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Self Reflection || more we take—smaller we become. More we give—greater we grow || 20 Jan 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः पिछले कुछ समय से एक आईडिया एक थॉट मेरे माइंड में चल रहा है। ऐसा हम होता है ना कि कोई कोई इशू को लेकर के हम चिंतन करते हैं कि हां यह एक इशू है। यह एक क्वेश्चन है। उसका सॉल्यूशन क्या होना चाहिए? आध्यात्मिक दृष्टि से प्योर स्पिरिचुअलिटी की दृष्टि से। देखिए मेरा एक पर्सनल इशू जो कि मैं काफी समय से उसको ऑब्जर्व कर रहा हूं और उसका जो एक फिलॉसोफिकल आंसर खोजने का प्रयास करता हूं। मैं हमेशा यह प्रयास मेरे जीवन में रहा है कि कोई भी प्रैक्टिकल इशू है तो उसका प्रैक्टिकल सॉल्यूशन तो एक है किंतु उसका फिलॉसोफिकल अंडरस्टैंडिंग क्या है? फिलोसोफिकल सॉल्यूशन क्या है? यह भी एक समझने का प्रयास करता हूं। जैसे कि मैं रांची गया था तो एक था कि हां पॉवर्टी है भारत में तो फिर हमको करना क्या चाहिए? जहां पे सबसे ज्यादा पॉवर्टी है वहां पर जाकर के उनको सहाय करनी चाहिए। किंतु मेरे लिए सिर्फ यह एक प्रैक्टिकल एस्पेक्ट इनफ नहीं था। मुझे इसका फिलॉसोफिकल अंडरस्टैंडिंग भी चाहिए कि क्यों पॉवर्टी है? उसका रीजन क्या है? उसके पीछे कौन से फैक्टर है और मैं तो क्या है ज्यादा से ज्यादा 100 200 लोगों को हेल्प कर पाऊंगा इंस्टीट्यूशन में हूं बोलकर के 1015000 लोगों को हेल्प कर पाऊंगा इससे तो ज्यादा नहीं जबकि भारत में जो पॉवर्टी है वह तो मिलियंस एंड मिलियंस एटलीस्ट 30 40 करोड़ लोग गरीबी की वजह से उन लोगों को कष्ट होता है। सो इतने बड़े पैमाने पे जो प्रॉब्लम है पॉवर्टी का उसका क्या सॉल्यूशन होना चाहिए और पहले तो उसका फिलॉसोफिकल रीजन क्या है फिलॉसोफिकल सॉल्यूशन क्या है तो एक है प्रैक्टिकल प्रॉब्लम उसका प्रैक्टिकल सॉल्यूशन किंतु साथ में ही उसका एक फिलॉसोफिकल अंडरस्टैंडिंग तो वो मेरा थिंकिंग स्वामी जी के जो आइडियाज है उसको समझने में उसको उसने मुझे बड़ा हेल्प किया क्योंकि स्वामी जी का फंडामेंट मेंटली यही तो है कि राइज एंड फॉल ऑफ द सिविलाइजेशन। सो वो एक था। वैसे ही मेरा एक पर्सनल इशू मैं उसके बारे में बीच-बीच में सोचता हूं। प्रैक्टिकल प्रॉब्लम का एक तो प्रैक्टिकल सॉल्यूशन है। होता ही है। किंतु साथ में ही उसका फिलॉसोफिकल अंडरस्टैंडिंग क्या है? अभी इसका मुझे कुछ कुछ उत्तर मैं बेलूर मठ जाने से पहले मुझे कुछ उत्तर मिले थे और बेलूर मठ में मुझे काफी एक सुंदर मौका मिला। एक सप्ताह मैं था वहां पे। सो बैठकर के कंटप्लेट करने का चिंतन करने का एक बड़ा ही सुंदर मौका मिला। गंगा का किनारा है। उस साइड टेंपल है। राजा महाराज का समाधि मंदिर मां का समाधि मंदिर स्वामी जी का। सो वो गंगा के किनारे टहलते टहलते मंदिर में प्रणाम करते-करते वो रिफ्लेक्शन करते-करते चिंतन करते-करते मेरा जो आंसर ऑलरेडी जो कि मुझे यहां पर मिल चुका था इट बिकम स्ट्रांग मेरा कन्विक्शन ज्यादा स्ट्रांग हुआ कि जो आंसर है वह ठीक है। अभी इसके बारे में मैं बात करने का प्रयास पहले भी किया था बेलून मठ जाने से पहले। मैंने सोचा था कि जब आंसर मिला है तो मैं उसके बारे में बताऊं। किंतु क्या है कि कुछ इश्यूज खास करके जो पर्सनल इशू होते हैं वो इतने डीप होते हैं कि उस दो चीज है। एक तो है कि हम अपने बारे में कितना बताना चाहते हैं, कितना रिवील करना चाहते हैं वो तो एक क्वेश्चन है। दूसरा है कि जगत के बारे में हम जो कुछ भी सोचते हैं तो सोचने के लिए हमारे पास में शब्द है। किंतु हमारी खुद की जो फीलिंग्स है, हमारे जो भाव है, हमारी जो स्टेट ऑफ माइंड है, मानसिक परिस्थिति है, वो शब्दों के परे होते हैं कभी-कभी। हमको फील होता है किंतु हम उसको शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते। तो फिर उसका जो सॉल्यूशन जो होता है वह भी कभी-कभी उसको एक्सप्रेस करने के लिए वर्णन करने के लिए हमको शब्द नहीं मिलते हैं। ऐसा कभी-कभी हो जाता है। तो मैंने आज सुबह से मैं सोच रहा था कि एटलीस्ट टुडे आई विल ट्राई कि भले ही चाहे मुझे शब्द ना मिले या तो फिर भले ही चाहे मैं इतना अच्छे से एक्सप्लेन ना कर पाऊं। लेकिन फिर भी लेट मी ट्राई कि यह क्या इशू था और क्या इसका सॉल्यूशन मुझे मिला है। देखिए मेरे साथ

Problem with my attitude: I am very introvert

में एक प्रॉब्लम बहुत लंबे समय से रहा है कि मैं बहुत ही ज्यादा इंट्रोवर्ट हूं। इजीली मैं लोगों के साथ में बात नहीं कर सकता। इसका रीजन एक बार मैंने शायद डिस्कस किया था। एक तो है कि मेरा एवरजन या तो मुझे घृणा है। स्मॉल टॉक जिसको कहते हैं। वो अच्छा क्या कर रहे हो? कैसे हो? कल क्या खाया था? परसों दिन क्या किया था? कल कहां जाने वाले हो? यह जूते कहां से खरीदे? यह कपड़े कहां से खरीदे? मार्केट में क्या चल रहा है? लोग क्या कर रहे हैं? यह जो जिसको हम स्मॉल टॉक कहते हैं, यह फ्रेंडली चिट चैट यह मुझे मेरे से शायद बर्दाश्त ही नहीं होती। मैं हमेशा आइडियाज है, फिलॉसोफी है ना कि ऐसा ही कुछ मेरे मन में चलता रहता है। मेरे पास में थोड़ा सा फ्री टाइम होगा तो मैं स्टडी करूंगा। कोई प्रोजेक्ट में बिजी रहूंगा। बट लोगों को मैं इग्नोर करूंगा। तो यह लोगों को इग्नोर करना जो मेरा हैबिट है इससे होता क्या है कि बहुत कम फ्रेंड्स बनते हैं मेरे रेयरली और फिर दूसरा एक चलो फ्रेंड नहीं बनते हैं। उसका तो कोई यह नहीं है। पता ही है कि मैं बिजी इतना हूं कि इतना कोई फ्रेंडशिप जितना कुछ चाहिए भी नहीं। किंतु इसका ना एक नेगेटिव इंपैक्ट भी होता है। जिन लोगों का भीतर में इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स होता है, वे लोग यह समझ बैठते हैं कि मैं बहुत ही ज्यादा घमंडी हूं। मैं बहुत ही ज्यादा अहंकारी हूं। बोलकर के मैं उनसे बात नहीं करना चाहता। अभी उनके मन में यदि ऐसा बैठ जाता है तो मैं क्या करूं? पहली बात तो है कि मुझे नहीं लगता कि मैं घमंडी हूं। मुझे बस इतना ही लगता है कि आई एम ए वेरी ड्रिवन पर्सन। मेरा जीवन का एक उद्देश्य है। उसका एक हमेशा मुझे उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए मुझे लगे रहना है। एक सेकंड भी मुझे वेस्ट नहीं करना है। यह मेरा थिंकिंग है। मैं नहीं मानता कि मैं घमंडी हूं। किंतु कोई कोई-कोई लोग ऐसा मान बैठते हैं कि हां यह बहुत ज्यादा घमंडी है और उनको ना बहुत बुरा लग जाता है। वे लोग ऐसा सोचते हैं कि मैं उनको इग्नोर करता हूं या मैं उनको तुच्छ दृष्टि से देखता हूं। हालांकि मेरे मन में ऐसा नहीं है किंतु वे लोग ऐसा सोचते हैं। अभी देखिए अपना मन के भीतर में क्या चलता है उसका एनालिसिस 100% करना वो भी तो कोई हमसे पॉसिबल नहीं है। क्योंकि यह भी एक बात है कि घमंड जो होता है वो घमंड की माध्यम से ही तो यह जो जिसको ईगो कहते हैं, अहंकार कहते हैं। उसके चश्मे पहन करके ही तो हम जगत को देखते हैं ना। मन बुद्धि चित्त अहंकार यही तो अपने कॉन्शियसनेस का एक पार्ट है। जैसे हमने कल डिस्कस किया था कि एक रिफ्लेक्टेड चैतन्य है। एक मन बुद्धि चित्त अहंकार है। दोनों मिलकर के अपना कॉन्शियसनेस बनता है। तो यह अहंकार के चश्मे पहन के ही तो मैं जगत को देखता हूं। अहंकार के चश्मे पहन करके ही तो मैं अपने को एनालाइज करता हूं। तो मैं शायद ऐसा सोचूंगा मेरे में अहंकार नहीं है। हो सकता है अहंकार हो। तो जो भी है फैक्ट यह है कि मैं लोगों के साथ बात करना अवॉइड करता हूं और कुछ-कुछ लोगों को ऐसा लग जाता है कि मैं उनको तुच्छ दृष्टि से देखता हूं या तो फिर मैं इनको इग्नोर करता हूं या फिर मैं उनको अवॉइड करता हूं और मैं अपने को बड़ा घमंडी मानता हूं। अभी होता क्या है? यदि उनको बुरा लगे वहां तक भी यदि मामला सिमट जाए तो भी ठीक है। किंतु कभी-कभी क्या है? वे लोग चाहते हैं कि वे लोग बदला लें। मुझे नीचा दिखाएं। मेरा अपमान करें। मेरा इंसल्ट करें। जिससे कि क्या है उनके हृदय को जो ठेस पहुंची है मेरे बिहेवियर से वो मुझे अपमान करके उनके हृदय को सुकून मिले। उनके हृदय को शांति मिले। तो वे लोग इस तरह से प्रयास करेंगे। कभी-कभी मेरा अपमान भी करेंगे और अपमान होने से हमको तो बुरा लगेगा ही लगेगा। तो मुझे बुरा लगने से उनको बड़ा अच्छा लगता है कि देखा वह घमंडी आदमी अभी तक तो हमको तुच्छ समझता था। अभी उसका जब अपमान हुआ है और उसको जब बुरा लगा है तो उसकी अकल अभी ठिकाने आ गई है। तो देखिए कि ऐसा मेरे साथ में होता रहता है क्योंकि जो फंडामेंटल जो मेरे नेचर का है कि उसको तो मैं चेंज नहीं कर पाऊंगा। मैंने प्रयास किया ज्यादा फ्रेंडलियर होने का क्योंकि मैंने तो लीला प्रसंग पढ़ा है। ठाकुर का बचपन की कहानियां मुझे पता है। मुझे अभी भी याद है। मैं रामकृष्ण मिशन में जॉइ ही किया है और फिर जॉइनिंग बेलूर मठ मेरा जॉइनिंग है। प्री प्रोबेशनल ट्रेनिंग सेंटर पीपीटीसी में वहां से मुझे नागपुर भेजा गया। तो उस समय जब मैं शुरू शुरू में आया था लीला प्रसंग में काफी पढ़ता था डिटेल में। तो ठाकुर का यह जो हृदय के उत्साह से उच्छवास से आनंद से लोगों के साथ में मित्रता करना लोगों के प्रति सहानुभूति रखना लोगों के दुख दर्द कष्ट समझ करके उनको सहाय करना सांत्वना देना बालक गदाधर उसकी जो कामार पुकुर की लीलाएं हैं वो मैंने काफी अच्छे से पढ़ी थी बाय दैट टाइम मेरा नागपुर पोस्टिंग हुआ तो अभी यह क्या है मेरा मोनेस्टिक लाइफ में तो पहला पहला ही कदम है क्योंकि इससे पहले मैं रांची में था तो सही मैं साधु के कपड़े पहनता तो था किंतु मैं 90% ऑफ मेरा टाइम ट्राइबल एरिया में ही बीता है। सुबह को 7:30 को नाश्ता करके जो मैं निकल जाता था सीधा रात को 8 8:30 को आता था। रात्रि का भोजन करके सीधा अपने कमरे में चला आता था। वो बीच में नाइट क्लास होता है। आपको पता होगा रामकृष्ण संघ के जितने सेंटर होते हैं वो तो नाइट क्लास होता है। भोजन के बाद में रात के तो वो समाप्त करके मैं सीधा कमरे में चला आता था। तो एक मोनेस्टिक कम्युनिटी में ज्यादा डीपली में इनवॉल्व नहीं था। यह पहली बार मेरा इनवॉल्वमेंट हुआ नागपुर में। तो मैं जब नागपुर में बाय द टाइम मेरा पोस्टिंग हुआ। मुझे ऑलरेडी बालक गदाधर की यह जो सहानुभूति प्रेमाल जो वर्तन है बिहेवियर है उसके बारे में बहुत अच्छे से पता है। एट दैट टाइम मैंने सोचा था कि मेरा भी तो बिहेवियर ऐसा होना चाहिए। अल्टीमेटली ये जो इमिटेशन ऑफ श्री रामकृष्ण हमको तो ठाकुर को ही फॉलो करना है। हम हमारी खुद की पर्सनालिटी जैसी भी हो। हमको तो ठाकुर की पर्सनालिटी को ही पर्सनालिटी रूपी जो ये जो मोल्ड है उसी के भीतर में अपने को ढालना है। तो मैं सोचता था नागपुर जाकर के कि मेरा भी पर्सनालिटी इस तरह से वार्म पर्सनालिटी हो। फ्रेंडली पर्सनालिटी हो। लोगों के प्रति मेरी सहानुभूति मेरा एक एंपैथी हो। किंतु ऐसा हो नहीं पाया। मेरा इंट्रोवर्ट नेचर हमेशा के लिए इंट्रोवर्ट ही रह गया। अभी देखिए दिस इज कंट्राडिक्शन कि आउट ऑफ हृदय की सहानुभूति से तो मैं रांची गया था। एमैथी की वजह से ही लोगों के प्रति करुणा की वजह से ही रांची गया था। किंतु दैट इज क्या है कि एक एब्स्ट्रैक्ट करुणा है। एब्स्ट्रैक्ट एंपैथी है कि हां जो लोग गरीब है उनके प्रति सहानुभूति। किंतु एक कोई एक पर्टिकुलर व्यक्ति जो कि कम्युनिटी लेवल पर है वो सहानुभूति शायद उस समय भी मैं नहीं इतना डेवलप कर पाया बाद में भी इतना इजीली डेवलप नहीं हुआ। तो देखिए कि सिविलाइजेशनल लेवल पर मेरा कंपैशन है किंतु कम्युनिटी लेवल पर कंपैशन नहीं है। दिस इज अ कंट्राडिक्शन मेरे नेचर में जिसको कि मैं भी नहीं समझ पाता हूं कि क्यों है। किंतु है। तो, देखिए कि अभी यह मेरे नेचर में जो डिफेक्ट है, या तो शॉर्टकमिंग कहो ना कि अह स्ट्रेंजनेस कहो जो भी कहो विचित्रता वो बिल्कुल पहले से मुझे पता थी कि इन जनरल जो गरीब है, पद दलित है, दरिद्र नारायण, चंडाल नारायण, मूर्ख नारायण उनके प्रति मेरे हृदय का पूरा प्रेम है, पूरा सहानुभूति है। किंतु जब साथ में रहने की बारी आती है जो 10 15 लोग एक साथ में रहते हैं रामकृष्ण आश्रम में रामकृष्ण मिशन के आश्रमों में तो जो मेरे साथ में रहने वाले लोग हैं कम्युनिटी लेवल पर इतना कोई मैं सहानुभूति या सिंपैथी नहीं दिखा पाता हूं। मैं सब समय सेल्फ अब्सॉर्बड अवस्था में रहता हूं। सब समय यह सोचता हूं। ये किताब पढ़ लिया। अभी यह किताब पढ़ना है। इसके बाद में यह प्रोजेक्ट हाथ में लेना है। इसके बाद में यह काम करना है। इसके बाद में यह लिखना है। इसके बाद में यह सोचना है। इतना मैं सेल्फ अब्सॉर्बड रहता हूं कि आसपास में क्या चल रहा है? लोगों की क्या परिस्थिति है? लोगों के मन में क्या चल रहा है? लोगों को सहानुभूति की आवश्यकता है और मैं वह सहानुभूति नहीं प्रोवाइड कर पा रहा हूं। एज इफ आई एम लिविंग लाइक एन एलियन अमोंग द पीपल। लोगों के बीच में रहता तो हूं किंतु लोगों के साथ में मिक्स नहीं हो पा रहा हूं। यह अंडरस्टैंडिंग मुझे समझ में आ रहा था कि ऐसा हो रहा है क्योंकि साइकोलॉजी तो मैंने स्टडी किया है। हिस्ट्री मैंने स्टडी किया है। ठाकुर मां स्वामी जी को स्टडी किया है। तो इतना तो मेरा अंडरस्टैंडिंग क्लियर है कि सिविलाइजेशनल लेवल पे मेरा जो बिहेवियर होना चाहिए व्हिच इज़ परफेक्ट बिहेवियर है। यदि स्वामी जी की दृष्टि से देखें तो। किंतु कम्युनिटी लेवल पर जो मेरा बिहेवियर है इट इज माने बहुत ही उसमें शॉर्ट कमिंग्स है। बहुत ही उसमें इंप्रूवमेंट की आवश्यकता है। अंडरस्टैंडिंग है किंतु यह मैं अपने को उस लेवल पर कभी ला नहीं पाया कि मैं अपने बिहेवियर को कम्युनिटी लेवल पर चेंज करूं। इससे परिणाम क्या आता है? देखिए मैं दोनों दृष्टि से अपने को देख पा रहा हूं। मैं अपनी दृष्टि से अपने को देखता हूं कि अच्छा उसको मेरे पर गुस्सा क्यों आता है? मैं ना ही उसका मैंने कुछ बुरा किया है ना ही उसके बारे में कुछ बुरा सोचा है। मैं तो अपना काम ही करता हूं ना। उससे उसको क्या है? तो मैं अपनी दृष्टि से जैसे मैं मेरी जो कम्युनिटी है उन लोगों को देखता हूं। आश्रम में जो रहते हैं उनको देखता हूं। तो आश्रम वासियों की दृष्टि से भी मैं अपने को देख पाता हूं। इतना तो मेरे में एक विज़डम आया है कि लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं। लोग मेरे बारे में किस तरह से समझते हैं मुझे। तो उनकी दृष्टि से जो घमंडी अहंकारी इंट्रोवर्ट लोगों को अवॉइड करता है। लोगों को शोकता है भीतर भीतर में से लोगों को धिक्कारता है। घृणा करता है। किसको पता तो मैं अपनी दृष्टि से भी अपने को देख पाता हूं। दूसरों की दृष्टि से भी अपने को देख पाता हूं। तो ये जो है मैं बहुत लंबे समय से ऑब्जर्व कर रहा हूं। कुछ-कुछ लोगों को मेरे बिहेवियर से इतना बुरा लग जाता है कि वे लोग जब तक मेरा अपमान नहीं करेंगे, जब तक मुझे इंसल्ट नहीं करेंगे, तब तक उनके हृदय को शांति नहीं मिलेगी। तो, इतना उनको बुरा लग जाता है। सो, ठीक है, अभी क्या करेंगे? कम्युनिटी में रह रहे हैं तो यह सब चीजें तो चलने ही वाली है। अपमान सहन कर लेता हूं और कभी सामने उत्तर नहीं देता क्योंकि मैं समझ पा रहा हूं कि उनको गुस्सा या उनको क्रोध कहां से आ रहा है। तो अभी यह जो थिंकिंग है मेरी जो यह अवस्था है इसके बारे में मैं ऑन एंड ऑफ ऑन एंड ऑफ कभी-कभी सोचता हूं। कभी नहीं सोचता कभी सोचता हूं। तो यह बेलूर मठ जाने के एक सप्ताह पहले इस बात के बारे में मैं सोच रहा था। सॉल्यूशन क्या होना चाहिए? देखिए मनुष्य का मन जो है ना तो जैसे मूवीज में होता है ना कि मूवी में क्या होता है? हीरो का अपमान हुआ। फिर यह हीरो उस समय तो कमजोर था। छोटा था उम्र में। किंतु फिर एक बार उसका अपमान हुआ। खास करके मैं जैकी चैन जैकी चैन [गला साफ़ करने की आवाज़] है ना वो हांगकांग का वो एक्टर उसके मूवीस देखेंगे तो फिर क्या करेगा वो कुंगफू ऐसा कुछ सीखेगा फिर वह जाकर के जो विलन है उसकी पिटाई करेगा तब कहीं जाके उसका यह जो बदला रिवेंज कि यह जो अग्नि थी उसके हृदय में वह शांत होगी। यह मूवीस जो है उसमें यही आपको दिखाया जाता है कि बदला लेना है, रिवेंज लेना है। आपके साथ में जो अपमान हुआ, बुरा हुआ, आपका शोषण हुआ, उसका आपको बदला लेना है। तभी आपके हृदय की अग्नि शांत होगी। जिस तरह से यह बात मैं दूसरों लोग के भीतर में देख रहा हूं, मैं अपने भीतर में भी इसको कभी-कभी देखता हूं कि इसने मेरा अपमान किया, मैं बदला लूंगा। एक दिन में इतना पावरफुल हो जाऊंगा कि मैं उसको फिर ठिकाने लगा दूंगा। किंतु मुझे तो पता है कि यह तरह का विचार जो है मेरी इस पूरी आध्यात्मिकता को खा जाएगा। यदि मैं बदला लेने के बारे में सोचूं, रिवेंज लेने के बारे में सोचूं तो जो मैंने मेहनत करके अभी तक प्राप्त किया था पूरा उसके ऊपर में पानी फेर जाएगा। मेरा यह जन्म जो है वह विफल हो जाएगा। फिर नेक्स्ट जन्म में वो अल्फाबेट ए बी सी डी से फिर से स्टार्ट करना होगा। वो ए बी सी डी करते-करते मैं वो एक्स व जेड तक जो पहुंचने वाला था तो वहां से गिर करके फिर से वो ए बी सीडी से स्टार्ट करना होगा। तो इस तरह का बदला लेने का तो मुझे सोचना ही नहीं है। किंतु फिर जब अपमान होता है तो आप अपने हृदय को कैसे शांत करेंगे? वह भी तो एक बहुत बड़ा फैक्टर है। क्योंकि यदि हृदय के भीतर में मन के भीतर में इस तरह का एक झंझवात चलता रहता है। एक तरह का तूफान चलता रहता है तो आप साधन भजन बिल्कुल नहीं कर पाएंगे। थोड़ा सा भी आंख बंद करेंगे तो मन के भीतर में वही चलता रहेगा कि अरे इसने मेरे साथ में ऐसा किया। उसने मेरे साथ में ऐसा किया और यह एकद दिनों की बात नहीं है। यह जो इंसल्ट है, अपमान है, यह सब हमारे ह्रदय में घर करके बैठ जाते हैं। सालों सालों तक हमारा पीछा करते हैं। कहीं आप जप करतेकरते मन स्थिर हो गया है। एक घंटा दो घंटा आप बैठे हैं। मन एकदम स्थिर हो गया है। एकाएक कहां से वो 10 साल पुराना 20 साल पुराना वो इंसल्ट एकाएक आकर के अपने अपने पे आक्रमण करेगा और मन की पूरी शांति खत्म कर देगा। उस समय तो ऐसा ही लगेगा कि अभी उठा वो तलवार अभी जाकर उसको मारो। जब तक मैं उसको मारूंगा नहीं तब तक मेरे हृदय को शांति नहीं मिलेगी। तृप्ति नहीं मिलेगी। तो फिर क्या है कि आध्यात्मिक जीवन में इसी तरह से होता रहता है। हम मेहनत करके एवरेस्ट कैलाश पर्वत तक जाना तो है। बहुत हद तक ऊपर उठ ही तो गए हैं। बस शिखर को स्पर्श करने ही वाले हैं। एकाएक पैर फिसला और सीधा जमीन पर आकर टकराए। जमीन पे आकर पटकाए। तो ऐसा बार-बार होता है। फिर होता क्या है? आध्यात्मिक जीवन के प्रति अपना एक तरह का विराग हो जाता है। अरे यार कुछ होने ही नहीं वाला है इस जन इस जन्म में तो छोड़ो इस सब मामले को और कुछ करते हैं। आनंद लेते हैं एंटरटेनमेंट लेते हैं। आजकल लोगों को यह जो शॉर्ट वीडियो है, सोशल मीडिया है, यह सबका हैबिट जो है, बैड हैबिट यह क्यों लग गया है? एडिक्शन क्यों है? एडिक्शन इसीलिए है क्योंकि यह मन को अशांत कर देने वाली घटनाएं बार-बार मन के भीतर में घूमती रहती है। आध्यात्मिकता का सहारा ले लेने को आप जाएंगे तो सही किंतु और शुरू शुरू में गुरु के उपदेश है। फिर बाकी सब आध्यात्मिक पिपासु पिपासु लोग जो है मुमुक्षु लोग जो है उनका संग है। वो करतेकरते आपको शुरू शुरू में तो फटाफट प्रोग्रेस होने लगेगा। किंतु क्या है हमारे भीतर में यह राक्षस जो रहता है ना यह राक्षस एक ना एक दिन सर उठाएगा जैसे ही साधना की उच्च से उच्चतम भूमि पर जाना शुरू करेंगे तब यह सब मन के भीतर का बाहर आता जाएगा तब हमको लगेगा अरे भाई मैं नागपुर में था मैं उस समय रांची में था या राजकोट में था या बेलूर मठ में था वो कितने साल बीत गए उस घटना को उस समय मुझे वह एक घटना पसंद नहीं आई। एक किसी व्यक्ति ने मेरा अपमान किया या तो फिर मुझे कुछ चीज से बुरा लगा। आज आज 10 साल हो गए, 15 साल हो गए, 20 साल हो गए। फिर भी यह चीज मेरे मन में एकाएक प्रकट हो के यह जो शांत मन से यहां पर समुंदर का किनारा है। सुबह को मैं टहल रहा हूं। वहां पे वो सूर्योदय हो रहा है। उस समुंदर के उस पार रंग बिरंगी बादल है। एकदम जगत शांत है। कहां मेरा मन हू हू करे। ठाकुर की भाषा में हू हू करता करता वो ईश्वर के समीप जाना चाहिए ना कि एकाएक भीतर में से ऐसा एक विचार आता है जैसे कि हृदय को मन को तोड़ देता है और फिर ऐसी निराशा लग जाती है उस समय हमको मेरे साथ में ऐसा बार-बार हुआ पिछले एक महीने में ऐसी निराशा लग गई मुझे लगा कि छोड़ो यार पूरे मामले को होने ही नहीं वाला है आध्यात्मिक जगत में कुछ प्रगति करना आसान है मैं तो कहता हूं आध्यात्मिक जीवन में इस प्रगति को टिकाए रखना बड़ा मुश्किल है। आप मेहनत करके बैठेंगे कुछ दिन देखेंगे कि ऐसा लगेगा कि बस अभी आत्म साक्षात्कार नजर के सामने ही है। बस अभी यह कुछ ही दिनों का मामला है। ईश्वर का दर्शन ठाकुर का दर्शन हो ही जाएगा। फिर एकाएक भीतर में से एक ऐसा रिएक्शन आएगा। कितने सालों पुरानी घटनाएं आकर के मन में ऐसा एक तूफान खड़ा करेगी कि कहां वो हिमालय पर बैठे थे कैलाश पर बैठे थे वहां पे सीधे जमीन के पर में पटकेंगे हमको और फिर मन की शांति पूरी तोड़ मरोड़ कर देगी तोड़फोड़ कर देगी इसका सॉल्यूशन क्या होना

More I take—smaller i become. More I give—bigger I become. जितना मैं लेता हूँ, उतना छोटा हो जाता हूँ; जितना मैं देता हूँ, उतना बड़ा बन जाता हूँ

चाहिए देखिए जो कि एक सामान्य आदमी के मन में होता है बदला लेने की भावना यह भावना उस समय अपने ऊपर में इतनी स्ट्रांग हो जाती है कि उससे माने आध्यात्मिक जीवन आपका मैंने देखा है ऐसे लोगों को एक साधक को मैंने देखा है कि किसी के साथ में फोन पर बात करेगा फोन की बातें रिकॉर्ड करेगा और फिर मुझे उसने बताया इस साधक ने कि देखो मैंने वो सब फोन पर बात उसके साथ में हुई ना रिकॉर्ड करके रख दी है प्रूफ के लिए भविष्य में मैंने कहा देखो भाई तुम साधना में थोड़ा सा भी आगे बढ़ना चाहते हो तो जितने रिकॉर्डिंग किए हैं अभी के अभी उसको सब गंगा में फेंक दो। एक भी चीज अपने पास में मत रखना। वरना तुम थोड़ा सा भी आध्यात्मिक जीवन में नहीं बढ़ पाओगे आगे। क्योंकि बदला लेने की भावना अपने को प्रोटेक्ट करने की इच्छा कोई भविष्य में मेरे पर झूठा आक्षेप रखे तो मेरे पास में प्रूफ होना चाहिए। हम लोग तो करोड़ों-करोड़ों रुपयों के साथ में काम करते हैं। तो फिर कहीं आक्षेप झूठ-मूठ का लग गया तो अपना तो अपना जो सम्मान है, अपना जो ओनर है सब तो जैसे मिट्टी में मिल जाएगा। तो मुझे अपने को प्रोटेक्ट करने के लिए कुछ ना कुछ मेरे पास में सबूत रखने हैं। तो यह सब कुछ अपने को प्रोटेक्ट करना है, रिवेंज लेना है, बदला लेना है। वह सभी चीजों को एक साथ में उठा के गंगा में फेंक देनी है। भगवान के सामने पूरा नंगा हो जाना है। स्वामी जी का एक इंटरेस्टिंग आईडिया है। स्वामी जी कहते हैं कि जब अपने मन के भीतर में काम का विचार आता है। अपने मन के भीतर में यह कामिनी के बारे में विचार आता है तो सब साधुओं के बीच में जाकर के निवस्त्र हो जाओ नंगे हो जाओ और कहो सबके सामने कि देखो मेरे मन में यह विचार आ रहा है। ये सब विचार जो है अंधेरे में पनपते हैं। ये सब विचार जो है एकांत में पनपते हैं। ये जो लोगों की दृष्टि रूपी सूर्य प्रकाश इस पर डालेंगे फड़ाक करके ये सब हवा हो जाएंगे। तो वैसे ही यह जो अंधेरे में पनपने वाले जो बदला लेने के विचार है यह सबको पवित्र गंगा में पधरा दो। ईश्वर के सामने नंगे हो जाओ। संपूर्ण निवस्त्र दिगंबर हो जाओ। कोई प्रोटेक्शन नहीं, कोई डिफेंस नहीं, कोई प्रूफ नहीं, कोई रिवेंज नहीं। संपूर्ण रूप से ईश्वर के सामने जैसे अभी स्यो जात शिशु जिसको कहते हैं अभी-अभी जिसने जन्म लिया है इस तरह के शिशु की तरह ईश्वर के सामने हमको खड़े रहना है। तो अभी देखिए मैं यह सब कुछ सोच रहा था। उस समय ना मैं टहल रहा था यहां पे वो गंगा के समुंदर के सामने ही हमारा लाइब्रेरी उसकी टेरेस पे मैं शाम को शाम को हाथ में चाय का एक कप लेकर टहलता हूं तो मैं वॉकिंग कर रहा था एकाएक मेरे माइंड में विचार आया मोर यू टेक स्मॉलर यू बिकम मोर यू गिव बिगर यू बिकम दिस इज़ अ वेरी पैराडॉक्सिकल थॉट हम जितना लेंगे ना उतना हम छोटे बनेंगे जितना जितना देंगे उतना हम बड़े बनेंगे। देखिए लेने का क्या अर्थ है? मेरा अपमान हुआ तो मुझे बदला लेना है। मुझे इस जगत से अपना सम्मान लेना है। मुझे लोगों से सम्मान चाहिए। मुझे लोगों से रिस्पेक्ट [नाक से की जाने वाली आवाज़] चाहिए। मुझे लोगों से एक तरह की प्रशंसा चाहिए। मुझे लोगों से एक तरह का रिकॉग्निशन चाहिए कि हां मैं कुछ अच्छा कर रहा हूं। तो रिकॉग्निशन नहीं मिलता है, सम्मान नहीं मिलता है, अस्मान मिलता है तो मुझे बड़ा गुस्सा आता है। यह गुस्सा आता क्यों है? क्योंकि मैं यह लेना चाहता हूं उनसे। सम्मान चाहता हूं। मैं मेरे मन में कहीं ना कहीं यह बात घर करके बैठी है कि मैंने अपने जीवन में इतना सैक्रिफाइस किया। मैंने अपने जीवन में इतना त्याग किया। मैंने इतना लोग घर छोड़ के संघ में आते हैं। रामकृष्ण संघ ज्वाइन करने के लिए। मैंने घर तो छोड़ा मैंने रामकृष्ण संघ छोड़ दिया था। रांची में काम करने के लिए एज ए एक्सटर्नल एज ए प्राइवेट ब्रह्मचारी में रांची में रहता था। क्योंकि रामकृष्ण संघ की सिस्टम में ऐसा नहीं आता कि मैं जाकर कहूं कि मुझे ट्राइबल एरिया में काम करना है और मेरे कहे अनुसार यह लोग मुझे पोस्ट करें। ऐसा नहीं होता। वे लोग जहां पोस्ट करेंगे वहां जाना है। तो जब मैंने रिक्वेस्ट किया कि मुझे गांव में काम करना है तो उन्होंने कहा कि तुम संघ छोड़ दो एज ए तुम प्राइवेट साधु के रूप में रहो और फिर वहां पर जाकर काम करना। तो मैंने कहा वो भी मुझे मंजूर है। रांची में मैं गया था। एज ए प्राइवेट साधु के रूप में गया था। वहां आश्रम में ही रहता था। ब्रह्मचारी के ही कपड़े पहनता था। उन्हीं के साथ में खाना खाता था। किंतु मैं संघ का पार्ट नहीं था। मैं गांव पूरा अपना टाइम गांव में बिताता था। बाद में तो फिर मुझे संघ में जॉइ करने का चांस मिला। व्हिच इज अ लॉन्ग स्टोरी। किंतु लोग घर छोड़ते हैं तपस्या करने के लिए। मैंने सिर्फ घर नहीं छोड़ा। मैंने संघ को भी छोड़ा है गांव में काम करने के लिए। तो यह जो मेरा सैक्रिफाइस है, अकॉर्डिंगली मुझे वह तो एक रिकग्निशन तो मिलना चाहिए। सम्मान छोड़ दीजिए, प्रशंसा छोड़ दीजिए। एक रिकॉग्निशन तो मिलना चाहिए कि हां भाई इसका ये हिस्ट्री है। तो क्या है वो रिकॉग्निशन मुझे चाहिए। यह जितना मैं चाहता हूं जितना मैं लेना चाहता हूं उतना ही मैं छोटा बनूंगा। उतना ही मेरा मन जो है ना संकुचित होता जाएगा। किंतु गिव देखो चारों ओर माने सिविलाइजेशनल लेवल पर तो एक हो गया कि गरीब है चंडाल नारायण मूर्ख नारायण दरिद्र नारायण वो तो हो गया एक कम्युनिटी लेवल पे देखिए जो कि मेरा हमेशा से एक डिफेक्ट रहा है मेरे पर्सनालिटी का ना कि मेरे कैरेक्टर का जो भी है मैं लोगों को कंप्लीट इग्नोर करता हूं। मेरे जो आसपास में जो रहते हैं उनकी ओर देखो। देखिए ठाकुर ने मुझे इतना तो दिया है कि मैं हमेशा मैं उनकी दृष्टि से अपने को देख पाता हूं। यह साइकोलॉजी स्टडी करने का लोगों के मन समझने का यह एक बेनिफिट है कि उनकी दृष्टि से मैं देख पाता हूं कि हां वे लोग क्या सोच रहे हैं। तो टेक एडवांटेज ऑफ दैट। मैं तो समझ रहा हूं कि ये जो है साधक है, साधु है, भक्त है, स्टाफ है, वॉलंटियर है ना कोई भी है जो कि आश्रम में जो हम लोग साथ में यूजुअली रहते हैं। उसके मन में कहीं ना कहीं किसी तरह का खेद है। कहीं ना कहीं कुछ रिग्रेट है। जाओ उसके साथ में बैठकर के सहानुभूति पूर्वक वर्तन करो। उसको दो मीठे वचन कहो जिससे कि उसके हृदय को सांत्वना मिलेगी। गिव लेना नहीं है। एक जो हमेशा छुपी हुई एक आशा थी रिकॉग्निशन की कि हां मैं जो कर रहा हूं मेरा जो कंट्रीब्यूशन है वो रिकॉग्नाइज हो। यह जो मेरा एक सेल्फ अब्सॉर्ब्ड भाव था उसको अभी कंप्लीटली भूल जाना है। देना है। मैंने जो किया सो किया जो नहीं किया सो नहीं किया। मेरे कैरेक्टर की स्ट्रेंथ वीकनेस फॉरगेट द होल थिंग अपने को संपूर्ण रूप से भूल जाओ। अपने को संपूर्ण रूप से खत्म कर दो। देना है। अपना मन जो है बहिर्मुखी होना है। लोगों की लोगों के मन के भीतर में क्या चल रहा है उसको समझना है। उनको सहानुभूति के सांत्वना के मित्रता के प्रेम के दो वचन कहने हैं। उनके प्रति हमारी ये जो सहानुभूति है वह परिस्फुट होने देनी है। और देखिए ये मोर यू गिव लार्जर यू बिकम। यह मैंने उस समय जब यह मेरे माइंड में आईडिया आया था तब से मैं इसको थोड़ा सा प्रैक्टिस करने का ट्राई कर रहा हूं। अभी देखिए मेरा साथ में सबसे बड़ा प्रॉब्लम कहां पे आता है? एक तो है कि मैं एक्सट्रीमली इंट्रोवर्ट हूं। बात करना मेरे लिए बहुत ही मुश्किल है। तो फिर क्या है? चलो सामने जाकर के बात नहीं करेंगे तो हृदय में से तो हम एक पहुंचा सकते हैं। स्वामी जी कहते हैं ना राजयोग में कोई आपका मित्र या संबंधी बीमार है। कहीं दूसरी जगह पर रह रहा है तो हीलिंग्स के वेव्स भेजिए उसकी ओर। यह हीलिंग्स क्योंकि यह प्राण का विज्ञान है तो प्राण तो कनेक्टेड है कॉस्मिक प्राण है जो कि सभी लोग उस कॉस्मिक प्राण के साथ में कनेक्टेड है तो उस कॉस्मिक प्राण के मीडियम से यदि मैं अपनी हीलिंग आरोग्य की कामनाएं शुभकामनाएं यदि उसको भेजूंगा तो यह आरोग्य की शुभकामनाएं यह कॉस्मिक प्राण के मीडियम से वह तैरती तैरती उसके मन में जाएगी उसको आरोग्य प्राप्ति करवाएगी उसको हील करेगी। यह स्वामी जी ने स्पष्ट रूप से कहा है। तो व्हाई नॉट इस साइंस का एडवांटेज लेकर के मैं उनके प्रति अभी सहानुभूति की कामनाएं भेजूं। सहानुभूति के गुड विशेस भेजूं। इतना तो मैं कर सकता हूं। शब्दों से व्यक्त करना थोड़ा सा मुश्किल है। और देखिए इस थ्यरी को थोड़ा सा एक्सपैंड करें। सभी के साथ में बात करने को जाना वह भी कोई कहां पर उचित नहीं है। स्त्रियों को खास करके किसी के साथ में मित्रता पूर्ण व्यवहार करने को जाएंगे वो कुछ उल्टा ही समझ लेगा। तो शब्दों से ज्यादा कुछ व्यक्त नहीं करना चाहते हैं। दैट इज ओके। अंडरस्टैंडेबल है। मैं इस बात को बहुत अच्छे से समझ सकता हूं कि शब्दों में व्यक्त करना इस हमेशा मेरा एक माने क्या कहेंगे? वीकनेस रहा है तो बट अपने मन से यह सहानुभूति के विचार भेजिए। देखिए स्वामी जी की बात यदि सच है माने समथिंग एज ग्रोस एज डिसीज माने स्थूल से स्थूल क्या हो सकता है? देह की बीमारी तो मन की बीमारी तो माने और ज्यादा नियरर टू वेदांत नियरर टू प्राणिक यह कॉनसेप्शन के नजदीक है। तो ये मन की जो उसकी जो सामने वाले की बीमारी है तो सहानुभूति के हीलिंग्स के विचार उसकी ओर भेजिए। देखिए कि उसको टच करेंगे ही करेंगे। अभी उसको क्या बेनिफिट होता है नहीं होता है वह तो एक साइड फैक्टर है। देखिए यह जब हम देते हैं ना वी विल ग्रो मोर वी गिव बिगर वी ग्रो यह पिछले एक सप्ताह से जाने से पहले बिलूर मठ में भी यह मैंने देखा कि सही में यह इस प्रैक्टिस का इतना मुझ पर पॉजिटिव इफेक्ट हुआ है। मैंने कल ही कहा था कि गंगा आरती हो रही थी। संक्रांति के दिन गंगा के किनारे बैठा था। तो मैंने कहा था कि एकाएक मुझे ऐसी अनुभूति हुई। म सुंदर वातावरण है। मां का समाधि मंदिर और मां गंगा और इतने साधु संघ इतने साधुओं का संग रिवर्ड प्रेसिडेंट मोस्ट रिवर्ड प्रेसिडेंट महाराज बैठे थे। अपने जितने भी सीनियर साधु हैं सभी लोग बैठे हैं वहां पे। तो यह जो जमझमाट आध्यात्मिकता थी एकाएक मुझे ऐसी अनुभूति हुई कि मैं अपनी ओर देख रहा हूं। अपने हृदय की ओर देख रहा हूं। तो दिस वाज़ इन दिस कॉन्टेक्स्ट कि मैं समझ पा रहा हूं कि इतना क्लियरली मैं समझ पा रहा हूं कि यदि मैं चाहता हूं किसी से कुछ रिकॉग्निशन चाहता हूं रिस्पेक्ट चाहता हूं तो जितना मैं चाहूंगा जितना ही मैं मांगूंगा जितना ही मैं डिमांड करूंगा उतना ही मैं छोटा होता जाऊंगा उतना ही मेरा हृदय संकुचित होता जाएगा और जितना मैं दूंगा जितना मैं ऑफर करूंगा। जितना मैं सहानुभूति प्रेम के जो यह आइडियाज है, भाव है, लोगों की ओर भेजूंगा, उतना ही मेरा ग्रोथ होगा मेरी कॉन्शियसनेस का। ये एक सम हाउ मुझे यह स्पष्ट रूप से दिखा। सो यह एवरीथिंग इज टाइड टुगेदर। आज सुबह से ही मैं वही प्रयास कर रहा हूं कि बैठा हूं मंगल आरती से आने के बाद में और फिर अपने हृदय में झांकने का प्रयास करता हूं कि क्या व्हाट इज द स्टेटस वो सोशल मीडिया पे स्टेटस होता है ना सो व्हाट इज द स्टेटस ऑफ़ माय कॉन्शियसनेस मैं डिमांड की वो परिस्थिति में हूं। डिमांड के स्टेट में हूं ना कि गिविंग के स्टेट में हूं। सो मैं सुबह से प्रयास कर रहा हूं। ओवरऑल बड़ा पॉजिटिव मुझे इसका परिणाम दिख रहा है। ऑलवेज अपने हृदय को समुंदर की तरह बनाना है। लोगों को देना है। अपने को भूल जाना है। मैं मैंने इतना किया तो मुझे इतना मिलना चाहिए। मुझे यह क्यों नहीं मिल रहा है? मेरे साथ में यह क्यों नहीं हुआ? मेरे साथ में वह क्यों नहीं हुआ? मेरा मिसफर्च्यून मेरा प्रोग्रेस होना था, अटक गया, प्रमोशन होना था, नहीं हुआ। यह सब जितने भी अपनी रिग्रेट्स है संपूर्ण रूप से उसको भूल जाइए। संपूर्ण रूप से उसको गंगा में विसर्जित कर दीजिए। बस मुझे देना है लोगों को। मुझे लोगों को सिंपथी देनी है। मुझे लोगों को सहानुभूति देनी है। लोगों को प्रेम देना है। यह देना है। यही एक बात याद रखिए। वो सिविलाइजेशनल लेवल पर कर्मयोग स्वामी जी का शिव ज्ञान जीव सेवा वो एक अलग कांसेप्ट है। मैं उसके बारे में नहीं कह रहा। मैं ये जो मां का जो थिंकिंग है मातृ हृदय एक कम्युनिटी लेवल पर कह रहा हूं वि इज ये मैंने जितना भी सेल्फ एनालिसिस करता हूं उतना ही मुझे ये एकदम क्लियर होता जाता है। सिविलाइजेशनल लेवल पे शिव ज्ञान जीव सेवा जो कांसेप्ट है और ये जो कम्युनिटी लेवल पे लोगों के प्रति सहानुभूति है ये दो डिस्टिंक्ट है। ये दो अलग-अलग आइडियाज है। ज्यादातर लोगों में दोनों कनेक्टेड होंगे। पता नहीं मेरे में दोनों सेपरेट है। मैंने वह तो अचीव कर लिया है। शिव ज्ञान जीव सेवा मेरे से ज्यादा सैक्रिफाइस किसने किया होगा? कहां अपना घर छोड़ के कहां बेलूरमठ छोड़ के वो रांची के वो ट्राइबल एरिया में मैं रह रहा था। प्रतिदिन मैं गांव में जाता था। तो इतना सैक्रिफाइस कितने लोगों ने किया होगा? दैट आई हैव अचीव्ड शिवज्ञान जीव सेवा। किंतु यह छोटा हृदय रखना, एक सेल्फ अब्सॉर्ब्ड रहना, लोगों को इग्नोर करना कम्युनिटी लेवल पर लोगों के प्रति जो सहानुभूति रखना है यह राइट नाउ अभी देखिए मुझे 20 साल हुए इस संघ में [हंसी] 20 साल के बाद में [गला साफ़ करने की आवाज़] 2003 में मैं आया था मोर देन 20 इयर्स हुआ इतना टाइम मुझे लगा कि मां का यह विचार जो है सहानुभूति पूर्वक सबके साथ व्यवहार करना यह मुझे अभी समझ में आ रहा है। स्वामी जी को बिल्कुल समझ के मैं आया था। किंतु मां का यह जो कांसेप्ट है। यह मुझे अभी समझ में आ रहा है। सो मैंने सोचा कि थोड़ा सा आपके साथ शेयर करूं। जितना ये सब चीजों को हम स्टडी करते हैं। देखिए अपने को स्टडी करने में ना कभी भी कतराना नहीं चाहिए। एक डर लगता है। जब हम अपने को स्टडी करते हैं ना कि भीतर में से क्या निकलेगा? अपनी खुद की जो गलतियां है, अपने खुद के जो शॉर्ट कमिंग्स है, अपने खुद की ये जो प्रॉब्लम्स है, हम ना उसको फेस ही नहीं करना चाहते। हम लोग सब समय यह प्रूव करना चाहते हैं कि गलती दूसरे लोगों की है। शॉर्टकमिंग दूसरे लोगों में है। मैं तो परफेक्ट ही हूं और मुझे जो प्राप्त्य सम्मान है नहीं मिल रहा। यह प्राप्त्य सम्मान नहीं मिल रहा है। बोलकर के मन के भीतर में एक तरह का डिप्रेशन, एक तरह का आक्रोश, एक तरह का निराशा ऐसा आकर के बैठ जाता है। यह आध्यात्मिक जीवन को संपूर्ण रूप से खत्म कर देगा। किंतु बी द बिगर मैन। अपने को यह सब छोटी-मोटी चीजों से ऊपर ले जाइए। देना सीखिए। यह बिल्कुल भूल जाइए कि मैं मैंने यह किया, मुझे यह प्राप्त्य है, मुझे यह मिलना चाहिए। अपने को संपूर्ण रूप से विसर्जित कर दीजिए। ईश्वर के श्री चरणों में गंगा में विसर्जित कर दीजिए अपने को। बस अपने को भूल जाइए। मुझे लोगों को देखिए। आसपास में जो रहते हैं और जितना उनको सहानुभूति के वेव्स भेज सके। फिर से मैं कहता हूं वाणी से अपनी सहानुभूति को व्यक्त करना थोड़ा सा सोच समझ के करना होता है। समाज में रहते हैं। लोकाचार देशाचार मान के चलना है। सब समय हमारी सहानुभूति को लोग अच्छी दृष्टि से ना भी देखें दूसरी दृष्टि से भी देख सकते हैं। सो बी केयरफुल अबाउट दैट। बट यह जो सहानुभूति पूर्वक विचार जो है, ये जो वेव्स जो है, यह जो थॉट्स जो है, वह तो हम भेज ही सकते हैं। इफ वी डू दैट मच, मुझे लगता है कि अपना जो आध्यात्मिक जीवन की एक सबसे फंडामेंटल प्रॉब्लम मैं खुद के जीवन में जो देखता था कि प्रोग्रेस तो कर लेता हूं। बहुत ही उच्च शिखर पे पहुंच भी जाते हैं। बहुत हाई लेवल पर पहुंच भी जाते हैं। किंतु फिर एकाएक ऐसा कुछ हुआ भीतर में से रिएक्शन आया कि सीधा आकाश में से पटकाए गिरे जमीन पे। तो ऐसा ना हो इसके लिए यह एक आवश्यक एक्सरसाइज है। तो मैंने सोचा कि ये अब इतने डीप है ना ये सब अपनी अनुभूतियां, अपने विचार, अपने एक्सपीरियंस कि कभी-कभी ना शब्दों को व्यक्त करने में करने के लिए शब्द नहीं मिलते हैं। और यदि शब्द मिलते भी है तो हमको डर लगता है कि मैं जो कहना चाहता हूं वो आप ठीक से समझे कि नहीं। तो मैंने सोचा लेट मी ट्राई टुडे। सो कल से ठाकुर का कथामृत आगे बढ़ाएंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: हम सभी को आत्म-समीक्षा करने की ज़रूरत है, है ना?

और शुद्ध उचित नहीं तार पर जे हमरा कंक्लूजन आशीटा के किंतु प्रैक्टिकल करते होवे श रिफ्लेक्शन कर ले होवे ना तार पर एक करेज चाहिए निजे मिस्टेक एक्सेप्ट करा और निजे मिस्टेक एक्सेप्ट करे निजे बिहेवियर के चेंज करा शेज अच्छे और से जन नहीं हमरा आध्यात्मिक जीवन में बेगुते पारी ना तो आध्यात्मिक जीवन में थोड़ा सा भी आगे बढ़ना है तो अपने बिहेवियर को मॉडिफाई करना है बिहेवियर को हम तभी मॉडिफाई करेंगे जबकि हम अपनी गलतियों को स्वीकारेंगे। गलती को ही नहीं स्वीकारेंगे तो बिहेवियर कहां से मॉडिफाई होना है। सो [हंसी] ये एक देखिए देखिए देखिए देखिए देखिए ये बहुत लोग ऐसा करते हैं बोल के सीधा हम उसी गलती में फिर से चले गए ना बहुत लोग क्या करते हैं उससे हमको क्या फर्क पड़ता है हम लोग क्या करते हैं वो तो हमको देखना है राइट अगेन उनको अवॉइड नहीं करना उनके प्रति अपना जो द्वेष है उसको अवॉइड करना है

प्रश्न: आपने कहा की ह्रदय विस्तृत करने की जरुरत है. परन्तु बहुत ज्यादा मित्रता करने को जायेंगे और लोगों को मददगार होंगे तो एक समस्या यह बन जाती है कि लोग की हमसे अपेक्षा बढ़ने लगती हैं। लेकिन सामाजिक जीवन के लिए हमारे पास समय सीमित होता है। इसलिए जब हम उनके फोन कॉल का उत्तर नहीं देते या उनके घर नहीं जा पाते, तो वे नाराज़ हो जाते हैं। ऐसे हालात से कैसे निपटना चाहिए?

आपने ठीक ही कहा और इसीलिए कि पुरुषों को जो यह प्रॉब्लम है उससे तो बहुत ज्यादा स्त्रियों को भी है क्योंकि अब चैनल ऑफ कम्युनिकेशन ओपन करने को जाएंगे तो दूसरे लोग किस दृष्टि से उसको देखेंगे वो तो कहना मुश्किल है और इसीलिए जो वेव्स ऑफ हीलिंग हमको अपने मन से भेजते रहना है। मैंने खुद ने जब से मैंने ये रेजोल्यूशन लिया जब से मेरा ये अंडरस्टैंडिंग बना मैंने किसी के साथ में बात नहीं किया अदर देन कि जो मेरा अभी तक का बिहेवियर है उसको मैंने चेंज नहीं किया बट मेरा इंटीरियर मैंने रीइंजीनियर करने का प्रयास किया है कि एक जो सोचना सतत कि ऐसा क्यों ऐसा क्यों वो नहीं देना है अभी राइट सिंपथी देनी है अपने को भूल जाना है दिस इज़ माय एंटायरली इनर डेवलपमेंट बाहर में मैंने कोई भी मॉडिफिकेशन अभी अपने बिहेवियर में नहीं किया क्योंकि आप जैसा कहते हैं मेरा एक एक ड्रिवन एटीट्यूड है कि हमेशा एक प्रोजेक्ट के बाद में दूसरा प्रोजेक्ट लिखना है, क्लास लेना है, यह करना है और मुझे भी इसमें डिस्टरबेंस नहीं चाहिए। मैं बहुत ही वेल सेट हूं आज। माने मेरे कार्य में, मेरे रूटीन में, मेरी मेथोडोलॉजी में उसमें मुझे थोड़ा सा भी डिस्टरबेंस नहीं चाहिए। यहां से मैं स्नान करके लाइब्रेरी जाऊंगा। वहां 2 घंटे मुझे सॉलिड मिलते हैं स्टडी करने के लिए, लिखने के लिए। आई डोंट वांट एनी डिस्टरबेंस इनू दैट। सो मैं तो कभी भी ऐसा नहीं करूंगा कि ऐसा चैनल ऑफ कम्युनिकेशन ओपन करने से वो आकर के मेरे जितने भी ये पर्सनल टाइम है उसको खा जाए लोग। राइट? सो दैट हैज़ टू बी अंडरस्टुड।

प्रश्न: ये तो आपने ठीक ही कहा की मन से ही उदार होना उचित है. बाह्य जगत में उदार ह्रदय होने को जाने से दस तरह की समस्याओ में पड़ जाएंगे।

किंतु देखिए यहां पे फिर एक तो मैंने ऑलरेडी कहा कि मन से ही करना ज्यादा उचित है। किंतु गोइंग बियों्ड दैट ठाकुर को देखिए। लज्जा घृणा भय से मुक्त होने के लिए वो जो रसिक मेहतर था उसका टॉयलेट अपने बालों से क्लीन किया। तो प्रश्न हो सकता है मन मन मन में से ही तो वो ब्राह्मणत्व का अभिमान त्याग कर सकते हैं। इतना एक्सट्रीम स्टेप क्यों लेना पड़ा इन एक्सटर्नल वर्ल्ड। राइट? तो बात यह है ना कि साधना की प्रायोरिटी क्या है अपने जीवन में? यदि साधना की प्रायोरिटी लो है तो हम मेंटल जो कुछ करें मानस पूजा जिसको कहते हैं तो इससे काम चल जाएगा। किंतु यदि साधना अपने जीवन में प्रायोरिटी रखता है, उम्र के साथ में प्रायोरिटी बढ़ती जाती है, तो फिर यह एक्सटर्नल वर्ल्ड में भी हमको इसको करना होगा। ठाकुर के जितने भी उदाहरण हम देखते हैं, सब कुछ एक्सट्रीम में जाकर करते हैं। तो यही प्रश्न है कि ठाकुर जैसे ठाकुर को इतना फिजिकल लेवल पर यह सब करने की क्या आवश्यकता अन पड़ी? किंतु ठाकुर को यदि करने की आवश्यकता अन पड़ती है। लज्जा, घृणा, भय, जाति, कुल, शील, मान और अभिमान ये ब्राह्मणत्व का अभिमान, ये उच्च वर्ण का अभिमान उससे छूटने के लिए ठाकुर ने इतना एक्सट्रीम जाकर किया तो हमको कितना करना पड़ेगा यह सबसे छूटने के लिए? राइट? सो, एट द एंड ऑफ द डे साधना की प्रायोरिटी अपने जीवन में क्या है? अभी आज मेरे जीवन एज ऑफ नाउ आज की मेरी प्रायोरिटी क्या है? आज की आज मेरी प्रायोरिटी है कि मैं अभी 9:30 बजे किचन में जाऊंगा। मेरे लिए चाय बनाऊंगा। चाय बना के लाइब्रेरी में जाऊंगा। आई विल नीड एटलीस्ट टू आवर्स सॉलिड टू आवर्स फॉर माय स्टडी। यह आज की मेरी प्रायोरिटी है। किंतु क्या आज की मेरी प्रायोरिटी ईश्वर दर्शन है? यदि ईश्वर दर्शन है तो दिस रूटीन इज रोंग फॉर मी। सो अपनी प्रायोरिटी क्या है? [हंसी] ईश्वर दर्शन कभी प्रायोरिटी होता ही नहीं है अनफॉर्चूनेटली

प्रश्न: एक सीनियर साधु ने कहा था की में सिर्फ रूटीन फॉलो कर रहा हु, व्याकुलता तो है ही नहीं।

एक्चुअली देखिए रूटीन इस व्याकुलता को मिमिक करता है। हम लोगों को पीपीटीसी में जॉइ करने के समय यह बात एकदम सर के भीतर में डाल दी गई थी। ठाकुर की जो व्याकुलता है ना देखिए व्याकुलता कहां पे व्याकुलता बोलने से नहीं व्याकुलता का रिजल्ट क्या है? वो है इंद्रियों का संयम। हम इंद्रियों का संयम नहीं होने वाला है। हमसे मुंह से हजार व्याकुलता व्याकुलता बोले गंगा के किनारे वो नाचते कूदते घूमे इंद्रियों का संयम नहीं होने वाला है। तो इंद्रियों का संयम कैसे होगा? तो रूटीन बना करके होगा। वि इज एकदम फंडामेंटल साइकोलॉजी है। बोल के हमको रूटीन फॉलो करना है। वरना तो जिस दिन इंद्रिय संयम हो गया तो यह रूटीन फुटीन कहां अदृश्य हो जाएगा? यस। माने इंद्रिय संयम राइट। इंद्रिय संयम जब तक नहीं होता तब तक हमको यह सब सब्स्टट्यूट एक्सटर्नल स्कैफोल्डिंग लगने वाले हैं। रागानुका भक्ति आ जाती है। इंद्रिय संयम इज द की माने एट द एंड ऑफ द डे आपका वो बैरोमीटर क्या है? तो इंद्रिय संयम है।

प्रश्न: यदि हमारे परिवार का कोई सदस्य गलत रास्ते पर जा रहा है, तो क्या उसे सुधारना हमारा कर्तव्य है?

देखिए अपना ड्यूटी है कि उसको सत्य एक बार बता देना। किंतु यदि वह सत्य को फॉलो नहीं करता है तो फिर हम क्या कर सकते हैं? राइट? वो एक मूवी था ना दो आंखें 12 हाथ वो एक आदमी वो प्रजनर्स जो कैदी थे वो क्रिमिनल्स उनको सुधारने का ट्राई करता है। अभी ये सब चीजें प्रायोरिटी पे आ जाती है। आप कितना प्रायोरिटी देना चाहते हैं? पूरा जीवन देना चाहते हैं। वह टीचर की तरह ना जो भी वह था इस मूवी में कि फिर वह ऊपर ऊपर से करना चाहते हैं। राइट? एंगेजमेंट लेवल इतना ही होता है जितना अपना प्रायोरिटी होता है। सो प्रायोरिटी क्या है? उसके अनुसार आप कुछ जो चाहे वो कर सकते हैं। मेरा तो कहना है जैसे मेरा खुद का प्रायोरिटी इस तरह का कभी नहीं रहा किसी के भी प्रति। तो मैं तो कहता हूं एक बार अपना ड्यूटी है। धर्म है कि उसको बताना भाई ऐसा नहीं ऐसा करो। बट बियों्ड दैट अभी क्या करें? मेरा अपना रूटीन है। मेरा अपना काम है। उसको छोड़ के मैं कितना दूसरों के पीछे दौडूंगा। शेटा उसी को तो आध्यात्मिकता कहते हैं ना। देखिए अल्टीमेटली तो अपनी कॉन्शियसनेस के बाहर में जगत है ही नहीं ना। यह तो जगत को ठीक देखिए स्वामी जी जैसे स्वामी जी शिव ज्ञान ने जीव सेवा के इतनी बड़ी बात कह दी। फिर आखिर में क्या कहते हैं? जगत को सुधारना कुत्ते की पूंछ को सीधी करने के बराबर है। वो कभी सीधी नहीं होने वाली। बस यही है कि लोगों को सहाय करके अपने कर्म शुद्धि होगी। तो यही तो है अल्टीमेटली। स्वामी जी जैसे स्वामी जी यदि यह बात कहते हैं तो फिर और क्या रह गया? कथामृत की तो शुरुआत ही ऐसे होती है ना। कथामृत की शुरुआत ही वहां से होती है। मास्टर महाशय कहते हैं लोगों को बता देना है कि ये वो पत्थर की मूर्ति की पूजा नहीं करते। चिन्मय मूर्ति की पूजा करते हैं। ठाकुर कह तुम लोगों को कल कथा लोगों का वही एक है। लोगों को बता देना है। लोगों को लेक्चर दे देना है। खुद को कौन बताए, खुद को कौन समझाए उसका कोई ठीक नहीं। कथामृत की शुरुआत ही वही से होती है। मास्टर महाशय की शिक्षा की। देखिए अपने धर्म के अनुसार अह अगेन प्रायोरिटी क्या है अपने जीवन की राइट? स्वामी जी ने तो कहा है ना शिव ज्ञान जीव सेवा लोगों को तो सहाय करनी है किंतु यह अपेक्षा नहीं रखनी कि लोग सुधरेंगे। हमेशा यह करना है कि अपना खुद का चरित्र शुद्धि हो रही है। इसी से करना है। लोग नहीं सुधरते फिर डिप्रेशन में चले जाएंगे। यह तो एक दूसरा प्रॉब्लम हो जाएगा ना। हमको ईश्वर की पूजा कर देखिए शिव ज्ञान जीव सेवा का अर्थ क्या है? हम लोग सिर्फ जीव सेवा नहीं करते। हम शिव ज्ञान जीव सेवा करते हैं। मनुष्य के भीतर में जो भगवान शिव बैठे हैं उनकी पूजा करते हैं। है ना? नहीं कि लोगों को सुधारने का प्रयास करते हैं। उनके भीतर में ईश्वर है उनकी आराधना करते हैं। सो दैट कांसेप्ट बड़ा क्लियर होना चाहिए। क्योंकि लोगों को सुधारने का फिर घमंड आ जाता है। अनेक प्रॉब्लम हो जाता है। ये सब देखिए ये सब चीजों पे हमने काफी डिस्कस किया है। राइट? वेल नोन टेरिटरी है यह हम सबके लिए। कोई रामकृष्ण संघ का कोई भी साधु ऐसा नहीं कहेगा कि लोगों को इग्नोर करो। हम सभी लोग कहेंगे लोगों को सहाय करो। किंतु विद दिस अंडरस्टैंडिंग कि लोगों के भीतर में रहे हुए शिव की आप आराधना कर रहा है। विद दिस अंडरस्टैंडिंग ओम