंगे प्रवचन सुनेंगे लेकिन यहां पे धूप के भीतर में वो दौड़ दौड़ धाम करेंगे लोगों को खाना परोसें क्या ये इन लोगों को किंतु देखिए कि ये मनुष्य का मन ही ऐसा है थोड़ा सा भी आप बोलेंगे शांत होकर के बैठो तो इमीडिएट वो बहाने बनाना शुरू कर देता है कि शांत होकर के बैठना यह तो तमस का चिन्ह है उसके बेटर है मैं स्वामी जी का काम करता हूं बाहर आकर के दौड़ दम करता हूं सर्विंग करूंगा क्लीनिंग करूंगा बाजार में जाकर के परचेस करना है जिस दिन फंक्शन होता है उस दिन कुछ ना कुछ आपको लास्ट मोमेंट में में चाहिए ही होता है उस समय भंडारी महाराज फिर फोन करेंगे अरे जाओ जाओ बाजार जाकर के ये लेके आओ तो वो बाजार में जाने के लिए लोग तैयार हो जाएंगे मुझे भेजो मुझे भेजो करके तो यह शांति से बैठना मनुष्य के स्वभाव में ही नहीं है मनुष्य हजार बातें निकालेगा यह बहाना निकालेगा वो बहाने निकालेगा उस समय जिस समय आप बैठने का प्रयास कर रहे हैं जब ध्यान का प्रयास कर रहे हैं उस समय सिर्फ आपको यह आत्मन की अनंत शांति का प्रलोभन कार्य नहीं करेगा सामने यह महा मृत्यु भय है यह भी आपको एक प्रचंड मोटिवेशन देता है और इसीलिए अ ठाकुर का खुद का आप देखिए उदाहरण कि ठाकुर के प ठाकुर जब पाठशाला में पढ़ते थे लाहा बाबू की पाठशाला यदि आप कमार पुकुर के दर्शन किए होंगे तो ठाकुर के बचपन का घर और वहां पर लाहा बाबू की पाठशाला देखी होगी तो वहां पर पाठशाला में जाते थे फिर वहां पर क्या करते थे व वहां पर वह दौड़ कर के भाग जाते थे फिर वह जो माणिक राजा का जो आम्र कानन है आम का बागान वहां पर जाकर के वोह नाटक का अभिनय किया करते थे पौराणिक नाटकों का या तो फिर अपने मित्रों के साथ में गप लगाएंगे तो ऐसे ठाकुर थे गदाधर था बचपन में किंतु जैसे ही पिता की मृत्यु हुई उसी समय एक जो उनके मन का जो परिवर्तन हुआ वो परिवर्तन से लगा कि जैसे यह नश्वर संसार यह अश्वर संसार में यह चाल कला बांधा विद्या ठाकुर बार-बार कहते हैं चाल कला अर्थात कि यह जो ब्राह्मण होते हैं व यजमान के वहां पर जाकर के पूजा पाठ या विधि करते हैं और उसके सामने उनको भिक्षा में चावल और यह केले जैसे फल वगैरह मिलते हैं तो यह धान मिलेगा फल मिलेगा और कुछ पैसा मिलेगा तो पैसों के लोभ में चावल के धान के लोभ में फल के लोभ में आप दूसरों के वहां जाकर के पूजा विधि करेंगे अभी पूजा विधि तो होती है अपने संस्कारों की शुद्धि के लिए आध्यात्मिक उन्नति के लिए तो आध्यात्मिक उन्नति के लिए पूजा नहीं करके आप पैसों के प्रलोभन से पूजा करते हैं इससे निम्न क्या हो सकता है तो ठाकुर बार-बार कहते थे कि आमी चाल कोला बांधा विद्या आमी चाइना मुझे ऐसी कोई विद्या नहीं ग्रहण करनी ऐसी कोई विद्या मुझे नहीं प्राप्त करनी जिससे कि मुझे यह धान और यह फल मूल मिले तो नेचुरली है कि उनके जो बड़े भाई थे रामकुमार वह थोड़े परेशान हो गए थे कि यह लड़का यदि काम धाम नहीं करेगा तो परिवार का भरण पोषण कैसे करेगा तो गदाधर को फिर वह कोलकात्ता लेकर आए थे और ग गदाधर उस समय का गदाधर देखता भी था कि उनके बड़े भाई ने यह तो एक अच्छा कार्य किया कि काली मंदिर में जाकर के उन्होंने नौकरी स्वीकार की एटलीस्ट दूसरों के घर जाकर के पूजा करने से बेटर है कि काली मंदिर में आप अपने मन की इच्छा के अनुसार मां काली की पूजा कर सकते हैं नो डाउट आपको सामने सैलरी मिलेगी ठाकुर ने खुद ने जब वहां पर वह पुजारी का कार्य करते थे तो सैलरी के रजिस्टर में उन्होंने साइन भी किया था यहां तक कि फिर वह अ एक घटना है योगेन महाराज की ही है शायद कि उस समय मां काली का जो बरात अर्थात कि जो प्रसाद वगैरह जो ठाकुर के रूम में आने वाला था वो आया नहीं तो ठाकुर जिस समय जो आने वाला था समय अनुसार नहीं पहुंचा तो ठाकुर थोड़े से परेशान हो गए तो ठाकुर ने परेशान होकर के यह योगेन महाराज को कहा कि जाओ तो जाकर के देख के आओ जहां पर भंडारी रहता है वहां पर उस ऑफिस में कि क्यों यहां के लिए महाकाली का प्रसाद अभी तक नहीं आया है तो योगेन महाराज सोचने लगे मन में ही मन में कि ठाकुर कितने ही बड़े अवतार हो ना गए हो आखिर में तो चाल कोला बांधा बामु नहीं तो अर्थात कि आखिर में तो यह धान और फल मूल प्राप्त करके पूजा करने वाले ब्राह्मण ही तो है वो आखिर में तब ठाकुर उनके मन का भाव सम ग और का कि देखो यहां पर जब माहाकाली का प्रसाद आएगा तो भक्तों को उसको ग्रहण करने का अवसर प्राप्त होगा किंतु वहां पर यदि प्रसाद रहेगा भंडार ब्र में पता नहीं किस-किस को खिला देंगे इसके लिए प्रसाद यहां पे आना उचित है रानी रासमुल मंदिर की निर्माण ही इसीलिए किया है कि साधु संत भक्त का भक्तों की सेवा हो नहीं कि बाकी सब निकम में लोगों की तो बात ऐसी नहीं है कि ठाकुर ये सैलरी है या प्रसाद है इन सबसे कोई मोह यह कर देते थे किंतु फिर मन में संतोष होना चाहिए कि जो पूजा विधि आप कर रहे हैं आपके खुद के आत्म तृप्ति के लिए हो रहा है नहीं कि यजमान की आत्म तृप्ति के लिए नहीं कि यजमान की मन की शांति के लिए तो यह ठाकुर के जीवन में हमेशा हमने देखा है किंतु यह जो परिवर्तन हुआ हालांकि देखिए ठाकुर तो अवतार है कोई प्रश्न ही नहीं है पिताजी जीवित रहके रहते कि फिर पिताजी का देहांत होता उनके जीवन में उनकी जो साधना है उनकी जो पवित्रता है उसमें कभी भी कोई कमी आने वाली नहीं थी किंतु फिर भी हम लोग सिर्फ फैक्ट को देख रहे हैं स्वामी जी स्वयं नर नारायण रूपी ऋषियों का अवतार थे भगवान शिव के अंश से जन्म ग्रहण किया था किंतु फिर भी देखिए कि पिताजी के मृत्यु से उनके जीवन में एक बड़ा ही परिवर्तन आया जो उनके जीवन जीवनी का है उन जीवनी कां ने इस बात का बड़ा ही स्पष्ट उल्लेख किया है तो वैसे ही लीला प्रसंग में भी ठाकुर के पिताजी की मृत्यु के बाद में ठाकुर के जीवन में बालक गदाधर के जीवन में जो आमूल परिवर्तन देखा गया सब समय वह ईश्वरीय भाव में मत्त रहते थे सब समय ईश्वर की आराधना करते रहते थे कहीं वह भूति र खाल वह स्मशान है स्मशान में जाकर के जब ध्यान किया करते थे वह जो सब आमूल परिवर्तन जो हमको दिखा वह उनके पिताजी की मृत्यु के बाद में ही दिखा था तो देखिए कि यह जो कोई भी एक महा भय हमारे सामने प्रकट होता है हमको सोचने को मजबूर कर देता है कि अरे यह मेरा जो क्षुद्र जीवन है जो अभी तक मैं छोटी-छोटी वासनाओं की पूर्ति के लिए मैं बिताया करता था तो क्या इसका कोई उच्च उद्देश्य के भी है कि नहीं क्या मैं इस छोटे से जीवन से लेक मैं कोई ऐसा कुछ नहीं कर पाऊंगा जो कि यह जो महा भय मेरे सामने उपस्थित हुआ है उसको मैं ट्रांसजेंडर पाऊं यदि युद्ध होता है तो इतने बड़ी महामारी या युद्ध उसमें एक छोटा सा मनुष्य क्या कर पाएगा हमको सब समय यह अपनी हेल्पलेसनेस दिखती है यह जो हेल्पलेसनेस है ये हेल्पलेसनेस एक बहुत ही बड़ा मेंटल डिसीज है जब भी आजकल तो हम बड़े-बड़े ऑर्गेनाइजेशन में रहते हैं नौकरी करेंगे कि कहां पर भी रहेंगे वहां पे यदि हम अपने जो अपने सीनियर जो है अपने सुपीरियर जो है उन लोगों के साथ में यदि झगड़ा हो जाता है अपने कलीग्स जो है उनके साथ में रहना मुश्किल हो जाता ता है तो हम लोग सब समय एक हेल्पलेसनेस फील करते हैं ये खास करके एक कफ का बोल कर के एक यूरोपियन नोवलिस्ट है उसने यह जो हेल्पलेसनेस के बारे में काफी अच्छा लिखा है वह जो सोवियत यूनियन और यह जो सोवियत सिस्टम था वो बड़ा ही स्ट्रांग पेट्रिया कल सिस्टम था बड़ा ही अथॉरिटेरियन सिस्टम था अमेरिका में जाएंगे सब समय इंडिविजुअल फ्रीडम की बात चलती रहती है मुझे जो करना चाहता हूं मैं वही करूंगा ऐसा एक वहां पे इंडिविजुअल फ्रीडम अमेरिका है इवन भारत में भी काफी इंडिविजुअल फ्रीडम है अपनी बिकॉज कि हमारी डेमोक्रेसी है किंतु जो अथॉरिटेरियन सिस्टम है जैसे कि चाइना है जैसे सोवियत यूनियन था जैसे कि ईट यूरोपियन अथॉरिटेरियन कंट्रीज थे वहां पे क्या होता था आपकी अपनी इच्छा के अनुसार आप कुछ भी नहीं कर पाएंगे सब समय आपको बताया जाएगा तुम ऐसा करो तुम ऐसा करो तुम ऐसा करो और यदि नहीं करेंगे तो बड़ी जबरदस्त पनिशमेंट होती थी वो मतलब वहां पे जेल में डाल देना मारपीट करना यह सब तो आम बात थी वहां पे तो ऐसी अथॉरिटेरियन सिस्टम में इंडिविजुअल स्पिरिट जो है वो क्रश हो जाता है किसका एक पोएटिक स्पिरिट होता है किसको नोवलिस्ट होना है किसको आर्टिस्ट होना है किंतु नहीं सिस्टम कहती है कि तुमको यही करना है तो बिना इच्छा के भी हमको यह सब करना पड़ता है तो वो जो हेल्पलेसनेस की जो भावना थी इन फेस ऑफ ब्यूरोक्रेसी इन फ्रेस इन द फेस ऑफ दिस अथॉरिटेरियन सिस्टम तो वो हेल्पलेसनेस की भावना के बारे में कफ का बोलक के जो यह नोवलिस्ट है उसने काफी कुछ लिखा है तो हेल्पलेसनेस हमको कब फील होती है जबकि हम ऐसी परिस्थिति का सामना करते हैं जो कि हमारे लिए बड़ी ही कष्टदायक है हमारे लिए बड़ी ही भयावह है और उसका सामना करने में हम लोग संपूर्ण रूप से असमर्थ होते हैं तब यह हेल्पलेसनेस डिस्पेरटनेस यदि इफ यू टेक इट पॉजिटिवली यदि आप कहेंगे कि हां यदि यह मृत्यु भय है महामारी है यह अथॉरिटेरियन सिस्टम है या व्हाट एवर इज देयर जो कि मेरे सामने आकर के खड़ा हुआ है देन आई विल ट्राई टू ट्रांस इट आई विल ट्राई टू मेक माइसेल्फ इवन बिगर इन दैट केस यू विल स्टार्ट डूइंग साधना सीरियसली यदि हम आस्तिक है तो किंतु जो नास्तिक है उनका बेचारे का क्या होगा कि भले ही भगवान पे लिप्स जैसे कि वो मास्टर महाशय ही कथामृत में उदाहरण देते हैं कि ये शोपे नवर वगैरह जो यूरोपियन पंडित है उन लोगों ये जो य खास करके यह जो एक फिलोसोफर था उसने आत्महत्या कर ली आखिर में क्यों क्योंकि उसको सृष्टि का रहस्य समझ में ही नहीं आया तो मास्टर महाशय कहते हैं इस तरह का एक नास्तिक मत पोषण करके आखिर में मुझे मेरे हाथ में कुछ नहीं आया बोलकर के नासी पास होकर के डिप्रेशन में आकर के आत्महत्या कर लेने की वजह बेटर है कि मैं ठाकुर के ऊपर में विश्वास करूं ठाकुर की अमृतवाणी को पालन करने का अपने जीवन में उतारने का मैं थोड़ा सा प्रयास करूं सो देयर इज वन वे आउट जद अथॉरिटेरियन सिस्टम है युद्ध है उसका यदि सामना करना होगा तो जद युद्ध होता है तो आपको अस्त्र शस्त्र लेकर के युद्ध करना पड़ेगा यदि अपने को बचाए रखना है बट देयर इज अ हायर वे टू ट्रांसड्यूसर अस प्रतिदिन दिन हमारे सामने यह मनुष्य सभ्यता में एक के बाद एक घटनाएं दुर्घटनाएं जो हमारे सामने उपस्थित हो रही है उसका सामना करने का एक उच्चतर मार्ग भी है और वो है ईश्वर प्राप्ति के लिए साधन भजन तो ये दो मोटिवेशन है अपने जीवन में वेदांत हमको आत्मा का अमरत्व का प्रलोभन देता है तो हम प्रलोभन से वश होकर के आत्मा भाव की साधना प्रारंभ करें ना कि फिर मां काली हमको मृत्यु भय दिखाती है दुर्घटना का भय दिखाती है तो उससे डर करके हम इस रास्ते पे चले दो माने दो मोटिवेशन है स्टिक एंड कैरट ये दोनों मोटिवेशन हमको इस रास्ते प चलने के लिए मोटिवेट करते हैं इफ वी कैन टेक इट पॉजिटिवली यदि नेगेटिवली लेंगे तो फिर जितने भी एडिक्शन है जितने भी ये बैड हैबिट्स से उसमें हम डूब जाएंगे अमेरिका में देखिए कि एक मैं स्टडी पढ़ रहा था कि कॉलेज में पढ़ने वाले लड़कों में जो एल्कोहोलिज्म का जो प्रमाण है इतना बढ़ गया है पहले वैसे ही तो वहां पे शराब पीना वगैरह आम बात है किंतु खास करके कॉलेज के लड़कों में आज से 10 15 20 साल पहले जो लोग जिस तरह से शराब पीते थे उससे कहीं ज्यादा आजकल पी रहे हैं क्यों क्योंकि एक तो है स्टूडेंट डेट एक तो वहां पे एजुकेशन हायर एजुकेशन प्राप्त करना कॉलेज का आपको बहुत ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है तो आपको वह ऋण लेना होगा अभी ऋण ले लिया है फिर तो ऋण तो चुकाना भी तो होगा यह सब चीजें कोई मुफत में नहीं होती तो वो एक टेंशन रहता है फिर क्या है कि जितना एक क्रिएटिव डिस्ट्रक्शन है आज की इकोनॉमी में प्रतिदिन हाईफाई इनोवेशन होती रहती है यदि आप अ कीप अप नहीं करेंगे आप देखिए ना चार पा साल पहले एआई का नाम भी किसने सुना था और आजकल बिना एआई के एक भी कंपनी नहीं चल पाएगी इतना विदन फोर फाइव इयर्स से रेवोल्यूशन आ गया है तो यह सतत एक क्रिएटिव डिस्ट्रक्शन चलता रहता है यू विल हैव टू कीप योर नॉलेज अपडेटेड यदि सतत अपने नॉलेज को अपडेट नहीं किया तो आप एंप्लॉयमेंट की रेस में से फटाक करके बाहर निकल जाएंगे तो यह टेंशन की वजह से दिन रात वोह लोग अपने मन को शांत करने के लिए शराब पान किया करेंगे तो दैट इज अ निम्न कक्षा का एक रास्ता है अपने मन को शांत करने का हायर वे इज देयर द वे ऑफ मेडिटेशन द वे ऑफ योगा द वे ऑफ वेदांता तो लेट अस मेक अ स्मार्ट चॉइस इन अवर लाइफ दोनों मोटिवेशन सब समय हमारे सामने आते ही रहेंगे टेक और खास करके यह मृत्यु रूपा काली यह मां काली को नजर के सामने रख कर के जितना भी यह ऐसी घटनाएं होती है जो कि हमारे शरीर मन को आतंकित कर देती है टेक इट ऐ प्रसाद महाकाली का प्रसाद है ऐसा समझ कर के यह साधन भजन में और ज्यादा डूब जाए जिससे कि अपना जो भविष्य के जितने भी जन्म है एक के बाद एक जैसे हमने डिस्कस किया था कर्म हमारा बैंक बैलेंस है बैंक बैलेंस में नेगेटिव कर्म पॉजिटिव कर्मा दोनों इकट्ठा होते हैं फिर जैसे ही यह देह छोड़ कर के इस देह का त्याग करके नया देह प्राप्त करेंगे उस समय ये इस देह का बैंक बैल बैंक अकाउंट क्लोज हो जाएगा और जो बैलेंस है वो कैरी फॉरवर्ड होगा तो पॉजिटिव बैलेंस है तो पॉजिटिव बैलेंस कैरी फॉरवर्ड होगा नए देह में और यदि नेगेटिव है तो वो नेगेटिव कैरी फॉरवर्ड होगा तो लेट अस मेक दिस स्मार्ट चॉइस टेक बोथ ऑफ दिस प्रलोभन एंड पनिशमेंट दोनों को एक प्रॉपर एक उसके रूप में ले प्रेरणा के रूप में ले मोटिवेशन के रूप में ले और अपना साधन जीवन जो है उसको हम स्व सशक्त बनाए तो यह तो एक बात हो गया दूसरा है कि हमने जैसे कल हमारी बात हो रही थी कि आप खुद संहार मूर्ति क्या धारण कर सकते हैं कि नहीं जैसे कि शत्रुओं के विनाश के लिए मुझे संहार मूर्ति धारण करनी पड़ेगी कि नहीं यहां पे कैसा है देखिए कि जैसे ठाकुर कहते हैं ना कि वो आपका तमोगुण के मारो काटो डकेट लोग जब आक्रमण करते हैं व किसी डके करने के लिए गांव के ऊपर में कि यात्रियों के ऊपर में तो जोर-जोर से चिल्लाए मारो काटो ऐसा करके तो फिर क्या होगा कि यह जो रक्षण करने वाले है गांव का या यात्रियों का वे लोगों का हृदय जो है ना डर के मारे बिल्कुल यह हो जाएगा तो ये यह तमोगुण है जो ये तमो भाव है वो उसको भी साधना में डालना है कि ऐसा करके भय दिखाना है लोगों को तो यहां पर पता है एक्चुअली इसको किस कांटेक्ट में देखना चाहिए दुश्मन आ जाते हैं जैसे भारत के ऊपर में किसी आतंकवादियों ने हमला किया तो हमारे सोल्जर शौर्य वीर्य भाव से उनका सामना करेंगे तो वह तो एक स्थूल जग में हो गया साधन जगत में इसका क्या अर्थ है साधन जगत में रुद्र भाव धारण करना इसका क्या अर्थ है कि जब जैसे कि यह ठाकुर का खुद का देखिए उदाहरण कि एक बार वह भाव में ही अपने साथ में बात कर रहे हैं और क्या कर रहे हैं तई आमा के प्रलोभन दिखाते शज जा शाली ऐसा करके वह गाली दे रहे हैं मन में भाव में है और गाली दे रहे है किसी को अर्थात कि फिर मास्टर महाशय इस बात को इंटरप्रेट करते हैं कि ठाकुर को जदी ने प्रलोभन दिखाया है वो जैसे वो उदाहरण है ना कि ठाकुर पंचवटी के नीचे में बैठ कर के ध्यान कर रहे थे तो प्रलोभन दिखाने के लिए उनको एक दर्शन दिखा कैसा दर्शन उनको दिखा कि एक गोरा खलासी एक बड़ा थाला लेकर के खड़ा है जिसमें कि सोना महर है संदेश है वगैरह सब है उसमें और दो सुंदर स्त्रियां तो ठाकुर बोलते हैं तार भतर एक एक फांदी नथ अर्थात की नाक में वो जो नथ है वो एक नथ पहनी हुई थी तो बड़ी ही सुंदर स्त्रियां और यह मने पावर एंड कामिनी एंड कांचन एंड पावर लोक मान्यता यह सब ठाकुर के सामने आकर के उपस्थित हुआ है तो ठाकुर क्या कहते हैं कि मैं रो रो करके माहाकाली को प्रार्थना करने लगा कि इनको आप यहां से हटाए तो वो एक बात है कभी-कभी ठाकुर एकदम गाली गलोज देना शुरू कर देते हैं जाओ शली खानते के आमा के प्रलोभन दिखा एशो तो वो रुद्र भाव धारण करने का या तो फिर तामसिक भाव धारण करने का क्या तात्पर्य है कि जब हम ध्यान करने के लिए बैठे हैं हमारे सामने यदि प्रलोभन आता है या सिर्फ ध्यान करने के लिए ही नहीं जीवन में भी इन जनरल साधक जीवन में जब भी हमारे सामने प्रलोभन आता है तो विल पावर को तो स्ट्रांग करना पड़ेगा बिना विल पावर को स्ट्रांग किया आप किस तरह से उसका सामना करेंगे सब समय मोटिवेशन काम नहीं करता यहां पर मृत्यु रूपी मोटिवेशन है यहां पे आत्मन रूपी पॉजिटिव मोटिवेशन है किंतु यह दोनों मोटिवेशन मिलकर के भी आपको साधन राज्य में आगे नहीं बढ़ा पाएंगे जब तक हमारा खुद का एक प्रचंड विल पावर ना हो तो वो विल पावर अर्थात कि वही रुद्र स्वरूप हमको धारण करना है और हमको यह रुद्र स्वरूप धारण करके सामने आए हुए प्रलोभन का डट कर के मुकाबला करना है तो देखिए कि रुद्र स्वरूप दो तरह के हैं मृत्यु स्वरूप दो तरह के हैं एक तो है कि हमको मोटिवेशन देने के लिए यह हमारे सामने खड़ा होता है कि इस तरह का एक मृत्यु भय है इस तरह का महामारी युद्ध प्रचंड भयानक विनाश हमारे जीवन में मनुष्य के जीवन में या सभ्यता के जीवन में सिविलाइजेशनल और इंडिविजुअल लाइफ के सामने हमेशा उपस्थित होता है तो पहले से ही स्टार्ट मेकिंग स्मार्ट चॉइसेज इन योर लाइफ पहले से ही अच्छी चॉइस करना शुरू कर दो अपने जीवन में वरना तो एक बार जब आखिरी घड़ी में ये आ जाएगा तो बिल्कुल वल्नरेबल होकर के खड़े रह जाओगे सो दैट इज वन थिंग वन पार्ट ऑफ दिस कांसेप्ट ऑफ मृत्यु रूपा काली सेकंड इज टू टेक दैट भाव इनसाइड अस टू टेक दैट फॉर्म टू इवोक मदर काली इनसाइड अस टू किल द एनीमीज अब ये एनिमी दो तरह के है ग्रॉस एनिमी तो है ही है जैसे कि शुंभ निशुंभ का विनाश करने के लिए मां काली ने जन्म धारण किया था किंतु आज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह राक्षस जो है वह हमारे ही मन के भीतर में छुपे हुए प्रलोभन है और उनका डट कर के सामना करने के लिए हमको रुद्र स्वरूप धारण करना होगा हमको अपना विल पावर प्रचंड बना देना होगा जैसे कि जितनी भी बार मैं बैठ कर के या तो फिर स्व चरित्र जीवन पालन करने का प्रयास करूं और जब भी यह मेरे सामने आए मुझे दूसरे रास्ते पर ले जाने के लिए तब रुद्र काली मेरे खुद के मन में प्रकट होगी और मैं इन राक्षसों का संहार करूं तो दो तरह से देखिए कि यह मृत्यु रूप कपा काली हम इस कांसेप्ट को देख सकते हैं एक तो है कि हमको मोटिवेशन देने के लिए जिससे कि वी कैन मेक स्मार्ट चॉइस इन आवर लाइफ और सेकंड है कि विल पावर को फॉर्म अप करने के लिए विल पावर को दृढ भूत करने के लिए जिससे कि जब भी प्रलोभन आए हम उसका सामना कर पाए सो दिस आर टू बेसिक कांसेप्ट ऑफ रुद्र स्वरूपिणी काली अभी इसके बाद का कांसेप्ट हम कल देखेंगे आज यहीं तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तस्त श्री राम कृष्णा अर्पण मस्तु वो काशीपुर में वह पता है ना आपको पैसा लेकर के कुछ सब बातें चली थी कि यह रामचंद्र दत्त वगैरह जो लोग नौकरी करते थे वह पैसा देते थे और फिर यह यंग लड़के वहां पर रहकर सेवा करते थे तो ये रामचंद्र वगर ने बोलना शुरू कर दिया कि यह लड़के लोग यहां पर रहते हैं तो खर्चा बहुत होता है तो फिर ठाकुर बड़े ही दुखित हो गए थे फिर स्वामी जी को क्या कहते हैं तोर कंधे कांधे बोसीय जेखाने निए जा भी सेखाने जावो अपनी अपने कंधे पर बिठा कर के तुम मुझे जहां पर भी ले जाओगे भिक्षा करके भी मुझे खिलाओगे वो मैं खाऊंगा वहां पर मैं जाऊंगा तो स्वामी जी जब बेलूरमठ में ठाकुर का अस्थि स्थापित कर रहे थे और ये उस समय उन्होंने यह बात अपने शिष्य को बताई थी शरद चंद्र को कि देखो ठाकुर ने मुझे ऐसा कहा था इसीलिए आज मैं ठाकुर के अस्थि को अपने कंधे पर बिठा कर के यहां पर बेलूरमठ में लाया हूं और ठाकुर यहां पर स्थापित होंगे क्योंकि यह ठाकुर का खुद का प्रॉमिस है तो उसके बाद में फिर वो तो हो गया था कि वो सुरेश मित्र वगैरह ने पैसा देना शुरू कर दिया था किंतु देखिए कि ये पैसे को लेकर के यह सब है अपने वो स्वामी जी के कुछ दूर के रिश्तेदार थे और उनके घर की परिस्थिति ऐसी थी उस समय कि स्वामी जी के घर में रहकर के उन्होंने स्टडी किया है स्वामी जी के पिताजी थे उन्होंने उनके पैसा पैसा देकर के स्टडी करवाया है और बाद में हां रामचंद्र दत्त और फिर जब बड़े हुए और इतने सक्सेसफुल हो गए तो उन्होंने स्वामी जी को सहाय नहीं की जब स्वामी जी को स्वामी जी के पिताजी का मृत्यु हुआ था और उनको आर्थिक सहाय की जरूरत थी तो देखिए कि लगता है कि जब स्वामी जी के घर में रहते होंगे उसी समय से उनके प्रति किसी ना किसी तरह का द्वेष होगा क्योंकि नेचरली ही आप किसी के घर में रहेंगे तो पिताजी तो अपने खुद के बच्चे हैं उसी को तो ज्यादा प्राधान्य देंगे ना वो दूसरे रिलेटिव का लड़का रह रहा है घर में तो उसको तो इतना मतलब बेसिक चीजें सब पूरी करेंगे किंतु लग्जरी वगैरह स्पेशल तो कुछ उसके लिए होगा नहीं तो कुछ ना कुछ उनके मन में रह गया होगा तो बोलक के बड़े होकर के बाद में जब स्वामी जी इस तरह से संन्यास लेते हैं उनके घर में ऐसी परिस्थिति हो होती है तो धनवान होते हुए भी और बड़ा हृदय नहीं रख पाते सो मुझे लगता है वो राम गिरीश घोष वगैरह कहा करते थे य दत्त दत्त के बीच बीच का झगड़ा है उसमें मैं नहीं आना ये नरेंद्र यह भी दत्त फैमिली के है ना सब तो दत्त दत्त के बीच का झगड़ा है उसके बीच में हमको नहीं आना ये फैमिली फ्यूड जिसको कहते हैं ना कौरव पांडवों का कैसा था कि वो भीम जब ये छोटे थे तो उनकी पिटाई किया करता था तो उसकी दुश्मना आवट बड़े होकर के इस तरह से निकाली किंतु देखिए कि स्वामी जी के घर के लोगों का बड़पन देखिए स्वामी जी के जो छोटे भाई है ना महेंद्रनाथ दत्त जिन्होंने बहुत सारी किताबें लिखी है उनमें उन्होंने यह भी एक लिखा है महात्मा रामचंद्र दत्ते अनुदीप में या उनके परिवार के भीतर में उनके प्रति ऐसा कोई द्वेष भाव नहीं था पता नहीं वही क्यों यह सब ऐसा और आखिर में देखिए इसकी जो परि समाप्ति कैसे होती है मैंने शुरुआत तो हुई कि रामचंद्र दत्त स्वामी जी के घर में बड़े हुए और पता नहीं कुछ ना कुछ वो रह गया होगा इसका अंत कैसे आया जीवन समाप्त होने के समय रामचंद्र दत्त वहां पर बीमार थे और कांकड़ काछी अपने योगोद्यान में थे बहुत ही बीमार दे मृत्यु समय आ गया था उस समय विश्व विजेता स्वामी जी अभी तो कल छोकरा नर नहीं रहा वो मारा मारा घूम रहा है विश्व विजेता स्वामी जी अमेरिका से वापिस आए रामचंद्र दत्त को मिलने के लिए जाता है अभी रामचंद्र दत्त उनको बाथरूम जाने की आवश्यकता आन पड़ी तो बड़े ही वह बीमार होथे शरीर बड़ा ही अस्वस्थ था तो कैसे भी करके बैठे अभी चप्पल खोजने के लिए वह नीचे झुक रहे हैं चप्पल वो बेड के नीचे में चले गए तो उनके हाथ में नहीं आ र है तो स्वामी जी सामने बैठे थे चेयर के ऊपर में इमीडिएट कुर्सी से नीचे उतर कर के बेड के नीचे में हाथ डाल के वोह चप्पल निकाल कर के उनके सामने रख तो जैसे ही रामचंद्र ने यह देखा तो उनकी आंखों में से आंसू आ गए बोला कि देखो नरेण इतने दिनों के बाद में अभी मुझे समझ में आया कि जो ठाकुर तुम्हारी प्रशंसा करते थे तुमको महात्मा देते थे वह झूठ मुठ का नहीं देते थे वाह मने उनको बेचारे को तो दो जगह प ऐसा हुआ ना स्वामी जी के घर में बड़े हुए हैं तो पिताजी तो स्वामी जी को ही प्राधान्य देंगे अब जब ठाकुर के पास में आया तो ठाकुर भी स्वामी जी को प्राधान्य दे रहा है किंतु यह घटना के बाद में कहते हैं कि देखो नरे ठाकुर जो तुमको प्राधान्य देते थे वो झूठ मुटका नहीं देते अभी मुझे पता चला हा फिर वो फिर से आना पड़ता उसको रिजॉल्व करने के लिए ठाकुर कहते हैं मेरे पास में जो आते हैं सबका आखिरी जन्म मां कहती थी कि ठाकुर के पास में जो भी आते हैं सबका आखिरी जन्म है तो ठाकुर को तो ये प्रूव करना पड़ेगा ना इसमें क्या है ना देखिए जब भी क्राइसिस आती है तब प्यास लगी है तो कुआ खोदने को जाना ऐसा करने से तो ज्यादा कुछ लाभ नहीं है फ्रॉम द चाइल्डहुड इट सेल्फ की हमको ना स्मार्ट चॉइस करनी होगी पेरेंट्स को अपने बच्चों को ना अभी क्या है पता है हम लोग जैसे ही धर्म का नाम देते हैं ना तो कैसा एक पिक्चर खड़ा होता है मंदिर में जाओ अच्छे कपड़े पहन के वहां पर पूजा पाठ वगैरह करो फिर मने दिस इज एन एक्सटर्नल एस्पेक्ट ऑफ रिली एक्सटर्नल एस्पेक्ट राइट देर इज इंटरनल एस्पेक्ट योगा एंड वेदांता अपनी प्रत्येक सांस के साथ में ना योग और वेदांत को बुन लेना है बचपन से ही यह अपने जीवन में एक इस तरह से स्पिरिचुअलिटी का प्रवाह बहाना है कि जब भी हम बड़े होंगे जब क्राइसिस आएंगी वी हैव द टूल्स दैट कैन हेल्प अस क्रॉस दिस क्राइसिस तो बड़े होक अभी हम सबके साथ में तो वही है ना कि बड़े होकर के ही तो हमें यह क्या ला बचपन में ठीक है मंदिर वगैरह में जाते थे वो कोई बड़ी बात नहीं किंतु एक्चुअल स्पिरिचुअलिटी क्या है वो क्यूरियोसिटी और फिर उसको एक्सप्लोर करने की अकल तो बड़े होने के बाद में ही आई किंतु जब बचपन से सभी के साथ में ऐसा ई होता है किंतु बचपन से जब यह सब कहानियां है ना ठाकुर महा स्वामी जी या जिस किसी भी भी अवतार पे अपनी विश्वास हो तो कहानियां पढ़ते रहने से मन में वो टूल्स रेडी हो जाते हैं फिर जब क्राइसिस आती है वी कैन यूटिलाइज दोस टूल्स टू कीप द पीस ऑफ अवर माइंड टू कीप द सैनिटी इंटैक्ट वो पहले से ही हमको थोड़ा सा करना पड़ेगा ये स्कूलों में आजकल पहले तोय झुठ मुठ का सेकुलरिज्म था ये बाकी जितने भी धर्म है क्रिश्चियनिटी वगैरह वो सब बाइबल फाइबल सिखा सकते हैं अपनी स्कूलों में हम लोग हिंदू लोगों को ही ना ही गीता सीखने को मिली ना ही उपनिषद का नाम कभी सुना था बूढ़े हो गए तब तक तो ये झुठ मुठ का सेकुलरिज्म हटा करके फ्रॉम द चाइल्डहुड इट सेल्फ इनर स्पिरिचुअलिटी है उसके टूल्स बच्चों को देने होंगे सो दैट व्हेन द टाइम कम्स दे कैन यूटिलाइज दो टूल्स इन ट केस जो जो जैसे कि क्राइसिस आ जाती है तो आपको इंजेक्शन लेना पड़ेगा मैं जैसे कि आप वो छोटा-मोटा बुखार है तो वो मेडिसिन से चल जाएगा बड़ा कुछ है तो इंजेक्शन लेना पड़ेगा तो वो जो एक बूस्ट अप चाहिए उसके लिए तो फिर बाकी सब ट्रेडिशनल रिलीजियोसिटी तो ही है या तीर्थ यात्रा के लिए जाओ कैलाश मानसरोवर अमरनाथ वगैरह जगह पे लोग क्यों जाते हैं कुछ एक बड़ा क्राइसिस आ गया मन को शांति चाहिए वो मां ने पंच तपा किया था ना ठाकुर के जाने के बाद में मन में इतना आगुण जल रहा है कि शांति मिल ही नहीं रही अ मां की जद ये परिस्थिति हम लोगों की क्या होगी तब वह किसी ने सजेस्ट किया कि चलो पंच तपा करते हैं तो दैट इज यह जो अमरनाथ यात्रा या तो फिर यह नर्मदा परिक्रमा य लोग क्यों करते हैं जिससे कि इमीडिएट हमको बूस्ट अप मिल जाए सो दैट वे देर आर ऑप्शंस आर देयर