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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः कंप्लीट वर्क्स ऑफ स्वामी विवेकानंद वॉल्यूम टू कॉस्मस द मैक्रो कजम इस प्रवचन का ऑलमोस्ट हम अभी लास्ट पैराग्राफ तक आ गए हैं हमने देखा कल कि किस तरह से स्वामी जी एक बहुत ही पोएटिक लैंग्वेज में हालांकि यह फॉर्म जो है वह पद है गद है गद दैट इज द प्रोज फॉर्म प्रोज फॉर्म में कितना पोएटिकली व वेदांत के अद्वैत वेदांत के जो हाईएस्ट आइडियाज है उसको रखते हैं तो वह कल हमने देखा आज वह जो लास्ट पैराग्राफ बचा है उसको मैं पढ़ रहा हूं स्वामी जी कहते हैं दिस इज द मिस्ट्री ऑफ द यूनिवर्स इस विश्व ब्रह्मांड का यह एक मिस्ट्री यानी कि रहस्य एक पहली है एक उलझन है एक रिडल है इस विश्व ब्रह्मांड की धाव आर्ट द मैन ऊ आर्ट द वुमन ऊ आर्ट द स्ट्रांग मैन वकिंग इन द प्राइड ऑफ यूथ श्वेता स्वत का श्लोक है स्वामी जी यहां पर उसको एजेक्ट ट्रांसलेशन नहीं किंतु ऑलमोस्ट नियर ट्रांसलेशन करके बता रहे हैं ईश्वर ही पुरुष है ईश्वर ही स्त्री है अपने युवानी का जिसको गर्व है इस तरह का यंग मैन भी ईश्वर ही है जो चल जिसको चलने में तकलीफ हो रही है इस तरह का वृद्ध व्यक्ति भी ईश्वर ही है दाउ आर्ट द ओल्ड मैन टोटरिंग ऑन क्रचस ऊ आर्ट इन एवरीथिंग थ सब कुछ के भीतर में सब कोई चीज के भीतर में आप ही हो तुम ही हो ऊ आर्ट एवरीथिंग ओ लॉर्ड जो विश्व ब्रह्मांड में कुछ भी है वह सब आप ही हो हे ईश्वर दिस इज द ओनली सॉल्यूशन ऑफ द कॉस्मस दैट सेटिस्फाई द ह्यूमन इंटेलेक्ट ह्यूमन इंटेलेक्ट को इस विश्व ब्रह्मांड के बारे में यदि सोचना शुरू करेंगे कि किस तरह का ब्रह्मांड होना चाहि ईश्वर यदि सर्वशक्तिमान है तो उन्होंने एक सर्वशक्तिमान ईश्वर ने किस तरह के ब्रह्मांड की रचना की होगी यह हम इंटेलेक्चुअली जद सोचना शुरू करेंगे तो यही तरह का थिरी हमारे मन को अच्छा लगेगा इन वन वर्ड वी आर बोर्न ऑफ हिम वी लिव इन हिम एंड अन टू हिम वी रिटर्न जयदिश में कहा जाए तो ईश्वर में से हमारा जन्म हुआ है ईश्वर में हमारा जीवन है ईश्वर में ही हम फिर से विलीन हो जाने वाले हैं सृष्टि स्थिति प्रलय की यह जो साइकल है जन्म मृत्यु जरा व्याधि क्या यह जीवन चक्र यह ईश्वर के ऊपर में ही है ईश्वर के भीतर में ही है ईश्वर में से ही प्रकट होता है ईश्वर में ही समाहित हो जाता है तो यह स्वामी जी का लेक्चर यहां पर समाप्त हुआ और आखिर में जो स्वामी जी यह जो पैसेज क हैं उस पैसेज में अभी तक का जो कुछ भी हमने पढ़ा उसका एक सार संक्षेप उन्होंने यहां पर हमारे सामने प्रस्तुत किया है अभी हम इस चीज को किस तरह से देखेंगे देखिए कि जो आपने वेदांत थोड़ा पढ़ा होगा मैंने जैसे थोड़ा बहुत पढ़ा है तो हमको लगेगा कि जब स्वामी जी इस प्रवचन की शुरुआत करते हैं तो एक बहुत ही द्वैत आईडिया से करते हैं एक एक सांख्य ज ऐसा एक विचार कि बीज में से वृक्ष बनता है वृक्ष फिर से बीज में इवॉल्व होता है और फिर उस बीज में से एक नया वृक्ष खड़ा होता है और फिर यह इस आइडिया से शुरुआत करके स्वामी जी हमको आखिर में इस आईडिया तक ले जाते हैं बीज ईश्वर में से बना है और जब वृक्ष इवोल्व होता है तो ईश्वर के रूप में इवोल्व होता है तो यहां तक तो फिर भी यह एक धवक आईडिया चलता है कि एक सृष्टि है एक ईश्वर है जैसे कि आप कहेंगे कि गाय के दूध में से घी बनता है तो आप घी कोई गाय के दूध से तो अलग नहीं है और हालांकि घी में से फिर से दूध नहीं बनने वाला शायद किंतु घी खा कर के हम लोग रुष्ट पुष्ट होंगे हम लोग गाय को खाना खिलाएंगे हम गाय की केयर करेंगे तो गाय फिर से जब दूध देगी तो फिर उस दूध में से फिर से घी बनेगा माने इनडायरेक्ट ली हम इस जीवन चक्र को बता सकते हैं कि दूध की दूध गाय में से दूध आता है दूध में से घी बनता है घी मनुष्य खाता है मनुष्य गाय की केयर करता है गाय फिर से दूध देती है दूध फिर से घी बनता है इस तरह का कुछ हमको दिखाई देता है कि जिस पदार्थ में से यह विश्व ब्रह्मांड प्रकट हुआ उसी पदार्थ में विश्व ब्रह्मांड इवॉल्व हो रहा है वो इवोल्व तो होता ही है किंतु साथ में इवॉल्व भी उस पदार्थ में होता है ये एक हमको लगता है कि द्वै दिक आईडिया है किंतु आखिर में स्वामी जी जो अद्वैत पर हमको ले आए कि किंतु आखिर में जो यह जो है स्वामी जी का सेंटेंस ही इज ट कम्स डाउन एंड बिकम द लोएस्ट एटम एंड स्लोली अनफोल्डिंग हिज नेचर रिजॉस हिमसेल्फ यानी कि उसी पदार्थ में वह रिजोन हो जाता है और आखिर में यह जो सेंटेंस है वी आर बो ऑफ हिम वी लीव इन हिम एंड अन टू हिम वी रिटर्न उन्हीं में से हम प्रगट होते हैं उस प्रगट होने के बाद में उन्हीं पर हमारा विकास होता है और उन्हीं में हम समाहित हो जाते हैं दिस इज प्योर अद्वैत जैसे कल हम बात कर रहे थे कि यदि थिएटर में हम बैठे हैं और यहां पर सामने स्क्रीन है और स्क्रीन के ऊपर में हमको पिक्चर दिखाई देती है तो अद्वैत क्या कहता है स्क्रीन जो है वह तो न्यूट्रल है पिक्चर जो है वह माया है स्क्रीन ब्रह्मण है और जो पिक्चर दिखाई देता है ब्रह्मण के ऊपर में यह परछाई के स्वरूप हमको विश्व ब्रह्मांड का भ्रम होता है किंतु यदि इस एनालॉजी को हम उसके लॉजिकल एक्सट्रीम तक ले जाए तो एक्चुअल ब्रह्मण कौन है नहीं स्क्रीन नहीं की यह पिक्चर जो उसके ऊपर में प्रोजेक्ट होता है जो ऑडियंस है वो ब्राह्मण है क्यों क्योंकि यहां पर होता है देखिए ये जो क्लासिकल फिजिक्स और आज का मॉडर्न फिजिक्स इन दोनों में देयर इज अ शार्प डिवाइड देयर इज अ वेरी स्ट्रांग डिवीजन जो क्लासिकल फिजिक कहता है कि जो वर्ल्ड है इट इज एन ऑब्जेक्टिव रियलिटी इस पृथ्वी पे इस ब्रह्मांड में मनुष्य या तो फिर कॉन्शसनेस है या नहीं है इसका फर्क नहीं पड़ता यह पृथ्वी सूर्य के आसपास ऑर्बिट करती है भ्रमण करती है फिर चंद्र पृथ्वी के आसपास में घूमता है यह जो फोर्स ऑफ ग्रेविटी है इलेक्ट्रोम मैग्नेटिज्म है स्ट्रांग न्यूक्लियर फोर्स है वीक न्यूक्लियर फोर्स है यह जो फ्यूजन होकर के तारे का जन्म होता है उसका जीवन चक्र है फिर तारे का वह फ्यूल जब खत्म हो जाता है तो एक्सप्लोजन होकर के फिर आखिर में उसमें से न्यूट्रॉन स्टार या तो फिर ब्लैक होल बनेगा तो यह जो पूरी फिजिक्स एस्ट्रोनॉमी कॉस्मोलॉजी की प्रोसेसेस है वह चलती ही रहेगी उसमें मनुष्य का रहने का नहीं और मोर देन ह्यूमन ये जो कॉन्शसनेस जो है वो रहे ना ना रहे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता तो एक क्लासिकल फिजिक्स हमको यह बात बता रहा था अभी क्वांटम डायनेमिक्स क्या कहता है क्वांटम डायनेमिक्स ने हमारे सामने इस तरह का एक रेवोल्यूशन आईडिया रखा है मान लीजिए कि यह किताब मेरे पास में है अभी मेरे हाथ में है तो जब तक यह किताब मेरे हाथ में है तब तक ही यह किताब में मैं जब तक यहां पर हूं तब तक ही यह किताब मेरे हाथ में है मान लीजिए कि यह किताब रख कर के मैं अपने कमरे में चला गया या तो फिर मैं मंदिर में चला गया तो मेरी ऑफिस में तो कोई भी उपस्थित नहीं है तो क्वांटम डायनेमिक्स कहता है कि हो सकता है कि यह किताब का स्थान अनिश्चित हो जाता है हो सकता है यह किताब यहां पर भी हो देर इज 1 पर चांस ये किताब दिल्ली में भी हो 1 पर चांसेस दैट यह किताब बेलूरमठ में भी हो 1 पर चांसस द दे किताब चांद पर भी हो सूर्य पर भी हो विश्व ब्रह्मांड में कहीं भी हो सकती है जब तक मैं वापस आकर के किताब को दर्शन नहीं करता हूं किताब का ऑब्जर्वेशन नहीं करता हूं तब तक इस किताब का स्थान अनिश्चित है ऑफकोर्स यह जो अनसर्टेनटीज है वह सब एटॉमिक पार्टिकल के लिए है किताब का जस्ट मैं एक उदाहरण दे रहा हूं किंतु इवन फॉर सब एटॉमिक पार्टिकल्स यह एक रेवोल्यूशन आइडिया है कि ऑब्जर्वर जब उस पार्टिकल को ऑब्जर्व करता है तभी उसका स्पीड उसका वेलोसिटी या तो फिर उसका लोकेशन फिक्स होगा यह जो रेवोल्यूशन आइडिया फि क्वांटम डायनामिक्स में आया हम देखते हैं कि यह रेवोल्यूशन आइडिया वास ऑलवेज प्रेजेंट इन अद्वैत वेदांत द वर्ल्ड इज अ सब्जेक्ट ऑब्जेक्टिव रियलिटी बोलकर के कुछ है ही नहीं यदि मैं यह कहता हूं कि किताब का मेरे बाहर में मेरे मन के बाहर में अस्तित्व है तो नहीं है इवन मैं खुद मैं स्वयं कृष्ण सखानू का कोई अस्तित्व नहीं है एक ईगो का लेयर है जो कि मेरे सही स्वरूप के ऊपर में है और मुझे एक प्रतीत करवाता है मेरे मेरे मन में एक आभास एक भ्रम खड़ा कर ता है कि हां मेरे करोड़ों करोड़ों जन्म पहले हुए थे कोटि कोटि जन्म हुए थे कोटि कोटि जन्म होने वाले हैं और इस जन्म जन्मांतर की यह जो मेरी साइकिल यात्रा जो है उससे पसार होते-होते धीरे-धीरे करके सद कार्य करते-करते मैं अपने जितने भी दुर्गुण है जितने भी दुष्कर्म है उसको मैं काटता जाऊंगा मेरे संस्कार का बंधन जो है वह धीरे-धीरे दूर होता जाएगा आखिर में मुझे निर्वाण प्राप्त होगा और मैं कोई अनंत महासत्ता में विलीन हो जाऊंगा य इवन यह जो हमारी आध्यात्मिक यात्रा इट सेल्फ जो है दैट इट सेल्फ इज एन इल्यूजन हालांकि इल्यूजन शब्द नहीं यूज करके हम लोग यूज करते हैं इग्नोर अद्वैत वेदांत का जो बेस्ट वर्ड जो है माया को डिफाइन करता है दैट इज इग्नोर हम हमको पता नहीं है कि हमारा सही स्वरूप क्या है यह सही स्वरूप के बारे में अज्ञ होने की वजह से ही हमको यह सब कुछ दिखाई देता है मेरे मन में कभी-कभी क्रोध आ जाता है जैसे देखिए कि अभी कुछ दिनों से ऐसा हो रहा है कि हमारे यहां जहां पर मैं रहता हूं देयर आर सम प्रॉब्लम्स कुछ कुछ समस्याएं खड़ी हो रही है तो अभी सब समय मेरा मन जो उद्विग्न रहेगा मैं उद्विग्न रहेगा यदि मेरे मन में यह इस तरह का एक कटुता का भाव जदी चलता रहेगा कि अरे अरे वो ऐसा क्यों कर रहा है मतलब जो भी इश्यूज है यहां पर लोकल जद यह होता है ह्यूमन नेचर है कि यह सभी इश्यूज गोल गोल घूमते ही रहेंगे आपके मन में और फिर आखिर में कोई मनुष्य त्राहिमाम होकर के नासी पास हो कर के मैं क्या सॉल्यूशन लाऊं यह जो मेरे सर पर सब समय एक नेगेटिविटी का एक क्लाउड एक बादल बना हुआ है कहां से मैं यहां किस तरह से मैं इससे छुटकारा पाऊं किस तरह से मैं इससे मुक्ति पाऊं तो वह किसी ना किसी एडिक्शन का शिकार हो जाता है वह स्मोकिंग करेगा ड्रिंकिंग करेगा या तो फिर यह बींज वाचिंग आजकल चलता है यह जो मोबाइल के ऊपर में जो सब कार्यक्रम आते हैं वो एंटरटेनमेंट के बिंज वाचिंग एक नया एक शब्द आज हमको मिला है वो दिन-रात वह बैठ कर के किसी ना किसी वो एंटरटेनमेंट को वो ऑब्जर्व करता रहेगा एंटरटेनमेंट देखता रहेगा क्योंकि क्या है कि जिस क्षण वह अपना मन इस मोबाइल के ऊपर में से ये सोशल मीडिया के आकर्षण से वह मुक्त करने का प्रयास करेगा वैसे ही वह नेगेटिविटी का क्लाउड फिर से उसके सर पर सवार हो जाएगा और उसको इतना मतलब नासी पास कर देगा इतना त्राहिमाम कर देगा कि वह सोचता है कि भैया इससे बेटर है कि मैं चलो फिर से उसमें चला जाता हूं यह मैं कोई मूवी देखता हूं ना कि यह सोशल मीडिया है ना कि फिर ये एडिक्शन है देखिए यह नेगेटिविटी हमारे मन को इस तरह से पूरा मायूस कर देती है हमारे मन को पूरा क्रश कर देती है हमारा स्पिरिट ने का जो स्पिरिट है उसको पूरा तोड़ देती है तो हमको चाहिए कि हमारे भीतर में इतनी प्रचंड आत्म श्रद्धा हो स्वामी जी कहते हैं कि व्ट मेक्स यू स्ट्रांग इज धर्म व्हाट मेक्स यू वीक इज अधर्म यदि कोई धर्म आपको ऐसा कहता है जिसको सुनकर के आप कमजोर हो रहे हैं आप मायूस हो रहे हैं आपका मन किसी बर्डन के भीतर में ढक जा रहा है तो वो धर्म नहीं है अधर्म है और जो आइडिया जो फिलोसोफी जो विचार आपको स्ट्रांग बनाते हैं भीतर से आपको जीने की शक्ति प्रदान करते हैं आपको ताकत देते हैं दैट इज द ट्रू रिलीजन वो सही धर्म है तो अद्वैत वेदांत के साथ में स्वामी जी का जो आत्म श्रद्धा का जो कांसेप्ट है दैट आर परफेक्टली अलाइन हमको ये ही सोचना है कि हां यह मेरी जन्म कभी मैं सोचता हूं कि पता है ना कभी कोई ऐसा सोचना जो ठाकुर की बहुत सुंदर कहानी है कि किसी एक नारद मुनि कहीं से जा रहे थे तो दो तीन साधक बैठे थे उनमें से किसी ने पूछा कि महाराज जी आप तो वैकुंठ में जा रहे हैं भगवान विष्णु के दर्शन करेंगे कृपा करके उनको पूछिए कि हमारी मुक्ति कब होगी तो नारद मुनि ने कहा ठीक है फिर वो वैकुंठ का दर्शन करके यात्रा भ्रमण करके वापस आए वह साधक मुनि गण बैठे थे उनके सामने जाकर के कह रहे हैं कि भगवान विष्णु ने कहा है कि इस पेड़ के ऊपर में जितने पत्ते हैं उतने जन्म लगेंगे आपको साधना करते तब आपको मुक्ति मिलेगी तो एक साधक था वोह बिचारा पूरा निराश हो गया अरे इतने कोटि कोटि जन्म कितने पत्ते होंगे वटवृक्ष के ऊपर में इतने कोटि जन्म अभी मुझे तपस्या करनी है साधना करनी है दूसरा जो साधक है किंतु उसके ऊपर में और ही किसी तरह की असर हुई वह एकदम खड़ा होकर के नाचने लगा बोलता है कि अरे वाह आखिर में तो मुक्ति संभव है आज नहीं ना कल कल नहीं ना परसों परसों नहीं तो नरसो एक दिन तो मुक्ति होने वाली है मैं कहीं वो एकदम अंधेरे कुए में तो अपने को नहीं डाल दिया हूं कि तपस्या करके क्या मिलने वाला है तुमको छोड़ दो तपस्या ऐसा करके तो मेरा तो ऐसा कोई भयावह गति तो मैं मेरी नहीं अनहोनी तो मेरे साथ में नहीं होने वाली तो ऐसा करके इतना खुश हो गया तो ठाकुर की कहानी यहीं पर अटक जाती है किंतु मेरा खुद का मानना है यदि आप अद्वैत वेदांत की दृष्टि से सोचेंगे तो जो साधक एकदम खुश होकर के खड़ा हो कर के नाचने लगा कि अरे वाह आखिर में देयर इज अ रे ऑफ लाइट एट द एंड ऑफ द टनल यह जो टनल एक बहुत बड़ी सुरंग के भीतर में मैं फंसा हुआ हूं उसके अंत में मुझे दिव्यता का प्रकाश तो दिख रहा है यह कितने सुंदर बात है जिस क्षण उसके मन में यह बात आई होगी उसी क्षण उसको मुक्ति मिल जानी चाहिए क्योंकि ये जन्म मृत्यु जरा व्याधि की साइकल इट्स जस्ट एन इ जस्ट एन इग्नोर वो तो हमको पता नहीं है बोलकर के हम इसमें फंसे हुए हैं जिस क्षण सही सही विश्वास जिस क्षण सही सही शरणागति आत्म श्रद्धा का उदय हुआ उसी क्षण जैसे कि हमारे शास्त्र में कहा गया है कि सिद्ध गुरु जब निष्ठावान साधक को महामंत्र दान करता है तत्व मसी श्वेत केतो अहम ब्रह्मास्मि ऐसा जब कहता है साथ-साथ में ही निष्ठावान साधक के हृदय में ब्रह्मज्ञान की उत्पत्ति होती है तो यह अद्वैत वेदांत है देखिए कि आप अद्वैत वेदांत की दृष्टि से हमारे साहित्य को पढ़ने की शुरुआत करेंगे आपको एक बिल्कुल नई दृष्टि मिलेगी पहले हमारा जितना भी साहित्य है देखेंगे कि शुरुआत इस तरह से होती है कि आपको तपस्या करनी है आपको निष्ठावान होना है आपको गुरु वाक्य में शास्त्र पर श्रद्धा करनी है आपको एक सही सही साधक का जीवन जीना है ऐसा सब कुछ आपको बताएंगे किंतु फिर आखिर में यह बताएंगे कि देखिए यदि आपके मन में एक बार शरणागति आ गई तो यह जो कार्यकलाप का चक्र है उसका तो कोई एंड नहीं है किंतु जद जिस दिन आपके मन में शरणागति आ गई उसी क्षण आपको मुक्ति मिल जाएगी फिर आपको मैं आज यह दुष्कर्म किया या तो मेरे मन में यह गलत विचार आया तो अरे बाप रे अभी मुझे कितने दिन फिर से तपस्या करके इसको काटना पड़ेगा आज मेरे मन में कुछ भी गलत विचार आया तो मैं एक सप्ताह जद चलो मान लो कि तपस्या करता हूं तो एक विचार का वो कटा उसका जो भी बंधन है किंतु एक सप्ताह के बाद में दूसरा एक विचार आ गया फिर मैं एक सप्ताह तपस्या करूंगा फिर से उसको काटने का प्रयत्न करूंगा उसके बाद में दूसरा एक विचार आ गया फ्रीक्वेंसी बुरे विचारों की शायद कम होगी हमारे दुष्कर्म की शायद कम होंगी किंतु वोह तो जीरो तो नहीं हो जाएगी यह तो एक इनफा साइकल है कि दु दुष्कर्म हमारे यह जो कु विचार है एक के बाद एक चलते ही रहेंगे और उसको काटने के लिए हम कुछ ना कुछ तपस्या करते ही रहेंगे यह तो अनंत काल तक साइकल चलती रहेगी क्या इसका कोई अंत भी है कि नहीं और आखिर में यह प्रश्न होता है जैसे कि ऋणम कृत्वा तम पवे ऐसा जो कहते हैं कि क्या जरूरत है यह सब करने की एक तो मनुष्य जन्म मिला है इसके आगे पूछे कुछ है कि भी नहीं किसको पता चलो आनंद कर लो इस दुनिया का भोग कर लो और फिर यह मुक्ति बंधन जो कुछ भी है अगले बार देखा जाएगा यह जो मटेरियल जम किस तरह से प्रवेश हो गया है जबकि धर्म साधना यह सब हमको एक क्या है ना कि कोथ कोथा बांग्लाते जेटा बोले माने बातो वातो ना वड़ा गुजराती मा कहते हैं अभी हिंदी मुझे देखना पड़ेगा क्या उसका है सा कोई कहावत किंतु ये सिर्फ बातों की बातें हैं कि मने आप बोलते हैं कि तपस्या करो आपको ईश्वर के दर्शन होंगे कहां मैं तो इतने सारे लोगों को पहचानता हूं मैं तो आश्रम में रहता हूं ठाकुर के आश्रम में रहता हूं यहां कोई मैं नहीं देखता किसी को कि जिसको ईश्वर का दर्शन हुआ इवन साधु लोग भी क्लेम नहीं करते कि हमको ऐसा कोई आशीर्वाद मिला है दर्शन हुआ हैना कि कोई अनुभूति हुई है हुई होगी किसी किसी को किंतु एटलीस्ट पब्लिक में तो कोई नहीं बोलता तो मैं ये देखता हूं कि अरे ज्यादातर लोगों को तो मैं मुंह से बातें धर्म की करता देखता हूं और चलो मुंह पर बोल देंगे कि मैं धार्मिक हूं यह वो किंतु इनका आचरण तो देखो जिस तरह से वह जिसको बोलेंगे कि कुकर्म करके पैसा अर्जन करने की उनकी यह जो मानसिकता है फिर यह जो मान लीजिए कि हजार दोज इस तरह से कलेक्ट किए हजार 2000 तो क्या है आजकल तो लाखों में यह सब कुकर्म होते हैं तो लाखों लाखों करोड़ों करोड़ों इस तरह से अर्जित किए फिर मंदिर में जाकर के हजार दो हजार लाख दो लाख का डोनेशन देकर के बड़े ही धार्मिक होकर के घूमेंगे ऐसे लोग भी तो हमने देखे हैं और फिर कोई बहुत ज्यादा धर्म की बातें करे अरे मैं तो सुबह को उठ जाता हूं अरे मैं तो ये फिर जाकर के पूजा करता हूं आरती करता हूं मैं प्रतिदिन आश्रम में आता हूं साधु लोगों को प्रणाम करता हूं वेरी गुड बुरा कुछ नहीं है किंतु ऐसे सभी लोगों के बारे में नहीं कह रहा किंतु ऐसे चंद लोग होते हैं कि जो लोग मुंह से तो ऐसी बातें करें करेंगे ऐसा आचरण भी शायद करेंगे किंतु फिर उनका पर्सनल लाइफ देखेंगे उनका प्रोफेशनल लाइफ देखेंगे हमको इंटीग्रिटी या ऑनेस्टी नहीं दिखाई देगी देखिए हमारे एक डिवटी है मैंने शायद पहले भी एक बार कहा था उनके बारे में अहमदाबाद में ही रहते हैं और उनका आईटी का बिजनेस है और उनके अंडर में 300 400 लोग व स्टाफ है और क्लाइंट से सबके स्टाफ क्लाइंट सबके साथ में डीएल करना है अभी यह जो भाई जो है वे बड़े ही मने सज्जन है वो बड़े ही साधु प्रकृति के हैं अपने बहुत अच्छे डिवटी है तो अभी उनके ही किसी रिलेटिव के साथ मेरी बात हो रही थी उनकी बहन यहां पर आई थी तो उनके साथ बात हो रही थी तो मैंने उनको बात-बात में कह दिया अरे वो तो इतने सरल है इतने लोगों को इनका जो स्टाफ है 3400 का कैसे संभालते होंगे तो वो बोलने लगी हां महाराज आप सही बोल रहे हैं सही में उनको बड़ा परेशानी होता है मैंने कहा देखिए आप एक सरल होना आप प्रयत्न भी करेंगे तो इस संसार में रहना कितना मुश्किल है माने दूसरी तरह से आप देखिए ऑन वन हैंड आप देखेंगे कि कोई लोग तो दिखावा करते हैं माने धार्मिक होने का दूसरे लोग जद सही सही प्रयत्न भी करते होंगे किंतु ये संसार ऐसा विकट है कि किस तरह से वह अपनी सरलता अपनी धर्म अपनी एक इंटीग्रिटी और ऑनेस्टी बचा कर के चल पाएंगे कुछ ना कुछ तो उनको इधर-उधर करना ही पड़ेगा यदि संसार में रहना है तो तो ये सब प्रश्न प्रैक्टिकल जीवन में उत्पन्न होते हैं किंतु देखिए कि स्वामी जी का सोल्यूशन क्या है कि ये जो कार्यकलाप का चक्र आज मेरे मन में एक बुरा विचार आया तो उसका मैं एक सप्ताह तक प्रायश्चित करूं वगैरह वगैरह इस तरह से नहीं सोच करके सोचिए कि वो जो अनंत सर्वशक्तिमान सर्व आनंदमय सर्व ज्ञानी सर्वदाता ईश्वर जो है मेरे ही हृदय में विराजमान है और मैं एक अलग हूं एक व्यक्ति के रूप में मेरा एक एक अलग से अस्तित्व है यह मेरी जन्म मृत्यु जरा व्याधि की कोटि कोटि जन्मों की यह यात्रा जो मैं कर रहा हूं उसके मैं तपस्या कर रहा हूं स्ट्रगल कर रहा हूं व सिर्फ मेरे अज्ञान वसत मुझे ऐसा दिखता है सिर्फ मेरे इग्नोर की वजह से मुझे ऐसा दिखता है जिस क्षण मेरे मन में यह ज्ञान प्रकट हो गया जिस क्षण मेरे मन में ईश्वर के प्रति शरणागति प्रकट हो गई कि हां ईश्वर आप है और मैं हूं मैं आपका दास हूं मैं आपका शरणागत हूं मैं आपका संतान हूं ये शरणागति कहो ना कि फिर यह आत्म श्रद्धा कहो यह दोनों एक सिक्के के दो पहलू है वो शरणागति ऑन वन हैंड आत्म श्रद्धा ंधी अधर जिनके भीतर में सही सही आत्म श्रद्धा प्रकट होती है वो लोगों के भीतर में सही सही शरणागति आती है और जिनके मन में सही सही शरणागति आती है वे लोग इतने साहसिक हो जाए जाएंगे इतना उनके भीतर में करेज और एक स्ट्रेंथ प्रकट होगी जैसे जैसे कि फॉर एग्जांपल गांधी जी का उदाहरण बहुत सारे लोग आजकल महात्मा गांधी को इधर-उधर की बातें सुनाते रहते हैं अरे उनकी वजह से जो भारत में आज की समस्या है उनकी वजह से है यह वो तो देखिए कि ऐसा नहीं है कि मैं कोई गांधी को गांधी जी का मतलब उनका कोई यह कर रहा हूं मतलब उनको फेवर कर रहा हूं किंतु जब मैं उनके जीवन के बारे में कुछ-कुछ घटनाएं देखता हूं अभी देखिए कि यह जो सरम कत्यार शाही है कोलोनियल पावर्स थे उनके पास में ऐसी प्रचंड शक्ति थी कि वह किसी भी भारतीय का जीवन संपूर्ण रूप से बर्बाद कर देते उसको फांसी दे देते उसकी मारपीट करते उसको जेल में डाल देते जो कुछ चाहे कर देते किंतु फिर भी उनको कोई रोकने वाला नहीं था क्योंकि उनके पास में डिक्टेटोरियल पावर था अभी भारत में जो पावर था उससे 100 गुना पावर उनके पास में साउथ अफ्रीका में था तो वह साउथ अफ्रीका में जाकर के गांधी जी सत्याग्रह करके आए एक घटना है कि एक गाड़ी में बैठे थे और एक टिकट चेकर आया वहां का गोरा टिकट चेकर वो गांधी जी का देखा वो ब्राउन स्किन है वो तो बोले कि चलो तुम यहां से निकल जाओ तुमको यहां पर बैठने का अधिकार नहीं है वो शायद फर्स्ट क्लास का कमरा होगा कि जो भी हो मुझे रीजन याद नहीं आ रहा किंतु गांधी जी को निकल जाने को कहा कमरे से तो गांधी जी ने कहा देखो भाई आप लोगों ने तो लो बनाया है कि आप जो इस कमरे की टिकट खरीदेगा उस वो इस कमरे में बैठने का अधिकारी है तो मेरे पास में टिकट है मैंने वो लॉफुली आपको पैसा देकर के टिकट खरीदा है मेरा कायदे कीय रूप से यहां पर बैठने का अधिकार है तो अभी यह तो गोरा आदमी है उसको तो कायदा कानून थोड़ी ना दिखता है कायदे कानून तो वो हमारे लिए बनाते हैं वो अपने लिए थोड़ी ना होता है तो गांधी जी को खींच करके वो दरवाजे के पास में ले गया ट्रेन चल रही है है उसको धक्का मार के निकालने को प्रयत्न कर रहा है तो गांधी जी ऐसे वो जो वहां पर वो जो कुछ पकड़ करके दरवाजे को पकड़ करके चिकट चिपट करके बैठ गया है कि नहीं निकलूंगा मैं यहां से नहीं उतरूंगा और यहां पे वो आधे बाहर है आधे भीतर है गाड़ी के और वो टिकट चेक और डंडे से उनको मार रहा है और फिर भी गांधी जी छोड़ नहीं र मैंने कहा कि देखो जो व्यक्ति इस परिस्थिति में धर्म का पालन करता है वो व्यक्ति सही सही महान है देखिए गांधी जी के मन में ब्रिटिशर के प्रति थोड़ा सा भी एक वैषम्य नहीं था वरना तो हम लोगों का क्या होता है कि किसी ने हमको कुछ बोल दिया या किसी ने हमारे साथ में कोई कटु व्यवहार कर दिया हमारे मन में उसके भीतर में पूरा टॉक्सिन भर जाता है अरे वह आदमी शैतान है यह वो दिन रात हमारे मन में चलता रहता है किंतु जिसके मन में सही सही शरणागति गांधी जी यहां से गए थे व मैंने वो पहली पहली बार जब मैंने पढ़ा था कि वो एक मुनि है यहां पर उनके पास में उन्होंने तीन प्रतिज्ञाएं उनकी माता जी ने उनके पास में दिलवाई थी कि शराब पान नहीं करेंगे मानसा आर नहीं करेंगे और स्त्री संघ से दूर रहेंगे तब मुझे लगता बड़ा हंसी आती थी कि पूर्वा श्रम में जब मैं गांधी जी को पहली बार पढ़ रहा था मैंने कहा कि अरे यह सब चीजों से आपका वोह थोड़ी ना कोई धार्मिक और आध्यात्मिक प्रगति होने वाली है मैं भगवान बुद्ध को पढ़ा है भगवान महावीर को पढ़ा है तो जिस तरह की तपस्या करके फि फ आखिर में उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया या तो फिर ये आइंस्टाइन या तो फिर न्यूटन जैसी क्रिएटिविटी जिनमें होती है वे लोग ग्रेट साइंटिस्ट हुए तो ये आदर ग्रेट तपस्या करो या तो फिर ग्रेट क्रिएटिविटी दिखाओ यह सब वो माने मैं इस तरह का मांसाहार नहीं करूंगा यह सब चीजों से क्या होने वाला है बाद में भी ठाकुर ने ठाकुर को मैंने पढ़ा वो भवनाथ आया था तो वो कह रहा है कि बस वो ना किसी ने बोला कि भवनाथ ने मछली और पान का त्याग किया है तो ठाकुर ने कहा पान माच त्याग कोले की होवे मछली और पान का त्याग करने से क्या होगा तो मतलब आहार निराहार वो आहार का वो पालन वगैरह करके किंतु देखिए कि गांधी जी के जीवन में बात सिर्फ यह नहीं है कि उन्होंने यह प्रतिज्ञा ली है कि मैं यह नहीं करूंगा वो नहीं करूंगा बात है कि जो निष्ठा है जिस तरह की निष्ठा से उन्होंने वो प्रतिज्ञा ली और निष्ठा का पालन किया तो ये निष्ठा होना शरणागति होना भीतर में सही सही ईश्वर के प्रति श्रद्धा भक्ति होना यह दिखाता है कि आपका चरित्र किस तरह से गठित हो रहा है तो यहां पर देखिए कि जब स्वामी जी कहते हैं कि इस ईश्वर के ऊपर में से ही विश्व ब्रह्मांड प्रकट होता है व विकसित होता है समाहित होता है और ईश्वर अपने आप में नि निराकार निर्विकल्प है ईश्वर को अपने को यह सब चीजों से कोई फर्क नहीं पड़ता तो इससे क्या है कि कि ये जो अद्वैत वेदांत हमको बताता है कि इफ हम यह स्वीकार कर ले कि यह मैं जिसको कि मैं मानता हूं कि इसका एक इंडिविजुअल अस्तित्व है मैं जिसका कि एक ईगो है मैं कि जिसके साथ में कोई सद् व्यवहार या दुर्व्यवहार कर रहा है मैं कि जिसको कि क्रोध जिसके मन में प्रकट होता है मैं कि जिसके मन में किसी भी व्यक्ति किसी भी चीज के प्रति किसी भी व्यक्ति के प्रति काम भाव प्रकट होता है यह मेरा तो अस्तित्व ही नहीं है ईश्वर ही है मेरी जगह और ईश्वर यह जो मेरा अहंकार का आवरण है वोह तो ऐसे को तो जाने वाला नहीं है चपटी बजाने से या बातें करने से या इवन ज्ञान योग पढ़ने से या इवन इस तरह का सत्संग करने से तो वो तो जाने वाला नहीं है हमारी यात्रा तो चालू ही रहेगी किंतु फिर यह अहम जो है उसको सुसंस्कृत कर देना है अहम के भीतर में हमको दो एलिमेंट हालांकि दो एलिमेंट एक ही एलिमेंट के दो स्वरूप है उसको प्रवेश करवाना है एक है आत्म श्रद्धा दूसरा है शरणागति जैसे ही ये अहंकार के भीतर में यह मैं हूं ये मैं के भीतर में अहंकार और आत्म श्रद्धा और शरणागति दो प्रवेश हुए वैसे ही मैं सुसंस्कृत हो जाऊंगा और धीरे-धीरे करके यह जो अंधकार अहंकार और यह अज्ञान का जो काला बादल काली रात मेरे मन के ऊपर में आवरण करके छा कर बैठा है धीरे-धीरे करके वह डिस्पर्स होना शुरू हो जाएगा और ब्रह्म ज्ञान का सूर्योदय होगा तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम श्री राम कृष्णा अर्पण मस्तु