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ओम स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप पिणे अवतार षय राम कृष्णा यते नम तो स्वामी विवेकानंद का जीवन का एक आउटलाइन हम देख रहे थे यह जो क्रोनोलॉजी है मैंने आपके साथ में शेयर किया तो इसमें हमने देखा कि किस तरह से मैंने स्वामी जी के जीवन के ऊपर में जितनी भी प्रमाणित ग्रंथ लिखे गए हैं जैसे कि लाइफ ऑफ स्वामी विवेकानंद बाय ईस्टर्न एंड वेस्टर्न डिसाइल है उसके बाद में यह कंप्लीट वर्क्स से मेरी लुईस का न्यू डिस्कवरी है छह वॉल्यूम में रेमसंस है और फिर यह शंकरी प्रसाद बसु का आठ वॉल्यूम में स्वामी विवेकानंद और समकालीन भारतवर्ष तो इसमें जितना भी इंफॉर्मेशन मिला उन सबको कलेक्ट करके मैंने यह क्रोनोलॉजी बनाया है और इसी क्रोनोलॉजी के आधार पर मैंने देखा कि यदि स्वामी जी के जीवन को हम कुछ मेजर फेस कुछ पीरियड और कुछ चैप्टर्स में बांट दे तो हमको स्वामी जी के जीवन को उनके उपदेश को समझने में काफी सुविधा होगी तो इसी आधार पर मैंने आपसे पहले लास्ट क्लास में हमने डिस्कस किया था कि किस तरह से कुछ मेजर फेजेस में बांट दिया है वो फेजेस के भीतर में पीरियड्स है और पीरियड के भीतर में यह चैप्टर्स है तो देखिए कि अभी स्वामी जी के जीवन का फिफ्थ फेज स्टार्ट हो चुका है इससे पहले हमने देखा कि स्वामी जी का जो फर्स्ट फेज चाइल्डहुड एंड यूथ 1816 से हो गया 18 18811 18864 टू जुलाई 1890 उसके बाद में स्टार्ट हुए परिज डेस जुलाई 1890 टू मे 1893 मे 1893 में आखिर में स्वामी जी अमेरिका जाने के लिए उने प्रयाण किया तो यह फिफ्थ फेज है मिशन टू द वेस्ट मे 1893 टू दिसंबर 18960 होते हैं 94 पूरा 95 पूरा 96 पूरा और 93 आधा यानी कि 35 साल का यह पूरा स्वामी जी का अमेरिका का दौरा पहला दौरा यह रहा और इतने बिल्कुल कम कम समय में सिर्फ साढ़े तीन साल में स्वामी जी ने वो करके दिखाया जो कि हम कोई भी उनके बाद में गए हुए कोई भी प्रचारक कहो क्या उनके पहले वाले किसी ने भी एक विदेशी धरती में हिंदू सभ्यता का बीच इतना शॉर्ट टाइम में इतने अल्प समय में इतना गहराई से बोया नहीं है जितना स्वामी जी ने इतने साढ़े तीन साल के सफर में किया विदेश के तो इस सफर का दौरा और उसका जो आउटलाइन है वह थोड़ा सा हम देखते हैं तो यह जो पीरियड है इसके भीतर में अमेरिका के जो स्वामी जी का जो मिशन है उसमें हमको कितने पीरियड दिखाई देंगे सबसे पहले तो वो डिस्कस कर लेते हैं सबसे पहला पीरियड है वॉयज एंड अर्ली डेज इन अमेरिका में से स्वामी जी निकले और फिर वहां जाकर के वर्ल्ड पार्लियामेंट के पहले के जो कुछ दिन है उस समय का उसके बाद में पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन उसके बाद में साइक्लोनिक मंग उसके बाद में अच्छा इसको चैप्टर्स के साथ में ही डिस्कस करते हैं सबसे पहला पीरियड है मिशन टू द वेस्ट का वॉयज एंड अर्ली डेज इन अमेरिका मई में निकले मई में हमको पता है कि स्वामी जी उस समय मद्रास थे और खेतड़ी के राजा ने उनको पुकारा वहां पर कि आप आइए आपके आशीर्वाद से मेरे पुत्र का जन्म हुआ है पुत्र को आशीर्वाद दीजिए और फिर आपको जो भी सहाय चाहिए विदेश के दौरे के लिए तो मैं करूंगा तो इस तरह से स्वामी जी वहां पर निकले और हमने यह भी देखा कि स्वामी जी को इस तरह से चद्दर पैसे कलेक्ट करना अच्छा नहीं लगता था तो विदेशी सफर के लिए आला सिंगा वगैरह जो लड़कों ने कुछ पैसा कलेक्ट किया था उसको स्वामी जी ने वापस लौटा दिया था तो और साथ-साथ में स्वामी जी एक बड़ा ही इंपोर्टेंट बात भी कहे थे कि मैसूर के राजाना कि ऐसे कुछ लोगों ने वहां के कुछ बड़े-बड़े लोगों ने स्वामी जी को प्रॉमिस किया था कि हां आपकी स के लिए आपकी जर्नी के लिए हम आपको ये करेंगे स्पांसर करेंगे अनफॉर्चूनेटली जब समय आया पैसा पैस का देने का तो सभी ने शायद मना कर दिया या बहाने करने लगे ना कि फिर जितना एक्सपेक्टेड था उससे कम पैसा दिया जो भी रीजन हो जो स्वामी जी की जो उनसे अपेक्षा थी वो संपूर्ण नहीं हुई तो इस बारे में स्वामी जी एक पत्र में लिखते हैं कि यह जो राजपुताना के जो राजा है जो प्राण जाई पर वचन ना जाई तो यह जो रघुवीर नीति सदा चली आई ये इन लोगों में है यह साउथ के राजा लोगों ने वचन तो दिया किंतु सामने इसको पूरा नहीं किया जबकि यह जो राजपुताना के राजा है उन्होंने जो वचन दिया वह सही में उन्होंने पूरा करके निभाया और राजा खेतड़ी के राजा के बारे में हमको पता है कि स्वामी जी जब अमेरिका थे तो उस समय खेतड़ी के राजा मट को नियमित रूप से सहाय भेजते थे कलकाता में जो मठ था सर्वप्रथम तो वरा वरा नगर मठ में तो उस समय तो निकल गए थे स्वामी जी और उसके बाद में गुरु भाइयों ने जो कि कलकाता में थे उन्होंने मठ को शिफ्ट कर दिया था क्योंकि वो रा नगर मठ वाला जो बिल्डिंग था वो बहुत पुराना हो गया था तो ये लोग आलम बाजार चले आए थे तो ये आलम बाजार मठ में राजा के खेतड़ी के राजा नियमित रूप से प्रति महीने कुछ-कुछ रुपया बेचते थे और कुछ समय के बाद में उन्होंने स्वामी जी की मां को भी भुवनेश्वरी देवी को भी प्रति माह प्रति महीने रुपए भेजने की आर्थिक सहाय देने की शुरुआत की थी तो देखिए कि एक खेतड़ी के राजा कि जिन्होंने इतना सारा स्वामी जी को सहाय किया अनफॉर्चूनेटली उनका अंत भी बड़ा दुखद रहा ऐसा कहा जाता है कि जयपुर के जो महाराजा थे उसके साथ में उनका सतत कुछ ना कुछ लेकर के वाद विवाद चलता रहता था और मैंने यहां भी ऐसा भी एक पड़ा था कि उनका जो राजकुमार था उनको यह लोग वारस के रूप में स्वीकार नहीं कर रहे थे पता नहीं क्या रीजन है व शायद बहुत उम्र में छोटा होगा या जो कुछ भी होगा तो इसी सब के चलते खेतड़ी के राजा वो काफी थोड़े से परेशानी में भी थे और एक बार वो कहीं पे एक बड़े टावर पे वो उसकी साइड सीइंग के लिए वो चढ़े होंगे तो शायद वहां से उन्होंने जंप लगा दिया वो सुसाइड था एक्सीडेंट था अभी कना मुश्किल है किंतु एक बड़ा ही दुखद अंत आया जो भी है स्वामी जी के आशीर्वाद प्राप्त हो गए हैं तो उनका यह आखिरी जन्म होगा तो इस तरह से स्वामी और यही खेतड़ी के राजा ने स्वामी जी के लिए जो विंटर वहां तो ठंड बहुत पड़ती है तो कपड़े वगैरह ले लिए थे उनके लिए लगेज वगैरह का व्यवस्था कर दिया था बमबे में उनके जो एजेंट थे एजेंट के साथ में उनको मिला दिया था स्वामी जी को और वही एजेंट आखिर में स्वामी जी को जहाज पर बिठा करके आ गया था तो इस तरह से स्वामी जी की अमेरिका की सफर प्रारंभ हुई इस सफर के बारे में देखिए कि ओशन वॉयज टू अमेरिका ये जो फर्स्ट चैप्टर है मे टू जुलाई 1893 मई में स्टार्ट हुआ था जून जुलाई तक वहां पर जाने में उनको लगा उस समय की लंबी जर्नी आजकल की तरफ नहीं कि 24 घंटों में ना कि 48 अवर्स में आप ये आधा जगत भ्रमण कर ले उस समय तो ये सब स्टीम बोट में जाना पड़ता था सी सिकनेस एक बड़ा ही डेंजरस एक था तो जो भी है इस तरह से सफर प्रारंभ हुई और इस सफर के बारे में सबसे इंपोर्टेंट हाईलाइट जो है जो कि आज भी स्वामी जी के जो डिवोटा है स्वामी जी के एडमायब्रांड सफर का तो वर्णन किया है किंतु साथ में उन्होंने इन लोगों को जो भारत की जो हजार साल की मित्रा है यह जो तमस में हमारे लड़के डूबे हुए हैं हमारी सभ्यता संस्कृति हमारा समाज उसको जागृत करने के लिए जिस तरह से चाबुक मार कर के स्वामी जी ने बात की है वो इस पत्र की बहुत बड़ी विशिष्टता है मेरा जो फेवरेट सेंटेंस है उसमें से काफी बार मैंने कोट किया है स्वामी जी व सब लड़कों को बोलते हैं आला सिंगा वगैरह जो ट्रिपली केट लिटरेरी सोसाइटी के जो सब थे सदस्य उनको कहते थे कि सी हाउ द नेशंस आर ऑन द मार्च कि देखो कि यह जो बाकी सब देश है किस तरह से सभ्यता की ये आगे कुछ में कदम से कदम मिलाकर के चल रहे हैं पश्चिम के साथ में हमको तो ऐसा लगता था कि भारत एक देशी मतले एक पूर्व का देश है तो पश्चिम के साथ में कहां मुकाबला कर पाएगा ये क्योंकि यह दोष सिर्फ भारत का नहीं है पूरी पूर्वी सभ्यता ही डूबी हुई है ईस्टर्न सिविलाइजेशन पूरी इस तरह से तमस में डूबी हुई है यह हम लोग एक कुछ कुछ लोग मानते थे तो यह जापान को देख कर के स्वामी जी का यह संदेह भ्रम दूर हो गया कि सिर्फ पश्चिमी देश ही सभ्य मने आधुनिक साइंस एंड टेक्नोलॉजी डेवलप कर सकते हैं इंजीनियरिंग वगैरह तो ऐसा नहीं है इंजीनियरिंग इंडस्ट्रियल इजेशन सिर्फ पश्चिम का एकलौता अधिकार नहीं है उनकी मोनोपोली नहीं हम पूर्वी देश भी चाहे तो इस निद्रा में से जागृत होकर के अपने को इंडस्ट्रियल इज्ड नेशन बना सकते हैं तो वह स्वामी जी का खुद का एक बड़ा एक आई ओपनिंग उनका रहा उनकी एक बड़ी इनसाइट रही और वहीं से उन्होंने जो आला सिंगा को लिखने पत्र लिखने का जो दौर प्रारंभ किया तो वह पत्र एक के बाद एक हम पढ़ेंगे तो हमको लगेगा कि किस तरह से भारत में नवजीवन की शंख नाथ नवजीवन का जो वो जो मूर्ति के भीतर में जो यह करते हैं ना प्राण प्रतिष्ठा वो एक टैगोर फैमिली की एक लेडी थी भारती बोलकर के जो पत्रिका थी उसकी एडिटर मैं उसका नाम भूल गया तो उसको स्वामी जी ने एक बड़ा सुंदर पत्र लिखा था वह जब अमेरिका से वापस आए तब और उन्होंने एक सरला सरला घोषाल यस सरला घोशाल यस तो सरला घोषाल को स्वामी जी ने एक सुंदर पत्र लिखा था उस पत्र में उन्होंने कहा कि एक जापान की एक कहानी उनको बता कर के कि जापान में एक ऐसी मिथ है एक ऐसी लोक वाहिका है बच्चे ऐसा मानते हैं कि उनकी जो गुड़िया है खिलौने की उस गुड़िया को जद आप बहुत ही प्रेम करेंगे जी जान से उसको चाहेंगे तो गुड़िया के भीतर में प्राण संचार होगा और वह जीवित हो जाएगी तो स्वामी जी इसी बात का उल्लेख करके सरला घोशाल को कहते हैं कि यदि भारतवासी भी इतने जो स्वार्थ पर हो गए हैं इतने एक तरह से क्या कहेंगे कि मातृभूमि के प्रति संपूर्ण रूप से उदासीन हो गए हैं यदि भारत के कुछ लोग इस भारत माता को इस भारतीय भूमि को जी जान से चाहेंगे अपना प्राण नु छावर करने के लिए तैयार होंगे तो यह सोई हुई धरती भी फिर से जग उठेगी तो इतनी सुंदर कहानी स्वामी जी ने हमको पता नहीं कि वो जापान गए थे तब सुना था या किसी किताब में पढ़ा था किंतु दिस इज रिलेटेड टू जापान इसलिए मैंने कहा तो वो जापान की योकोहामा पोर्ट जो था तो उसकी मुलाकात और फिर वहां से गए स्वामी जी कैनेडा कैनेडा के वैंकूवर पैसिफिक रूट से गए थे अटलांटिक रूट से नहीं अटलांटिक के थ्रू जाते तो यह जो स्वेस कैनाल इजिप्त फिर मेडिटरेनियन फिर यूरोप और फिर वहां से जिब्राल्टर क्रॉस करके स्ट्रेट ऑफ जिब्राल्टर क्रॉस करके टिक क्रॉस करके न्यूयॉर्क जाते किंतु पैसिफिक का रूट लिया था इसके लिए पहले तो श्रीलंका श्रीलंका के बाद में यह जो मलाका स्ट्रेट है वहां से सिंगापुर सिंगापुर देखा था श्रीलंका देखा था श्रीलंका में जो सोते हुए भगवान बुद्ध की मूर्ति है उसका भी उन्होंने दर्शन किया था फिर मलाका स्ट्रेट क्रॉस करके मकाऊ गए थे जहां पर ये आजकल बहुत सारे कैसिनो है अभी तो चाइना के हाथ में आ गया है तो वहां पर कैसिनो अभी तो कैसिनो बहुत सारे हैं उस समय इतने नहीं थे स्वामी जी ने होंग कोंग वगैरह का भी मुलाकात ली थी कुछ बौद्ध मंदिरों को देखा जहां पे उनको ये बंगोली लिपि में लिखे हुए मंत्र दिखाई दिए थे फिर मैंने ये जो हिंदू सकति किस तरह से साउथ ईस्ट एशिया में फैली है स्वामी जी ने उसको फर्स्ट हैंड उसका मैंने दर्शन किया था आज हम लोग बोलते हैं कि दो तरह के रूप थे एंट विश्व में पुरातन विश्व में एक तो था कि स्पाइस रूट दूसरा था कि सिल्क रूट तो यह सिल्क रूट जो है वो नॉर्दर्न चाइना से स्टार्ट हो करके टिब क्रॉस करके नॉर्दर्न इंडिया से हो करके यह जो सेंट्रल एशियन जो रिपब्लिक्स है आजकल के ताजिकिस्तान तुर्कमेनिस्तान वगैरह तो वहां से क्रॉस करके आखिर में यह इस्तांबुल और इस्तांबुल से यूरोप की ओर जाता था और इस सिल्क रूट पे व सिल्क उसका जिस तरह से नाम है उस तरह से पूर्व से चाइना से भारत से सिल्क के बने हुए वस्त्र ऊंट पर बिठा कर के यह जो सौदागर थे वो यूरोप ले जा ले जाते थे और इसी रूट के द्वारा मार्को पोलो बोलकर के एक बड़ा ही फेमस एक्सप्लोरर य पूर्व की मुलाकात के लिए आया था पूर्व में जर्नी किया था और इसी रूट के थ्रू ये सिल्क रूट के थ्रू ही पुराने समय में बुद्धिज्म का प्रसार हुआ था आज तो अभी इस्लाम के आने की वजह से य इस्लाम का यह जो एक ऑर्थोडॉक्स एक टेंडेंसी है कि पुराने जितने भी चिकना है पुराने धर्म के पुरानी कल्चर के उसको तोड़ दो बोलकर के यह बुद्धिज्म का यह जितने भी आर्कियोलॉजिकल सब एक्सक वेशन करके जो कुछ भी मिला था वो सब उन्होंने तहस नहस कर दिया है वरना तो पूरे चाइना से लेकर के जापान से लेकर के बुद्धिज्म जो स्प्रेड हुआ था वो हमको दिखता है कि पूरा वहां तक गया था यूरोप तक गया था और यहां तक कि स्वामी जी जब सेकंड टाइम भारत लौट रहे थे अमेरिका से तो क्रीट बोलकर के एक टापू है तो उस क्रीट बोलकर के टापू के स्वामी जी ने देखा था कि किस तरह से यह वहां पे बुद्धिस्ट मोनेस्ट्री होगी और इस बुद्धिस्ट मोनेस्ट्री में शायद जीसस ने ट्रेनिंग ली होगी तो ये एक बहुत बड़ा रेवलेशन स्वामी जी को हुआ था तो यह बुद्धिज्म इसी सिल्क रूट के थ्रू फैला था और जो समुद्र का जो रूट था उसको कहते हैं स्पाइस रूट और यह स्पाइस रूट अर्थात कि यह साउथ ईस्ट ये साउथ ईस्ट के ईस्ट एशियन जितने भी ये कंट्रीज है यह इंडोनेशिया मलेशिया जकार्ता यह थाईलैंड यह बर्मा यह जितने भी कंट्रीज है वहां सब पे जो स्पाइसे जो उगते थे ये जो जिसको हम कहते हैं मसाला वो वो सब यूरोप में भारत के थ्रू जाता था तो ये इसी स्पाइस रूट के थ्रू हिंदुइज्म फैला था यह साउथ ईस्ट एशियन कंट्रीज में तो ये हिंदुइज्म का जो फुटप्रिंट है रामायण है भगवान राम है इस सबकी किस तरह से पूजा होती है वगैरह यह स्वामी जी ने अपनी नजरों से देखा था तो ये हो गया स्वामी जी की समुद्र यात्रा का छोटा सा विवरण वहां पे कैनेडा पहुंचे कनेडा में वैंकूवर में उतरे वैंकूवर से ट्रेन में वो शिकागो आए यदि जिस अमेरिका का नक्शा देखा होगा तो पता होगा कि वैंकूवर है वेस्ट कोस्ट पे और शिकागो है वैसे ऑलमोस्ट ऑन द ईस्ट कोस्ट तो यह पूरा लंबा ट्रेन जर्नी करके ईस्ट कोस्ट आ रहे थे उस समय उसी ट्रेन में एक महिला के साथ में मुलाकात हो जाती है मिस सनबन उनका नाम था तो इनके साथ में मुलाकात होकर के अभी जब स्वामी जी शिकागो पहुंचते हैं तो पता चला दो चीज पता चली कि शिकागो पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन प्रारंभ होने में अभी तो देरी है दूसरा है क्योंकि स्वामी जी पहुंच गए थे ऑलमोस्ट जुलाई में और होने वाला था वोह तो सितंबर में तो जुलाई ी अगस्त एक महीना जो है उनको कहीं पर बिताना था और शिकागो बड़ा ही महंगा सिटी था स्वामी जी के पास में इतने पैसे नहीं थे तो क्या करेंगे तो अभी ऐसा हुआ ठीक कि यह जो महिला थी जिनके जो मिस सनबन जिनके साथ में उनकी मुलाकात हुई थी उन्होंने कहा कि आप काम कीजिए मेरे साथ में बोस्टन चलिए एनी वहां पे मैं रहती हूं मैं आपको वहां पर सब लोगों से मुलाकात करवाऊंगी तो स्वामी जी उनके साथ में आए बोस्टन फिर यह बोस्टन है मेड काफ है फिर यह एनिस क्वाम है फिर यह सलेम है सेने डोगा है वगैरह जगह पे वो घूमे और ये घूमने का वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन से पहले यह सब जगह पे नेता स्वामी जी को दो-तीन बेनिफिट हुआ सीधा वर्ल्ड पार्लिमेंट में आ जाते तो कुछ उनको दो तीन चीजों व नहीं कर पाते शायद नहीं कर पाते ऐसा कोई प्रश्न ही नहीं है कि तो इस तरह से घूमने से जो सबसे बड़ा बेनिफिट हुआ वो एक तो है लैंग्वेज का स्वामी जी जो पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन में जो लेक्चर देते हैं और उसके बाद के भी जो अमेरिका के लेक्चर है वो सुनक के लगता नहीं है कि किसी नॉन अमेरिकन ने यह लेक्चर दिया होगा यह बात कही होगी क्योंकि हमको पता है कि ब्रिटिश इंग्लिश और यह अमेरिकन इंग्लिश उसमें कुछ कुछ तफावत है ऊपर से नहीं दिखेंगे किनको जिनको पता है क्या तफावत है वे लोग इमीडिएट पकड़ पाएंगे कि ये अमेरिकन इंग्लिश में बात कर रहा है ब्रिटिश इंग्लिश में और ब्रिटेन के साथ में अमेरिका का तो उस समय वो जो कॉलोनी था ना ब्रिटेन का तो ब्रिटेन के प्रति कोई अमेरिका का इतना कोई सहानुभूति नहीं था तो स्वामी जी यदि ब्रिटिश एक्सेंट में ब्रिटिश मुहावरे यूज करते तो हो सकता है कि अमेरिकन लोगों को इतना टच नहीं कर पाते किंतु ये जो कुछ कुछ समय में जून जुलाई अगस्ट सितंबर यह जो वहां पर रहे जुलाई अगस्ट सिंबर इतना समय यह जो ईट अमेरिका में उन्होंने बिताया उस वजह से स्वामी जी एकदम इजली ये अमेरिकन एक्सेंट अमेरिकन फ्रेजस अमेरिकन टर्न ऑफ सेंटेंस यह सब बड़ा ही आसानी से सीख गए और इसकी वजह से जब वोह शिकागो में पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन में बोलने के लिए खड़े हुए उनकी लैंग्वेज मैं जब उस समय पहली पहली बार स्टडी कर रहा था मैंने भी सोचा कि स्वामी जी इतना परफेक्ट इंग्लिश अमेरिकन इंग्लिश बोलते हैं हालांकि उनका स्टडी तो इंडिया में ब्रिटिश इंग्लिश का हुआ था उनके जितने भी टीचर थे वोह स्कॉटिश टीचर एक फेमस थे व तो वो सब तो उनके तो ब्रिटिश थे तो स्वामी जी इतना परफेक्ट अमेरिकन इंग्लिश कैसे बोलते हैं तो मुझे थोड़ा सा हुआ था मेरे मन में बाद में जब मैं एकदम डिटेल में पढ़ने लगा तब कहीं जाकर के मुझे पता चला कि यह जो कुछ एक डेढ़ महीने उन्होंने ईस्ट कोस्ट प बिताए ये बोस्टन वगैरह उसके आसपास में उसकी वजह से उनको यह बहुत बड़ा बेनिफिट हुआ कि उन्होंने फट करके ये जो अमेरिकन एक्सेंट है उसको अपना लिया स्वामी जी का सीखने का कैपेसिटी तो गजब का था इसलिए कुछ ही एक ही महीना उनके लिए काफी था उ लोगों को पूरा लाइफ टाइम लग जाएगा कि एक एक्सेंट से दूसरी एक्सेंट में जाने के लिए यहां पे मैं नॉर्थ इंडिया से साउथ इंडिया आया हूं तो इंग्लिश कितना चेंज हो जाता है तो तो वहां पे आपको कहां वो पूरी एक दुनिया से दूसरी दुनिया में जाना है तो एक महीने में स्वामी जी ने यह सीख लिया दैट वाज हाउ ही वाज एबल टू मेक सच ए डीप इंपैक्ट ऑन अमेरिकन ऑडियंस कि इतना परफेक्ट अमेरिकन इंग्लिश बोलते थे कि वहां के न्यूज़पेपर वाले वहां के लोग एकदम इजली अट्रैक्ट हो गए सो उस समय का एक बहुत बड़ा बेनिफिट यह हुआ दूसरा कि प्रोफेसर हेनरी राइट के साथ में उनकी मुलाकात हुई और उन्होंने स्वामी जी के लिए जो एक यह लिखा है रिकमेंडेशन लेटर इतना अद्भुत टू आस्क स्वामी विवेकानंदा फॉर हिज क्रेडेंशियल टू स्पीक इज लाइक आस्किंग द सन फॉर जज क्रेडेंशियल टू शाइन तो मैंने स्वामी विवेकानंद को यह कहना कि बोलने का आपका क्या अधिकार है प्रवचन देने का आपका क्या अधिकार है यह सूरज को पूछने के समान है कि प्रकाशित होने का तुम्हारा क्या अधिकार है तुम्हारी क्या योग्यता है तो यह सबसे बड़े बेनिफिट उस समय के उसके बाद में पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन सितंबर 1893 उसकी भी एक बैकग्राउंड बड़ा सुंदर है कि स्वामी जी को पार्लिमेंट अभी पहले तो सबसे पहले तो वो जो मिसेस एल के वहां पर रहे थे वो भी तो एक बड़ी फेमस घटना है कि स्वामी जी तो आए थे नए-नए और जैसे फकीर की तरह हालांकि वो प्रोफेसर हेनरी राइट का रिकमेंडेशन लेटर है किंतु वैसे ही घूमते घूमते और कहां पर रुकेंगे कहा क्या क्या करेंगे कुछ ठिकाना नहीं तो एक बॉक्स कार में सोए हुए थे रेलवे स्टेशन पर शायद कि इधर-उधर तो फिर वो मिसेस मेरी हेल की नजर में आ गए उन्होंने बड़े ही आदर पूर्वक अपने घर में ले आई और फिर मिस्टर एंड मिसेस हेल और उनकी चार लड़कियां दो लड़कियां दो नीस भतीजी ये सभी लोग छह लोग स्वामी जी के सबसे बड़े एडमाइन के में वो बाद में जाने गए स्वामी जी ने कहा कि यदि अमेरिका में पश्चिम में कोई एक परिवार है कि जिसने मेरे मन पर सबसे गहरी छाप छोड़ी है तो वह आप ही का परिवार है ऐसा स्वामी जी ने एक लेटर में बहुत बाद में लिखा था किंतु इसके बाद में भी एक दूसरी घटना है कि एक बार वो वहां पर जाकर के डॉक्टर बेरोज के सामने क्रेडेंशियल प्रस्तुत किए और एज ए डेलीगेट उनको एक्सेप्टेंस मिल गया उसके बाद में ऐसा हुआ कि डेलिगेट्स जो है इतने सारे हैं कि इतनी सारी होटल तो सब बुक हो गई है तो यह जो पार्लिमेंट की ये जो ऑर्गेनाइजर है उन लोगों ने ठीक किया कि जो जितने भी सज्जन लोग हैं शिकागो के उनको हम कहेंगे कि क्या आप किसी डेलीगेट को अपने घर में हाउस गेस्ट की तरह रखना चाहते हैं कि नहीं तो उस समय एक मिस्टर एंड मिसेस लियोन थे जिन्होंने एक वो एग्री उन्होंने अपना नाम एज अ वॉलंटिली दिया था पहले से ही कि आप जिस डेलीगेट को हमारे घर भेजना चाहे तो भेज सकते हैं तो उसके अगले दिन जिस दिन स्वामी जी वहां से ठीक हुआ कि स्वामी जी को इनके घर भेजेंगे और स्वामी जी के आने से पहले पहले एक दिन पहले उनके घर पर यह मैसेज भेजा गया कि भारत से एक डेलीगेट आ रहे हैं और यह मैसेज इसलिए भेजा गया कि आपको कोई आपत्ति नहीं हो कि एक काला आदमी एक धन हिंदू आपके घर आ रहा है यदि कोई आपत्ति है तो पहले बोल दीजिए किसी क्रिश्चियन डेलीगेट को रख देंगे तो उस समय कि तो मिस्टर लियोन जो थे वो बड़े ही लिबरल थे और उनकी वाइफ थी उसने पहले तो पूछा कि इस तरह से कोई इंडिय काले इंडिय को हम रखेंगे अपने घर प और उनके घर पर दूसरे गेस्ट भी रह रहे थे तो वो क्या आपत्ति नहीं जताए क्या तो मिस्टर लियोन ने कहा कि उनको यदि आपत्ति है तो घर छोड़ के जाए मैं तो उनको रखूंगा ही तो पहले से ही ही वाज वेरी लिबरल तो स्वामी जी आए उनके घर में रहे और ये मिस्टर एंड मिसेस लियोन भी उनके बड़े ही मने बड़े ही ग्रेट एडमाइन घर की एक घटना है कि वो जो टोबेको सॉस जो कि बड़ा ही चिली होता है बड़ा ही तीखा रहता है तो उनको खाने के समय दिया गया और मिसेस डन ने कहा कि देखिए स्वामी जी यू टेक इट इन अ वेरी स्मल मेजर बड़ा ब थोड़ा-थोड़ा करके लीजिएगा बड़ा ही तीखा है तो स्वामी जी कहते हैं अच्छा तीखा है फिर ऐसा करके ऐसा पूरा डाल दिया अपने खाने में तो सब लोग चिल्ला उठे अरे मर जाओगे इतना तीखा स्वामी जी आराम से खा गए वो तीखा खाने की उनकी हेट थी और अमेरिकन लोगों की नहीं होती इतनी तो जबी है तो वो इस तरह से वहां पर रहे फिर 11 सितंबर की बात तो सबको पता है सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका उसके दूसरे दिन ू न्यूजपेपर में जिस तरह से स्वामी जीी की प्रशंसा प्रारंभ हुई उससे दो चीज हुई अमेरिका के वो लोग जो स्वामी जी को पहचानते थे उन लोगों का दो दल बन गया एक तो हो गए उनके बहुत बड़े एडमाइन पीछा करेंगे व यहां तक कि एक बाद में जब स्वामी जी कैलिफोर्निया गए थे और एक मिसेस वलर के वहां पर रुके थे उन्होंने स्वामी जी का शिकागो में दर्शन किया था प वो पार्लिमेंट में थी और उन्होंने बाद में जब एक रेमसंस लिखा तो उसमें उन्होंने कहा कि जैसे ही स्वामी जी का प्रवचन पूरा समाप्त होता था दल के दल महिलाएं सब एक के बाद एक जितनी बेंच है क्रॉस करके स्वामी जी का स्वामी जी का हैंड शेक करने के लिए उनको नजिक से देखने के लिए दल बना कर के पूरी स्टेज की ओर दौड़ रही है जैसे वेव्स आफ्टर वेव्स ऑफ विमेन तो वो मिसेस वलर लिखती है यदि इस आक्रमण से तुम अपने को बचा पाओ तो मैं कहूंगी तो तुम सही में देवता हो स्वामी जी ने ऑफकोर्स इस तरह के आक्रमण से भी अपने को बचाया था आज देखिए कि हम लोग इस तरह से आश्रम में रहते हैं इतने प्रोटेक्शन में रहते हैं क्योंकि कारण यही है कि जब तक नजर के सामने प्रलोभन नहीं आता तब तक सब साधु है नजर के सामने प्रलोभन आ जाने से उस समय अपने को बचाना कितना कठिन है सबको पता है इसीलिए जितने भी साधु है सिर्फ रामकृष्ण मिशन के ही नहीं दूसरे संप्रदाय के भी देखेंगे गुजरात में जो स्वामिनारायण संप्रदाय है वहां पर तो स्त्रियों का चेहरा देखने का भी वो मनाई है यदि वहां पर प्रवचन देने के लिए कोई साधु जाएगा तो स्त्रियों को एक साइड में अलग से कमरे में बिठाए जैसे कि साधु उनका चेहरे का दर्शन ना कर पाए तो इस तरह से हम लोगों को बिकॉज कि हम लोग आम आदमी है इस तरह से हमको अपने को प्रोटेक्ट करना पड़ता है स्वामी जी वहां पे इतने सारे टेंटेशन के भीतर में ओवरनाइट जिनको प्रसिद्धि मिल जाती है उनका सर कैसे घूम जाता है वह तो हमने बहुत बार देखा है कोई एक्टर है ना कि कोई सिंगर है ना कि कोई आर्टिस्ट है ना कि कोई स्पोर्ट्समैन है एकाएक उसको सफलता मिल गई उसके बाद में उसने जो पागलपन वाली हरकतें की है वह सब हमको पता है देखा है बहुत बार देखा है न्यूज़पेपर इस तरह के न्यूज़ से भरे हुए रहते हैं उस समय स्वामी जी ने इस प्रलोभन से अपने को बचाया कि ओवरनाइट प्रसिद्धि मिल गई शिकागो अमेरिका के जितने भी बड़े-बड़े घर थे बड़े-बड़े परिवार थे सब लोग तल पापड़ थे बड़े ईगर थे कि कब स्वामी जी को अपने घर बुलाए कब उनका मतलब उनकी महमान गति करें और कितनी ही महिलाएं थी स्वामी जी को पास से देखने के लिए उनकी बात सुनने के लिए वो इतनी मतलब ईगर थी तो इस आक्रमण से स्वामी जी ने अपने को बचाया और वह जो फेमस घटना कि किसी धनी के घर में वो रात को रुके थे और जो इतना सुंदर बिस्तर था इतना नरम उसके ऊपर सो नहीं पाए कारपेट पर सोए हैं और रो रहे हैं अपने भारतवासियों के लिए अपने भाइयों बहनों के लिए कि मेरे पास में यहां प इतनी लग्जरी है और मैं सामान्य फकीर हूं मेरे पास में इतनी लग्जरी और वहां पर मेरे भाई बहन बिना खाए पिए भूखे नंगे मर रहे हैं सो दैट इज स्वामी विवेकानंद तो ओवरनाइट प्रसिद्धि के बाद में ये सब उन्होंने अपने मन को दिमाग को ठंडा रखा व्हिच इज समथिंग रियली वंडरफुल और उसके बाद की घटना भी हमको पता है बड़ी फेमस है कि उन्होंने यह ठीक किया कि अमेरिका में वो प्र वचन देते घूमे किंतु एक ऐसे पागल लेक्चर ब्यूरो के हाथ में पड़ गए मतलब चुंगल में पड़ गए कि इस लेक्चर ब्यूरो वाले ने स्वामी जी का बेनिफिट तो पूरा ले लिया जगह जगह पर मेहनत करवा करके इधर से उधर दौड़ा दौड़ी करवा करके उनको प्रवचन तो बहुत सारे दिलवाए किंतु उनको यह भी पता चल गया कि स्वामी जी तो भोले भाले हैं तो उनको लूटो ये लोग तो धर्मा करने के लिए नहीं आए व सामने वाला यदि मूर्ख दिखता है तो सीधे लूट लेते हैं तो स्वामी जी को फिक्र नहीं है कि वो कहां पर जा कितना पैसा वो कमाते हैं टिकट का कितना उनका कमीशन कितना व स्वामी जी को तो कोई हिसाब नहीं रखते तो आखिर में जब पता चला कि यह लोग उनको ठग रहे हैं तब स्वामी जी ने ठीक किया कि मैं अभी इनसे अपना पीछा छुड़ा करके मैं अपने से अपने बलबूते पर अपने दम पर अमेरिका में प्रवचन दूंगा तो यह जो था पहले तो यह पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में जितने भी चैप्टर है 10थ और 11थ सिंबर बहुत डिटेल में अपने पास में इंफॉर्मेशन है 12 टू 27 सितंबर बहुत बहुत डिटेल है इतने सारे न्यूजपेपर में इतना सब कुछ लिखा गया इतनी सारी रेमसंस है बहुत कुछ उसके बाद में विक्ट्री यह जो एक जग प्रसिद्ध होकर के जो लोग विख्यात लोग इस तरह से लोगों के साथ में उनका जो आलाप वगैरह हुआ उसके बाद में इफेक्ट ऑन इंडिया यह जो समाचार ट ऑफ रिलीजन सक्सेस का समाचार भारत में कैसे पहुंचा और भारत में उसकी क्या असर हुई देखिए कि हजार साल से गुलाम एक देश जहां के राजा मने सो कॉल्ड राजा तथाकथित राजा और यह धनी लोग वगैरह ब्रिटेन जाकर के उनका एक ही मकसद होता था कि भारत को गाली देना जैसे कि हम लोग ये गोरे लोगों के फेवरेट हो सके यह केशव सेन हो ना कि ये मजूमदार हो ना कि ये फिर ये एनी बेस एनी बेस और कर्नल ओल कोट जो थे थियोसोफिकल सोसाइटी के व से तो हालांकि भारतीय नहीं थे तो जो भी है किंतु भारतीय जितने भी जाते थे उनका एक ही है कि हम लोगों के वहां विधवाओं का विवाह नहीं होता और लड़कियों का छोटी उम्र में शादी कर देते हैं ऐसा करके भारत को एकदम एक इस तरह से जंगली प्रदेश की एक उसकी ये करेंगे छवि एक आ केंगे कि लोग सहानुभूति से उनको रुपया दे दे अरे आप क्रिश्चियन हो जाओ हमारा रुपया ले लो रुपया लेकर भारत में जाओ और लोगों को कन्वर्ट करो तो स्वामी जी जब यह जो विक्ट्री स्वामी जी विजय के मूड में थे स्वामी जी की विजय गाथा अमेरिका के समाचार पत्रों में जो लिखी जा रही थी उसका सिर्फ भारत प जो असर हुआ कि अरे हजार साल के बाद अपना देश बांधव अपनी भारत वर्ष की गरिमा के बारे में बात कर रहा है और गरिमा के बारे में बात करके प्रसिद्ध हुआ है वो तो एक नई बात थी ही थी अद्भुत बात दूसरी साथ में यह थी कि स्वामी जी एक पत्र में लिखते हैं कि अभी यह जो भारत की यह जो जितने भी क्या कहेंगे नमक हराम लोग अमेरिका आ करके लंदन जाकर के ऐसा जो कहते हैं कि विधवा का विवाह नहीं देते छोटी बच्चियों की शादी कर लेते हैं वह सब अभी यहां पर नहीं चलेगा क्योंकि इन लोगों ने देखा है कि भारत का सही भारत प्राचीन भारत का सही प्रतिनिधि उसके भीतर में क्या तेज है क्या अदम्य उत्साह है क्या ये एक देवी शक्ति है इन लोगों को जाकर के धर्म की शिक्षा देना माने यह तो सूरज के सामने कैंडल जलाने के बराबर हो गया एक अग माने एक दिया जलाने के बराबर हो गया तो दो तरह से यहां पे वैसे डिटेल देखेंगे कि लाइफ में वो भारत प जो इफेक्ट हुई उसके बारे में काफी डिटेल है किंतु यह मेरा भी एक एनालिसिस है कि अमेरिका प इसकी जो असर हुई भारत के प्रति जो अमेरिका और पश्चिमी जगत की एक जो दृष्टि थी एक पॉइंट ऑफ व्यू था एक एटीट्यूड था वो पूरा धर्मल से चेंज हो गया और स्वामी जी के बाद में जितने भी ये प्रचारक गए ये योगानंद परमहंस है न की रामदास है न की जितने भी लोग है हजार हजार लोग ये कृष्णा मूर्ति वगैरह ओशो है जो अमेरिका जाकर के अडड़ते उन सबके पीछे स्वामी जी की ही यह जो फाउंडेशन डाला हुआ था हिंदू धर्म की श्रेष्ठता उसका था यदि स्वामी जी जाकर के इतने प्रसिद्ध नहीं होते इन लोगों के मन में हिंदू धर्म के प्रति जो जितने भी गलत धारणाएं हैं वो सब यदि दूर ही कर देते तो बाद के लोग इतना प्रसिद्धि प्राप्त नहीं करते और यहां तक कि आज यह जो भारतीय यह जो बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी के सीईओ है इसके पीछे में भी भारत के प्रति एक जो पॉजिटिव इमेज क्रिएट की गई थी स्वामी जी के द्वारा वही है अदर वाइज आप देखिए ना चाइना का चाइना चाइनीज लोग इतने वहां पे एजुकेशन इंजीनियरिंग स्किल्स टेक्नोलॉजिकल स्किल भारत से तो कम नहीं है भारत से भी कहीं ज्यादा है किंतु ब बहुत ही रेयरली आपको दिखेगा कि कोई बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी का सीईओ चाइनीज है तो दिस इज वन डिफरेंस कि भारत के बारे में जो पॉजिटिव एक छवि आकी स्वामी जी ने इसका यह जो क्या है कि लाभ जो है इसका इसका जो सूद है आज भी बैठ कर के पेंशन खाच ठाकुर बोलते हैं तो कि अभी वो पेंशन खा रहा है बहुत मेहनत कर लिया अभी पेंशन खा रहा है बेड मेट तो स्वामी जी ने अमेरिका का जाके जो मेहनत की उसका पेंशन आज की जनरेशन भी हम इसको भुगत रही है माने इसका उसका बेनिफिट ले रही है तो यह हो गया पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन पीरियड उसके बाद में साइक्लोनिक मंग जो स्वामी जी ने सब जगह पर जाकर के उन्होंने यह जो प्रवचन देना शुरू किया शिकागो में फिर शिकागो के आसपास में मिड वेस्टर्न सदर्न स्टेट यह जो मिड वेस्टर्न और सदर्न स्टेट की जो टूर है उसके बारे में एक ऐसा है कि यह पूरा एक कंजरवेटिव बेल्ट था और बड़े-बड़े शहर इसमें ज्यादा नहीं थे छोटे-छोटे टाउन ही ज्यादा थे और वहां पर जाकर के प्रवचन देने का बहुत कोई मैंने उस समय इमीडिएट कोई लाभ नहीं था जैसे कि शिकागो बोस्टन न्यूयॉर्क सन फ्रांसिस्को लॉस एंजलिस डेट्रॉइट ये सब जो बड़े-बड़े सिटीज है वहां पर प्रवचन देने से जो लाभ होता है कि वहां के इंटेलेक्चुअल लोग इमीडिएट स्वामी जी से आकर्षित हो जाते थे तो इस तरह का लाभ ये मिड वेस्टर्न और ये सधन स्टेट की टूर से हुआ नहीं क्योंकि वहां पर लोग बहुत ज्यादा कंजरवेटिव होते हैं बहुत ही ज्यादा ऑर्थोडॉक्स क्रिश्चन होते हैं तो अभी इस बात को लेकर के दो मत है एक तो है कि स्वामी जी का यह समय जो था पूरा बर्बाद हुआ और यह जो लेक्चर ब्यूरो था जिसके चुगल में स्वामी जी पढ़े थे स्वामी जी ने अपने से ही उसके साथ में नाता तोड़ दिया यह एक मत है दूसरा मेरा खुद का जो मानना है पर्सनली कि जहां जहां हां पर भी स्वामी जी ने प्रवचन दिया होगा छोटे से छोटा वो गांव भी क्यों ना हो छोटा शहर या एक मार्केट भी क्यों ना हो वहां पे वेदांत की जो वेदांत के जो बीच बोए गए हैं वो आज नहीं ना कल वो फलीभूत अवश्य होंगे स्वामी जी जैसे वर्ल्ड क्लास टीचर जहां पर जाते हैं उस भूमि को उस मिट्टी को पवित्र किए बिना छोड़ेंगे नहीं तो उस समय शायद असर दिखा नहीं अभी भी शायद नहीं दिखेगा किंतु भविष्य में क्या होगा किसको पता तो वो हो गई मिड वेस्टर्न और यह सदर्न स्टेट की टूर उसके बाद में स्वामी जी आए डेट्रॉइट डेट्रॉइट में हमको पता है कि स्वामी जी की मुलाकात उस समय अ इसके साथ में हुई थी सिस्टर क्रिस्टिन के साथ में ने कि बाद में हुई थी किस समय हुई थी अभी मैं एग्जैक्ट डेट भूल गया हूं किंतु डेट्रॉइट में ही ये सिस्टर क्रिस्टिन रहती थी उसके बाद में ओहायो शिकागो बैक टू डेट्रॉइट बे सिटी उसके बाद में फाइनल विजिट टू डेट्रॉइट फिर ये जितनी भी कंट्रोवर्सी है वह सब है फिर ईस्ट कोस्ट पे फिर शिकागो फिर बोस्टन कैंब्रिज बाल्टीमोर वाशिंगटन न्यूयॉर्क कैंब्रिज ब्रुकलिन न्यूयॉर्क शिकागो यह जो पूरा साइक्लोनिक मंक बोलकर के जो एक फेज है पूरा उसको देखिए कि अक्टूबर 93 से जनवरी 95 यानी कि एक साल 94 पूरा ने उसके ऊपर में तीन चार महीने यह पूरा एक साल स्वामी जी ने बैक ब्रेकिंग लेबर किया है कमर तोड़ परिश्रम किया है एक जगह से दूसरी जगह एक किसी एक परिवार से दूसरे परिवार एक प्रसिद्ध व्यक्ति से दूसरे प्रसिद्ध व्यक्ति एक शहर से दूसरे शहर जो घूमे है स्वामी जी मतलब आध्यात्मिक जगत के ये जो प्रीचिंग हिस्ट्री में ये एक अद्भुत होगा और कोई वर्ल्ड क्लास टीचर इतना घूम कर के उसने प्रवचन दिए होते लोगों को कन्वर्ट किया होता कन्वर्ट शब्द तो वैसे हम लोग नहीं यूज करते वो तो ठीक नहीं है पर अब अनुप्रेरणा इससे तो किंतु सेहत टूट जा रही है और कोई विजिबल बेनिफिट हो नहीं रहा है भविष्य में जो बेनिफिट होगा सो होगा अभी तात्कालिक जो उनको जरूरत था कि भारत में कार्य को आगे बढ़ाने के लिए वो उनको कुछ नहीं मिल रहा है तो उस समय स्वामी जी ने यह ठीक किया कि मैं एक जगह पर बैठता और कुछ ऐसे शिष्यों को तैयार कर क्योंकि अभी यह जो टूर हुई ना उसके दो तीन बेनिफिट है एक तो है कि चलो कि वहां पर आध्यात्मिकता के वेदांत के बीच बहुत ही बड़े विस्तार में वो स्वामी जी ने फैला दिए उसको यह कर दिया स्प्रेड कर दिया वह तो एक है साथ में ही दूसरी एक चीज स्वामी जी को समझ में आई कि उनका जो एक तरफा जो विजन था अमेरिका आने ता कि भारत के लिए मदद इकट्ठा करनी है उसके बाद में दूसरा एक विजन उनकी नजर के सामने में आया कि इस भूमि में भी भो गवाद की चरम सीमा प यह जो भूमि ब हुई है यहां पर भी मन की शांति के लिए कितने ही लोग तड़प रहे हैं उनको एक दिव्य आनंद चाहिए जो कि यह ऑर्थोडॉक्स क्रिश्चन रिलीजन उनको नहीं दे पा रहा है और दे आर नाउ ओपन टू लर्निंग समथिंग न्यू कुछ नया सीखने के लिए यह लोग तैयार है यह बात स्वामी जी को उस समय में समझ आई थी तो स्वामी जी ने ठीक किया कि जैसे ठाकुर दक्षिणेश्वर में बैठ कर के हालांकि वो कलकाता में खर खर घूमते तो थे किंतु रात को आकर के वही दक्षिणेश्वर में रुक जाते थे वहां पर यह यंग लड़के उनके पास में आए उनके साथ में रहे दिन प्रतिदिन साधु के दिने देख भी रात्रे देखी तबे साधु ठीक करवी साधु संबंध एक निश्चय करवी ये जो योगानंद महाराज की बात योगेंद्र महाराज की कि रात को देखा कि ठाकुर कहां जा रहे हैं अपनी पत्नी के घर पर जा रहे हैं कमरे में जा रहे हैं ऐसा सोच कर के खड़े रहे नबत के सामने पता चला ठाकुर जाऊ दला से आ रहा है तो तभी तो कहीं जाकर के लोगों को विश्वास हुआ वरना कलकाता में ठाकुर के जो प्रवचन सुने होते प्रवचन नहीं वार्तालाप ठाकुर कहते गुरु बाबा यह सब शब्द से मेरे अंग में कांटे बिनते तो ठीक है चलो प्रवचन नहीं दिए किंतु जो वार्तालाप करते थे मृत्य कीर्तन होता था सिर्फ वही सुनते तो क्या ये लोग सन्यासी होने का एक संकल्प कर पाते कि नहीं वो एक डाउटफुल है क्योंकि बहुत सारे भक्त वहां पर आते थे सन्यासी कितने हुए चंद ही हुए जो लोग नियमित रूप से ठाकुर के साथ में दक्षिणेश्वर में रहते थे वही लोग सन्यासी हुए थे मास्टर महाशय ने एक प्रयास किया क्रिस्मस के दिनों की छुट्टी थी तो आए थे कुछ दिन रुके थे किंतु उसके बाद में जो चले गए फिर बहुत दिनों के बाद में वापस आए थे और फिर वहां पर रुके नहीं थे कभी भी लंबे समय तो ये मास्टर महाशय के शायद यानी हमारे नसीब में था कि वो कथामृत लिखते यदि साधु हो जाते तो कथामृत नहीं लिखते तो जो भी है जो उनके बारे में जिसके बारे में जो मां जगदंबा ने ठीक किया है किंतु वो सन्यासी तो नहीं ही हुए सन्यासी वही हुए जो कि ठाकुर के साथ में दक्षिणेश्वर में नियमित रूप से रात्रि विद्या दे थे ठाकुर की कहे अनुसार जब ध्यान साधन भजन करते थे तो स्वामी जी ने भी वही सोचा कि ये घूमना फिरना बहुत हो गया साइक्लोनिक मोंग फेज है उसको समाप्त करो एक जगह पर बैठो एक जगह पर बैठ कर के अभी मैं कुछ को डिसाइल्स को वेदांत के बारे में सिखाऊंगा सो दैट वाज द बिगिनिंग ऑफ रियल अमेरिकन वर्क यह जो हम आज जो किताबें देख रहे हैं राज योग भक्ति योग कर्म योग ज्ञान योग फिर यह इंस्पायर्ड टॉक्स यह सब स्वामी जी ने उस समय में यह न्यूयॉर्क में बैठ कर के दिए थे और यह प्रवचन दिए थे उसके भी दो फेसेस है हम करेंगे डिटेल में डिस्कस तो ये किंतु ये जो एक जगह पर बैठ कर के उपदेश देना ऐसे कुछ चुन डिसाइल को तैयार करना जो कि यह वेदांत का मैसेज पहले तो अपने जीवन में उतारे साधन भजन तपस्या करके बाद में पूरे जगत में फैलाए यह आवश्यक है तो यह जो घूमना फिरना इधर से उधर लाक स्वामी जी घूमना फिरना कभी बंद नहीं करते थे उ स्वामी जी अपने को वेग बंड कहते हैं अर्थात कि वो जो इधर उधर घूम कर के लोग जो घूमते रहते हैं इस तरह के तो बैठने का तो उनके नसीब में था ही नहीं किंतु जो भी है ली उनके जीवन में उन्हें कंपेयर टू हिम दूसरा जो फेस था उस कंपेयर में एक जगह पर कुछ समय शांति से बैठे थे और अपने डिसाइल को तैयार किए थे तो यह जो है फेस यह जो पीरियड उसका नाम दिया है मैंने वेदांत इन अमेरिका जनवरी 18955 बहुत लंबा समय नहीं है ऑलमोस्ट जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मे जून जुलाई अगस्ट तकरीबन सात आठ महीने का यह समय है कि स्वामी जी कुछ समय के लिए बैठ कर के डिसाइल को रेडी किए तो न्यूयॉर्क वेदांत फॉर द वर्ल्ड एंड एनालिसिस ये एनालिसिस जो है न्यू डिस्कवरी में मेरी लुईस ने बहुत ही सुंदर रूप से किया है कि स्वामी जी का एक जगह पे बैठ कर के वेदांत के प्रचार करने का हेतु क्या था उसके पीछे उनका मकसद क्या था और उसके जो वाइडर रिपर कशन है फ्यूचर उसकी ये जो इफेक्ट है वह सब क्या है बहुत ही सुंदर एनालिसिस है फिर यह जो एनालिसिस पहले तो न्यू डिस्कवरीज में से मैंने कलेक्ट किया है फिर लाइफ में से कलेक्ट किया है दोनों जगह पर बहुत ही सुंदर एनालिसिस है फिर यह जनुअरी टू अप्रैल स्वामी जी ने कंटीन्यूअस क्लासेस लिए वहां पे जनवरी फेब्रुअरी मार्च अप्रैल ऑलमोस्ट थ्री टू फोर मंथ क्लासेस लिए और उस समय की एक बहुत ही इंपोर्टेंट घटना है कि यह जो दो बहने स्वामी जी के पास में आती थी और स्मी जी की बहुत ही क्लोज डिसाइकल वो हो गई बेटी लगेट और जोसेफाइन जोसेफाइन मैक्लाउड बेटी लगेट बेटी उस समय मिस्टर लगेट के साथ में विवाह नहीं हुआ था तो लगेट नाम तो उसको बाद में दिया गया आज लगेट नाम उनके साथ में जुड़ा हुआ है तो मुह से आ जाता है वरना तो जैसे जोसेफाइन मैक्लाउड उनका मेडन नेम है अर्थात की जोसेफाइन ने तो शादी नहीं की थी तो बेटी की भी शादी नहीं हुई थी या तो फिर उनकी दूसरी शादी थी ऐसा कुछ था तो उस समय का उनका नाम दूसरा होगा व बेटी के साथ में क्या सरनेम थी अभी मुझे याद नहीं किंतु जो भी है लगेट उनके साथ में जुड़ा हुआ है तो फिर यह नाम तो यह दोनों बहने नियमित स्वामी जी के पास में आती थी कि तो किसी को बताती नहीं थी कि हम लोग कहां जा रही है तो उस समय यह जो मिस्टर लगेट थे फ्रांसिस लगेट ऑलरेडी बेटी के साथ में उनका जो ये होता है अफेयर वो चालू हो गया था वो परिणय चालू हो गया था इन दोनों का दोनों नियमित रूप से मिलते थे और मिस्टर लगेट ने प्रपोज भी किया था बेटी को कि क्या आप मेरे से शादी करेगी तो शायद उन्होंने हां भी कह दिया था तो यह उसी समय शादी के पहले का ये जो समय था तो एक दिन यह दोनों बहने उनके साथ में मिस्टर लगेट के साथ में एक रेस्टोरेंट में बैठी हुई थी इससे पहले स्वामी जी के साथ में स्वामी जी प्रतिदिन देखते थे कि ये दोनों बहने हैं वो पहले आ जाती है और फिक्स जगह पर बैठती है तो स्वामी जी पूछ दिन तो ऑब्जर्व किए फिर प्रतिदिन आ रहे हैं देखा कि जितने भी बाकी लोग जो है उनका प्रवचन सुनने के लिए आते हैं आकर के स्वामी जी के साथ में हैंड शेक करेंगे जो कि वहां की प्रथा है और फिर स्वामी जी के साथ में कुछ ना कुछ बातें करेंगे फॉलो अप क्वेश्चन करेंगे ये दोनों बहने स्वामी जी के साथ में कभी बात नहीं करें किंतु एकदम नियमित आएगी एक ही जगह पर बैठेगी तो स्वामी जी को क्यूरियोसिटी हुई सामने से पूछा कि आप लोग क्या बड़े बहुत दूर से आते हैं तो उन्होंने कहा नहीं नहीं ये तो पास में ही है हम लोग घोड़ा गाड़ी में आते हैं तो 10 15 मिनट में कि ऐसा कुछ होता है एग्जैक्ट टाइम कितना कहा तो भूल गया मैं तो जो भी है स्वामी जी ने कहा नहीं नहीं वो तो काफी दूर से आते हैं आप तो वेरी गुड वेरी गुड इतना दूर से आप आते हैं नियमित आते हैं वेरी गुड इतना ही कुछ बात हुआ था इससे ज्यादा और कुछ नहीं फिर जब ये दोनों बहने मिस्टर लगेट के साथ में बैठी हुई है रेस्टोरेंट में और इन्होंने कहा कि अभी हमको कहीं पर जाना है जल्दी है तो हम चलते हैं तो इमीडिएट मिस्टर लगेट ने पूछा कि कहां जा रही हो इस समय प्रतिदिन ऐसा क्या है कि तो उन्होंने कहा कि एक इंडियन प्रीचर है उनको सुनने के लिए हम जाते हैं तो उन्होंने कहा कि क्या मैं आपके साथ में आ सकता हूं तो कहा कि चलिए तो मिस्टर लगेट इन दोनों के साथ में आए स्वामी जी का प्रवचन सुना फिर ये तो मर्द लोग होते हैं वो तो बड़े ही फॉरवर्ड होते हैं वो तो वो सीधा जाकर के स्वामी जी को हैंड शेक करके अपना परिचय दिया कि आई एम फ्रांसिस लगेट और इस तरह से मेरा बिजनेस है वगैरह वगैरह और ये मेरी फियांसी है और ये फरी फियांसी की बहन है बेटी और ये जोसेफाइन तो दैट वाज फर्स्ट मीटिंग कि पहली बार एक प्रॉपर इंट्रोडक्शन हुआ जोसेफाइन मैक्लाउड का स्वामी जी के साथ में तो उसके बाद में फ्रांसिस लेगें ने स्वामी जी को इनवाइट किया कि मेरा एक फार्म है वहां पे फार्म हाउस है रिजली बोल कर के एक जगह है टाउन है वहां पे तो आप आइए हम लोग समर सीजन में जाएंगे वहां पे तो स्वामी जी एग्री हो गए और जबक समर में बहुत गर्मी होती है और बाकी सब उनके जो प्रवचन श्रोता थे वो समर में इधर-उधर चले जाते थे उस समय स्वामी जी गए थे रिजली मेनर अप्रैल द ग्रेट समर बोलकर के जोसेफाइन मैक्लाउड इसको कहती है ट वो बाद में आएगा ये स्वामी जी की पहली मुलाकात थी बहुत सुंदर घटना है उस समय की और फिर रिजली मैनर के वहां से स्वामी जी न्यूयॉर्क आए वापस आए सेकंड फेज उनका स्टार्ट हुआ प्रवचन का उसके बाद में सेकंड फेज समाप्त होने के बाद में स्वामी जी की और एक डिसाइल थी उन्होंने कहा कि व मेरा एक लेक ईरी बोलक के वो जो है लेक मिशिगन ने ईरी में फुल गया एक्जेक्टली उसमें बहुत सारे आइलैंड है थाउज आइलैंड वहां प मेरी कोटेज है वहां पर आप आइए वहां पर हम लोग सब रहेंगे एक साथ में तो स्वामी जी जैसे कि जीसस के साथ में जो 10 12 डिसाइल थे उसी तरह से स्वामी जी अपने जैसे ठाकुर के साथ में थे दक्षिणेश्वर में रुकते हैं तो इस तरह से कुछ डिसाइल को लेकर के स्वामी जी गए थाउजेंड आइलैंड पार्क वहां पर रुके और प्रवचन जो दिए वो अमर किताब इटरनल बुक ए इम्मोर्टल बुक इन द फॉर्म ऑफ इंस्पायर्ड टॉक्स ऑ स्वामी विवेकानंद उनकी डिसाइल मेरी लुईस ने जो लिखी वो जो क्या नाम मैं फुल गया उसका एक जो भी है तो उसने जो स्वामी जी के जो सब बातों को वार्तालाप को नोंद करके वो जो किताब लिखी मैं इंस्पायर्ड टॉक व्हिच वाज इन हियर इन थाउ आइलैंड पार्क जून टू अगस्ट 18951 में ही लंदन जाने के लिए उन्होंने तैयारी करनी थी लंदन फ्रांस वगैरह और इसके पीछे की क्या कहानी थी क्या हुआ वह सब हम कल देखते हैं आज तस श्री राम