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ओम स्थापा का यॉट धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप ने अवतार रामकृष्ण अति ना एम स्वामी अखंडानंद जी की स्मृति कथा इस किताब में से हम थोड़ा सा पाठ आगे भी किया हैं अभी भी करेंगे इसके आगे हमने देखा की किस तरह से ठाकुर अखंडानंद जी महाराज को कहते हैं की तुम जाकर के कोलकाता में जो शिमला एरिया है सिमुलिया जो विस्तार है वहां पर नरेंद्र राहत है नरेंद्र से जाकर के मिलन और ठाकुर फिर नरेंद्र के बड़े में क्या कहते हैं पहले तो खाद्य खाद्य का जो विचार था अखंडानंद जी का की भविष्यवाणी करके खाना है फिर जो मछली वगैरा है जो मां काली का प्रसाद है नहीं खाना है यह जो उनका एक खुद का एक निष्ठा और आचरण पूर्वक अखंडानंद जी जी तरह से र रहे थे तो इस के कांटेक्ट में ठाकुर कहते हैं की देखो नरेंद्र खाता है जो मिलता है वही वो खाता है किंतु कोलकाता के पहले से जब जाता है तब वो मकान है एन की घड़ी मनुष्य है जो रास्ते पे चल रहा है वह सबके दी उसके ऊपर में उसका थोड़ा सा भी मां नहीं होता मां राहत है सब समय अंतर्मुखी तो इस तरह से ठाकुर ने नरेन को मिलने को अखंडानंद जी को कहा अखंडानंद जी मिलने के लिए गए देखा की नरेंद्र अपना जो मकान है अपना जो घर है उसके बाहर वाले एक कमरे में बैठा था देखा उसे कमरे में ना ही तो ठीक से सफाई हुई है और जी बिस्तर पर बैठा था वो बिस्तर भी इतना गंदा है शायद धोया भी नहीं होगा उसकी चादर वगैरा कपड़े भी ऐसे पहने हुए हैं सब तरह इस तरह से रखा है जैसे की किस तरह के आदमी र रहा है जिसको नहीं साफ सफाई की कोई चिंता है ना ही उसको ठीक से कपड़े पहने की कोई चिंता और एक बहुत बड़ी किताब पढ़ करके बुद्ध गया के ऊपर समय वह पढ़ रहे थे किंतु देखा की उनकी आंखों का भाव और अंतरमन की स्थिति यह तो अखंडानंद जी के तो जन्म जन्मांतर के संस्कार थे ना तो दूसरे सड़क किया तो दूसरे सिद्ध पुरुष को देखकर के वो तो इम्मीडिएटली समझ जाएंगे की मैं किसे मिल रहा हूं तो इम्मीडिएटली जाकर के वो नरेंद्र के साथ में बात करना शुरू किया और इतने प्रभावित हुए दक्षिणेश्वर में आकर के ठाकुर को कहा की हां मैं नरेंद्र से मिला था और सही में नरेंद्र का व्यक्तित्व नरेन की उदारता नरेंद्र इतना स्नेहा और प्रेम से इनके साथ बात किया की अखंडानंद जी महाराज पूरे ही उनके वशीभूत हो गए वशीभूत कोई नेगेटिव अर्थ में नहीं किंतु प्रेम का जो बंधन होता है स्नेहा का बंधन होता है उसमें वे लोग बंदे गए थे ठाकुर इस तरह से अपने जितने भी अंतरंग शिष्य थे जो भी उनका यह जो वर्ल्ड वाइड मिशन जो है उसको जो भविष्य में आगे चलने वाले थे उन सबको इस तरह से के एक सूत्र में ठाकुर बंद देते थे और अभी जैसे देखिए की कोई-कोई लोग अभी जैसा खदानानंद जी समझ गए की हां नरेंद्र के वस्त्र के ऊपर में बकाया दिखाव के ऊपर में वैसे कोई उसकी ये कोई नजर नहीं है किंतु उसके भीतर में कैसी बात है अभी यही चीज जो की मूड माटी आदमी जो होता है जो तामसिक आदमी होता है ये बाहर की चीज नहीं समझ पाएगा देखा एक बहुत सुंदर उदाहरण है गिरीश घोष के वहां पे एक बार स्वामी जी बैठे हुए थे अभी ये कौन से समय की बात है ठाकुर के शरीर के जान के बाद की बातें ठाकुर ने 186 अगस्त महीने में महासमाधि प्राप्त की थी महासम्मती ग्रहण की थी उसके बाद में यह गुरु भाई जो थे सब वहां वराह नगर मठ में र रहे थे अपना एक मठ बना करके किंतु देखा की वर्णन अगर मठ में नहीं वो पहने के कपड़े ठीक से हैं ना ही इनको कोई स्नान करने की नियमित रूप से या तो फिर नियमित रूप से अपने यह देख अब जो है उसको ठीक रखना की कोई इच्छा कपड़े भी है की नहीं पहने को एक ही जोड़ी कपड़ा राहत था जब बाहर में जो जाएंगे वो पहन लेंगे और बाकी जो सब मठ में जो रहेंगे वो सब को ओपन पहन के चलाएंगे इस तरह की बात थी वह नगर मटकी तो अभी नरेंद्र ने भी पता नहीं कितने दोनों से स्नान नहीं किया था शरीर के ऊपर में मिट्टी का एक पूरा स्टार जो है वो बन गया था बाल भी कितने दोनों से वो बड़े हो गए थे वो जाता हो गई थी बाल जब पाक जाए जैसे बालों में धूल मिट्टी ग जान से और बालों को ठीक से संभल नहीं रखना से किस तरह से जाता बन जाति है उसे तरह से जाता जट धारी बाल हो गए थे और ऐसे ही अवस्था में वो गिरीश खोज के वहां पर जाकर के गिरीश के साथ में गैप लगा रहे थे तो अभी देखिए की गिरीश भी तो ठाकुर का शिष्य है गिरीश को भी पता है की नरेंद्र जो है वो इस तरह के वो त्याग के भाव में है किंतु उसके भीतर में तो सोना पड़ा है तो भी हॉस्टी वह कोई चिंता किया बिना उसका दिखाव कैसा है की इसको देख करके हो सकता है बच्चे लोग डर जाए लेकिन तू जो भी है बहिया देखा हूं की चिंता किया बिना गिरीश भी उनके साथ में गैप लगा रहा था अभी इस समय एक आदमी वहां पे आया और अभी जैसे होता है ना तामसिक लोगों का की किसी के किसी के साथ बात क्यों करेंगे किसी बड़े घर बड़े आदमी के घर क्यों जाएंगे उनको लगेगा की हां मैं मुझे कुछ फायदा होगा या तो फिर मैं अपना कुछ कम इन लोगों से निकलवा लूंगा तो गिरीश का भी तो एक थिएटर था तो थिएटर के बालों के साथ में बात करना हो सकता है की थोड़ा बहुत कम निकाल जाए इन लोगों का भी तो कांटेक्ट राहत है ना गिरीश का भी कांटेक्ट था नेटवर्क था तो ऐसे सोशल नेटवर्क होते हैं तो गिरीश के पास में जाकर के यह जो आदमी था कोई मामलादार ना की ऐसा कुछ था अभी वो एग्जैक्ट में भूल गया कोई इस तरह से कोई जैसे एजेंट जो बोलते हैं ना बंगाली शब्द है इसके लिए मैं भूल गया तो ऐसा कोई एजेंट था वो जाकर के वो गिरीश साथ में इस तरह से बात कर रहा है जैसे की वह कोई बहुत बड़ा आदमी है और दूसरे के साथ में पूर्वक जैसे इस तरह के लोग जिसका की अपना अहंकार अपना घमंड अपनी क्या कहेंगे की अपनी पोजीशन और अपनी सत्ता का और अपने पावर का जो घमंड होता है तो दूसरों के साथ किस तरह से तुच्छतापूर्वक बात करते हैं तो इस तरह से बात करने लगा तो अभी सामने देखा की वो नरेंद्र बैठा है वो भी जमीन पे बैठा था वो भी उसका देखा होगी इस तरह से की भिखारी भी बेचारा उससे डर जाए इस तरह का देखा उसका बाकी उसका मतलब वेशभूषा जटाधारी बल्कि बिना धूल मिट्टी लगा है पूरे शरीर में तो अभी देख कर के इस तरह से वो नरेंद्र के साथ में वो मतलब वो नरेंद्र के प्रति इस तरह का एक अनुभव दिखाने लगा की जैसे नरेंद्र जो है वो उसका कोई मतलब बिल्कुल भिखारी है और भिखारी को कैसे टच करके पुकारते हैं या बात करते हैं तो इस में नरेंद्र सुद्दनली कुछ दो तीन शब्द अंग्रेजी के क्या कहते हैं है वह एकदम ब्लू डर गया की अरे मतलब ऐसे लोग पता है ना की जिसको थोड़ी सी विद्या बुद्धि देखकर के वो बड़े ही आश्चर्य चकित हो जाते हैं या इंप्रेस हो जाते हैं जो सात्विक मनोभाव वाले होते हैं इनके साथ में ऐसा नहीं होता किंतु कोई-कोई लोग होते हैं जो की विद्या बुद्धि से बड़े ही मतलब इंप्रेस हो जाते हैं तो नरेंद्र ने दो बात ऐसी क्या की थी वो बेचारे एकदम डर का मारा यह हो गया तो देखिए अभी वो बाकी है देखा उसे वो उसकी नरेन थी वो कीमत करता है पता नहीं की उसके हृदय के भीतर में क्या है क्योंकि वो तामसिक आदमी था और अखंडानंद जी शुद्ध सात्विक बाल ब्रह्मचारी जैसे ही नरेंद्र को देखा भले ही चाहे कपड़े गंदे पहने हैं भले ही चाहे जी कमरे में नरेंद्र बैठा है उसमें झाड़ू पूछा भी नहीं लगाया गया कितना धूल मिट्टी पड़ा हुआ है किंतु फिर भी उनके हृदय में जो है अखंडानंद जी ने इनीशिएटली देख लिया समझ लिया की नरेंद्र क्या है तो इस तरह से हम यदि दूसरे आदमी को कैसे पहचानते हैं दूसरे आदमी की क्या कीमत करते हैं डेड डिपेंड्स की हमारी खुद की स्थिति क्या है आईटी डिपेंड्स की हम खुद किस आध्यात्मिक लेवल पर खड़े हैं इसीलिए बहुत लोग जो है इस तरह से आध्यात्मिक लोगों को नहीं पहचान पाते जिससे जीसस को जैसे उनके खुद के जो समाज के लोग जो थे उनकी खुद के वो जो लोग थे यहूदी लोग यहूदी के वो धर्म गुरु थे उन्होंने ही जाकर के वो रोमन जो गवर्नर था उसको कंप्लेंट किया की जीसस जो है वो उल्टे-उल्टी बातें कर रहा है तो उसको पकड़ करके जय में दाल दो इसको कुर्सी फी कर दो तो अभी जिससे उसकी महत्व जो है वो किसने पहचानी वो मछुआरा था ना की कोई इस तरह से कोई निम्न जाति का था निम्न जाति तो खैर वहां पे नहीं थी किंतु ऐसे लोग वो जी तरह का कम करते हैं जिसको की समाज में उत्कृता की दृष्टि से देखा जाता है ऐसे लोगों ने जीसस को पहचाना किंतु यह जो बड़े-बड़े धर्म गुरु थे वो जीसस को नहीं पहचान पे पूरे भारतवर्ष में जब इस हालांकि वहां के बड़े में और अपने भारत के बड़े में यह डिफरेंस है की यदि हम लोग जड़ी किसी बड़े धर्म कोई आध्यात्मिक व्यक्ति है या तो कोई आध्यात्मिक एक प्राण है जिसका उसको यदि हम नहीं पहचान पाएंगे तो उसके साथ में तुच्छतापूर्ण बात करके हम लोग छोड़ देंगे इससे ज्यादा हम नहीं जाएंगे किंतु वहां पे जो है वेस्ट में कहो ना की भारत के बाहर में यदि ऐसा लगेगा की हम किसी के प्रति तुच्छकर का भाव है तो सिर्फ उसकी निंदा करके या तो सिर्फ उसकी अपमान करके अवहेलना करके नहीं रुक जाएंगे उसको फिर जय में भी डालेंगे टी भी करेंगे क्रुिफाई भी कर देंगे मैन की उनके भीतर का जो धिक्कार है घृणा है जो ईर्षा या तो भाई है वो इतना स्ट्रांग होता है ऐसे लोगों का बाहर में भारत के बाहर में की वे लोग दूसरे के प्रति मानसिक ही नहीं शारीरिक हनी किया बिना नहीं छोड़ते भारत में ऐसा है की हमारा जो धर्म है हिंदू धर्म वेदांत को हमारी मिट्टी में हमारी धरती में इतना गहराई तक चला गया है की इस मिट्टी में जो जन्म ग्रहण करता है वो चाहे रावण जैसा रक्षा भी क्यों ना हो वो भी हजार साल की तपस्या करके महादेव को प्रश्न कर लगा तो वहीं यहां पर रक्षा भी जो होते हैं इस मिट्टी में जो जन्म ग्रहण करते हैं वे लोग भी ऋषि के ऋषि को अपना सम्मान देते हैं और साधना तपस्या करते हैं भले ही चाहे उनकी माटी जो है उनकी जो बुद्धि जो है वो दुर्बुद्धि या कुमति भले ही हो किंतु तपस्या करना हमारे रक्षा भी नहीं छोड़ते तो भारत की ये जो पूनिया भूमि स्वामी जी जब अमेरिका से लोट कर के आए और हमारी मिट्टी में वो जो एकदम वो अपने देहात को अपनी मिट्टी के साथ में रगड़ना लगे मिट्टी में जाकर के वो अपने वो लेट गए मिट्टी में इस तरह से वह स्वामी जी ने क्यों किया पुण्य भूमि भारत को क्यों कहा की इस हमारी मिट्टी जो है इसमें से यदि रक्षा भी पैदा होते हैं तो वे लोग भी तपस्या करते हैं वे लोग सिर्फ अत्याचार या ट्राई नहीं देते तो ये भारत की ये विशेषता है तो अभी एक दिन अभी ये जो बात हो गई अखंडानंद जी का जो इस तरह से एक अचार निष्ठा थी तो ऑलरेडी ठाकुर ने उनको का दिया था की नरेंद्र को देखो की वो किस तरह से वह ना ही बाकी है अचार के ऊपर में थोड़ा सा भी ध्यान नहीं देता किंतु वह किस तरह की आध्यात्मिक ऊंचाई पे बैठा है तो यह सब देखकर के अखंडानंद जी के मां में थोड़ा सा संश्ले तो ए गया की वो जी तरह के अचार का पालनपुर करते हैं वो क्या ठीक है की नहीं तो इसके रिलेटेड एक प्रसंग है फिर महाराज उसका वर्णन करते हैं महाराज उसको लिखने हैं लिखने हैं जो टाइटल दिया है संदेह समाधान संदेह का समाधान महाराज लिखने हैं अमर मन हरी तो की खबर इत्यादि बढ़ो बुढो बना अखंडानंद जी के मां में बीच-बीच में ऐसा एक विचार आता था की मैं जी तरह से तेल नहीं लगता जी तरह से मैं भविष्य करके भविष्य एन का एन खाता हूं फिर जी तरह से मैं कठोरता करता हूं हरि तक खाता हूं ये सब जो मैं करता हूं तो ठाकुर तो कहते हैं की मेरा एक बूढ़े आदमी जैसा भाव है मैं जैसे जवान अवस्था में ही बड़ा हो गया हूं तो क्या यह बात सही है ऐसा संदेह अखंडानंद जी के मां में प्रकट हुआ तो क्या हुआ इस समय जी समय यह संदेह हुआ था इस समय वो एक बार ठाकुर के पास में गए थे प्रसाद भी ग्रहण किया था अब यहां पे नहीं लिखा की कौन सा प्रसाद ग्रहण किया है मां काली का नेकी भगवान विष्णु का किंतु अभी हम अनुमान करके का सकते हैं की ठाकुर का ऐसा था की कोई यदि ऐसा तपस्या का भी यदि अहंकार होता है तो वो अहंकार भी ठाकुर तुड़वा देते थे तो हो सकता है शायद इस बार भी एक बार तो पहले किस तरह से मां काली का प्रसाद लेने को कहा था वो तो हमने पढ़ा हो सकता है शायद दूसरी बार नाही कहा हो अहंकार टूट गया एक बार तो फिर बार-बार बेचारे की जो निष्ठा है उसके ऊपर में आघात क्यों करते रहना तो शायद दूसरी बार नाही कहां हो जो भी है हम तो हनुमान कर सकते हैं उसे समय आप प्रसाद ग्रहण करने के बाद में दोपहर का समय है ठाकुर ने थोड़ा सा विश्राम किया था अभी वह बैठ गए हैं उठ करके खड़े हुए हैं इस समय कुछ भक्तों ने आकर के कमरे में प्रवेश किया ठाकुर का जो कैमरा है दक्षिणेश्वर में यदि आपने देखा होगा तो उसे कमरे में भक्तों ने प्रवेश किया आर्मी में जय मधुर पेट दिलम मैंने जमीन के ऊपर में एक कारपेट जो है एक चटाई बढ़ा दी इन लोगों के लिए तारा की जो खान पैर ठाकुर के बोल लेने वो भक्ति लोगों ने ठाकुर के साथ में चर्चा विचारण किया सब बातें की धार्मिक बातें की किंतु कुछ समय के बाद में उन्होंने ठाकुर को पूछा मासे अपना कच्चे शोक छोटो छोटो केले संसार धर्म नाक और सन्नासियों पर जन्म अच्छे अच्छे एटा की भालू की महाशय परमहंस महाशय यह जो यह यंग लड़के जो है यह जुबान लड़के जो है वे लोग संसार धर्म नहीं करके संसार का पालनपुर नहीं करके आपके पास में सन्यासी बने के लिए जो आते हैं यहां पर आपके पास में रहते हैं आप भी इनको प्रोत्साहन देते हैं आशीर्वाद देते हैं उपदेश देते हैं क्या यह बात ठीक है संसार धर्म का पालनपुर नहीं होगा तो संसार कैसे चलेगा इस तरह से इस तरह की बातें अपने ओल्डर में बार-बार साधुओं को खास करके एक साथ एक लड़का गया था तो अभी क्या था की वहां तो फिर यह नलिनी ये जो थे मां का यह जो सब संसार तो उन लोगों को यह सब देख करके बड़ा डर लगता था की अरे मां सबको सन्यास दे दे रही है इतनी अच्छे-अच्छे घर के लड़के हैं और फिर इनकी नजर भी ऐसी होती है देखेंगे नहीं की महक कुछ नहीं देखेंगे कुछ उसमें से ऐसा कुछ देखेंगे जिसमें से उनको कुछ मतलब उनमें से कोई ना कोई कमी निकालना की बात है इस तरह से ही देखेंगे सी वो एक बात थी ना की जय रामबाते की कुछ औरत दिलरबाथ में गई फिर वो मां को मिलने के लिए कोलकाता गई जहां पे वो मार रहे रही थी तो मां ने पूछा सब जो उनकी ये तो समूह व्यास उनकी उम्र की थी शायद हो सकता है मां उनके साथ में बचपन में खली भी होगी तो यह सब औरतें जा करके मां के पास बैठी खाने लगी मां हम तो देख करके आए शारदा उसको तो शारदा कहेंगे शारदा हम लोग देख कर के आए बेलूर मठ तो देखा की वहां पर कितनी बड़ी बड़ी गे है तो मैन कहा की अरे जाए किंतु या तुम लोगों ने यह देखा की वहां पर सन्यासी लोग जो है कितनी श्रद्धा भक्ति पूर्वक ठाकुर की पूजा करते हैं आराधना करते हैं किस तरह से तपस्या करके रहते हैं किस तरह से नरेन का ये जो शिवा ज्ञान है जीवन सेवा का जो आदर्श है उसको अपने जीवन में चरितार्थ करते हैं कितनी साड़ी सेवा करते हैं तुम लोगों ने क्या ये सब देखा तो वो लोग औरत बोलने लगी हां हां वो तो ठीक है चलो वो तो सब तो देखा किंतु हम ने ये देखा की बेलूर मठ में कितनी बड़ी-बड़ी गे है जैसे की वो गे देखकर की वो लोग मोहित हो गई है तो ऐसा कोई बड़ा इतना बड़ा बेलूर मठ है उसको गौशाला के रूप में उन्होंने जिन लिया नहीं की शिवा ज्ञान है जीवन सेवा के आदर्श पर इतना बड़ा कार्य जो हो रहा है वो नहीं देख करके घोषणा मां लिए उसको तो यहां पे भी वो नलिनी मां को देख रहे हैं की मां सबको सन्यास दे रही है यंग लड़कों को तो वो पूछने लगी मां तुमको की किस तरह से ये तू किस तरह का कम कर रही हो महामाया ने संसार की रचना ही की है की जैसे लोग संसार करें और संसार आगे बढ़ यह लड़के लोग तुम इन लोगों को सन्यास दे रही हो तो महामाया जो है एक बार तुम पे नाराज हो जाएगी ऐसा वो बोल दिया मां को तो मैन नाराज होकर के क्या कहा की अरे तुम क्या चाहती हो तुम सब ये पूरे संसार में सभी लोग तुम्हारी तरह संसार करेंगे ये क्या ये क्या ठीक बात है तुम संसार करना चाहे करो जिसको नहीं करना है उसके ऊपर में अपनी इच्छा क्यों इस तरह से ये कर रही हो तो मैन भी उसको बड़ी स्ट्रांग लैंग्वेज में बोला था हालांकि मैं तो बड़ी वाले दे लैंग्वेज में बोला हूं तो यहां पे भी ठाकुर को जब किसी ने ऐसा कहा की आपके पास में ये लड़के जब आते हैं तो वो संसार नहीं करके सानिया सन्यास आश्रम का मार्ग ग्रहण कर रहे हैं तो क्या यह बात ठीक है तो ठाकुर ने क्या कहा हालांकि देखो ये बात किस कॉन्टेक्स्ट में हुई है और खानदान नानजी महाराज यह जो सब कठोरता कर रहे थे उसके संदर्भ में उन्होंने यह प्रसंग कहा है महाराज लिखने हैं ठाकुर उत्तर दे जानो ना ठाकुर ने उत्तर दिया की अरे देखो तुम लोग तो इन लोग ये जो लड़के सन्यास लेने के लिए या तो फिर जिनके मां में त्याग का भाव दृढ़ हो गया है इनका यही जन्म देख रहे हो इंद्रियों के आगे का जन्म हो तुम लोगों को दिखता नहीं है श्री जन्मे ए राजा संसार धर्म और शेष करें ऐसे-ऐसे पिछले जनों में इन्होंने संसार धर्म जो है वो समाप्त कर दिया है उसका उपभोग कर चुके हैं ये लोग उपभोक शब्द तो ठीक नहीं है यह क्या है की ये सब कर्म होते हैं कर्मों कोशी करना होता है कर्म को वर्कआउट करना होता है तो ये संसार का जो कर्म है वे लोग उन्होंने वर्कआउट कर दिया है पिछले जनों में यही देखो देखो ये जो कर लड़के हैं उसमें से एक लड़का जो है जो थोड़ा सा उम्र में बड़ा होने के बाद में जब अपने होश संभलता है वो अपने खुद के बड़े में सोचना शुरू करता है जब छोटे बच्चे तो वही करते हैं जो की उनके मां-बाप करवाते हैं किंतु जब वो 12-13 साल के होते हैं आजकल तो और भी मतलब यंगर आगे में वो बोलना शुरू कर देते की नहीं मैं ये करूंगा ये खाऊंगा ये करूंगा ऐसा वो उनका एक स्ट्रांग अपना एक बिल पावर हो जाता है तो जैसे एक मां के कर लड़के हैं ठाकुर उदाहरण देकर कहते हैं उसमें से एक लड़का थोड़ा सा ही होश संभालने के बाद में कहता है की मैं जो है भविष्य एन करके खाना खाऊंगा मैं अपने सर पे तेल नहीं लगाऊंगा उसे समय था की अभी भी है की सर पे बालों में तेल लगाना या तो फिर वो स्नान करने के शरीर पर तेल लगाते हैं ना उसको एक लग्जरी का चिन्ह जो है भोग का चिन्ह माना जाता है या तो फिर कहते हैं की इससे कम वासना बढ़ेगी तो जो भी है ये लड़का जब भी होश संभालना है तो कहता है मैं तेल भी नहीं लगाऊंगा अपने अंग के ऊपर में डे के ऊपर में या तो फिर बालों में और ना ही मैं जो है की और कुछ भी खाना खाऊंगा मैं भविष्य एन का खाना खाऊंगा ऐसा एक लड़का बोलना शुरू कर देता है आप मां शारदा शादी करें बार-बार भाई देखा है तब उसे खेल तार त्यागीर भाव छड़े ना अभी ये सब देख करके मां कितनी डर जाति होगी और फिर सोचती होगी करें ये लड़का मेरे हाथ से चला जाएगा संसार त्याग कर देगा तो फिर मेरा क्या होगा यह शशि देवी की बात है ना बड़ा लड़का विश्वरूप वह इतना पंडित था इतना त्यागी था इतना वो मतलब वो शास्त्र में उसकी इतनी उत्पत्ति थी तो महासिच देवी देखकर सोचती थी की हां मेरा लड़का तो मतलब एक मां को एक ये होता है ना की गर्व होता है की मेरा लड़का कितना सुंदर है देखने में और विद्वान भी कितना है एक निशीथ भी कितना है किंतु एक दिन क्या हुआ यही विद्वान एक निष्ठा लड़के ने इस संसार त्याग करके सन्यास ग्रहण करके घर छोड़के चला गया तो वह शशि देवी की क्या अवस्था हुई होगी और इस समय छोटा लड़का विश्व पर महाप्रभु चैतन्य देव स्वयं देखा की वही इस तरह के रास्ते पे सोच रहे हैं की मैं भी जो है की एकदम एक निष्ठापूर्वक शास्त्रों का अभ्यास करूंगा मैं भी जो है त्याग तपस्या पूर्ण जीवन जिऊंगा तो मां शशि देवी के हृदय में क्या बिकती होगी अरे दूसरा लड़का भी चला जाएगा तो यह मां-बाप बच्चे को प्रलोभन दिखाई हैं इस तरह की बातें करते हैं उनके पिता जगन्नाथ मिश्रा उन्होंने सोचा की ये लड़का जब बहुत अच्छा पढ़ाई लिखी करेगा तो घर छोड़ देगा तो उनकी पढ़ाई अटका दी जगन्नाथ मिश्रा ने कहा विश्व भर को भगवान चैतन्य देव को की देखो तुम क्या मतलब उन्होंने कहा मतलब सोचा की ज्यादा पढ़ाई लिखी कर लगा तो ये घर से चला जाएगा जैसे बड़े लड़के विश्वरूप ने किया है है तो इसीलिए उन्होंने पढ़ाई लिखी अटका दी और बेचारे चैतन्य देव भी जो है कृष्णा चैतन्य की वह सोने लगे की अरे मैं पढ़ाई लिखी नहीं करूंगा तो मेरे साथ में क्या होगा किंतु मां-बाप इस तरह से सोचते हैं की बहुत ज्यादा कोई लड़का एक निशीथ है बहुत ज्यादा पढ़ाई लिखी करता है बहुत ज्यादा वह सिंचर है तो पता नहीं वो क्या कर लगा मैं हम लोग जब यहां पे जॉइन करने के लिए आते हैं सब साधु लोग तो यंग सब एक उम्र के होते हैं तब बातें चिट्टे होती रहती है आपस में की भाई तुमने किस तरह से त्याग किया किस तरह से ठाकुरमार स्वामी जी के बड़े में तुमने पहले बार जानकारी मिली किस तरह से तुमने यहां आश्रम में अपने रामकृष्ण मिशन में आकर के जॉइन करने का तुमने सोचा ऐसी सब बातें होती रहती है आपस में तो अभी इसी मामले में एक लड़का जो यहां पर जॉइन करने के लिए आया था देखा वो बहुत ही मतलब उसका सिंसियर नेचर है बहुत ही स्टूडियो से बहुत ही उसमें तपस्या का जो है रूटीन फॉलो करने का डिसिप्लिन का भाव बड़ा स्ट्रांग है तो मैं उसे समय बेलूर मठ में था तो मैं उसे उसके जो पेरेंट्स है उनको मैं पहचानता था कहानी पे दूर से किसी ने संपर्क करके बोला होगा उनके जो पेरेंट्स से वो बेलूर मठ में आए थे तो किसने बोला होगा की मैं हूं वहां पे तो जाकर के मुझे मिले तो मुझे भी मिलने के लिए आए थे तो वह लोग बता रहे थे उनके लड़के के बड़े में जो की अभी ऑलरेडी साधु हो चुका है अपने ऑर्डर में की हमको पहले से ही लगता था की इसका नेचर थोड़ा सा डिफरेंट है उसके घर में जाकर के वो हमने देखते थे तो इतनी साड़ी ठाकुर्मा स्वामी जी की किताब है वो वहां पे पड़ी रहती थी अन्य सब धार्मिक किताबें वो पढ़ना राहत था वो अपने मित्रों के साथ में हंसी मजाक गैप लगाना या तो फिर ये बाहर में जाकर के मूवी देखना या तो रेस्टोरेंट में जाकर के खाना खाना उसको भी यह सब करते हुए कभी नहीं देखा कपड़े वगैरा भी जो पहना है एकदम सीधे साढे सब समय वो आश्रम में और वहां वह जी जगह रहा था वहां पर अपना मठ था तो वहां पर जाकर के वह वॉलिंटियर वॉलिंटियर का कम करता था जो भी आश्रम का कम है उत्सव है वहां पे जाकर के ऐसे वॉलिंटियर कितना सुंदर कम करता था की सभी साधनों लोग भी उसके ऊपर बड़े प्रसन्न थे तो इस समय किंतु उसे समय हमको ऐसा नहीं लगा की वो एक दिन घर छोड़कर के साधु हो जाएगा उसकी मां रो रही है बेचारी मां तो रोएगी लड़का जब चला गया है तो वो वो सोच रही है की उसे समय हमको मुझे बता रही है की उसे समय हमको क्यों नहीं पता चला की वो इस तरह से ऐसा कुछ करेगा किंतु अभी इतने दोनों के बाद जब उसके बड़े में सोचते हैं की वो उसे समय कैसा था और कंपेयर तू हम दूसरे लड़के कैसे होते हैं तब आज हमको लगता है की ना पहले से ही उसमें इस तरह के संस्कार थे हमको मतलब स्नेहा और प्रेम होता है उसकी वजह से हमारी आंखों के ऊपर में वो जो पर्दा जाता है ना की लड़के के प्रति इतना स्नेहा होता है की लड़का त्याग करके छोड़ कर के चला जाएगा वो विचार वो सोच भी अपने मां में कभी नहीं आई तो इस तरह से जब मां पिताजी इस तरह से किसी की एक निशीथ अवस्था देखते हैं या तो फिर वो उसको इग्नोर करना शुरू कर देते हैं या तो फिर बड़े ही डर जाते हैं और उसकी तपस्या भांग करवाने का पर्यटन करते हैं तो ठाकुर कहते हैं है की उनके मां और पिताजी बड़ा उसको स्नेहा करके बोल रहा है या तो टी करने का भी डर दिखा रहा है की अरे यह तो तुम यह जो मछली तेल नहीं लगाओगे या तो फिर ये भविष्य एन खाओगे ये सब तो ठीक नहीं है तुम्हारी छोटी उम्र के लिए तुम यह सब करो आनंद वो सब करो जीवन के जो सुख भोग है उसका आनंद लो वरना तो फिर तुम्हारे साथ में क्या होगा भविष्य में किसको पता ऐसा करके मां-बाप उसको डर भी दिखा रहे हैं लुभा भी रहे हैं तब्बू से चले तार त्यागीर भाव छड़े ना फिर भी वो लड़का जो है अपना त्याग का भाव और छोड़ना नहीं है कर लड़के हैं तो एक लड़का इस तरह से त्याग में पड़ा हुआ है ओके हर तीन टी किंतु भिगे मत तो और तीन लड़के जो है वो भोग में दुबे हुए हैं जापान जो मिला वही का लिया जितना मिला उतना का लिया चौथ लड़का है जो खाने-पीने में संयम बरता है वो थोड़ा सा बड़ा हो जान के बाद में सब कुछ त्याग कर देना चाहता है क्योंकि उसमें शत्रु गन जो है वो बहुत ही अधिक मंत्र में है सतोगुनर जखन उदय हुए तखन का उदय होता है तब यह सब होता है त्याग का भाव प्रगति होता है ठाकुर और मुख्य एक कोठा सुन आचार्य प्रति अमर श्रद्धा त्रिगुण बेड के लोग ठाकुर ने जब यह कहानी कहीं ये उदाहरण दिया तब अखंडानंद जी लिखने हैं की आचार्य विचार और यह जो निष्ठा के साथ में जी रहा हूं इन निष्ठा का जो मैं पालनपुर कर रहा हूं त्याग तपस्या का ये उसके प्रति मेरी निष्ठा दोगुनी बाढ़ गई अभी निश्चय हमको मतलब एक आश्चर्य होगा एक प्रश्न हमारे मां में होगा की यहां पे ठाकुर कहते हैं की कर लड़कों में से एक त्यागी है तीन भोगी है एक लड़का भविष्य एन करके खाता है और बाकी के तीन लड़के है इसके आगे वाली कहानी में स्टोरी में ठाकुर ने नरेंद्र के बड़े में कहीं थी की जो 105 खाता है जो मिलता है वही खाता है किंतु कलकत्ता के रास्ते से जब जाता है तब गाड़ी घोड़ा मकान मनुष्य ये सब चीजों के ऊपर में इसकी नजर नहीं रहती नजर रहती है अंतर्मुख तो यही ठाकुर ने एक बार ऐसा कहते हैं और एक बार ऐसा कहते है तो क्या नरेंद्र के बड़े में उनका जो मत है वो रिदम मत नहीं है या तो फिर नरेंद्र यूनिक है हमको पता है की ये दूसरा पॉइंट ऑफ यू ही ठीक है की नरेंद्र यूनिक है जैसे वो जो मारवाड़ी लोग जो थे वो ठाकुर के पास में आकर के बहुत साड़ी चीज ले आते थे मेवा मिठाई मिष्ठान बहुत कुछ लेक आते थे तो ठाकुर नहीं खुद उसको ग्रहण करते थे ना ही अपने किसी और शिष्य को ग्रहण करने देते थे क्यों क्योंकि वे लोग जो ठाकुर को अर्पण करते थे वह कामना वासना से जड़ी तथा की ठाकुर को यह सब दिया तो सामने में ठाकुर हमको आशीर्वाद देंगे की हमारा यह जो बिजनेस है हमारा ये जो धन है उसमें वृद्धि हो इस तरह से उनका एक मनोभाव राहत था तो जो कामना करके कोई चीज दी जाति है वो ग्रहण करना बड़ा ही डेंजरस होता है तो इसीलिए ठाकुर ना ही खुद ग्रहण करते थे ना ही अपने शिष्यों को किसी को देते थे किंतु नरेंद्र को सब देते थे कहते थे इसके भीतर में गांड नहीं है जोर डालेगा उसे ज्ञान की के भीतर में सब जो है वो हजम हो जाएगा सब जो है वो रख हो जाएगा तो इसीलिए नरेंद्र यूनिक है नरेंद्र जो जितना खाएगा नरेंद्र एक बार जाकर के ठाकुर को बोलना है की महाशय मैंने आज जिसको खाद्य कहा जाता है इस तरह का खाना खाकर के आया हूं तो ठाकुर कहते हैं ठाकुर पहले बार तो एक-दो बार तो नाराज हो जाते हैं किंतु वो तो बड़ा ही करता है ना मतलब वो एक दिखाना चाहता है की मैं इस तरह से तो मतलब मेरा जो मेरा एक इंडिपेंडेंस है कितना स्ट्रांग इंडिपेंडेंस है ठाकुर कभी-कभी नाराज भी हो जाते थे कभी कभी बेचारे हो अपने सर पर हड्डी के बैठ जाते थे क्या करें नरेंद्र ऐसा ही है ठाकुर की कितनी परीक्षा करता राहत था कभी देखा था उनके वो बिस्तर के नीचे वो एक रुपए का सिक्का रख देता था माणिक सिक्का रख देता था रुपया तो नहीं पता नहीं कितने रुपए का सिक्का होगा किंतु एक सिक्का रख देता था तो अभी ठाकुर सबको बोलते रहते हैं की देखो मैं तो धन को स्पर्श नहीं कर सकता अभी वो बिस्तर पे बैठने भी गए तो एकदम खड़े होकर के वो बैठने से पहले ही पता चल गया की अरे देखो इसके भीतर में वो उसने इस तरह से वो चालाकी करके मेरी परीक्षा करने का प्रयास कर रहा है तो नरेंद्र की पुरी बात अलग है और बाकी के शिष्य जो है उन लोगों की बात अलग है इसीलिए ठाकुर अब जैसे त्यागी शिष्यों को देखते थे जब उपदेश देंगे तो देखेंगे की वो कोई गृहस्ती तो आसपास में नहीं है ना फिर अपने कमरे का दरवाजा बैंड करके इन लोगों को उपदेश देते थे तो यही चीज से चीज हो नरेंद्र के साथ में करते थे जब वो काशीपुर में अंतिम समय चल रहा था तो नरेंद्र को अकेले अपने कमरे में बुलेट थे और बाकी सब टी संतानगण भी वहां पर नहीं रहते थे राजा महाराज शरद महाराज वे लोग भी वहां पर नहीं रहेंगे सिर्फ नरेंद्र को अकेले बुलाकर के वो उनको जो बताना था भविष्य के बड़े में उनके मिशन के बड़े में अध्यात्म ब्रह्मा विद्या के बड़े में जो भी है वो नरेंद्र को अकेले बिठाकर के वो बताते थे तो नरेंद्र यूनिक था और बाकी सब की स्थिति अलग थी इसीलिए देखिए की जो जैसे वो ठाकुर कहते हैं ना की जहर पेट जांच हुए मां किसको क्या खिलाती है जिसके पेट में जो हजम होता है जिसका वो डाइजेशन थोड़ा सा वीक होता है उसके लिए खिचड़ी वगैरा बना देगी और जिसका डाइजेशन स्ट्रांग होता है उसके लिए कचोरी वगैरा पुरी अचार वगैरा बना देगी तो इस तरह से जिसके पेट में जो सहन होता है जो डाइजेस्ट होता है मां उसे बच्चे को अपने उसे बच्चे को उसे तरह से खाना खिलाती है तो वैसे ही ठाकुर जो जी रास्ते पे चला है जिसका भक्ति भाव है उसको भक्ति ही बात करेंगे ज्ञान मार्ग जिसका प्रतीक है जैसे अरे तो ज्ञान मार्केट बात करेंगे अभी जैसे किंतु अभी किसी का रास्ता जबरदस्ती चेंज कर देना वो भी ठीक नहीं है जैसे काली महाराज के साथ में हुआ था काशीपुर में नरेंद्र काली महाराज को कहा की मेरे मुझे स्पर्श करके देखो तुमने काली ने जैसे काली महाराज ने जैसे नरेंद्र को स्पर्श किया वैसे ही लगा जैसे करंट का एक ये लगा हो मतलब एक झटका लगा हो तो ये जब हो गया तब ठाकुर ने नरेंद्र को बुलाया किया अरे तुमने इकट्ठा करने से पहले ही खर्च करना शुरू कर दिया है तुम्हारी आध्यात्मिक शक्ति काली जो है वो भक्ति मार्ग लेक चल रहा था अभी जबरदस्ती उसको तुमने ज्ञान मार्ग दे दिया पता नहीं इसके साथ में क्या होगा तो बात कीजिए जी तरह से घटना होती है ठाकुर की ये जो आशंका वो सही निकलते है की हां काली महाराज के मां में थोड़ा बहुत तो इस घटना को लेकर के कुछ दुविधा संदेह कुछ यह सब जिसको कहेंगे की कनफ्लिक्ट ये सब खड़ा अवश्य हुआ था तो जो जी मार्ग का प्रतीक है उसको इस मार्ग का उद्देश्य देना है किंतु हां साथ-साथ में ये भी कहना है की सभी जितने भी मार्ग हैं सभी मार्ग इस एक ही ईश्वर के पास ले जाते हैं मैं यदि मांसाहार नहीं करता हूं तो जो मांसाहार करेंगे उनके प्रति घृणा नहीं हनी चाहिए ये बात ठाकुर ने अपनी सभी संतानों में ये एकदम ठीक रूप से बिठा दी थी कौन सा भी धर्म हो कौन सा भी अचार हो कौन सा भी मार्ग हो कौन सी भी साधन पद्धति हो सभी एक ही ईश्वर के पास ले जाति है हमको अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार अपना मार्ग चयन करना है अपना मार्ग सिलेक्ट करना है तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति