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Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life and Teachings 31 Jul 2025

prayer

ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का जीवन चरित्र उसका हम अध्ययन कर रहे हैं। कल हमने गंभीरानंद जी महाराज द्वारा रचित एक पैसेज पढ़ा। जिसमें कि महाराज जी ठाकुर की महासमाधि के बाद में गुरु भाइयों के मन की क्या अवस्था थी? वे लोग किस तरह से अपने भविष्य के बारे में सोच रहे थे और साथ-साथ में ही गुरु भाइयों के साथ में ही अर्थात कि त्यागी संतानों के साथ में ही यह जो कुछ प्रवीण गृहस्थ भक्त थे उन लोगों का क्या चिंतन था वह सब हमने ऑलरेडी देख लिया है। अभी यह एनालिसिस समाप्त होता है। इसके अंत में महाराज जी ने हमको एक बात बताई कि ठाकुर की महाशक्ति श्री रामकृष्ण रूपी जिस महाशक्ति का पृथ्वी पर अवतरण हुआ है उसका क्या उसका महत्व क्या है उसका भविष्य क्या है उसका जो इंपैक्ट है फ्यूचर सिविलाइजेशन के ऊपर में ह्यूमन स्पीशीज के ऊपर में वो क्या होने वाला है इस इसका अंदाज बहुत कम लोगों को था जिनको था उनमें से एक तो थे स्वामी विवेकानंद नरेन उस समय के और दूसरे थी मां शारदा देवी और किस तरह से मां ने ठाकुर को प्रार्थना करके कहा था कि ठाकुर तुम तो आए सभी यह लड़कों को त्याग की शिक्षा दी उनका करियर उनका फैमिली लाइफ यह सब तो अभी आपने खत्म कर ही दिया है तो अभी यह लोग तुम्हारे नाम से घर छोड़कर जो निकले हैं वे लोग यदि दो मुट्ठी ही भिक्षा के लिए इधरउधर घूमते फिरेंगे, भटकते फिरेंगे तो मैं देख नहीं पाऊंगी। कृपा करके इन लोगों के लिए सामान्य खाने-पीने का, कपड़े का और रहने का व्यवस्था करो। तो यह जो मां ने प्रार्थना की तो हमने यह भी देखा कल कि एक्चुअली यह प्रार्थना की थी मां ने 1890 में अर्थात कि यह वो समय है देखिए कि वराह नगर मठ की यदि क्राइसिस कही जाए तो दो समय एक सीरियस क्राइसिस प्रकट हुई थी सन्यासियों के ये संघ होकर के रहने के बारे में सर्वप्रथम तो ठाकुर की महा महासमाधि के बारे में यह लोग कहां पर रहेंगे, कैसे रहेंगे? काशीपुर तो उसका जो यह था भाड़ा वो तो देना बंद कर दिया था। तो फिर इकट्ठा होकर रहने की कोई जगह नहीं थी। तो उस समय की क्राइसिस से पसार होकर के वह सुरेन मित्र की कहानी अभी देखेंगे हम कि किस तरह से ठाकुर ने उसको दर्शन देकर कहा कि तुम मेरे लड़कों के लिए मेरे त्यागी संतानों के लिए रहने की व्यवस्था करो। तो वह तो एक हुआ। तो वह तो एक क्राइसिस था। दूसरा था आखिर में कि जिस तरह से स्वामी जी ने प्रमदादा दास मित्र को लेटर लिखा था उसमें लिखा था कि यह जो दो बड़े रसददार थे वराह नगर मठ के बलराम बाबू और सुरन बाबू दोनों का देहांत हुआ है तो अभी मठ को चलाने के लिए वैसे गिरीश घोष है मास्टर महाशय है और जो सभी लोग हैं ठाकुर के समय के भक्त वे लोग थोड़ा बहुत पैसा दे रहे हैं किंतु इससे से होने वाला नहीं है। प्लस हमारी तो एंबिशन भी बहुत बड़ी है। सिर्फ रोटी कपड़ा मकान से तो होने वाला नहीं। उस समय गंगा के किनारे एक जमीन लेकर के श्री रामकृष्ण देव का मंदिर स्थापित करेंगे। निर्माण करेंगे। वहां पर ठाकुर की अस्थियों की नियमित रूप से पूजा होगी। यह सो जो हमारी एंबिशन थी या तो फिर यह जो हमारा स्वप्न था वह तो इतने पैसों से पुराएगा नहीं। तो फिर जब स्वामी जी ने ऐसा करके प्रमदादा दास बाबू को पत्र लिखा तो उसके उत्तर में प्रमदा दास ने ऐसा कोई आशा नहीं दिखाई कि हां वह पैसा इकट्ठा करके रामकृष्ण मठ को देंगे। तो फिर उसके उत्तर में स्वामी जी समझ गए कि अभी कुछ मिलने वाला नहीं है यहां से और उन्होंने उत्तर में पत्र लिखा कि ठीक है अभी हम लोग भी धीरे-धीरे करके मठ छोड़कर के चारों दिशाओं में प्रवृज्या करने के लिए जा रहे हैं। तो उस समय मां ने यह प्रार्थना की थी ठाकुर को कि तुम्हारे लड़के दो मुट्ठी अन्न के लिए दर-बदर भटकते रहे वह मुझसे देखा नहीं जाएगा। आप उनके लिए कुछ ना कुछ रहने की खाने की व्यवस्था कीजिए। तो एक्चुअली मां की जो प्रार्थना थी वह तो कुछ ही दिनों में फलीभूत हो भी गई थी। कुछ समय के बाद में यानी कि विदिन वन टू इयर्स ये आलम बाजार मठ और फिर यह जब 1897 में स्वामी जी अमेरिका से वापस आए तो फिर यह बेलूर मठ की भी स्थापना होने को चली थी। यानी कि कुछ ही समय में मां की प्रार्थना अवश्य फलीभूत हुई। किंतु मां का यह जो हमेशा के लिए हमारे ऊपर में आशीर्वाद रूपी हस्त स्थापित है। उससे हमको पता है कि हमारी एंबिशन भविष्य में चाहे हम रामकृष्ण संघ कितना ही विस्तृत हो रामकृष्ण देव के मंदिर रामकृष्ण मिशन अपनी कार्यवधि कार्य प्रणाली चाहे कितनी ही विस्तृत करता रहे मां का इस आशीर्वाद के परिणाम स्वरूप हमको कभी भी आर्थिक तंगी का सामना नहीं करना पड़ेगा। तो यह सब कल हमने देख लिया। अभी इससे पहले कि वराह नगर मठ की स्थापना हो। कुछ कुछ प्रसंग है जो कि हमको गुरु भाइयों के रेमिनेशंस में स्मृति चारण में पढ़ने को मिलते हैं। तो उसमें से एक अद्भुतानंद

लाटू महाराज की कहानी

जी महाराज का लाटू महाराज का एक प्रसंग है। वो कहते हैं कि काकुड़ गाछर उत्सबेर पर रामलाल दादा दक्षिणेश्वरे एकटा भंडारा दिलन शेखाने कीर्तन होए छिलो अर्थात कि काकुड़गाची में 28 वो जो जन्माष्टमी के दिन ठाकुर की अस्थियों का जो वहां पे स्थापन हुआ और फिर वहां पर नियमित रूप से पूजा होने लगी रामबाबू यह सब जो आयोजन कर रहे थे तो वह काकुड़ गाछी के उत्सव के बाद में दक्षिणेश्वर में रामलाल दादा ने एक भंडारा दिया था। वह जैसे एक जनरली होता है मृत्यु के बाद में एक भंडारा दिया जाता है। तो ठाकुर की स्मृति में यह भंडारा था। वहां पे भी कीर्तन हुआ था। किंतु श्री श्री मां के निय जाबार्जनो रामलाल दादा राम बलराम बाबू बाड़ी ते ऐसे छिलेन बाकी मां शेखा ने जेते चले ना दक्षिणेश्वरे रामलाल दादा देवा भंडाराय हमने गि छिलो ये जो लाटू महाराज की जो हिंदी मिश्रित बंगाली है क्या कहते हैं कि वहां पे भंडारा तो दिया रामलाल दादा ने दक्षिणेश्वर में और रामलाल दादा रामलाल दादा अर्थात कि हमको पता है ठाकुर के भतीजे उनके भाई के लड़के तो और काली मंदिर में ठाकुर जो मां काली की पूजा कर रहे थे तो उनकी यह जो भाववस्था एक के बाद एक प्रारंभ हुई तो उसके यह जो एक प्रचंड झड़ की तरह एक प्रचंड तूफान झंजावात की तरह ठाकुर का साधन प्रवाह सिद्धि एक के बाद एक समाधि दर्शन भाव यह सब अवस्थाएं प्रारंभ हुई तो फिर ठाकुर अभी मंदिर में पूजा नहीं कर पाएंगे। तो फिर रामलाल दादा को यह कार्य दिया गया था। किंतु हमको यह भी पता है कि रामलाल दादा ने मां का जो एक जिम्मा लेने का जो कि उनका उत्तरदायित्व था जो कि उनकी रिस्पांसिबिलिटी थी उसमें उन्होंने कोई ऐसी तत्परता नहीं दिखाई थी। इसी वजह से देखिए कि रामलाल दादा ने जब दक्षिणेश्वर में भंडारा दिया तो वह मां को लेने के लिए बलराम बाबू के घर आए थे। मां उस समय बलराम बाबू के घर रह रही थी बलराम मंदिर में तो किंतु वह जब लेने को आए तो मां ने दक्षिणेश्वर जाने से इंकार कर दिया। मां उस भंडारे में नहीं गई थी। अभी क्यों नहीं गई थी? इसके बारे में तो हम स्पेककुलेशन ही कर सकते हैं। एक स्पेककुलेशन यह है कि शायद हो सकता है कि रामलाल दादा का जो बिहेवियर रहा होगा उस समय में मां को नेगलेक्ट करने का यह मां को शायद पसंद नहीं आया होगा। किंतु यह जो सब पेटीजेलसिस हम लोग कहते हैं ना यह छोटी-मोटी बातों से बुरा लग जाना और फिर अहंकार करके कार्य करना या बिहेव करना यह सब तो इन लोगों में था नहीं। ठाकुर मां स्वामी जी ने तो मुझे नहीं लगता कि यह स्पेककुलेशन कोई बहुत ज्यादा सही है। मुझे यह लगता है कि वहां दक्षिणेश्वर फिर से जाना। ठाकुर की यह जो लीला भूमि है ठाकुर के साथ में माने इतने दिन बिताए थे जहां पे यह पवित्र तपोभूमि में वहां पर जाकर के ठाकुर की याद जो फिर उनके हृदय को जो व्यथा देगी वह शायद मां फिर से सहन ना कर पाए। इसलिए उन्होंने वहां पर जाने से इंकार किया होगा। तो यह स्पेककुलेशन मुझे थोड़ा सा ज्यादा एक्यूरेट लग रहा है। तो जो भी है मां वहां पर गई नहीं किंतु लाटू महाराज स्वयं वहां पर गए थे। और क्या कहते हैं हमने गिलम ये हम अर्थात ये हम और ये बंगाली और हिंदी दोनों को मिश्रित करेंगे तो होगा हमने। यह जो अद्भुतानंद जी की जो भाषा थी बंगाली मिश्रित हिंदी वो बड़ी अद्भुत थी। जिस तरह से अद्भुत उनका चरित्र था उतनी ही अद्भुत उनकी भाषा भी थी और उनकी यह जो उनकी जो किताब है जिस किताब में से यह रेमिनेशंस लिया गया है उस किताब में लाटू महाराज की भाषा का बड़ा ही अच्छा से वो एक हमको एक मिलता है। पिक्चर देखने को मिलता है। बड़े ही अच्छे से लाटू महाराज की लैंग्वेज को प्रिजर्व किया गया है। अदरवाइज बाकी सब जगह पे आप लाटू महाराज के रेमिनेशंस दूसरी जगह पे आप कहीं पर पढ़ेंगे तो आपको लगेगा कि लाटू महाराज उसी तरह की बेंगोली में बात कर रहे हैं जिस तरह की बेंगली में इवन नरेंद्र है या तो राजा महाराज है। यह लोग बात कर रहे हैं। किंतु लाटू महाराज की लैंग्वेज की ओरिजिनालिटी यह इस किताब में देखने को मिलती है। तो अह अभी इसके बाद में क्या कहते हैं लाटू महाराज? ठाकुर महासमाधिर पर काशीपुर बागाने हमार मन टिकतो ना। ठाकुर की महासमाधि के बाद में काशीपुर बागान में मेरा मन टिकता नहीं था। हमने माझे माझे रामबाबू बाड़ी ते चोले जे तू मैं बीच-बीच में रामबाबू के घर चला जाता रामबाबू के घर क्यों जाते क्योंकि एक्चुअली तो रामबाबू के घर में ही उन्होंने एक नौकर के रूप में कार्य करने का प्रारंभ किया था और रामबाबू की यह महत्ता भी थी कि फिर वह लाटू महाराज को एक बार जब उन्होंने देखा कि ठाकुर के प्रति लाटू महाराज की इतनी श्रद्धा है दूसरा कि ठाकुर की वह प्राण पण सेवा करते हैं और ठाकुर का भी इनके ऊपर में इतना स्नेह है। तो फिर रामबाबू ने सामने से इसको कहा था लाटू महाराज को कि तुम दक्षिणेश्वर में रुक जाओ। एक डायलॉग भी है वार्तालाप भी है ठाकुर का और लाटू महाराज का। ठाकुर कहते हैं अरे तुम पैसा लेते हो रामबाबू का और रहते हो और काम करते हो यहां पे अर्थात दक्षिणेश्वर में। ऐसा कैसे चलेगा? किंतु रामबाबू को तो पता था कि यह ठाकुर की ही लीला है। ठाकुर ने ही अपने दिव्य आकर्षण से लाटू महाराज को मेस्मराइज कर दिया है। हिप्नोटाइज कर दिया है। उनका मन हर लिया है। तो अभी लाटू महाराज के पास में वह शक्ति ही नहीं रही कि ठाकुर का संग त्याग करके जाए। तो फिर रामबाबू ने सामने से कहा लाटू महाराज को कि ठीक है दक्षिणेश्वर में ही रहो और ठाकुर की सेवा करो। तो अभी ठाकुर की महासमाधि के बाद में किंतु फिर लाटू महाराज क्या करेंगे? कहां पर जाएंगे? तो फिर वह बीच-बीच में रामबाबू के घर वापस चले जाते थे। रामबाबू की पत्नी को वह मां करके ही पुकारते थे और वह भी लाटू महाराज का काफी ख्याल रखती थी। खास करके लाटू महाराज के ये जो सब अद्भुत आचरण थे, कब कहीं से आ जाएंगे और कब कहीं पर चले जाएंगे। एकाएक आना, एकाएक जाना, किसी भी चीज की निश्चितता नहीं। ठाकुर जब थे तब ठाकुर की एकदम नियमित रूप से सेवा की थी। किंतु ठाकुर की महासमाधि के बाद में लाटू महाराज का यह अद्भुत आचरण वो धीरे-धीरे करके प्रकाश में आने लगा।

स्वामी विवेकानन्द के चरित्र की शक्ति

शेखाने मन टिकतो ना लोरेन भाई बाड़ी जे तुम तो वो रामबाबू के घर में भी मेरा मन टिकता नहीं तो मैं लोरेन भाई के घर जाता। अभी ये नरन को वो अपभ्रंश करके उनकी खुद की भाषा में कह रहे हैं लोरेन तो लोरेन भाई के घर जाता लोरेन भाई कतो कथा बोलतो तो लोरेन भाई कितनी कितनी सारी बातें करते हम जिज्ञेश तुम मैं पूछता हां भाई लोरेन तोमा के तो ठाकुर ए तो भो बा जे होक बोलची तोमा के छेड़े नहीं थकते पारते ना तो मैं नरेंद्र को कितनी सब बातें करता उसको कहता कि भाई लोरेन तुमको तो ठाकुर इतना स्नेह करते थे कि हक बोल छी सच में बता रहा हूं कि तुमको छोड़कर के वो रह नहीं पाते थे लोरेन भाई हमार कथा सुने हंसतो और बोलतो ओरे तीनी तोरो छेड़े थकते पार ना लोरेन भाई मेरी बात सुनते और हंसते और कहते कि अरे वो तो तुमको भी छोड़कर के रह नहीं पाएंगे तो के शशि के राखाल के ततो भो बा तुमको शशि को राखाल को इन सबको वो कितना स्नेह करते थे तोरा ही तो तार सेवा कोरे छ आमी आर की कोरे छ तुम लोगों ने ही तो उनकी सेवा की है मैंने तो और क्या किया है देखिए इस यह जो सेंटेंस है उसमें बड़ा एक रहस्य छुपा हुआ है ठाकुर कभी भी स्वामी जी से अपनी यह जो अंगत सेवा है यह जो पर्सनल सर्विस है वह नहीं करवाते थे। जिस तरह से लाटू महाराज को कहते कि फिर यह उनके जो वस्त्र वगैरह ठीक-ठाक करना है। उनका बेड बनाना है। उनकी यह जो सब जो भी सेवा कार्य करनी है। ठाकुर एक बार आखिरी आखिरी समय में कहते उन्होंने कहा कि देखो अभी मैं शौच जाने के लिए अपना बिस्तर छोड़कर के उठ नहीं पाऊंगा। इतने दुर्बल हो गए थे ठाकुर। तो यही लाटू महाराज थे कहते हैं कि हम ही तो आज ही अपना मैं तो हूं आपकी ये जो क्लीन करने के लिए आप आप जो शौच कर करेंगे तो वो साफ करने के लिए मैं तो यहां पर हूं तो ऐसा करके लाटू महाराज है शशि महाराज है ठाकुर की यह जो पर्सनल सेवा है वह बहुत करते थे और उन्होंने ही एक्चुअली सेवा की है किंतु नरेंद्र के पास में से ठाकुर इस तरह की सेवा ग्रहण नहीं करते थे क्योंकि नरेंद्र के भीतर में वह स्वयं नर नारायण ऋषि को अंश उनके भीतर में दर्शन करते थे। नरेंद्र को एक अलग रास्ते से वह गढ़ रहे थे और यह शशि महाराज है, लाटू महाराज है। उनको एक अलग रास्ते से राजा महाराज है। उनको एक अलग तरीके से अर्थात कि किसका क्या संस्कार है किसका क्या प्रयोजन है इस लीला में अवतार लीला में नारायण जब पंचमहाभूत का देह धारण करके पृथ्वी पर अवतरण करते हैं तो उस लीला में बहुत विभिन्न तरह के कार्य करने के लिए विभिन्न पार्षदों का भी अवतरण होता है। तो श्री रामकृष्ण रूपी लीला में लाटू महाराज का क्या अवदान था? शशि महाराज का क्या था? राजा महाराज नरेंद्र का क्या था? वह अवदान के अनुसार ठाकुर ने उनसे उस तरह की सेवा ग्रहण की है। अभी नरेंद्र के पास में से पर्सनल सेवा नहीं ग्रहण की तो फिर नरेंद्र को अपने हृदय का एक-एक रक्त बिंदु उनको बहाना पड़ा था पूरे विश्व में श्री रामकृष्ण देव का प्रचार करने के लिए। यानी कि नरेंद्र का एक महत्ता नरेंद्र की एक महत्ता थी। नरेंद्र का एक पार्टिकुलर रोल था। उसके अनुसार उसको तैयार किया था। तो इसीलिए यहां पर वो नरेंद्र कहता है कि पहले तो जब लाटू महाराज कहते हैं कि ठाकुर तुमको कितना स्नेह करते थे। तुमको छोड़कर के रह ही नहीं पाते थे। कहने का आशय यह है कि नरेंद्र को छोड़कर के ठाकुर यदि नहीं रह पाते थे। नरेंद्र को यदि इतना प्रेम करते ही थे तो फिर नरेंद्र को छोड़कर के उन्होंने स्वधाम विदाई क्यों ले ली? यह कहने का आशय होगा इस सेंटेंस के पीछे में। इसलिए नरेंद्र ने सामने से कहा कि यदि मुझे स्नेह करते थे तो तुमको तो तुम लोगों को तो कम स्नेह नहीं करते थे। तुम लोगों ने ही तो ठाकुर की असली सेवा की है। यह पर्सनल सर्विस आप लोगों ने ही तो की है। मैंने तो और बड़ा क्या कर लिया है। देखो तो लोरेन भाई और केमोन बिनोय जब नरेंद्र ने ऐसा कहा तो लाटू महाराज आश्चर्यचकित होकर के कहते हैं कि देखो तो लोरेन भाई का विनय कितना है। जनरली और किसी को इस तरह से आप प्रशंसा करेंगे कि आपके गुरुदेव आपको बड़ा स्नेह करते हैं तो वो बड़े ही खुश हो जाएंगे। चेहरे पर दिखाएंगे तो नहीं भीतर भीतर में किंतु बड़ी खुशी होगी। वो भीतर भीतर में वह बड़े ही प्रसन्न हो जाएंगे। और भले ही चाहे मुंह पर दिखाने का प्रयास ना करें। भीतर की यह जो एक तरह की गुरूर जो है भीतर में एक तरह का जो गर्व जो है वह दूसरों को पता चल ही जाता है। मनुष्य का मन जो है एक तरह से एक टेलीपैथिक डिवाइस है। हम लोग समझते हैं टेलीपैथी का क्या अर्थ है? दूसरों के मन में क्या विचार चल रहे हैं? उसको पढ़ना माइंड रीडिंग जिसको कहते हैं। क्या यह टेलीपथी है? एक्चुअली टेलीपथी देखें हम सभी के भीतर में है। यह जो सभी हम लोग सभी तो कनेक्टेड हैं। हम सबके भीतर में एक ही आत्मन है। तो आत्मन एक ही है बोलकर के उसकी आत्मन की जो प्रकाश रूप यह जो अपना कॉन्शियसनेस है वह भी इन अ वे कनेक्टेड है। इसलिए दूसरे के मन के विचारों को शायद हम ना पढ़ पाए। किंतु दूसरों के मन का भाव हम आसानी से समझ जाएंगे। यदि किसी के साथ में जाकर के बात करते हैं तो वह कहेगा कि अच्छा आप तो बड़े अच्छे हैं। आप यह कर रहे हैं, वह कर रहे हैं। किंतु हमको कुछ ही क्षण में पता चल जाएगा कि यह प्रशंसा करने के लिए यह सब मुंह से बोल रहा है। इसके भीतर में हमारे प्रति कोई इतना रिस्पेक्ट नहीं है। मुंह पे एक मन में दूसरा यह समझने की शक्ति हम सभी लोगों में होती है। किसी लोगों में कम होती है। किसी किसी में काफी ज्यादा होती है। जो लोग बड़े सेंसिटिव होते हैं उन लोगों के सामने आप अपने मन का भाव छुपा करके कभी नहीं रखने वाले हैं। और जो लोग थोड़े से मूढ़मती होते हैं उनको आप आसानी से मूर्ख बना सकते हैं। गुजराती में एक कहावत है लोभिया हो त्या धुतारा भूखे नो मरे। अर्थात कि जहां पे लोभी आदमी रहता है या तो जहां पे लोभी आदमी है वहां पे यह धुतारे कभी भी भूखे नहीं मरते हैं। क्योंकि जो लोभी है, जो लालचू है, जो वासना से ग्रस्त है, उसकी यह जो कॉमन सेंस है, उसके ऊपर में एक पर्दा लग जाता है। फिर इस तरह से लोभी आदमी को मूर्ख बना करके आप कितने ही पैसे उसको ठग करके निकाल सकते हैं। यह जो शेयर मार्केट में बीच-बीच में स्कैम चलते रहते हैं, वह क्यों होते हैं? क्योंकि लोगों को एक इजी मनी का एक लोभ लग जाता है। वे लोग सोचते हैं कि हार्ड वर्क करके पढ़ाई लिखाई करके या तो फिर यह मार्केटिंग करके अपना बिजनेस बढ़ाना, पढ़ाई लिखाई करके ठीक-ठीक एक कैरियर डेवलप करना ना कि कोई प्रोडक्ट डेवलप करना। ऐसा करके पैसा नहीं कमा करके यदि शेयर मार्केट में डाल के यदि पैसा मिल जाता है तो इससे अच्छा और क्या है? कंफर्टेबल लाइफ लीड करेंगे, लग्जरियस लाइफ लीड करेंगे। ऐसा बोलकर के यह लोग हमेशा किसी ना किसी फिराक में रहते हैं कि कहां से हमको एक अच्छा टिप मिल जाए कि यहां पे पैसा डालना है और फिर शेयर मार्केट ही कहां आजकल तो सभी चीजों में सट्टाबाजी चलती है। यह क्रिकेट का रिजल्ट हो ना कि कुछ भी हो इलेक्शन का रिजल्ट हो सभी पे सट्टा चलता है। सभी पे जुआ बाजी चलती है। तो वे लोग किसी ना किसी टिप की अपेक्षा में रहेंगे। कोई हमको आके बता दे कि यह टीम का अच्छा परफॉर्मेंस है। यह टीम जीतेगी या तो फिर यह पॉलिटिकल पार्टी का परफॉर्मेंस अच्छा है। इलेक्शन में यह लोग जीतेंगे। तो फिर इसके अनुसार यह लोग बैटिंग भी करेंगे। और आजकल यह बैटिंग की ऐप भी आती है। तो इस तरह से इजी मनी की अपेक्षा रखेंगे। तो लोग तो आपको मूर्ख बनाने ही वाले हैं। यह आजकल ऑनलाइन फ्रॉड वगैरह क्यों हो रहा है? हम सबको जैसे कि सबको नहीं किंतु किसी किसी को एक तरह की लालच लग गई है कि यह डिजिटल एज में इस तरह से बैटिंग करके ना ऐसा कुछ करके हमको कुछ आसानी से पैसा मिल जाएगा। किंतु याद रखिए कि देयर इज नो फ्री लंच एट द एंड ऑफ द डे। यह मुफ्त में खाना कहीं नहीं मिलने वाला है। मुफ्त में पैसा कभी नहीं मिलने वाला है। तो जो लोग मूढ़मती होते हैं इस तरह से उनको समझ में नहीं आता कि सामने वाला उनको ठग रहा है। किंतु एक जो क्लियर आइड एक बैलेंस पर्सनालिटी जिसका होगा उसको इजीली समझ में आ जाएगा कि सामने वाले का भाव क्या है। जो मेरी प्रशंसा कर रहा है तो मन के भीतर में हमारे प्रति द्वेष है। यह भी समझ में आएगा और जैसे यह गुरु भाइयों का था कि स्वामी जी भले ही चाहे उनको हजार डांटते हो सबको दिखता था स्पष्ट दिए की तरह स्पष्ट दिए के प्रकाश में सूरज के प्रकाश में किस तरह से आप स्पष्ट चीजों को देख सकते हैं इतना ही क्लियरली स्वामी जी के हृदय में उनके प्रति जो स्नेह प्रेम है वे लोग देख पाते थे बोलकर के स्वामी जी की चाहे कितनी डांट हो उसको को वे लोग माइंड नहीं करते थे तो यहां यहां पर भी जब नरेंद्र ने यह कहा कि अरे भाई ठाकुर सिर्फ मुझे ही कहा तुम लोगों को भी तो इतना प्रेम करते थे। तुम लोगों ने ही तो असली सेवा की है। तो स्वामी जी यह उसको भरोसा दिलवाने के लिए भीतर भीतर में बड़े ही हर्ष हो रहा है। किंतु मुंह पर तो थोड़ा सा विनय दिखाना पड़ेगा कि अरे नहीं नहीं मैं कौन हूं। ऐसा किंतु फिर म क्या है कि भीतर में तो वह गर्व जागृत हो गया है कि देखो लोग मेरी प्रशंसा कर रहे हैं। किंतु स्वामी जी का ऐसा नहीं था। जो मुंह पे है वही हृदय में है। जो जुबान में है वही हृदय में है। तो वह जो जेनुइननेस थी स्वामी जी की वो लाटू महाराज ने पहचानी परख की। इसलिए यहां पर कह रहे हैं कि देखो तो लोरेन भाई का विनय कितना है और कोई होता तो कितना हर्षोतफुल हो जाता किंतु नरेंद्र इतना ही हंबल है इतना ही विनम्र है प्रशंसा में भी और स्तुति में भी स्तुति में भी और निंदा में भी प्रशंसा में भी और यदि क्रिटिसिज्म कोई करता है तो उसमें भी एक दिन तो एक जन गुरु भाई हमारे

विश्वासी भक्त के हृदय में ठाकुर नित्य विराजमान है

सामने दुख करते ला लो बोल ले एक दिन एक गुरु भाई हमारे सामने मेरे सामने दुख करते ला लो दुख करते ला लो ऐसा नहीं दुख करते ला लो बोल लेन क्या बोला तनी अर्थात ठाकुर आमा देर एमनी कोरे फाकी दिए गन कि ठाकुर इस तरह से हमको फांकी देकर चले गए हमको ठग करके चले गए एक तरह से तो फिर म यही बात है कि ठाकुर ठाकुर के नाम पर सब कुछ छोड़ा अभी तो संसार के ना रहे ना ही और कोई रास्ता है हमारे सामने और कोई भरोसा है हमारे सामने तो फिर भविष्य क्या होगा तो क्या ठाकुर ने हमको ठग लिया क्या ठाकुर ने हमको मूर्ख बना करके घर तो छुड़वा दिया किंतु भविष्य में और कुछ रखा नहीं हमारे लिए तो फिर यह जैसे कहते हैं माया मिली ना राम संसार में रहते तो माया मिलती त्याग या तो सन्यास का आश्रय लेते हैं तो राम मिलेंगे। किंतु यहां तो ना मिली माया ना मिले राम। ऐसी अवस्था ठाकुर ने कर दी क्या हमारे साथ में? ऐसा बोलकर के एक गुरु भाई दुख कर रहे हैं। गुरु भाई अर्थात कि उसी त्यागी संतानों में से एक तार कथा सुने हमार भारी दुख हो लो। उनकी बात सुनकर के मुझे बड़ा ही दुख हुआ। बोले दिल मैंने बोल दिया अविश्वासीर ले गए त मोरे गए छ बाकी बिश्न बेचे आ यदि अविश्वासी यदि कोई है तो उनके लिए वह मर गए हैं किंतु जिनके भीतर में जिनके हृदय में विश्वास है उनके लिए वह अभी भी जिंदा है अभी भी जीवित है देख लेना तीन मां के देखा दिलन देखा नहीं तुमने उस दिन सुना नहीं था क्या कि उन्होंने आकर के मां को दर्शन दिया था तेमोन विश्वास थाक ले तनी तोमा के देखा इस तरह का यानी कि मां का जो ठाकुर पर विश्वास था वो विश्वास यदि तुम्हारा भी रहेगा तो ठाकुर आकर के तुमको भी दर्शन देंगे। देखिए कितनी सुंदर बात है। अ जीसस की क्रुसिफिकेशन के बाद में वो जितने भी उनके ये थे एपोस्टल वो सब छोड़कर के चले गए थे। जीसस का बॉडी वहां पर रखा था। उस समय सिर्फ एक ही थी मेरी मैकडेलिन जो कि अभी मेरी मैकडेलिन के रोल के बारे में भी काफी कुछ चल रहा है। इधर-उधर की बातें चर्च ने तो उसके रोल को छुपा देने का ही प्रयास किया। किंतु बाइबल में तो बड़ा स्पष्ट लिखा है कि जब जीसस को वहां पे रखा गया था जीसस के बॉडी को उनके देह को तो सिर्फ वही वहां पर उपस्थित थी। बाकी सब चले गए थे। इसी की एकमात्र श्रद्धा थी कि जीसस जिस तरह से उन्होंने हमको उपदेश दिया है। जिस तरह से उन्होंने हमको यह एक दिव्यत्व का संधान दिया है। जिस तरह से एक दिव्य लोक के बारे में हमको एक बताया है। दिव्य लोक का रास्ता हमारे सामने प्रकाशित किया है। तो वह देह जाने से क्या वह भी चले जाएंगे? बोल के वह वहां पर खड़ी थी। एकाएक जीसस प्रकाशित रूप में प्रकाशमान देह लेकर के उसके सामने आए तो वह इतनी खुश हो गई कि वह जाकर के बाकी जितने भी एपोस्टल थे यह पीटर वगैरह सबको बुलाकर के ले आई। तो देखिए कि एक उसकी श्रद्धा थी जीसस के ऊपर में कि देह जाने के साथ में उनका यह जो दिव्य मिनिस्ट्री जो है दिव्य डिवाइन मिशन जो है वह समाप्त नहीं होने वाला है। तो यहां पर भी हमको पता है कि तीन लोगों को ठाकुर ने उसी समय में चार लोगों को ठाकुर ने उसी समय में दर्शन दिए थे और यह तो रिकॉर्डेड है। अनरकॉर्डेड कितने दर्शन हो गए पता नहीं। सर्वप्रथम उसी दिन शाम को आकर के मां जब निकाल रही थी, आभूषण निकाल रही थी, उस समय मां का हाथ पकड़ कर के कहा कि अरे तुम विधवा के वस्त्र विधवा का वेश क्यों धारण करती हो? मैं गया कहां हूं? यह तो एक कमरे से दूसरे कमरे में जाना। इतना ही तो ऐसा करके मां को दर्शन दिया। उसके कुछ दिनों के बाद में स्वामी जी और हरीश वही पागल हरीश वो यह दोनों जब काशीपुर गार्डन में जब टहल रहे थे तो वो गेट जो था मेन गेट वहां से एक दिव्य एक आकृति एक दिव्य क्रांति से युक्त दिव्य कांत से युक्त प्रकाशमान देह प्रवेश किया और वहां पे वो जो फूलों की जो झाड़ी थी पौधे थे वहां पर जाकर के अदृश्य हो गया तो स्वामी जी को इस बात से इतना एक भीतर में भरोसा मिला कि हां ठाकुर भले ही चाहे यह पंचमहाभूत के देह से चले गए हैं किंतु दिव्य सत्ता के रूप में इन सभी के भीतर में विराजमान है। तो वह नरेंद्र और हरीश यह पागल हरीश भी इतना लकी है कि नरेंद्र का संग करके उसको भी ठाकुर का दर्शन हुआ। और फिर हमने देखा था कि एक रामायित साधु की कहानी उसी दिनों में वह नॉर्थ इंडिया से आया था। ठाकुर के दर्शन करने के लिए दक्षिणेश्वर के पंचवटी में रह रहा था। रो रहा था कि मैं इतना लंबा सफर करके आया और मुझे दर्शन ना देकर आप पहले ही चले गए। तो रो रहा था। भूखा प्यासा पड़ा था। तो वहां गंगा में से ठाकुर प्रकट हुए। उनके हाथ में एक खीर का कटोरा था। कहा कि अरे भाई रोते क्यों हो? यह खीर खाओ थोड़ा सा शरीर में देह में बल लाओ। तो फिर उसने बड़ा ही खुश होकर के यह खीर खाई थी। तो देखिए कि चार लोगों को तो ठाकुर ने उसी दो-तीन महीने में दर्शन दे दिए थे। और किस किसको किसको दिए होंगे हमको क्या पता। किसी ने बताया है, किसी ने नहीं बताया। तो यहां पर भी लाटू महाराज कहते हैं कि अरे भाई तुम इस तरह की बात क्यों कर रहे हो कि ठाकुर हमको फांकी देकर के चले गए। ठाकुर हमको ठग करके चले गए। यदि तुम्हारा ठाकुर के ऊपर में इतना विश्वास है होगा जितना मां का ठाकुर के ऊपर में था तो जिस तरह से मां को उन्होंने दर्शन दिया था तुमको भी दर्शन देंगे। तो यह लाटू महाराज के उस दिनों की कहानी कि कि वराह नगर मठ स्थापित नहीं हुआ है और ठाकुर की महासमाधि हो चुकी है तो भविष्य जो जिस तरह से एक अंधकारमय इनको दिखता था आशा भरोसा हृदय में तो था किंतु हम सबको पता है कि हृदय में हजार आशा हो जब बाहर के सरकमस्टेंस बाहर की परिस्थितियां जब विपदगामी होना विपरीत होना शुरू कर दे तब यह भीतर के आशा भरोसा जो है कभी-कभी हमको इस तरह से छोड़ के चले जाते हैं कि हम क्या करें उस समय समझ में नहीं आता। तो गुरु भाइयों की भी इस तरह की परिस्थिति थी। अब यह त्यागी संतानों के अलावा और ठाकुर को कौन ज्यादा समझा है? तो वे लोग भी यदि बीच-बीच में संदेह ग्रस्त हो जाते थे तो हम लोगों के जैसे सामान्य लोगों की तो क्या बात है? तो वो लाटू महाराज की कहानी अभी देखिए इसी सिलसिले में स्वामी

श्री रामकृष्ण की महासमाधि के बाद स्वामी विवेकानन्द की मनःस्थिति

जी के जो छोटे भाई थे महेंद्रनाथ दत्त उन्होंने स्वामी जी के उस दिनों की कुछ बातें कही है जो कि हमको और कहीं पर देखने को नहीं मिलती। तो देखिए कि स्वामी जी के छोटे भाई क्या कहते हैं स्वामी जी के उन दिनों के समय के बारे में वह कहते हैं नरेंद्रनाथ राम तनु बसुर गलीते गलीर बाड़ी ते फिरिया आबार आईनेर पुस्तक खुलिया पढ़ते लागी ठाकुर की महासमाधि के बाद में अब जब ठाकुर बीमार थे तब तो वह काशीपुर में ही ज्यादातर समय बीतता था घर की व्यवस्था करने के लिए स्वामी जी बीच-बीच में आते जाते रहते थे किंतु एक बार जब ठाकुर की महासमाधि हुई तो फिर अभी रहने को तो और तो कोई जगह है नहीं तो फिर क्या और काशीपुर का वो जो भाड़ा जितने दिन था तो था उसके बाद में कहां पर रहेंगे तो बोलकर के नरेंद्र अर्थात कि स्वामी जी अपना जो घर था राम तनु बसु की गली में वहां पर फिर से आकर के रहने लगे और यह जो लॉ की प्रिपरेशन कर रहे थे लॉ एग्जाम की प्रिपरेशन तो वो कानून की किताबें खोल के फिर से पढ़ने लगे। अभी देखिए यह पढ़ना तो ऊपर ऊपर से है। भीतर में तो पूरा अलग ही सब चल रहा है। परीक्षार आर अल्पो दिन बाकी आ परीक्षा के बस कुछ ही दिन बाकी है। दरजा शो बंदो राखी तेन पाछे के हो आशिया भी रक्त कोरे दरवाजे सब बंद रखते को इस वजह से कि कोई आकर के उनको डिस्टर्ब ना करें। परीक्षा की तैयारी करनी है। किताब पढ़ रहे हैं। परीक्षा सामने ही है। किंतु बोई खुलिया अनेक समय उन्मना होया था कितेन शून्य दृष्टि स्थिर नेत्र किंतु किताब खोलकर के बहुत समय उन्मना होकर के रहते थे। उन्माद की तरह शून्य दृष्टि स्थिर नेत्र इसका अर्थ क्या है? दृष्टि जैसे कि अनंत की ओर देखती रहती और नेत्र स्थिर हो जाते। अपलक पलक भी नहीं झबकती। तो इस तरह से स्वामी जी बैठे रहते। अभी वह कहते तो है कि मैं परीक्षा की तैयारी करने के लिए किताब पढ़ रहा हूं। किंतु कौन सी किताब और कौन सी परीक्षा दरवाजा बंद करके भले ही चाहे बैठे हो दृष्टि है अनंत की और नेत्र है अपलक। यह ठाकुर ने उनको निर्विकल्प समाधि का एक टेस्ट करवा के गए थे। स्वाद देकर के गए थे। अभी किस हिसाब से यह एक लॉ की एग्जाम में एक कानून यह जो लॉयर की एग्जाम में उनका मन बैठेगा एक दिन बेला प्राय तीन टार समय हुटको गोपाल आशिया दरजाई धक्का मारी ते लागी लेन एक दिन ऑलमोस्ट 3:00 बजे की बात है यह हुटको गोपाल आकर के स्वामी जी जिस कमरे में दरवाजा बंद करके बैठे थे उस दरवाजे को धक्का मारने लगे। अभी यह हुटको गोपाल इसका इस समय एक काफी अच्छा रोल था। नहीं जब गुरु भाई सब इितर-बितर हो गए थे बिखर गए थे सब अपने-अपने घर चले गए थे उस समय यह हुटको गोपाल था कि सबको घरघर जाकर के ठाकुर की बातें याद करवाता इसको पकड़ कर के उसके घर ले जाता उसको पकड़ कर के उसके घर ले जाता बंगाली में वो एक कांसेप्ट है घटक ठाकुर अर्थात कि एक इस तरह का ब्राह्मण जो कि अभी यह लड़की का विवाह करवाना है तो पात्र खोजना पड़ेगा तो अभी यह लड़की अपने से तो जाएगी नहीं पात्र खोजने के लिए। मां-पिताजी को भी कई बार पता नहीं होता कौन सा लड़का अच्छा है। तो इस तरह के घटक ठाकुर अर्थात कि एक ब्राह्मण को कहते हैं कि आप अच्छा पात्र जुगाड़ कर दीजिए। पात्र अच्छा होगा। लड़की का विवाह हो जाएगा तो आपको इतनी दक्षिणा देंगे। तो लड़के की पक्ष से भी विवाह करना है। पात्री का संधान करना है। तो इस तरह से किसी घटक ठाकुर को कहेंगे तो इनका काम था कि लोगों का इस तरह से मेल बिठा देना। तो यहां पर यह हुट को गोपाल भी इस तरह से ये सब गुरु भाइयों को इकट्ठा करने में उसका एक क्रिटिकल रोल एक शॉर्ट पीरियड के लिए था। तो एक दिन वो 3:00 बजे आकर के स्वामी जी के दरवाजे पर धक्का मारने लगा। नरेंद्रनाथ गुहिया गुरुहाभ्यंतर होइते कोनो उत्तर कर लेना। जिस कमरे में नरेंद्र बैठा था उसने उसमें से कोई आवाज की नहीं। भले ही चाहे वह दरवाजा खटखटाते रहे वो उन्होंने किसी भी तरह का शब्द नहीं किया किसी भी तरह का उत्तर नहीं दिया शेष काले गोपाल बोली लेन तो स्वामी जी उत्तर नहीं दे रहे हैं दरवाजा नहीं खोल रहे हैं बोल के आ अब ये क्या है कि गोपाल के पास में यह हुटको गोपाल यह नाम स्वामी जी ने ही दिया था हुटको अर्थात कि एकाएकाइयक अचानक वो एकाएक कहां से आ जाता और एकाएक कहीं पर गायब भी हो जाता उसका सब यह अनप्रिडिक्टेबल बिहेवियर था तो इसकी वजह से स्वामी जी ने हुट को गोपाल नाम दिया था। दूसरे थे बूढ़ो गोपाल अर्थात कि हमारे स्वामी अद्वैतानंद जी महाराज भविष्य के तो यह सब नाम देने में स्वामी जी माहिर थे। एक हरमोहन बोलकर के स्वामी जी का मित्र था। उसको उन्होंने नाम दिया था हारमोनियम। तो ये जो अक्षय कुमार रामकृष्ण पंथी के लेखक उनका चेहरा जो था वो थोड़ा सा थोड़ा सा डरावना चेहरा था ऐसा कहे तो चलेगा तो स्वामी जी ने उनको नाम दिया था शंख चुन्नी इस तरह से स्वामी जी नाम देते थे सबको तो ये गोपाल को भी उन्होंने नाम दिया था हुटको गोपाल ये हुटको गोपाल एकाएक कहां से हठ माने सडनली कहां से आकर के उपस्थित हुआ। स्वामी जी का दरवाजा खटखटा रहा है। स्वामी जी उत्तर नहीं दे रहे। दरवाजा नहीं खोल रहे। तो स्वामी जी का साइकोलॉजी किंतु इसको पक्का पता है। तो फिर वो साइकोलॉजी यूज़ करके क्या कहता है? शेष काले गोपाल बोली लेन भाई तो केके तमाक्ष खवाते शेष दरजा खोल ना। तो कहते हैं वो हुटको गोपाल कहता है कि भाई तुमको थोड़ा सा तंबाकू सजा करके खिलाने के लिए आया हूं। तुम दरवाजा खोलो ना। क्यों दरवाजा नहीं खोल रहे? अभी उनके भाई लिखते हैं महेंद्रनाथ कि नरेंद्रनाथ बो तांबाक प्रिय छिलेन सात पांच भाबिया दरजाटा खुली लेन नरेंद्रनाथ था बड़ा ही तंबाकू प्रिय था तो उसने यह पांचसा सोच करके यानी कि इधर-उधर कुछ सोच के सोचा होगा कि यदि तंबाकू बना करके खिला ही रहा है सजा करके तो क्यों नहीं खा ले अभी ये खिलाना अर्थात कि स्मोक करना नहीं कि उसको एक्चुअली खाना ये बेंगली में पानी पीने को भी पानी खाना कहते हैं। तो यह तंबाकू स्मोक करने के लिए वह जो चिलम वगैरह सजा देते हैं वो सजा करके स्वामी जी को देने के लिए यह आया हूं। मैं इस तरह से ये कह रहा है। तो ऐसा सोच के स्वामी जी ने ऐसा सोचा कि चलो थोड़ा सा स्मोकिंग कर ही लेते हैं। कौन सा बुरा है उसमें? यह सोच कर के उन्होंने दरवाजा खोल दिया क्योंकि वह थे बड़े ही तंबाकू प्रिय। देखिए यह जो एक तरह का हास्य विनोद की बात भविष्य में स्वामी जी जब प्रवृजिया कर रहे थे तो वह की कहानी तो बड़ी फेमस है कि वह एक एक जगह पर बैठकर के इसी तरह से चिलम फूंक रहा था। तो स्वामी जी को भी यह तंबाकू प्रिय थे बड़े ही तो उन्होंने देखा कि यह आदमी बैठकर के चिलम फूंक रहा है। तो उस उन्होंने भी साथ में बैठकर कहा कि भाई मुझे भी थोड़ा सा स्मोक करने दो। तो यह आदमी था। वह कहता है कि अरे महाराज आप तो सन्यासी हैं। मैं हूं। नीची जात हूं। कहां मेरे होठों से स्पर्श हुई चिलम आपको मैं दूंगा। मैं तो बड़े पाप में पतित होऊंगा। तो अभी स्वामी जी के संस्कार तो थे। इस तरह के सभी के संस्कार थे। वो जो नात जात वगैरह-वगैरह तो वो खड़े होकर चलना शुरू कर दिया। सोचा कि अच्छा ये तो है। अभी इसकी जो चिलम है कैसे फूंकेंगे? किंतु थोड़े से ही आगे गए तो फिर उन्होंने सोचा कि अरे ये तो मैं खुद यदि अह अय आत्मा ब्रह्मन ये जो मेरा जो आत्मन है वो ब्रह्मन है और ये जो सर्वम खलवम इदम ब्रह्मन ये जो पूरा जगत जो है यह सब ब्राह्मण है ऐसा जो सोचने वाला मैं स्वयं और बाय दैट टाइम यह जो मैक्रोकोजम माइक्रोकोजम वाला एक्सपीरियंस स्वामी जी को ऑलरेडी हो चुका था कि यह जो मनुष्य की दिव्यता है वही दिव्यता पूरे कॉस्मोस में रिफ्लेक्ट होती है। प्रत्येक मनुष्य के भीतर में वह रिफ्लेक्ट होती है। तो इस तरह के एक्सपीरियंस किया हुआ मैं स्वयं निर्विकल्प समाधि प्राप्त हो चुकी है। ठाकुर जैसे उदार हृदय मेरे गुरु थे। मैं स्वयं क्या इस तरह की बातों में आ गया। मैं खुद यह सब बातों में किस तरह से ये हिप्नोटाइज हो गया। जाति पाति के ये सब डिवीजन में बोलकर के स्वामी जी वापस आए। कहा कि नहीं भाई तुमको तो मुझे वो चिलम जो है देना ही पड़ेगा। बोलकर के चिलम फूंकना शुरू कर दिया। अभी यह बात स्वामी जी जब बेलूर मठ में अमेरिका से वापस आकर के अपने गुरु भाइयों को कह रहे हैं तो वह गिरीश घोष भी वहां पर उपस्थित था। तो उसका तो व्यंग विनोद वाला स्वभाव था। तो हंसते-हंसते कहता है कि यह जाति पाती से ऊपर कहां कुछ फूटे नहीं हो तुम। तुम इतने तंबाकू प्रिय हो कि इवन की चिलम भी लेकर के तुम फूंकना शुरू कर दोगे। तो ये स्वामी जी का यह तंबाकू प्रिय था। माने प्रियता जो थी यह स्मोकिंग के प्रति उनका आकर्षण यह बड़ा ही जग जाहिर था उनके गुरु भाइयों के भीतर में अभी जिस तरह जैसे ही स्वामी जी ने दरवाजा खोला गोपाल गहे प्रवेश करिया ई कथा ओ कथार पर काशीपुर कथा तुल लेन गोपाल ने उनके कमरे में प्रवेश करके इधरउधर की बातें करके काशीपुर की बातें करना शुरू किया ए के नरेंद्र नाथ पुस्तकों बंद होया गो यहां पे नरेंद्रनाथ की पुस्तक भी बंद हो गई दुई जने बाहिर होइया पड़ लेन दोनों बाहर निकल गए घर से गोपाल बोली लेन शरत और शशि बाड़ी ते आे दोरे दिक दिए गले शरते बाप टेरर पाबे ओके जानालार दिक दिए डेके डाकी गि गोपाल कहता है कि शरद और शशि अपने घर में है किंतु जब मेन दरवाजे से घर में प्रवेश करेंगे तो जो शरद के पिताजी जो है वह देख लेंगे और उनके पिताजी की यह इच्छा नहीं थी कि वह शरद महाराज जो है इस तरह से यह त्यागी संतानों के साथ में संग करें। खास करके नरेंद्र के साथ में नरेंद्र का ऑलरेडी एक बेड रेपुटेशन होना शुरू हो गया था। तो यह गोपाल कहता है कि जो पीछे का जो दरवाजा है जानालार के अर्थात कि खिड़की की ओर से जाकर के हम उसको पुकारते हैं। तो शरद महाराज बाड़ी ते छिलेन जानाला दिया चादर और जूताटा फेलिया दिल। तो शरद महाराज कमरे में घर में ही थे। जैसे ही खिड़की में से आवाज लगाई इन दोनों ने तो उन्होंने खिड़की का दरवा खिड़की खोल करके वह जो देह पर जो आवृत करने के लिए चादर जो होती है और जूते होते हैं वो खिड़की में से फेंक दिए गोपाल तुलिया ले लेन ऐन एवं रास्ता जनो कोनोकार जे जाते छ ए छोले बाहिर होइया आले तो जैसे ही वो खिड़की में से यह चादर और जूते फेंक दिए तो उसके बाद में शरद महाराज मुख्य दरवाजे से मेन डोर से बाहर निकले ले ऐसा अभी ना ही जूते पहने हैं ना ही चादर पहनी है। अर्थात कोई देखेगा भी तो वह सोचेगा कि अच्छा यह तो किसी काम के लिए जा रहा है। अभी 2 मिनट में वापस आ जाएगा। चादर यदि ओढ़ी हुई है और आवरत की हुई है और यदि जूते पहने हैं तो लगेगा कि यह बाहर किसी काम के लिए जा रहा है। तो फिर उनके पिताजी पूछेंगे कहां जा रहे हो? किंतु बिना चादर बिना जूते बाहर निकल रहे हैं तो कोई पता भी नहीं चलेगा। वो सोचेंगे कि अच्छा अभी 2 मिनट में आ जाएगा। तो इस तरह से छल करके यह शरद महाराज बाहर निकल आए क्रो में तीन जने एकत्र होले फिर तीनों साथ में हुए तीन जने एकत्र कोखन मास्टर महाशय बाड़ी कखनो गिरीश बाबू बाड़ी कखनो बा बलराम बाबू बाड़ी जते छ ये तीन इकट्ठा कभी मास्टर महाशय के घर कभी गिरीश बाबू के घर कभी बलराम बाबू के घर जा रहे हैं वहां पे जाकर के वही पुराने दिनों का आस्वाद वादन करेंगे। पुराने दिनों की याद फिर से ताजी करेंगे। फिर से वही ठाकुर की वाणी को दोहराएंगे। फिर से वही जो दिव्य आनंद उनको प्राप्त हुआ था उसका स्मरण करेंगे। कनो बा लाटू महाराज आशिया राम तनु बसुर गली ते नरेंद्र नाथ नाथर काछे बोशिया थाकी तेन एवं नरेंद्रनाथ के टानिया लोइया जते तो कभी-कभी लाटू महाराज आते स्वामी जी के घर और स्वामी जी को पकड़ कर के खींच करके ले जाते बाकी सब गुरु भाइयों के वहां पे देखिए यह जो सब कहानियां है उस समय के उस दिनों की गुरु भाइयों के हृदय की जो अवस्था है उनके मन की जो परिस्थिति है कितना सुंदर रूप से हमको उसका एक पिक्चर हमारे सामने एक ड्रॉ करती है। एक दिन लाटू महाराज राम तनु बशुर गली बाटीर घरटीते बोश्या नरेंद्र नाथर माता के नरेंद्र नाथर विषय बोली ते लागी लेन एक दिन लाटू महाराज नरेंद्र के घर आए और उनके घर में ही बैठकर के नरेंद्र की जो मां थी भुवनेश्वरी देवी उनके साथ में नरेंद्र के बारे में वार्तालाप करने लगे। क्या कहा? देख नर मटाो मोदार ताले मोतन जे रकम भाबे ग से भाबे रे होए देखिए नरन का मन जो है वह मैदे का जो आटा होता है उसकी तरह है जिस तरह से गढ़ेंगे उस तरह से गढ़ेगा अर्थात महाशक्ति भीतरे रो रही छे अर्थात कि भीतर में महाशक्ति रही है देखिए यह जो लाटू महाराज यहां पर जैसे हमने उस किताब में देखा था लाटू महाराज के रेमिनेशंस में तो उस रेमिनेशंस में देखेंगे कि लाटू महाराज की ओरिजिनल लैंग्वेज प्रिजर्व हुई है। इसलिए वो नरन को लोरेन कहते थे वो हमको स्पष्ट देखने को मिलता है। किंतु यह जो स्वामी जी के भाई ने जो रेमिनेशंस लिखे हैं उसमें लाटू महाराज का यह जो एग्जैक्ट लैंग्वेज प्रिजर्व करने का प्रयास नहीं हुआ है। इसलिए यहां पर लोरेन की जगह उन्होंने कर दिया है नरेन। तो ये अपने लिटरेचर की यह जो सब यह है क्या कहेंगे फ्लेवर्स वो डिफरेंट-डिफरेंट टाइप की किताबें पढ़कर के डिफरेंट-डिफरेंट ऑथर्स को पढ़कर के हमको पता चलता है कि कौन कितना ऑथेंटिक होने का प्रयास करता है। बाकी यह महेंद्रनाथ वैसे तो ऑथेंटिक ही है किंतु लैंग्वेज उन्होंने प्रिजर्व नहीं की है। तो यह लाटू महाराज नरेंद्र की मां को क्या कहते हैं भुवनेश्वरी देवी को कि नरेंद्र का मन इस तरह का है कि जिस भाव से इसका गठन करेंगे जिस भाव में इसको ढालेंगे उस भाव में यह ढल जाएगा। अभी यहां पर देखने की बात है कि जिस भाव में ढालेंगे उस भाव में ढल जाएगा। अर्थात कि एक तो एक फ्लेक्सिबिलिटी है दूसरी की एक महाशक्ति है। तो इसका अर्थ घटन महेंद्रनाथ स्वयं क्या करते हैं? अर्थात महाशक्ति भीतरे रहया छ अर्थात कि नरेंद्र के भीतर में महाशक्ति है जे दिके जोखन लगाईते छे तोख दिक नूतनत्व दिखाईते छे जिस समय जिस कार्य में लगाते हैं उस कार्य में एक क्रिएटिव कुछ उनका बाहर आता है भीतर की टैलेंट यहां पे देखिए कि ठाकुर ने स्वयं कहा था कि यदि नरेंद्र यहां पर नहीं आता तो यह केशव सेन की तरह एक दल का लीडर बनकर के दलपति बनकर के रह जाएगा। अर्थात भीतर में शक्ति तो है। यह बहुत ज्यादा यदि ब्रह्मो समाज की ओर चले जाता नरेंद्र तो उनकी तरह एक केशवसेन की तरह हो जाता। किंतु जब ठाकुर के पास में आया है तो ठाकुर के भाव में रंग करके एक सिद्ध महापुरुष युगनायक विवेकानंद होंगे। तो यह लाटू महाराज का एनालिसिस था नरेंद्र के बारे में। इस तरह का नरेंद्र का मन है कि जिस मोल्ड में ढालेंगे जिस घट में ढालेंगे उस तरह का उसका आकार हो जाएगा। तो अच्छा है कि ठाकुर के पास आए नहीं किसी दुष्ट व्यक्ति के पास में या तो फिर भले ही चाहे केशव दुष्ट ना हो भले ही चाहे अच्छा ही आदमी हो किंतु जो स्वामी जी का रियल पोटेंशियल निकलना था वह वहां पर नहीं आता जो कि ठाकुर के पास रहकर के उनका रियल पोटेंशियल मैनिफेस्ट होने वाला था। तो यहां पर यह सब प्रसंग समाप्त होते हैं और इसके बाद का वही घटना कि सुरेंद्रनाथ को सुरेंद्रन मित्र को ठाकुर का दर्शन हुआ और ठाकुर ने कहा कि तुम मठ का प्रारंभ करो। तो वो कहानी जो है वराह नगर मठ की स्थापना और वराह नगर मठ की कहानियां उसको अभी हम नेक्स्ट क्लास से देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ये जो ठाकुर कहते हैं ना नरेंद्र को पूछते हैं कि ये अमृत समुंदर में के किनारे तुम खड़े रहोगे तो कैसे तुम उससे अमृत का पान करोगे तो नरेंद्र कहता है मैं किनारे से मुंह लंबा करके थोड़ा धीरे-धीरे करके पान करूंगा। ठाकुर कहते हैं भाई यह अमृत का सागर है। उसमें पड़ने से गिरने से मरोगे नहीं अमर हो जाओगे। तो ठाकुर की कहानियां भी ऐसी है। वो

प्रश्न: नरेन इतना तर्क करता था की सब ब्रह्म कैसे हो सकता है किन्तु ठाकुर एक ही स्पर्श में उसे विश्वास करा देते है।

वो वो जो ठाकुर कहते हैं ना कि 100 सुनार की एक लोहार की। म नरेंद्र की 1000 तर्क और ठाकुर का एक स्पर्श

प्रश्न: नरेन कहता है अन्धविश्वास नहीं होना चाहिए. ठाकुर कहते है विश्वास विश्वास है, उसमे देखने वाला या अन्ध कैसे हो सकता है.

ना इसका एग्जैक्टली लॉजिकल कंक्लूजन कहां पर देखना है पता है ठाकुर की ये जो बात और नरेंद्र का यह पूरा वार्तालाप इसका लॉजिकल कंक्लूजन कहां आता है गिरीश घोष जब नरेंद्र के साथ में वो एक तर्क प्रारंभ करता है डिबेट प्रारंभ करता है कि श्री रामकृष्ण है अवतार और स्वामी जी कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि ठाकुर पर श्रद्धा नहीं है किंतु उनको ईश्वर मान के उनकी पूजा करना यह सब थोड़ा सा नरेंद्र को उस समय पेटेबल नहीं हो रहा था एक रैशनलिस्टिक माइंड था तो तो अभी देखिए कि गिरीश का विश्वास इतना था और इतनी पावरफुल आर्गुमेंट करता था कि एक समय नरेंद्र चुप हो गया तो उसने फिर काउंटर आर्गुममेंट करना बंद कर दिया। तो किसी ने आकर के ठाकुर को कहा कि यह गिरीश के सामने नरेंद्र हार गया है। तो ठाकुर इमीडिएटली कहते हैं नहीं इसलिए नहीं। फिर नरेंद्र कहता है कि देखिए उनका विश्वास इतना है कि फिर उसके सामने अभी मुझे कुछ बोलने की इच्छा नहीं रही। यानी कि सेम थिंग कि जैसे कि यदि नॉलेज हो जाता है तो दैट इज वन थिंग। किंतु विश्वास जब इतना दृढ़ हो जाता है तो फिर ये अंध देखना यह सब क्या है? विश्वास विश्वास है। फिर उसके सामने बिना मतलब तर्क करने से कोई लाभ नहीं है। तो यहां पे एक्चुअली देखिए कि दोनों को ठाकुर ही एनकरेज कर रहे हैं कि वह जो ठाकुर की कहानी है ना कि एक छोटा आदमी अर्थात कि एक आम आदमी एक बड़े जमींदार के साथ में मुकदमा लगाता है। तो फिर ठाकुर कहते हैं कि हमको समझ लेना है कि वह आम आदमी के पीछे में और एक जमींदार खड़ा है। यहां पे वो गिरीश को वो आगे कर रहे हैं कि नरेंद्र के साथ जाकर के तर्क करो। नरेंद्र को तो रेडी करना है ना भविष्य के लिए। तो अभी गिरीश घोष को लगा देंगे। कभी यह मास्टर महाशय को लगा देंगे। जाओ उसके साथ में जाकर तर्क करो।

प्रश्न: ठाकुर के भक्तो के सामने स्वामीजी की तर्क में हार होती है देख कर अच्छा लगता है. जैसे गोपाल की माँ के सामने हार गए. भक्ति के सामने ज्ञान की हार.

और इसमें स्वामी जी की तो महत्ता दिखती है ना। देखिए कोई एक स्टबोन पर्सन होगा कि जिसका अभी खुद पर विश्वास इतना हो गया है। स्वामी जी कहते हैं ना कि एक समय था कि आपको यह भगवान पे भूत पर विश्वास था। आज ये हकसली और टिंडले पे विश्वास है। वही अंधविश्वास जो कि आपको यह सब चीजों के ऊपर में था। तो वही अंधविश्वास आज आपको साइंस पे आ गया है। तो यह जो रैशनलिस्टिक लोग भी होते हैं वह भी एक अंधविश्वास में आकर के कि नहीं साइंस ही सही है। मेरा ही प्रपोजिशन सही है। ऐसा बोलना शुरू कर देते हैं। तो नरेंद्र भी तो ऐसा कर सकता था कि मैं रैशनलिस्टिक हूं। मैं ही सही हूं। मैं कभी भी दूसरों के सामने हार नहीं स्वीकार करूंगा। तो नरेंद्र ने ऐसा कभी नहीं किया। तो दैट वास हज ग्रेटनेस कि वह समझता है कि जिस तरह से विश्वास की लिमिटेशन होती है वैसे रैशनलिस्टिक थॉट की भी लिमिटेशन होती है। बियों्ड दैट इज ज्ञान वहां पर हमको जाना होगा। हां माने अदरवाइज ये अघोरमणि देवी कहां स्वामी जी कहां कहां वो बौद्धिक क्षमता कहां वो इवन आध्यात्मिक क्षमता दोनों में स्वामी जी उनसे कितने ऊपर थे। किंतु फिर भी उनके सामने वह रोना शुरू कर दिए। सो दैट इज स्वामी जीस ओन ग्रेटनेस। ना और उसका देखिए कि स्वामी जी की जो अघोरमणि देवी पर गोपाल की मां पर जो डिवोशन था भक्ति था तो वह निवेदिता ने भी वही भक्ति निवेदिता में से आई मतलब ये अपने गुरु की भक्ति को निवेदिता को जैसे कि वारसे में मिली और अधोरमणि देवी पे निवेदिता की जितनी श्रद्धा थी कि वह फिर आखिर आखिर समय में उनका समय चल रहा था अोरमणि देवी का तो निवेदिता अपनी स्कूल में ले आई और स्वयं उनकी सेवा करती थी और एक फोटोग्राफ भी है वो अघोरमणि देवी लेटी हुई है। निवेदिता पास में बैठी हुई है। तो वही स्वामी जी का जो डिवोशन उनके प्रति था वह निवेदिता एज इफ इनहेरिटेड द सेम डिवोशन

स्वामी विवेकानन्द की जीवनी और वाणी तथा उनके शिष्यों के चरित का अध्ययन कैसे करे.

कि स्वामी जी का जीवन चरित्र हमारा जितना जितना चलता रहेगा ना तो स्वामी जी के साथ में जो लोग एसोसिएटेड है सबके बारे में हम डिटेल में डिस्कस करेंगे। उसमें भी स्वामी जी के वेस्टर्न डिसाइपल जो कि अब जैसे निवेदिता जैसे हमको ऐसा लग रहा है कि ज्यादा उसके बारे में डिस्कस नहीं करते तो वैसे ही ये एलिस हेंसब्रो है, एडथलन है, आइड अंसेल है जो कि स्वामी जी इन लोगों को कैलिफोर्निया में मिले थे। तो यह बोस्टन न्यूयॉर्क एरिया वाले जितने भी है वह तो फेमस हो गए। सारा ओलीबुल जोसेफाइन मैक्लाउड यह बेटी लेगेट वगैरह निवेदिता ब्रिटेन की थी क्योंकि स्वामी जी फर्स्ट विजिट में उनको मिले थे तो इनके पास में काफी टाइम था स्वामी जी का संग करने का और अपने साहित्य में एक स्थान ग्रहण करने का किंतु कैलिफोर्निया विजिट स्वामी जी का आखिरी आखिरी था तो उस समय जो सब उनके जो एक्वेंट्स डिसाइपल वगैरह थे उनका एक अद्भुत चरित्र है सो सब हम बड़े डिटेल में डिस्कस करेंगे इसीलिए मैं स्वामी जी का लाइफ किसी किताब के अनुसार नहीं कर रहा हूं। किंतु कोई भी किताब स्वामी जी को जस्टिस नहीं देगी। अकेली किताब। सो सब जगह से हम कलेक्ट करेंगे। किंतु फिर देखिए ऐसा भी कहना फिर स्वामी जी को लिमिट करना हो गया ना। क्योंकि स्वामी जी को सही-सही पढ़ना है तो उनका कंप्लीट व्स भी पढ़ना पड़ेगा। उनके बारे में जो स्मृति कथाएं हैं उनके डिसाइपल की वह भी पढ़नी पड़ेगी। और ठाकुर के साथ में मां के साथ में क्या इंटरेक्शन था वह तो स्वामी जी लेटर में बहुत कम लिखते हैं। सो ओवरऑल पढ़ना ही पड़ेगा स्वामी जी को लाइफ कंप्लीट वर्क्स और रेमिनेशंस तीनों को कंबाइन करना पड़ेगा। साथ-साथ में उनके डिसाइपल्स की लाइफ को भी कंबाइन करना पड़ेगा। अभी जैसे मैं राजकोट

निवेदिता की कहानी

में था तो निवेदिता अपने लेटर्स में स्वामी जी के बारे में क्या लिखती है? उसका कंपाइलेशन मैं पब्लिश करता था मैगजीन में। इतना सुंदर-सुंदर सब बातें हैं। अद्भुत सब बातें हैं। तो वो भी हम इसमें ले लेंगे धीरे-धीरे करके सब वो स्वामी जी को किंग करके पुकारा करती थी। माने ये जो ये तीन थी ना वो क्लोज वेरी क्लोज थी तीनों निवेदिता जोसेफाइन मेकलाउड सारा ओली बुल। तो ये तीन जब आपस में जब लेटर्स वगैरह लिखेंगी, बातें करेंगी तो स्वामी जी को किंग करके पुकारती थी। द किंग सेड मी दिस। किंग सेड मी दैट व्हिच इज़ वेरी स्वीट एक्चुअली किंग कभी-कभी प्रॉफेट कहेगी निवेदिता का खास करके ऐसा था कि निवेदिता के मन में कुछ ना कुछ दुविधा चल रही थी। यह कहानी हमने टुकड़ों-टुकड़ों में थोड़ा सा डिस्कस किया है। हम लोग डिटेल में उसको करेंगे डिस्कस। अ जब स्वामी जी निवेदिता को लेकर के सेकंड टाइम अमेरिका गए तो प्लान ऐसा था कि निवेदिता अपनी स्कूल के लिए पैसा कलेक्ट करेगी। अनफॉर्चूनेटली उसको इतना पुअर रिस्पांस मिला कि उसका पूरा यह होप आशा वगैरह एकदम भग्न हो गया। तो वो तो एक फैक्टर था। दूसरा एक फैक्टर प्रारंभ हुआ कि निवेदिता खुद ऐसा सोचने लगी कि जब तक भारत को पॉलिटिकल फ्रीडम नहीं मिलता है तब तक यह कन्या विद्यालय सिर्फ चलाने से होने वाला नहीं है। निवेदिता के माइंड में है कि इस तरह से पॉलिटिकल फ्रीडम जब तक भारत को नहीं मिलता है। इस तरह से स्कूल चलाने से वगैरह करने से ज्यादा कोई लाभ नहीं है। अभी बात ऐसा नहीं है कि स्वामी जी थ्योरिटिकली इस बात से असहमत थे। यह तो किसी को भी स्पष्ट रूप से पता है। समझ में आता है कि पॉलिटिकल फ्रीडम तो होना ही चाहिए। यदि कल्चरल स्पिरिचुअल रहने सा लाना है। किंतु स्वामी जी का बड़ा स्पष्ट था कि रामकृष्ण मिशन इस पॉलिटिकल फ्रीडम जो मूवमेंट है उसमें पार्टिसिपेट नहीं करेगा। तो वो एक निवेदिता और स्वामी जी का डिफरेंस ऑफ ओपिनियन सीरियसली शुरू हुआ। एक तो जो स्कूल चला रहे हैं उसमें कोई एनकरेजमेंट नहीं मिल रहा है। दूसरा कि भारत में जो एक जाति प्रथा नात जात का इतना भयानक था कि यह ब्राह्मण लोगों के घर में निवेदिता रह नहीं पाएगी। यानी कि देख सोच के देखिए कि वो ब्रिटेन छोड़कर के वो भारत की सेवा करने के लिए भारत में आई और मां के घर में निवेदिता रह रही है तो वह सब वो मां की जो बाकी सब थी सेविकाएं वगैरह भक्तों को पसंद नहीं आ रहा है कि वह एक म्लेच्छा आ करके मां के साथ में रह रही बोल के तो चारों ओर से निवेदिता के ऊपर में यह आघात हो रहे थे। तो सेकंड टाइम जब स्वामी जी के साथ में निवेदिता अमेरिका आई तो फिर उसने अपना एक अलग से करने का कुछ थिंकिंग करने का वगैरह प्रयास किया। सफल नहीं हो रही है। अल्टीमेटली मन के भीतर में स्वामी जी के ऊपर में भी कहीं-कहीं कुछ डाउट होना शुरू हुआ। किंतु एक बड़ा ही सुंदर सीन है। निवेदिता खुद वर्णन करती है। कहती है कि स्वामी जी जब कैलिफोर्निया से लौटे और न्यूयॉर्क में वह पहला प्रवचन देने वाले थे। अभी यह तो आखिरी प्रवचन माला थी। स्वामी जी की न्यूयॉर्क में वो देंगे जो प्रवचन उसके बाद में जो अमेरिका छोड़ के जाएंगे तो सीधा अभी उनका जीवन तो अभी समाप्ति की ओर जा रहा है। तो न्यूयॉर्क के लेक्चर में निवेदिता पहले से ही जाकर के बैठ गई है। अभी स्वामी जी जब कैलिफोर्निया गए थे स्वामी जी सेकंड टाइम अमेरिका आए तो पहले तो वे लोग गए थे वहां पे रिजली मैनर में। तो निवेदिता रिजली मैनर में स्वामी जी के साथ में थी कुछ दिन। किंतु उसके बाद में स्वामी जी चले गए थे कैलिफोर्निया। तो निवेदिता स्वामी जी के साथ कैलिफोर्निया नहीं गई थी। वह अपने से फंड कलेक्ट करने का प्रयास कर रही थी। तो वह जो पीरियड था कि स्वामी जी है कैलिफोर्निया में यहां पे निवेदिता ईस्ट कोस्ट पे फंड कलेक्ट करने का प्रयास कर रही है। दैट वाज़ द डारकेस्ट पीरियड इन निवेदितास लाइफ। एक तरह से एक अविश्वास आ गया कि ना ही पैसा मिल रहा है ना ही यह पॉलिटिकल फ्रीडम के बारे में स्वामी जी कुछ स्वीकार करने को तैयार नहीं है। तो फिर मेरा प्रयोजन क्या है? तो जब स्वामी जी कैलिफोर्निया से लौटे न्यूयॉर्क में जो पहला लेक्चर देने वाले थे उस लेक्चर हॉल में निवेदिता बैठी थी। अभी यह बात निवेदिता स्वयं कहती है कि मेरे हृदय में एक संदेह जागृत हो गया कि मैं अपने गुरुदेव को इतने टाइम के बाद में फिर से मिलूंगी तो उनके प्रति वही श्रद्धा भक्ति मेरी रहेगी कि नहीं। तो एकदम हृदय में एक तरह का डर बैठ गया है कि यदि स्वामी जी पर श्रद्धा नहीं रहेगी तो फिर मेरा जो जीवन लाइफ चॉइस जो मैंने किया है मेरा घर छोड़ के भारत जाने का उसका कोई अर्थ ही नहीं रहेगा तो बोलकर के डरी हुई बैठी है और वो लिखती है स्वयं कि जैसे ही स्वामी जी ने उस कमरे में प्रवेश किया जैसे ही मैंने स्वामी जी का दर्शन किया वैसे ही मेरे मन में जितने भी संदेह थे जितना भी डर था जितनी भी आशंकाएं थी कहां पे जैसे के उड़ गई और जब स्वामी जी ने बोलना शुरू किया तो उनकी अमृतमय वाणी के प्रवाह में जैसे कि मैं अपने को खो बैठी। सो दैट वाज़ अ पॉइंट ऑफ रिकंसिलिएशन। किंतु अनफॉर्चूनेटली यह रिकंसिलिएशन भले ही चाहे हृदय का हो गया हो मन का नहीं हुआ था। तो जब स्वामी जी के साथ में वह यूरोप आई तो साथ में कि स्वामी जी भी रिटर्न आ रहे हैं। तो रिटर्न आने के समय कुछ समय वह फ्रांस में रहने वाले थे। तो निवेदिता साथ में थी। सारा ओली बुल साथ में थी। तो उस समय फिर दोनों का जो डिबेट दोनों का जो आर्गुमेंट प्रारंभ हुआ तो उस देख के वह सारा ओलीबुल कहती है कि मैं निवेदिता को लेकर के अलग जा रही हूं वो ब्रिटेनी अर्थात कि यह जो फ्रांस का ब्रिटेन के सामने का जो किनारा है समुंदर का किनारा वहां पे तो वहां पे जाकर के निवेदिता को लेकर के सारा ओलीबुल रहने लगी। अभी यहां पे स्वामी जी मोस्ट प्रोबेबबली पेरिस में थे उस समय। अभी पेरिस से विदाई ले रहे हैं। किंतु स्वामी जी विदाई लेने से पहले अपने मन में सोचते हैं कि निवेदिता को मिलकर जाना है। बिना उसके साथ में मुलाकात किए नहीं जाना। तो वह स्वामी जी निवेदिता को मिलने के लिए ब्रिटेन आते हैं। वहां कुछ कुटिया में यह लोग रह रहे थे। तो यह दूसरा एक सुंदर वर्णन निवेदिता करती है। कहती है कि स्वामी जी आए मेरे साथ में बात किया। उसके बाद में स्वामी जी जा रहे हैं तो वह जो बैलगाड़ी में बैठकर के स्वामी जी जा रहे हैं पीछे की साइड में बैठ के और निवेदिता के साथ में ऐसा कर रहे हैं उनको म विदाई ले रहे हैं और निवेदिता कहती है कि मैं अपने हाथ में एक लटन लेकर के खड़ी थी स्वामी जी का विदाई में दर्शन कर रही थी संध्या का समय था बोल के सो एक दूसरी उनका यह जो एक ये हुआ कि कहेंगे कि रिकंसिलिएशन हुआ नहीं ब्रिटेनी में और उसके बाद में स्वामी स्वामी जी इंडिया आए और उनके जीवन का आखिरी समय जब आ गया फोर्थ जुलाई को स्वामी जी की महासमाधि थी उससे आई थिंक दो-ती महीने पहले ही निवेदिता भारत लौटी उस ये जो समय जो निवेदिता ने ब्रिटेन में यूरोप में बिताया उसमें वो जो एक प्रोफेसर गेडेस बोल के एक था तो उसके चक्कर में वह पड़ गई थी। अभी उसका भी तो माइंड बड़ा ऐसा था ना कि शी इज़ सर्चिंग कि कहां पे उसका कुछ सॉल्यूशन मिले। तो ये प्रोफेसर गेडेस के वो जो आइडियाज थे उसके सब जो थे उसके साथ में निवता आकर्षित होकर के उनके साथ में कुछ समय बिताया था उनकी असिस्टेंट होकर के किंतु आखिर में उसको पता चला कि नहीं इवन यह जो इनके भी विचार है वह स्वामी जी के पास में कहीं आने वाले नहीं है। तो स्वामी जी की महासमाधि के दो-तीन महीने पहले ही निवेदिता भारत आई और स्वामी जी के साथ में रिकंसिलिएशन हुआ और बड़ा ही सुंदर दृश्य वही स्वामी शिष्य संवाद में वह शरद चंद्र चक्रवर्ती लिखते हैं कि निवेदिता आई स्वामी जी बहुत बीमार थे। कुछ बोल भी नहीं पा रहे थे। आखिरी समय बिल्कुल चल रहा है। तो निवेदिता आई चुपचाप वहां पे जो द उनके कमरे की चौखट थी वहां पर बैठी। कुछ समय बिताया जैसे कि स्वामी जी के जो पवित्र जो वाइबेशंस है वह ग्रहण किए और फिर चुपचाप वहां से चली गई। सो दैट वाज़ कि निवेदिता की आखिरी मुलाकात। एक दिन स्वामी जी ने उसको बुलाकर के खाना खिलाया था। भोजन खिलाया था। भोजन करवाने के बाद में स्वयं निवेदिता के हाथ धो रहे हैं। तो निवेदिता कहती है कि अरे स्वामी जी आप यह क्या कर रहे हैं? तो मेरे हाथ आप क्यों धुलवा रहे हैं? वो हाथ में वो जल डाल रहे हैं जिससे कि वो अपना हाथ धो सके। तो स्वामी जी ने कहा कि जीसस ने भी तो अपने डिसाइपल्स के पैर हाथ धोए थे। तो निवेदिता के मन में आशंका जागृत हो गई कि वह तो एकदम आखिरी समय में हुआ था। निवेदिता लिखती है दैट वास द लास्ट टाइम। तो ये सम हाउ उसको पता चल गया कि दिस इज द लास्ट मीटिंग। और उसके बाद में स्वामी जी की महासमाधि और फिर निवेदिता एकदम फिर वो पॉलिटिकल फ्रीडम वगैरह की ओर बढ़ गई। सो उन दोनों का जो ये पूरा एक स्टोरमी एक रहा रिलेशन निवेदिता का स्वामी जी पे पर्सनल श्रद्धा भक्ति बहुत था। किंतु उसके जो आइडियाज है खास करके पॉलिटिकल फ्रीडम के बारे में वो स्वामी जी थ्योरेटिकली स्वीकार करते थे। प्रैक्टिकली तो रामकृष्ण मिशन को उस डायरेक्शन में जाना संभव नहीं था। पूरी स्टोरी कहेंगे एक बार कभी टाइम मिलेगा तो पूरी मतलब कैसे निवेदिता कौन-कौन से स्टेप के माध्यम से स्वामी जी के आकर्षित हुई। फिर माने एक टर्निंग पॉइंट बहुत बड़ा टर्निंग पॉइंट है वह अमरनाथ यात्रा कि किस तरह से अमरनाथ गुफा में स्वामी जी को दर्शन हुआ किंतु निवेदिता जैसे कि अतृप्त रह गई और फिर वहां से एक डिफरेंस ऑफ ओपिनियन जैसे कि और जोर पकड़ने लगा। सो दैट्स अ लॉन्ग स्टोरी और बड़ी ब्यूटीफुल स्टोरी है। निवेदिता के खुद के शब्दों में वो हमको पढ़ना है उसको।

प्रश्न: विश्वास क्या है. विश्वास कैसे प्राप्त करें?

विश्वास का बेसिक अर्थ क्या है? देखिए हम लोगों के लिए सिर्फ विश्वास इनफ नहीं है। सिर्फ डिवोशन इनफ नहीं है। हमको थोड़ा सा ज्ञान भी डेवलप करना होगा। किंतु वह हमारे लिए है। अ जो लोग अवतार के साथ में आते हैं। अवतार के जो पार्षद होते हैं उन लोगों का कैटेगरी ही अलग है। जैसे कि जब तक वर राजा है तब तक वर यात्री जो है अह वे लोग आनंद ही करेंगे। तब तक वे लोग दुख में नहीं रहेंगे। यह ठाकुर कहते मां खुद कहती थी कि जय राम बाटी में आए हो इतना जप ध्यान करने की क्या जरूरत है वह तो तुम घर जाकर भी कर सकते हो यहां पे तो जय राम बाटी में जो आराध्या देवी इष्ट स्वयं आपकी नजरों के सामने विराजमान है तो उनकी सेवा करनी है कहां उनकी आराधना करनी मतलब कहां उनका उपासना करनी है उनकी कहां उनका ध्यान करना है उनकी सेवा करनी है सो यह जो सिर्फ विश्वास नहीं विश्वास के साथ में बड़ा ही क्लोजली रिलेटेड है सेवा हुआ ठाकुर को कैंसर हुआ तो किस तरह से डिवीजन होना शुरू हो गया। कुछ लोगों ने कहा कि हम लोग सेवा करेंगे। कुछ लोगों ने कहा कि ठाकुर से जितना मिलना था हमको मिल गया। इससे ज्यादा कोई अपेक्षा नहीं है। बोलकर के वे लोग बहिरंग हो गए। अभी जो अंतरंग थे उसमें भी फिर दो डिवीजन हो गए। एक डिवीजन था कि जो लोग ठाकुर के साथ में रहकर के पूरा जीवन समर्पित कर दिया और दूसरा डिवीजन था मास्टर महाशय बलराम बाबू रामचंद्र दत्त वगैरह कि हां सेवा करने के लिए तत्पर तो थे किंतु फिर से जो संपूर्ण रूप से सेल्फ सैक्रिफाइस करना था अपने सांसारिक जीवन का वह नहीं कर पाए। यानी कि यदि विश्वास के ग्रेडेशन देखेंगे तो यह तीन ग्रेडेशन आपको दिखते हैं। ठाकुर के पास जो लोग आए हैं उन सबका ठाकुर पर तो श्रद्धा भक्ति होना ही है। अदरवाइज तो क्यों ठाकुर के पास आते? किंतु जो सबसे आउटसाइड जो ग्रेड था या आउटसाइड लेवल था वे लोग थोड़ा सा भी ठाकुर के लिए सैक्रिफाइस करने को तैयार नहीं थे। ना ही वह संसार को सैक्रिफाइस करने के तैयार थे। ना ही वह जो एक श्रम दान कर सेवा एक अंगत सेवा जो करनी है ना ही उसके लिए तैयार थे तो एक आउटसाइड लेयर हो गया इनर लेयर में फिर दो होते हैं कि हां ठाकुर की सेवा करने को तो तैयार है किंतु संसार को सैक्रिफाइस करने के लिए तैयार नहीं और जो इनर मोस्ट लेयर है ठाकुर की सेवा भी करेंगे और संसार को भी सैक्रिफाइस कर दिया संपूर्ण रूप से न्योछावर कर दिया अपनी सब कामना वासनाएं तो विश्वास का अर्थ क्या है। हाउ विल यू मेजर द विश्वास? तो अभी हृदय में तो कोई देख नहीं सकता है। आप भी कहेंगे मेरे में विश्वास है। मैं भी कहूंगा मुझ में विश्वास है। बट हाउ विल यू से कि मेजर कैसे करेंगे? तो मेजरमेंट है अपने कार्य से वह मेजर होगा कि मैं कहां तक जाने को तैयार हूं। किस एक्सट्रीम तक जाने को तैयार हूं। सो विश्वास का यदि आपको ग्रेडेशन करना है तो किस लेवल तक यह लोग सैक्रिफाइस करने को तैयार है जिनके प्रति विश्वास है उनके लिए दैट विल डिटरमाइन ग्रेडेशन और लेवल यानी विश्वास का जर्नी है इन अ वे इट्स अ जर्नी ऑफ़ सैक्रिफाइस। आई थिंक इट इज़ अ फीडबैक लूप। ऐसा मुर्गी पहले ना कि अंडा पहले इस तरह का ये शायद हो जाएगा। यदि हम ऐसा सोचेंगे कि साधना करने से विश्वास होता है या विश्वास करने से साधना होती है। बोथ एक दूसरे को परिपुष्ट करते हैं। इट्स लाइक ए फीडबैक लूप कि यदि मैं थोड़ा सा विश्वास है तो उसको लेकर के मैं थोड़ा सा तो साधना कर लूं। अदर वाइज वो स्वामी जी ना कि ठाकुर कौन कहता है कि मैं पहले तो तैरना सीखूंगा फिर पानी में छलांग लगाऊंगा तो ना ही आप तैरना सीखेंगे ना ही आप पानी में गिरेंगे जो थोड़ा बहुत हाथ पैर लगाना आता है पानी में गिरो हाथ पैर लगाओ देखोगे थोड़े समय में धीरे-धीरे करके तैरना सीख लोगे सो जो थोड़ा विश्वास है उससे साधना स्टार्ट कर देनी है जो थोड़ी साधना है उससे विश्वास ले आना है इवेंचुअली यह दोनों एक दूसरे को परिपुष्ट करते जाएंगे