Prayer
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः स्वामी विवेकानंद का बायोग्राफी इसका हम पाठ कर रहे हैं। मैं आपके साथ में कुछ स्क्रीन शेयर कर रहा हूं। ऑलरेडी
Outline of the first 100 years of Ramakrishna Mission
हम लोगों ने जो कुछ डिस्कस किया उसका एक आउटलाइन यहां पे है। देखिए यह आउटलाइन जो है हमने वैसे तो डिस्कस किया ही है कि किस तरह से संपूर्ण रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा यह 100 साल की जो स्टोरी है इसको मैंने कुछ फेस में बांट दिया है। चार फज़ में बांटा है। उसमें आप देखिए कि यह टाइमलाइन में यह ग्रीन लाइन है, येलो है, ब्लू है और ऑरेंज है। ये चार जो है आपको चार फेजेस यहां पे दिखाती है। सर्वप्र प्रथम फेज तो है ठाकुर की बाल्या लीला और ठाकुर की साधना जो कि उन्होंने काली मंदिर दक्षिणेश्वर में की थी। वो एक फेज हो गया। 1836 से प्रारंभ करें और 1936 यह 100 ईयर अपना जो हिस्ट्री है इसको यदि हम समग्र भाव से देखें क्योंकि क्या है कि बहुत बार हम यदि ठाकुर मां स्वामी जी को स्टडी करने का प्रयास करते हैं तो होता क्या है कि कभी-कभी हमारे मन में कंफ्लिक्ट हो जाता है कि कहां पर ठाकुर ने ऐसा कहा है तो कहां पर ठाकुर ने ऐसा कहा है तो इन दोनों के बीच में मेल कहां पर है? फिर ठाकुर ने ऐसा कहा तो स्वामी जी ने ऐसा कहा स्वामी जी ने कर्म योग की बात की तो ठाकुर ने कहा कि कर्मनाशा नदी है उसमें झपलाने से ही उसमें स्नान करने से ही हम लोग बचेंगे। तो यह दोनों का एक है। आप ऊपर ऊपर से विरोधाभास लगता है। दूसरा है कि ठाकुर तो थे पूरे सन्यासी किसी के जगत के साथ में उन्होंने संपूर्ण नाता तोड़ दिया था। तो यहां पर है हम हमको मां शारदा दिखती है कि अपने भाई के परिवार के साथ में रहती है और राधुराधु करके पागल होती है। तो यह जो एक अपेरेंट कंट्राडिक्शंस ऊपर ऊपर से दिखता है तो हमको इसको सॉल्व करने के लिए इस अपेरेंट कंट्राडिक्शंस को रिजॉल्व करने के लिए क्या करना होगा? ठाकुर मां स्वामी जी तीनों का जीवन एक साथ में स्टडी करना होगा। तो यदि हम एक साथ में स्टडी करने का प्रयास करेंगे तो हमारे सामने सबसे बड़ा एक फर्स्ट चैलेंज यह आएगा कि ठाकुर की बायोग्राफी अलग से लिखी गई है। ये स्वामी शारदानंद जी ने ठाकुर की ऑथेंटिक बायोग्राफी है। श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग उसको लिखा है। मां की बायोग्राफी है। गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखी गई है। वह एक अलग से लिखी गई है और स्वामी जी की जो ऑथेंटिक बायोग्राफी है बंगाली में है युगनायक विवेकानंद और इंग्लिश में है लाइफ ऑफ स्वामी विवेकानंद बाय हिज ईस्टर्न एंड वेस्टर्न डिसाइपल्स। तो यह तीनों की बायोग्राफी अलग-अलग से लिखी गई है और वैसे तो कॉमन घटनाओं का उल्लेख तीनों में मिलता है किंतु एक जो कॉम्प्रहेंसिव फ्रेमवर्क होना चाहिए एक ही किताब में एक ही सिस्टम में वो हमको देखने को नहीं मिलता। बहुत सारे आर्टिकल्स लिखे गए हैं। तीनों को रिंसाइल करने के लिए बहुत सारे स्पीचेस दिए गए हैं। किंतु इवेंट बाय इवेंट डेट बाय डेट टीचिंग बाय टीचिंग जो एक एक होलिस्टिक फ्रेमवर्क होनी चाहिए। तीनों के लाइफ और टीचिंग को रिकंसाइल करने के लिए तीनों के लाइफ और टीचिंग को एक साथ में कॉम्प्रिहेंसिव फ्रेमवर्क में देखने के लिए वह अभी तक मिसिंग है। तो मैंने यहां पे एक प्रयास किया है एक फ्रेमवर्क डेवलप करने का कि तीनों का जो जीवन है या तो फिर 1 इयर्स हिस्ट्री है हमारा ओरिजिनल फर्स्ट फर्स्ट सेंचुरी क्रिकेट की लैंग्वेज में कहें तो यह जो हमारी फर्स्ट सेंचुरी है 1836 में ठाकुर का भूमि पर अवतरण हुआ तब से लेकर के यह जो बेलूर मठ में श्री रामकृष्ण देव का यूनिवर्सल टेंपल है। उसका क्सिक्रेशन हुआ। आई थिंक 1930 के आसपास की घटना। तो यह जो नियरली 100 ईयर हिस्ट्री है उसको जो संपूर्ण रूप से समग्र रूप से देखा जाए तो हमको एक सुंदर रूप से एक चितार मिलता है। सुंदर रूप से एक फ्रेमवर्क तैयार किया हुआ मिलता है। जो कि तीनों के लाइफ और टीचिंग को एक साथ में एक ही फ्रेमवर्क में एक ही पॉइंट ऑफ व्यू से एनालाइज कर सके और उसको डिस्कस कर सके। तो इसके लिए जो एक प्रथम फ्रेमवर्क मैंने बनाया है, सेवरल फ्रेमवर्क्स बनाने पड़ेंगे। हो सकता है कि अल्टीमेटली सभी फ्रेमवर्क्स में मर्ज कर दूं। तो बट एटलीस्ट एज ऑफ नाउ एक जो फ्रेमवर्क है मेरा वो है कि ठाकुरमा स्वामी जी तीनों की लाइफ को एक साथ में यदि स्टडी करना होगा तो हम किस पीरियड्स के अनुसार उसको स्टडी करेंगे तो उसके अनुसार मैंने पीरियड्स बनाने के लिए कुछ लेवल बनाए हैं। लेवल में टॉपमोस्ट लेवल है फज़। तो चार फेजेस हमको दिखते हैं ठाकुर मास्वामी जी के जीवन में। यह जीवन समग्र में। देखिए कि 1836 में यहां पे आप देखेंगे कि ठाकुर का जन्म हुआ और 1855 में ठाकुर कामार पुकुर छोड़कर के द काल कोलकाता आए। और वहां पर जब काली मंदिर का निर्माण हुआ तो वहां पर रहकर के उन्होंने साधना की। तो यह जो ग्रीन लाइन है वह फेज वन डिनोट करती है। उसके बाद में देखिए कि मां शारदा का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ। ठाकुर ने मां की शोशी पूजा की और उसके बाद में मां की शक्ति से शक्तिमान होकर के ठाकुर ने कोलकाता में जो जितने भी भक्त हैं उनके घरघर जाकर के ठाकुर ने अपना जो यह नया संदेश है उसको फैलाने का कार्य प्रारंभ किया। तो यह जो धर्म चक्र प्रवर्तन है या तो फिर ठाकुर का यह जो गुरु भाव है मिनिस्ट्री ऑफ श्री रामकृष्ण श्री रामकृष्णस मिनिस्ट्री इट स्टार्टेड 1873 शोडशी पूजा से प्रारंभ होकर के 1886 ठाकुर की महासमाधि तक का यह सेकंड फेस उसके बाद में देखिए कि जैसे ही ठाकुर की महासमाधि हुई स्वामी जी के सर के ऊपर में संघ को संचालित करने का पूरा जिम्मा आ गया तो स्वामी जी ने किस तरह से ठाकुर के यह जो उपदेश है वैसे तो कुछ ही अल्प लोगों तक ही उसको एक बहुत ही डीपली लिया गया था। देखिए कि ठाकुर वैसे तो घर-घर जाते थे। बहुत सारे लोग ठाकुर के पास आते थे। किंतु यह कोलकाता में जो ठाकुर का नाम प्रसरित हुआ था उसको तो पूरे विश्व में फैला देना है और पूरे विश्व की इतनी सारी आप देखेंगे कि लोकल कल्चरर्स इतने सारे हैं। अभी फ्रांस का एक कल्चर और थिंकिंग है। ब्रिटेन का एक है। अमेरिका का एक है। जापान का एक है। भारत में ही देखिए कितना वैविध्य यह बंगाल का एक कल्चर फिर यह हिंदी हार्टलैंड जो है अपना यूपी बिहार उस समय यूनाइटेड प्रोविंसेस कहा जाता था तो उसका एक कल्चर है। फिर यहां पे देखिए कि उत्तराखंड राजपूताना गुजरात यहां पे साउथ इंडिया यहां पे कर्नाटक केरल कितना वैविध्य है। तो प्रत्येक देश की यह परिस्थिति को समझ करके ठाकुर का उपदेश उस लोकल सिचुएशन के अनुसार लोगों के सामने प्रस्तुत करना वह एक बहुत बड़ा कार्य स्वामी जी के सर पर आन पड़ा था। देखिएगा कि वैसे तो कोलकाता में या जनरली इन बंगाल यह मांसाहार चलता है। एवन ब्राह्मण लोग भी जो होते हैं शक्ति के जो उपासक होते हैं वे लोग मछली है वगैरह नियमित रूप से आहार करते हैं। किंतु अखंडानंद जी महाराज जब यहां पर गुजरात राजस्थान में भ्रमण कर रहे थे तो उस एरिया में क्या है? जैन धर्म का वर्चस्व है। तो वहां पे यदि कोई एक धार्मिक व्यक्ति मांसाहार करें तो उसको बहुत ही बुरी दृष्टि से देखा जाता है। तो अखंडानंद जी ने एक बार उस समय स्वामी जी अमेरिका में थे। तो अखंडानंद जी ने स्वामी जी को पत्र में लिखा कि अच्छा यहां पे तो मांसाहार धार्मिक जो व्यक्ति है साधु सन्यासी है इसको यदि मछली या मांस खाते हुए लोग देखेंगे तो उसको बड़ी ही द्रोणा की घृणा की दृष्टि से देखेंगे। तो हमको क्या करना चाहिए? तो स्वामी जी ने बेंगली में उसका उत्तर दिया है लोकाचार अर्थात कि वहां की जो ट्रेडिशन है उसको हमको मानना होगा और यदि वहां पर ऐसा लगेगा कि मांसाहार करने से लोग हमको हीन दृष्टि से देखते हैं तो उसका तदन तदंडे त्याग करवे। स्वामी जी ने बंगाली में लिखा है तदंडे त्याग करवे। तत उसी क्षण तदंड अर्थात कि उसी क्षण उसका त्याग करना है। तो देखिए कि स्वामी जी को पता था कि कौन से प्रदेश की कौन सी माइंडसेट मेंटालिटी है, कल्चर है। उसके अनुसार ठाकुर का उपदेश उस प्रदेश में प्रसारित करना है। क्योंकि मांसाहार करना वह कोई ठाकुर के जीवन का या तो फिर उपदेश का कोई हार्ट नहीं है। कोर नहीं है। ठाकुर के जीवन का जो कोर टीचिंग जो है वह है त्याग और ईश्वर समर्पण। यह त्याग और ईश्वर समर्पण की बात करने के लिए यदि आपको लोकल विचारों में, लोकल भाषाओं में, लोकल कल्चर में अपना मैसेज देना पड़े तो वह भी सही है। तो यह जो पूरा ठाकुर का जो एक उदात जीवन और एक लिबरल आइडियाज वगैरह पूरे विश्व में जो प्रचार करने का कार्य था ठाकुर की महासमाधि के बाद में स्वामी जी के कंधों पर आन पड़ा और यह रहा तब तक जब तक कि स्वामी जी की खुद की महासमाधि ना हुई हो। तो यह स्वामी जी की महासमाधि तक आप देखेंगे यह ब्लू लाइन कि स्वामी जी स्वामी विवेकानंदास मिनिस्ट्री या तो फिर स्वामी विवेकानंद का गुरु भाव ऑलमोस्ट 16 साल तक रहा है। इसके बाद में देखिए कि जैसे ही स्वामी जी की महासमाधि हुई मां शारदा के कंधे के ऊपर में पूरे संघ का जिम्मा आन पड़ा। यह स्वामी ब्रह्मानंद जो कि उस समय रामकृष्ण मिशन के प्रेसिडेंट थे। स्वामी शारदा जो कि रामकृष्ण मिशन के जनरल सेक्रेटरी थे और भी जितने भी भक्त वगैरह है उन सबके सामने में एक आध्यात्मिक आदर्श यदि हो। ऐसा कोई एक प्रचंड व्यक्तित्व कि जिनकी बातों को स्वीकार करके यह लोग अपने जीवन को आध्यात्मिकता से समृद्ध बनाएं। तो ऐसा कौन था? तो वह थी मां शारदा। तो यहां पर 1902 स्वामी जी की महासमाधि से प्रारंभ करके 1920 हम देखेंगे कि मां शारदा का गुरु भाव रहा। ऑफ कोर्स आप यदि ऐसा कहेंगे कि स्वामी जी की महासमाधि के बाद में मां शारदा का गुरु भाव कैसे हो सकता है? मां शारदा के जीवन में तो हम देखते हैं कि बचपन से ही मां का गुरु भाव प्रगटित हो रहा है। खास करके यह 1873 में देखिए कि मां की शोडशी पूजा करके मां के श्री चरणों में अपना समग्र आध्यात्मिक उपलब्धि समर्पित करके ही ठाकुर ने अपना गुरु भाव प्रारंभ किया है। तो फिर यह मां का गुरु भाव आप स्वामी जी की महासमाधि से कैसे गिन सकते हैं? तो उसका उत्तर भी हमने डिस्कस किया था कि यह बह प्रकाश है। आउटर एक्सप्रेशन है। जनसाधारण के भीतर में इससे पहले जो मां के गुरु भाव का प्रकाश था वो ठाकुर के जो अंतरंग शिष्य गण है उन्हीं तक सीमित था। तो इस तरह से चार फेज में 1836 से लेकर के 1920 और इसके बाद भी आप देखेंगे कि 1936 38 तक यह पूरा टाइमलाइन चार फेज में बांटा है। अभी इसको और थोड़ा डिटेल में देखेंगे तो आप देखिए कि ठाकुर का जो साधना जो है साधना फेस उसको मैंने दो पर्व में बांटा है। एक तो है बाल्य पर्व अर्थात कि कामार पुकुर में ठाकुर की लीला साधन पर्व अर्थात कि कलकथा में ठाकुर की लीला साधना उसके बाद में ठाकुर का गुरु भाव उसको शक्ति पर्व मां का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ वहां तक का आनंद पर्व अर्थात कि अपने अंतरंग शिष्यों के साथ में ठाकुर की लीला आत्म प्रकाश पर्व ठाकुर को कैंसर हुआ और उन्होंने प्रकाश में जाहिर में अपना यह जो अवतारत्व है उसको स्वीकार करने की शुरुआत की। ठाकुर की महासमाधि के बाद में यह जो गुरु भाव पर्व है स्वामी जी का उसमें देखिए कि प्रथम तो है संघ पर्व अर्थात कि किस तरह से वराह नगर मठ में यह गुरु भाई रहते थे। भारत पर्व स्वामी जी पूरा भारत का भ्रमण करते हैं। भारत की परिस्थिति का अंदाज लेते हैं। उसके बाद में विजय पर्व किस तरह से अमेरिका जाकर के वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में स्वामी जी का जो प्रख्यात भाषण उससे स्वामी जी फेमस हो गए और पूरे विश्व में ठाकुर के नाम का सनातन हिंदू संस्कृति का प्रचार करने का स्वामी जी को अपॉर्चुनिटी प्राप्त हुआ। उसके बाद उद्योग पर्व किस तरह से स्वामी जी भारत आए और भारत में आकर के स्वामी जी ने ठाकुर के उपदेश अनुसार उपदेश को कार्यरत करवाने के लिए वेदांत को प्रैक्टिकल करने के लिए रामकृष्ण संघ की स्थापना की। उसके बाद में मां का गुरु भाव और मातृ पर्व और स्वराज पर्व। तो देखेंगे इस तरह से मैंने कुछ पर्व में चार फेस को बांट दिया है। अभी यदि हम स्वामी जी का लाइफ स्टडी करें तो देखेंगे तो एक तो है चाइल्डहुड डज़ टॉपिक वन उसके बाद में ठाकुर के साथ में स्वामी जी के जीवन टॉपिक टू उसके बाद में ठाकुर के रहते रहते ही पिताजी की महासमाधि होने के बाद में स्वामी जी के जीवन में जो संघर्ष आया वह उसके बाद में निर्विकल्प समाधि प्राप्त होती है। वराह नगर मठ में यह लोग रहने को आते हैं। पूरे भारत में प्रवृजिया करते हैं। प्रथम विजिट टू द वेस्ट भारत में आए रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। सेकंड विजिट टू द वेस्ट और उनके लास्ट डेज। तो स्वामी जी के जीवन को मैंने इस तरह से 10 टॉपिक में बांटा है। उसमें से यह जो फिफ्थ टॉपिक है, उसका डिस्कशन हम कर रहे थे। फिफ्थ टॉपिक में फर्स्ट चैप्टर था कि ठाकुर की महासमाधि के बाद की घटनावली उसका भी हमने पाठ कर लिया और वराह नगर मठ की स्थापना इसका भी हमने पाठ कर लिया। अभी जो थर्ड चैप्टर जो है कि कंफर्मेशन ऑफ फेथ कि किस तरह से ठाकुर की महासमाधि हुई। यह जो सन्यासी गुरु भाई थे उनके भविष्य के ऊपर में एक तरह का प्रश्नार्थ चिन्ह था कि यह लोग क्या करेंगे किंतु स्वामी जी ने स्वामी जी को तो पता था कि ठाकुर ने उनको कहा है कि सभी गुरु भाइयों को इकट्ठा रखकर के संघ की स्थापना करनी है। तो फिर स्वामी जी ने सबको इकट्ठा किया। वराह नगर मठ की स्थापना हुई। किंतु भीतर में से एक एक होता है कि अभी ठाकुर तो चल बसे हैं। तो अभी हमारे भविष्य का जीवन कैसा होगा? जब तक ठाकुर थे तब तक यह लोग दक्षिणेश्वर में और बाद में श्यामपुकुर और काशीपुर में ठाकुर की सेवा करते थे। किंतु ठाकुर की महासमाधि के बाद में इन लोगों का जीवन कैसे चलेगा? क्योंकि ऐसा तो नहीं है कि जीवन की प्रत्येक क्षण आप साधन भजन जप ध्यान लेकर के रह पाए। आपको अन्य तो कुछ करना होगा। साथ में यदि रहना है तो खाना पकाना होगा। घर की संभाल मठ की संभाल लेनी पड़ेगी। यदि कोई डिवोटीज आते हैं तो उनके साथ में वार्तालाप करना पड़ेगा। यह जो 13 14 15 यह यंग लड़के एक साथ में रहते थे तो एक सोशल डायनेमिक्स एक क्रिएट होता है कि किसको किस तरह की रिस्पांसिबिलिटी दी जाएगी। किसका क्या रोल रहेगा और फिर क्या है कि देखिए पर्सनालिटी क्लेश तो सब जगह पर लगा ही रहता है। भाई भाई में भी होता है। भाई-बहन में भी होता है। तो यह लोग तो प्रत्येक तो एक-एक कहेंगे कि दिक्कपाल थे तो प्रत्येक गुरु भाई ठाकुर के जो सन्यासी शिष्य एक-एक आध्यात्मिक विभूति लेकर के प्रकट हुए हैं। तो तो यह लोग जब साथ में रहेंगे तो किसी ने कुछ कहा, किसने क्या किया वो सब लेकर के वो आपस में कुछ ना कुछ तो चलता ही रहेगा। तो इन सब चीजों को आपको किस तरह से मैनेज करना है? यह सब जो नॉर्म्स एंड प्रोसीजर्स होती है एक कोई भी इंस्टीट्यूशन का वह सब नॉर्म्स एंड प्रोसीजर एस्टैब्लिश करनी होती है। तो वह सब करने के लिए एक पक्का रिजॉल्व चाहिए। एक पक्का अपने दृढ़ निश्चय चाहिए कि नहीं कुछ भी हो जाए हम लोगों को आपस में चाहे कितना भी तकलीफ हो पैसा नहीं है तो भले ही चाहे कितना भी गरीबाई में जिए कितना ही पॉवर्टी में जिए किंतु कैसे भी करके हमको साथ में रहना है संघ होकर के रहना है हम लोगों में टूट नहीं पड़ जानी चाहिए हम लोगों में डिवीजंस नहीं हो जाने चाहिए हम लोगों में से कोई निकल कर के अलग से ना हो जाए। कैसे भी हो साथ में तो रहना ही रहना है। यह जो रिसोल्व है एक साथ में रहने का एक साथ में साधन भजन करने का एक साथ में संघ की स्थापना करके समाज कल्याण का कार्य करने का भविष्य में जब स्वामी जी यह उपदेश देंगे। यह महामंत्र देंगे। शिव ज्ञान जीव सेवा तो उसकी जो प्रस्तुति है वह उसके लिए एक पक्का रिजॉल्व होना चाहिए और इस रिजॉल्व को किस तरह से दो घटनाओं के माध्यम से हमको दिखता है। एक तो घटना है कि किस तरह से आठपुर में यह गुरु भाई गए थे। वहां पर एक दिन संध्या के समय सुंदर गांव है, छोटा सा गांव है। तो गांव का जो प्राकृतिक परिवेश तो आप समझ ही सकते हैं। और बंगाल के गांव देखे होंगे तो कितने वह ग्रीनरी से भरपूर है। वह यह जो छोटे-छोटे तालाब है, सब जगह पर रहते हैं। तालाब के भीतर में कमल के फूल खिले होते हैं। और आज की तरह ना ही नॉइज़ पोल्यूशन है, ना ही एयर पोल्यूशन है और ना ही यह साउंड यह जो लाइट पोल्यूशन है। अभी आज ही मैं पढ़ रहा था दिल्ली का एक्यूआई तो वह कितना बढ़ गया है। पता नहीं वहां के लोग किस तरह से रहते होंगे। तो यह एयर पोल्यूशन वगैरह को लेकर के आज के युग में शहर में रहकर के साधना करना भी कठिन है। किंतु वह आठपुर के दिन यह जो भारत में यह इंडस्ट्रियलाइजेशन और यह जो व्हीकल नहीं आए थे उसके पहले के दिन शांत पवित्र निर्मल वातावरण और संध्या के बाद में तो कोई चहलपहल भी नहीं होती है। तो एकदम सन्नाटा छाया हुआ है। यह जो सुंदर प्रशस्त आकाश है तारों से झगमग कर रहा है। उसके नीचे में बैठकर के इस तरह सुंदर आकाश के नीचे में बैठकर के यह गुरु भाइयों ने ध्वनि प्रज्वलित की है और जैसे ही ध्वनि प्रज्वलित हुई उन्होंने जब ध्यान करना मेडिटेशन करना प्रारंभ किया और उसमें से जब इन्होंने विश्राम लिया मेडिटेशन में तब स्वामी जी ने जीसस का जो जीवन है उसके बारे में बात करना शुरू किया कि किस तरह से उन्होंने अपने यह जो डिसाइपल्स थे उनके लिए अपना खुद का बलिदान दिया, सेल्फ सैक्रिफाइस किया। और फिर इतना ही नहीं यह सेंट पॉल वगैरह जो उनके जो एपोस्टल्स थे उन्होंने कितना कष्ट करके जीसस का जो मैसेज है पूरे पृथ्वी पर फैलाया। तो इस तरह से स्वामी जी की जो उद्दीपनामई वाणी में ये जो एक उत्साहवर्धक उनकी जो कहानी कहने की स्टाइल है उससे जब स्वामी जी ने बात करना शुरू किया तो सभी जो डिसाइपल्स थे ठाकुर के मोनेस्टिक डिसाइपल गुरु भाई वे लोग इतने प्रभावित हो गए इतने इंस्पायर हो गए कि वहीं पर धनि के सामने ही बैठकर के उन्होंने निश्चय किया कि हम लोग भी जीसस स के एपोस्टल्स की तरह ही ठाकुर का संदेश घरघर फैलाने का हम लोग यह निर्णय करते हैं, निश्चय करते हैं और संदेश को फैलाने के लिए तो आपको संघ होना होगा। अपना खुद का चरित्र है, कैरेक्टर है, एकदम मजबूत स्ट्रांग बनाना होगा। त्याग और तपस्या आपके जीवन में भरपूर रूप से होनी ही चाहिए। तो यह रेजोल्यूशन उन्होंने वहां पे आठपुर में किया और फिर दूसरे दिन जब सुबह हो गई उस समय उनको पता चला कि वह दिन था वह थी क्रिसमस ई 24 दिसंबर की संध्या थी। उस दिन उन्होंने यह सब रेजोल्यूशन लिया था। तो देखिए कि किस तरह से कोइंसिडेंट चलते हैं। तो यह आठपुर की फेमस घटना और उसके बाद में यह लोग वराह नगर मठ वापस आए आठपुर से जो कि एक गांव है कोलकाता से थोड़ा सा दूर है और यह वराह नगर मठ लोकेटेड है कोलकाता में। तो यह लोग कोलकाता वापस आए और फिर एक दूसरा इंपॉर्टेंट कार्य इनके सामने बाकी था। वह था सन्यास ग्रहण। आपने यह तो ठीक कर लिया है कि हां ठाकुर के उपदेश अनुसार हम जीवन धारण करेंगे। जीवन व्यतीत करेंगे और अपना जीवन यह लोक कल्याण के लिए सनातन हिंदू धर्म का संदेश फैलाने के लिए हम यूटिलाइज करेंगे। इतना तो आपने ठीक कर लिया है। किंतु फिर इसके लिए तो आपको हिंदू संस्कृति के अनुसार सन्यास ग्रहण करना होगा। तो सन्यास किस तरह से ग्रहण किया? इसके पीछे की क्या कहानी है? वह अभी हम देखते हैं आगे। तो यहां तक तो एक आउटलाइन हमारे सामने हो गया। अभी देखते हैं कि सन्यास के बारे में क्या होता है। तो गंभीरानंद जी महाराज की किताब है युगनायक विवेकानंद। उसमें से मैं थोड़ा सा पाठ करता हूं कि यह यहां से वापस आने के बाद में आठपुर से वापस आने के बाद में किस तरह से सन्यास विजा होम तक की घटनावली हुई है।
आंटपुर से वापस आने के बाद वराहनगर मठ में गुरुभाईओ का स्थायी निवास प्रारम्भ : january 1887
क्या कहते हैं गंभीरानंद जी महाराज? ए भाबे आठ पूरे एक सप्ताह काटया तहारा मठेबा कलकाता शसने फिरी लेन इस तरह से आठपुर में एक सप्ताह बिताने के बाद में गुरु भाई कोलकाता में अपनेपने घर वापस आए किस तरह से आठपुर में एक सप्ताह बिताया था तो वह तो हमने देख ही लिया कि वहां पे संध्या के बाद में ध्वनि प्रज्वलित करते थे उसके चारों ओर यह गुरु भाई बैठते थे जब ध्यान, साधन, भजन, ईश्वरीय वार्तालाप चलता था। ठाकुर के जीवन और उपदेशों को लेकर के चर्चा होती थी। और उनका खुद का भविष्य इन गुरु भाइयों का भी भविष्य और जो रामकृष्ण संघ अभी-अभी तो जो प्रारंभ हुआ है उसका भविष्य क्या होगा? यह सब डिस्कशन होता था। इसके बाद में यह लोग कोलकाता आए। नरेंद्रनाथ एक प्रथम कर्तव्य होईल आठ पूरे गहीत प्रतिज्ञा कार्य परिणत करते शकल के सहाज करा नरेंद्रनाथ का अर्थात कि स्वामी विवेकानंद का अभी कोलकाता आने के बाद में सर्वप्रथम कर्तव्य हुआ कि आठपुर में उन्होंने जो प्रतिज्ञा ग्रहण की थी उसको कार्य में परिणत करने के लिए सबको सहाय करना। आठपुर में क्या प्रतिज्ञा की थी कि ठाकुर के कहे अनुसार अपना आध्यात्मिक सन्यास जीवन का गठन करेंगे और ठाकुर का सनातन हिंदू धर्म का मैसेज जितना वाइड स्प्रेड हो उतना फैलाएंगे। तो यह प्रतिज्ञा को कार्यरत करें जिससे कि सब गुरु भाई इसके लिए नरेंद्र अभी सबको सहाय करने लगा है ए जन आरहा कि बे परिश्रम करते होलो ना यदि ओ पुरबे अवस्था अन्न रूप छिलो और आठपुर के आठपुर से आने के बाद में अभी नरेंद्रनाथ को अपने गुरु भाइयों को समझाने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी इससे पहले क्योंकि अवस्था अलग थी। इससे पहले क्या था? अगस्त 1886 में ठाकुर की महासमाधि हुई। इसके बाद में यह गुरु भाई जो कि अपना घर छोड़कर के ठाकुर को ठाकुर को तो कैंसर हुआ था। तो उनकी सेवा के लिए सब काशीपुर उद्यान बाटी में रह रहे थे। उद्यान ग्रुप में रह रहे थे। तो ठाकुर की महासमाधि के बाद में सब यंग लड़के अपने-अपने घर चले गए थे। जो अपना कोई अपना स्टडी कर रहा था तो वो स्टडी में वापस लग गए। मां-बाप जो कहते हैं मां-पिताजी इसके अनुसार किसी की शादी का कुछ तय होने लगा ना कि ऐसा सब कुछ जो कुछ भी है एक सामान्य लड़के का जीवन चलता है। उस तरह से वे लोग रहने का प्रयास तो कर रहे हैं। किंतु ठाकुर ने तो सबको घेरुआ वस्त्र काशीपुर में अपने हाथों से दे दिया था। तो घेरवा वस्त्र ठाकुर के ही हाथ से ग्रहण करना। इसका अर्थ है कि आप तो विधिवत रूप से सन्यास हो ही गया है। या तो फिर कहेंगे कि अंतर से तो आपका सन्यास हो ही गया है। बाहर से सिर्फ आपको यह अपने हिंदू शास्त्र के अनुसार कुछ विधियां करने की बाकी है। तो वही तो बात है और विधि क्या है? तो वो वीरजा होम। तो जब तक यह लोग आठपुर नहीं गए थे तब तक ठाकुर की महासमाधि से लेकर के आठपुर तक के जो दो-तीन महीने थे नरेंद्र को थोड़ा सा तकलीफ सहन करना पड़ा कि जब गुरु भाई अपनेपने घर चले गए हैं तो उनको सबको पकड़ पकड़ करके वराह नगर मठ में ले आना और उनको कहना कि भाई ठाकुर ने तो हमको गेरवा दिया है। हम लोग भीतर से तो सन्यासी हो ही गए हैं। तो घर जाकर के पढ़ाई लिखाई करना, भविष्य में जॉब करने का चिंता, शादी करने की चिंता यह सब आप लोग क्यों कर रहे हैं? आइए वराह नगर मठ में ही रहते हैं। यहीं पर साधन भजन का प्रवाह बहा देते हैं। तो आठपुर जाने से पहले स्वामी जी को थोड़ा बहुत गुरु भाइयों को पकड़ पकड़ करके लाना पड़ता था। किंतु नागपुर में यह जो रेजोल्यूशन उन्होंने लिया यह जो दृढ़ प्रतिज्ञा ली कि नहीं हम लोग अपना जीवन ठाकुर के उपदेश के अनुसार ही बिताएंगे तो फिर आठपुर से आने के बाद में अभी स्वामी जी को ज्यादा कोई तकलीफ सहन नहीं करनी पड़ी। एक के बाद एक सभी गुरु भाई यह सब यंग लड़के शरद है, काली है, शशि है यहां पे ये लाटू लाटू महाराज काली महाराज और तारकदा महापुरुष महाराज इन तीनों का तो वैसे ही बूढ़ो गोपाल सॉरी लाटू महाराज बूढ़ो गोपाल और तारकदा बड़ो गोपाल अर्थात कि अद्वैतानंद जी लाटू महाराज अर्थात कि अद्भुतानंद जी और तारकदा अर्थात कि महापुरुष महाराज शिव आनंद जी इन तीनों का कोई घर नहीं था तो बोलकर के वे लोग तो पहले से ही वराह नगर मठ में रहते थे किंतु इनके अलावा जो बाकी जो गुरु भाई थे शरद है शारदानंद ंद जी है ये शशि है रामकृष्णंद जी काली है यह अपने अभेदानंद जी वगैरह वगैरह एक के बाद एक हरि महाराज है तुरियांद जी वे लोग आकर के वराह नगर मठ में रहने लगे जो 16 डायरेक्ट डिसाइपल है उसमें से सिर्फ विज्ञानानंद जी जो है वह वराह नगर मठ में नहीं रहे हैं। उन्होंने स्वामी जी अमेरिका से जब वापस आए तब उन्होंने रामकृष्ण मठ में योगदान दिया था। रामकृष्ण मठ में प्रवेश किया था। तो उनको छोड़कर के बाकी जितने भी गुरु भाई हैं एट वन टाइम और अनदर उन्होंने वराह नगर मठ में निवास किया है। तो अब जब यह आठपुर से वापस आ गए तो वैसे ही सभी लोग अपने से ही आकर के मठ में नियमित रूप से रहना शुरू कर दिए। आठ पुर पर त्यागाकांक्षा तान्वित होइया अवस्था अन्य रूप धारण कर लो आठ पुर के बाद में त्यागाकांक्षा त्याग की आकांक्षा डिजायर फॉर रनाउंसिएशन वो त्वरान्वित हो गई वो उसने और गति से वेग पकड़ लिया और अवस्था अन्य रूप हो गई अर्थात कि आठपुर जाने से पहले नरेंद्र को गुरु भाइयों को पकड़ पकड़ पकड़ करके लाना पड़ता था। अभी वह अपने से ही आकर के मठ में रह रहे हैं। क्रमे शशि बाबूराम निरंजन राखाल शरद शारदा और सुबोध मठी बास करते लाले क्रम क्रमे अर्थात कि धीरे-धीरे करके कुछ समय के भीतर में शशि स्वामी रामकृष्णानंद जी पाबूराम स्वामी प्रेमानंद जी निरंजन स्वामी निरंजनानंद जी राखाल स्वामी ब्रह्मानंद जी शरद स्वामी शारदानंद जी शारदा स्वामी त्रिगुणातीतानंद जी और सुबोध स्वामी सुबोधानंद जी भविष्य के वह सब ने मठ में ही निवास करने का प्रारंभ कर लिया। कोयक माश पर वृंदावन होते प्रत्यागत लाटू जोगदान कर लेन हरि रो आशते बिलंब होलो ना। कुछ समय के बाद में जब उस समय ठाकुर की महासमाधि के बाद में मां वृंदावन गई थी तो मां जब मां के साथ में यह काली महाराज लाटू महाराज जो थे वह भी गए थे। तो जैसे ही मां वृंदावन से वापस आई तो मां के साथ में वापस आए हुए लाटू महाराज भी वराह नगर मठ में रहने लगे। हरि रो आशीते बिलम होलो ना हरि अर्थात स्वामी तुरियनंद जी उनको भी आने में देरी नहीं हुई। श्री मां बस ते कुलाबोन होइते फिरिया आशीले जोगिंद ओ मठ जीवन आरंभ होइलो एक साल के बाद में जब मां वापस आई तो योगिन महाराज भी जो उनके साथ में गए थे तो योगिन महाराज को भी योगिन महाराज अर्थात स्वामी योगानंद उन्होंने भी मठ में आकर के रहना प्रारंभ कर दिया गंगाधर 1887 ख्रिस्ताब्दे फरवरी मासे गृहत्याग कोरिया हिमालय और तिब्बत भ्रमण बाहिर होया छिलेन सुतान त स्थाई भाबे मठे आशिले 1890 ख्रिस्ताब्दे मध्य भाग गंगाधर महाराज अर्थात कि स्वामी अखंडानंद जी 1887 के फरवरी महीने में घर त्याग करके हिमालय और तिब्बत भ्रमण में बाहर निकले थे। इसलिए उनको नियमित रूप से मठ में आने का रहने का चांस मिला। 1890 ख्रिष्टाब् के मध्य भाग में। देखिए गंगाधर महाराज स्वामी अखंडानंद जी का यह जो तिब्बत और तिबेट तिबेट और हिमालय की भ्रमण का जो वर्णन है उन्होंने अपने हाथों से लिखा है और बड़ा ही सुंदर वर्णन है और हमको यह भी पता है कि उस स्थान हिमालय और तिबेट उन्होंने इतना सुंदर रूप से एक्सप्लोर किए थे कि स्वामी जी स्वयं जब हिमालय जाना चाहते थे तो उन्होंने गंगाधर महाराज को कहा था कि तुम वापस आओ। आओ हम दोनों साथ में जाएंगे। तुम मुझे जितने भी तीर्थ स्थान है उसका भ्रमण करवाना। तो गंगाधर महाराज इसलिए वापस आए थे स्वामी जी को साथ में ले जाने के लिए। और इसलिए यहां पर लिखा है वो मठ में आकर के रहने कब लगे? 1890 में। 19 1890 में। किंतु जो आए थे वो क्यों आए थे? तो वो स्वामी जी को ले जाने के लिए आए थे। तो इस तरह से देखिए कि सभी गुरु भाई है एक के बाद एक मठ में आकर के रहने लगे आर सर्वशेषे अनेक परे स्वामी विवेकानंदर अमेरिका होते प्रत्यावर्तने परे आशिया छिलेन हरि प्रसन्न और सबसे आखिर में स्वामी जी के अमेरिका से रिटर्न आने के बाद में प्रत्यावर्तन के बाद में आए थे हरि प्रसन्न महाराज स्वामी विज्ञानानंद जी महाराज आर एक जनेर नाम करा आवश्यक और एक व्यक्ति का नाम यहां पर लेने की आवश्यकता है तनी तुलसी उनका नाम है तुलसी इनहीं श्री रामकृष्ण के एकाधिक बार देखिया था कि ले ओ घनिष्ठ भावे मिश नाई उन्होंने श्री रामकृष्ण को एक से ज्यादा बार दर्शन किया तो था किंतु ठाकुर के साथ में कहीं उनका नजदीक का संपर्क नहीं रहा घनिष्ठ संपर्क नहीं रहा। ठाकुर के अंतरंग में नहीं थे। ठाकुर के बहिरंग में थे। और इसीलिए वह अपने को ठाकुर का सेज जन निजे के श्री रामकृष्ण शिष्य ना बोलिया। ब्रह्म स्वामी विवेकानंद शिष्य रूपे परिचय देते ही गर्व अनुभव करते और इसीलिए अपने को ठाकुर का शिष्य न बोलकर के वह अपने को स्वामी विवेकानंद के शिष्य के रूप में परिचय देने में ही गर्व अनुभव करते थे। अवश्य शेष बोनी ए मत परिवर्तन करिया श्री रामकृष्ण शिष्य रूपे आत्म परिचय दीतेन अवश्य अपने आखिरी समय में उन्होंने अपना यह मत परिवर्तन करके अपने को ठाकुर के श्री रामकृष्ण के शिष्य के रूप में परिचय देना प्रारंभ किया था। देखिए तुलसी महाराज की भी एक कहानी है। आप लोगों में से जो रामकृष्ण संघ के जो डिवोटीज है शायद उन्होंने सुना भी होगा। तुलसी महाराज को साउथ इंडिया में भेजा गया था और उन्होंने वैसे देखिए तुलसी महाराज का उल्लेख जो है वो इनका कथामृत में भी आता है इनका उल्लेख और बादबाद में भी जब वराह नगर मठ में भी उनकी तपस्या और उनका जो डेडिकेशन है उसके बारे में भी उल्लेख है एक सुंदर घटना है वह आई थिंक आलम बाजार मठ की है शायद एक बार वहां पर धरती हुआ तो सभी जो गुरु भाई है वे लोग दौड़कर के बाहर आ गए। किंतु फिर देखिए कि ठाकुर के अस्थि है। ठाकुर का यह जो व्यवहृत वस्त्र वगैरह है वो तो मठ के भीतर में ही है। तो यह तुलसी महाराज वो जो अस्थि वगैरह को लेकर के अपने हनुमान महावीर हनुमान की तरह वे लोग उस वो उसको लेकर के बाहर आए थे। तो यह सब कहानियां है उनके बारे में और यदि अपने को स्वामी जी के ही शिष्य के रूप में पहचान देते रहते आखिर तक तो उनका एक बहुत बड़ा नाम होता। आज अपने संघ में जिस तरह से स्वामी सदानानंद गुप्त महाराज का नाम है इन सबका जो जिस तरह से स्वामी जी के शिष्यों का नाम है वैसा ही तुलसी महाराज का होता। किंतु अनफॉर्चूनेटली आखिर आखिर में उनको ऐसा लगना शुरू हुआ कि मैं स्वामी विवेकानंद को क्यों अपना गुरु मानूं जबकि मैंने ठाकुर का स्वयं दर्शन किया था तो वह अपने को ठाकुर के शिष्य के रूप में पहचानने लगे और स्वामी जी के गुरु स्वामी जी के शिष्य के रूप में नहीं अपना परिचय स्वामी जी के गुरु भाई के रूप में देना शुरू कर दिया तो इसके लिए फिर आखिर में हमारे संघ में से इनके बारे में अभी कोई बहुत अच्छी धारणा नहीं है। तो क्या है देखिए कि यह अहंकार जब आता है तो किस तरह से आप अपने को एक ऐसी परिस्थिति में पाते हैं कि आपकी साधना है, आपकी तपस्या है, आपकी निष्ठा है, सब कुछ जैसे कि यह अहम जो है वह खा लेता है। देखिए कि यह जो 16 गुरु भाई है ठाकुर ने कहा था कि आपको नरेंद्र को अपने लीडर के रूप में अपने नेता के रूप में स्वीकार करना है। तो यह स्वामी जी के अलावा जो 15 गुरु भाई थे उन्होंने स्वामी जी को अपने नेता के रूप में स्वीकार अवश्य किया था। बोलकर के ही यह जो 16 गुरु भाई है रामकृष्ण संघ का जो फाउंडेशन है वह डाल पाए थे। अभी यह जो तुलसी महाराज है उन्होंने यदि ऐसा ठीक कर लिया एकाएक कि मैं तो ठाकुर का शिष्य हूं स्वामी जी का नहीं मैं तो स्वामी जी का गुरु भाई हूं स्वामी जी का शिष्य नहीं बोलकर के जो अहंकार आन पड़ा तो संघ की जो बाद की जो भावधारा है उससे वो अलग हो गए। तो यदि इस तरह का अहंकार ठाकुर के गुरु शिष्यों में कहीं आ जाता यह 16 गुरु भाई में से किसी के मन में आ जाता कि मैं नरेंद्र को क्यों अपने लीडर के रूप में स्वीकार करूं। मैं खुद का कुछ कम हूं क्या? मैं खुद एक बहुत बड़ा साधु हूं। मैं खुद तो ठाकुर का एक जेनुइन डिसाइपल हूं। मोनेस्टिक डिसाइपल हूं। ठाकुर का अंतरंग हूं। ठाकुर ने स्वयं अपने हाथों से मुझे गिरवा वस्त्र प्रदान किया है। तो मैं क्यों नरेंद्र को अपना लीडर मानूं? मैं क्यों उसके अंडर में रहूं? क्यों नहीं मैं एक अपना संघ अलग से स्थापित करूं। ऐसा यदि घमंड किसी के मन में आ गया होता तो यह जो वराह नगर मठ जो कि बाद में सु विस्तृत होकर के रामकृष्ण मिशन और रामकृष्ण मठ रूपी यह जो ट्विन ऑर्गेनाइजेशन है उसमें यह जो परिणत हुआ वह उस समय नहीं होता या तो फिर आज हमारा जो प्रभाव है वह प्रभाव नहीं रहता। देखिए यह तो जग जाहिर है कि अभेदानंद जी ने अपना एक अलग इंस्टट्यूशन प्रारंभ किया था। किंतु वो कब किया था? यह जो अभेदानंद अभेदानंद जी बेलूर मठ से बिछड़े उस समय बेलूर मठ का जो फाउंडेशन है वो दृढ़ रूप से लग गया था। उसके बाद में तो वो सेपरेट हुए। ठाकुर कहते हैं ना पौधा जब छोटा होता है तो चारों ओर से उसको फेंसिंग करके रखना होता है। उसको प्रोटेक्शन में रखना होता है। जब पौधा बड़ा हो जाए वृक्ष में परिणत हो जाए उसके बाद में आपको फेंसिंग की तो जरूरत नहीं ही है। ऊपर से यदि एक चैन से एक हाथी को बांध दे तो भी हाथी भी इस पेड़ को नहीं गिरा पाएगा। तो वैसे ही वराह नगर मठ में यह पौधा छोटा था। उसको गुरु भाइयों के भीतर में एक तरह का स्ट्रांग बॉन्ड आवश्यक था। ब्रदरहुड आवश्यक था। उस समय इन लोगों के भीतर में फुटफाट होती तो पता नहीं भविष्य में क्या होता। तो वह जो समय था वह कैसे भी करके संभाल लिया गया। इन लोगों का जो बॉन्ड था आपस में ये जो भालो भाषा स्नेह का जो सूत्र जिसके भीतर में ठाकुर ने इनको बांधा था वह वराह नगर मठ के पीरियड के दौरान तो अकबंद रहा बोलकर के अपने रामकृष्ण मठ और मिशन रूपी ट्विन इंस्टीट्यूशन है। उसका फाउंडेशन बड़ा ही स्ट्रांग आधार पे रखा गया है। उसके बाद में ये 1920 1930 वो सब जो बाद का जो समय है जबकि संघ सुविस्तृत हो गया था। उस पेड़ में परिणत हो गया था। वो छोटे से पौधे में से बड़ा होकर के इस तरह के पेड़ में परिणत हो गया था कि अभी आप हाथी को भी चैन से बांध ले तो हाथी भी इस वृक्ष को नहीं तोड़ पाएगा। उस वृक्ष के समान हो गया था। तब कहीं जाकर के अभेदानंद जी संघ से सेपरेट हुए थे और तभी कहीं जाकर के तुलसी महाराज ने अपना यह जो दुर्बुद्धि है उसका प्रदर्शन करना शुरू किया था। ठाकुर की कृपा से ना ही तुलसी महाराज ना ही अभेदानंद जी ना ही और किसी ने वराह नगर मठ का जो पीरियड है उसके दौरान उन्होंने नरेंद्र का जो लीडरशिप है वह संपूर्ण रूप से स्वीकार किया था। बोलकर के ही रामकृष्ण संघ आज इतने स्ट्रांग फाउंडेशन पर खड़ा है।
गुरुभाईओ ने विधिवत संन्यास ग्रहण करने के लिए किये हुए विरजा होम की कहानी
जहां हो जो भी है एक प्रश्न ए अभी प्रश्न यही है। त्यागी भक्त वृंदो अनुष्ठानिक रूपे सन्यास लोलेन कोबे एवं की रूपे यह त्यागी भक्त वृंद है। उन्होंने अनुष्ठानिक रूप विधिवत रूप से सन्यास लिया कब और किस तरह से आठपुर से आने के बाद में आठपुर में अपना जो रेजोल्यूशन है पक्का करने के बाद में देखिए कि यह जो तीन घटनाएं हैं अपने संघ के इतिहास में सुस्पष्ट रूप से तीनों घटनाओं का एक प्राधान्य हमको दिखता है कि यदि हम इंस्टीट्यूशनल अपना जो ऑर्डर है उसका हिस्ट्री देखते हैं तो हमको तीन घटनाएं कौन सी दिखती है? एकदम फंडामेंटल यदि देखा जाए तो ठाकुर ने गुरु भाइयों को गेरुआ वस्त्र प्रदान किया था काशीपुर में और गेरुआ वस्त्र देकर के उनको कहा था साथ में रहना है। साथ में साधना करनी है और नरेंद्र की लीडरशिप को एक्सेप्ट करना है। यह ऑर्डर ठाकुर ने इन गुरु भाइयों को दिया था। तो वह हो गई सर्वप्रथम घटना। उसके बाद में हो गया यह आठपुर पर्व कि वो 24th दिसंबर की इवनिंग को इव को इवनिंग नहीं इव 1886 24 दिसंबर उस दिन की संध्या के बाद में धनि प्रज्वलित करके गुरु भाइयों ने ठीक किया कि वह जो गेरुआ वस्त्र ठाकुर से हमको मिला था इसके बाद में अभी हम अपना जीवन सहीसही में ठाकुर के ही कहे अनुसार बिताएंगे तो वह जो पक्का रेजोल्यूशन बना वि इज अ सेकंड इंपॉर्टेंट इवेंट और फिर यह विजा होम करके विधिवत सन्यास ग्रहण करना यह हो गई थर्ड मोस्टेंट इवेंट। यह तीन इवेंट है कि रामकृष्ण संघ का जो यह फाउंडेशनल पीरियड जो है उसको डिफाइन करती है। तो ऑलरेडी हमने आठपुर वाली घटना देख ली। वो गेरुआ जब मिला उसकी घटना क्या हुई वह हम उस समय डिस्कस करेंगे जब हम ठाकुर का लाइफ डिस्कस करेंगे तो उसको स्किप कर दिया है किंतु यह जो थर्ड मोस्टेंट इवेंट है विजा होम करके गुरु भाइयों ने सन्यास ग्रहण किया तो क्या किया कैसे किया उसका जो विवरण हमको गंभीरानंद जी देते हैं उसका अभी हम पाठ करेंगे तो अभी यह जो पाठ है उसको हम कल कल से प्रारंभ करते हैं। आज यहीं तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु