Transcript
इस किताब कुछ प्रसंग जो है वह हमने ऑलरेडी डिस्कस किया हैं और अभी आगे बढ़ते हैं किताब में पहले ही हमने देखा की किस तरह से शरद महाराज जो है वो कवालपाड़ा आए थे और फिर मां को भी लेक आए थे मां गोलपारा और योगमा यह चारों किस तरह से कोयल पड़ा आए थे और पड़ा में आते-आते डेरी हो गई थी तो गांव वालों को बेचारे को पता नहीं था किस तरह से डेरी हो जाएगी तो उन्होंने संदेश और नारियल के लड्डू बनाकर के रखें थे जो की रात को उनको खाने को दिए उसके बाद में किया हुआ शर्ट महाराज ने जल्दी-जल्दी इन लोगों को लेकर के कल पड़ा से रावण हो गए रास्ते में कोई एक दुकान पर जाकर के उन्होंने खाना पकाया और फिर भजन आहार किया और जब दूसरे दिन जब गांव में खबर आया की यह तो रात इसलिए तेरी हो गई थी तो जान की जल्दबाजी क्यों थी क्योंकि आज का समय हो गया शारदा महाराज जो है मां के बहुत ही लंबे समय तक उन्होंने सेवा की है और इसी किताब में बाद में आता है की मां की इस पृथ्वी पे इस धरातल पे मां की आखिरी क्षण तक वर्धा महाराज जो है उनके साथ-साथ रहे थे मैन कहा था वर्धा तुम मुझे छोड़ कर के कहानी मत जाना मेरे साथ में ही रहो और जब तक क्या था की मां को गम बहुत है बुखार था तो मां को मां को गम बहुत लगता था तो वर्धा महाराज उनके पास में लेते रहते थे वह बच्चे जैसे थे यंग थे उमर में और उनका डे पूरा शीतल था तो मां अपने दोनों हाथ उनकी पीठ पर रखती थी जिससे की मां का शरीर भी शीतल हो तो ये वर्धा महाराज ने मां की बहुत ही श्रद्धा पूर्वक एक निष्ठा से सेवा की है तो इन्हीं के यह रिमेनिंग पुस्तक का नाम है मंत्र वरदान जी वर्धा महाराज तो अभी महाराज आगे लिखने हैं अमर पिता एक दिन खूब शोकल्स नान कोरिया नूतन एक खाने लाल नेरुनाथूति बड़ी ते तेरी किछु कौवा शाहरुख अनाज पाती लिया जय राम भट्टी ते श्री श्री मां के दर्शन जो है जी साल हुए थे इस साल क्या हुआ की एक दिन वर्धा महाराज के पिता जी और यह जो केदार बाबू जो की शिक्षक महाशय थे और जिनके यह सब विद्यार्थी थे तो यह वर्धा महाराज के पिताजी एक लाल वो किनारे वाला धोती और यह सब कुछ लेकर के मां का दर्शन करने के लिए जय राम भाटी में गए क्या लिखा है असली लाल के किनारे वाला धोती मैन वो उनके गई थी तो गई के दूध में से घर में गी बनाया था तो वो गी वाणी में तैयार गायिका गी अपने खुद के घर पे बना होगा गायिका जी स्वरूपाल अर्थात की वो धन जो होता है राइट और दूसरी तरह का ध्यान वगैरा लेकर के ये सब वो जब ईश्वर के पास जब जाते हैं गुरु के पास जाते हैं इस्ट के पास जाते हैं तो क्या है की खाली हाथ नहीं जाते कुछ वो जो है इट्स एन गुरु दक्षिण ऐसा कुछ लेकर के जाते हैं तो इसलिए उन्होंने ये सब लेकर केदार बाबू के साथ में मिलकर के वर्धा महाराष्ट्र के पिता जी जय राम बाटी गए मां के दर्शन के लिए तकिया संघर्ष बड़ी लैंड पूरा दिन वहां जयरामबाती में रहे और शाम के समय घर लोट आए श्री श्री मां और भक्ति केले डर कोठा बोलते जिया तीन के बोले बोली ते लगले श्री मां और उनके साथ में जो भक्ति लड़के जो रहते थे यह त्यागी शिष्य सब और वह भी कुछ और भी कोई देवोते ही वॉलिंटियर वगैरा होंगे तो उनके बड़े में बात करते करते वर्धा महाराज के पिता जी खाने लगे आहा आहा मेयर कथा की बोलबो आहा आहा मां की बात में क्या कहूं मैन इतना भक्ति से विगलित हो गए हैं की क्या कहे मां के बड़े में साक्षात देवी है यदि मां अपने बच्चे को प्रेम करती है बच्चे को नहलाती है सुलाती है खिलाती है तो क्या है की वह तो एक शारीरिक संबंध है हालांकि मां का प्रेम तो एक ईश्वरीय प्रेम है किंतु खुद के अपने बेटे पर जो प्रेम है वो तो एक सांसारिक संबंध थे किंतु अपनी जो मां थी मां शारदा देवी वह तो जगदंबा थी जगत की मां थी और ये वर्धा महाराज के पिताजी के साथ में वैसे उनका क्या लेना देना क्या संबंध क्या रिलेशन था क्या उनके साथ में ऐसा कोई मेल वगैरा मतलब उनके साथ में कोई पहचान वगैरा थी फिर भी देखिए की वर्धा महाराज के पिता जी वहां पे गए हैं उनको कितना प्रेम से उनको वो स्वागत किया खाना खिलाया कितना उनके साथ से बात किया बेट करके इसलिए बोल रहे हैं बुखार क्या स्नेहा क्या प्रेम कितना निस्वार्थ जो है और मां के साथ में यह जो त्यागी लड़के की सुंदर कथावर्ता और व्यवहार कितनी सुंदर वार्तालाप है कितना सुंदर मधुर व्यवहार है स्वर्गीय देवता सब जैसे की स्वर्ग के देवता है देखिए कितनी बड़ी बात का दी जब वो ईश्वरीय प्रेम जब हृदय को स्पर्श करता है तो जब पूरा जगत जो है वो पूरा हमको स्वर्गीय दिखने लगता है वो मास्टर महाशय जब दक्षिणी ईश्वर जाते हैं तो वो किस तरह से वर्णन करते हैं की जैसे सब किछु जनों मुंह में घोड़ा मैन मॉम अर्थात की ये ये जो है वैक्स जो कैंडल जिसकी बंटी है कैंडल वैक्स का बंता है और वैक्स जो है मॉम उससे हम बहुत साड़ी चीज बनाते हैं वैक्स से जैसे की वो छोटे-छोटे वो फल वगैरा बनते हैं खिलौने के और इस तरह से सब कुछ बंता है ये मॉम से फिर मकान भी बनते हैं छोटे-छोटे खिलौने के वैक्स जो होता है वो जो की स्क्लप्टिंग करते हैं जैसे कोई मूर्ति बनानी है जैसे वो सजाने के लिए पता है ना किसी के घर में सजाने के लिए एक थाली में फल अच्छे होते हैं तो आपको लगेगा देख करके फल कितना सुंदर है किंतु जैसे ही खाएंगे तो एकदम मुंह खराब हो जाएगा क्यों क्योंकि वो असली फल नहीं है वो वैक्स का बना हुआ है फिर उसके ऊपर कलर कर देते हैं तो ऐसी सब घर में सजावट की चीज सब वैक्स की बंटी है तो ये मास्टर महाशय इस तरह से वर्णन करते हैं जब भी दक्षिणी चोर एक बार गए थे तो ठाकुर का प्रेम जो है ठाकुर की जो आध्यात्मिक अनुभूति जो है ठाकुर का जो ईश्वरीय पान जो है वो ईश्वरीय भाव जो पूरे दक्षिणेश्वर काली मंदिर को जैसे भालोबाशर सब जिनिस जनों भालोबाशा दिए बड़ा मैन पेड़ जो है वो भी वो ठाकुर के ऐश्वर्या प्रेम से बना है ये पेड़ के ऊपर पक्षी जो बैठा है वो भी ईश्वरीय प्रेम से बना है ये जो बिल्डिंग जो है सब काली मंदिर के विष्णु घर के वो भी जैसे ठाकुर के ऐश्वर्या प्रेम से ईश्वरीय स्नेहा से ये सब बिल्डिंग बने है तो मास्टर महाशय लिखने हैं जैसे की वैक्स से जैसे वो खिलौने वगैरा बनाते है तो ऐसे ही सब कुछ जैसे की मदर घोड़ा अर्थात की वैक्स का बना हुआ जैसे की ठाकुर के भालोबाशा ठाकुर के प्रेम का बना हुआ तो जब भी वो ईश्वर का स्वयं अवतरण होता है तो ईश्वर का प्रेम भी ईश्वर का जो आशीर्वाद जो है वो आशीर्वाद पूरे उनके आसपास परिपार्श्विल जाता है और सबको अपने कलर में वो रंग लेट है जैसे की भगवान बुद्ध या भगवान महावीर की फोटो जब भी देखा होगा छवि जड़ी अच्छी होगी तो आपने देखा होगा की वो बुद्ध जो है वो तो अहिंसा के अवतार थे तो अहिंसा जब भगवान बुद्ध वहां पर हाजिर होते थे तो यहां पर शेर जो है शेर अपना शिकार करना भूल जाता था यह जो भेद बकरी या गे जो है वे लोग शेर से डरना भूल जाति थी क्यों क्योंकि पता है की शेर जो है उनका शिकार नहीं करेगा तो वे क्या करेंगे की यहां पर वह भगवान बुद्ध बैठे हैं ध्यान मैग्ना है वह बुद्धि वृक्ष के नीचे में एक और वो शेर बैठा है एक और वो भेद बकरी या बैठी है क्योंकि वो भगवान बुद्ध की प्रेजेंस में उनकी हाजरी में वो शिकार करना या शिकारी से डरना भूल जाते हैं वो जैसे किसी तालाब में जाएंगे जहां पे मछलियों का शिकार नहीं होता हम लोग वो आठ पर वगैरा जाते थे ट्रेनिंग सेंटर से तो वहां से वापस आते हुए ठाकुर एक जगह पे रुक थे वो वहां पे कोई वैष्णव उत्सव वगैरा वो मैं एक्जेक्टली नाम भूल गया पानी हटी नहीं है और एक जगह है जहां पे ठाकुर रुक थे बहुत बड़ा एक तालाब है और वहां पे कोई वैष्णव रहते थे या वैष्णव उत्सव होता था मैं थोड़ा सा खोज कर बताऊंगा बाद में किंतु वहां पर तालाब है मुझे यह बात याद है पक्का की तालाब में किंतु मछलियों का वो पकड़ना माना है तो हम लोगों ने हमारे साथ में यहूदी मुरमुरा वगैरा कुछ था तो जैसे ही तालाब में फेंका इतनी साड़ी मछलियां इकट्ठा आने के लिए कोई डर नहीं की यह लोग हमको पकड़ करके शिकार कर लेंगे क्यों क्योंकि वो तालाब में शिकार होता ही नहीं तो मछलियां भी डरना भूल गई है की हां किसी इंसान से डर कर के रहना चाहिए वो हमको पकड़ के ले जाएगा और पाक करके का लगा तो वैसे ही जहां पे ये जो ईश्वरीय प्रेम राहत है वहां पे दूसरों का एक्सप्लोइटेशन करना या दूसरों का ऊपर में दूसरों का शोषण करना या दूसरों को कष्ट देना ये बात भी जो है शोषण करता कष्ट करता जो ये लोग होते हैं कठोर मां के लोग वो बात भूल जाते हैं और जो कमजोर होते हैं वो डर करके रहना भूल जाता है क्योंकि ईश्वर का प्रेम जो कमजोर है उसको सशक्त करता है और वो जो जैसे वो जो की किसी का शोषण करने वाला है करूर हृदय है किसी का तो कुर्ता तो यह परिणाम है तो यह जो वर्धा महाराज के पिताजी जो कहते हैं की देवता मैन मां जो जहां पर रहती है अभी हमको तो पता है मां की लाइफ जो है मां की बायोग्राफी है हमने बड़ी है मां के आसपास में देवता कहां रहते थे वो जो पगली मानी थी वो पगली राज थी वो नलिनी और मकू सब समय उनका द्वेष ईर्षा झगड़ा सब लगा ही राहत था और इसी के अगले प्रसंग में महाराज ने ही लिखा है की शरद महाराज क्यों आए थे जय राम बाल्टी तो मां के जो भाई थे काली मामा वधाम और प्रश्न मामा उन लोगों में संपत्ति का बंटवारा करने के लिए शरद महाराज को सब पूरे मठ मिशन के जनरल सेक्रेटरी है कोलकाता में बैठ करके पूरे मठ मिशन को चलते हैं वर्ल्ड वाइड वो कम छोड़कर के एक गांव में इन लोगों के पास में संपत्ति भी कुछ नहीं है वैसे गरीब ब्राह्मण है छोटी सी जमीन है और छोटा सा कुछ वो ये होगा वो कुटिया वगैरा उसका बंटवारा करने के लिए शरद महाराज को कहां से कहां आना पड़ा तो अभी यह सब पागल लोगों को लेकर के मां-बेटी है किंतु फिर भी मां की प्रेजेंस से सब लोग जैसे की देवता हो जाते हैं इसीलिए यह वर्धा महाराज के पिताजी कहते हैं शॉप जीनो स्वर्गीय देव मनुष्य जो है उसके भीतर में इतना विनय हो सकता है इतना नामराव व्यवहार हो सकता है मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था ना ही मैंने कभी इसको देखा है की श्रद्धावन अमर मोटो लॉकर प्रतियोगिता और सेवा भाव और उनके जो है भक्ति और भक्ति इनके प्रति क्या श्रद्धा है वर्धा महाराज के पिताजी जो है वो नागाणिया आदमी है वो किसान है वो गांव में रहते हैं एक छोटे से ना ही कोई धन संपत्ति है ना ही कोई उनका वैभव है ना ही वो कोई बड़ा पद है जिससे की वो जाकर के लोगों को इंप्रेस कर सकें बस और हृदय में मां के प्रति एक सरल भक्ति ऐसा भी नहीं है की कोई बहुत मां की सेवा वगैरा कर दी हो जैसे ये योगेंद्र महाराज है या शरद महाराज है या तो फिर वर्धा महाराज स्वयं जो की बाद में मां की इतनी सेवा करने वाले थे उनके पिताजी ने तो कुछ नहीं किया था सिर्फ एक सरल विश्वास लेकर के मां के पास गए थे वो बिल्कुल नागण्य आदमी है वो एक क्या एक धोती लेकर के गए थे कुछ अनाज धन चावल लेकर गए थे वो मार्केट श्री चरणों में अर्पण करने के लिए दक्षिण के रूप में वही है उनकी पहचान और वही है उनका वह जो है क्या कहेंगे तो वो ऐसे सरल बिल्कुल नागण्य लोक के प्रति भी व्यक्ति के प्रति भी इतना श्रद्धा भक्ति वो प्रकट कर सकते हैं ना ही कल्पना की है ना ही कभी देखा है भी रहते हैं सब देवता है अभी वह बेचारे को पता नहीं है की वो पगली मानी भी है और वह पगली राजू भी है वह क्या सब नाटक करते हैं किंतु जब वो ईश्वरीय आवेश होता है तो ये सब चीज दिखाई नहीं देती ग्वालपाड़ा आश्रम में अश्लील ही अमर पिता सब समय तहाड़े सॉन्ग कर सकते हैं वहां पर एक छोटा सा एक छोटा सा आश्रम है तो जैसे ही कोई भक्ति है कोई त्यागी संतान है कोई साधु है कोई भी है जयरामबाती जान के लिए कल पड़ा आएगा वह कल पड़ा आश्रम में विश्राम करने के लिए रुकेगा वैसे ही यह पिताजी वहां पे जाएंगे उनका संघ करेंगे और उनके हाथों जय राम बाटी भेजना के लिए कुछ ना कुछ दक्षिण वगैरा जो है वो दे देंगे अनाज पाती ये धन है चावल है वगैरा जय राम बाटी उनके हाथों भिजवाएंगे अमर पिता श्री श्री माया निकट दिखावा कोई विषय उपदेश आई है पिताजी ने मां के पास में क्या कोई दीक्षा ग्रहण की थी या तो फिर ऐसा का सकते हैं की मैन क्या कृपा करके उनको दीक्षा प्रधान की थी वो पता नहीं क्या आध्यात्मिक साधन भजन के लिए कोई दिशा निर्देश दिए थे वह पता नहीं किंतु उनके घर में ठाकुर का फोटो एक छवि हमेशा राहत था घर ठाकुर एक खानी फोटो छीलो नित्यम एयरपोर्ट ठाकुर समूह के बोस्नियन ठाकुरर समूह के बोस्नियन अनिक कोरिया जल खबर खेतान घर में ठाकुर का फोटो रखा था प्रतिदिन आहार स्नान करने के बाद में फोटो के सामने बैठ करके अपनी करते थे फिर जो है सुबह का नाश्ता करते थे फिर जो है अपना कम जो भी है करने के लिए वो वहां से प्रस्थान करते थे तो ये पूरा एक प्रश्न समाप्त हुआ अभी दूसरे प्रसंग में वर्धा महाराज लिखने हैं 1910 की साल है देखिए यह कितने पुराने दोनों का समय ज्यादातर मां के बड़े में रिमिनेशंस है जो ज्यादातर भक्तों ने लिखे हैं वो 1911 1912 के बाद में ही लिखे गए हैं जब से की मां नियमित रूप से वो उद्बोधन में वो जो उद्बोधन भवन का जो निर्माण हुआ मातृ मंदिर का शरद महाराज ने मां की सेवा के लिए मां के आगमन के लिए जब मां कोलकाता में आई थी तो कहां कभी-कभी भक्तों के घर रहती थी कभी-कभी वो भाड़े का घर लेना पड़ता था सबको असुविधा होती थी तो मां की सेवा के लिए मां के रेट निवास के लिए कोलकाता में वो देना मतलब वह सुधा लेकर के भी शरद महाराज ने वहां पर मकान बनाया था वो मकान का नाम था उद्बोधन भवन या तो मायाबादी 19096 या नो दोनों में से एक साथ भूल गया वो तैयार हो गया और फिर मां वहां पर नियमित जान लगी तब से ज्यादा से ज्यादा भक्तों का मां को प्रणाम करने का सुयोग मिलने लगा और तब से लेकर के वो कलकत्ता में धीरज ठाकुर जैसे की वो केशव सेन ठाकुर के बड़े में न्यूज़पेपर में लिखना शुरू किया तब से कोलकाता के लोगों में ठाकुर के बड़े में जो है पता चलना शुरू हुआ की हां दक्षिणेश्वर में एक परमहंस है वो बहुत ही मतलब उनकी आध्यात्मिक अनुभूतियां सर्वोच्च कक्षा की है और उनके पास जान से आशीर्वाद देते हैं आध्यात्मिक दिशा निर्देश देते हैं ऐसी बात वो केशव सेन की वजह से वो कलकत्ता में फैलने लगी और सब जनसाधारण को पता चलने लगा तो वैसे ही ये उद्बोधन भवन का निर्माण होने के बाद में धीरे-धीरे करके मां का आगमन जो कोलकाता में नियमित रूप से शुरू हुआ वहां पर भक्तों के प्रणाम करने की वो सुविधा होने लगी इसकी वजह से ज्यादा से ज्यादा भक्तों जो है मदरसन करने के लिए आने लगे और बहुत सारे लिखे गए हैं मां के शिष्यों द्वारा वो इस समय के बाद पहले से ही जा रही थी बोल करके वो इनके भक्ति जो है उनकी रिमेंशंस 1910 इस तरह के जो की काफी पुराने कहे जाएंगे है तो 1910 का समय है श्री श्री मां प्राय एकवचन तक गया कोलकाता निज़ाबादइट जैबर पोते एक दिन कल सुकून के लोया शायरी गुरुर गाड़ी से पॉल पढ़ाई अश्लील एवं शिशु पैर सुंदर समय केदार बाबू ना होईलैंड 1 साल बीट गया है एक बार एक एक वन एयर वो समाप्त हो चुका है मां उसे समय जय राम बाटी में थी उसके बाद में ग्वालपाड़ा कोलकाता जान के लिए फिर से प्रस्थान किया रास्ते में आई कुछ तीन-चार वो तीन कर गुरु वो बैलगाड़ियां थी उसमें बैठ करके और कुछ समय विश्राम किया और संध्या के समय संध्या हो गई है केदार बाबू की मां को लेकर के विष्णु पर जान के लिए प्रस्थान किया देखिए किस तरह से वह मा कहती है ना कव्वाल पड़ा अमर बैठक खाना तो कल पड़ा मैं किस तरह से वो कोलकाता जान के रास्ते में आकर के विश्राम करती है और कोलकाता से ए करके जयरामबाती आने के समय में वो विश्राम करती है कुछ समय विश्राम किया मैं सबको आशीर्वाद दिया दर्शन दिया फिर ये केदार बाबू की मां है उनको उसे साथ में कोई चाहिए वो बाकी सेवा करने के लिए मां का वो केयर करने के लिए तो वो जो है केदार बाबू की मां को लेकर के विष्णु पूर्व जो है वे लोग रावण हुए हैं किछु दिन परेशान है की मतलब इन लोगों ने सुना ये ये समय की बात है यह समय जो मां कोलकाता गई थी तो शशि महाराज ने स्वामी रामकृष्ण नंद जी ने बहुत ही मेहनत करके परिश्रम कर-कर के मां को चेन्नई में निमंत्रण दिया था मद्रास उसे समय का नाम था तो मां को कहा की मां अब दक्षिण देश के दक्षिण भारत के जितने भी तीर्थ दर्शन है वह करने के लिए आप मद्रास पधारिए मैं खुद जो है आपको यह सब दर्शन करवाऊंगी और ये जो दर्शन माथुर में जाकर के दक्षिण भारत में जाकर के मैन ये जो रामेश्वर वगैरा मंदिर के जो दर्शन किया तीर्थ स्थान के दर्शन किया बहुत ही सुंदर कहानी है उसको हम एक दिन पढ़ेंगे किस तरह से विभिन्न तीर्थ क्षेत्र में जाकर के मैन क्या-क्या उनको क्या-क्या दर्शन हुए थे क्या-क्या एन गलती हुई थी और मैन क्या कहा था किंतु यह जो पूरा दक्षिण भारत में जो तीर्थ दक्षिण भारत के तीर्थ क्षेत्र का मैन जो भ्रमण किया इसके पीछे एक दूसरी कहानी है शशि महाराज को पता था की उनका जो स्वास्थ्य जो है वो धीरे-धीरे करके अभी वो नष्ट हो रहा है उनको टीवी लगभग होने वाला था तो उन्होंने सोचा की जड़ी में अपने स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए चिकित्सा का आरंभ कर लूंगा मैं अपने खुद की आरोग्य के लिए मैं कोई डॉक्टर के पास किसी विद्या के पास जाकर के बोलूंगा की मुझे इस तरह से ये बीमारी है तो वे लोग तो मुझे पूरा विश्राम करने के लिए बिठा देंगे एक के बाद एक जो है ओशूट खिलाना शुरू कर देंगे तो फिर क्या होगा की फिर मैं जो है वो मां को इतना वो दक्षिण भारत में जो बुलाया है तो मां की सेवा नहीं कर पाऊंगा क्योंकि मां जब आएगी बिल्कुल नई जगह पे जा रही है तो कितना केयर करना पड़ता है प्रत्येक छोटी-छोटी जो है किस तरह से संभल पड़ती है हमारे आश्रम में जब प्रेसिडेंट महाराज वाइस प्रेसिडेंट महाराज जब आते हैं तो पूरा आश्रम जो है वो कम में ग जाता है महाराज का वो क्या आहार करते हैं उनका डायट चार्ट होता है उनके सेवक महाराज जो होते हैं वो पूरा हमको बता देंगे की किस तरह से महाराज को क्या चाहिए क्या नहीं वो दीक्षा का जो समय होता है दीक्षा के समय क्या करना है वो पूरा इंस्ट्रक्शन होता है पूरा आश्रम जो है महाराज की सेवा करने के लिए लगता है तो वैसे ही ये अनुभव एक बोलकर के मैं अनुमान करके का रहा हूं की शशि महाराज ने मां के आगमन के लिए किस तरह से तैयारी की होगी जैसे की पूरे दक्षिण भारत के जितने भी भक्ति हैं महाराज शशि महाराज ने कहा था मेरे मां की दो इच्छाएं थी एक तो श्री मां को दक्षिण भारत में लाना और फिर राजा महाराज को स्वामी ब्रह्मानंद जी को दक्षिण भारत में लाना इन दोनों को एक के बाद दक्षिण भारत में लाकर के मद्रास लाकर के दक्षिण भारत के जितने भी तीर्थन क्षेत्र रहे उनका दर्शन करवाना और दक्षिणी के जितने भी भक्ति हैं उनके पैरों में फेक देना इस तरह से महाराज तो मैन दक्षिण भारत के जितने भक्ति हैं वो मां के दर्शन करके धनिया होंगे राजा महाराज के दर्शन करके धनिया होंगे इसके लिए उन्होंने जो परिश्रम किया है ऑलरेडी वो जो उनका जो व्याधि है वो व्याधि दिखाई दिया था डॉक्टर ने का दिया था की आपको जो है औषध वगैरा की बहुत ही आवश्यकता है विश्राम की आवश्यकता है किंतु डॉक्टर को जो है वैद्य की बात नहीं सनी अपने स्वास्थ्य जो है स्वास्थ्य का बलिदान दे दिया मां और राजा महाराज की यात्रा का बंदोबस्त करने के लिए उनके आगमन की तैयारी करने के लिए और आखिर में मां जब वापस चली गई राजा महाराजा जब वापस चले गए तब जाकर के उनका स्वास्थ्य इतना खराब हो गया डॉक्टर को बेंगलुरु जाकर के दिखाए तो वो डॉक्टर कहता है वैद्य कहता है अरे आपने यदि कुछ समय पहले कहा होता तो आपका इस व्याधि का इलाज हो सकता था अब ये व्याधि आपके ये जो लक्स है वगैरा उतनी फेल गई है की अभी आपकी कोई भी ट्रीटमेंट संभव नहीं है देहात जाना जो है बेहद त्याग जो है वो अभी वो होने वाली वो देहात त्याग होने की अभी पुरी संभावना है ऐसा विद्यान का दिया तो उसे समय शशि महाराज ने यह बात कहीं थी वो जब पता चला की मां की सेवा करने के लिए राजा महाराज की सेवा करने की उन्होंने अपने स्वास्थ्य को जो है वो नजरअंदाज कर दिया तब वो बेंगलुरु में जाकर के बैठ करके उन्होंने ये बात कहीं थी डॉक्टर के साथ में बात हो जान के बाद में की मेरे मां में दो साध थी साध अर्थात की इच्छा थी की दक्षिण भारत में मां को बुलाऊं दक्षिण भारत में राजा महाराज को बुलाऊं और उनकी सेवा करूं दक्षिण भारत के जो जितने भी भक्ति हैं उनके चरणों में सोप डन तो ये दो उनकी इच्छाएं समाप्त हुई उनका स्वास्थ्य धीरे-धीरे करके इतना फिर वो ये होने लगा वीक होने लगा की वो स्वास्थ्य उधर करने के लिए ट्रीटमेंट के लिए कोलकाता आए कोलकाता में वहां पे रहे वो उद्बोधन में वो मेयर बड़ी में और वही पे उनका देहांत हुआ तो देखिए मां का हृदय में भी कितना कष्ट हुआ होगा की मेरे जो लड़का जो है उसका मार्केट तो सब त्यागी संतान तो मां के ही संतान थे उनका देख जान से उनकी वो महासम्मती से मां को कितना कष्ट होगा तो मां उसे समय वहीं पे थी तो यह पुरी मां के दक्षिण भारत के यात्रा के पीछे ये कहानी है सीक्रेट कहानी है छोटी शशि महाराज को जो पढ़ने हैं उनको पता है तो यहां पे जब महाराज लिखने हैं वर्धा महाराज के 1910 में जब मां जय रामबाती से कोलकाता जा रही थी उसे समय पड़ा विश्राम किया था तो और फिर यह केदार बाबू की मां को लेकर के गई थी तो इस समय वह कोलकाता जाकर के फिर वहां से दक्षिण भारत गए थे और वहां पर पूरा दक्षिण भारत के तीर्थ क्षेत्र का भ्रमण करके वापस लौटे थे अभी एक बात है मैन एक छोटा सा इंटरेस्टिंग इंसिडेंट एक छोटी सी इंटरेस्टिंग फैक्ट की मां तो जब ट्रेन में मुसाफिर करेगी तो ट्रेन में तो क्या है ना की लोअर बर्थ होता है अपार बर्थ होता है तो मां का तो पर तो किस तरह का है मां के पर को तो अर्थराइटिस है मां तो अपार बर्थ में जा ही नहीं शक्ति तो लोअर बर्थ जो होता है नीचे वाली सीट वहीं पर मां बैठेगी मां विश्राम करेगी तो भी मां के अपार बर्थ में कौन बैठेगा कोई नहीं बैठ सकता कोई संभव ही नहीं है तो अभी टिकट जो ली है तो टिकट तो जिन करके ले जाति है तो मां का अपार बर्थ किंतु खाली राहत था और वह जो मां के जो सब सेवक संगिनी वगैरा जो थे वो साथ-साथ में वो मतलब बैठ करके वो किसी भी तरह से विश्राम कर लेते थे तुम मां के ऊपर में कोई नहीं बैठता था ट्रेन में जर्नी करनी है तो यह सब चीज किस तरह से होती है वो मैंने एक छोटा सा एक आवाज है ये सब बहुत साड़ी बातें हैं मां के दक्षिण भारत के भ्रमण की वो किसी दिन एक बार वो मैं एक बार वो किताब लेकर के हम इसको पढ़ेंगे तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं और आज तो फिर रथ यात्रा है सबको शुभकामनाएं और यहां आश्रम में भी फिर बहुत अच्छा उत्सव वगैरा होने वाला है वो रथ जो है वो रथ का वो परिभ्रमण भी होगा परिक्रमा भी होगी मंदिर के आसपास वो भक्ति लोग वगैरा बहुत कोई आएंगे वो कीर्तन वगैरा बहुत अच्छा होगा हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा