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Sri Ramakrishna's Disciples ·

स्वामी ब्रह्मानन्दजी के साथ रामेश्वरम दर्शन 15 Nov 2023

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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः राजा महाराज की कुछ स्मृति कथाएं हम लोग चिंतन मनन कर रहे थे कुछ समय से पिछले कुछ समय से हमने इतना हैवी फिलोसॉफिकल डिस्कशन किया है कि मैंने सोचा और और मैं भी यह उत्सव के समय थोड़ा सा मेरा मन भी ऐसा हो गया था कि मैंने सोचा कि क्लास करना है कि नहीं करना है क्योंकि इतना हेवी रीडिंग मेरे से होगा नहीं बात भी होगी नहीं फिर मैंने सोचा चलो कुछ स्मृति कथाएं ली जाए तो मैं थोड़ा सा चिंतन मनन कर रहा था यह सब स्मृति कथाओं के ऊपर में और एक पार्टिकुलर टॉपिक मैंने देखा कि राजा महाराज का ही कि राजा महाराज मंदिर में दर्शन करने के लिए जाते हैं तीर्थ स्थान का भ्रमण करने के लिए जाते हैं तो किस तरह से वह पूरी घटना वह वो यह होती है पेन आउट होती है ठाकुर के बारे में तो हमको पता है देखिए हमने ठाकुर मां स्वामी जी और राजा महाराज यदि अपने संघ में कहा जाए डायरेक्ट डिसाइल तो सब के सब है ही है किंतु ठाकुर महा स्वामी जी और राजा महाराज इन चारों की आध्यात्मिक महिमा अपने संग में सर्व श्रे श है अभी ठाकुर के तीर्थ स्थानों का वर्णन लीला प्रसंग पुस्तक में बहुत ही सुंदर रूप से वह चित्रित किया गया है अंकित किया गया है शारदानंद जी महाराज ठाकुर के साथ में हृदय था तो हृदय के पास से सुन सुन करके और ठाकुर के खुद के श्री मुख से ठाकुर ने अपने से बहुत सारा वर्णन किया था तो वह सब इंफॉर्मेशन सब कहानियां कंपाइल करके हमको लीला प्रसंग में बहुत ही सुंदर रूप से बताई है स्वामी जी का है स्वामी जी का भी हमने कहीं कहीं पर देखा है वह स्विटजरलैंड गए हैं व एक कारागार में जाकर के जहां पर कैदियों को आइसोलेशन में रखा जाता था अभी यह आइसोलेशन सेल जो होता है वह सबसे क्रूर सजा है क्योंकि किसी भी व्यक्ति को आप समाज से अलग करके आइसोलेशन में रखेंगे तो कुछ ही दिनों में वह बेचारा पागल हो जाएगा क्योंकि मनुष्य का जीवन है उसकी इंद्रियों में तो इंद्रियों का खुराक जद उसको नहीं मिलेगा आंखों से लोगों को देखेगा नहीं कानों से लोगों की बात नहीं सुनेगा मुंह से बात नहीं करेगा तो माथा खराब हो जाएगा उसका अभी ऐसी जगह को देख कर के स्वामी जी कहते हैं कि व्ट ए बेस्ट प्लेस फॉर मेडिटेशन ध्यान करने के लिए कितनी उपर्युक्त जगह है तो हमने इन लोगों के मां के बारे में हमने कहीं-कहीं पर देखा है वो साउथ इंडिया का भ्रमण करने के लिए मां गई थी मदुराई में जाकर के मदुराई के राजा ने मां को कहा कि मां यह मेरा धन भंडार है इसमें से तुमको जो चाहे वो ले लो तो मां ने तो कहा कि मुझे तो ऐसा क्या चाहिए राजा के धन भंडार में से यह रत्न जवाहर सोना मोहोर ये धन वैभव मां मां कहती है मुझे तो इस सब कोई जरूरत नहीं है शशि महाराज ने सोने के बिल्व पत्र बनाए थे उससे माने मदुराई में शिवलिंग की पूजा की थी सॉरी रामेश्वरम की बात है रामेश्वरम में शिवलिंग की पूजा की थी तो अभी रामेश्वरम के राजा यदि ऐसा कहते हैं कि धन भंडार में से कुछ भी ले लो तो मां क्या कहेगी मुझे कुछ चाहिए नहीं किंतु मां के साथ में राधू थी तो मां राधू को कहती है कि अच्छा तुमको यदि कुछ चाहिए तो तुम इसमें से ले लो जो भी चाहिए तो अभी जैसा कि मां ने कहा किंतु साथ में मां का हृदय भी धड़कने लगा कि एक्चुअली लिखा है मा मां खुद बोलती है तो कि राधू यदि इसमें से कुछ मांग लेगी तो वो तो अच्छा नहीं रहेगा वो तो ठीक नहीं रहेगा तो व भी मां बेचारी बड़े टेंशन में आकर के सोच रही कि राधू क्या मांगेगी तो राधू ने कहा कि अरे मुझे तो यह सब चीजों की कोई जरूरत नहीं है मेरी पेंसिल टूट गई है मुझे पेंसिल दे दो तो यह सुन कर के मां का मां को शांतोना मिली मां का मन शांत हुआ फिर वह बाहर जाकर के कहीं पर एक दुकान में से राधू को एक पेंसिल छोड़ लेकर के उसको दे दी तो देखिए कि इन सब की तीर्थ यात्रा तीर्थ भ्रमण की कहानियां हमारे पास है तो वैसे ही राजा महाराज के तीर्थ भ्रमण की कुछ कुछ कहानियां हमारे पास है इसका बहुत ही सुंदर रूप से वर्णन भी किया गया है तो पहली जो कहानी है विशुद्धानंद जी महाराज ने उसको वर्णित की है विशुद्धानंद जी महाराज जब चेन्नई में रहते थे शशि महाराज ने राजा महाराज को चेन्नई बुला आ या मद्रास उस समय का और फिर मद्रास के जितने भी तीर्थ स्थान थे एक के बाद एक उनको दर्शन करने के लिए लेकर गए थे तो वहां पर के जो सबसे इंपॉर्टेंट जो दो तीर्थ स्थान मदुराई और रामेश्वरम इन दोनों के दर्शन के समय विशुद्धानंद जी महाराज जितेन महाराज भी राजा महाराज के साथ थे और जितेंद्र महाराज इतना सुंदर रूप से यह दोनों घटनाओं का वर्णन कर कि हमको पढ़ कर के इसकी बात सुनक के बड़ा ही हमारे मन को आनंद मिलता है हमारे मन में श्रद्धा भक्ति का उद्र होता है यसे जोरा पौराणिक कहानियां है यह पौराणिक कहानियों का महात्म ही यही है आप बहुत यदि फिलोसोफी या तो फिर दर्शन शास्त्र समझ करके यदि आप भगवान को प्राप्त करना चाहे तपस्या साधना ध्यान और शास्त्र चर्चा यह राजमार्ग है ईश्वर प्राप्ति के किंतु सभी लोग तो इस राजमार्ग पर चलने के नहीं चल सकते या तो फिर चलते चलते कभी थक जाते हैं तो फिर उनको कहीं पर विश्राम करने की जरूरत पड़ती है तो यह विश्राम करने की जो जगह है इस राजमार्ग के ऊपर में वह धर्मशाला जिसको धर्म स्थन कहा जाता है वह है यह सब पौराणिक कहानियां तो पौराणिक कहानियों के मंदिर जितने भी अपने पौराणिक म है उनके चारों और यह सब कहानियां बुनी हुई है और जब इस तरह के कोई महापुरुष इस मंदिरों की मंदिरों में दर्शन करने के लिए जाते हैं तो वह कहानियां जैसे कि पुनर्जीवित हो जाती है और इनके साथ में जो लोग होते हैं उनको यह सब दृश्य जैसे रामेश्वरम में भगवान राम मां सीता मदुराई में मां मीनाक्षी तो इनके दर्शन जैसे कि स्वयं उनको हो इस तरह से उनको लगता है तो विशुद्धानंद जी महाराज सर्वप्रथम हमको रामेश्वरम मंदिर के दर्शन की बात करते हैं रामेश्वरम की कहानी तो हमको पता ही है लंका से वापस आने के बाद में भगवान राम ने सोचा कि रावण की हत्या की है रावण तो ब्राह्मण था तो ब्राह्मण की हत्या का पाप से मुक्त जैसे पंच महाभूत फाद ब्रह्म पड़े काधे ठाकुर जैसा कहते थे कि पंच महाभूत का शरीर धारण करने के बाद में भगवान विष्णु को भी कर्म के इस पाश से उनको यह कर्म का जो पाश है वह उनको भी लगता है ब्राह्मण की हत्या की है तो प्रायश्चित के रूप में वो वहां पर शिवलिंग की स्थापना करेंगे अभी शिवलिंग की स्थापना करने के लिए शिवलिंग चाहिए तो भगवान महावीर को बोला गया हिमालय में से एक शिवलिंग लेकर के आओ महावीर भगवान गए वो जैसे कि हवा में उड़ते उड़ते जाते हैं अभी आते-आते उनको देरी हो रही है यह देख कर के मां सीता ने क्या किया रेती का एक शिवलिंग बना कर के वहां पर उसकी स्थापना की तो यह वही शिवलिंग है जो कि मां मा मां जब गई थी मां शारदा रामेश्वरम के दर्शन के समय तो फिर वह दर्शन करके वापस आई उद्बोधन में बैठी है वो केदार बाबू है वरदा महाराज है उन सबके साथ में बात हो रही है मां ने बात बात में ने कह दिया जेमन रेखे छिला तमनी देखला माने जिस तरह से मैंने शिवलिंग को रख के गई थी मैं वैसे ही मैंने उसको वैसे ही देखा अभी केदार बाबू ये पुरुष लोगों का क्या है ना कि बहुत सारी चीजें उनके सर में घूमती रहती है वो ये टेंशन रहता है वो टेंशन रहता है तो उन्होंने सुना नहीं सुना क्या किंतु गोलाप मां वहां पे पास में से पसार हो रही थी तो उन्होंने सुन लिया और फटक करके पकड़ लिया मां क्या बोला तुमने बताओ तो फिर से तो मां ने कहा क्या मैंने क्या मां भी ऐसे बात करते करते ऐसा बह गई है कि उनके इस जन्म के पूर्व जन्म के सभी स्मृतियां जैसे कि एक हो गई अभी सडन जब गोलाप मा ने कहा मां तुमने क्या कहा तो फिर से एकदम संभाल लिया अपने को अरे लोगों के सामने अपना स्वरूप प्रकट अभी तो नहीं करना है स्वरूप प्राकट्य जीवन के अंत समय में ही होता है उससे पहले नहीं होता तो मां ने फटाक करके अपने को संभाल लिया बोला अरे क्या मैंने तो कुछ नहीं कहा तो गुलाब मां ने कहा नहीं मां मैंने सुन लि तुमने कहा कि जिस तरह से तुमने शिवलिंग को रखा था उसी तरह का उसी स्थान में उसी तरह से शिवलिंग तुमने दर्शन करके तुम आई हो ऐसा तुमने कहा मैंने सुन लिया अभी तुम नहीं अपने इस बात से अपनी अभी इसको ये नकार नहीं सकोगी तो इस तरह से देखिए कि वहां पर मां सीता का शिवलिंग है भगवान राम ने फिर जब हनुमान जी शिवलिंग लेकर के आए तो भगवान राम ने उसकी भी स्थापना की दोनों शिवलिंग वहां पर है तो इस रामेश्वरम मंदिर की मंदिर का दर्शन करने के लिए राजा महाराज वगैरह जाते हैं विशुद्धानंद जी महाराज लिखते हैं अभी देखिए महापुरुष लोगों के साथ में मंदिर का दर्शन करने में जिस तरह से आपको पुण्य मिलता है उस तरह से आपको उसकी जो प्रचंड ताप है वह भी सहन करना पड़ता है आपको अपनी निष्ठा सेवक के रूप में गए हैं निष्ठा अपनी इतनी तीव्र रूप से बजाए रखनी पड़ती है कि जद थोड़ा सा भी आपने गड़बड़ कर दी आपकी सेवा में तो फोरन डाट मिलेगी और यह तो राजा महाराज थे तो रामेश्वरम जाते-जाते मंदिर तक पहुंचते पहुंचते तीन बार उन लोगों को ऑलरेडी डांट पड़ चुकी है और विशुद्धानंद जी महाराज तीनों का जीतन महाराज तीनों का एक के बाद एक वर्णन करते हैं कहते हैं कि पहले तो वो ट्रेन में जा रहे थे थोड़ा सा ठंड पड़ रहा था शीत का समय था तो राजा महाराज ने कहा कि उन को वो पहनने के लिए वो टोपी वगैरह वो गर्म वुलन केप होती है तो वह चाहिए तो अभी मांगा तो पता चला कि जिस केप को अभी जो चीज आपको जो लोग जर्नी करते हैं यात्रा करते हैं उनको पता रहता है कि जो चीज आपको चाहिए समय-समय पे उसको आप पास में ही रखें और जो चीज आपको यात्रा स्थान पर पहुंचने के बाद में चाहिए उसको आप पैक वगैरह कर दे अच्छे से को बड़े से बॉक्स में बड़े से बैग में और उसको साइड पर रख दे डंट मैटर हमेशा हम लोग दो तरह की बैग रखते हैं एक तरह की बैग है जिसको कि हम हैंड बैग जैसा कहते हैं जैसे प्लेन में होता है आपका लगेज जो है वह प्लेन में वो वहां लगेज एरिया में जाएगा किंतु आपको वो लोग एक हैंडबैग रखने की अनुमति देते हैं फ्लाइट में यदि कुछ चीजों की जरूरत पड़ी दवाई है ना कि कोई भी चीज है कपड़े है इस तरह के यदि शीत का समय है तो गर्म वस्त्र वगैरह है वह आप अपने साथ में हैंडबैग में रखते हैं फ्लाइट में जिससे कि जब भी जरूरत पड़े तो ऊपर में वह रहता है निकाल करके बैग उसमें से आप ले ले तो कोई भी यदि पैकिंग करेगा तो इस तरह से सोचेगा कि यात्रा के दौरान जो चीज जरूरत पड़ने वाली है उसको पास में रखें और जो चीज हमको यात्रा स्थान प जाकर के चाहिए उसको लॉक करके बड़े से बॉक्स में साइड प रखते अभी यात्रा जा रहे हैं ट्रेन में शीत का समय है राजा महाराज को थोड़ी सी ठंड लग रही है उन्होंने कहा कि वो जो गर्म टोपी है वो लाओ तो थोड़ा सा अभी पता चला सेवक महाराज ने गरम टोपी गरम वस्त्र वो बड़ी बैग में रख दिया है और उसको चाबी लगा दी है तो अबे तो यह तो ठीक नहीं हुआ राजा महाराज मांग रहे हैं यहां पे और यहां पे सेवक लोग दौड़ धाम कर रहे हैं बैग निकालो बैग कहीं एक साइड प पड़ा होगा फिर उसका च ताला खोलो ताला खोलने के समय पता चला कि चाबी खो गई वो चाबी खो गई तो चाबी का कहां पे है अभी चाबी नहीं मिल रही है और यहां पर राजा महाराज व टोपी मांग कर के वह अपेक्षा कर रहे देख रहे कि नहीं आ रही है फिर उन्होंने इनको जो डांटने की शुरुआत की कि ये किस तरह के मूर्ख लोग हो तुम लोग पता नहीं है कि जो चीज यात्रा के समय चाहिए उसको पास में रखना चाहिए इस तरह से पैक करके रही और फिर चाबी भी उसमें से खोदी हे राम अभी यह तो एक बार डांट लगी दूसरी बार क्या हुआ कि किसी स्टेशन पर पहुंचे हैं स्टेशन पर बैठे हैं और अभी जैसे देखिए कि अपने भारत में तो ऐसा है कि गेरवा वस्त्र धारण किए हुए साधु सन्यासी जहां पर भी जाते हैं लोगों को उनको सम्मान देते हैं तो अभी यहां पर क्या हुआ कि ये सेवक लोग सभी ये बैग वगैरह रख करके एक स्टेशन पर खड़े थे और राजा महाराज और उनके साथ में शशि महाराज थोड़ा सा दूर खड़े थे और सेवक लोग और यह बैग वगैरह एक जगह प थे अभी कुछ लोगों ने देखा कि अरे ये तो सन्यासी है तो उनके साथ में उनके प्रति कुछ श्रद्धा भक्ति अर्पण किया जाए जाकर के उनके साथ कुछ बात की जाए तो ऐसे कुछ लोग इकट्ठा हो गए जितेंद्र महाराज और बाकी जो सब सेवक थे उनके साथ में अभी यह लोग बात कर रहे हैं गब लगा रहे हैं गब लगाते लगाते इतने मशगूल हो गए किसी ने पता अभी वो बैग उनका सामान वगैरह कहां पर रखा है वह सब भूल ही गए तो अभी किसी ने एकाएक कहा जो भक्त लोग वहां पर इकट्ठा हुए थे कि इस स्टेशन प ना चोरों का बड़ा भय है देखिएगा कि आपका सामान कोई चोरी ना कर ले तो जैसे ये जितेंद्र महाराज ने सुना फटाक करके उनको तो एकदम टेंशन हो जाएगा ना कि गप लगाते लगाते वो तो सामान वगैरह भूल गए राजा महाराज ने भी सुना राजा महाराज ने भी सुन लिया और देखा कि यह लोग सामान की ओर नजर रखने की बजाय ये भक्तों के साथ में गप लगाने में बिजी हो गए तो जैसे ही उन्होंने सुना फिर उनको जो डांटने की शुरुआत की है कि तुम लोग यहां पर लाए हैं सेवा करने के लिए अभी सेवा ऐसा तो बोलने की जरूरत नहीं है किंतु सामान के ऊपर में तो नजर रखनी चाहिए वह नहीं रख करके गप लगाने के प्रारंभ कर दो ये क्या है और दूसरी डांट उनको मिली फिर अच्छा तीसरी है कि अ जब रामेश्वरम पहुंचे तब वहां पर किसी एक धर्मशाला में पंथ निवास जिसको कहते हैं रहने की व्यवस्था थी तो वहां पर रहने की व्यवस्था थी तो अभी यह लोग जब पहुंचे तो ऐसा था कि उनको सब विश्राम करके वह सीधा सीधी वहां पर विश्राम करने की व्यवस्था थी और किंतु कुछ ही समय अल्प समय वहां पर रहना था ज्यादा समय रुकना नहीं था तो यह शशि महाराज और राजा महाराज तो एकदम उन्होंने फटाफट आहार कर लिया और जाने के लिए तैयार हो गए देखा कि ये सेवक लोग अभी भी तैयार नहीं हुए जाने के लिए तो पूछा गया कि यह लोग क्या कर रहे हैं आहार वगैरह करने में इतना देरी क्यों लग रहा है तो उत्तर मिला कि यह लोग स्नान कर रहे हैं तो जैसे ही राजा महाराज ने सुना जोर से गर्जा उठे बोले कि अरे हम लोग सेकंड क्लास में आ रहे थे यह स्नान वगैरह तो ट्रेन में ही समाप्त कर लेना चाहिए यहां पे पंथ निवास में धर्मशाला में यह सब क्या स्नान वगैरह करने की जरूरत है पता नहीं है कि हमको इमीडिएट यहां से निकल जाना है ऐसा करके तीसरी बार डांट लगाई देखिए वो अब तीर्थ दर्शन के लिए जा रहे हैं और राजा महाराज तीर्थ दर्शन के मतलब मंदिर के समय मंदिर में प्रणाम करने के समय राजा महाराज का एक स्वरूप हमको दिखेगा किंतु यह रास्ते में जो प्रैक्टिलिटी है इन लोगों की यह देखिए कि कितनी तीव्र है मास्टर महाशय का वो फेमस घटना याद है ना कि पंचवटी के पास में कीर्तन वगैरह हो रहा था या तो फिर यह लोग घूमने के लिए गए थे वापस आक के देखा कि मास्टर महाशय छाता छोड़ कर के आ गए हैं छाता यानी कि अंब्रेला तो ठाकुर ने पूछा कि अरे छाता कहां गया तो मास्टर महाशय एकदम एकदम उनको याद आया कि अरे छाता तो मैंने पंचवटी में छोड़ के आया हूं मैं जाकर के ले आता हूं तो ठाकुर ने क्या कहा अरे मेरे शरीर पर वस्त्र नहीं रहते मैं जब ईश्वर ध्यान में इतना मग्न हो जाता हूं किंतु फिर भी मैं छाता नहीं भूलता और तुम लोग संसारी हो संसार में रहते हो सभी चीजों की तुमको इतना ध्यान रखना चाहिए सांसारिक चीजों का अपने जो मटेरियल पोजीशन है आपके वह सब चीजों का ध्यान रखना वो कालजी रखना गुजराती शब्द है उनका केयर रखना यह सब तो आपको मतलब आपके लिए बहुत ही सहज होना चाहिए आपके लिए बड़ा ही इंपोर्टेंट होना चाहिए तो वो नहीं करके छाता छोड़ के आ गए पंचवटी में तो मास्टर महाशय बेचारे शर्मिंदा हो कर के छाता लेकर गए तो देखिए इन लोगों को हम लोग कभी-कभी सोचते हैं कि हां ईश्वर ध्यान में इतने मग्न हो गए हैं तो पता नहीं ये जो सब सांसारिक चीज है उसके प्रति उनका कितना अ उनकी अंडरस्टैंडिंग है किंतु इन लोगों की प्रैक्टिकल अंडरस्टैंडिंग भी इतनी ही थी जितनी कि उनकी आध्यात्मिक अंडरस्टैंडिंग थी अभी ये सेवक लोग तो बेचारे नए-नए आए हैं वो घर में जब थे तो घर में तो सभी चीजों की ध्यान संभाल रखने के लिए मां तो उनको कहती ही है कि मां बच्चे को कहती है ना अपना रूम ठीक रखना अपनी चीजों को संभाल के रखना अपने खिलौने वगैरह है पढ़ाई लिखाई की चीजें हैं वो खो ना जाए वो सब चीजों के पर ध्यान रखना लड़का जब बड़ा होता है तो कहती है कि जाओ बाजार में से यह खरीद के ले आओ वो खरीद के ले आओ बाबूराम महाराज को भेजा था कि जाकर के कुछ वो एक पात्र लेकर के आने को पात्र लेकर के आया देखा महाराज जी लेकर के आए देखा कि उसमें छोटा सा एक होल है उसमें तो यह देख कर के ठाकुर ने कहा कि अरे तुमने यह पात्र जब लिया है तो तुमको पता नहीं चला कि इसमें होल है तो महाराज ने कहा कि उस समय तो खैर वो तो घर में ही थे सन्यास अभी तो नहीं लिया था ठाकुर की महासमाधि के बाद में वरा नगर में वो विरजा होम होने वाला था तो बाबूराम महाराज ने कहा कि दुकान वाले ने कहा कि ये बहुत सुंदर बहुत अच्छा है आप इसको ले जाइए आपका पैसा सब वसूल हो जाएगा जैसे हम लोग कहते हैं ना कि पैसा वसूल हो गया तो इसलिए मैंने उसकी बात सुन कर के ले आया ठाकुर क्या कहते हैं कि अरे मूरख भक्तो हो भी बोका हो भी भक्त होना है मूर्ख नहीं होना है माने कोई लोग तुमको ठग जाए इस तरह का भक्त नहीं होना है भक्त की प्रैक्टिकल सेंस भी इतनी होनी चाहिए तो देखिए कि ये प्रैक्टिकल सेंस इन लोगों की कितनी थी ये छोटे-छोटे उदाहरणों से हमको पता चलता है उसके बाद में राम रामेश्वरम पहुंचे रामेश्वरम में रामेश्वर के राजा के वे लोग अतिथि थे अभी ऐसी बात है कि जब जैसे उस समय के जो ये जो एक मान्यता होती है कि धुलो पाए दर्शन करा अर्थात कि जैसे ही आप आए हैं तीर्थस्थान में वैसे ही आप दर्शन के लिए चले जाए धुलो पाय अर्थात की पेर में जो तीर्थ यात्रा यात्रा के जो यात्रा का जो पथ है उसकी जो धूल लगी है पैर में उसी धूल वाले पेर लेकर के आप मंदिर में दर्शन करने के लिए जाए ऐसी एक मान्यता है तो यहां पर जाकर के देखा कि राजा महाराज और शशि महाराज दोनों रामेश्वरम पहुंच कर के सीधे सधी दर्शन के लिए चले गए अभी मंदिर में जाकर के दर्शन कर रहे हैं और अपेक्षा कर रहे हैं कि ये सेवक लोग शायद पीछे पीछे आते ही होंगे तो एक घंटा शायद इनकी अपेक्षा की वहां मंदिर में देखा कि कोई नहीं आ रहा कोई भी सेवक तो वह वापस आए जहां पर रामेश्वरम के राजा के अतिथि थे व वहां पर वापस आए और देखा कि यह लोग वहीं पर है अभी तो मंदिर में तो आने के लिए वह निकले प्रस्थान ही नहीं किया तो राजा महाराज ने पूछा कि अरे तुम लोगों को पता नहीं है कि धुलो पाए मंदिर में दर्शन करना चाहिए ये लोग क्या कर रहे हो तुम लोग यहां पे तो ये जितेंद्र महाराज और जो सेवक महाराज थे उन्होंने कहा कि हम लोग आपका ये जो सामान वगैरह है पहले उसको ठीक ठाक सजा देते हैं उसके बाद में हम मंदिर में दर्शन करने के लिए जाएंगे अभी तक तीन बार डांट मिल चुकी है और तीन बार तो हमको पता है उन्होंने लिखा है और कितनी बार डांट मिली होगी पता नहीं तो अभी वो एक्स्ट्रा कोशिस हो गए हैं एक्स्ट्रा केयरफुल हो गए हैं कि सब कुछ ठीक ठाक करना है फिर से वरना महाराज वो डांटना शुरू ना कर दे तो मैंने ओवर कंपन सेट जिसको कहते हैं तो ऐसे बड़ा ही उनको उनको मैंने हंसी खुशी उत्तर दिया कि इस बार हम लोग गलती नहीं कर रहे इस बार हम लोग आपका सामान पत्र सब सजा करके रख रहे हैं बाद में मंदिर में दर्शन करने के लिए वो सोचा कि बड़ी अभी प्रशंसा होगी तो उल्टा हो गया राजा महाराज शशि महाराज को बोलते हैं भाई एकटा बाती लाओ तो माने भाई एक बत्ती लेकर के आओ माने एक दिया लेकर के आओ ये सामान पत्र को मैं आग लगा देता हूं ये सब दफा ही मिट जाए सामान पत्र रहेगा तो इसकी तुम लोग चिंता करोगे सामान पत्र नहीं रहेगा तो तुम जाकर के भगवान में मन लगाओगे देखिए वो सुंदर जो वर्णन है राजा महाराज जब वापस आए वहां पर जो पूछने के लिए तो महाराज पूछते हैं ये तो खण की कोरा होलो खाने बसे थे के इतनी देर तक तुम लोग यहां पर बैठे बैठे क्या कर रहे थे तो आमी भए भए बोलू जितेंद्र महाराज कहते हैं मैंने डरते डरते कहा कि आमरा ही जिनिस पत्र गुलो एकट साज राख छल हम लोग यह सामान पत्र थोड़ा सा सजा करके रख रहे थे ताई सुने बोलले यह बात सुनकर के राजा महाराज ने कहा शशि भाई आनो तो एक खानी बाती शशि भाई लाओ तो एक दिया लाओ तो एक गुलो एक खुनी ज्वालय दी आपद चुके जाग यह सब अभी जला देता हूं सब मुसीबत मिट जाएगी तो देखिए कि माने यदि सेवा नहीं करते हैं ठीक से तो भी डांट सुननी है यदि ज्यादा सेवा कर ली तो उसमें भी डांट सुननी है तो किंतु ऐसे ही धीरे-धीरे करके महापुरुषों की डांट सुन कर के इन लोगों का चरित्र गठन होता था आज हम लोग जिस तरह से रह रहे हैं कोई किसी को डांटे नहीं कोई किसी को कुछ बोलेगा नहीं यदि आप सामने से जाकर पूछने को जाएंगे कि मेरी क्या गलती हो रही है तो शायद आप लोगों को हमको बोलेगा कोई वरना ऐसे कोई किसी को बोलता नहीं है कि तुम क्या ये गलती कर रहे हो सभी लोग क्या है बहुत ज्यादा जेंटलमैन हो गए हैं आजकल तो छोटे होते हैं हम जब ब्रह्मचारी होते हैं बिल्कुल नए आए हुए तब कोई कुछ दो-तीन शब्द हमको बोल देता है किंतु आजकल वो भी नहीं होता रामकृष्ण मिशन के साधु अभी बहुत ही सौम्य स्वभाव के हो गए हैं तो यह मुझे पता नहीं कि इवोल्यूशन है कि डिवोशन है यह जब पुरानी बातें जब हम सुनते हैं तब मुझे लगता है कि देखिए कि चरित्र गठन जब नए आए हुए साधुओं का करना है उसकी जिम्मेदारी यह जो रिस्पांसिबिलिटी सीनियर साधुओं की रहती है और यह सीनियर साधुओं की डांट सुनना वो भी हमारे लिए एक बड़े ही भाग्य की बात है वह भी हमारे लिए एक बड़े ही एक वो हमारे जन्म जन्मांतर के कर्म कितने काट देगा हमको पता नहीं तो ये अभी जितेंद्र महाराज लिखते हैं कि ता रुद्र मूर्ति देखे बबलू जब यह कहते हैं राजा महाराज की लाओ तो एक दिया लाओ तो एक ये सब सामान पत्र को जला देते हैं सब आ आपद मि जाएगी तो यह जितेंद्र महाराज कहते हैं उनकी रुद्र मूर्ति यह जो उनका रुद्र स्वरूप है यह देख कर के मैंने सोचा महापुरुष देर संगे आर तीर्थ दर्शने जा ना बाबा अरे भगवान मैं महापुरुष लोगों के साथ में फिर से तीर्थ दर्शन के लिए नहीं जाता हूं शे बार अपराध तो अच्छे माने सेवा का अपराध तो है ही सेवा अपराध अर्थात कि हम जद किसी महापुरुष की सेवा करते हैं तब हमारे से सेवा करने में गलती होती है उसको सेवा अपराध कहते हैं तो सेवा अपराध तो है ही उसमें से आबार धमक खेते खेते प्राणा तो माने सेवा का अपराध तो होही गया ऊपर में से यह जो धमक मिल रही है उन लोगों की यह सुनकर के प्राणा हो जाता है महाराज ने जो शब्द यूज किया है प्राणा माने जान चली जाती है जान निकल जाती है इस तरह से हमको धमक मिलती है रुद्र स्वरूप धारण करेंगे राजा महाराज और फिर डांट तो किस तरह का वो डांट होगा हम लोग अनुमान करके सोच ही सकते हैं तो महाराज किंतु कहते हैं देखिए य तो होलो एकटा दिख किंतु यह हुई एक तरह की बात एक मने एक बात तार संगे भ्रमण करले अनेक अमूल्य अभिज्ञता और लाभ होए किंतु साथ-साथ में इनके साथ में भ्रमण करने से बहुत सारी अमूल्य अभिज्ञता यानी कि अनुभूति या तो अनुभव भी प्राप्त होते हैं देखिए इसके बाद का जो वर्णन है महाराज ने इतना सुंदर रूप से किया है मैं पढ़ता हूं जितेंद्र महाराज कहते हैं अभी उस दिन तो जब रामेश्वरम में गए तो उस दिन तो राजा महाराज और शशि महाराज धुलो पाय सीधा सधी दर्शन के लिए चले गए थे और यह सेवक लोगों का तो उस दिन महाराज लोगों के साथ में दर्शन नहीं हुआ था दूसरे दिन की बात है बहुत सुंदर वर्णन है पोर दिन शकाल थे के महाराज के देखते पावा जाे ना दूसरे दिन सुबह को हम लोग उठे देखा कि राजा महाराज कहीं प दिख नहीं रहे तो इन लोगों ने चारों ओर खोजना आरंभ किया कि महाराज तो वैसे अपने से अकेले कहीं जाते नहीं है है ठाकुर का था ना कि ठाकुर कहीं अकेले नहीं जाते थे कभी भाव में आ जाते थे और क्या कर बैठते थे उनको समझ नहीं आता मतलब वो कभी-कभी वो एक प्राण का संशय हो जाता था एक बहुत ही सुंदर बात है ठाकुर वो थिएटर में गए हैं वहां पर गिरीश घोष ने ठाकुर को बुलाया है अभी ठाकुर के पास में राखल को बिठाया है अरे यही राजा महाराज को अभी कुछ कारण वश तः किसी कारण सह यह राजा महाराज वहां से उठ कर के किसी काम के लिए गए अभी ठाकुर के पास वाली जगह खाली है तो कोई एक आदमी आकर के वहां पर बैठ गया तो ठाकुर ने उसको क्या कहा देखो भाई तुम यहां पर मत बैठो ये जगह तो रिजर्व है राखल के लिए और मने कोई अनजाना आदमी होगा और ठाकुर ने क्या उत्तर दिया पता है क्या कारण दिया कि देखो मेरी अवस्था ऐसी हो गई है कि पास में जो होता है वह जो कहता है वह मैं करता हूं माने बिल्कुल छोटे बच्चे का एक निर्भरता का भाव किस तरह से आ जाता है इस तरह का कभी-कभी ठाकुर के साथ में हो जाता इसलिए ठाकुर ने उस व्यक्ति को कहा कि तुम यहां पर मत बैठो वरना तुम जो बोलोगे वो कुछ भी बोल दोगे मुझे मैं मैं यदि ऐसा करना आरंभ कर दूंगा तो पता नहीं क्या हो जाएगा तो देखिए महापुरुष लोगों की एक एक एक ये होता है ना भीतर में से सरलता और भरोसा का एक एक उनका स्वभाव हो जाता है तो एक र डांट दे भी है और दूसरी ओर इनके ऊपर में डिपेंडेंट भी रहते हैं तो राजा महाराज वैसे इधर-उधर कहीं जाते नहीं थे उस दिन दूसरे दिन सुबह को उठकर के देखा कि महाराज ने ही है चारों ओर खोजने का प्रारंभ कर दिया तो शशि महाराज ने कहा कि मुझे लग रहा है कि महाराज मंदिर जाने के लिए चले गए तो सभी लोग चैतन्य महाप्रभु का भी है वो सभी अपने दल के साथ में भक्तों के साथ में जगन्नाथ पूरी जा रहे थे अभी चैतन्य महाप्रभु आगे-आगे जाना शुरू कर दिया भक्त लोग पीछे रह गए और वहां पर जाकर के जगन्नाथ मंदिर में जाकर के पूरी मंदिर में अभी उनको एकाएक भावा वेश हुआ और एकदम प्रभु को अ जो उनका जो यह है प्रतिमा उनको आलिंगन करने के लिए जाने लगे अभी वह जो सेवक लोग वगैरह रहते हैं उन लोगों को लगेगा अरे यह कोई पागल है वो मूर्ति पर हमला कर रहा है क्या हो रहा है जाकर के उन्होंने प्रभु के श्री अंग पर आघात करने की शुरुआत कर दी फिर वो तो भक्त लोग आए और भक्तों को थोड़ा टेंशन में आ गए थे कि अरे महाप्रभु इतने जल्दी अकेले-अकेले क्यों चले गए तो फिर जब आए देखा कि महाप्रभु बेचारे बेहोश पड़े हैं उनके शरीर पर श्री अंग पर आघात के चिन्ह है तब लोग बड़े ही परेशान चिंता में आ गए थे तो देखिए कि उस समय भी भक्तों को पता था कि भगवान को ऐसे अकेले नहीं छोड़ना है भावा वेश में आ जाएंगे तो पता नहीं क्या करेंगे तो यहां पर भी जैसे ही पता चला कि राजा महाराज मंदिर में चले गए हैं यह लोग दौड़ते दौड़ते पीछे गए महाराज लिखते हैं शशि महाराज और सभी सेवक लोग अभी महाराज का जो वर्णन है जितेंद्र महाराज जो वर्णन करते हैं देखिए महाराज जी लिखते हैं मंदिरे पहुंचे जा देख लूम ता केमोन कोरे बुझाई बोलो मंदिर में जाकर के जो देखा मैं किस तरह से समझाऊं कहो तार एक टू आभास सुधु दते पारी उसका सिर्फ एक आभास मात्र में दे सकता हूं देख लूम तिनी शिव सनि दने ध्यान मग्न बज सुन्नो निस्पंद देखा कि राजा महाराज शिव सनि ध्यान में मग्न है बाह्य शून्य हो गए हैं का ध्यान करते करते इस तरह से समाधि में शरीर चले गए हैं कि शरीर बिल्कुल स्थिर हो गया है आंख की पलक भी जबक नहीं रही बिल्कुल स्थिर होकर के खड़े हैं शशि महाराज आमा देर इशारा कोरलेन ता के घिरे बोसे पड़ते शशि महाराज ने हमको इशारा किया कहा कि इनको घर करके बैठ जाओ जैसे कि किसी के आने जाने से उनको टक्कर ना लगे या तो फिर उनको खुद को कोई आघात ना लगे जाते भीड़ चापे तार शरीरे आघात ना लागे वहां पर भीड़ थी कोई आकर के वह धक्का मार देगा तो पता है ना कि जो लोग समाधि में जाते हैं उनको थोड़ा सा भी यह शारीरिक आघात या मां की बात है ऐसा आघात होने से बड़ा ही उनके हृदय को कष्ट पहुंचता है मां की बात है मां एक बार पंचवटी वहां पे दक्षिणेश्वर में ध्यान कर रही थी नबत में तो वहां पर वृंद जी वही वृंद जी जिसको कि मास्टर महाशय ने पूछा था कि अरे उनी बध खूब पढ़ा लिखा मने पढ़ाई लिखा अने बई पढ़े वृंदा जी बोल ना ब सब मुखे माने मास्टर महाशय जब गए थे ठाकुर के प्रथम दर्शन के समय तो पहले तो देखा कि ठाकुर बैठे हैं अपने कमरे में दक्षिणेश्वर के अपना जो कमरा है वहां पर और मास्टर महाशय ने सोचा कि अरे यह तो जैसे कि सुखदेव स्वयं भागवत कथा क रहे हैं इतना पवित्र वातावरण फिर सोचा कि पहले मैं देख लेता हूं मैं कहां आया हूं बाद में मैं फिर यहां पर आकर के ठाकुर के साथ में उनका दर्शन करूंगा बोल कर के गए मंदिर वगैरह देखा सुंदर मंदिर है वापस आक के देखा तो ठाकुर का कमरा बंद था और धूप वगैरह दिया हुआ था तो अभी वो जैसे इंग्लिश पढ़े लिखाई आजकल के कि बिना खटखटाया हुए हम किसी बंद कमरे में प्रवेश करना हम लोग उचित नहीं समझते हैं तो मास्टर महाशय वहां पर बंद कमरे के सामने खड़े हैं सोच रहे हैं क्या करना तो यही वृंदा दासी दासी ना वो काम वाली जो वहां पर काम जो बर्तन वगैरह मांस ती थी वगैरह जो करती थी वो वृंदा वहां पर खड़ी है तो मास्टर महाशय ने उनको पूछा था कि ये इतनी बड़ी बड़ी मने इतनी सुंदर बातें करते हैं तो उन्होंने बहुत पढ़ाई लिखाई की होगी तो वृंदा क्या कहती अरे सब इनकी जिहुआ पे सब अवस्थित है पढ़ाई लिखाई क्या फिर मास्टर महाराजय पूछते क्या मैं अंदर जाऊं तो वो कहती है अरे जाओ जाओ उसमें क्या है तो तो वही वृंदा दसी तो मां एक बार नबत में ध्यान कर रही थी और वृंदा ने एक बर्तन को पटका जोर से तो इतना जो ध्यान करते हैं इस तरह से कोई एकाएक कोई आवाज आती है तो मां एकदम चिल्ला कर चिल्ला उठी और जैसे कि हृदय में किसी ने बड़ा ही आघात किया हो ठाकुर अपने कमरे में थे वहां से दौड़ कर के आए अरे मां के साथ में क्या हुआ एकदम द दौड़ कर के तो देखिए मां रोना शुरू कर दिया था मां ने तो इस तरह से जो ध्यान कर है उनको ध्यान में भंग करते हैं कोई एकाएक तो उनको बड़ा ही कष्ट होता है तो देखा कि राजा महाराज शिव सनि ध्यान ध्यान मग्न बाह्य शून्य निस्पंद शिव सनि ध्यान में ध्यान मग्न है बाह्य शून्य है निस्पंद है तो राजा महाराज को इस तरह से देख कर के शशि महाराज ने कहा चलो भाई हम लोग राजा महाराज को घेर करके बैठ जाते हैं चारों और जिससे कि भक्तों की भीड़ से राजा महाराज को आघात ना लगे तिनी निजे एकटा दख आगले बोस लेन शशि महाराज ने एक साइड में चौकीदार की तरह वहां पर जाकर के बैठ गए आश्चर्य बशार अल्प खोने मध्य आमरा गभीर ध्यान डूबे गलम आश्चर्य की बात है कि राजा महाराज को घेर करके बैठने की अल्प क्ण के बाद में ही हम लोग गभीर ध्यान में निमग्न हो गए माने ये तो उल्टा हो गया कहा राजा महाराज की वो चिंता करेंगे राजा महाराज रखवाली करेंगे नहीं ये लोग खुद ध्यान में चले गए इनको कोई टक्कर देगा तो क्या होगा पता नहीं देखो व्यापार देखिए कैसी बात उच्च आध्यात्मिक शक्ति संपन्न महापुरुष सानिध्य जे आश बे प्रभावित होए पड़ उच्च आध्यात्मिक शक्ति संपन्न महापुरुष के सानिध्य में जो आएंगे वह महापुरुष की आध्यात्मिक यह जो य ये है आध्यात्मिक तन मात्रा है उससे प्रभावित हो जाएंगे हृदय आध्यात्मिक भावे स्फुरण आपनी होवे हृदय में आध्यात्मिक भाव का स्फुरण अपने से होगा ताई तो शास्त्रे अभिराम साधु संगर महिमा कीर्तन कोर छन इसीलिए तो शास्त्र अविराम साधु संग की महिमा का कीर्तन करता है जाई होक जो भी है ए भावे प्राय दुई घंटा कटे जाए इस तरह से लगभग दो घंटे चले गए महाराज धीरे-धीरे बाच ज्ञान लाभ कर लेन महाराज धीरे-धीरे समाधि में से नीचे आए यह बाह्य ज्ञान थोड़ा सा हम जो अपनी जो शब्द नहीं मिलते है ना समाधि का वर्णन करने के लिए इसलिए हम लोग कहते बाह्य ज्ञान गवा दिया किंतु यह कहना मुझे उचित नहीं लगता है मुझे लगता है शब्द को थोड़ा सा और संस्कृत किया जाए तो वह उच्च आध्यात्मिक भूमि से नीचे उतर आए आमरा ओ सहज होलम हम भी उच्च आध्यात्मिक भाव में से सहज अवस्था प्राप्त की तीनी आरो आध घंटा आसने बोसे थकले राजा महाराज और भी आधा घंटे तक आधे घंटे तक आसन पर बैठे रहे मुख भाव शांत गंभीर उनके चेहरे का भाव शांत और गंभीर तारपोर शशि महाराज खूब संतर पणे ताके एक खानी गाड़ी ते तुले ये बासु स्थाने फिरले इसके बाद में शशि महाराज ने बड़े ही कालजी पूर्वक बड़े ही केयरफुली राजा महाराज को एक गाड़ी में लिया और हाथ पकड़ करके धीरे-धीरे और फिर गाड़ी में बिठा करके उनको जहां पर ये लोगों का वास स्थान था वहां पर उनको लेकर के आए सात आठ दिन रामेश्वर बास होए मदराज जीी भक्तो रामु हमार संगे छलो राम ना राजा लोक जनो छलो सात आठ दिन वहां पर रहे थे रामनाथ के राजा के लोग भी थे एक दिन बोई काले महाराज शोग तो क्ति सुन लू एक दिन शाम को महाराज बोल रहे थे अपने अपने से वो सुना महाराज ने कहा भाव होवे ना मने महाराज ने जो उनके साथ में यह जो उच्च भावा अवस्था की स्थिति हुई थी उसके बारे में कह रहे खुद कह रहे हैं कि भाव नहीं होगा क्या स्वयं भगवान प्रतिष्ठा कोरे गछ ज भगवान राम ने स्वयं शिवलिंग की प्रतिष्ठा की है तो अभी हालांकि हम सबको ज्यादातर तो मां सीता के नाम से ही य कहानियां प्रसिद्ध है किंतु जो भी है तो ये रामेश्वरम दर्शन की एक सुंदर कहानी तीन कहानियां है इस तरह से दूसरी है मदुराई तीर्थ की और तीसरी है विंध्यवासिनी देवी की मैंने सोचा था कि एक दिन में सब हो जाएगा किंतु आज एक ही दिन में एकही हुई तो जो भी है अभी दो कहानिया है वो कल हम फिर से देखेंगे आज यही तक ओम शांति शांति शांति ओम श्री राम कृष्णा अर्पणम