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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः कल रयान जी महाराज की तिथि पूजा थी तो मुझे मंदिर में बोलना था महाराज जी के बारे में मैं थोड़ा सा यह सब चिंतन कर रहा था कल तो पता है कि 12 जनवरी यानी कि इंग्लिश कैलेंडर के अनुसार स्वामी जी का भी बर्थडे है तो यह मैं सोच रहा था कि दोनों का कंबाइन कर दे तुर आनंद जी का भी और स्वामी जी का भी अभी क्या होता है कि बहुत सारी चीजें हम लोगों ने पढ़ी होती है किंतु जब तक हम इन सब चीजों के ऊपर में एक गहराई से जाएंगे नहीं एक डिफरेंट तरह से चिंतन करें नहीं तब तक क्या है ना कुछ कुछ चीजें जैसे कि हमको ऐसा स्ट्राइक नहीं होती है थोड़ा सा किंतु आप थोड़ा चिंतन चालू करेंगे ना आपको एकदम नई नई चीजें स्ट्राइक होना शुरू होगी तो कल मैं सोच रहा था कि हरि महाराज और स्वामी जी दोनों को कंबाइन करके कुछ बोला जाए तो दोनों का आ जाएगा स्वामी जी का 12थ जनवरी का भी हो जाएगा नेशनल यूथ डे का और रियाना जी का भी हो जाएगा तो थोड़ा सा बैकग्राउंड रीडिंग भी कर रहा था तो जो मुझे एक स्ट्राइक हुआ कंट्रास्ट और कंप्लीमेंट स्वामी विवेकानंद और स्वामी रयान जी के जीवन में किस तरह से देखिए जब तुर्या जी महाराज हमको पता है कि उनका नाम था हरि हरि महाराज ठाकुर के पास में वैसे तो नियमित जाते थे दक्षिणेश्वर किंतु कुछ समय वह गए नहीं अभी जब ठाकुर के पास गए नहीं तो ठाकुर ने किसी को पूछा कि व क्यों लड़का क्यों नहीं आ रहा है काफी दिन हो गए मैं इसको यहां पर देखता नहीं हूं तो जिनको यह प्रश्न किया गया था उन्होंने उत्तर दिया कि महाशय अभी तो यह हरि है बहुत सारे वेदांत के ग्रंथों का पाठ करता है और यह वेदांत के ग्रंथ का पाठ करते-करते ही वह बड़ा बिजी रहता है तो ठाकुर ने कहा अच्छा ठीक है उसको एक बार मेरे पास आने को कहना तो अभी यह जो मित्र था हरि महाराज का उसने जाकर के हरि महाराज को बताया कि ठाकुर तुमको बुला रहे हैं जाओ जाकर एक बार मिलक आओ तो अभी देखिए यह भी तो एक बड़ा मिस मतलब एक बड़ा ग्रेटेस्ट फॉर्चून है ना कि अवतार स्वयं उनको बुलाते हैं हम लोग कितना ही जब ध्यान कर ले कितना ही उनको पुकार ले वो कहां वह उनको हमको बुलाएंगे यहां पर वो सामने से किंतु हरि महाराज को पुकारते हैं कि आओ मुझे मिलने के लिए आओ तो हरि महाराज गए ठाकुर को को मिलने के लिए अभी ठाकुर क्या कहते हैं कि देखो तुम यह जो सब वेदांत के ग्रंथों का पाठ कर रहे हो तो उसमें क्या लिखा है मुझे बताओ उसका एसेंस क्या है तो अभी हरि महाराज सोचने लगे अभी हरि महाराज ने क्या सोचा हमको पता नहीं किंतु मैं थोड़ा सा अपनी कल्पना का रंग डाल कर के मैं अनुमान करके कह सोच रहा हूं कि हरि महाराज सोचते होंगे कि इतने सारे वेदांत के ग्रंथ है पंचदशी है विवेक चूड़ामणि है यह शंकराचार्य के भाष्य है भाष्य के ऊपर में फिी टिकाए हैं इतने सारे प्रकरण ग्रंथ लिखे गए हैं यह सब बिना पाठ किए संपूर्ण रूप से वेदांत में संपूर्ण रूप से एक्सपर्टाइज्ड तो यह तुम इस एसेंस को ले लो तुम इतना सब यह सब ग्रंथों के पाठ में इतना क्यों लगे हुए हो जैसे ही ठाकुर ने यह बात कही हरि महाराज को एकदम जैसे कि मन में स्ट्राइक हुआ कि हां ठाकुर तो ठीक ही कहते हैं आप वेदांत के कितने ही ग्रंथ आप कितने ही सालों तक उसका अध्ययन करते जाइए एट द एंड ऑफ द डे आपको तो यही बात मिलने वाली है फिर अब जैसे कि देखिए वेदांत यदि आप स्टडी करेंगे तो अल्टीमेटली आपको बोल दिया जाएगा कि हमको यह माया की वजह से या तो अज्ञान की वजह से यह जगत का सही स्वरूप क्या है समझ में नहीं आता है इसको कहते हैं अध्यारोपण के ऊपर में अविद्या अज्ञान का अध्यारोपण करके यह जीव जगत यह पंचकोष पंच प्राण पंच ज्ञानेंद्रिय पंच कर्मेंद्रिय मन बुद्धि चित्त अहंकार यह सब कुछ मैं नहीं हूं ऐसा करके अपनी वासनाओं को काटते काटते आखिर में आपको ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना है यही तो है ना वेदांत का व पूरे जितने भी ग्रंथ पढ़ ले यही आपको मिलने वाला है एसेंस इससे बाहर तो कुछ आने वाला नहीं है तो फिर यह ग्रंथ का पाठ करके यह जो सब पांडित्य चतुराई वाक चतुराई आर्गुमेंट यह सब में बहुत ज्यादा जाने की बजाय बेटर है कि साधना का प्रारंभ कर दे तो देखिए कि यहां पे जैसे कि उसी दिन फिर हरि महाराज ने क्या किया कि ये जितने भी वेदांत के ग्रंथ थे उनको सबको गंगा में फेंक दिया और ठाकुर के कहे अनुसार साधन भजन का प्रारंभ कर लिया अभी देखिए हरि महाराज के साथ में यह घटना हुई नाउ कंट्रास्ट और कंपेयर कीजिए स्वामी जी के साथ में काशीपुर में क्या हुआ काशीपुर में ठाकुर है ठाकुर को को कैंसर हो गया है आखिरी दिन चल रहे हैं स्वामी जी ने अपने गुरु भाइयों को कह दिया कि मुझे लग रहा है कि अभी ठाकुर ने ठीक कर लिया है कि वह देह की रक्षा नहीं करने वाले हैं उन्होंने देह त्याग का संकल्प शायद ले लिया है आओ ठाकुर के यह जो आखिरी दिन है हम लोग साधन भजन करके मनुष्य जीवन की जो सर्वोच्च प्राप्ति है मनुष्य के लिए जो सर्वोच्च प्राप्त व्य है उसको प्राप्त कर ले अपना जीवन धन्य बना दे तो ऐसा करके स्वामी जी साधन भजन में डूब गए अभी ऐसा साधन भजन करते-करते एक बार उन्होंने ठाकुर को ऐसा कुछ कह दिया कि मेरी तो ऐसी इच्छा है कि मैं सब समय समाधि में मग्न रहूंगा और बीच-बीच में कहीं इस लौकिक जगत में आकर के आहार वगैरह दैहिक कुछ क्रियाएं कर लूंगा जिससे कि देह की रक्षा हो सके देह बना रहे किंतु ये एसेंशियल दैहिक क्रियाएं है उसको समाप्त करके फिर से मैं समाधि में बुंद हो जाऊंगा तो उनको ठाकुर ने क्या उपदेश दिया कि अरे तुमको लानत है धिक्कार है तुमको तुम ऐसी छोटी बातें करोगे मुझे तो कभी सपने में भी मैंने नहीं सोचा था मैंने तो सोचा था तुम उस विराट वटवृक्ष की तरह होंगे जिसके नीचे में जिसकी छाया में कोटि कोटि लोग आकल के शीतलता और आनंद प्राप्त करें करेंगे यहां पर ठाकुर नारायण को कहते हैं कि यह जो मनुष्य जीवन का जो सर्वोच्च प्राप्त व्य है जिसको कि अपने शास्त्र में दर्शाया गया है उससे भी परे तुमको जाना है तो ऑफकोर्स स्वामी जी को तो पूरा एक यह जो भारत भ्रमण करके फिर यह जो अल्मोड़ा की गुफा में उनको जो अनुभूति हुई थी उनकी बहन की जो मृत्यु का समाचार जो प्राप्त हुआ था वो बहुत सारी उसके भीतर में से जाकर के तब कहीं जाकर के स्वामी जी को यह सब समझ में आया था कि ठाकुर उनसे क्या आशा रखते हैं अभी यह दोनों का कंट्रास्ट देखिए यहां पर हरि महाराज को ठाकुर कहते हैं कि देखो तुमको यह ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या करके तुम साधन भजन में लग जाओ और यहां पर स्वामी जी को कहते हैं कि यह जो ब्रह्म प्राप्ति की यह जो तुम्हारी इच्छा है उससे भी परे जाओ उससे भी परे कुछ है ये कैसा एक कंट्रास्ट लगता है थियर जद कि तो आप समझेंगे प्रश्न होगा कि क्या ठाकुर वैसे तो एक अधिकारी वाद है अपने संघ में और इन जनरल भी है किस तरह की कंट्रास्टिंग थिरी कंट्रास्टिंग टीचिंग्स आप देखते हैं आपात विरोधाभासी कोई आपको बात दिखती है तो हमेशा जानिए कि इसके पीछे अधिकारी वाद है अर्थात कि हरि महाराज इस तरह की साधना उनके लिए श्रेष्ठ थी तो वह साधना हरि महाराज को दर्शित की गई स्वामी जी के लिए यह साधना उनके लिए आवश्यक थी तो वह स्वामी जी के लिए वह साधना प्रदर्शित की गई किंतु और भी थोड़ा सा गहराई में जाकर के देखेंगे तो हमको पता चलेगा कि नहीं ठाकुर की एक यूनिवर्सल थिरी है जिसको कि हमने काफी बार डिस्कस किया है यह यूनिवर्सल थिरी के माध्यम से ये आपात अः जो कंट्रास्टिंग दिख रहा है इन दोनों के बीच में इन दोनों का आप एक जैसे कि एक संयोग एक संगम कर पाएंगे और ठाकुर की थियर क्या है देखिए कि साधना के दो स्टेज है एक तो है कि नेति नेति करके अपनी कामनाओं वासनाओं का त्याग करके हमको कैसे भी करके ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लेना है कैसे भी करके निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर लेनी है फिर जैसे ठाकुर हमको वो उपमा देकर के समझाते हैं कि एक बार आपने सीढ़ी चढ़ कर के छत के ऊपर में गए तब आपको पता चलेगा कि जिस चीज की यह छत बनी हुई है जिस ईंट जिस रेती जिस सीमेंट जिसकी यह छत बनी है वही ईंट वही रेती वही सीमेंट का यह पूरा जगत बना हुआ है अर्थात कि निर्विकल्प समाधि में जब ब्रह्मज्ञान प्राप्ति होती है तब पता चलेगा कि वही ब्रह्मण से ही पूरा जी जीव जगत सब कुछ बना हुआ है तो यह जो प्रथम स्टेज में मैं पंच ज्ञानेंद्रिय नहीं पंच कर्मेंद्रिय नहीं पंच महाभूत नहीं पंच प्राण नहीं पंच तन मात्रा नहीं मन बुद्धि चित्त अहंकार नहीं यह जीव जगत इन सबसे मेरा कोई भी वास्ता नहीं बोलकर के सबके साथ में यह संपर्क खंडन करते-करते जब आप निर्विकल्प समाधि प्राप्त करेंगे उसके बाद में यदि मां की इच्छा हुई सबके लिए नहीं अदर वाइज तो जनरली क्या होता है कि 21 दिन के बाद बाद में समाधि में देह त्याग हो जाता है किंतु यदि मां जगदंबा की इच्छा हुई अभी यह भी एक कैसा एक पैराडॉक्स है यहां पर हम सर्वोच्च अद्वैत ज्ञान की बात करते हैं सर्वोच्च निर्विकल्प समाधि की बात करते हैं वहां पर अपनी इच्छा संपूर्ण रूप से लुप्त हो जाती है वहां पर कहां से मां जगदंबा आ जाएगी कहां मां इच्छा करेगी कि नहीं इसके देह को रखा जाए इसके मन बुद्धि चित्त अहंकार को अंतःकरण को रखा जाए जिससे कि यह जगत में वापस जाकर के लोक कल्याण का कार्य करेगा यह जो ठाकुर कहते हैं तो यहां पे सर्वोच्च अद्वैत ज्ञान और यह सर्वोच्च भक्ति यह शास्त्र इन दोनों का जैसे कि एक संगम भी होता है कंट्रास्ट भी होता है और सही में इसको रिजॉल्व करने का क्षमता अभी मेरे में तो नहीं है कि कहां सर्वोच्च अद्वैतवाद की दृष्टि से सर्वोच्च निर्विकल्प समाधि प्राप्त की वहां पर मां जगदंबा कैसे आ जाएगी वहां तो आपको मां जैसे कि ठाकुर की कहानी है कि जब ठाकुर निर्विकल्प समाधि में जाने का प्रयास कर रहे थे तब सब समय उनकी नजर के सामने मां जगदंबा आकर के खड़ी हो जाती थी क्योंकि ठाकुर ने वह पूरा जीवन मां का ही नाम लेकर के मां की ही पूजा आराधना करके बिताया है वह जो जैसे एक ठाकुर की खुद की कहानी है ना कि एक पंडित था उसको पकड़ कर के मुसलमानों ने जबरदस्ती धर्मांतरण करवा दिया उसको मुसलमान बनवा दिया अभी वह बीच-बीच में वह उसके का जो नाम है वह ले रहा है उसी में बीच-बीच में काली का नाम आ जा रहा है तो सभी लोग उसको मारने को दौड़ते हैं क्यों तुम बीच-बीच में काली का नाम रह र तो बोलता है कि काली मेरे गले तक आ गई है इसलिए वो माने इच्छा नहीं होने पर भी मां काली का नाम आ जाता है क्या करू यहां पर भी ठाकुर को मां काली गले तक आ गई थी और निर्विकल्प समाधि में जाने से पहले भी निर्विकल्प समाधि में जाने का प्रयास करने पर भी मां काली नजर के सामने आ जा ती थी तब तोतापुरी ने वह काच का टुकड़ा लिया सर के ऊपर में यहां पर ऐसा किया एक जोर से उनको यह किया और कहा कि अभी यह जो दर्द हो रहा है उसके ऊपर में मन को कंसंट्रेट करो और ठाकुर ने उसके ऊपर में मन को कंसंट्रेट किया और जैसे ही मां काली उनकी नजर के सामने फिर से आई तो वैसे ही ठाकुर ने ज्ञान रूपी असी से मां के दो टुकड़े कर दिए और वैसे ही उनका मन सीधा निर्विकल्प समाधि में मग्न हो गया अभी यही ठाकुर हमको कहते हैं कि निर्विकल्प समाधि में वैसे तो 21 दिन में मृत्यु होती है किंतु यदि मां काली चाहे मां जगदंबा चाहे कि हां इसके शरीर की रक्षा करने से लोगों का कल्याण होगा तो उसी मन को फिर यह सोने का बना करके मन को संपूर्ण रूप से परिशुद्ध करके फिर से जगत में वापस भेजती है यानी कि इती इती करके इस जगत में वापस आना यह जो मन का संपूर्ण ट्रांसफॉर्मेशन कैसा और ठाकुर और तोतापुरी की वह वर्ल्ड फेमस घटना कि तोतापुरी ठाकुर को नियमित साधना का रहस्य समझाते समझाते वो उपमा देक कहते हैं कि यह कमंडलु है मेरा इसको मैं यदि प्रतिदिन ध होंगा नहीं तो इसके ऊपर मैं धूल मिट्टी लग जाएगी यानी कि प्रतिदिन साधना नहीं करने से जगत का यह जो जगत के प्रति अपनी लोलुपता है वो अपने सर पर आकर के घर जमा देगी तो साथ-साथ में ही ठाकुर क्या उत्तर देते हैं कि किंतु जद ये जो कमंडलु है व यह लोटा है लोटा कमंडलु नहीं लोटा यह लोटा जद सोने का हो जाए तो तो आपको उसको प्रतिदिन धोने की जरूरत नहीं पड़ेगी तो तोतापुरी इमीडिएट बड़े ही प्रसन्न हो गए कि एकदम पक्का शिष्य उनको मिला है क्यों निर्विकल्प समाधि में अपना यह जो काम कांचन युक्त तमस और रजस युक्त मन संपूर्ण सत्व में परिणत हो जाएगा संपूर्ण सत्व में ट्रांसफॉर्म हो जाएगा फिर यह जब इति इती करके यह पूरा जीव जगत सब कुछ ब्रह्मण की ही एक किरण से प्रकाशमान है ब्रह्मण का ही एक स्वरूप है ब्रह्मण का ही परिणति है तो ऐसा समझ कर के जब जमीन पर वापस आएंगे पृथ्वी पर जद वापस आएंगे तब उनका मन सोने का हो गया होगा और किसी भी तरह की कामना वासना लोलुपता उनको स्पर्श नहीं करेगी तो अभी देखिए कि यह ठाकुर का थिरी है ठाकुर चाहते थे कि नरन निर्विकल्प समाधि के भी परे जाकर के इती इती करके इस जगत में वापस आए और जगत का कल्याण करें यानी कि एक ही थिरी के माध्यम से आप दोनों को समझ सकते हैं जब तुर्या अंद जी को ठाकुर कहते हैं कि ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या इसके अलावा तो तुम्हारे वेदांत में और कुछ नहीं है तो बिल्कुल सही कि यह साधन का समय है यह नेति नेति वाला फेज है उस समय आपको मन प्राण इंद्रियों पर संपूर्ण संयम रख कर के कैसे भी करके ब्रह्म प्राप्ति कर लेनी है और जब स्वामी जी को कहते हैं कि तुम यह निर्विकल्प समाधि में बुंद रह कर के उसी में मग्न रहने की यह जो बातें करते हो यह कैसी हीन बुद्धि का कार्य है अर्थात कि निर्विकल्प समाधि के बाद में स्वामी जी को वापस आकर के जगत का कल्याण करना है और स्वामी जी ने यह किया भी सही कि जब वहीं पर काशीपुर में ही स्वामी जी को निर्विकल्प समाधि प्राप्त हो गई थी किंतु ठाकुर ने क्या कहा मैंने ताला लगा दिया है और चाबी अभी मेरे पास में है तो स्वामी जी अपना पूरा जीवन फिर ये जो सेकंड स्टेज है इती ईती का यानी कि जगत कल्याण के लिए जो करना है बिल्कुल निरह का होकर के ऐसा भाव नहीं कत भाव नहीं है कि हां मैं कल्याण कर रहा हूं यह सब मेरे ही एक एक्सटेंशन है यह जो एकत्व भाव है जो पीड़ा मेरे हाथ को इजा मेरे हाथ में जद इंजरी होती है और जो पीड़ा मुझे होगी यह मेरे भाई के हाथ में जद इंजरी होगी तो वही पीड़ा मुझे होनी चाहिए क्यों उनके भीतर में भी वही ब्रह्मण है मेरे भीतर में भी यही ब्रह्मण है यानी कि गोइंग बियोंड जस्ट पीटी और कंपेज करुणा या दया के परे जाकर के यह इनफाइनों एंड कंपेज तो यह यूनिटी का भाव स्वामी जी के माइंड में था और फिर स्वामी जी ने जगत कल्याण के लिए रामकृष्ण संघ की स्थापना की तो ये एक थिरी हो गई कि पहले तो हमने यह जो दक्षिणेश्वर काशीपुर वाला जो फेज है ठाकुर के रहते-रहते ठाकुर के इस देह में रहते-रहते जो घटनाएं हुई ये उसका एक विवरण है किंतु बाद में देखिए कि ठाकुर की जब महासमाधि हुई उस महासमाधि के बाद में तुर्या अंद जी ने स्वामी जी के पास में से किस तरह से ये जो सेकंड फेज है उसके सीक्रेट सीखे क्योंकि ठाकुर से तो उन्होंने यह सीख लिया था कि ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या संपूर्ण रूप से त्याग करके कठोर त्याग करके आपको साधन भजन करना है यह बात तो उन्होंने आत्मसात कर ली थी किंतु इसके परे का जो स्टेज है कि हां यदि आपको ब्रह्म ज्ञान प्राप्त हो जाता है उसके बाद में समग्र जगत के साथ में आपको एका काता अनुभव करके जगत के कल्याण के लिए और फिर यह जगत का कल्याण ऐसा नहीं वह आत्म प्रसाद के लिए आपको कार्य करना है क्योंकि यह मेरा भाई है मेरी बहन है यह पशु है पक्षी है पेड़ है पौधे हैं वो तो मेरे ही स्वरूप है मैं आत्म प्रसाद के लिए अपने खुद के आनंद के लिए जो कार्य करूंगा उसका बेनिफिट तो सबको मिलने वाला है जगत का कल्याण वह बात ही बाद में नहीं आती फिर तो आत्म प्रसाद आत्म तृप्ति आत्मशांति वाली बात आ जाती है मैं अपने आत्म शांति के लिए आत्म आनंद के लिए जो करूंगा उससे जगत को कल्याण ही होने वाला है मैं गलती से भी दूसरों को इजा हो दूसरों को कष्ट हो दूसरों को हानि हो ऐसा गलती से भी इस तरह का कार्य मैं बाद में नहीं कर पाऊंगा तो यह जो सेकंड स्टेज की शिक्षा जो है यह हरि महाराज ने स्वामी जी के पास से किस तरफ पाई थी तो यह सेकंड स्टेज हरि महाराज की लाइफ में और यह जो स्वामी जी के साथ में वह जो उनका यह जो जीवन भर का ये जो इंटरेक्शन चला है वह सेकंड स्टेज जब आता है कि ठाकुर की महासमाधि हो गई है और फिर यह सभी गुरु भाई वराह नगर मठ में रह रहे हैं फिर व वहां पर तो वैसे काफी वेदांत चर्चा वगैरह होती थी किंतु फिर एक समय ठीक हुआ कि स्वामी जी ने ठीक किया कि बस अभी प्रव्रज्या प्रारंभ की जाए वह हिमालय पुकार रहा है साधुओं के हृदय में वैसे स्वामी जी कैसे भी ठाकुर ने कहा था साथ में रहना है तो कुछ साल तो साथ में रहे किंतु सब समय यह हिमालय की पुकार यह मां गंगा की पुकार यह भारत की यह जो विशाल जंग वन वन राजी है अरण्य है यह खुले मैदान है यह तो पुकारता है तो साधुओं को यह कितने सारे तीर्थ स्थान है तो स्वामी जी और हरि महाराज वगैरह सब वहां से प्रव्रज्या के लिए निकल पड़े अभी देखिए कि एक के बाद एक कैसी घटनाएं होती है स्वामी जी की जो उदार हृदयत है स्वामी जी का ये जो विस्तृत हृदय है उसका परिचय धीरे-धीरे करके हरि महाराज को कैसे मिलता है एक तो हिमालय में तपस्या करने के बाद में मेरठ में सभी गुरु भाई इकट्ठा हो गए काफी गुरु भाई जैसे कि वहां पर एक छोटा सा वराह नगर मठ ही स्थापित हो गया और सभी लोग आनंद से कुछ दिनों के लिए साथ में रहे उस समय स्वामी जी ने एक दिन हमको तो पता है स्वामी जी बहुत अच्छा खाना पका सकते थे तो स्वामी जी ने एक दिन एक बड़ा बड़ा सुंदर एक डिश बनाया मोस्ट प्रोबेबली पुलाव ही था तो यह बना कर के स्वामी जी ने सबको खिलाया अपने गुरु भाइयों को अब ये हरि महाराज ने जब वो खाया तो उनको इतना आनंद हुआ बोल रहे हैं कि नरेंद्र तुम इतना अच्छा खाना बनाते हो वाह मुझे तो इतना सुंदर लगा ऐसा करके जब हरि महाराज प्रशंसा कर रहे थे तो स्वामी जी ने क्या किया अपने लिए जो थोड़ा बचा करके रखा था आखिर में वो भी हरि महाराज को दे दिया तो हरि महाराज बोलते हैं अरे नरन तुम अपने लिए बचा करके नहीं रख के अपना पूरा यह सब मुझे दे रहे हो तुम क्या खाओगे तब स्वामी जी क्या कहते हैं कि आमी तो ये सब ढेर खे छी यह सब तो मैंने बहुत खाया है अभी तुम उसको खाओ तुमको खाते हुए देख कर के मुझे तृप्ति होगी तो यह देखिए एक कैसा एक छोटी सी घटना है किंतु स्वामी जी की उदारता और यह जो उनका जो हृदय जो प्रसारित होने लगा है उसका कितना सुंदर उदाहरण इसके बाद में मेरठ से फिर स्वामी जी ने भारत की यात्रा प्रारंभ की प्रव्रज्या प्रारंभ की यह दिल्ली फिर यह राजपूताना फिर यह गुजरात फिर यह महाराष्ट्र फिर यह त्रावणकोर वहां से चेन्नई उस समय का मद्रास और फिर मद्रास में फिर उन्होंने ठीक किया कि जो उनके जो मित्र उनके जो फॉलोअर्स इकट्ठा हुए थे उनके पास में उन्होंने ठीक किया कि वे लोग स्वामी जी को स्पांसर करेंगे वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में जाने के लिए किंतु फिर उस समय दो बातें थी कि वो पूरा खर्चा उठाने की क्षमता वो मद्रास के डिसाइल्स में नहीं थी दूसरी बात है कि चंदा इकट्ठा करना यह सब स्वामी जी को पसंद नहीं था जैसे ठाकुर को नहीं पसंद था वो काशीपुर के लिए जब चंदा इकट्ठा करने की बात हुई थी तब ठाकुर ने कह दिया कि ऐसा सब मत करो नरेंद को कह दिया कि तुम अपने कंधे प बिठा कर के मुझे जहां ले जाओगे वहां प मैं जाऊंगा तो ये चंदा इकट्ठा करने वाली बात ठाकुर को भी नहीं पसंद थी मां को भी नहीं ये जब मां जयराम बाटी में थी तो एक ब्रह्मचारी वहां पे आसपास के गांव में चंदा इकट्ठा कर रहे थे अपने ही ऑर्डर के कि ये रिलीफ एक्टिविटी चल रही है उसके लिए पैसा चाहिए तो ऐसा चंदा इकट्ठा करते-करते डोनेशन कलेक्ट करते-करते वो मां के पास में जयराम बाटी आकर के कुछ दिन रुके तो मां ने पूछा कि तुम क्यों यहां पे आए हो जैसे वो प्रेम से पूछते हैं क्या कर रहे हो अभी कैसे मतलब तो ये ब्रह्मचारी महाराज ने बताए कि मां ये मैं यहां पे मैं सब डोनेशन कलेक्ट कर रहा हूं रिलीफ एक्टिविटी के लिए वो मां ने इमीडिएट कह दिया कि देखो यह जो यह जो ठाकुर के यह जो जगह है उन मां की खुद की यह जो जगह है जयराम बाटी कामर पुकुर यहां आसपास में तुम चंदा इकट्ठा मत करो तुमको यदि पैसा कलेक्ट करना है तो दूर कहीं जा करर के करो यानी ये ये क्या है कि यदि कोई धनी व्यक्ति या तो फिर कोई रसत दार जिसका जिसका मन थोड़ा सा पवित्र है और जिसके पास में धन है वह आकर के स्पों सर करता है तो ठीक है किंतु लोगों के पास में चंदा इकट्ठा करना ये तीनों को नहीं पसंद था तो स्वामी जी ने भी सोचा कि कैसे पैसा इकट्ठा करें उसी समय वह खेतड़ी से आहवान आया कि वह अजीत सिंह का लड़का हुआ है स्वामी जी के ही आशीर्वाद से वो स्वामी जी को खेतड़ी बुला रहे हैं और वोह जो उनका जो मुंशी था जगमोहन वह भी आ गया चेन्नई कि चलिए स्वामी जी आप हमारे साथ में खेतड़ी चलिए और फिर यदि आपको वहां पर जाना है अमेरिका तो राजा सब व्यवस्था करेंगे उनके एजेंट बंबे में आपके लिए जहाज वगैरह बुक कर देंगे जहाज पर आपका बर्थ बुक कर देंगे कपड़े वगैरह परचेस कर लेंगे तो स्वामी जी वहां चेन्नई से मद्रास से चले खेतड़ी वहां पर खेतड़ी से जब वापस जा रहे थे वहां पर उस समय आबू जंक्शन पर हरि महाराज से फिर से मुलाकात हो गई देखिए वहां पर मेरठ में मिले थे स्वामी जी ने जो बनाया था खाना सब हरि महाराज को खिला दिया था अभी फिर से मुलाकात हो गई आबू और यह आबू से बम्बे गए साथ में अभी बम्बे में स्वामी जी हरि महाराज को कहते हैं कि देखो हरि भाई यह साधन भजन तपस्या करके मुझे कितना प्राप्त हुआ यह सब मुझे नहीं पता है कितना आत्मज्ञान मिला कितना यह ब्रह्म ज्ञान मिला वह सब तो मैं समझ नहीं पा रहा हूं किंतु मेरा हृदय बड़ा ही विशाल हो गया है भारत की यह जो परिस्थिति है भारतीयों के दुख दर्द कष्ट है वह देख कर के अभी मैं रह नहीं पा रहा हूं और मैं उनके कल्याण के लिए कुछ तो भी तो मुझे करना पड़ेगा देखिए कि यहां पर स्वामी जी एकदम स्पष्ट रूप से पहली बार ज जैसे कि यह ठाकुर का यह जो महामंत्र उनको काशीपुर में मिला था और उससे भी पहले यहां पर दक्षिणेश्वर में एक बार ठाकुर ने कहा था कि जीव पर दया करने वाले तुम कौन हो तुमको तो जीव की शिव के रूप में सेवा करनी है पूजा करनी है वह जो महामंत्र ठाकुर से जो सीखा था स्वामी जी ने पहली बार उसका इतना वैसे चेन्नई वगैरह में उन्होंने बोले होंगे किंतु यह जो अपने गुरु भाइयों के पास में स्पष्ट उसका आर्टिकुलेशन है यहां पर हमको देखने को मिलता है और फिर वहां से स्वामी जी गए अमेरिका वर्ल्ड फेमस हो गए पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में शिकागो में प्रवचन दिया अमेरिका में वेदांत योग सिखाया भारत वापस आए उस समय मठ था आलम बाजार में और फिर वहां से वह बेलूर मठ की स्थापना हुई स्वामी जी के वो जो सपना था आदर्श था शिव ज्ञान जीव सेवा उसका यह प्रचार करने के लिए फिर वहां से जब स्वामी जी सेकंड टाइम अमेरिका जाने के बारे में सोच रहे थे तब स्वामी जी ने हरि भाई को फिर से कहा हरि महाराज को तुर्या अंद जी को कि मैं जा रहा हूं फिर से निवेदिता भी साथ में आ रही है तुम आप भी चलिए मेरे साथ में तो अभी हरि महाराज तो दुनिया भर के बहाने बनाने लगे अभी क्या है कि उनका तो पहले तो बात थी उनकी कि एक इंट्रोवर्ट नेचर था एक रिजर्व उनका नेचर था फिर यह साधन भजन तपस्या करके ही इंद्रिय संयम करके ही तो उन्होंने समय बिताया था यहां तक कि स्वामी जी एक्नॉलेज करते हैं एक पत्र में लिखते हैं कि जब भी मैं हरि महाराज का हरि भाई का त्याग तपस्या पूर्ण जीवन देख देखता हूं उसके बारे में मैं सोचता हूं वैसे ही मुझे एक ऐसा स्पिरिचुअल बूस्ट मिलता है तो स्वामी जी भी यह बात एक्सेप्ट करते हैं किंतु साथ-साथ में ही स्वामी जी चाहते थे कि यह ठाकुर का यह जो महामंत्र है इस युग के लिए ठाकुर का जो संदेश है उसको तो फैलाना ही पड़ेगा सिर्फ अपने खुद के साधन भजन करके बैठे रहने से बात नहीं बनने वाली तो फिर स्वामी जी ने बड़ी ही विनती की बार-बार रिक्वेस्ट करने लगे और हरि महाराज भी है कि बार-बार कैसे कोई ना कोई बहाना करके बात को टालते टालने लगे तो आखिर में फिर और कोई फिर वो उपाय नहीं मिला तो स्वामी जी के पास में जो ब्रह्मास्त्र था अपने गुरु भाइयों को पटाने के लिए वो ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया हरि भाई को गले पर लगा कर के उनको आलिंगन करके रोना शुरू कर दिया कहा भाई ये मैं अपना जीवन बूंद-बूंद मेरे रक्त उसको पात करके मैं जीवन को मैं मेरा नष्ट करके इस स्वास्थ्य को इस देह को नष्ट करके मैं ठाकुर का काम कर रहा हूं क्या तुम लोग सब खड़े-खड़े देखते ही रहोगे क्या तुम लोग मेरे लिए मुझे सहाय करने के लिए कुछ भी करोगे नहीं जैसा ही स्वामी जी ने रोते-रोते कहा वैसे ही हरि महाराज का हृदय पिघल गया कहा कि ठीक है भाई तुम यदि मुझे कहते ही हो तो मैं तुम्हारे साथ में अमेरिका जाने को तैयार हूं किंतु तुम तो पता है तुमको पता है मेरे बारे में ये प्रवचन देना ये प्लेटफॉर्म वर्क ये जो वर्ड यूज करते हैं प्लेटफॉर्म वर्क यह सब तो मेरे से होने वाला नहीं है मैं तुमको किस तरह से सहाय करूंगा तब स्वामी जी कहते हैं कि देखो यह सब चिंता तुम मत करो प्रवचन देना वगैरह तुम सब एक जीवन जपन करो बस लीड अ लाइफ लीड अ होली एंड प्योर ऑस्टरी टियर लाइफ और इसी से फिर लोग अनुप्रेरणा होंगे लोग इंस्पायर होंगे और हुआ भी वही आखिर में तो फिर यह स्वामी जी हरि महाराज को लेकर के सेकंड टाइम अमेरिका की यात्रा किए और जब वहां पर जाने से पहले ही उनको स्वामी जी ने अपने अमेरिकन डिसाइल्स को बता दिया था कि अभी तक तुम लोगों ने क्षत्रिय पावर देखा है मेरे भीतर में किंतु अभी मैं आपके पास में इस तरह के साधु को लेकर आने वाला हूं जिनके भीतर में तुम लोगों को ब्राह्मण पावर दिखेगा यह क्षत्रिय और ब्राह्मण यह दो अपनी परंपराएं हैं सनातन परंपराएं क्षत्रियों को देखिए कि ये अपने भगवान राम भगवान कृष्ण यह जैसे कि थे कि त्याग के जैसे कि सर्वोच्च आदर्श भगवान बुद्ध तीन हम देखते हैं कि जो सर्वश्रेष्ठ जो जिनको कहेंगे अवतार जो कि भारत में प्रकट हुए तीनों ही जैसे कि क्षत्रिय थे और साथ-साथ में ही यह ब्राह्मण परंपरा है अपने वेद उपनिषदों के ऋषि मुनि है जिन्होंने स्वाध्याय अध्ययन अध्यापन करके यह जीव जीवन बिताया है शांति से जीवन बिताया है और भारत में यह शास्त्र परंपरा अमर रख कर के गए हैं यह जो मेसोपोटामिया है ना कि इजिप्त है जहां वो पुरानी संस्कृतियों थी ये नाइल वैली सिविलाइजेशन आज देखिए कि उस सिविलाइजेशन का कुछ भी बचा नहीं है पिरामिड सिर्फ बचे हैं किंतु भारत में देखिए कि अभी भी वैदिक परंपरा जीवित है जैसे कि स्वामी जी ने खुद ने कहा था कि मनु फिर से जदिया तो फिर टाइम मशीन में बैठकर जद भारत में आ जाए टाइम मशीन मेरा शब्द है तो कैसे भी करके यदि आज के वर्तमान युग में भगवान मनु वापस आ जाए तो उनको अलग से कुछ नहीं दिखेगा वही सनातन परंपराएं अभी भी उनको जीवित मिलेगी तो यह क्यों संभव हुआ कि यह ब्राह्मण जो हमारे ऋषि मुनि तपस्वी साधु जो सब थे साधक थे उन्होंने ये जैसे कि जनरेशन आफ्टर जनरेशन ये वेद उपनिषद को उसकी जो ये शाखा विशाखा एं जो है उसको जीवित रखा है शाखा प्रशाखा है उनको जीवित रखा है इसलिए ये अवेलेबल है आज भी भारत में तो स्वामी जी कहते हैं कि अभी तक तुम लोगों ने मेरे में क्षत्रिय पावर देखा है क्षत्रिय शक्ति देखी है क्षत्रिय प्रभाव देखा है अभी मैं तुम्हारे पास में एक ऐसे साधु को लेकर आने वाला हूं जिनके भीतर में आप ब्राह्मण पावर उसके भीतर में आप देखेंगे तो यह सेकंड टाइम हरि महाराज को लेकर के स्वामी जी आए अमेरिका और वहां पर देखिए अगेन अभी देखिए कि हरि महाराज का स्वामी जी के प्रति क्या भाव था ठाकुर के पास में से यह तो सीखे थे कि प्रचंड तपस्या और त्याग ही एक आध्यात्मिक जीवन का एक जिसको कहेंगे फाउंडेशन या भित्ति है किंतु स्वामी जी के पास में से जो एक दूसरी चीज सीखी कि यह अपना खुद का यह साधन भजन तपस्या खुद की मुक्ति कामना इससे भी परे कुछ है तो जैसे कि ना वो स्वामी जी को भी अपने एक तरह से गुरु ही मानते थे शिक्षा गुरु जैसे अभी ऐसा इंटरेस्टिंग देखिए कि वहां रिजली मैनर में रह रहे हैं द ग्रेट समर जिसके बारे में हमने पहले भी काफी चर्चा की है तो उस समय वहां पर स्वामी जी है रिजली मैनर में हरि महाराज भी है मिसेस बेटी ले गट वहां पे होस्टेस है एक ही अ पासपास के दो कम कमरों में स्वामी जी को और हरि महाराज को रहने के लिए व्यवस्था की गई एक कमरे में स्वामी जी है बगल वाले कमरे में हरि महाराज है अब ये बेटी लगेट रात को सोने से पहले वो देख वो जब इंस्पेक्शन करने के लिए जाती है कि जद जो जो रहने की जो व्यवस्था है उसमें कुछ असुविधा नहीं है तो स्वामी जी को और हरि महाराज को कुछ यदि चाहिए कुछ ये असुविधा है तो उसका सोल्यूशन लाए व स्वामी जी के कमरे में गई देखा सब कुछ ठीक-ठाक है वो पानी का बोतल वगैरह सब कुछ रखा होगा जैसे आज आजकल हम लोग करते हैं जब गेस्ट महाराज जी आते हैं तो हम उनके क जो गेस्ट महाराज का जो कमरा होता है एक बार देख लेते हैं बेड ठीक से बना है कि नहीं वो गर्म पानी की व्यवस्था है कि नहीं पीने का पानी रखा है कि नहीं वगैरह वगैरह तो ये बेटी लेग भी ऐसा कुछ वो देखने के लिए गई होगी स्वामी जी के कमरे में से आकर के वह हरि महाराज के कमरे में गई देखा कि हरि महाराज ने जमीन के ऊपर में बिस्तर बिछाया हुआ था अपना तो वो बेटी लगेट बड़ी ही आश्चर्य चकित हो गई कि स्वामी जी आप कोर्ट के ऊपर में क्यों नहीं सोते हैं ये सोने के लिए जो कोर्ट होता है वो रखा था स्वामी जी भी तो बगल वाले कमरे में स्वामी विवेकानंद भी तो वही कोट के ऊपर में सो रहे हैं यहां पर रयान जी क्यों जमीन पर सोए हुए हैं तो तुर्या अंद जी ने क्या उत्तर दिया आई डोंट वांट टू स्लीप ऑन द सेम लेवल एज ऑफ स्वामी जी अर्थात कि स्वामी जी जिस लेवल पर सो रहे हैं उसी लेवल पर मैं सोना नहीं चाहता इसके लिए मैंने जमीन पर अपना बिस्तर बिछाया है और उस समय बेटी लगेट इतनी मतलब प्रभावित हो गई थी कि देखिए कि हरि महाराज का स्वामी जी के प्रति ना श्रद्धा भक्ति है कि उन्होंने शुरू शुरू में तो यह सोचना शुरू कर दिया था कि हरि महाराज जैसे कि स्वामी जी के डिसाइल है बाद में उनको पता चला कि नहीं वो उनके डिसाइल नहीं है वो उनके गुरु भाई है तो देखिए कि यह जो स्वामी जी से जो सीखा हरि महाराज ने वो प्रतिफल कब हुआ वो फुल मेनिफेस्टेशन कब हुआ जब स्वामी जी ने हरि महाराज को कहा कि वहां कैलिफोर्निया में एक बहुत बड़ी जमीन उनको मिलने वाली थी उस जमीन को फिर उन्होंने कहा कि शांति आश्रम नाम देते हैं और हरि महाराज को कहते हैं कि वहां पर जाइए और वहां पर कैलिफोर्निया में जाकर के लॉस एंजेलिस है सन फ्रांसिस्को है वहां पर स्वामी जी ने जाकर के जो उनके जो फॉलोअर्स बनाए थे उनके साथ में वार्तालाप कीजिए और शांति आश्रम में एक ट्रेडिशनल मठ खड़ा करके दिखा दीजिए तो यह स्वामी जी से आदेश प्राप्त करके रयान जी कैलिफोर्निया आए कैलिफोर्निया में जो मिसेस हेंस ब्रो डिथ एलन मिस्टर एंड मिसेस एलन फिर ये जो आइड अनसेल यह जो सब वो उनके जो जितने भी फॉलोअर्स थे उनके साथ में मिले उनके साथ में वार्तालाप किया वो जो घर गथ जो वार्तालाप होता है ना प्लेटफार्म पे एक प्रवचन देना लेक्चर हॉल में वो एक होता है किंतु घर में साथ में मिलकर के वोह जो अंतरंग शिष्य होते हैं फॉलोअर्स होते हैं उनके साथ में वार्तालाप करना वेदांत की शिक्षा देना वो एक अलग ही माहौल होता है तो इस तरह से वेदांत का प्रचार करते-करते धीरे-धीरे फिर महाराज ने हरि महाराज ने ठीक किया कि शांति आश्रम में रहा जाए और शांति आश्रम में वह ऑलमोस्ट 3 साल रुके थे यह जो स्वामी जी के साथ में सेकंड टाइम अमेरिका आए थे समवेल इन 18990 99 से लेकर के 90 18990 1901 1902 ऐसा ऑलमोस्ट 3 साल शांति आश्रम में रुके और वहां पर उनकी तपस्या की कहानियां है वह सब अमर हो गई है ये आइड अनसेल है वो जो सब बाकी उनके जो डिसाइल है यह गुरुदास महाराज वगैरह ये अतुला अंद जी महाराज वगैरह जो उनके इतने घनिष्ठ थे उनके साथ में वहां पर रह रहे थे और उन्होंने यह जो सब लिखा था वो जो कहानियां सब लिखी है वो सब अद्भुत कहानियां है और बड़ी ही उन्होंने तपस्या करके वहां पर वो रहे थे अभी देखिए कि न साल वहां पर रहने के बाद में शांति आश्रम में हरि महाराज का स्वास्थ्य धीरे-धीरे करके थोड़ा सा शिथ थोड़ा सा डिटेरिऑरेटिंग तो फिर हरि महाराज सोचते हैं कि चलो मैं भारत जाता हूं कुछ दिन और वहां पर विश्राम करके स्वास्थ्य वापस लेकर आता हूं तो अभी वह भारत यात्रा कर रहे हैं वैसे ही उनको एक समाचार मिला बड़ा ही दुखद निदु समाचार कि स्वामी विवेकानंद ने फर्थ जुलाई 1902 को देह त्याग कर दिया है बेलूर मठ में उन्होंने समाधि ले ली है तो जैसे ही यह समाचार हरि महाराज के पास आया वह वैसे ही वह इमीडिएट कलकाता आने की ओर रवाना हुए कोलकात्ता बेलूर मठ में गए फिर ये जो अभी तो स्वामी जी रहे नहीं तो जिनके आदेश से लेकर के उन्होंने अमेरिका गए थे तो वह फिर अमेरिका जाकर के फिर से वही यह तपस्या मय जीवन यह अमेरिकन शिष्यों को वेदांत सिखाना यह सब उनको लगा कि अभी मेरे से नहीं होने वाला है तो फिर वो फिर भारत में ही रह गए और भारत में जैसे वृंदावन है या फिर यह काशी है नकी य सब विभिन्न जगह पर रह करर के बेलूरमठ है उन्होंने ये जो स्वामी जी ने कहा था डू नथिंग जस्ट लीड लाइफ बस एक तपस्या मय जीवन बिताओ तो ये तपस्या मय जीवन बिता करके हरि महाराज ने दिखा दिया अभी देखिए कि हरि महाराज को आखिर आखिर में यह हो गया था डायबिटीज और डायबिटीज की वजह से वो जो सब साइड इफेक्ट होता है बॉईल वगैरह कार्बंकल वगैरह उनको हुआ था और उसके लिए सर्जरी करनी होती थी यह बैक पीठ के ऊपर में कुछ फोड़े हो गए थे कार्बंकल इसको बोलते हैं उस समय की लैंग्वेज में तो अभी सर्जरी करनी है तो अभी सर्जरी करना है डॉक्टर को बुलाया गया डॉक्टर ने कहा कि क्लोरोफॉर्म देते हैं आपको आप बेहोश हो जाएंगे फिर हम सर्जरी करते हैं तो हरि महाराज कहते हैं नहीं मैं संज्ञान वैसे ही रहूंगा आप सर्जरी कीजिए मैं अपने मन को उच्च लेवल पर लेकर के बांध दे देता हूं तो देखिए कि डॉक्टर भी बड़ा आश्चर्य चकित हो गया यहां पर हरि भाई हरि महाराज अपने गुरु भाइयों के साथ में बैठकर वेदांत की चर्चा कर रहे हैं और उनकी पीठ पर जो फोड़ा हुआ है तो यह जो सर्जन जो है वो चाकू से उसको काट रहे हैं और कोई भी होता जद यह मतलब उसका थोड़ा सा भी इस तरह से काटेंगे तो उसको तो कितनी पीड़ा होगी वो कैसा चिल्ला उठेगा यह है अपने हरि महाराज बिल्कुल निर्विकार होकर के यह अपने भाइयों के साथ में वेदांत की चर्चा करते रहे और उनको पीठ पर यह सब सर्जरी होती रही अभी देखिए कि एक बड़ा ही इंटरेस्टिंग इंसिडेंट मां के भी जीवन में है मां को पेर में फोड़ा हो गया था अभी यह बहुत पेन करता था बड़ा ही पेनफुल था अभी डॉक्टर ने आकर के सलाह दी पहले तो मां बोलती है कि ड्रेसिंग कर लेते हैं दवाई खा लेते हैं फिर डॉक्टर ने आकर के कहा कि इससे होगा नहीं अस्त्र उपचार करना पड़ेगा उसको काटना पड़ेगा तो अभी मां बेचारी बड़ी बालिका भाव है तो एक और है जगदंबा पूरे जगत का संहार करती है यहां पर छोटा सा अस्त्रोदेवम नहीं नहीं मैं अस्त्र पचार नहीं करवाऊंगी वो चाकू लेकर काटेंगे अरे बाप रे ऐसा मा मना करती है और वह पेर में वह फोड़ा बढ़ता ही जाता है और वो बड़ा ही दर्द होता ही जाता है तो अभी करें क्या मां को मनाते मनाते मां मानती ही नहीं है हरि फिर ये अपने शरत महाराज सभी लोगों वसा मां को बड़ा समझाए मां उसको थोड़ा सा सर्जरी करके काट लेते हैं इसको फोड़े को मां बोलती है नहीं बिल्कुल बालिका भाव में मां है उस समय तो अभी किया क्या जाए तो अभी ये बाबूराम महाराज ने बड़ा साहस किया अ उनका एक डॉक्टर मित्र था वो लेकर के मां के पास में आए कहा कि यह मेरा मित्र है ऐसा करके पहचान करवाया कहा तो माने जैसे मां का था कि वो चा वो अपना मुंह ढक करके वो ऐसा करके वह खाट के ऊपर में बैठी है कोट के ऊपर में और वो प्रणा प्रणाम करेगा भक्त ऐसा करके वह प्रणाम ग्रहण करने के लिए मां बैठी और जैसे ही यह जो मित्र था महाराज का वह तो एक्चुअली था सर्जन ही था मां को प्रणाम करने के बहाने मां के पैर के पास में झुका और चाकू लेकर के फोड़ा काट दिया वो एकदम मां जोर से चिल्ला उठी अरे किंतु देखिए कि इनिशियल पेन जब ठीक हो गया फिर यह सर्जन ने फिर ये वो ड्रेसिंग वगैरह करके मां को प्रणाम करके क्षमा मांग ली मां आप मेरा अपराध मत लीजिएगा वह आपकी ही मतलब अच्छे के लिए मैंने ऐसा किया था महाराज के आदेश पर ही किया था ऐसा क्षमा मांग कर के चला गया वो बाद बाद में उस समय तो मां बड़ी नाराज हो गई थी बाद बाद में कहती अच्छा ठीक है वो ठीक ही किया अभी देखो पैर कितना ठीक हो गया है ये उनका मां का बालीका भाव था ये सब कंट्रास्ट कैसा वो दिखता है इन सबके जीवन में ठाकुर माहा स्वामी जी डायरेक्ट डिसाइल के जीवन है तो यहां पर हरि महाराज है अच्छा हरि महाराज को बाद बाद में किंतु रोग वगैरह बहुत हुए थे और एक बार उन्होंने अपने एक डिसाइल को कहा भी था कि देखो कि मैं स्वामी जी की अर्थात स्वामी विवेकानंद की बात को नहीं मान कर के उन्होंने कहा कि आओ मेरे साथ तो 3 साल तो वहां पर रहे किंतु बाद में जो मैं भारत वापस आ गया स्वामी जी की महासमाधि के बाद में वो स्वामी जी के तो जैसे कि एक तरह से उनके आदेश की अवगणना करना ही तो हुआ ना तो ये जो मैंने मुझे अभी आज जो इतने डिसीज हो रहे हैं मुझे ऐसा लग रहा है कि स्वामी जी जी की बात की जो अवगणना की है उसी का फल जैसे कि मैं इस तरह से भुगत रहा हूं अब ये उनका एक था इंटरप्रिटेशन अभी यह सब इंटरप्रिटेशन भी ऐसे होते हैं ना कि आप करते ही जाइए करते ही जाइए इसका कोई अंत नहीं है जो भी है अभी हरि महाराज का आखिरी दिन आखिरी दिन चल रहे हैं महासमाधि के दिन आ गए हैं उस समय उन्होंने अपने एक डिसाइल को कहा कि देखो स्वामी जी ने मुझे एक बार बताया था स्वामी विवेका नंद ने हरि महाराज को एक बार बताया था कि हरि भाई आज तक तो लोग यही सोचते रहे कि यह जब ध्यान साधन भजन पूजा पाठ आराधना करके ही ईश्वर मिलते हैं किंतु इस जगत में मैं नए पंथ का एक प्रादुर्भाव करके जा रहा हूं आज के युग में यदि दरिद्र नारायण चंडाल नारायण यह मूर्ख नारायण इनकी भी यदि आप शिव के रूप में सेवा पूजा करेंगे तो उससे भी आपको वही ब्रह्मज्ञान ईश्वर प्राप्ति होगी तो ये आखिरी दिनों में हरि महाराज ने अपने एक शिष्य को बताया था देखिए कि कहां वह ठाकुर से उन्होंने ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या सीख करके जो जर्नी का प्रारंभ किया था तो स्वामी जी का यह जो महामंत्र शिव ज्ञान से जीव सेवा आत्मन मोक्षार्थम जगत हिताय च वहां पे हरि महाराज की यह जर्नी समाप्त हुई और इस घटना के कुछ ही दिन के बाद में उनकी महासमाधि हो गई तो देखिए कि वैसे तो हम लोग सब कुछ पढ़ते रहते हैं किंतु जब यह साथ-साथ में पढ़ते हैं या कंपेयर कंट्रास्ट करते हैं तो कितने सारे इंटरेस्टिंग पहलू एक्स्ट्रा हमको इसके भीतर में देखने को मिलते हैं तो आज यही तक अभ कल से फिर ठाकुर का कथामृत फिर से चालू करेंगे ठाकुर केशव सेन के साथ में नौका विहार कर रहे हैं तो उससे फिर से प्रारंभ करेंगे ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु यह जो बात ऐसी भी है ना कि अधिकारी बाद अभी हु वाज मैचर इनफ स्पिरिचुअली कि इसको ग्रहण कर पाए क्योंकि जो कुछ भी करना है फाउंडेशन है त्याग उसके बिना तो कुछ होने वाला नहीं है तो मने हम लोगों की बात आज की बात अलग है उस समय जो ठाकुर के पास जो आते थे कि यह जो हायर आईडिया तो तभी ले पाएंगे जबक आपने नेति करके प्राप्त कर लिया है बाद में तो फिर इती इती करके वापस आएंगे ना बाकी जितने भी है उ सबको तो नेती नेती करके प्राप्त करना है जो कि जीवन का प्राप्त व्य है बाद में तो फिर स्वामी जी से यह लोग सीखेंगे जैसे हरि महाराज का पूरा जो जर्नी है दो फेज में आप बांट दीजिए ठाकुर के पास में नेती नेती सीख है स्वामी जी के पास में इति इति सीख [हंसी] है मुझे इस घटना के बारे में नहीं पता किंतु एक दूसरी सिमिलर टाइप की घटना है एक बार वही विज्ञान महाराज वो स्वामी जी के कमरे के सामने खड़े थे वो आए तो देखा स्वामी जी वहां पर खड़े वो जो ये है ना गैलरी वो जो यह है वोह बाहर में देखने वाला अ जो वरांडा है स्वामी जी के कमरे के सामने एक वरांडा है गंगा देख सकते हैं वहां पे स्वामी जी खड़े थे बड़े ही जैसे कि चिंता में मग्न है तो विज्ञान महाराज ने पूछा कि क्या हुआ तो स्वामी जी ने कहा कि मुझे ऐसा लग रहा है कहीं पर बहुत बड़ा डिजास्टर हुआ है तो विज्ञान महाराज सोच रहे हैं कि यहां प बैठे-बैठे उनको कैसे पता चलेगा क्या हो रहा है हो सक उनके मन की कल्पना होगी यह तो रेशनल माइंड यह सब करता है ना फिर दूसरे दिन न्यूज़पेपर में देखा कि वहां कहीं पर अर्थक्वेक हुआ था यह साउथ ईस्ट एशिया में ही और बहुत सारे लोग मर गए थे उसमें तो वो टाइम देखा मिला कर के न्यूज़पेपर में जो अर्थक्वेक का टाइम लिखा था उसी टाइम में स्वामी जी ने यह बात कही थी तो विज्ञान महाराज कहते हैं कि स्वामी जी का माइंड है इस इज मोर सेंसिटिव देन सेस्मो ग्राफ ये सेस्मो ग्राफ अर्थात कि वो जो अर्थक्वेक मेजर करने वाला यंत्र तो स्वामी जी का माइंड इससे भी ज्यादा सेंसिटिव है यह जो हमने इसको पहले भी डिस्कस किया था ना कि राजा महाराज ने कैसे वो एक बताया कि स्वामी जी कहते हैं कि वर्क इज वरशिप मैं कहता हूं वर्क एंड वरशिप तो आज का जो अपना ट्रेंड है अपने ऑर्डर में दैट इज वर्क एंड वरशिप अब साधन भजन भी कीजिए जप ध्यान तपस्या भी कीजिए और साथ में सेवा कार्य कीजिए तो वो जो नाउ यू कैन ऑलवेज स्पैकुलेट कि स्वामी जी का जो रेडिकल आईडिया था कि वर्क इज वशिप उसको उसके पोरेट फॉर्म में इंप्लीमेंट करते तो क्या होता व्ट इफ ये आता है अपने माइंड में कि 100% वी हैव गिवन अवर सेल्स अप टू सेवा कार्य यानी कि फिर यह आज जो हम यह मंदिर में पूजा करने के लिए जो अपना एक मेन पावर जाता है या तो फिर यह जो इंटरनल मेंटेनेंस के लिए हम लोग जितना भी मैन पावर मॉनेस्टिक मैन पावर लगाते हैं उसको 100% यदि सेवा कार्य में यूटिलाइज किए होते व्हाट वुड हैव हैपन क्या हुआ होता ये एक [हंसी] स्पेक्युलेटिव फिलोसोफी में कहते हैं ना कि योर थिरी इज वेर योर माउथ इज यानी कि ये जो जो यानी कि क्या खाते हैं ट डिटरमाइंस कि आप क्या सोचते हैं राइट अभी हम लोग थिरी तो कितना ही लगा लीजिए मेन थ है यदि राम कृष्ण मिशन या तो अपना संघ किस डायरेक्शन में जा रहा है देखना है तो आप मोनिस्टिक मेन पावर किस तरह से यट करते हैं दैट इज द बिगेस्ट साइन बाकी आप वो बाकी सब कुछ है राइट तो कितना परसेंटेज किस कार्य में है तो यह जो जो टीप ऑफ द स्पीयर कहते हैं ना कि मने प्योर सेवा कार्य में मुझे नहीं लगता कि 20 30 पर से ज्यादा अपना मेन पावर इसमें होगा यह जो मेरा अनुभव में बता रहा हूं सो हैड इट बीन अप टू 70 पर वी डू नॉट नो व्ट वुड हैव हैपन अभी अभी आज का आज का उदाहरण देना है तो एआई आप एआई की कितनी बातें कीजिए वो आपका कंपनी का कितना परसेंटेज ऑफ रेवेन्यू आप एआई में लगाते हैं वो बता दीजिए मां अपना खुद का खाना सिर्फ अपने बच्चे को ही खिलाएगी और उसको उसके लिए भूखा रहेगी दूसरों के बच्चे के लिए नहीं दिस इज द बिगेस्ट डिफरेंस जबकि स्वामी जी का था कि पूरे जगत के लिए वह अपनी खुद की मां को भूखा रख कर के वह जगत को खिला रहे थे सीधा कंट्रास्ट यानी मां के बारे में जद मां और बच्चे के साथ में आपको यदि कंपेयर करनी है तो मां अपने बच्चे को भूखा रख के दूसरे के बच्चे को खिलाती है ऐसा हो गया सो च इज द यूनिकनेक्ट में रख सकते थे वह नहीं करके अपने जो खाना वो हरि भाई को खिला दिया जगत वासियों को खिला दिया सो ट इज अ ग्रेटेस्ट डिफरेंस और देखिए मातृ प्रेम तो है ही है इस जगत में उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है प्रश्न यह है ना आप जी हरने सिंह की जो बात करते हैं ना कि ये अभी जैसे भारत की या तो फिर जगत की मां जितना प्रेम या जितनी केयर अपने बच्चे के लिए करती है उतनी ही यदि आसपास के पड़ोसी के लिए भी यदि इतना करें ना गरीब लोगों के लिए तो ये जगत पूरा जैसे कि स्वर्ग हो जाएगा स्वामी जी ने वोह जो फेमस घटना कि लड़का आ कर के कह रहा है कि मैं कमरा बंद करके ध्यान कर रहा हूं नहीं हो रहा स्वामी जी ने कहा पहले तो कमरे का दरवाजा खिड़की खोलो बाहर आओ गरीब गुरु के लिए सेवा करो बाद में तुम जब भी जब ध्यान करोगे अच्छा होगा तो यह थोड़ा सा यदि अपने घर से बाहर झाक करके यह जो गरीब के बच्चे हैं उनकी भी जद थोड़ी केयर करेगी माने बहुत ज्यादा नहीं ऐसा नहीं है कि पूरे जगत को रे रेवल शनाज कर देना है जिस शहरी में रहती है जिस गली में रहती है उसी के आसपास का यदि थोड़ा सा केयर करें देन वी कैन रियली हार्नेस दिस मातृ भाव यह जो मदर्स हार्ट है उसको यह शिव ज्ञान जीव सेवा के लिए हार्नेस कर सकते हैं चाइना में एक जैसे अपने यहां पर वो जो ब्लेसिंग देते हैं ना आशीर्वाद दे कि स पुत्रवती भव ऐसा सब वो कहते हैं ना विजय भव तो चाइना में आशीर्वाद देते हैं कि मे यू लिव इन बोरिंग टाइम्स मने बोरिंग जो समय युग है उसमें तुम रहो इंटरेस्टिंग युग में मत रहो इंटरेस्टिंग युग में क्या होता है युद्ध होगा महामारी होगी सिविल वर होगा जो बोरिंग युग है जहां पर सब शांति है सो मे यू लिव इन बोरिंग [हंसी] टाइम्स इंग्लिश में एक कहावत है कि हैव फेथ इन गॉड बट कीप योर पाउडर ड्राई ये पाउडर यानी कि गन पाउडर यहां पर ऐसा कहने की बजाय कि अल्टीमेटली भक्ति विंस हमको ऐसा कहना चाहिए कि वी डू नॉट अंडरस्टैंड व्हाट हैपेंस ट द हाईएस्ट स्टेज विथ अवर माइंड यह मन बुद्धि चित्त अहंकार तो पिघल जाएंगे अल्टीमेट जाने के बाद में तो अभी इस मन बुद्धि चित्त अहंकार से उस लेवल पर क्या होता है वह बोलना बड़ा मुश्किल है जैसे कि ठाकुर ने खुद ने वोह कहा था ना कि सब कुछ झूठा हो गया है ब्रह्म ज्ञान झूठा नहीं हुआ क्यों क्योंकि इस मुंह से उसके बारे में बात नहीं की गई सो ऐसा कोई डेफिनेट स्टेटमेंट देने की बजाय कि भक्ति विंस ओवर ज्ञाना वी कैन से दैट व्हाट हैपेंस एट द स्टेज वी विल रियलाइफ पे हमारे लिए वो एक पैराडॉक्स बन के रहेगा कि कैसे निर्विकल्प समाधि में जाने के बाद में मां इच्छा करेगी तब आप वापस आएंगे हाउ इज दिस पॉसिबल ये तो आपकी सब थिरी यहां पे फेल हो जाती है हाउ इज दिस पॉसिबल विल रिलाइज ओली लच निर्विकल्प समाधि नॉट बिफोर दैट यह बड़ा इंटरेस्टिंग क्वेश्चन हैने जिन लोगों का एक उस टाइप का दिमाग नहीं होगा ना तब तक यह सब प्रश्न आएंगे नहीं हम लोग यह सब किताब पढ़ कर के सब स्वीकार कर लेते ऐसा ऐसा है हम लोग इसको डाउट नहीं करते क्वेश्चन नहीं करते देखिए इसको डिफरेंट तरीके से देख सकते हैं एक तो स्वामी जी का खुद का स्टेटमेंट है कि कोई महापुरुष एक गुफा में बैठ कर के यदि पांच अच्छे विचार भी करता है तो वह पांच विचार गुफा की दीवाल को भेद करके जगत में स्प्रेड होंगे लोगों के मन में जाकर के वो वहां से कार्य करेंगे सो वो एक है फिर जैसे दूसरा आपने कहा कि अक्षर देह स्वामी जी का कि ये कंप्लीट वर्क्स वगैरह है जीवन के प्रसंग वो तो अभी प्रिंटेड फॉर्म में है उसको पढ़ कर के हम उसको प्रेरित होते हैं तो वो भी एक है उसका आंसर दो आंसर तो हो गए तीसरा जद जहां पर यह जो उन्होंने जो जिस बात को जानने का प्रयास किया है कि डस स्वामी जी एक्चुअली लिव हियर इन सूक्ष्म फॉर्म और हमको गाइड करते हैं तो उसका देखिए कि हमारे पास में इंगित बहुत सारे हैं जैसे कि उस दिन आप ही ने वह कहानी बताई थी नागपुर की कि वह महिला को जाकर के वह मां ने कहा कि जाओ नरेंद्र स्वामी तुमको जाकर के हेल्प करेंगे सो इस तरह से सूक्ष्म फॉर्म में कहीं पर रहते हैं और हमको गाइड करते हैं सो यह जो पहले दो तो हमको समझ में आता है सब मने वेरी रेशनल फेरली ऑर्डिनरी वो तो बड़ा एक मने आजकल से स्वामी जी ही क्या यह जो कार्ल मार्क्स है ना कि यह जो आइंस्टाइन है उनके आइडियाज भी तो आज जगत को गाइड करते हैं यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्वांटम डायनेमिक्स न्यूक्लियर साइंस हमेशा के लिए हम ह्यूमन सिविलाइजेशन को वो शेप और फॉर्म करते रहेंगे नॉलेज नॉलेज हैज दैट पावर उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है गोइंग बियोंड दैट डू सम थ ऑफ देयर रिमन हियर नित्य कृष्ण नित्य लीला कि यह लीला हमेशा से चल रही है हमेशा के लिए चलने वाली है कभी स्थूल देह में होती है कभी सूक्ष्म देह में होती है लीला चलती रहेगी और यह लीला के माध्यम से हमको अनुप्रेरणा पर है कि हमको य अनुभूति होती है कि नहीं हम मैं मैं नहीं कह पाऊंगा कि ये ऐसा ही है क्योंकि मुझे ऐसी कोई अनुभूति नहीं हुई यदि जिसको होती है वह कह पाएगा कि नहीं वो ठाकुर सही में सूक्ष्म देह में है स्वामी जी है और हमको गाइड करते हैं इट डिपेंड्स ऑन योर अनुभूति म पॉसिबिलिटी स्ट्रंग एजिस्ट ये स्वामी जी ने एक बात कहते हैं स्वामी जी ने ही कहा है कि जापान में ऐसी कहानी है कि गुड़िया जो होती है बच्चे की उसको आप जितना प्रेम करेंगे यदि गुड़िया को तो गुड़िया भी जीवंत हो जाएगी यानी स्वामी जी कहना चाहते देश के बारे में कि देश को आप प्रेम करेंगे तो यह सोया हुआ देश भी जागृत हो जाएगा किंतु यही बात यह विग्रह के बारे में भी इतनी ही सही है कि प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव क्यों किया जाता है कि वह जिसको कि एक मार्बल की इमेज थी आज वह जीवंत हो गई है और आपको इस तरह से इसको ट्रीट करना है