प्रार्थना
ओम स्थापकाायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः ठाकुर ने मां को जिस तरह से अपने संघ का दायित्व लेने के लिए प्रेरित किया था उस संघ के दायित्व लेने के लिए की जो पूरी जर्नी है मां शारदा देवी की वह हमने देखा कि किस तरह तरह से शोडशी पूजा से प्रारंभ होकर के निवेदिता के मां के पास में समर्पण तक की यह जर्नी है। तो एक पत्र के बारे में हमने देखा था कि निवेदिता मां शारदा देवी को एक पत्र लिखती है। तो इस पत्र में किस तरह से देखिए कि निवेदिता का मां के प्रति समर्पण, मां के प्रति श्रद्धा और मां के प्रति भक्ति का कितना सुंदर प्रस्फुटन होता है। कितना सुंदर प्रकाश होता है। तो मैंने सोचा कि वह पत्र का आज स्पेसिफिकली पाठ करेंगे तो हमको भी यह पता चले कि निवेदिता का मां के प्रति कितना भक्ति था। अभी देखिए कि हमको पता है कि निवेदिता का मां का यह जो ठाकुर स्वामी जी की जो तीन विदेशी महिला भक्त थी निवेदिता सारा ओलीबुल और जोसेफाइन मैक्लाउड वे लोग भारत में आए थे समवेयर अराउंड 1898 स्वामी जी के साथ में उन्होंने बाद में कश्मीर और खीर भवानी की यात्रा की थी उत्तर भारत के जो तीर्थ क्षेत्र है वहां पे वे लोग गए थे। तो उस समय जब निवेदिता मां का निवेदिता ने मां का प्रथम दर्शन किया उस समय का एक फोटोग्राफ भी है हमारे पास में। अभी यह पत्र जो है वह लिखा गया है 1910 में। यानी कि निवेदिता के पास में मोर देन 10 इयर्स 10 साल से भी ज्यादा निवेदिता मां शारदा देवी को पहचानती थी। मां शारदा देवी के साथ में निवेदिता का परिचय था। और इस 10 साल में जनरली ऐसा होता है देखिए कि आप जैसे कि ठाकुर और
स्वामी विवेकानंद की आध्यात्मिक यात्रा : पहले श्रीरामकृष्ण को और बाद में सनातन धर्म को स्वीकार करना
स्वामी जी का ही जो संबंध है उसको देखिए कि किस तरह से स्वामी जी ठाकुर के पास में जब आए समवेयर इन 1881 1881 के आसपास में और जब स्वामी जी ने मां काली को स्वीकार किया। यह घटना हुई है समवेयर अराउंड 1885 एटलीस्ट 4 साल का गैप है कि स्वामी जी ने संपूर्ण रूप से आत्मसमर्पण किया। अभी देखिए कि ऐसा नहीं था कि मीन वाइल कि स्वामी जी जब ठाकुर के पास में आते थे। हालांकि वह ठाकुर की मजाक उड़ाया करते थे। ठाकुर के दर्शन है। ठाकुर का जो सब उसको हेलुसिनेशन वगैरह कहा करते थे और ठाकुर जो उपमाएं देते थे, कहानियां देते थे, उसके बारे में अपना संदेह प्रकट करते रहते थे। कल ही हमने देखा कि किस तरह से चातक पक्षी वह चमगादड़ को चातक पक्षी समझ के ठाकुर को कहते हैं कि देखिए कि यह भी सब तरह का पानी पीता है। सिर्फ स्वाति नक्षत्र का नहीं। तो यह हमने ऑलरेडी देखा किंतु बाद में पता चला कि जब एक टर्निंग पॉइंट जीवन में ऐसा आता है कि जब आप अपने संदेह है अपना यह जो एक इंडिपेंडेंट थिंकिंग है अपना यह जो जिसको स्मार्टनेस कहते हैं वह है वह सब छोड़कर के आप संपूर्ण आत्मसमर्पण की ओर बहेंगे। अभी देखिए कि आध्यात्मिक जीवन में एक बात हमको याद रखनी है कि संदेह रखना बुरा नहीं है। क्योंकि यदि हम प्रश्न करना नहीं सीखेंगे, यदि हम एक तरह का डाउट प्रकट करना नहीं सीखेंगे, तो क्या है कि कोई भी आकर के हमको मूर्ख बना जाएगा। किंतु यह भी बात इतनी ही सही है कि जब तक हम जीवन में एक तो टर्निंग पॉइंट आएगा। जबकि हमको संदेह को पीछे रख के आत्मसमर्पण और साधना के जो उच्चतर क्षेत्र है, उच्चतर आयाम है, उसकी ओर आगे बढ़ते जाना है। तो यह जो जर्नी है जिस तरह से स्वामी जी के जीवन में हमने देखा कि प्रथम तो ठाकुर पर संदेह करते थे। ठाकुर की बातों को प्रश्न के ठाकुर की बातों के सामने प्रश्न खड़े करते थे। किंतु बाद में उन्होंने ठाकुर को अपने इष्ट के रूप में अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया। एंड मोर देन ठाकुर ठाकुर जिस थॉट सिस्टम को रिप्रेजेंट कर रहे हैं। क्योंकि यदि चलिए कि हम कह सकते हैं कि ठाकुर है कि उन्होंने मॉडर्न लैंग्वेज में बोलना सीख लिया था कि किस तरह से सनातन सत्य को आज की भाषा में व्यक्त किया जाए। तो चलो कि ठाकुर को आपने अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया। किंतु स्वामी जी उससे भी एक स्टेप आगे जाकर के सिर्फ ठाकुर को ही नहीं स्वीकार करते हैं। किंतु ठाकुर जो पिछले 10,000 साल की भारतीय आध्यात्मिकता का प्रवाह है उसके जो रिप्रेजेंटेटिव है ठाकुर इस पूरी 10,000 साल की भारतीय आध्यात्मिकता को स्वामी जी स्वीकार करते हैं। अभी आप स्वामी जी के साथ में आजकल के जो कुछ-कुछ आपको दिख जाएंगे मॉडर्न गुरु उनका आप कंपेयर कीजिए। वह वे लोग आपको यह तो कहेंगे कि हां हम लोगों ने अपने गुरु के पास में से यह सब विद्याएं सीखी है। किंतु यह लोग इस तरह का बात नहीं करेंगे कि उनके गुरु के पीछे में जो एक सनातन भारतीय संस्कृति थी, उस सनातन भारतीय संस्कृति को हमने स्वीकृत किया है। वे लोग फिर अपने गुरु के पास में से जो थोड़ा बहुत सीखे हैं उसका इस तरह का आधुनिकीकरण करके आज के समाज के सामने खड़ा करेंगे कि आपको लगेगा कि इसके पीछे जैसे कि कोई ट्रेडिशन ही नहीं है। इसके पीछे जैसे कि हमारी आध्यात्मिक धरोहर का कोई हाथ ही नहीं है। जैसे कि खास करके यह जो मॉडर्न योगा मूवमेंट है। उसको कि आज के युग की आवश्यकता अनुसार संपूर्ण रूप से एक तरह से मॉडर्नाइज कर दिया गया है। इसको सेुलराइज करने का एक प्रयास किया गया है। इसके पीछे हमारी हिंदू आध्यात्मिक संस्कृति का जो पूरा एक इतिहास है उससे इसको डाइवेस्ट करने का प्रयास किया गया है। इसको एक हेल्थ एंड वेल बीइंग की लैंग्वेज में हम लोग लोगों के सामने रखते हैं। और बुद्धिज्म के साथ में भी एक तरह से यही हुआ कि भगवान बुद्ध ने आप यदि भगवान बुद्ध का चरित्र पढ़ेंगे उनका जीवन आप अभ्यास करेंगे तो आपको यह स्पष्ट दिखेगा कि यह जो हमारा हिंदू सं हमारी वैदिक संस्कृति के जो विचार सरणी है उसी के आधार पर भगवान बुद्ध ने अपनी खुदनी अपनी खुद की साधना का आधार स्तंभ रखा था और इसी विचार सरणी में सिद्ध होकर के उन्होंने निर्वाण प्राप्ति की थी। किंतु उनके जो डिसाइपल थे, उनके जो शिष्य थे, उन्होंने भगवान बुद्ध को तो एक्सेप्ट किया किंतु भगवान बुद्ध के पीछे की जो हिंदू सनातन वैदिक संस्कृति थी, उसको रिजेक्ट कर दिया। यही बात आजकल देखिए कि यह अभेदानंद जी के डिसाइपल के साथ में हुई है। उन्होंने अभेदानंद जी को तो अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया किंतु अभेदानंद जी जिस रामकृष्ण परंपरा से आ रहे हैं उस परंपरा से उन्होंने अपने को अलग कर दिया। तो ऐसा कई बार देखने को मिलता है कि कोई एक गुरु या उस गुरु के जो शिष्य होते हैं वह उनके पीछे की जो आध्यात्मिक धरोहर होती है उससे अपने को सेपरेट करके एक नया पंथ प्रारंभ करने के बारे में सोचते हैं। इसी तरह का एक प्रयास देखिए कि क्रिश्चियनिटी इटसेल्फ जीसस का लाइफ यदि हम प्रॉपर्ली स्टडी करें तो पता चलेगा कि जुडाइज्म यानी कि आज का जो यहूदी धर्म है उसके भीतर में जीसस के पूरे रूट्स थे। वह खुद एक यहूदी थे और यहूदी विचार सरणी के अनुसार उन्होंने अपने आध्यात्मिक जीवन को गठित किया था। किंतु उनके डिसाइपल्स ने यह सोचा कि यदि पूरे विश्व में फैलना है तो यह जो जुडाइज्म के जो रूट्स है उससे अपने को बाहर निकलना पड़ेगा क्योंकि जुडाइस बहुत ही ज्यादा कंजर्वेटिव रिलीजन है। तो इस कंजर्वेटिवज्म को और जीसस का जो उदार हृदय है उसके बीच में बहुत बड़ा एक क्लेश है। यदि हम यह कहेंगे कि यह जो सरमन ऑन द माउंट खास करके बाइबल में है जो कि एक बड़ा ही उदार हृदय भगवान का अपने भक्तों को मैसेज है। अभी आप सरमन ऑन द माउंट का प्रचार करेंगे जिसको कि अभी न्यू टेस्टामेंट कहा जाता है। यानी कि गोस्पेल अकॉर्डिंग टु ल्यूक वगैरह जो चार डिसाइपल थे जीसस के वह चार लोगों ने चार गोस्पेल लिखे हैं जिसको कि न्यू टेस्टामेंट कहते हैं। तो ये ओल्ड टेस्टामेंट के साथ में इसको कंट्रास्ट करेंगे तो ओल्ड टेस्टामेंट में ऐसी बहुत सारी बातें हैं जो कि जीसस के मैसेज के साथ में वह मैच नहीं होती। तो उन्होंने क्या किया कि क्रिश्चियनिटी को अपना यह जो यहूदी उसकी जो जड़ थी उससे काट करके अलग से एक सेपलिंग लगाया क्रिश्चियनिटी का और क्रिश्चियनिटी सही-सही में पूरे विश्व में फैला भी सही। अभी देखिए कि यही ऑप्शन स्वामी जी के पास में भी आया होगा। एटलीस्ट मैं समझता हूं इस तरह का कोई प्रूफ अपने पास में नहीं है। ना ही लिखित है ना ही मैंने किसी सीनियर साधु से सुना है। किंतु यह मेरा खुद का एक स्पेकुलेशन है कि स्वामी जी का जो एक तीक्ष्ण ऐतिहासिक दृष्टि था, इस दृष्टि के अनुसार स्वामी जी जब अमेरिका गए थे तो उन्होंने एक बार तो शायद इस तरह का ऑप्शन उनके पास में आया होगा कि ठाकुर को हम स्वीकार करें। किंतु ठाकुर के पीछे का जो हिंदू धर्म है उस समय की जो हिंदू धर्म की परिस्थिति थी वह इतना रूढ़ चुस्त हो गया था इतना वो रिजिड हो गया था इतना वो इस तरह का हो गया था कि कहेंगे कि उसमें किसी भी तरह का सुधार करने की संभावना बड़ी कम दिख रही थी स्वामी जी को खुद को इस रूढ़िच चुस्तता का शिकार होना पड़ा था फेमस घटना है जब स्वामी जी साउथ इंडिया में कहीं पे थे। एक पंडित के साथ में वह बात कर रहे थे। कह रहे थे कि वेदांत का संदेश बाहर के विश्व में फैलाना है। तो फिर यह पंडित जोर-जोर से स्वामी जी के साथ में आर्गुममेंट करते-करते जोर-जोर से चिल्लाता है। कदापि ना कदापि ना कभी भी नहीं कभी भी नहीं। यानी कि हिंदू धर्म को एक तरह से उदार दृष्टिकोण संपन्न करना, इसका इन लोगों के सामने किसी तरह का प्रयोजन नहीं था। किसी तरह की आवश्यकता नहीं थी। तो स्वामी जी कहते हैं कि उस जो चिल्ला-चिल्ला करके आंख लाल करके मेरे सामने जो बोल रहा था कदापि ना वो मैं कभी भूल नहीं पाऊंगा कि इतना एक रिजिडिटी अपने हिंदू धर्म में आ गया है। क्या कहेंगे इसके बारे में? किंतु फिर भी स्वामी जी ने ऐसा नहीं किया कि चलो श्री रामकृष्ण को अपनाए और मूलभूत अपना हिंदू धर्म है उससे अपनी जड़ों को सेपरेट कर दें। तो यह डिसीजन स्वामी जी ने लिया था कि हिंदू धर्म रूपी जो कॉस्मोस है जो विश्व है उसी के भीतर में हमको श्री रामकृष्ण देव का जो आज का नतुन संदेश है नया संदेश है उसको उसी के भीतर में रखना है। उससे सेपरेट नहीं करना है। यह एक बहुत ही इंपॉर्टेंट डिसीजन स्वामी जी ने लिया था। तो इसीलिए देखिए कि स्वामी जी ने दो तरह के आत्मसमर्पण किए थे। सर्वप्रथम तो था कि उन्होंने श्री रामकृष्ण देव को आत्मसमर्पण किया था। यह तो जैसे कि पहली ही मुलाकात में हो गया था कि जब भी ठाकुर ने उनको स्पर्श करके ठाकुर ने जब उनका पूरा भूत भविष्य वर्तमान देख लिया था तो मुझे लगता है कि स्वामी जी को भी उस समय के नरेंद्र को भी समझ में तो आ ही गया होगा कि रामकृष्ण देव ही उनके जन्म जन्मांतर से इष्ट और गुरु थे है और रहेंगे। तो ठाकुर के सामने नरेंद्र का जो आत्मसमर्पण था वैसे वह कोई ट्रेडिशनल टाइप का नहीं था कि नरेंद्र उनकी स्तवस्तुति करता या तो उनकी बढ़ाई उनकी प्रशंसा करता वह जो एक टिपिकल कॉलेज के लड़के की जो होती है कि अपना एक का खुद का एक सेल्फ कॉन्फिडेंस होता है आत्मश्रद्धा होती है तो नरेंद्र ठाकुर को स्वीकार तो करता था किंतु उनकी जो बहुत बड़ी प्रशंसा नहीं करता था इसका एक उदाहरण
ठाकुर नरेन की अवगणना कर के उसकी परीक्षा करते है
है ठाकुर ने खुद ने नरेंद्र का टेस्ट लेना चाहा था। नरेंद्र की परीक्षा लेनी चाही थी। अभी देखिए कि इस परीक्षा में ठाकुर ने क्या किया? नरेंद्र जब दक्षिणेश्वर आता है तो उसके साथ में बात करना बंद कर दिया था। कुछ दिनों तक वो देखते थे कि मैं टेस्ट करना चाहते थे। वैसे तो नरेंद्र आता है तो ठाकुर इतने खुश हो जाते थे कि बाकी सबको छोड़कर के सिर्फ नरेंद्र के ही साथ में वार्तालाप करेंगे। कथामृत में एक प्रसंग है कि जब मास्टर महाशय वगैरह थे दक्षिणेश्वर में और एक उस समय एकाएक हुआ कि नरेंद्र आ गया वहां पे तो अभी ठाकुर के दूसरे प्रोग्राम थे सबके साथ में बात कर रहे थे किंतु जैसे ही नरेंद्र आया तो ठाकुर ने सबको स्पष्ट रूप से कह दिया कि अच्छा अभी आप लोग विदाई लीजिए अभी आप लोग जाइए यहां से यह पूरे कथामृत में देखेंगे कि आपको इस तरह का ठाकुर का सेंटेंस कि अभी भी आप आइए यहां से या तो फिर यहां से जाइए। इस तरह से आपको एक ही जगह पर मिलेगा एटलीस्ट जहां तक मेरा मेमोरी जाता है याद रखने का वहां तक कि वह नरेंद्र आया तो ठाकुर चाहते हैं कि नरेंद्र के ही साथ में वह बात करें। उसको वह जो सीक्रेट इंस्ट्रक्शन देते थे ठाकुर वह काशीपुर में उसका प्रारंभ वही दक्षिणेश्वर से ही बहुत अर्ली डेज से ही स्टार्ट हो गया था। तो यह नरेंद्र को जो इतनाेंस मिलता था नरेंद्र भी समझता था कि मैं ठाकुर मेरे पर इतने कृपालु क्यों है? क्योंकि वह उच्च अधिकारी है। यह बात तो नरेंद्र को भी समझ में आती होगी। किंतु एक दिन ठाकुर ने टेस्ट किया कि नरेंद्र जब आता है तो उसके साथ में वह बात नहीं करेंगे। तो ऐसा कुछ दिनों तक चला। फिर भी नरेंद्र आता रहा। ठाकुर के सामने बैठेगा। देखेगा कि ठाकुर उन उसको इग्नोर कर रहे हैं। तो वह थोड़ी देर के बाद में खड़ा होकर के वहां पर वरांडे में वह हाजरा बैठता था। उसके पास में जाकर के हुक्का का हुक्का पीना शुरू कर देगा। तो यह देखा हमने कि नरेंद्र का इस तरह का जो ठाकुर के प्रति जो आकर्षण था उसकी वजह से वह सतत आता रहता था। अभी किंतु कुछ दिनों के बाद में ठाकुर ने नरेंद्र को पूछा कि अच्छा मैं तो तुम्हारे साथ में बात नहीं करता हूं। फिर भी तुम यहां पर क्यों आते हो? तो नरेंद्र ने उत्तर दिया कि आप मेरे साथ में बात ना करें तो उससे क्या आता जाता है? मुझे आपका संग मुझे बड़ा अच्छा लगता है। आपका दर्शन करने के लिए आपकी बातें सुनने के लिए मैं यहां पर आता हूं। आप मेरे साथ बात करें ना करें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। तो यह बात सुनकर के ठाकुर बड़े खुश हो गए थे। तो देखिए कि ठाकुर के प्रति जो नरेंद्र का आत्मसमर्पण था भले ही चाहे कितना ही अंडरस्टेटेड हो कितना ही भले ही चाहे इसको वर्बली नरेंद्र ने व्यक्त नहीं किया हो किंतु वह पहली मुलाकात के दौरान ही हो गया था। किंतु वह जो 4 साल के बाद की घटना है कि जबकि नरेंद्र ने मां काली को स्वीकार किया वि इज अ ग्रेटर आत्मसमर्पण एंड वो आत्मसमर्पण सिर्फ ठाकुर को नहीं है। यह पूरी भारतीय हिंदू संस्कृति है। सनातन वैदिक धर्म है। उसको स्वामी जी ने आत्मसमर्पण किया है। देखिए ठाकुर खुश होकर क्या कहते हैं। नरेंद्र काली मैनेज है। नरेंद्र ने मां काली को स्वीकार किया है। ठाकुर ने यह नहीं कहा कि नरेंद्र ने मुझे स्वीकार किया है। हालांकि ठाकुर इस सब चीजों से शर्माते नहीं थे। जब वह ब्राह्म समाज वाले आकर के कहते हैं कि वह पौहारी बाबा के ना वहां पर कहीं पर उन्होंने ठाकुर का फोटो देखा दीवाल पर टंगा हुआ तो ठाकुर ने क्या कहा कि खोलटा अर्थात कि यह तो यह आवरण है। उसका तो फोटो टंगा है ना। मैं तो इससे सब अलग हूं। भिन्न हूं। मुझे यह गुरु करता बाबा कोई कहेगा तो ऐसा लगता है कि जैसे मेरे देह में कोई कांटे चुभो रहा है तो एक और तो ठाकुर वैसे अपने को जो लोग झूठमठ की प्रशंसा करते उन लोगों से अपने को दूर ही रखते उन लोगों को मना भी कर देते किंतु साथ में ही एक जेनुइन एक्सप्रेशन होता है अपने अवतारत्व का अपनी डििनिटी का उसमें ठाकुर कभी भी पीछे नहीं हटते थे तो ठाकुर ने ऐसा यदि कहना चाहते कि नरेंद्र ने मुझे स्वीकार किया है तो वह कह सकते थे क्योंकि उनका जो मैं है वह उनका तो मैं नहीं है। वह तो मां काली का मैं है। देखिए एक बड़ी सुंदर कहानी है कि
एक पंडित की नकल करते हुए ठाकुर ने "मैं" कहना बंद कर दिया
वो गौरी पंडित ना कि कोई वो ऐसा उसने ऐसा प्रैक्टिस था कि मैं नहीं कह के कहेगा यह। यानी कि मैं कहेंगे तो एक कर्तृत्व पण आ जाता है तो एक ईगोइज्म आ जाता है। तो वह जैसे कहेंगे मैंने ऐसा किया तो ऐसा नहीं करके कहेंगे कि इसने ऐसा किया अपनी ओर इशारा करके या तो फिर कहेगा कि माने ऐसा ही कुछ मैं कहना वह टालेगा। तो ठाकुर ने खुद ने इस प्रसंग को नेट किया है। ठाकुर कहते हैं कि गौरी को देखतेदे देखदे करके मैंने भी ऐसा कहना शुरू कर दिया कि मैं नहीं कहूंगा इस यानी कि अपने देह की ओर इशारा करके कहेंगे कि इस देह ने यह कार्य किया है या तो फिर यह देह भोजन करना चाहता है या तो फिर यह देह है जो उसको यह आवश्यकता है। मैं कहना ठाकुर अवॉइड करेंगे। आई यानी कि कर्तृत्व पण ना आ जाए इसके लिए। तो जब ठाकुर को कुछ दिनों तक ऐसा करते हुए देखा मथुर बाबू ने तो फिर वह आकर के एक बार ठाकुर को कहते हैं कि बाबा वो ठाकुर को बाबा करके पुकारते थे मथुर बाबू तो आकर के वह ठाकुर को कहते हैं कि बाबा आप उसके देखादेखी आप इस तरह की बातें क्यों करते हैं? वह तो एक सामान्य पंडित मात्र है। वह पंडित लोगों को तो यह सब सेेंटिक ना कि यह सब शब्दों की रमत है। वो उन लोगों के लिए ठीक है। घमंड से भरे हुए हैं और फिर कहते हैं कि मैं नहीं बोलूंगा। यह सब उनके लिए ठीक है। आप तो इष्ट अवतार दिव्यत्व से भरपूर नारायण स्वयं है। तो आपको यह सब बोलने की जरूरत नहीं है। तो यह बात ठाकुर खुद अपने मुंह से कहते हैं कि मथुर बाबू ने जब मुझे ऐसा कहा तब वो ठाकुर कहते हैं कि अच्छा कि यह जो दूसरे लोग हैं वह इस तरह का दिखावा करेंगे कि मैं ऐसा नहीं कहना है। ठाकुर कहते हैं कि जब वह म जो कहना चाहते हैं कि ठाकुर यदि मैं कह भी देते हैं तो उसके पीछे में यह देह पंचमहाभूत पंच ज्ञानेंद्रिय कर्मेंद्रिय पंचवायु का निर्मित देह मन बुद्धि अहंकार चित्त यह सिर्फ नहीं है। वह मां काली के साथ में मिला हुआ जो संपूर्ण एक दिव्य सत्ता है वह है। तो यह ठाकुर यह कह ही सकते थे कि उसने मुझे स्वीकार किया है। नरेंद्र ने मुझे स्वीकार किया। किंतु यह नहीं कह के नरेंद्र ने मां काली को स्वीकार किया है। यहां पे नरेंद्र पूरी जो अपनी वैदिक धरोहर सनातन संस्कृति है उसको स्वीकार करता है। इस स्टेप के बाद में स्वामी जी के मन में ठाकुर को हिंदू धर्म से अलग करके प्रोजेक्ट करना ऐसा कोई प्रश्न ही नहीं आता था। तो जिस तरह से
माँ को लिखे हुए निवेदिता के पत्र का पाठ
स्वामी जी के दो समर्पण हुए। एक तो श्री रामकृष्ण देव के प्रति समर्पण दूसरा कि सनातन हिंदू धर्म वैदिक संस्कृति को समर्पण वैसे ही देखिए कि निवेदिता के जीवन में भी आपको दो तरह के समर्पण दिखेंगे। एक तो है कि जब पहली बार स्वामी जी के पास में आती है और स्वामी जी को निवेदिता की बायोग्राफी में है कहीं पर कि वह पहला एक पत्र लिखती है जिसमें कि वह स्वामी जी को माय मास्टर बोलकर के संबोधन करती है। यानी कि जब स्वामी जी के सामने वह आत्मसमर्पण करती है। स्वामी जी को गुरु के रूप में स्वीकार करती है और उसके बाद में कलकाता आकर के कोलकाता आकर के मां शारदा देवी को मिलती है और मां को मिलकर के मां का दर्शन करके वह बड़ी ही कृतार्थ हो जाती है। बड़ी ही खुश होती है। यह था कि निवेदिता का प्रथम समर्पण प्रथम आत्मसमर्पण श्री स्वामी विवेकानंद और मां शारदा देवी को। किंतु इसके बाद में जो दूसरा पत्र जब यह निवेदिता लिखती है, यह पत्र की डेट है 11 दिसंबर 1910 यानी कि मोर देन 10 इयर्स 10 साल से भी ज्यादा का समय बीत गया है। जबकि निवेदिता ने मां शारदा देवी के समक्ष समर्पण किया था। तो वह जो समर्पण था वह था एक व्यक्तिगत श्री मां शारदा देवी को समर्पण। किंतु यह पत्र जब आप पढ़ेंगे तो पता चलेगा आप मैंने रीडिंग बिटवीन द लाइन कि यह जो स्वामी जी का जो द्वितीय समर्पण था संपूर्ण भारतीय सनातन संस्कृति को यहां पे और इसके लिए स्वामी जी को नियरली फोर इयर्स ऑलमोस्ट चार साल जो लगे हैं यहां पे भी आप देखिए कि निवेदिता को मां शारदा देवी स्वामी जी और ठाकुर को उनके प्रति एक इंडिविजुअल जो आत्मसमर्पण किया और यह सनातन वैदिक संस्कृति के सामने वह समर्पित होती है। उसको ऑलमोस्ट 10 साल लगे हैं। और यह जो पत्र है उसको हम पढ़ते हैं और देखते हैं कि सनातन संस्कृति और मां शारदा देवी दोनों के प्रति निवेदिता का कितना गंभीर उसका यह है श्रद्धा है और कितना गंभीर उसका आकर्षण है। देखिए कि यह जो पूरा अह और दूसरी बात पहले से ही कह देता हूं कि यह जो पूरा जो यह है इसको क्या कहेंगे? एनालिसिस। यह मेरा पर्सनल एनालिसिस है। यानी कि इस तरह से नहीं है कि मैंने इसको कहीं पर पढ़ा है या ऐसा। इसको मैं अपने से ही इस तरह से सोच के बताया है। तो अभी यह पत्र एक पढ़ते हैं। पत्र का जो टाइटल होता है कैंब्रिज मेसेच्यूसेट्स। अमेरिका से यह पत्र लिखा है। पूर्व भूमिका ऐसी है कि सारा ओलीबुल बीमार थी और जब वो बीमार थी तो उसकी सेवा करने के लिए निवेदिता वहां पर थी। तो मां पत्र का जो यह है थीम है वैसे कि सारा ओलीबुल के स्वास्थ्य के लिए उसकी मन की शांति के लिए निवेदिता मां शारदा देवी को यह पत्र लिखती है। डेट है 11 दिसंबर 1910 निवेदिता लिखती है बिलोवेड मदर श्रद्धा भरी मां शारदा दिस मॉर्निंग अर्ली आई वेंट टू चर्च टू प्रे फॉर सारा इस सुबह को आज सुबह को अर्ली मॉर्निंग को बड़ी जल्दी सुबह को मैं चर्च में गई सारा के लिए प्रार्थना करने के लिए सारा अर्थात कि सारा ओलीबुल यह उसका फर्स्ट नेम है सारा ऑल ऑल द पीपल देयर वेर थिंकिंग ऑफ मेरी द मदर ऑफ जीसस एंड सडनली आई थॉट ऑफ यू वहां पे जितने भी लोग इकट्ठा हुए थे चर्च में वह सब मदर मेरी यानी कि जीसस की जो मां है उसके बारे में चिंतन कर रहे थे उनको प्रार्थना कर रहे थे तो निवेदिता ने भी कहा कि मैं भी जाकर के बैठी और प्रार्थना करने का प्रारंभ किया एंड सडनली आई थॉट ऑफ यू और एकाएक मैंने सोचा आपके बारे में योर योर डियर फेस एंड योर लविंग लुक एंड योर वाइट साड़ी एंड योर ब्रेसलेट्स। आपका वही जो सुंदर चेहरा, आपकी यह जो स्नेह भरी नजर, आपकी वह सफेद साड़ी और यह जो आपके हाथों की वो चूड़ियां इट वाज़ ऑल देयर। जिस तरह से निवेदिता ने मां का दर्शन किया था वही साक्षात मां मदर मेरी की जगह पे उस बोस्टन के उस चर्च में निवेदिता के सामने प्रकट हुए एंड इट सीम टू मी दैट योर्स वास द प्रेजेंस दैट वास टू सूद एंड ब्लेस पुअर सारास सिक रूम और मुझे लगा कि आपकी उपस्थिति प्रेजेंस यह प्रेजेंस कैपिटल पी अर्थात कि उपस्थिति किंतु यह कैसी उपस्थिति दिव्य उपस्थिति आपकी दिव्य उपस्थिति यह जो सारा का जो रूम है सिक रूम अर्थात कि जिस रूम में सारा लेटी हुई है बीमार होकर के उस सारा के इस रूम में यदि कोई शांति और आशीर्वाद ले आएगा तो वह आपकी दिव्य प्रेजेंस ही है। एंड डू यू नो और आपको पता है क्या? आई थॉट आई हैड बीन वेरी फुलिश टू सीट इन योर रूम एट द इवनिंग सर्विस टू श्री रामकृष्णा ट्राइंग टू मेडिटेट व्हाई डिड आई नॉट अंडरस्टैंड दैट इट वाज़ क्वाइट इनफ टू बी अ लिटिल चाइल्ड एट योर डियर फिट और पता है क्या मैं कितनी मूर्ख थी कि जब वहां पे बाग बाजार में संध्या आरती के समय में श्री रामकृष्ण देव की संध्या आरती चल रही थी उस समय में बैठकर के मूर्ख की तरह ध्यान करने का प्रयास कर रही थी मेरे चेहरे में इतनी भी अकल नहीं थी कि आपके श्री चरणों में बैठना एक छोटी सरल बच्ची बालिका होकर के वही तो इनफ है। यही तो है आध्यात्मिक जीवन का सबसे बड़ा प्राप्ति। डियर मदर प्रिय मां यू आर फुल ऑफ लव। आप स्नेह, करुणा, ममता और प्रेम से भरी हुई है। एंड इट इज नॉट अ फ्लस्ट एंड वायलेंट लव लाइक आवर्स एंड लाइक द वर्ल्ड्स। और यह आपका प्रेम है वह जो दो तरह का प्रेम होता है ना एक तो है कि दैहिक आकर्षण से जो प्रेम प्रकट होता है जिसके साथ में क्रोध जिसके साथ में घृणा या तो फिर जिसके साथ में एक तरह का क्या कहेंगे कि वायलेंस जुड़ा हुआ है। आपका प्रेम इस तरह का नहीं है। हम सबका है इस तरह का प्रेम। मेरा ना कि इस जगत का किंतु आपका प्रेम कैसा है? बट अ जेंटल पीस दैट ब्रिंग्स गुड टू एवरीवन एंड विशेस इल टू नन। किंतु आपका प्रेम है वह स्निग्ध शांतिमय जो कि इस जगत में सबके प्रति आशीर्वाद ही लाता है। किसी के प्रति किसी तरह की घृणा नहीं करता है। इट इज अ गोल्डन रेडियंस फुल ऑफ प्ले। वो एक जैसे कि सुनहरी एक एक ओजस का तेज पुंज है जिसके भीतर में सब कुछ लीला है। रसमय लीलाधुर्य से भरा हुआ है। व्हाट ए ब्लेसड संडे दैट वाज़ अ फ्यू मंथ्स एगो व्हेन आई रेन इन टू यू द लास्ट थिंग बिफोर आई वेंट टू द गंगा एंड रेन बैक टू यू फॉर अ मोमेंट एस सून एस आई केम बैक। अभी कुछ समय पहले ही निवेदिता भारत में थी और उसने मां का दर्शन किया था। तो जिस रविवार को जिस संडे को निवेदिता ने मां का दर्शन किया था उसके बारे में निवेदिता कह रही है। कहती है कि वह कितना आशीर्वादमय रविवार था। कुछ महीनों पहले जबकि मैंने आपका दर्शन किया। गंगा स्नान करने जाने से पहले मां गंगा का दर्शन करने से पहले मैंने आपका दर्शन किया और गंगा स्नान के बाद में जब मैं वापस आई फिर से मुझे आपके दर्शन का सौभाग्य मिला। आई फेल्ट सच अ वंडरफुल फ्रीडम इन द ब्लेसिंग यू गव मी एंड इन योर वेलकम होम। मुझे एक तरह की आध्यात्मिक दिव्यता आध्यात्मिक मुक्ति का अनुभव हुआ जो कि आपके आपकी दिव्य उपस्थिति और आपके दिव्य आशीर्वाद ने मुझे प्रदान किया था। आपका यह जो वेलकमिंग होम है, आपका ऐसा घर कि जो कि खुले हाथों से मुझे स्वीकार करता है, आपके इस वेलकमिंग होम में आपने जो आशीर्वाद दिया, उसकी वजह से ऐसा एक दिव्य फ्रीडम का मुझे अनुभव हुआ था। डियर मदर स्नेहमई मां, आई विश वी कुड सेंड यू अ वंडरफुल हिम और अ प्रेयर। मां मैं चाहती हूं कि मैं आपके लिए एक बड़ा ही सुंदर गीत या तो फिर कविता लिख के भेजूं। बट सम हाउ इवन दैट वुड सीम टू लाउड टू फुल ऑफ नॉइज़। किंतु यह कविता भी यह पोएम भी ऐसा लगता है कि बहुत ज्यादा घूंघाट से भरपूर होगी। बहुत ज्यादा जैसे कि एक तरह के डिस्टरबेंस से भरी होगी। शोरली यू आर द मोस्ट वंडरफुल थिंग ऑफ गॉड श्री रामकृष्णास ओन चलाइस ऑफ हिज लव फॉर द वर्ल्ड ये कविता क्यों एक तरह के डिस्टरबेंस से भरपूर होगी क्योंकि मां का जो दिव्य अस्तित्व है इट इज बिय्ड इवन द पोएम इट इज बिय्ड इवन दिस एक कविता है कवित्व का जोधुर्य है उससे भी सूक्ष्म उससे भी प्रशांत महासागर जैसा मां का अस्तित्व है प्रशांत महा महासागर के सामने जाकर के आप कविता का पाठ करेंगे तो आपको कितना छोटा सा दिखाई देगा। इतना विशाल समुंदर, इतना शांतिमय समुंदर और उसके सामने कविता का पाठ वो कितना एक मिनुस्कल दिखता है। तो ऐसे ही यहां पर कहती है आपकी दिव्य शांति के सामने एक हिम या तो फिर कविता या तो पोएम भी जैसे कि छोटी पड़ जाती है। फिर कहती है श्योरली यू आर द मोस्ट वंडरफुल थिंग ऑफ गॉड। भगवान की सबसे महत्वपूर्ण सबसे सुंदर गिफ्ट आप इस जगत के लिए है। श्री रामकृष्णास ओन चलाइस ऑफ ह लव फॉर द वर्ल्ड श्री रामकृष्ण देव का इस जगत के लिए जो प्रेम था वो प्रेम को भरने के लिए जो कटोरा था या तो जो प्रेम मूर्तिमय प्रेम वह स्वयं आप है। अ टोकन लेफ्ट विथ हिज चिल्ड्रन इन दिस लोनली डज़ एंड वी शुड बी वेरी स्टिल एंड क्वाइट बिफोर यू। यह एक इस तरह की गिफ्ट है जो कि ईश्वर ने अपने संतान के लिए भेजी है। यह जो हमारे लोनली डेज है यह जो आध्यात्मिक रण प्रदेश में आध्यात्मिक मरुभूमि में हम जो चारों ओर मारेम-मारे घूम रहे हैं और हमारे सामने किसी तरह का रास्ता नहीं दिखता है। चारों ओर अंधेरा दिखता है। तब आपकी जो उपस्थिति आपका दिव्य प्रेम हमारे हृदय को प्रकाशित करता है। इस मरुभूमि को एक ओवासिस में एक गार्डन में परिणत कर देता है। वी शुड बी वेरी स्टिल एंड क्वाइट बिफोर यू एक्सेप्ट इंडीड फॉर ए लिटिल फन। हम लोगों को आपके सामने बड़ी ही शांति से और निरवता पूर्वक आपके श्री चरणों के सामने बैठे रहना चाहिए। बस बात वही है कि हम आपके संतान हैं तो बीच-बीच में थोड़ा बहुत नटखट नटखट हम होंगे। कुछ ना कुछ खेल हम खेलेंगे और थोड़ा बहुत आनंद करेंगे। किंतु इसके अलावा हमारे हृदय में आपकी उपस्थिति से एक अनंत प्रशांति भर जानी चाहिए। शोरली द वंडरफुल थिंग्स ऑफ गॉड आर ऑल क्वाइट। देखिए क्यों क्यों शांति से निरवता पूर्वक आपकी दिव्य उपस्थिति का आनंद हमको ग्रहण करना है। क्योंकि भगवान ने इस जगत को जो गिफ्ट दिए हैं। इस जगत को जो उपहार दिए हैं, वह सब शांत और नीरव है। स्टिलिंग अननोटिस्ड इनू आवर लाइफ जितने भी उपहार है, जितने भी गिफ्ट है, जितने भी आशीर्वाद है, ईश्वर के हमारे लिए शांत और नीरव है, वह सब शांति से अननोटिस्ड यानी कि बिना किसी डिस्टरबेंस के हमारे जीवन में वह प्रवेश करते हैं। द एयर एंड सनलाइट एंड द स्वीटनेस ऑफ गार्डन्स एंड ऑफ द गंगा। दीज़ आर द साइलेंट थिंग्स दैट आर लाइक यू। यह हवा, यह सूर्य प्रकाश, यह जो बागान की मधुरता और यह गंगा की पवित्रता, यह सब आप ही की तरह निरव है और शांत है। डू सेंड टू पुअर सारा द मेंटल ऑफ योर पीस। यह सारा जो कि बीमार है उसको आप अपना शांतिमय आशीर्वाद भेजिए। इजंट योर थॉट नाउ एंड देन ऑफ द आईकन दैट नाइदर लव्स नॉर हेड्स? यह जो आपका विचार है, मैं आपके बारे में जो सोचती हूं, मैं आपके बारे में जो चिंतन, मनन स्मरण करती हूं, क्या इसी से मेरा हृदय शांति और प्रेम से नहीं भर जाता? आई काम दैट नाइदर लव्स नर हेट्स एक इस तरह का एक दिव्य आनंद प्रकट होता है जो कि ना ही किसी को प्रेम करता है इस अर्थ में कि दैहिक प्रेम करता है ना ही किसी के प्रति इसकी घृणा है नाइदर लव्स नॉर हेट्स ना ही किसी के प्रति दैहिक आकर्षण है ना ही किसी के प्रति क्रोध है इजंट दैट द स्वीट बेनेडिक्शन दैट ट्रेंबल्स इन गॉड लाइक द ड्यू ड्रॉप ऑन द लोटस लीफ एंड टचेस नॉट द वर्ल्ड। आपकी यह जो उपस्थिति है, आपका यह जो आशीर्वाद है, वह क्या इस ईश्वर के सामने इस तरह से प्रस्तुत नहीं होता? जैसे कि सुबह को जो एक ओस गिरती है लोटस लीफ यानी कि कमल के पत्तों के ऊपर में सुबह की ओस गिरती है तो कितना शांति से कितना जेंटली कितना क्वाइटली वह गिरती है और इस जगत को स्पर्श भी नहीं करती। आपकी उपस्थिति, आपकी दिव्य जो प्रेजेंस, आपके आशीर्वाद, यह हमारे हृदय के लिए उस सुबह की जो ओस है, जो कमल के पत्ते पर गिरती है, वैसे ही आपके आशीर्वाद हमारे हृदय पे हमारे मन पर आते हैं। बरसते हैं और हमारे मन को दिव्य आनंद से भर देते हैं। एवर माय डार्लिंग मदर योर फुलिश खुकी निवेदिता मां शारदा हमेशा से मैं आपकी वही मूर्ख बच्ची खुकी यह बेंगली शब्द है मां निवेदिता को खुकी करके पुकारा करती थी तो वही फुलिश खुकी वही बचपने वाली जो बच्ची हूं मैं जो नटखट बच्ची आपकी वह निवेदिता मैं शारदा आपकी वही नटखट बच्ची हूं ऐसा करके निवेदिता यहां पर साइन करती
निवेदिता की आध्यात्मिक यात्रा : पहले स्वामी विवेकानन्द को और बाद में सनातन धर्म को स्वीकार करना
देखिए कि पत्र छोटा है किंतु इस छोटे पत्र के भीतर में निवेदिता ने मां के प्रति जो अपनी श्रद्धा है कितना सुंदर रूप से व्यक्त किया है। जैसे कि यह मां शारदा का जो उपस्थिति और प्रेम यह हिमालय की शांति यह गंगा की पवित्रता यह जो खुशनुमा आबोहवा है या तो फिर यह जो सूर्य प्रकाश है वह सब किस तरह से हमारे जीवन को हमारे जन्म को परिपुष्ट करते हैं। यदि एक क्षण के लिए भी सूर्य प्रकाश या तो गंगा या हिमालय की उपस्थिति या तो फिर यह हवा या एक सेकंड के लिए भी थम जाए तो हम पूरे उसी क्षण वहां पे हमारा मृत्यु होगा। किंतु जब तक यह है अपने जीवन में हमको इसकी महत्ता समझ में ही नहीं आती है। तो यहां पर निवेदिता कहती है कि मां का आशीर्वाद भी उसी तरह से है। इतना शांत सुमधुर कि हमको समझ में भी नहीं आता है कि मां के दर्शन के बाद में हमारे जीवन पूरा एक टर्निंग पॉइंट आया है। हमारा जीवन पूरा एक बिल्कुल नई डायरेक्शन में प्रवाहित हो रहा है। यदि दूसरे लोग जो होते हैं, यदि कुछ बात भी करेंगे, उपदेश भी देंगे तो अपना महत्व सबसे पहले वह प्रस्थापित करना चाहेंगे। अपना घमंड दिखाना चाहेंगे। अपनी उपस्थिति दिखाना चाहेंगे। ऐसे लोगों की उपस्थिति ही जैसे हमारे मन को रजस से या तो फिर किसी ना किसी तरह के डिस्टरबेंस से भर देती है। किंतु यहां पर मां की उपस्थिति ऐसी है वह जैसे यही एग्जैक्टली वह शब्द प्रयोग जो कि स्वामी जी ने अपनी सनातन हिंदू संस्कृति के बारे में किया कि दूसरे धर्मों ने इस जगत के ऊपर में कैसे विजय प्राप्त की तो एक हाथ में तलवार है दूसरे हाथ में धर्म पुस्तक है। इसको लेकर के उन्होंने जगत को जय किया। या तो हमारे धर्म को अपनाओ या तो इस तलवार से हम तुम्हारा गला काट देंगे। एक पूरी आर्मी आती है। आर्मी के पीछे इनके जितने धार्मिक प्रीचर हैं वह आते हैं। किंतु हिंदू धर्म का प्रचार प्रसार किस तरह से हुआ है? जैसे कि सुबह की ओस एक गुलाब के ऊपर में पड़ती है, गिरती है। मॉर्निंग ड्यू फॉलिंग अपॉन ए रोज। और जब यह गुलाब की जड़ है वह परिपुष्ट होती है। किसी को पता भी नहीं चलता कि हिंदू धर्म की यह जो असर हमारे जीवन पर हो रही है और हमारे जीवन आध्यात्मिक जीवन को अपनी मानसिक परिस्थिति को सुदृढ़ बनाती है। एग्जैक्टली यह बात जो स्वामी जी ने हिंदू धर्म के बारे में कही है। यहां पर निवेदिता उसी बात को मां शारदा देवी के लिए दोहराती है। और यहां से हमको पता चलता है कि यह हिंदू धर्म के साथ में निवेदिता कनेक्ट हुई है। यहां पे पहली मुलाकात में देखेंगे कि मां शारदा के प्रति उसका जो आत्मसमर्पण था और यहां पे देखिए कि निवेदिता का आत्मसमर्पण सिर्फ मां शारदा देवी के प्रति नहीं है। मां शारदा देवी सनातन हिंदू धर्म की प्रतीक है। मूर्ति मंत स्वरूप है। उस मूर्ति मंत्र सनातन मूर्ति मंत्र स्वरूप मां शारदा देवी के सामने उसने आत्मसमर्पण किया है। यानी कि अभी इस क्षण निवेदिता के लिए मां और हिंदू धर्म वैदिक संस्कृति एक साथ में मिलकर के जैसे कि यूनाइट हो गई है, फ्यूज हो गई है। तो यह पत्र यह निवेदिता का और हमको पता है कि उसके एक ही साल के बाद में वह समवेयर अराउंड 1911 निवेदिता का भी मृत्यु होता है। निवेदिता भी इस जगत से चली जाती है और यह पत्र लिखा गया है 1910 को। यानी कि यह जो स्वामी जी के साथ में भारत में आई थी। उस समय निविदिता के भीतर में जो उत्साह था कि भारत में क्रांति लाकर के भारत की जो आर्थिक या तो फिर सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति है उसको संपूर्ण रूप से वह बदल देगी। इस तरह के जो रेवोल्यूशनरी आइडियाज थे और यहां पर देखिए कि बिल्कुल मां शारदा देवी की बच्ची की तरह वो हो गई है। तो यह जो पूरा निवेदिता का जीवन परिवर्तन है पहली बार मां से मुलाकात और इस पत्र के द्वारा मां से संपर्क उसका जो पूरा ट्रेजेक्टरी है हमको समझ में आता है। तो जिस तरह से स्वामी जी का था स्वामी जी ने अपने आखिरी पत्र में आखिरी आखिरी पत्रों में से एक पत्र में जोसेफाइन मैक्लाउड को लिखा हुआ उसमें स्वामी जी कहते हैं कि बस अभी यह प्रवचन देना यह सब कुछ अभी चला जा रहा है। अभी मैं फिर से वही नरन हो गया हूं। युवा नरेंद्र जो कि पंचवटी में श्री रामकृष्ण के श्री चरणों के सामने बैठकर के मंत्रमुग्ध होकर के उनकी वाणी सुना करता था। तो वही नरेंद्र मैं फिर से हो गया हूं। तो देखिए कि यह लोग जो होते हैं निवेदिता है या तो फिर स्वामी जी है उनके जीवन में प्रारंभ तो एक बार आत्मसमर्पण करके करते हैं किंतु उनका एक वर्ल्ड मिशन भी होता है कि जिस समय उनको बड़े ही करेजियसली इस जगत को फेस करना है जगत में जो कोई भी यह धर्म चक्र प्रवर्तन प्रवर्तन करने के लिए जो कुछ करना है यह बड़ा ही कठिन कार्य बड़ा ही कर्म योग उनको अपने कंधों पे उठाना है। किंतु जैसे-जैसे उनका जीवन चक्र अपने अंतिम चरण की ओर आगे बढ़ता है, उनके जीवन की समाप्ति नजदीक आती जाती है, वैसे ही वे लोग छोटे बच्चे हो जाते हैं। स्वामी जी जैसे कि ठाकुर के सामने यहां पे निवेदिता मां के सामने बिल्कुल बच्चे की तरह बच्चों का जो इनोसेंस होता है बच्चों का जो अपने मां-पिता के प्रति जो स्नेह और एकात्मता का संबंध होता है वही संबंध उनके जीवन के आखिरी समय में फिर से एस्टैब्लिश हो जाता है। तो यह देखिए कि आप निवेदिता और स्वामी जी स्वामी जी का ठाकुर के प्रति समर्पण यहां पे निवेदिता का मां के प्रति समर्पण ये दोनों का एक कंपैरेटिव एनालिसिस करेंगे तो कितना सुंदर आपको यह सब बातें जानने को मिलती है। तो आज यहीं तक अभी कल यहां से आगे ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: ध्यान करने से भी कर्तापन का भाव आ जाता है. क्या जीवन के आखिरी समय शरणागति ही श्रेष्ठ है?
यहां पर एक्चुअली निवेदिता का जो आखिर में उसको जो समझ में आया कि मां सिर्फ एक गुरु ही नहीं है। वह इष्ट है। जिनका ध्यान करती है वही तो उनकी नजर के सामने बैठी है। तो फिर यह तो मूर्खामी हो गई ना कि हम अपनी मां के सामने बैठकर के फिर मां को पत्र लिखते हैं कि मुझे यह यह चाहिए। मां सामने ही बैठी है। वो पर्सनली फेस टू फेस बात कर लीजिए। यह ठाकुर और लाटू महाराज का है। ठाकुर ने एक दिन जाकर देखा लाटू महाराज गंगा के किनारे ध्यान कर रहे थे। ठाकुर ने कहा अरे पगले तुम जिसका ध्यान कर रहे हो वो तो नहबत में आटा ठेस रही है। जाओ उसको मदद करो। इष्ट जब नजर के सामने स्वयं है तो फिर उनको ध्यान के माध्यम से क्या प्राप्त करना? वो तो हम लोगों जैसे कम नसीब लोग जो है कि इष्ट का जो सदेह दर्शन नहीं कर पाए उन लोगों के लिए
प्रश्न: एक और ठाकुर माँ को कहते है लडको को कम रोटी खाने को दो क्योकि उन्हें ध्यान करना है, दूसरी और, लाटू महाराज को कहते है तुम जिसका ध्यान कर रहे हो वह रोटी का आटा ठेस रही है.
है। कंट्रास्ट है जब तक ध्यान जब तक ध्यान नहीं करेंगे पता नहीं चलेगा। जिनको ध्यान कर रहे वो यहीं नंबर में बैठी है। ये सर्कुलर आर्गुमेंट हो जाता है। ध्यान करके पता चलेगा। जिसका ध्यान कर रहे हो वो नब में बैठी है। ध्यान करके पता चलेगा ध्यान करने की जरूरत नहीं है। एग्जैक्टली मतलब यही एक्जेक्टली ऐसा ही इंसिडेंट वहां जयराम बाटी में भी हुआ है। मां खुद वहां पे कहती है। एक लेडी डिवोटी आई। वहां पे जयराम बाटी में बैठकर के वो ध्यान कर रही है। तो वो मां ने उसको देखकर के हंसते-हंसते कहा कि बहु मां बहुमां अर्थात कि वो बिटियां तुम जिसका ध्यान कर रहे हो वो यहां पे खाना पका रही है। तो ऐसा कर मां ने खुद कहा तब वो लज्जित होकर के ध्यान छोड़कर के मां को आकर हेल्प करना शुरू किया।
प्रश्न: कभी कभी ईश्वर की कृपा इतने सूक्ष्म रूप से होती है की हम समझ ही नहीं पाते की कृपा हुई है.
किंतु यहां पर एक भी ऐसी भी बात है ना टू काउंटर पॉइंट यदि करें कि ऐसे लोगों के ऊपर में कृपा इजीली होती भी नहीं है जो कि कृपा को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं होते हैं। अभी जैसे कि निवेदिता ने मां को स्वीकार किया तो उस समय एटलीस्ट 1000 ब्रिटिशर भारत में थे। उसमें से कितने लोगों ने मां को स्वीकार किया। निवेदिता थी कि जिसने मां को समझा तो वह भी तो एक है कि यदि आपका हृदय ऑलरेडी उस लेवल पर नहीं पहुंचा है। आप मां को स्वीकार नहीं करेंगे। एक ब्रिटिश मेम की कहानी है। एक ब्रिटिश लेडी वहां पर मां के पास में आई थी। अभी आई है इसलिए कि उसकी बच्ची बहुत बीमार है। तो उसने मेडिसिन वगैरह का इस्तेमाल करके देखा। पता कि कुछ नहीं होगा। डॉक्टर ने कह दिया कि कुछ लाभ नहीं होने वाला है। तो किसी ने उसको कहा कि वहां पे बाग बाजार में एक वो लेडी है। उसके पास में आप जाइए। तो वो ब्रिटिश लेडी आई। मां के पास में रोती-रोती कहती है मेरी एक ही बच्ची है। बहुत प्रेम करती है। वह चली जाएगी। आप कुछ कीजिए। तो उसकी वो जो एक मतलब हृदय की जो व्याकुलता है उसको देखकर के फिर मां ने उसको आशीर्वाद दिया। अभी उसकी बच्ची के साथ क्या हुआ वो मुझे अभी याद नहीं आ रहा है। किंतु देखिए कि म पूरे कोलकाता में जो कि ब्रिटिश एंपायर की राजधानी थी। ब्रिटिश लोगों से भरा हुआ होगा। मैं एक ही ब्रिटिश लेडी है जो कि मां के पास आई और वह भी इसलिए आई क्योंकि उसकी बच्ची मर रही थी। ऐसा नहीं कि मां के प्रति ऐसा कोई स्पेसिफिकली कोई प्रेम जागृत हो गया था। और यहां पे निवेदिता है जिसने सब कुछ त्याग करके मां के पास में आकर के आत्मसमर्पण किया। सो उसकी एक जो इनेट एक एलिजिबिलिटी होती है बोलकर के ही तो ईश्वर का आशीर्वाद हुआ। अभी जैसे जड़ हृदय वाले जाएंगे आशीर्वाद होगा भी नहीं होगा। वो जैसे वो ये चलो ना कि आप समझ लीजिए कि गुलाब है या तो फिर यह कमल है। उसके ऊपर में ओस गिरा तो कुछ लाभ है। पत्थर पे ओस गिरने से क्या लाभ है? कुछ फर्क नहीं पड़ता। ना देखिए आप लोग आकर के बैठते हैं वही तो एक बड़ी बात है ना वरना तो
ठाकुर नरेन को इतना प्रेम करते है इस लिए कुछ भक्तो को इर्षा होती है
फिर आपने जो कहा ऐसा एग्जांपल है एक्चुअली वो हरमोहन ना कि कौन एक्सजेक्टली नाम भूल गया तो ठाकुर एक दिन पूछते हैं नरेंद्र भी सामने बैठा है तो मने दो तीन घटना होती है उस दिन एग्जैक्टली इसी बात को लेकर के कोई एक डिवोटी कहता है कि नरन आता है तो आप कहते हैं नरन आओ नरन खाओ आमरा जैनो शलारा भे छ अर्थात कि ये जो गंगा में ये जो वो बहते-बहते यह जो घास पुंज वगैरह जो है यह जो पेड़ है, पेड़ की डालियां है वह कैसे वह गंगा में बहता रहता है? तो नरन आता है तो आप कहते हैं कि नरन आओ नरन खाओ और हम लोग जैसे गंगा में बहते-बहते कुछ आ गया है उस तरह आप मेरे से बिहेव करते हैं। ऐसा वो बोलता है एक भक्त ठाकुर के सामने तो ठाकुर हंसते-हंसते नरेंद्र को बोलता है कहते हैं कि देख रहे तो तोर संबंध ही कथा बोलचे देखो देखो तुम्हारे ही बारे में बोल रहा है फिर इसी घटना मत इसी कन्वर्सेशन में ठाकुर आगे में पूछते हैं अच्छा वो एक डिवोटी आ रहा था क्यों नहीं आ रहा मोस्ट प्रोबेबबली हरमोहन ना की कोई तो उनको उत्तर दिया सामने वाले डिवोटी ने कि आप ये जो उसको इग्नोर करते हैं और नरेंद्र को वो जो इतना प्राधान्य देते हैं बोल करके वो बोलते हैं कि ठाकुर को हमारी जरूरत नहीं है हम नहीं आएंगे। तो ठाकुर बड़े आश्चर्यचकित होकर बोलते हैं अरे यह पहले तो उसको इस तरह की बातें करते हुए कभी नहीं सुना। आज एकाएक क्यों ऐसा बोल रहा है? उसको बोलो कि फिर से यहां पे आए। तो देखिए कि उस समय ठाकुर और नरेंद्र के सामने ही ऐसा बोलने वाले लोग बैठे थे कि ठाकुर नारायण को एक्सेसिवेंस देते हैं। आप दूसरों की क्या बात करते हैं? शरद महाराज जैसे शरद महाराज लीला प्रसंग में लिखते हैं। लीला प्रसंग यानी कि अपना तो एकदम मने फंडामेंटल शास्त्र उसमें वो लिखते हैं कि जब ठाकुर नरेंद्र को इतना इंपोर्टेंस देते हैं तो हमको लग थोड़ा सा दुख होता था कि ठाकुर इतना इंपोर्टेंस हमको क्यों नहीं देते हैं। तो यह एक था बहुत सारे लोगों में किंतु अ वह जो मिसफर्चूनेट आदमी था, वह जो कह के चला गया कि ठाकुर नरेंद्र को इंपोर्टेंस देते हैं तो मैं नहीं आऊंगा। वह बड़ा मूर्ख था। जबकि शरद महाराज को भले ही मन में दुख हुआ कि यह नरेंद्र को इतनाेंस मिलता है किंतु फिर भी शरद महाराज ने आना नहीं छोड़ा और फिर आखिर में अपना जीवन धन्य करके गए। तो यह जो आपने कहा कि दो तरह के भक्त उसी टाइम में भी थे कि वह जो ठाकुर पक्षपात करते बोल के ठाकुर को ही छोड़ दिया और एक ने भले ही चाहे मन में लगता हो कि पक्षपात हो रहा है। किंतु यह तो उसकी उनकी अकल क्लियर थी कि ना जो वो ठाकुर जो कह रहे हैं इट इज यूनिवर्सली एप्लीकेबल। भले ही चाहे वह उनके प्रति जैसे शक्ति का तारतम्य होता है जिसमें ज्यादा शक्ति है तो उनको इस तरह से प्राधान्य देना है तो वह जो एक कॉमन सेंस या तो फिर विवेक शरद महाराज में आप लीला प्रसंग में ही पढ़कर के पता चल जाता है ना माने एक तो ठाकुर को स्वीकार करने वाले अपने अवतार के रूप में और बहिरंग माने अंतरंग बहिरंग दो कैटेगरी हो गई कि एक तो थे अंतरंग की जो कि ठाकुर को एज अवतार स्वीकार करते थे और ठाकुर को अवतार रूप के स्वीकार करते थे उसमें भी दो कैटेगरी जो कि नरेंद्र को स्वीकार करते थे। नरेंद्र को नहीं स्वीकार करते थे। तो नरेंद्र को नहीं स्वीकार करने वाले रामचंद्र दत्त वगैरह जो कि सब निकल गए और नरेंद्र को अपने लीडर के रूप में स्वीकार किया। वे लोग अभी रामकृष्ण परंपरा में अभी भी टिके हुए
हम यहाँ पे क्यों आए है? -- ठाकुर के प्रति श्रद्धा के कारण, न की यहाँ पे हमें मिलते हुए सन्मान के कारण?
हैं। ना इवन देखिए मैं अपना खुद के बारे में कहूं तो मैंने खुद ने बहुत स्ट्रगल किया है यहां पे। पहली बात तो है कि मैं कोई ट्रेडिशनल रूप से यहां पे नहीं आया। इस अर्थ में कि किसी आश्रम में जाता था। किसी साधु के साथ में मुला मतलब मेरा अच्छा एक रिलेशन था। फिर उनसे प्रेरित होकर के आया हूं। मैं यहां पर आया हूं। वह ट्राइबल डेवलपमेंट वगैरह करना चाहता था। तो उस माध्यम से आया हूं। किसी एक पर्टिकुलर साधु के प्रति मेरा एक इतना ज्यादा अच्छा रिलेशन ऐसा कभी नहीं रहा है। किसी ने मुझे प्रेरित करके यहां पे लाकर के मुझे स्टेप बाय स्टेप गाइड किया हो। ऐसा भी कहीं मेरा नहीं है। पहले तो ट्राइबल डेवलपमेंट किया उसके बाद में लिटरेचर को पकड़ा। तो मुझे यहां पर खुद को एक्सेप्ट ऐसा लग रहा था कभी-कभी कि जो बाकी लोग जो कुछ है जिनको कि इतना इजी एक्सेप्टेंस मिल जाता है उससे और मेरे में यह है कि मेरे पास में बहुत ज्यादा अपेक्षाएं रखी जाती है। उनके पास में इतनी अपेक्षाएं नहीं रखी जाती क्योंकि उनके साथ में पर्सनल रिलेशन है और मेरा ऐसा कोई पर्सनल रिलेशन में किसी के साथ में रखता नहीं था और मेरा नेचर भी नहीं है। तो मैं आइडियाज को लेकर के आया हूं। तो यह लोग अपेक्षा बड़ी रखते हैं मेरे से। बिकॉज़ ही लिव्स विद आइडियाज ही शुड बी मोर आइडियलिस्टिक देन अदर्स। एक्चुअली वी आर नॉट वी आर ऑन अ कॉमन सेम प्लेन। कोई भी इतना आइडियलिस्टिक बहुत ज्यादा एक दूसरे से बहुत ज्यादा आइडियलिस्टिक हो कि बहुत कम जिसमें आइडियल हो ऐसा नहीं है। मोर और लेस सभी लोग एक ही प्लेन पे हैं। मेरी ऐज के मैंने जितने भी देखे किंतु जो बिकॉज़ के पर्सनल रिलेशन होता है तो बहुत सारी जो आपकी जो गलतियां होती है, वह क्षमा कर देते हैं लोग। अच्छा यह तो अपना ही आदमी है। और फिर जो जिसके साथ में पर्सनल रिलेशन नहीं होता है, इतना अच्छा, आपकी प्रत्येक छोटी-छोटी गलती को इतना बड़ा करके देखेंगे। सो दैट स्ट्रगल आई मसेल्फ हैड टू गो थ्रू कि वेदर टू लीव हियर बिकॉज़ आई डू नॉट हैव गुड रिलेशन वि मेनी पीपल और रेदर आई हैव कम हियर फॉर ठाकुर मास्वामी जी एंड आई शुड स्टिक टू दैट इंस्पाइट ऑफ व्हाटएवर मे हैपन। किंतु सॉल्यूशन है यह कास्टेंट अफमेशन। एक कंटीन्यूअस रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में अपने को डूबा के रखना है। जप ध्यान तो है ही है। कर्म योग तो है ही है किंतु दैट देमसेल्व्स आर नॉट इनफ। जब तक यह साहित्य में डीप में नहीं जाएंगे। अगेन सबका अपना-अपना एक माइंडसेट पर्सनालिटी होता है। मेरे लिए साहित्य है। कोई कोई लोग हैं कि कर्म में अपने को डुबो देते हैं। कोई है कि भजन प्रार्थना में डूबा देते हैं। बट यू हैव टू अकॉर्डिंग टू योर पर्सनालिटी अकॉर्डिंग टू योर साइकोलॉजिकल प्रोफाइल यू हैव टू फाइंड समथिंग इन व्हिच यू कैन अब्सॉर्ब योरसेल्फ। दैट वे यू कैन सर्वाइव ऑल दिस ट्रबल्स एंड ट्राइबुलेशंस ऑफ डे टू डे लाइफ। दिस इज अ पार्ट ऑफ आवर
Question: however much we try to get rid of our ego, some incident happens and it comes roaring back. how to get rid of ego permanently?
जेनेटिक मेकअप। दैट इज व्हाई तोतापुरी एडवाइसेस ठाकुर दैट वो यू हैव टू क्लीन योर वेसल एवरीडे। दिस लोटा दैट इज़ दैट वेसल फॉर अह प्रिजर्विंग वाटर दैट ठाकुर सेज़ दैट इट हैज़ टू बी अह तोतापुरी सेज़ टू ठाकुर। अंटिल एंड अनलेस यू वाश इट एवरीडे इट विल बिकम डर्टी। तो ऑफ़ कोर्स ठाकुर रिप्लाईज़ इन अ वेरी नाइस मैनर। ही सेज़ दैट इफ दिस लोटा बिकम्स गोल्डन देन यू वोंट हैव टू वाश इट अगेन। सो दैट इज़ द सॉल्यूशन एक्चुअली बट सॉल्यूशन इज़ वेरी डिफिकल्ट इन अ योगशास्त्र इट इज़ सेड दैट अंटिल एंड अनलेस आवर डिजायर्स बिकम दग्ध बीज दे विल नॉट बी रिमूव्ड। नाउ व्हाट इज़ द मीनिंग ऑफ़ दग्ध बीज? दग्ध मींस बर्न। एंड बीज मींस सीड। अंटिल एंड अनलेस सीड्स आर बर्न, दे विल गो ऑन क्रिएटिंग वन ट्री आफ्टर अनदर। सपोज़ यू अह सॉ सम सीड्स इन दी अर्थ आफ्टर अ वाइल अ ट्री और सैपल्लिंग विल कम अप। यू कट दिस सैपलिंग एंड अनदर से अह अनदर फ्रेश शूट्स विल कम अप। यू गो ऑन कटिंग दिस शूट्स। बट एज़ लॉन्ग एज द सीड इज देयर इन द अर्थ इन द सोइल, इट विल गो ऑन प्रोडूसिंग मोर एंड मोर ऑफ़ शशूट्स, मोर एंड मोर सेपल्लिंग्स। सो, द थिंग इज़ टू गेट रिड ऑफ़ दिस सीड्स देम सेल्फ, यू विल हैव टू पोर अ बर्न हॉट वॉटर अपॉन दिस सीड्स। वंस यू पोर दिस हॉट वॉटर ऑन द सीड्स, दिस सीड्स विल बर्न एंड इट विल स्टॉप प्रोडूसिंग मोर सेपल्लिंग्स ओर मोर शूट्स। सो दिस दिस दग्ध बीज इट हैपेंस ओनली ड्यूरिंग निर्विकल्प समाधि। इन कथामृत देयर इज़ अ कथामृत और समवेयर आई हैव रेड अ स्टोरी दैट देयर वर टू फार्मर्स हु वेर अह फाइटिंग विथ ईच अदर। सो वन फार्मर सो सम फ्रेश सीड्स इन हिज़ फार्म एंड द अदर फार्मर हु वाज़ हिज़ एनिमी ही वेंट एट द नाइट इन द फार्म एंड पोर सम हॉट वाटर अपॉन दैट ग्राउंड। सो दिस फ्रेश सीड्स दे वेर ऑल कुक्ड एंड नो शूट्स केम। सो ऑल दिस स्ट्रगल दैट फार्मर फर्स्ट फार्मर हैड डन टू टिलिंग द सोइल एंड सोविंग द सीड इट ऑल केम टू नॉट। सो लाइक दिस यू विल हैव टू पोर हॉट वाटर अपॉन द सीड्स ऑफ आवर डिजायर दैट इज़ टू अटेन निर्विकल्प समाधि एंड देन द फ्रेश शूट्स विल स्टॉप कमिंग। ऑफकोर्स दिस इज़ इज़ियर सेड देन डन। माने इट्स नॉट लाइक दैट टुमारो मॉर्निंग आई एम गोइंग टू अटेन निर्विकल्प समाधि। इट्स अ लाइफ लॉन्ग साधना, लाइफ लॉन्ग अफमेशन बट दिस इज द ओनली सॉल्यूशन एंड वी विल हैव टू बी एट इट टिल द
Question: we should not feel guilt and keep on trying?
एंड या इट्स अ ह्यूमन नेचर इट्स अ पार्ट ऑफ़ ह्यूमन पर्सनालिटी ह्यूमन मेक अह जेनेटिक मेकअप दैट वी विल गेट एंग्री। वी विल गेट फ्यूरियस, वी विल गेट अह पैजनेट, वी विल गेट अह रिपल्स बाइ समवन ऑर समथिंग। इट्स जस्ट अ पार्ट ऑफ़ आवर लाइफ। डोंट टेक इट टू सीरियसली। सी देयर आर टू डेंजरस। फर्स्ट ऑफ़ ऑल इफ वी जस्ट कंप्लीटली नेगलेक्ट इट देन वी विल स्टॉप कंट्रोलिंग आवर सेल्फ। सो इट शुड नॉट बी देर एंड सेकंड वन एक्सट्रीम इज़ टू कंप्लीटली इग्नोर इट। वी शुडंट डु दैट। एंड दी अदर एक्सट्रीम इज़ टू टेक इट टू सीरियसली इन सच अ वे दैट अल्टीमेटली इट कम्स टू हाउ आवर साधना। इन द फॉर्म ऑफ़ गिल्ट फीलिंग। बोथ ऑफ़ दिस एक्सट्रीम्स वी शुड अवॉयड।
प्रश्न: अहंकार दग्धबीज करना तो बहोत आगे की बात है. दिन प्रति दिन की साधना के लिए ठाकुर कहते है की अहंकार की दिशा मोड़ दो.
जैसे ठाकुर कहते हैं ना कि मन है, वन है और कोण है। यानी अपने मन में एक अपने घर के कॉर्नर में और बीच-बीच में रिट्रीट में जाकर के ईश्वर चिंतन करना है। सो ऐसा तो होगा नहीं कि मैं अपनी नौकरी बंद करके अपने जीवन को पूरा साधना में लगाऊं। इवन हम लोगों का भी अभी यहां पर समर कैंप आ रहा है तो उसके लिए मुझे भी तैयारी करनी है। तो यह सब तो हमको करना ही करना है। बट डेली वंस इन अ डे एक ऐसा पीरियड होना चाहिए साधना का बीच-बीच में कहीं रिट्रीट में जाकर के। सो दिस इज़ हाउ वी मेंटेन आवर दिस अफमेशन प्रोसेस। बट द प्रिंसिपल इज सेम। रिट्रीटिंग टू रिट्रीट फ्रॉम द वर्ल्ड। वेदर यू रिट्रीट एट द कॉर्नर ऑफ योर रूम और कॉर्नर ऑफ योर माइंड और इन अ फॉरेस्ट। बट प्रिंसिपल इज रिट्रीट। जैसे हमको यहां पर कहा जाता है कि यह जो सुबह का मंगल आरती और शाम का संध्या आरती कुछ भी हो जाए उसको छोड़िए मत। अभी आज हमको लगता है कि मैंने बहुत साधना कर दी। आरती में जाने की क्या जरूरत है। बट डोंट थिंक लाइक दैट। इट्स अ पार्ट एंड पार्सल ऑफ योर लाइफ। मेक इट अ डे टू डे एक्सपीरियंस। सो अभी अभी मुझे ये सब 20 साल के बाद में लगता है कि सही में बहुत बड़ी एडवाइस है कि दिन का दो टाइम तो एटलीस्ट है। मैं चाहे दिन में कुछ भी कर लूं। एटलीस्ट दो टाइम तो है मेरे पास में और यह थर्ड अभी मेरा सुबह का क्लास है तो यह तीन ओकेजन है मेरे लिए कि मैं सब छोड़कर के एटलीस्ट मैं ठाकुर का स्मरण करता हूं। अभी आइडियली स्पीकिंग अभी जैसे हमारे ट्रेनिंग सेंटर में जप यज्ञ होता था कि सप्ताह में एक दिन पूरी रात सैटरडे नाइट और संडे को क्लासेस नहीं होते थे। हालांकि संडे को ये रूम क्लीनिंग और ये कैंपस क्लीनिंग होता था। व्हिच इज इवन माने हेवियर देन डेली क्लासेस। किंतु माने वह साइकोलॉजिकल कहते हैं ना कि वह क्लास नहीं है तो चलो रात सैटरडे को पूरा रात जग करके जप यज्ञ करेंगे। सो आइडियली स्पीकिंग आई शुड डू दैट किंतु मैं टीसी छोड़ने के बाद में कभी नहीं किया। वो टीसी में भी आधा दिन फांकी मार देता था। तो जो करना चाहिए उसमें से मैं 10% भी नहीं कर रहा हूं। रामकृष्ण मिशन के साधु को जो करना चाहिए इन जनरल एक आध्यात्मिक एस्पिरेंट्स को करना चाहिए। उसका 1% भी यदि मैं कर पाऊंगा तो बहुत है। बट एटलीस्ट यह तीन ओकेजन है मेरे डे टू डे लाइफ में कि मैं सब छोड़कर के ठाकुर का चिंतन करता हूं। सो दिस विल गो ए लॉन्ग वे। अभी 12 साल में या 24 साल में मुझे सफलता नहीं मिलेगी। इतना यह जो म सेडेंटरी अप्रोच है मेरा साधना के प्रति। किंतु चलो भाई कुछ जन्मों के बाद में कुछ तो फर्क दिखेगा। इफ आई कंटिन्यू द सेम साधना बर्थ आफ्टर बर्थ। अपना लाइफ स्टाइल है पूरा सेडेंटरी ना ही हम ऐसा कोई कर्म बहुत ज्यादा कर देते हैं ना ही कोई बहुत बड़ी साधना कर देते हैं तो सॉल्यूशन इज टू बी स्टेडी वो जो कछुआ कैसे है वो रेस में जीत जाता है वैसे अभी रिसेंटली मैंने वो इंडिया का पढ़ा जीडीपी कि हमारा 2 ट्रिलियन होने में 60 साल लगा इंडियन इंडिपेंडेंस से लेकर के 2015 तक अपना जीडीपी 2 ट्रिलियन हुआ। फिर 2015 से 2025 10 साल में डबल हो गया। 2 ट्रिलियन का 4 ट्रिलियन हो गया। अभी लोग कहते हैं कि इसका डबल होने में इससे आधा टाइम लगेगा। यानी कि जो फर्स्ट डबलिंग है वो लंबा टाइम लेता है। किंतु उसके बाद में ज्योमेट्रिकल रेट ऑफ प्रोग्रेस जितनी भी बार डबलिंग होगा ना उतना आधा टाइम ले लेता है। तो हमारे हमारे जीवन में भी ऐसा ही है। आध्यात्मिक जीवन में भी ये धीरे-धीरे चल रहा है। किंतु भीतर में डबलिंग हो रहा है। पता नहीं चल रहा। उसके लिए आपको यह ठाकुर जैसा यदि गुरु मिल जाए एक एक्सपर्ट इकोनॉमिस्ट तो वह बता देगा आपको कि भीतर में डबलिंग हो रहा है बाहर में नहीं पता चल रहा है। वो जो ठाकुर का फेमस एग्जांपल है स्लोपिंग रोड वो कलमबाड़ा रास्ता माने वो किले में गए थे एक फोर्ट फोर्ट में देखने के लिए वो स्लोप था। तो स्लोप आप उतर रहे हैं कि चढ़ रहे हैं धीरे-धीरे चले पता नहीं चलेगा। पीछे देख के पता चलेगा कि कितना नीचे ना कि कितना ऊपर आ गया है। रैंप गोस बोथ वे डिटेरेशन भी होगा धीरे-धीरे तो पता नहीं चलेगा। दैट इज ट्रू
प्रश्न: ठाकुर कहते है की अहंकार तो जाने वाला नहीं तो पड़ा रहे साला "दास अहम्" बन कर. इसके बारे में कोई प्रैक्टिकल सलाह?
थ्योरिटिकल जो सॉल्यूशन है वो तो जैसे कोने मने वने और कोने दैट डेली वी नीड टू हैव सम रेगुलर प्रैक्टिस व्हिच विल टेक अवे ऑल द नेगेटिविटी ऑफ द डे। बट दैट इज अ लॉन्ग टर्म क्वेश्चन। जब तक दगधबीज नहीं होता अपना मन के भीतर के वासनाएं तब तक तो यह हमको करना ही करना है। बट टू गिव यू सम प्रैक्टिकल हिंट्स देखिए कि अहंकार का मैनिफेस्टेशन क्या है? एक तरह से यदि देखें तो कुछ-कुछ मैनिफेस्टेशन होते हैं रिग्रेट या तो फिर एंगर। मैंने खुद के जीवन में जैसे मैंने देखा है कभी-कभी लोगों के ऊपर में बड़ा गुस्सा आ जाता है। कभी-कभी दूसरों से ईर्ष्या होती है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि हमको बाईपास करके और किसी को प्रमोट किया जा रहा है। व्हिच आर द रिग्रेट्स ऑफ द लाइफ। अभी हम लोगों की एक तरह की रिग्रेट होती है। आप लोगों की दूसरी तरह की रिग्रेट होती है। किंतु रिग्रेट इज अ पार्ट ऑफ लाइफ। और यह यही रिग्रेट को भूलने के लिए ही लोग एडिक्शन में घुस जाते हैं। क्यों लोग स्मोकिंग और ड्रिंकिंग करते हैं? क्योंकि उनका माइंड जो है कंटीन्यूअस इसके इर्द-गिर्द घूमता रहता है कि दिस इज अ रिग्रेट ऑफ माय लाइफ। दिस इज द रिग्रेट ऑफ माय लाइफ। दिस इज़ वेयर आई हैव बीन डियल्ड अनजस्टली। और दिस इज़ द इनजस्टिस डन टू मी। यह कंटीन्यूअस जो भीतर में चलता है कि आई हैव लॉस्ट आउट दिस अपॉर्चुनिटी और समवन एल्स हैज़ बीन प्रमोटेड एट माय एक्सपेंस। और समवन इज टेकिंग बेनिफिट ऑफ माय वल्नरेबिलिटी एंड ही इज़ एक्सप्लइटिंग मी। सो आई हैव एंगर टुवर्ड्स हिम। यह जो एक कंटीन्यूअस भीतर में चलता रहता है, उससे छूटने के लिए लोग क्या करते हैं? एडिक्शन के शिकार हो जाते हैं। आवर सॉल्यूशन इज़ ऑफ कोर्स साधना। मैं खुद का एक प्रैक्टिकल पॉइंट बताऊं कि मैंने एक प्रैक्टिस ऐसा किया है अह कि जब भी हम थोड़ा सा इंट्रोस्पेक्शन करते हैं ना तो मैं इंट्रोस्पेक्शन की शुरुआत पहले तो मैंने ऑब्जर्व किया कि यह रिग्रेट रहता है ना वो मेरे मन में इतना रजस पैदा करता है कि मैं ईश्वर चिंतन या तो फिर नाम स्मरण ठीक से कर ही नहीं पाता हूं। इसका एक सॉल्यूशन मेरे पास में ऐसा था कि किताब पढ़ना शुरू कर दे। कथामृत वगैरह। इससे क्या होगा? जप ध्यान करने से जो एक रजस प्रकट होता है। प्रॉब्लम कहां पे है? देखिए यहां पे कि जब तक मैं कुछ कर्म करता हूं तब तक यह रिग्रेट मेरे से दूर रहेगा। सो कर्म इज अ सॉल्यूशन। एडिक्शन इज अनदर सॉल्यूशन। ऐसा मैं अपने गम को इस बोतल में डुबो देना। ऐसा जैसे कहते हैं तो जब तक मैं एडिक्शन में रहूंगा वह रिग्रेट नहीं रहेगा। किंतु जैसे ही मैं एडिक्शन से दूर जाऊंगा, यह कर्म भी एक तरह का एडिक्शन है। मैं एक्टिविटी से जैसे ही अपने को रिट्रीट में रिट्रीट करूंगा, थोड़ा सा शांत बैठने का प्रयास करूंगा। यह जितना भी रिग्रेट वो थोड़ा समय रुक करके रहा था, सब वो कंपाउंड इंटरेस्ट के साथ में मेरे मन में आकर के ऐसा डिस्टरबेंस खड़ा करेगा कि 10 मिनट में मैं खड़ा हो जाऊंगा। नहीं करना है जप ध्यान, नहीं करना है चिंतन। चलो किसी चीज में अपने मन को प्रवृत्त कर दे। और यदि आजकल तो यह मोबाइल फोन है तो एक ऐसा एडिक्शन है कि आप जॉब पर से जैसे वापस आए तो वैसे ही टीवी चालू कर दिया। बड़े-बड़े आवाज से लोग टीवी चालू कर देते हैं। क्यों? क्योंकि भीतर का जो डिस्टरबेंस है उसको वो इस टीवी के जो नॉइज़ है, मोबाइल का नॉइज़ है, उसमें यह लोग डुबो देना चाहते हैं। सो, मोबाइल इज़ टीवी इज़ अनदर एडिक्शन। प्रॉब्लम कम्स। अपना सॉल्यूशन क्या चाहिए? ये शांति से बैठे हैं। उस समय ये जो रिग्रेट, ये डिस्टरबेंस, ये नॉइज़, ये दूसरों के प्रति क्रोध, ये दूसरों के प्रति यह एक तरह का जेलसी वो आता है। उसको शांत करना है। तो मैंने पहला मेरा प्रैक्टिस ऐसा था कि मैं जब बैठूंगा, आंख बंद करके मन जैसे ही डिस्टर्ब होगा, कथामृत पढ़ना शुरू कर देना। तो क्या है कि वह एक तरह का कर्म है। अपना मन उसमें एंगेज रहता है। कथामृत पढ़कर मन शांत हो उसके बाद में फिर से जप करना है। तो यह जप करना कथामृत पढ़ना यह दोनों साथ में मैं करता था। दैट इज माय फर्स्ट सॉल्यूशन। इसके बाद में मैंने एक दूसरा सॉल्यूशन प्रैक्टिस किया कि शुरू से ही जैसे ही मैं बैठता हूं वैसे ही एक प्रैक्टिस ऐसी करनी है कि जिन लोगों के प्रति मेरे मन में क्रोध है उनको सबसे पहले अपने मन में से आशीर्वाद देना है। सबसे पहले उनके पास में क्षमा मांग लेनी है कि इसका मेरे साथ में जो भी झगड़ा है तो यह आदमी इसलिए कर रहा है क्योंकि उसको पता नहीं है कि उसके भीतर में भी डिविनिटी है। मेरे भीतर में भी डिविनिटी है। वह अपने अहंकार के मारे यह सब कर रहा है और मैं अपने अहंकार के मारे इसको सीरियसली ले रहा हूं। बिकॉज़ बट एज वी बोथ आर बियों्ड आवर बॉडी माइंड कॉम्प्लेक्स वी आर बोथ द रेज़ ऑफ द सेम डिविनिटी आई फॉरगिव हिम फ्रॉम द बॉटम ऑफ माय हार्ट। आई ब्लेस हिम फ्रॉम द बॉटम ऑफ माय हार्ट। आई ट्रांसफर ऑल माय स्पिरिचुअल अटेंडमेंट टू हिम। यहां से शुरू करना है कि उसके प्रति जो क्रोध है वह वहीं पर ठंडा हो जाए। जैसे कि वह कहते हैं ना सांप के जो फैन चढ़ा के सांप आपको मारने को आता है तो उसके सर पर धूल डालोगे तो इमीडिएटली वो ठंडा हो जाएगा। तो मां इस उपमा का प्रयोग करती है। तो ये सांप के सर पर धूल फेंकने के बराबर यह क्रोध अपना सर उठाए उससे पहले ही उसके सर पर यह जो क्षमा और आशीर्वाद रूपी धूल डाल दीजिए। तो वह आदमी अपने माइंड से चला जाएगा। जैसे ही उसके साथ में संबंध कट हुआ, ठाकुर के साथ में मेरा संबंध एस्टैब्लिश हो गया। अभी देखिए कि यह प्रैक्टिस मेरे किस तरह से मुझे हेल्प करती है कि मैंने बार-बार ऑब्जर्व किया है कि जैसे ही आंख बंद करूंगा तो वैसे ही यह इसके प्रति क्रोध, उसके प्रति ईर्ष्या, उसके प्रति नाराजगी यह सब गोल-गोल घूम के आता है। पहले ही मैंने आशीर्वाद देकर ठंडा कर दिया तो फिर वह लोग चले जाते हैं दिमाग से। फिर यह भूत की तरह है। भूत पिशाच गण की तरह है। जो भगवान बुद्ध को जब निर्वाण प्राप्त होने वाली थी जो आखिरी रात तो प्रथम प्रहर में द्वितीय प्रहर में तृतीय प्रहर में वह मारा आकर के उनको कभी प्रलोभन देता है तो कभी धमकी देता है। तो उस भगवान बुद्ध ने ना ही प्रलोभन प्रलोभन से विचलित हुए ना ही धमकी से डरे। तो उस बिकॉज़ कि उन्होंने मारा को इग्नोर किया। चतुर्थ आखिरी प्रहर में उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। सो सेम प्रैक्टिस कि यह एक्चुअली वह व्यक्ति जिसके प्रति मेरा क्रोध है। एक्चुअली वह व्यक्ति कि जिसके प्रति मेरी नाराजगी है या तो वह व्यक्ति कि जिसके प्रति मैं ईर्षान्वित हूं जो कि मेरे से ज्यादा टैलेंटेड है वो आकर के मुझे डिस्टर्ब नहीं कर रहा है। यह जो शैतान रूपी जो मारा है वो उनको लाकर के मेरे मन में घुसा रहा है जिससे कि मैं अपने पथ से भटक जाऊं। तो सबसे पहले यह जो शैतान या तो जो मारा है जो उनका चेहरा लेकर के मेरे मन में आता है उसी को मैंने आशीर्वाद दे दिया कि अच्छा तुम मेरे से ज्यादा टैलेंटेड हो मेरे से ज्यादा आगे जा रहे हो तुमको भी माने अपने हृदय के अंत पूर्वक आशीर्वाद जो मेरे से कमजोर है फिर भी वो मतलब मेरे से फाइट करना चाहता है जिसको कहते हैं चित्त प्रसाद योग की भाषा में इसको कहते हैं चित्त प्रसाद कि मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षा जो कि अपने इक्वल है जिसके साथ में अपनी फाइट है उसके साथ में अपने मन में मैत्री बनाओ। मुदिता जो अपने से छोटे हैं और अपने साथ में फाइट करना चाहते हैं उनके प्रति दया रखो। करुणा जो कि अपने विरोधी है जो कि अपना अहित करना चाहते हैं उनके प्रति करुणा और मुदिता जो अपने से बड़े हैं और अपना अहित करना चाहते हैं उनके प्रति उपेक्षा। तो यह मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षा। यह जो चित्त प्रसाद है, यह चित्त प्रसाद अपने माइंड में इंस्टॉल करना है। डिफॉल्ट सॉफ्टवेयर के रूप में तब देखेंगे कि फिर अपना माइंड शांत हो जाता है और फिर साधन भजन की ओर चलता है। जब तक आप इस एस्पेक्ट को इग्नोर करेंगे तब तक क्या होगा कि आपका साधना में मन बैठेगा ही नहीं। वो कभी ना कभी कहीं ना कहीं कहां से ना कहां से यह सब आकर के आपको डिस्टर्ब करता ही रहेगा। सो दिस इज द सॉल्यूशन। पहले यह जो भूत पिशाच आते हैं और हमेशा याद रखना है कि वह व्यक्ति आकर के मुझे डिस्टर्ब नहीं कर रहा मेरे मन में। उसके साथ में जो घटनाएं हुई है वह तो होकर के कब की खत्म हो गई। किंतु वो 10 साल पहले की बात 20 साल पहले की बात आंख बंद करूंगा तो बचपन की यह सब बातें आकर के मुझे सताती है। अभी मेरे बचपन वालों के साथ में मेरा कोई रिलेशन भी नहीं रहा। किंतु उस समय की रिग्रेट अच्छा ऐसा होता तो कैसा होता? ऐसा नहीं हुआ तो बड़ा गलत हुआ। अननेसेसरी वो सब आ करके सताता है। सो फर्स्ट ऑफ ऑल उसका इस तरह से सॉल्यूशन ला दो। एकदम अपने हृदय मन से उनके प्रति आशीर्वाद दो। उनको क्षमा कर दो। जो भी गलती हुई है डज नॉट मैटर। देन फ्री आवरसेल्फ देन फोकस ऑन साधना। एक बात याद रखनी है इस तरह की
प्रश्न: जप प्रारम्भ करने से पहले लोगो को क्षमा और आशीर्वाद देने से हमारे आसपास वालो से झगड़े भी कम हो जाएंगे
साधना ना हमारे जीवन में कमजोरी ना ला दे। इस अर्थ में कि भारत ने जो 1000 साल तक गुलामी जो हमने भुगती कि सबको आशीर्वाद देकर क्षमा कर देना है। अभी दुश्मन को भी आशीर्वाद दिया। दुश्मन अपने पर राज करते गए। हम उसको क्षमा करते गए। तो इस तरह का पागलपन ना हो। आपने यह जो कहा ना कि एक्सटर्नल फ्रिक्शन कम हो जाएगा। इसके लिए मैं यह बात बता रहा हूं। यदि कोई अपना अहित करना चाहता है तो उसका सामने हमको एकदम डट के मुकाबला करना है। वो दैट एक्सटर्नल वर्ल्ड इज कंप्लीटली डिफरेंट। अपनी साधना डिफरेंट है। अपने मन में ईश्वर का नाम जप करते-करते दुश्मन जब आए दुश्मन को अपने मन में क्षमा करना है। बाहर में यदि अपने परिवार का हित करने को आए हम क्षमा कर देंगे तो किस तरह की मददानगी भाई तो दैट वी हैव टू बी क्लियर। ना भारत ने 1000 साल तक ये आध्यात्मिकता माने वो हमने वो देखा था ना उस दिन कि वो ढेड़ो सांप माने वो वोटर स्नेक वो जहरीला नहीं होता है वो मेंढक को गिलता है। अभी मेंढक मरता भी नहीं है क्योंकि उसकी आध्यात्मिकता इतनी स्ट्रांग है। वो बचता भी नहीं है क्योंकि वो अपना आत्मसरक्षण नहीं कर पाता है। ये स्वामी जी देखिए स्वामी जी यह सब चीजों में कितने क्लियर थे। ठाकुर और भारतीय आध्यात्मिकता दोनों पीछे में खड़ा है। खड़े हैं स्वामी जी के। अच्छा फिर भी कहते हैं कि ये जब वो भारत को ग्रेट होना है। पूरे विश्व पे विजय प्राप्त करनी है। हालांकि आध्यात्मिकता से बट फ्रीडम इटसेल्फ इज नॉट इनफ। यह जो एकदम मने खड़े होकर के अपनी ग्रेटनेस को स्वीकार करना इज़ समथिंग सो यूनिक। यह पक्का अहंकार है।