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1836 - 1936 || श्रीरामकृष्ण संघ के प्रथम 100 वर्षों की एक झलक || 21 Apr 2025

Invocation

ओम स्थापकाय यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः अ एक किताब लिखने के बारे में मैं लंबे टाइम से सोच रहा था तो इसका एक आउटलाइन मैंने तैयार किया है आपके साथ में एक बार शेयर करता हूं। होता क्या है कि हम जब ठाकुर मां स्वामी जी की किताबों को पढ़ते हैं तो होता है कि जैसे कि शरद महाराज ने लीला प्रसंग लिखी। गंभीरानंद जी ने मां का जीवन भी लिखा और स्वामी जी का जीवन लिखा और फिर साथ-साथ में ही देखिए कि इतने सारे लेटर्स है, स्वामी जी के लेक्चर्स हैं। इतना सब कुछ है। हमारा लिटरेचर यदि देखें मेरी पर्सनल लाइब्रेरी में 200 से भी ज्यादा किताबें हैं। वि इज एक्सक्लूसिवली रिलेटेड टू रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर। फर्स्ट जनरेशन जिन लोगों ने ठाकुर मां स्वामी जी के साथ में उनका दर्शन किया था। उनका साक्षात्कार किया था। उनके माध्यम से या तो फिर इनके स्वयं के द्वारा जो लिखा गया है इतनी सारी किताबें हमारे पास में अवेलेबल है। तो जब हम किसी का लाइफ एक्सक्लूसिवली पढ़ते हैं तो हमको कभी-कभी यह समझ में नहीं आता या तो फिर हम लोग यह अंदाज नहीं कर पाते कि इनके जीवन का जो लार्जर इंपैक्ट है वो सिर्फ रामकृष्ण जो भावधारा है अपनी इसके भीतर में उनका क्या इंपैक्ट है या तो फिर इनका क्या कंट्रीब्यूशन है या तो फिर यह ओवरऑल जो भारत देश जो कि पिछले 10,000 सालों से हमारे हमारा आध्यात्मिक प्रवाह जो बहता आ रहा है इसके भीतर में इनका क्या यूनिकनेस है क्या कंट्रीब्यूशन है तो यह सब सोच के 100 इयर्स ऑफ हिस्ट्री रामकृष्ण संघ की आप देखेंगे कि 100 साल का हिस्ट्री मैंने यहां पर कनेक्ट किया है। ठाकुर के जन्म से प्रारंभ करके बेलूर मठ में ठाकुर का मंदिर का निर्माण हुआ 1836 टू 1936 देखिए कि एग्जैक्ट 100 इयर्स का यह पीरियड है। जबकि ठाकुर मां और डायरेक्ट डिसाइपल इंक्लूडिंग स्वामी विवेकानंद इनका यह जीवनकाल है। तो इनके 100 साल के जीवनकाल के दरमियान क्या-क्या घटनाएं हुई? एक घटना दूसरी घटना के साथ में किस तरह से कोरिलेट कर सकते हैं, कंट्रास्ट कर सकते हैं। किस तरह से एक ही आइडियाज को ठाकुर मां स्वामी जी विभिन्न दृष्टियों से विभिन्न विभिन्न शब्दों में व्यक्त करते हैं। यह पूरा देखना यह हमारे लिए बड़ा इंटरेस्टिंग हो जाएगा। प्रोजेक्ट थोड़ा सा बड़ा है किंतु फिर भी यहां पर आउटलाइन है। देखिए कि बाल्य पर्व से प्रारंभ होता है 1836 टू 1854 कि जब तक ठाकुर कोलकाता में आए। तो बाल्य पर्व में हमको पता है कि ठाकुर की बाल्य लीलाओं का वर्णन है। उनमें फिर पिताजी खुदीराम और कामरार पुकुर ग्राम का वर्णन है और साथ में ही उनका एक एनसेेस्ट्री है कि कहां से यह इन लोगों का जो परिवार है श्री रामकृष्ण का वो जो देरे ग्राम जहां से यह सब प्रारंभ हुआ था तो देरे ग्राम से किस तरह से उनको कामारपुक आना पड़ा था। इसके बाद में है साधन पर्व 1854 से 1873। अभी देखिए कि जब ठाकुर कोलकाता आते हैं काली मंदिर का निर्माण होता है। ठाकुर जब अपनी साधनाओं में डूब जाते हैं तो यहां पर सबसे पहले देने की आवश्यकता है कि पिछले 10,000 साल का भारत का जो साधना का इतिहास है, इसी साधना के इतिहास को ठाकुर आगे बढ़ा रहे हैं। यानी कि देखिए कि आप यदि वेस्टर्न फिलॉसोफी या वेस्टर्न साइंस जब भी पढ़ते हैं तो आपको पता चलेगा कि कोई भी फिलॉसोफर के पीछे एक लंबा लाइन ऑफ फिलॉसोफर होता है जो कि ऑथर सबसे पहले इनके बारे में बात करता है। फिर इनका क्या कंट्रीब्यूशन है वो हमको बताता है। फिर इसी लाइन में पिछले मान लीजिए फिल आज की मॉडर्न वेस्टर्न फिलॉसोफी के बारे में यह शोपेनोवर है ना कि कांट है ना कि हेजल है। इन सबके बारे में यदि आज का कोई मॉडर्न ऑथर लिखेगा तो वह सीधा सोक्रेटिस से और उससे भी आगे प्रीसोक्रेटिक प्री ग्रीक फिलॉसोफी है जो इन्फ्लुएंस है रोम के ऊपर में ग्रीस के ऊपर में वहां से स्टार्ट करके 2000 साल का फिलॉसोफी वो डिस्क्राइब करेगा फिर वो कहीं जाकर के मॉडर्न जर्मन फिलॉसोफर पे आएगा तो यहां पे भी देखिए कि मैंने जो यह वॉल्यूम है साधन पर्व इसके भीतर में जो मैंने चैप्टर बनाए है। अभी तो सिर्फ आउटलाइन ही है। किंतु जैसे-जैसे मैं उसको डिटेल करता जाऊंगा वैसे-वैसे देखेंगे कि हिस्ट्री ऑफ इंडियन स्पिरिचुअलिटी। अभी देखिए कि शरद महाराज का लीला प्रसंग आप पढ़ेंगे तो जब भी कोई भी साधना ठाकुर प्रारंभ करते हैं जैसे कि वेदांत साधना है या तो फिर शक्ति साधना है या तो फिर यह भाव साधना है तो इसका एक आउटलाइन तो निश्चय शरद महाराज हमको देते हैं कि वेदांत साधना का प्रयोजन क्या है? मधुर भाव का सार तत्व क्या है? शक्ति साधना का क्या एक इतिहास है? किंतु फिर भी वो आउटलाइन बड़ा ही उन्होंने एसेंशियल जो पॉइंट है उसी पर उन्होंने फोकस किया है। यहां पर मैं चाहता हूं कि एक हिस्टोरिकल आउटलाइन में प्रेजेंट करूं और इसके लिए अभी आजकल हमारे पास में मटेरियल भी बहुत सारा उपलब्ध है। यह इंस्टट्यूट ऑफ कल्चर रामकृष्ण मिशन गोल पार्क से इंडियन कल्चरल हेरिटेज की पूरी सीरीज ऑफ बुक्स पब्लिश हुई है। जहां से कि हमको बड़ा ही अच्छे से मटेरियल मिल सकता है। तो पिछले 10,000 साल की इंडियन स्पिरिचुअल जर्नी और फिर देखिए कि ठाकुर ने सिर्फ भारतीय धर्मों की साधना ही नहीं की थी। साथ में ही इस्लाम और क्रिश्चियनिटी की भी साधना की थी। तो वो वर्ल्ड स्पिरिचुअल थॉट जो कि ठाकुर के आने से पहले क्या था उसका एक हिस्टोरिकल आउटलाइन। तो एक पूरा ठाकुर के जो साधना है इसके पीछे में पिछले जो मानव सभ्यता है उसकी एटलीस्ट 10,000 साल की साधना का इतिहास है। स्वामी जी ने जैसे कहा था कि पिछले 10,000 साल की भारत की जो स्पिरिचुअल साधनाएं हैं, वह सबको ठाकुर ने जैसे कि एक लाइफ टाइम में यह साधना कर ली है। तो 10,000 साल की जो साधनाएं कौन-कौन सी थी? कि किस तरह से कौन से साधक ने कौन से संत ने कौन से दार्शनिक ने क्या कंट्रीब्यूशन किया उसका एक आउटलाइन आवश्यक है। यदि हम ठाकुर का कंट्रीब्यूशन समझना चाहते हैं तो उसके बाद में देखिए कि ठाकुर की एक के बाद एक सभी साधनाओं का एक वर्णन करेंगे और आखिर में यह पर्व का अंत आता है शोडशी पूजा पे कि मां का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ। ठाकुर ने शोडशी पूजा की और फिर वहां से उन्होंने कोलकाता में धर्म चक्र प्रवर्तन का प्रारंभ किया। तो देखिए कि यहां पे जब मैं यह आउटलाइन बना रहा हूं तो मैं किस बातों का ख्याल रखता हूं। उस बातों का कि जैसे कि देखिए सबसे पहले तो टर्निंग पॉइंट जहां पर आते हैं वहां से नया चैप्टर स्टार्ट करना है। दूसरा कि विदिन द चैप्टर्स कहां पे आइडियाज अभी जैसे यहां पे हिस्टोरिकल एनालिसिस कर रहे हैं। तो कौन से हिस्टोरिकल आइडियाज के साथ में ठाकुर के आइडियाज मैच हो रहे हैं। कहां पे हमको कंट्रास्ट देखने को मिलता है। कहां पे ठाकुर ने अपना एक वैल्यू एडिशन किया है। वह सब आइडियाज को लेकर के जो एनालिसिस करना होता है, वह मैं करने का प्रयास करूंगा। इसके बाद में देखिए कि आनंद पर्व प्रारंभ होता है। 1873 मां की शोडशी पूजा से प्रारंभ होकर के 1885 ठाकुर को जब कैंसर हुआ तो हमको हमने ऑलरेडी डिस्कस किया है कि आनंद पर्व प्रारंभ करेंगे शोडशी पूजा से और उसका अंत लाएंगे पानीहाटी से। यह दो ब्रैकेट है जिसके भीतर में यह पूरा आनंद पर्व प्ले आउट होता है। और देखिए कि आनंद पर्व का सबसे इंपॉर्टेंट पार्ट क्या है? एक तो ठाकुर आध्यात्मिक एक स्पिरिचुअल एक्सटसी में रहते ही थे। आध्यात्मिक अनंत आनंद में रहते ही थे। जो लोग दक्षिणेश्वर में आते थे ठाकुर के पास में वे लोग ठाकुर की इस आनंद गंगा में स्नान करके इस महाकुंभ में ठाकुर की आध्यात्मिक जो उपलब्धियां थी उस उपलब्धियां रूपी महाकुंभ में स्नान करके वे लोग तो धन्य हो ही जाते थे। किंतु साथ में ही देखिए कि ठाकुर के पास में दो लोगों का ऐसा आगमन हुआ कि जिन्होंने दे ब्रॉट ईस्ट एंड वेस्ट टुगेदर। इसके बारे में भी हमने अपना जो डिस्कशन चल रहा है अपने क्लासेस में काफी डिटेल में वर्णन किया है कि किस तरह से केशव सेन और नरेंद्र भविष्य के स्वामी विवेकानंद यह लोग जो थे पूरे एक वेस्टर्न साइकोलॉजी इन्होंने इंबाइब किया था। उन्होंने अपने भीतर में उतारा था। और इस वेस्टर्न साइकोलॉजी को ले आकर के जब उन्होंने ठाकुर को एक्सेप्ट किया तो इन दोनों के भीतर में किस तरह से ईस्ट मिट्स वेस्ट पूर्व और पश्चिम का संगम किस तरह से हुआ है वो एक बड़ा ही इंटरेस्टिंग एनालिसिस है। क्योंकि देखिए कि जब आप पूर्वीय सभ्यता में वो चाहे भारतीय हो ना कि ये कंफ्यूशियस हो ना कि ये अपने इस्लामिक इवन सिविलाइजेशन हो। देखिए कि अपने यहां पर जब आप किसी को अपने गुरु या अपना लीडर इस तरह से स्वीकार करते हैं तो फिर आंख बंद करके इनके ऊपर में भरोसा करते हैं। जबकि यह पश्चिमी विचार है खास करके पोस्ट रहनेसा वहां पे सभी अथॉरिटीज को आपको क्वेश्चन करना है। जितने भी ये प्रीकंसीव्ड आइडियाज चले आ रहे हैं उसके ऊपर में अटैक करके उसको ब्रेकडाउन करके उसके भीतर में यदि कहां पे भी खोखला दोगुलापन है तो उसको खोज निकालना है। यह एक वेस्टर्न थिंकिंग है रैशनलिस्टिक एंड साइंटिफिक। तो किस तरह से यह नरेंद्र और केशव सेन दोनों के भीतर में यह रैशनालिस्टिक साइंटिफिक थिंकिंग था। उन्होंने अपने मापदंड पर ठाकुर को रखा और देखा कि ठाकुर सभी रैशनलिस्टिक थिंकिंग में परफेक्टली पास हो जाते हैं। तब कहीं जाकर के उन्होंने ठाकुर को एक्सेप्ट किया था। वही जो घटना हमने कथामृत में देखी कि ठाकुर मास्टर महाशय को पूछते हैं कि इस तरह से जब राजा जयमल वो श्यामण शाह की पूजा करता है तो वो युद्ध में युद्ध करने के लिए नहीं जा पाता। इवन अपनी रक्षा नहीं कर पाता तो फिर शामल शाह स्वयं आकर के वो घोड़ेसवार का स्वरूप धारण करके आते हैं और जयमल की रक्षा करते हैं। तो इस बात पर तुमको विश्वास होता है कि नहीं होता है। ठाकुर जैसे कि मास्टर महाशय की परीक्षा करते हैं। और मास्टर महाशय भी देखिए कि उनके भीतर में इंटीग्रिटी कितनी है। यदि आप रियली स्केप्टिकल और रैशनलिस्टिक हैं तो फिर आपकी वीकनेस के सामने आपको झुक नहीं जाना है। कैसे भी हो आपको रैशनलिस्टिक माइंडसेट बना के रखना है। वो एक इंटीग्रिटी इट रिक्वायर्स इंटीग्रिटी एंड ऑनेस्टी। तो फिर मास्टर महाशय क्या उत्तर देते हैं कि वो राजा जयमल ने भक्तिपूर्ण होकर के श्यामशाह की पूजा की थी। उनको प्रार्थना की थी। यह बात तो विश्वास हो रही है। किंतु श्रावण शाह स्वयं घोड़ेसवार बनकर के युद्ध के मैदान में गए थे। इसके बारे में मैं कुछ बता नहीं पाऊंगा। पता नहीं कि लोगों ने यह घोड़ेसवार को ठीक-ठीक देखा कि नहीं। हो सकता है राजा का ही कोई बड़ा वीर सेनापति हो। उसने जाकर के शत्रु की सेना का संहार किया है। किसको पता? लोगों ने उनको ठीक-ठीक देखा है कि नहीं? तो फिर ठाकुर फिर वहां से बात को मोड़ देते हैं। तो यह स्केप्टिसिज्म और रैशनलिटी और एक साइंटिफिक लॉजिकल थिंकिंग इट मीट्स दैट कंप्लीट टोटल सेल्फ सरेंडर टू ईश्वर। तो यह ईस्ट मीट्स वेस्ट यह यहां पर आनंद पर्व में होता है और इसीलिए पूरा जो वेस्टर्न रेनेसा है उसका इतिहास हमको देखने की आवश्यकता है और यह भी देखने की आवश्यकता है कि किस तरह से रेनेसा वाली रूपी जो ट्रेन है जो हम मिस हो गए उसकी वजह से भारत में डार्क एजेस प्रारंभ हुए। अंधेरे का युग प्रारंभ हुआ। एक के बाद एक बाह्य आक्रमणों के सामने हम झुक गए और आखिर में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के गुलाम होकर के रह गए। तो यह पूरा इतिहास यहां पे पूरा वर्णन होगा। उसके बाद में विद इन दिस कॉन्टेक्स्ट ठाकुर और स्वामी जी का जो वार्तालाप है उनका जो रिलेशन है किस तरह से पुरातन भारत भविष्य के भारत को एक धरोहर जो हैंड ओवर करता है वो जो वो रिले रेस होती है ना रिले रेस में क्या होता है वैसे जनरल रेस होती है तो वो जो पार्टिसिपेंट होते हैं वो तो स्टार्टिंग पॉइंट से एंड पॉइंट तक उन्हीं को दौड़ना होता है दौड़ के जी जो पहले पहुंचेगा वह जीत जाएगा। रिले रेस में क्या होता है? एक पार्टिसिपेंट है वह वन क्वार्टर ना कि 1/3 वो जाएगा रास्ते में वहां पे दूसरा उसका जो पार्टनर खड़ा होगा तो उसको वो एक मशाल ना कि ऐसा कुछ उसके हाथ में देना होता है। वहां से लेकर के वह पार्टनर है और थोड़ा सा वन थर्ड जाएगा। फिर वह अपने तीसरे पार्टनर को देगा। तीसरा पार्टनर हो सकता है डेस्टिनेशन तक पहुंचे। इसको कहते हैं रिले रेस। तो यह ठाकुर ने भी यह जो भारत की आध्यात्मिकता की भारत की जो प्राण शक्ति है उस मशाल को स्वामी जी के हवाले किया था। स्वामी जी को सुपृत किया था। यह जो अपनी 10,000 साल की गुरु शिष्य परंपरा वही शंकराचार्य का फेमस इंसिडेंट कि वह वेदव्यास ने आकर के उनको दर्शन दिया था। क्यों दिया था? क्योंकि यह आवश्यक है कि शंकराचार्य शुड रिप्रेजेंट गुरु शिष्य परंपरा। नो डाउट उनके जो गुरु थे गोविंद पाद उनके जो गुरु थे गौडपाद उन्होंने तो यह गुरु शिष्य परंपरा बजाई ही रखी थी किंतु फिर भी एक सिंबॉलिक ट्रांसफर ऑफ ये जो टॉर्च है इंडियन सिविलाइजेशन इट वाज नेसेसरी। तो यहां पर भी देखिए कि ठाकुर यह जो टॉर्च ऑफ इंडियन सिविलाइजेशन स्वामी जी के हाथों सुपुत करते हैं। तो यह जो सिंबॉलिक ट्रांसफर ऑफ पावर द ट्रांसफर ऑफ विज़डम एंड लर्निंग स्वामी जी तक आता है और यही आनंद पर्व के अंत में देखेंगे कि किस तरह से नरेंद्र की जो पूरी जर्नी है ठाकुर को क्वेश्चन करता रहता था। वहां से लेकर के उसने मां काली को स्वीकार किया और इसका भी हमने काफी डिटेल में डिस्कशन देखा था कि नरेंद्र ने सिर्फ ठाकुर को ही स्वीकार नहीं किया है। नरेंद्र ने भारतीय सनातन हिंदू धर्म को स्वीकार किया है। क्योंकि महाकाली को स्वीकार करना सिर्फ अभी जैसे कि क्रिश्चियनिटी के साथ में हुआ और बुद्धिज्म के साथ में हुआ। दो उदाहरण हमारे सामने है कि जब अवतार आए तो अवतार के शिष्यों ने फिर अवतार के नाम पर एक नया धर्म प्रारंभ कर दिया। तो ठाकुर में भी यह कैपेसिटी है कि उनकी जो आध्यात्मिक उपलब्धियां है उसके बेस पर आप नया धर्म प्रारंभ कर सकते हैं और यह ऑप्शन शायद स्वामी जी के माइंड में कभी आया भी होगा क्योंकि उस समय की जो भारतीय जो रूढ़िच चुस्तता थी क्योंकि फिर यह जो हजार साल का पिछले अंधेरा चला आ रहा था इसकी वजह से जो रूढ़िच चुस्तता थी तो स्वामी जी सोच सकते थे कि अभी देखिए कि नाथ जात यह सब प्रथाओं में भारत इतना डूबा हुआ है कि इसको रिफॉर्म करने से कोई लाभ नहीं है। ऐसा हम प्रारंभ करते हैं कि जिस तरह से ब्राह्म समाज है या तो फिर जिस तरह से यह थियोसोफिकल सोसाइटी है। इन लोगों ने हिंदू धर्म को छोड़कर के एक नया धर्म जिस तरह से चालू किया था और जैसे माय प्लान ऑफ कैंपेन में स्वामी जी कहते हैं कि हिंदू धर्म को सुबह शाम चाय पी के गाली देते थे। तो यह ऑप्शन स्वामी जी के पास में भी था। स्वामी जी को कोई कम सहन नहीं करना पड़ा था। काला पानी क्रॉस करके आए थे बोल के। वही दक्षिणेश्वर जहां पे वह मंत्रमुग्ध बालक की तरह ठाकुर के पैरों के सामने श्री चरण के सामने बैठकर के ठाकुर की बातें सुना करते थे। वही काली मंदिर में उनका प्रवेश निषेध कर दिया गया था। तो फिर उनको क्या जरूरत है इस तरह के हिंदू धर्म को उठाने की सर के ऊपर में। किंतु फिर भी स्वामी जी का जो थिंकिंग था बड़ा ही क्लियर था कि यह जो शिप है हमारी यह जो भारतीय जहाज हजारों सालों से भारतीयों को भवसागर पार करवा करके निर्वाण के वो जो सामने वाला किनारा है मोक्ष का किनारा वहां तक ले जा रहा है। आज कहीं इस जहाज में थोड़ा सा एक होल हो गया है। एक वहां पर वो गड्ढा जैसा हो गया है। पानी भीतर में चला आ रहा है बोलकर के विल यू अबेंड ऑन दिस शिप? क्या इस भारतीय जहाज को ही छोड़ दोगे? विदेशी जहाज में बैठ जाओगे क्या? तो ऐसा नहीं इसी भारतीय जहाज को हमको फिर से नया नवनिर्माण करके फिर से इसके नौका में हमको हजारों करोड़ों भारतीयों को मोक्ष द्वार तक पहुंचाना है। तो यह स्वामी जी का जो कांसेप्ट था ये सब कुछ किस तरह से संभव हुआ भविष्य का कि किस तरह से उन्होंने सिर्फ श्री रामकृष्ण को नहीं सनातन हिंदू धर्म के सामने उन्होंने माथा टेका। यह पूरा एक एनालिसिस इसमें होगा और फिर क्या है कि मैं इस तरह से नहीं करूंगा कि जितने भी इंसिडेंट है अपने साहित्य के सभी इसमें डालने का प्रयास करूं क्योंकि वह तो फिर बहुत बड़ा हो जाएगा। अपने पास में पूरा कथामृत है, लीला प्रसंग है, स्वामी जी का जीवन है, कंप्लीट वर्क्स है, मां का जीवन है, मां की बातें हैं। फिर यह डायरेक्ट डिसाइपल के एक्सपीरियंसेस और रेमिनेशंस है। इतना सब मटेरियल है। तो सब इंसिडेंट इसमें डालने की बजाय एक एनसाइक्लोपीडिया सेपरेट है अपने पास में शारदा कोष बोल के। तो उसके भीतर में सब इंसिडेंट मिल जाएंगे। किंतु इस किताब में मैं वही लूंगा जो कि एनालिसिस करने के लिए आवश्यक है। तो यह आनंद पर्व उसके बाद में देखिए कि आत्म प्रकाश पर्व 1885 टू 1886 ठाकुर को जब से कैंसर प्रारंभ हुआ तब से ठाकुर ने अपने अंतरंग शिष्यों के सामने अपना सही स्वरूप प्रकाश करने का प्रारंभ कर दिया। यह घटनाएं भी हमने देखी है कि किस तरह से काली पूजा की रात को गिरीश ने ठाकुर की ही काली मान के पूजा की और फिर ठाकुर उस समय भाव में चले गए। सबको आशीर्वाद देना शुरू कर दिया। वही 1 जनवरी की घटना 1886 ठाकुर कल्पतरु होकर के सबको आशीर्वाद देते हैं। वही फिर वह नरेंद्र के मन में जो आखिरी संदेह बच गया था। ठाकुर मृत्यु शैया पे है। नरेंद्र सोचता है कि इस समय यदि कहे कि मैं अवतार हूं तो मानो और ठाकुर कहते हैं जो राम जो कृष्ण वही राम कृष्ण तो यह सभी घटनाएं किस तरह से ठाकुर अपना आत्म प्रकाश करते हैं और साथ में ही एक एनालिसिस यह है कि अंतरंग बहिरंग भक्तों का डिवीजन होता है और अंतरंग भक्तों में गृहस्थ और सन्यासी इस तरह के डिवीजन होते हैं। यानी कि ठाकुर के भक्त तीन ग्रुप में बट जाते हैं। एक तो है बहिरंग अपना स्वार्थ पूर्ति के लिए आए थे। एक अंतरंग गृहस्थ और एक अंतरंग सन्यासी। तो यह पूरा संघ की स्थापना होती है और मां शारदा देवी इस संघ की आगेवानी ग्रहण करती है। तो यह पूरा अभी देखिए कि इसके भीतर में सभी तरह के थ्रेड है। मां के जीवन का भी इसमें आता है ट्रेड स्वामी जी के जीवन का, ठाकुर के जीवन का और भविष्य में जो रामकृष्ण संघ में जो होने वाला है, उन सब के सीड्स जिसको कहते हैं, रूट्स जिसको कहते हैं, वह सब हमको आत्म प्रकाश पर्व में मिल जाएगा। किस तरह से राजा महाराज को ठाकुर ने तैयार किया। किस तरह से सभी गुरु भाइयों को ठाकुर ने कहा कि नरेंद्र की आगेवानी आपको स्वीकार करनी होगी। किस तरह से मां को बार-बार कहते हैं भार स्वीकार करने के लिए। यह जो मां के जीवन का जिस चैप्टर का हम पाठ कर रहे हैं, उसी में ठाकुर मां को कहते हैं कि क्या मैं अकेला सब कुछ करूंगा? तुम कुछ नहीं करोगी। यह उसी आत्म प्रकाश पर्व की ही घटना है। मां कहती है मैं तो स्त्री हूं। मेरे से कैसे कुछ होगा? तो ठाकुर कहते हैं नहीं नहीं तुमको भी यह सब जिम्मा लेना पड़ेगा। तो फिर किस तरह से ठाकुर मां को तैयार करते हैं भक्तों की आगेवानी ग्रहण करने के लिए उनकी उनका गुरु पद स्वीकार करने के लिए देत्व स्वीकार करने के लिए देत्व का प्रकाश करने के लिए वो सब घटनाएं इसके भीतर में और फिर उसके बाद का पर्व है कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में तपस पर्व अच्छा इसके पहले के पर्व की जो आखिरी जो घटना होगी संघ की स्थापना कि किस तरह से ठाकुर अपने जो अंतरंग शिष्यों हैं उनको घेरवा देकर के उनका हृदय सन्यासी का कर देते हैं और फिर जितने भी अंतरंग वो चाहे गृहस्थ हो ना कि चाहे सन्यासी हो सबको एक स्नेह सूत्र में बांध करके संघ की स्थापना करते हैं। वह आखिरी घटना होने के बाद में ठाकुर की महासमाधि और महासमाधि के समय की जो घटनाएं हैं उसका जो तात्पर्य है वह भी वहां पर करेंगे डिस्कस। फिर तपस पर्व कि किस तरह से ठाकुर की महासमाधि के बाद के कुछ साल ऐसे रहे सबके लिए तपस्या का समय था वह चाहे मास्टर महाशय यह बलराम बसु जिस तरह से गृहस्थ भक्त हो या तो फिर मां हो मां को कामार पुकुर जाकर के रहना पड़ा था कामार पुकुर के तपस्या के दिनों की जो कहानियां है मां बेचारी बेचारी अकेली रहती थी और फिर वह जो लाहा बाबू के घर की वह जो एक लड़की थी उसने उसने कहा कि तुम चिंता मत करो कि मैं मेरे घर की ये जो काम वाली है वो कभी-कभी आकर के तुम्हारे साथ में रहा करेगी। तो वह तपस्या के कामार पुकुर के दिन यहां पे वराह नगर मठ में तपस्या किस इतनी सारी घटनाएं हैं जो कि हमारे पास में अवेलेबल है और इसमें भी देखिए कि सभी गुरु भाइयों की अपनी-अपनी तपस्या की कहानियां है और साथ में मां शारदा देवी की कहानी है और साथ में ही यह मास्टर महाशय बलराम बसु या तो गिरीश घोष जैसे या तो फिर नाग महाशय या तो फिर यह गोलापमा है योगिन मां है जैसे पक्के गृहस्थ भक्त थे उनकी सब कहानियां है वह सबको एक सूत्र में बांध करके प्रेजेंट करना होगा इतना सुंदर रूप से वह मिलेगा अभी आज देखिए हमारे पास में यह तपस पर्व की घटनाएं चारों ओर बिखरी पड़ी है कहीं पे अभी लीला प्रसंग और कथामृत तो समाप्त हो ही जाते हैं। वहीं पे ही ठाकुर की इवन ठाकुर की महासमाधि के पहले ही जैसे कि लीला प्रसंग समाप्त हो जाता है। कथामृत में थोड़ा बहुत चितार मिलता है कि किस तरह से मास्टर महाशय वराह नगर मठ में आते थे। किंतु वहां पर भी ज्यादा कुछ नहीं है। फिर वराह नगर मठ के बारे में सिस्टमेटिक जानना है तो गंभीरानंद जी की स्वामी जी की जो जीवनी है युगनायक विवेकानंद उसमें जानने को मिलता है। फिर स्वामी जी के जो भाई है महेंद्रनाथ गुप्त दत्त उनके जीवन में उन्होंने जो स्वामी जी के जीवन की जो कहानियां लिखी है वो उसमें है और फिर बाकी सब गुरु भाइयों के जीवन में है। या तो फिर जैसे कि ये अपने वीरानंद जी महाराज वो जब वहां पे आते हैं पहली बार वरा नगर मठ में तो वहां पे हमको थोड़ा बहुत मिल जाएगा। है मटेरियल बहुत सारा किंतु चारों ओर बिखरा पड़ा है। उसको सबको सिस्टमेटाइज करके स्टेप बाय स्टेप क्रोनोलॉजिक सजा करके स्टोरी फॉर्म में कहना इट विल बी वेरी वेरी इंटरेस्टिंग कि हां इस तरह से गुरु भाइयों ने तपस्या की है। इसके बाद में प्रारंभ होता है भारत पर्व। देखिए कि स्वामी जी के मन में आखिर में वो अनंत नाद जो है जो भारतीय जो एक आध्यात्मिकता का एक जो सिस्टम है कि एक के बाद एक सन्यासी अपने घर बार को छोड़कर के वैद्यो नारायणो हरिह औषधम जानवी तुल्य अर्थात कि औषध है मां गंगा का बहता पानी और फिर वैद्य है नारायण हरि इस तरह से खाने खाने पीने की शरीर की चिंता छोड़कर के प्रवरज्या के लिए निकलते हैं। यह जंगल जंगल वन वन पहाड़ नदी यह गांवगांव घर जाकर के वो जो एक अनुभूति प्राप्त करते हैं कि ईश्वर पर संपूर्ण रूप से शरणागत होकर के रहने से किस तरह से हमारी शरणागति परफेक्ट होती है। हमारा जो अहंकार है संपूर्ण रूप से निर्विशेष हो जाता है और साधन भजन में हमको किस तरह से बूस्ट मिलता है। तो वह जो स्वामी जी की जो प्रवरज्या की कहानी है और सिर्फ स्वामी जी ही नहीं सभी गुरु भाई इस तरह से प्रवरज्या में निकल गए थे। वह चाहे राजा महाराज हो काली महाराज हो अखंडानंद जी हो शशि महाराज को छोड़कर के प्राय सभी गुरु भाई कहीं ना कहीं कोई ना कोई समय तो निकले थे। शशि महाराज ही थे अकेले कि जिन्होंने पहले तो वराह नगर मठ और बाद में आलम बाजार मठ में रहकर के ठाकुर की सेवा करना कंटिन्यूस उन्होंने यह काम किया था। तो यह जो गुरु भाई पूरे भारत में भ्रमण किए और भारत की जो वास्तविकता है और साथ में ही भारत की आध्यात्मिकता है उसका जो उनको एक पता चला। देखिए कि इन दोनों के बीच में कंट्रास्ट कितना बड़ा है। वही ऋषि मुनियों का देश इसी मिट्टी में एक के बाद एक ब्रह्म ज्ञानियों ने जन्म ग्रहण किया है। तपस्या की है और सिद्धि प्राप्त की है। जिनके आशीर्वाद जिनके पूत जीवन से यह धरती सिंची हुई है। उसी धरती में उस समय की जो भयावह परिस्थिति थी वो परिस्थिति भी इन्होंने अपनी नजरों से देखी। यानी कि भारत का जो पोटेंशियल है और भारत की जो रियलिटी है इन दोनों के बीच में क्या गैप है ये सभी लोगों ने देखा था और इसी से प्रेरित होकर के आखिर में स्वामी जी ने जो हमको जो स्वामी जी के जीवन का जो एक के बाद एक इतने सारे टर्निंग पॉइंट है वही अल्मोड़ा में स्वामी जी वहां पर सोचते थे कि बस मैं अभी निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर लूंगा। वहां उनकी बहन की अपघात का समाचार आया सुसाइड का और फिर उन्होंने ठीक किया कि अरे मेरी ही बहन की यह हालत है तो भारत में जो करोड़ों बहनाएं हैं मेरी उनकी क्या हालत होगी और फिर वो भ्रमण करते-करते फिर आखिर में कन्याकुमारी गए कन्याकुमारी जो रॉक वहां पर उनको जो दर्शन हुआ ठाकुर का कि पश्चिम में जाओ और फिर वहां से यह चेन्नई में आए जो चेन्नई में जो एकदम नया मैसेज था उनका वो बाय दैट टाइम तैयार हो गया था कि शिव्ञान यानी जीव सेवा जो यह भारतीय सन्यासी घर-घर गांव-गांव जाते हैं। आध्यात्मिकता की बातें करते हैं। रामायण फिर ये गीता ये पुराण फिर इन सब की जो कहानियां सुनाते हैं। तो साथ-साथ में ही यह ग्लोब है, मैप है, थोड़े से मॉडर्न साइंटिफिक एक्सपेरिमेंट है वो अपने साथ में ले जाए और यह मॉडर्न एजुकेशन भी भारत को सिखाए क्योंकि भारत में आध्यात्मिकता की कमी अभी नहीं है। भारत में जिस चीज की जरूरत है, यह है कि मॉडर्न साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल लर्निंग। तो इसी विचार को लेकर के स्वामी जी गए अमेरिका तो वह जो पूरा स्वामी जी का जो माइंडसेट रेडी हुआ कि उन्होंने अपनी खुद की आध्यात्मिक उन्नति को छोड़कर के सर्वप्रथम पूरे देश के बारे में सोचना शुरू किया। यह स्वामी जी के जीवन में ही नहीं पूरे आध्यात्मिक इतिहास में बहुत बड़ा टर्निंग पॉइंट है। निवेदिता कहती है बड़ा ही सिग्निफिकेंट स्टेटमेंट कि फर्स्ट टाइम ऐसा हुआ कि स्वामी विवेकानंद की कैलिबर के एक आध्यात्मिक गुरु ने सिर्फ अपनी आत्मन के ऊपर नहीं किंतु समग्र भारत देश के ऊपर में ध्यान किया और समग्र भारत देश पर ध्यान करके उन्होंने भारत माता का यह जो पुनः जागरण करना था जो अपना जो विराट भारत देश पिछले 1000 साल से तमस की नींद में सोया हुआ था वहां वहां से उसको पुनः उत्थित करना था। वो कार्य स्वामी जी ने किया। सो दैट इज और यह बात इतना रेडिकल था कि इवन स्वामी जी के जो गुरु भाई थे वे लोग भी इस बात को समझ नहीं पाए थे कि स्वामी जी के मन में एकाएकी किस तरह के नए आइडियाज चल रहे हैं। तो, यह पूरा जो चिंतन स्वामी जी के मन में चला, वह पूरा भारत पर्व किस तरह से उन्होंने भारत देश का अवलोकन किया और उस अवलोकन से इस एनालिसिस से इनके मन में क्या-क्या विचार प्रकट हुए। पूरा आइडियाज और इंसिडेंट इस तरह से ले लेना होगा कि हम स्टेप बाय स्टेप स्वामी जी की इंटेलेक्चुअल जर्नी को ट्रेस कर पाए। और इसके बाद में हमको पता है कि स्वामी जी अमेरिका गए। अमेरिका में शिकागो पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में प्रवचन जो एक प्रवचन जो दिया सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका वहीं से उनका विजय प्रारंभ हुआ। विजय गाथा प्रारंभ हुई इस विजय पर्व में। 1892 से लेकर के 1895 स्वामी जी की जो प्रथम अमेरिकन और यूरोपियन यात्रा थी। इसके बारे में जितने भी पॉइंट्स हैं, जितने भी कांसेप्ट्स और आइडियाज है, मेजर टर्निंग पॉइंट्स और इंसिडेंट्स है, वह सब यहां पे इस पर्व में आ जाएंगे। अभी देखिए कि इसके साथ में ही वहां पर आलम बाजार मठ तो है ही है। मां तो है ही है। वहां पे जय राम बाटी में अभी चली गई थी। तो किस तरह से मां गुरु भाई स्वामी जी इन 17 जिनको कि ठाकुर रख के गए थे। अपनी धरोहर को आगे बढ़ाने के लिए इन 17 लोगों का जीवन किस तरह से इंटरवाइन होता है। किस तरह से मंथन हो के भविष्य के संघ का त्रपात होता है। भविष्य के मिशन का संघ की स्थापना तो हो गई। अभी किंतु रामकृष्ण मिशन की शुरुआत होने वाली है। देखिए कि रामकृष्ण संघ और रामकृष्ण मिशन। रामकृष्ण संघ क्या है? कि जितने भी श्रद्धालु हैं, जितने भी भक्त हैं, जितने भी संतान संतति है, हम ठाकुर मां स्वामी जी के हम सबको स्नेहसूत्र में आबद्ध करके हम लोगों के भीतर में एक परिवार की रचना करना यह रामकृष्ण परिवार यह जो है ठाकुर और मां ने वहीं पर काशीपुर में प्रारंभ कर दिया था। किंतु इसको एक कॉर्पोरेट स्वरूप देना, इसको एक ऑर्गेनाइज्ड स्ट्रक्चर देना, इसको एक अपने देश के कानून के साथ में ले आ के एकाउंटिंग सिस्टम, लीगल सिस्टम के माध्यम से एक कॉर्पोरेट बॉडी प्रारंभ करना जो कि लोक कल्याण के कार्य कर पाए। दैट इज रामकृष्ण मिशन। तो रामकृष्ण परिवार या तो रामकृष्ण संघ का प्रारंभ श्री रामकृष्ण ने ही काशीपुर में ही कर दिया था। किंतु इसका जो कॉर्पोरेट आउटलुक है वह फिर स्वामी जी ने जब विजय पर्व में अमेरिका में रहते-रहते ही जो भारत में जो पत्र लिखे उस पत्रों के माध्यम से करना शुरू किया था। वह तो स्वामी जी के इंडियन वर्क का हुआ। किंतु जो अमेरिका में स्वामी जी ने देखा कि यह लोग भोगवाद की चरम शिखर पर खड़े तो हैं किंतु इनके हृदय में अभी भी एक तरह का स्ट्रेस एंग्जायटी है। खालीपन है। यदि यह लोग अभी वेदांत को स्वीकार करते हैं तो ऑन वन हैंड मॉडर्न साइंस ऑन दी अदर हैंड एंशिएंट वेदांत। यह दोनों मिलकर के इनका लाइफ फुलफिल कर पाएंगे। यह पश्चिमी सभ्यता का जो भविष्य है वह एक और योग और वेदांत के माध्यम से ही गठित होगा। और यदि यह लोग योग और वेदांत को स्वीकार नहीं करेंगे तो महा भयानक खूनामकी यहां पे होने वाली है। वह बात स्वामी जी ने स्वामी जी ने कहा 50 साल में ही भयानक खुनामर की होगी। वो प्रेडिक्शन स्वामी जी की एग्जैक्टली प्रूव हुई। यह फर्स्ट वर्ल्ड वॉर और सेकंड वर्ल्ड वॉर के माध्यम से। उसके बाद में देखिए कि यह 1947 जब ये 1945 जब ये न्यूक्लियर एट बॉम्ब्स फेंके गए ये हिरशिमा नागासाकी के ऊपर में तब से लेकर के हम देखते हैं कि इनके भीतर में भी योग और वैसे तो स्वामी जी योग वेदांत का प्रारंभ करके ही गए थे किंतु एक वाइड स्प्रेड वेदांत को तो नहीं मिला इतना किंतु योग को जो मिला है एक्सेप्टेंस उसमें भी योग के जो स्पिरिचुअल एस्पेक्ट इतने नहीं फिजिकल एस्पेक्ट को जो मिला मिला है वह सही में देखिए कि स्वामी जी की जो प्रेडिक्शन है अमेरिका और यूरोप के बारे में वह सही होती हुई लग रही है। यह तो एक कंट्रीब्यूशन है ही है। दूसरी एक बात है मच ग्रेटर कंट्रीब्यूशन जो कि बहुत कम लोग इसको इसको समझ पाते हैं वो है कि मॉडर्न साइंस इटसेल्फ मॉडर्न साइंस जिस समय स्वामी जी थे वहां पे उस समय में जो यह एब्सोल्यूट स्पेस और टाइम की परिकल्पना थी एब्सोल्यूट स्पेस एब्सोल्यूट टाइम एंड एब्सोल्यूट कोजेशन चेन ऑफ कॉज एंड इफेक्ट यह कहता है वेदांत की जगत तो जो है वह तो अपने भीतर में एक कंस्ट्रक्ट मात्र है। इसके भीतर में एब्सोल्यूट कुछ भी नहीं हो सकता। टाइम जो एक फ्रेम ऑफ माइंड के अनुसार सब कुछ वेरीरी हो सकता है। तो ये जो रेडिकल आईडिया स्वामी जी ने वहां पे उसकी जो विजय पताका लहराई वही आइडिया आखिर में दो फिल दो साइंटिफिक थ्यरीज़ है जो कि आज के मॉडर्न साइंस का फाउंडेशन है। थ्यरी ऑफ़ रिलेटिविटी एंड क्वांटम डायनेमिक्स। इन दोनों के भीतर में यह जो क रोल ऑफ़ कॉन्शियसनेस है या तो फिर यह फ्रेम ऑफ़ माइंड है या तो फिर यह फ्रेम ऑफ़ द ऑब्ज़र्वर इसका एक बहुत बड़ा रोल इसके भीतर में है। क्वांटम डायनेमिक्स इतना रेडिकल कांसेप्ट है। कहता है कि जब तक आप एक इलेक्ट्रॉन को ऑब्जर्व नहीं करेंगे तब तक ये इलेक्ट्रॉन एक वेव फंक्शन होगा। अर्थात कि जैसे कि कोई एक पेन है अभी इलेक्ट्रॉन की जगह थोड़ा सा बड़ा ऑब्जेक्ट में जैसे कि एक पेन है। एक पेन मेरे पास में है। मेरे पॉकेट में है। तो आई एम श्योर कि यह पेन मेरे पॉकेट में ही रहेगी और कहीं नहीं जाएगी। क्वांटम डायनामिक्स कहता है कि पेन की जगह इलेक्ट्रॉन होता तो वह पूरी गैलेक्सी में कहीं पर भी हो सकता है। उसकी प्रोबेबिलिटी है कि मेरे पॉकेट में भी हो, चांद के ऊपर में भी हो, कोलकाता में भी हो, मद्रास में भी हो, जापान में भी हो, यूरोप में भी हो या कहीं एंड्रोमडा गैलेक्सी में भी हो। इट कैन बी एनीवेयर। यह प्रोबेबिलिटी 90% मेरे पॉकेट में है। किंतु 10% प्रोबेबिलिटी इज इट एनीवेयर। जब तक मैं उसको ऑब्जर्व नहीं करता हूं, मैं जैसे ही अपनी पॉकेट के सामने देखूंगा कि हां पेन है कि नहीं, तब यह वेव फंक्शन कोलैप्स होता है। पेन लोकलाइज़ होती है। या तो मेरे पॉकेट में रहेगी या तो चांद पे चली जाएगी। वेयरवर उसका जो लोकलाइजेशन होना है। कोलैप्स ऑफ वेव फंक्शन कहां पे भी होना है। तो दिस सच अ रेडिकल आईडिया कि एक पेन का भी फिजिकल लोकेशन आप ठीक रूप से नहीं कह पाएंगे। पेन का तो खैर कह पाएंगे। ये सब ये माइक्रोस्कोपिक ऑब्जेक्ट के बारे में है। ये सब इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन जो सब एटॉमिक जिसको पार्टिकल्स कहते हैं उसके बारे में है। तो ये रेडिकल आईडिया जो है कि वेदांत इज़ सेज़ कि नथिंग कैन बी एब्सोलुटली श्योर इन दिस वर्ल्ड। एवरीथिंग मतलब देयर इज़ अ एलिमेंट ऑफ अनसर्टेनिटी एवरीवेयर। तो यह जो है यह आज के मॉडर्न साइंस में स्वामी जी का आईडिया है। ये आज के मॉडर्न साइंस में हमको देखने को मिलता है। बहुत बार लोग कहेंगे कि अच्छा स्वामी जी ने वहां जाकर के बोला और यह साइंटिस्ट लोगों ने इनके पास में सीखा इसका क्या प्रूफ है? तो प्रूफ अपने पास में एस सच कुछ नहीं है। किंतु जो यह जिसको सरकमस्टेंशियल एविडेंस कहते हैं वो बहुत सारे हैं। जिससे कि निकोला टेस्ला और स्वामी विवेकानंद की मुलाकात और फिर यह निकोला टेस्ला की ही कोई एक रिलेटिव है जिसके साथ में आइंस्टाइन का मैरिज हुआ था। सो सरकमस्टेंशियल एविडेंसेस आर देयर किंतु फिर भी हम पक्का कुछ नहीं कह पाएंगे। सो खैर व्हाटएवर आइडियाज जैसे स्वामी जी कहते हैं ना कि यदि आप एक गुफा में बैठकर के पांच एक महत आइडियाज भीचारे तो वो गुफा को भेद करके वो आइडियाज पूरे संसार में जाएंगे किसी ना किसी के सर में जाएंगे प्रवेश करेंगे और वहां से कार्य करना शुरू करेंगे तो स्वामी जी ने पांच महत आइडियाज सिर्फ सोचे नहीं थे गुफा में बैठकर के अल्मोड़ा की गुफा में बैठकर के उन्होंने पूरे विश्व में भ्रमण करके उस आईडिया को फैलाए थे तो सम हाउ दोस वेदांत िक आइडियाज दे फाउंड देयर इको इन मॉडर्न रिलेटिविटी एंड क्वांटम डायनेमिक्स। तो, यह स्वामी जी का विदेश में बहुत बड़ा अवदान है जिसको कि हमको स्टेप बाय स्टेप कौन सी मेजर इवेंट है, कौन से टर्निंग पॉइंट है, इसको लेकर के हमको एनालाइज करना है। इसके बाद में स्वामी जी भारत में वापस आते हैं और हमको पता है कि जिस तरह से भारत में उनका स्वागत हुआ जिस तरह से यह हजार साल पुरानी नींद में से एकाएक भारतवासी जग गए और उन्होंने यह नवीन सन्यासी ये युवा सन्यासी का उन्होंने अपने दोनों हाथ फैला करके उन्होंने आलिंगनबद्ध किया इस भारत की भूमि ने तो भारत में जैसे कि नव जागरण की सूचना प्रारंभ हुई तो यह है अपना नवोदय पर्व स्वामी जी के भारत में आने से लेकर के स्वामी जी की महासमाधि तक 1896 से 192 स्वामी जी भारत आते हैं। एक के बाद एक शहरों में भ्रमण करते हैं। उन जो भारत का जो पुराना मैसेज है योग और वेदांत का वह तो ठीक ही है। वह तो देते ही हैं। साथ में ही एक जो आज के युग के अनुसार युगोपयोगी जो उपदेश है कि शिव ज्ञान जीव सेवा यह बात भी स्वामी जी बताते हैं। फिर वहां रामकृष्ण मिशन की स्थापना होती है कोलकाता में। फिर यह विदेशी डिसाइपल भारत में आते हैं। मां शारदा देवी और स्वामी जी स्वामी मां शारदा देवी का दर्शन करते हैं। अपने फॉरेन डिसाइपल को ले आते हैं। सो मेनी इंपॉर्टेंट एंड इंटरेस्टिंग इवेंट कि जिसका कि क्या फिलॉसोफिकल तात्पर्य है वो सबको स्टेप बाय स्टेप देखना है। फिर स्वामी जी अमेरिका वापस जाते हैं। निवेदिता को साथ में ले जाते हैं। निवेदिता का एक नया थ्रेड यहां पे इंट्रोड्यूस होता है। निवेदिता का जो अपनी भारतीय भारतीय जो यह नवजागरण है सिर्फ उसमें ही नहीं जो रामकृष्ण संघ रामकृष्ण मिशन है उसके जो प्रारंभ के जो दिन थे उसमें निवेदिता का क्या योगदान है आइडियोलॉजिकली इंटेलेक्चुअली वो समझना बड़ा ही आवश्यक है। तो निवेदिता को लेकर के अमेरिका जाते हैं। वही फिर और दूसरी विजिट के दरमियान जो स्वामी जी का सबसे एक इंपॉर्टेंट एस्पेक्ट है सेकंड विजिट का जिसका कि हम बहुत ज्यादा डिस्कस आजकल नहीं करते वो है कैलिफोर्निया विजिट। आज अमेरिका में देखिए आजकल अमेरिका में कैलिफोर्निया राज्य की हालत थोड़ी बिगड़ गई है। किंतु जो फॉर्मेटिव पीरियड था अमेरिका का यह उस समय में देखिए कि कैलिफोर्निया का बहुत ही इंपॉर्टेंट कंट्रीब्यूशन रहा था। ये सिलिकॉन वैली है या हॉलीवुड है या एरोस्पेस इंडस्ट्री है या तो फिर ये मॉडर्न फाइनेंसिंग एंड इंस्ट फिर ये यूनिवर्सिटीज है जो सब ये इतना सारा कंट्रीब्यूशन कैलिफोर्निया का है तो वही कैलिफोर्निया में जाकर के स्वामी जी ने वेदांत का संदेश दिया योग और वेदांत का व्हिच आर वेरी इंपॉर्टेंट पार्ट्स ऑफ दोज़ विजिट प्रत्येक इवेंट का क्या तात्पर्य होगा किस तरह से फर्स्ट विजिट के साथ हम इसको कंट्रास्ट करके इसको कंपेयर करके देख सकते हैं। सेकंड विजिट के दरमियान जो जो डिवोट डिसाइपल्स जो कि स्वामी जी के आसपास में आन मिले थे। आईडा अनसेल है, मिस्टर एलन है, मिस्टर एंड मिसेज एलन है। यह मिड सिस्टर्स है। खास करके एलिस हेंसब्रो इन सबका क्या योगदान था? बड़ा ही समझने की आवश्यकता है। तो यह पूरा जो नवोदय पर्व है समाप्त होता है स्वामी जी के भारत में आगमन से और फिर बाद में स्वामी जी की महासमाधि। इसके बाद में देखिए कि हमने जिस तरह से मां के जीवन में डिस्कस किया कि यह जो अभी तक की जो जितनी भी घटनावली है यह 1836 से लेकर के 192 यह पूरी घटनावली जैसे कि एक स्टेज तैयार किया गया है। एक महान एक कहेंगे कि एक स्पेसशिप तैयार किया गया है। जिसकी कि जो ये जो पायलट का जो ये होता है ब्रिज या तो फिर जो सिंहासन होता है सिंहासन तैयार करके श्री मां शारदा देवी के लिए वो जगह जैसे कि तैयार की गई है मां शारदा देवी आकर के वहां पर विराजित होती है। यह संघ जिसके पीछे में कि यह स्वामी जी और ठाकुर ने अपना जीवन पात किया जिस संघ का गठन करने के लिए यह संघ की आगेवाणी आज से फिर प्रारंभ होकर के मां शारदा देवी ग्रहण करती है। मां के जीवन में देखिए कि वह बड़ी ही इंपॉर्टेंट घटना कि राधु को स्वीकार करती है। अपनी पुत्री के रूप में माया स्वीकार ये जो गंभीरानंद जी कहते हैं मां माया स्वीकार करती है। उनका जो मन है इस जगत में रहे जिससे कि ठाकुर के जितने भी संतान हैं जो रामकृष्ण संघ के पास में अभी जो देश विदेश से जो चारों ओर से भक्तगण आ रहे हैं उनका आध्यात्मिक मार्गदर्शन करें तो वह हो गया मातृ पर्व 1902 से लेकर के स्वामी जी की महासमाधि से प्रारंभ करके 1920 मां की महासमाधि तक यह मातृ पर्व चलता है और यह पर्व में देखिए कि दूसरा रहा है। एक जो अभी कॉन्टेक्स्चुअल भी तो हमको देखना है कि आसपास में क्या हो रहा है। तो भारत में देखिए कि यह फ्रीडम मूवमेंट खास करके ये जो बंग भंग का जो आंदोलन था उसको रोकने के लिए जो आंदोलन था वो जो एक के बाद एक स्टार्ट होता है वो बड़ी इंपॉर्टेंट घटना इसी के कॉन्टेक्स्ट में रामकृष्ण संघ को देखना है कि किस तरह से अपने ऊपर में चारों ओर से प्रेशर आ रहा था कि हम लोग पॉलिटिक्स में जाएं। किंतु हम लोग यह प्रेशर को रेजिस्ट कर पाए। वह एक बहुत बड़ी बात है। एक तो यह प्रेशर था कि हम लोग पॉलिटिकल जो मूवमेंट है उसकी आगेवानी लें। क्योंकि बहुत सारे लोग यही मानते थे कि स्वामी जी तो फ्रीडम फाइटर सबसे पहले फ्रीडम फाइटर तो स्वामी जी ही है। तो मुक्ति की बात करते हैं तो सिर्फ आत्मन की मुक्ति की तो नहीं आत्मन नहीं जीवात्मन की मुक्ति की ही तो बात करते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं देश की मुक्ति के बारे में भी वह बात करते हैं। तो स्वामी जी कंसीडर्ड टू बी द फर्स्ट फ्रीडम फाइटर। तो स्वामी जी के द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन क्यों फ्रीडम मूवमेंट में नहीं जाएगा? तो यह लेकर के एक ओर भारतीयों का प्रेशर है। दूसरी ओर गवर्नमेंट का प्रेशर है कि रामकृष्ण मिशन यह क्रांतिकारियों को अपने यहां पे साधु बना करके छुपा रहा है। तो सब समय यह जासूस है। वह अपने रामकृष्ण मिशन के पीछे में पड़े रहते थे। यहां तक कि वहां पे जयराम बाटी में भी वह गांव का चौकीदार है। प्रतिदिन आकर के वह नाम लिख के जाता था कि मां के घर में कौन-कौन लोग रह रहे हैं। उस समय एक ब्रह्मचारी जो कि इस तरह से क्रांतिकारी था। वह सब छोड़कर के वह ब्रह्मचारी बना और फिर वह वहां पर जय राम भाटी आया था। तो फिर इन लोगों ने कहा कि भाई तुम चले जाओ। यहां पे क्या है? पुलिस लोगों की नजर है। वैसे ही मां के ऊपर में और फिर पता चलेगा कि यह भूतपूर्व क्रांतिकारी यहां पे आकर रहता है साधु हो के तो मां को और परेशानी का सामना करना पड़ेगा। वो एक मां के भक्त थे। ललित बाबू मोस्ट प्रोबेबबली। वो एक बड़े पुलिस ऑफिसर को ले आए एक बार मां के पास में कि वो इस तरह से पुलिस वालों की नजर सब समय रहती है। क्रांतिकारी यह वो वगैरह बोल के तो एक पुलिस ऑफिसर को लेके आए तो पुलिस पुलिस ऑफिसर पूछता है मां को कि मां आपको डर लगता है क्या जब ये लोग पुलिस वाले आकर के सब लोगों का ये नाम पता लेते हैं नाम लिखते हैं वगैरह तो वो जो डिवोटी थे जिन्होंने उनको ले आए थे वो इमीडिएटली बोल दिए नहीं मां को कहां से डर लगेगा मां को कोई डर नहीं लगता किंतु मां उस समय अपने कमरे में बैठी हुई थी पुरुष लोगों के सामने नहीं आएगी तो ये लोग बाहर थे मां कमरे के भीतर में थी जय राम बाटी में यदि मां का घर देखा होगा तो वरांडा है वहां पे तो वरांडा में ये लोग खड़े थे और मां भीतर में थी तो मां ने भीतर में से कहा कि ना बाबा डर लगता है बहुत डर लगता है तो फिर ये फिर ये पुलिस ऑफिसर ने इमीडिएटली कहा ठीक है मां ये लोग आप करके ये लोग आकर के आपको इतना परेशान नहीं करेंगे तो ये जो कॉन्टेक्स्ट है कि इस कॉन्टेक्स्ट के भीतर में रामकृष्ण संघ को बड़ा होना है। रामकृष्ण संघ का फैलावा होना है। किस तरह से ऑन वन हैंड ब्रिटिशरों की सिंपैथी रखी जाए। जैसे कि वे लोग लीगल कोई प्रॉब्लम हमारे सामने ना खड़े करें। एट द सेम टाइम भारत में यह जो नवनिर्मा जो चल रहा है, जो एक नव आंदोलन प्रारंभ हुआ है, एक नया सूर्योदय जो दिख रहा है, उसकी भी तो आगेवाणी लेनी है। यह बड़ा ही इंपॉसिबल चीज है। यदि यह भारत के यह जो फ्रीडम मूवमेंट से प्रेरित होकर के जो नवे युवा लोग जागृत हो रहे हैं, इनको यदि गाइडेंस नहीं करेगा, तो फिर रामकृष्ण संघ का क्या अर्थ रह गया? किंतु गाइड इस तरह से करना है कि पॉलिटिक्स में हम ना जाएं और पॉलिटिक्स में ना जाकर के फिर और यह ब्रिटिश गवर्नमेंट से हम उनके साथ में एक तरह का एक क्या कहेंगे कोडियल रिलेशन बना करके रखें तो यह जो माइंड फील्ड है एक माने एक थिन आपको उसके ऊपर में चलना है रोप के ऊपर में यह बड़ा ही बैलेंसिंग एक्ट उस समय में हमको करना पड़ा था इसके रिलेटेड बहुत सारी घटनाएं हैं तो एक तो है कि मां का जो स्पिरिचुअल एक जो मिनिस्ट्री है वह भी चल रहा है। दूसरा कि संघ किस तरह से यह पॉलिटिकल फ्रीडम मूवमेंट के जो माइंड फील्ड है उसमें नेविगेट करके इस तरह से नेविगेट करता है कि यहां से भारतीय लोगों के नजर के सामने हम लोग बिल्कुल यह ना हो जाए कि उन लोगों की सिंपैथी ना गवा बैठे। ऐसा ना कुछ-कुछ जैसे कि चला था कि अमेरिकन ये ब्रिटिश लोग यहां पे आकर के बाबू लोग यहां पे रहते हैं। बेलूर मठ में ये तो कोई आध्यात्मिक जगह नहीं है। ये तो सब विदेशी लोग यहां पे आकर के रहते हैं। तो इन लोगों ने यह म्युनिसिपालिटी है बाली म्युनिसिपालिटी उसने रामकृष्ण संघ के सामने वो बेलूर मठ के ऊपर में टैक्स लगा दिया था। तो फिर यह टैक्स में से माफी मांगने मतलब टैक्स को कैंसिल करने के लिए हमको फिर कोर्ट में केस करना पड़ा था। अभी यह कोर्ट में केस तो चलता रहेगा किंतु मेन चीज है कि यह जो लोगों के सामने हमको एलिजिबल भी तो रहना है। लोग यदि अपने मन में से हमको कैंसिल कर देंगे बोलेंगे कि अरे यह तो विदेशी लोगों के द्वारा चलता हुआ संस्थान है तो फिर हम लोगों की सिंपथी गवा बैठेंगे। तो फिर स्वामी जी ने वहां पे जो दुर्गा पूजा का प्रारंभ किया था। तो यह पूरा एक माइंड फील्ड है। थोड़ा सा भी इधर जाएंगे तो भारतीय लोगों की सिंपैथी गवा बैठेंगे और थोड़ा सा इधर जाएंगे तो फिर यह ब्रिटिश गवर्नमेंट से नाराजगी ब्रिटिश गवर्नमेंट से दुश्मनी लग जाएगी। दोनों से बचकर के संघ को चलाना है। व्हिच इज वेरी इंपॉर्टेंट एंड वेरी डिफिकल्ट टास्क। दो लोग थे उस समय मां तो थी ही थी किंतु साथ में ही स्वामी ब्रह्मानंद जी महाराज थे। इन लोगों ने दोनों ने मिलकर यह काम किया है। फिर ऑफ कोर्स बाकी सभी गुरु भाई तो थे ही थे। अपने शरद महाराज थे। स्वामी शारदानंद जी जो कि संघ के जनरल सेक्रेटरी थे। उस समय में फिर बेलूर मठ में उस समय बाबूराम महाराज, स्वामी प्रेमानंद और स्वामी शिवानंद जी थे जो कि बेलूर मठ में रहकर के पूरा मैनेजमेंट करते थे। यहां पे शशि महाराज है। साउथ इंडिया देखते थे। तो यह सब ने मिलकर के यह कार्य किया है। किंतु फिर भी यह बड़ा ही डिफिकल्ट पीरियड था जो कि आगेवाणी थी किंतु मां की जब मां का मां की महासमाधि हुई तब राजा महाराज ने एक बड़ा ही सिग्निफिकेंट सेंटेंस कहा था। उन्होंने कहा एतो दिन पहाड़े आडा छिलाम इतने दिन पहाड़ के पीछे में छुपा हुआ था। अभी यह पहाड़ चला गया है। अभी जो भी मुसीबत आएगी सीधी मेरे सर पर आएगी। तो दिस वास राजा महाराज जीसस वेरी सिग्निफिकेंट स्टेटमेंट। तो मां की महासमाधि के साथ में यह पर्व समाप्त होता है। फिर प्रारंभ होता है स्वराज पर्व। देखिए कि भारत में यह फ्रीडम मूवमेंट पूरे जोर शोर से चालू हो गई है। किंतु साथ में ही यह अपना संघ जो है चारों ओर विस्तार कर रहा है। कितने ही नए-नए ब्रांच सेंटर है वह बन रहे हैं। कितने ही युवा है जो कि एक आदर्श से प्रेरित होकर के हमारे यहां पर आ रहे हैं। उस समय यदि कोई युवा है आदर्शवादी है तो उसके सामने दो ऑप्शन थे जॉइ करने के लिए। एक तो ऑप्शन था कि यह कांग्रेस थी। दूसरा ऑप्शन था कि यह रामकृष्ण मिशन था। तो किस तरह से भारत में यह जो स्वराज मूवमेंट चला उसका जो आगेवानी है उसका जो ये पूरा डायरेक्शन है वो हमने दिया है और किस तरह से यह जो प्रथम हरोड़ के जितने भी यह फ्रीडम फाइटर्स थे सबको हमने गाइड किया है। सबको कि सभी लोग हमारी आध्यात्मिक लीडरशिप से प्रेरित होकर के उन्होंने अपने जीवन को एक तरह से नवनिर्माण किया है। भारत में भी देखिए कि हमने कभी भी यह वॉरफेयर के माध्यम से युद्ध करके हमने आजादी प्राप्त नहीं की। हमने आजादी प्राप्त की है। सबको आशीर्वाद देकर के इवन ब्रिटिशरों के प्रति हमने कोई किसी भी तरह का अपने मन में जहर नहीं रखा। जहर के माध्यम से बहस पर यदि हम लोगों की निंदा करके या तो किसी के प्रति कटुभाव रखकर के यदि हम किसी देश की स्थापना करते हैं तो वह देश में पूरे प्रारंभ से लेकर के जहर ही फैल जाएगा। जिसका कि सबसे बड़ा उदाहरण हमारे सामने है पाकिस्तान। भारत को गाली देकर के भारतीयों की निंदा करके उन्होंने देश की स्थापना की है। देखिए उनके देश में क्या हो रहा है। जबकि भारत की स्थापना हुई है। इवन अपने दुश्मनों को आशीर्वाद देकर के। यह तो आशीर्वाद भारत के फाउंडेशन में है। आध्यात्मिकता भारत के फाउंडेशन में है। बोल कर के भारत आज इतनी प्रगति कर रहा है। इतनी भी प्रगति नहीं की हमने जितनी कि हमारी आशा थी जितनी कि चाइना ने कर दी है। किंतु देखिए कि भविष्य हमारा उज्जवल इसलिए है कि चाइना फिर भी मटेरियल प्रोस्पेरिटी को लेकर के रह रहा है। आज चाइना एग्जैक्टली वहां पे है जहां पे भी अमेरिका आज से 100 साल पहले था। फॉरर्चूनेटली फॉर अमेरिका स्वामी जी वहां पे गए और मटेरियल प्रोस्पेरिटी के जो शिखर पर बैठे थे वहां पे उनको योग और वेदांत सिखाया। जबकि चाइना की अनफॉर्चूनेटली परिस्थिति ऐसी है। वहां की गवर्नमेंट इतनी इललीबरल है कि वह किसी को भी किसी भी फॉरेन इन्फ्लुएंस को अपने यहां पे नहीं आने देंगे। वे लोग योग और वेदांत को नहीं अपनाएंगे। यानी कि स्वामी जी नहीं जाते तो अमेरिका की परिस्थिति क्या होती? यह परिस्थिति हमको लगता है कि भविष्य में चाइना की होने वाली है। यदि वह योग और वेदांत को ना अपनाए तो। तो यह पूरा एनालिसिस कि ठाकुर के जन्म से लेकर के हम फिर 183 1936 में ठाकुर का जो मंदिर है मुख्य मंदिर बेलूर मठ में उसकी स्थापना हुई और बस उसी के आसपास में ही जो ठाकुर के आखिरी दो डिसाइपल बचे थे विज्ञान महाराज और आखिर में अभेदानंद जी महाराज उनकी भी महासमाधि हुई अभेदानंद जी की हुई 1938 के आसपास में तो वह पूरा 100 साल का इतिहास नौ पर्व में बांट करके जितने भी इंपॉर्टेंट घटनाएं हैं, जितने भी टर्निंग पॉइंट्स है, उस सबको एनालाइज करके इसको लिखना है। अभी यह प्रारंभ तो किया है, उसका अंत कब आएगा, वह तो ठाकुर के हाथ में है। तो मैंने सोचा कि आपके साथ में यह एक शेयर करो। तो आज यहीं तक कल से फिर मां का जीवन प्रारंभ करेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ना दैट वे यू आर राइट दैट वे

प्रश्न: क्या 1936 के बाद से रामकृष्ण मिशन में कोई बड़ी घटना या महत्वपूर्ण मोड़ आया है? Q: have there been any major events or turning points in ramakrishna mission since 1936?

यू आर राइट कि कुछ-कुछ मेजर इवेंट्स हुई है जैसे कि इंडिपेंडेंस के बाद में अ उस समय ऐसा था कि खास करके निवेदिता स्कूल इज़ इन अ सेंटर ऑफ दिस एंटायर थिंग कि निवेदिता स्कूल चालू करके करके गई थी। उसमें उसने उसका जो संविधान है उसमें लिखा है कि गवर्नमेंट से पैसा नहीं लेंगे। हम रामकृष्ण मिशन अपने पैसों से यह स्कूल चलाएगा क्योंकि ब्रिटिश गवर्नमेंट ही है। ब्रिटिश गवर्नमेंट से पैसा लेंगे तो उनके इन्फ्लुएंस में हम लोग आ जाएंगे जो अपना रेडिकल आईडियाज नहीं स्प्रेड कर पाएंगे। सो उसका तो आईडिया बड़ा ठीक था। किंतु आफ्टर इंडिपेंडेंस नाउ भारत की गवर्नमेंट है तो गवर्नमेंट से पैसा लेकर के हम प्रोजेक्ट करना व्हिच इज समथिंग वेरी न्यू जो कि पहले कभी हुआ नहीं। तो फिर निवेदिता स्कूल के कुछ टीचर अलग हो गए वहां से कि आप लोग गवर्नमेंट से कैसे पैसा ले सकते हैं और हम लोगों ने भी हमारे भीतर में भी यह सब चल रहा था कि हाउ कैन वी टेक मनी फ्रॉम गवर्नमेंट एंड डू सोशल सर्विस बट देखिए कि इंडिपेंडेंट इंडिया की सिचुएशन इज़ कंप्लीटली डिफरेंट। तो आज की जो सर्विस एक्टिविटी है वो एक्सपेंशन के पीछे में गवर्नमेंट एड जो है बहुत बड़ा पार्ट है इसका। बहुत बड़ा पार्ट है। बहुत सारे स्कूल्स कॉलेज ऐसे हैं जो कि गवर्नमेंट एड से चलते हैं। तो दैट इज समथिंग कंप्लीटली न्यू। अदरवाइज सिर्फ डिवोटी के पैसों से यह सब चला ना तो हमारा इस तरह का एक्सपेंशन नहीं होता। स्पेसिफिकली इन टर्म्स ऑफ सोशल सर्विसेस जो कि आज हुआ है। तो व्हिच इज अ न्यू पॉइंट यदि मैं कहूंगा। अदर देन दैट ऐसा कोई रेडिकल डिपार्चर मुझे नहीं दिख रहा। एक्चुअली एक बात बताऊं जस्ट

प्रश्न: क्या कोई और परिवर्तन संभव है? Q: any further changes possible?

बिटवीन अस। मेरे माइंड में बहुत सारे आइडियाज हैं कि हाउ टू चेंज कि हाउ टू यू कैन से रीडायरेक्ट आवर ऑर्डर। किंतु इसके लिए ना आपको सॉलिड फाउंडेशन चाहिए फिलोसोफिकल। आज मैं कुछ भी बोलूंगा ना नो वन गोइंग टू लिसन। किंतु अपने पास में एक सॉलिड फिलॉसोफिकल फाउंडेशन है कि दीज़ आर द स्टेप्स। दीज़ आर द टर्निंग पॉइंट्स, दीज़ आर द कंट्राडिक्शंस एंड यू कैन से आइडियाज़ कि व्हिच आर इन द फाउंडेशन ऑफ़ आवर ऑर्डर। देन बेस्ड ऑन दैट आप भविष्य के बारे में कुछ बोल सकते हैं। जस्ट हवा में बातें करने वालों की कोई कमी नहीं है। जैसे कि हमने वो डिस्कस किया था ना कि ओलंपिया एकेडमी वहां पे बहुत सारे लोग ये थ्यरी जो आइंस्टाइन की है वो लोग आपस में बातें करते थे। इट वाज़ आइंस्टाइन हु गव द मैथमेटिक्स। बिना मैथमेटिक्स के थ्यरी तो 10 लोग आपको दे देंगे। हमारा वो जो राजकोट का एक गेटमैन था वो भी एक बहुत बड़ा पंडित था। लोग उसकी बात सुनते थे। वो भी ज्ञान देने में माहिर था। ज्ञान कोई भी दे सकता है। यू नीड अ सॉलिड फाउंडेशन बिहाइंड यू टू फॉर पीपल टू टेक यू सीरियसली। वो जो

प्रश्न: आजादी के बाद से हम अत्यधिक गरीबी से छुटकारा पा चुके हैं। अब हमारा अगला लक्ष्य निम्न आय के जाल से ऊपर उठकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महान बनना है। Q: since independence, we have got rid of extreme poverty. now our next goal is to rise above lower-income trap and become great on international level.

स्वामी जी के जो स्टेप्स है ना कि पहले अन्नदान फिर जीवन दान फिर विद्यादान फिर ज्ञान दान। सो इट्स टाइम फॉर अस टू ग्रेजुएट नाउ टू विद्यादान एंड ज्ञान दान। सो दैट इज़ देयर। अभी देखिए एक हिस्टोरिकल कॉन्टेक्स्ट क्या है? अह सेम सिचुएशन में उस समय का रोमन एंपायर था आज से 2000 साल पहले कि यह चर्च का स्प्रेड हो रहा था और रोमन एंपायर अपने ही के अंदर में वह डूबा जा रहा था कोलैप्सिंग विद इन इटसेल्फ क्योंकि वो जो डिफरेंट-डिफरेंट जो प्रजातियां है उन लोगों का जो डिफरेंट एजेंडा था तो जैसे जैसे कि ये ग्रीस था ग्रीस के जो गोल्डन डेज थे तो एक के बाद एक फिलॉसोफर साइंटिस्ट एक के बाद एक राइटर्स पोएट इन लोगों ने आकर करके जो कंट्रीब्यूशन किया वह फिर यह रोम में आखिर में नहीं दिख रहा था। तो फिर क्या है कि जो कैथोलिक चर्च है दे टूक अप द लीडरशिप। यह होली रोमन एंपायर उसकी स्थापना हुई। अभी पहले तो कुछ डार्क एजेस चले किंतु ये विद इन दिस क्रिश्चियन सेमिनरीज ही ये न्यूटन जो है हु वाज़ ही वाज़ स्टडिंग इन अ क्रिश्चियन सेमिनरी। तो वहां से फिर ये जो आइडियाज विद इन द इंस्टीट्यूशन ऑफ चर्च जो डेवलप हुए दे व इंस्ट्रूमेंटल इन ब्रिंगिंग रेनेसा। अभी ये हिस्टोरिकल अ एक आयरनी है कि इसी रेनेसा को रोकने के लिए चर्च ने बहुत प्रयास किया जो रेनेसा को लाने में चर्च का बहुत बड़ा हिस्सा था। सो वि इज अ हिस्टोरिकल आइरनी बट दिस इज हाउ चर्च बिकम इंस्ट्रूमेंटल इन ब्रिंगिंग दैट ओल्ड ऑर्डर ऑफ थिंग्स टू न्यू ऑर्डर ऑफ थिंग्स। सो सिमिलरली जैसे आपने कहा कि यह ब्रेकउ कांसेप्ट आज हम इंडिया जो है सिर्फ यह मिडिल इनकम ट्रैप ही नहीं कल्चरल ट्रैप में फंस गए हैं। यह एक इतिहास हमको बुलाता है। देखिए कि हाउ स्वामी विवेकानंद रीड्स हिस्ट्री एंड हाउ सम ऑफ द पॉलिटिशियंस रीड हिस्ट्री। तो कितना डिफरेंस दिखता है। स्वामी विवेकानंद टेक्स द स्पिरिचुअल एस्पेक्ट ऑफ आवर हिस्ट्री। जबकि यहां पे ऐसा हो रहा है कि एक पॉलिटिकल एस्पेक्ट लेना प्रयास कर रहा है। अभी पॉलिटिकल एस्पेक्ट ऑफ इंडियन हिस्ट्री बड़ा भयानक है वो। तो आपस में जो भी इश्यूज थे वो उसको नहीं समझे बिना वही इतिहास को फिर हम दोहराएंगे तो फिर यह ठीक नहीं रहेगा। क्योंकि भारत जो गुलाम हुआ उसके पीछे में हमारी कमजोरी कारण भूत थी वो जो ना जो कास्ट है इस सब में जो डिवीजन होना शुरू हो गया था व्हिच आर वेरी डेंजरस। अभी आप आंख बंद करके वही पॉलिटिक्स को आज के 1000 साल पहले वाले आप प्रेजेंट एज में ले आएंगे तो वही इश्यूज को भी आप ले आएंगे। तो स्वामी जी रीड्स हिस्ट्री इन टर्म्स ऑफ स्पिरिचुअलिटी नॉट इन टर्म्स ऑफ़ पॉलिटिक्स। सो दिस इज़ व्हाट कि आज कोई कल्चरल ट्रैप में हम फंस गए हैं। वी नीड टू ब्रेक आउट ऑफ दैट कल्चरल ट्रैप यूजिंग स्वामी जीसस आइडियाज। सो व्हिच इज़ वेरीेंट। और जो कैथोलिक चर्च ने जो रोल प्ले किया विद इन द वेस्टर्न सिविलाइजेशन रामकृष्ण मिशन शुड डू दैट। देखिए मैं इसको

प्रश्न: हमारे पास बहुत अच्छे स्कूल हैं, लेकिन मुझे लगता है कि हम उन्हें भारतीय आध्यात्मिक मूल्यों के बारे में नहीं सिखाते हैं। इसके अलावा हमें युवा लोगों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है, उन्हें स्वामी विवेकानंद के बारे में पढ़ाना चाहिए। Q: we have so great school but i feel like we do not teach them about indian spiritual values. also we need to focus more upon young people, teach swami vivekananda to them.

यूथ और उसके आई विल नॉट फ्रेम माय इशू इन द सेंस ऑफ यूथ कि यूथ को बुलाना है। मैं कहूंगा कि थिंकर्स को हमारे पास में आना है। देखिए जगत को मैं इस तरह से बांटता हूं। देयर आर थिंकर्स एंड देयर आर नॉन थिंकर्स। थिंकर्स आर दोस कि उन लोगों को भविष्य का एक विज़न उनके मतलब दे हैव क्यूरियस मुमुक्षुत्व जिनके भीतर में होता है। नाउ एज डज नॉट मैटर मुमुक्षु जनरली यंग होते हैं। ठाकुर के पास में भी देखा ज्यादातर यंग लड़के ही आते थे। उन्हीं के बेस पे उन्होंने संघ की स्थापना की। बट मुमुक्षुत्व इज अ वन थिंग। अभी जैसे मास्टर महाशय में भी मुमुक्षुत्व था जो क्वेश्चन करते हैं ठाकुर को। सो यदि ठाकुर का यह ऐम होता कि मुझे यूथ सेंट्रिक होना है तो हो सकता है मास्टर महाशय जैसे लोगों को इतना ये नहीं मिलता। हालांकि उनकी उम्र 28 थी। सो कम आज के युग में तो वो यूथ ही कहे जाएंगे बट स्टिल रेदर देन अ यूथ और नॉन यूथ लेट अस से मुमुक्षु आने चाहिए व्हिच इज वेयर आवर प्रॉब्लम लाइ कि हम लोग जो है मुमुक्षु को क्या है कि सभी चीजों को क्वेश्चन करेंगे उनको एक्सप्लोर करना होगा उनको आपको एक लॉन्ग रोप देना होगा कि दे विल थिंक एंड दे विल एक्सेप्ट अभी जो हम डिमांड कर रहे हैं कि यह हैव फेथ एंड डोंट क्वेश्चन व्हिच इज रॉन्ग एंड खास करके मुमुक्षु में यंग लोग भी ज्यादा होते हैं। यंग लोगों को आप कहेंगे कि एक्सेप्ट विदाउट आस्किंग क्वेश्चन देन दे आर नेवर गोइंग टू बी अट्रैक्टेड बाय अस। सो दैट मुमुक्षुत्व यानी कि जो क्यूरियोसिटी, इंक्वायरी, वंडरमेंट ये जो सब आइडियाज है दैट वी विल हैव टू इंट्रोड्यूस हियर और जो सेकंड आपने कहा अह कि देखिए खास करके संघ को यदि यदि मुझे फ्यूचर में जाना है। ब्रेकआउट जैसे आपने कहा कि ये अपना ये मिडिल इनकम या तो फिर यह कल्चरल ट्रैप है। इफ वी वांट टू ब्रेक आउट ऑफ दिस तो हमको ना वी विल हैव टू हैव वेरी स्ट्रांग आइडियाज अबाउट एवरीथिंग। मतलब सिर्फ यह नहीं है कि स्पिरिचुअलिटी के बारे में जगत के सभी एस्पेक्ट के बारे में हमारे आइडियाज होने चाहिए। अभी ऐसा नहीं है कि पॉलिटिक्स के बारे में आइडियाज है तो वी विल गो इनू पॉलिटिक्स। और यदि सिविलाइजेशन के गवर्नेंस के बारे में हमारे पास में आईडिया है तो वी विल गो इनू गवर्नेंस। बट दिस आइडियाज हैज़ टू बी प्रेजेंट। हियर द की क्वेश्चन इज़ आइडियाज। व्हाट इज द जैसे कि अगेन कंपेयरिंग विद कैथोलिक चर्च जिसका कि हिस्ट्री बड़ा डे मतलब वी शुड कंपेयर विद बुद्धिस्ट संघ। प्रॉब्लम यह है कि हिस्ट्री इतनी ईज़ली अवेलेबल नहीं है। हिस्ट्री ईज़ली अवेलेबल है ये कैथोलिक चर्च की। तो व्हाट इज़ देयर ग्रेटेस्ट कंट्रीब्यूशन इन द फील्ड ऑफ़ आइडियाज़। दे केप्ट ऑन गिविंग आइडियाज दैट सोसाइटी टूक अप एंड देन दे राइड दे रोड ऑन दोज़ आइडियाज। हम लोगों को एक जो डर बैठ गया है अपने भीतर में कि शंकराचार्य के बाद में आइडियाज बंद कर देना है। जो शंकराचार्य बोल के गए हैं दैट इज द अल्टीमेट। इसके बाद में अभी सोचना ही नहीं है हमको। व्हिच इज़ वेरी डेंजरस। बिकॉज़ स्वामी विवेकानंद यू जस्ट लुक एट हिज लाइफ। कि ही इज़ बबलिंग विथ आइडियाज़। तो न्यू आइडिया शुड बी कंटीन्यूसली जनरेटेड एंड दे दे शुड बी गिवन टू द सोसाइटी वि शुड बी आवर जॉब तो दैट इज वेयर आई एम टू मेक सम कंट्रीब्यूशन और दूसरा कि स्कूल कॉलेज में आपने जो बताया एग्री विद यू कि हम लोग ऐसे डरे डरे हुए सहमे से हैं कि ये नॉर्थ ईस्ट में आप जाइए तो अपनी स्कूलों में ठाकुर मां स्वामी जी का नाम लेने से हम लोग कतराते हैं। कहते हैं सभी लोग क्रिश्चियन है। हमको अपना बस यह सेकुलर इंडियन कल्चर क्लास किसके ऊपर लेना है? ठाकुर मां स्वामी जी पे नहीं एक यूफेमिज़्म हमने बना दिया। इंडियन कल्चर पे क्लास लेना है जिसमें कि हम ठाकुर मां स्वामी जी के बारे में बताएंगे। व्हिच इज कंप्लीटली रोंग। हम लोग जो इतना डरते क्यों हैं? यह क्रिश्चियन हो क्यों गए? क्योंकि उन्होंने क्राइस्ट के बारे में सिखाया। इसलिए यहां पे मैं वो जो गया था वो एंबेसडर को मिलने के लिए तो वहां पे देखा स्कूल वगैरह दे आर कंप्लीटली शेमलेस इन टीचिंग अबाउट जीसस। जबकि अपनी ही स्कूल चल रही है। वहां पर ठाकुर मां स्वामी जी के बारे में रेयरली कुछ बातें होती है। सो यू आर राइट दैट वे कि अपनी स्कूलों में वी शुड फोकस मोर ऑन ठाकुर मां स्वामी जी। सो यस यस आई एग्री विद यू कंप्लीटली। दैट इज व्हाई आई हैव

प्रश्न: युवाओं को आत्मश्रद्धा आदि के मूल्यों की शिक्षा देना केवल रामकृष्ण मिशन का एजेंडा नहीं है, यह भारतीय समाज की आवश्यकता है। Q: teaching the values of atmashraddha etc. to the youth is not only ramakrishna mission's agenda, it is the need of indian society.

बेस्ड माय बुक ऑन कॉन्टेक्स्ट। क्योंकि सी स्वराज स्वराज मूवमेंट जो था इससे पहले जो इंडियन स्पिरिचुअल हिस्ट्री है यह वेस्टर्न रेनेसा हिस्ट्री है। वी हैव टू थिंक विद इन दैट कॉन्टेक्स्ट। हम लोग अपने को जगत से इंसुलर करके इंट्रोवर्ट नहीं हो जाएंगे। यदि हो जाएंगे देन वी विल लॉस्ट द सिंपथी ऑफ द पीपल। देखिए यह जो मातृ पर्व है इसका एक जो कि जिसके बारे में एक एस्पेक्ट जो कि हमने डिस्कस किया बड़ा रेयरली आपको डिस्कस करने को मिलेगा। हाउ वी मेक आवर वे आउट ऑफ दिस माइंड फील्ड। ऑन वन हैंड यदि हम ब्रिटिश गवर्नमेंट के बहुत ज्यादा नजदीक चले जाते हैं। वी विल लॉस्ट द सिंपथी ऑफ़ द सोसाइटी। ये लोग तो सब गोरे लोग ही चला रहा है। ऑन दी अदर हैंड वी कम टू नियर टू डेवोल्यूशनरीज देन ब्रिटिश गवर्नमेंट विल स्टार्ट हमारे सामने प्रॉब्लम खड़ा कर सकती है। दोनों को बचा करके रखना। दो दुश्मन है उसके बीच में आपको दोनों के साथ मित्रता रखनी है। आज जैसे मोदी वो यूक्रेन के साथ में और रशिया के साथ में दोनों के साथ फ्रेंडशिप रखता है। तो दैट वी हैव डन एट दैट टाइम कि ऑन वन हैंड ब्रिटिश गवर्नमेंट के साथ में अच्छा रखा है। ऑन दी अदर हैंड कि ये जो जन युवा समाज जो है भारतीय युवा समाज उसकी सिंपैथी अर्जन की है। बोल के इतने सारे साधु उस समय जॉइन होने को आए हैं। सो दैट वी हैव टू मेंटेन। सो एक बात है अभी देखिए अभी मेरा सॉल्यूशन क्या है? अल्टीमेटली व्हाट आई एम गोइंग टुवर्ड्स कि देखिए मेरे माइंड में सबसे बेस्ट प्रोजेक्ट जिसके ऊपर में मैंने काम किया है ना इट इज़ अ सर्व शिक्षा अभियान। उस समय मैं रांची में था तो अभी रांची में तो गवर्नमेंट स्ट्रक्चर तो है ही नहीं तो गवर्नमेंट ने हमको दे दिया था कि ये सर्व शिक्षा का जो है एव्री 1 कि.मी. पर एक प्राइमरी स्कूल होगी। तो वो आप अब कीजिए स्टार्ट। तो मोर देन 300 यूनिट्स मोर 350 यूनिट्स के आसपास में हमने स्टार्ट किए थे। सो आई वास लुकिंग आफ्टर एवरीथिंग एंटायर इंफ्रास्ट्रक्चर कि गांव-गांव जाना कमेटी बना के मीटिंग करके कमेटी बनाना गांव के एक लड़के या लड़की को अपॉइंट करना एज ए टीचर जो कि एटलीस्ट मैट्रिक या वो हो ग्रेजुएट की अपेक्षा नहीं रख के मैट्रिक पास भी है 10थ 12th तो भी चल जाएगा तो लोकल रिसोर्स पे सब कुछ करना है तो वो उसको अपॉइंट करना फिर ये घर बनाना फिर ये जो टीचर्स ट्रेनिंग है वो अपने दिव्यायन जो कि अपना इंस्टीट्यूशन है रांची में तो दिव्यान के माध्यम से स्कूल चलाना मतलब टीचर्स ट्रेनिंग करना, स्टडी मटेरियल पहुंचाना, असेसमेंट करना। सो एंटायर प्रोजेक्ट आई लुक्ड आफ्टर एंड आई फेल्ट सो मच कंटेंटमेंट। क्योंकि वहां पे मेरे पास में ऐसा कोई रिस्ट्रिक्शन नहीं था कि ठाकुर महा स्वामी जी नहीं लाने हैं। वो सब रिस्ट्रिक्शन होते फॉर्मल स्कूल में। यह तो इनफॉर्मल है। पूरा अपने हाथ में है। देन आई स्टार्टेड टीचिंग देम रामकृष्ण शरणम एंड वो जो बाल्य बाल कथाएं हैं ना वो जो पिक्टोरियल स्वामी विवेकानंद वगैरह। सो पीपल टूक इट अप लाइक एनीथिंग कि बाल जो बच्चों की जो कहानियां है ठाकुर मां स्वामी जी की बाद में जब मैं लिमड़ी में ये जो गदाधर प्रोजेक्ट चला रहा था वहां पे भी मैंने देखा कि किस तरह से बच्चे लोग इतना फटाफट करके ठाकुर मां स्वामी जी की कहानियों को पकड़ लेते हैं। यहां पे भी अभी जैसे मैं ये स्टूडेंट्स के साथ में बात कर रहा हूं। एवरीवन एक्सेप्ट्स ठाकुर मां स्वामी जी। इतना इजी है उन लोगों के लिए। सो व्हाई आर वी नॉट गिविंग दैट टू देम। तो मेरा ऐसा एक ऐसा है इन माय माइंड कि फ्यूचर प्रोजेक्ट कि गदाधर पाठशाला कि गांव-गांव में एट ए 1 कि.मी. डिस्टेंस गदाधर पाठशाला हो देयर वी विल गिव क्वालिटी एजुकेशन एंड ठाकुर मास्वामी जी इन योग एंड वेदांत जो कि बचपन से ही उनको स्पिरिचुअलिटी बताएं। क्योंकि जब तक वो मान लीजिए कि बचपन से ही मेडिटेशन सीखता है, जप ध्यान सीखता है तो ग्रेजुएट होने से तो बच्चा कितना एडवांस हो जाएगा। सो आवर फ्यूचर प्रोजेक्ट शुड बी आवर पूरे ऑर्डर की जो प्राण शक्ति है इसके ऊपर में फोकस कर देनी है। तो प्रत्येक गांव में गांवगांव में यह गदाधर पाठशाला होनी चाहिए। मिनिमम 10 से 15 करोड़ बच्चे अपनी एजुकेशन सिस्टम में पढ़ते होने चाहिए। तब तो होगा कि ठाकुर मां स्वामी जी के संतान है हम लोग। उससे कम में चलेगा नहीं।