prayer
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः गीता के ऊपर में ऑलरेडी पिछली बार पिछले क्लास में हमने कुछ डिस्कशन कर लिया है। गीता के श्रीमद्भगवत गीता के अर्जुन विषाद योग प्रथम चैप्टर में हमने देखा कि किस तरह से कौरवों और पांडवों की सेना सामने-सामने खड़ी है और किस तरह से इस सेना को देखकर के कौरवों की सेना को देखकर के अर्जुन के मन में विषाद का उत्पन्न विषाद उत्पन्न हुआ है। और यह जो अर्जुन का जो है वाणी उसको पूरा हमने कुछ श्लोकों में पिछली बार देखा था। इसके बाद में द्वितीय अध्याय प्रारंभ होता है। सांख्य योग और इस अध्याय के प्रथम दो श्लोक भी हमने देख लिए हैं कि किस तरह से अर्जुन का विषाद देखकर के भगवान कृष्ण ने उसको उपदेश देने का प्रारंभ किया। तो गीता
अध्याय 2 सांख्य योग, श्लोक 1: भगवान कृष्ण का कायर अर्जुन को पुरुषत्व का उपदेश
के द्वितीय चैप्टर के प्रथम तीन श्लोक है। दो श्लोक हमने ऑलरेडी देखे हैं। तृतीय श्लोक इस बार देखेंगे। इन तीनों श्लोकों को एक बार हम एक साथ में देख लेते हैं। क्या कहता है संजय? कि भगवान ने यह वचन कहना अर्जुन की जो अवस्था थी दुरावस्था वह देखकर के अर्जुन की कायरता देखकर के भगवान कृष्ण ने उस अर्जुन को यह वचन कहना शुरू किया जो किस तरह के अर्जुन को तम तथा कृपया विष्टम जो कृपा से आ जिसके ऊपर में कृपा का या तो फिर कायरता का आवेश हो चुका का था अश्रु पूर्णाकुलेक्षणम किस तरह का अर्जुन जिसकी आंखों में इस तरह से आंसू बह रहे हैं कि उसको कुछ दिखाई नहीं देता है विषदंतम किस तरह का अर्जुन जो कि विषाद कर रहा था तम तथा कृपया विष्टम अश्रु पूर्णाकुलेक्षणम जो कि कृपा से आविष्ट हो चुका था जिसकी आंखों में आंसुओं की वजह से कुछ दिखाई नहीं देता कहता था विषदंतम जो कि विषाद कर रहा था। इस तरह के अर्जुन को इदम वाक्यम उवाच मधुसूदनः मधुसूदन ने भगवान कृष्ण ने इस वाक्य से संबोधन किया। क्या कहा?
अध्याय 2 सांख्य योग, श्लोक 2
कुतस्तवा कश्मलम इदम विषमे समुपस्थितम अनार्य जुष्टम अस्वर्ग्यम अकीर्ति करम अर्जुन। कुतस्तवा कहां से कश्मलम अर्थात कि यह कायरता तुम्हारे ऊपर में यह कहां से आ गई वह भी विषम समुपस्थितम एक ऐसी विषम घड़ी है। दोनों सेनाएं एक दूसरे के सामने-सामने खड़ी है। इस दोनों सेनाओं को देखकर के यानी कि तुम्हारे शत्रु की सेना को देखकर के यदि तुम्हारे मन में फिरता साहस शौर्य और वीर्य क्षत्र तेज जो यह जो क्षत्रिय का जो प्रताप है वह यदि तुम्हारे भीतर में उसका संचार नहीं होगा तो फिर यह तो बहुत भयानक घटना है। यह विषम परिस्थिति है। इस तरह का भाव मन में उत्पन्न करने की कुतस्त कहां से कश्मलम यह कायरता तुम्हारे मन में आई विषम समुपस्थितम इस विषम घड़ी में उपस्थित हुई है और यह कायरता कैसी है? अनार्य जुष्टम अस्वर्ग्यम अकीर्ति करम अर्जुनम अनार्य जुष्टम जो आर्य है वह इस तरह की कायरता से कभी भी अभिभूत नहीं होते वे लोग कभी भी इस तरह की कायरता से कभी भी वे लोग कमजोर नहीं हो जाते अस्वर्ग्यम जो कि स्वर्ग को देने वाली नहीं है। स्वर्ग से हमको हटा देने वाली है। अकीर्ति कर्म जो कि अकीर्ति है वो ले आती है। कीर्ति यानी कि ओनर। एक जो योद्धा होता है, एक वॉरियर होता है, उसका जो ओनर होता है, उसकी यह जो एक सम्मान जो होता है, वह सम्मान उसके लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसीलिए आर्मी में देखेंगे कि वे लोग आपको कहते हैं डिस्चार्ज ऑनरेबली। अर्थात कि यह इसको सस्मान हम आर्मी में से डिस्चार्ज करते हैं। जब सोल्जर भारत की लैंग्वेज में कहे तो युवान जवान यह जवान जब है एक सोल्जर जब है एक वॉरियर आर्मी में से निकलता है तो आर्मी उसको यह कहती है कि उसने बड़े सम्मान के सहित बड़ी वीरता के सहित उसका जो कर्तव्य था देश की सीमाओं की रक्षा करना शत्रुओं का मुकाबला करना बड़े सम्मान के साथ में उसने यह कर्तव्य निभाया है सस्मान हम इसको आर्मी में से रिहा करते हैं। डिस्चार्ज ऑनरेबली ऑनरेबली डिस्चार्ज और जो सैनिक जिसने कि अपना कर्तव्य है उसको करने में यदि वह डर गया हो युद्ध के मैदान से भाग गया हो शत्रुओं से यदि शत्रुओं का मुकाबला ना करने की वजह यदि वह अपने बंधुओं को छोड़कर के अपने जो साथी सैनिक है उसको छोड़कर के भाग खड़ा हुआ हो तो फिर उसको क्या कहेंगे डिसऑनरेबली डिस्चार्ज या अर्थात कि सम्मान के सहित हम उसको रिहा नहीं करते हैं। अस्मान के साथ में हम आर्मी में से निकालते हैं। तो यह जो डिसऑनरेबली ये जो डिस्चार्ज विद डिसऑनर ऐसा कुछ यदि उसको लग जाए तो फिर हमेशा के लिए इसके मन में एक विषाद की छाया बनी रहती है इस सोल्जर के मन में। तो देखिए कि यहां पर इसलिए भगवान अर्जुन को कहते हैं कि अकीर्ति यह जो तुम यहां से इस तरह के कायरतापूर्ण बात कर रहे हो और तुम्हारी बात सुनकर के सोच के ऐसा लगता है कि तुम यदि यहां से भाग खड़े होगे तो यह तुम्हारी जो कीर्ति है योद्धा के रूप में हमेशा के लिए इसको खत्म करके रखेगी। इसके बाद में भगवान कृष्ण का वह जो
अध्याय 2 सांख्य योग, श्लोक 3
फेमस श्लोक जो कि स्वामी विवेकानंद का इतना प्रिय था क्लब्यम मास्म गमः पार्थ नतपद्यते क्षुद्रम हृदय दुर्बल्यम तक्त तष् परंतप क्लब्यम अर्थात कि यह नपुंसकता को तुम प्राप्त मत हो मास्मगमः इस नपुंसकता को तुम प्राप्त ना हो पार्थ न एतत्व उपबध्यते यह तुम्हारे लिए उचित नहीं है। यह तुम्हारी जो कीर्ति है तुम्हारा जो शौर्य है तुम्हारा जो साहस है इसके अनुकूल यह बात नहीं है। क्षुद्रम हृदय दौर्बल्यम यह क्षुद्र हृदय का जो दुर्बल्य है त्यक्त उतष् उसको छोड़ के त्यक्त्वा उतष् उसको त्याग करके खड़े हो परंतप शत्रुओं का नाश करने वाले शत्रुओं को संहार करने वाले जो तुम अर्जुन हो तुम इस हृदय के क्षुद्र हृदय के दौरबल्य का त्याग त्याग करके खड़े और युद्ध के मैदान में युद्ध करो। देखिए यह जो श्लोक है जिसने कि रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का अभ्यास किया है सबको पता है कि स्वामी विवेकानंद का बड़ा ही फेवरेट श्लोक है। अभी इसके ऊपर में डिस्कस करने से पहले या तो फिर डिस्कस करने के लिए स्वामी विवेकानंद का एक थ्यरी हम यहां पे ला लेके आते हैं। यहां पे देखिए कि
स्वामी विवेकानन्द: कायरता और क्रूरता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं
भगवान अर्जुन को बेसिकली क्या कहते हैं कि ये जो तुम्हारे हृदय की दुर्बलता है उसको तुम त्याग करो। अभी प्रश्न होता है कि हृदय की दुर्बलता आती कहां से है? तो स्वामी जी हमको कहते हैं कि दुर्बलता यानी कि कायरता और क्रूरता यह दोनों एक साथ-साथ में चलती है। जैसे कि एक सिक्के की दो बाजुएं हैं। एक बाजू यानी कि एक पहलू सिक्के का यदि कायरता है तो उसका दूसरा पहलू है क्रूरता। किस तरह से स्वामी जी इस बात को कहते हैं? पहले हम इसको देखेंगे। स्वामी जी ने एक बड़ा ही सुंदर लेटर लिखा है आला सिंघा को। तो इस लेटर का थोड़े से कुछ एक्सेप्ट्स है। उसका एक अंश है। उसका पाठ करके यह देखेंगे कि स्वामी जी क्या कहना चाहते हैं कि किस तरह से कायरता और क्रूरता एक साथ-साथ में चलती है। और फिर ये डिस्कस करने के बाद में ये देखेंगे कि यहां पे एक्चुअली जो प्रथम श्लोक हमने पढ़ा उसमें तो भगवान संजय कहता है कि देखिए कि अर्जुन तो कृपया विष्टम अश्रु पूर्णाकुलेक्षणम ये जो अपने सामने जो परिवारजन थे उसको देखकर के कृपा से आविष्ट हो गया था और उसकी आंखों में आंसू आ गए थे। तो यह एक्चुअली कृपा थी ना कि कायरता थी। यह जो अर्जुन के मन का जो कॉम्प्लेक्स भाव है इस भाव को हम स्वामी जी का यह जो सेंटेंस है क्रूरता और कायरता दोनों साथ-साथ चलती है। इस फार्मूला में हम अर्जुन के इस भाव को कैसे बिठाएंगे? वह दूसरा प्रश्न है। तो सबसे पहले हम स्वामी जी का यह जो लेटर है इसको लिखा हुआ आला सिंघा को उसका पाठ करके हम प्रारंभ करते हैं। यह लेटर लिखा गया है मेसेचुसेट्स ब्रजीमिडोस से और 20th अगस्त 1883 यानी कि यह 11th सप्टेंबर वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन जो था उससे पहले यह लेटर लिखा गया है। तो यहां पर पटभूमिका ऐसी है बैकग्राउंड ऐसा है कि स्वामी जी कहते हैं कि वह एक स्त्रियों के लिए एक जेल थी। एक वुमस वीमस प्रजन था स्त्रियों के लिए जेल। उसकी मुलाकात के लिए स्वामी जी गए थे। अभी जनरली कोई भी जेल में आप जाएंगे। किसी भी प्रजन में आप जाएंगे तो शायद आपको ऐसा देखने को मिलेगा कि जो कैदी है उनके साथ में काफी क्रूर व्यवहार होता है। उनके साथ में उनको बहुत कष्ट दिया जाता है क्योंकि वैसे भी तो यह लोग क्रिमिनल है और क्राइम करके यहां पर आए हैं तो समाज भी कोई ज्यादा कुछ माइंड नहीं करता। जो चोरी करता है, जो हत्या करता है, जो दूसरों का शोषण करता है, यदि कोर्ट के द्वारा यदि उसको दोषी ठहराया जाए और यदि उसको जेल में भेजा जाए, तो फिर वह तो उसके साथ में जो दुष्टता होगी, कठोरता होगी, क्रूरता होगी, उसका तो वह पात्र है। ऐसा जनरली लोग सोचते हैं। किंतु इस ये जो स्त्रियों की जेल में जब स्वामी जी गए देखने के लिए तो उन्होंने देखा कि यहां पर कैदियों पर क्रूरता नहीं की जाती। वे लोग दोषी है ऐसा बोलकर के उनके ऊपर में दमन नहीं गुजारा जाता। उनका शोषण नहीं किया जाता। किंतु उनको समाज के एक अच्छे नागरिक बेहतर नागरिक फिर से हो पाए। उन्होंने जो गलती की वह गलती समझ करके फिर से समाज के एक बेहतर नागरिक हो पाए। इसके लिए प्रयास किया जाता है। यानी कि वह सिर्फ प्रजन नहीं है। वह रिफॉर्म हाउस है। यहां पर लोगों को सिर्फ दंड नहीं दिया जाता। उनको उनके चरित्र के जो अच्छे पहलू है, अच्छे गुण है, उनको फिर से याद करवा करके अच्छे नागरिक बनाने का प्रयास किया जाता है। तो स्वामी जी ने यह सब देखा। देखकर के वह काफी इंप्रेस हो गए और फिर आला सिंघा को लिखते हैं कि देखो कि यह लोग उसको प्रजन नहीं कर कहते। इसको रिफमेटरी कहते हैं और यहां के कैदियों के ऊपर में इन लोगों का कितना अच्छा सद्भाव है। अच्छा वर्तन है। कंपेयर टू दैट। अभी यह स्वामी जी जो लेटर लिखते हैं आलास सिंघा को उसमें लिखते हैं कि कंपेयर टू दैट कि वहां पे अपने ही नागरिकों के साथ में यह जो दूसरे नागरिक हैं इतना सदव्यवहार करते हैं। भले ही चाहे वह कैदी हो। जबकि भारत में क्या हो रहा है? कैदियों की तो बात ही छोड़ दीजिए। यह जो आम नागरिक है उनके साथ में ही इस तरह का दुर्भाग्यपूर्ण दुर्व्यवहार होता है कि जो आम नागरिक है वह हमेशा के लिए तड़पता रहता है। उसको हमेशा के लिए दुख कष्ट का आसरा लेना। उसके ऊपर में हमेशा दुख और कष्ट गुजरते रहते हैं। किस अर्थ में यहां पे स्वामी जी ब्रिटिश एंपायर की बात नहीं करते। यह जो ब्रिटिश राज था वह भारतीयों के ऊपर में इस तरह के दमन करता था। दमन गुजारता था। भारतीयों का भारतीयों के ऊपर में अत्याचार करता था। यह बात तो सर्वज जाहिर है। सर्वजन विदित है। किंतु भारतीय खुद आपस आपस में मेरी ऊंची जात है। वह नीची जात का है। मेरे हायर कास्ट है। उसका लोअर कास्ट है। बोलकर के यह जो तथाकथित लोअर कास्ट है। नीची जात के जो है उनके ऊपर में जो भयानक अत्याचार सदियों सदियों से चला आ रहा है। भारत के गरीबों के लिए ना ही खाना है ना ही रहना है ना ही वस्त्र है उनके लिए और जो तथाकथित धनी लोग हैं जो राजा है जो कि उच्च वर्ण के हैं उनके हृदय में थोड़ा सा भी अनुकंपा या तो थोड़ा सा भी सहानुभूति या तो थोड़ा सा भी कंपैशन या एंपैथी का संचार नहीं होता। हम लोग हमारे ही देश बांधवों की यह दुरावस्था देखकर के क्या हमारा हृदय द्रवीभूत क्यों नहीं होता? यह बात लिखकर के स्वामी जी कहते हैं कि देखिए कि जब कुछ-कुछ रिफॉर्म सोसाइटीज थी उस समय की उन्होंने जब भारत की यह दुरावस्था देखी उन्होंने देखा कि ये उच्च वर्ण नीच वर्ण इन सब में इतना बड़ा डिफरेंस है और जो लोगों को अछूत माना जाता है जिन लोगों को हरिजन माना जाता है जो लोग की पदददलित है उनके लिए इस समाज में जैसे जैसे कि किसी भी तरह का स्थान नहीं है। तो जो भारत को रिफॉर्म करना चाहते थे ये 19th सेंचुरी में ये केशव सेन वगैरह-वगैरह कुछ लोगों को लगा कि अरे ये भारत की ऐसी दुरावस्था है तो चलो भारत के लिए कुछ अच्छा किया जाए। किंतु इन लोगों का जो सॉल्यूशन था वो सॉल्यूशन क्या था? वे लोग कहते हैं कि भारतीय धर्म है हिंदू धर्म उसी के भीतर में इस तरह का प्रभेद है। हिंदू धर्म ही यह हमारे भीतर में फुटफाट पड़वाता है। हिंदू धर्म ही हमको भारत को यूनाइट होने से रोकता है। हिंदू धर्म ही कहता है कि यह इस वर्ण का है। यह उस जाति का है। यह इस कास्ट का है। बोलकर के हिंदू धर्म ही हमको डिवाइड करता है। हम जब भी हमारा धर्म ही हमको डिवाइड करता हो तो फिर बाहर से यह जो लोग आकर के हमारे पे राज करें उसमें आश्चर्य क्या है? ब्रिटिश लोगों के बाद बारे में कहा जाता है कि डिवाइड एंड कंकर उनका नीति क्या था? लोगों में पहले तो एक देश में जाएंगे। फिर लोगों में फुटफाट पड़वाएंगे। लोगों को डिवाइड करेंगे और फिर कहेंगे कि वह जो दो बिल्ली और एक बंदर की कहानी है ना दो बिल्लियों के पास में एक रोटी आ गई। तो अभी यह दोनों बिल्लियां सोचती है कि इसको आधी करेंगे तो ऐसा ना हो जाए दोनों को खाने के लिए कि इसको बड़ा हिस्सा मिल जाए उसको छोटा मिल जाए। तो यह दोनों बिल्लियां झगड़ती झगड़ती एक बंदर के पास में गई और कहा कि आप हमारे लिए दोनों के लिए इक्वल टुकड़े कर दीजिए इस रोटी के। तो यह बंदर भी बड़ा चालाक था। उसने क्या किया? एक बड़ा टुकड़ा किया, एक छोटा टुकड़ा किया और एक बिल्ली को बड़ा दिया, दूसरी को छोटा दिया। अभी जिसको छोटा टुकड़ा मिला है वह बिल्ली चिल्लाने लगी कि अरे सामने वाली उसको तुमने बड़ा टुकड़ा क्यों दिया? तो बंदर कहता है अच्छा उसमें से मैं थोड़ा सा काट करके मैं ही खा लेता हूं। बोल कर के उसने एक टुकड़ा उसका काट करके खा लिया। अभी जिसके पास में बड़ा था और जिसका टुकड़ा बंदर ने खाया वह सोच रही है कि अभी मेरा तो छोटा हो गया टुकड़ा और यह जो दूसरी बिल्ली है उसका बड़ा हो गया। तो वह कहती है उसमें से भी थोड़ा सा काट के खा जाओ। तो बंदर ने क्या किया कि दूसरी बिल्ली का भी एक टुकड़ा काट के खा गया। अभी जिसका खाया उसका और छोटा हो गया रोटी का टुकड़ा। वह सामने बंदर को कहती है कि अभी सामने वाली का बड़ा हो गया है रोटी का टुकड़ा उसमें से काट के खा जाओ। ऐसा करके आखिर में देखा कि पूरी रोटी बंदर खा गया और बिल्ली के हाथ में कुछ नहीं आया। तो ऐसा ही यह जो ब्रिटिश गवर्नमेंट की साजिश थी जहांजहां पे भी जाएंगे देखेंगे कि यह डिवीजन है लोगों के भीतर में तो सीधा एक्सप्लइट करना शुरू कर देंगे। एक डिवीजन को कहेंगे, एक ग्रुप को कहेंगे कि हम आपके आपको सहाय करेंगे। आप दूसरों के साथ में लड़िए। अभी वह दोनों जब लड़ते हैं तो पीछे-पीछे जाकर के ब्रिटिश लोग दोनों को हेल्प करेंगे और ये दोनों को लड़ के मरने देंगे। जब दोनों कमजोर हो जाएंगे तब दोनों के ऊपर में अपनी सत्ता स्थापित कर देंगे। किंतु जब ये ब्रिटिश लोग भारत में आए उन लोगों को हमारे भीतर में यह फुटफाट पढ़ाने का हमारे भीतर में यह वैमनस्य खड़ा करने का ये हमारे भीतर में ये एक दूसरों के प्रति द्वेष खड़ा करने का उनको कोई मेहनत नहीं करना पड़ा था। क्योंकि ऑलरेडी भारतीय समाज की जो पिछले कुछ 100 सालों से परिस्थिति बनी आ रही थी ब्रिटिश के आने से पहले कि ऑलरेडी हमारा समाज इस तरह से टूट-फूट बिखर गया था कि आपस में किसी भी तरह का भाईचारा नहीं था। किसी भी तरह की सिंपथी नहीं थी। देखिए कुछ-कुछ जो मूवमेंट्स है भारत में यह भक्ति मूवमेंट है। यह जो चैतन्य देव की मूवमेंट है वेस्ट बंगाल में उन्होंने यह प्रयास किया कि जो कि यह पदलित है जो कि यह नीची जाति के हैं उनको फिर से वैष्णव धर्म में अपनाया जाए। किंतु सम हाउ यह जो रिफॉर्म मूवमेंट थी यह वैष्णविज्म या तो भक्ति मूवमेंट यह चैतन्य की यह जो मूवमेंट है उसमें शायद इतनी शक्ति नहीं थी कि ब्रिटिश आक्रमण को सहन कर पाए। तो फिर यह ब्रिटिश लोगों ने ऑलरेडी देखा कि फुटफाट है ही है तो उसको एक्सप्लइट करके हमारे पर राज करना है। तो अभी यह इतिहास पढ़कर के जब कुछ लोग ऐसा कहेंगे 19th सेंचुरी में कि हां ब्रिटिश लोग हमारे पर राज कर पाए थे। इसका एक ही कारण है कि हम लोगों में फुटफाट है और यह जो हम लोगों में यह जो डिवीजन है, आपस में द्वेष है, आपस में वेयर है एक दूसरे के प्रति। इसका एक ही कारण है वह है हिंदू धर्म। इस हिंदू धर्म को हमारे बीच में से हटाओ तो सब तरह से लोगों के भीतर में फिर से मित्रता का वातावरण स्थापित होगा और हम यह विदेशी शासन से मुक्ति पा लेंगे। तो यह सुनकर के स्वामी जी कहते हैं कि यह डायग्नोसिस बिल्कुल गलत है। ईश्वर की कृपा से मुझे यह जानने को मिला है कि धर्म का कोई फौल्ट नहीं है। हिंदू धर्म की कोई गलती नहीं है। ये जो हिंदू धर्म के जो गोल्डन प्रिंसिपल है, हिंदू धर्म का जो फर्स्ट प्रिंसिपल है, सर्वम खलु इदम ब्राह्मण यह जो भी जगत है, वह पूरा ब्रह्म का बना हुआ है। सभी के भीतर में वही ईश्वर का निवास है। स्वामी जी कहते हैं कि मैं उस देवता की पूजा करता हूं जिसे अज्ञानी लोग मनुष्य कहते हैं। तो यह मनुष्य है। उसी के हृदय में शिव बैठे हुए हैं। यदि ऐसा कहे कि यह चंडाल है, यह हरिजन है, यह मेथर है, यह डोम है, यह यह है, यह उस जाति का है। ऐसा सब कुछ कहने को जाएंगे तो हिंदू धर्म के जो मुख्य प्रिंसिपल है कि सभी के हृदय में वही आत्मन, वही ईश्वर विराजमान है। उस प्रिंसिपल को तो हमने छोड़ ही दिया। और फिर यह नात, जात वगैरह-वगैरह जो है उसको अपने सर पर बिठा दिया। तो गलती यहां पर कोई हिंदू धर्म की नहीं है। गलती है कि हम लोगों ने हिंदू धर्म को ठीक-ठीक से समझा नहीं है और उसका गलत एप्लीकेशन हम अपने समाज में कर रहे हैं। देखिए स्वामी जी इसके बारे में क्या कहते हैं। हियर मी माय फ्रेंड्स। सुनो मेरे मित्र। आई हैव डिस्कवर्ड द सीक्रेट थ्रू द ग्रेस ऑफ द लॉर्ड। ईश्वर की कृपा से मैंने इस रहस्य को खोज निकाला है। रिलीजन इज नॉट इनफोल्ट। धर्म का कोई गलती नहीं है। ऑन द अदर हैंड। दूसरी ओर म ऑन अदर हैंड योर रिलीजन टीचेस यू दैट एवरी बीइंग इज ओनली योर ओन सेल्फ मल्टीप्लाई। हमारा धर्म तो यह कहता है कि जितने भी मनुष्य हैं इस जगत में वो मेरा ही मेरे ही आत्मन है। यह मेरा ही आत्मन मल्टीप्लाई होकर के दूसरे दूसरे के हृदय में निवास कर रहा है। बट इट वाज़ द वांट ऑफ प्रैक्टिकल एप्लीकेशन, द वांट ऑफ सिंपथी, द वांट ऑफ आर्ट। किंतु यह जो भव्य प्रिंसिपल है हिंदू धर्म का कि सभी के भीतर में एक ही आत्मन विराजमान है। वही आत्मन आपके भीतर में है जो कि मेरे भीतर में है। यह मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, पंचमहाभूत, पंच प्राण, पंच ज्ञानेंद्रिय, पंचकर्मेंद्रिय यह जो देह बना है उसके परे यदि जाएंगे तो हमको पता चलेगा कि हमारे भीतर में जो चेतन तत्व है, मेरे भीतर में जो चेतन तत्व है, वही आपके भीतर में है। आत्मन की दृष्टि से हम सभी लोग एक ही है। यह जो वैविध्य है, वैविध्य तो अज्ञान मोह से प्रकट हुआ है। किंतु इसको नहीं समझ करके मैंने इस देह को मेरा सही स्वरूप समझ लिया। यह मेरी हिंदू धर्म के मूल सिद्धांत को पहचानने की अक्षमता है। मूल सिद्धांत को व्यवहार में परिणत करने की, प्रैक्टिकल एप्लीकेशन करने की मेरी कमजोरी है। इसके बाद में क्या कहते हैं? द लॉर्ड वंस मोर केम टू यू एस बुद्धा एंड टॉट यू हाउ टू फील हाउ टू सिंपथाइज विद द पुअर द मिज़रेबल द सीनर भगवान फिर से बुद्ध के रूप में प्रकट हुए बुद्ध ने सिखाया सबको कि सहानुभूति अनुकंपा कंपैशन ही है जैसे कि धर्म का हृदय किंतु इस भगवान बुद्ध को सराहना करने की वजह भगवान बुद्ध का जो मूल सिद्धांत है। सबके प्रति सहानुभूति, कंपैशन, सबके प्रति दया, सबके प्रति ममता। इस बात को ग्रहण करने की वजह हम लोगों ने यह कह के प्रचार करना शुरू कर दिया कि भगवान बुद्ध तो वेद में मानते नहीं है। भगवान बुद्ध तो नास्तिक है। इसलिए भगवान बुद्ध को स्वीकार करने की कोई आवश्यकता नहीं। ऐसा बोलकर के हमने भगवान बुद्ध को छोड़ दिया। किंतु इसका परिणाम क्या आया? स्वामी जी कहते हैं कि देखिए जिस तरह से जीसस का जन्म हुआ था यहूदियों के बीच में। किंतु इसी यहूदियों ने जीसस को दगा दिया। जीसस के बारे में झूठमठ का कंप्लेन करवाया और जीसस को क्रुसिफाई करवा दिया। और इसका परिणाम क्या आया कि यही यहूदी प्रजा सेंचुरीज आफ्टर सेंचुरीज सदियों से इधर-उधर भटक रही है और इनके ऊपर में इतने सारे अत्याचार होते आ रहे हैं। तो स्वामी जी कहते हैं कि जो यहूदियों के साथ में हुआ वही हमारे साथ में हुआ कि जो भगवान बुद्ध का जो इतना सुंदर जो संदेश था सबके पति प्रति सहानुभूति कंपैशन उसको छोड़कर के हमको भी जो भी भारत में आया जितने भी हमलावर भारत में आए सबकी हमको मार खानी पड़ी है। सबके द्वारा हमारे पे शोषण या तो फिर अत्याचार हमको सहन करने पड़े हैं। जो भी आया उसने हमारे पे अत्याचार किया और हम इस अत्याचार के बारे में कुछ नहीं कर पा रहे हैं। आखिर में देखिए इस पैराग्राफ के अंत में स्वामी जी एक बहुत सुंदर बात कहते हैं। क्या कहते हैं कि ओवरवर्स इज टरेनी एंड रिवर्स स्लेवरी। यह जो सिक्का है उसकी एक बाजू है टायरेनी टायरेनी अर्थात कि क्या क्रूरता अपने जो साथी है, अपने जो बंधु है, अपने जो मित्र है, अपने जो सह नागरिक है इस देश के उनके प्रति क्रूरता। मैं उसको सहाय नहीं करूंगा। क्यों? क्योंकि वह तो डिर्व करता है बेड ट्रीटमेंट। क्यों? क्योंकि वह तो दूसरी जाति का है, नीची जाति का है। मैं उच्च जाति का हूं। बोल के मेरे हृदय में उसके प्रति सहानुभूति नहीं होती। यह है क्रूरता। तो यदि सिक्के की एक बाजू क्रूरता है तो रिवर्स इज स्लेवरी। उसकी दूसरी बाजू है यह गुलामी। यदि हम क्रूर होंगे अपने देश बांधवों के प्रति तो फिर हमको गुलामी करनी ही पड़ेगी। यह भारत की गुलामी का जो राज क्या है? भारत को 1000 साल तक क्यों हम दूसरे यह जो विदेशी लोगों के सामने झुकना पड़ा था? जितने भी विदेशी शासक आए उन्होंने हमारे पर राज किया। इसका कारण क्या है? तो स्वामी जी कहते हैं कि हमारे हृदय में हमारे ही देश बांधवों के प्रति जो क्रूरता प्रकट हुई थी, इसकी वजह से यह जो हमको गुलामी का सामना करना पड़ा। बड़ा ही सुंदर स्टेटमेंट। द स्लेव एंड द टयरेंट आर सिनोनिमस। जो दास है और जो क्रूर है यह दोनों एक ही व्यक्ति है। यदि मैं क्रूरता का मैं यदि क्रूर होऊंगा यदि मैं दूसरों के प्रति सहानुभूति नहीं रखूंगा तो यह जो प्रकृति है जो प्रकृति के सिद्धांत है वह मुझे दास बनाकर के गुलाम बना करके रखेंगे। यदि मेरे हृदय में मित्रता नहीं है। यह जो चित्त प्रसाद योग शास्त्र में कि मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा यह चित्त प्रसाद यदि मेरे में नहीं है तो मुझे गुलामी ही करनी पड़ेगी। तो यह गुलामी और यह कायरता यह दोनों सिक्के की दो बाजुएं हैं। और इससे मुकाबला कैसे किया जाए और इससे छूटा कैसे जाए। अच्छा देखिए ये गुलामी और कायरता के बारे में स्वामी जी एक उदाहरण देते हैं। स्वामी जी कहते हैं कि तुमको याद है कि हम उस एक पंडित के साथ में वार्तालाप कर रहे थे और उसको मैंने बताया था कि मैं विदेश में जाना चाहता हूं। विदेश में जाकर के हिंदू धर्म का प्रचार करूंगा और इसके लिए मुझे यह जो काला पानी है उसको क्रॉस करना पड़ेगा। तो यह जो पंडित था उसका जो नेचर था उसका जो स्वभाव था इतना क्रूर था कि यह जो हमारे धर्म के यह जो प्राणदायक जीवन दायक जो मूल सिद्धांत है अमृतमय यह जो वेद उपनिषद श्रीमद् भगवत गीता की वाणी है उसको पूरे विश्व में प्रचार करें उसके लिए स्वामी जी को सराहना दी जाए उसके लिए स्वामी जी को अभिनंदन दिया जाए उनको एन एनकरेज किया जाए। उसकी वजह ऐसा नहीं करके जोरजोर से चिल्ला करके बड़े ही दुष्टता पूर्वक बड़े ही घिनौना चेहरा बना करके वो कहता है कि कदापीना कदापीना अर्थात कि यह काला पानी क्रॉस करना यह जो म्लेच्छ है विदेशी लोग कौन है? तो वह है म्लेच्छ। तो यह म्लेच्छों के देश में जाना, उनको स्पर्श करना, उनके द्वारा बनाया हुआ आहार करना, उनके साथ में एक ही घर में रहना, उनके साथ में मित्रता करना। ऐसा करने से तो जात चली जाएगी। ना ही म्लेच्छों के देश में जाना चाहिए, ना ही काला पानी क्रॉस करना चाहिए। और भारत में यह जो नीची जाति वाले हैं, उनके साथ में वही क्रूरता पूर्ण व्यवहार करना चाहिए। तो स्वामी जी कहते हैं कि देखो यह जो चिल्ला चिल्ला करके क्रूरता पूर्वक बार-बार कह रहा था कदापि ना कदापि ना यह मुझे हमेशा याद रहेगा। यह लोग सोचते हैं कि भारत एक जैसे कि यह भारत ही सब कुछ है उनके लिए और भारत में भी यह जो ऊंची जाति के हैं वही सर्वस्व है। ना ही यह विदेशी लोगों की इनको फिक्र है। ना ही खुद के देश बांधव जो कि दिन प्रतिदिन गरीबी में बेहाली में डूबे जा रहे हैं। ना ही उनके प्रति सहानुभूति है। ना ही यह जिलों को विदेशियों को कहते हैं म्लेच्छ। म्लेच्छों के भीतर में वेद का प्रचार कैसे हो? म्लेच्छों के भीतर में वेद की ये जो अमृत्वय वाणी है वो मलेच्छों को कैसे सुनाया जाए ऐसा बोलकर के उनका जो हृदय है बड़ा ही कठोर हो गया है बड़ा ही क्रूर हो गया है और इसीलिए स्वामी जी कहते हैं दिस स्टेट ऑफ थिंग्स मस्ट बी रिमूव्ड नॉट बाय डिस्ट्रइंग रिलीजन बाय बट बाय फॉलोविंग द ग्रेट टीचिंग्स ऑफ द हिंदू फेथ यह जो भयानक विषम परिस्थिति है। इस परिस्थिति को भारत में से निकालना होगा। हिंदू धर्म का सर्वनाश करके नहीं किंतु किंतु वही इस हिंदू धर्म के जो मूल सिद्धांत है उसको फॉलो करके एंड जॉइनिंग विथ इट द वंडरफुल सिंपैथी ऑफ दैट लॉजिकल डेवलपमेंट ऑफ हिंदूइज़्म द बुद्धिज्म। और इस हिंदू धर्म का जो यह मूलभूत सिद्धांत ब्राह्मण की यह जो बुद्धिमत्ता है उसके साथ में जो विशाल उदार हृदय है भगवान बुद्ध का इसको कंबाइन करना होगा। ब्राह्मण के पास में प्रचंड मेधा शक्ति है। यह माया की जो माया जाल है, इंद्र जाल है, उसको छिन्नभिन्न करके ब्राह्मण की यह जो तीव्र मेधा हमको ईश्वर ज्ञान या तो आत्म साक्षात्कार प्राप्त करवा सकती है। किंतु ऐसा करते-करते एक स्टेज पे हम लोगों के भीतर में जो क्रूरता आ गई, तो यह हिंदू धर्म का ही जो लॉजिकल डेवलपमेंट है बुद्धिज्म उसके माध्यम से भगवान बुद्ध का विशाल महत हृदय हमको अपनाना होगा। ब्राह्मण की यह मेधा जिसके माध्यम से हम माया को चकनाचूर कर दें और भगवान बुद्ध का उदार हृदय जिसको लेकर के हम पूरे विश्व में मानवता का बंधुत्व का मित्रता का और सहानुभूति का मैसेज फैलाएं वो म्लेच्छों के प्रति हो ना कि यह जो कुचली हुई जातियों के प्रति पदलितों के प्रति दोनों के प्रति हमारी सहानुभूति और मित्रता और कंपैजन होना चाहिए। अ 100 थाउज मैन एंड वुमेन फायर्ड विद द झील ऑफ होलीनेस फर्टिफाइड विद इटरनल फथ इन द लॉर्ड एंड नर्व टू लायंस करेज बाय देर सिंपथी फॉर द पुअर एंड फोलन एंड द डाउन विल गो ओवर द लेंथ एंड ब्रेथ ऑफ द लैंड प्रीचिंग द गोस्पेल ऑफ सेल्वेशन द गोस्पेल ऑफ हेल्प द गोस्पेल ऑफ सोशल राइजिंग अप द गोस्पेल ऑफ इक्वलिटी अ 100 थाउज मेन एंड वमेन 1 लाख पुरुष और स्त्रियां लड़के और लड़कियां फायर्ड विद द झील ऑफ होलीनेस। यह जो पवित्रता की यह जो प्रचंड अग्नि है उसमें से अपने को स्ट्रेंथन करके अपने को जैसे कि मजबूत करके फर्टिफाइड विद इटरनल फेथ इन द लॉर्ड। ईश्वर के प्रति अनंत श्रद्धा अपने हृदय में आरोपित करके और नर्व टू लायंस करेज शेर की यह जो साहस है शेर का जो वीर्य है शेर का जो प्रचंड प्रताप है वो अपने हृदय में भर करके और फिर साथ में ही यह जो पुअर है फोलन है और डाउन ट्रोडन है जो कि गरीब है पदददलित है और संसार में जिन जिनका कि हमेशा दमन होता आ रहा है। उनके प्रति भयानक प्रचंड सहानुभूति अपने हृदय में लेकर के पूरे देश के में फैल पूरे देश में फैल जाएंगे। पूरे देश की भूमि में फैल जाएंगे। और क्या करेंगे? द टू प्रीच द गोस्पेल ऑफ सेल्वेशन। मुक्ति की वाणी सुनाएंगे। सहानु टू प्रीच द गोस्पेल ऑफ हेल्प। मदद और सहाय की दिव्य वाणी सुनाएंगे। एंड द गोस्पेल ऑफ सोशल राइजिंग अप। जो लोगों का दमन होता आ रहा है आज तक उनको फिर से अपना सीना यह करके अपना सिर उठा के सम्मान के साथ में कैसे जिया जाए यह सिखाएंगे। तो यह जो किस तरह से स्वामी जी कहते हैं दो चीज यहां पर स्वामी जी बताते हैं कि यदि मेरे हृदय में क्रूरता है तो फिर मैं कायर होऊंगा ही होऊंगा। यदि मेरे हृदय में दूसरों के प्रति भयानक द्वेष भरा हुआ है। म्लेच्छों के प्रति नीची जात के प्रति इस तरह से यदि मेरे मन में वैर भाव द्वेष भाव भरा हुआ है तो फिर मैं गुलाम यदि बनता हूं यह विदेशी हमलावरों के इस बात में कोई भी आश्चर्य नहीं है क्योंकि जो क्रूर होता है अपने बांधवों के प्रति अपने साथियों के प्रति वो आदमी हमेशा गुलाम ही बनता है। गुलामी और ये क्रूरता कायरता और क्रूरता दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और यदि इससे मुक्ति प्राप्त करनी है तो आपको इस तरह की प्रचंड शक्ति अपने भीतर में जागृत करनी होगी। देखिए झील ऑफ होलीनेस पवित्रता की प्रचंड अग्नि इटरनल फेथ इन लॉर्ड ईश्वर के प्रति प्रचंड श्रद्धा की भयानक अग्नि और यह शेर का साहस पवित्रता और फिर ईश्वर में श्रद्धा और फिर यह शेर का साहस सिंह का साहस यह तीनों हमको इकट्ठा करने होंगे। इन तीनों की शक्ति से अपने स्नायु को फर्टिफाइड करना होगा और साथ-साथ में ही अपने हृदय में प्रचंड सहानुभूति, प्रेम, कंपैशन, करुणा और दया रखनी होगी। दो चीज हमको चाहिए। यदि यह भारत की अवनति हुई है उससे यदि बचना है तो सबसे पहले तो अपने हृदय में से क्रूरता को भगा करके सहानुभूति प्रकट करनी है। दूसरा कि अपने बाहों में प्रचंड शक्ति को जन्म देना है। इस तरह की शक्ति जो कि पवित्रता से उत्पन्न होती है। इस तरह की शक्ति जो कि ईश्वर पर श्रद्धा से उत्पन्न होती है। इस तरह की शक्ति या साहस या शौर्य या वीर्य जो कि एक शेर में होता है तो इस तरह की शक्ति से शक्तिमान होना है और हृदय में सहानुभूति और करुणा का उद्रेक करना है। यदि यह दोनों चीज साथ में होगी तभी भारत का उत्थान होगा। नो रिलीजन ऑन अर्थ प्रीचेस द डिग्निटी ऑफ ह्यूमैनिटी इन सच अ लॉफ्टी स्ट्रेन इज हिंदूइज़्म। हिंदू धर्म के अलावा ऐसा और एक भी धर्म नहीं है जो कि आपको मनुष्य की दिव्यता के बारे में इतने सुंदर शब्दों से बताता हो। अनफॉर्चूनेटली नो रिलीजन ऑन अर्थ ट्रीट्स अपॉन द नेक्स ऑफ द पुअर एंड लॉ इन सच ए फैशन एस हिंदूइज़्म। अनफॉर्चूनेटली हिंदू धर्म के अलावा ऐसा कोई धर्म नहीं है जो कि पददलित है। उनकी गर्दन पे अपने पैर रख करके उसको कुचड़ लेता है। यानी कि देखिए कि जो मनुष्य की दिव्यता है उसका संदेश भी यही हिंदू धर्म में से निकला है और यह जो हिंदू धर्म के नाम पर जो विकृतियां जो समाज में फैली है वह भी ऐसी भयानक है कि अपने जो साथी अपना बांधव है अपना यह जो सह नागरिक है उसके प्रति इतनी क्रूरता प्रदर्शित करता हो इतना इस तरह का दूसरा धर्म भी नहीं है। ये दोनों जैसे कि आपको हिंदू धर्म के साथ में देखने को मिलती है। किंतु स्वामी जी क्या कहते हैं कि दोष यहां पर हिंदू धर्म का नहीं है। दोष है हम लोगों का कि हमने हिंदू धर्म के मूल सिद्धांतों को पहचानने की वजह मूल सिद्धांत को वास्तविकता में परिणत करने की वजह प्रैक्टिकल एप्लीकेशन करने की वजह यह जो विकृतियां है विकृतियों को ही समाज में स्थान दिया है। गलती हमारी है हिंदू धर्म की नहीं है। और इसीलिए स्वामी जी कहते हैं कि दिस इज द स्कूल ऑफ मिजरी वि इज आल्सो द स्कूल फॉर ग्रेट सोल्स एंड प्रोफेट्स फॉर द कल्टीिवेशन ऑफ सिंपैथी ऑफ पेशेंस एंड अबव ऑल ऑफ एन इंडोमिनेटेबल आयरन विल व्हिच क्वेक्स नॉट इवन इफ द यूनिवर्स बी पलवेराइज्ड एट आवर फीट यह जो जगत है वह एक ऐसी विशाल एक ऐसी एक स्कूल है एक ऐसी एक शाला है। जहां पे यह जो ग्रेट सोल यानी कि महात्मा होते हैं, जो प्रॉफेट्स होते हैं, वह यहां पे आकर के सिंपथी यानी कि सहानुभूति सीख सकते हैं। पेशेंस यानी कि धैर्य सीख सकते हैं। किंतु अबव ऑल इंडोमिटेबल आयरन विल। एक इस तरह की प्रचंड संकल्प शक्ति वे लोग प्रकट कर सकते हैं जो कि कभी भी धुजेगी नहीं। कभी भी डरेगी नहीं। यदि यह पूरा यूनिवर्स, यह पूरा विश्व ब्रह्मांड हमारे सामने चकनाचूर हो जाए हमारे पैरों के सामने तो भी हमारी संकल्प शक्ति है। कभी भी थोड़ी सी भी चत नहीं होंगी। इसमें थोड़ा सा भी डर प्रकट नहीं होगा। इसमें थोड़ा सा भी धुझारी प्रकट नहीं होगी। इस तरह की प्रचंड संकल्प शक्ति प्रचंड करुणा और प्रचंड आयरन धैर्य करुणा धैर्य और संकल्प शक्ति यह जगत हमको सिखाता है। तो जब तक यह करुणा हमारे में नहीं आएगी, धैर्य नहीं आएगा, संकल्प शक्ति हमारे में नहीं आएगी, तब तक हम भारत का फिर से पुनरुद्धार नहीं करने वाले हैं। इसीलिए क्या करना है? मेक ए ग्रेट सैक्रिफाइस। एक इस तरह का सैक्रिफाइस करो। बलिदान दो। द सैक्रिफाइस ऑफ ए होल लाइफ फॉर देम। यह पूरा जीवन यह गरीबों के लिए बलिदान प्रदत्त कर दो। फॉर हुूम ही कम्स फ्रॉम टाइम टू टाइम। हुम ही लव्स अबव ऑल द पुअर द लोली द ऑप्रेस। किसके सामने हम यह अपने जीवन को बलिदान करें उनके लिए जो कि यह गरीब है, पददलित है उनको जो प्रेम करते हैं और जिनके लिए यह हमेशा हमेशा से फिर से फिर से जन्म ग्रहण करते रहते हैं। गो नाउ दिस मिनट टू द टेंपल ऑफ पार्थ सारथी। अभी इसी क्षण उस पार्थ सारथी के मंदिर में जाओ। कौन पार्थ सारथी? भगवान कृष्ण स्वयं पार्थ के जो सारथी थे उस पार्थ सारथी के मंदिर में जाओ। एंड बिफोर हिम हु वाज़ अ फ्रेंड टू द पुअर एंड लोली को हर्ट्स ऑफ गोकुल। वो जो कि गरीबों के मित्र थे। यह जो गोपालक थे गोप बालक बालिकाएं थी वृंदावन की उनके जो मित्र थे हु नेवर श्रेंग टू एम्ब्रेस द पराया गुहक हु एक्सेप्टेड द इनविटेशन ऑफ अ प्रॉस्टिट्यूट इन द प्रेफरेंस टू द नोबल्स एंड सेव्ड हर इन ह इनकारनेशन एस बुद्धा ये डाउन ऑन योर फेस बिफोर हिम एंड मेक द ग्रेट सैक्रिफाइस वो जो कि गोप बालक उल बालिका ओं के मित्र थे जो परिगहक था उसको उन्होंने आलिंगनबद्ध किया और भगवान बुद्ध के रूप में उन्होंने एक वैश्या का आमंत्रण ग्रहण किया। उस भगवान के श्री चरणों में जाकर के अपने पूरे जीवन का सैक्रिफाइस करो। पूरे जीवन को यह गरीबों के लिए बलिदान प्रदत्त करो। वाओ देन टू डिवोट योर होल लाइफ टू द कॉज ऑफ द रिडेंशन ऑफ दोस दिस 300 मिलियन गोइंग डाउन एंड डाउन एवरीडे ये 300 करोड़ लोग ये 30 करोड़ लोग जो कि दिन प्रतिदिन जैसे कि भयानक गरीबी बेकारी में डूबे जा रहे हैं उनके उत्थान के लिए अपने जीवन को बलिदान स्वरूप करो तो यह था स्वामी जी का मैसेज स्वामी जी बेसिकली क्या कह कहना चाहते हैं यदि जिसके हृदय में सहानुभूति नहीं है, जिसके हृदय में करुणा नहीं है, वह हमेशा इस तरह की कायरता का शिकार होगा ही होगा और इस तरह की कायरता का शिकार होकर के वह शत्रुओं के द्वारा पराजित होगा और उसके ऊपर में शत्रु आकर के उसको गुलाम बना के उसके ऊपर राज करेंगे ही करेंगे। इसमें कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। और इसीलिए यहां
अध्याय 2 सांख्य योग, श्लोक 3: करुणा से पूर्ण अर्जुन क्रूर कैसे हो सकता है?
पे भगवान कृष्ण कहते हैं क्या कहते हैं कि क्लब्यम मास्म गमह पार्थ यह जो कायरता है तुम इसको प्राप्त ना हो न एतत्वपद्यते यह तुमको शोभा नहीं देता है क्षुद्रम हृदय दुर्बल्यम यह क्षुद्र हृदय की दुर्बलता है तक्तिष्ट परंतप उसका त्याग करके उत्त जागृत प्राप्त्य वर निबोधत यह जो स्वामी जी का फेवरेट स्टेटमेंट खड़े हो जाओ और शत्रुओं का सामना करो। यहां पर जिस तरह से भारतवासियों को स्वामी जी कहते हैं कि क्रूरता से मुक्ति पाओ। यहां पर भगवान कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि कायरता से मुक्ति पाओ। सॉल्यूशन दोनों का एक ही है। प्रचंड साहस, वीर्य, धैर्य ईश्वर में श्रद्धा, पवित्रता इसके माध्यम से अपने को बलवान करके शक्तिमान करके हमको युद्ध क्षेत्र में आगे बढ़ना है। आज के भारत में आज जो हम अर्जुन हैं और भगवान रामकृष्ण जो कि हमारे सारथी हैं पार्थ सारथी आज के उनका जो संदेश है भगवान रामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद का वो संदेश है कि यह भारत रूपी भूमि में यह जो गरीबी रूपी महक्षस है यह हजार कौरवों की जो सेना है 100 कौरवों की इसका हमको सामना करना है और वहां पर अर्जुन को भगवान कृष्ण कृष्ण कहते हैं कि कायरता को छोड़कर के फिर से शौर्य वीर्यवान होकर के तुम्हारे शत्रुओं का दमन करो। अच्छा यह तो हमने सोचा यहां पर किंतु जैसे कि पहले ही श्लोक में हमने देखा था तम तथा कृपया विष्टम जो कि कृपा से आविष्ट हो चुका है और अश्रु पूर्णा कुलेक्षणम ऐसे आंखों ऐसी आंख जो कि आंसुओं की वजह से कुछ देख नहीं पा रही है। अर्थात कि अर्जुन की तो अपने यह जो परिवारजन थे उसके ऊपर में करुणा ही तो थी। ऐसा कहा है कि अर्जुन उनके उनसे डर गया है। हालांकि कायरता शब्द का व्यवहार अवश्य यहां पर हुआ है। किंतु यह हमको देखना है कि अर्जुन के मन में दो बात थी। कायरता कहां से प्रकट हुई तो वह करुणा से प्रकट हुई। यदि वह अर्जुन और किसी शत्रुओं का सामना करता जिसमें कि उसके बांधव या तो गुरुजन या तो फिर यह जो कजिन ये परिवारजन ना होते तो शायद अर्जुन इस तरह से कायरता से ग्रसित ना हो जाता। अर्जुन डर ना जाता। अर्जुन का जो भय है, डर है, कायरता है, वह कहां से प्रकट होती है? युद्ध के मैदान में अपने परिवारजनों को देखकर के। तो यहां पर स्वामी जी जो हमको कहते हैं कि हमारे हृदय में करुणा होनी चाहिए। यदि करुणा नहीं होगी तो हम क्रूर हो जाएंगे। तो यहां पर अर्जुन के हृदय में तो करुणा है ही है अपने परिवार जनों के प्रति। किंतु यह करुणा उसको फिर यह जैसे स्वामी जी कहते हैं कि यदि हमारे हृदय में करुणा है तो हमको शेर की तरह साहस प्राप्त होगा। यह पवित्रता की अग्नि हमारे में प्रकट होगी। यह सील ऑफ होलीनेस और यह जो ये ये पवित्रता की यह जो अग्नि है हमारे भीतर में प्रकट होगी। कब प्रकट होगी? जब हमारे हृदय में करुणा का प्रवेश होगा। तो एक और स्वामी जी कहते हैं कि यदि हम करुणा पर्वश होंगे तो हम प्रचंड शक्ति से शक्तिमान बनेंगे। हमारा विल पावर हमारी संकल्प शक्ति प्रचंड रूप से बढ़ जाएगी। अर्जुन के साथ में बिल्कुल रिवर्स हुआ है। यदि उसके भीतर में करुणा का प्रवेश हुआ तो वह कायर ही हो गया है। तो यह क्या भगवान कृष्ण यानी कि अर्जुन के हृदय में जो हो रहा है अर्जुन की जो साइकोलॉजी है वो क्या स्वामी जी जो जिस तरह से आज की साइकोलॉजी समझते हैं तो हमारी साइकोलॉजी और अर्जुन की साइकोलॉजी अलग है। अर्जुन का जो रिएक्शन है और स्वामी जी जो ऑब्जर्व कर रहे थे भारतीय समाज में वह क्या विरोधाभासी नहीं है यहां पे कंट्राडिक्शन नहीं है कंट्राडिक्शन है किंतु इसका सॉल्यूशन भी है अर्जुन के हृदय में अपने परिवारजनों के प्रति करुणा थी ऐसा नहीं है। देखिए यहां पे यदि हमारी करुणा या तो हमारी दया या तो फिर हमारी सहानुभूति यदि हमारे परिवारजन पर होती है तो वह करुणा नहीं है। वह तो माया है। वह तो मोह है। मोह, माया और करुणा इन दोनों में डिफरेंस क्या है कि मोह या तो फिर माया हमारे जो रिश्तेदार है, हमारे जो करीबी है, हमारे जो मित्र है या तो परिवारजन है, उसके ऊपर में होती है। और यह जो करुणा जो होती है, वह पूरे विश्व के ऊपर में होती है। यहां पर यह मेरा बच्चा है बोलकर के मैं उसको प्रेम कर रहा हूं। वह तो मोह का बंधन हुआ। किंतु सबके भीतर में वही आत्मन है बोलकर के मैं सबको प्रेम कर रहा हूं। वो दिव्य संबंध है, दिव्य करुणा है। यहां पर वो जो शारीरिक संबंध से जो मोह प्रकट होता है वह है और वहां पर वो दिव्य संबंध से जो दिव्य करुणा प्रकट होती है वो है। तो यह तो सब शारीरिक संबंध से यह चाचा है, मामा है, काका है। यह सब है। भाई, भांजा, भतीजा यह सब है। जबकि ये जगत जो है यहां पे जिस दिन मैं अमेरिका जाता हूं स्वामी जी जैसे अमेरिका गए अमेरिका वासियों पे उनकी करुणा की वजह से योग और वेदांत का जो संदेश दिखाया वहां पर कहां स्वामी जी के कोई चाचा मामा भाई भतीजा वहां पर थे कोई नहीं था। स्वामी जी के खुद के भाई-बहन भारत में भूखे मर रहे थे। उनको छोड़कर के वह वहां पर वह जो धनपतियों के साथ में वार्तालाप कर रहे थे। स्वामी जी के जो शिष्य थे फ्रांसिस लेगेट वो तो कितना बड़ा बिजनेसमैन था। स्वामी जी ने उसको ऐसा नहीं कहा कि तुम एक काम करो तुम थोड़ा पैसा मेरी मां को भेजो। हालांकि ये जो मिज ओलीबुल है वगैरह जो स्वामी जी की लेडी डिसाइपल उन्होंने बीच-बीच में थोड़ा बहुत आर्थिक सहाय स्वामी जी की मां को करते थे। किंतु वह तो अपने से सोच करके स्वामी जी ने कभी उनको नहीं कहा कि मेरी मां इतनी बेहाल है उनकी अवस्था उनको हेल्प करो। नहीं स्वामी जी ने कहा यदि आपको पैसा देना है डोनेशन देना है तो बेलूर मठ को दीजिए भारत के उत्थान के लिए बेलूर मठ के द्वारा जो रिलीफ एक्टिविटी वगैरह चल रही है उसमें आप अपना डोनेशन दीजिए नहीं कि मेरे परिवार जनों को दीजिए यानी कि परिवारजनों पे मोह स्वामी जी का नहीं था किंतु समग्र विश्व पे समग्र देशवासियों के ऊपर में समग्र जो विश्व के जितने भी नर नारी है सबके प्रति करुणा दिव्य करुणा स्वामी स्वामी जी के मन में थी। तो यह जो दिव्य करुणा प्रकट होगी जो कि आत्मन से आत्मन का संबंध है उसको रिकॉग्नाइज करके तब हमारे भीतर में यह झील ऑफ होलीनेस है ये जो लायंस करेज है वो तब हमारे में प्रकट होगा। किंतु यह मोह और ममता से जब हम पूरे आविष्ट हो जाते हैं, मोह और ममता हमारे ऊपर में जब छा जाती है, तो हमारे हृदय में फिर कायरता ही प्रकट होगी। और इस कायरता या तो फिर यह क्रूरता दोनों का एक ही सॉल्यूशन है। तक्तो तष्ट परंतप इसका त्याग करके उठकर के युद्ध के क्षेत्र में शत्रुओं का विनाश करने के लिए अपने साहस, शौर्य और वीर्य का प्रदर्शन करो। तो यह था भगवान कृष्ण का और स्वामी जी का मैसेज। देखिए कि कितना परफेक्टली दोनों एक दूसरे के साथ में चलते हैं। उस समय अर्जुन की जो परिस्थिति थी उसके अनुसार भगवान कृष्ण ने उसको उपदेश दिया। आज की जो परिस्थिति है उसके अनुसार स्वामी जी हमको उपदेश देते हैं। तो अच्छा आज यहीं तक अभी बाद में कभी देखेंगे यदि क्लास होता है तो। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: आज के युग में पुरुषत्व के इस संदेश की क्या उपयोगिता है?
देखिए आज के परिप्रेक्ष्य में यदि हम देखें तो हमारे साथ में सबसे बड़ा प्रॉब्लम है कि हमारे हृदय में दूसरों के प्रति सहानुभूति नहीं है और यह सहानुभूति नहीं है बोलकर के हमारे में यह कायरता और क्रूरता दोनों का प्रवेश होता है। तो पहले तो वह जो प्रचंड आत्मविश्वास चाहिए वह जो उसमें कहा ना स्वामी जी ने कि नर्व टू द लायंस करेज एंड द फायर्ड विद द ज़ील ऑफ होलीनेस ये दोनों का कहां से आएगा? तो यह दोनों तो एक्चुअली भगवान कृष्ण ने कह ही दिया कि यह जो यदि हमको भगवान कृष्ण की वाणी पर विश्वास है तो हम यह कायरता और यह क्रूरता दोनों को अपने हृदय में से हटा करके शौर्य वीर्य का प्रवेश करवाएंगे। कैसे करना है उसके बारे में तो फिर पूरा गीता पढ़ा है। उसका तो चिंतन करना होगा। किंतु यह जो बेसिक आईडिया है वह उन्होंने दे दिया है कि शौर्य वीर्य चाहिए कायरता क्रूरता नहीं चाहिए करुणा सहानुभूति चाहिए माने दो चीजें चाहिए दो चीजें नहीं चाहिए क्या चाहिए तो करुणा और साहस और क्या नहीं चाहिए कायरता और क्रूरता
प्रश्न: पहले राजा लोग शास्त्रों में पारंगत होते थे। लेकिन आज राजाओं को शास्त्रों का कोई ज्ञान नहीं है।
यहां पे अभी देखिए स्वामी जी खुद कहते हैं कि एक समय था जबकि राजा भारत पर राज करते थे किंतु यह जो युग युग है ना यह जनता का युग है। प्रजा का युग है। हमको यह जिम्मेदारी अपने सर पर उठानी होगी। यदि हम यह कह के बैठे रहे कि अभी मेरा पड़ोसी गरीब है तो फिर यह सीएम आकर के कुछ नहीं करते। ये डीएम आकर के कुछ नहीं करते। पीएम आकर के कुछ नहीं करते। तो आज के युग में ऐसा नहीं चलेगा। हम ही को थोड़ा सा इनिशिएटिव लेकर के हमारे पड़ोसियों को हेल्प करना होगा। यह जो राजा का जो कार्य है ना आज नागरिक का कार्य हो गया है। राजा सिर्फ नागरिक के इच्छा को रिफ्लेक्ट करता है। यदि नागरिक खुद अपने हाथ में यह रिस्पांसिबिलिटी नहीं उठाएगा तो यह राजा के पास में आज अपेक्षा करना सीएम के पास में पीएम के पास में तो वह कोई काम का नहीं है। देखिए बड़ा अच्छा उदाहरण है कि एक लड़का स्वामी जी के पास में आया कहता है कि मैं अपने कमरे के अपने घर के दरवाजे खिड़की बंद करके ध्यान करने का प्रयास कर रहा हूं किंतु ध्यान नहीं हो पा रहा है तो क्या करूं तो स्वामी जी का जो वर्ल्ड फेमस उत्तर है कि पहले तो खिड़की दरवाजे खोल दो फिर घर के बाहर आओ फिर जो आसपास में जो गरीब लोग रह रहे हैं उनको सहाय करो और फिर देखो यह सहाय करके तुम्हारे हृदय में जो पवित्रता साहस और एकाग्रता का जन्म होगा उसके बाद में तुम जब आंख बंद करके बैठोगे फड़फड़ करके अपना मन ईश्वर में लग जाएगा। तो यदि यह आध्यात्मिक उन्नति भी करनी है देश की उन्नति और आध्यात्मिक उन्नति दोनों यदि करनी है तो हमको लोगों को सहाय करनी पड़ेगी। कर्म योग ये शिव ज्ञान जीव सेवा आत्मनो मोक्षार्थम जगत हिताय च इसी मंत्र का सहारा सभी नागरिकों को लेना होगा। गवर्नमेंट के सर पर डालने से आज नहीं काम होगा। देखिए गवर्नमेंट अच्छी है तो बहुत अच्छा है। मतलब यह गवर्नमेंट फिर इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करेगी। गवर्नमेंट जो प्रॉपर अर्थनीतियां इकोनॉमिक पॉलिसी है उसको एम् इंप्लीमेंट करेगी। गवर्नमेंट आर्मी को बनाएगी अच्छे से जो कि नागरिक लोग नहीं कर पाएंगे। हम लोग जाकर के इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं खड़ा करने वाले हैं। हम लोग कहीं जाकर के आर्मी नहीं बनाने वाले हैं। हम लोग जाकर के ये ब्यूरोक्रेसी है, पुलिस फोर्स है, जुडिशियल सिस्टम है, ये म्युनिसिपालिटी है। ये सब हम लोग नहीं करने वाले हैं। हमारी शक्ति की बाहर की बात है। किंतु क्या है ना कि गवर्नमेंट रिफ्लेक्ट करती है नागरिक को। नागरिक के भीतर में ही यदि क्रूरता है या तो स्वार्थ परता है तो फिर गवर्नमेंट क्या है? वही डिवाइड एंड रूल वाला बनाएगी। यह इस जाति को इसके साथ में लड़ा देगी। इसके पास में यह वोट बैंक बना देगी। इसको यह है वो म जो चलता है आपको न्यूज़पेपर देखना है। मुझे बोलने की जरूरत नहीं है। तो ऐसा करके गवर्नमेंट कैसे भी करके कोई भी पॉलिटिकल पार्टी है वह वोट ले लेगी। उनको पता है कि जो क्रूर या तो स्वार्थ पर होते हैं उनको ज्यादा सहाय करने की कोई जरूरत नहीं है। वो लोग गुलाम बनने के लिए ही सर्जित हुए हैं। तो फिर वे लोग भी हमको इग्नोर करना शुरू कर देंगे।