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सात्त्विक गर्व और तामसिक गर्व 15 Feb 2024

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ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूप अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते नम स्वामी जी के लेटर हम डिस्कस कर रहे हैं कल हमने देखा कि किस तरह से स्वामी जी हमको बताते हैं कि यदि एक आदर्श कर्म योगी होना है या तो फिर एक आदर्श साधक होना है तो उसके क्या-क्या लक्षण है तो यह जो सब लाइफ अपने सामने यह सब टेस्ट फेंकता है ना परीक्षा फेंकता है छोटी-छोटी तो आज सुबह ही मेरे साथ में ऐसा हो गया मैं मंदिर में बैठा हुआ था और सुबह को तो मंगल आरती के बाद में मां का स्तव चैटिंग होता है आज तो कल तो वैसे तो सरस्वती पूजा समाप्त हो गई किंतु मां की प्रतिमा अभी भी है आज शाम को उसका विसर्जन होगा शायद तो मां की प्रतिमा है तो मां का स्तव तो करना ही है तो जो हमारे जो गाने वाले जो महाराज थे वह बैठ गए हारमोनियम लेकर के भजन चालू कर दिया अभी पीछे में हम चार पांच साधु जो बैठे थे तो क्या था कि ट्रे में वह भजन की किताबें रहती है अभी ज्यादातर साधु तो इतने सालों से भजन गा रहे हैं स्तोत्र स्तव पाठ कर रहे हैं तो जब साथ में गाने की बारी आती है तब वैसे कोई किताब की जरूरत नहीं पड़ती तो वैसे किसी ने वोह ट्रे में से किताब लिया नहीं किंतु उसमें वहां पर एक व्यक्ति था उसने ऐसा सोचा कि साधु लोग वैसे ही बैठे हैं और ट्रे तो थोड़ी सी दूर है तो क्यों नहीं ट्रे में से किताब सभी साधुओं को दे दी जाए तो अभी उसने क्या किया कि ट्रे में से किताब लिया और वहां पर चार पांच साधु बैठे थे मैं भी एक था सबको किताब दिया मुझे नहीं दिया तो अभी जो भी रीजन हो शायद उसने देखा नहीं होगा कि शायद ट्रे में किताब नहीं होगी पता नहीं किंतु जब ऐसा कोई घटना अपने साथ में होता है कि सबको वो किताब दे रहा है मैं भी साथ में बैठा हूं मुझे नहीं दिया तो तो बुरा तो लगेगा ही कि अरे उसने ऐसा तो मैंने इसके साथ में कौन सा दुर्व्यवहार कर दिया था कि जो सबको किताब दे रहा है मुझे नहीं दे रहा तो एक क्षणिक गुस्सा या तो क्या कहेंगे कि एक प्रकार का उसके ऊपर में क्रोध वो तो होना ही है दैट इज अ सिंपल ह्यूमन नेचर किंतु पता है कि ऐसी परिस्थिति में ही हम लोग जो वेदांत स्टडी करते हैं जो ठाकुर महा स्वामी जी की बातें पढ़ते हैं इसी क्षण में देखिए कि हमारी त सही सही परीक्षा होती है यह स्तोत्र पाठ सुबह से चल रहा था ऑलमोस्ट आधा घंटा स्तोत्र पाठ हुआ उसके बाद में रूम में जाकर के मैं पढ़ाई कर रहा हूं वो इतना सुंदर वातावरण है कि हमको ऐसा लगता है कि अरे चलो अभी तो हमने निर्वाण प्राप्त कर ही लिया है क्योंकि जब अच्छा सा स्तोत्र सुनते हैं तो हृदय में से प्रेरणा आती है तब तो ऐसा एकदम सुमधुर भाव अपना चल रहा है ऐसा भीतर में से लग रहा है कि मां सरस्वती अभी हमको दर्शन दे देगी इतना किंतु जब उसके भीतर में एक ऐसी घटना होती है फटा करके हमारे भीतर में जो क्रोध है या तो अहंकार है या तो घमंड है वो फट करके बाहर निकल आता है कि अरे तो क्या उसको क्या लगता है कि मैं इतना सीनियर साधु हूं सबको दे रहा है किताब मुझे नहीं दिया क्या बात है भाई इसमें तो क्या है कि यह तो जब ऐसा होता है तो जैसे ही हमने यह जो पूरा एक एक पैलेस खड़ा किया था ना एक पूरा एक महल बनाया था अपना खुद का सिद्धि के बारे में कि हां मैंने इसमें सिद्धि प्राप्त कर ली है इसमें सिद्धि प्राप्त कर ली है कामिनी कांचन से मैं संपूर्ण रूप से दूर हो गया हूं पढ़ाई लिखाई प मेरा बड़ा प्रभुत्व है तो मैं तो बहुत आगे निकल गया हूं साधना और अध्यात्म के रास्ते प किंतु जैसे वो जैसे मैंने कल कहा था ना कि गुब्बारे में कोई एक पिन मारेगा तो कैसा पंचर हो जाएगा वैसे ही जब एक घटना होती है और फट कर के जब अपना अहंकार जागृत हो जाता है तो हमको पता चलता है कि यह जो पूरा महल हमने बनाया था सीधा जमीन पर आकर के ध्वस्त हो जाता है तब हमको पता चलता है कि देखिए कि हम कितने दूर है अभी तो साधना के पाथ में किंतु देखिए कि जैसे ही यह भी एक बात है कि एक एक क्षण तो ऐसा होना ही होना है किंतु बाद में आइडियल क्या है यदि आप कहेंगे कि ओके ठीक है चलो कर्म योग के रास्ते पर चलेंगे साधना के रास्ते पर चलेंगे कोई यदि गलती करता है तो उसको क्षमा कर देनी है क्योंकि क्या है कि यदि सभी के भीतर में वही आत्मन है तो उसके भीतर में भी वही आत्मन है जो कि बाकी जब साधु बैठे हैं उनके भीतर में भी वही आत्मन है जो किताबें डिस्ट्रीब्यूटर रहा है उसके भीतर में भी वही आत्मन है जो भजन की पुस्तक है उसमें भी वही आत्मन है जो कि मैं मेरे में है तो किसको दिया किसने दिया क्या दिया डजन मैटर ऐसा करके आप अपने मन को मना तो सकते हैं किंतु उससे भी ज्यादा आगे एक और स्टेज है वो है वो तो हो गया पहले वाला तो हो गया डिटैचमेंट जबकि हम आत्म तत्व का चिंतन करते हैं दूसरा इससे भी आगे का स्टेज है लार्ज हार्टेड बस अपने हृदय में से यह बात आनी चाहिए कि देखिए सभी साधु लोग स्तव कर रहे थे वो ट्रे किताबों की थोड़ी सी दूर पड़ी थी तो वह किताब में से ट्रे में से किताबें निकाल कर के बाकी साधुओं को डिस्ट्रीब्यूटर सकता था जैसे इस व्यक्ति ने सोचा कि हां मेरा यह कर्तव्य होना चाहिए कि साधुओं को मैं किताब दूं तो वो तो मेरे मन में भी तो आना चाहिए था सबसे पहले मैंने तो वो सेवा का मौका गवाया अभी जो सेवा का मौका जिसने ले लिया उसको ऊपर से मैं गाली दे रहा हूं ये तो कितनी बुरी बात हो गई यानी कि ये लार्ज हार्टेड नेस हमको डेवलप करना हैय जो विजन है अपना उसको हमको एक्सपें करना है यदि यह विजन हम अपना एक्सपें नहीं करेंगे और सिर्फ एक डिटैचमेंट के रास्ते पर चलेंगे कि हां जो कुछ भी है आत्मन है या तो फिर कहेंगे कि जो कुछ भी है सब कुछ माया है उससे मुझे क्या लेना देना तो डिटैचमेंट के रास्ते पर एक लेवल पर जाकर के हो सकता है कि एक हमारा लिमिट आ जाए क्योंकि डिटैचमेंट मनुष्य नेचर ही ऐसा है कि इमोशन से चलता है यह फीलिंग से चलता है यह भाव से चलता है जद भाव हम पॉजिटिव भाव नहीं कल्टटर नेगेटिव भावों को दूर करने का ही सिर्फ प्रयास करेंगे तो इससे नहीं होगा साथ साथ में ही दूसरा स्टेप है पॉजिटिव भाव को पॉजिटिव इमोशंस को कल्टटर यह जो इंसिडेंट हुआ जैसे मेरे मन में ये अहंकार जागृत हो गया क्रोध जागृत हो गया साथ-साथ में ही किंतु देखिए कि मैंने इनफ स्टडी किया है कि मुझे यह भी पता चला यह भी मैंने सोचा कि देखो जो सेवा का मौका उसने उठा लिया जिस तत्परता से उसने सोचा कि चलो मैं सबको किताब डिस्ट्रीब्यूटर दूं तो वो बात मेरे मन में क्यों नहीं आई आई मीन जिसने यह सोचा कि चलो मैं साधुओं को किताब डिस्ट्रीब्यूटर करूं ही इज ग्रेटर देन आई एम उसने सेवा करने में तत्परता दिखाई जबकि मैं सिर्फ अपना बारे में सोचता था आंख बंद करके बैठा था स्तोत्र पाठ करने के लिए मुझे तो किताब नहीं चाहिए मैं साथ में वैसे ही स्तोत्र पाठ कर सकता हूं इनफ एक्सपीरियंस है अभी तक का तो किंतु मैं तो सिर्फ अपने बारे में सोच कर के बैठा रहा यह जो था उसने तो दूसरे साधुओं के बारे में सोचा सो दिस इज हाउ आई शुड टेक दिस इंसिडेंट प्रॉपर्ली किंतु यह बात आने में मुझे चार पाच मिनट लगा और फिर अभी तो हम लोग तो अपने को सिर्फ शब्दों से मनाते हैं ना कि हां ऐसा नहीं ऐसा होना चाहिए सेवा का मौका तो उसने ले लिया तुमने सेवा का मौका गवा दिया यह तो गलत काम किया तुमने ऐसा क्यों किया ये स हम तो अपने को मनाते हैं इस तरह से किंतु जब जब सही सही में वो जो भाव और फीलिंग प्रकट होना हृदय में कि हां मैं अपना हृदय इतना उदार है सागर की तरह विशाल है कि मैं सेवा करने के लिए सेवा का मौका जो मुझे ठाकुर देते हैं उसके लिए मैं अपने को धन्य महसूस करूं उसके लिए मैं अपने को भाग्यवान म महसूस करू वो तो अभी तक कहां आया है ऐसी ही बात और एक बार हुई थी हम लोग कहीं बाहर गए थे किसी काम के लिए और रात को बड़ी देरी से आए थे ऑलमोस्ट 121 बज गए थे और भोजन किसी ने नहीं किया था तो अभी हम लोग सभी गए डाइनिंग हॉल में और जैसे ही हम लोग अभी मेरा ऐसा नेचर है जैसे मैंने पहले ही कहा था कि मैं ऐसे बहुत सारे मौके बिना सोचे ही गवा देता हूं तो मैं तो जाकर के सीधा बैठ गया क्योंकि क्या है हम लोग सा है तो हम लोगों को वो हैबिट है कि लोग तैयार रहते हैं सेवा करने के लिए और थे भी सही पता है कि साधु लोग रात को 1 बजे आ रहे हैं किचन में ऑलरेडी कोई था हमको सर्व करने के लिए किंतु हम में से ही दो साधु थे दूसरे वो इमीडिएट हमारे साथ में नहीं बैठ कर के भले ही चाहे 1 बज गए हैं रात को वो भोजन के लिए नहीं बैठ कर के वे लोग सामने से सर्विंग करना शुरू कर दिया कि देखो कि हम लोग थे ऑलमोस्ट 10 12 साधु थे और इतनी रात को सर्विंग करने के लिए तो कौन एक ही आदमी वहां पर उपस्थित था एक ही स्टाफ उपस्थित था तो उसको थोड़ा सा देरी होगा इतने सारे साधु भूखे हैं तो चलो दो साधुओं ने मिलकर के उस स्टाफ के साथ में मिलकर के सबको सर्व किया और फिर बाद में सबसे आखिर में इन दोनों ने खाया तो देखिए कि यह बात मेरे मन में नहीं आई कि यह तो ठाकुर ने सेवा का मौका दिया है मैं अपने बारे में ही सोच कर के सबसे पहले मैं बैठ गया लाइन में हालांकि आई वास द जूनियर मोस्ट जो साधू लोग गए सब मैं जूनियर में ही था किंतु फिर भी मैं सीधा जाकर के बैठ गया लाइन में और जो सीनियर साधु थे वे लोग सर्व कर रहे हैं जो पुरानी जनरेशन थी उन लोगों की इस तरह से शायद पता नहीं कि स्टडी और फिलोसोफी कितना उन्होंने समझा होगा नहीं समझा होगा किंतु सेवा का भाव यह सेवा करने का मौका जो ठाकुर देते हैं तो उसको फट करके उसको पकड़ लेना यह उन लोगों में बड़ा ही स्ट्रांग था और इसीलिए हम लोग आजकल मैं खुद कभी-कभी ऐसा सोचता हूं कि अरे हम लोग साधना नहीं कर रहे हैं इतना जो आज हमारी जो विरजानंद जी थे शुद्ध जी थे शंकारानंद जी थे ये जो एक पूरी जनरेशन थी गंभीरानंद जी थे या तो फिर ये अपने भूतेशानंद जी थे ये जनरेशन ही एक ऐसी थी कि जो लोग की साधना करके सिद्धि प्राप्त कर लिए अभी मुझे लगता है कि मेरे से इन लोगों का 1 पर 2 पर भी होगा कि नहीं किसको पता डायरेक्ट डिसाइल की तो बात ही छोड़ दीजिए ठाकुर मां के बारे में तो सोचना ही नहीं है किंतु बाद की जो जनरेशन थी उन्होंने जो साधना की उसका भी 1 पर हमसे होगा कि नहीं होगा वो मुझे कभी-कभी डर लगता है किंतु देखिए कि ये हम लोग जब किताब ही सिर्फ पढ़ते हैं जब तक फिलोसोफी ही पढ़ते हैं हमको ऐसा लगता है कि अरे मैंने तो यह सब कुछ समझ लिया है अरे मैंने तो ये सब कुछ जान लिया है किंतु फिर भी क्यों नहीं हो रहा कि ये जो प्रैक्टिकल जब आता है तब हमको पता चलता है कि हमारी वीकनेस कहो ना कि अभी भी हमको यह जो फिलोसोफी को प्रैक्टिकल करने की जो सेंस है उसमें कहां तक अभी हम दूर है अभी तक हमको कितना लंबा रास्ता काटना है तो यह मैंने एक ही इंसिडेंट से मुझे और ऊपर से देखिए कि इसी टॉपिक के बारे में हम डिस्कस भी कर रहे हैं तो फटाफट करके मेरे माइंड में सब कनेक्शन बैठ गए आई वाज वेरी हैप्पी मैं जब उस समय यह सब कनेक्शन बिठा रहा था कि हां देखो कि मैंने इमीडिएट अपने को को संभाल लिया अपने को यह क्रोध या अहंकार है उसको मैंने इमीडिएट कंट्रोल में कर लिया किंतु यह सोच कर के मुझे भले खुशी होगी किंतु जो सेवा का मौका जो गवाया मैंने वो तो कभी भी फिर से यह मौका नहीं आने वाला है दूसरे 10 मौके आ जाएंगे माने आश्रम में तो यदि आपको किसी को हेल्प करनी है उसका तो अपॉर्चुनिटी में कभी कोई कमी नहीं है किंतु वो एक मौका तो मेरा गया और मैं सिर्फ यह सोच कर के खुश होकर बैठा हूं कि हां एटलीस्ट मैं ने फिलोसॉफिकली अपने को ठीक करके रखा है प्रैक्टिस में पता नहीं कब क्या होगा अच्छा तो स्वामी जी का यह लेटर पढ़ रहे थे कर्मयोग के बारे में स्वामी जी ने कल एक बड़ा ही पावरफुल स्टेटमेंट हमारे सामने रखा है स्वामी जी कहते हैं आबार नई नई बोलले शपर बीश खोय होए जाए की ना व कौन दिश बनो आमी किछु जानी ना आमी किछु नहीं व कौन बी आर विनय है बाप वह किस तरह का विनय है जो कहता है कि मैं कुछ नहीं जानता या तो फिर मुझे कुछ नहीं पता वो किस तरह का विनय और वैराग्य है रे बाप स्वामी जी का शब्द है हे बाप अभी देखिए कि यह जो सेंटेंस है इसके पीछे भी एक बहुत बड़ा एक पॉइंट है जब हम साधना करने की शुरुआत करते हैं जब हम जब ध्यान करने की शुरुआत करते हैं कि साधु हो कि गृहस्थ हो आश्रम में रहते हो कि संसार में रहते हो कहीं पे भी हो हमको सबसे पहले यह बताया जाता है कि यह जो पंच क्लेश है अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश या तो फिर ये काम क्रोध मद लोभ मोह मत्सर ये जो सब नेगेटिव आइडियाज है नेगेटिव इमोशंस है नेगेटिव भाव है उसको दूर करके हमको साधना करनी है जब तक हम उससे छुटकारा नहीं पाएंगे तब तक किस तरह से रहेगा ठाकुर जैसे एक उदाहरण देते हैं दो उदाहरण देते हैं एक यह थी स्क्विरल तो स्क्विरल की पूंछ पे किसी लड़कों ने एक पत्थर बांध दिया अब यह स्क्विरल क्या करती है वह अपनी दीवाल पे चढ़ने का प्रयास करती है अपने बिल में जाने के लिए अपने घर में जाने के लिए किंतु पूंछ के ऊपर में तो पत्थर बंधा है तो जैसे ही थोड़ी सी दीवाल पर चढ़ती है फट करके गिर जाती है फिर से प्रयत्न करती है दीवाल पर चढ़ने का किंतु पीठ के ऊपर में इतना बड़ा वो पूंछ के ऊपर में इतना बड़ा पत्थर बंधा है कि फटाफट करके जितनी बार उठेगी उतनी बार गिर जाएगी दूसरा एक उदाहरण दिया ठाकुर ने कि दो तीन माता माता अर्थात कि जिन्होंने मध्य पान करके अल्कोहल का पान करके वे लोग मत हो गए हैं अपना हश गंवा बैठे हैं ऐसे लोग कुछ लोग नौका चला रहे थे तो कहीं प जाना था तो देखा कि कहीं प जाने के लिए नौका में बैठने के लिए नदी के किनारे गए देखा नौका है तो बोलो चलो बैठ जाते हैं फिर उसमें से दो तीन लोगों ने वो जो ओर्स होता है ना हालेसा जिसको बोलते हैं उसको लेकर के वो चलाना शुरू कर दिया पूरी रात भर चलाते रहे सुबह उठ के देखा तो अरे व तो वहीं पे किनारे पे ही है तो बोला कि ऐसा कैसे हो गया कि सुबह तक तो वो क्या है कि शराब का नशा उतर चुका था तब पता चला कि नौका जो है वह किनारे पे रस्सी के साथ में बंधी हुई है जब तक आप रस्सी नहीं काटेंगे तब तक आप नौका को कितना ही चलाइए वो एक ही जगह पे रहेगी तो ऐसा हमको बहुत कुछ शुरू से ही बताया जाता है कि ये काम क्रोध मद लोभ मोह इन सब से हमको छुटकारा पाना चाहिए तब कहीं जाकर के साधना में हम आगे बढ़ेंगे अदर वाइज तो हम वहीं के वहीं रहेंगे जितना ही जब ध्यान कर लो जितनी ही बड़ी-बड़ी बातें कर लो वेरी गुड जब हम किंतु सही सही में अपना अहंकार है अपना घमंड है यह सबसे छुटकारा पाने का प्रयास करते हैं तब होता क्या है पता है एक्चुअली यह सब इमोशंस है ना वो वैसे ही हमारे सर पर किसी ने हमको टॉर्चर करने के लिए नहीं डाल दी है ये इवोल्यूशन का माने मोर देन न 30 मिलियन इयर्स ना कि कितना अपना ह्यूमन सिविलाइजेशन इस सिविलाइजेशन तो नहीं कहेंगे यह ह्यूमन स्पेसस पृथ्वी के ऊपर में है 10 लाख साल ना 20 लाख साल ना 15 लाख साल जितना जितना रिसर्च होता है वैसे अलग-अलग फिगर्स हमको मिलते हैं जो होमो इरेक्टस था उसमें से होमोसेपियंस को आए हुए शायद इतने कोई 10 15 20 साल 20 लाख साल हुए होंगे तो यह 20 लाख साल की ये जर्नी है कि जिससे कि हमको आज जिस परिस्थिति में है हम सबके भीतर में अहंकार है घमंड है क्रोध है डर है सब कुछ है अभी जदी ये इवोल्यूशन ने हमको दिया है एज ए डिफेंसिव मैकेनिज्म यदि हमारे पर अटैक होता है तो फट करके अहंकार जागृत हो जाना चाहिए मेरा और मेरे परिवार जनों की रक्षा करने के लिए जो मैं अपने परिवार जनों की या मेरी रक्षा नहीं कर पाऊंगा तो क्या होगा कि सर्वाइवल की इस रेस में मैं हार जाऊंगा सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट ऐसा जो कहते हैं वह बिल्कुल गलत नहीं है हमको भीतर में से तो एक स्ट्रांग विल पावर स्ट्रेंथ चाहिए ही चाहिए इस समाज में टिके रहने के लिए तो यह स्ट्रेंथ कहां से आएगी वैसे तो स्ट्रेंथ सही असली विल पावर की शक्ति तो आत्मन में से आती है किंतु आत्मन में से ये जो विल पावर की शक्ति आना वो कोई इजली नहीं होता वो कितने ही माने आपकी तपस्या करने के बाद में हमको आत्मन में से भीतर में से शक्ति मिलने लगती है इससे पहले जो शक्ति जो आती है व आती है हमारे घमंड में से वो आती है हमारे अहंकार में से कि हां जब छोटा बच्चा स्कूल में जाता है और दो-तीन लोग बच्चे उसको डराते हैं धमकाते हैं तो व ऐसा कहता है कि मैं अपने पापा को कह दूंगा मेरे पापा एक बड़े अधिकारी है ठाकुर बड़ा ही सुंदर एक एग्जांपल देते हैं कि मालिक का लड़का शेठ जी का लड़का और उसके घर में एक नौकरानी रखी है उसका लड़का इन दोनों के बीच में झगड़ा हुआ अभी मालिक के लड़के के पास में तो पूरा पावर है उसकी वो नौकरानी को भी एक उसने वो रखा है अपने पैसा देक के जो चाहे तो उसको निकाल सकते हैं उसको अन एंप्लॉयड कर सकते हैं उसका रोजी रोटी छीन सकते हैं इतना पावर इन लोगों के पास में है किंतु फिर भी यह नौकरानी का लड़का वह क्या कहता है अपने मालिक के लड़के से कि तुम इस तरह से मेरे साथ दुर्व्यवहार करोगे तो मैं अपनी मां को कह दूंगा क्यों ऐसा कहता है क्योंकि उसको भरोसा है कि उसकी मां के पास में इतनी शक्ति है कि उसको प्रोटेक्ट कर सकता है बच्चे को पता नहीं है कि मां का क्या स्टेटस है तो वो तो इस तरह से बातें करता है तो अभी देखिए कि ठाकुर तो वैसे जगन माता के बारे में ऐसा कहते हैं कि इस जगत में जितने ही चाहे हम हमारे सामने तकलीफ आ जाए हमको कहना है कि मां जगन माता मेरी मां है और माने हमको ऐसा लगता है ना कि संसार में कोई बड़े अधिकारी का लड़का है कोई राजा का लड़का है कोई क्या है उसके सामने तो हम बड़े छोटे हैं हमको लगता है कि मेरी मां क्या कर लेगी मां तो राज राजेश्वरी है तो ठाकुर समझाते हैं इस तरह से किंतु इसका थोड़ा सा सांसारिक दृष्टि से यदि देखें तो कोई भी लड़का जदिया कि मैं एक बड़े ही कुल में से आता हूं बड़े परिवार में से आता हूं मेरे पिताजी के पास में बहुत पैसे हैं तो ऐसा तो कोई इतना इजली मुझे डराना मुझे धमकाना संभव नहीं है क्योंकि लाइफ आपके सामने हर समय यह सब क्राइसिस फेंकता ही रहेगा तो आप अपने को किस तरह से बचाएंगे आपके भीतर में अहंकार का एक कुछ नहीं रहेगा अहंकार करने के लिए गर्व करने के लिए अहंकार शब्द को यदि छोड़ दे थोड़ी देर के लिए गर्व करने के लिए यदि अपने पास में ऐसा नहीं रहेगा तो हम किस चीज को लेकर के स स वाइव करेंगे मेरे खुद की बात करूं तो क्या है कि मैं जब छोटा था तो ऐसे ही अपने मित्रों के साथ में कभी भी ऐसा कोई झगड़ा वगैरह होता था तो मुझे ऐसा लगता था कि हां मेरे परिवार मेरा परिवार मेरी रक्षा कर लेगा क्योंकि मुझे लगता था अभी सही में क्या है नहीं है वह दूसरी बात है छोटे बच्चे के मन में होता है कि मेरे पिताजी तो बड़ी अच्छी पोस्ट पे है या तो फिर मेरा परिवार जो है वो बहुत बड़ा है तो कोई भी क्राइसिस होने से ये लोग मुझे बचा लेंगे ये होता है ना गर्व नहीं होने से जैसे ही खतरा सामने आया हम लोग डिप्रेशन में चले जाएंगे हम लोग एक बहुत ही भयानक व्याधि का शिकार हो जाएंगे भीतर में से एक ऐसा डर हमारे सामने होगा कि एक सांप के सामने चिड़िया केसी पैरालाइज होकर के रह जाती है कुछ अपना सेल्फ डिफेंस नहीं कर पाती है और साप उसको भक्षण कर लेता है वैसे ही अपने भीतर में कोई गर्व नहीं रहेगा जाति कुल मान धन पछ संपद सामाजिक प्रतिष्ठा ऐसा कोई गर्व नहीं रहेगा तो क्राइसिस आकर के हमको खा लेगी हम मुकाबला नहीं कर पाएंगे पैरालाइज हो जाएंगे तो यह सब डिफेंसिव मैकेनिज्म है कि जो कि इवोल्यूशन ने हमको दिए हुए हैं वही बात है कि सा अध्यात्मा आपको यह नहीं कहता है कि गर्व से या तो आपका यह जो डिफेंसिव मैकेनिज्म है या तो आपकी जो स्ट्रेंथ एंड विल पावर है उसको आप छोड़ दे आप वल्नरेबल या तो कमजोर हो जाए साधना यह नहीं कहती या तो फिर आध्यात्मिकता या तो फिर वेदांत आपको ऐसा नहीं कहता वेदांत क्या कहता है कि आपकी स्ट्रेंथ का जो सोर्स है वो तामसिक सोर्स की ओर से सात्विक सोर्स बना दो एक ऐसा सात्विक सोर्स जो कि अमर अजर है और सही सही में आपको प्रचंड विल पावर प्रचंड इच्छा शक्ति प्रचंड संकल्प शक्ति आपको देता है किसी भी तरह की क्राइसिस के सामने फाइट करने के लिए किंतु यह एक बात है कि जैसे साधना करने की शुरुआत की और यह जो अपना तामसिक सोर्स है गर्व का या तो फिर अहंकार का या तो फिर विल पावर का उसका त्याग करके सात्विक सोर्स की ओर जब हम जाते हैं बीच में एक ऐसा पीरियड आता है कि हम लोग बड़े ही वल्नरेबल हो जाते हैं बड़े ही एक माने अटैक जब होगा तो हम डर जाते क्यों क्योंकि तामसिक सोर्स से तो मुक्ति पाने का प्रयास कर रहे हैं और सात्विक सोर्स तो अभी अपने हाथ में आया नहीं है अपने पिताजी की धन संपत के ऊपर में या तो फिर मेरी खुद की सामाजिक प्रतिष्ठा के ऊपर में जो मुझे गर्व करना चाहिए था उसको तो मैं प्रयास करके दूर हो रहा हूं दूसरी बार है कि यह जो मैं ठाकुर का संतान हूं अमृतस्य पुत्रा वयं यह जो मैं अमृतस्य माने ये ऋषि मुनियों की संतान हू वो गर्व तो अभी आया नहीं है तो बीच का पीरियड बड़ा ही वल्नरेबल हो जाता है तो स्वामी जी हमको कभी-कभी चाबुक मार के कहते हैं कि देखो तमस में डूब कर के इस तरह की वल्नरेबल में बैठे मत रहो वरना साधना करते हो कोई किसी भी तरह के धन संपत्ति सामाजिक प्रतिष्ठा उसके ऊपर में गर्व नहीं करना है अच्छी बात है किंतु यह जो विनय विनम्रता या तो डर आपको कहीं पैरालाइज करके खत्म ना कर दे फटाफट करके कदम उठाओ और जिस रा माने एक मंजिल से दूसरी मंजिल की ओर जाना है थक कर के बीच में यदि हम रेस्ट करने के लिए बैठ गए तो शेर आ कर के खा जाएंगे फटाफट करके चलो आगे कदम करो आगे कुछ करो जो सामने की मंजिल है वहां पर पहुंचने का प्रयास करो ऐसा वल्नरेबल स्थिति में आकर के ऐसा होता है कि जब क्राइसिस आ जाती है साधक डर जाता है पैरालाइज हो जाता है डिप्रेशन में चला जाता है ऐसा मैंने अपनी नजरों से देखा है मेरे खुद के जीवन में मैंने उसको महसूस भी किया है बहुत बार मेरे साथ में ऐसा होता है कि मैं क्यों गर्व करो मैं तो यह संसार छोड़ कर के आया हूं किंतु साथ-साथ में ही जैसे कहा कि आज सुबह की ऐसी एक घटना हो गई कि फट कर के ये घमंड जागृत हो गया या तो फिर जद ये घमंड जागृत नहीं होगा तो साथ-साथ में डिप्रेशन भी आ गया कि अरे वो मेरे साथ में ऐसा क्यों कर रहा है माने अहंकार और डिप्रेशन दोनों भीतर में से एक आ जाता है घटना होने से तो इसीलिए हमको जो भी है साधना करने की शुरुआत की फटाफट करके हमको ठाकुर के ऊपर में गर्व हमारा प्रकट करना है ठाकुर के श्री चरणों में शरणागति करनी है जैसे कि हमारा विल पावर वो सशक्त करें वो स्ट्रन करें जिससे कि हमने वोह जो अपना गर्व जो बाकी का सांसारिक घमंड छोड़ के आए हैं तो वो हम कहीं ऐसे शिकार ना हो जाए शेर का ना कि सांप का तो इसीलिए स्वामी जी यहां पर हमको चाबुक मार करके बोल रहे हैं कि वो किस तरह का विनय है वो कौन दिशि विनय आमी किछु जानी ना आमी किछुई नहीं कि मुझे कुछ नहीं पता मैं कुछ नहीं हूं यह किस तरह का विनय है कभी कोई साधक कहेगा कि अरे भाई मैं मुझे क्या पता मुझे क्या मैं क्या हूं मैं कौन हूं मैं कुछ नहीं हूं किंतु ऐसा कहने से आप ऑलरेडी डिप्रेशन में चले जाएंगे ऐसा कोई आईएएस ऑफिसर होगा बाहर के जगत में बड़ा ही घमंड है उसको कि मैं आईएएस ऑफिसर हूं यहां पर साधु होने को आया बोलेगा कि अरे मैं तो आईएस ऑफिसर ह मैं तो साधु हूं फिर जब क्राइसिस आएगी जब वो ऐसा विनय प्रकाशित करेगा कि क्यों भाई मैं तो कुछ भी नहीं हूं मेरा तो कोई स्टेटस ही नहीं है मैं तो साधु हूं सन्यासी हूं किंतु स्वामी जी कहते हैं कि नहीं जैसे तुम्हारा यह घमंड था कि मैं आईएएस ऑफिसर हूं वो गलत था तो साथ-साथ में ही यह जो गलत गलत विनय प्रकाशित कर रहे हो मैं कुछ नहीं हूं वो भी गलत है अरे तुम तो ठाकुर के संतान हो तुम तो अमृत के पुत्र हो तुम तो ऋषि मुनियों की वंशज हो तुमको भी इस तरह का विनय या तो डर प्रकट करने की क्या जरूरत है इस तरह से सब समय भय में रहने की क्या जरूरत है तो दोनों चीजों का त्याग करना है एक तो जो सांसारिक घमंड है उसका भी त्याग और फिर घमंड का त्याग करने के बाद में यह जो वल्नरेबल आती है उसका भी त्याग एक सात्विक गर्व अपना होना ही चाहिए अदर वाइज यह संसार हमको खा जाएगा तो इसीलिए हां ऐसा कोई ओवरनाइट नहीं करना है ऐसा ओवरनाइट करने से तो फिर बहुत सारी दूसरी तरह की तकलीफें आ जाएंगी तो धीरे-धीरे करके इस रास्ते पर किंतु एक बार यदि हमने स्टार्ट किया है साधना के रास्ते पर फिर वो क्या है कि तमस या तो फिर आलस से बैठे नहीं रहना है जो एक रेगुलर साधना करने का हमने निश्चय किया है वो तो करते ही जाना है तो इसीलिए स्वामी जी कहते हैं आमी किछु जानी ना आमी किछुई नहीं व कौन दिश बैगी आर विनय है बाप वह किस तरह का वैराग्य है किस तरह का विनय है रे बाप और रकम दीना हीना भाव के दूर करे दते होबे इस तरह का दीन हीन भाव दीन हीन को यहां पर कोटेशन मार्क में स्वामी जी ने लिखा है इस तरह का दीन हीन भाव को दूर कर देना पड़ेगा बहुत बार होता है ना गुजराती में एक शब्द है वेदियो तो मेरे घर में मैं ऐसा सुनता रहता था वेदियो अर्थात कि जो वेद का बहुत ज्यादा फॉलो करता है वेद अर्थात कि धर्म जो कि बहुत ज्यादा धर्म धर्म करके वो संसार में क्या है कि वो कुछ वो प्राप्त नहीं कर सकता जैसे कि मुझे एक इंसिडेंट याद है कि मैंने यह शब्द सुना था मेरे ही घर में वो किसी मेरे परिवार में से ही कोई यह बिजली का बिल भरने के लिए गया था अभी आजकल तो क्या है मोबाइल पर सब बिल वगैरह भरा दिया जाता है ऑनलाइन सब कुछ हो गया है उस समय ऐसा नहीं था उस समय ऐसा था कि आपको लंबी लाइन में खड़े रहना है आधे घंटे के बाद में एक घंटे के बाद में आपका समय नंबर आएगा और तब कहीं जाकर के आपको वो वो खिड़की के ऊपर में वो जो बैठा होगा गवर्नमेंट का वो जो वो उसका भी किसी भी तरह का बेड टेंपर होगा किसी भी तरह से रफल बिहेव करेगा कुछ भी करेगा आपको चुपचाप सहन कर लेना है बिल का पैसा देना है माने ये सब कुछ इस तरह से था पूरा तो अभी हमारे परिवार में से कि कोई गया वहां पे आधा घंटा लाइन में खड़ा रहा फिर जैसे ही उसकी बारी आई तो उन लोगों ने खिड़की बंद कर दी बोला कि अभी टाइम हो गया है खत्म हो गया तो वैसे ही वापस आ गया बोला कि मेरा जैसे नंबर आया तो वैसे ही तो उसने खिड़की बंद कर दी तो हमारे परिवार में से किसी ने बोला यह है ना वेदियो है वेदियो वो झगड़ा करके बोल नहीं सकते कि अरे भाई तुम मेरा तो ले लो मैं इतने टाइम से खड़ा था इतना बोलने का तुम्हारे में साहस नहीं हुआ यानी कि क्या है कि इसने धर्म को इस तरह से समझाए कि सब समय वो सहमा सहमा डरा डरा रहता है तो हम लोग कभी-कभी ऐसा एक पॉपुलर परसेप्शन है कि जो लोग धार्मिक व्यक्ति है वह डरे हुए हैं वह सहमे हुए हैं वोह अपना प्रतिकार नहीं कर सकते या तो सेल्फ डिफेंस नहीं कर सकते किंतु यह जो सब भाव है ना वो बुद्धिज्म में ये जो अहिंसा का एक कांसेप्ट खड़ा हुआ था उसमें से आता है स्वामी जी का एक बहुत ही सुंदर इंसिडेंट है हमने काफी बार चर्चा भी किया होगा आपने पढ़ा भी होगा कि वो ट्रेन में जा रहे हैं तो स्वामी जी को तो पता था ना कि पेट की बीमारी थी माने इनडाइजेशन की तो क्या था कि उनको सेकंड क्लास ने कि ऐसा मुसाफर करनी पड़ती थी थर्ड क्लास में मुसाफिर नहीं करेंगे फर्स्ट क्लास कल से सेकंड क्लास में वो मुसाफिर करेंगे जिससे कि वहां पर टॉयलेट अवेलेबल हो ट्रेन के भीतर में तो अभी वह अजमेर में कि कहीं पर राजस्थान में थे उनके एक शिष्य ने उनके एक डिसाइल ने उनको ट्रेन का टिकट दिया अभी यह प्री पार्लिमेंट स्वामी जी है जब स्वामी जी परिवर्धन और गेरवा वस्त्र धारण करके पूरे भारत में घूम रहे थे भिक्षा मांगते हुए और भारत की जो मां भारती की जो यह आज की वर्तमान अवस्था है उसका निरीक्षण करके इसके ऊपर में ध्यान करके तो इसी तरह से अननोन सन्यासी है बिल्कुल किंतु जो कोई भी उनके संपर्क में आता था जो कोई भी उनकी बातें सुनता था बड़ा ही प्रभावित हो जाता था तो राजस्थान में कहीं पे थे और एक कोई जेंटलमैन उनकी बात सुनकर के बड़े ही प्रभावित हो गए और जब स्वामी जी जा रहे थे वहां से तो उन्होंने स्वामी जी को कहा कि मैं आपके लिए ट्रेन की टिकट खरीद देता हूं तो स्वामी जी ने कहा होगा इस तरह से फर्स्ट क्लास या ऐसी कोई टिकट खरीदना जैसे कि वो बाथरूम वहां पे अवेलेबल हो तो उसने यह टिकट खरीद दी ये दोनों वो कंपार्टमेंट में बैठे थे और बातें कर रहे थे उस समय सामने एक ब्रिटिश व ब्रिटिशर आया तो जैसे ही आया तो उसने सोचा कि अरे यह तो वैसे ही ये तो इंडियन भारतीय लोगों को तो थर्ड क्लास में मुसाफर करनी चाहिए तो उसकी बजाय कहा यह फर्स्ट क्लास में बैठा है और वो भी एक फकी फर है माने कोई गवर्नमेंट ऑफिसर होता कोई क्लार्क ब्रिटिश माने गवर्नमेंट का तो तो समझ सकते हैं यह तो एक फकीर है जो कि फर्स्ट क्लास में आकर बैठा है तो उसने क्या किया वोह टिकट मास्टर था टिकट चेकर उसको बुलाया और कहा कि यह फकीर यहां पर फर्स्ट क्लास में क्या बैठा है क्या कर रहा है उसको भगाओ यहां से तो टिकट चेकर ने कहा कि आप एक काम कीजिए यहां से निकल जाइए थर्ड क्लास में जाइए तो स्वामी जी के जो साथ में जो जेंटलमैन थे जो उनका जी को तो मैंने फर्स्ट क्लास का टिकट खरीद करके दिया है और मैं खुद रेलवे का कर्मचारी हूं तो मुझे पता है कि उनको यहां पर बैठने का पूरा अधिकार है आपको यहां पे कुछ बोलने की जरूरत नहीं है आप जाइए तो अभी क्या है कि वो टिकट मास्टर तो यह बात सुन कर के बड़ा ही नाराज हो गया वो ब्रिटिश लोग होते हैं ना घमंड इतना इतना होता है कि ये लोग तो गुलाम प्रजा है तो उसने झगड़ा करना स्टार्ट कर दिया जोर-जोर से कि तुम चले जाओ यहां से तुम चले जाओ यहां से तो दो-तीन बार तुम तुम बोल दिया तो स्वामी जी जोर से एकदम पहले तो चुप चुपचाप सुन रहे थे किंतु उसके बाद में जोर से चलाना गरज करके शेर की तरह कि अरे तुम्हारे में क्या विनय नहीं है तुम मुझे तुम तुम करके बुलाते हो तुम किस तरह के आदमी हो ऐसा करके स्वामी जी ने उसको जो डांटा है ऐसा डांटा है कि वो टिकट मास्टर वहां से दुम दबा के भाग गया और वो ब्रिटिशर था जो कि जिसने उसको बुलाया था वो चुपचाप पूरी जर्नी में मुंह बंद करके स्वामी जी के सामने बैठा रहा एक शब्द बोले बिना एक शब्द का उच्चार किए बिना तो देखिए कि अभी जो जो जैसे कि वेदिया शब्द जिनके बारे में मेरे परिवार में जो थे उनके साथ में यदि ऐसा हो जाता कि नहीं हम तो धार्मिक है हम तो बड़े ही हम शांत मने अहिंसा यानी कि किसी के झगड़ा नहीं करना किसी को कटु वचन नहीं कहना किसी को कोई किसी तरह से नुकसान नहीं करना कष्ट नहीं देना तो ऐसे लोग क्या करेंगे बेचारे चुपचाप कहेंगे अच्छा ठीक है भले ही चाहे हमाने टिकट के पैसे दिए हो भले ही चाहे टिकट के पैसे व्यर्थ जाए हम लोग जाकर थर्ड क्लास में बैठ जाता किंतु स्वामी जी का ऐसा नहीं था जो अधिकार है अपना अधिकार के लिए युद्ध करना धर्म युद्ध वो तो हमारा कर्तव्य है और इसी के ऊपर में अपनी गीता बनी हुई है कि जो जो धर्म के लिए युद्ध करना महाभारत में सुंदर प्रसंग है पांडव कहते हैं कि जद एक सुई जो है सुई जितनी जमीन के सुई को खड़ी रहने के लिए जितनी रत्ती भार जमीन जद हमको मिल जाती है तो भी हम युद्ध नहीं करेंगे इतनी जमीन भी एज ए टोकन हमको दे दो क्योंकि यह तो धर्म की बात हो गई कि जिस जमीन के ऊपर में हमारा अधिकार है वो आप छीन लेंगे और हम कुछ नहीं करेंगे तो नहीं चलेगा एट द सेम टाइम यह सिविल वॉर भाई भाई में युद्ध झगड़ा नहीं करना सुई जितनी जमीन के ऊपर में खड़ी रहती है इतनी सी जमीन भी दे दो तो युद्ध नहीं होगा तो इन लोगों ने कहा कौरवों ने कि इतनी जमीन भी नहीं देंगे तब कहीं जाकर के युद्ध करने की बारी आ गई तो यह अपने हिंदू धर्मशास्त्र कहते हैं इसीलिए स्वामी जी ने एक बार कहा है अपने प्रवचन में कि देखिए कि यह जो यूरोपियन कंट्रीज है वैसे तो वह फॉलोअर्स है क्राइस्ट के किंतु वे लोग फॉलो कर रहे हैं कृष्णा को और हम लोग इंडियन लोग हम लोग है फॉलोअर्स ऑफ कृष्णा किंतु हम लोग एक्चुअली इन प्रैक्टिस फॉलो कर रहे हैं क्राइस्ट को क्यों जीसस ने कहा है कि कोई एक गाल प चाटा मारे तो दूसरा गाल दिखा दो तो य ये फॉलो उनके प्रोफेट ने कहा है और उसका प्रैक्टिस में प्रैक्टिस कर रहे हैं हम लोग और हमारे प्रोफेट ने कहा है कि धर्म के विरुद्ध में यदि कोई हाथ उठे तो इस हाथ को तोड़ दो तो यह हमारे प्रोफेट ने कहा है किंतु प्रैक्टिस कर रहे हैं वो यूरोपियन लोग तो इसलिए स्वामी जी कहते हैं कि देखिए कि धर्म के सामने धर्म का पालन करते हुए यह एक अपना हमारे भीतर में दीन हीन भाव है इसको दूर करके धर्म का पालन करना है यह जो एक वल्नरेबल बिलिटी आ जाती है कि हमने मैं कोई एक ऑफिसर हूं या तो फिर मैं बहुत बड़ा धनी व्यक्ति हूं या तो फिर मेरे पास में बहुत सामाजिक प्रतिष्ठा है यह तामसिक गर्व है इसका त्याग करके सात्विक गर्व हमारे भीतर में आना चाहिए ठाकुर मा स्वामी जी की संतान है हमको आभार डर किस चीज का भय किस चीज का तो इस तरह से सात्विक गर्व हमारे में प्रकाशित होना चाहिए इसके बाद की बात है कि जब परम हंस अवस्था आ जाती है जबकि हम आत्म भाव में या तो फिर सत्व में प्रतिष्ठित हो जाती है हम हो जाते हैं उस समय यह गर्व वगैरह कहां चला जाएगा पता भी नहीं चलेगा उसके बाद में हम संपूर्ण रूप से मां के ऊपर में निर्भर होकर के रह जाएंगे किंतु जब तक वह नहीं होता है तब तक तो एक सात्विक गर्व हमारे में होना ही चाहिए अदर वाइज यह जगत हमको खा जाएगा और वैसे हुआ भी था भारत की जो परिस्थिति थी स्वामी जी ने वो काश्मीर से लेकर के कन्याकुमारी तक पूरी यात्रा की थी मने लिटरली ये जो काश्मीर से कन्याकुमारी शब्द जो एक आजकल एक जो जनरली फेमस है स्वामी जी ने सही सही में कन्याकुमारी भी गए थे काश्मीर भी गए थे और बीच के जितने भी स्टेट थे ऑलमोस्ट सभी स्टेट की उन्होंने यात्रा की थी भ्रमण किया था लिटरली कश्मीर से कन्याकुमारी और यहां पर वो सोमनाथ से वो वहां पर ब्रह्मपुत्र नदी लिटरली स्वामी जी सोमनाथ भी गए थे ब्रह्मपुत्र भी गए थे तो यह जर्नी तो स्वामी जी ने सही सही में की थी भारत की परिस्थिति उन्होंने अपनी नजरों से देखी थी और उनको पता था कि जदव के नाम पर हम किस तरह के एक अज्ञान में एक तमस में एक डर में ऐसे डूब गए हैं कि कोई भी आता है ये ब्रिटिश आएगा ना कि ये मुगल आएंगे कि जो भी आएंगे हमको लात मार के हमारे पर राज कर रहा है यह तो नहीं चलेगा सबसे पहले वो क्षात्र वीर्य जो है वो फिर से ब्रह्म तेज और क्षात्र वीर्य दोनों को फिर से प्रकट करना होगा एक सात्विक गर्व हमारे में होना चाहिए तब कहीं जाकर के तो हम सही सही साधना के रास्ते पर आगे बढ़ पाएंगे तो इसीलिए स्वामी जी कहते हैं इस तरह का दीना हीना भाव के दूर करे दते हुए दीन हीन भाव को दूर कर देना पड़ेगा आमी जानी नहीं तो कौन शाला जाने जद मुझे नहीं पता तो किस साले को पता हैने स्वामी जी जो स्ट्रांग लैंग्वेज यूज करते हैं मुझे नहीं पता यदि कोई मुझे पूछेगा कि अच्छा इस बात का क्या उत्तर है मुझे नहीं पता क्योंकि मैं तो कुछ भी नहीं हूं मैं कौन हूं तो यदि मैं नहीं जानता तो कौन साला जानता है तुम ही जानो ना तो य तो काल कोरले की यदि तुमको नहीं पता है तो इतने दिन क्या किया अभी यहां पर दूसरा भी एक कांटेक्ट है कि ये जो स्वामी जी अपने गुरु भाइयों को कह रहे हैं बार-बार की संघ बद्ध हो और ठाकुर का नाम का प्रचार एक हम संघ बद्ध होकर के रामकृष्ण मिशन की स्थापना करके करते हैं तो ये जो राजा महाराज राज थे यह सब लोगों का ऐसा था कि चलो तपस्या करते-करते प्रव्रज्या करते करते घूमते रहते हैं यह संघ की स्थापना करेंगे तो क्या दुनिया भर का आपका झंझट आपके सर पे वो बैठ जाएगा राजा महाराज तो जमींदार के लड़के थे उनको तो पता है जमींदारी चलाने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है वो कोई यहां से मुकद्दमा किसी ने किया कहीं कोर्ट केस कर दिया कहीं यह गवर्नमेंट के साथ में वो झमेला हो गया कहीं किसी के साथ में कुछ हो गया जैसे ही जर जमीन अने जोरू ये जो गुजराती में कहते हैं कि जर जमीन अने जोरू आ त्रण कजियाना छोरू अर्थात की जर अर्थात की जवाहरात जमीन अर्थात की ये लैंड और जोरू अर्थात कि स्त्री ये जवाहरात ये जमीन और स्त्री ये तीन है कजियाना छोरू कजिया अर्थात की झगड़ा और छोरू यानी कि सन ये सब झगड़े के जो मूल स्रोत है वो यही सब है और यदि संघ की स्थापना करेंगे तो निश्चय ही आपके साथ में यह जो पैसा भी आएगा डोनेशन भी आएगा जमीन भी आएगी बिल्डिंग भी आएगा इंफ्रास्ट्रक्चर भी आएगा सबकी संभाल करते-करते आप दूसरे जमींदार ना हो जाए तो राजा महाराज वैसे ही जमींदार के लड़के थे जमींदारी तो उनको अपने वारसा में मिलने वाली थी वोह छोड़ कर के साधु हुए ना कि एक दूसरे जमींदार हो गए फिर से ये तो मैंने राजा महाराज का ऐसा था हैना सभी गुरु भाइयों का एक ऐसा भाव था कि यह सब जमेला नरेंद्र खड़ा कर रहा है यह तो क्या सही में ठाकुर ने ऐसा कहा है कि नहीं कहा किसको पता तो इसीलिए स्वामी जी इनको चाबुक मार के बोल रहे हैं कि दीन हीन भाव को दूर कर दो आमी जानी नहीं तो कौन साला जाने मैं जद नहीं जानता तो कौन साला जानेगा तुम ही जानो ना तो य तो काल करले की तुम नहीं जानते तो तुमने इतने दिन क्या किया वही सब नास्तिक कथा लखी छाड़ और बिनय वो सब नास्तिक लोगों की बातें हैं लखी छाड़ और बिनय लखी छड़ा अर्थात की लक्ष्मी छाड़ जिसके पास में लक्ष्मी नहीं है दरिद्र है वो हालांकि यहां पर स्वामी जी किसी दरिद्र व्यक्ति की बात नहीं कर रहे दरिद्र का माइंड सेट जिसका होता है माने एक पॉवर्टी माइंडसेट कहो ना कि एक निम्न कक्षा का जिसका माइंड सेट है उसके बारे में बहुत सारे दरिद्र लोग होते हैं उनका इतना विराट हृदय होता है कि जो भी आपको एक सुंदर कहानी स्वामी जी कहते हैं कि एक नेवला एक युधिष्ठिर ने सभा की उसमें यज्ञ में आकर के वो आलोट लगा तो देखा कि फिर वो ऐसा आलोट के बाद में वो बड़ा ही निराश हो गया तो वहां प सब लोग बैठे हैं अभी नेवले का आधा शरीर सोने का है आधा शरीर अभी भी वो नेवले का ही है तो बाकी सबने पूछा कि अरे तुम यहां पर यज्ञ की राख में इतने तुमने राख में जाकर के बाहर आकर के तुम निराश क्यों हो गए हो तो नेवले ने कहा कि देखो कि आपने इतना बड़ा यज्ञ किया तो आपको तो कितना पुण्य मिलना चाहिए तो मैंने तो सोचा कि मेरा जो अधा शरीर है वह भी सोने का हो जाएगा किंतु हुआ नहीं तो बाकी सबने पूछा क्यों तुम ऐसा क्यों कह रहे हो तो बोला कि मैं किसी के घर पर गया था गरी परिवार था ब्राह्मण का तो वहां पर जाकर के मैंने देखा कि इन लोगों के पास में खाने के लिए सिर्फ एक ही रोटी थी तो मैंने जाकर बोला कि मुझे भूख लगी है तो उन्होंने वो रोटी मुझे दे दी अभी वो जो कुछ अल्प आहार था इनके घर में तो वो आहार तो मुझे दे दिया तो जो किसान था उसकी पत्नी थी उनका लड़का था तीनों ही उस रात को मृत्यु पा उनका मृत्यु हो गया बिना आहार के तो मैं उनकी जो राख थी वो चूल्हे की राख उसमें मैं प्रवेश किया और बाहर आकर देखा तो मेरा आधा शरीर सोने का हो गया था अर्थात कि यही दरिद्र ब्राह्मण लोगों ने कितना मैंने दान किया है वो दान की सही में बड़ी महिमा है बात ये नहीं है कि सिर्फ एक रोटी दी है वो रोटी का महत्व इन लोगों के लिए कितना बड़ा था तो यह नेवला आके बोल रहा है युधिष्ठिर की सभा में कि आपने तो इतना सारा हजारों लाखों गाय दान में दी होगी सोना महर दी होगी तो आपकी ये यज्ञ की राख में में जाकर प्रवेश किया तो मेरा आधा शरीर तो सोने का नहीं हुआ अर्थात कि आप ने जो दिया उससे कहीं ज्यादा आपने छुपा के रखा था माने आपके लिए जो दान दिया दान का इतना महत्व नहीं था तो ऐसा नहीं है कि लक्ष्मी छड़ा अर्थात की कोई दरिद्र व्यक्ति के बारे में बात करें दरिद्र माइंड सेट जैसे कि नचिकेता के पिताजी का था इस तरह का माइंड सेट कि वो जो दग्ध दोहा यायाम गतर समम माने की दग्ध दोहा माने कि इस तरह की गाय उन्होंने दान में दी जो कि जिसका दूध खत्म हो चुका है उनका शरीर में किसी भी तरह की शक्ति नहीं रही है उनकी वो बूढ़ी हो गई है इस तरह की गाय उन्होंने दान में दी यमराज को फिर अभी नच केता ने सोचा कि यमराज को इस तरह की गाय दी है हालांकि उनके पास में स्वस्थ गाय दूध देने वाली गाय तो बहुत सारी होगी वो नहीं दी और इस तरह की गाय दी तो यमराज नाराज हो जाएंगे चलो मैं यमलोक में जाकर के उनको शांत करता हूं उनसे वरदान मांग लेता हूं कि मेरे पिताजी पर नाराज ना हो उनको क्षमा कर दे तो देखिए कि यह बात यह नहीं है कि आप दरिद्र पैसों से है आपका माइंड सेट दरिद्र का है कि नहीं तो वह जो कहानी जो किसान की कहानी कि जिनके पास में सिर्फ एक रोटी थी जो कि उन्होंने नेवले को खाने के लिए दे दी व ज्यादा धनपति था कंपेयर टू यह न नचिकेता के पिताजी जिन्होंने यह सब वृद्ध गाय जिनमें दूध नहीं है इस तरह की गाय दान में दी हालांकि वह बड़े ही लब्ध प्रतिष्ठित व्यक्ति थे बहुत सारी गाय उनके पास थी किंतु माइंड सेट उनका दरिद्र का था तो इसलिए स्वामी जी कहते हैं वोह सब नास्ति ही सब नास्तिक कोथा लखी छाड़ और बनय लखी छड़ा अर्थात की दरिद्र का विनय वह सब नास्तिक की बातें दरिद्र का विनय तो आज यही त कल फिर से मिलते हैं ओम शांति त श्री राम कृष्णर्पण मतो