prayer
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का बायोग्राफी हम देख रहे थे आठपुर चैप्टर रामकृष्ण संघ का जो इतिहास है उसमें जो कुछ कुछ महत्व महत्वपूर्ण घटनाएं हैं। उसमें से एक आठपुर में सब गुरु भाई सब तो नहीं नौ गुरु भाई का नाम हमको यहां पर मिला है। वे लोग इकट्ठा हुए थे। नरेंद्र बाबूराम, शरद, शशि तारक, काली, निरंजन, गंगाधर ओ शारदा। यह नौ गुरु भाई वहां पर इकट्ठा होकर के किस तरह से क्रिसमस ईव को एक महत्वपूर्ण घटना घटी। उसका डिस्क्रिप्शन हम पाठ कर रहे थे। ऑलरेडी देख लिया कि किस तरह से ट्रेन में जर्नी करके यह संगीत और सब वाद्य के साथ में यह लोग जर्नी कर रहे हैं। तानपुरा है, तबला है। इसके साथ में और जैसे ही ट्रेन स्टार्ट होती है तो साथ में ही नरेंद्रनाथ ने भजन गाने की शुरुआत कर दी। तो यह भजन गातेगाते यह लोग सब आठपुर की ओर चले। जैसे ही आठपुर पहुंचे तो मातंगिनी देवी बाबूराम महाराज भविष्य के स्वामी प्रेमानंद महाराज की मां ने कितने प्रेम से उनको सादर आवा आवकार पूर्वक आह्वान पूर्वक ग्रहण किया और कैसे अपने खुद के हाथों से उनकी केयर करने में लग गई। तो यह हमने ऑलरेडी देखा हुआ है। इसके बाद में यह गंभीरानंद जी महाराज आगे क्या कहते हैं? थोड़ा सा पाठ करते हैं। क्या कहते हैं?
श्री रामकृष्ण के भक्तो में परस्पर स्नेह और सौहार्द
प्ली श्यामल निर्जतार मध्य ए श्री रामकृष्ण भक्त परिवारे स्वच्छंद आहार बिहार सुजोक पया त्यागी युबक वृंदो भगवत आराधना ओ भगवत चिंताए प्राण ढालिया दिलन पल्ली अर्थात कि गांव गांव की यह श्यामल निर्जनता उसमें भी इस रामकृष्ण भक्त परिवार में स्वच्छंदता पूर्वक आहार और विहार का सुयोग प्राप्त करके त्यागी युवक वृंद ने भगवत आराधना और भगवत चिंता में अपने प्राण ढाल दिए। देखिए यहां पे सबसे पहली बात तो है कि आप किसी के घर जाते हैं तो कभी-कभी ऐसा लगता है कि यह हम लोग एक तरह से जो रहने को हैबचुएटेड है उस तरह से शायद हम यहां पे नहीं रह पाएंगे तो फिर मन में कभी-कभी ऐसा लगता है कि अभी यहां से निकल कर के कब हम अपने घर में वापस जाइए जा जाएंगे किंतु कोई कोई घर ऐसा होता है जहां पर आप एज ए गेस्ट गए तो है किंतु आप वहां के यह जो यजमान है आपके होस्ट है उनके साथ में आपका रिश्ता इतना गहन होता है इतना प्रेमास्पद होता है कि आपको ऐसा ही लगता है कि आप अपने घर पे ही आए हैं तो फिर वहां पे फिर वहां से जाने में कष्ट होता है तो यहां पर भी देखिए कि ये तो रामकृष्ण भक्त परिवार है तो यह बाबूराम महाराज की मां का यह घर है छोटे से गांव आठपुर में। यह तो भक्त परिवार है भगवान रामकृष्ण देव का। और यह तो कल ही हमने देखा कि किस तरह से मातंगिनी देवी ने ये बाबूराम जैसे उनका संत पुत्र है तो वैसे ही बाकी जो गुरु भाई थे त्यागी संतान थे ठाकुर के वह भी तो उन्हीं के संतान है बोलकर के उनको ग्रहण किया था। यानी कि इनको ऐसा ही लगा यह नौ गुरु भाइयों को कि जैसे वह अपने ही घर आए हैं। अपनी ही मां के घर आए हैं। तो इतना स्वच्छंदता पूर्वक उनको आहार और विहार करने को मिला था। और जैसे ही यह स्वच्छंदता मिली, एक फ्रीडम ऑफ माइंड मिला। फ्रीडम फ्रॉम एनी टेंशन कि मैं इस तरह से बात करूंगा तो यजमान को बुरा लग जाएगा या इस तरह से आचरण करूंगा तो उनको बुरा लग जाएगा। यह सब टेंशन जैसे ही चला गया वैसे ही मुक्त मन से यह लोग भगवत आराधना में मग्न हो गए और यह सब करने
निःसंकोच, निडर, निर्भीक — यही था विवेकानन्द का स्वभाव
में तो अपने स्वामी जी तो कोई पीछे नहीं है ना स्वच्छंदता पूर्ण वो जो आचरण करते हैं वो जो हमने काफी कहानियां देखी है उनके अमेरिका के दिनों की स्वामी विवेकानंद जब अमेरिका जाते हैं और जो उनके यह जो फ्रेंड होते हैं एडमायरर्स होते हैं फॉलोअर्स होते हैं उनके के घर पर रहने को जाते हैं। तो अभी प्रत्येक और यह तो अमेरिका का कल्चर है ना इंडिया के कल्चर से कितना डिफरेंट और स्वामी जी तो फिर साधु है। यानी कि साधु का साधु को तो एक हैबचुएशन होता है कि यह शशान में रहने का यह वराह नगर मठ ये शिव जी का शशान ही तो था। वहां पे वह सांप रहते थे। वो निर्जन था। धूल मिट्टी पड़ी रहती थी। वो तो इसी तरह से तो स्वामी और फिर बाद में उन्होंने प्रवृजिया की। अर्थात कि पूरे भारत में भिक्षा मांगते मांगते घूमे हैं। कभी आज किसी धनी के घर रह रहे हैं। कभी किसी किसान की कुटिया में रह रहे हैं। और कभी ऐसा है कि पेड़ के नीचे भी रात बितानी पड़ी है। तो यह स्वामी जी का इतिहास है। वराह नगर मठ रूपी शशान में रहना और पूरे भारत में भ्रमण करना। अभी यह जो स्वामी जी की जो हैबिट थी कि किसी के माने नॉन एपोलजेटिक जिसको कहते हैं अनपोलजेटिक मैं जो कुछ भी करूंगा उसके लिए मैं कभी भी एपोलॉजी अर्थात कि क्षमा प्रार्थना नहीं करूंगा। क्यों? क्योंकि मैं गलत तो कुछ कर नहीं रहा हूं। आपके जो कुछ नीति नियम होंगे उसको मैं फॉलो नहीं करता। उसका अर्थ थोड़ी ना है कि मैं गलत कर रहा हूं। देखिए कि वो स्वामी जी एक लेडी डिवोटी के घर अमेरिका में गए हैं भोजन करने के लिए। तो अभी वैसे तो अमेरिकन लोग स्मोकिंग करने में माहिर है। किंतु ऐसा एक कन्वेंशन है, सोशल एटीकेटी है कि जहां पर लेडीज उपस्थित है, वहां पर स्मोकिंग नहीं करना है। और यह तो एक जनरल कन्वेंशन होता है। दूसरा एक था कि जिनके घर स्वामी जी गए थे, वह लेडी पार्टिकुलरली स्ट्रिक्ट थी कि यह डिनर टेबल पर बैठ के तो स्मोकिंग बिल्कुल ही नहीं करना है। डिनर टेबल पे आप इकट्ठा हुए हैं। आप खाना खाइए और फिर खाना खा के जो पुरुष लोग हैं जिनको स्मोकिंग करना है। तो ये सेपरेट स्मोकिंग रूम रहता है धनी लोगों के घर में। तो वहां पर जाकर आप स्मोकिंग कीजिए। वरना तो यह सेकेंडरी इफेक्ट होता है ना स्मोक का। वह अपने लंग्स पर खराब असर डालता है। तो अभी यह हेल्थ के पॉइंट ऑफ व्यू से भी यह ठीक ही है कि स्मोकिंग के लिए सेपरेट कमरा रखा जाए और एक सोशल एटीकेटी के हिसाब से भी ठीक है कि आप लेडीज के सामने स्मोक करेंगे तो लेडीज लोगों को क्या है थोड़ा सा इंसल्ट जैसा उनको लगेगा। तो अभी ये तो स्वामी जी है। वो तो सदा शिव। तो [हंसी] ये भोलेनाथ तो अब जैसे हुआ ऐसा कि ये जो लेडी थी होस्टेस वो 2 मिनट के लिए खड़ी होकर के किसी काम के लिए गई। डिनर चल रहा था। तो एकाएक स्वामी जी ने वो सिगार निकाली और वहीं पर डिनर टेबल पे ही वह स्मोक करना शुरू कर दिया। सिगार फूंकना शुरू कर दिया। तो अभी सभी लोग एकदम डर गए क्योंकि एक एक देखिए तो स्वामी जी के मुंह पर कुछ भी बोलना थोड़ा मुश्किल है। स्वामी जी की पर्सनालिटी ही ऐसी प्रचंड पर्सनालिटी थी और सभी तो स्वामी जी के फॉलोअर्स ही है। तो ऐसा स्वामी जी के मुंह पर बोलना कि स्वामी जी स्मोक मत कीजिए। तो वो भी थोड़ा मुश्किल है। और दूसरा कि यह जो होस्टेस थी वो थोड़ी स्ट्रिक्ट थी। तो वो क्या बोल देगी अभी स्वामी जी को? स्वामी जी को इंसल्ट हो जाएगा। वो भी तो ठीक नहीं है। तो सभी गेस्ट एकदम बेचारे स्टन होकर के फ्रीज हो गए कि अभी होता क्या है देखते हैं। तो यहां स्वामी जी ऐसा स्मोक कर रहे हैं। धुआं उड़ा रहे हैं और यहां पे वो होस्टेस वापस आई किसी काम के लिए गई होगी। तो जैसे ही वापस आई देखा कि स्वामी जी बिंदास डिनर टेबल पर बैठ के वो चिरूट फूंक रहे हैं। चिरूट ने सिगार व्हाटएवर। तो वह तो एकदम गुस्से से आग बबूला हो उठी और चिल्ला के बोली स्वामी डोंट यू नो दैट वी शुड नॉट स्मोक ऑन दिस डिनर टेबल आर यू ए चिमनी और आर यू ए ह्यूमन माने आप चिमनी है ना कि ह्यूमन है चिमनी अर्थात पता है ना अमेरिका में ठंड बहुत पड़ती है तो फिर वहां पे यह फायर प्लेस होता है तो वहां पे ये लकड़ियां जलाते हैं तो लकड़ियों का जो स्मोक होता है वह चिमनी के माध्यम से वह निकल जाता है। वरना स्मोक यदि घर में वो फैलेगा तो फिर वह एस्थेक्सिया हो जाएगा। यह कार्बन डाइऑक्साइड पोइजनिंग हो जाएगा। व्हिच इज वेरी डेंजरस। कुछ जलाते हैं लकड़ी वगैरह लोग्स वगैरह तो उसका आउटलेट स्मोक का आउटलेट होना चाहिए। तो यह सभी अमेरिकन घरों में चिमनी जैसा होता है। तो इसने कहा कि आप क्या चिमनी है क्या कि इस तरह से धुआं फेंक रहे हैं चारों ओर। तो स्वामी जी ने कहा कि नहीं मैं तो चिमनी नहीं हूं किंतु मेरे पास में एक चिरूट है जो कि चिमनी का काम करती है। [हंसी] तो स्वामी जी ने ऐसा हंसी मजाक करके बोल दिया कि वो होस्टेस भी थोड़ी ठंडी हो गई क्योंकि क्या है देखिए स्वामी जी के भीतर में तो वह पर्सनालिटी है ना आप उनको ऐसा करके उनके साथ में मिस बिहेव नहीं कर सकते। इवन यदि वह मजाक करके भी स्वामी जी उत्तर दे तो तो फिर माने उनकी पर्सनालिटीज के पीछे में इस तरह से रहती है भैरव की कि आप उनके साथ में ज्यादा तर्क वितर्क नहीं कर सकते हैं। तो वो होस्टेस भी चुप हो गई और यहां पे स्वामी जी आराम से वो चिरूट फूंक रहे हैं। तो देखिए कि और यह तो स्वामी जी अकेले यहां तो सभी नौ के नौ गुरु भाई सब एक के बाद एक भैरव जैसे वह उनका खाने का पीने का कपड़े पहनने का कब वो स्नान करेंगे कब नहीं करेंगे वह सब तो तपस्वीयों जैसा था तो अभी किसी के घर इस तरह के आप चले जाएंगे तो कोई भी होस्टेस होगी वहां घर की लेडी वह तो बेचारी परेशान हो जाएगी कि किस तरह की इन सब की हैबिट है खाना खाने के समय दिखते नहीं है सबके यह खाना रखना पड़ता है। कौन कब आएगा, कब नहीं आएगा, किस तरह की बातें करेगा। यह जो स्वामी जी अखंडानंद जी को लेकर के ये ठाकुर के रहते रहते की यह बात है। ठाकुर सदैव वर्तमान थे काशीपुर में ही थे शायद कैंसर की ट्रीटमेंट के लिए और उस समय के यह गंगाधर महाराज और यही नरेंद्र किसी एक डिवोटी के वहां पर गए और वह फिर मधुर भाव का गोपी भाव का गीत गाने लगे। तो वह जो होस्ट था उनका यजमान वो थोड़ा सा नाराज हो गया। बोलता है कि देखो मैं यहां पर यह सब लेडीज लोगों को लेकर रह रहा हूं। यह सब गोपी भाव का भजन यहां पे क्यों गा रहे हो? वो ठीक नहीं है। तो क्या है कि अभी एक सन्यासियों का जो आदर्श होता है और गृहस्थ का होता है। गृहस्थ अपनी और ठीक है कि एक बार आपने मैरिज कर लिया फिर मधुर भाव की बातें करना वह फिर आपकी वाइफ को अच्छा नहीं लगेगा। और यहां पर सन्यासी है कि वह सदा निर्मल पवित्र हृदय है। उनके मन में यदि मधुर भाव के गीत भी गाते हैं तो वन परसेंटेज पाप भी मलिनता भी उनको स्पर्श नहीं करेगी। तो अब क्या है कि यह सन्यास का एक आदर्श है। संसार का एक गृहस्थ का आदर्श है। सन्यासी किसी के घर रहने को जाएंगे तो वह गृहस्थ जो है वह बेचारे थोड़े तो परेशान हो ही जाएंगे। किंतु यहां पर देखिए कि मातंगिनी देवी वो ऑलरेडी ठाकुर के प्रति इतनी समर्पित थी कि इस त्यागी संतानों के जितनी भी ये वो आप क्या कहेंगे कि विचित्रताएं होंगी ये इडियो सिंक्रोसिस होंगी सब कुछ जैसे कि उन्होंने प्रेम से ग्रहण कर लिया तो इस तरह से आहार और विहार में स्वच्छंदता का सुयोग प्राप्त करके त्यागी भक्त वृंद यह सोशल एटीकेटी की टेंशन नहीं है। यह टेंशन नहीं है। वह टेंशन नहीं है। तो टेंशन मुक्त जब हो गए तो फिर भगवत चिंतन और भगवत आराधना में वे लोग मग्न हो गए। प्राण ढाल करके उन्होंने साधना करना शुरू कर दिया। श्री रामकृष्ण भलो भाषा उपदेश आदर्शों जीवन ओ ताहार अर्पित दाय इत्यादि ई तहां देर अभिराम आलोचनार विषय होइलो श्री रामकृष्ण का प्रेम श्री रामकृष्ण का उपदेश उनका आदर्श उनका जीवन और उनके द्वारा अर्पित रिस्पांसिबिलिटी जवाबदारी इसके बारे में अविराम आलोचना करना ही इनका कार्य हो गया। देखिए ऊपर
स्वामी विवेकानन्द मेरे लिए ध्यान कर रहे हैं
वाला टॉपिक उसमें और एक पॉइंट ऐड कर देता हूं। यह भक्त लोगों के घर जाकर के रहना। देखिए स्वामी जी जब सेकंड टाइम अमेरिका गए थे तो शुरू शुरू में यह वो जो किसी किसी के घर रहते तो थे। अब जैसे कि यह मिज हेंसब्रो है। तो मिसेज एलिस हेंसब्रो तो वो स्वामी जी की बहुत अच्छी डिवोटी थी। किंतु स्वामी जी यह भी समझ गए कि इतना वैसे ही इन लोगों का बड़ा परिवार है। फिर यह उनके वहां पर रहना हो सकता है कि उनको लंबे टाइम तक रहना उनको थोड़ा सा मुश्किल हो। उसके बाद में स्वामी जी गए स फ्रांसिस को तो वहां पर भी वह एक दो जगह पर ऐसा रहे तो सही किंतु फिर उनको समझ में आ गया कि उनको यदि स्वच्छंदता पूर्वक एक फ्रीडम से रहना है क्योंकि जब उनको क्लासेस लेने हैं तो फिर क्लास के आसपास में ही स्वामी जी का पूरा तो रूटीन बना रहेगा ना क्लास समाप्त होने के बाद में ही खाना खाना है उससे पहले मेडिटेशन वगैरह जो कुछ भी है वह सब करना है तो फिर स्वामी जी ने ठीक किया कि एक भाड़े से मकान लेंगे। वहां पर जाकर के रहेंगे। यह होम ऑफ ट्रुथ जहां पर स्वामी जी रह रहे थे तो वहां पर नहीं रह के वो एक सेपरेट घर भाड़े करके रहेंगे। तो टर्क स्ट्रीट बोलकर के एक जगह थी। वहां पे एक अपार्टमेंट था। तो वहां पे मोस्ट प्रोबेबबली सेकंड या थर्ड फ्लोर पे स्वामी जी ने अपार्टमेंट भाड़े किया। और यह मिसेज एलिस एंसपो और स्वामी जी और यह होम ऑफ ट्रुथ की जो संचालिका थी यह तीनों लोग वहां पर रहने के लिए गए और देखिए कि वहां के दिनों की जो सब घटनाएं हैं इतनी सुंदर-सुंदर घटनाएं हैं। एक दिन ऐसा हुआ कि स्वामी जी क्लास का टाइम हो गया है। स्वामी जी क्लास में जा रहे हैं। तो जिस पैसेज में से जा रहे हैं तो वहां से वो किचन के सामने से जा रहे थे। तो एकाएक उन्होंने देखा कि एलिस हेंस ब्रो वो स्वामी जी के लिए अभी भी वो सुबह का ब्रेकफास्ट जो होता है ना वो ब्रेकफास्ट बना रही थी। वो ब्रेकफास्ट भी अभी क्या है कि बिकॉज़ कि हम लोगों का एक छोटा सा ग्रुप है। इसके लिए मैं बताता हूं। जनरली यह सब बोलने को जाएंगे तो लोगों को बुरा लगता है। क्या है कि स्वामी जी के लिए मीट जो होता है उसका ब्रोथ बना रही थी। अर्थात कि उसका जूस बना रही थी। तो अभी मीट को क्या करना है? मांस को क्या करना है कि लंबे समय तक उसको उबालना पड़ता है। जिससे कि उसके जितने भी पोषक तत्व हैं वह सब रिलीज हो के यह जूस में आ जाए। तो लंबे टाइम तक उसको उबालना है। तो स्वामी जी ने कहा कि देखा कि एलिस हेंसब्रो यह ब्रोथ बना रही है मीट का। तो कहा कि अरे क्लास का टाइम चालू हो गया। क्लास का टाइम हो गया है। आप अभी भी खाना पका रही है। तो एलिस हेंसब्रो ने कहा स्वामी जी मैं आज थोड़ा सा देरी से स्टार्ट किया है तो अभी थोड़ा देरी हो जाएगा और आप ही के लिए बना रही हूं। मेरे लिए बनाती तो अभी छोड़ के चली जाती। किंतु आपके लिए तो बना रही हूं। तो क्लास मिस करके भी मैं पहले तो आपके लिए ब्रोथ बना दूंगी। तो स्वामी जी कहते हैं अच्छा अच्छा स्वामी खुश खुश हो गए स्वामी जी कहते ओके ओके आई विल मेडिटेट फॉर यू देखिए मेडिटेशन का क्लास था राजयोग का क्लास था स्वामी जी मेडिटेशन सिखाने वाले थे अभी जो डिवोटी उनका जो कि उनके लिए उनकी सेवा करने के लिए मेडिटेशन छोड़कर के खाना पुका रहा है स्वामी जी कहते हैं कि आई विल मेडिटेट फॉर यू मैं आपके लिए ध्यान करूंगा तो एलिस कहती है अच्छा ठीक है स्वामी जी अभी वह वहां पे खाना पका रही है। वो ब्रोथ जो है वह बॉईल हो रहा है। वो वहां पे सामने खड़ा रहना पड़ता है। वो जो पेन वो जो होता है ना एक चमचा वगैरह रह के उसको बीच-बीच में घुमाना पड़ता है। हिलाना पड़ता है जैसे कि वो चिपक ना जाए। तो अभी वो वहां पर खड़ी है। एकाएक वो खुद यह रेमिनेशंस लिखती है। कहती है कि एकाएक इस तरह का शांति, पवित्रता और शीतलता आकर के मेरे पर सवार हो गया। जैसे कि मैं सही-सही में ध्यान कर रही हूं। किंतु ध्यान नहीं कर रही। वो तो वो मीट ब्रोथ बना रही है। वो किचन में खड़े रह के वो किंतु मन इस तरह से शांत हो गया है। तो वो समझ गई कि सही-सही में स्वामी जी मेरे लिए ध्यान कर रहा है। अभी देखिए कि यह घटना एक्चुअली जिस समय हुई थी 1899 में उसके ऑलमोस्ट 40 इयर्स के बाद में मिसेज एलिस हेंसब्रो यह रेमिनेशंस स्वामी अशोकानंद जी को कहती है। और यह रेमिनेशंस कहने के बाद कहती है कि आई स्टिल फील स्वामी जी का डेथ तो हो गया 1902 में। यानी कि यह घटना है आई थिंक 19 1940 के आसपास की। तो कहां 1902 में स्वामी जी की महासमाधि और कहां यह 1940 की बात यह एलिस हेंसब्रो कहती है स्वामी अशोकानंद जी आई स्टिल फील एज इफ स्वामी जी इज मेडिटेटिंग फॉर मी। मतलब एट मच पीस उतना शांति, शीतलता और पवित्रता उसमें यह रहती थी। तो देखिए कि आप यदि यह सोचते हैं कि मैं साधन भजन करके मन की शांति है, मेडिटेशन है, मेडिटेटिव पीस है, स्पिरिचुअल पीस है, स्पिरिचुअल जर्नी है। उसमें आगे बढूंगा तो कभी हमको यह भी देख लेना है कि यह मेडिटेशन करने की अपनी कैपेसिटी कितनी है। यदि कैपेसिटी कम है। देखिए आपकी स्वामी जी की तरह मेडिटेशन कर करने की कैपेसिटी है। स्वामी जी की तरह मेडिटेशन करके यदि आप आध्यात्मिक जीवन में फटाफट आगे बढ़ जाएंगे। ये जितने भी गुरु भाई हैं देखिए सब के सब तो एक के बाद एक वो वो भूत और बंदर वो भगवान शिव के भूत और भगवान राम के बंदर इसी के जैसे हैं वे लोग तो जो चाहे कर सकते हैं किंतु जब आम आदमी की बात है हमारे जैसे तब हमको यह डिसीजन लेना होता है कि मैं मेहनत करके परिश्रम करके मेडिटेशन करके साधना करके जप ध्यान करके अपने आध्यात्मिक जीवन में आगे बढूंगा ना कि शरणागति पूर्वक सेवा करके आगे बढूंगा। यह एलिस एंसब्रो उसको स्वामी जी हजार राजयोग भी सिखा देते तो भी वह मुझे नहीं लगता कि इस तरह की आध्यात्मिक शांति और आनंद उसको प्राप्त होता जितना कि वह स्वामी जी के लिए खाना बना के वहां टर्क स्ट्रीट फ्लैट था जो कि भाड़े पर लिया था। वहां पर स्वामी जी की सेवा करके उसको जो शांति मिलती थी वो उसको माने अपने से जब ध्यान करके मिलती। देखिए टर्क स्ट्रीट फ्लैट की बहुत सारी घटनाएं हैं। स्वामी जी अभी वहां पर तो स्नान करने के लिए बाथ टब होता है। तो अपने यहां पर तो क्या है हम लोग बाल्टी में पानी डाल देते हैं स्नान करने के लिए। बाल्टी में से पानी लेते हैं। वहां पर वो बाथ टब होता है अमेरिका में। तो वहां पर भी स्वामी जी जिस बाथरूम में स्नान करते थे वहां पर बाथ टब है। तो ऐसा है कि बाथ टब पानी ज्यादा समय रहेगा तो बैक्टीरिया वगैरह उसमें जमा हो सकता है। तो उसको घस करके एक बार बीच-बीच में धोना होता है। क्लीन करना होता है। अभी यह एलिस हेंसब्रो है। वह स्वामी जी का बाथ टब एक तरह का वह स्टोन होता है ना पत्थर होता है घिसने का। उसको लेकर के बाथ टब को क्लीन कर रही है। तो स्वामी जी को पता चला कि वो बाथ टब क्लीन कर रही है तो पत्थर घिसने की आवाज आएगी तो तो वह बाथरूम में जाकर उसको कहते हैं देखो यह यहां पे ये उसका बॉटम पे ये पानी जम जाता है ज्यादा उसको और ज्यादा घिस करके तुम क्लीन करो तो एलिस हेंस बेचारी वो तो क्लीन कर ही रही है और स्वामी जी सामने खड़े हैं और और उपदेश के ऊपर में उपदेश दिए जा रहे हैं। अब देखिए कुछ-कुछ कार्य तो लेडीज लोगों को ही समझ में आते हैं। स्वामी जी ने ना ही कभी वह बाथटब का यूज़ किया है इंडिया में ना ही वह क्या है कि लेडीज़ का काम लेडीज़ ही ठीक से जानेगी ना। अब फिर भी स्वामी जी सामने खड़े रह कर के एक के बाद एक ऑर्डर दिए जा रहे हैं। ऐसा करके घिसो ऐसा करो वैसा करो तो फिर एलिसब्रो थोड़ी नाराज हो गई। वो खड़ी होकर के बोली ये लीजिए यह पत्थर घिसने का। आप ही घिसिए। देखती हूं मैं कि मेरे से अच्छा घिस सकते हैं कि नहीं। तो स्वामी जी को लगा कि नहीं नहीं ये मैंने ऐसा सब बोल के उसको नाराज कर दिया। फिर स्वामी जी उसको शांत करते हैं। अच्छा ठीक है ठीक है आप आपको जिस तरह से करना है क्लीन वो कीजिए। वो मेरा पत्थर वापस देके स्वामी जी वहां से निकल गए। देखिए कि सच एन इंटिमेट सीन यहां पे काम गंध का एक नामोनिशान भी नहीं है। मैं जब पहली पहली बार यह सब स्वामी जी के अमेरिका के दिनों के रेमिनेशंस पढ़ता था। मुझे आश्चर्य होता था कहां ठाकुर का यह उपदेश कि यदि एक स्त्री की मूर्ति भी यदि पड़ी है, स्त्री की एक गुड़िया भी यदि पड़ी है जमीन के ऊपर में तो सन्यासी उसके सामने दूसरी बार देखेगा नहीं और कहां यह निवेदिता के साथ में स्वामी जी का यह जो रिश्ता था यह एलिस हेंसब्रो या एडथ एलन जो कि सब यह जोसेफाइन मैक्लाउड यह जो अमेरिकन डिवोटीज थे उन लोगों के साथ में स्वामी जी का रिलेशन कहां ठाकुर का उपदेश कहां यह स्वामी जी का लाइफ कोई लोग यहां तक कि स्वामी जी के गुरु भाई भी विज्ञान महाराज विज्ञानानंद जी महाराज वो स्वामी जी को कहते हैं कि भाई नरेंद्र तुम यह लेडी अमेरिकन लेडी डिवोटी के साथ में तुम उस समय तो स्वामी जी कश्मीर वगैरह जाकर के आए थे तो इन लोगों के साथ में और यह लोग भी बेलूर मठ में जब भी उनको आवश्यकता होती है आकर के स्वामी जी के साथ में वार्तालाप करती थी तो विज्ञान महाराज स्वामी जी को कहते हैं कि अच्छा नरेंद्र अच्छा भाई यह ठाकुर ने तो यह सब हमको कहा है कि स्त्रियों से तो बिल्कुल ही दूर रहना है और तुम इतना क्लोजली यह लेडी डिवोटीज के साथ में मिक्स हो रहे हो तो क्या यह ठीक है तो जैसे ही विज्ञान महाराज ने ऐसा कहा स्वामी जी का चेहरा लाल हो गया अब देखिए म नाराज तो हो ही जाएंगे दो चीज है एक तो दुख भी होता है कि उनका खुद का गुरु भाई उनके ऊपर में इस तरह से संदेह की उंगली चींधे वो तो एक बात है। दूसरा कि स्वामी जी किस तरह से बताइए अपने गुरु भाई को कि उन्होंने साधना तपस्या और त्याग और वैराग्य की जिस चरम शिखर पर बैठे हैं वहां पर यह लिंग भेद जो है यह जेंडर डिस्क्रिमिनेशन वो कब का चला जाता है? स्वामी जी इनको आत्मन के रूप में ही देखते हैं। नहीं कि स्त्री और पुरुष के रूप में तो उस लेवल पर बैठकर के निर्विकल्प समाधि प्राप्त करने के बाद में स्वामी जी इन लोगों के साथ में इस तरह से वार्तालाप
आंटपुर के वे साधन-भजन तपस्या और आनंदमय अविस्मरणीय दिन
करते हैं। सो माने यह साथ में रहना उसके ऊपर में से तो यहां पे आठपुर वापस चले आते हैं अमेरिका से तो ठाकुर के और वहां पर रहकर के फिर करना क्या है आठपुर में तो ठाकुर के प्रेम के बारे में वार्तालाप करनी है। उन्होंने जो उपदेश दिया है उसके बारे में चर्चा करनी है। ठाकुर ने जो सन्यास का आदर्श दिखाया, त्यागी का योग का जो आदर्श दिखाया, उसके बारे में चर्चा करनी है। और सबसे इंपॉर्टेंट है कि गुरु भाइयों को और खास करके स्वामी जी को ठाकुर ने जो रिस्पांसिबिलिटी दिया है उसके बारे में चर्चा करनी है। आर शंगेशंगे शास्त्र व्याख्या तब स्तुति भजन संगीत कीर्तन और जप ध्यान तो चलते ही था कि लोग और साथ-साथ में शास्त्र व्याख्या स्तवस्तुति भजन संगीत कीर्तन और जप ध्यान तो चलता ही रहता है ए रूप एकटा जमाट भाबेर आकर्षण तहारा निज निज पृथक अस्तित्व हरया नरेंद्रनाथर परिचालनाए एक अखंड चैतन्य सत्तार परिणत होले इस तरह से एक जमाट भाव अर्थात कि माने कंडेंस्ड स्पिरिचुअल एटमॉस्फियर उसमें यह लोग अपने को डूबा दिए और अपना अलग-अलग अस्तित्व हारकर भूल करके नरेंद्रनाथ की परिचालना में नरेंद्रनाथ की लीडरशिप में एक अखंड चैतन्य सत्ता में परिणत हूं। हुए। देखिए यह कितना अगेन गंभीरानंद जी के वो जो कुछ-कुछ हाईली लिटरली हाईली ब्यूटीफुल जो स्टेटमेंट होते हैं उसमें से यह एक कि जब आप यह नो डायरेक्ट डिसाइपल है। वह मिलकर के उन लोगों की साधना, उन लोगों की तपस्या और फिर उन लोगों का यह शास्त्र चर्चा और नरेंद्रनाथ की लीडरशिप यह सब मिलकर के इस तरह का कंडेंस्ड स्पिरिचुअल एटमॉस्फियर तैयार हुआ है। यह जो स्पिरिचुअलिटी है, स्पिरिचुअल पावर है, ऐसा घनीभूत हो गया है वहां पे कि यह लोग अपना-अपना यह जो इंडिविजुअल एग्जिस्टेंस है, पृथक-पृथक अस्तित्व वह भूल करके एक अखंड चैतन्यमय सत्ता में परिणत हुए हैं। देखिए वही बात शोडशी पूजा का आखिरी मतलब समाप्त होने वाली है। कलमिनेट होने वाली है। उस समय मां और ठाकुर दोनों समाधि मग्न हो गए और फिर उच्च आध्यात्मिक अवस्था में जाकर के दोनों एक दूसरे में विलीन हो गए। दोनों का आध्यात्मिक मिलन हुआ। वह जिस तरह से सुंदर रूप से गंभीरानंद जी वह स्टेटमेंट लिखते हैं, वैसा ही यह एक कि आध्यात्मिकता जब बढ़ती जाती है, तब यह जो मेरा स्मॉल आई है धीरे-धीरे करके लार्जर आई में विलीन होता जा रहा है। तो फिर हमको ऐसा लगेगा ही नहीं कि मैं सेपरेट हूं। यह एक ग्रुप जो है ठाकुर का उससे मैं सेपरेट हूं। ऐसा लगेगा ही नहीं। हालांकि सबकी अपनी-अपनी इडओसिंक्रेसीज है। सबके अपने-अपने संस्कार है। सबकी अपनी-अपनी स्ट्रांग पर्सनालिटीज है। जो कि ये वराह नगर मठ के दिनों की जैसे-जैसे चर्चा करेंगे पता चलेगा कि ऐसा नहीं है कि ये लोग सब यह ब्रेनलेस ऑटोमेटोन है। नरेंद्र ने उनको ब्रेन वाश करके हिप्नोटाइज करके अपना एक गुलाम जैसा बना के रखा है। महापुरुष महाराज, ये बाबूराम महाराज, ये योगेन महाराज सबके तो अपने-अपने एक भैरव जैसे हैं और ठाकुर के भूत ये बंदर और भूत इस तरह के हैं। उनका ब्रेन वाश आप नहीं कर सकते। किंतु इंस्पाइट ऑफ दैट इतनी स्ट्रांग पर्सनालिटी को आपको सैक्रिफाइस करके एक लार्जर होल में मर्ज करवा देना। इट रिक्वायर सच अ लेवल ऑफ डडीिकेशन एंड स्पिरिचुअल प्रैक्टिस।
आंटपुर में क्रिसमस की पूर्वसंध्या — जब श्रद्धा ने रूप लिया संकल्प का
इहार मध्य 24 दिसंबर एक अचिंतनीय घटनार फले आठ पूर्व श्री रामकृष्ण श्रंगेर इतिहास अविस्मरणीय होइया उठिलो इसी के बीच में 24 दिसंबर का दिन 24 दिसंबर क्रिसमस ईव का दिन एक अचिंतनीय घटना एक यूनिक इवेंट की वजह से आठपुर यह गांव है वह रामकृष्ण संघ के इतिहास में अविस्मरणीय अनफॉरगेटेबल होकर के बन गया। शार अनेक परे बाहिरे धन ज्वालिया नक्षत्र खचितो उज्जल मुक्ताकाश निमने त्यागी श्री राम कृष्ण संतान वृंदो ध्याने निमग्न हो संध्या के अनेक बाद त्याग ये जो घर के बाहर में एक जगह पे वीरान जगह पे धनि जला करके नक्षत्र खचित उज्जवल मुक्त आकाश नक्षत्र खचित अर्थात नक्षत्र अर्थात कि ये तारे हैं गैलेक्सीस है वगैरह ये तो ये तारों से भरा हुआ उज्जवल मुक्त आकाश मुक्त आकाश अर्थात कि ओपन स्काई अब ये नाइट स्काई जो है वो उज्जवल कैसे होगा तो नाइट स्काई ये ये जो तारों का जो प्रकाश है उससे झगमगा रहा है तो यह तारों के प्रकाश से झगमगता हुआ ओपन स्काई उसके नीचे में यह त्यागी श्री रामकृष्ण संतान वृंद इन लोगों ने ध्यान में निमग्न हुए। जस्ट इमेजिन कि वैसे ही तो छोटा सा गांव है। वैसे ही तो वहां पर वो पपुलेशन बड़ी कम है। वहां पर यह लोग निर्जन एक जगह पर बैठे हैं। ऊपर में खुला आकाश है। तारों से भरा हुआ और नीचे में धुनि जलाई हुई है। और इस धुनि के चारों ओर यह गुरु भाई एक सर्कल में बैठे हुए हैं। कभी जप ध्यान कर रहे हैं। कभी शास्त्र चर्चा कर रहे हैं, कभी एक वार्तालाप कर रहे हैं। कितना सुंदर दृश्य। मैं जब रांची में काम करता था तो मुझे रांची में वो तो ट्राइबल एरिया है। वहां पर पोल्यूशन है नहीं शहर का। इतना ज्यादा कुछ तो शहर में यदि आप आकाश में देखेंगे ना आपको तारे इतने सारे नहीं दिखेंगे। क्योंकि एयर पोल्यूशन बहुत ज्यादा होता है। किंतु यह ट्राइबल एरिया है। वहां पर चले जाए जहां पर यह व्हीकल्स बहुत कम होते हैं। वहां पर रात को आप आकाश देखेंगे तो इतना वो माने तारों से भरा हुआ दिखेगा कि आप आश्चर्यचकित हो जाएंगे कि क्या आकाश में इतने तारे भी है कि नहीं। तो मैं कभी-कभी वहां ट्राइबल एरिया में रात को रुकता था। तो क्या था क्या होता था कि अभी सभी लोग तो जमीन पर बैठने को हैबचुएटेड है ट्राइबल लोग किंतु मैं तो साधु था वहां शहर से गया था तो मेरे लिए ये लोग बड़ा मेहनत करके कुर्सी का जुगाड़ करके रखते थे ट्राइबल एरिया में तो छोटी-छोटी कुटिया ही तो होती है ना फर्नीचर के नाम पर बेचारों के पास में कुछ नहीं होता बहुत ही डेस्पिरेटली पुअर लोग थे यह सब तो अभी कुर्सी का जुगाड़ करना भी मुश्किल था। किंतु अभी मैं उनको पता था कि यह महाराज आज रात को रहने वाले हैं। तो फिर यह लोग मेरे लिए स्पेशल कुर्सी का जुगाड़ करके रखते थे। मुझे पहले ही पूछ लेते थे कि आप बकरा खाएंगे कि चिकन खाएंगे। [हंसी] उस समय में यह सब नॉनवेज खाता था। तो यह पहले से ही वह सब वो नॉनवेज खाना वो ठीक करके रखेंगे। बढ़िया सा चाय बना करके रखेंगे। मुझे चाय पीना अच्छा लगता है। सबको पता है। तो वहां पे रात को मेरे लिए कुर्सी लगाया है और वहां पर इस तरह से धनि जलाया है। क्योंकि क्या है कि रात को बहुत ठंड लगता है। वैसे ही तो हिली एरिया है और यह मैं जो बात बता रहा हूं वह दिसंबर के महीने की है। बहुत ही ठंड हो जाती है वहां पे। मैं ऐसा स्वेटर पहन करके भी शॉल पहन ओढ़ के भी वहां पर बैठता हूं। फिर भी मुझे ठंड लगता है। और यह ट्राइबल लोग बिना किसी शर्ट के वहां पे बैठे हुए हैं। व्हिच इज़ वेरी सरप्राइजिंग। किंतु क्या है अभी उनका फिजिकल स्ट्रक्चर और हम लोग शहर में बड़े हुए हैं। हम लोग ये थोड़े से क्या कहेंगे? डेलिकेट है उनकी कंपेयर में। तो मुझे यह स्वेटर भी पहनना पड़ता था। शॉल भी ओढ़नी पड़ती थी। और फिर यह हाथ में ये गरम चाय का कप है। और मैं कुर्सी पर बैठा हूं। यहां सामने वह ध्वनि जल रही है और सब ट्राइबल लोग उसके आसपास में बैठे हैं। वे लोग बात कर रहे हैं। मैं चुपचाप बैठा हूं। मैं आकाश देख रहा हूं। तारे गिन रहा हूं। मैं शहर में रहता हूं। शहर में बड़ा हुआ हूं। मैंने कभी भी इतने तारे आकाश में नहीं देखे जितने उस समय मुझ मुझे दिखते थे। तो और यह जो आप यह लकड़ी जलाते हैं ना तो लकड़ी के स्पार्क्स होते हैं। तो यह स्पार्क्स जो होते हैं ना धीरे-धीरे करके वो आकाश में उड़ते हैं। तो आप ऊपर में देखेंगे ना कभी-कभी आप कंफ्यूज हो जाएंगे कि आप तारे के सामने देख रहे हैं कि वो जो स्पार्क्स उड़ रहे हैं उसके सामने देख रहे हैं। ऑब्वियसली पता तो चल ही जाएगा कि यह स्पार्क है वो उड़ रहे हैं। जबकि तारे स्थिर है। किंतु दैट वाज़ अ मेस्मराइजिंग सीन। तो वह सीन मुझे पक्का मेरी मेमोरी में फिट बैठा हुआ है। तो यहां पर भी यह जो एक ही सेंटेंस है देखिए कितना सुंदर कि धुन जलाकर के नक्षत्र खचित उज्जवल मुक्ताकाश के नीचे में त्यागी रामकृष्ण संतान वृंद ध्यान में निमग्न हुए ध्याना तहारा ईश्वर आलोचनाए रत आन ऐन समय नरेंद्रनाथ क्रमे जीशु क्रिस्ट त्याग तपस्या पूत अपूर्व जीवन कथा प्राण स्पर्शी भाषा आतंत अन्गल बोलिया जते लागी ले ध्यान जब समाप्त हुआ ध्यान के अंत में ध्याना वह लोग ईश्वर आलोचना में रत थे मग्न थे उस समय नरेंद्रनाथ धीरे-धीरे करके जीशु क्रस्ट का त्याग और तपस्या पुत्र अपूर्व जीवन कथा प्राण स्पर्शी भाषा में पहले से आखिर तक आध्यपांत पहले से आखिर तक अनर्गल एंड माने विदाउट इंटरप्शन बोलने लगे। अब देखिए कि अगेन हम लोगों का एक तरह का प्रजुडाइस होता है। मैं ट्राइबल एरिया में काम करता था तो मैं देखता था कि ये क्रिश्चियन मिशनरीज वहां पर कितना प्रवेश कर गए हैं। किंतु देखिए कि वे लोगों की भी तो एक तपस्या है ना। हम साधु यानी या तो फिर मैं कहूंगा कि यह हिंदू समाज इन जनरल ट्राइबल लोगों को जैसे कि एबेंडोन कर दिया है। उन लोगों को अपने नसीब पर छोड़ दिया है। तब कहीं अब ये क्रिश्चियन लोग जाएंगे उनको कन्वर्ट करेंगे। थोड़ा बहुत हेल्प करेंगे तो उसमें गलती किसकी है? उनकी है ना कि हमारी है। हम लोग अपने भाइयों की संभाल नहीं रखते। बोल के ही तो वे लोग यह सब करने में सक्षम हुए हैं ना। तो दैट इज वन थिंग। अ वो अपना एक प्रजुडाइस साइड पर रख दे यदि तो यहां पर एक सुंदर दृश्य कि जीसस का लाइफ थोड़ा बहुत तो स्टडी किया है मैंने और क्रिश्चियनिटी का हिस्ट्री जो है वो भी मैंने स्टडी किया है। तो मैंने हमेशा यह पाया है कि अर्ली क्रिश्चियनिटी है वो त्याग तपस्या और यह सैक्रिफाइस में उनका मतलब दूसरी मिसाल मिलना मुश्किल है। एक बार जब क्रिश्चियन कम्युनिटीज फॉर्म होना शुरू हो गई और उसके बाद में यह जो रोमन एपरर था एक के बाद एक जितने भी पागल रोमन एंपायर आते गए उन्होंने सोचा कि यह अपने राज्य में जितना भी यह केओस चल रहा है जितना भी डिस्टरबेंस चल रहा है सबके लिए यह क्रिश्चियन जो है उनको रिस्पांसिबल बना दो और फिर उनको जिंदा स्टेक के ऊपर में जला दो तो इन लोगों को पकड़ पकड़ पकड़ करके ले जाते थे। एरीना अर्थात कि एक सर्कस जैसा होता है। बहुत सारे लोग वहां पर बैठे हैं और उन लोगों का मेंटालिटी ही इस तरह का था कि किसी को मारेंगे, टॉर्चर करेंगे, जिंदा जलाएंगे तो लोगों को बड़ा एंटरटेनमेंट मिलता था। तो लोगों के एंटरटेनमेंट के लिए तो ये सब क्रिश्चियन लोगों को पकड़ के ले आते हैं। एक ओर से ये क्रिश्चियन लोगों को प्रवेश करवाते हैं एरीना में और दूसरी ओर से ये सिंह है। ये बियर है। ये शेर है। इस तरह के हिंसक प्राणियों को छोड़ेंगे और फिर यह क्रिश्चियन लोग दौड़ेंगे और यह हिंसक प्राणी उनका शिकार करेंगे। इस तरह का एंटरटेनमेंट चलता था। तो लोगों को खुश रखने के लिए ये जो रोमन एपरर थे वे लोग क्रिश्चियन लोगों पर इस तरह का अत्याचार करते थे। इसके बावजूद जबकि उनको कहा जाता कि आप लोग जीसस को रनाउंस जीसस एंड वरशिप द एपरर। यह एपरर है। उसकी पूजा करो। जीसस को छोड़ दो। तो यह लोग स्वीकार नहीं करेंगे। नहीं एपरर तो मनुष्य है। मनुष्य की पूजा नहीं होती। पूजा ईश्वर और ईश्वर के संतान की ही होती है। सो दैट इज देयर माने भीतर में से ऐसी अग्नि शिख की तरह प्रज्वलित ध्वनि की तरह उन लोगों में ये जो फेद था दैट इज व्हाट कि लेटर ऑन क्रिश्चियनिटी बिकम सच ए डोमिनेंट एंड सक्सेसफुल वर्ल्ड रिलीजन। तो हम हिंदुओं में भी एक प्रचंड धधकती हुई यह श्रद्धा यह पेट्रियोटिज्म यह एक दूसरे के प्रति सहानुभूति यह जब तक हम लोगों में नहीं आएगा यह ऊंची जात का है ना कि यह नीची जात का है। यह इस कास्ट का है ना कि उस कास्ट का है। यह इस राज्य का है ना कि उस राज्य का है। वह सब चीजों से हमको क्या लेना देना है। यदि वह हिंदू है, मैं हिंदू हूं तो हम दोनों भाई भाई ही हैं। यह स्वामी जी कहते हैं ना कि इस्लाम का यह सबसे बड़ा गुण जो है जिसको कि हम हिंदुओं को लेने की जरूरत है वो क्या है? दैट इज द सेंस ऑफ ब्रदरहुड। जिस क्षण आप यह यहां पे यह नीची जात का है। यहां पे यह है जिस क्षण उसने यह क्रिश्चियन क्रिश्चियनिटी या इस्लाम अपना लिया। साथ-साथ में ही वह हम हिंदुओं के साथ में समकक्ष हो जाता है। जो नीची जाति के जिस आदमी को हम अपने घर में नहीं आने देते थे। जिस क्षण उसने क्रिश्चियनिटी या इस्लाम अपनाया हम उसको अपने घर में बुला लेंगे। क्यों? क्योंकि क्रिश्चियन या मुस्लिम जो है वे लोग नीची कास्ट के अभी नहीं रहे। तो स्वामी जी कहते ये किस तरह का पागलपन है? उस आदमी को बेचारे को आपका समकक्ष होने के लिए अपना धर्म परिवर्तन करना पड़ता है। ये किस तरह का पागलपन हिंदुओं में घुस गया है? तो यहां पे भी यह जो यह मिशनरी रिलीजन जो होते हैं और यह जो ट्रेडिशनल रिलीजन जो होते हैं इनमें यह फर्क होता है। आज देखेंगे कि दुनिया में दो ट्रेडिशनल रिलीजन है। इस अर्थ में कि इस रिलीजन में पार्टिसिपेट करने के लिए आपको यूजुअली उस धर्म में जन्म ग्रहण करना होगा। तो एक है जुडाइज्म दूसरा है हिंदूइज़्म। यह दोनों ट्रेडिशनल रिलीजन नॉन मिशनरी रिलीजन है। तो यह एक हो गए। दूसरा हो गया मिशनरी रिलीजन। वो प्रारंभ हुआ था बुद्धिज्म से। यही हिंदूइज़्म का ही एक डिस्टेंट ऑफशूट। यही बुद्धिज्म स्वामी जी कहते हैं ना कि बुद्धिज्म इज अ रेबेल चाइल्ड ऑफ हिंदूइज़्म एंड क्रिश्चियनिटीज़ इज़ अ डिस्टेंट ऑफशूट। तो ये रेबेल चाइल्ड ऑफ हिंदूइज़्म। ये बुद्धिस्ट लोगों ने गांव गांव शहर शहर देश विदेश जाकर के लोगों को कहा कि भगवान बुद्ध को अपनाइए निर्वाण को अपनाइए। सो बुद्धम शरणम गच्छामि धम्मम शरणं गच्छामि संघम शरणम गच्छामि। तो इस तरह से बुद्धिज्म जहां-जहां पे भी जाता है लोगों को इक्वल बना करके ये ब्रदरहुड का मैसेज फैलाता है। सिमिलरली क्रिश्चियनिटी इज़ अ मिशनरी रिलीजन। सिमिलरली इस्लाम इज़ अ मिशनरी रिलीजन। कि वहां पर यह लोग एक्टिवली जाकर के धर्म प्रचार करते हैं। एक्टिवली जाकर के लोगों को कन्वर्ट करने के लिए इंस्पायर करते हैं। तो स्वामी जी कहते हैं कि मेरे जीवन का आदर्श है कि मुझे हिंदूइज़्म को एक अग्रेसिव मिशनरी रिलीजन बनाना है। हिंदूइज़्म में आपने जन्म लिया। ये नीची कास्ट का ये ऊंची कास्ट का ये इस कास्ट का ये उस कास्ट का ये जेंडर डिस्क्रिमिनेशन ये लैंग्वेज डिस्क्रिमिनेशन ये माने ज्योग्राफिकल डिस्क्रिमिनेशन यह बंगाली है गुजराती है यह तेलुगु है यह हिंदी है यह जो जितने भी डिस्क्रिमिनेशन है वी हैव टू डू अवे विद इट वी हैव टू मेक हिंदूइज़्म अग्रेसिवली मिशनरी रिलीजन हमको अग्रेसिवली जाकर के प्रीच करना है स्वामी जी क्या कहते हैं इंडिया मस्ट कॉनकर द वर्ल्ड बट नॉट नॉट वि द मिलिट्री पावर बट वि द पावर ऑफ स्पिरिचुअलिटी। तो दिस स्पिरिचुअल पावर से दुनिया को ककरर करना दैट इज हम लोगों का उद्देश्य है। तो यहां पर जब स्वामी जी धीरे-धीरे करके जीसस के बारे में जीसस का जो पवित्र तपस्यामय उनका जीवन था। इसके अलावा देखिए भारत में तपस्या की कोई कमी नहीं है। आपको गांव-गांव शहर-शहर घर-घर में तपस्वी साधु संत देखने को मिल जाएंगे। जीसस कोई उन्होंने इन लोगों के सबसे ज्यादा जाकर के कुछ ऐसा नहीं किया। किंतु जो क्रिश्चियनिटी का जो यूनिकनेस है दिस इज अग्रेसिव मिशनरी ज़िल या अग्रेसिव प्रीचिंग ज़ील जो कि हम हिंदुओं में नहीं है। हम हिंदू यदि हम पे अत्याचार करने को कोई आएगा तो हम लोग साथ में मिलकर के सामना नहीं कर पाएंगे। हम लोग सोचेंगे अरे वह उस कास्ट के ऊपर अत्याचार कर रहा है। उससे मुझे क्या है? फिर दूसरे पे अत्याचार करेगा वह आक्रमणकारी तो हम सोचेंगे कि उस कास्ट के साथ में कर रहा है। मेरे क्या है उससे? फिर जब किंतु वे लोग मेरे पे आक्रमण करने को आएंगे तो मुझे कोई सहाय करने को नहीं आएगा। यानी कि हम लोग सब इतना बटे हुए हैं। तो दिस अग्रेसिव फॉर्म ऑफ हिंदूइज़्म इज नेसेसरी व्हिच कैन फ्यूज अस टुगेदर। ये जो कहा ना आगे मैं कि इस तरह का एक उच्च आध्यात्मिक वातावरण तैयार हुआ कि ये जो सबकी ये जो इंडिविजुअलिटी थी गुरु भाइयों की उनकी ये इडियोसिंक्रेसिस थी उनके ये इंडिविजुअल कर्म प्रवाह थे संस्कार थे सब भूल करके वे लोग एक जमाट बांधा एक घनीभूत आध्यात्मिकता में वे लोग मर्ज हो गए। सो हम लोगों के भी यह कास्ट डिफरेंस, जेंडर डिस्क्रिमिनेशन, जियोग्राफिकल डिस्क्रिमिनेशन, लैंग्वेज डिफरेंसेस यह सब भूल करके हम सब हिंदू एक ब्रदरहुड के भाव से इकट्ठा हो। वी कैन फ्यूज आवर आइडेंटिटी टुगेदर। पेट्रियोटिज्म इतना स्ट्रांग हो। दैट इज व्हाट अग्रेसिव हिंदूइज़्म रिक्वायर्स। तो यहां पे भी कि जिस तरह से नरेंद्र ने जीसस के त्याग और तपस्या पूर्ण अपूर्व जीवन की कथा प्राण स्पर्शी भाषा में पहले से आखिर तक बोलने लगे तो वैसे ही सभी गुरु भाइयों के मन में भी यह जागृत हो गया कि किस तरह से हमको भी यह हिंदूइज़्म को इस तरह से आगे बढ़ाना है। तार पर सेंट पॉल हते आरंभ कोरिया विभिन्न त्यागी शिष्य देर क्लांत परिश्रम और आत्म विसर्जन फले की रूपे ख्रिष्ट धर्म और कृष्ण संप्रदाय प्रचारित और प्रसारित हो तहार इतिहास वर्णना करिया तनी गुरु भ्राता दिग के एक त्यागश्वर्य मंडितो प्रेरणामय नबीनो राज्य लया गलेन एवं शकले निकट साग्र आवेदन जाई लेन ताओ जेनो जीशु क्रिस्ट और तदी शिष्य वृंद न्याय पवित्र जीवन गठन पूर्वक उहा जगत कल्याण उत्सर्गो करीते पारे पूरा एक पैराग्राफ एक सेंटेंस में तो पहले तो जीसस का खुद का लाइफ है वो स्वामी जी ने बताया कि किस तरह से उनका लाइफ त्याग तपस्या से पूर्ण था किंतु दिस इज नथिंग यूनिक भारत में आप गांवगांव शहरशहर घरघर आपको त्यागी तपस्वी और साधक मिल जाएंगे। किंतु क्रिश्चियनिटी का जो यूनिकनेस है वह जीसस की क्रुसिफिकेशन के बाद में प्रारंभ होता है। क्या कहते हैं गंभीरानंद जी? जीसस के बाद में सेंट पॉल से प्रारंभ करके विभिन्न त्यागी शिष्यों के यानी जीसस के एपोस्टल के अकलांत परिश्रम और आत्मविसर्जन के परिणाम स्वरूप फल स्वरूप किस तरह क्रिश्चियनिटी और क्रिश्चियन संप्रदाय प्रचारित और प्रसारित होने लगा। उसका इतिहास वर्णना करके स्वामी जी गुरु भ्राताओं को एक त्यागश्वर्य त्याग रूपी ऐश्वर्य मंडित प्रेरणामय नवीन राज्य में ले गए और सबके सामने आग्रह पूर्वक निवेदन किया कि वे लोग भी जैसे कि वे लोग भी जीससु क्र्रास्ट और उसके शिष्य वृंद यानी जीसस और उनके एपोस्टल उनकी तरह पवित्र जीवन गठन करके जग जगत कल्याण में इस पवित्र जीवन को उत्सर्गित करें। सेंटेंस लंबा है किंतु भाव जो है उसका बड़ा सिंपल है। स्वामी जी के जीवन का यह ड्रीम था कि हिंदूइज़्म को भी जो कि आज स्टैटिक बना हुआ है। एक ट्रेडिशनलिस्ट बना हुआ है। भूतकाल में रहता है। उसमें से इसको निकाल करके एक अग्रेसिव मिशनरी रिलीजन बनाए। और अग्रेसिव मिशनरी होने के लिए हमको तो सबसे पहले अपना घर ठीक करना होगा। तो यहां पर स्वामी जी क्या कहते हैं कि शिष्यों को कहा कि तुम लोग पवित्र जीवन गठन करो और इस पवित्र जीवन को फिर गठन करके बिल्ड अप करके आपका कैरेक्टर आपकी स्पिरिचुअलिटी उसको बिल्ड अप करके देन इसको आप एक लार्जर पर्पस के लिए सैक्रिफाइस करो। तो जिस तरह से एक इंडिविजुअल को यह बात करनी है कि इंडिविजुअल को अपना कैरेक्टर फॉर्म करके उसको लार्जर पर्पस के लिए सैक्रिफाइस करना है तो वैसे ही स्वामी जी कहते हैं ना वो एक लड़का स्वामी जी के पास में साधु होने को आया तो स्वामी जी कहते हैं कि बुद्ध के पास में तो त्याग करने के लिए राज्य था। तुम्हारे पास में त्याग करने के लिए है क्या कि तुम त्याग करके साधु बनोगे। पहले तो त्याग करने के लिए कुछ अर्जन करो। उसके बाद में साधु बनो। तो यहां पे भी यह बात मैंने रांची में बहुत महसूस की। मैं सोचता था कि मैं ट्राइबल लोगों को हेल्प करूंगा। किंतु हर समय मैं अपनी ही ओर देख कर के मैं थोड़ा डर जाता था कि ऐसा मेरा कौन सा स्किल सेट है ना कि ऐसा कौन सा मेरा पर्सनालिटी स्ट्रेंथ है कि मैं इन लोगों को हेल्प कर पाऊंगा। जो कुछ भी है वह रामकृष्ण मिशन मेरे पीछे में खड़ा है। बोल करके ही तो मैं थोड़ा बहुत कर पा रहा हूं। तो प्रत्येक क्षण मुझे मेरी यह जो क्या कहेंगे कि लैक ऑफ एबिलिटी मुझे पल-पल महसूस होती थी। तो हियर आल्सो एक हमको एक संपूर्ण रूप से अपना चरित्र बनाएंगे नहीं तो फिर आप लोगों के लिए कल्याण के लिए क्या उत्सर्गित करेंगे? तो वो तो एक बात है। दूसरा कि यदि अग्रेसिव हिंदूइज़्म को फॉर्म करना है जो कि पूरे विश्व में फेल करके देश विदेश जाकर के लोगों को कहे कि हिंदू धर्म के ये योग और वेदांत रूपी यह जो उच्च आदर्श है अपने जीवन में उसको ढालिए। अपना अपने जीवन में इसको अपनाइए और जीवन को इसके अनुसार ढालिए। वो कहने से पहले तो अपना खुद का घर अपने को ठीक करना होगा। भारत में ही यह जो डिवीजन है हम लोगों के भीतर में वैमनस्य है हम एक दूसरों के प्रति उसको तो खत्म करना होगा। जितने भी जाति प्रजाति जितने भी कास्ट है जितने भी ये समाज संप्रदाय है उन सबको तो एक पेडेस्टल पे इक्वलिटी देनी होगी। तब इस तरह से अपना घर हिंदुओं को टेक करना होगा। तब तो कहीं जाकर के आप विदेश में जाकर के अपने को प्रीच करेंगे। वरना देखिए यह जितने भी अमेरिकन यूरोपियन आते हैं भारत में एक कैमरा लेकर के स्लम एरिया में जाते हैं और फिर यह जो स्लम में यह जो नंगे बच्चे घूमते रहते हैं खेलते रहते हैं कादव में कीचड़ में उनके फोटो लेकर के वो हमें वहां के बड़े-बड़े न्यूज़ पेपर में मैगजीन में आर्टिकल लिखते हैं कि हाउ डर्टी हिंदूस आर। तो फिर उसको देखकर के हमको गुस्सा भी बहुत आ जाता है कि कहां हिंदू लोगों का यह इतना सुंदर सिविलाइजेशन भव्य प्राचीन सिविलाइजेशन है। यह अपना इतना हाई फिलॉसोफिकल रिलीजन है। यह अपनी ये जो सक्सेस स्टोरीज है इसरो है वगैरह-वगैरह वो नहीं देख के स्लम में जाकर के वो नंगे बच्चों के पिक्चर लेता है और उसको प्रोपेगेट करता है। तो मैं कहता हूं कि इस तरह से वह विदेशियों पर गुस्सा करने से क्या लाभ है? आप खुद जाइए स्लम एरिया में। आप खुद जाइए बच्चों को हेल्प कीजिए। उनको यदि आप अपने खुद के पेडेस्टल पे लेकर के नहीं आएंगे तो विदेशियों को यह कहना कि भारत में आकर के पॉवर्टी जो है पॉवर्टी टूरिज्म मैं रिसेंटली एक आर्टिकल पढ़ा था। दिल्ली में यह पॉवर्टी टूरिज्म चलता है। कुछ-कुछ ये टूर गाइड होते हैं जो अमेरिकन लोग धनी अमेरिकन जो होते हैं ना धनी यूरोपियन वे लोग इस तरह के टूर गाइड का कांटेक्ट करते हैं कि हमको पॉवर्टी देखनी है। पॉवर्टी देखने के लिए ले जाओ। क्योंकि क्या है इन लोगों के पास में इतना रुपया है कि यह बड़ी से बड़ी होटल जो बुर्ज खलीफा सेवन स्टार होटल फिर यह यदि रिसोर्ट में पिकनिक करने के लिए जाना है तो स्विट्जरलैंड जाएंगे वो ये सब करेंगे सर्फिंग करेंगे हवाई जाकर के यानी कि लग्जरी का तो चरम सीमा उन्होंने देख लिया तो भारत में क्यों आएंगे तो भारत में वह पॉवर्टी देखने के लिए आएंगे तो यह पॉवर्टी टूरिज्म तो यह कुछ-कुछ टूर गाइड रहते हैं वे लोग यह अमेरिकन और यूरोपियन धन धन धनपति जो होते हैं उन लोगों को दिल्ली के स्लम में लेकर जाएंगे और यह नंगे बच्चे हैं वो गरीब है वो जो कादो कीचड़ में खेल रहे हैं वो ऐसे लोगों को जाकर के मिलाएंगे और ये ये धनी लोग भी उन लोगों के साथ में फोटो लेकर के बड़ा ही आनंद करेंगे कि हां हमने ये थर्ड वर्ल्ड में जाकर के ये नेटिव किस तरह से रहते हैं वो देखा अभी ये मैंने जब पढ़ा मुझे बड़ा गुस्सा आ गया मैंने कहा यह क्या है नाटक चल रहा है किंतु फिर देखिए गुस्सा ही करना है तो मैं थोड़ी ना वो टूर गाइड पे गुस्सा करूंगा। थोड़ी ना वो जो अमेरिकन यूरोपियन आते हैं पॉवर्टी टूरिज्म करने के लिए उन पे गुस्सा करूंगा। मुझे तो गुस्सा अपने पे करना चाहिए। अपने देश बांधवों पर करना चाहिए कि इन लोगों को हेल्प नहीं करके हम लोग अपना एक बंद कमरे में जैसे कि एक छोटा सा एक कम्युनिटी हमने बना लिया है इंसुलर कम्युनिटी उसमें रह रहे हैं और अपने ही ये भाई बहनों की ये जो पुकार है उनकी ये जो कष्ट की आवाज है वो नहीं सुन पा रहे हैं। सो ये पहले तो हमको अपना घर ठीक करना है और उसके बाद में हिंदूइज़्म को अग्रेसिव मिशनरी हिंदूइज़्म बनाना है। सो दिस इज म वन ऑफ दिस टर्निंग पॉइंट इन रामकृष्ण मिशन। इसके बाद में भी है इस घटना में काफी कुछ तो जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।
प्रश्न: ISKCON अपने प्रचार में बहुत aggressive है, पर हम रामकृष्ण मिशन अब तक इतने aggressive नहीं हुए हैं। हम अपने ही विद्यालयों में ठाकुर, माँ और स्वामीजी के जीवन और उपदेशों की शिक्षा भी नहीं देते। हमारी सेवा-गतिविधियाँ अत्यंत व्यापक और उत्कृष्ट हैं, फिर भी हमारे भक्तों की संख्या बहुत अधिक नहीं है।
ये बिल्कुल जय मां ये बिल्कुल वैलिड ऑब्जरवेशन है। देखिए कि रामकृष्ण मिशन भी ऐसा ही था। आप बाबूराम महाराज की कहानियां पढ़िए ना एक रेमिनेशनंस है। कुछ लड़के वहां कोलकाता से निकले। सोचा कि चलो आज बेलूर मठ जाते हैं। तो गंगा तैर करके अभी गंगा शायद बेलूर मठ के सामने देखी होंगी। एटलीस्ट 2 कि.मी. और बड़ा रैपिड उसका फ्लो है। किंतु ये सब यंग लड़के हैं ना गंगा तैर करके बेलूर मठ में आए। अभी आके देखा कि दोपहर हो गई है। खाना सब समाप्त हो गया है। सब लोग दोपहर को विश्राम करने के लिए चले गए हैं। अभी ये लोग गंगा तैर के आए हैं। यानी जो परिश्रम हुआ होगा यंग लड़के हैं। भूख तो लगी है। तो जाकर के बाबूराम महाराज को प्रणाम किया। बाबूराम महाराज ने पूछा देखकर के ही भीगे कपड़े देखकर के कि कैसे आए? तो बोला गंगा तैर करके सामने वाले बैंक से गंगा तैर के आए तो बाबूराम महाराज इंस्टेंटली समझ गए यंग है गंगा तेरी है 2 किलोमीटर का तो भूखे होंगे अभी क्या है वो रसोइया जो था वो चला गया है विश्राम करने के लिए बाबूराम महाराज ने अपने से किचन में गए अपने से ये जो सब ये चावल वगैरह दाल इकट्ठा किया अपने हाथों से खिचड़ी बनाई और खिचड़ी अपने हाथों से इनको खिलाई और यह लड़के बड़े खुश होकर के चले गए। अब यह लड़कों का आगे पीछे और कुछ नहीं है कि ऐसा नहीं कि उसमें से बाद में कोई साधु हो गया ना कि ऐसा हो गया कि उनको लगा होगा बाबूराम महाराज को कि भविष्य में यहां पे जॉइ करने को आएगा। नथिंग ये बस इतना ही उनका ये रेमिनेशंस किंतु ये लोग कहते हैं कि यह हम लोग अपने सात जन्म में नहीं भूलेंगे। इस तरह का जो प्रेम था। सो दैट वाज़ इन रामकृष्ण मिशन था ही था। अभी आजकल का जैसे आप लोग कह रहे हैं ना कि हम लोग इतना एक्टिवली डिवोटी को अट्रैक्ट करना नहीं करते हैं। तो देखिए मैं अपनी ही बात बताता हूं। एक तो म मेरे जैसे जो है साधु यंग साधु हम लोगों को एक डर लगता है कि डिवोटियों के साथ में ज्यादा बात करने को जाएंगे तो एक क्या है ना कि फिसलन वाला रास्ता है। कहीं एक माया में फंस गए तो फिर क्या है कि एक दूसरा झमेला खड़ा हो जाएगा। उससे बेटर है कि एक मॉडरेट लेवल का इंटरेक्शन जहां पर रखना चाहिए जितना उतना रखो। काम के लिए रिलेटेड इंटरेक्शन रखो और बाकी का भक्तों को कहो कि जाइए अभी ठाकुर के पास में जाइए मंदिर में जाकर बैठिए। हम लोग इतना एक्टिवली लोगों को एंगेज नहीं करते हैं। और दूसरा माने ये भय सदा एक हमेशा हमारे मन में रहता है। तो जैसे मानव भाई ने कहा बिल्कुल ठीक कहा कि ये साधुओं के मन में यह कंफ्लिक्ट है। एक और है कि ये ठाकुर कहते हैं कि त्याग तपस्या भक्तों के साथ में ज्यादा मिलनाजुलना नहीं। एकांत में रहना है, जप ध्यान करना है। वगैरह-वगैरह एक एक इनर लाइफ है जो कि ठाकुर हमको समझाते हैं। दूसरा यह स्वामी जी बाबूराम महाराज, अखंडानंद जी, शशि महाराज जो एक भव्य ट्रेडिशन है रामकृष्ण संघ की कि भक्तों के साथ में दरिद्र नारायण के साथ में इंटरेक्शन करने की, उनकी सेवा करने की वो है। सो दैट कन्फ्लिक्ट ऑलवेज कम्स। और देखिए कि मैं तो कहता हूं कि दिस इज़ अ ब्यूटी ऑफ़ रामकृष्ण मिशन। रेदर देन अ लायबिलिटी। दिस इज़ एन एसेट ऑफ़ रामकृष्ण मिशन। यदि आप इस कन्फ्लिक्ट को ट्रांसेंट कर गए ना तो आप साधु लाइफ तैर जाएंगे। ये मैंने हमेशा देखा है कि क्फ्लिक्ट जैसे ही आएंगे ये चैलेंज जैसे ही आएंगी वैसे ही यू विल स्टेप अप टू फेस द चैलेंज। अभी चैलेंज ही नहीं है। आपका एक वन डायरेक्शन फिलॉसोफी है कि हां चलो लोगों को कैसे भी करके पकड़ के ले आना है। नंबर्स बढ़ाने हैं। देयर आर नो अदर कन्फ्लिक्ट। तो होगा क्या पता है कि चैलेंज है नहीं। वन डायरेक्शन में आप जा रहे हैं। परहप्स यू माइट नॉट इतना स्पिरिचुअली शायद आप इवॉल्व नहीं होंगे। तो यह मेरा एक पर्सनल मानना है कि दूसरा कि देखिए कि रामकृष्ण साहित्य को पढ़कर के कंफ्यूजन होता है वो तो जगजाहिर है और इसीलिए मैं अपने क्लास में कहता हूं कि अपने को एक फ्रेमवर्क तैयार करके देखना है कि ठाकुर का जो भी उपदेश है दैट इज मच मोर रिलेवेंट टू स्पिरिचुअल इंडिविजुअल स्पिरिचुअल लाइफ। मां का जो उपदेश है, जीवन है वह कम्युनिटी लाइफ रिलेटेड है और स्वामी जी का जो है दैट इज रिलेटेड टू सिविलाइजेशनल स्केल। तो इस तरह से हमको फ्रेमवर्क बना करके एक दूसरे को एक दूसरे के साथ में फिट करना है। यह जो आप बोल रहे हैं ना कि देखिए मैंने भी इस बात को थोड़ा सा ध्यान दिया है। मुझे ऐसा लग रहा है ना स्वामी जी ने जब रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। अब ओरिजिनली जो रामकृष्ण मोनेस्टिक ऑर्डर है उसकी स्थापना करने के समय तो वह मोनेस्टिक ऑर्डर ही था। नेसेसरीली वो मोनेस्टिक ही उसमें पार्टिसिपेट कर पाएंगे गवर्नेंस वगैरह में। किंतु रामकृष्ण मिशन इज सच अ बॉडी कि वहां पर गृहस्थ और सन्यासी दोनों उसमें पार्टिसिपेट कर सकते हैं। आज भी आप रामकृष्ण मिशन की ये एनुअल मीटिंग होती है। बहुत सारे डिवोटीज जो कि मिशन में पार्टी मेंबर हैं वे लोग जाते हैं। मीटिंग अटेंड करते हैं। तो यह क्या है? इवन विद इन क्रिश्चियनिटी आल्सो कि यह हाउसहोल्डर और क्लर्जी एंड हाउसहोल्डर्स यह दोनों एक साथ में उन्होंने इन अ टेंडम वे लोग आगे बढ़े हैं। हम लोगों के यहां पे क्या है कि सन्यासी और गृहस्थ इनके बीच में एक तरह का एक हारमोनियस एक कोऑर्डिनेशन होना चाहिए। ऐसा शायद मुझे नहीं दिख रहा है। या तो फिर ओवर लास्ट फ्यू इयर्स फ्यू डिकेड्स पिछले 20 30 साल में थोड़ा सा कम हो गया है। स्टार्टिंग में अच्छा था अभी शायद इतना नहीं है। देखिए ये एक रेवोल्यूशनरी आईडिया
हम संन्यासियों के पास सेवा-कार्य का एक सुसंगठित ढाँचा है; अब गृहस्थ भक्तों को भी उसी प्रकार संगठित होकर सेवा करने की आवश्यकता है
था कि बहुत सारे यंग लड़के यहां पे आते हैं साधु नहीं हो पाते। तो किंतु फिर भी वे लोग त्याग तपस्या के रास्ते पर चलना चाहते सेवा के रास्ते पे। तो क्यों नहीं वे लोग बाहर से सन्यास ले। वो वो बाहर से सन्यास लेने में कोई एज लिमिट वगैरह नहीं रहेगा और उन लोगों का एक सेकंड ऑर्डर एस्टैब्लिश करें। सो इसको लेकर के काफी म [हंसी] आर्गुममेंट भी बहुत हुआ था। काउंटर आर्गुमेंट भी बहुत हुआ था। तो मुझे नहीं लगता कि ये आईडिया ज्यादा सक्सेसफुल रहेगा। मेरी दृष्टि से ये जो हाउसहोल्डर जो है ना उन लोगों का एक यह संघ जैसा होना चाहिए। अपार्ट फ्रॉम यह रामकृष्ण मिशन जो कि एक फॉर्मल ऑर्गेनाइजेशन है क्योंकि बहुत सारे डिवोटी वॉलंटियर यहां पर काम करने को भी आएंगे ना उन लोगों को वो फ्रीडम नहीं मिलता क्योंकि नेसेसरीली साधु लोगों का यहां पे एक मोनोपोली जैसा है। अभी आपको कहेंगे कि इस तरह से काम करना है तो आपका ईगो बड़ा कंट्रोल में रहना चाहिए। अब जैसे बकुलेश भाई की बात कर रहे हैं ना बकुलेश भाई को शायद आपने देखा होगा। मैंने तो देखा है काफी नजदीक से कि साधुओं के साथ में बात करेंगे ना एकदम विनम्रता पूर्वक कहेंगे। यह साधु एक साधु एक बात करेगा दूसरे साधु दूसरी बात करेगा दोनों में हां हां महाराज जो आप कह रहे हैं ठीक है इवन एक साधु दो बार दो अपोजिट बातें करेगा तो उसमें भी हां महाराज जैसा आप कहे वैसा ही करेंगे सो अपने को एक ढाल देने की कैपेसिटी है बोलकर के वो साधुओं के साथ काम कर पाते हैं किंतु सबका ऐसा नहीं होता वो वे लोग साधुओं में डिफेक्ट खोजना शुरू करेंगे साधुओं में कंट्राडिक्शन खोजना शुरू करेंगे तो साधु लोग नाराज हो जाएंगे बोला यार तुम हाउसहोल्डर हो और हमको उपदेश दे रहे हो सो बेटर है कि कि एक पैरेलल ट्रैक जैसा उन लोगों के लिए एक सिस्टम बने वेयर वे लोग अपनी एनर्जी को डाल के कुछ लोक माने रामकृष्ण भावधारा का प्रचार प्रसार का कार्य करें। सो एक सेकंड पैरेलल ट्रैक इज नेसेसरी। दिस इज व्हाट चर्च हैज़ मास्टर्ड। और हम लोगों का अभी ऐसा हो गया है कि एक्सक्लूसिवली मोनेस्टिसिज्म की ओर जा रहा है। अभी मोनेस्टिक बाय नेसेसरीली इट विल बी फ्यू इन नंबर। आप साधुओं की संख्या बढ़ाएंगे ना तो बड़ा भयानक है। मतलब एलिजिबिलिटी के बिना साधु हो जाना फिर अपने भी तकलीफ में जाएंगे। संघ को भी बदनाम करेंगे। ऑलवेज बेटर कि यह जो मिडिल लेवल पे आते हैं कि संसार में अभी वे लोग एक लेवल पे आ गए हैं। चलो अपना फैमिली लाइफ सेटल हो गया है। फाइनेंशियली मोर और लेस सिक्योर है। नाउ आई वांट टू गिव समथिंग कंट्रीब्यूट समथिंग। सो ऐसे बहुत सारे लोग हैं। सो व्हाई नॉट टू हैव अ फ्रेमवर्क फॉर देम इन अ सिस्टमेटिक मैनर दे कैन कंट्रीब्यूट समथिंग। अदरवाइज आप आश्रम में जाकर बैठेंगे तो वहां पर महाराज बैठे उनके सामने आपको बैठे रहना है। महाराज जैसा बोलेंगे ऐसा करो तो ऐसा करना है। ऐसा करो तो ऐसा करना है। और इवन अब जैसे राजकोट में वो डिस्पेंसरी है तो डिस्पेंसरी में एक दो वॉलंटियर बैठे रहते हैं। तो बेसिकली उनको वही करना है जो डिस्पेंसरी इंचार्ज कहते हैं। या तो फिर एक पर्टिकुलर रूटीन टास्क ही करना है। उससे आगे पीछे और कुछ सोचना नहीं है। सो उनकी एनर्जी प्रॉपर वो यह नहीं होती। मैनिफेस्ट नहीं होती। सो दिस इज व्हाट आई बिलीव। देखिए मैं भी एक फनी इंसिडेंट बताता हूं। यहां पे वो पापाल एंबेसडर आया था ना मैंने बताया था बीच में मैं गया था उसको मिलने के लिए मीटिंग जैसा रखा था तो वेटिकन का एंबेसडर अभी क्या है उसके साथ में तो ऐसा कुछ मतलब इंटरेस्टिंग कुछ नहीं मतलब वो था किंतु अदर देन दैट मैंने ये उन लोगों का स्ट्रक्चर देखा बहुत सारे लोग डेलीगेट्स आए हुए थे चर्च के आसपास के और आंध्र प्रदेश ये कन्वर्शन में गढ़ है यह मतलब यह रांची केरल आंध्र प्रदेश ये ट्राइबल एरिया में भयानक कन्वर्ज़ होता है तो कहां-कहां से यह सब डेलीगेट आए हैं। तो मैं पूछ रहा हूं सब लोग सफेद बफेद कपड़े पहन के वह यह बांधते हैं ना वह गले में क्रॉस पहन के ऐसा करके तो मैं पूछता हूं आर यू ए मोनेस्टिक क्लर्जी यानी कि अनमैरिड ऐसा रह के बोला नहीं हम तो हाउसहोल्डर है। ये तो यहां पे आए बोल के ये सफेद कपड़े पहन लिया है। तो मैंने कहा अच्छा तो काम क्या करते हैं? बोलते हैं कि मुझे यह एरिया दे दिया है। वहां पे मुझे यह प्रचार प्रसार करना है। और मेरा जीवन का एंबिशन क्या है? वहां पे एक चर्च खड़ा हो। जहां पर चर्च है वहां पे तो और भी आगे बढ़ना है। किंतु जहां पर चर्च नहीं है वहां पे मुझे चर्च बनाना है। लोगों को अट्रैक्ट करना है। ये मेरा लाइफ का मिशन है। मैं मेरी मीटिंग करता हूं। संडे मास होता है तो 10 लोग आते हैं। व्हिच इज वेरी गुड। पहले कोई नहीं आता था। अभी मैं 20 तक ले जाऊंगा। 30 तक ले जाऊंगा। उसके बाद में फॉर्मल चर्च खड़ा करेंगे। मैंने कहा वेरी गुड। ये आदमी है। एक लड़का ही है। यंग लड़का है। ऐसा नहीं है कि इज अ फॉर्मल क्लर्जी ऑफ कैथोलिक चर्च। वैसे ही हाउसहोल्डर ही है। किंतु वो एरिया का एंपावरमेंट उसको दे दिया है। तो अब ये लोग जो फॉर्मल क्लर्जी जो है वे लोग कहां जा पाएंगे? वो तो लिमिटेड रहेगा ना उनका रीच और ऐसे लोग भी तो कम बनेंगे ना पूरा लाइफ अनमैरिड रहना है। कितने लोग रह पाएंगे इस तरह से डिसिप्लिन में तो नेसेसरीली फ्यू इन नंबर। किंतु डेलीगेट इतने सारे थे। सब लोग एक-एक एरिया को रिप्रेजेंट कर रहे हैं। सब लोग उस एरिया में उनका प्रचार प्रसार का काम चल रहा है। तो यह देखकर के मैं आश्रम में आया और आश्रम में आकर के दूसरे ही दिन यहां का जो एक वर्कर है उसके साथ में मैं बात कर रहा था। तो वो वर्कर मुझे बता रहा है महाराज आपको पता है यहां पे वो एक डिवोटी आता था। एक लड़का पता है वो अभी क्या कर रहा है? मैंने बोला क्या कर रहा है? बोला वह वहां पर जाकर के ठाकुर के नाम पर लेक्चर दे रहा है। देखिए कितना बड़ा गलत काम कर रहा है। साधुओं को लेक्चर देना चाहिए ना कि वो लड़का जाकर ठाकुर का नाम क्या लेक्चर दे रहा है। [हंसी] माने इन लोगों को इतना शौक लग गया था कि एक हाउसहल्डर लड़का जाकर के लेक्चर दे। लेक्चर तो साधु ही देंगे। गृहस्थ लोग वॉलंटियर को कभी लेक्चर देते देखा है? [हंसी] देखिए मैं गारंटी पूर्वक कह सकता हूं आज हमारा आश्रम यहां का मैं सिर्फ इसी आश्रम की बात करूं कि हम ऐसा कहे कि आप एक-एक एरिया ले लीजिए उस एरिया में आपको प्रचार प्रसार करना है। संध्या आरती करनी है, संध्या पूजा करनी है, प्रेयर सेशन करना है और यथासंभव सेवा कार्य करना है। मुझे नहीं लगता कि 50 से कम लोग मिल जाएंगे हमको। म इतने लोग मुझे आराम से मिल जाएंगे। ऐसा मेरा विश्वास है। सिर्फ मैं इसी सेंटर की बात कर रहा हूं। कंपेयर टू दैट अभी होता क्या है? हम पांच साधु हैं। पांचों साधु में से कोई भी आश्रम छोड़कर कहीं नहीं जाता। पांचों पांच पूरा टाइम आश्रम में ही रहते हैं। आश्रम के 10 मिनट आप बाहर जाकर किसी को पूछेंगे कि रामकृष्ण मिशन क्या है? तो आपके सामने देखेगा वो क्या रामकृष्ण मिशन?
प्रश्न: प्रचार हमारे समग्र दृष्टिकोण का आवश्यक स्तंभ होना चाहिए। भारत की सबसे गंभीर भूल द्वैतवाद को मान्यता देना थी।
देखिए मैं तो कहता हूं कि हम लोग इस तरह के फिलॉसोफिकल रैबिट होल में मत ना भी जाए फिलॉसोफिकल ब्लैक होल में ना भी जाए और एक सिंपल यदि एक ऑर्गेनाइजेशनल एक डिसीजन मेकिंग करें कि भाई यह वॉलंटियर है डिवोटीज है उनका भी कुछ कंट्रीब्यूशन करने की इच्छा है। सो गिव देम ए सिस्टमेटिक फ्रेमवर्क इन विद इन व्हिच दे कैन कंट्रीब्यूट समथिंग एंड दे विल फील म विल फील सेटिस्फाइड म कृतार्थ हो जाएंगे कि हां भाई हमने भी कुछ किया है। स्वामी जी का जो आदेश है शिव ज्ञान जीव सेवा वो भी मैंने थोड़ा सा किया और ठाकुर की बातें करना है ना। अब जैसे कि देखिए मैं रांची में सेम थिंग आपने कहा ना कि नॉर्थ ईस्ट में कि हम लोग ठाकुर का भी नाम नहीं लेते अपनी स्कूलों में सेम चीज मैंने रांची में देखा। अपनी रात्रि पाठशाला है नाइट स्कूल तो वहां पे वही बस सेकुलर एजुकेशन ही चलता है। मैंने जाकर के कहा कि देखो कथामृत का थोड़ा सा पाठ करो। यह स्वदेश मंत्र है। सबको मुखस्थ कराओ। ये अपने जो सामान जो जो इजी भजन है राम कृष्ण शरणम वो सब स्टार्ट कराओ। क्यों हम नहीं करेंगे? उसमें कौन सा हमको यह डर थोड़ी ना है कि मैं संघ गुरु बनकर के दीक्षा दे रहा हूं। वो डर छोड़ दीजिए। आपको उनको रामकृष्ण शरणम सिखाना है। आप थोड़ी ना गुरु बन गए हैं। आपको उनको स्वदेश मंत्र सिखाना है। कौन सा आपको डर लग गया है कि नहीं मेरी आध्यात्मिकता चली जाएगी। मैं गुरु के पद पर बैठ जाऊंगा तो मेरे में घमंड आ जाएगा। राम कृष्ण शरणम सिखाने में कौन सा बड़ा यह है? सो एक डर छोड़कर के यह जो बेसिक अपने अपने संग में जस्ट सी दिस स्पिरिचुअल वेल्थ कितना है? अपने भजन ट्रेडिशन अपने भजन के ट्रेडिशन यह आगमनी गीत श्यामा संगीत ठाकुर मां स्वामी जी के गीत यह स्पिरिच यह संस्कृत स्तोत्र माने सच अ वेल्थ वी हैव गॉट ये योग है वेदांत है कथामृत का पाठ है ये सब मेडिटेशन की सामान्य टेक्निक्स है सच अ वेल्थ वी हैव गॉट उसका आप कीजिए ना प्रचार प्रसार आपको कौन रोकता है आप कुछ लड़कों को तैयार कर दीजिए गृहस्थों को तैयार कर दीजिए जाइए आप इस इस एरिया में जाइए आप काम कीजिए हम लोग आपके बैकअप में खड़े है जो भी आपको फ्रेमवर्क चाहिए हम लोग इंस्टीट्यूशनल फ्रेमवर्क प्रोवाइड करने को तैयार हैं। सो अरे कितना काम होगा? तो सबसे बड़ा क्या है
प्रश्न: आपका कहना सही है — अनेक स्वयंसेवक तत्पर हैं, किंतु मिशन का मार्गदर्शन और सहयोग हम सबके लिए अत्यावश्यक है।
कि उनको फ्रीडम देना है। देखिए प्रभानंद जी का एक था विवेकानंद सर्विस कोर। उनको स्टार्ट करना था तो मैं राजकोट में था उस समय। तो अनंत महाराज थे तो उन्होंने एक दो वॉलंटियर को पकड़ा। बोला कि आप लोग सर्विस कोर स्टार्ट कीजिए। तो अभी यह वालंटियर भी कैसे हैं? उनको साधु संग करने की बड़ी इच्छा है। तो वे लोग ऐसे चार 101 लड़कों को इकट्ठा किए कुछ-कुछ ड्रिल वगैरह करवाते थे। वो एनएसएस टाइप का ड्रिल करवाते थे और फिर पूरा टाइम आश्रम में बैठे रहते थे। मौका खोजते रहते थे। कौन कब कौन साधु को पकड़ करके उसके साथ में गप लगाना शुरू करें। और माने कोई इंडिपेंडेंट थिंकिंग नहीं कि च और फोटो खींचवाने के लिए कभी एक बार स्लम में ले जाएंगे। वहां पर बच्चों के साथ में वो नोटबुक, टेक्स्ट बुक हाथ में लेकर फोटो खींच लेंगे। मैंने जब पहली बार फोटो देखे मैं बड़ा इंप्रेस हो गया। मैंने बोला कि आप सप्ताह में कितना घंटा आप वहां पर जाते हैं? बोला एक ही बार गए अभी तक फोटो खिंचवाने के लिए। [हंसी] बाकी पूरा टाइम आश्रम में ही बैठे रहते हैं। आश्रम में का क्या काम करना है? मंदिर क्लीन करना है, किचन में काम है, साधुओं की सेवा करनी है। उसके लिए हम तैयार हैं। मैंने कहा भाई मंदिर क्लीन करने के लिए, किचन में काम करने के लिए, साधुओं की सेवा करने के लिए दूसरे 10 लोग बैठे हैं। यह विवेकानंद सर्विस कोर का आईडिया वही है कि आप लोग बाहर जाकर गरीब लोगों के लिए कुछ करें या तो नीडी लोगों के लिए कुछ करें। किंतु माइंडसेट एटा ऐसा बैठ गया है। साधु लोग भी उनको छोड़ना नहीं चाहते कि लोग बाहर जाकर काम करें और उन लोगों के भीतर में डर है कि हम लोगों को गुरु नहीं बन जाना है। जैसे हम आश्रम में ही बैठे रहेंगे। ओम