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Swami Vivekananda My Plan Of Campaign ·

मेरी क्रान्तिकारी योजना : स्वामी विवेकानन्द : भारतीय व्याख्यान || 7 jul 2025

Invocation

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का माय प्लान ऑफ कैंपेन हमने पिछली बार देखा ऑलरेडी अ इस लेक्चर को हमने पॉइंट्स में डिवाइड कर दिया है और सिक्स 16 पॉइंट्स हमने ऑलरेडी कवर किए हैं। 17th पॉइंट जो है वहां से इस बार हम स्टार्ट करेंगे। दिस इज क्लासिक विवेकानंद। जैसे हम कंप्लीट वक्स पढ़ते हैं या तो इन जनरल स्वामी जी के बारे में हमारी जो कही सुनी जो मान्यताएं सब है वो कहां से आती है? वो कौन से स्वामी जी के कोटेशंस है जिसको कि हम यूनिक टू स्वामी जी ऐसा कह सकते हैं। स्वामी जी जब आत्मन के बारे में बात करते हैं उपनिषद की ग्रेटनेस के बारे में बात करते हैं। इंडियन कल्चर के बारे में तो वह सब तो दूसरे भी साधु महापुरुष संत या तो फिर और भी जितने भी फिलॉसोफर्स हैं उन्होंने वही बातों को काफी बार दोहराया है भारत में। उपनिषद की महानता, आत्मन की महानता या तो फिर आत्मन का एक सर्वोच्च अपनी आध्यात्मिक सिद्धि है। यह सब बातें अपने कोई भी आध्यात्मिक धार्मिक ग्रंथ खोल के देखेंगे आपको मिल जाएगी। स्वामी जी का जो एक यूनिक व्यू पॉइंट है एक स्पिरिचुअलिटी को किस तरह से प्रैक्टिकल करना क्योंकि जो बात वैसे जैसे हमारे लास्ट क्लास में हमने इसको डिस्कस किया था कि प्रैक्टिकल स्पिरिचुअलिटी ये कांसेप्ट अपने आप में नया नहीं है। जितना पुराना ह्यूमन सिविलाइजेशन है उतना ही पुराना यह प्रैक्टिकल स्पिरिचुअलिटी है।

उत्क्रांती (evolution) वही लक्षणों को विकसित करता है जिसकी हमें आवश्यकता है. आध्यात्मिकता भी इसी तरह प्रैक्टिकल है.

इनफैक्ट ये स्पिरिचुअलिटी प्रैक्टिकल ही है। थ्योरेटिकल कभी हो ही नहीं सकती। दिस इज अ कंट्राडिक्शन इन टर्म्स। जैसे कि इवोल्यूशन क्या कहता है? मनुष्य के या तो फिर यह अह ऑर्गेनिज्म है। कोई भी जीवंत ऑर्गेनिज्म है। वह कोई भी एक ट्रेट या तो कोई भी एक लक्षण तभी डेवलप करता है, तभी इवॉल्व करता है जब उसकी आवश्यकता आन पड़ती है। अब जैसे कि हम पानी में जब तक रहते थे, हमको मछली की तरह वह पानी में से ऑक्सीजन लेने की जरूरत थी। जैसे ही हमने इवोल्यूशन की यह जो लंबी यात्रा है पानी में से जमीन पर आ गए तो हमको हवा में से ऑक्सीजन लेने की जरूरत पड़ी। तो जब तक पानी में थे तो पानी में से डिस्टिल कैसे करें ऑक्सीजन को यह अपना बायोकेमिस्ट्री था। जब जमीन पर रह रहे हैं तो हवा में से ऑक्सीजन को कैसे डिस्टिल करें? वो नया तरह का बायोकेमिस्ट्री डेवलप हुआ। अभी यदि हम लोगों को जंगल में रहते थे, शिकार करने की आवश्यकता थी, तब हम शारीरिक रूप से बड़े ही मजबूत थे, बड़े ही फिजिकली स्ट्रांग थे। हमारी उस समय की जो पुरानी मनुष्य सभ्यता है या तो फिर कहेंगे कि ह्यूमन स्पीशीज जो पहले की जो स्पीशीज है होमोस्पीज ये होमोसेपियंस तो लेटेस्ट है। उससे पहले जो मनुष्य के पहले जो प्रजातियां थी होमो इरेक्टस है। होमोहबिलिस है। उन सब की हड्डियां देखेंगे तो इतनी मोटी-मोटी दिखती है। इतनी स्ट्रांग दिखती है। क्यों? क्योंकि जंगल में रहना है। शिकार करके आपको जीवन निर्वाह करना है। किंतु जैसे-जैसे एग्रीकल्चर की स्थापना, एग्रीकल्चर का विकास हुआ, हम शहर या गांव बसाते गए, सिविलाइजेशन बसाते गए, वैसे-वैसे ही अभी शारीरिक स्ट्रेंथ की जगह मानसिक इंटेलेक्चुअल स्ट्रेंथ की आवश्यकता पड़ी। तो फिर हमारा ब्रेन जो है उसने डेवलप होना शुरू हुआ और हमारी हड्डियां है वह थोड़ी कमजोर होती गई या तो कहेंगे कि हड्डियों की शक्ति पहले की जो होमो स्पीशीज थी उससे कमजोर है। तो ये इवोल्यूशन उसी चीज को प्रकट करता है जिसकी आवश्यकता होती है। जो चीज की आवश्यकता नहीं है वो चीज इवोल्यूशन अदृश्य कर देता है। धीरे-धीरे करके फेज़ आउट कर देता है। जैसे कि बंदर थे, बंदर की पूंछ थी। अभी क्या है? एक पेड़ से दूसरे पेड़ के ऊपर में जंप लगाना है। तो, अभी दो हाथ है, दो पैर है। उससे भी डाली पकड़नी पड़ती है। ब्रांच वो पेड़ की और कभी-कभी पूंछ से भी पकड़नी पड़ती है। जैसे कि 100% श्योरिटी रहे कि आप वैसा एक डाल से दूसरी डाल जंप लगाते गिर ना जाए। तो अभी हमने जमीन पर चलना शुरू कर दिया तो पूछ की आवश्यकता नहीं रही। यह जो चार पैर वाले जो पशु है उनको पूंछ की जरूरत पड़ती है क्योंकि मक्खी वगैरह यदि उनके शरीर पर बैठेगी तो उनके तो हाथ नहीं है। चार पैर ही है। घोड़ा है, गाय है, कुत्ता, बिल्ली है। वह किस तरह से मक्खियों को भगाएंगे या इस तरह से करेंगे तो उनको पूछ की जरूरत पड़ती है। किंतु जैसे हमने हाथ डेवलप कर दिया। जैसे जमीन पर शुरू चलना शुरू कर दिया तो धीरे-धीरे करके पूंछ अदृश्य हो गई। तो इवोल्यूशन उसी चीज को रखता है जिस चीज की आवश्यकता है और जो ट्रेट या तो जो भी अंग है हमारा जिसकी आवश्यकता नहीं रहती है उसको धीरे-धीरे करके फेज आउट कर देता है। यह एक एक्सपेरिमेंट के बारे में पहले भी हमने एक बार डिस्कस किया था कि एक जंगल में पेड़ के ऊपर में वह जो मोस होती है, मोस यानी कि फंगस का एक प्रकार वह लगा रहता है। तो अभी क्या है कि उसका कलर कैसा है? तो वह ग्रीन जैसा कलर है। क्यों? क्योंकि उसको तो अपने जो शिकारी पशु होते हैं उससे बचना है। तो उसको एक केमोफ्लेज चाहिए। अपना जो बैकग्राउंड है उसमें उसको मिक्स हो जाना है। तो जंगल में जनरली यह ग्रीनरी होती है तो इसका कलर भी ग्रीन था। अभी कुछ समय के बाद में ऐसा हुआ कि उस जंगल में आग लग गई। अभी के पूरा जो आग लगती है तो ग्रीनरी तो जल जाती है। पूरा वह जो मिट्टी का कलर हो जाता है। राख का कलर हो जाता है। तो यह जो मोस है विदिन कुछ ही समय के भीतर में उसने अपना कलर चेंज करके ग्रीन की वजह राख का कलर कर दिया। क्योंकि उसको तो कैसे भी करके सर्वाइव करना है। चारों ओर राख गिरी है वहां पर यदि इसका ग्रीन कलर होगा तो उसके जो खाने वाले जो होंगे उसको तो इमीडिएटली दिख जाएगा। तो उसका कलर उसके बैकग्राउंड के साथ में मैच हो जाता है। तो इवोल्यूशन कभी-कभी लॉन्ग पीरियड ऑफ टाइम काम करता है हजारों हजारों सालों पे और कभी-कभी इस तरह से इंस्टेंटली भी कार्य करता है। तो देखिए कि स्पिरिचुअलिटी या आध्यात्मिकता वो डेवलप हुई है तो उसका अर्थ यही है कि उसकी कोई प्रैक्टिकल आवश्यकता थी। वह कभी भी थ्योरेटिकल नहीं हो सकती है। थ्योरेटिकल कब होती है? जैसे कि हमने पिछली बार

किसी भी सभ्यता के विकास के पीछे प्रेरक शक्ति होती हैं सामाजिक संस्थाएं (institutions)। संस्थाओं की नींव है धर्म।

आर्नोल्ड टोयनबी के बारे में चर्चा की थी। उसका कुछ-कुछ थ्यरी खास करके इस फील्ड में काफी आप कहेंगे कि रिलेवेंट है उसके ऑब्जरर्वेशंस। तो उसका क्या कहना है कि यह जो यूनिवर्सल जो रिलीजन होते हैं उसमें एक बार करप्शन प्रवेश होता है तब धीरे-धीरे करके वो जो पूरी सिविलाइजेशन है उसके भीतर में यह करप्शन प्रवेश करता है। जब तक ये रिलीजन है, जब तक ये धर्म है, वो प्योर है, तब तक वो सिविलाइजेशन वो भी स्ट्रांग होगी और जैसे धर्म में करप्शन प्रवेश हुआ, वैसे ही उस सिविलाइजेशन विनाश की ओर जाना शुरू होगी। तो यहां पे भी भारत में एक समय था कि धर्म बड़ा ही प्रैक्टिकल था। डे टू डे लाइफ में वह फैला रहता था। किंतु एक समय ऐसा आया कि धर्म के नाम पर अनाचार दुराचार बढ़ गया। लोगों को यह कास्ट यह सब डिवीजन यह जो अपने स्किन का कलर लैंग्वेज इस तरह से वो रेस इस तरह से वो सब डिवीजन होना शुरू हुआ। तो जैसे एक्चुअली कोई भी एक सिविलाइजेशन खड़ी होती है। इसके पीछे में एक यूनिफाइंग फोर्स चाहिए। यह यूनिफाइंग फोर्स क्योंकि कोई भी एक देश है, कोई भी एक राष्ट्र है, कोई भी एक समाज है, उसका सबसे बड़ा स्ट्रेंथ क्या है? वो है यूनिटी। यदि यूनिटी नहीं होगी तो वो समाज कभी खड़ा ही नहीं होगा। अब जैसे कि हम अब प्री एग्रीकल्चर युग में जब हम जी रहे थे ट्राइबल अपना जो युग चल रहा था उस समय वो छोटी-छोटी ट्राइब है हमेशा आपस में लड़ती रहती है या तो फिर आपस में कंपटीशन करती रहेगी। अभी किंतु जब तक ये ट्राइब्स जो है वो इकट्ठी नहीं होगी तब तक क्या होगा कि वे लोग एक एक गांव की सिटी स्टेट की रचना कर ही नहीं पाएंगे। आपको यूनाइटेड होना होगा। एक साथ में आना होगा। आपको अपने ऊपर में एक इंस्टीट्यूशन खड़ा करना पड़ेगा। वह इंस्टीट्यूशन ठीक करेगा। आर्बिट्रेच करेगा। अभी दो ग्रुप है, दो ट्राइब है। उसमें एक तरह से बात हुई। कंपटीशन लगा कि यह जो जंगल है, इसमें कौन शिकार करेगा? यह मेरा टेरिटरी है। यह मेरा टेरिटरी है। वो जो शेर होता है ना शेर का एक टेरिटरी होता है। वो उस टेरिटरी में उसका जो एरिया है उसमें वही शेर शिकार करेगा। और कोई शेर आ जाएगा तो वह दोनों शेर लड़ना शुरू करेंगे। यह कुत्तों में भी आजकल हम देखते हैं। यह कुत्ता जो है यह उसका एरिया है। जैसे मैं आश्रम में कई बार देखता हूं कि यह आश्रम में यह कुत्ता रह रहा है। अभी दूसरा कहीं से आ गया तो वो जो आश्रम वाला कुत्ता है उसके पीछे बड़ा जोर-जोर से भौक करके उसको भगाने का प्रयास करेगा। क्यों? क्योंकि यहां पे वो जो एक्स्ट्रा जो जो लेफ्ट ओवर जो होता है खाना वो खाना वो खाएगा। अभी दूसरा कुत्ता यदि आ जाएगा तो उसमें वो हिस्सा लगाएगा तो वो तो उसको चलेगा नहीं। यानी यह बहुत बार हमने यह कुत्तों की फाइट देखी होगी। कोई गली है, कोई स्ट्रीट है वहां पर नया कुत्ता जैसे ही आ गया तो उस गली वाले सभी कुत्ते जोर-जोर से भौक करके उसको भगा देंगे। क्यों? क्योंकि उस गली में जो कुछ भी खाना फिर यह शेल्टर वगैरह मिलता है उसके ऊपर में यह लोग अधिकार करके बैठते हैं। तो अभी देखिए कि यदि अलग-अलग ग्रुप होंगे तो उनके पास में युद्ध के अलावा और कोई ऑप्शन ही नहीं है। महाभारत का युद्ध क्यों हुआ? यह कौ पांडवों का राज्य कौरवों ने हड़प लिया और कैसे भी करके जुआच वो जो कहते हैं ना वो उसमें वो गैंबलिंग में वो जीत गए। अभी गैंबलिंग में जीत तो गए किंतु जब पांडवों की जो बारी आई अभी वह उनका वह जो जितना भी उनका प्रॉब्लम था वह सॉल्व करने के बाद में अब राज्य वापस चाहिए तो राज्य वापस कैसे मिलेगा? कौरव कहेंगे हम राज्य वापस नहीं देंगे। भगवान कृष्ण स्वयं गए वहां पर वो एज ए एंबेसडर पांडवों के तो वो दुर्योधन क्या कहता है जो सोई होती है सुई जहां पे यदि जमीन के ऊपर में सुई रख दे तो जितनी जमीन वो सुई लेगी खड़ी रहने के लिए इतनी सी जमीन तो उतनी सी जमीन भी हम वापस नहीं देंगे तो फिर वह युद्ध करना पड़ा तो अभी क्या होता है यदि एक इंस्टीट्यूशन होता है अपने सर के ऊपर में सभी लोग यूनाइट होते हैं तो यह इंस्टीट्यूशन ठीक करता है कि किसके हिस्से में क्या रिसोर्स आएंगे। किसके भाग्य में किसका क्या एबिलिटी है, किसका क्या स्किल है, किसका क्या नेसेसिटी है, उसके अनुसार रिसोर्स हम एलोकेट करेंगे। इस इस तरह से नहीं कि जिसका लट्ठी उसका भैंस जैसे वह हिंदी में कहावत है। जो स्ट्रांग है वह रिसोर्स खींच लेगा। युद्ध करके भी ले लेगा, फाइट करके भी लेगा। लोगों का दमन करके, लोगों का शोषण करके भी ले लेगा। ऐसा नहीं। यह देखिए कि यह सेकंड वर्ल्ड वॉर जब तक यह फर्स्ट वर्ल्ड वॉर और उसके पहले भी यह ब्रिटिश या तो फिर यह जर्मन या तो फ्रेंच ये जैसे-जैसे वो एक देश डेवलप हुआ। ब्रिटेन का ही सबसे बड़ा उदाहरण है कि उन्होंने भारत पे कैसे भी करके डिवाइड एंड कंकर यह सब नीति अपना करके भारत पे अपना कब्जा कर लिया। फिर भारत में वह जो उस समय का मुगल राजा है उसके पास में से यह उन्होंने यह ले लिया ऑथॉरिटी कि हम इस एरिया का टैक्स कलेक्ट करेंगे और फिर टैक्स कलेक्ट करके वहां की मैनचेस्टर की मील वहां का जो कपड़ा है या तो फिर ब्रिटेन में तो इंडस्ट्रियल वो जो रेवोल्यूशन आ चुका था वहीं की फैक्ट्री में जो कुछ भी प्रोड्यूस होगा हम यहां पे भारत में बेचेंगे। बीच में कोई टेरिफ लगेगा नहीं और भारत में जो इंडीजीनियस जो कुछ भी प्रोडक्शन होता है उसको यह लोग बंद कर देंगे। वो जैसे हमको पता है वो जो सिल्क के वो जो कारीगर थे सिल्क बुनने वाले उनके हाथों के अंगूठे काट दिए थे। यानी कि भारत में इतना अच्छा सिल्क प्रोडक्शन क्लोथ प्रोडक्शन ना हो। तो ये जो भयानक अत्याचार ब्रिटिश लोगों ने भारत पे किया तो ऐसी ही रीति चली आ रही थी। किंतु सेकंड वर्ल्ड वॉर में जो भयानक हत्याकांड हुआ, न्यूक्लियर वेपन डेवलप हुए, तो फिर वह अमेरिका के प्रेसिडेंट और ऐसे कुछ बुद्धि म जिन लोगों में थोड़ा बहुत अकल है उन्होंने कहा कि नहीं यूनाइटेड नेशन की रचना की जाए। एक देश दूसरे देश पर आक्रमण करेगा तो सभी देश मिलकर के उसको सेंक्शन करेंगे। अभी ये ऑथॉरिटी यूनाइटेड नेशन की कितनी चलती है, कितनी नहीं चलती है वो तो हम न्यूज़पेपर देख के समझते ही है। किंतु व्हाट काउंट्स इज द आईडिया? ये आईडिया तो डेवलप हुआ कि हां एक हायर इंस्टीट्यूशन होना चाहिए। और ये इंस्टीट्यूशन है उसके अंडर में जितने भी प्रजाएं हैं, जितने भी ग्रुप है, जितने भी ये सोसाइटल एलिमेंट्स हैं, उन सब में ये आर्बिट्रेज करेगा। जब तक यह इंस्टीट्यूशन नहीं होगा तब तक हम यह बार्बेरियन के लेवल से यह जंगली लेवल से यह जंगली प्रजा के लेवल से हम ऊपर ही नहीं आएंगे। पशु जो पशुवत जो हमारी अवस्था होती है उससे हम ऊपर ही नहीं आएंगे। देखिए एक पशु और एक

धर्म की और बढ़ने का पहला कदम है प्रत्याहार: इन्द्रियों के विषयों को अंतर्मुखी करना

मनुष्य या तो इंसान दो बहुत डिफरेंस है। बहुत बड़े डिफरेंस है। एक तो है कि हम लोग जो है मनुष्य हम लोग एक तो स्पिरिचुअल है। इस अर्थ में कि बाह्य जगत के जो कुछ भी हमारी इंद्रियां आहार करने को जा रही है। उस इंद्रियों को हमने रिवर्स किया है। प्रतिआहार प्रत्याहार। यह हो गया मनुष्य मनुष्यत्व की तरफ जाने का सर्वप्रथम स्टेप। पशुत्व से मनुष्यत्व मनुष्यत्व से दिव्यत्व की जाने की जो यात्रा है उसमें सबसे बहुत बड़ा एक इंपॉर्टेंट माइलस्टोन है यह प्रत्याहार। अपनी इंद्रियां हमेशा बाहर का आहार खोजती है। अपना मन जो है बाहर में एक्साइटमेंट खोजता है। अपना जो खाने की इच्छा होती है। चीजों को प्राप्त करने की इच्छा होती है। तो यह जो बाहर के जगत में अपनी इंद्रियां धावित होती है उनको पकड़ करके कैसे भी करके संयमित करके भीतर में उसको रिीडायरेक्ट किया जाए। क्यों? क्योंकि हमको धीरे-धीरे यह पता लगने लगा कि बाहर में जितने भी आप कहेंगे कि भोग, सुख, आनंद या तो कुछ भी हमको मिलता है उससे फार ग्रेटर आनंद, उससे फार ग्रेटर सेटिस्फेक्शन, उससे फार ग्रेटर कंटेंटमेंट हमको भीतर से मिलता है। क्योंकि भीतर में डिविनिटी छुपी हुई है। आत्मन या तो ब्रह्मन है। तो यह धारणा जब से हुई तब से हमने अपनी इंद्रियों को संयमित करना शुरू किया। बाहर की जगत से आंतरिक जगत की ओर मोड़ना शुरू किया। यह एक बहुत बड़ा माइलस्टोन मनुष्य के जीवन में आया। और जब आप अपने को संयम करते हैं तभी

किसी संस्था के निर्माण का पहला कदम है इंद्रियों पर नियंत्रण

दो लोग एक साथ में रह सकते हैं। यदि मैक्सिमलिस्ट एक एप्रोच होगा जीवन का कि मुझे इंद्रियों के भोगों को चरितार्थ करना है। उसके लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हूं। जैसे कि मैं शेर हूं तो शेर क्या करेगा? यह मेरा टेरिटरी है। इस टेरिटरी में मैं ही रहूंगा। फिर इस इस टेरिटरी में मैं ही शिकार करूंगा। दूसरा शेर यदि आ जाएगा तो फिर मैं उसके साथ में युद्ध करूंगा। या तो वह जीतेगा या तो मैं जीतूंगा। यह पहले के जमाने में और इवन यहां तक कि यह मुगल जो राजा थे सब देखिए कि किस तरह से यह सक्से सक्सेशन होता था। अभी एक बादशाह है। अभी वह धीरे-धीरे करके बूढ़ा हो रहा है और उसके लड़के को अभी सत्ता चाहिए। तो अपने वो पिताजी है वो गद्दी छोड़ नहीं रहे हैं तो उसकी हत्या करके अपने से गद्दी उसने वो ये कर ली वो ग्रेप कर ली अभी देखिए कि उसकी जो सत्ता की लालसा है उसके लिए अपने पिता का भी वह वध करने से नहीं अटकता है। कौरवों की बात एकदम जगजाहिर है। सत्ता की लालसा, भोग सुखों की वासना इतनी स्ट्रांग थी कि पांडवों की जगह, पांडवों की जमीन, पांडवों का राज्य भी उन्होंने हड़प लिया था। तो यह मैक्सिममलिस्ट एप्रोच जब तक जीवन की ओर रहेगा तब तक हम इंस्टीटशंस डेवलप कर ही नहीं पाएंगे। तब तक हम साथ में रह के कंप्रोमाइज करके दो लोग साथ में रह ही नहीं पाएंगे। अभी निश्चय पांडवों का जो कौरवों की जो भोग वासना थी या इवन यह जो मुगल जो सब राजा थे बादशाह थे उन लोगों की राज्य प्राप्त करने की जो इच्छा थी वह तो फिर भी थोड़ी सी मॉडरेट हो चुकी थी इवोल्यूशन की यात्रा में पहले पहले तो जब हमारा ट्राइबल एग्जिस्टेंस था ट्राइबल लेवल पर हमारा इवोल्यूशन पहुंचा था उस समय तो मैक्सिमम पोजीशन अर्थात कि यह जगह मेरी ही है। आप स्वीकार नहीं करेंगे तो आखिर में फाइट होगी ही होगी। अभी आजकल तो या तो फिर कहेंगे कि पिछले जब जब से सिविलाइजेशन प्रारंभ हुआ है युद्ध एक एक्सेप्शन है। किंतु पहले ऐसा था कि युद्ध नॉर्म था और पीस था एक्सेप्शन। तो देखिए कि युद्ध नहीं कहेंगे। उसको डे टू डे फाइट ही कहेंगे। तो जो भी है यह जब तक हम मैक्सिमलिस्ट एप्रोच रखते हैं अपनी इंद्रियों का कि मुझे जितने भी भोग है सब मैं ही भोगूंगा। मैं शेयर नहीं करूंगा। मैं कंप्रोमाइज नहीं करूंगा। मैं एक साथ आपस में रह के एक तरह से हार्मोनियस एक जीवन नहीं जिऊंगा। तो वो हम इंस्टीट्यूशन बना ही नहीं पाएंगे। यानी कि यह दोनों जो है एक तो है कि मैं अपनी इंद्रियों को इनवर्ड करता हूं। मुझे बाहर के सुख नहीं चाहिए। मैं सुख को भीतर में से खोजने का प्रयास करता हूं। यहां से धर्म का प्रारंभ होता है। जैसे कि देखिए कि लक्ष्मण का जो अपने जो बड़े भाई है भगवान राम उनके प्रति जो आदर और श्रद्धा थी। अब लक्ष्मण को देखिए और यह मुगल राजाओं को देखिए। बड़ा भाई हो ना कि पिताजी हो उनकी हत्या करके कैसे भी करके राज्य प्राप्त कर लेना है। यहां पे भरत है। भरत के हाथ में उसकी मां ने राज्य दिया भी किंतु फिर भी उसने ग्रहण नहीं किया। क्यों? क्योंकि वह कहता है कि धर्म कहता है कि जो सबसे जष्ठ पुत्र है। ज्येष्ठ भ्राता जो है वही राज्य करेगा। मेरी मां ने भले ही चाहे अधर्म का आश्रय लेकर के मुझे राज्य दिया हो। मैं इस जो सिंहासन है सिंहासन के ऊपर में भगवान राम की पादुका को स्थापित करके उन्हीं को राजा मान करके राज्य को गवन करूंगा। किंतु राजा तो भगवान राम ही है। देखिए कि यह धर्म का रास्ता है। मैंने अपनी वासना कामनाओं को संयमित किया है। जब तक मैं कामना वासना को संयमित नहीं करता हूं। मैं धर्म के रास्ते पर आगे बढ़ता ही नहीं हूं। और जब तक मैं धर्म के रास्ते पर आगे नहीं बढ़ता हूं, मैं समाज में सुख पूर्वक हारमोनियसली जी ही नहीं पाऊंगा। तो वो हो गया कि धर्म के आधार पे हमने वैदिक इंस्टीट्यूशन बनाए थे। सबको अपना-अपना कार्य पता है। ब्राह्मण का लड़का है वह वेदाभ्यास करेगा। क्षत्रिय का जो संतान है, वह युद्ध शास्त्र सीखेगा। देश की सीमाओं की रक्षा करेगा। शूद्र का जो लड़का है वह धीरे-धीरे करके सेवा करना सीखेगा। वैश्य का जो लड़का है वह व्यापार सीखेगा। वाणिज्य सीखेगा, अकाउंटिंग सीखेगा। अभी यहां पे ऐसा नहीं है कि उसके ऊपर में यह बात हमने थोप के बिठा दी है। यहां पर बात यह है। देखिए कि दो चीजें हैं इस जो पुरानी वर्ण प्रथा थी उसके बारे में। सर्वप्रथम तो आज बाद में जिस तरह से हेरिडिटरी हो गया कि यह ब्राह्मण का लड़का ही ब्राह्मण होगा। यदि वो और कोई शूद्र के लड़के में यदि वह विद्याभ्यास करने की तमन्ना है तो भी वह नहीं कर पाएगा। वह बात बाद बात की बात है। महाभारत में महाभारत के समय से ही एक्चुअली यह सब हमको यह रिजिडिटी जो है देखने को मिल जाती है। एकलव्य था एकलव्य को जो धनुर्वेद सीखना था। धन वो जो युद्ध शास्त्र सीखना था तो जो द्रोणाचार्य थे उन्होंने सिखाया नहीं तो बोलकर के एकलव्य अपने से सीख रहा है। क्यों? क्योंकि वह राजकुमारों के साथ में वो शिक्षा प्राप्त करने के लिए योग्य नहीं है। वह जो उच्च क्षत्रिय कुल है उसमें उसका जन्म नहीं हुआ है। अब जब द्रोणाचार्य ने उसकी विद्या देखी तो क्या कहा कि तुम मुझे गुरु दक्षिणा में अपना अंगूठा काट करके दे दो। तो वह वो एकलव्य की जो गुरु निष्ठा थी भले ही चाहे प्रतिमा के सामने उसने वह तीर चलाना सीखा हो किंतु फिर भी अभी प्रतिमा तो प्रतिमा है तो गुरु की ही तो फटाक करके उसने अपना अंगूठा काट के दे दिया तो अभी देखिए कि एक ओर यह रिजिडिटी प्रवेश कर चुकी थी दूसरी ओर धर्म फिर भी जागृत था कि अभी जो गुरु कहते हैं उसको मैं सम्मान करूंगा किंतु यदि एक बारबेरिटी यदि रहती है, पशुत्व यदि हमारे में रहता है तो हम कहेंगे कि मैंने अपनी मेहनत करके विद्या सीखी है। आप होते कौन है? मेरा अंगूठा मांगने वाले। मैं क्यों अपना अंगूठा काट करके आपको दे दूं? तो वो बात हो सकती है। तो एक्चुअली आइडियल क्या है कि हम लोग धर्म को फॉलो करतेकरते मेरी यह जो वासनाएं हैं, मेरे जो डिजायर्स है, उसको कंट्रोल करें। भगवान ने मुझे जो दिया है उसमें संतुष्ट होकर के रहे और भीतर में संतुष्टि प्राप्त करने का प्रयास करें। यदि यह राजा का संतान है और मैं यदि शूद्र का संतान हूं और राजा के संतान के पास में जो भोग विलास मुझे दिखाई दे रहे हैं उसके पीछे आंख बंद करके दौड़ने की वजह मेरा जो जन्म मेरी जो स्थिति जो भगवान ने मुझे दिया है वह कार्य करके उसमें संतुष्ट रहके मैं धर्म का पालन करूंगा और आध्यात्मिक जगत में उन्नति प्राप्त करने का प्रयास करूंगा। तो यदि धर्म है तो इंस्टिट्यूशन है। बिना धर्म के इंस्टट्यूशन होंगे नहीं। वरना तो प्रत्येक जनरेशन में आपको रेवोल्यूशन आएगा। एक राजा का मृत्यु होता है तो फिर उसके बाद में दूसरा राजा कौन बनेगा? तो धर्म कहता है कि ज्यष्ठ संतान जो है वह राजा बनेगा और बाकी जितने भी संतान है उस राजा के उन सबको ज्यष्ठ भ्राता जो है उसकी बात सुननी है। यदि यह धर्म को आप फॉलो नहीं करेंगे तो जितनी भी बार राजा का मृत्यु होता है उतनी भी बार यह जो उस राज्य में अराजकता फैलेगी। जितने भी वह जो भाई है वह आपस में लड़ेंगे या अपने राज्य एक लड़का कहेगा कि भले मैं छोटा हूं किंतु मेरे में तो बड़े भाई से ज्यादा टैलेंट है। मैं क्यों चुपचाप बैठ जाऊं। मेरा भाई सब कुछ भोग करेगा राजा के रूप में और मैं एक छोटा सा एक जमींदारी मुझे दे देगा। कहीं कोने में जाकर के रहो। इस तरह से मैं क्यों रहूंगा? मैं भी राज्य को चलाऊंगा। मैं ही राज्य को भोग करूंगा। तो बोलकर के छोटा भाई है वह बड़े भाई के साथ में लड़ना शुरू कर देगा। ऐसा यदि होगा तो फिर वह राज्य हर जनरेशन में एक बार वहां पर हत्याकांड होगा। कुछ ही जनरेशन के बाद में वो राज्य कमजोर हो जाएगा। विदेशी राजा आकर के आक्रमण करेगा और वह है भीतर से ऑलरेडी खोखला हो चुका है। बार-बार सिविल वॉर होती है तो बाहर के आक्रमण के सामने फिर वह टिक नहीं पाएगा। यानी कि यदि आपको इंस्टिटशंस चलाने भी है तो आपको अपनी वासनाओं को संयम में रखना है। वासनाओं को संयम में रखने का एक ही उपाय है यदि हम धर्म को धर्म को फॉलो करें और धर्म को फॉलो करना माने कि सिर्फ बड़ा भाई है तो मैं उसको राज्य दे देता हूं। लक्ष्मण जो है लक्ष्मण जी भगवान राम के साथ में वन में गए। भगवान राम की इतनी सहायता की। वह तो कह सकते थे कि मैं भरत के साथ में बैठकर के राज्य करूंगा। हो सकता है भरत मुझे कोई मंत्री वगैरह कुछ बना दे। क्यों मैं वन वन जंगल जंगल घूमूंगा? तो यदि भोग वासना की इच्छा होती तो फिर वो हमारी जो भव्य वैदिक संस्कृति थी उसकी रचना कभी होती ही नहीं है। होती ही नहीं। तो यह और

भीतर से आनंद मिलेगा तभी में धर्म का पालन कर पाउँगा

यदि मैं धर्म को मुझे फॉलो करना है तो वह तभी हो सकता है। मैं सिर्फ बातों बातों में धर्म को फॉलो करूं ऐसा संभव ही नहीं है। मैं कहूंगा अच्छा मैं जो छोटा संतान मतलब ये यंगर सन हूं। मैं यदि छोटा भाई हूं तो फिर यह मेरी फर्ज है कि बड़े भाई को राज्य दे देना। किंतु बोलने से तो होगा नहीं। भीतर में यदि कामना है, भीतर में यदि वासना है तो इस बात को मैं कभी स्वीकार नहीं करूंगा। हमेशा कुछ ना कुछ एंट्री चलता रहेगा। हमेशा कोई ना कोई कांस्परेसी चलती रहेगी। हमेशा कुछ ना कुछ षड्यंत्र चलता ही रहेगा। वो राज्य कभी शांत नहीं होगा। मैं धर्म को तभी फॉलो कर सकता हूं जबकि मुझे भीतर में से आनंद मिल रहा है। भीतर में ईश्वर दर्शन भीतर में आत्म साक्षात्कार का यदि एक अंश भी मिलता है तो भीतर का जो सेटिस्फेक्शन है वही मुझे धर्म को फॉलो वही मुझे इंद्रियों के भोग को संयमित करवाएगा। इंद्रियों के भोग संयमित होंगे तभी मैं धर्म को फॉलो करूंगा। यदि मैं धर्म को फॉलो करता हूं तभी इंस्टिटशंस काम करेंगे। और यह जो पूरी साइकिल है आध्यात्मिकता, धर्म और इंस्टीट्यूशन यह जो ट्रायंगल है वो तीनों एक दूसरे के एक दूसरे के साथ में मतलब बड़े ही क्लोजली कनेक्टेड है। इन जो ट्रायंगल का एक पार्ट भी एक पॉइंट भी यदि टूटा तो बाकी सब पॉइंट इधरउ तितर-बितर हो जाएंगे। यदि मैं आध्यात्मिक नहीं हूं और सिर्फ मुंह पर धर्म की बात कर रहा हूं कि भले ही चाहे मैं भरत हूं तो मुझे जष्ठ भ्राता जो है निश्चय वही राज करेंगे। मैं मुंह से तो बोलता हूं किंतु भीतर भीतर में बड़ी ये जो कामना वासना भीतर से जागृत हो चुकी है कि भगवान राम भले गए जंगल में यहां पर मैं कुछ ना कुछ षड्यंत्र करके मैं कैसे भी करके राज्य को सही-सही में हत्या लूंगा। उस समय तो भगवान राम के बहुत सारे फॉलोअ थे उस आसपास में राजमहल में रहते होंगे तो कैसे भी करके उनकी हत्या करके रियल पावर जो है मैं ले लूंगा भले मुख में राम बगल में छुरी जैसा हम अपने कहावत है मुंह पे तो मैं धर्म की बात करूंगा किंतु भीतर में सब अधार्मिक आचरण रहेंगे तो ऐसा होगा तो भी इंस्टिट्यूशन चलेगा नहीं तो यह आध्यात्मिक उपलब्धि वहीं से धर्म होगा धर्म धर्म का अर्थ ही है कि अपनी कामना वासनाओं को संयम में रखना। देखिए ये मैरिज का इंस्टीट्यूशन कैसे चलता है। पति हो कि पत्नी वो दोनों एक मतलब जब विवाह होता है तो अपनी यह जो वासना होती है उसको संयमित कर लेते हैं। एक पत्नी व्रत या तो फिर यह एक पतिव्रत या एक ही स्त्री या तो एक ही पुरुष के साथ में आपको संबंध रखना है। अभी वासना यदि बहुत बढ़ गई और यह एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर्स जो कहते हैं ना कि विवाह तो एक के साथ में किया है किंतु अफेयर दूसरे दो लोगों के साथ में दूसरे 10 लोगों के साथ में चल रहा है। अभी भारत में तो आज फिर भी ये सब चीजों के ऊपर में इतना इसकी कोई इतनी ज्यादा मान्यता नहीं है। किंतु यह वेस्टर्न कंट्रीज में आप जाएंगे तो यह एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर्स या तो फिर बात में डिवोर्स ले लेना यह सब चीजें तो बड़ी कॉमन है। यह कॉलेज लाइफ वहां का कैसा है? यह सब तो हम न्यूज़पेपर में पढ़ते ही हैं। इस चीज को कहते हैं प्रॉमिस क्यूईटी अर्थात कि एक से ज्यादा पार्टनर के साथ में संबंध रखना और थ्रूउ अपने जीवन में रखते रहना। और समाज इसको कोई बहुत बुरी नजर से नहीं देखता है। जब तक मैं भोग मुझे भोग भोगने को मिलते हैं तो फिर मैं दूसरे लोग क्या कर रहे हैं? उसके ऊपर में क्यों मैं नजर रखूंगा? लोग दो-दो तीन-तीन चार-चार बार डिवोर्स लेकर के नया मैरिज करते हैं। मैरिज के बाद में भी एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स रखते हैं। तो यह सब चीजें वहां पर बड़ी सामान्य है। तो यह सब तो हमको पता है। भारत में जो बड़े-बड़े शहर है, महानगर है, वहां पे थोड़ा बहुत यह सब हो रहा है। किंतु बाय एंड लार्ज भारत में आपको यह जो विवाह का जो बंधन है, उसकी पवित्रता मेंटेन की हुई आपको देखने को मिलती है। तो यह विवाह का बंधन विवाह का जो इंस्टीट्यूशन है वह कब काम करेगा? वह तभी कार्य करेगा कि जब पति और पत्नी दोनों अपना जो धर्म है सती धर्म और पति धर्म उसका निवाह करेंगे तभी तो वह विवाह का इंस्टीट्यूशन टिक रहेगा। यह जो फैमिली का इंस्टीट्यूशन तभी तो वह चलेगा और धर्म को फॉलो करने के लिए आपको हृदय में संतोष चाहिए ही चाहिए। यदि हृदय में आपको कोई आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं हुई है तो आप धर्म के बारे में मुंह से हजार बातें करें। आपका चरित्र जो है धीरे-धीरे करके उसमें करप्शन प्रवेश करेगा ही करेगा।

ठाकुर और माँ की आत्म-संतुष्टि की कहानी

ठाकुर और मां यह कहानी तो जग जाहिर है। ठाकुर ने मां को एक बार कहा था जब मां वहां पे नहबत में रहती थी। तो ये जो मछुआरेन है सब ये जो मछली पकड़ने के लिए जो मछुआरे आते हैं और उनकी वाइफ उनकी स्त्रियां तो ये स्त्रियां सब वहां पे गंगा के घाट पर बैठकर के वो दुनिया भर का वो जो होता है ना चर्चा गोसिप वो गोसिप किया करती थी तो ठाकुर ये सब गोसिप कभी-कभी सुनते थे अपने कमरे में से तो यह तो सब बातें कर रहे हैं कि अरे मां शारदा को तो संतान हुआ नहीं है पता नहीं उनके पति के क्या सब कमज कमजोरी है या व्हाटएवर तो शायद जाकर के मां को कुछ सलाह भी देती होंगी कि संतान प्राप्ति के लिए कुछ औषध है दवाई है या जादू टोना है ऐसा कुछ कीजिए तो शायद संतान प्राप्त हो जाए तो जो भी है ठाकुर यह सब सुनते थे तो जाकर के एक बार मां के पास में विनती करते हैं कहते हैं देखो मेरे पास में सब कुछ है किंतु मैंने उसको ईश्वर की सेवा के लिए ईश्वर प्राप्ति के लिए मैंने सब कुछ समर्पित कर दिया है मां काली के सामने बलि प्रदत्त कर दिया है। तुम मेरे पे तुम मेहरबानी करके वो मेरे पे यह सब दवाई ये सब जादू टोना यह सब मेरे पे मत करना। तो मां कभी करने वाली नहीं थी। ठाकुर ने बोला ठाकुर का नेचर था बच्चे जैसा। छोटा बच्चा कैसा बीच-बीच में वो नर्वस हो जाता है। एंशियस हो जाता है। नरेंद्र कुछ कहता है तो ठाकुर सीधे मां काली के पास में जाकर कहते हैं कि नरेंद्र कहता है कि यह तो चातक पक्षी नहीं। ये तो चमगादड़ है। फिर मां और काली ठाकुर को आश्वासन देती है कि अरे नहीं वो तो बच्चा है। उसको क्या पता तो वो नरेंद्र कुछ कहता है, हाजरा कुछ कहता है तो ठाकुर वो नर्वस एंशियस हो जाते थे। मां काली के पास में कहने को दौड़ जाते थे। क्यों? क्योंकि मां ने मां जगदंबा ने ठाकुर को एक बालक की अवस्था में रखा था। तो ठाकुर में यह बालक भाव था। बोल के मां शारदा के पास में आकर के इस तरह से बोलते हैं। हमको पता है कि मां इस तरह का जादू टोना या औषध या दवाई का प्रयोग ठाकुर के ऊपर में कभी नहीं करने वाली है। जैसे हरीश की पत्नी ने किया था। वही हरीश वो फेमस इनफेमस ये ठाकुर का वो जो शिष्य था ठाकुर के पास में नियमित रूप से आता था। कथामृत में भी काफी वर्णन है और यह वही हरीश देखिए ऐसा वैसा नहीं है यह स्वामी जी ठाकुर की महासमाधि के बाद में दूसरे के तीसरे दिन के बाद में ही जब स्वामी जी और हरीश दोनों काशीपुर गार्डन में टहल रहे थे और ठाकुर का जो दर्शन हुआ था स्वामी जी को वो पास में ही हरीश खड़ा था और स्वामी जी ने सबसे पहले हरीश को पूछा कि अच्छा तुमको कुछ दिखा क्या तो हरीश भी ऐसा वो क्योंकि हरीश को भी दर्शन हुआ था फिर स्वामी स्वामी जी जोर-जोर से चिल्लाने लगे। सभी लोग इकट्ठा हो गए। फिर देखा कि वो फेमस घटना पता है कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में सभी लोग मायूस हो गए थे। किंतु ठाकुर ने उसी दिन शाम को आकर के मां को मां का हाथ पकड़ के कहा। मां जब हाथों की चूड़ियां निकाल रही थी उसी समय मां का हाथ पकड़ के कहा था कि मैं गया कहां पे हूं कि तुम यह जो विधवाओं के तरह रहना चाहती हो। चूड़ियां क्यों निकाल रही हो? तो वो बात फैल गई दूसरे दिन वो गोलापमा ने आकर के सबको कहा था तो थोड़ा सा तो भरोसा हुआ था किंतु स्वामी जी का तो रैशनलिस्टिक माइंड है तो वह तो ईजीली वो संतुष्ट होंगे नहीं तो वो दो-तीन दिन के बाद की ही घटना है स्वामी जी के जीवन में हमने देखा कि वो काशीपुर गार्डन में टहल रहे थे एकाएक मेन रोड जो है वहां से फटक से एक कोई एक दिव्य पुरुष एक दिव्य एक ज्योति स्वरूप कोई पुरुष भीतर में प्रवेश किया तो स्वामी जी चुपचाप आश्चर्यचकित होकर देख रहे हैं तो यही ही हरीश पास में खड़ा है और वह भी देख रहा है और फिर हमको पता है कि वह जो दिव्य पुरुष था वो वहां पे वह कुछ फूलों की ये जो पेड़ थे वहां पर आकर के अदृश्य हो गए। तो जो दृश्य स्वामी जी ने देखा था वही दृश्य देखने का सौभाग्य हरीश को भी प्राप्त हुआ था। तो यह वही हरीश कि उसकी पत्नी ने उसके क्योंकि वह पत्नी के साथ में संबंध नहीं रखता था। बोल के कुछ दवाई वगैरह कुछ ऐसा खिला दिया कि उसका माथा खराब हो गया। फिर जयराम भाटी जाकर के मां को परेशान कर रहा था। फिर मां ने उसकी पिटाई की एक बार अच्छे से तब कहीं जाकर उसकी अकल ठिकाने आई थी। तो देखिए कि यह सब होना वो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। यह सब घटनाएं होती रहती थी। ठाकुर तो बड़े प्रैक्टिकल थे। ठाकुर को पता था। तो अभी देखिए कि हरीश की पत्नी और मां शारदा दोनों में डिफरेंस क्या है? वह हरीश की पत्नी में भोग वासना होगी। तो वह भोग वासना से प्रेरित होकर के उसने हरीश पर यह सब गड़बड़ करने का प्रयास किया था। मां का हृदय एकदम 100% पवित्र था। शुद्ध सात्विक हृदय था। मां को ठाकुर ने स्वयं शोडशी के रूप में जगदंबा के रूप में पूजित किया था। पूजा था और मां के भीतर में जो आध्यात्मिकता का प्रवाह था इतना प्रचंड था कि भोग वासनाओं के प्रति मां की तिल मात्र नजर नहीं थी। की थोड़ी सी भी आकांक्षा नहीं थी। तो बोलकर के मां ठाकुर के साथ में इस तरह का अन्याय कभी नहीं करने वाली थी। तो देखिए कि कोई भी इंस्टीट्यूशन हो

सक्षम और समर्थ संस्थाएँ महान राष्ट्रों की बुनियाद होती हैं

वो चाहे फैमिली इंस्टीट्यूशन हो। फैमिली भी तो एक इंस्टीट्यूशन है। इंस्टीट्यूशन का अर्थ ही है कि एक से ज्यादा लोग जहां पे इकट्ठा होंगे वहां पर कुछ ना कुछ नियम के अनुसार वो यूनिट कार्य करेगा। तो सबसे बेसिक इंस्टीट्यूशन आज सिविलाइजेशन में देखें तो वो फैमिली है। मां, पिताजी और संतान। यह है सबसे बेसिक इंस्टीट्यूशन। यह बेसिक इंस्टीट्यूशन से प्रारंभ करके जैसे धीरे-धीरे करके आप इंस्टीटशंस की कॉम्प्लेक्सिटीज है। इंस्टीट्यूशन के जो प्रकार है वो आप जितने भी ऊपर में जाएंगे उतने कॉम्प्लेक्स होते जाएंगे। यूनिवर्सिटीज है, एजुकेशन इंस्टट्यूट है। वह भी तो एक तरह के इंस्टटशंस है। यह पुलिस सिस्टम है कि किसकी पुलिस में भर्ती होगी, किस तरह से ट्रेनिंग होगी, कैसे डिप्लॉयमेंट होगा, किसका क्या ड्यूटी रहेगा, किसको कैसे प्रमोशन मिलेगा, किसका किस तरह से सैलरी मिलेगा, किसका रिटायरमेंट बेनिफिट होगा। वो पूरा एक पुलिस इंस्टीट्यूशन है। ये जुडिशियल इंस्टीट्यूशन है कि इंडियन पीनल कोड या तो फिर यह इंडियन जितने भी ये लॉज़ है उसको किस तरह से स्टडी करना है। किस तरह से इंटरप्रेट करना है। किस तरह से जजमेंट देना है। किस तरह से जजेस को ट्रेन करना है। जजेस को प्रमोट करना है। पोस्टिंग करना है। ट्रांसफर करना है। पनिश करना है। ये ये पूरा एक जुडिशियल इंस्टीट्यूशन है। आर्मी इज एन इंस्टीट्यूशन। पॉलिटिकल पार्टी इज़ एन इंस्टीट्यूशन। स्टेट गवर्नमेंट, पंचायत है, लोकल गवर्नमेंट है, सेंट्रल गवर्नमेंट है, फेडरल गवर्नमेंट है। दीज़ आर ऑल इंस्टीटशंस। कोई भी एक सिविलाइजेशन का स्ट्रेंथ कहां पे है? जब तक यह इंस्टीट्यूशन उसके कार्यरत रहते हैं तब तक वो सिविलाइजेशन स्ट्रांग रहती है। जैसे ही यह इंस्टीटशंस में करप्शन आना प्रवेश किया वैसे ही यह सिविलाइजेशन में डिग्रेडेशन और डिसइीग्रेशन होना प्रारंभ हुआ। तो यह जो जितने भी इंस्टीट्यूशन कहेंगे मोस्ट बेसिक लेवल फैमिली से प्रारंभ करके यह जो अपनी सोसाइटी में वह जो रेजिडेंशियल एक कमिटी होती है बहुत सारी जगह पर होती है तो वो रेजिडेंशियल कमिटी जो है आपकी सोसाइटी की वे लोग ठीक करेंगे कि यदि आपको चौकीदार को अपॉइंट करना है तो सबके पास में से कितना यह जो है आपको वो कंट्रीब्यूशन कलेक्शन किया जाए प्रत्येक घर को कहेंगे कि आपको ₹00 कि ऐसा कुछ देना है तो सोसाइटी का जो मेंटेनेंस है जो चौकीदार को रखना है यदि वहां पे जो कुछ भी सर्विज है जो कि रेजिडेंशियल कॉम्प्लेक्स आपको प्रोवाइड करता है उसके लिए सभी प्रत्येक घर से इतनाइतना चंदा इतनाइतना कंट्रीब्यूशन कलेक्ट करना है। मैं जब अपने छोटा था बचपन में तो मैं देखता था कि वो अभी गणेश पूजा तो बड़ा फेमस वो पॉपुलर त्यौहार है। तो जैसे ही ये गणेश चतुर्थी आती है उसके पहले से ही प्रत्य ये जो कमेटी बनती है हमारी सोसाइटी में भगवान गणेश की गणपति दादा की एक मूर्ति वो होती थी और फिर आरती होती थी। हम सभी बच्चे जाते थे प्रसाद मिलता था। अभी भी मुझे याद है वो किस तरह का प्रसाद मिलता था। वो जो अगरबत्ती की खुशबू यह जो आरती होती है वह देख छोटे बच्चे थे हम लोग तो मैं फर्स्ट सेकंड स्टैंडर्ड यह सब देखकर के इतना अद्भुत लगता था तो अभी भी याद है कि वह गणेश चतुर्थी के एक महीने पहले से ही यह जो कमेटी होती है वे लोग घर-घर जाकर के कहेंगे कि आपको कंट्रीब्यूट करना है तो अपने हमारे घर में से भी वह जितना भी वह 100 ₹200 उस समय तो 100 200 की कुछ वैल्यू भी थी तो इतना देते थे तो अभी क्या है कि यह सब फिर इतना पैसा कलेक्ट हुआ। उसमें से भगवान गणेश की मूर्ति रखी गई। इतना खर्च हुआ, फिर इतना रुपया बचा। यह जो पूरा एक अकाउंटिंग जैसा है, वह फिर भी बाद में डिस्कस भी करते थे यह कमेटी वाले मीटिंग करके कि हां इतना खर्चा हुआ, इतना कलेक्शन हुआ, यदि इतना बचा है तो कहीं बैंक अकाउंट में रख देंगे या जो कुछ भी है। इसका कहीं पे कुछ सदुपयोग कर देंगे। सोसाइटी में यदि मरम्मत करने की कुछ जरूरत है वगैरह-वगैरह तो। यह सब इंस्टीट्यूशन है। सोसाइटी लेवल से प्रारंभ करें तो यह फिर वहां पर अपनी लोकल गवर्नमेंट है। लोकल पॉलिटिकल बॉडीज है। यह म्युनिसिपालिटी है। वहां से प्रारंभ करें। अपनी स्टेट गवर्नमेंट है। फिर ये जो ये होता है ना सब ये रहता है। सब वो आपकी समाज रहता है। समाज अपनी जाति का समाज। वो जो यह दिगंबर लोगों का समाज है। फिर यह वैष्णव लोगों का समाज है। यह जैन लोगों का समाज है। यह समाज है। क्षत्रिय लोगों का समाज है। तो वो समाज में फिर वो समाज के रिलेटेड फिर सब कुछ डिस्कशन होगा। जिस स्कूल में हम जाते थे। स्कूल एक इंस्टीट्यूशन है। यदि हॉस्पिटल में जाते हैं। हॉस्पिटल एक इंस्टीट्यूशन है। सेंट्रल तो यानी कि आप देखिए कि बिल्कुल बेसिक लेवल फैमिली से स्टार्ट करके धीरे-धीरे जितना भी एक इंस्टीट्यूशन की कॉम्प्लेक्सिटीज पावर बढ़ता जाएगा उतना ही आप देखेंगे कि वो इंस्टीट्यूशन जितना अच्छे से कार्य करता है, उतना ही उस देश या तो उस समाज के लिए फायदेमंद होता है। आज देखिए कि ये जो वेस्टर्न कंट्रीज है वेस्टर्न कंट्रीज की आज की जो सक्सेस है उसमें सबसे पावरफुल इंस्टीटशंस कौन से हैं? तो इंस्टीटशंस ऑफ हायर लर्निंग ये ऑक्सफोर्ड ये हावर्ड या तो फिर यह प्रिंस्टन ये एमआईटी ये ये जो जो उस समय की ये जो ग्रेट यूनिवर्सिटीज थी वो इतने पावरफुल इंस्टीट्यूशन थे यदि मैं यूनिवर्सिटी का प्रेसिडेंट हूं और मेरे पास में करोड़ों रुपया है यूनिवर्सिटी को चलाने के लिए तो मैं उसके साथ में कुछ भी कर सकता हूं। मैं अपने जो रिलेटिव्स हैं उसको प्रोफेसर बना दूंगा। जो मेरी चमचागिरी करते हैं उनको प्रमोट कर दूंगा। जो स्टूडेंट के पास में से डोनेशन दो नंबरी डोनेशन लेकर के स्टूडेंट्स को पास करवा दूंगा। पीएचडी थीसिस दे दूंगा। इस तरह का करप्शन यदि रहेगा तो यूनिवर्सिटी किसी काम की नहीं है। किंतु यूनिवर्सिटी प्रेसिडेंट या तो यूनिवर्सिटी बोर्ड है उसमें इंटीग्रिटी है तो वही उसी टीचर्स को वे लोग अपॉइंट करेंगे जिनके पास में सही-सही में स्किल है। उन्हीं टीचर को वे लोग टेन्योर देंगे। उन्हीं टीचर्स को फुल टाइम प्रोफेसर बनाएंगे कि जिन्होंने साइंटिफिक वर्ल्ड में कुछ कंट्रीब्यूशन किया है। रेफरल जर्नल्स में उन्होंने आर्टिकल लिखे हैं या तो उनके क्षेत्र के जो बड़े-बड़े प्राइज है वो उनको प्राप्त हुए हैं। उन्हीं को वो टेन्यर्ड प्रोफेसरशिप देंगे। स्टूडेंट्स को तभी पीएचडी बनाएंगे डॉक्टरेट की वो देंगे कि जबकि वे लोग जेनुइनली हार्ड वर्क करके कुछ ना कुछ एकेडेमिक उनका अचीवमेंट रहता है नहीं कि बेस्ड ऑन डोनेशन तो ये इंटीग्रिटी जब वो गवर्निंग बोर्ड में रहेगी तो वो गवर्निंग बोर्ड इस तरह की यूनिवर्सिटीज को खड़ी करेंगे व्हिच आर दी वर्ल्ड बेस्ट यह हावर्ड है या तो ऑक्सफोर्ड है या प्रिंस्टन या एमआईटी जो कि बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटीज में उसका नाम आता है अपने यहां पे भी भारत में देखिए कि आईआईटी है, आईआईएम है। ये सब ग्रेट इंस्टीट्यूशन है। क्यों? क्योंकि उनके जो गवर्निंग बॉडी रहती है उनके भीतर में इंटीग्रिटी होती है। बिना इंटीग्रिटी के अपने ऐसा नहीं है कि यूनिवर्सिटी और कॉलेज की कमी है। भारत में हजार कॉलेज, यूनिवर्सिटी, एकेडमिक इंस्टीटशंस हैं। वहां पे कोई भी उनकी कुछ भी एकेडमिक क्षमता नहीं होती। बहुत सारी जगह पे तो आप पैसा देकर के डिग्री भी मिल जाती है आपको। फिर वह डिग्री किस काम की? वह डिग्री लेकर के वह मेडिकल प्रैक्टिस करेंगे। उसके पास जो पेशेंट जाएगा उसके तो आप समझ लीजिए कि क्या अवस्था होगी। तो देश या तो सिविलाइजेशन उसको यदि ग्रेट होना है तो उसके इंस्टीटशंस ग्रेट होने चाहिए। अभी सेंट्रल गवर्नमेंट है। सेंट्रल गवर्नमेंट ने करप्शन है। अभी देखिए हमारे नेबरहुड में हमारे पड़ोस में क्या हो रहा है? भयानक करप्शन है। वहां पे वह जो सत्ताधारी है उनका एक ही उद्देश्य है कि टैक्स के जो पैसे हमको मिलते हैं जनता के पास में से जो टैक्स बटोरते हैं उसको कैसे भी करके अपने पॉकेट में डाल दिए जाए। यह जो देश की जमीन है, देश के यह जो रिसोर्स है, उसको अपने सेल्फिश कार्य के लिए उसको इस्तेमाल किए जाए। और जहां पे गवर्नमेंट में इंटीग्रिटी होती है, चाइना को देख लीजिए या तो फिर यह वेस्टर्न कंट्रीज को देख लीजिए। ऐसा नहीं है कि वहां पर करप्शन नहीं है। किंतु करप्शन जो है वो कुछ हद तक तो मॉडरेशन में है। बोलकर के ही यह जो टैक्स का पैसा जो आता है वो लोग अपनी आर्मी को स्ट्रेंथन करते हैं। यह जो इकोनॉमिक सेक्टर जो होता है, इंडस्ट्रियल सेक्टर जो होता है उसको स्ट्रेंथन करते हैं। मेरिट को प्रमोट करते हैं। जो यूनिवर्सिटीज जो होती है उसमें इंटीग्रिटी बनी रहे। इस तरह के प्रयास करते हैं जो लॉज़ एंड ऑर्डर्स जो है लॉ एंड ऑर्डर देश में वह बने रहे उसके लिए जुडिशियल सिस्टम है वो ठीक-ठीक कार्य करें इसलिए प्रयास करते हैं। तो कोई भी ग्रेट कंट्री है उसके जो इंस्टीट्यूशन है वो ग्रेट रहेंगे तभी वह कंट्री तभी वह देश ग्रेट बनेगा। यदि इंस्टीटशंस में करप्शन प्रवेश कर गया म टॉप टू बॉटम यह जो मैरिज इंस्टीट्यूशन में करप्शन प्रवेश किया उसके बाद में ये लोकल गवर्नमेंट में करप्शन घुसा उसके बाद में ये सेंट्रल गवर्नमेंट में फिर ये जितने भी ये अदर जो एस्पेक्ट ऑफ लाइफ है यदि आप जुडिशियल सिस्टम है मुझे अपनी फेवर में यदि चाहिए यदि वो जजमेंट तो मैं जाकर के पैसा खिला दूंगा अपनी फेवर में जजमेंट आ गया तो ये भयानक करप्शन यदि प्रवेश करेगा तो वह फेल्ड स्टेट होगा। अपनी दुनिया में देखिए न्यूज़पेपर सभी पढ़ते हैं। फेल्ड स्टेट की भी कमी नहीं है और सक्सेसफुल स्टेट भी है। सक्सेसफुल स्टेट्स में ऐसा नहीं है। सक्सेसफुल कंट्रीज में ऐसा नहीं है कि करप्शन बिल्कुल नहीं है। किंतु करप्शन मॉडरेट लेवल पे है। इस लेवल पे कि जहां तक देश की प्रगति का सवाल है, वहां पे फिर वे लोग ज्यादा करप्शन नहीं करते। बाकी जब सब जगह पे वह जितना भी करते हो उतना करते होंगे। तो वो क्या है कि इंटीग्रिटी या तो फिर कहेंगे कि धर्म का पालन मैं यदि आईएएस ऑफिसर हूं तो मेरा धर्म क्या है? मुझे यदि ये अभी ये जो लैंड रेवेन्यू डिपार्टमेंट है उसमें यदि मेरा पोस्टिंग हुआ है तो फिर अभी ये लैंड रेवेन्यू जो रिकॉर्ड है उसको ऑल्टर करने के लिए उसमें गड़बड़ करने के लिए मेरे पास में कितने वो टेंप्टेशंस आएंगे? कितनी प्रपोजल आएगी? कोई आदमी कहेगा यह रेवेन्यू रिकॉर्ड में यह कर दीजिए मेरे लिए। मैं आपको इतना रुपया दे दूंगा। तो अभी यदि मैं ऑनेस्ट हूं, मैं धर्म का पालन करता हूं, तब तक मैं इस तरह का कोई भी गड़बड़ अपने डिपार्टमेंट में सहन नहीं करूंगा। तो यह इंस्टीट्यूशन अच्छे से चलेगा। मैं यदि करप्ट हूं, मुझे पैसा चाहिए। मैं कैसे भी करके पैसों का ये उसके लिए मैं अपनी ये जो ऑनेस्टी है उसको भी बेच देने के लिए तैयार हूं। तो वहां पे करप्शन प्रवेश किया। तो यह जब करप्शन मल्टीप्लाई होता है इंडिविजुअल लेवल पर मल्टीप्लाई होते होते करके वो जो फेल्ड स्टेट में परिणत होता है और यदि यह ऑनेस्टी होती है इंडिविजुअल लेवल पर यदि ऑनेस्टी है तो वो ऑनेस्टी मल्टीप्लाई होते एक सक्सेसफुल स्टेट में हम लोग परिणत होते हैं। तो अभी देखिए कि मैं इंटीग्रिटी मेरी तभी रहेगी जबकि मैं मेरी भोग वासना है उसको कंट्रोल में रखूंगा। आज मैं कैसे भी करके मेहनत करके आईएएस ऑफिसर हुआ। अभी मेरा जो मित्र था उसने भी मेहनत करके एक मल्टीीनेशनल कंपनी का सीईओ हुआ है। अभी प्राइवेट सेक्टर में तो नो डाउट सैलरी का जो यह है लेवल वो डिफरेंट ही होता है। अभी मेरा मित्र जो कि मेरे ही साथ में पढ़ रहा था शायद हो सकता है कि मैं उससे ज्यादा इंटेलिजेंट था। किंतु फिर भी मुझे आज जितनी गवर्नमेंट से सैलरी मिल रही है उससे 10 गुनी ज्यादा उसको प्राइवेट सेक्टर में मिल रही है। कंपनी की ओर से उसको पर्सनल जेट दिया गया है। वो पर्सनल जेट में आज टोक्यो जाता है तो दूसरे दिन लंदन जाता है। तीसरे दिन पेरिस जाता है तो चौथे दिन दुबई जाता है। और यहां पे मैं एक छोटे से गांव में मेरा पोस्टिंग हुआ है। तो यहीं पे मैं फंसा हुआ हूं। तो यह जब भीतर में से यह होगा मतलब यह धीरे-धीरे करके अपने भीतर में ये करप्शन प्रवेश करेगा। यह कामना वासना उदय होगी। फ्रस्ट्रेशन जिसको कहते हैं ये फ्रस्ट्रेशन जैसे मेरे मन में आएगा कि अरे मैं उससे ज्यादा इंटेलिजेंट था। मेरे पास में एज अ गवर्नमेंट ऑफिसर ज्यादा पावर है, ज्यादा प्रेस्टीज है। किंतु कोस्पोंडिंग जो मॉनिटरी बेनिफिट मुझे होना चाहिए वह तो नहीं हो रहा है। तो फिर मैं धीरे-धीरे करके यह करप्शन में प्रवेश करूंगा। जैसे भी कोई आएगा फाइल के ऊपर में साइन करवाने के लिए तो 10 बहाने बनाऊंगा। तो वह आदमी अभी वह आदमी भी समझ जाएगा कि यह जो भी साहब है उसको अभी वह साइन करनी नहीं है इसलिए वह सब बहाने बना रहे हैं। डॉक्यूमेंट का कोई प्रॉब्लम नहीं है। फिर हमने वह चपरासी को इंस्ट्रक्शन देकर रखा है। नेक्स्ट टाइम वह आदमी आएगा उसको साइड पे ले जाना। कहना कि साहब तो साइन करवा दूंगा मैं। मेरा जवाबदारी है। इतना रुपया दे दीजिए यहां पे। इतना तो करके तो फिर ऐसा करके मैं धीरे-धीरे करके पैसा कलेक्ट करना शुरू करूंगा। तो देखिए यह इंडिविजुअल लेवल करप्शन कहां से आता है? जब मैं अपनी कामना वासना पर कंट्रोल नहीं कर सकता हूं। कामना वासना पर कंट्रोल क्यों नहीं कर सकता हूं? क्योंकि भीतर में किसी भी तरह की आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं है। अभी देखिए कि यह जो एक तो है कि एक्सट्रीम यदि देखें कि एक और है कि भीतर में संपूर्ण रूप से खाली है। भीतर में पूरा पशुत्व है और इंद्रियों के सुख उसके ऊपर में इस तरह से हावी हो जाते हैं कि वो क्राइम करते भी यह नहीं होता है। माने उसको द्विधा नहीं होती है। मर्डर करेगा, चोरी करेगा, भयानक लेवल पर करप्शन करेगा। तो वह एक एक्सट्रीम है। दूसरा एक एक्सट्रीम है कि भीतर में इस तरह की आध्यात्मिक उपलब्धि हुई है कि बाहर के क्षेत्र में यदि वह आदमी गरीब भी है। बाहर में वो यदि सांसारिक दृष्टि से उसको देखे हजार कष्ट भी उसको मिल रहे हैं तो भी वह शांति से संतोष पूर्वक जीता है। तो यह दोनों एक्सट्रीम में किंतु ज्यादातर समाज को आप देखेंगे यह पृथ्वी की खास भारत की बात करूं। भारत में 150 करोड़ की पॉपुलेशन है। तो यह दोनों एक्सट्रीम में रहने वाले 1 लाख 2 लाख या तो फिर कहेंगे कि एक दो करोड़ से ज्यादा नहीं होंगे। एक दो करोड़ ऐसे होंगे जिनका कि मन 100% करप्ट हो चुका है और एक दो करोड़ ऐसे होंगे कि जिनका मन सही-सही में शुद्ध सात्विकता से परिपूर्ण है। बाकी के 150 करोड़ में से यदि मान लीजिए कि इस तरह से 3 करोड़ 4 करोड़ को निकाल दिया जाए तो 1140 करोड़ के आसपास की पॉपुलेशन जो है वह इन बिटवीन समवेयर आती है। थोड़ा बहुत तो भीतर में संतोष है। वरना तो 150 करोड़ के देश में रहना संभव नहीं है। प्रत्येक स्टेट आपस में फाइट करेगा। यह नदी है। इसका पानी हम ही पूरा ले लेंगे। दूसरा स्टेट कहेगा कि ना पूरा पानी हम ही ले लेंगे। फिर अभी सेंट्रल गवर्नमेंट की बात सुनेंगे नहीं। दोनों स्टेट अपनी-अपनी आर्मी खड़ी करेंगे और आपस में लड़ना शुरू करेंगे और फिर सेंट्रल गवर्नमेंट से सेपरेट हो जाएंगे। तो भारत में देखिए कि इस तरह की सेपरेटिस्ट मूवमेंट ज्यादा चलती नहीं है। लोग लिप सर्विस तो देते हैं किंतु उसमें ज्यादा कोई इफेक्टिवनेस नहीं होती है। तो ज्यादातर 1440 करोड़ के आसपास की जो पपुलेशन है वो समवेयर इन बिटवीन आती है। थोड़ा बहुत भीतर से संतोष भी है और कामना वासनाएं भी है। दोनों को बैलेंस करके चलती है। किंतु यदि एक सही-सही ग्रेट सिविलाइजेशन हमको होना है तो हमारे पास में बड़े ही पावरफुल इंस्टीट्यूशन होने चाहिए। यदि ये पावरफुल इंस्टीट्यूशन नहीं होंगे तो हम कभी भी ग्रेटनेस के लेवल पर नहीं पहुंच पाएंगे। फिर ये एक मिडओकर मिडिल पावर। यदि ये आज की जिओपॉलिटिकल की लैंग्वेज में कहेंगे तो एक तो होते हैं ग्रेट पावर और दूसरे होते हैं मिडिल पावर। इंडिया आज मिडिल पावर की पोजीशन में है। यह जो जगत के जो बड़े-बड़े जियो जिओपॉलिटिकल फ्लैश पॉइंट है उसमें हमारा ऐसा कुछ खास बोलना नहीं है। हम लोग बीच-बीच में कहते तो हैं कि हम शांतिप्रिय हैं किंतु हमारी बात कोई सुनता नहीं है। क्योंकि हम लोग एक मिडिल पावर हैं। तो यदि आपको एक ग्रेट पावर के लेवल पर जाना है जो कि पूरे विश्व में कुछ भी हो रहा है और वे लोग यदि बोलेंगे कि ऐसा नहीं ऐसा होना चाहिए तो सभी देश जो है उनकी बात सुनेंगे। वो कब होगा? जबकि अपनी आर्मी है, अपनी इकोनमी है, अपनी इंडस्ट्रियल कैपेसिटी है। यह आरएडी ये जो यह इकोसिस्टम है, वो सब स्ट्रांग होगा तभी तो लोग हमारी बात सुनेंगे। अभी रिसेंटली मैंने न्यूज़ में पढ़ा कि सेंट्रल गवर्नमेंट ने यह आर आरडीआई रिसर्च डेवलपमेंट एंड इनोवेशन बोल के एक फंड रेडी किया है। अभी यह फंड कितना इफेक्टिवली यूज़ होता है। वो तो अभी यह फंड को मैनेज करने वालों की इंटीग्रिटी किस पे है वही तो डिसाइड करेगा। वरना तो इस तरह के फंड कितने ही जगह पे कितने ही देशों में बनते होंगे। किसका कहां पे ठीक-ठीक यूटिलिटी होता है। अमेरिका में देखिए कि ये जो सेंट्रल गवर्नमेंट का कुछ-कुछ फंड ये जो नेशनल साइंस फाउंडेशन ने कि ऐसे कुछ जो इंस्टीट्यूशन है वो इस तरह से फंडिंग किए हैं कि जिसमें से ये क्वांटम टेक्नोलॉजी है ये इंटरनेट टेक्नोलॉजी है। ये स्पेस साइंस है, ये एवीए एयनिक्स है, ये एिएशन जो साइंस है या तो फिर ये जो मॉडर्न कंप्यूटिंग इंडस्ट्री है वो सब वहां से डेवलप हुए हैं। अभी ये एआई टेक्नोलॉजीस जो कि आज डेवलप हुई है उसके पीछे में उसके फंडर्स थे माने उसको जो फंड करने वाले इनिशियल फंडिंग करने वाले उन लोगों ने तो बड़ा रिस्क लेकर के ही तो पैसा डाला था ये ओपन एआई जैसी कंपनियों के पीछे में तो यह देखिए आपके भीतर में वो ऑनेस्टी इंटीग्रिटी नहीं होगी तो आपके पास में जो इन्वेस्टमेंट करने के लिए पैसा आया है या तो अपने रिलेटिव्स के पॉकेट में जाएगा या तो फिर आपके चमचों के पॉकेट में जाएगा। रियल इनोवेशन कभी होने वाला नहीं है। किंतु आपने ठीक-ठीक रियल इनोवेशन हो उसके लिए पैसा डाला है तो फिर वही देश यह सब टेक्नोलॉजी के माध्यम से ग्रेट पावर होगा। अभी जहां पे भी कोई भी क्फ्लिक्ट होता है कुछ भी होता है अमेरिका वो अमेरिका का प्रेसिडेंट जैसा एक हुक्म देगा सबको सुनना पड़ेगा। तो वो पावर ग्रेटनेस कहां से आती है? क्योंकि वहां पर इंस्टीटशंस काम करते हैं। यदि इंस्टीटशंस काम नहीं करेंगे तो वो देश की ग्रेटनेस कभी भी वो होगी नहीं। फिर यह फेल स्टेट होगा जैसे वो बहुत सारे कंट्रीज हैं आजकल के या तो फिर ये मिडिल पावर होगा जैसे आजकल का इंडिया है तो वो मिडिल पावर या तो फेल स्टेट होकर के रह जाएगा। ग्रेट स्टेट यदि होना है तो इंस्टीटशंस पावरफुल होने चाहिए और इंस्टीटशंस पावरफुल होने हैं तो जो इंस्टीटशंस चलाते हैं उसमें ऑनेस्टी इंटीग्रिटी होना चाहिए और ऑनेस्टी इंटीग्रिटी तभी होगा जबकि कुछ ना कुछ स्पिरिचुअल अचीवमेंट उनको प्राप्त हुआ है। या तो फिर भीतर में से कुछ ना कुछ शांति मिली है। यदि ऐसा नहीं होगा तो कोई भी इंस्टीट्यूशन ठीक से काम नहीं करेगा और कोई भी देश ग्रेटनेस के लेवल पर नहीं जाएगा। तो यह हो गया एक पूर्व भूमिका स्वामी जी जो कहना चाहते हैं उसकी। इसके बाद में अभी स्वामी जी क्या कहते हैं वह अभी हम कल देखते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न: संस्था की आवश्यकता के बारे में बात करने के बाद, स्वामीजी इसके संचालन के लिए मजबूत, ईमानदार लोगों की बात करते हैं।

इन लोगों का यह जो लॉजिकल सेंस बड़ा स्ट्रांग होता है ना वह आपने ठीक ही कहा वह स्वामी जी का ही ओरिजिनल ही है। मैंने कंपाइल नहीं किया है। और जैसे हम कथामृत पढ़ रहे थे तो ठाकुर कहते हैं ना कि वो स्त्री पुत्रों को आपको अंधक कुएं की तरह देखना है। अंधकूप की तरह देखना है। किंतु साथ-साथ में ही आप ठाकुर ने वो एंटीडोट भी दे दिया कि स्त्रियां जो है वह जगदंबा का स्वरूप है। यानी कि उनके प्रति आकर्षण भी नहीं होना है तो उनके प्रति घृणा भी नहीं होना है। तो लॉजिक उनको समझ में आता था। सिमिलरली हियर इंस्टीटशंस बनाना है तो बिना आदमी के तो इंस्टीट्यूशन नहीं है। व्हाट इज इंस्टिट्यूशन? यह टेबल, यह बिल्डिंग, ये उसका बैंक अकाउंट, ना उसकी फाइल ना कि ये सब तो इंस्टीट्यूशन नहीं है। मैन इज द इंस्टीट्यूशन। सो और जैसे आपने कहा कि इंस्टीट्यूशन एंड इंडिविजुअल बोथ आर डायरेक्टली रिलेटेड। ऑब्वियसली सबसे बड़ा एग्जांपल है फैमिली। हमारा सबसे जो फॉर्मेटिव पीरियड है वो कहां पे जाता है? हमारी मोरल वैल्यूज़ कहां पे बिल्ड अप होती है? अपने बचपन में होती है। अपनी फैमिली में होती है। मां-पिताजी यदि हम हमको प्रेम करते हैं। उन दोनों में यदि अब जैसे अमेरिका में ही देखिए ना बार-बार डिवोर्स होता है। डवोर्स नहीं होता तो झगड़ा होता है। तो वो जो प्रॉब्लम चाइल्ड बोल के वहां पे एक बड़ा चलता है। अब डिवोर्स फैमिली का वो बच्चा है। एक सप्ताह अपनी मां के पास में रहता है। दूसरे सप्ताह अपने पिताजी के पास में रहने को जाता है। तो फिर इस बच्चे का क्या एक डेवलपमेंट होगा? इमोशनल उसको क्या एक मिलेगा? नरिशमेंट। सो फैमिली इज द बेस्ट एग्जांपल कि आप कह सकते हैं कि आप ठाकुर का ही मां और पिताजी को देखिए। जब भी कोई भी संत महापुरुष की बातें जब हम बायोग्राफी पढ़ते हैं मां-पिताजी से स्टार्ट होता है। सभी म कोई भी इवन जो स्पिरिचुअल ही नहीं वो जैसे नेपोलियन वगैरह की भी आप बायोग्राफी पढ़ेंगे तो वो लिखेंगे कि उसकी मां का उसके ऊपर में बड़ा प्रभाव था या उसका फैमिली में उसका बड़ा कैरेक्टर बिल्डिंग में कंट्रीब्यूशन हुआ था। सो दिस इज वेरी कॉमन साइकोलॉजिकल अंडरस्टैंडिंग कि फैमिली मेक्स द चाइल्ड एंड चाइल्ड इंटर्न गुड चाइल्ड इंटर्न मेक्स अ बेटर फैमिली। सो बोथ आर वेरी क्लोजली नीड टुगेदर।

धार्मिक संस्थानों का महत्व

देखिए आज मैंने रिलीजियस इंस्टीट्यूशन नहीं डिस्कस किए हैं। कल हम करेंगे। आज टुडे वी डिस्कस इंस्टीट्यूशन इन जनरल। व्हाट इज़ अ डायनामिक्स ऑफ इंस्टीट्यूशन? टुमारो वी विल डिस्कस रिलीजियस इंस्टीट्यूशन व्हिच इज़ अ स्पेशल क्लास ऑफ़ इंस्टीट्यूशन। क्योंकि हिस्ट्री को पढ़कर के हमको यह समझ में आता है कि रिलीजियस इंस्टीटश आर द मोस्टेंट वन। क्योंकि रिलीजन ठीक रहेगा। रिलीजन इंटीग्रिटी रहेगी तो फैमिली भी ठीक चलेगा, राज्य भी ठीक चलेगा, जुडिशियल सिस्टम भी ठीक चलेगी, गवर्निंग सिस्टम भी ठीक चलेगी। बिकॉज़ रिलीजियस इंस्टीटश टीचेस अस मोरल वैल्यूज़। ऐसा और कुछ नहीं है। आप स्कूल में जाइए, कॉलेज में जाइए, आप टीचर आपको कोई मोरल वैल्यू सिखाएंगे पर से आप उससे सीखने नहीं वाले हैं। यदि आप रिलीजियस होंगे तभी आप मोरल वैल्यू सीखेंगे। क्योंकि वो तो भीतर में से आना है। सिर्फ आपको झूठ नहीं बोलना। स्वामी जी का फेमस जो स्टेटमेंट है। स्वामी जी कहते हैं कि आप एक लड़के को बोलते हैं चोरी मत करो। बोलने से तो थोड़ी ना वो उसको चोरी मत करो। ठीक है? जब तक उसके पास में खाने पीने को चोरी नहीं करेगा। जब वह भूखा है तब वह चोरी ना करे उसके लिए तो ऐसा क्या आपने दे दिया है? सिर्फ वो किताबों में लिखी बातों से उसको पेट नहीं भरने वाला है। वो भूखा है तो उसका पेट या तो चोरी करके भरेगा या तो भीतर में कुछ मिला है उसको तो उसका पेट भरेगा। सो दैट कि एक स्पिरिचुअल एटमेंट होनी चाहिए। भले चाहे अभी वेस्टर्न कंट्रीज में बहुत सारे लोग अपने को सेुलर कहलाते हैं। हालांकि उनका लाइफ बड़ा ही मोरल होता है। वे लोग कहते हैं वी फॉलो एथिक्स एंड मोरालिटी बट वी आर नॉट रिलीजियस। परहप्स दे मे से आई एम स्पिरिचुअल बट नॉट रिलीजियस। तो नॉट नेसेसरी कि आप अपने को किसी डिनॉमिनेशन के साथ में एक कि मैं वैष्णव हूं। मैं शाक्त हूं। मैं यह मंदिर में जाता हूं। नॉट नेसेसरी। स्पिरिचुअलिटी इज़ नॉट एना पिताजी की संपत्ति नहीं है किसी भी धर्म की कि आप इस चर्च में जाएंगे। इस मंदिर में जाएंगे तभी आप धार्मिक होंगे। इट्स अ डायलॉग बिटवीन योरसेल्फ एंड गॉड। और यदि आप ईश्वर में भी नहीं विश्वास करते हैं तो भी तो भीतर में से आपको मिलता है। यानी कि स्पिरिचुअलिटी सच परवेजिव एस्पेक्ट इन आवर सोसाइटी। कोई भी इवन अभी ये जैसे कि रिसेंटली न्यूज़ आया कि बिल गेट्स ने ठीक किया कि अपनी पूरी संपत्ति दे देगा। अभी उससे बड़ा मटेरियलिस्ट भोगवादी और कौन होगा इस जगत में? सेंटी बिलियनियर है। कितने 100 बिलियन की उसकी संपत्ति है। अभी वो संपत्ति दे रहा है। दैट मींस भीतर में कुछ उसने कुछ अचीव किया है। भले वो चाहे उसके बारे में कुछ ना बोले या तो भले ही चाहे उसको छुपा के रखे। द मोमेंट आप रनाउंसिएशन करते हैं। द मोमेंट आपको समझना है कि भीतर में कुछ प्राप्त हुआ है। बिना भीतर में कुछ प्राप्त हुए आप रनंसिएशन कर ही नहीं सकते। स्पिरिचुअलिटी एंड रनंसिएशन बोथ आर डायरेक्टली लिंक टुगेदर। रामकृष्ण मिशन का काफी एक्सपीरियंस है। हम लोग कहते हैं नया मंदिर बनाना है पैसा दीजिए तो सीधा मना कर देंगे। किंतु हम कहेंगे डिस्पेंसरी चलाना है उसके लिए पैसा दीजिए। ये ये आई हॉस्पिटल है ना कि ये आपका वो है वो तो फटाक करके पैसा आ जाएगा। यह तो हमारा लंबा एक्सपीरियंस है। देखिए बहुत सारे लोग सुनना चाहते हैं और उनको एक बार ऐसा कोई मिल गया कि जिनके अब जैसे मैं भागवत के बारे में सुनना चाहता था काफी दिनों से किंतु मैं कभी-कभी YouTube पे सर्च करता हूं कभी मुझे रेयरली कोई अच्छा लगता है। तो रिसेंटली एक इंद्रेश उपाध्याय बोल करके है। उसका मैंने सुनना शुरू किया। मुझे बहुत अच्छा लगा। तो क्या है कि वह इंडिविजुअल लेवल पे मेरा उसके साथ में ट्यूनिंग हो गया है। तो उसके वीडियो मैं कभी-कभी बीच-बीच में देख लेता हूं। तो दिस इज हाउ इट हैप्स।

प्रश्न: द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य का अंगूठा लेना बहुत गलत था।

किंतु इसीलिए तो फिर जैसे देखिए कलयुग प्रवेश कर गया ना भगवान कृष्ण के मृत्यु के साथ-साथ में ही तो कलयुग प्रवेश कर गया था। तो वो क्यों हुआ? क्योंकि भगवान कृष्ण ही एक थे कि जो कि एक द्वापर को खड़े करके रखे थे। दो पैरों पर था। भगवान कृष्ण का ही एक पैर था उसमें अकेले का। तो जैसे ही वो गए सीधा एक पैर पे आ गया धर्म। देखिए जब धर्म चार पैरों पर खड़ा था सतयुग में तब था कि सब ऋषि मुनियों को या तो इवन जनसाधारण को भीतर से जो आध्यात्मिक उपलब्धि होती थी उसकी वजह से समाज में जो कुछ भी हो रहा है वह बहुत ज्यादा कुछ मायने नहीं करता था। इसके बाद में जब धर्म तीन पैरों पर खड़ा हुआ। एक पैर चला गया। त्रेता युग में देखिए कि यह वाली और यह सुग्रीव का युद्ध वाली ने सुग्रीव की पत्नी और उसके पास में से यह ले लिया। तब भी भगवान राम को जाकर इंटरवीन करना पड़ा। सुग्रीव ने ऐसा तो नहीं कहा कि ठीक है चलो भाई अपने भाई ने लिया है तो लिया है। मुझे भीतर में ऐसी उपलब्धि प्राप्त हो रही है कि मुझे राज्य नहीं चाहिए। ऐसा उसने नहीं कहा। उसके बाद में जब धर्म दो पैरों पर खड़ा रहा है द्वापर में तब यह सब यह द्रोणाचार्य वाला सब मामला चला है। द्रोणा सतयुग होता तो द्रोणाचार्य कहते हैं कि शूद्र हो ना कि क्षत्रिय हो वो तो गुण से पता चलता है। नहीं कि उसके जन्म से तो डज नॉट मैटर। कर्ण है। कर्ण यदि वो सारथी का पुत्र है तो क्या है? वो क्षत्रिय के सम्मान का अधिकारी है। कुंती क्यों उसको त्याग करेगी? यह जो देवता से उसका तो जन्म हुआ है। तो सतयुग में यह सब चलता किंतु अभी द्वापर तक हम पहुंच गए हैं। धर्म ऑलरेडी दो पैरों पर खड़ा है। बोलकर के यह सब गड़बड़ होना शुरू हुआ है। कली में तो और भी आपको पता है कि धर्म सिर्फ एक पैर पर खड़ा है। यानी भीतर में खाली है। अब बाहर में हम सब सुख प्राप्ति की चेष्टा कर रहे हैं। यानी कि धर्म किस लेवल पर है उसके अनुसार वह समाज चलता है। नेचुरली द्रोणाचार्य ने जो किया वह गलत किया। किंतु सामने यह भी देखिए कि धर्म दो पैर पर ऑलरेडी आ चुका था। तो अभी वह क्या करने वाले हैं और हम किसी से भी जैसे स्वामी जी ने कहा कि आप चोरी मत करो ऐसा बोलने से नहीं चलेगा। वह चोरी करेगा ही करेगा यदि वह भूखा है। वो भूखा है और चोरी ना करे। वो कब होगा? जब को उसको भीतर में से अन्न प्राप्त होता है। तभी तो वह बाहर से अन्न की चेष्टा नहीं करेगा। सो दैट वी हैव टू रिमेंबर कि आध्यात्मिक उपलब्धि पर ही धर्म टिका है। जैसे ही आध्यात्मिक उपलब्धि चली गई धर्म सिर्फ बातों की बातों में ही रह जाएगा। इसीलिए कहते हैं ना कि ये जगत में जो कुछ भी है सब महाभारत में है। जो महाभारत में नहीं है जगत में है ही नहीं। जितने भी मोरल डायलेमाज़ हैं सब वहां पर खड़े कर दिए हैं। जिसने महा मैंने तो कहीं महाभारत का ऐसे स्टडी किया नहीं है। ऊपर ऊपर से सब कुछ पता है। किंतु मान लीजिए कि सही स्टडी करेंगे देन यू विल हैव अ वेरी गुड आईडिया ऑफ द वर्ल्ड अराउंड यू। सिमिलर थिंग यू कैन से अबाउट रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर। कि यदि आप रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर का ठीक-ठीक स्टडी करेंगे तो आपको जगत का एक बहुत अच्छा आईडिया हो जाएगा।