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ओम स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार षय राम कृष्णा यते नम स्वामी विवेकानंद का ज्ञान योग पढ़ रहे थे कॉस्मस माइक्रो कोसम स्वामी जी लिखते हैं इट कैन नॉट बी ट द सोल नोस इट इ नॉलेज इट कैन नॉट बी दैट द सोल हैज एक्जिस्टेंस इट इज एक्जिस्टेंस इट कैन नॉट बी दैट द सोल इज हैप्पी इट इज हैप्पीनेस ऐसा नहीं है कि आत्मन सत आत्मन के भीतर में सत है आत्मन सत स्वरूप है आत्मन के भीतर में ज्ञान आत्मन ज्ञान प्राप्त करता है या तो फिर आत्मन जानता है ऐसा नहीं आत्मन ज्ञान स्वरूप रूप है ऐसा नहीं कि आत्मन कहीं से आनंद पाता है कहीं वह ट्रिप में जाकर के कि कहीं वह कोई टेलीविजन देख कर के इस तरह से आत्मन ज्ञान प्राप्त नहीं करता आत्मन ज्ञान स्वरूप है सत जीत आनंद एक्जिस्टेंस नॉलेज एंड ब्लिस ये तीनों आत्मन का स्वरूप है आत्मन कहीं बाहर से इसको प्राप्त नहीं करता जिस तरह से चांद को सूरज का प्रकाश मिलता है और सूरज के प्रकाश से प्रकाशित होकर के चांद जो हमको दिखता है आत्मन के साथ ऐसा नहीं है या तो सूरज के साथ में ऐसा नहीं है चांद का प्रकाश उधार लिया हुआ है किंतु सूरज स्वयं प्रकाशित है वैसे ही मन बुद्धि चित्त और अहंकार जिसको कि हम अंतःकरण कहते हैं वेदांत में वो कहीं से बाहर में कुछ देख कर के वे लोगों को खुशी होती है कभी गम होता है कभी नाराजगी होती है कभी क्रोध होता है क्योंकि बाहर का जो जगत है और भीतर की जो अवस्था है उसकी खुद का जो डायनामिक्स है वह उसको प्रभावित करता है किंतु आत्मन को बाहर से कुछ भी प्रभावित नहीं कर सकता यदि देखा कि किसी का मृत्यु हो गया है या तो कोई बहुत बड़ी दुर्घटना हो गई है तो मन बेचारा बहुत बड़े सदमे में आ जाएगा मन मायूस हो जाएगा आत्मन को इससे कुछ नहीं होने वाला क्योंकि आत्मन निर्लिप्त है कभी-कभी थोड़ा क्रूअल लगता है पढ़ने में कि अरे आत्मन को क्या इस जगत के साथ में समाज के साथ में प्रियजनों के साथ में कोई लेना देना नहीं है किंतु आत्मन तो जो सफर करता है जिसके साथ में दुर्घटना हुई है वह भी तो वही आत्मन है जो कि यह है माने आत्मन के लिए तो पर कुछ नहीं सब कुछ एक ही है तो आत्मन सब जैसे कि पूरा विश्व आत्मन है या तो फिर आत्मन का ही एक उसके पर में देखेंगे कि एक तरह का भ्रम है तो जिसको कि बाहर मान लीजिए कि कहीं पर कोई दुर्घटना हुई मुझे उसका दुख हुआ तो जिसके साथ में दुर्घटना हुई है वह भी आत्मन है जो जिसको गम हो रहा है वह भी आत्मन है सब कुछ आत्मन है बोलकर के आत्मन सुख और दुख जन्म मृत्यु जरा व्याधि सृष्टि स्थिति प्रलय यह सब घटना चक्र है यह सब संसार चक्र है इससे परे है दैट व्हिच इज हैप्पी हैज बरोड इट्स हैप्पीनेस जो खुश है उसने अपनी खुशी कहां से उधार ली है दैट व्च जज नॉलेज हैज रिसीवड इट्स नॉलेज जिसके पास में ज्ञान है उसने किसी गुरु के पास से किसी शिक्षक के पास से या तो फिर आजकल जैसे होता है किताबें पढ़कर के या तो फिर यह इंटरनेट पर सर्च करके उसने ज्ञान प्राप्त किया है जिसके पास ज्ञान है उसने बाहर से कहीं से प्राप्त किया है एंड ट च हैज रिलेटिव एक्जिस्टेंस जज ओनली अ रिफ्लेक्टेड एक्जिस्टेंस और जो जिसका की अस्तित्व सापेक्ष है वह सापेक्ष अस्तित्व सिर्फ एक परछाई मात्र है विश्वम दर्पण वो दक्षिणामूर्ति स्तोत्र है ना विश्वम दर्पण दृश्य मानम नगरी तुल्य निजात गतम विश्व जो है दर्पण में दृश्य होने वाली नगरी मात्र है सही में तो वो विश्व कहो या तो फिर सही आत्मन सत्ता कहो हमारे ही भीतर है तो एगजैक्टली विश्वम दर्पण दृश्य मानम दर्पण के भीतर में दिखने वाला विश्व जैसा है वैसे ही जिसका एजिस्ट मेंस सापेक्ष है यह जगत उसका एसिस्टेंसिया होने वाले परछाई की तरह ही है या तो फिर कहेंगे कि सिनेमा में दिखने वाले स्क्रीन की तरह ही है वेर एवर देयर आर क्वालिटीज दिस क्वालिटीज हैव बीन रिफ्लेक्टेड अपॉन द सब्सटेंस बट द सोल हैज नॉट नॉलेज एक्जिस्टेंस एंड ब्लेसेडनेस एज इट्स क्वालिटीज दे आर द एसेंस ऑफ द सोल जिसके गुण है वो गुण कहीं और कहीं की परछाई मात्रा है गुण कहीं से उसने उधार लिए हुए हैं किंतु सत चित आनंद आत्मन के गुण नहीं है आत्मन का स्वभाव है इसके ऊपर एक सुंदर कहानी है स्वामी जी अमेरिका गए थे तो अभी क्या था कि सेकंड टाइम जब अमेरिका गए थे तो ऐसा हुआ कि हमको तो पता है फर्स्ट टाइम जब स्वामी जी अमेरिका आए थे तो ठाकुर का आदेश प्राप्त था भारत में जाकर के रामकृष्ण संघ की स्थापना करनी थी और एक नया धर्म का एक रामकृष्ण भावधारानी का जगत में प्रचार करना था धर्म नहीं भावधारानी और दूसरा है कि विदेश में जाकर के देखा तो देखा कि अरे मैंने भारत में तो जितना रामकृष्ण भावधारानी धर्म के पुनरुत्थान की जरूरत है उतनी ही जरूरत यह विदेश में भी है यह लोग यह भौतिकवाद यह भोगवा द में इतना डूब गए हैं कि यदि इनको एक नई डायरेक्शन नहीं दी जाएगी तो ये लोग जैसे स्वामी जी यूरोप में जाकर के कहते हैं ना कि ये लोग बारूद के बहुत बड़े भट्ठे के ऊपर में बैठे हुए हैं उसमें कब चिंगारी लग जाएगी कब विस्फोट होगा ठीक नहीं 50 साल में ही ऐसा होगा स्वामी जी ने भविष्यवाणी की थी और सही में 50 साल के आसपास में ही ये फर्स्ट वर्ल्ड वॉर सेकंड वर्ल्ड वॉर और ये बाद में कोल्ड वॉर ये न्यूक्लियर वॉर क्या-क्या सब पश्चिम ने पश्चिमी सभ्यता ने किया है तो यदि वहां पर ठीक-ठीक गाइडेंस नहीं दिया जाएगा तो वे तो अपने को को तो मार ही देंगे आपस में लड़ाई करके किंतु व हम हमको भी भारत को भी ले डूबेंगे माने ये न्यूक्लियर वॉर होगी तो उससे कोई भारत बचने वाला नहीं है फिर वोह हर जगह पर बम फेंके जाएंगे वे लोग सोचेंगे हम अकेले क्यों मारे सबको साथ में लेकर जाते हैं ऐसा पागलपन ऐसा पागलपन जिनमें होता है वही लोग न्यूक्लियर वोल चालू करते हैं तो एनीवे तो जब स्वामी जी अ उस पहली बार गए थे तो इतना उनके सर पे था जिम्मेदारी फिर भारत में गए रामकृष्ण मिशन की स्थापना की सब कुछ उन्होंने किया फिर उनका स्वास्थ्य टूट गया इतना उनको डायबिटीज वगैरह हो गया बार-बार उनको इतना बुखार हो रहा है वो ठीक से भारत में जाकर के देखेंगे कि उन्होंने विदेश में जितने प्रवचन दिए दिन के दो-दो तीन-तीन क्लास करते थे सप्ताह में छह सात आठ क्लास प्लस एक पब्लिक लेक्चर एक जाहिर प्रवचन तो उसमें से कुछ भी वो भारत में नहीं कर पाए क्यों क्योंकि भारत में उनका स्वास्थ्य ऑलमोस्ट टूट चुका था देखिए कि कलकाता में जाकर उन्होंने बहुत कुछ का बहुत कम काम किया है यहां पर आए कोलंबो में फिर कोलंबो से यह कोलकाता की जर्नी है उन्होंने प्राय एवरीडे प्रवचन भी दिए हैं और बहुत सारे डिवोर्स को जो उनको मिलने वाले लोग हैं उनको भी मिले हैं किंतु अल्टीमेटली कोलकात्ता जाकर जो उनकी अवस्था हुई है बहुत कम उन्होंने बाद में काम किया है भारत में तो उस समय डॉक्टरों की सलाह थी कि आप फिर से सेकंड टाइम अमेरिका में जाइए और सेकंड टाइम थोड़ा सा का स्वास्थ्य में उन्नति होगी तो यह बात सुनकर के स्वामी जी गए सेकंड टाइम अमेरिका और साथ में निवेदिता को और रयान जी को लेकर गए निवेदिता अपनी स्कूल के लिए पैसा बटो रेगी और रयान जी है कि वह अभी क्लास लेना शुरू करेंगे स्वामी जी से तो कहा इतना सब कुछ होने वाला है तो यह लोग गए अमेरिका में रिजली मैनर में रह रहे हैं वहां पर एक डिवोटा है डिवटी अभी जैसे हमने कहा था वो लोग अपने को डिवोटा या शिष्य नहीं कहते अपने को फॉलोअर्स एंड फ्रेंड्स कहते हैं अमेरिकन लोग तो उनकी एक फ्रेंड थी उसका नाम था मोड स्टम अभी शी वाज अ वेरी गुड पेंटर वो बहुत अच्छी पेंटिंग जानती थी तो स्वामी जी ने उसको कहा कि देखो तुमको तो पेंटिंग आता है तो मुझे भी थोड़ा सा सिखाओ क्योंकि क्या है कि इस तरह से स्वामी अभी हेल्थ इतना उनका बिगड़ गया है कि अभी वो प्रवचन देने की वो सब अभी बात ज्यादा नहीं है थोड़ा सा पहले उनको रिकवर होना है तो रिकवरी के लिए वहां पर रिलैक्स हो कर के रह रहे हैं रिजली मेनर बोलकर के बहुत ही सुंदर एक रिजली बोलकर के शहर है वहां पर मेनर एक बनाया हुआ है एक बहुत ही सुंदर मकान बनाया हुआ है उनके डिसाइल थे उसका नाम था मिस्टर लगेट तो ये मिस्टर लगेट ने उनको फ्रांसिस लगेट ने स्वामी जी को कहा कि न्यूयॉर्क वगैरह आप जगह पर आप प्रवचन देते घूमते हैं उसकी ब आप यहां पे आइए रिजली में आइए हमारे साथ रहिए और आप थोड़ा सा रिलैक्स होइए तो स्वामी जी वहां पर गए उन दिनों का विवरण हमने कुछ दिन पहले भी बात किया था कि जोसेफाइन मे क्लाउड उसको ग्रेट समर कहके पुकारती है क्योंकि वो समर और ऑटम के कुछ दिन थे उसमें स्वामी जी वहां पर रहे थे और अभी गए हैं रिलैक्स होने के लिए किंतु दिन प्रतिदिन ईश्वरीय वाणी ही उनके मुंह में से निकल रही हो सब लोग जैसे मंत्र मुग्ध होकर के सुन रहे हैं तो उस समय ऐसा होता है ना कि एक एक थिरी है कि अपने हाथों से कुछ काम करो यदि अपने मन को डिस्ट्रेक्ट करना है तो अपने हाथों से कुछ काम करो अपना मन यदि बड़े टेंशन में है तो कोई एक नई प्रवृत्ति में किसी हॉबी में उसको लगाओ तो टेंशन आपका थोड़ा सा रिलैक्स रिलीज होगा तो स्वामी जी ने इस मोड स्टम को कहा कि तुम मुझे पेंटिंग बनाना बनाना सिखाओ तो मोड स्टम ने कहा अरे वो तो उसका इतना बड़ा सद्भाव है विश्वविख्यात स्वामी जी स्वयं उनके पास पेंटिंग सीखने को आ रहे तो सब कुछ ठीक हो गया वो पेंटिंग के लिए वो जो पेपर वो बोर्ड फिर ये जो जो भी ये कलर की ये जो ब्रश वगैरह जुगाड़ करके रख लिया व जैसे पेंटिंग सीखने का समय आया स्वामी जी एक एप्पल लेकर के उसके पास में आए सफर्जन लेकर के और कहा उसको दिया जैसे अपनी भारतीय परंपरा है ना वो गुरु शिष्य गुरु को दक्षिणा देता है तो वैसे ही स्वामी जी ने कहा कि फल एप्पल इज अ फ्रूट तो फ्रूट उसके हाथ में देकर के कहा इन द होप दैट अवर सेशंस बिकम फ्रूटफुल यह फल देता हूं इस आशा में कि हमारी ये जो पेंटिंग सीखने की क्लास है वो फल प्रद फल प्रसुप्त हो ऐसा मैंने मैंने स्वामी जी का वो सभी चीजों में इतना वो यूनिक उनका एक सोचने का बोलने का तरीका था तो स्वामी जी ने ऐसा करके उसको एप्पल दिया फिर वो सीखने की शुरुआत की और कुछ ही दिनों में उन्होंने निवेदिता का भी पेंटिंग किया इनका भी रयान जी का भी पेंटिंग किया पोर्ट्रेट इसको कहते हैं अभी कुछ दिनों के बाद में अब जब खाने टेबल पर सब लोग बैठे थे तो मिसेस ओली बुल थी सभी लोग थे तो ओली बुल उनका मातृ स्वभाव था स्वामी जी के प्रति तो कभी-कभी वोह स्वामी जी के साथ में हंसी मजाक भी किया करती थी निर्दोष ह हंसी मजाक जैसे चलता है तो ओली बुल ने कहा कि स्वामी जी को यदि हम ऐसा कहेंगे कि स्वामी जी आप इतने बड़े फिलोसोफर है आपको यह हिंदुइज्म वेदांत क्रिश्चियनिटी जगत के जितने भी धर्म है इस सबके बारे में आपकी इतनी गहन अंडरस्टैंडिंग है और आपकी इतनी बड़ी उपलब्धि भी है आज नी उपलब्धि हम लोग तो देख पाते हैं किंतु यह प्रशंसा सुन कर के आपको कोई फर्क नहीं पड़ता आप बिल्कुल जैसे कि अ पत्थर पर पानी डालते हैं ना इस तरह से प्रशंसा आपके ऊपर में से निकल जाती है प्रशंसा क्या आपके ऊपर में कोई य ही नहीं रेखा पात नहीं करती किंतु एक चीज हमने नोट की है मिसेस बुल कहती है कि जब हम आपको यह कहेंगे ना कि स्वामी जी आपने इतना अच्छा पेंटिंग किया है अरे निवेदिता का इतना अच्छा पोर्ट्रेट बनाया तो आप बिल्कुल बच्चे की तरह खुश हो जाते हैं है तो यह कैसा विरोधाभास यह कैसी विचित्र होता है कि जिस चीज में आप सही सही वर्ल्ड एक्सपर्ट है वेदांत और फिलोसोफी और स्पिरिचुअलिटी और मेडिटेशन और योग उसके बारे में कितनी ही प्रशंसा सुने आपको कोई फर्क नहीं पड़ता और पेंटिंग तो आपने अभी एक सप्ताह से सीखने की शुरुआत की है ऐसा कोई आशा ही नहीं है कि आप पेंटिंग में कोई बहुत बड़े पिकासो है ना कि रेम ब्रंट है उसके जैसे वर्ल्ड फेमस हो जाएंगे किंतु फिर भी पेंटिंग के बारे में थोड़ी सी भी प्रशंसा होती है तो आप बड़े खुश हो जाते हैं तो अब जैसा मिसेस बुल ने ऐसा कहा तो बाकी सब भी वो गेस्ट वगैरह बैठे हुए थे वे लोग भी इस तरह स्वामी जी का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया कि स्वामी जी सो वेन अबाउट हिज पेंटिंग अपने पेंटिंग को लेकर के कितने गर्वित है मने वो जैसे छोटा बच्चा है कि मेरे पास में बहुत अच्छा खिलौना है बहुत अच्छा खिलौना है तो स्वामी जी चुपचाप सब कुछ सुन रहे थे फिर थोड़ी देर को तो सुना फिर जिन्होंने रेमन सेंस लिखा है उसने लिखा बहुत सुंदर सेंटेंस स्वामी जी सडन वोक अप एकदम अलर्ट हो गए स्वामी जी कुछ समय के बाद में और फिर जैसे स्वामी जी जब ऐसा वो अलर्ट हो जाते हैं फिर तो वेद वेदांत के जितने भी गुण तत्व है सब आ जाते हैं सब उन्हें डे टू डे बातों में तो स्वामी जी सडन वोक अप स्वामी जी एकदम अलर्ट हो गए निंद्रा से जग गए जैसे कि एकदम आलस की तरह बैठे थे शांति से सब सुन एकदम अलर्ट हो गया फिर क्या कहा कि मिसेस बुल को कहते हैं कि सी आपके जो हस्बैंड मिस्टर बुल अबी उनका तो डेथ हो गया था बाय दैट टाइम वो तो एक्चुअली थे बहुत अच्छे संगीतज्ञ संगीतकार थे किंतु उन्होंने यह जो सिविल इंजीनियरिंग है टाउन प्लानिंग है यह रोड बिल्डिंग है वगैरह उनका एक हॉबी था और जैसे यह सिविल इंजीनियरिंग में उनका हॉबी वो इतना उसके ऊपर में उनका गर्व था कि यदि कोई संगीत के बारे में उनकी कोई प्रशंसा करेगा तो उनको कोई फर्क नहीं पड़ता था किंतु जैसे सिविल इंजीनियरिंग है टाउन प्लानिंग है यह सब जो सब्जेक्ट है जो कि उनके होबी थे उसके बारे में कोई कुछ भी उनकी थोड़ी सी भी प्रशंसा करेगा तो बड़े गर्वित हो जाते थे बड़े खुश हो जाते थे बड़े ही अभिमान से फुल जाते थे यह बात आपको पता है ना तो मिसेस बुल ने कहा या हां ये बात सही है कि अभी देखिए स्वामी जी का ऑब्जर्वेशन लोगों के प्रति कैसा है मिसेस बूल के खुद के हस्बैंड की जो ये कैरेक्टरिस्टिक है वो जब स्वामी जी ने पॉइंट आउट की तब उनको स्ट्राइक हुआ कि वो बहुत अच्छे संगीता किए थे किंतु जब संगीत के बारे में कोई प्रशंसा करेगा तो कोई इतना ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा किंतु जो उनकी होबी थी यह टाउन प्लानिंग वगैरह सिविल इंजीनियरिंग वगैरह उसके बारे में थोड़ी सी भी प्रशंसा उनको एकदम हंसी खुशी से भर देगी तो स्वामी जी ने कहा पता है क्यों ऐसा है बिकॉज वह संगीतमय थे जिसकी वजह से संगीत के बारे में प्रशंसा उनको ज्यादा फर्क नहीं देती थी किंतु यह टाउन प्लानिंग वगैरह उन्होंने यह विद्या अर्जित की थी इसके लिए उनको इस बात के ऊपर में गर्व था तो जो जो मय है जिसका का जो स्वभाव है उसके बारे में कोई कितनी ही प्रशंसा करें कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उसको पता है कि मेरी एक्सपर्टाइज्ड से है उसका जो स्वभाव है उसके बारे में किंतु जो चीज वो थोड़ी बहुत मेहनत करके अर्जित करता है उसके बारे में उसका बड़ा एक गर्व अनुभव करता है सेम वे जैसे कि धर्म अध्यात्म दर्शन शास्त्र स्वामी जी तो धर्म मय है स्वामी जी तो अध्यात्म मय है स्वामी जी ने ये सब चीजें कहीं करके हमारी तरह अर्जित नहीं की वह तो ध्यान में जाना उनका स्वभाव था बचपन में देखते थे कि जैसे सोने के समय में कोई एक दृश्य उनको विजन दिखता था जैसे कि बहुत बड़ा सर्कल हो उनकी नजर के सामने आता था फिर उसके ऊपर ध्यान करते करते उनको नींद आ जाती थी तो बिल्कुल छोटी उम्र में ऐसा हुआ था फिर अपने दूसरे मित्रों को पहले तो उन्होंने यह सोच लिया कि अरे ये तो सबके साथ में ऐसा होता होगा यह स्वाभाविक फिनोमिना है नेचुरल फिनोमिना है फिर अपने मित्रों के साथ बात की तो पता चला नहीं ये तो सिर्फ उनके साथ में ही ऐसा होता है वो बचपन में ध्यान कर रहे थे भगवान बुद्ध आकर के उनको दिखे दर्शन दिए तो बेचारे डर के मारे भाग गए थे उस समय तो यह तो उनका स्वभाव था धर्म अध्यात्म ध्यान वगैरह दर्शन वगैरह वो कोई उनको प्रशंसा करेगा तो फर्क नहीं पड़ेगा किंतु पेंटिंग वो मेहनत करके सीखे हैं तो पेंटिंग के बारे में प्रशंसा करेगा तो उनको बड़ा अच्छा लगता था तो स्वामी जी ने कहा कि पता है यह कैसा डिफरेंस क्यों है एक किस विद्या मय हो जाना किसी चीज का आपका स्वरूप हो जाना ये है ज्ञान पथ ये है अद्वैत और जो चीज आप मेहनत करके अर्जित करते हैं वो है ध्व जो आपका स्वभाव नहीं है आपको कर्म करके उसको अर्जित करना पड़ता है यह है ध्व और जो आपका स्वभाव है उसके लिए उसको अर्जित करने के लिए सिर्फ ज्ञान चाहिए मेरे पॉकेट में पेन है मैं चारों ओर घूम के देख रहा हूं कहां है पेन कहां है पेन वो नहीं मिल रहा है फिर मैंने लड़के को बुलाया देखो थोड़ा झुक कर के टेबल के नीचे पड़ी है कि नहीं अभी तो वेट भी बढ़ रहा है झुकना संभव नहीं है तो लड़के को बुलाया तो लड़के ने झुकने की बजाय पहले ही बोल दिया महाराज जी पेन तो आपके पॉकेट में है तो ओ अच्छा पॉकेट में ज्ञान हुआ और पेन मिली मैं आखा पूरा व ऑफिस में चारों ओर ढूंढ कर के देखा पेन नहीं मिली कर्म से पेन नहीं मिलने वाली क्योंकि पेन मेरे पास में ही है तो वैसे ही ज्ञान तो मेरा स्वभाव ही है आत्मन तो मेरा स्वभाव ही है व कर्म करने से वो नहीं ने वाला जब हमारा मन चित्त शुद्ध हो जाएगा कर्म करना है चित्त शुद्धि के लिए चित्त शुद्ध हो जाएगा तब जब गुरु जाकर के कहेगा सद्गुरु कहेगा तत्व मसी श्वेत केतो श्वेत के तो तुम वही हो तुम आत्मन ही हो तब कहीं जाकर के हमको ज्ञान होगा और हमको वो प्राप्त होगा तो देखिए कि स्वामी जी ऐसे बात बात में माने वो कहां वे लोग हंसी मजाक कर रहे हैं स्वामी जी चुपचाप सुन रहे हैं और सडन वो जैसे कि अलर्ट होकर ऐसी कोई बात कर दी जब भारतीय फिलोसोफी जिसको समझने के लिए लोग कितने बचपन से लगे रहते हैं संस्कृत सीखते हैं शास्त्र सीखते हैं कितनी किताबें पढ़ते हैं वो अद्वैत और अद्वैत ज्ञान पथ और कर्म पथ या तो भक्ति पथ ये क्या डिफरेंस है फट करके छोटी सी घटना में स्वामी जी ने हमको बता दिया तो वैसे ही स्वामी जी यहां पर बार-बार कहते हैं मन जो है वह बाह्य घटनाओं से विचलित हो जाता है मन जो जो है वह बाह्य घटनाओं से खुश हो जाएगा मन बाह्य घटनाओं के ऊपर में संपूर्ण डिपेंडेंट है किंतु आत्मन की खुशी आत्मन का ज्ञान या तो फिर आत्मन का होना एसिस्टेंसिया तलवार भी मारेंगे तो आत्मन को काट नहीं पाएंगे वायु उसको सुखा नहीं पाएगा अग्नि उसको जला नहीं पाएगा पानी उसको भिगा नहीं पाएगा ज जैसे गीता में है बहुत सुंदर श्लोक तो वैसे ही शरीर को भिगा देगा और जैसे शरीर भिगे गया मन डिप्रेसो जाएगा बुखार आएगा तो किंतु आत्मन कोई बुखार आने से कोरोना होने से डिप्रेसो वाला है हमको पता नहीं है कि ये मन के भीतर में या तो मन के पीछे में आत्मन है तो जैसे वो कठवारा जो एक एक आदमी है ना जंगल में जाता है तो लकड़ी काटने के लिए तो वो साधु ने कहा कि और भी आगे जाओ और भी आगे जाओ यहां पर लकड़ी मिलती है बाद में देखोगे कि तुमको रूपा की खान मिलेगी वो माइन मिलेगी फिर वो गुरु कहते हैं कि अभी और भी आगे जाओ थोड़ा आगे जाओगे तो फिर यह सोने की ये आपको सोना मिलेगा और थोड़ा आगे जाओगे जंगल में तो हीरा जवाहरात मिल जाएगा माने जंगल में एक्सप्लोर करने के लिए जा रहे हैं या तो कुछ धन अर्जन करने के लिए जा रहे हैं आजकल की लैंग्वेज में कहेंगे कि एक्सट्रैक्शन ऑफ नेचरल रिसोर्सेस ये नेचरल रिसोर्स जो है जंगल में उसको आप उसको आप एन कश करना चाहते हैं काट कर के लेकर के बाजार में जाकर के सेल करना चाहते हैं तो अभी आप जितना आगे जाएंगे जंगल में उतना ही ज्यादा से ज्यादा ट्रेजर्स ज्यादा से ज्यादा धन संपत्ति आपको मिलेगा तो यू हैव टू गो ऑन एक्सप्लोरिंग हम लोग मन तक जाकर के जो आज के जितने भी साइकेट्रिस्ट है ये आपको साइकोलॉजी है आप किसी कंसल्टेंट से मिलेंगे आपका एनाला एनालिसिस करेंगे वे लोग क्या कहेंगे ट्राई टू बिकम हैप्पी ट्राई टू कीप योर माइंड हैप्पी फिर यदि बहुत ज्यादा डिप्रेसो जाते हैं तो कहीं हवा फेर करने के लिए चले जाए कहीं लॉन्ग ट्रिप के ऊपर में चले जाइए यहां पर एक लड़का आता है तो उसको बाइक आता है और उसको फोटोग्राफी का भी बड़ा शोक है तो मुझे बोलता है बीच-बीच में उसका फादर के साथ में कभी-कभी झगड़ा हो जाता है वो अभी क्या है एक दुकान है तो दुकान में सबको बैठना है तो अभी ये क्या है कि उसका इतना कैपेसिटी नहीं कि वो दुकान छोड़ कर के और कहीं बिजनेस अपना अलग से करे ना कि उसका कोई इतना स्टडी भी नहीं तो दुकान के ऊपर में ही तो डिपेंडेंट है और दुकान जब तक पिताजी है तो उन्हीं का तो मालिक ही चलेगा तो बीच-बीच में किस तरह से दुकान को चलाना है वो थोड़ा डिफरेंस ऑफ ओपिनियन हो जाता है डिप्रेसो जाता है तो मुझे कहता है कि मैं लॉन्ग बाइक टूर पे चला जाता हूं कहीं हिमालय चला जाएगा वो कभी हिमाचल चला जाएगा कहीं वो कब कहां चला जाएगा और जाकर के फोटोग्राफी वगैरह करता है तो बोलता है कि मेरा मन बड़ा शांत हो जाता है इस तरह से झगड़ा ऐसा कुछ जद होता है तो तो दिस इज अ गुड वे ऑफ रिलैक्सिंग योर माइंड उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है किंतु यह देखो कि जब तक आप अपने मन को रिलैक्स करने के लिए एक्सटर्नल इंस्ट्रूमेंट के ऊपर में डिपेंड करते हो तब तक हमेशा ऐसा होता रहेगा कि जब घर वापस आओगे कुछ दिन के बाद में फिर से झगड़ा होगा कुछ दिन के बाद में झगड़ा होने के बाद में फिर से डिप्रेसो जाओगे या तो फिर क्रोधित हो जाओगे और फिर से लंबी ट्रिप प जाना होगा यह संसार चक्र चलता ही रहेगा संसार चक्र को तो छोड़ना है यह खुशी यह डिप्रेशन का सॉल्यूशन यह रेमेडी भीतर में से खोजना है जब तक भीतर में से रेमेडी नहीं मिलती है जब तक आप अपने मन को डिसिप्लिन करना नहीं सीखते हैं यह संसार चक्र के भीतर में इस चक्की में पड़कर बार-बार पीसे जाओगे इसका कोई सोल्यूशन नहीं है यह मेरे पास में लड़का आता है इतनी बातें भी करता है किंतु उसने अभी तक मेरे मुझे ऐसा कभी पूछा नहीं कि हां आप बताइए कि क्या सोल्यूशन है अबरा ऐसा है कि जब तक कोई मुझे पूछेगा नहीं तब तक मैं बोलूंगा नहीं वो बोलता है मैं हिमाचल जाके ये फोटो पाड़ा ये फोटो तो मैं वो फोटो देखता हूं और बड़ा हंसी खुशी मजाक करते हैं फिर क्या किस तरह से रहे कहां रात बिताई किस तरह की वहां पर धर्मशाला है किस तरह का नेचुरल सीन है वही सब बातें चलती है तो फिर वो अभी देखो कि बैक ऑफ हिज माइंड उसको पता है अदर वाइज तो मेरे पास आता नहीं आश्रम में आता नहीं साधु के पास आता नहीं सिर्फ मेरे पास नहीं बाकी सब साधुओं से भी उसका बड़ा अच्छा परिचय है तो आश्रम में आता नहीं साधुओं के पास आता नहीं यदि उसको यह पता ना होता कि सही सही रेमेडी यहां पे है किंतु वो रेमेडी फिर पता है किंतु उसके ऊपर में एक्शन लेने का साहस नहीं है क्योंकि हम उसको ऐसी कोई बात कर देंगे जो कि वो एक्सेप्ट नहीं कर पाएंगे या तो फिर उसके ऊपर में एक्शन नहीं ले पाएगा तो आता है किंतु वो प्रश्न कभी पूछता नहीं है कि इसका क्या सोल्यूशन है वो तो देखिए कि ये जगत है जगत में हमारे जितनी भी समस्याएं हैं सबका समाधान मन के भीतर मन के पार जाकर के आत्मन के पास जाकर के मिल जाता है किंतु जैसे कि हमारा कल भी डिस्कशन हो रहा था इतनी बात सुनने के बाद में भी यदि आप यह कहेंगे कि अरे ये तो मैं पता है चलो मैंने मैंने सुन लिया मैंने जान लिया किंतु अभ एक्शन कैसे ले इसके ऊपर में मैंने मुझे इसका फल क्यों नहीं दिख रहा तो इसके लिए तो फिर हमको प्रतिदिन बैठ कर के थोड़ा सा जब ध्यान थोड़ा सा पाठ वगैरह करना ही पड़ेगा मेरे पास में यदि कोई ऐसा प्रश्न करेगा कि क्या इसका कोई सहज उपाय नहीं है जैसे अभी कोई कोई कुछ दिन पहले ही एक लड़का आ करके वो ऐसे कंप्यूटर इंजीनियर है वो बता रहा पूछ रहा था कि जब करने को बैठता है किंतु 15-20 मिनट से आगे ज्यादा नहीं हो पाता मैंने कहा देखो तुम एक हाथ में कथामृत लो एक हाथ से जप करो ये फिर जैसे ही जप में से मन निकले उसको कान पकड़ कर के कथामृत में बिठा दो और कथामृत पढ़ते पढ़ते थोड़ी देर के बाद देखोगे कि मन कैसा एकाग्र हो जाएगा ऑटोमेटिक जप की ओर चला जाएगा फिर जप करते करते फिर से मन में यदि विक्षेप पड़े तो फिर उसको कथामृत में बिठा दो दोनों साथ-साथ में रखो सामने कथामृत खुला हो और एक हाथ से माला से या उंगली से जैसे आप जप करते हैं वो जप करते रहो तो यह दोनों के भीतर में ही घूमेगा इससे बाहर नहीं जाएगा कथामृत है मन को एकाग्र करने के लिए एकाग्र होने के बाद में जप करना बड़ा ही सहज हो जाता है और जप आप 20 मिनट 30 मिनट से ज्यादा नहीं कर पाएंगे जैसे मैं आजकल क्या करता हूं वो youtube1 फिर कभी-कभी मैं जप करता हूं या ध्यान करता हूं तो कहां पे पे समय चला जाता है वो वो कभी ज्यादातर समय यह जो स्वामी जी कहते हैं ना कि कान है किंतु मन नहीं है तो आपको सुनाई नहीं देगा तो वैसे ही कभी-कभी मैं सुन सुन पाता हूं कभी-कभी नहीं सुन पाता हालांकि व चल रहा है उसके बावजूद भी क्योंकि मन फिर वहां से लेकर के कहीं वह उर्ध्व अवस्था में चला गया है किंतु इसका फायदा यह है कि जब वो नीचे में आएगा तो कथामृत के लेवल तक ही आएगा उससे नीचे नहीं जाएगा तो ये ये सब ट्रिक थोड़ा सा अजमाना पड़ता है थोड़ा सा ट्रिक्स जब तक अपना मन का डिसिप्लिन इतना परफेक्ट ना हो जाए कि आप जब करने को बैठे तो जब ही चलेगा फिर और कुछ नहीं आएगा वो डिसिप्लिन मेरा भी नहीं आया तो ये सब ट्रिक्स मैंने सब डेवलप की है कुछ-कुछ तो इसका सहाय लेकर के यहां से मन निकले तो वहां पे और वहां से मन निकले तो यहां पे ये एक के बाद एक वो आपको अपने हाथ में रखना है जैसे मां दुर्गा के आठ हाथ है और आठों हाथ में एक शस्त्र है तो वैसे ही सब अस्त्र शस्त्र अपने सामने बिछा करके रखने है जब आप जब ध्यान करने को बैठे तो ये नहीं तो यह यह नहीं तो यह कभी स्टडी करना है तो कभी कोई प्रवचन सुनना है मैं वैसा प्रवचन सुनता रहता हूं क्योंकि मुझे इस तरह से मैं अपना खुद का कभी नहीं सुनता किंतु ये बाकी य सुहितानंद जी है बलभद्रानंद जी है सर्वप्रिया नंद जी है इन लोगों को मैं सुनता रहता हूं बड़ा अच्छा लगता है तो यह एक घंटा कहां चला गया पता नहीं चलता तो यह एक के बाद एक रेमेडीज है टू कीप अवर माइंड फोकस सुबह को शाम को अपने खुद के लिए सेल्फ केयर कहते हैं ना आजकल ये पूरा सेल्फ केयर वेलनेस इंडस्ट्री चला है अभी आजकल सिर्फ योगा नहीं कहते आज कहते हैं कि योगा एंड वेलनेस माने कोई कोई बोलेगा कि मेरे अभी मेरा ऐसा फिजिकल फिटनेस नहीं है कि मैं आसन प्राणायाम कर पाऊं तो अभी इन लोगों को तो क्या है कि वो पैसा कमाना है ना कैसे भी करके तो अभी एक एक्सटेंशन दे दिया है वेलनेस का वहां प और भी बहुत स्पा होता है कोई फिर वो मसाज होता है और फिर हमने वो अच्छे-अच्छे प्रवचन वगैरह होते हैं वो मोटिवेशनल स्पीकर्स को बुलाते हैं तो बहुत कुछ यह लोग ट्रिक्स अजमा हैं कि आप योगासन प्राणायाम वगैरह नहीं कर पाए मेडिटेशन नहीं कर पाए तो वी हैव अदर वेज यू कैन स्पेंड योर मनी अपॉन तो यहां पे भी यह हमको यह जब ध्यान एंड सेल्फ केर मने सब तरह से जब हम अपने लिए 1 घंटा दो घंटा समय निकाले सब तरह से हम लोग अपने को एंगेज रख पाए ऐसा करना है तो देखेंगे कि धीरे-धीरे करके मन की एकाग्रता कंसंट्रेशन अपना डिसिप्लिन इतना बढ़ता जाएगा कि कुछ समय के बाद में अनायास सहज ध्यान होना शुरू हो जाएगा और यह अवस्था लाना कोई बहुत बड़ा डिफिकल्ट नहीं है कथामृत में ठाकुर की मां की स्वामी जी की बातों में वो पावर है कि थोड़ा बहुत भी हम पसू करेंगे थोड़ा बहुत भी हम ध्यान दे कर के पढ़ेंगे सुनेंगे उनकी बातों को तो फटाफट करके अपना मन संस्कारों को काटना शुरू कर देता है वो ठाकुर कहते हैं ना कली में अन्नगरामम नहीं ये मनोमय आनंदमय प्राणम विज्ञान मय यह सब कोष है यह सब कोष अपने इस तरह के आनंदमय शरीर नहीं है अ विज्ञान मय शरीर नहीं है अनमय शरीर है तो अनमय कोश का ये अनमय शरीर इसकी तपस्या की कैपेसिटी मन को डिसिप्लिन करने की कैपेसिटी वो मिनिमम है बचपन से हमने सीखा नहीं है तो यदि बचपन से नहीं सीखा बड़ी उम्र में सीखने की शुरुआत की है तो हमको यह सब मेथड्स यूज करनी है और फिर जैसे मैं कभी-कभी किसी के साथ में डिस्कस करता रहता हूं कि यह जो मॉडर्न एजुकेशन सिस्टम को अभी राम मंदिर बन गया है लेटस थिंक वन स्टेप अहेड ये भारतीय करण करो एजुकेशन का योगा और प्राणायाम पहले ही स्टैंडर्ड से सिखाना शुरू करो स्वामी जी ने क्या कहा यदि मेरा एजुकेशन मेरे हाथ में होता तो मैं कहीं ये फिजिक्स मैथमेटिक्स और लैंग्वेज नहीं सीखता पहले मैं मन को एकाग्र करना सीखता फिर इस एकाग्र मन से जो भी विषय में सीखना चाहता हूं उसको को मैं फट फट करके चुटकी बजाते बजाते उसको मैं आयत कर लूंगा उसमें मैं एक्सपर्ट हो जाऊंगा तो पहले स्टैंडर्ड से केजी ये सीनियर केजी लोअर केजी वगैरह जो भी है फर्स्ट स्टैंडर्ड सेकंड स्टैंडर्ड ये एलिमेंट्री स्कूल है मन को एकाग्र करना सिखाओ योगासन प्राणायाम सिखाओ उसके बाद में ये जो लड़के हाई स्कूल में आएंगे उनको जो विषय देंगे उस विषय में वे लोग महारत हासिल कर देंगे ये इंफॉर्मेशन कलेक्ट करना कोई ह्यूमन एम ऑब्जेक्टिव नहीं है ह्यूमन जर्नी जो है यह ज्ञान को प्रकट करना है बाहर से इंफॉर्मेशन भीतर में नहीं डालना भीतर में जो ज्ञान ऑलरेडी है उसको मेनिफेस्ट करना है चेंज द ऑब्जेक्टिव ऑफ अवर एजुकेशन सिस्टम यह जैसे-जैसे ज्ञान मेनिफेस्ट होगा आप इमेजिन करके देख लीजिए कि आज हम मॉडर्न एजुकेशन की प्रोडक्ट है ग्रेजुएशन करने के बाद में बंच ऑफ थॉट्स आर रनिंग रायोस इन अवर माइंड देखोगे कि ग्रेजुएशन करने के बाद क्या हुआ कुछ इधर-उधर से कलेक्ट किए हुए विचार है मन के भीतर में वो रायोट ंग कर रहे हैं हल्लागुल्ला मचा रहे हैं किंतु यदि इस भारतीय परंपरा के अनुसार ज्ञान का मेनिफेस्टेशन यदि एजुकेशन का टारगेट हो एजुकेशन का एम हो तो उस एजुकेशन सिस्टम से ग्रेजुएट किया हुआ लड़का या लड़की को आप देखेंगे तो आपको पता चल जाएगा चेहरे के ऊपर में कैसा प्रकाश है मन के भीतर में कैसा उत्साह है और उसका प्रेजेंस समाज के लिए आशीर्वाद मय हो जाएगा तो एजुकेशन सिस्टम का थो अप हीवल अप होल करने की जरूरत है क्योंकि इस अवस्था में हम 25 30 साल हो गए हैं हम लोग इस रास्ते की ओर आते हैं इससे पहले क्यूरियोसिटी होती है कभी-कभी किंतु पता है एक रिबेलियस एटीट्यूड भी होता है पिताजी माताजी मंदिर में जाते हैं तो बूढ़े लोग जाएंगे मैं क्यों जाऊंगा मैं तो अभी मेरे मन में अभी इतनी शक्ति है मेरा फिजिकल इतना स्ट्रांग हूं तो क्या एक लियस एटीट्यूड की वजह से हम लोग बहुत सारे लोग इस रास्ते को फॉलो नहीं करते फिर जब मैच्योरिटी थोड़ा आती है थोड़े से धक्के लगते हैं फिर इस डायरेक्शन में आते हैं तो बाय दैट टाइम इट इज टू लेट ग्रेजुएशन हो जाता है माइंड ऑलरेडी एक आपका हो गया है किसी एक डायरेक्शन में फिक्स अभी उसको चेंज कैसे करेंगे तो यहां पर स्वामी जी को जब हम पढ़ते हैं नॉट ओनली कि अपने इंडिविजुअल साधना के बारे में सोचेंगे किंतु ये संग है अपने भक्त है वी शुड थिंक ऑफ ओवर होलिंग या तो फिर स्टार्टिंग अ न्यू वे ऑफ एजुकेटिंग अवर किड्स स्कूल में ना हो पाए तो घर में तो एटलीस्ट अपने बच्चों के साथ में ऐसा कीजिए कि जैसे कि योगासन प्राणायाम जप ध्यान ठाकुर महा स्वामी जी की बातें नॉट ओनली ठाकुर महा स्वामी जी कोई भी धार्मिक लिटरेचर हो उसको पढ़े और अपने जीवन में उसको सही सही उसका उसको उतारे उसका पालन कितना करना वो तो एक भविष्य के ऊपर में है जब उनकी मैच्योरिटी आएगी जब वह एडल्ट होंगे तब तो वोह सब इस रास्ते में जाएंगे कि किस तरह से जो अर्जित किया है धार्मिक ज्ञान उसको अप्लाई करना इंप्लीमेंट करना किंतु एटलीस्ट उनको मिले तो सही जब उसके सामने बच्चा जब बड़ा हो जाता है जब उसके सामने डिसीजन मेकिंग की बारी आ जाती है वो कंप्लीट अनप्रिपेयर्ड होता है तो इसकी बजाय एटलीस्ट ही शुड हैव द नॉलेज ऑफ धर्म भारतीय हिंदू धर्म क्या कहता है ये उसके बैक ऑफ द माइंड तो हो फिर जब डिसीजन मेकिंग की बारी आएगी तो अपने संस्कार के अनुसार वो डिसाइड करेगा कि मुझे क्या करना है क्या मेरी जर्नी किस तरह से किस डायरेक्शन में होनी चाहिए किंतु वो धर्म का बैकअप ही नहीं है धर्म उसके मन में है ही नहीं तो वह किस तरह से डिसाइड करेगा तो एटलीस्ट यदि सामाजिक लेवल प ये ना हो पाए तो इंडिविजुअल पारिवारिक लेवल पर अपने बच्चों को अवश्य इस डायरेक्शन की ओर मोड़े तो आज यही तक कल फिर से मिल ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णा अर्पण मस्तु m