Skip to transcript
ClassesSaradakosh

Sri Ramakrishna's Disciples ·

Swami Akhandananda 14 June 2023 स्मृति कथा : स्वामी अखण्डानन्द लिखित

Transcript

तो आज हम और एक नया किताब इसमें से एक प्रसंग का पाठ करते हैं किताब का नाम है स्मृति कथा और लेखक है स्वामी अखंडानंद जी महाराज अभी अखंडानंद जी महाराज का परिचय तो हम सबको है ही है गंगाधर महाराज बहुत ही छोटे थे जब उम्र में युवावस्था में तब ठाकुर के पास आए थे और स्वामी जी उनको प्रेम से गंजे कहा करते थे गंगा का इंग्लिश में गंगा को गंजन कहते हैं इसलिए गंगाधर महाराज का नाम किया था स्वामी जी उनको कहते थे गंजे तो वही गंगाधर महाराज जिनके साथ में स्वामी जी पूरे भारत की यात्रा करने के लिए उसे समय यदि हमको पता हो तो वर नगर मठ में ठाकुर का ठाकुर ने अपने प्राण त्याग किया थे ठाकुर ने महासमाधि में प्रवेश किया था अगस्त 1886 में उसके बाद में वरंगर मठ की स्थापना हुई और फिर उसे मटकी में सबसे पहले गंगाधर महाराज हमको तो पता है की एक के बाद एक सभी साधु तपस्या करने के लिए निकाल गए थे मठ में से और पूरे या तो भारत का भ्रमण किया था हिमालय में भ्रमण किया था विभिन्न तीर्थ स्थान में गए थे और जहां पे भी वो खुला जंगल लिया तो जमीन पेड़ के नीचे नदी के किनारे का जहां पे भी जगह मिल्क बैठ करके जब ध्यान किया करते थे पुराने भारत में मंदिर आप देखेंगे ब्राह्मण करने को जाएंगे मैंने खुद नर्मदा के किनारे कुछ समय तक भ्रमण किया है और भी जगह पे किया है मुझे पता है भारत में अब जहां पे भी जाएंगे वो मंदिरों का अभाव नहीं राहत और सब जगह पे जागृत देवता होते हैं कहानी पे वो हनुमान जी का मंदिर एन कहानी पे शिवलिंग है कहानी पे वो माताजी का वह छोटा सा ये है स्थान है तो वहां पर देखेंगे की कोई भी एक ब्राह्मण है या साधु है उसे स्थान को छोटे से मंदिर को जागृत करके बैठा हुआ है तो इस तरह से भ्रमण करते-करते ऐसे छोटे-मोटे कितने ही मंदिर और यह सब आते जाएंगे और बड़े-बड़े तीर्थ की तो भारत में कोई कमी ही नहीं है तो हमारे सभी सन्यासी जो है एक के बाद एक भारत में तीर्थ तीर्थ घूमते रहे और फिर जो है ब्रह्मज्ञान की प्रताप जो गंभीर आनंद और प्रशांति जो ध्यान में बैठकर के प्राप्त होती है वो उनको प्राप्त होती रही जहां वे भी गए छोटा सा मंदिर देखा गया तो फिर और कुछ नहीं तो नदी के किनारे ही बैठ करके ध्यान करने लगे तो सबसे पहले अगर मठ में से गंगाधर महाराज गए थे पूरा हिमालय घूमे थे फिर तिब्बत में भी गए थे और फिर वहां से वो स्वामी जी ने उनको वापस बुलाया था कहा था की तुम मेरी हिमालय में जाना चाहता हूं तुम मेरे साथ में चलना तुमने वहां पर बहुत भ्रमण किया है तो तुम ऐसे गाइड गाइड के रूप में चलना साथ में तो गंगाधर महाराज आए वर नगर मठ में स्वामी जी को लेने के लिए उसे समय श्री मां मां शारदा देवी कलकत्ता में आई हुई थी वो घुसुदी बोलकर के एक जगह है वहां पे एक भाड़े के मकान में र रही थी हमको पता है की योगिन महाराज जो है मां की सब व्यवस्था शुरू शुरू में करते थे तो अभी किसी के भक्ति के घर कभी रुकती थी किंतु भक्ति के घर क्या होता था की अभी मां को मां के साथ में फिर मां के यह सब जो रिलेटिव्स है राहु है मंकू है वगैरा भी कभी-कभी आते थे फिर साधु ब्रह्मचारी भी उनके साथ में रहेंगे कोई कोई भक्ति भी जो है वो ठाकुर के गुरु ही भक्ति जो मां को प्रणाम करने के लिए आते थे शुरु-शरोम में तो मां की महिमा बहुत ही कम लोगों को पता थी यह जो स्वामी जी है यह गिरीश होश वगैरा जो एकदम दृढ़ निश्चय मतलब एक निशीथ जो ठाकुर के जो भक्ति थे उनको मां की महिमा पता थी किंतु यह साधारण में ठाकुर जी तरह से पॉपुलर हो गए थे मां का इस तरह से जनसाधारण में तब तक वो जो है नाम नहीं हुआ था बहुत कम लोग जो मां को प्रणाम करने के लिए आते थे किंतु आते थे तो इसीलिए किसी के घर रहना कभी-कभी मास्टर महाशय के घर में कभी वो बलरामबाबू के घर में तो सब समय संभव नहीं होता था तो कभी-कभी क्या करते थे योगिन महाराज कहानी से भी पैसों का जुगाड़ करके जब मां आएगी कुछ दोनों के लिए कोलकाता तो कहानी पे एक घर को भाड़े पे रख करके वे लोग मां के रहने की व्यवस्था करते थे तो ऐसा मां उसे समय घुसुदी बोल करके कोलकाता में एक जगह है वहां पे र रही थी तो स्वामी जी और गंगाधर महाराज मां को प्रणाम करने के लिए गए मां का आशीर्वाद लेने के लिए की स्वामी जी ने निश्चय किया था की वो हिमालय में जाएंगे तपस्या करेंगे और गंगाधर महाराज को साथ में ले जाएंगे तो जब उन्होंने मां को प्रणाम किया तब मैन गंगाधर महाराज को कहा था है की देखो मेरे प्राण का समस्त धन जो अमर प्राणी धुन नरेंद्र मां के प्राण का धन था मां का प्राण था नरेंद्र तो मैन कहा की अमर प्राणी धुन तो मां के दीक्षित मेरे जो मेरा जो प्राण है वो तुमको देती हूं तुम नरेंद्र की अच्छे से संभल रखना तुम जो है भिक्षा करके नरेंद्र को खिलाना अभी मां ऐसा तो नहीं रहेगी की मतलब कोई फेवरेट है या कोई फेवरेट नहीं है किंतु क्या है मार्केट तो लिए सभी समाज है किंतु नरेंद्र एक विशिष्ट स्थान था ठाकुर के और मां के हृदय में वो हमको इस बात से पता चला है और नरेंद्र का स्वामी जी का गंगाधर महाराज के ऊपर में कितना दृढ़ भरोसा था कितनी आशा थी उनसे वो भी हमको पता है बाद में जब स्वामी जी अमेरिका गए और जीव ज्ञान से शिवसेवा या तो फिर ये प्रैक्टिकल वेदांत वह सब बातें उन्होंने करनी शुरुवात की तब बहुत सारे स्वामी जी के कुछ-कुछ गुरु भाई थे उनके मां में शुरू में कुछ अल्प समय के लिए यह संदेह अवश्य प्रगति हुआ था की क्या स्वामी जी यह जो सब बातें कर रहे हैं वो ठाकुर के उपदेश के अनुसार है या फिर स्वामी जी अपने हिसाब से कोई नई बात कर रहे हैं ठाकुर ने तो ऐसा नहीं कहा की लोगों के कल्याण के लिए रिलीफ एक्टिविटी स्कूल हॉस्पिटल वगैरा बनाएं ठाकुर ने तो कहा है की काली मंदिर में जाएंगे और कालीघाट कोलकाता में कालीघाट है तो वहां महाकाली के दर्शन करने के लिए जाएंगे तो क्या आप पहले बाहर में जो भिखारी बैठे हैं उनको वो चंदा देने के लिए दान देने के लिए वो अब व्यस्त रहेंगे की कैसे भी करके धक्का मुक्की करके पहले मां का दर्शन कर लो फिर बाहर आकर के भिखारी को जो देना है दान वो देते रहो पहले ईश्वर प्रताप करो फिर जगत कल्याण के बड़े में यहां तो स्वामी जी वो उल्टा दिए है पूरा मामला पहले जगत कल्याण फिर बाद में ईश्वर प्रताप एक्चुअली स्वामी जी ने जो कहा है ये कर्मयोग ऐसे साधना ऐसे गुरु अगर आशीर्वाद नहीं इस साधना तो फिर ये पूरा एक फिलोसॉफिकल डिबेट है जो की बाद में सभी गुरु भाइयों के मां में क्लियर हो गया था किंतु शुरू में जब किसके किसी के मां में ये संदेह था की यह कर्मयोग का आरंभ ईश्वर दर्शन से पहले करना चाहिए की नहीं उसे समय गंगाधर महाराज जो है सर्वप्रथम स्वामी जी का उपदेश ग्रहण करके यही पे हमारे गुजरात में वो जो गरीब बच्चों के लिए पाठशाला वगैरा आराम करने का वो उन्होंने आरंभ किया था और यही से उन्होंने सेवा का जो कार्य जो है स्वामी जी का सर्वप्रथम आपको पता है की सर्वप्रथम सोसाइटी मतलब क्या हम हमारा रामकृष्ण मिशन तो एक ऑर्गेनाइज इंस्टिट्यूट है तो उसको एक ऑफिशल एक्ट के अंदर में जिसको कहते हैं वो उसके अंदर में हम लोग सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट उसके अंदर में हम लोग रजिस्टर हैं तो सबसे पहले रजिस्टर्ड मठ कौन नहीं था वह बेलूर मठ नहीं था वह का वेदांत सोसाइटी तो वैसे ही सबसे पहले सेवा कार्य कहां पर स्टार्ट हुआ रामकृष्ण मिशन का तो यही पे गुजरात में तो इसके पीछे गंगाधर महाराज की प्रेरणा और स्वामी जी के प्रति श्रद्धा भक्ति थे तो अभी यही गंगाधर महाराज यही हमारे अखंडानंद जी महाराज उन्होंने अपने जीवन के आखिरी समय में एक अपनी अपनी खुद की स्मृति का था लिखी अपने हाथों से लिखी यह पहले बायोग्राफी है ऑटो बायोग्राफी जिसको कहेंगे अपने ऑर्डर में लिखी गई है तो उनकी ये ऑटो बायोग्राफी जिसमें बहुत सुंदर सुंदर और ये प्रसंग है सबसे पहले प्रश्न जो है की गंगाधर महाराज का ठाकुर के साथ में प्रथम दर्शन जैसे वह हमने कथामृत में प्रथम दर्शन पड़ा था ना की मास्टर महाशय आते हैं ठाकुर के साथ में बात करते हैं वह सबसे पहले उनकी मां में क्या आया था जैसे सबसे पहले ठाकुर का दर्शन किया तो उनको लगा की जहां पर भगवान सुखदेव स्वयं जैसे वह भागवत कथा सुना रहे हैं क्या इसी तरह से ठाकुर जो है वो अपनी छोटी खाट पर बैठकर के वो ईश्वर कथा का वह जो है वो ये उपदेश दे रहे हैं तो मास्टर महाशय ने तो बहुत ही सुमधुर ललितायपूर्ण भाषा में कथामृत लिखा है गंगाधर महाराज की जो भाषा है कथामृत जितनी मैं शायद नहीं है और कथामृत में जितनी डिटेल है ठाकुर के इतने सारे उद्देश्यों को मास्टर महाशय ने एक के बाद एक स्मरण करके लिखा है वहां गंगाधर महाराज कुछ-कुछ उपदेशों का ही यहां पे संकलन करते हैं ठाकुर की कुछ ही बटन का संकलन करते हैं किंतु जो यहां पे जो कहा गया है गंगाधर महाराज ने उनकी भाषा में जो लिखा है जो उपदेशों का जो संग्रह है वह उसमें भी एक चीज हमको देखने को मिलती है की ठाकुर का अपने यह जो लड़के जो त्यागी लड़के त्यागी शिष्य उनके प्रति कितना प्रेम था कितना स्नेहा था कितना भालोबासा था तो ये भालोबाशा के बंधन में ही उन्होंने सबको ये लड़कों को पकड़ के रखा था और इसी के इसी से उन्हें ठाकुर बीच-बीच में कहते हैं की मैं इनको जो है वो सीधा सदा खाना सिर्फ नहीं देता बीच-बीच में अचार वगैरा भी खिलता हूं जिससे की उन लोगों को खाने का आनंद आए बहुत ही सात्विक खाना खाने से क्या होता है की फिर हमको खाने पे रुचि नहीं आई ज्यादा नहीं खाता हैं हां उसकी जैसे जिनकी उम्र हो गई है फिर वे लोग जो है वो दलिया है या ओटी से वगैरा खाता हैं जिसमें मसाला या तेल नहीं डालते मैं खुद यहां पे मेरा रूटीन है की यहां पे मैं 7:00 बजे ए जाता हूं पब्लिकेशन डिपार्मेंट में अपने से थोड़ा सा ओट्स बना देता हूं और फिर उसको खाता हूं उसमें ना ही वो मिर्च डालता हूं ना ही नमक डालता हूं ना ही तेल डालता हूं तो क्या है की ऐसा ही प्रैक्टिस बनाया है मैंने तो जो भी है अभी बूढ़े लोगों का खाना हो गया बच्चों को तो इस तरह से नहीं चाहिए उनको तो जैसे तले बजा है समोसा है पिज़्ज़ा है आजकल तो ऐसा वो कुछ मसाला वाला खाना सब बच्चों को चाहिए जो ठाकुर भी कहते थे की आ मैं सिर्फ उनको सीधा सदा खाना नहीं बीच-बीच में ये मसाला वाला भी खाना देता हूं तो ठाकुर बहुत हंसी मजाक करके प्रेम भालोबासा से इन बच्चों को पकड़ के रखें थे तो ये कुछ अल्प कुछ प्रसंग है उसमें से एक प्रसंग का पार्ट हम आज करते हैं प्रथम दर्शन और हम क्या करेंगे की अलग-अलग किताबें में से मेरे पास में अपने ऑर्डर की बहुत साड़ी किताबें का संग्रह है तो सभी किताबें में से एक-एक प्रसंग का मैन टर्न बाय टर्न पाठ करते जाएंगे थोड़ा सा चर्चा करते जाएंगे जिससे की क्या हो की एक हमको डाइवर्सिटी जो है एक नवीन एक न्यूनेस कहेंगे की डाइवर्सिटी जैसा हमको मिलता रहे तो आज खानदान जी महाराज का लिखित ऑटोबायोग्राफी जिसका नाम है स्मृति कथा महाराज जी लिखने हैं प्रथम दर्शन कल देयर साल है 1883 या 84 समय है गर्मी का लोड रिपनर आमले एवं कोलकाता अंतर्जातीय प्रदर्शनी पुर्बे ई प्रथम दक्षिणेश्वरी जाए महाराज दक्षिणी शोर में पब्लिक सर्वप्रथम कब गए थे तो लॉर्ड रिपन उसे समय इंडिया के वाइस रोहित थे और इसी समय वहां पर कलकत्ता इंटरनेशनल एग्जीबिशन वहां पर लगाया गया था उससे थोड़ा सा पहले महाराज जो है गंगाधर महाराज दक्षिणेश्वर में पढ़ा राहत है ठाकुर के पास आगमन हुआ था ठाकुर ठाकुर चले जाते थे समाधि में चले जाते थे तो वो धोती कपड़ा वस्त्र कहां पे चला जाता था पता नहीं चला था और दिगंबर होकर के घूमते थे और वहां पर जो लोग खड़े हैं ना ही उनको लज्जा होती थी ना ही ठाकुर को ठाकुर को तो होगी ही नहीं भाव में चले गए हैं मां काली के गॉड में बैठे हैं जैसे छोटा बच्चा बिल्कुल शिशु है तो शिशु कैसे वो दिगंबर अवस्था में चारों और मां की चारों और घूमता है बांग्लादेश दोनों पैरों से जो चला है बच्चा इस तरह से वो छोटा बच्चा कैसे हो अपनी मां की चारों और घूमता है वैसे ही वह ठाकुर शिशु हो करके मां काली के आसपास में वो खेलने थे ठाकुर को तो ग जा होगी ही नहीं किंतु फिर बच्चों वयस्क रोड या तो फिर यह जो यंग ये लड़के जो बैठने थे वो भगत उनके उनको भी लज्जा नहीं होती थी क्योंकि क्या है की उसे समय इतना मैन दिव्या पवित्र एक प्रचंड आध्यात्मिक जो है प्रवाह बेहतर था उसे कमरे में की वो लज्जा घृणा भाई ठाकुर कहते है ना की लज्जा घृणय तीन हफ्ते नहीं तो लज्जा घृणा और भाई कहां पे चला जाता था और कहां मां ऐश्वर्या आवेश में डब जाता था वो का नहीं सकते तो इसीलिए इसके बाद में के जो प्रसंग है टिकट ठाकुर जो है वो दिगंबर हो करके वहां पे बैठने हैं और महाराज को उपदेश देते हैं तो इसलिए पहले ही महाराज ने बोल दिया है की 15 16 साल की वजह थी उम्र थी और दिगंबर होने में थोड़ा सा भी मुझे ग जा नहीं होती थी ठाकुर कच्चे डायनामि प्रथम जय अच्छा वह पता है ना की यह सब चीज आपको कथामृत में नहीं मिलेगी वह ठाकुर जब ये भक्तों को जब उपदेश देते थे मास्टर महाशय जैसे भक्तों को और लड़कों को जब उपदेश देते थे बिल्कुल एकदम डिफरेंट है मास्टर महाशय को जो उपदेश दिया है उनको लिखने के लिए जब भक्तों को वो क्या है की वेद वेदांत भक्ति वगैरा सब बातें की है किंतु एक सन्यासी के लिए एक प्रज्वलित त्याग एक 100% रिनाउंसिएशन ये जो 100% ब्रह्मचर्य इसका पालनपुर करने के लिए जो शिक्षा उन्होंने त्यागी बच्चों को दी है वो उन्होंने गृहस्तों को नहीं दी क्योंकि ग्रुप तो जो है वो शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाएंगे इसलिए आप देखेंगे की कथामृत का एक स्थान है भक्ति के लिए और यह जो हमारे डायरेक्ट डिसीप्ल जो है त्यागी शिष्य जो है यह 16 वे लोग ठाकुर के बड़े में जो लिखने हैं उसका एक अलग स्थान है सार्थक के लिए कथामृत है लोगों के लिए और साधकों के लिए दोनों के लिए किंतु यह त्यागी सन्यासी जो लिखने हैं उसका सड़क के लिए एक अलग उसमें स्थान है इसमें प्रज्वलित जालंधर त्याग की महिमा का इसमें वर्णन है जैसे अभी ऐसा नहीं है की त्याग के बड़े में पर से मतलब लिटरली त्याग के बड़े में बता रहे हैं किंतु ऐसे छोटे-छोटे वो इस तरह से एक प्रसंग ए जाएंगे इस तरह से एक दो सेंटेंस ऐसे ए जाएंगे जिससे की हमको पता चलेगा की इनके जीवन में अखंडानंद जी के और ठाकुर के जीवन में त्याग से बड़ा और कुछ नहीं है त्यागी इनके लिए सर्वश्रेष्ठ आदर्श है इसीलिए महाराज पहले लिख देते हैं स्मृति कथा के शुरुआत में ही ऐसी स्मृति कथा या तो ऐसी ऑटोबायोग्राफी अपने शायद कभी पड़ी नहीं होगी वहां पे वो ऑथर पहले से ही बोल देता है की उसे समय 16 15 16 साल की उम्र थी जब मैं ठाकुर के पास आया था और दिगंबर होने में थोड़ा सा भी मुझे लज्जा नहीं होती थी ऐसा शुरू में ही उन्होंने बोल दिया तो इसमें त्याग की महिमा प्रतिष्ठित होती है की कम कंचन के प्रति की हमारा जो मां जो है वो धृत होता है उसके प्रति जो आकर्षण होता है उससे कहानी उद्धव उठकर के कहानी ऊपर उठकर के वो ईश्वर के श्रीपाद पद्भमों में इनका मां जो है हमेशा मगन राहत था इसलिए ये छोटी-छोटी चीज उनको कभी परेशान नहीं करती थी वर नगर में है की वह नगर मठ में जो 11 12 लड़के रहते थे त्यागी लड़के ये डायरेक्ट डिसीप्ल तो उनको अभी एक जोड़ी कपड़ा है जो की बाहर जान के समय पहनेगी मठ में जब रहेंगे भीतर में तब तो कभी-कभी कोबिन पहन के रहेंगे कभी कभी बिना को ओपन के भी पूरे दिगंबर हो करके रहेंगे क्योंकि इनका मां जो है वो सांसारिक यह सब चीज हैं इंद्रियों की यह सब भोग जो है इंद्रियों के जो आकर्षण जो है यह बाकी है सांसारिक चीज जो है इससे कहानी ऊपर उठकर के या तो फिर दिन रात वहां पर वेदांत की चर्चा हो रही है या तो दिन रात जब ध्यान चल रहा है है वह जो सड़क बैठता है वैसे ही वरंगर मठ में यह जो साधना की धूनी जो प्रज्वलित हुई थी उसे ध्वनि प्रज्वलित धूनी में इन लोगों प्रति जो आकर्षण है जो वासना एक कहानी भस्म हो गई थी कहानी उन्होंने वो स्वाहा हो गई थी तो इसलिए वो दिगंबर होकर के मठ में रहते थे और कभी कोई बाहर से आता था तो पहले ही कोई सूचना दे देता अरे कोई देवोते ए रहा है तो फिर कैसे भी करके कॉपी पहन के या ऐसा कुछ वस्त्र जो है अपनी कमर पे लगा करके बैठने थे किंतु आपस में रहते थे दिगंबर तो इसीलिए महाराज जी यहां पे पहले का देता है किंतु टेक्स बहुत हो ना ठाकुर जी दिन ठाकुर के पास में मैं गया पहले बार ठाकुर ने सहस्य वादन हंसते हंसते उनको बड़े ही प्रेम पूर्वक आमंत्रण दिया अपने पास में बिताया आधार सत्कारपूर्वक और बड़े ही प्रेम से पूछा क्या तुमने मुझे पहले कभी देखा था उत्तर बड़ी ते देखें चिल्ला गंगाधर महाराज ने कहा की हां मैं जब बहुत छोटा था तब दिन बस के घर पर जहां पर आए थे मैंने आपको देखा था अच्छा यहां पर जो है ठाकुर महाराज ने एक बात हां ना है यहां पे स्वामी अद्वैतानंद गोपाल दादा बडो गोपाल जाके मैंने सवाई बोलते हैं बडो गोपाल स्वामी अद्वैतानंद ठाकुर महाराज जो है गोपाल दादा या तो फिर जिनको सब बडो गोपाल करके बुलेट थे वो ठाकुर के पास में उसे समय रहते थे अभी वहां पे वो एक दूसरा भी एक गोपाल करके देवोते था जिसका नाम स्वामी जी ने दिया था गुटकू गोपाल गुटको अर्थात की वो अचानक कहानी से चले आते थे और अचानक चले जाते थे वो अचानक आना अचानक जाना बिना किसी मतलब अभी बैठे हैं और अभी पता चला की बोला की गोपाल कहां है तो पता चला गया है तो वो खुद को गोपाल नाम स्वामीजी ने उनको दिया था और इनका भी नाम गोपाल था दूसरे गोपाल नाम के भक्ति हैं तो इनको नाम दिया था ये सब कारनामा करने में वो हमारे स्वामी जी सर्वप्रथम बहुत सारे लोगों को नाम उन्होंने दिया था गंगाधर महाराज को गंजे करते थे तो उसे समय यह बुध गोपाल या तो फिर गोपाल दादा ठाकुर के पास में ठेके दे के ठाकुर हंसते-हंसते बोलना ओ ओ सोनू ए बोल्शे की ना खूब केले बेले देखेचिलो उहू एयरबार चले मैन ठाकुर ने हंसते हंसते गोपाल दादा को बुलाया और कहा अरे सुनो सुनो ये बच्चा क्या कहता है बच्चा कहता है मैं जब बहुत छोटा था तब आपको देखा था अभी ये बच्चा है और फिर कहता है की मैं बच्चा और भी ज्यादा बच्चा था तब आपको देखा था ठाकुर हस्त करके मजाक करके कहते हैं ठाकुर की उम्र उसे समय 50 के आसपास होगी ये महाराज की उम्र है 15 16 साल तो महाराज के सामने तो ठाकुर के सामने तो गंगाधर महाराज बिल्कुल बच्चे जैसे ही थे 15-16 साल के हैं तो वो जब ऐसा कहेंगे की मैं और भी छोटा बच्चा था तब आपको देखा था तब ठाकुर को ये मत सुन करके हंसी ए गई देखिए कैसा पवित्र सुंदर एक मधुरिमा एक वातावरण बंता है इसे हंसी मजाक सुनकर के हमको भी लगता है की चलो बहुत ज्यादा पढ़े वरना तो सिर्फ ड्राई फिलासफी ही चलते रहते जैसे मास्टर महाशय का देखेंगे ये कटहनुत में इतना सर फिलासफी है उसमें भारत हुआ हालांकि उसको भी थोड़ा सा माइल्ड कर दिया गया है उपमा देकर के जैसे भी जब भी ठाकुर कुछ कहेंगे जैसे ब्रह्मा और शक्ति अभेद है तो साथ-साथ में ही ठाकुर कहेंगे की जैसे समुद्र और उसकी लहरिया समुद्र का पानी जो है वो शांत राहत है तो समुद्र राहत है जब वो छल कूद करता है लहरों के रूप में तब वो लहरें भी वही पानी है और शांत होकर के समुद्र रहा है बेचैन बागी भी पानी है तो वैसे ब्रह्मा और शक्ति अभेद है जब वो निष्क्रिय होता है तो ब्रह्मा और सक्रिय होता है तो शक्ति तो इस तरह से ठाकुर जो है उपदेश और उपमा उपदेश और उपमा इस तरह से सतत चलते हैं तथा उनके यहां पर जो है इन लोगों की जो ठाकुर के बड़े में बातें पढ़ेंगे तो उपदेश तो होंगे ही होंगे उसमें तो कोई प्रश्न ही नहीं है किंतु यह हंसी मजाक ये फिर बात बात में ही इस तरह की कोई गहन आध्यात्मिक ब्रह्म ज्ञान की बातें कर देना जो की सीधे हमारे हृदय में चली जाए ये इनकी राइटिंग्स में जो की डायरेक्ट डिसएबल ठाकुर के बड़े में लिखने हैं या बोलते हैं इसमें सबसे ज्यादा हमको ये देखने को मिलता है आगे महाराज लिखने हैं तार कथाएं शेर था की ठाकुर ने कहा उसे रात को की भाई तुम रुक जो आज को इतना दूर से आए हो तो उनकी बात सुनकर के गंगाधर महाराज जो है उसे दिन रात को दक्षिणी शोर में ही रहे हैं काली घर और विष्णु घर प्रणाम करें पंचवटी थे चीते बोले थोड़ा सा समय हुआ तो ठाकुर ने कहा की जा करके पंचवटी और विष्णु घर जहां पर राधा कांत का मंदिर है उसको ठाकुर विष्णु घर कहते थे वहां पर जो और प्रणाम करके ए जो पंचवटी ठेके प्रणाम करके पंचवटी में जो पंचवटी ठेके ठाकुर घर प्राय संघर्ष में फिर यहां पर महाराज ने यह नहीं लिखा है की पंचवटी जाकर के क्या करने को बोला है मैं हम लोग अनुमान करके का सकते हैं की ठाकुर ने या तो उनको जाप करने को बोला होगा या तो फिर ये गंगाधर मारा खुद बाद में लिखने हैं की किस तरह से वो गंगा के पानी से वो अपना एन पकाते थे और अपना एन खाता थे और कहानी से अब स्वापक जिसको ब्राह्मण लोग कहते हैं की अपना खुद का पकाया अन्ना ही ग्रहण करना और कुछ ग्रहण नहीं करना ऐसे ये गंगाधर महाराज का नियम था तो शायद उन्होंने पंचवटी में गंगा के पानी से वो खाना जो धन है धन ले गए होंगे तो उसमें से कुछ खाना बनाया होगा अपना अन्य पकाया होगा या जब ध्यान किया होगा यह हम अनुमान कर सकते हैं तो जो भी है संदर समय फायर आशिक पंचवटी से संध्या के समय ठाकुर के घर में वो फिर से उपस्थित हुए नौबत खाना है मोहब्बत बजे उठ लो जैसे ही वो गंगाधर महाराज ठाकुर के कमरे में वापस आए तो उसे समय कैसा था की कालीबाड़ी में दो नवंबर खाने थे और उसे नंबट खानों में जैसे संध्या आरती का जब आयोजन समय शुरू होता है तब वहां पे मोहब्बत बचत है नौबत के रूप में ये शहनाई वगैरा जो है वो बस्ती है और इतना सुंदर उसे समय दृश्य और वातावरण खड़ा होता है मुझे पता है यह बात क्योंकि ब्लू मठ में दुर्गा पूजा के समय बिल्कुल सुबह से देखेंगे किस तरह से वो नौबत जैसा बनाते हैं वो मैन वो मंच जैसा लंबा और उसमें अभी तो वहां पे तो कोई मैन म्यूजिशियन या तो कोई किसी कोई गायक या तो इस तरह से किसी को नहीं बिठाते जैसे इस समय तो ये स्पीकर वगैरा नहीं थे तो यह जो चिनाई बजाने वाले वहां पर रहते ही थे मंदिर में और वे लोग शहनाई बजाते थे और किंतु बेलूर मठ में मैंने देखा की वो माइक जो है वो रिकॉर्ड बजा देते हैं शाइन का और सुंदर संध्या सुबह-सुबह जो है अर्ली मॉर्निंग जब मठ में वो जो शहनाई बजती है और दुर्गा पूजा के समय तो इतना सुंदर पवित्र वातावरण खड़ा होता है तो हम लोग अनुमान करके का सकते हैं की जब ये जो रिकॉर्ड किया हुआ जो माइक सुनते हैं वो शहनाई की आवाज उसने जो हमको इतना आनंद होता है इतना मां को शांति मिलती है तो जब सही सही कोई कलाकार जो है कोई गायब जो है या जो शहनाई बजाने वाले को क्या कहते हैं मुझे पता नहीं तो वो जो शहनाई बजाने वाले जो है वो अपने नियमित रूप से प्रतिदिन वे लोग श्रीनई बजाते होंगे तब कितना आनंद आता होगा क्योंकि क्या है की रिकॉर्ड किया हुआ और जो कोई जो गायक है या जो कोई आर्टिस्ट जो है वो अपने से शहनाई बजना है उसमें जो आसमान जमीन का फर्क है वो जो अपने से जो बजाते हैं वे लोग क्या कर सकते हैं उसमें वह डाइवर्सिटी लेट हैं उसमें एक के बाद एक अलग-अलग वह चेंज करते रहते हैं उसके राज और सूट जबकि वो रिकॉर्ड है तो अपने रिकॉर्ड के हिसाब से बचत ही रहेगा तो कोई जीवंत व्यक्ति की सहाना शहनाई सुना लाइव और रिकॉर्ड सुना इन दोनों में बड़ा फर्क है तो जो भी है बेलूर मठ में हमको सुबह ये रिकॉर्ड किया हुआ शहनाई सुनकर के आनंद आता था जो उससे कहानी ज्यादा आनंद हमको दक्षिणी शोर में आता जहां पे वो जो है जीवन व्यक्ति सब समय ये संध्या के समय सुबह को और शाम को शहनाई बजाते थे तो उसे समय आरती का आयोजन होने की शुरुआत हो गई शहनाई बजाने लगी तार पर अमित ठाकरे घरेलू जैसे गंगाधर महाराज ने जी तरह से ठाकुर को देखा था मास्टर महाषाश ने भी ऐसे ही देखा था महाराज लिखने हैं की जैसे ही मैं ठाकुर के घर में प्रवेश करने को गया देखा की वहां पे धूप दिया हुआ था और थूक का जो धुआं था इतना ज्यादा था की ठाकुर उसे धुएं में दिखते भी नहीं थे मास्टर महाशय भी जब आए थे ठाकुर के कमरे में वो सबसे पहले बार आए तो वो देखा की ठाकुर बात कर रहे हैं सब भक्तों के साथ में बहुत अच्छा लगा फिर महाशय ने सोचा की चलो देख के आता हूं कालीबाड़ी में ये बागान है मंदिर है देखा हूं कैसा है फिर जाकर के दर्शन करके फिर ठाकुर के पास बैठा हूं तो जब वापस आए तो वृंदावन वहां पर खड़ी थी उसके साथ में बात हुई की क्या उन्होंने बहुत अभ्यास किया है बहुत पढ़ाई लिखी की है तो वृंदा ने क्या रहा था और पादासना और शबनम उन्होंने ठाकुर के मुंह पे ही वहां पे ही सरस्वती वासी हुई है उन्होंने पढ़ाई लिखी ऐसा कुछ किया नहीं उसके बाद में मास्टर महाशय जब कमरे में प्रवेश किया देखा की वो दुख दिन दिया हुआ है और ठाकुर वहां पर बैठे है अभी एक एडल्ट डिटेल मैंने एक्स्ट्रा डीटेल्स जो शायद मास्टर महाशय ने ठाकुर का दर्शन हो गया होगा धुएं में किंतु गंगाधर महाराज को अकुर्दी के नहीं इतना ज्यादा धुआं था ठाकुर और घोड़े जैसी घर अंधकार करें दक्षिणेश्वर कोलकाता दक्षिण हंसते-हंसते बोले आभार आशीष शनिवार है सुबह हो गई दक्षिणेश्वर से कोलकाता जा रहे थे तब ठाकुर ने कहा हंसते-हंसते फिर से आना और इस बार शनिवार को आना शनिवार क्यों शनि और वो जो मंगलवार जो है वो काली मंदिर में मां शक्ति स्थान के प्रणाम करने का वो एक पवित्र दिन है मैन वो शुभ दिन है जबकि हम जो है वो शक्ति की आराधना करते हैं शक्ति जो होता है उसके दर्शन के लिए जाते हैं तो काली मां का मंदिर है तो इसलिए ठाकुर ने कहा था शनिवार को आना अच्छा अभी रात को क्या हुआ किंतु महाराज कुछ लिखने नहीं है इसके बाद में कुछ-कुछ उन्होंने वर्णन किया है की ठाकुर के साथ में रहने से फिर रात को क्या बात होती थी वगेरा किंतु यह जो कृष्ण जो पहले दिन है पहले रात जो है उसे दिन क्या हुआ उसे दिन का वर्णन जो है उन्होंने नहीं किया हम लोग हनुमान करके का सकते हैं की जो है ठाकुर ने गंगाधर महाराज को एक के बाद जैसे स्वामी जी की परीक्षा की थी उन्होंने तो वैसे ही गंगाधर महाराज की भी थोड़ी बहुत परीक्षा की होगी देखा होगा की वो नीचे वो जो है ठाकुर के खुद के हैं अंतरंग है और वो सा टेस्ट करके फिर उनको एक के बाद एक जो है साधन भजन के वो गहन मुखिया उपदेश जाके बोले बांग्लादेश जो सीक्रेट जो सब टीचिंग्स जो होते हैं साधना के वह सब दिए होंगे और वो साधना भी जो है वो महाराज ने उसे रात को की होगी क्योंकि हमने बार-बार पढ़ा है ठाकुर की बायोग्राफी ठाकुर के बड़े में जब भी वो डायरेक्ट डिसीप्ल है मां है जो भी लिखने हैं या बोलते हैं कहते हैं की ठाकुर जो है रात को किसी को सोनी नहीं देते थे और जबरदस्ती जगह के रखते थे सब के साथ साधना करवा देते थे बोलते थे अरे अरे वो कितना सूज क्या तुम लोग यहां पर सोनी के लिए आए हो जो खड़े हो जो थोड़ा सा साधन भजन करो भगवान का इस्ट देवता का नाम स्मरण करो तो ठाकुर किसी को सोनी नहीं देते थे तो वैसे ही हम लोग अनुमान करके का सकते हैं गंगाधर महाराज ने अपने से तो कुछ बोला नहीं की पहले रात को क्या हुआ था पहले दर्शन की रात में हम हनुमान करके का सकते हैं पुरी रात जो है उन्होंने ईश्वर के नाम स्मरण में ही निकाल तो आज यही तक कल फिर से ओम शांति शांति