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Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life and Teachings 21 Apr 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय धर्मस्य [संगीत] सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते स्वामी विवेकानंद का लाइव इस सप्ताह हम पाठ कर रहे हैं। वराह नगर मठ का पीरियड चल रहा है। मास्टर महाशय आए हैं वही मठ में

पुनरावृत्ति

और फिर नरेंद्र के साथ में वार्तालाप हो रहा है। तो जिस तरह से कल हमने देखा कि किस तरह से स्वामी जी अपने पुराने दिनों की बातें मास्टर महाशय को बताते हैं कि किस तरह से प्रथम बार ठाकुर के साथ में जो वार्तालाप हुए थे। ठाकुर ने किस तरह से उनके भीतर में शक्ति संचार किया था। उनकी ये जो कुछ कुछ आध्यात्मिक अनुभूतियां थी उसके बारे में नरेंद्र कहता है और किंतु यह सब कुछ सीक्रेटली नरेंद्र फिर यह भी कहता है कि देखिए आप यह सब जो बातें मैं आपको बताता हूं और किसी को बताइएगा मत तो मास्टर महाशय हां कहते हैं कि हां नहीं बताऊंगा इसका ऐसा कहने के बाद में म नरेंद्र ने जो मास्टर महाशय को कहा मत बताइएगा ये भी मास्टर महाशय ने लिखा है और उन्होंने यह जो कहा कि हां मैं नहीं बताऊंगा। यह भी उन्होंने लिखा है। तो देखिए इसके पीछे का हमने देखा था कि रास क्या है। बात ऐसा नहीं कि मास्टर महाशय जो है वो नरेंद्र का भरोसा तोड़ रहे हैं। किंतु स्वामी जी की महासमाधि के बाद में यह सब कुछ विधिबद्ध किया गया है। तो यहां तक हमने देखा था थोड़ा सा आगे देखेंगे। साथ में ठाकुर ने ये भी कहा था कि म नरेंद्र का और ठाकुर का जो नाता था कितना अपना था। कितना स्नेह से पूर्ण था। ईश्वर कहीं अवकाश में कहीं बादलों के ऊपर में नहीं रहते। वो कोई पराए नहीं है। उनका भय नहीं करना है। उनसे डर के नहीं रहना है। ईश्वर तो अपने स्वयं है। अपने खुद के मां पिताजी की तरह वो हमको स्नेह भी करते हैं और हम मां पिताजी के साथ में जैसा झगड़ा करते हैं वैसा हम ईश्वर के साथ में नाराज भी हो सकते हैं, झगड़ भी सकते हैं। मुझे डाउट है कि ऐसा कोई व्यक्ति होगा। ऐसा कहेगा कि नहीं? मैंने मेरे पेरेंट्स के साथ में कभी झगड़ा नहीं किया या तो फिर उनके साथ में मैं कभी नाराज नहीं हुआ। ऐसा हो ही नहीं सकता। ये जो ग्रोइंग अप जो पीरियड है इट्स अ पीरियड ऑफ़ चेंज एंड इवोल्यूशन। अपना माइंड है, अपना बॉडी है। उसमें एव्री ईयर एव्री फ्यू डेज रेडिकल चेंजेस आते हैं। तो क्या है कि कभी-कभी हमको घर में घुटन सी महसूस होती है। सफोकेशन जैसा होता है। तो दीज़ आर ऑल पार्ट एंड पार्सल ऑफ़ ग्रोइंग अप प्रोसेस। आप सबके घर में संतान संतति होंगे ही होंगे। तो आपको पता ही होगा कि कितना किंतु जब संतान मां या पिताजी के साथ झगड़ा करता है तो उनके प्रति उसके मन में तिरस्कार या तो फिर द्वेष का भाव कभी नहीं रहेगा। अपनापन ही रहेगा। स्नेह ही रहेगा। कल झगड़ा हुआ है तो आज साथ में बैठ के खाना भी खा रहे हैं। कल गुस्सा हुए हैं तो आज वही हंसी मजाक कर रहे हैं। तो क्या है साथ में रहना है। छोटी मोटी चीजों को धीरे-धीरे करके इग्नोर करना सीखना होगा। मेरा ही चलेगा घर में और किसी का नहीं चलने दूंगा। ऐसा कोई नहीं कह सकता। ना ही पेरेंट्स कह सकते हैं ना ही यह बच्चे कह सकते हैं। सबको यह लेनदेन करके रहना है। तो क्या है यह आपस में स्नेह का रिश्ता होने से यह सब होता है। आप कंपेयर टू देखिए ऑफिस में या तो वर्क प्लेस में कैसे होता है कि मुझे अपना सुपीरियरिटी एस्टैब्लिश करना है। मुझे यहां पे प्रमोशन पाना है और प्रमोशन प्राप्त करने के लिए बाकी सबको मुझे जैसे कि एक तरह से उनको साइड लाइन कर देना है। तो कैसे करेंगे? या तो ओपन माने जाहिर में विद्वेष रखेंगे या तो फिर पीछे पीछे में उनके साथ में कास्परेसी करेंगे। तो ये पीछे में कास्परेसी करना जाहिर में विद्वेष रखना यह सब कुछ आप देखिए। वर्क प्लेस जहां पर है वहां पर होता है। परिवार में नहीं होता। जिस परिवार में इस तरह का मामला चालू हो जाए कि वहां पे पीछे पीछे विद्वेष रख के आपके साथ में कटुता दुश्मनावट की जाए तो समझ लीजिए कि फिर वो परिवार परिवार नहीं रहेगा। वो फिर एक तरह के वर्क प्लेस में कन्वर्ट हो जाएगा। आश्रमों में भी देखिए ये ठाकुर मां स्वामी जी का आश्रम है या यहां पर जितने भी आते हैं वो साधु हो भक्त हो वंटियर्स हो स्टाफ हो सबको साथ में मिलकर के स्नेह के सूत्र में बंध करके ठाकुर का कार्य करना है। यदि यहां पे भी इस तरह का विद्वेष प्रारंभ हो जाए तो फिर ये रामकृष्ण परिवार विद्या का संसार नहीं रह के अविद्या का संसार हो जाएगा। तो यहां पर भी ठाकुर के साथ में जो नरेंद्र की बात होती थी तो नरेंद्र कहते थे कि मैं जो भी मेरे मन में आता था जो उनको मैं स्पष्ट कह देता था। उसमें कुछ कुछ जो बातें हैं कि ठाकुर ने कहा तुम यदि चाहो तो तुम अपने हृदय में कृष्ण का दर्शन कर सकते हो। तो ठाकुर ने कहा मैं कृष्ण उसमें मानता नहीं हूं। म स्पष्ट उनके मुंह पे बता दिया इस तरह की जो और फिर स्वामी जी कहते हैं कि मैं जहां जहां कभी-कभी कोई जगह पे जाता हूं या कभी-कभी किसी को मैं देखता हूं तो भीतर में से ऐसा लगता है कि इनके साथ में उस व्यक्ति या उस वस्तु के साथ में मेरा चीर परिचित जितना कि जन्म जन्मांतर का नाता है। क्योंकि क्या है कि देखिए ठाकुर ने कहा ना कि कलमीर दल एकटा के टान ले सबाई टेनेश जब लक्ष्मी दीदी ने ऐसा कहा कि मैं अभी नेक्स्ट टाइम आपके साथ में नहीं आऊंगी [गला साफ़ करने की आवाज़] अभी ये मेरा आखिरी जन्म ठाकुर ने कहा तुम्हारे हाथ में थोड़ी ना है ये जो कमल के ये जो सब रूट्स होते हैं जलाशय के भीतर में देखेंगे कि वो सब आपस में जुड़े हैं। एक कमल की डाल को या एक कमल के पत्ते को खींचेंगे तो सभी जो है खींच के साथ साथ में चले आएंगे। तो यहां पे भी जन्म जन्मांतर से ये पार्षद गण है वो ठाकुर के साथ में या तो फिर युगावतार के साथ में पृथ्वी पे अवतरण करते हैं तो फिर आपका जन्म जन्मांतर का नाता रहेगा ही रहेगा। अह स्वामी जी ने उदाहरण के रूप में कहा कि पहली बार जब मैं शरद के घर गया था, स्वामी शारदानंद जी के घर, तो लग रहा है जैसे कि सब कुछ मेरा जाना पहचाना है। घर में जैसे कौन सा कमरा कहां पे है, कौन सी चीज कहां पे रखी है, वो सब कुछ जैसे कि मेरा चिर परिचित नाता है, यह जन्म जन्मांतर का नाता है। तो यहां तक हमारा बात हुआ था। अभी नरेंद्र मास्टर

ब्राह्मोसमाज पर श्रीरामकृष्ण का गहरा प्रभाव

महाशय के साथ में ही और भी आगे वार्तालाप कर रहा है। कथा में ये लिपिब है। उसको अभी हम देखते हैं। क्या कहता है नरे आ नि तो काज कोता त किु बोलते ना मैं अपनी इच्छा के अनुसार काम करता वो कुछ कहते नहीं आ साधारण ब्राह्म समाज मेंबर होए छिलाम जाने तो मैं साधारण ब्राह्म समाज का मेंबर हुआ था आपको पता है तो मास्टर कहते हैं हां ता जानी हां मुझे पता है देखिए मैं बेलून मठ में था जब ट्रेनिंग सेंटर सेंटर में तो हमको क्या है कि ये कोलकाता टूर पे ले गए थे एक बार ये जो ठाकुर मां स्वामी जी के साथ जो एसोसिएटेड जो सब तीर्थ स्थान है उसका दर्शन करवाने के लिए तो अभी ये बहुत सालों पहले की बात है ऑलमोस्ट अभी उस बात को 15 साल तो मिनिमम हो गए 2009 की बात है ऑलमोस्ट तो मुझे याद है कि ब्राह्म समाज की एक ये जो सभागृह है वहां पे गए थे। मोस्ट प्रोबेब्ली यह साधारण ब्राह्मण समाज का ही सभागृह था। देखा कि बहुत बड़ा होल तो है किंतु भीतर में से सब टूटा फूटा हुआ है। एक कोने में सब बेंचेस जो है उसको ढग करके रख दिया है। वो म वो धूल मिट्टी पड़ा है। भीतर में हम गए तो लाइट भी नहीं है। पता नहीं लाइट है कि नहीं। वो अंधेरे में हमने थोड़ा बहुत देखा और फिर चले आए। तो देखिए कि यही ब्राह्म समाज वाले ठाकुर को कहते थे कि उनके पास में ये फैकल्टी ऑफ ऑर्गेनाइजेशन नहीं। आज देखिए किसका ऑर्गेनाइजेशन कहां पर है। तो और फिर देखिए ब्राह्मण समाज का रामकृष्ण संघ के जो प्रारंभ के दिनों में अवदान भी बढ़ा है। क्योंकि ये केशव सेन जब ये लेक्चर देता था उससे काफी शिक्षित बंगाली जो नवयुवक थे प्रभावित हो के ब्राह्मण समाज में आए थे। फिर यही केशव सेन ही जैसे कि उनको ठाकुर के पास में ले गए क्योंकि ठाकुर के साथ में जब वार्तालाप प्रारंभ हुआ ठाकुर का नियमित दर्शन करने लगा केशव तो उसके खुद के स्वभाव में कितना परिवर्तन आया निराकार ब्राह्मण की बात छोड़ के गले में खोल डाल के वो नृत्य करते करते मां का नाम लेता था यहां तक बात आ गई थी एक बार ठाकुर ये लोग गए थे वहां पे दक्षिणेश्वर गए थे तो चांदनी में सब वार्तालाप हो रहा है तो सब ब्राह्मण भक्त बैठे हैं तो ठाकुर कहते हैं अच्छा तुम लोग सब साथ में बोलो भागवत भक्त भगवान तो सभी लोग बोलते हैं भागवत भक्त भगवान और फिर ना जब हां जैसे दो तीन बातें और बुलवाई जब ये कहा कि ये बोलो भगवत भक्त भगवान ना ये तो बुलवाया फिर कहा गुरु कृष्ण वैष्णव माने कि गुरु कृष्ण वैष्णव तीनों में एक ही दिव्य सत्ता है। जब ऐसा बोलने को बोला तो फिर ये केशव ने हंसते हंसते कहा नहीं महाशय इतना दूर नहीं यदि ये कहेंगे तो लोके आमादेव गोंडा बोल दे अर्थात लोग कहेंगे हम लोग ये रूढ़ चुस्त वैष्णव है बोल के वहां पे वो अटक गया किंतु देखिए केशव इस हद तक ठाकुर के भावधारा में भावित हो गया था ठाकुर की भावधारा में आन मिला था कि फिर धीरेधीरे करके ये जो ये जो विजय कृष्ण गोस्वामी है ये ये दो तीन लोगों ने मिलकर के उनसे अलग हो गए थे। हालांकि विजय कृष्ण गोस्वामी स्वयं जो है ठाकुर के बहुत बड़े भक्त थे। किंतु फिर क्या है कि ये फिलोसोफिकल भीतर भीतर में जो इनका क्या कहेंगे डिफरेंस ऑफ ओपिनियन वो मैरिज की बात वगैरह को लेकर के स्टार्ट हो गया था। तो इसलिए स्वामी जी कहते हैं कि मैं ब्राह्म

स्त्रियों के प्रति साधु कैसा व्यवहार करे? श्रीरामकृष्ण और विवेकानन्द के दो दृष्टिकोण

समाज का मेंबर हुआ था। आपको पता है तो मास्टर महाशय कहते हैं हां पता है नरेंद्र कहता है तीन जानते हैं उनको पता था ओखाने में मानुष राज्य वहां पे स्त्रियां जाती है मे देर सामने रह के ध्यान करा जाए ना ताई निंदा करते स्त्रियों को सामने रख के ध्यान नहीं कर सकते हैं इसीलिए निंदा करते थे देखिए ये जो ठाकुर का कामिनी कांचन त्याग जो त्याग के रास्ते पे चल रहा है। स्त्रियों का चेहरा भी नहीं देखेगा। ठाकुर ने कहा कि यदि स्त्री की एक पुतलिका की एक डोल की यदि जमीन पे पड़ी है मिट्टी की प्रतिमा स्त्री की तो फिर वो सन्यासी उसके सामने भी नहीं देखेगा। ये ठाकुर के नियम थे। किंतु आप सबको पता ही है कि रामकृष्ण मिशन में इतना जो ठाकुर ने जो कहा था इस हद तक म इस हद तक भी हम लोग पालन नहीं करते। स्त्रियां तो मंदिर में आती ही है। वरना तो फिर ठाकुर की ये बात यदि उसको स्ट्रिक्टली पालन करेंगे तो फिर मंदिर में स्त्रियों के सामने आप आरती भी नहीं गा सकते। तो क्या है कि थोड़ा बहुत रामकृष्ण मिशन प्रैक्टिकल है। हमारी जो सेवा कार्य है बहुत सारे सेवा कार्य इंस्टट्यूशन में स्त्रियां होती है। स्कूल में टीचर होती है। यहां पे तो हमारी स्कूल है। तो प्रिंसिपल है। वो एक मैडम ही है। फिर हमारी हॉस्पिटल है। वहां पर डॉक्टर होते हैं, नर्स होते हैं। तो क्या है कि उनके साथ में वार्तालाप तो करना ही पड़ता है। तो किंतु स्पिरिट जो है वह स्पिरिट सेम है अह कि और देखिए यहां पे खास करके आप यदि ध्यान की बात करें स्वामी जी अमेरिका में यूरोप में खास करके लंदन में ध्यान के क्लास लेते थे तो वो खुद डायास पे बैठकर के ध्यान करते थे और सामने जो उनके स्टूडेंट होते थे स्त्री और पुरुष दोनों रहते थे वे लोग भी उनके सामने बैठ बैठ के ध्यान करते थे। यानी कि क्या है देखिए ठाकुर ने जिस तरह से कुछ स्ट्रिक्ट रूल्स बनाए हैं। स्वामी जी ने उसको थोड़ा सा 1% जितना उसको लाइट किया है। अब जैसे कि कर्मनाशा नदी है जिसमें झलाने से ही हुआ। ठाकुर कहते हैं किंतु स्वामी जी का कर्म योग का सिद्धांत है। अभी कर्म योग तो आप फिर भी जैसे कि क्या है कि फिलॉसोफी के आधार पे समझा सकते हैं। अधिकारी भेद के हिसाब से समझा सकते हैं कि जिसके भीतर में अभी तमस है उसको रजस में जाना है। इसलिए कर्म योग करें और जो ऑलरेडी सत्व में है उसको कर्म योग की वजह डायरेक्ट यह जो भक्ति और ज्ञान और ध्यान का रास्ता है वो अपना सकता है। तो कर्म योग में तो फिर भी चलो इस तरह का आप एक फिलॉसोफिकल ये रख सकते हैं। किंतु जहां तक स्त्रियों को लेकर के कार्य करना है कोई भी हमारी ये जो सर्विस एक्टिविटी है या तो फिर स्त्रियों को सामने रख के ध्यान करना इसके बारे में जो स्वामी जी ने बाद में जो मॉडिफिकेशन किए उसका कोई फिलोसोफिकल बेसिस नहीं है। ऐसा नहीं है कि ठाकुर स्त्रियों को सम्मान नहीं देते थे और यह सम्मान स्वामी जी ने प्रारंभ किया। ऐसा बोल नहीं सकते क्योंकि रामकृष्ण संघ में शक्ति की जो गरिमा है ठाकुर ने स्वयं प्रारंभ की है। मां की पूजा की थी और फिर एक देखिए एक फीमेल डीटी माने एक शक्ति एक देवी की आराधना की थी तो मां काली की शक्ति को शक्ति की पूजा की थी यानी कि अपनी पत्नी की और वही एक शक्ति को उन्होंने गुरु बनाया था भैरवी ब्रह्माणी यानी गुरु पत्नी और इष्ट ये तीनों के साथ में ठाकुर का दिव्य संबंध था। तो हम कभी यह नहीं कह सकते कि ठाकुर ने शक्ति की गरिमा या स्त्रियों का सम्मान नहीं मेंटेन किया। इसके बावजूद ठाकुर के जो रूल्स थे, ठाकुर के ये जो कहेंगे कि नियम थे, बहुत ही कठोर थे। इस तरह की कठोरता का पालन वराह नगर मठ में हुआ था। वराह नगर मठ में स्त्रियों के आगमन का स्त्रियों का आगमन निषिद्ध था। अभी हुआ ऐसा स्वामी जी स्वयं हुए बीमार बरा नगर मठ में ही बीमार हुए हैं तो इतने बीमार हुए हैं कि कभी-कभी ऐसा लगेगा कि प्राण संशय हो रहा है जीवित भी रहेंगे कि नहीं उस समय उनकी माताजी भुवनेश्वरी देवी उनको समाचार मिला तो वो स्वामी जी को मिलने के लिए वन नगर मठ में आई। अभी स्वामी जी बुखार में पड़े हुए हैं। प्राण संशय है और म मुंह में कुछ बोलना भी मुश्किल है। इस तरह की अवस्था में होश में है ना कि बेहोश है वो भी नहीं समझ में आता। इस तरह की अवस्था में जब उन्होंने देखा कि उनकी मां उनको मिलने के लिए आई है तो स्वामी जी नाराज हो गए। अपने गुरु भाइयों को कहा कि अरे मैंने ही नियम बनाया और मेरे ही समय तुम लोग इस तरह के नियमों को तोड़ रहे हो कि कैसे चलेगा? तो वराह नगर मठ में और इसके बावजूद स्वामी जी ने बनाए हुए नियम के बावजूद उनकी माता जी को वहां पर मठ में आमंत्रण दिया गया था और वो आई भी थी और स्वामी जी का दर्शन भी किया था। सो देखिए कि हार्ड एंड फास्ट रूल जितने भी थे वराह नगर मठ के बाद में जब भी ये पेरू मठ की स्थापना हुई तब से इतने स्ट्रिक्ट रूल स्त्रियों के बारे में नहीं है। अखंडानंद जी का था कि जब वो दीक्षा देना प्रारंभ किया उन्होंने तो उन्होंने नियम रखा कि पति पत्नी ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे। अभी बहुत सारे कपल्स है दंपत्ति है जो कि दीक्षा लेना चाहते हैं। किंतु इस तरह का नियम आप सन्यासी है और ऑब्वियस है कि आप नियम बनाइए किंतु गृहस्थों को इस तरह का नियम में बांधना ये तो कितना मुश्किल है अभी दो चीज होगा जो लोगों की दीक्षा लेने की बहुत ही प्रबल इच्छा है वे लोग कमिट तो करेंगे कि हां ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे किंतु आप समझ ही सकते हैं कि साथ में रहना ये तो बहुत ही मुश्किल है कमिट करने के बाद में गलती हो गई और फिर मन में पश्चाताप ये तो एक सिचुएशन है कोई कोई दीक्षा के लोभ में सीधासीधी झूठ बोल देगा हां महाराज हम करेंगे कोई इंटेंशन नहीं है करने का मुंह पे बोल दिया और तीसरे है कि बिकॉज़ की सत्य वचन की रक्षा करनी है गुरु को यदि वचन दिया और फिर यदि वचन भंग हुआ तो फिर कैसे चलेगा महापाप में पड़ेंगे तो वो बेचारा दीक्षा ही नहीं ले रहा है तो फिर गोल घुमा करके ये कंप्लेंट महापुरुष महाराज के पास में गई वो उस समय प्रेसिडेंट है तो उन्होंने अखंडानंद जी को बुला के कहा कि देखो भाई गंजेश गंगाधर महाराज के लोग कहते थे गंजेश देखो ये साधु सन्यासी तो है नहीं वो हम लोग जितनी तपस्या कठोरता करते हैं उतनी तुम उनसे अपेक्षा मत रखो फिर उसके बाद में अखंडानंद जी ने मुक्त हस्त से दीक्षा देना प्रारंभ कर दिया बहुत सारे लोग कहते हैं कि जो भी महाराज होते हैं बड़े स्ट्रिक्ट होते हैं बड़े ही कठोर होते हैं अनुशासन में डिसिप्लिन में जब संघ गुरु की पदवी जब आरूढ़ होते हैं तब उनका हृदय खुल जाता है। फिर वो मात हृदय हो जाता है। सो ये मैंने खास करके आत्मस्थान जी के केस में देखा है। सो किंतु देखिए ठाकुर का ये जो नियम है और फिर बाद में रामकृष्ण संग की परंपरा है। खास करके हमारे मंदिरों में सभी का मुक्त रूप से आना जाना है। हमारे मंदिरों में जब जप यज्ञ होता है। तो जप यज्ञ में आप देखिए आजकल बहुत सारी जगह पर होता है गाइडेड मेडिटेशन के क्लासेस होते हैं। बहुत सारे सेंटर में होते हैं। वहां पर ऐसा नियम नहीं है कि सिर्फ पुरुषों के लिए है। सबके लिए होता है। सो दैट इज देयर कि स्वामी जी ने इसको थोड़ा सा मॉडिफाई किया है। यह सब रूल को इसका अच्छा परिणाम बुरा परिणाम वो सब तो इतिहास ही बताएगा। किंतु एस ऑफ नाउ ऐसा है।

स्वामी ब्रह्मानन्द का विवेकानन्द के प्रति गहरा प्रेम और श्रद्धा

आई कनतु किु बोलते ना मुझे किन्तु और कुछ कहते नहीं थे ठाकुर ने समझ लिया था स्वामी जी को बोलने से कोई लाभ नहीं एक दिन बोल एक दिन सिर्फ कहा राखाल के कथा की बोलीिश नहीं जे तू समाज मेंबर होए सिर्फ एक दिन उन्होंने कहा था कि राखाल को यह सब बातें मत बताना कि तुम समाज के मेंबर हुए हो और ताले होते इच्छा जावे उसकी तो फिर मेंबर होने की इच्छा होगी। राजा महाराज का था कि स्वामी जी से काफी प्रभावित थे। तो एक एक होता है ना हीरो वशिप बोल के हम सबके साथ में मोर और लेस ऐसा कभी-कभी होता है स्टूडेंट है और हमारा एक फ्रेंड है वो फिजिकली और मेंटली काफी फिट है उसका पर्सनालिटी भी काफी मैग्नेटिक है तो फिर उसका देखा देखी वो जो करेगा मुझे करना है। ऐसा सब चलता है। घर में भी देखेंगे वो भाई बहन सब होते हैं। चाचा चाची के जो छोटे-छोटे कजिंस होते हैं तो भाई बहन कजिंस वगैरह मिलाकर के चार पांच बच्चे बच्चियां होंगे जॉइंट फैमिली में उसमें से सबसे बड़ा जो होगा उसको सभी लोग अनुसरण करने का प्रयास करेंगे तो यहां पे भी राजा महाराज स्वामी जी से काफी प्रभावित थे तो हालांकि और ऐसा हुआ भी था कि राजा महाराज ने एक्चुअली वहां का जो प्रतिज्ञा पत्र है ब्राह्मण समाज का उसमें उसमें साइन कर दिया था। उसमें ऐसा है कि ये साकार प्रतिमा की पूजा नहीं करेंगे। निराकार पूजा ही करेंगे। या तो फिर निराकार उपासना ही करेंगे। तो अभी ये बात उन्होंने स्वामी जी को देख के की हो ना कि उन्होंने अपनी इच्छा से की हो वो तो अभी इतना मुझे क्लियर नहीं। किंतु इस तरह से उन्होंने प्रार्थना पत्र पे प्रतिज्ञा पत्र पे उन्होंने सही साइन किया था। और फिर जब वो ठाकुर के पास जाने लगे मां काली के मंदिर में बैठकर के मां काली के पूजा मतलब एक प्रार्थना करने लगे साकार मंत्र की जप करने लगे यह सब देख के नरेंद्र थोड़ा सा राजा महाराज पे नाराज हुआ था नरेंद्र का तो खुद का रेजिस्टेंस टूटते टूटते कितना टाइम लगा था हमको पता है नरेंद्र ने जो मां काली को स्वीकार किया इट्स अ लेजेंडरी स्टोरी कि पिताजी का देहांत हो गया है घर में खाने पीने को कुछ नहीं है और फिर भीतर में जो स्पिरिचुअल इवोल्यूशन चल रहा है। बाहर में सांसारिक कष्ट भीतर में स्पिरिचुअल इवोल्यूशन दोनों मिलकर के कन्फ्लुएंस पॉइंट आ गया। जब स्वामी जी ठाकुर के पास आए कहा कि आप मेरे घर के लिए थोड़ा सा व्यवस्था कर दीजिए। ठाकुर ने कहा जाओ तुम मां काली के पास जाकर के मांगो। तो स्वामी जी तीन बार गए। तीनों बार मुंह में से वही आया। ज्ञान दो, भक्ति दो, वैराग्य दो। ये नहीं आया कि रोटी दो, कपड़ा दो, मकान दो। और फिर उसके बाद में उन्होंने मां काली को स्वीकार किया। तो नेक्स्ट डे ठाकुर की जो खुशी है जैसे कि समा नहीं रही है। सबको जाकर के हर्षोतल हो के कहते हैं नरण काली मैनेज है। नरेंद्र काली मैनेज है। तो देखिए कि वो स्वामी जी ने काली को स्वीकार किया। दैट इटसेल्फ इस अ ग्रेट स्टोरी इन इटसेल्फ। किंतु राजा महाराज को ऐसा रेजिस्टेंस नहीं था भीतर से। तो शायद हो सकता है कि युवानी के आवेश में आकर के उन्होंने इस प्रतिज्ञा पत्र में साइन किया हो या तो फिर नरेंद्र की देखा किया हो जो भी है जब स्वामी जी को पता चला नरेंद्र ने राजा ने राखाल ने ये साइन भी किया है और अब ये साकार प्रार्थना वगैरह भी कर रहा है तो नरेंद्र उनके ऊपर में नाराज हुआ था। फिर स्वामी ठाकुर ने कहा अरे तुम इतना उसके पीछे में क्यों लगते हो? उसका यदि अभी मन यदि साकार की ओर जा रहा है तो जाने दो। उसके बाद में स्वामी जी ने फिर राजा महाराज को कुछ भी बोलना तंग करना बंद कर दिया था। तो यहां पे ठाकुर ने सिर्फ इतना कहा कि तुमको जो करना है करो। बोलने से तो कोई लाभ नहीं है। बस खाली राखाल को यह सब मत करना कहना वरना तुमको देखा देखी तुम्हारा देख करके वो भी ऐसा कुछ करने को जाएगा। और ताहले होते इच्छा जावे। उसकी भी तो हो सकता है कि मेंबर होने की इच्छा होगी।

स्वामी विवेकानन्द और मास्टर महाशय

मास्टर तो ब मारण को जब स्वामी जी ये सब कहते हैं तो मास्टर महाशय कहते हैं तुम्हारे मन का जोर ज्यादा है इसलिए तुमको ठाकुर कहीं पे कुछ भी करने से निषेध नहीं करते थे। नरेंद्र अनेक दुख कष्ट पे तभी ये अवस्था होए छे। अनेक दुख कष्ट प्राप्त करके अभी यह अवस्था हुई है। देखिए दुख कौन सी अवस्था हुई है? दोनों अवस्था मां काली को स्वीकार भी किया है और निर्विकल्प समाधि प्राप्त भी हुई है। माने साकार में जो सर्वश्रेष्ठ है ईश्वर साक्षात्कार ईश्वर दर्शन वो भी हुआ ही होगा। मां काली का दर्शन उस समय स्वामी जी को हुआ था कि नहीं। आई एम नॉट दैट क्लियर किंतु इतना तो पता है कि मां काली की प्रेरणा से ही उनके मुंह में यह रोटी कपड़ा मकान की जगह ज्ञान भक्ति वैराग्य शब्द बार-बार आ रहा है। तो साकार का जो सर्वोच्च है ईश्वर की कृपा प्राप्त होना और निर्विकल्प निराकार का जो सर्वोच्च उपलब्धि है निर्विकल्प समाधि दोनों स्वामी जी को बाय द टाइम प्राप्त हो गई है। इसलिए कहते हैं कि अनेक दुख कष्ट प्राप्त करके तब कहीं जाकर के ये अवस्था हुई है। देखिए स्वामी जी उस समय काशीपुर में थे। एकाएक महावीर हनुमान का भाव उनके ऊपर में प्रकटित हुआ और जय श्री राम जय श्री राम बोलते बोलते वो रात को दक्षिणेश्वर की ओर जाने को निकले काशीपुर से तो ठाकुर को डर लग गया कि कहीं क्या कुछ ना कर बैठेगा तो पीछे में भेजा लोगों को कि जाओ उसको कैसे भी करके पकड़ के ले आओ मास्टर स्वामी जी पे यह सब म हालांकि देखिए ये भी एक बात है लीला प्रसंग में शरद महाराज कहते हैं कि जब ये स्वामी जी ये जो साधन भजन उपासना और मुमुक्षत्व की ये जो झड़ में से पसार हो रहे थे ये जो तूफान उनके ऊपर में सवार हुआ था उस समय काशीपुर में यह जो सब बाकी जो युवक ठाकुर के जो शिष्य थे त्यागी संतान स्वामी जी के गुरु भाई वे लोग इतने इंप्रेस हो गए थे स्वामी जी से तो एक दिन शरद महाराज ठाकुर के पास में जाके कहते हैं कि देखिए नरेंद्र की ये जो अवस्था कितनी सुंदर है तो ठाकुर ने स्वीकार करके फिर ये तो निश्चय ठाकुर ये तो स्वीकार करेंगे ठाकुर के आशीर्वाद से ही तो सब हो रहा है किंतु साथ में ये भी कहा एकने जा अपनी ओर इशारा करके उनके ऊपर में ईश्वर प्राप्ति के लिए जो झड़ बह के गई थी तो नरेंद्र के भीतर में ओार शिक शिकर शिक म एक सिककी यानी पता नहीं वो रुपए का कितना वो पार्ट होता होगा 16 पार्ट जो भी है तो सिक्की का सिक्की भी नहीं माने एक का एक पैसा से एक पैसा भी नहीं माने इतना जो नरेंद्र का जो ईश्वर प्राप्ति का ये जो ये जो झड़ तूफान जो नरेंद्र के हृदय में बह रहा था वो ठाकुर के हृदय में जो ईश्वर प्राप्ति का तूफान बहा था उसका एक फ्रिक्शन मात्र है। तो जब शरद महाराज ने यह सुना लीला प्रसंग में लिखते हैं कि हम लोग आश्चर्यचकित हो गए। नरेंद्र को देख कर के यदि हम इतने इंप्रेस हो गए हैं तो हम ठाकुर को यदि देखते तो हमारी क्या अवस्था होती? तब नर कहता है कि अनेक दुख कष्ट प्राप्त करके तब कहीं जाकर के यह अवस्था हुई है। मास्टर मशाने दुख कष्ट पान ताई मास्टर महाशय आपने दुख कष्ट प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए मानिए दुख कष्टों ना पहले रेिग्नेशन होए ना अर्थात कि दुख कष्ट नहीं प्राप्त होगा तो रेिग्नेशन अर्थात कि शरणागति होगी नहीं एब्सोल्यूट डिपेंडेंस ऑन गॉड ईश्वर के ऊपर में संपूर्ण समर्पण देखिए नरेंद्र कहता तो है मास्टर महाशय को किंतु अगेन सेम वस्तु है मास्टर महाशय के जीवन में दुख दुख और कष्ट था हमको पता है ठाकुर को मिलने के लिए ही आए थे इसलिए क्योंकि वो सुसाइड का विचार उनके मन में चल रहा था। कथा में डायलॉग है कि ठाकुर मास्टर महाज को कहते हैं कि तुम अपने पिताजी के साथ में घर में रहने को जाओ ना तुम अलग से घर क्यों रखे हो? ठाकुर का था और ठाकुर कहते भी है देखो ये जो जॉइंट फैमिली में रहेंगे जॉइंट फैमिली मेरा शब्द है ठाकुर कहते हैं साथ में यदि रहेंगे तो क्या है साधन भजन करने में बहुत सुविधा होती है म खाने पीने की व्यवस्था घर का जो छोटामोटा काम है वो सब शेयर हो जाता है आप अकेले रहते हैं आज की लैंग्वेज में जो न्यूक्लियर फैमिली हस्बैंड वाइफ और चिल्ड्रन ये अलग रहेंगे तो फिर क्या होगा कि आपको घर का हर छोटा-छोटा काम आप ही को करना पड़ेगा तो फिर साधन भजन करने में विक्षेप जो है बहुत सारा आएगा। तो यह तो एक प्रैक्टिकल बात है। किंतु साथ में ही पिताजी के प्रति जो श्रद्धा होनी चाहिए वो क्यों तुम में नहीं है? जाओ तुम अपने पिताजी के पास जाओ। पिताजी ने तुमको गाली दी है। तुम्हारा अपमान किया है। तुमको मारा भी होगा शायद। तो क्या है? उससे क्या तुमको म ये तो क्या है? तुम्हारी चित्त शुद्धि के लिए। ये भी मेरा शब्द है चित्त शुद्धि। बट एनीवे ठाकुर कहते हैं कि उससे होता क्या है? पिताजी का अधिकार है उनको शासन करने का, डिसिप्लिन करने का। तो मास्टर महाशय उत्तर में कहते हैं देखिए उस घर में मुझे इतना कष्ट मिला है कि वहां पे जाने की मेरी कोई इच्छा नहीं। और आखिर तक यही हुआ कि ठाकुर कहते थे बीच-बीच में किंतु मास्टर महाशय अपने पिताजी के घर में जाके कभी नहीं रहे। तो समझ सकते हैं कि उस घर में अभी क्या रीजन है बैकग्राउंड वो तो मुझे नहीं पता। किंतु कष्ट बहुत मिला था। ये तो एक बात है। फिर सुसाइड तो करने को गए ही थे। तो ऐसा नहीं है कि मास्टर महर्षि के जीवन में दुख कष्ट नहीं है। किंतु जैसे नरेंद्र और ठाकुर का जो कंपैरिजन है ठाकुर ने जैसे कहा इसके भीतर में जो झड़ वही है ईश्वर प्राप्ति की उसका एक सिक्की का सिक्की भी नरेंद्र के भीतर में है मुश्किल से। तो वैसे ही जो फ्रैक्शन ऑफ ठाकुर नरेंद्र के भीतर में है तो नरेंद्र ने जो कष्ट किया है मास्टर महाशय का कष्ट उसके सामने एक फ्रैक्शन जितना ही है बहुत किंतु नरेंद्र जितना नहीं है तो इसलिए नरेंद्र कहता है कि आपको दुख कष्ट नहीं मिला इसलिए आपको समझ में नहीं आता कि ये जो रेिग्नेशन अर्थात की शरणागति अब्सोल्यूट डिपेंडेंस ऑन गॉड ईश्वर के प्रति संपूर्ण समर्पण किसको कहते हैं? उसके बाद में नरेंद्र कहता है अच्छा ये तो नम्र और निरहंकार को तो विनोय आमा के बोलते पार आमा के विनोय होए तो मास्टर महाशय कहते हैं अच्छा आप इतने नम्र और निरहंकारी है। इतना विनय है आप में। क्या मुझे बोल सकेंगे कि इस तरह का विनय कैसे हो? मास्टर महाशय बिल्कुल चुपचाप शांत रहते थे। ठाकुर कभी-कभी उनको बोलते थे। गाने को बोलते थे। सब लोग कीर्तन कर रहे हैं, नृत्य कर रहे हैं। तो मास्टर महाशय साइड पर खड़े हैं। तो ठाकुर उनका हाथ पकड़ के खींच के कहते हैं साला नाच [हंसी] नाच साला। और वो कभी-कभी नाराज हो जाते थे। कहते थे कि ये वहां पे स्कूल में बच्चों के सामने दांत दिखाएगा। यहां पे नहीं दिखाएगा। अर्थात कुछ बोलना है, गाना है तो अब मुंह खोलेंगे तो दांत दिखेंगे। मुंह बंद करके ही रखेंगे तो दांत तो दिखने वाले नहीं। जबकि वो टीचर थे स्कूल में तो बच्चों को पढ़ाना है। पढ़ाने के लिए मुंह खोलना है। मुंह खोलेगा तो दांत दिखेंगे। तो ठाकुर कहते हैं वहां पे स्कूल में बच्चों के सामने वो दांत दिखाएगा। यहां पे नहीं दिखाएगा। और एक बार कहते भी है गिरीश घोष गिरीश घोष ठाकुर को पूछता है कि अच्छा महाशय हम लोग तो इतना बकबक किए ही जा रहे हैं। और ये मास्टर महाशर की ओर इशारा करके कहते है ये बिल्कुल चुपचाप बैठे हैं। ये क्या कारण है? तो एक तो कारण पता है कि मास्टर महाशय की उम्र थोड़ी ज्यादा थी। पता है ना तीसरे ही दिन जब मास्टर महाशय ठाकुर का तृतीय दर्शन करने के लिए आए एक आ एक ठाकुर हंसना शुरू कर दिए। बोला कि देखो ये आ गया तो फिर ठाकुर को कहानी कहते हैं कि 4:00 बजे मयूर को अफीम खिला दिया था। फिर प्रत्येक दिन 4:00 बजे मयूर आ जाता है। तो ये सुनकर के सभी लोग हंसने लगे। फिर मास्टर महाशय आश्चर्यचकित होकर देखते हैं कि ठाकुर को वही ठाकुर जो कि अगले द्वितीय मुलाकात में उन्होंने देखा कि भाव में चले गए हैं, समाधि में चले गए हैं और यह सब कुछ और तिरस्कार करते हैं कि तुम क्या ज्ञानी हो बोल के वही ठाकुर आज बच्चों के सामने हंसी मजाक कर रहे हैं। बिल्कुल जैसे एक सामान्य एक साधक होता है। इस तरह से तो मास्टर महाशय ये विस्मित हो करके देख रहे हैं। तो ठाकुर बच्चों के सामने हंसी मजाक भी कर रहे हैं। बीचबीच में मास्टर महाशय के सामने देखते हैं और फिर बाकी सबको कहते हैं एक उम की ना मुख वो उसकी उम्र थोड़ी ज्यादा है इसलिए मुंह बंद करके बैठा है तो ये सब था जब गिरीश घोष ठाकुर को कहते हैं कि अच्छा महाशय बताइए तो हम सब लोग बकबक कर रहे चुपचाप बैठे हैं तो फिर ठाकुर ने वो एक छड़ा बांग्ला बोले छड़ा अर्थात कि एक पद वो कहा वो जो मैं एक्सैक्ट भूल गया कुछ कुछ मुझे याद है लंबा घोटा वाला नारी पाना पुर जोल मुख हल से और मुख ऐसा ही कुछ है तो एनीवे उसका अर्थ होता है कि जो बहुत ज्यादा बोलता है जो बिल्कुल नहीं बोलता जो एक लंबा गुटा वाला नारी है और फिर एक ऐसा जलाशय है जिसके ऊपर में ये सब पत्ते वो पूरा उसे कवर कर लिया है ऐसे ऐसे लोगों पर कभी भी भरोसा नहीं करना। तो इस चार में मास्टर महाशय को जो बिल्कुल मुंह बंद करके रहते हैं उस म वह वो कंडीशन में वो आ जाते हैं। किंतु फिर ठाकुर कहते हैं किंतु यह अंतः फलगति माने इसके भीतर में मुख हलसा बेहतर बूंदे हां बस यस यस परफेक्ट मुख हलसा भीतर बूंदे भीतर बूंदे अर्थात की बिल्कुल चुपचाप बैठे रहते हैं मुख हलसा माने बिल्कुल बक पक करते रहते हैं वो लंबा गुमटा वाला नारी पाना पुरे हां एकक्टली सो ठाकुर कहते हैं कि ये मुख बंद करते रहते हैं किंतु इसका अर्थ ये नहीं कि भीतर में कपट है भीतर में सार है इसलिए इसलिए प्राप्ति हुई है भीतर में इसलिए वो चुपचाप है। तो यहां पे नरेंद्र मास्टर महाशय को कहते हैं कि आप इतने नम्र और निरहंकारी है बताइए तो आप में इतना विनय है बताइए तो मेरे में ये विनय कैसे होगा? तो यहां पे ये मास्टर महाशय चुपचाप बेचारे सब समय रहते हैं और नरेंद्र का नेचर यदि मग एकजेक्टली ऑपोजिट नेचर यदि रामकृष्ण के जो ठाकुर के ये जो पार्षद थे उनमें दो व्यक्ति को सिलेक्ट करना है बिल्कुल ही ऑपोजिट वाले नेचर हो तो एक और आएंगे मास्टर महाशय और एक और आएगा ये नरेंद्र ये नरेंद्र के बारे में ठाकुर कहते हैं ये जो बच्चों को पता है ना पिताजी के पास में बैठे हैं तो चुपचाप बैठे जब चांदनी में जाकर के खेलते हैं तो दूसरा मूर्ति अर्थात कि ये जो पिताजी के सामने बैठे तो चुपचाप विनय से बैठे हैं किंतु चांदनी में अर्थात कहीं बाहर जाकर के मैदान वगैरह में खेलेंगे तो फिर भीतर का पराक्रम है भीतर का जो जोश है उत्साह है वो एंथूजियाज्म है आत्मश्रद्धा है वो बाहर आता है स्वामी जी को तो क्या है देखिए आधे जगत के साथ में लड़ना था भारत में ये सब ऑर्थोडॉक्स टाइप के लोग थे यह क्रिश्चियन मिशनरी थे। यह ब्रह्मो समाजी थे। यह थियोसोफिस्ट थे। भारत में भी इनके साथ में फाइट करना है। अमेरिका यूरोप जाकर के भी इनके साथ में फाइट करना है। तो ये जो फाइट करने के लिए योद्धा का स्वभाव चाहिए। इंटरेस्टिंगली स्वामी जी जब कैलिफोर्निया हरि महाराज को भेजते हैं तुरानंद जी को। तुरानंद जी का ऐसा ही शास्त्रज्ञ शांत स्वभाव तो स्वामी जी ने जब तुरानंद जी को भेजा वहां पे तो उन्होंने कैलिफोर्निया के डिवोटीस को कहा अभी आपने मेरे भीतर में आपने क्षत्रवीर्य देखा है। अभी जो मैं जिनको भेजूंगा मेरा गुरु भाई उनके भीतर में आप ब्रह्म तेज देखेंगे। तो देखिए कि स्वामी जी खुद स्वीकार करते थे कि उनके भीतर में ये क्षत्रवीर्य क्षत्रिय का प्रताप था। यदि ये प्रताप नहीं रहता यदि स्वामी जी ने फाइट करके मैदान क्लियर नहीं किया होता तो ये जो जितने भी शांत स्वभाव वाले देखिए राजा महाराज भी ऐसे थे शरद महाराज भी ऐसे थे शरद महाराज के सामने शरद महाराज के बारे में तो स्वामी जी खुद कहते हैं और मा रक्त मछली का रक्त है एक दिन की बात है स्वामी जी का जो डांटने का पर्व जब प्रारंभ होता था अच्छे अच्छे को ले लेते थे शरद महाराज को सामने बिठा के डांट रहे हैं बिल मठ का एस्टब्लिशमेंट हो चुका बाय दैट टाइम स्वामी जी अमेरिका से लौट आए हैं। शरद महाराज को सामने बिठा के डांट रहे हैं। अभी ये शरद महाराज तो सेक्रेटरी थे और ये एडमिनिस्ट्रेशन का कोई मामला होगा। डांट रहे डांट रहे ऐसा जोर से डांट रहे और शरद महाराज ऐसा करके बिल्कुल चुपचाप शांति से सुन रहे हैं। एकाएक ऐसा हुआ कि ठाकुर का कोई पुराना भक्त आ गया। तो अभी स्वामी जी ने अपने को संभाल लिया। पब्लिक के सामने तो ऐसा जो इंटरनल डिस्कशन नहीं चलता है ना। फिर वो भक्त को आया बिठाया उसको और पुराना भक्त है सभी पहचानते हैं तो शरद महाराज बढ़िया मजे से उसके साथ में गप कर रहा है स्वामी जी ने चाय का ऑर्डर दिया तो चाय आई तो शरद महाराज बढ़िया मजे से बिंदास चाय पी रहे हैं हंसी मजाक चल रहा है और जैसे ही वो भक्त खड़ा हो के गया फिर से स्वामी जी ने डांट चालू की और फिर से शरद महाराज ऐसा एकदम चुपचाप सुन रहे तो देखिए स्वामी जी के भीतर में ये क्षात्र वीर्य नहीं होता ये मैदान क्लीन नहीं किया होता तो बाद में ये जितने भी साधु ब्रह्मचारी हम जैसे हैं शांत स्वभाव के विनम्र धीर विनय हम लोगों को फिर क्या है समाज में टिकना मुश्किल हो जाता स्वामी जी ये मैदान क्लियर करके गए हैं बोल के रामकृष्ण शंख आज पनप रहा है तो मास्टर महाशय को स्वामी जी कहते हैं कि आपका इतना निरहंकार इतना विनय आमाई बोलते प विनय हो मुझे बता सकते हैं मुझे किस तरह से मेरे में किस तरह से विनय आए स्वामी जी को विनय की जरूरत नहीं है [हंसी] लेकिन फिर भी वो बीचबीच में ऐसा लगता है कि जरूरत है मास्टर त बोले छ तो अहंकार संबंध अहंकार देखिए कितना सुंदर ये वाक्य है मास्टर महाशय कहते हैं त बोले छ अर्थात ठाकुर ने कहा है तुम्हारे अहंकार के बारे में यह अहंकार बंगाली शब्द है थोड़ा सा देखना होगा अहंकार का अर्थ तो हमको पता है संस्कृत शब्द है अहम अहंकार बंगाली में जो लिखा है मास्टर महाशय ने कैसे लिखा है अहंकार अहम उसके ऊपर में कोट मार्क किया है फिर लिखा है कार अभी बंगाली यदि करण बंगालीकरण करेंगे और अहम और कार इन दोनों को सेपरेट कर देंगे तो क्या होगा अहम तो अहम ही है कार अर्थात किसका अहंकार अहंकार अहंकार अर्थात अर्थात कि मेरे भीतर में ईगो है या तो फिर घमंड है एक तरह का और अहमकार अहम को सेपरेट कर दिया कार को सेपरेट कर दिया कार अर्थात किसका ये अहम किसका है तो नर पूछता है इसका क्या अर्थ है ये क्या बोल रहा है तो मास्टर उसका उत्तर देते हैं अर्थात राधिका के एक जन सखी बोल अर्थात कि राधिका को एक सखी कहती है तो अहंकार हो ताई कृष्ण के अपमान कोली तुम्हारा अहंकार हुआ है इसलिए तुमने कृष्ण का अपमान किया। तो जैसे ही राधा रानी को एक सखी ने ऐसा कहा साथ में ही दूसरी सखी ने कहा आर एक सखी उत्तर दी छिलो और एक सखी ने उत्तर दिया हां अहंकार श्रीमती हो छिलो बटे हां श्रीमती का अहंकार हुआ था किंतु किंतु ये अहंकार किंतु ये अहम किसका है अर्थात कृष्ण आर पति ए अहंकार अर्थात कृष्ण मेरे पति है यह अहंकार है कृष्ण ए अहम रे दिए छले कृष्ण ने ही इस अहम को रख दिया था ठाकुर कथ माने ए ठाकुर की बात का अर्थ यही है ईश्वर ही यही अहंकार तुम्हारे भीतरे रखे दिए छ ईश्वर ने ही इस अहंकार को तुम्हारे भीतर में रख दिया है अनेक काज करिए ने ए जन्म बहुत सारा काम करवा लेंगे इसलिए देखिए ये जो अहंकार कार अर्थात ये अहम किसका है? इसके आगे ही हमने देखा ना ठाकुर ठाकुर नारायण को कहते हैं कि देखो मेरे पास में तो बहुत सारी सिद्धियां है किंतु मैं तो सिद्धि का प्रयोग नहीं करने वाला किंतु मैं चाहता हूं कि तुम्हारे माध्यम से मैं सिद्धियों का प्रयोग करूं। तो नरेंद्र ने स्पष्ट बोल दिया नहीं महाशय ऐसा होगा नहीं। म यदि आपको सिद्धि की आवश्यकता नहीं तो फिर मैं क्यों ये सब योगिक पावर्स सुपर पावर्स ले घूमता रहूं। किंतु एटलीस्ट ठाकुर ने नरेंद्र के भीतर में ये सिंह समान विराट आत्मश्रद्धा छोड़ दी थी। ये आत्मश्रद्धा एक ऐसी सुपर पावर है। एक ऐसी शक्ति है कि जिसके माध्यम से स्वामी जी ने जगत जय किया है। यदि स्वामी जी के भीतर में सिंह सदृश्य आत्मश्रद्धा नहीं होती तो वही जो हजार साल से नम्र हिंदू इसकी लात खाता है। उसके बाद में इसकी लात खाता है। अभी इसकी गाली खाता है तो कभी उसकी गाली खाता है। वो आज तक ऐसा ही रहता है। ये जो हमारी जाति का हमारी रेस का हमारे राष्ट्र का जो उत्थान हुआ है इसके भीतर में स्वामी जी का ये जो अहम है वो कारण भूत है। और यहां पे मास्टर महाशय कहते हैं अहंकार ये अहम किसका है? जो ठाकुर मेरे गुरु है। मैं ठाकुर का संतान हूं। यह अहम है। ठाकुर ने ही यह अहम नरेंद्र के भीतर में छोड़ा है। क्यों? क्योंकि तुम्हारे से बहुत सारा काम करवाना है। मास्टर महाशय ये कहते हैं नरेंद्र किंतु हम हाक डेके बोले हमारा दुख ना कहता है किंतु हाक डेके अर्थात कि म हाक डेके का क्या अर्थ करेंगे जो कि बातें करने में बड़ा ही माहिर है। मैं बहुत बातें करता हूं कि तू इस बात का मुझे दुख नहीं। देखिए ठाकुर भी नारायण का कभी कभी मजाक करते थे। नारायण एक बार ठाकुर को जाकर के कहता है म ये जो आंकड़े के अर्थात की जो मन में आए बोल देना म गर्व पूर्वक कहना किसी का असम्मान नहीं करना किसी को नीचा नहीं दिखाना किसी का इंसल्ट नहीं करना एट द सेम टाइम म आत्मश्रद्धा पूर्वक बातें करना तो ये जो नरेंद्र की बात करने की स्टाइल थी जो मन में आता था बिना किसी का अपमान किए किंतु स्पष्ट रूप से जो अपनी बात रखना और बातें करते ही रहना बकबक करते रहना तो एक एक बार उन्होंने उसने नारायण ने ठाकुर के सामने कह दिया कि विपद के संपत ज्ञान पूर्व विपद अर्थात की मुसीबत क्राइसिस और संपद अर्थात की ओपोरर्चुनिटी तो संपद अर्थात की वेल्थ जो विपत आएगी तो उसको संपद के रूप में ज्ञान करेंगे। क्राइसिस आएगी तो उसको चैलेंज के रूप में लेंगे। ओपोरर्चुनिटी के रूप में लेंगे। ये जो जगत का इतिहास है ऐसे लोगों से ऐसी कहानियों से भरपूर है कि गरीब लड़का था बहुत मेहनत करके बहुत बड़ा साइंटिस्ट हुआ बहुत बड़ा इंडस्ट्रियलिस्ट हुआ वगैरह वगैरह चैलेंज आती है तो मनुष्य का जो भीतर का जो सिंह है वो जागृत हो जाता है चैलेंज का उत्तर देने के लिए तो फिर हमारे भीतर की शक्ति बाहर आती है तो ये विपद को संपद ज्ञान करना चैलेंज को ओपोरर्चुनिटी के रूप में लेना ये इट्स म इट्स अ वेरी गुड ह्यूमन ट्रेड तो अभी नरेंद्र हां देख म मुंह में जो आए वो बोलता है बिना किसी का अपमान किए मुंह में जो आए वो बोलता है तो ठाकुर के सामने ऐसा बोल दिया कि संपत के विपद ज्ञान करूंगा माने जब संपत विपत के संपत ज्ञान करूंगा जब विपत आ जाएगी क्राइसिस आ जाएगी तो मैं उसको ओपोरर्चुनिटी के रूप में दूंगा तो ठाकुर ने उस बार तो सुन लिया फिर जब नरेंद्र के सामने सही में क्राइसिस आई पिताजी का मृत्यु हुआ घर में खाने को नहीं है बेचारा मारामारा घूम रहा है नौकरी के लिए तो ठाकुर मजाक करके कहते कहते हैं बोले छो तो के विपद के संपत ज्ञान करो देखो एक करो विपद के संपत ज्ञान करो वो बोला था तो विपद को संपत ज्ञान करूंगा क्राइसिस को मैं ओपोरर्चुनिटी के रूप में लूंगा पिताजी का मृत्यु हो गया है अभी नौकरी खोजने के लिए घूम रहा है कल तक तो जो बहुत ही अपने प्रेमी थे मित्र थे मित्रता का दिखावा करते थे उन सब ने मुंह घुमा लिया है अभी तक पैसों की कीमत नहीं थी पिताजी के पैसे पे जी रहा है अभी खुद को पैसा कमाने की बारी आई तो पता चला कि पैसे की क्या कीमत है। अभी करो क्राइसिस को ओपोरर्चुनिटी के लो रूप में उसके रूप में और ठाकुर भी इस तरह की मजा करते हैं। तो यहां पे कि स्वामी जी स्पष्ट कहते हैं मैं हाक डाक करता हूं तो उसमें उसमें मुझे कोई दुख नहीं है। मैं स्पष्ट वक्ता हूं इस बात का मुझे दुख नहीं है। तो मास्टर साहस्य मास्टर महाशय साहस्य कहते हैं। तभी शोक करे आंख डाक करो। उपमा वहां से कहते ठीक है तो फिर शोक करके म जी जान से हाक डाक करो दोनों हंसते हैं ये स्वामी जी ने हांक डाक की बोल के ही तो स्वामी जी वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में चले गए थे वहां पे जाकर के जो बोलने का साहस उनके भीतर में हुआ था वरना एक गुलाम देश का एक फकीर साधु मने इस तरह की एक ऑगस्ट असेंबली में खड़े होके बोले दैट इटसेल्फ कितना इंप्लसिबल लगता है यह जो हाक डाक करने का उनका जो नेचर था स्पष्ट वक्ता होने का मुंह में जो आए वह बोल देने का तो इसी वजह से स्वामी जी यह सब कर पाए थे। इसके बाद का जो है दोनों का डायलॉग अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति। हरि ओम तत्स श्री राम कृष्णामस्तु