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Sri Ramakrishna's Disciples ·

स्वामी ब्रह्मानन्दजी के साथ विंध्यवासिनी दर्शन 17 Nov 2023

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ओम स्थापक यच धर्मस्य स धर्म अवतार षय राम कृष्णाय ते नमः तो हम लोग यह राजा महाराज के जो मंदिर दर्शन तीर्थ यात्रा वह एक जो पूरा सीरीज अपना चल रहा है तो मैं देख रहा था यह तो दो दिन हम ने डिस्कस किया कि मदुराई और रामेश्वरम दक्षिण भारत की यात्रा के लिए राजा महाराज जो गए थे तो व मंदिर में प्रवेश करने से उनके भीतर में जो भावांतर उपस्थित होता है वह इतना अद्भुत था कि उनके साथ में जो रहने वाले लोग थे मतलब उनके साथी जो थे दर्शनार्थी उन लोगों के भीतर में भी वह भाव प्रवेश करता था यह हमने देखा तो इसी सीरीज में मैं मैं देखता हूं कि और भी एक जगह वैसे तो राजा महाराज बहुत सारी जगह गए हैं तीर्थ यात्रा के लिए तीर्थ दर्शन के लिए और एक बहुत सुंदर जगह है वह है विंध्यवासिनी मंदिर विंध्याचल में हमको पता है कि वह एक शक्तिपीठ है और मां दुर्गा के साथ में वो संलग्न है और भगवत उसमें भी भगवान कृष्ण के साथ में भी इस एक कहानी है कि जिस रात को माता देवकी ने भगवान कृष्ण को जन्म दिया था उसी रात को एक पुत्री को भी जन्म दिया था और भगवान कृष्ण को तो फिर वह वृंदावन में ले गए उनके पिताजी किंतु पुत्री का पुत्री की हत्या करने के लिए जब कंस आया तो उस पुत्री ने वो देवी का स्वरूप धारण करके कहा कि तुम्हारा वध करने वाला तो ऑलरेडी यहां से निकल गया है तो वो जो देवी है वो शायद उनके साथ में भी यह विंध वासनी स्थान संलग्न है किस तरह से है वह मुझे नहीं समझ में आया मैंने थोड़ा सा रिसर्च करने का प्रयत्न किया किंतु जो भी है तो यह विंध्यवासिनी के दर्शन के लिए राजा महाराज गए थे और राजा महाराज के साथ में थे स्वामी अंबिकानगर का एक थोड़ा सा पूर्व परिचय ले लेते हैं बिफोर कि हम यह तीर्थ यात्रा के बारे में मंदिर के दर्शन के बारे में कहे अंबिकानगर छोटा सा कहानी है उनके माताजी और पिताजी दक्षिणेश्वर में जाया करते थे ठाकुर को उर ठाकुर के दर्शन के लिए ठाकुर के भक्त थे तो जब अंबिका नंद जी का जन्म हुआ तो मां उनको लेकर के छोटा बच्चा है गद में उठाया है उसको लेकर के मां गई ठाकुर के पास में तो ठाकुर ने वैसे ही बाल बाल सहज भाव में ठाकुर तो होते हैं तो पूछ लिया कि क्यों मेरे लिए क्या लाए हो तो मां ने इमीडिएट कह दिया साथ-साथ ही कि आपके लिए यह मेरा पुत्र संतान है वोह लाई हूं तो ठाकुर ने वो देखा कि लड़का बड़ा ही छोटा सा सुंदर दिखने में और मां की गोद में हंस रहा है तो ठाकुर ने कहा बहुत अच्छा बहुत अच्छा अभी यह लड़का मेरे लिए रहा तुम अभी अपने पास में रखो जब इसका समय आएगा मैं इसको वापस ले लूंगा तो वही अंबिका नंद जी महाराज अभी जब थोड़े से बड़े हुए ठाकुर की तो महासमाधि हो गई थी मठ आलम बाजार में था तो आलम बाजार में अंबिका नंद जी जाया करते थे और वहां पर किंतु उन्होंने देखा कि तुर्या अंद जी महाराज के साथ में बहुत ही अच्छा एक प्रीति का संबंध उनका बन गया था तुर्या अंद जी महाराज थे कि उनको बुलाते थे उनको वेलकम करते थे उनके उनको कुछ प्रश्न होंगे तो उसका उत्तर देते थे किंतु अंबिका ये जो महाराज जी है उस समय तो खैर गृहस्थ ही थे मतलब घर में ही थे तो देखते थे कि राजा महाराज जो है बड़े ही स्थिर गंभीर और एक अंतर्मुखी उनका व्यक्तित्व है तो उनको अभी जैसे क्या लगता है ना बहुत बार ऐसा होता है जो लोग इंट्रोवर्ट होते हैं ना उनको देख कर के लोगों को लगता है कि ये लोग या तो केरलेससवीडियो लोगों को ऐसा लगता है तो राजा महाराज को देख कर के अंबिकानगर था आलम बाजार मठ में कि राजा महाराज सब समय अकेले रहते हैं उनका मन कहीं मुक्त पंखी की तरह वो वह वो विचरण कर रहा है आध्यात्मिक राज्य में अभी आध्यात्मिक राज्य में क्या होता है क्या नहीं अभी यह तो यंग लड़का है उसको तो यह सब कहां समझ में आने वाला है तो वह सोचता था कि महाराज का नेचर थोड़ा सा रुद्र स्वभाव के महाराज दूर रहा जाए ऐसा वह सोचते थे तो अभी इस तरह से मठ में आना साधुओं के साथ में परिचय होना यह सब चला उसके बाद में स्वामी जी की महासमाधि के बाद में रयान जी महाराज और राजा महाराज वृंदावन में थे तो वृंदावन में उस समय अंबिकानगर भी वहां पर गए होंगे शायद तो वहां पर फिर से वृंदावन आश्रम में जाकर के नंद जी को प्रणाम किया अभी तुर्या नंद जी ने पूछा होगा कि अरे राजा महाराज भी तो यहीं पर है तुमने प्रणाम किया कि नहीं किया तो अभी वह बेचारे क्या धर्म संकट जिसको कहते हैं तुरिया नंद जी ने कह दिया है कि जाकर के प्रणाम करना है तो ठीक है तो बड़े ही डरते डरते राजा महाराज के कमरे में गए देखा कि राजा महाराज वहां पर बैठे हुए हैं तो जाकर के प्रणाम किया तो राजा महाराज ने कहा कि थोड़े से मेरे पैर दबा दोगे क्या तो अभी क्या है कि आजकल की जो जनर है अभी हम आज की जनरेशन कहते हैं किंतु द सेम थिंग इज ट्रू अबाउट देर जनरेशन आल्सो अरे भाई ये दो लोगों के पेर दबाना यह सब क्या मतलब एक ऐसा होता है ना वो ठाकुर ने प्रणाम अस्त्र से जगत का जय किया था जैसे ठाकुर कहते थे वो गिरीश घोष के साथ में गिरीश घोष य कोलकात्ता वाले लोगों का ऐसा खड़े खड़े ऐसा करके हाथ जोड़ कर के करेंगे तो ठाकुर ने झुक कर के किया प्रणाम तो गिरीश ने और थोड़ा भी गिरीश को लगे कि ठाकुर इतना झुक रहे हैं तो मुझे तो फिर थोड़ा सा एक जेंटलमैन नेस एक कर्टस दिखाना पड़ेगा तो और ज्यादा झुक करके प्रणाम किया तो ठाकुर ने और थोड़ा सा ज्यादा झुक करके प्रणाम किया तो आखिर में गिरीश ने साष्टांग प्रणाम कर ही दिया ठाकुर को तो ऐसे ठाकुर लोगों को प्रणाम करना सिखाते हैं यह जो अपनी सनातन भारतीय सभ्यता यह जो स्पिरिचुअल वैल्यूज वगैरह है इसको तो जदी मैं खुद आई एम नॉट टू बिग इन ऑल दिस थिंग्स जद मतलब मेरे घर पर तो मैं किसी को प्रणाम करता ही नहीं था और यदि कोई बोलता प्रणाम करने का तो मैं बड़ा ही विवत हो जाता बड़ा ही नाराज हो जाता यह सब क्या है वह पुराने जमाने के सब सुपरस्टिशन य अंधश्रद्धा यह सब क्या है ऐसा नए लोग मतलब लड़के लोग सोचते हैं तो वैसे ही अंबिकानगर के थे अभी राजा महाराज ने कहा मेरे पैर दबाओ तो अभी अंबिकानगर अभी क्या करेंगे बड़े ही संकोच पूर्वक व कभी तो यह सब सेवा नहीं की है साधुओं की किसी की तो संकोच पूर्वक जैसे हो इस तरह से महाराज के पैर दबा रहा है तो राजा महाराज ने कहा अरे ये इतना संकोच यह डर यह सब किस चीज का डर मत रखो ऐसा करके उनकी पीठ पर हाथ रख दिया अब जैसे ही उनकी पीठ पर हाथ रखा अंबिकानगर में से एक भावांतर प्रकट हुआ जैसे कि ऐसा होता है ना कि व वो स्वाति नक्षत्र में वो छिप के भीतर में वो एक पानी गिरता है वो एक रेती का एक कण गिरता है फिर वह छिप बंद हो जाता है फिर उसमें से मोती बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है तो क्या है कि कभी-कभी हम लोग राह देख कर के बैठे होते हैं कि कोई आकर के हमको मार्गदर्शन दे हमारे जो थोड़े से अंतराय है या तो फिर जीवन को एक नई दिशा देने की बात है वोह एक कोई कोई हमको स्पर्श करके कोई हमको हाथ पकड़ कर के एक नए रास्ते पर चला दे तो पूर्व जन्म के जो सुसंस्कार हो होते हैं जिनके भीतर में वे लोगों को ऐसा होता है कि सदगुरु प्राप्त होने से ही व जैसे कि वह ब ये होता है ना डैम डैम खुलने से ही पानी का प्रवाह कैसा वो बहने लगता है वैसे ही व भीतर में से आध्यात्मिक प्रवाह वो तैयार होकर के बैठा है कि जैसे ही सदगुरु की सदगुरु का आश्रय मिले सदगुरु का आशीर्वाद मिले वैसे ही यह प्रवाह बहना शुरू हो जाए तो अभी यहां पर बड़े ही संकोच के साथ में पैर दबा रहे हैं वगैरह कर रहे हैं अभी राजा महाराज ने स्पर्श क्या कर दिया भीतर में से पता नहीं एक ऐसा भावांतर प्रकट हुआ और भावांतर होने से लोगों का अलग-अलग मतलब एक रिएक्शन देखने को मिलता है हमको पता है कि पहली जनवरी को ठाकुर ने जब अपने भक्तों को स्पर्श करके तो मादर चैतन्य होक तुम लोगों को चैतन्य प्राप्त हो ऐसा करते करते स्पर्श करना जब शुरू किया था तब हमको पता है कि कैसे लोग कोई कोई हंसना शुरू कर दिए थे कोई नाचना शुरू कर दिए थे कोई रोना शुरू कर दिए थे कोई कीर्तन करना शुरू कर दिए थे किसी ने ठाकुर के ही पैरों में लेट कर के ठाकुर की स्तुति प्रारंभ कर दी थी तो भाव होने से एकदम एक जड़ वत पिशाच वत बालक वत इस तरह की परमहंस अवस्थाएं उपस्थित होती है तो यहां पर महाराज को जैसे स्पर्श किया अंबिकानगर अंतर हुआ राजा महाराज के पैरों के ऊपर में ही सर रख कर के सो गए बो आश्चर्य होगा सुन कर के अभी पता नहीं कितनी देर तक सोते रहे फिर एकदम उनको होश आया तो फट कर के चमक करके खड़े हो गए और अभी एक क्या है एक शर्मिंदगी भी एक प्रकट होती है एक एंबेरेसमेंट भी होता है कि अरे कहां मैं महाराज की सेवा करने के लिए आया था उन्हीं के पैरों पर सर रख कर के सो गया और राजा महाराज भी हंसते हंसते कहते हैं कि अरे तुम तो मेरे पैर दबाने के लिए आए थे मेरे पैर को बना कर के तुम सो गए क्या बात हुई ऐसी मैंने राजा महाराज को सब पता है किंतु फिर भी इस तरह से पूछ रहा है तो अंबिका नंद जी वो कहते हैं कि महाराज आपने मेरे साथ में यह क्या कर दिया मुझे समझ नहीं आ रहा कि मेरे भीतर में क्या हो रहा है ऐसा बोल कर के उन्होंने हंसना शुरू कर दिया जैसे कि भीतर में इतना आनंद हंसी वो उसमें से प्रकट हो रही है कि वह संभाल नहीं पा रहे जोर-जोर से हंस रहा है अ भी उनके पैरों पर सो गए अभी हंस रहे हैं जैसे ये आध्यात्मिक भाव का प्रगट प्रगट होता है तब यह सब होता है और पहले तो राजा महाराज को ही दोष देना शुरू कर दिया कि महाराज आपने मेरे साथ में ऐसा तो क्या किया कि मेरे साथ में यह भावांतर हो रहा है किंतु जो भी है उस दिन के बाद से राजा महाराज के साथ में जो दूरी थी उनकी वह समाप्त हो गई और अभी क्या करते थे वृंदावन आश्रम में अपने मठ में राजा महाराज और सेवाश्रम में रयान जी महाराज दोनों थे अंबिकानगर आनंद जी महाराज कहते हैं कि भाई मैं भी तो यही चाहता था कि यह लड़का तुम्हारे आश्रय में आए तुम्हारा आशीर्वाद प्राप्त करके इसका आध्यात्मिक जीवन गठन हो तो यह है अंबिका नंद जी का बैकग्राउंड अभी यह लोग वृंदावन में थे और बाबूराम महाराज ने बेलूरमठ से मैसेज भेजा महाराज को राजा महाराज को कि भाई अभी बेलूर मठ में आओ कितने दिन मठ से बाहर रहोगे तो यह मैसेज प्राप्त करके राजा महाराज बेलूर मठ जाने के लिए रवाना हुए किंतु रास्ते में सोचा कि इलाहाबाद में तो विज्ञान महाराज वहीं पर रहते हैं विज्ञानानंद जी महाराज तो चलो गुरु भाई को मिलकर के जाया जाए इलाहाबाद आए विज्ञाना जी के साथ में मुलाकात हुआ दोनों का दोनों भाइयों का हसी खुशी पुराने दिनों की बात उसी समय बाद में राजा महाराज ने कहा कि विंध्याचल दर्शन के लिए चलते हैं विंध वासिनी देवी को उनका उनका आशीर्वाद ले लेते हैं तो फिर वहां से मैसेज भेजा गया एक भक्त को कि क्या कहीं रहने की व्यवस्था हो सकती है कि नहीं विंध्याचल में तो भक्त ने सामने इमीडिएट मैसेज कर दिया कि हां हां आप मेरे ही घर में रुक आपको और कहीं रहने की क्या जरूरत तो ठीक है वो विंध्याचल आए साथ में अंबिकानगर में रात को रुके उस दिन रुके अभी ऐसा था कि राजा महाराज तो तपस्या करते थे उस समय तपस्या का समय था उनका तपस्या का काल अभी भी चल रहा था तो दिन में सिर्फ एक बार दूध और भात खाते थे तो सब लोग खाने को बैठे हैं वोह भक्त के घर में राजा महाराज के लिए अलग से दूध और भात दिन में एक बार व्यवस्था कर दिया गया था अभी रात को सब लोग सोए हैं आधी रात का समय होगा अंबिकानगर सोए थे तो एकाएक देखा कि राजा महाराज ने आकर के उनको नींद में से जगा दिया तो महाराज ने जैसे ही वह नींद से जगे देखा कि राजा महाराज वस्त्र पहने हुए हैं और बड़ा एक मोटा सा कंबल अपने शरीर पर लगाए हुए हैं शीतकाल का समय था और हाथ में एक लाठी है और एक लैंटर्न है राजा महाराज ने कहा कि चलो तैयार हो जाओ हम हम लोग चलते हैं तो इमीडिएट बिना किसी द्विधा के बिना किसी प्रश्न के अंबिकानगर हो गए वस्त्र पहन लिए और वे दोनों निकल पड़े अमावस्या की रात थी और अंधेरा इतना घना होता है पता है अमावस्या और आजकल की तरह नहीं चारों ओर स्ट्रीट लाइट माने ये जो लाइट पोल्यूशन है आजकल का मने एक समय था कि हम लोग जब आकाश में देखते थे तो पूरा आकाश सितारों से भरा हुआ इतना सुंदर दिखता था हमारा मन भी जैसे कि वोह एक जगत की एक पूरी प्रवृत्ति है उससे वोह सिकुड़ करके उसमें से वह यह होकर के रिटायर होकर के वो जैसे कि आकाश में तारों के साथ में उड़ता है ऐसा एक होता था मैं कन्याकुमारी में कुछ दिन रुका था तो रात को मैं क्या करता था समुंदर के किनारे सुंदर एक जगह है एक बेंच जैसा है तो मैं वहां पर जाकर के रात को रात को लेटा रहता था वो समुंदर इतना सुंदर समुंदर और और वहीं से तो स्वामी जी की वो जो मूर्ति है वो रॉक मेमोरियल उसका भी दर्शन होता था तो मूर्ति का दर्शन नहीं रोक मेमोरियल का दर्शन तो वहां पर मैं लेटा रहता था और रात को मैं आकाश में देखता था इतने तारे इतने तारे कि हम लोग शहर में रहने वाले लोगों ने कभी अनुमान भी नहीं किया होगा कि आकाश रात्रि का आकाश इतना सुंदर दिखता है तो एक दिन ऐसा हुआ कि रात को मैंने देखा कुछ कुछ तारे ऐसे एक लाइन में चल रहे हैं एक तारा एक तारा ऐसा चल रहा है तो मैंने सोचना शुरू किया कि यह क्या हो सकता है एरोप्लेन नहीं हो सकता एरोप्लेन तो बड़ा फास्ट चलेगा यह तारा तो बड़ा धीरे-धीरे चल रहा है यह कोई मेटराइड भी नहीं हो सकती मेटराइड तो फट करके वो एक चली जाती है उसकी एक ट्रेल बनती है तो यह भी नहीं हो सकता है बड़ा धीरे-धीरे चलता है स्थिर भी नहीं है ग्रह भी नहीं हो सकता तो ये क्या है दूसरे दिन मैंने किसी को पूछा मैंने कहा कि अरे मैंने रात में एक तारा देखा वो चल रहा है व ऐसा तारा कहां से आएगा ये तो मेरे नॉलेज में कभी आया नहीं है तो उन्होंने कहा अरे तो आकाश इतना क्लीन है कि रात को सेटेलाइट दिखते हैं मैंने कहा अरे बाप रे अपनी नजरों से आप सेटेलाइट देख सकते हैं इतना स्वच्छ आकाश है और अभी रिसेंटली मैं पढ़ रहा था देखिए कि ये मानव सभ्यता धीरे-धीरे करके हमारी ये आध्यात्मिक जीवन के ऊपर में जो एंक्रोचमेंट हो रहा है शहरों में तो चारों ओर लाइट लाइट यह लाइट पोल्यूशन का एक बहुत बड़ा कांसेप्ट आजकल चला है जैसे नोइज पोल्यूशन है जैसे एयर पोल्यूशन है आए दिन दिल्ली की बात हम सुनते हैं कि दिल्ली का हवा इतना खराब है कि लोगों के लंग कैंसर होने की पूरी संभावना है तो इस तरह से हम लोग बार-बार सुनते हैं तो एक एयर पोल्यूशन है एक नोइज पोल्यूशन है वैसे ही एक लाइट पोल्यूशन है जो कि अब मनुष्य की एक आध्यात्मिक जीवन होता है ना हम लोग इसको धर्म नहीं कहते कभी-कभी हम इसको अध्यात्मा भी नहीं कहते हम लोग कहते हैं इसको कि एक अंतर्मुखी जीवन जबकि हम जीवन की सभी समस्याओं से दूर होकर के एक अन्य राज्य में विचरण करें तो दिन भर तो भाई संसार की समस्या लेकर के रह रहे हैं रात को तो थोड़ा सा सुकून दो रात को कहीं इस तरह से जाकर के बैठे कि पूरा आकाश तारों से भरा हुआ है और हमारा मन भी ज की समस्याओं से दूर होकर के धीरे-धीरे करके अंतर्मुखी पेशन यह कोई इतनी कठिन चीजें नहीं है आप प्रकृति के रमणीय प्रकृतिक प्राकृतिक परिवेश में जाकर के बैठेंगे ऑटोमेटिक देखेंगे कि आपका मन एकाग्र होने लगा है ऑटोमेटिक देखेंगे कि भीतर में से जैसे कि अनाहत नाद ऑटोमेटिक उत्पन्न हो रहा है ऑटोमेटिक लगेगा कि मेरा मन यह जगत को छोड़ करके एक दूसरे जगत में जाने की शुरुआत कर दी है तो अध्यात्मा इतना सहज है हम लोग आज इतना मतलब वो क्या स क्या-क्या नहीं करते हैं धर्म अध्यात्म ध्यान मेडिटेशन मन की शांति स्ट्रेस रिलीफ यह सब करने के लिए किंतु यदि कोई भी प्राकृतिक सुंदर परिवेश में जाकर के आप बैठे तो आप ऑटोमेटिक देखेंगे कि आपका मन यह सब विषयों की ओर उच्च विषयों की ओर धावित होना शुरू हो जाएगा यह जो क्रिएटिविटी है व जो एक फिलोसोफर है कैंट बहुत बड़ा उसका नाम है जर्मन फिलोसोफर है तो वह क्या करता था कि वह दोपहर को वॉकिंग के लिए जाता था और एक सुंदर रमणीय जगह थी वृक्ष थे पेड़-पौधे थे तो वहां पर प्रतिदिन वह एक रूट एक रास्ता पकड़ कर के वह चल चलने के लिए जाता था तो ये जो आफ्टरनून इवनिंग वॉक थी तो उस मैंने उसको वह कहता था कि यह प्रकृति में इस तरह से विचरण करने से उसकी क्रिएटिविटी है उसको और भी ज्यादा बढ़ावा मिलता और भी हायर थॉट्स उसके मन में आना शुरू हो जाते थे तो वह जो रास्ता है जहां से वह गुजरता था उसको फिलोसोफर वॉक या तो फिर फिलोसोफर पाथ इस तरह से लोग पहचानने लगे थे तो यह प्राकृतिक सौंदर्य में वॉकिंग करने के लिए जाना मैं अभी रिसेंटली कुछ स्टडीज पढ़ रहा था कि यदि आप कि किसी भी प्राकृतिक जगह पर जाएंगे प्रतिदिन इस तरह से वॉकिंग के लिए जाएंगे देखेंगे कि ऑटोमेटिक आपका स्ट्रेस रिडक्शन होता है ऑटोमेटिक कोलेस्ट्रॉल बी बीपी वगैरह रिडक्शन वहीं पर होना शुरू हो जाता है प्रकृति का ये एक प्रभाव है और आजकल क्या है कि चारों ओर हम लोग ये प्राकृतिक दृश्य प्राकृतिक सौंदर्य पे हमारी मॉडर्न टेक्नोलॉजी सब जगह पे एंक्रोचमेंट कर रही है रात को भी आपको सकून नहीं है चारों ओर बड़ी-बड़ी लाइट है फ्लैश लाइट यह फ्लड लाइट है ना कि वह जो सोडियम लाइट्स और फिर कहीं पर वह बड़े-बड़े आवाज में यह म्यूजिक शुरू हो जाएगा यह डीजे ये क्या है आपकी इंद्रियों पर जो आक्रमण दिन भर तो चलता ही है आप काम करते हैं परिवार का रिस्पांसिबिलिटी है वह तो रहता ही है रात को कहीं ना कि आप थोड़ा सा सुकून से बैठे संसार से थोड़ा सा अपने को विराम दे वो नहीं यही संसार आकर के आपकी ये जो पर्सनल स्पेस है उसके ऊपर में वो आक्रमण करता है और ऑफकोर्स मोबाइल तो है ही है आजकल तो वोह वाईफाई फ्री जोन वो रिट्रीट वहां पर वाईफाई नहीं होता है वहां पर जा पैसा देक के जाते हैं लोग वाईफाई वाईफाई का कनेक्शन लेने के पैसा देते हैं अभी उल्टा भी होता है वाईफाई का कनेक्शन ना आए उसके लिए वाईफाई फ्री रिट्रीट में लोग जाते हैं पैसा देकर के तो ये अपनी इंद्रियों पर आक्रमण तो अभी जैसे देखिए कन्याकुमारी में मुझे एक ऐसा एक्सपीरियंस होता था मैं प्रति दिन रात को वहां पर वह समुंद्र के किनारे सोता रहता था तो आकाश में एक सेटेलाइट भी जाता था तो व नजर से आता था किंतु पता है यह जो आधुनिक संस्कृति एक जो आक्रमण है टेक्नोलॉजी का वो अभी आकाश में भी चला गया है ये स्टारलिंग के लगभग 5000 सेटेलाइट अभी आकाश में है तो अभी जितने भी एस्ट्रोनोवा कंप्लेन करना शुरू कर दिए हैं कि सेटेलाइट का जो रिफ्लेक्शन है उससे वो जो एस्ट्रोनॉमिकली ऑब्जर्वेशन है उसमें बड़ा ही इंटरफेरेंस होता है प्लस यह 5000 सेटेलाइट मिलकर के सिग्नल भेजते रहेंगे तो जिसको कहते हैं रेडियो एस्ट्रोनॉमी तो रेडियो एस्ट्रोनॉमी में भी इस तरह से डिस्टरबेंस आता है और विजुअल एस्ट्रोनॉमी जो है टेलिस्कोप की मदद से विश्व विश्व ब्रह्मांड का निरीक्षण करना उसमें भी इंटरफेरेंस होता है तो यह दोनों तरह के इंटरफेरेंस हमको ये आधुनिक टेक्नोलॉजी कर रही है पृथ्वी पर तो नहीं छोड़ रहे अवकाश में भी नहीं नहीं छोड़ रहे दोनों ओर से ये अटैक हो रहा है तो जो भी है यह तो हमारी समस्या है उस समय की जो बात थी ये राजा महाराज और अंबिकानगर हैं विंध्यवासिनी देवी के दर्शन के लिए रास्ता एकदम शांत शमशान रास्ता है अमावस्या की रात है और रात में चलते-चलते महाराज को अंबिकानगर वगैरह लगी होगी तो राजा महाराज ने क्या कहा ये लैंटर्न तुम अपने हाथ में रखो मैं तुम्हारा हाथ पकड़ लेता हूं तो इस तरह से ये दोनों जाने लगे महाराज अंबिका नंद जी महाराज के हाथ में लैंटर्न है और राजा महाराज उनका हाथ यहां कंधों से पकड़े हैं हाथ में लाठी है राजा महाराज के तो इस तरह से जा रहे हैं मंदिर में प्रवेश करके देखा मध्यरात्रि है फिर भी बहुत सारे दर्शनार्थी पहले से ही वहां पर उपस्थित है कोई जब ध्यान कर रहा है तो कोई नाम कीर्तन कर रहा है देखिए यह अपने मतलब आधी रात को भी इस तरह से भक्तों का वहां पर उपस्थित होना यह हमारी संस्कृति का परिचायक है ऐसा मतलब आजकल तो भीड़ सब जगह पर दिखती है किंतु उस समय ऐसा होता था कि तीर्थ स्थान जो होते थे वोह जानबूझ कर के थोड़ी सी कठिनाई वाली जगह पर बनते थे जिससे कि क्या होगा कि जिनका र सही सही डेडिकेशन है वही लोग वहां पर जाएंगे कैलाश मानसरोवर अमरनाथ यह सब यात्राएं क्यों है यह सब तीर्थ इतने दुर्गम स्थान पे क्यों है जो कि सही सही जिसका डेडिकेशन है वही वही वहां पे जाएगा और वह वहां पर एक एक शमशान परिवेश पाएगा जिससे कि उसका मन ऑटोमेटिक अंतर्मुखी तरह से आपका रोपवे है ना हेलीकॉप्टर है ना कि जो भी मब भीड़ हर जगह पर लगी रहती है और पता नहीं लोग दर्शन के लिए भी जाते हैं ना कि सिर्फ वो एक ट्रिप के लिए जाते हैं वो हॉलीडे ट्रिपस जो होता है तो जो भी है आजकल की तो पूरी बात ही अलग है जितने भी दुर्गम तीर्थ स्थान है सब जगह पर देख देखेंगे कि अभी भीड़भाड़ लगी हुई है किंतु उस समय था कि तीर्थ का अर्थ ही था कि दुर्गम स्थान पर हो जिससे कि जिनका सही सही डेडिकेशन हो वही वहां पर जाए तो यह लोग जब विंध्यवासिनी देवी के मंदिर में प्रवेश किए देखा कि ऑलरेडी भक्त लोग वहां पर विराजित है और कोई कीर्तन नाम कीर्तन जब ध्यान सब चल रहा है मां के मंदिर का दरवाजा बंद था और उस समय कोई उत्सव था तो मां का श्रृंगार चल रहा था श्रृंगार समाप्त हुआ और दरवाजा खुला तो पुजारी लोगों ने देखा कि वहां पर अभी देखिए कि जब कोई महापुरुष उपस्थित होता है ना तो उसको अनाउंस करने की जरूरत नहीं है कि हां भाई ये महाराज जी आए हैं तो उनके लिए पहले दर्शन की व्यवस्था करो लाइन में पहले उनको प्रवेश करवा दो कुछ नहीं राजा महाराज भी चुपचाप एकदम शांत हो कर के बैठे हैं किंतु उनके मुख मंडल पर जो आध्यात्मिक प्रभा उनका जो उज्जवल उनका उनकी हासी उनके मन की मुख की प्रसन्नता प्रसन्न वदन और यह जो आध्यात्मिक ओरा उनके चारों ओर वह देख कर के पुजारी जो है एकदम प्रभावित हो गए उन्होंने क्या किया बाकी सब दर्शनार्थियों को कहा कि अभी आप रुक जाइए यह महापुरुष स्वयं उपस्थित है पहले उनको दर्शन कर देने दीजिए तो राजा महाराज मंदिर में प्रवेश किए और मां को दर्शन किया उसके बाद का जो वर्णन है मैं थोड़ा सा पढ़ता हूं देखिए अंबिका नंद जी महाराज यह वर्णन लिख महाराज देवी मूर्ति सामने गए बिस्मोई भोरे बोलले आहा की सुंदर की सुंदर राजा महाराज देवी मूर्ति के सामने जाकर के बड़े ही विस्मय पूर्वक विस्मय पूर्वक बोले आहा क्या सुंदरता क्या सौंदर्य क्या सौंदर्य पर मुहूर्ते तिनी भाबा बिष्ट होलेन दूसरे ही मुहूर्त में दूसरे ही क्षण में वोह भाव में वो समाधि की ओर उनका मन उच्च गति की ओर जाना शुरू कर दिया मंदिरे तो खन अद्भुत नीरवता विराज कोर छलो मंदिर में उस समय एक अद्भुत नीरवता फेल रही थी क्योंकि सभी लोग देख रहे हैं दर्शनार्थी भी पुजारी भी कि मां का संतान स्वयं मां की चरणों की व आश रखे हुए मां के चरणों में आशीर्वाद पाने के लिए वहां पर खड़ा है तो ऐसे महापुरुष का दर्शन करके तीर्थ का महात्म ही यही है कि आप ईश्वर का तीर्थ राज जो है तीर्थ राज उनका तो दर्शन करते ही है किंतु सही सही सुपुत्र जो होते हैं वोह तीर्थ राज के वो भगवान के सही सही संतान जो होते हैं उनके भी दर्शन आपको वहां पर मिल जाते हैं बड़े ही दुर्लभ होते हैं विजय कृष्ण गोस्वामी वो चारों ओर पूरा घूम कर के आया हिमालय और वे ईस्ट बंगोल वो हर जगह घूम कर के फिर आखिर में दक्षिणेश्वर में आकर के ठाकुर को क्या कहता है कि महाशय मैं तो सोच रहा था कि दक्षिणेश्वर के पास में ही यदि इतनी विराट आध्यात्मिक सत्ता विराज कर रही है तो पहाड़ों में जंगलों में वन में जाऊंगा तो और भी कितने बड़े-बड़े आध्यात्मिक महापुरुष मुझे दिखाई देंगे किंतु देखा कि यहां पर जो सत्ता विराजमान है वो अद्वितीय है और इस तरह की सत्ता आध्यात्मिक प्रकाश और इस जगत में नहीं है तो ईश्वर का भी दर्शन और ईश्वर के जो सुपुत्र होते हैं साधु संत उनके भी दर्शन हमको वो तीर्थ में जाने से मिल जाते हैं तो दक्षिणेश्वर तो तीर्थ ही था मां का वहां पर निवास था मां की नित्य सेवा थी तो राजा महाराज को भावा विष्कर्त फैल गई सब लोग आंख मुह बंद करके बड़े ही श्रद्धा भक्ति पूर्वक मां का भी दर्शन कर रहे हैं राजा महाराज का भी कर रहे हैं पुजारी और भक्ते रा विस्मय महाराज सेही भगवत भावे भाव बबल अवस्था देख चलन पूजारी और भक्त बड़े ही विस्मय पूर्वक महाराज की वह भगवत भाव में विह्वल अवस्था का दर्शन कर रहे हैं किछु खण परे महाराज भावा बस थाई थे के आमा के एकटी मायर गान गायते बोलले थोड़ी देर के बाद में भावा वस्था में ही राजा महाराज ने मुझे कहा कि तुम एक गान गाओ अभी अंबिकानगर गायक थे और महाराज का गान सुनकर के राजा महाराज को बार-बार समाधि होती थी महाराज अंबिकानगर महाराज ने कहा कि गाओ तुम एक गान गाओ और महाराज गान गा रहे हैं और राजा महाराज समाधि स्त भावा विष्ठा महाराज ने भावा वस्था में ही अंबिका नंद जी को गान गाने के लिए कहा और यहां पर अंबिका नंद जी गान गा रहे हैं देखिए जब कभी-कभी हमको ऐसा लगता है कि यह गान गाना एक कला है और बड़ी ही मेहनत करके हम लोग प्राप्त करते हैं किंतु वो तो एक है ही है किंतु गान का जो सौंदर्य है ना वो कब प्रकट होता है पता है जबकि आपके सामने वो जिनका गान गा रहे हैं वो स्वयं उपस्थित हो मां के बारे में एक बहुत ही सुंदर कहानी है एक तारा सुंदरी देवी बोलकर के अभिनेत्री थी मां के पास में कभी-कभी आया करती थी तो जब मां के पास में जाती थी उस बड़ा ही संकोच पूर्वक पता है कि मेरा चरित्र जो है इस मैं मां के पास जाऊंगी मां को प्रणाम करूंगी स्पर्श करूंगी वो तो उचित नहीं है तो मां जिस कमरे में रहती थी तो कमरे के बाहर में वह जो चौखट होती है वहां पर बैठ कर के मां को प्रणाम निवेदन करती थी और जो भी वो लाई है वो मिठाई फलफूल वगैरह वो निवेदन करती थी मां खुद ग्रहण नहीं करेगी लोगों को बांट देंगी तो इस तरह से तारा सुंदरी एक बार मां के पास में गई तो मां ने कहा कोई एक गान सुनाओ तो तो तो अभी उस अभिनेत्री ने गान गाने की शुरुआत की और जिस महाराज जी ने ये स्मृति कथा लिखी है वो आपको पता होगा उद्बोधन में किस तरह से है कि पहली मंजिल प मां रहती थी फर्स्ट फ्लोर पे और ग्राउंड फ्लोर प सब शरत महाराज सब साधु सन्यासी है वे लोग रहते थे और वो अपना काम करते रहते थे वो पूरा एक मने बाजार जैसा ही था भक्त लोग आएंगे उनके लिए प्रणामी वो खाने पने की व्यवस्था वगैरह सब कुछ होता एकाउंट होता था पूरे जगत का रामकृष्ण मिशन का जो कार्य है वो वहां से राजा महाराज शरत महाराज संपादित करते थे क्योंकि शरत महाराज थे रामकृष्ण मिशन के जनरल सेक्रेटरी उस समय जनरल सेक्रेटरी नाम नहीं था सिर्फ सेक्रेटरी नाम था किंतु पोस्ट था जनरल सेक्रेटरी का तो राजा शरत महाराज के सामने पूरा दुनिया भर का हिसाब किताब कंप्लेन ये वो पत्र पत्र व्यवहार सब पड़ा है साथ-साथ में लीला प्रसंग भी लिख रहे हैं कितने लोग आ रहे हैं जा रहे हैं साधु ब्रह्मचारी किताबें बिकती है तो वो सब मने पूरा एक बाजार जैसा ही था वहां पे तो ग्राउंड फ्लोर पे सब लोग काम कर रहे हैं अभी जो महाराज ने स्मृति कथा लिखी है वह लिखते हैं कि एकाएक हमने ये इतना सुमधुर गान की आवाज सुनी कि चारों ओर धीरे-धीरे करके एक शांति एक नीरवता का फैलना शुरू हुआ यहां तक कि शरद महाराज भी वो शरद महाराज का एक फोटो देखा होगा वो डेस्क वो जमीन पर बैठे हुए पलाठी लगा कर के और वो डेस्क जो डेस्क ऊपर में लिखते हैं तो शरत महाराज का वहां पे था वो डेस्क अभी भी शरत महाराज के कमरे में है उद्बोधन में जाएंगे तो देखेंगे तो अपने डेस्क प बैठे-बैठे शरत महाराज कुछ लिख रहे थे कुछ काम कर रहे थे वो उन्होंने एकदम वो भी स्थिर हो गए और एक चित्त से एक मन से वो गान सुन रहे हैं वो अभिनेत्री गान गा रही है और नीचे ऊपर में तो जो होता होगा मां के साथ में नीचे में जैसे कि सभी लोग अपना काम में जो जो करते स्थिर हो गए और बड़े ही एकाग्रता पूर्वक एक न सुनने लगे एक अभिनेत्री गान गा रही है और यह मतलब यह प्रभाव उसका और धीरे-धीरे करके जब गान का उपशम हुआ तो फिर जैसे कि लोगों ने अपनी सांस रोक दी हो तो ऐसे वो गहरी सांस छोड़ कर के लोग फिर से अपने अपने काम में लग गए तो देखिए कि बात यह नहीं है कि अभी वोह अभिनेत्री तो थिएटर में कितना ही गान गाती होगी कितना ही होता होगा तो किंतु यहां पर सिर्फ उसके गान गाने की कला ही नहीं यहां पे मां की उपस्थिति स्वयं है तो मां को वो जो गान निवेदित कर रही है उसका एक प्रभाव होता है इस तरह से मां के साथ में बहुत प्रसंग है जयराम बाटे ना की क्वाल पाड़ा वहां की एक बात है वहां पर जयराम बाटी की ही बात है वहां पर हमको पता है कि वह पूजा हर हर साल वह होती है जयराम बाटी में हर साल जगत धात्री पूजा होती है स्पेशल पूजा होती है जग त्र पूजा का इतिहास भी हमको पता है तो एक बार वहां पर इस तरह से गान का आसर बैठा था और एक भक्त मां के गान गा रहे हैं और मां क्या कर रही है वो मां वहां पर अपने कमरे में बैठ कर के सब बाकी स्त्री भक्तों के साथ में गान सुन रही है और यहां पर बाहर में सब लड़के लोग इकट्ठा होकर के सब साधु सन्यासी और वह जो गायक है गायक गृहस्थ है व गान गा रहे है और गान इस तरह से जम गया है और गायक जो है इतना भाव में मग्न हो गया है कि पता ही नहीं जैसे कि कितना समय बीत गया हो क्या लोग इतने भाव में मग्न हो गए हो और मां इतना एक शांति से एक एकाग्रता पूर्वक गान सुन रही है वो बहुत ही सुंदर वर्णन है वहां का तो जो लोग ईश्वर के सामने इस तरह से गान गाते हैं तो उनका ईश्वर की उपस्थिति से ही गान का प्रभाव हो जाता है तो यहां पर भी अंबिकानगर गायक थे किंतु वह राजा महाराज के भी सेवक थे राजा महाराज के साथ में बहुत जगह पर उन्होंने भ्रमण किया है और हर जगह पर राजा महाराज जब आदेश देंगे तो गान गाएंगे मां के गुण कीर्तन करेंगे तो उनकी गाने का प्रभाव भी वो बहुत सु गायक थे बहुत ही अच्छे गायक थे और राजा महाराज की उपस्थिति तो इन दोनों को मिलाकर के जो परिवेश प्रकट होता था उसकी हम कल्पना ही कर सकते हैं तो किछु खण परे महाराज भावा बस्था थे केमा के एकटी मायर गान गाते बोलले महाराज ने भावा अवस्था में ही मुझे एक गान गाने को कहा आमी गान कोबार समय तार दुई चोखेर कोण दिए आनंद अश्रू पढ़ते लागलो महाराज जी जब गान गा रहे हैं राजा महाराज की दोनों आंखों से आनंद के अश्रू निकल रहे हैं श एक अपूर्व स्वर्गीय दृश्य वह एक अपूर्व स्वर्गीय दृश्य आमा के उनी आरो एकटा गान गायते आदेश कर लेन एक गान समाप्त होने के बाद में राजा महाराज ने उनको एक दूसरा गान गाने को कहा गानेर शेषे आमरा देवी प्रतिमा के साष्टांग प्रणाम कोरे बायरे लाम गान समाप्त होने के बाद में देवी प्रतिमा का साष्टांग प्रणाम करके बाहर में आए महाराज मंदिर त्व एक कोण जप करार जन्नो बोसले और मा क बसते बोलले महाराज मंदिर के एक कोने में वो जो जगह थी बाहर की वहां एक कोने में बैठे जप करने लगे और मुझे भी बोला कि तुम भी बैठ कर के जप करो तो यह विंध वासिनी का दर्शन और भी कुछ कुछ दर्शन की कहानियां है वह हम एक के बाद एक लेंगे ये देखिए कि हम लोग जो मंदिर में दर्शन करने के लिए जाते हैं तो आधा समय तो क्या पता नहीं अपने मन में क्या चलता रहता है है ना वो मतलब मतलब 10 तरह की चिंता है यहां पर अच्छे से दर्शन होगा कि नहीं धक्का वो भीड़ में जाकर के हम लोग दर्शन करते हैं मैं खुद का एक अनुभव बताता हूं कि दक्षिणेश्वर गए थे हम लोग बिल्कुल पहली पहली बार मैं एक दो बार ही उस समय गया था टीसी से गए थे मोस्ट प्रोबेबली हम लोग ट्रेनिंग सेंटर में थे वहां से तो 30 40 ब्रह्मचारी होते हैं तो बैलून मट से गए हैं तो क्या है कि वो हमको तो सीधा मां के गर्भ रूप में जाने का हमको वो परमिशन रहता है हमको अनुमति रहती है तो सभी ब्रह्मचारी वहां पर लाइन लगा कर के खड़े हैं मां के गर्भगृह में जाने के लिए बाकी बाहर में तो बहुत भीड़ है किंतु लोग बाकी सब लोग बाहर से प्रणाम करते हैं हम लोग गर्भ गुरु के जो साइड वाला दरवाजा है वहां पर लाइन लगा कर के खड़े हैं और वहां पर हमारे आचार्य महाराज गर्भ गुरु के भीतर में खड़े एक के बाद एक सबको बोल रहे चलो चलो आओ एक के बाद एक आओ प्रणाम करो मां को साष्टांग प्रणाम करो मां को सामने एक मुश्किल से 30 40 सेकंड खड़ा रहो और फिर दूसरे दरवाजे से निकल जाओ तो उस दिन जो मैं पहली बार मैं दक्षिणेश्वर में मां काली के गर्भ गुरु में मैं प्रवेश किया था तो प्रणाम कर रहा हूं तो मुझे ऐसा कोई फील नहीं हुआ कि अरे यह तो वही जगह है जहां पर ठाकुर चामर करते-करते कितनी बार भावा विष्टि दर्शन हुआ है वो मां का खड़ग हाथ में धारण करके कहा था कि मां दर्शन दो वरना तो गला काट दूंगा अपना ये कितनी ही घटनाएं इस पवित्र गर्भगृह में हुई है तो प्रणाम कर रहा हूं तो ऐसा कुछ नहीं क्योंकि क्या है कि वो गए हैं गाड़ी में बैठ कर के तो गप लगाते लगाते पता है ना एक पूरा दूसरा माहौल होता है किंतु उस दिन रात को जब मैं बेलूर मठ में मंदिर में आरती के बाद में बैठा था वो थोड़ा हम लोगों जब ध्यान कंपलसरी करना पड़ता था तो उस समय जब बैठा था तब वो याद करके कि हां मैं गर्भ गुरु में खड़ा हूं तो उस समय मैंने क्या किया कि बाकी सबको निकाल दिया जो भी साधु ब्रह्माचारी साथ में थे उनको भी अपनी मेमोरी में से डिलीट कर दिया बाहर में वो जो सैकड़ों भक्त खड़े थे उनको भी डिलीट कर दिया मैंने इमेजिन किया कि मैं हूं और मां है बस तब जाकर के धीरे-धीरे लगा कि हां वो इतनी पवित्र जगह प इतनी प्रभावित प्रभावशाली जगह पर मैं गया था तो ऐसा बाद में थोड़ा-थोड़ा अनुभूति हुआ था तो देखिए कि हम लोगों के तीर्थ दर्शन के लिए जाना और महापुरुषों का तीर्थ दर्शन करना कितना बड़ा फर्क है तो आज यहीं तक कल फिर से अच्छा कल सैटरडे है आई थिंक कल सैटरडे है ना तो कल और संडे छुट्टी मंडे को फिर से मिलते हैं ओम श हरि ओम तसत श्री राम कृष्णम