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ओम स्थापना स्वरूप ने अवतार वरिष्ठय नमः शारदानंद जी की स्मृति कथा कल हमने इसके बड़े में पढ़ना शुरू किया था आज थोड़ा सा आगे देखते हैं कल हमने देखा कल वैसे एक प्रसंग शुरू किया था थोड़ा सा अधूरा छठ गया था मुझे बाद में समझ ख्याल आया आ राजा महाराज की महासमाधि के बाद में जब वो मीटिंग हुआ था दिल्ली गेट का की किसको रामकृष्ण संघ का नया अध्यक्ष बनाना चाहिए तो सब लोगों ने एक साथ में मेजॉरिटी जितने भी डेलीगेट आए थे उन्होंने शरद महाराज का नाम दिया था शरद महाराज यानी की स्वामी शारदानंद जी महाराज जो की ठाकुर के सन्यासी शिक्षा थे और स्वामी विवेकानंद के गुरु भाई थे और जिन्होंने स्वामी विवेकानंद ने शारदानंद जी को रामकृष्ण संघ के सेक्रेटरी के रूप में अप्वॉइंट करके गए थे तो राजा महाराजा यानी की स्वामी ब्रह्मानंद वह थे हमारे सर्वप्रथम प्रेसिडेंट अध्यक्ष और उनकी महाशय समाधि के बाद में जब ये मीटिंग हुआ जब यह सबसे सभी लोगों ने मेजॉरिटी डेलिगेट्स ने कहा की शरद महाराज को प्रेसिडेंट बनाया जाए तब शर्ट महाराज ने कहा था की नहीं स्वामी जी मुझे सेक्रेटरी बनाकर के गए हैं मैं सेक्रेटरी ही रहूंगा तो इस तरह से देखिए की शरद महाराज के बड़े में हम कितनी विभिन्न चीज उनके जो गन हैं वो कितने सारे हैं एक तो एक निश्चित होकर के राम कृष्णा सॉन्ग का रामकृष्ण मिशन का कार्य करते हैं इतने सारे ब्रांच सेंटर है उन सबकी संभल रखना इतने सारे साधु ब्रह्मचारी जो नए जॉइन हो रहे हैं उनकी ट्रेनिंग की चिंता करना उनके बड़े में उनका मतलब कम भी तो इस तरह से देना है की जी तरह से उनका कल्याण हो तो वह एक है साथ-साथ में ही फिर देखिए की मां का जितना भी कम है सब बैठ करके वो शरद महाराज करते थे मां की स्मृति कथा में हम बार-बार देखते हैं कोई भी छोटा सा मां के सामने समस्या आई है कोई भी छोटा सा कम होता है मां इम्मीडिएटली कहती है की शरद को लेटर लिखो शर पत्र लिखो शरद करेगा जी तरह से हमने देखा की मां के भाइयों में अनबन हो गया तो अभी वह पुरखा का जो संपत्ति है उसको बांटना है तो संपत्ति कौन बटेगा तो उसके लिए शरद महाराज कोलकाता में अपना कम छोड़कर के वहां जयरामबाती जाते हैं और मां के भाइयों का वो जो अनबन है जो झगड़ा है संपत्ति को लेकर के वो मित देते हैं संपत्ति का ठीक से बंटवारा कर देते हैं मां के लिए वहां पर री लेकर के मायारवादी उद्बोधन का निर्माण किया और री का पैसा वापस देने के लिए लीला प्रसंग लिखने की शुरुआत की लीला प्रसंग का सेल होकर के जो आए आएगी उसका जो प्रॉफिट होगा उसमें से जो री लिया गया है मारवाड़ी बनाने के लिए मंत्र मां का घर बनाने के लिए वह है लीला प्रसंग के सेल करके आने से प्रॉफिट में से वह रे जो चुकाया जाएगा इतना सर रिस्पांसिबिलिटी शरद आज अपने कंधे पर लेकर के बैठने थे इसलिए मैंने कहा है की शरद है मेरा वासु की वासु की तरह वासु की जो जी तरह से अपने कंधों पे पूरे पृथ्वी को उठाकर के रहते हैं इस तरह से शरद महाराज अब पूरे रामकृष्ण संघ का भर अपने कंधे पर लेकर के रहते हैं और इसीलिए रामकृष्ण संघ की सरू-शरू के देखें की किन लोगों ने क्रिटिकल पार्ट क्रिटिकल रोल उन लोगों का था ठाकुर और स्वामी जी की तो बात ही नहीं है मां की तो बात ही नहीं है किंतु राजा महाराज प्रेसिडेंट थे शरद महाराज सेक्रेटरी थे बाबूराम महाराज बेलूर मठ के इन कर रिश्ते जो भी कम होगा बाबूराम महाराज करते थे और शशि महाराष्ट्र साउथ इंडिया देखते थे तो इस तरह से वह कर दिशा में जैसे की कर लोग बैठे हुए हैं पूरे संघ का कल्याण पूरे संघ को चलने के लिए जो सेकंड जेनरेशन ऑफ लीडरशिप जिनको कर सकते हैं वह इन लोगों के हाथ में थी और इन लोगों के जी तरह से एक के बाद एक जब इनका महासमाधि होती गई आखिर में राजा महाराज गए एन पहले शशि महाराज 1911 में उनका देहांत हुआ फिर राजा महाराजा 1923 में बाबूराम महाराज 1918 में और शरद महाराज आखिर में 1926 में तो शरद महाराज जब जाते हैं तब निश्चय महापुरुष महाराज थे अखंडानंद जी थे विज्ञान आनंद जी थे काली महाराज थे सुबोध महाराज थे सुबोध आनंद जी थे किंतु उन लोगों का क्या है की वे लोग इस तरह से अभी उम्र में भी इतने वायो जस्ट हो गए हैं की दे टुडे एक्टिविटी जो रामकृष्ण संघ की थी वो अभी यंगर जेनरेशन को दे दी गई थी तो यह लोग थे सिर्फ आशीर्वाद देने के लिए और 1926 से लेकर के 1938 तक ये लोग वर्तमान रहे पृथ्वी पर और सभी साधुओं को आशीर्वाद देते रहे किंतु राजा महाराजा शरद महाराज के जान के बाद में जो डायरेक्ट एक्टिविटी में पार्टिसिपेट करना था इन हमारे डायरेक्ट की साइकिल का वह धीरे-धीरे करके बैंड हो गया एक्चुअली राजा महाराज के देहांत के बाद ही क्योंकि हम यहां पे पढ़ेंगे की जैसे राजा महाराजा गए तो शरद महाराज हालांकि थिस सेक्रेटरी किंतु कम सब धीरे-धीरे करके उन्होंने डेलीगेट करना शुरू कर दिया था वीरजानंद जी महाराज थे श्रद्धानंद जी महाराज थे विशुद्ध जी महाराज थे यह शंकारानंद जी महाराज थे इसे एक के बाद एक उनको कम डेलीगेट करते थे और फिर शरद महाराज के बड़े में पढ़ेंगे उद्बोधन भवन में सुबह को बैठे थे स्थिर हो करके ऐसे लगता था जैसे वो पत्थर की मूर्ति की तरसती हो करके ध्यान कर रहा है कल हमने बात की थी ना ठाकुर जब भी वो मां काली के मंदिर में जाते थे तो नाथ मंदिर के ऊपर में वो भैरव की मूर्ति को दिखा करके अपने मां को आदेश करते थे की इस तरह से यह भैरव जो है उसे तीर हो करके ध्यान कर रहा है इसी तरह मुझे भी ध्यान करना है यह बात ठाकुर अपने मां को आदेश करते थे तो यह जो पूरा घटनाक्रम है शरद महाराज के जीवन की एक के बाद एक घटनाएं शरद महाराज की श्रुति जो है इसमें बहुत सुंदर वर्णन है चेतनानंद जी ने इसका सिलेक्शन किया है हम पढ़ने हैं निखिल आनंद जी की यह श्रुति कथा है तो निखिलानंद जी की एक स्मृति हमने शर्ट महाराज के बड़े में कल अच्छी किस तरह से वो शरद महाराज के लिए गम पानी रख दिया राजा महाराज के सेवक ने कहा था निखिल आनंद जी को की राजा महाराज के लिए हम ठंडी के दोनों में गम पानी रख देते हैं ग्राम पानी व्यवहार करने से उनको सुकून मिलता है उम्र हो गई है इन लोगों की तो अभिप्राय सभी लोग 60 प्लस हो गए थे बाई दिस टाइम तो निखिल आनंद जी ने सोचा मैं भी शरद महाराज के सेवक के रूप काशी आया हूं तुम्हारा विश्वनाथ का मंदिर का दर्शन करने के लिए गए हैं तो चलो मैं भी महाराज के लिए गम पानी रख डन फिर किंतु शरद महाराजा करके देखा ग्राम पानी रखा है तो उसे हाथ पर तो दो दिए किंतु फिर पूछा की तुमने किसको पूछ कर के ग्राम पानी रखा मैंने तो कहा नहीं था तुमको तो फिर निकाला नंद जी कहते हैं की राजा महाराज के सातों तो नहीं था किसी का नाम लेकर के किंतु कहा की आपको थोड़ा सा अभी उम्र हो गया है ऐसा तो नहीं कहेंगे ना किसी के मुंह पे तो ऐसा का दिया की मतलब राजा महाराज के सेवक उनके लिए गम पानी रख देते हैं तो ये बात सुनकर के शरत महाराज इतना नाराज हो गए बोले की अरे तुम राजा महाराज के समक्ष मुझे रखना चाहते हो कहा राजा महाराज वो ग्राम पानी उसे करेंगे तो क्या मुझे भी करना है मैं उनके लेवल का थोड़ी ना हूं की मैं इस तरह से करूंगा देखिए की राजा महाराज को इतना सम्मान वो देते थे तो यह कल की बात आज एक दूसरा एक स्मृति निखिल आनंद जी का पढ़ने हैं महाराज जी लिखने हैं स्वामी शारदानंद जी आश्चर्यजन परिचय स्वामी शारदानंद जी का जो आश्चर्य जनक को धैर्य जो था उसके परिचय स्वरूप एक घटना मुझे याद ए रही है उनका धैर्य कितना था वो पता है ना की मां खुद कहती थी स्वामी जी कहते थे की शरत का जो खून है वो मछली के खून की तरह है मछली का खून ठंडा होता है तो शरद का खून भी इतना ठंडा है लहू भी इतना ठंडा है की वो कभी भी ग्राम नहीं होता मैंने इस तरह से मेटाफोर देकर के कहना चाहते हैं की चाहे कितना भी प्रेशर ए जाए घटनाक्रम का शरद महाराज का मां विचलित नहीं होता इस तरह से बहुत सुंदर घटना है शरद महाराज और एक देवोटी है तो वो दोनों का में बैठकर के गंगा से जा रहे थे तो इकाई को बड़ा झाड़ वृष्टि और तूफान ए गया गंगा का पानी एकदम उछाल करने लगा और नौका जो है वो इधर-उधर होने लगी अभी ऐसा लगेगा की अभी डब ही जाएगी तो ये शुद्ध करके किंतु यह सभी लोग बड़े भाई भित हो गए जो नौका में जो बाकी सब मुसाफिर है वो वो नाविक जो था बेचारा वो भी बड़े परेशानी से बड़ी मेहनत करके नौका को स्थिर रखना का पर्यटन कर रहा था तो ये देवोटी जो था शरद महाराज के साथ में उसने क्या देखा की शरद महाराज जो बैठ कर के जो हुक्का पी रहे थे नवका में तो वैसे ही आराम से हुक्का पिए जा रहा है जब वो कुछ नहीं था पानी शांत था और नोखा चल रही थी तो बैठ करके शांत रूप से वो प्रकृति का आनंद लेते लेते हुक्का पी रहे थे तो वैसे ही झाड़ वृष्टि और तूफान ए गया नो का हिल रही है कब डब जाएगी ठीक नहीं इस समय भी बैठ करके खुद का पी रहा है तो यह भक्ति जो था वो बड़ा नाराज हो गया और लेकर के वो सड़क मिराज का हुक्का लेकर के गंगा में फेक दिया बोला की अरे तुमको कुछ होता भी नहीं है आपको कुछ मतलब कुछ भी नहीं ग रहा है कोई टेंशन भी नहीं है सब लोग हमारी जान जान को बैठी है आप बैठ करके हुक्का पी रहे हैं मैंने वो देखिए अभी शायद महाराज ने क्या कहा था एक्जेक्टली वो मुझे अभी याद नहीं ए रहा है किंतु देखिए की इतना मतलब धी इसे फिजिकल मेनिफेस्टेशन कोई भी बड़ी पोस्ट पर रहने से मेंटल प्रेशर बहुत होता है तो मेंटल प्रेशर के साथ में आपको जूझता होता है किंतु वो हमको बहुत पर पता नहीं चला की कोई किसी आदमी के सर पे कितना मेंटल प्रेशर है और वो कितना उसके सामने वो कितना अच्छे से वो खड़ा है क्या मेंटल प्रेशर के सामने वो फिर उसके मां में फिर वो उद्वेक है या तो फिर निराशा है या डिप्रेशन है या टेंशन है यह सब ए जाता है की उसका मां शांत हो करके बैठता है वो बहुत बार हमको पता नहीं चला हालांकि शरद महाराज के कैसे में पता चला था की कितना शांत होकर के बैठे हैं किंतु फिर भी मेंटल स्ट्रगल जो होती है मेंटल हमारी कॉक्वेस्ट जो होती है मेंटल जो हमारी सिद्धियां जो होती है वो बड़ी इजीली नहीं समझ में आई किंतु यह जो घटना जो है एक भौतिक घटना उससे वो बखूबी समझ में आता है की इतना झाड़ ब्रश ठीक में भी शरत महाराज शांति से बैठे थे और स्वामी जी की तो वो कहानी बड़ी फेमस है पहले भी एक दो बार मैंने कहीं है की स्वामी जी एक बार शरद महाराज को दांत रहे थे अमेरिका से लौटे थे बेलूर मठ का कम शुरू हो गया था और पैसों का मामला अकाउंट का मामला वो लेकर के स्वामी जी तो बड़े स्ट्रिक्ट है की और देवोतीस से पैसा लिया है तो उसका एकदम 100% अकाउंटेबिलिटी होना चाहिए और यह लोग तो बेचारे क्या है की तपस्या करके घूमते घूमते वो उन लोगों ने उसे पैसों का क्या इतना टेंशन लेना है तो अभी वो शर्ट महाराज ऐसा कुछ हो गया होगा बात बात में निकाल गया होगा शरद महाराज के मुंह से या तो जो भी है फिर स्वामी जी ने उनको जो डांटना शुरू किया और स्वामी जी जब रौद्र स्वरूप धरण करते हैं किसी और मैन तुम्हारे जैसा होगा तो हमारा तो हार्टी फेल हो जाएगा इस रुद्रा स्वरूप से वो डांटना शुरू करेंगे वो जैसे वो भगवान शिवा वो तांडव नृत्य करते-करते वो पूरे सृष्टि में किस तरह से प्रलय ए जाता है इस तरह से वो प्रणयात्मक स्वामी जी का वो तांडव वो स्वरूप राहत है वो रुद्रा स्वरूप तो ये सुनकर के भी शरत महाराज बिल्कुल ठंडा से चुपचाप शांत होकर के बेटे हैं अभी किंतु आया उनको मिलने के लिए तो अभी भक्ति के सामने तो इस तरह से वो बातें नहीं होती है किसी को नहीं दांत जाता है तो स्वामी जी एकदम शांत हो गए और वह भक्तों को बिताया अभी शरद महाराज भी बैठे हैं स्वामी जी भी बैठे हुए टीवी बैठा है स्वामी जी ने किसी को बुलाया भाई क्या लेक आओ तो एक ब्रह्मचारी बेचारा चाय लेकर आया सब कुछ चाय पिलाई तो शरद महाराज बढ़िया कर रहे हैं और जैसे ही वो ड्यूटी गया फिर से उनको डांटना शुरू किया और फिर से चुप बीच में देखिए वह सुमधुर संबंध कैसा है इन लोगों की स्वामी जी हालांकि बाकी रूप से दांत भी रहे हैं किंतु जैसे वो देवोतिया या फैट करके वो जितना उनका गुस्सा था जितना उनका रुद्रा स्वरूप था वो कहां अदृश्य होकर के सौम्या स्वरूप ए गया भगवान विष्णु का सौम्या स्वरूप आशीर्वाद आए और जैसे ही देवोते गए अब भगवान शिवा का रुद्रा स्वरूप वापस तो स्वामी जी का भी इस तरह से है की जो मुंह से कहते हैं हमारे कल्याण के लिए दांते हैं उसे तरह की दांत से हमारे वो जो संस्कार जो है हमारे संस्कार कट जाते हैं यहां पे वो शरद मार्ग भी दांते हैं जब जरूर पड़ेगी निखिल आनंद जी को बहुत दांते हैं वह भी बात बाद में आएगी उसमें लिखने हैं की मुझे समझ में नहीं ए रहा था की महाराज मुझे इतना क्यों दांते हैं किंतु अभी यह श्रुति कथा उन्होंने शरत महाराज के साथ में वो दिन थे वो दिन तो चले गए 40 साल के बाद में लिखिए तो महाराज लिखने हैं की 40 साल के बाद में मुझे समझ में ए रहा है आफ्टर 40 इयर्स मुझे ये समझ में ए रहा है की जो शरद महाराज मुझे दांते थे वो मेरे कल्याण के लिए ही दांते थे मेरे जो कर्म के जो संस्कार जो है हमारे ये सब कट जाते हैं इस तरह की दांत सुन करके किंतु जब दांते थे तब बड़ा गुस्सा हो जाता था मैं पहले ही ऑलरेडी कल दांत दिया उनको की किस तरह से मेरे लिए ग्राम पानी रख दिया तुमको किसने मेरे लिए ग्राम पानी रखना को कहा था कोई अच्छी बात करने को भी जाए उसमें भी दांत पद जाएगी बेचारे को तो इस तरह से बहुत साड़ी घटनाएं है की वो बात बात में वो दांत सनी पड़ती है बात बात नहीं हुई गुस्सा कर देते हैं किंतु यह डायरेक्ट डिसीप्ल का जो गुस्सा है जो सद्गुरु का जो गुस्सा है वह क्यों है वह हमारे संस्कारों को काटने के लिए हमारे अहंकार को काटने के लिए वरना सेवा करके अहंकार ए जाता है की हां मैं एक हूं मैं इतनी अच्छी सेवा कर रहा हूं और मैं सेवा नहीं करूंगा तो इन लोगों का क्या होगा बहुत सारे लोग ऐसा सोचना शुरू कर दें कम कर रहा हूं मैं यह कम छोड़ दूंगा तो सब खत्म हो जाएगा यहां पे एक देवोटी है बहुत सालों से आते हैं बहुत अच्छा कम भी करते हैं पब्लिकेशन में तो अभी एक दिन उन्होंने सडनली बोल दिया की मैं नहीं रहूंगा तो ये सब प्रूफ रीडिंग वगैरा कौन करेगा सब बैंड हो जाएगा अभी वो सिंगल देवोते है तो फिर मैंने उनके मुंह पे नहीं कहा की किंतु मेरे मां में ए गया की ठाकुर भी चले गए तो भी संघ का कम चला रहा माफी चली गई संघ का कम चला रहा स्वामी जी भी चले गए संघ का कम चला रहा क्योंकि वो अपनी प्राणशक्ति इस संघ में डालकर के गए हैं हम साधु ब्रह्मचारी भक्ति आज है नहीं है संघ का कम एकदम मजे से चलेगा कभी यह नहीं सोचना है की मैं नहीं आऊंगा तो ये कम बैंड हो जाएगा या तो फिर मेरी ट्रांसफर हो जाएगी तो या पब्लिकेशन का क्या होगा इस तरह की सोच जो है वो बड़े ही मैन इस तरह का यह सब सूक्ष्म अहंकार है बाकी जो हम लोग सोचते हैं की कामिनी कंचन को त्याग करना है ठीक है अच्छी बात है किंतु यह सब भोग है यह सब ठुल्लू भोग है सबको समझ में आते हैं आज मैं बड़ा ही लग्जरियस लाइफस्टाइल अपना शुरू करूंगा महंगे महंगे गेजेट्स से अच्छे-अच्छे कपड़े हैं ये सब में व्यवहार करना परचेज करना शुरू करूंगा सबकी नजर में ए जाएगा बोलेंगे अरे ये साधु होकर के इतना भोगविलास क्यों कर रहा है तो ये सब चीजों से मैं वैसे ही थोड़ा सा दूर रहूंगा की मतलब इच्छा होने से भी लोग क्या कहेंगे ये सोच करके हम लोग साधु लोग बहुत सारे त्याग करना शुरू करते हैं या तो फिर ऐसा तो नहीं कहना चाहिए लोग क्या सोचते हैं किंतु कभी-कभी ये फैक्टर होता है हमारे मां की कोई इच्छा होती है की मैं ये करना चाहता हूं किंतु लोग क्या कहेंगे ये फैक्टर हमेशा हमारे मां में एक राहत ही है किंतु यह तो हो गया भोग के बड़े में जो मानसिक भोग है ये सूक्ष्म अहंकार ये सूक्ष्म वासना है की कोई मेरी प्रशंसा करें कोई मेरे बड़े में सोचिए कोई मेरे बड़े में बोले अटेंशन सीकिंग बिहेवियर जो है की लोग मेरे ऊपर में अपना मां को अपने मां को अपने ध्यान को मेरे ऊपर केंद्रित करें लोग मेरे बड़े में आ मेरे बड़े में डिस्कशन करें इसको इंग्लिश में कहते हैं अटेंशन सीकिंग बिहेवियर ध्यान आकर्षक यह वृत्ति तो ये जो है ये भी एक सूक्ष्म अहंकार से प्रकट होता है और यदि इस सूक्ष्म अहंकार का हम अपने उसके जड़ मूल से इसको नहीं निकलेंगे तो क्या होगा की हमारी साधना जो है वो हमेशा के लिए अधूरी र ही जाएगी तो इसीलिए ये जो दांत पड़ती है हमको ये दांत भी इसलिए पड़ती है की सूक्ष्म अहंकार है वो कट जाए बाकी जो अंक भोग है वो तो चलो हमको पता चलते हैं की उसको एक के बाद एक काटना है किंतु सूक्ष्म अहंकार को भी काटना है वो हम कभी-कभी नहीं समझ पाते वो कभी-कभी हम नहीं रिकॉग्नाइज्ड कर पाते इसके लिए इस तरह की दांत जरूरी है जिसको की सीनियर्स की दांत पड़ी है वह साधु बड़ा भाग्यवान है वरना तो ऐसा होता है की मेरा अहंकार वैसे का वैसे ही र गया यदि किसी ने इस तरह से मुझे नहीं दांत होता तो इसलिए ये सब घटनाएं सुनकर के हमको पता चला है की साधु जीवन या तो सड़क का जीवन किस तरह से वो गठित होता है क्योंकि ठाकुर खुद बड़ा ही जोर से किसी को दांत देते थे और ठाकुर जब नाटक थे तो वो सहन करना बड़ा मुश्किल हो जाता था वो स्वामी जी जैसे एक दो लोग होंगे वो दांत सुनकर के बात रहेंगे और किसी का यह साहस नहीं होता था तो जो भी है शुरुआत निखिल आनंद जी करते हैं क्या कहते हैं स्वामी शारदानंद जी परिचय एक घटना होने पर है स्वामी शारदानंद जी के आश्चर्य जनक धैर्य की एक घटना मुझे याद ए रही है तेरी पुरी पर वो उद्बोधन में प्रातः कल दीर्घकाल ध्यान करते हैं वह पुरी में जगन्नाथ पुरी में और उद्बोधन में सुबह के समय लंबे समय तक ध्यान करते थे दीघा का दीर्घकाल अर्थात की तीन घंटा ऐसा दो-तीन घंटा वो ध्यान करते थे तो खून ता के पोस्ट मूर्ति बहुत मां हो तो उसे समय उनको जैसे संगमरमर की मार्बल की एक मूर्ति बनाई हुई है इस तरह से प्रतीत होता था इतने स्थिर होकर के वो ध्यान करते थे कल हमने जैसे देखा की आ पहले तो शरीर को स्थिर करना है फिर प्राण को स्थिर करना है फिर मां को स्थिर करना है इसलिए योग साधना में पहले असम फिर प्राणायाम फिर प्रत्याहार और फिर धरना ध्यान समाधि ये सब और उससे पहले अपनी नैतिकता को स्थिर करना इसीलिए सर्वप्रथम यह और नियम तो यह नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धरना ध्यान समाधि ये जो स्टेप बाय स्टेप साधना है वो इसीलिए हमारे लिए प्रिसक्राइब की गई है उनका शरीर देखकर के लगता था ध्यान करने के समय मूर्ति की तरफ पत्थर की मूर्ति की तरह स्थिर बैठने हुए हैं स्वामी शुद्ध एक दिन प्रातः कालीन भाषा में सेक्रेटरी स्वामी शारदानंद जी के देख हर जन्म अत्यंत व्यापुल अभी ये घटना है काशी की तो काशी में क्या हुआ सुबह को शरद महाराज ध्यान कर रहे थे उसे समय तो पता है की वो सेवा शर्म के जो सेक्रेटरी महाराष्ट्र उनकी और से एक मैसेज आया की सेक्रेटरी महाराज सेवा शर्म के सेक्रेटरी महाराज शरद महाराज के साथ में बात करना चाहते हैं और यह अत्यंत जरूरी बात है शारदानंद जी श्री समय ज्ञानपुर छेड़ना उसे समय शारदानंद जी ध्यान कर रहे थे सेक्रेटरी महाराज के वह जो मैसेंजर जो था सेवक था जो भी था उनको निखिल नानजी ने का दिया की शारदानंद जी ध्यान कर रहे हैं इस समय उनको ध्यान में से डिस्टर्ब करना ठीक नहीं है उनको ध्यान में से वो बाहर निकालना मैन वो तो बड़ा ही मैन वो अपराध हो जाएगा किंतु स्वामी सुभानंद बोले जय विषयति खूब जरूरी अधिकांतु सेक्रेटरी एसुस्त हो किरण बाबर बड़ी टिटेनिया शारदानंद जी के ही प्रदा दुश्मनी देते हुए अब इस जो लोग काशी सेवा श्रम गए हैं उनको पता है की सेवा श्रम के कुछ पास में ही किरण बाबू की किरण बाबू का घर है किरण बाबू थे जो हमारे बड़े अच्छे देवोते थे और मां खुद जब काशी में आई थी तो किरण बाबू के घर रुकी थी तो शरद महाराज भी किरण बाबू के घर में र रहे थे उसे समय वो आश्रम से शोभानंद जी महाराज हो गए थे वहां पे और उन्होंने कहा था की आश्रम के सेक्रेटरी महाराज को मिलन है और इतना ही नहीं साथ-साथ में क्या कहा की सेक्रेटरी महाराज जो है वो एसुस्त है वो बीमा है और वो शरद महाराज को मिलने के लिए किरण बाबू के घर में नहीं ए पाएंगे शरद महाराज को ही ध्यान छोड़कर के सेवा आश्रम में जाकर के सेक्रेटरी महाराज को मिलन होगा की कर वो मुझे उठाते पर छीलना अभी यह बात सुनकर के निखिल आनंद जी बड़े धर्म संकट में पद गए यहां पर शरद महाराज ध्यान कर रहे हैं मूर्ति वत को करके और सामने से इतना जरूरी में से की वो सेक्रेटरी मारा जो बीमा है असुस्ता है शरद महाराज को ध्यान छोड़कर के उठाना होगा 10 मिनट चल करके सेवा आश्रम में जाकर के सेक्रेटरी को मिलन होगा इतना जरूरी कम है अभी ये जो कहते हैं ना की बिल्ली के गले में घंटी कौन लगाएगी इस तरह से शरत महाराज को ध्यान से कौन उठेगी अभी वो शरद मर्द नाराज हो जाए को तो क्या होगा उनको बड़ा अच्छे से पता था आमीन स्वामी शारदानंद जी घोड़े और दुर्जा समूह के डांडिया मैं जाकर के वह महाराज कहते हैं की शारदानंद जी के घर का जो दरवाजा है उनके कमरे का वहां पे वो खड़े थे ठीक सहयोग तो यह सान्याल महाशय जो है वो भी हमारे देवोते थे वर्णन नगर मठ में भी रहे थे ठाकुर को भी देखा था एक समय गुरु भाइयों के साथ में वह परिवार जग के रूप में वो घूमे भी थे किंतु फिर वो किस तरह से वो नहीं र पे वो चले गए थे मतलब सन्यास जीवन छोड़ दिया मतलब सन्यासी नहीं हुए थे वैसे ही वहां पर र रहे थे तो वह सानियाल महाशय इनकी बात और भी बाद में आएगी तो वो सानिया महाशय जहां पर वो शारदानंद जी के कमरे का दरवाजा है वहीं पे एक बचाने पे वो वो भी ध्यान कर रहे थे और यह निखिल आनंद जी वह दरवाजे के भीतर से देख रहे हैं की शरत हमारा ध्यान कर रहे तो अभी क्या करें धर्म संकट में पड़े हुए हैं आमीन स्वामी शारदानंद जी मैं स्वामी शारदानंद जी के घर के दरवाजे के सामने दरवाजे के सामने अपने बिस्तर में बैठकर के ध्यान कर रहे थे स्वामी शारदानंद जी घोड़े और बंदी के दीवाले पैसे तार बिछाने बोसे ध्यान कोर्चीलें शारदानंद जी अपने वह बिस्तर में बैठकर के वो भी ध्यान कर रहे थे गोला नाबादी 2017 ने उनको इशारे से पूछा की क्या चाहिए तुमको क्यों यहां पे खड़े हो शरद मरदयां कर रहे हैं वो भी ध्यान कर रहे हैं यहां पे आकर के खड़े रहने की क्या जरूर है कुछ कम ए गया है क्या ई शारदानंद जी के देखिए दी मैंने शारदानंद जी की और इशारा कर दिया क्योंकि उनके उनका कम है बड़े नाराज हो गए बोला की जो यहां से निकालो तुम्हारा ध्यान कर रहे पागल कहानी के इस समय उनके ध्यान में डिस्टरबेंस करोगे किंतु स्वामी सुभानंद जी स्वामी शारदानंद जी सेपरेटर संगे शाखा कोरा अवश्य प्रयोजन किंतु वह जो सेक्रेटरी महाराज के वह जो मैसेंजर आए थे वो जीत करने लगे की नहीं सेक्रेटरी महाराज के साथ में शारदानंद जी का मिलन बहुत आवश्यक है शारदानंद जी को ध्यान छोड़कर के खड़ा होना ही होगा 10 मिनट जाकर के सेवा आश्रम जाना ही होगा और उनसे मिलन ही होगा दी तीन बार चेष्टा बोलना शारदानंद जी संगीत कोठा बोलते ही हो गए अभी इस तरह से वो बार-बार बोल रहा है तो फिर निखिल आनंद जी दरवाजे के पास में जाकर के बोल दिए की नहीं शारदानंद जी के साथ में बात तो करनी ही पड़ेगी स्वामी शारदानंद जी चोक खुला जानते चाय ले व्यापार की शरद महाराज ने भी एक जब वो हल्ला हो रहा है तभी शर्ट महाराष्ट्र भी ध्यान भांग हो गया आंख खुला करके वह पूछा की क्या बात है भाई अमित तीन ही बोल लेने शरद महाराज ने कहा ओ एरा अच्छी ये पागल लोग मुझे शांति से ध्यान भी नहीं करने देंगे तीन ही सेक्रेटरी के लिए फिर उन्होंने कहा ठीक है भाई उसको मिलन ही है लेक आओ उसको ई जनला सेक्रेटरी एसुस तो एवं ताकि सेवा आश्रम में देते हुए मैंने कहा सेक्रेटरी महाराज एसुस्थ है अभी उनको ही सेवा शर्म में जाना पड़ेगा तीन ही तड़ा-तड़ी जमा जूता पूरे सेवा में गैलन अभी देखिए शरद महाराज ने इम्मीडिएटली वो अपने ठीक से कपड़े पहन लिए और फिर सेवा शर्म में जाकर के उनसे मिलने गए अमर किंतु एक घटना होने पर लियो इकोनो बुक कहां पर मैं यदि यह घटना याद करता हूं तो अभी भी मेरे हृदय में ध्रुव जारी हो जाति है ताकि ध्यान कल वर्क तो कुरते की भाई ही ना पेज नाम शरत महाराज को ध्यान करते-करते उनको नाराज करना नाराज करके हो तो थोड़े से नाराज हो ही गए थे तो कितना भाई मुझे मैं कितना भयभीत हो गया था मुझे अभी भी याद करके मेरा हृदय जो है वो कम पे जाता है ध्रुव जाता है रोज उठाता है देखिए की ये दो तीन चीज हैं सबसे पहले तो शरद महाराज की दो बातें हैं ध्यान करने के समय उनको जब ये उनको डिस्टर्ब किया थोड़े से तो नाराज हो ही गए किंतु पूरे संघ का जम्मा तो इनके सर पे है ना अपनी खुद की आध्यात्मिक साधना को भी छोड़कर कहानी भी का नहीं सकते थे वो रामकृष्ण संघार के जनरल सेक्रेटरी वो वो खुद मिलने के लिए जाए वह सेक्रेटरी को वो एक सेंटर के वो अध्यक्ष को तो वो का ही सकते हैं बीमा है तो फिर ठीक है अभी मैं बाद में जाऊंगा या तो फिर जो भी है छोड़ दो कितना भी जरूरी कम है मैं बाद में जाकर के उनसे मिलेगा या तो फिर नाराज होकर के कुछ भी बोल सकते थे किंतु एक बार थोड़ा सा नाराज हुए किंतु इम्मीडिएटली वो सेवा शर्म में वो महाराज को मिलने के लिए चले गए दोनों चीज हैं इन लोगों के हम डायरेक्ट डिसाइड पाल का जीवन का ये जो संतुलन देखते हैं की ध्यान करने में भी इतने वो एक निश्चित और कर्मों में भी एक अनिष्ट बहुत बार ऐसा होता है किसी किसी को हम देखेंगे की कर्म करने में बहुत ही वो निष्ठावान होते हैं बड़ा ही मेहनत करके कर्म करते हैं किंतु फिर 10-15 मिनट बैठने की बड़ी ए जाति है तो बड़ा ही मतलब परेशान हो जाता है मां मां बड़ा ही अकाल भी अकाल हो जाता है फिर इमीडियाटली हम खड़े हो जाते हैं ऐसा भी देखने में आता है और किसी किसी का अंतर मुख वो एक राहत है एक पर्सनालिटी एक एटीट्यूड तो उनको कम करने को बोले तो थोड़ा सा नाराज हो जाते अरे भाई इस समय मुझे कम करना है मैं नहीं कर पाऊंगा ये मेरा रूटीन इस तरह का है तो इस समय मैं ये सब मेरे से नहीं होगा है वह भी किंतु शरद महाराज के जीवन में और कोई डायरेक्ट डिसीप्ल के जीवन में ध्यान और कर्म दोनों का जो संतुलन है ध्यान करने के समय फैट करके उठ करके भी नहीं चलेंगे नाराजगी व्यक्त की है की अभी यह लोग मुझे ठीक से ध्यान भी नहीं करने देते हैं किंतु वो उठकर के चले भी गए एक बार नाराजगी व्यक्त करने के बाद में वो वहीं पे खत्म हो गया मामला तो ध्यान में जो उनकी निष्ठा थी कर्मों में भी उनकी लिस्ट आई ये जो बैलेंस लाइफ इनडायरेक्ट डिसीप्ल का था वो हम सभी साधुओं को भक्तों को सीखने की जरूर है की हम जब ठाकुरमार स्वामी जी का नाम भी करेंगे दिन में एक बार तो निष्ठा के सहित करना है और डिस्टरबेंस आए तो थोड़ा सा हमको उसमें थोड़ा सा नाराजगी भी दिखाना है भाई इस समय क्यों डिस्टर्ब कर रहा हूं किंतु फिर भी जब कर्म की बात ही जाए तो फिर कर्म पे भी इतनी ही निष्ठा हमारी हनी चाहिए ये कर्म और ठाकुर का नाम स्मरण ये दोनों पे निष्ठा एक समाज होगी तब हमारा जीवन जो है सड़क का जीवन बहुत ही सुंदर जाएगा हम लोगों का प्रोग्रेस बड़ा ही सुंदर रूप से होगा तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति