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निःस्वार्थता ही है यथार्थ तपस्या 14 Feb 2024

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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः स्वामी जी स्वामी विवेकानंद का एक पत्र हम पढ़ रहे थे जैसे हमने कल देखा कि स्वामी जी विभिन्न लोगों को विभिन्न तरह से उपदेश देते हैं तो अपने गुरु भाइयों को किस तरह से संघ बद्ध होना है किस तरह से यह रामकृष्ण मिशन कॉर्पोरेशन की स्थापना करनी है उसके बारे में स्वामी जी जो बताया करते थे वह इस पत्र में लिखा है पत्र लिखा गया है स्वामी ब्रह्मानंद जी महाराज को जो कि स्वामी जी के गुरु भाई थे ठाकुर के मानस पुत्र थे और यही ब्रह्मानंद जी महाराज रामकृष्ण सं की स्थापना के बाद में उनके प्रसम प्रथम प्रेसिडेंट हुए थे तो यही प्रथम प्रेसिडेंट महाराज को लिखे हुए पत्र में स्वामी जी किस तरह से रामकृष्ण मिशन कार्य करेगा और किस तरह से रामकृष्ण मिशन अपने यहां पर आए हुए जितने भी साधु ब्रह्मचारी भक्त वॉलंटस तरह से परिवर्तन करेगा इसमें स्वामी जी ने बड़ा ही सुंदर रूप से दिखाया है तो इस पत्र में पिछली कल हमने पढ़ा था उसका थोड़ा सा पुनरावर्तन कर देता हूं स्वामी जी लिखते हैं दादा मुक्ति नाबा होलो दादा अर्थात की बड़ा भाई बंगाली में या तो फिर भाई कि भाई मुक्ति चाहे न भी मिले दई चार बार नरक कुंडे गेले बा दो तीन बार दो चार बार नरक कुंड में चले भी गए एक कोथा की मिथ्य क्या यह बात गलत है मन स वच स काय पुण्य पियूष पूर्ण जो मन वचन कर्म से पुण्य पियूष रूपी अमृत से परिपूर्ण है त्रिभुवन उपकार श्रेणी भी ही प्रिय माण त्रिभुवन का उपकार करके सबके प्रिय पात्र हो रहे हैं परगण परमाणु पर्वत कृत्य के चत दूसरे का सद्गुण जद परमाणु तुल्य भी है छोटा सा भी है रज मात्र भी है उसको भी वह पर्वत करके पर्वत के समान बड़ा करके देखते हैं निज रद विक संत संती संत कि अंतः जो इस तरह के कार्य करके अपने हृदय का विकास करते हैं ऐसे संत महात्मा अभी भी जीवित है तो स्वामी जी ने जब इस तरह से डेफिनेशन दिया तो हमको अवश्य यह प्रश्न होगा कि हम जिस तरह से ट्रेडिशनल वेदांत पढ़ते हैं कि जिसमें यम और नि नियम के ऊपर में इतना जोर दिया गया है कि सत्य अहिंसा अस्ते अपरिग्रह ब्रह्मचर्य तप शोज संतोष स्वाध्याय और ईश्वर प्रधान यह 10 यम और नियम है जद यह 10 यम और नियम के ऊपर में इतना भार दिया गया है तो कोई प्रश्न ही नहीं आता कि इसका पालन करने से आपके जीवन में कोई दुष्कर्म करने की बारी आएगी या तो नर नरक कुंड में जाने की बारी आएगी नरक कुंड में आप कब जाएंगे जबकि आप कोई दुष्कर्म करते हैं या तो फिर अन एथिकल कार्य करते हैं तो ये अन एथिकल अर्थात कि नीति के विरोध का कार्य सद नीति के विरोध का कार्य करने से नरक कुंड में जाया जाता है तो यहां पर जिस तरह से ट्रेडिशनल वेदांत में मैं इसको कहता हूं माइक्रो एथिक्स माइक्रो एथिक्स अर्थात कि जीवन के पलपल में जिस सद्गुणों को हमको पालन करना होता है सत्य हमको पलपल हमको अलर्ट रहना होगा कि कहीं बात-बात में भी मिथ्या वचन ना निकल जाए अभी जैसे कि मैंने जैसे मैंने एक बार कहा था कि मैं एक बार जा रहा था बेलूर मठ में रास्ते से वहां तो साइड में इतने सारे मंदिर है तो मेरा मन इसी के ऊपर में था कि मंदिर में दर्शन करूंगा और मने वो जो शाम को इतना सुंदर वातावरण होता है तो उसी के ऊपर में मेरा दृष्टि था कि मंदिर में जाकर दर्शन करूंगा अभी एक महाराज साइड में खड़े थे मुझे ऐसा करके वसा हाथ किया मैं देख नहीं पाया तो दूसरे दिन बोलते अभी तुम आए हो और अभी इतना घमंडी हो गए हो कि मुझे देखते भी नहीं हो तो मैंने ऐसा आधा सच बोलकर छोड़ दिया कि मैंने चश्मा नहीं पहना था इसलिए नहीं देख पाया तो ऐसा क्या है कि छोटे मोटे झूठ तो हम बार-बार जीवन में बोलते ही जाते हैं क्यों क्योंकि जिससे कि हमारे रिलेशनशिप बिगड़े नहीं तो अभी जद आपको प्रत्येक क्षण सत्य वचन का पालन करना है तो आप स सोच करके देख लीजिए कि आपका पैर कभी भी किसी दुष्कर्म में नहीं पड़ेगा आप हमेशा सत्कर्म करते ही जाएंगे क्योंकि सच बोलने के लिए आपको सच सत्य आपका वर्तन भी आपका लाइफ आपका बिहेवियर भी सत के ऊपर में होना चाहिए आप जद चोरी करते हैं और फिर पुलिस वाले आकर पूछेंगे कि अच्छा यह चोरी आपने की कि नहीं अभी मैं सत्य वचन का पालन करूंगा बोलूंगा कि हां मैंने चोरी कि है तो सीधा मैं जेल में चला जाऊंगा बेटर है कि चोरी ना करें इसलिए जब कोई पूछे कि यह बुरा काम तुमने किया कि नहीं तो हम स्पष्ट रूप से बोलेंगे कि नहीं मैंने यह काम नहीं किया माने काम ही अच्छे करने हैं जिससे कि हमको झूठ बोलने की जरूरत ना पड़े वैसे ही जितने भी ये यम और नियम है ब्रह्मचर्य का पालन है फिर अपरिग्रह धन का संचय नहीं करना है वगैरह वगैरह अभी यह सब साधकों के लिए है तो ज यद मान लीजिए कि इतने सारे यम और नियम का पालन करके हम अपने जीवन को प्रत्येक क्षण अलर्ट रह करके अपने जीवन को एक सत मार्ग की रास्ते में यदि हम डालते हैं तो फिर हमको नरक में जाने की बारी कहां पर आ जाएगी वो हो ही नहीं सकता तो यह माइक्रो एथिक्स का पालन करने से नरक में जाने का प्रश्न ही नहीं आता नरक में जाने का प्रश्न कब आएगा जबकि हमारे सामने जीवन के बड़े-बड़े ये न मेकिंग उपस्थित होते हैं जैसे कि यह धर्मराज युधिष्ठिर को कहा गया कि आप द्रोणाचार्य को जाकर के जब द्रोणाचार्य पूछेंगे कि उनके पुत्र का मृत्यु हुआ कि नहीं तो आपको यह सत्य वचन उस समय पालन नहीं करना है और सही में जब उनको द्रोणाचार्य ने पूछा कि मेरा पुत्र मर गया कि मेरा पुत्र का क्या वध हुआ कि नहीं तो उन्होंने कहा कि वध हुआ है कि इसका जो जो एक हाथी को मार करके मने वो 100% झूठ ना बोलना पड़े तो पुत्र का जो नाम था उसी नाम का हाथी का भीम ने मार दिया और फिर कहा कि हां कि इस नाम के किसी का वध हुआ है किंतु फिर मन में बोलते हैं नरोवा कुंज रोवा वो शायद मनुष्य भी हो सकता है हस्ती भी हो सकता है हाथी भी हो सकता है तो उसी में उनका रथ जो छह उंगल छह उंगली जो जमीन के ऊपर में चलता था तो जमीन पर आकर बैठ गया तो अभी क्या है कि आप कह सकते हैं कि यह झूठ बोला तो नरक में जाना पड़ेगा शायद तो अभी क्या है कि जीवन के जो बड़े-बड़े डिसीजंस आ जाते हैं जबकि पूरा सिविलाइजेशन पूरी मानव सभ्यता का भविष्य आपके कंधे पर है तो शायद आपको ऐसे कोई डिसीजन लेने पड़े जो कि नीति के विरुद्ध में हो यहां पर जो स्वामी जी कहते हैं कि आप यदि चाहे नरक कुंड में भी चले जाइए किंतु परहित करना आप कभी ना भूले तो अभी देखिए कि हमारे सामने यह कंफ्लेक्स परों का कल्याण करूं या तो फिर मैं सच बोलूं किंतु सच बोलने से दूसरे का कल्याण नहीं होगा तो मैं किस रास्ते प जाऊं तो यह रास्ता हमको कौन सा किस समय लेना है वह अपने चरित्र के ऊपर में अपनी टेंडेंसीज के ऊपर में अपने संस्कार के ऊपर में निर्भर है कोई कहेगा कि जयदिश में यदि कहेंगे कि कंट्रा टर चॉइस हमारी नजर के सामने आ जाए कि एक चॉइस है कि मैं सत्य वचन का पालन करता हूं किंतु इससे किसी की हानि होगी और दूसरी चॉइस है कि मैं झूठ बोलूंगा किसी को बचाने के लिए तो फिर मुझे क्या करना चाहिए यह एथिकल डाले मा जब हमारे सामने खड़ा हो जाता है तब कहीं जाकर के हमारा सही सही साधक के रूप में टेस्टिंग होता है जब तक हम अपने घर में शांति से बैठे हुए हैं बहुत ज्यादा कोई टेंशन अपने सर के ऊपर में नहीं है बहुत बड़ा कोई डिसीजन मेकिंग अपने सामने नहीं है तब हम जाकर के एक माइक्रो एथिक्स का पालन करें वह तो चलो एक तो समझ सकते हैं किंतु जब मेजर डिसीजन मेकिंग हमारे सामने आ जाए और सिर्फ इतना नहीं ऐसे डिसीजन जिससे कि लाखों लोगों का जीवन इससे इन्फ्लुएंस होता है जिससे कि लाखों लोगों के जीवन के ऊपर में हमारे डिसीजन का असर होगा इफेक्ट होगा उस समय हम जो डिसीजन देते हैं वो बहुत ही एक मेजर आकार धारण करते हैं एथिक्स इस समय किस तरह से फॉलो किए जाए यह नीति शास्त्र के ऊपर में ही भगवत गीता की रचना की गई है कि यदि हिंसा गलत है तो तो अपने प्रियजनों को वध करना अर्जुन के लिए उचित नहीं किंतु मानव सभ्यता के लिए मानव समाज के लिए भारतवर्ष के भविष्य के लिए कौरवों का विनाश आवश्यक था इसलिए अर्जुन को उनकी हत्या करनी पड़ेगी यह बात भगवान कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं तो किंतु जब आप हत्या करेंगे तो अवश्य आपको तो यह जो कर्म का बंधन है वह तो आपको लगेगा ही लगेगा इन दैट केस क्या किया जाए तो इस समय क्या करना है कि भगवान कृष्णा के ऊपर में संपूर्ण रूप से शरणागत होकर के उनके हुए उनके दिए गए कार्य का हमको पालन करना है अर्थात कि यदि मैं अपने अहं का से या तो फिर मैं अपनी धन लालसा को बढ़ाने के लिए दूसरों का राज्य छीनने के लिए मैं जद युद्ध करता हूं तो वह गलत है किंतु यदि नीति के लिए धर्म के लिए युद्ध करना पड़े तो उसमें गलत कुछ नहीं है किंतु फिर भी यह सब डिसीजन हम थियोरेटिकली जब डिस्कस करते हैं तो वैसे बड़े इजी लगते हैं महाभारत का युद्ध आज से 10000 साल पहले ना कि जब भी वह हुआ होगा तब हुआ होगा अभी उसके बार बारे में हमारे सामने हीरो और विलन बड़े ही क्लियर है कि यह विलन है उसकी हत्या करो हीरो है उसको बचाओ किंतु आज के युग में जब हमारी नजर के सामने इस तरह से डिसीजन आ जाते हैं तो कौन हीरो है कौन विलन है यह डिटरमाइंड करना इतना इजी नहीं होता हम लोग हम खुद कभी-कभी हो सकता है कि मैं खुद विलन हूं क्या स्टोरी में ऐसा हो ही सकता है जद मान लीजिए कि ऐसी कोई परिस्थिति खड़ी हो गई कि मैं ऐसा वर्तन कर रहा हूं जिससे बाकी 10 लोगों को इससे नुकसान हो रहा है तो मेरे में क्या वो एक अंतर दृष्टि है मेरे में क्या वह एनालिसिस करने की कैपेसिटी है कि हां मैं समझूं कि अभी यह जो घटना हो रही है यहां पर कंस कहो ना कि रावण कहो वो तो मैं ही हूं मुझे ही अपना बिहेवियर मॉडिफाई करना चाहिए कई-कई बार होता है ना कोई कोई लोग क्या करते हैं कि जो कुछ भी उनको पसंद नहीं आता है या हमेशा दूसरों को दोष देते रहते हैं कि अच्छा यह ठीक नहीं हुआ इसके लिए इसकी गलती है यह ठीक नहीं हुआ इसके लिए उसकी गलती है वह कभी भी अपने सामने देख कर के नहीं देखेंगे कि हां ये पूरी जो घटना है उसमें मेरा क्या रोल है क्या मुझे अपने को मॉडिफाई करने की जरूरत है कि नहीं मुझे अपने को सुधार करने की जरूरत है कि नहीं यह अंतर दृष्टि यह हमको धर्म देता है यानी कि धर्म हमारे सामने जब यह स्टार्क चॉइस अर्थात कि ये एक दूसरे के विरोधाभासी ऑप्शंस जद दे ता है कि बुरा कार्य करके किसी को बचाना एक ऑप्शन है और दूसरा है कि मैं सत कार्य करूंगा भले ही चाहे और किसी को कितना ही नुकसान हो जाए तो ये एथिकल डाले मा जब खड़ा होता है हमारे सामने तो जब हम डिसीजन मेकिंग करते हैं सबसे पहले हमारे हृदय की ओर देखना है सबसे पहले हमारी ओर देखना है कि मैं यह जो डिसीजन ले रहा हूं यह मैं स्वार्थ से ले रहा हूं और फिर इसके ऊपर पर मैं धर्म के कपड़े पहना दे रहा हूं कोई कोई लोग ऐसा करेंगे कि मुझे लगता है कि ऐसा होना चाहिए इसमें मेरा स्वार्थ है किंतु मैं तो दूसरे को जाकर के ऐसा नहीं कहूंगा कि मैं अपने स्वार्थ के लिए ऐसा कर रहा हूं मैं तो ऐसा ही कहूंगा कि नहीं देखो यह नियम है यह नीति है यह धर्म है इसके अनुसार ऐसा होना चाहिए यानी कि धर्म की आड़ में मैं अपनी वासना का संतोष करण करता हूं तो यह तो गलत हो गया यानी कि सही सही गीता में जो धर्म है या तो फिर जो स्वामी जी हमको कहते हैं उसका बॉटम लाइन है उसका एसेंस है उसका हार्ट है कि आत्म निरूपण आत्म दर्शन आत्म सेल्फ एनालिसिस यह सेल्फ एनालिसिस हम जितना ही करेंगे उतना हमको पता चलेगा कि हमारी एक्शन सेल्फिश है कि सेल्फलेस है यह नीति और एथिक्स का सबसे फाउंडेशन यह प्रिंसिपल है यदि मैं सेल्फिश होकर के सत्य वचन भी करता हूं तो वो गलत हो गया किंतु मैं सेल्फलेस होकर के झूठ शायद बोलूंगा तो मुझे नरक में तो जाना पड़े किंतु फिर मेरी मुक्ति अनिवार्य है कर्म का जो नियम है कर्म का नियम अपनी तरह से कार्य करेगा यदि मैं सच बोलूंगा तो मैं स्वर्ग में जाऊंगा किंतु फिर ये क्षीण पुण्य मृत्य लोके विषतिंदुक मैं पृथ्वी पर फिर से आके पटकूंगा माने भगवान मुझे पटक देंगे फिर से अभी जीरो से एकड़ एक से स्टार्ट करो अपनी जर्नी किंतु मैं यदि सेल्फलेस होकर के झूठ बोलूंगा तो शायद मुझे नरक में जाना पड़े क्योंकि यह तो कर्म का नियम है झूठ बोलने से पाप होता है किंतु उसके बाद में मेरी मुक्ति अनिवार्य है जब यह बुरे कर्मों का फल कट जाता है यानी कि अभी ये जो माइक्रो एथिक्स से जितने भी वो अपने सामने एक बहुत बड़ी माया जाल खड़ी करते हैं कि प्रत्येक स्टेप के ऊपर में हमको यह देखना है कि क्या हम यह 10 यम और नियम का पालन करते हैं कि नहीं किंतु यह पालन करने के समय में साथ में एक दूसरा भी फैक्टर है सेल्फिश या तो सेल्फलेसनेस का कि मैं कितना सेल्फलेस हूं यह एथिक्स का पालन करने के लिए हमेशा हम एक स्पिन दे सकते हैं कोई भी चीज के पर में मैं कह सकता हूं कि ऐसा करने से यह धर्म के अनुसार होगा यदि मेरी इच्छा ऐसा करने की है तो और यदि मेरी इच्छा ऐसा करने की नहीं है तो मैं कह सकता हूं कि ऐसा मत करो क्योंकि यह धर्म के विरुद्ध है ये अधर्म है यानी बातों के ऊपर में स्पिन देना जिन लोगों के पास में थोड़ी बहुत बुद्धि होती है जिन लोगों ने थोड़ा बहुत अध्ययन किया है स्वाध्याय किया है उनके लिए यह सब चीजें सहज है फट करके उसको मैंने घुमा देंगे अपनी इच्छा के अनुसार अपने स्वार्थ के अनुसार अपने मेरा यह डिजायर है तो यह धर्म यह कहता है ऐसा बोलने में ऐसा प्रूव करने में इन लोगों को देरी नहीं लगती किंतु यदि मुझे ऐसा नहीं करना है तो यह अधर्म का रास्ता है ऐसा प्रूव करने में भी फिर वह इतने ही माहिर होते हैं तो यहां पे लिटमस टेस्ट जिसको कहेंगे कि बटम माने जो एक्चुअल उसका जो सही सही टेस्ट है मेरी एक्शंस का वो सिर्फ ये माइक्रो एथिक्स नहीं है यम नियम सिर्फ नहीं है वो फंडामेंटल है सेल्फिश ना कि सेल्फलेसनेस और इस बात को स्वामी जी हमको यहां पर समझाते हैं और इस बात को स्वामी जी इतना सुंदर रूप से समझाते हैं कि हम लोग खुद कभी-कभी कंफ्यूजन में आ जाते हैं कि स्वामी जी धर्म के विरुद्ध में बात क्यों कह रहे हैं स्वामी जी के गुरु भाई खुद स्वामी जी के साथ में कभी-कभी आर्गुमेंट में चले गए थे कि ठाकुर ने जो कहा उसके विरुद्ध में जाकर के तुम सब उपदेश दे रहे हो तो अभी जो ठाकुर ने कहा जो स्वामी जी ने कहा उसका हम कंपैरेटिव एनालिसिस कर सकते हैं बहुत ज्यादा समय जाएगा उसमें अभी जाने की जरूरत नहीं किंतु हमको यह बात एक समझनी है कि जो स्वामी जी जो अपने गुरु भाइयों को यहां पर कहते हैं जो युग धर्म जो सिखाते हैं ऐसा बहुत बार हुआ कि बौद्ध धर्म को आकर बौद्ध धर्म के प्रभाव से हम लोग माइक्रो एथिक्स में ऐसे गए कि हम लोग अपना रास्ता भूल गए जैसे कि स्वामी जी एक सुंदर उदाहरण देते हैं श्रीलंका में थे उस समय का या तो वह श्रीलंका में थे या तो यह उदाहरण श्रीलंका का है वहां पर एक चोर एक शेठ के घर में चला गया तो अभी यह तो बौद्ध लोगों का घर था श्रीलंका का ही उदाहरण है तो यह बौद्ध लोगों का घर था तो अभी जैसे ही चोर को पकड़ा तो यह जो मकान का मालिक था शेठ था उसके लड़कों ने चोर की पिटाई करनी शुरू कर दी तो अभी ये शेठ तो सोए हुए थे रात को तो सडन ना हल्लागुल्ला सुन कर के वो उठ गए देखा कि उनके लड़के चोर की पिटाई कर रहे हैं तो वो बोल रहे हैं अरे अरे अरे क्या कर रहे हो क्या कर रहे हो हम लोग तो अहिंसा का पालन करने वाले हैं इस तरह से क्या किसी की पिटाई की जाती है तुम लोगों को शर्म नहीं आती ऐसा बोलकर अपने लड़कों को ही डांट दिया तो वो जो दो-तीन लोग खड़े थे वहां पे वे तो बड़े ही अहो मने अहो भाव में चले गए बड़े ही गदगद हो गए कि देखिए यह सेठ जी बौद्ध धर्म के हिंसा धर्म का इतना सुंदर रूप से पालन कर रहे हैं इतना निष्ठावान रूप से कर रहे हैं कि चोर भी यदि उनके घर में आ जाए तो उसकी भी पिटाई नहीं करनी है क्योंकि उससे तो अहिंसा व तो हिंसा हो जाएगी तो वो तो बड़े ही खुश हो गए तो इसके बाद में सेठ जी ने कहा कि एक काम करो एक बहुत बड़ा ये लो एक बैग लो एक थैला लो थैले में इस चोर को बांध दो फिर इस थैले को समुंदर में डाल दो वो ऐसे ही मर जाएगा बिना इसकी हिंसा किए हुए माने देखिए कि अहिंसा का नियम का किस तरह से करते हैं कि हिंसा हम नहीं करेंगे हिंसा समुंदर से करवाएंगे एक ब्राह्मण की कहानी ठाकुर कहते हैं कि एक ब्राह्मण ने बहुत ही सुंदर बगीचा बनाया था तो बगीचे के ऊपर में उसका बड़ा ही गर्व था एक बार एक गाय आ गई तो बगीचे में सब वो फूल वगैरह खाने लगी तो ब्राह्मण तो बड़ा ही नाराज हो गया एक लाठी थी जोर से गाय को मार दी तो बेचारी गाय इससे मर गई तो अभी ब्राह्मण तो बड़ा ही परेशान हो गया बड़ा ही मैंने टेंशन में आ गया कि अरे गौ हत्या का पाप तो बड़ा ही म तो नर्क में जाने वाला पाप है अभी मैं क्या करूं अभी मैं क्या करूं तो फिर उसने अपनी बुद्धि चलाई कि हत्या तो मैंने नहीं की है हत्या तो इस हाथ ने की है मेरे हाथ ने की है ओके तो अभी हाथ के देवता है इंद्र अर्थात कि इंद्र ने हत्या की है ऐसा सोच के वो अपने को कन्वींस कर लिया अभी ये गौ हत्या का पाप जब उसके पास में आया तो उसने कहा कि कि अरे भाई हत्या तो इंद्र ने की है मैंने की नहीं है पूरा लॉजिक समझा दिया तो पाप गया भगवान इंद्र के पास में तो इंद्र बेचारे बड़े परेशान हो गए बोला कि ये तो ब्राह्मण तो बड़ा ही चालाक है अपनी गलती मेरे सर पर डालना चाहता है अच्छा ठीक है तो उसने एक ब्राह्मण का स्वरूप धारण किया और ये इसके पास में आया और आकर के उसके बगीचे में घूमते घूमते उसके फूलों की बड़ी प्रशंसा करने लगा कि अरे वाह इतने सुंदर फूल इतना सुंदर बगीचा तो किसने किया तो ये ब्राह्मण जिसका ये बगीचा था वो बड़ा ही खुश होकर के बड़ा ही गर्व के साथ में बड़ा ही प्राउड से प्राउडली बोलने लगा अरे ये तो मैंने किया है यह बगीचा मैंने किया ये फूल मैंने डाले ये पौधे मैंने डाले इतना सुंदर पानी वगैरह मैं डालता हूं सब कुछ तो मैं करता हूं तब कहीं जाकर के जो आगंतुक था गेस्ट था उसने अपना सही इंद्र का स्वरूप धारण किया और बोला कि अरे पाखंडी जब बगीचा बनाना है तब मैं मैं और जब गाय की हत्या की बात आई तो इंद्र यह तो किस तरह का झूठा आदमी है तू जैसे ही ऐसा कहा इंद्र ने वैसे ही पाप आक के ब्राह्मण के सर पर बैठ गया तो देखिए कि एथिक्स का पालन करना हम यदि हम इस तरह से मने झुठ मुठ के एथिक्स का जब पालन करेंगे कि हां मुझे अहिंसा करनी है और अहिंसा करने के लिए मैं हिंसा और किसी माध्यम से करवाऊंगी तो यह तो ठीक नहीं हुआ सेल्फिश या तो सेल्फलेसनेस यह आपके हृदय में है कि नहीं यह सही सही टेस्ट है वरना तो माइक्रो एथिक्स को लेकर के स्वामी जी इसीलिए कहते हैं कि बौद्ध धर्म के आने से भारत में तमसा छन्ना एक पूरा वातावरण हो गया था भगवान बुद्ध के बारे में स्वामी जी बड़े ही रिस्पेक्टफुल थे भगवान बुद्ध का तो उनको बचपन में ही दर्शन हुआ था बुद्ध की जो निर्वाण प्राप्ति और बुद्ध की साधना तपस्या उसके प्रति स्वामी जी का मने एकदम हृदय से उनकी निष्ठा थी किंतु बाद बाद में जो बौद्ध धर्म में जो करप्शन आया बौद्ध धर्म की जो अवनति हुई इसके बारे में स्वामी जी कह रहे हैं कि यह जो अवन ति हुई इसके पीछे ये जो बहुत सारे नीति नियम उन्होंने जो बना कर के रखे थे उसमें यह लोग ऐसे अटक गए कि जब विदेशी आक्रमण स्टार्ट हुए तो भारत की रक्षा करने के लिए क्षत्रिय लोग बचे ही नहीं थे क्षत्रिय लोग बेचे ऐसार बेचारे ऐसे गिल्ट फीलिंग में चले गए थे जो भी मैं करता हूं पाप है मैं खड़ा भी होता हूं तो पाप है बैठता हूं तो पाप है खाता हूं तो पाप है सोता हूं तो पाप है पाप पाप करके उनको ऐसा एक डरा करके रख दिया था हमारे जितने भी युवा वर्ग है क्षत्रिय है सैन्य है इसको कि जब सही सही भारत की रक्षा करने की बारी आई तो सब लोग इसमें निष्फल हो गए तो हिंसा नहीं करनी बोलकर के जब देश के ऊपर आक्रमण होगा आप अपने को बचाव नहीं करेंगे तो यह तो भाई किस तरह का आपका ये एथिक्स हुआ वो तो है ना तो मैंने देखिए कि एथिक्स एक ऐसी माया जाल हमारे सामने रचता है कि हम लोग जो कि बहुत ही सिंसियर इसका पालन करने का सत्य अहिंसा अपरिग्रह ब्रह्मचर्य यह सबका पालन करने का हम प्रयास करते हैं तो बहुत सारी समस्याओं से हम घिर जाते हैं तो इस समय मैं सही कर रहा हूं कि गलत कर रहा हूं इसका टेस्ट है कि मैं सेल्फिश हूं कि सेल्फलेस हूं यदि मैं अपने फायदे के लिए कर रहा हूं तो मैं जद चाहे आपात तः बाह्य दृष्टि से दिखे कि मैं धर्म का पालन कर रहा हूं वह तो गलत है और यदि मैं सही सही सेल्फलेस होकर के कुछ कर रहा हूं तो मैं यदि बाहर से दिखे कि चलो यह अधर्म कर रहा है या तो धर्म के रास्ते सेय बिछड़ गया है तो भी जो मैं कर रहा हूं वह सही है क्योंकि सेल्फिश या तो सेल्फलेसनेस ही एक मात्र क्राइटेरिया है कि जिसको कि हम एथिक्स कहेंगे तो इसीलिए स्वामी जी जब कैसे कुछ कुछ स्टेटमेंट ऐसे हमारे सामने मार देते हैं कि हम लोग एकदम चक्कर खाके गिर जाते हैं और 10 बार सोचना पड़ता है कि अरे भाई यह जो मैं गीता भागवत कथामृत मां का जीवन ये जो सब में पढ़ा तो सब क्या मिथ्या हो गया सब गलत गलत हो गया और स्वामी जी क्या एक नया ही एक नियम हमारे सामने ला रहे हैं तो ऐसा नहीं है स्वामी जी जो कहते हैं गीता भागवत या तो उपनिषद या तो कथामृत या तो मां का जीवन या तो कोई भी डायरेक्ट डिसाइल का जीवन इसके साथ में विरोधाभास में नहीं है बस वही है कि कहां पर इनका संगम होता है कहां पर इनका मेल बैठती है वो हमको थोड़ा सा ध्यान से देखना पड़ता है इसीलिए स्वामी जी जब कहते हैं दादा मुक्ति नाई बा होलो दई चार बार नरक कुंडे गलेई बा दादा मुक्ति चाहे ना मिले भले दो चार बार हम नरक कुंड में चले भी जाए परहित करने से हमको कभी भी पीछे नहीं हटना है यह परहित करना अपना अहंकार को संपूर्ण रूप से निर्वित कर देना यही धर्म का सही रास्ता है हम लोग बहुत बार सोचते हैं कि मैं साधन भजन करूंगा जग ध्यान करूंगा कर्मा में मुझे फसने की क्या जरूरत है किंतु जिस क्षण मेरे मन में यह बात आई कि मैं मुक्ति पा लूंगा मैं अपने को बचा लूंगा मैं इस नरक कंड से निकल जाऊंगा नरक कुण से उसी समय ये सेल्फिश आ गया देखिए कि धर्म का पालन करते करते अधर्म कर देते हैं हम लोग वो हमको समझ में नहीं आता यानी कि संपूर्ण रूप से यदि साधक सेल्फलेस नहीं होता है संपूर्ण रूप से साधक अपने अहंकार को पूरा विनाश नहीं कर देता है तब तक तो वह साधना के रास्ते पर एक कदम भी उसने नहीं बढ़ाया है और इसीलिए हम लोग हम लोग समझ नहीं पाते बहुत बार कि मेरा खुद का लाइफ जैसे मैं खुद यहां पर जब आया था रामकृष्ण मिशन में जवाइन करने के लिए तो यह भगवान बुद्ध वगैरह की बायोग्राफी ठाकुर की साधना का वर्णन सब पढ़ के आया था कि 12 साल इन्होंने तपस्या की और इसके बाद में इनको निर्विकल्प समाधि या तो निर्वाण प्राप्त हो गया तो मैं भी ऐसा 12 साल ऐसी तपस्या करूंगा कि मुझे भी निर्विकल्प समाधि या निर्वाण प्राप्त हो जाएगा किंतु देखिए कि ऐसा नहीं है कि मैंने अभी तो मुझे प्राय 20 साल होने को आए ऐसा नहीं है कि मैंने बहुत ज्यादा भोगवा में जीवन बिताया है यथाशक्ति मैंने साधन भजन तपस्या करने का प्रयास किया किंतु मुझे इस बात का बड़ा ही मने आई एम वेरी अलर्ट अबाउट यह जो सेल्फ सेल्फिश बस है मेरे भीतर में इसके बारे में मैं बड़ा ही अलर्ट हूं मैं समझ पाता हूं कि मेरे में यह सेल्फिश स है बहुत सारी चीजों में मैं सबसे पहले अपने बारे में सोचता हूं नहीं के दूसरों के बारे में या तो फिर नहीं की एक हृदय खोल कर के एक विराट सागर की तरह हमारा स्वभाव हो जाए कि हम लोगों को दे और दे सामने कुछ पाने की अपे अपेक्षा ना रखे ऐसा स्वभाव मेरा अभी तक नहीं हुआ और इसको करने के लिए अभी पता नहीं कितने जन्म से मुझे जाना होगा तो मुझे मेरी यह वीकनेस कहो ना कि अभी मेरी यह जो बैकवर्ड स कहो साधन के रास्ते पे मुझे पता है और यह पता होना ही हमारे जीवन में साधना की सक्सेस का सबसे पहला स्टेप है यदि मैं यह समझ ही नहीं पाऊंगा कि मेरे भीतर में सेल्फिश है तो मैं सही सही साधना कैसे कर पाऊंगा यहां पर जितना भी कुछ कहा जाता है एकादशी के दिन चलो उपवास करो मंदिर में नियमित रूप से मंगलारती संध्या आरती अटेंड करो नियमित रूप से ठाकुर मा स्वामी जी की बातें पढ़ो सब कुछ करो बड़ा ही सिंसियर अपना कर्म करो जो कि अपने को दिया गया है जो डिपार्टमेंट दिया गया है सबके साथ में एक बड़ा ही सद व्यवहार करो सब कुछ करो किंतु भीतर में से सेल्फिश निस नहीं जाती और ये सेल्फिश कैसी है पता है दिन प्रतिदिन में आपको दिखी ग भी नहीं ये तो मेजर डिसीजन आपके सामने आ जाएंगे तब कहीं जाकर के ये दिखेगा माने एक ऐसा है ना कि मिट्टी आप जमीन में कितना ही खोदते रहे आपको सोना वैसे नहीं मिलेगा सोना यदि प्राप्त करना है तो आपको कितना ही खोदना होगा यह जो माइनिंग बिजनेस पूरा है ये माइनिंग मशीन बड़े-बड़े होते हैं अर्थ मूवर्स इसको कहते हैं तो मैंने राक्षस जैसे अर्थ मूवर्स ऐसे वो जमीन में जाएंगे जो खुदाई करेंगे माइनिंग करेंगे तब कहीं जाकर के कितना गहराई में से यह सोना मोती जवाहरात वगैरह सॉरी जवाहरात और मोती तो नहीं किंतु हीरा ये सोना है हीरा है चांदी है यह जो प्रेशियस मेटल जिसको कहे जाएंगे वह सब हमको कितनी गहराई से प्राप्त होते हैं गहराई में प्राप्त होते हैं वैसा ही अपने जीवन का सतत एनालिसिस करके अपने हृदय के भीतर में जो भाव है उसका सतत एनालिसिस करने के बाद में भी हमको कभी-कभी यह सेल्फिश नेस मिलती नहीं है व कब मिलेगी जब मेजर डिसीजन हमारे सामने आ जाएगा तब हमको लगेगा कि अरे मैं जो यह अभी जो डिसाइड करने वाला हूं इस रास्ते प जाऊंगा कि दूसरे रास्ते प जाऊंगा क्या इसके पीछे मेरी सेल्फिश नेस है ना कि सेल्फलेसनेस है क्या मैं अपने को बलिदान स्वरूप देकर के जो सही चीज है वह करने का प्रयास कर रहा हूं कि या तो मैं अपना योग क्षेम या तो फिर रोटी कपड़ा मकान की चिंता करके मेरा भविष्य इस तरह से भौतिक रूप से सुखरूप हो वह सोच कर के मैं डिसाइड कर रहा हूं यह जब हमारे सामने मेजर डिसीजन आते हैं तब हमको पता चलता है तो इसीलिए स्वामी जी की यह बात कि भले चाहे हम तीन चार बार नरक कुंड में चले भी गए किंतु सही कार्य करना है सही डिसीजन लेना है दूसरों का हित हमेशा करते रहना है यह है स्वामी जी की बात आगे स्वामी जी क्या कहते हैं नाई बहलो तु मादर मुक्ति भले ही चाहे तुम लोगों की मुक्ति ना हो की छले मानसी कथा माने क्या ये बच्चों जैसी बातें राम राम आबार नहीं नहीं बोलले शपर बीश खोय होए जाए कि ना नहीं नहीं या तो फिर नेती नेती करते करते साप का जहर भी चला जाता है कि नहीं देखिए स्वामी जी क्या कहते हैं सेल्फ पर हित करने के लिए पर उपकार करने के लिए यदि मैं अपनी मुक्ति को भी यदि मुझे गवाना पड़े तो भी क्या है कौन सी बड़ी बात है मुक्ति माने ये जब ठाकुर ने स्वामी स्वामी जी ने ठाकुर को कहा कि मैं चाहता हूं कि बस मैं निर्विकल्प समाधि में डूबा रहूंगा और बीच-बीच में थोड़ा सा पृथ्वी पर आकर के थोड़ा सा बाह्य होश में आकर के खाना पना खाके शरीर को टिकाने के लिए फिर से मैं निर्विकल्प समाधि में चला जाऊंगा तो फिर स्वा ठाकुर ने क्या कहा अरे निर्विकल्प समाधि से भी ऊपर में एक बड़ी अवस्था है और कहा कि तुम कितना सेल्फिश हो कि निर्विकल्प समाधि चाहते हो तो स्वामी जी आश्चर्य चकित हो गए कि अरे भारत के जितने भी धर्मशास्त्र को पढ़े यह पता चलता है कि निर्विकल्प समाधि मुक्ति ईश्वर दर्शन यह तो सब जीवन के उद्देश्य है और ठाकुर कहते हैं कि तुम समाधि चाहते हो यह तुम्हारी सेल्फिश से है तुम्हारी स्वार्थ परता है यह कैसी बात हो गई तो देखिए कि परहित जब तक क्योंकि क्या है कि यह सब चीजें मान लीजिए कि आप कितने ही माइक्रो एथिक्स का पालन करके सत्य अहिंसा अस्ते यह सबका पालन करते-करते आप चाहे जदी समाधि भी सामयिक रूप से मिल जाए चाहे आप स्वर्ग में भी थोड़े समय के लिए चले जाए किंतु जो अंतिम मुक्ति है वो अंतिम मुक्ति आपके जितने भी कर्म है उसका संपूर्ण क्षय और आत्यंतिक मुक्ति वो तो आपको संपूर्ण निस्वार्थ हुए बिना वो मिलने वाली नहीं है और यह स्वार्थ होने का रास्ता नर्क से गुजरता है इसलिए स्वामी जी कहते हैं कि नाई बा होलो तुमा देर मुक्ति भले ही चाहे तुम लोगों की मुक्ति ना हुई की छले मानसी कथा क्या बच्चों जैसी बातें कि मुझे मुक्ति चाहिए मुक्ति चाहिए राम राम आबार नहीं नहीं बोलले सापर बीश खो होए जाए कि ना नेती नेती करके साप का विष भी साप का जहर भी चला जाएगा यह बड़ा ही मेजर स्टेटमेंट है स्वामी जी का यहां पर स्वामी जी क्या कहना चाहते हैं वह हम थोड़ा कल देखते हैं तो आज यही तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु