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Swami Vivekananda My Plan Of Campaign ·

मेरी क्रान्तिकारी योजना : स्वामी विवेकानन्द : भारतीय व्याख्यान || 12 Aug 2025

Invocation

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का माय प्लान ऑफ कैंपेन मेरी समर नीति मद्रास में दिया हुआ भाषण और इसका बैकग्राउंड हमने ऑलरेडी कल देख लिया है कि किस तरह से श्री रामकृष्ण देव के पास में आध्यात्मिक शिक्षा आध्यात्मिक उपदेश ग्रहण करके स्वामी जी पूरे भारत में भ्रमण किए। एक भिक्षुक सन्यासी के रूप में और फिर अमेरिका जाकर के वेदांत का जो प्रचार है संदेश है पूरे विश्व में किया। और यह तीन मुख्य फेज जो थे स्वामी जी के बाय दिस टाइम यह प्रवचन उन्होंने डिलीवर किया था। यह तीनों फेजों से इन तीनों फेजेस से उन्होंने क्या सीखा? इसके बारे में भी कल हमने चर्चा किया था। हाउ टू बेटर इंडिया ग्लोरी ऑफ आत्मन इस 18th पॉइंट पर हम आ पहुंचे हैं। यह पॉइंट मैंने दिए हैं। किंतु इसके भीतर का जो टेक्स्ट वो 100% स्वामी जी का है। उसमें मैंने किसी भी तरह का ऑल्टरेशन नहीं किया। ना ही रिमूव किया है ना ही ऐड किया है। तो इसका

आत्मन् की महिमा

पहला पैराग्राफ हम ऑलरेडी पढ़ चुके हैं। फिर से एक बार पढ़ लेते हैं और फिर दूसरे पैराग्राफ की ओर जाएंगे। स्वामी जी क्या कहते हैं? फोर सेंचुरीज पीपल हैव बीन टॉट थिरीज ऑफ डिग्रेडेशन। सदियों से हम मनुष्यों को अधोगति की ओर ले जाने वाली ही बातें करते हैं। उपदेश देते हैं। दे हैव बीन टोल्ड दैट दे आर नथिंग। द मासेस हैव बीन टोल्ड ऑल ओवर द वर्ल्ड दैट दे आर नॉट ह्यूमन बीइंग्स। यह जनसाधारण है। उनको पहले से ही बता दिया गया है कि तुम्हारा कोई अस्तित्व नहीं, तुम्हारा कोई वैल्यू नहीं, तुम्हारा कोई वर्थ नहीं। पूरे विश्व में सिर्फ एक ही देश में, एक ही सिविलाइजेशन में, एक ही कंट्री में ऐसा हो ऐसा नहीं। पूरे विश्व में इस तरह की बातें होती है। इसीलिए स्वामी जी जब अमेरिका गए थे तो उन्होंने एक स्टेटमेंट दिया था। अमेरिका इज अ हेवन फॉर द मासिस एंड वीमेन। यह जनसाधारण और स्त्रियां यह जनसाधारण यानी कि वही जो को गरीब है जो कि पदलित है जिनका कि सब समय शोषण होता आ रहा है वो और जो स्त्रियां है इन दोनों का शोषण सभी देश में सभी सिविलाइजेशन में सभी युग में हुआ है। तो स्वामी जी कहते हैं कि किंतु अमेरिका का उस समय के अमेरिका की बात कि इट इज अ हेवन फॉर द वमेन एंड मासेस। सो दे हैव बीन सो फ्राइटन फॉर सेंचुरीज टिल दे हैव नियरली बिकम एनिमल्स। बाकी सब देशों में इस तरह से उनको डराया धमकाया गया है कि वे लोग पशुत्व की ओर आकर के खड़े हुए हैं। नेवर वे दे अलाउड टू हियर ऑफ द आत्मन। ये जो हमारे भीतर में अनंत अजर अमर आत्मन है इवन ये अनंत अजर और अमर ये शब्द भी आत्मन के सामने छोटे पड़ जाते हैं। क्योंकि यह बिगिनिंग और एंड यह इमोर्टलिटी या तो यह सर्वव्यापित्व यह दोनों जो ये जितने भी कांसेप्ट है यह सभी स्पेस और टाइम के साथ में जुड़े हुए हैं। स्पेस, टाइम, मैटर, एनर्जी और यह फोर्सेस जो कि इन सबके बीच में यह इंटरेक्शन करवाती है। तो यह पांचों जो है यह पांचों से परे आत्मन है। नेवर वेयर देयर अलाउड टू हियर ऑफ दी आत्मन। अभी इससे नया पैराग्राफ स्टार्ट करते हैं। लेट देम हियर ऑफ द आत्मन। आत्मन की महिमा का गान उनको सुनने दो। दैट इवन द लोएस्ट ऑफ द लॉ हैस द आत्मन विद इन यह जो सबसे कमजोर से कमजोर भी जो है अपने जगत में इस समाज में उसके भीतर में भी वही ग्लोरियस आत्मन विराजमान है वि नेवर डाइस एंड नेवर इज बोर्न जिसका ना ही मृत्यु है ना ही जन्म है ऑफ हिम हुम द स्वर्ड कैन नॉट पियर्स नोर द फायर बर्न ना ही तलवार उसको काट सकती है ना ही अग्नि उसको जला सकता है। नोर द एयर ड्राई ना ही वायु उसको सुखा सकता है। सहारा के डेजर्ट में भी उसको भेज देंगे। यह जो पेसिफिक ओशन के यह जो एकदम जो बॉटम है ओशन का वहां पर यदि भेज देंगे ना ही युद्ध के मैदान में उसको भेज देंगे। इसको कुछ नहीं होने वाला है। इमोर्टल विदाउट बिगिनिंग और एंड अनंत अमर जिसका ना ही बिगिनिंग है ना ही एंड है ना ही प्रारंभ है ना ही अंत। द ऑल प्योर ओमनीपोटेंट एंड ओमनी प्रेजेंट आत्मन जो संपूर्ण सदा पवित्र है ओमनीपोटेंट है जो कि सर्वशक्तिमान है ओमनी प्रेजेंट है सब जगह पर विद्यमान है। इस तरह की आत्मन का गान इन सबको सुनने दो। तो स्वामी जी अच्छा अभी

क्या आत्मज्ञान हमें अहंकार देता है?

यह जो आत्मन यह जब जीवन में मैनिफेस्ट होना शुरू हो जाता है तो हम लोगों को पता है कि किस तरह से अपना जीवन परिवर्तित होता है। बात यह नहीं है कि हम लोग घमंडी हो जाएंगे क्योंकि बहुत लोग कहते हैं कि अच्छा इस तरह का पावर यदि हमारे पास में आ जाता है। अब जैसे हम लोग देखते हैं कोई नेता का लड़का है ना कि कोई कोई बड़ा धनी आदमी है उसका लड़का है इन लोगों में गुरूर कितना होता है घमंड कितना होता है एोगेंस कितना होता है तो यदि इससे भी बड़ा पावरफुल यह नेता फेता तो कुछ नहीं है आज है कल नहीं दो दिनों का उनका अस्तित्व है किंतु जो आत्मन अजर अमर शाश्वत सर्वविद्यमान सर्वशक्तिमान सर्व नियंत्रा सर्वज्ञाता इस तरह का आत्मन यदि हमारे भीतर में है यह ज्ञान यदि हो जाए तो हम लोगों के भीतर में क्या वो घमंड नहीं प्रकट हो जाएगा जो कि एक आम आदमी जो कि सत्ता है या तो शक्ति है उसके नशे में धुत होकर के इसके तरह से जो बिहेव करता है जैसे कि रावण था रावण को अपने जो सत्ता का और शक्ति का अपनी खुद की महिमा का इस तरह तरह का नशा उसके मन में उठ गया था कि मां सीता का अपहरण करने का भी उसने कोई यह नहीं समझा कि यह मैं गलत कर रहा हूं। इस तरह के आदमी यही सोचते हैं कि मैं जो कुछ कर रहा हूं वह सब सही ही है। तो क्या इन लोगों की तरह आत्मन की महिमा जिन लोगों ने श्रवण की है, जिन लोगों ने उसको प्राप्त किया है, इनका स्वभाव भी इस तरह से जिद्दी या घमंडी नहीं हो जाएगा। यह प्रश्न हो सकता है किंतु देखिए कि यह घमंड या तो जीिद या तो फिर यह एोगेंस कहां से प्रकट होता है? वो जो उसका जो प्रोडक्ट डेवलपमेंट साइकिल जिसको कहते हैं ना यह लाइफ साइकिल उसका क्या है? तो पहले तो है अविद्या कि मैं आत्म नहीं मैं देह हूं। यहां से सब प्रॉब्लम प्रारंभ होता है। अविद्या में से प्रकट होती है अस्मिता। यदि मैं देह हूं तो फिर मेरा सेल्फ वर्थ क्या है? मेरा सेल्फ एनालिसिस मुझे क्या कहता है? क्योंकि मैं यदि देह हूं, उसका अर्थ है कि मैं यह जो मेरे आसपास में जितने भी लोग रहते हैं, मेरे कोर्कर है, मेरे कलीग है, मेरे क्लासमेट्स है, मेरे रिलेटिव्स है, मेरे नेबर्स है, मेरे फ्रेंड्स है, मेरे पे जो आश्रित है, वे लोग मैं जिन पे आश्रित हूं, वे लोग इन सबके साथ में मेरा रिलेशन क्या है? क्योंकि यदि मैं देह हूं तो वह भी देह है। हम लोगों में कोई अदर देन यह रिलेशनशिप सोशल रिलेशनशिप और तो कोई रिलेशन नहीं है आत्मन का या तो फिर यह कोई डिवाइन या कॉन्शियस लेवल पर तो कोई रिलेशन नहीं है। तो फिर मैं सब समय इन लोगों के साथ में या तो कंपटीशन करना शुरू करूंगा या तो फिर इनको अंध प्रेम करना शुरू कर दूंगा। दैहिक प्रेम नहीं कि दिव्य प्रेम तो वह प्रारंभ हो जाएगा। यानी कि अविद्या। पहले तो सेल्फ वर्थ यानी कि अस्मिता प्रकट होती है। फिर प्रकट होते हैं राग और द्वेष। मेरे किसी पर ज्यादा ही प्रेम है, दैहिक प्रेम है और किसी से मेरा कंपटीशन है, दुश्मनावट है। और इसमें से प्रकट होती है यह अभिनिवेश। अर्थात कि यह जीवन को देह तो मैं अपने को देह रूप में गिनता हूं। तो इस देह को पकड़ करके रखने की देह के ऊपर में मेरा आकर्षण इतना बढ़ जाएगा कि मैं मेरा शरीर त्याग हो जाएगा। मुझे बीमारी आ जाएगी। इस तरह की कोई भी आशंका होने से मैं बड़ा ही डर जाता हूं। देखिए कि यह ये पंचमहाभूत का यह जो शरीर है इसके प्रति आकर्षण या इसके प्रति प्रेम का सबसे बड़े प्रतीक जो जिसको कि हम ये सेवन वंडर्स कहते हैं ना ये सेवन वंडर्स में से कुछ-कुछ तो इसी के लिए है। यह अपना ताजमहल है। अपनी बीवी पर इतना बड़ा प्रेम हो गया कि इसके लिए उसने इतना बड़ा ताजमहल बना दिया। यह फेरोज़ के पिरामिड्स है। यह पिरामिड क्या है? कि इतना अपने देह के प्रति इतना प्रेम है कि फिर मैं जब फिर से मृत्यु के बाद में जब जजमेंट डे आएगा या तो फिर इस देह को लेकर के मैं जब स्वर्ग में जाऊंगा तो मुझे सब तरह का यह सुख भोग चाहिए जो कि मेरे इस पृथ्वी पर था। मैं फेरो था राजा था। उस समय मेरे पास में यह सुंदर वाइन हुआ करते थे। इतने सारे नौकर चाकर हुआ करते थे। है तो एक्चुअली यह जब फेरो का डेथ होता है उसको जिस तरह से मम्मी करके रखा जाता है उसके जो सेवक सेविकाएं जो होते हैं उनकी भी हत्या करके उनको भी मम्मी करके उसके साथ में रखते थे। फिर एक बड़ी बोट रखी है नौका। इस नौका के भीतर में यह सोना मोहर है ना कि ये फिर ये जितने भी यह महंगे-महंगे बर्तन है, पोटरी है, ये ज्वेलरी है, ऑर्नामेंट्स है वो सब रख दिए हैं वहां पे। तो जिस तरह से यह फेरो पृथ्वी पर रहता था भोग विलास में वैसे ही वह बाद में आफ्टर लाइफ में भी इसी तरह से रहेगा। सो यह देह के ऊपर में जो आकर्षण होता है तो उसमें से भय भी प्रकट होता है। यह अभिनिवेश प्रकट होता है कि देह एक दिन मेरे हाथ में से जाएगा। तो यह पूरा जो लाइफ साइकिल है अविद्या अस्मिता राग द्वेष और अभिनिवेश यह अभिनिवेश है यह फाइनल पॉइंट हम ज्यादातर लोगों के भीतर में यह अभिनिवेश होता है। यह देह के प्रति शरीर के प्रति एक प्रचंड आकर्षण होता है। किंतु यह आकर्षण कैसा है? जैसे कि ऑक्सीजन है। ऑक्सीजन के बिना हमारा जीवन धारण 1 मिनट 2 मिनट से ज्यादा नहीं हो पाएगा। पानी में आप डुबकी लगाइए। देखिए पानी के भीतर में कितना मिनट रह सकते हैं। मैक्सिमम 6070 सेकंड और कोई ओलंपिक लेवल का स्विमर होगा उसने यह बहुत प्रैक्टिस किया होगा अंडर वाटर रहने का तो मैक्सिमम 5 मिनट। 5 मिनट्स के बाद में जब ऑक्सीजन नहीं मिलता है तो ब्रेन जो है वह धीरे-धीरे करके वह काम करना बंद करता है और मनुष्य का मृत्यु होता है। तो देखिए कि हालांकि ऑक्सीजन जीवन धारण के लिए इतना इंपॉर्टेंट है। हम यह जो ऑक्सीजन धारण करते हैं स्वास स्वासोच्छ्वास के माध्यम से ब्रीथिंग के माध्यम से इसके प्रति हम थोड़े से भी कॉन्शियस नहीं होते हैं। जो कि सबसे आवश्यक है ना खानापीना से भी पानी या भोजन नहीं मिलेगा तो फिर भी हम लोग 1 दिन 2 दिन निकाल देंगे जो लोग उपवास करते हैं खास करके यह जैन साधु वगैरह तो पूरा महीना महीना जो है परयूषण का वह गर्म पानी पी के ना ऐसा करके यह लोग शायद निकाल देंगे बहुत सारे लोग बिना पानी का भी उपवास करते हैं निर्जला एकादशी ना ऐसा सब करते हैं तो ठीक है आप इतना एक दिन दो दिन एक सप्ताह एक महीना और कभी-कभी लोग तो डेजर्ट में यह हो जाते हैं, लॉस्ट हो जाते हैं। तो ऐसा भी देखने में आया है। तीन-4 महीने तक बिना खाए भी रहे तो हालांकि कमजोर तो बहुत हो गए हैं किंतु देह धारण हुआ है। किंतु बिना ऑक्सीजन के 5 मिनट से ज्यादा टिकना मुश्किल है। तो ऑक्सीजन इतना वाइटल है जीवन धारण के लिए फिर भी हम उसको ग्रहण करते हैं नहीं करते। उसके प्रति हमारा कोई ध्यान नहीं होता। खाना हम अच्छा खाना मिलता है, नहीं मिलता है, पानी का टेस्ट अच्छा है, नहीं है। यह सब हम हजार चिंता करते हैं। किंतु ऑक्सीजन उससे भी कहीं ज्यादा वाइटल है। उसके बारे में हम सोचते ही नहीं है। तो इतना सहज ये ऑक्सीजन का लेनदेन हमारे शरीर के साथ में बायोकेमिस्ट्री के साथ में है। तो यहां पे अभिनिवेश भी ऐसा है। यह इतना सटल है, इतना सूक्ष्म है। हमको समझ में ही नहीं आता कि देह के प्रति मेरा आकर्षण इतना प्रबल है कि थोड़ा सा भी एक्सीडेंट का भय यदि रहेगा मृत्यु का भय यदि रहेगा तो फिर इमीडिएटली हमको बड़ा ही भयानक डर आकर के हमारे मन में बैठ जाता है। जबकि यह राग द्वेष है वह समझ में आते हैं। अस्मिता फिर भी समझ में आता है कि मेरे भीतर में यह अस्मिता है। मेरे भीतर में यह राग द्वेष है। अविद्या नहीं समझ में आता किंतु यह बाकी सब तो समझ में आता है। तो यहां पे भी देखिए कि यह जो लाइफ साइकिल है अभिनिवेश की यह जो आत्मश्रद्धा है यह है अभिनिवेश का एंटीडोट। यह अभिनिवेश यानी कि देह पे जो प्रेम है उस प्रेम को ट्रांसफर करके आत्मन की यह जो महिमा है उसका गुणगान करना है। मैं देह नहीं आत्मन हूं। यह समझना है जैसे ही यह अविद्या का एंटीडोट ये अभिनिवेश का एंटीडोट आत्मश्रद्धा प्रकट हुआ वैसे ही इसकी जो प्रोडक्ट साइकिल है लाइफ साइकिल है पूरी ऑल्टर हो जाएगी। वहां वो अविद्या में से प्रकट होकर के अस्मिता की ओर जाता है। अस्मिता से राग और द्वेष की ओर जाता है। राग और द्वेष से अभिनिवेश की ओर जाता है। यहां पे पूरा वह साइकिल रिवर्स हो जाएगा। पहले तो यदि आत्मश्रद्धा प्रकट होगी अभिनिवेश की जगह तो अभी पूरा रिवर्स जाना शुरू होगा। वो रिवर्स जाकर के एक के बाद एक काटता जाएगा। आत्म आत्मश्रद्धा है तो उसके ऊपर में यह जो मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षा यह सब प्रकट होगा जिसको कि चित्त प्रसाद कहते हैं। यह यम नियम है वह प्रकट होना शुरू हो जाएंगे। यह सत्य, अहिंसा, अस्ते, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, तप, शोच, संतोष, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान यह 10 यमन नियम है वह प्रकट होंगे। इससे भीतर में जाएंगे तो फिर आत्मज्ञान प्रकट होगा। तो यह जिस तरह से अविद्या में से अभिनिवेश की ओर जाने की यह साइकिल है उसको रिवर्स हो जाती है। आत्म श्रद्धा से आत्मज्ञान की ओर जाने की यह साइकिल बैठ जाती है। जैसे कि एक उदाहरण देना है भगवान बुद्ध का ही कि जब निर्वाण प्राप्ति की कुछ ही क्षण बाकी थे। जिस रात को वह निर्वाण प्राप्ति होने वाली थी उस रात को आकर के मारा। यानी कि बुद्धिज्म में जिस शैतान या तो फिर जो प्रलोभन देने को आता है उसको मारा कहते हैं। तो मारा ने आकर के यह दुनिया भर के पहले तो प्रलोभन दिए। प्रलोभन से भगवान बुद्ध वश में नहीं हुए। फिर धमकी दी, डर दिखाया, भय दिखाया। उससे भी भगवान बुद्ध ने आसन छोड़कर के आसन त्याग करके वहां से भाग खड़े नहीं हुए। तो फिर आखिर में मारा हार गया। और भगवान बुद्ध निर्वाण प्राप्ति की जो घड़ी है उससे पहले क्या होता है यह जितने जन्म जन्मांतर के संस्कार है वो जैसे यह मूवी की जो रील होती है वह कैसे रिवर्स गति की ओर जाती है वैसे वह रिवर्स जातेज जाते जितने भी संस्कार है उसको तोड़ती गई एक के बाद एक संस्कारों को काटती गई जब वह प्रथम जन्म या तो फिर यह सर्वप्रथम संस्कार तक पहुंचे वह संस्कार भी कट गया तब कहीं जाकर करके आत्मज्ञान प्रकट हुआ। तो यहां पर भी यह जो कि यह जड़ है या तो कहेंगे सीड है अविद्या रूपी सीड सीड में से जैसे धीरे-धीरे करके अंकुरित होकर के यह वट वृक्ष बनता है एक के बाद एक इसकी डालियां है पत्ते हैं यह फल है फूल है वो जैसे प्रकट होता है तो उसकी लास्ट प्रोडक्ट है वो कोई भी ये होगा वृक्ष तो वृक्ष की फाइनल प्रोडक्ट क्या होगी सीड माने बीज में से आता है। बीज में परिणत होता है। यानी कि यह पहले तो सीड में से अंकुरित होकर के पूरा वृक्ष बनेगा। वृक्ष में से शाखा प्रशाखा खाए। ये पत्ते बनेंगे। पत्तों में से फिर आखिर में फूल आएगा। फूल में से फल बनेगा। फल गिरेगा तो उसके जो सीड है वो सीड चारों ओर बिखेरे जाएंगे। और उस सीड में से नए वृक्ष खड़े होना शुरू होंगे। यानी सीड टू सीड बीज टू बीज। यह जो साइकिल है ये साइकिल पूरी रिवर्स हो जाएगी। यह जो नए सीड जो प्रकट होंगे वो फिर आत्मज्ञान के होंगे। यह सीड जो है दगदबीज हो गए हैं। उसमें से नया संसार रूपी अश्वत्थ वृक्ष नया प्रारंभ नहीं होने वाला है। यानी कि यह आत्मश्रद्धा से यह साइकिल पूरी रिवर्स हो जाती है। यह यम नियम, चित्त प्रसाद और फिर आखिर में आत्मज्ञान प्रकट होता है। तो यहां पे भी देखिए कि यदि हमारा प्रश्न यह है कि एक धनी व्यक्ति के मन में जो गुरूर है उस जो गर्व है जो एोगेंस है जो घमंड है वो आत्मज्ञान प्राप्त करने के बाद में क्या इस तरह का घमंड गुरूर गर्व प्रकट नहीं होगा नहीं होगा क्योंकि वो अज्ञान की लाइफ साइकिल थी यह है ज्ञान की लाइफ साइकिल यहां पे आत्मश्रद्धा यदि प्रकट होगी हमारे भीतर में तो वह हमको को चित्त प्रसाद यानी कि सबके प्रति मैत्री, सबके प्रति करुणा, सबके प्रति दया भाव और दुश्मनों के प्रति एक तरह की उपेक्षा करना ही सिखाएगी। इसके बाद में यह साधन भजन और तपस्या रूपी जो फल है उसकी जो सौरभ है वह हमारे जीवन में फैलना शुरू होगी और फिर आखिर में आत्मज्ञान की ओर ले जाएगी। यानी एक सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स में से प्रकट हुआ गुरूर या तो गर्व या तो घमंड वह एक बिल्कुल डिफरेंट है जो कि एक आत्मज्ञान से प्रकट हुआ एक मन को शांति देने वाला समाज को शीतल करने वाला चित्त प्रसाद है। वह पूरा दो प्रोडक्ट ही डिफरेंट है।

हमें अपने आप पर श्रद्धा नहीं है: क्रूरता और गुलामी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं

लेट देम हैव फेथ इन देमसेल्व्स। उनको अपने लोगों को अपने ऊपर में अपने आप में श्रद्धा होने दो। फॉर व्हाट मेक्स द डिफरेंस बिटवीन द इंग्लिश मैन एंड यू। एक इंग्लिश मैन है एक ब्रिटिश समय उस समय का आज का अमेरिकन। आज के ब्रिटिश लोगों की हालत हमारे से कोई बहुत ज्यादा अच्छी नहीं है। तो आज का अमेरिकन तो इसमें और हम में फर्क क्या है? लेट देम टॉक अबाउट देयर रिलीजन एंड ड्यूटी एंड सो फॉरर्थ। बट आई हैव फाउंड अ डिफरेंस। उनको कहने दो कि मेरा धर्म है तुम लोगों से सुपीरियर है क्रिश्चियनिटी या तो फिर यह सेंस ऑफ ड्यूटी जो होती है सेंस ऑफ रिस्पांसिबिलिटी जो होती है ब्रिटिश लोगों में वो हिंदू लोगों से ज्यादा है बेटर है इस तरह की फालतू की बातें करने दो ये किंतु यह बातें ही है इसमें कोई दम नहीं है मैंने सही सही डिफरेंस खोज निकाला है द डिफरेंस इज हियर दैट द इंग्लिश मैन बिलीव्स इन हिमसेल्फ एंड यू डू नॉट डिफरेंस यहां पे है। इंग्लिश मैन अपने आप में विश्वास करता है और हम लोग नहीं करते। यह सालों सालों से दीन हीन होने की शिक्षा जो कि धर्म हमको देता रहा है और फिर यह मतलब यह जो परिस्थिति भी उस समय की ऐसी थी कि राजा कुछ-कुछ थे। वो इस तरह के क्रूर थे कि प्रजा का शोषण करते थे। वह तो एक समस्या थी। फिर विदेशी आक्रमण प्रारंभ हो गए। तो फिर यह क्रूर राजा यह स्वामी जी कहते हैं ना क्रूरता और गुलामी एक ही सिक्के के दो पहलू है। तो जब राजा क्रूर हो जाता है वो क्रूर राजा जब दुश्मन का हमला होने से राज्य का रक्षण नहीं कर पाता है। क्यों? क्योंकि उसकी क्रूरता ने अपने ही राज्य में बहुत सारे गद्दारों को जन्म दे दिया है। गद्दार कहां से प्रकट होते हैं? एक तो है लोभ के वजह से कि उसको धन का लोभ हो गया तो देश के प्रति राज्य के प्रति गद्दारी करेगा उसको बिटरे करेगा पी पीठ में चाकू मारेगा तो वो तो एक है लोभ की वजह से दूसरा कि ये क्रूरता की वजह से ये जो भारत में ये ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का आगमन इसी तरह से तो हुआ कि ये वो जो दिल्ली में जो मुगल राजा जो बैठा हुआ था वो इतना क्रूर था कि ये कुछ-कुछ जो मनी लेंडर्स थे वो वो उन लोगों को यह डर लग गया था कि ये मुगल राजा जो है दिल्ली का वो हमारे पर अत्याचार करेगा, शोषण करेगा, धन संपत्ति हड़प लेगा। तो उसका सामना करने के लिए अभी देखा कि हिंदू राजाओं में तो कोई दम नहीं है कि वो मुगल का ये सामना करें। ये ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी है कि जिनमें कुछ दम दिखाई देता है। तो उन्होंने उसको स्पॉन्सर करना, प्रमोट करना, इन्वेस्टमेंट करना शुरू कर दिया। तो हमारे ही यह मनी लेंडर्स जो थे यह सेठ जो थे उस समय के कुछ-कुछ उन्हीं के धन से यह वो इन लोगों ने ये कॉन्टिनेंटल इंडियन इंडियन आर्मी का निर्माण किया उसमें ज्यादातर तो अपने इंडियन ही थे और इन्हीं को लेकर के मुगल के साथ में युद्ध किया उसको हरा दिया और फिर अपना यह स्थापित कर दिया कंपनी का रूल और फिर 1857 के बाद में डायरेक्ट ब्रिटिश क्राउन का रूल चालू हो गया। तो क्या है कि हम लोगों में क्रूरता जब होती है तो क्रूरता होने से देश में गद्दार प्रकट होते हैं और यही गद्दार फिर दूसरे दुश्मनों को इनवाइट करते हैं कि यह जो हमारा राजा है बड़ा क्रूर है। हमारा शोषण करता है। आप आकर के हमको बचाइए। अभी होता क्या है कि यह जो क्रूर लोग जो होते हैं सब वह बंदर और वह बिल्ली की कहानी है ना कि दो बिल्लियां झगड़ रही है रोटी के एक टुकड़े के लिए। तो बंदर आकर के कहता है कि अच्छा एक काम करते हैं मैं तुम दोनों को समाधान करवा देता हूं। मैं दोनों में इक्वल रोटी बांटूंगा। तो दोनों बिल्लियां खुश हो जाती है। फिर बंदर करता क्या है? एक एक रोटी का दो टुकड़ा करता है। एक बड़ा एक छोटा। अभी छोटा जिसको मिला वह बिल्ली चिल्लाने लगी क्या? उसको बड़ा टुकड़ा मिला। तो बंदर कहता है अच्छा उसका समाधान करते हैं। बड़े टुकड़े में से एक टुकड़ा काट के वह खा गया। अभी जिसका टुकड़ा काट के खा गया उसका अभी छोटा हो गया और सामने वाली का बड़ा हो गया तो वह बिल्ली चिल्लाने लगी तो उसकी भी सामने वाले की बिल्ली में से वो रोटी का टुकड़ा काट के खा गया तो अब जितना जितना वो खाता जाता है उतना ही यह बिल्लियों का झगड़ा भी चलता जाता है आखिर में पूरा रोटी बंदर खा गया और बिल्लियों के हाथ में कुछ नहीं आया तो यह यदि हम दो बिल्लियां झगड़ती है और समाधान करने के लिए बंदर को बुलाएंगे तो बंदर दोनों का शोषण करेगा यह क्रूर लोग और यह गद्दार लोग यह दो बिल्लियों की तरह है। एक झगड़ते हैं। समझ में नहीं आता कि विदेश से दुश्मनों को बुलाएंगे तो सबका शोषण करेगा। अब जैसे ठाकुर ने ही हृदय को कहा था कि हम दोनों में जब झगड़ा होता है तो मैं जब गुस्सा करूंगा तो तुम चुपचाप सुन लेना और तुम जब गुस्सा करोगे तो मैं चुपचाप सुन लूंगा। वरना तो यदि हम एक दूसरों को सहन करना नहीं सीखेंगे तो हमको खजानची को बुलाना पड़ेगा। अभी खजांची उस सब लोगों का एक माइंडसेट रहता है कि कहां से लोगों को एक्सप्लइट किया जाए। कहां से लोगों का बेनिफिट लिया जाए। तो ठाकुर ने हृदय को इस तरह से कहा था भले ही आपस में जितना झगड़ा हो दुश्मन के सामने एक होकर के रहना है। दुश्मन यानी कि यह जो बिना मतलब का एडवांटेज लेने वाले ये कौरव और पांडवों में था कि वो इन लोगों ने आकर के वो गंधर्व ना कि इस तरह के कोई ना आकर के वो कौरवों का कुछ हरण करके ले गए। तो पांडव और कौरवों ने साथ में मिलकर के उसका सामना किया। क्यों? क्योंकि आपस में है 100 और पांच किंतु विधर्मियों के सामने दुश्मनों के सामने है 105 तो यहां पे भी यह जो इंग्लिश मैन है और हम है हम लोगों में डिफरेंस क्या है एक तो बहुत बड़ा डिफरेंस है जब क्रूरता होती है तो गद्दारी वहां पर होती ही है जहां पर क्रूरता होती है दासत्व होता ही है दोनों एक सिक्के के दो पहलू है तो इस तरह से नहीं करके क्रूर क्रूरता भी ना हो, दासत्व भी ना हो, आपस में एक तरह का कोऑपरेशन हो, ब्रदरहुड की भावना हो, किंतु उसके लिए आपको अपने पर प्रचंड श्रद्धा होनी चाहिए। मेरे में यदि हीन भावना है तो हमेशा मैं मेरे आसपास में कांस्परेसी थरीज ही खोजता रहूंगा। हमेशा मैं यही सोचता रहूंगा कि अच्छा वो मेरी निंदा कर रहा है। वो मेरे पीछे से कोई षड्यंत्र कर रहा है। वो मुझे नुकसान करने का प्रयास कर रहा है। ऐसा एक बड़ा ही घिनौना हीन तरह का मन हो जाएगा। यदि हमारे में हीन भावना है तो और हीन भावना के साथ में यह वो सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स आने ही वाला है। तो ये ये डिफरेंस है। स्वामी जी कहते हैं द डिफरेंस इज हियर। यहां पे

स्वामीजी कहते है अंग्रेज़ अपने आप पर विश्वास करता है, हमें अपने आप पर ऐसा कोई विश्वास नहीं है. प्रश्न है, क्या घमंड कर के हम आत्मश्रद्धा प्राप्त कर सकते है?

डिफरेंस है। द इंग्लिश मैन बिलीव्स इन हिमसेल्फ एंड यू डू नॉट। इंग्लिश मैन को पता है कि मैं कुछ भी कर सकता हूं। जबकि आपको ऐसा लगता है कि मैं कुछ नहीं हूं। मेरे से कुछ होने वाला नहीं है। दीन हीन हूं। ही बिलीव्स इन ह बीइंग एन इंग्लिश मैन एंड ही कैन डू एनीथिंग। उसको पता है वह विश्वास करता है कि मैं एक इंग्लिश मैन हूं और मैं कुछ भी कर सकता हूं। दैट ब्रिंग्स आउट द गॉड विद इन हिम। यह आत्मविश्वास जो है वह उसके भीतर में से एक तरह का दिव्यत्व या तो फिर ईश्वरत्व प्रकट करता है। एंड ही कैन डू एनीथिंग ही लाइक्स। इस तरह से दिव्य शक्ति प्रकट होने से वह जो चाहता है वह कर सकता है। अभी देखिए यहां पर प्रश्न होगा वो सीरियस प्रश्न हो सकता है कि इंग्लिश मैन यदि इस तरह से डिवििनिटी उसके भीतर में प्रकट होती है तो हम लोगों का वेदांत किस काम का है? यदि आपको क्योंकि यहां पर बात ऐसी तो नहीं है कि यह कोई आध्यात्मिक साधना करके आत्मश्रद्धा प्रकट हुई है। यह तो कॉन्फिडेंस है। सेल्फ कॉन्फिडेंस है। अस्मिता है। अस्मिता और आत्मश्रद्धा में बहुत बड़ा डिफरेंस है। हमने ऑलरेडी देख लिया है। तो ये अस्मिता स्ट्रांग होने से यदि ईश्वर प्रकट होते हैं तो फिर हमारी वेदांत की थरियों का क्या कुछ रह गया? वो तो सब तो अपने सर पर आकर के खड़ी हो गई। वो सब उल्टा पुल्टा हो गया। यदि घमंड करके ही ईश्वर मिल जाते हैं। घमंड करके ही ईश्वरत्व प्राप्त हो जाता है। तो बिना मतलब यह जो इंद्रिय संयम है, फिर यह त्याग, तपस्या, श्रद्धा, जप, ध्यान यह सब करके इतना सालों साल मेहनत करके हम यह अपने भीतर में ईश्वर के प्रति शरणागति क्यों प्रकट करते हैं? यदि ये बिना शरणागति के बिना तपस्या के बिना इंद्रिय संयम के यदि ईश्वरत्व मेरे में प्रकट हो सकता है जस्ट मात्र घमंड करके तो ऐसा होगा तो आज के जितने भी नेता हैं आज के जितने भी धनी लोग हैं उस समय के ब्रिटिश मैन थे आज का ये अमेरिकन है या तो फिर इंडिया में ही तो कमी नहीं है इस तरह के लोगों की बहुत सारी जगह पे इस तरह के लोग देखने को मिल जाते हैं तो वही लोग ईश्वर को ले जाएंगे क्या हम लोग यह तपस्या करके बैठे रहते हैं ठाकुर ने हमको मूर्ख बना दिया क्या यह प्रश्न प्रश्न हो सकता है और प्रश्न का उत्तर एक्चुअली बड़ा सिंपल है। देखिए एक तरह की आत्मश्रद्धा प्रकट होने से दिव्यत्व या तो ईश्वरत्व हमारे भीतर में प्रकट होगा अवश्य मोमेंटरीली और इस मोमेंटरीली प्रकट होने से हम जगत में जय भी कर पाएंगे। किंतु फिर यह आर्नोल्ड टोयनबी का जो थ्यरी है ना राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन क्या कहता है कि चैलेंज जब हमारे सामने आती है और जब चैलेंज का हम सक्सेसफुल सामना करते हैं उसके ऊपर में विजय प्राप्त करते हैं तो एक नई सिविलाइजेशन का प्रारंभ होता है। ये चैलेंज का सामना करने से हमको सेल्फ सेटिस्फेक्शन मिलेगा ही मिलेगा। इस तरह के सेल्फ सेटिस्फेक्शन में से एक तरह का सेल्फ कॉन्फिडेंस बढ़ेगा और सेल्फ कॉन्फिडेंस के साथ में एक तरह का एोगेंस भी आ जाएगा कि हां आई एम समबडी मैं कुछ हूं। मैं कोई हूं। मैंने यह सक्सेसफुली करके दिखाया है। सक्सेसफुल लोगों को आप जितना मिलेंगे बड़े लोग जिनको हम कहते हैं कॉरपोरेट सेक्टर में ये फाइनेंस सेक्टर में सर्विस सेक्टर में कोई भी किसी भी जगह पे उनके भीतर में एक तरह का एक सबस्ट्रेटम के रूप में यह एोगेंस दिखाई देगा ही देगा। इवन कोई कोई साधक होता है सक्सेसफुल एक बार यदि हो जाता है इस अर्थ में कि उसको कुछ अनुभूति हो गई है तो उसके भीतर में कि एक तरह का गर्व आ जाता है कि मैं साधक हूं बाकी सब मूर्ख है तो अभी एक बार तो आपके भीतर में यह प्रकट होगा ईश्वरत्व या तो दिव्यत्व किंतु यदि आपने उसका सदुपयोग नहीं किया इसको बुष्ट इससे जो बूस्ट मिलता है उससे आपने यदि फदर साधना नहीं की उसी को लेकर के संतुष्ट हो गए तो फिर उसका आपका पतन प्रारंभ हो जाएगा। जिस तरह से सक्सेसफुल चैलेंज का सामना करने से एक सिविलाइजेशन प्रारंभ होती है। किंतु फिर यह सिविलाइजेशन एक हायर रिलीजन को यदि डेवलप नहीं करेगी तो फिर यह सिविलाइजेशन डिसइीग्रेशन की ओर जाना शुरू हो जाएगी। तो यहां पे भी हमारे जीवन में भी यह ब्रिटिश लोगों का ही आप देखिए कि गुरूर था। गुरूर से एक आत्मश्रद्धा प्रकट हुई। आत्मविश्वास प्रकट हुआ। एक तरह का दिव्यत्व प्रकट हुआ। पूरे भारत देश पे। सिर्फ भारत ही कहां? पूरे आधे विश्व पे उन्होंने राज किया। कहते थे ना कि सन नेवर सेट्स ऑन ब्रिटिश एंपायर। क्यों? क्योंकि यह यदि अमेरिका में रात है तो हांगकांग में दिन है। यदि भारत में दिन है भारत में रात है तो वहां साउथ अफ्रीका में दिन है। यानी कि पृथ्वी के चारों ओर फैला हुआ था। तो ब्रिटिश एंपायर पे कभी सूर्यास्त सूर्य का अस्त होता ही नहीं था। तो वो एक परिस्थिति थी और आज का ब्रिटेन देखिए। आज की क्या उसकी परिस्थिति है। ब्रेक्सिट के बाद में यहां पे यह यूरोपियन यूनियन से भी निकल गए। यहां पे अमेरिका भी एक पागल बैठ गया है वहां पे आकर के। तो चारों ओर से जैसे कि उनका यह परिस्थिति है और वहां पे भी अब मैं थोड़ा सा स्टडी करेंगे तो कल्चरल और यह इकोनॉमिकल परिस्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं है। तो देखिए कि ईश्वर ने उनको एक मौका दिया। उनका जो सेल्फ कॉन्फिडेंस था सेल्फ कॉन्फिडेंस की वजह से एक बूस्ट उनको मिला। किंतु कुछ ही समय के बाद में देखिए कि सब जैसे कि ध्वंस हो गया। सब जैसे कि डिसइीग्रेट हो गया। तो हमको भी यदि आप आत्मश्रद्धा से या तो इवन एोगेंस से एोगेंस से यदि एक थोड़ा सा आपको बूस्ट मिलता है तो फिर उसका सदुपयोग करना सीख लीजिए। ठाकुर कहते हैं ना कि काम और कांचन या तो फिर घमंड ये सब तो काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह यह सब तो जाएंगे नहीं। तो सबको ईश्वर की ओर मोड़ फिरा दो। ईश्वर की ओर घूम उसको रीडायरेक्ट कर दो। यदि घमंड ही करना है तो यह घमंड करो कि मैं ईश्वर का सबसे बड़ा भक्त हूं। ईर्ष्या ही करनी है तो यह ईर्ष्या करो कि मेरा जो मित्र या मेरा साथी है वह साधना में मेरे से आगे बढ़ जा रहा है। मुझे साधना में उसके साथ कंपटीशन करनी है। नहीं कि ये मटेरियल वर्ल्ड में उसके साथ में कंपटीशन करनी है। यानी कि यह जो एक बूस्ट मिलता है आपको आत्मश्रद्धा या सेल्फ कॉन्फिडेंस या एोगेंस जो कुछ भी कह दो। स्ट्रांग अस्मिता यह फंडामेंटल है। एक अस्मिता स्ट्रांग होने से एक बूस्ट मिलेगा। इस बूस्ट का आप पॉजिटिव डायरेक्शन में यूटिलाइज कर दीजिए तो फिर देखेंगे कि अपना यह आध्यात्मिक जीवन एक अच्छे रास्ते पर चलना शुरू होगा। और फिर इस बूस्ट का हमने प्रॉपर यूटिलाइजेशन नहीं किया और इसी में बैठ गए कि इसी से मुझे संतुष्टि है तो फिर धीरे-धीरे करके जो जो प्राप्त हुआ था डिसइीग्रेशन की ओर जाएगा और हमारा जीवन भी जो मिलने वाला था मतलब व्हाट आवर पोटेंशियल कुड हैव बीन हम मैनिफेस्ट जो कर सकते थे उससे कहीं कम में हमको संतुष्ट होकर के रहना पड़ेगा

अपने आप पर श्रद्धा रखो believe in yourself

ही बिलीव्स इन ह बीइंग एन इंग्लिश मैन एंड ही कैन डू एनीथिंग दैट ब्रिंग्स आउट द गॉड विद इन हिम एंड ही कैन डू एनीथिंग ही लाइक। सो वो अपने आप में श्रद्धा रखता है। वह कहता है कि मैं इंग्लिश मैन हूं। मैं कुछ भी कर सकता हूं। और इस विश्वास से इस स्ट्रांग अस्मिता से उसके भीतर में ईश्वर जागृत हो जाता है। और सही में इस ईश्वरीय या तो दिव्य शक्ति से वह जो चाहे कर सकता है। यू हैव बीन टोल्ड एंड टोल्ड दैट यू कैन डू नथिंग एंड नॉन एंटिटी यू आर बिकमिंग एवरीडे। हमारी परिस्थिति जहां पे है साधना तो हजार करते हैं किंतु अस्मिता का बुष्ट नहीं मिल रहा है। कह रहे हैं कि वैसे हम लोग खुद अपने को कह रहे हैं कि मैं दीनहीन अधम हूं। साधक भी कह रहा है। जनसाधारण को भी यही सिखाया जा रहा है कि तुम लोग दीन हीन अधम हो। जैसे ही यह सीखा वैसे ही नॉन एंटिटीज यू आर बिकमिंग एवरीडे। यह शून्य से शून्यतर आप बनते जा रहे हो। अधम से अधमतम आप बनते जा रहे हो। व्हाट वी वांट इज स्ट्रेंथ। सो बिलीव इन योरसेल्फ। हमको चाहिए शक्ति। हमको चाहिए प्रचंड आत्मविश्वास। सो बिलीव इन योरसेल्फ। अपने आप में श्रद्धा रखना सीखिए। अपने आप में विश्वास रखना सीखिए। स्वामी जी कहते हैं ना 33 करोड़ ईश्वरों पर भगवान पर आपको विश्वास है और अपने आप पर विश्वास नहीं है तो कोई किसी काम का नहीं महापुरुष महाराज कहते हैं तीनर दया होलो एकर दया बिने जीव चार खारे गोलो तो ये तीन कौन गुरु कृष्ण वैष्णव इन तीन की दया हुई तो फिर भी जब तक एक की दया नहीं होती उसके बिना एक की दया के बिना गुरु कृष्ण और वैष्णव की दया किसी काम की नहीं वह एक कौन तो वह है अपना खुद का मन अपना खुद का मन जब वश में नहीं होता यह वैष्णव भाव है जब ध्यान साधन भजन त्याग तपस्या करने के लिए अपना मन जब तक सक्षम नहीं होता है तैयार नहीं होता है तब तक गुरु कृष्ण वैष्णव की आशीर्वाद या तो उनका दिव्य प्रवेश हमारे जीवन में किसी काम का नहीं यहां पे भी है कि हम लोग चाहे हजार साधना कर ले जब तक कि अस्मिता का एक बूस्ट हमारे भीतर में नहीं रहता तब तक हमारा कुछ होने वाला नहीं है।

कमजोर चरित्र वाले व्यक्ति रहस्यवाद में फंस जाते है

वी हैव बिकम वीक एंड दैट इज व्हाई ओकल्टिज्म एंड मिस्टिसिज्म कम टू अस। हम लोग मानसिक रूप से कमजोर हो गए हैं। और इसीलिए यह ऑकल्टिसिज्म और मिस्टिसिज्म हमारे जीवन में आते हैं। ये ओकल्ट और मिस्टिसिज्म क्या है? यानी कि यह तंत्र, यह विधि, यह ग्रह, यह अंधश्रद्धा यह सब हमारे जीवन में आ जाता है। पहले कुछ दिन पहले हमने डिस्कस किया था ना कि एक आदमी एक सज्जन के साथ मेरी बात हो रही थी। कह रहे हैं कि यह यंग लोग जो है आज के बड़े ही टैलेंटेड हाईली एजुकेटेड यह मल्टीीनेशनल कंपनी में काम करते हैं। कैसे इन लोगों को अध्यात्म की ओर ले जाया जाए? तो मैंने कहा कि भाई हमारी तो यही प्रार्थना होगी कि उनको अध्यात्म की ओर आना ही ना पड़े। क्योंकि क्या है कि भगवान पर विश्वास नहीं किंतु जब जीवन में चैलेंज आ जाती है तो भूत पे विश्वास आ जाता है। हजार तरह की विधियां करवाने को यह लोग तैयार हो जाते हैं। तो इससे तो कोई लाभ नहीं है। यदि भगवान पर विश्वास नहीं है तो भूत पर विश्वास करना होगा। मनुष्य देखिए असली सेकुलर या असली अथस्ट कौन है? वह है जो कि ना ही भगवान पर विश्वास करता है ना ही भूत पर विश्वास करता है। किंतु ज्यादातर लोग जो कि अपने को सेुलर या तो अथेष्ट कहते हैं, नास्तिक कहते हैं वे लोगों को भगवान पर विश्वास नहीं होता। भूत पर पूरा विश्वास होता है। इस अर्थ में कि प्रॉब्लम आने से ही कुछ ना कुछ अंधश्रद्धा उनके जीवन में आ जाएगी और अंधश्रद्धा में जाकर के वे लोग सब कुछ विधि विधान करना शुरू कर देंगे। तो स्वामी जी भी यहां पर यही कहते हैं। जब हम मानसिक रूप से कमजोर हो जाते हैं। तब यह ऑकल्टिसिज्म और मिस्टिसिज्म आकर के हमको घेर लेते हैं। दिस कपी थिंग्स यह सब कृपी क्या करेंगे इसका? कृपी अर्थात कि घिनौनी या तो फिर विचित्र या तो डेंजरस चीजें। देयर मे बी ग्रेंस ऑफ ट्रुथ इन देम बट दे हैव नियरली डिस्ट्रयड अस। इन लोगों इनके भीतर में यह ओकल्टिसिज्म ओकल्ट या तो मिस्टिसिज्म इसके भीतर में शायद कोई सत्य होगा किंतु इसने हमारे जीवन को बर्बाद करने के अलावा और कुछ नहीं किया है। देखिए मां का जीवन में

माँ सारदा के बालिका भाव की कहानी: बीमारी ठीक करने के लिए तांत्रिक पे विश्वास

यह सब कैसा कंट्रास्ट खड़ा होता है। मां उस समय क्वालपाड़ा में थी। मोस्ट प्रोबेबबली क्वालपाड़े की ही यह बात है। तो उस समय ये राधु और माकू और नलिनी ये सब तो मां के साथ में थे। उसमें भी ये माकू जो थी उसका लड़का उसका बच्चे का जन्म हुआ था और फिर वो फिर से उसका गर्भवती थी तो नलिनी थी उसकी बड़ी बहन तो बड़ी केयर करती थी और मां तो थी ही थी उस समय तो उस समय एक ज्योतिष वहां पर गया और उसने इस मां को कह दिया कि तुम्हारे जो दो लड़के हैं ना एक दूसरे को देखेंगे नहीं माने इसका अर्थ क्या होगा या तो नए बच्चे का जन्म होगा तो पुराने बच्चे का मृत्यु होगा या तो फिर नया नया बच्चा का जो जन्म होगा वो मरा हुआ ही होगा। तो जो भी है अभी ऐसा उसने कह दिया तो फिर वह तो बड़ी ही डर गई। रोना धोना शुरू कर दिया। मां के पास में गया गए लोग तो मां भी थोड़ी सी यह हो गई। मायूस हो गई। वो फिर ज्योतिष को बुलाकर के सेपरेटली कहा कि भाई तुमको यह सब कुछ यदि तुम्हारी गणना में यह सब दिखा भी था। तो तुमको तो आकर के पहले मुझे बताना चाहिए था। ये लड़कियों को क्यों बताया? बिना मतलब इनको डरा दिया। तो अभी देखो तो ये लोग तो डर गई है। तो अभी इनकी मन की संतुष्टि के लिए तुम्हारे ज्योतिष शास्त्र में जो भी विधान है विधि है तुम करो। तो यह ज्योतिष ने फिर जो विधि विधान है करना शुरू कर दिया। किंतु फिर हुआ ऐसा जो विधि की विचित्रता है उस समय नलिनी के मन में ऐसा बैठ गया कि मां राधु के प्रति ज्यादा वो एक फेवरेटिज्म दिखाती है राधु को ज्यादा प्यार करती है प्रेम करती है अभी राधु भी प्रेग्नेंट है माकू भी प्रेग्नेंट है किंतु राधु के पीछे में ज्यादा केयर करती है माकू की इतनी प्रेम नहीं केयर नहीं करती तो नलिनी नाराज होकर के उसको लेकर के जयराम बाटी चली गई कोलपाड़ा से तो मां भी बड़ी दुखी हो हो गई। कहती है कि यह जो लड़के को ले गई माकू के लड़के को तो मेरे पास में लाकर के उसको प्रणाम भी नहीं करवाया। नाराज होकर चली गई है। देखो अभी क्या होता है। तो मां ने ऐसा कहा वहां पर वह लड़का हेल्दी ही था। वैसे एकाएक उसको क्या हुआ? बीमार हो गया। तो फिर यहां पर क्वालपाड़ा में संदेश आया। तो उसी समय वो जो डॉक्टर महाराज थे वो डॉक्टर महाराज को भेजा माने कि जाओ जाकर के ट्रीटमेंट करके लाओ। उसको देखो जो भी है तो जैसे ही डॉक्टर महाराज ने देखा वो लड़क जय राम भाटी जाकर के तो देखा उसको डिप्थेरिया ना कि ऐसा कुछ हो गया है बड़ी डेंजरस बीमारी तो वे लोग डर गए तो बोला अभी तो ठीक था खेल रहा था इकाई के कैसे हो गया तो उसका तो कोई सॉल्यूशन नहीं अब कोलकाता से एक इंजेक्शन परचेस करके मंगवाना होगा तो इमीडिएटली किसी को भेजा कोलकाता मैसेज भेजा कोलकाता से शरद महाराज तो थे मां के भारी वो सब व्यवस्था करने के लिए गणेश की तरफ बैठे हुए थे। इमीडिएटली कोलकाता से किसी को भेजा कि जाओ यह इंजेक्शन या दवाई व्हाटएवर लेके जाओ जय राम भाटी। तो बाय द टाइम यह जो डिवोटी वहां पर पहुंचा बाय दैट टाइम लड़के का मृत्यु हो गया था। अभी यह संवाद मां के पास में आया। तो मां तो एकदम रोना धोना शुरू। जैसे वो एक गांव की एक औरत है। अनपढ़ अज्ञानी औरत उसी तरह मां का जैसे बाहर का बिहेवियर है। भीतर में है आत्मज्ञान। किंतु बाहर में जैसे गांव की स्त्रियों को कैसा एक भय लग जाता है कि अरे ये उसने इस तरह से बोल दिया ज्योतिष ने क्या होगा और फिर ये बच्चे का सही में मृत्यु हुआ तो किस तरह से एक आसक्त मां जो होती है बच्चे के लिए रोती है अपनी मां भी मां शारदा देवी भी इसी तरह से रो रही है तो जो भी है देखिए कि अभी ये जो ज्योतिष था किंतु अभी शरद महाराज को पता चल गया यह पूरा मामला कि ये ज्योतिष में इस तरह की कुछ क्षमता है तो जब मां का अंतिम समय आया तो इस ज्योतिष को बुलाया। कहा कि देखो तुम जो भी है मां के बारे में देखो। यदि कुछ हो सकता है तो कुछ करो। तो ज्योतिष तो मना नहीं करने वाला है ना कि कुछ नहीं हो सकता। ऐसा थोड़ी ना कहेगा। वह तो दक्षिणा मांगेगा और सामने विधि करना शुरू करेगा। तो विधि करना उसने शुरू कर दिया। एक घट की स्थापना हुई। अब घट की स्थापना करके उसके भीतर में पानी डाला गया। अब जैसे ही पानी डाला पता चला कि घट में जो है मिट्टी का घट होता है ना तो नीचे में एक होल बन गया है। उसमें से पानी निकल रहा है। तो सभी लोग तो बड़े डर गए। नेचुरली इस तरह का कुछ होता है तो डर तो लगेगा ही और फिर ज्योतिष को बुलाया है। यानी कि सोच ही लीजिए किस तरह का और मां एकदम मां की अवस्था तो बद से बदतर हो रही है। बीमारी तो ठीक नहीं हो रही। काला ज्वर ऊपर में से यह जो कफ और वीकनेस सब है तो ऊपर में से यह घट स्थापना की उसमें से यह होल हो गया ये हो गया गैप हो गया उसमें वो पानी निकल रहा है दूसरा घट लाया गया मिट्टी का उसमें फिर से स्थापना करके फिर से पानी डाला गया उसमें भी यह छेद हो गया और उसमें से पानी निकल रहा है अभी तो लोग सीरियसली डर गए कि अरे दो-दो घट बिठाए हैं दोनों में छेद हो गया है होल हो गया है और पानी पानी निकल रहा है तो अभी क्या करें क्या ना करें फिर पीतल का घट लाया गया और उसको स्थापित किया गया इसमें तो कुछ होगा नहीं मिट्टी की तो बात अलग है पीतल का घट स्थापित करके उसमें पानी डाला उसमें से भी छेद हो गया और उसमें से भी पानी निकलने लगा तो तो इतना डर का माहौल फैल गया कि अभी लगता है कि मां ने देह त्याग करने का सोच ही लिया है तो जो भी है कैसे भी करके वो सब विधि तो कंप्लीट करवाई किंतु मां ने देह छोड़ दिया अभी यह सब जो कहानियां हम पढ़ते हैं खास करके मां के जीवन में तो पता लगता है कि कहां स्वामी जी का यह जो आत्मश्रद्धा ये जो जितनी भी मानसिक कमजोरियां है उसको उठा के फेंक देने का और कहां यह मां वो राधु बीमार थी ख्वालपाड़ा में थी कि काली मामा एक दिन आए तो देखा कि मां ठंडे पानी का बर्फ से उसके सर पर सेक कर रही है। बर्फ उसके सर पर लगा रही है कि वो बुखार चला जाए। है तो वो कहते हैं काली मामा कि अरे मां तुम यह सब क्या कर रही हो? वैसे ही तो पागल है। उसके सर पर बर्फ लगा रही हो। ऐसा मत करो। वहां तिरोल बोल के एक जगह है। वहां पे काली है। उसमें एक तांत्रिक रहता है। उसको बुला करके लाते हैं। वो कुछ जल्दी कर दे तो हो जाएगा। तो मां कहती है अच्छा ठीक है जाओ। तो यह वर्दा महाराज मोस्ट प्रोबेबबली वर्दा महाराज ही थे। वह और काली मा काली मामा यह दोनों गए वहां पर तांत्रिक के पास में बात कर रहे हैं और तांत्रिक को लग गया कि यह मूर्ख आए हैं हाथ में वो सब तरह का नाटक करके वह तो बोलने लगा कि मुझे पता था तुम लोग आओगे और मैं मुझे पता है कि मुझे वहां पर जाना होगा क्वालपाड़ा यह विधि करूंगा ठीक हो जाएगा ये ये सब बोल के पैसा तो पढ़ा लिया अभी वह वापस आई यह लोग दो फिर एक दिन ठीक किया था तांत्रिक आया मां जैसे कि अपने सर पर वो वस्त्र ओढ़ के वो जैसे जैसे होता है। वो लाज करके इतना विनम्र भाव से दो हाथ जोड़कर के तांत्रिक के साथ बात कर रही है कि जैसे तांत्रिक यदि हेल्प नहीं करेगा तो मां की बच्ची का कुछ होने वाला नहीं। इतना वो बेचारी होकर के मां इसके साथ में बात कर रही है। तांत्रिक के साथ में कह रही है कि कैसे भी करके इतनी बड़ी मुसीबत से आप मुझे बचाइए। ऐसा कह रही है और तांत्रिक भी बड़ा खुश हो रहा है कि अच्छे मूर्ख लोग हाथ में आए हैं। नवरदा महाराज लिखते हैं स्पष्ट लिखते हैं कि उसकी ये जो क्या कहेंगे भंडामी बंगाली वर्ड है या तो फिर ये उसकी धूर्तता है उसको देखकर के ही पता चल जाता है किंतु फिर भी मां इस तरह से उसके साथ में बिहेव कर रही है जैसे कि वही तारणहार है तो तांत्रिक ने ऐसा सब म उटपटांग कुछ विधान दिया कहा कि यहां दुष्प्राप्य जितनी भी चीजें हैं जहां पर जाना मुश्किल है वहां से यह चीज कलेक्ट करना मुश्किल है ऐसी दुष्प्राप्य चीजों का इकट्ठा करके के उसमें से तेल बनाइए और इसको दीजिए। ऐसा बोल करके दक्षिणा ले चला गया। अभी देखिए उसकी भी चालाकी कैसी है। यह दुष्प्राप्य चीजें अर्थात कि जो कलेक्ट करना मुश्किल है। इस तरह की चीजों का लिस्ट आप कितना कलेक्ट करते रहेंगे। वहां से यह लाना है, यहां से यह लाना है। ये रामायण थोड़ी ना है कि वो इस पहाड़ पे ये जड़ी बूटी है। वो ले आइए तो फिर लक्ष्मण को ठीक करेंगे। उसको जो इंजरी हुई है तो महा इनको महावीर को भेजा गया। पता नहीं यह कौन सी जड़ी बूटी है। पूरा पहाड़ उठा के ले आए। इस तरह का तो कोई वहां पर था नहीं। तो मां ने कुछ दिन तो बड़ा आग्रह दिखाया कि इसको इकट्ठा करना है। यह आइटम है उसको कलेक्ट करना है। किंतु कुछ ही दिनों के बाद में मां समझ गई कि होने वाला नहीं है। फिर मां ने भी वह आग्रह छोड़ दिया। अभी आप वो तांत्रिक को जाकर के कहेंगे कि क्यों भाई तुम्हारा तो कुछ फल नहीं हुआ। राधु ठीक नहीं हुई। तो तांत्रिक तो सामने पूछेगा कि मैंने जो चीजें आपको बताई थी कलेक्ट करने के लिए आपने कलेक्ट की क्या? तो नहीं की। नहीं हो सकती है तो फिर मैं क्या करूं? यानी सी दैट डिलाइटफुल कंट्रास्ट यहां पे मां है। यहां पे स्वामी जी है। एंड वी हैव टू अंडरस्टैंड एट द एंड ऑफ द डे अस्मिता या आत्मश्रद्धा दैट इज नॉट समथिंग दैट इंपॉर्टेंट। सबसे इंपॉर्टेंट है कि मन की पवित्रता और मन की सच्चाई। यदि यह होता है तो बाकी सब चीजें अपने आप आ जाएगी। किंतु मन में पवित्रता नहीं है और आत्मश्रद्धा करने को कुछ गए तो वह घमंड में परिणत हो जाएगी। यह ब्रिटिश एंपायर यह हिटलर का एंपायर जो राज्य था जितने भी यह राजा रावण का राज्य था कंस का राज्य था असत के ऊपर में कभी भी आत्मश्रद्धा फिट नहीं बैठेगी सत के ऊपर में ही आत्मश्रद्धा ठीक-ठीक फिट बैठेगी यहां पे। हालांकि स्वामी जी हमको उकसाने के लिए प्रवोक करने के लिए एक ब्रिटिश लोगों का उदाहरण दे रहे हैं। किंतु आज से विद इन 100 इयर्स इटसेल्फ हमको पता है कि ब्रिटिश लोगों की हालत क्या है। इंडिया इज बेटर देन ब्रिटिश नॉट म इवन चाइना इज़ बेटर देन ब्रिटिश। तो अभी ये यही है कि आप असत्य के ऊपर में यह सब बनाएंगे तो ज्यादा टिकेगा नहीं। स्वामी जी को यह सब पता है। जस्ट स्वामी जी वांट्स टू प्रवोक अस इनटू थिंकिंग। स्वामी जी वांट्स टू गॉड अस। ये जो ठाकुर कहते हैं ना एक एक खोचा दाऊं अर्थात कि ये शशधर पंडित आया है उसके भीतर में विद्या तो बहुत है किंतु वो कुछ बोल नहीं रहा है। तो ठाकुर कहते प्रोवोकेटिव क्वेश्चन यदि करेंगे ना तो फटाक करके वो नाराज होकर के फिर वो उसका उत्तर देना शुरू करेगा। तो नाराजगी के मारे जो उत्तर देगा उसमें से उसकी विद्या बाहर आएगी और सबको उसको लाभ होगा। मां सीता का अपहरण हुआ तो रामायण लिखा गया। रामायण लिखा गया तो भगवान राम का यह जो पूत जीवन चरित्र है उनके जो उपदेश है वह हमारे सामने आए। मां सीता का यदि अपहरण नहीं होता भगवान राम वही अयोध्या में ही रहते। सब कुछ अच्छे से चल रहा होता तो ना ही रामायण लिखा जाता ना ही भगवान राम का चरित्र हमारे सामने आता। तो स्वामी जी हियर प्रवोक करने के लिए हमको गॉड करने के लिए खोचा एक दे रहे हैं कि देखो ब्रिटिश लोग कर रहे हैं। तुम लोग क्यों नहीं कर रहे हैं? ऐसा करके स्वामी जी कहते हैं व्हाट वी वांट इज स्ट्रेंथ सो बिलीव इन योरसेल्फ। हमको चाहिए शक्ति तो शक्ति प्राप्त करने के लिए अपने आप में विश्वास कीजिए। इसके बाद का पैराग्राफ अभी नेक्स्ट क्लास में। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न: ऐसा लगता है कि माँ तांत्रिक में विश्वास करने का सिर्फ अभिनय कर रही थी. अपनी आवरण शक्ति से अपने ज्ञान को छुपा रही थी। इसीलिए तो उन्होंने अपने भक्तों को तांत्रिको के पास जाने की शिक्षा नहीं दी।

किंतु देखिए कि इन लोगों में ना असत भी तो नहीं था इस अर्थ में कि मन में कुछ मुंह पे कुछ ऐसा भी तो इन लोगों में नहीं था कि विश्वास एक चीज करेंगे आचरण दूसरा करेंगे मन मुख एक ठाकुर जिसको कहते हैं मन और मुख को एक करना तो मुंह पर यदि तांत्रिक पे इतना विश्वास दिखाती है मुंह से बोल के तो मन में ना हो तो यह तो होने वाला नहीं है यह लोग तो दिखावा करने के लिए नहीं आए किसी भी तरह का भ्रम में डालने के लिए हमको नहीं आए। यानी कि और आप यह भी बात बिल्कुल सही कहते हैं। यह अपनी जो स्त्री भक्त है या कोई भी लड़के आते हैं मां के पास में मां ने जीवन को परिवर्तित करना सिखाया है। नहीं कि वो तांत्रिक के पास में इसको भेजा है सबको। राइट? यदि उस तांत्रिक पे यदि इतना सही में विश्वास होता तो यह जो आप कह रहे हैं ना उसमें यह नवांस ऐड करना है ना कि मां अपने लिए यह सब करती थी जैसे कि एक आवरण शक्ति का इस्तेमाल करके हमको यह समझना है कि शी हैज़ टू रियली बिलीव इन इट। अदरवाइज शी वुड नेवर एक्ट लाइक दिस। मन में एक है मुंह पे दूसरा है। ऐसा मां कभी नहीं करेगी। तो दिस इज व्हाट मेक्स ये ठाकुर मां स्वामी जी का यह कंपेरेटिव स्टडी सो यूनिक और मां का भी एक यूनिकनेस है। ठाकुर का भी देखिए कि ठाकुर बोलते हैं टिक टिकी पर तो मैंने छी अर्थात कि ये जो ये होता है ना छिपकली जो दीवार पर चलने वाली है वो यदि गिरेगी या होगा तो ऐसा अशुभ होगा। तो यह भी ठाकुर ने मान लिया है। ऑन दी अदर हैंड ठाकुर ने अपने शिष्यों को यह सब कभी नहीं सिखाया है। तो बिलीव करते हैं वो दिखाने के लिए समाज में रहना है। ठाकुर कहते हैं भांगते गढ़तेची भांगते नहीं। यानी कि कंस्ट्रक्ट करने के लिए आए हैं। डिस्ट्रक्ट करने के लिए नहीं। पुरानी प्रथाओं को तोड़ के नई प्रथा नहीं बनानी है। उसके ऊपर में बनाना है। बोल के प्लान करके कर रहे हैं। यह सब पॉलिसी करके कर रहे हैं। दिखावा करके करने के लिए कर रहे हैं। इट इज नॉट लाइक दैट। दे हैव टू जेनुइनली बिलीव इन दिस इन ऑर्डर टू एक्ट अपॉन इट। सो दैट नोस हैज़ टू बी देयर। ये जेन्युइनली बिलीव भी करते हैं। एट द सेम टाइम उसको सिखाते भी नहीं। सो हाउ आर यू गोइंग टू रिकंसाइल दिस टू आई डू नॉट नो। बट दैट वी हैव टू बिहेव क्लियर अंडरस्टैंडिंग।

प्रश्न: मैं इस विरोधाभास को सुलझाने के लिए दो प्रयास कर रहा हूँ। पहला, माँ ने अपनी आवरण शक्ति से अपना असली स्वरूप छिपाया था। दूसरा, ठाकुर कहते हैं कि हम 24 कैरेट सोने से आभूषण नहीं बना सकते। हमें कुछ अशुद्धियाँ मिलानी पड़ती हैं। इसलिए देहधारण करने के लिए माँ में ये अपूर्णताएँ थीं।

किंतु यदि देखिए माया का एक इस तरह से आवरण उनको प्रकट करना है सम सॉर्ट ऑफ एक इंप्योरिटी रखनी है तो ये अंधश्रद्धा ही क्यों फिर तो कामकांचन की ओर भी तो मन जा सकता है। सो आई डोंट डिसएग्री विद यू कि सम सॉर्ट ऑफ इंपपरफेक्शन वाज़ देयर इन देम बट दिस सुपरस्टिशन माने कोर्ट अनकोट सुपरस्टिशन दे इट वाज़ नॉट द रिजल्ट ऑफ दैट वीकनेस और इंपपरफेक्शन ये जो सर्वम खलवम इदम ब्रह्मन यानी कि सर्वभूत में ब्राह्मण है। यहां पे मैं एक उदाहरण दूंगा। सब साधन पद्धतियों में ठाकुर विश्वास करते थे। हालांकि ठाकुर कहते हैं कि कुछ साधन पद्धति है जो कि घर का मुख्य दरवाजे से भीतर में जाने के बराबर है। कुछ-कुछ साधन पद्धतियां हैं। घर के पीछे में जो टॉयलेट होता है उस रास्ते से भीतर में आने के बराबर है। यानी कि वो अशुद्ध टाइप की साधन पद्धति है। अब जैसे कि यह कर्ता भजा संप्रदाय उसके बारे में गिरीश घोष के साथ में वार्तालाप हो रहा है। तो गिरीश ने कटाक्ष करके कहा कि मैं उनके ऊपर में एक नाटक लिखूंगा। तो उनको एक्सपोज करने के लिए आजकल यह जो इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म चलता है तो उस समय यह नाटक लिखना चलता था एक्सपोज करने के लिए तो ठाकुर ने इमीडिएटली सीरियस होकर कर दिया अरे ऐसा मत करो ये भी तो एक सीरियस साधन पथ है ये भी तो ईश्वर की ओर ले जाता है तंत्र जैसे ठाकुर कहते हैं मध्यपान करके ये लोग तांत्रिक लोग इनको ये ले गए वहां पे भैरवी चक्र ने ऐसा कुछ तो मध्यपान करने को बोला तो ठाकुर ने बोला मैं तो मध्यपान नहीं करूंगा ूंगा कारणवारी का पान नहीं करूंगा किंतु एक वह लोग सब वाइन पीकर के शराब पीकर केकारी करते ला लो अर्थात कि एक तरह का विकृत बिहेवियर करना शुरू कर दिए किंतु उनका यह जो एक था अचलानंद बोल के उसको ठीक देखा कि वो शराब पीकर के ठीक ठीक स्थिर बैठ के ध्यान करता है यानी कि उन लोगों के भीतर में भी सिंसियरिटी है इस अर्थ में कि इवन यदि कर्ता भजा संप्रदाय काम कांचन निषिद्ध है आध्यात्मिक जीवन में वहां पे यहां पे स्त्री को लेकर के साधना करना। इस बात को ठाकुर यह नहीं कहते कि यह गलत है। कहते हैं कि यह निम्न रास्ता है। सो अंधश्रद्धा भी जो है देयर इज अ पार्ट ऑफ टेकिंग अस टू डिविनिटी। भले ही चाहे निम्न हो बट वो है। सो और ठाकुर अभी कर्ता भजा के बारे में ठाकुर बात तो करते हैं किंतु नरेंद्र को स्पष्ट कह देते हैं। नरेंद्र ने जब पूछा कि स्त्री लोगों को लेकर के साधन करना इसमें क्या है? तो ठाकुर ने इमीडिएटली कर दिया वो कि वो तुम्हारे लिए नहीं है। वो रास्ता बड़ा ही यह है। मतलब स्लिपरी श्लोक है। प्रायः पतन होता है। तो प्रायः पतन होता है। ठाकुर ने खुद ने वो करके देखा है। वो भैरवी ब्राह्मणी के साथ में एक सुंदर स्त्री को लेकर के आई। ठाकुर ने वो जप भी किया। वो सब किंतु ठाकुर यह बात किसी को रिकमेंड नहीं करेंगे कि तुम लोग तंत्र साधना करो। ठाकुर ने शुद्धा भक्ति सिखाई। स्वामी जी ने शुद्ध वेदांत सिखाया। यानी कि इन लोगों में पवित्रता की शक्ति इतनी थी कि निम्न से निम्न साधना भी यदि यह लोग कर ले उनको कोई नुकसान नहीं होने वाला था। हम लोगों में अपवित्रता इतनी है कि बेस्ट ऑफ द बेस्ट साधन पद्धति का इस्तेमाल करेंगे तो हमारे लिए कुछ आशा है। वन स्टेप भी नीचे आए तो सीधा गड्ढे में गिरेंगे। यह आशंका है बोल कर के हमको यह नहीं सिखाया। यहां पे भी स्वामी जी स्पष्ट कहते हैं ना देयर इज सम ट्रुथ इन दैट। ओनली थिंग इज दैट फॉलोइंग दैट हैस ब्रॉट अस टू मच हार्ट बर्न।

प्रश्न: हमें आत्मश्रद्धा के साथ-साथ शरणागति भी सिखाई जाती है। क्या ये दोनों भाव एक साथ रह सकते हैं या ये परस्पर विरोधी हैं?

आत्मश्रद्धा और शरणागति दोनों एक साथ में रह ही सकते हैं। और इतना ही नहीं यह दोनों सिक्के के दो पहलू है। एक दूसरे के पूरक है। बिना आत्मश्रद्धा के ठीक-ठीक शरणागति नहीं आएगी। बिना ठीक-ठीक शरणागति के ठीक-ठीक आत्मश्रद्धा नहीं आएगी। सबसे बड़ा उदाहरण है महावीर हनुमान। देखिए कि प्रचंड महावीर जैसी आत्मश्रद्धा हो ही नहीं सकती और किसी में नाम ही है महावीर और भगवान राम के प्रति इनके जितनी श्रद्धा भी किसकी नहीं हो सकती है छाती चीर के दिखा दिया भगवान राम है वहां पे सो स्वामी जी स्वयं कि संपूर्ण रूप से श्री रामकृष्ण को समर्पित हुए और फिर प्रचंड आत्मश्रद्धा का उनमें उदय हुआ ये जितने भी ठाकुर के डिसाइपल है डायरेक्ट डिसाइपल सब तो एक-एक भैरव है ना यह राजा महाराज हैं महापुरुष महाराज हैं निरंजन महाराज हैं लाटू महाराज है सब तो रेसलर थे और अपने आप में जिसकी सेल्फ कॉन्फिडेंस नहीं होगा वो रेसलिंग सीखेगा ही नहीं। बाबूराम महाराज जैसे कोई थे कि वो एकदम सेंसिटिव ज्यादा थे। बाकी तो ज्यादातर आप देखिए रेसलर टाइप के वो फिजिकली स्ट्रांग मेंटली स्ट्रांग ऐसे ही तो थे सब और उन्होंने ही तो शरणागति संपूर्ण रूप से की थी। यानी कि जैसे स्वामी जी कहते हैं क्रूरता और दासत्व ये दोनों एक सिक्के के दो पहलू है। जैसे कि ये इनफिरियरिटी कॉम्प्लेक्स सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स एक ही सिक्के के दो पहलू है। जिसमें सुपीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स है उसमें इनफिरिटी कॉम्प्लेक्स इमीडिएटली आ जाएगा। जिसमें इनफीरिटी कॉम्प्लेक्स है उसको सुपीरिटी कॉम्प्लेक्स आना ही आना है। सो हियर आल्सो शरणागति और आत्मश्रद्धा आर लाइक टू एस्पेक्ट ऑफ अ सेम कॉइन। म जितने भी श्रेष्ठ साधकों को देख लीजिए मीराबाई हो नरसी मेहता हो चैतन्य महाप्रभु हो ना एनी नंबर ऑफ साधक आप उनका लाइफ ठीक से स्टडी करेंगे म ए लेवल के जो है ए ग्रेड के जितने भी है वो सब देखेंगे दोनों उनके जीवन में देखने को मिलेगा आत्मश्रद्धा नहीं होगी तो उस लेवल की तपस्या आप कर ही नहीं पाएंगे उस लेवल का आप साहस ही नहीं कर पाएंगे कि मुझे वहां पर जाना है ये राम प्रसाद राम प्रसाद का तो हमने सब देख लिया। माए पोए मुकद्दमा धूम होवे राम प्रसाद बोले जिस मां को प्रेम करता है जिस मां पे शरणागति है उस मां पे ही वो कोर्ट केस चालू करेगा। कर क्या कर लोगे? बोल अभी इस

प्रश्न: जब स्वामीजी अंग्रेजों की आत्मश्रद्धा की बात कर रहे हैं, तो वे वास्तव में उनकी अस्मिता की बात कर रहे हैं, है न?

तरह से कहेंगे कि अस्मिता हमको एक बूस्ट देता है। स्ट्रांग अस्मिता होगी व्हिच इज फ्री फ्रॉम सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स और इनफीरिटी कॉम्प्लेक्स। एक हेल्दी अस्मिता होगी तो वह हमको एक बूस्ट देता है साधना के लिए। किंतु फिर वह जो बीच का वाला जो खाई है ना वह त्याग तपस्या करके एक्चुअल आत्मश्रद्धा प्रकट करने का वह आपको वहां तक जाना होगा। अदरवाइज ब्रिटिश लोग अभी तक राज करते हैं। वो नहीं कर पाए। विद इन अ फ्यू इयर्स उनका सिविलाइजेशन टूट गया। म एंपायर टूट गया और उनके देश का क्या हालत है तो हम पढ़ ही रहे हैं न्यूज़पेपर में। सो एक हेल्दी अस्मिता हमको बूस्ट देता है। किंतु इस बूस्ट का जो हमने बेनिफिट ना ले लिया तो फिर हम भी उसी गड्ढे में गिरेंगे जिस गड्ढे में जितने भी राक्षस जितने भी एंपायर आज तक आए हैं चंगेज खान का एंपायर हो ना कि ये नेपोलियन का एंपायर हो ना कि ये मुगल एंपायर हो या रावण का एंपायर हो सब एक ही गड्ढे में गिरे हैं। अस्मिता से बूस्ट तो मिल गया किंतु उसको सस्टेन नहीं कर पाए।

प्रश्न: स्वामीजी कहते हैं कि पहले भारत को अंग्रेजों की तरह रजोगुण की आवश्यकता है और फिर हम सत्वगुण प्राप्त करेंगे, है ना?

यहां पे किस तरह से देखना है? देखिए स्वामी जी ने हमको रजस का उपदेश दिया है। किंतु इसको हमको समझना है। 20थ सेंचुरी बहुत बड़ा लेसन है हम लोगों के लिए सभी के लिए। देखिए भारत गुलाम था। जर्मनी उन लोगों के मन में एक तरह का जेलसी प्रकट हो गया था कि ब्रिटेन और फ्रांस इतने आगे बढ़ रहे हैं। इतना कॉलोनी बना रहा है। हम लोग ज्यादा कुछ नहीं कर रहे हैं। रशिया ये सर्फ वगैरह जो वहां का जो जार था इतना पागल था कि रशिया को डेवलप नहीं होने दे रहा था। जर्मनी, इटली, चाइना, अमेरिका ये जो कुछ सात आठ कंट्रीज थे सात कंट्रीज तो इन लोगों में पोटेंशियल तो था किंतु उन लोगों को सभी को लग रहा था कि हमारा पोटेंशियल प्रॉपर मैनिफेस्ट नहीं हो रहा है। तो देखिए कि सातों कंट्रीज ने कौन सा रास्ता लिया। जर्मनी, जापान, इटाली, रशिया, चाइना इस पांच कंट्री में या तो फासिज्म आया या तो कम्युनिज्म आया। और इस फासिज्म और कम्युनिज्म बड़ा ही भयानक ब्लड शेड की ओर इनको ले गए। जबकि यह इंडिया है और ये एटलीस्ट अमेरिका है उस समय का। हमने देखा कि देखिए कि यह यदि तमस में से ऊपर आना है ना तो दूसरों पर आक्रमण करके आना यह कोई काम नहीं है। देश को डेवलप करना है। गरीबों की सेवा करनी है। सो एक तो हो गया कि तामसिक रजस जो कि ये जर्मनी, इटली, जापान, रशिया और चाइना ने यूज किया। तामसिक रजस और यह एटलीस्ट भारत और अप टू एन एक्सटेंट अमेरिका। यह है सात्विक रजस कि सेल्फ डेवलप करके ऊपर आना है और उन लोगों का था कि दूसरों का शोषण करके ऊपर आना है। यानी रजस में भी दो टाइप है। क्या आत्मश्रद्धा प्रकट करनी है, स्ट्रांग होना है तो स्ट्रांग कैसे होंगे? ब्रिटिश ने हम लोगों पर राज किया तो हम लोग इंटर्न ब्रिटिश पे राज करेंगे। स्वामी जी ने ऐसा तो कभी नहीं कहा। राइट? सो दिस इज अ नंस हियर कि एक तो तामसिक रजस होता है जो स्ट्रेंथ प्रकट होती है दूसरों का शोषण करके होती है। एक है सात्विक रजस कि एक सेल्फ डेवलपमेंट करके हम शक्ति प्रकट करते हैं। नहीं अगेन हियर देयर इज अ नंस कि

प्रश्न: चीन ने स्वयं को बहुत अच्छी तरह से विकसित किया है। यह हमारे लिए अनुकरणीय उदाहरण है।

चाइना का पूरा हिस्ट्री देखना है ना अभी का रिसेंट हिस्ट्री नहीं पूरा माने बोला 10,000 साल वाला नहीं किंतु ये जो सिंस इंडिपेंडेंस वो उनका इंडिपेंडेंस नहीं था किंतु एटलीस्ट सिंस द एस्टैब्लिशमेंट ऑफ कम्युनिज्म हमारे साथ में ही हुआ 1947 में हमको ये इंडिपेंडेंस मिला और 1950 के आसपास में ये कम्युनिज्म एस्टैब्लिश हुआ। वहां से लेकर के जो पहले 25 30 साल है भयानक भयानक खुनामर की हुई है। भयानक ब्लड शेड हुआ है। माओ जैसा एक पागल इनके सर पर सवार हो गया और उसने यह कल्चरल रेवोल्यूशन ग्रेटली फॉरवर्ड यह कुछ-कुछ पागलपन उसने ऐसा किया है। उस समय की कहानियां पढ़ेंगे तो रोंगटे खड़े हो जाएंगे। इतना अत्याचार उसने अपने खुद के देश बांधवों के प्रति किया है। 15 20 करोड़ लोगों को मार दिया है। फेमिन वगैरह से हो के। सो कितनी बड़ी संख्या है ये। अभी ये एक एबनॉर्मेलिटी से पसार हो के ये दूसरी एक सिचुएशन में आए हैं। जो देंशियाओ पिंग बोल के एक था उसने वहां पे फिर ये कम्युनिज्म से ये सूडो कम्युनिज्म या तो कैपिटलिज्म की ओर गया। अभी इन लोगों का प्रॉब्लम क्या है? पता है कि वन पार्टी सिस्टम आपको पावर भी बहुत देता है। यदि देंशियाओ पिंग जैसा आदमी बैठा होगा तो आपको यह प्रोस्पेरिटी की ओर ले जाएगा। किंतु यही सिस्टम आज कहीं दूसरा माओदोंग प्रकट करेगी तो उसी सिस्टम को उठा के वही गड्ढे में डाल देगा। यानी कि एक्सट्रीम होता है वहां पे। यदि प्रॉब्लम होते हैं तो करोड़ों लोग मर जाएंगे। इस तरह का एक्सट्रीम प्रॉब्लम और प्रोस्पेरिटी आएगी तो एक्सट्रीम प्रोस्पेरिटी आएगी विद इन 20-30 इयर्स। आप देखिए ना 1980 के आसपास में भारत चीन और पाकिस्तान ची पाकिस्तान का पर कैपिटा जीडीपीए हम दोनों से ज्यादा था व्हिच इज़ वेरी सरप्राइजिंग भारत और चीन से आज मेरी परिस्थिति उलट हो गई है पाकिस्तान चीन का सबसे ज्यादा है $000 पर एनम जीडीपी पर कैपिटा है हम लोगों का 3000 के आसपास है पाकिस्तान का 1500 के आसपास चला गया है सो चाइना के साथ में होता क्या है वन पार्टी सिस्टम या डिक्टेटरशिप होने की वजह से प्रोस्पेरिटी आएगी तो एक्सट्रीम प्रोस्पेरिटी बड़े ही शॉर्ट टाइम में आ जाएगी और यह पागल कोई आदमी बैठ जाएगा तो उसी प्रोस्पेरिटी को लेकर के पूरा गड्ढे में डाल देगा। सो इंडिया में क्या है? मीडक्रेसी है। यानी आप एक्सट्रीमली प्रोस्पेरस भी नहीं हो जाएंगे तो एक्सट्रीम प्रॉब्लम भी नहीं आ जाएंगे।

प्रश्न: कनाडा में मेरे रिश्तेदार का कहना है कि चीनी, जापानी आदि काम करने में बहुत मजबूत है, वर्क कल्चर बड़ा स्ट्रांग है. लेकिन हम भारतीय लोग तर्कशील होते हैं और काम को टालने के तरीके खोजते रहते हैं।

वो जो अमर्त्य सेन ने वो किताब लिखी है ना आर्गुमेंटेटिव इंडियन किंतु देखिए ये नेगेटिव वे में भी देख सकते हैं और इस तरह का एक पॉजिटिव वे भी है टीएसएमसी वो जो ताइवान सेमीकंडक्टर वो कॉरपोरेशन जो है वो अमेरिका में अभी अमेरिका वो क्या है कि आपको यहां पे मैन्युफैक्चर करना है तो ठीक है अमेरिका में उसने एक फेब एस्टैब्लिश किया है तो वो वहां पे एक आर्टिकल में पढ़ रहा था तो अमेरिकन इंजीनियर और ताइवानीज़ इंजीनियर वो वर्क कल्चर का एकदम डे एंड नाइट का डिफरेंस पता चल जाता है। वो फेब में कहीं पे एक भी इशू हुआ तो जितने ताइवानीज़ इंजीनियर है बिना बुलाए वो तो नोटिफिकेशन जाता है आधी रात को सब छोड़ के वहां पे खड़े हो जाएंगे। जबकि एक अमेरिकन जो है इंजीनियर उसको वो दुनिया भर के राइट्स और रेगुलेशन कि वीकेंड में काम नहीं करूंगा। आधी रात को नहीं आऊंगा। आऊंगा तो मुझे कंपनसेशन देना पड़ेगा। तो दिस इज अ रियल और ये जो ताइवानीज इंजीनियर है ना वो हमेशा ये अमेरिकन इंजीनियर की मजाक उड़ाया करता है कि उन लोगों को कुछ आता नहीं है। कमजोर है और कमिटमेंट नहीं है, डेडिकेशन नहीं है। बट एट द सेम टाइम देखिए कि अमेरिका में डिजाइन होती है। उसी को तो यह लोग ये करते हैं ना प्रोड्यूस करते हैं। ऐसा तो है नहीं कि उनकी खुद की डिज़ है। डिजाइनिंग तो पावर Alto में ही होती है। वह Apple है ना कि एनवीडिया है। वे लोग तो डिजाइन करते हैं। सो दैट इज कि क्रिएटिविटी भी तो एक चीज है। वर्क कल्चर क्रिएटिविटी नहीं लाएगा। दैट इज वेरी डिफरेंट। क्रिएटिविटी क्या है? एक रिलैक्स मोड में आती है। एक सोशली पॉजिटिव एनवायरमेंट में आती है। आज आप Fortun 500 कंपनी के वो परसेंटेज वाइज सीईओ देख लीजिए। नेशनलिटी ओरिजिन तो टॉप लेवल पे अदर दैन अमेरिकनंस जो फॉरेन नेशनलिटी है। टॉप लेवल पे अपने इंडियन ही आएंगे। रेदर देन एनी जापानीज, चाइनीस, कोरियन और ताइवानीज़। क्यों? क्योंकि दैट मल्टीकल्चरल, मल्टीलिंगुअल मल्टीशियल एनवायरमेंट में पढ़ना, सीखना, बड़ा होना हमने पहले से ही सीख लिया है। ये जो अपना ये जॉइंट फैमिली है, अपनी ये कॉलेज सिस्टम, एजुकेशन सिस्टम सभी उस तरह का है। सो ऐसा नहीं है कि यह एक्सट्रीम वर्क कल्चर दैट इज द ओनली थिंग वर्थ कल्टीवेटिंग। एक क्रिएटिविटी है, एक सोशल कोहिजन है, फ्रेंडलीनेस है। सब तरह की नेशनलिटी के साथ काम करने की एक एक इनेट हैबिट होती है। इंडियन सीईओ का है। यहां साउथ इंडियन, यहां नॉर्थ इंडियन, यहां बंगाली, यहां पे मराठी, यहां गुजराती। तो ऑलरेडी ये सब डीएल करके अमेरिका गए हैं। तो ये कोरियन है, कोई फ्रेंच है, कोई पाकिस्तानी है, कोई श्रीलंका का है, कोई अफ्रीका का है। सो इनेट एबिलिटी हो जाती है सबके साथ डीएल करने की। जबकि ये सब ना मोनोकल्चर है। चाइना, जापान, ताइवान, कोरिया, फ्रांस, जर्मनी ये सब मोनोकल्चर है। माने उन्होंने एक ही टाइप की नेशनलिटीज, एक ही टाइप का स्किन कलर, एक ही टाइप की लैंग्वेज, एक ही टाइप का कल्चर देखा है। तो वे लोग ना मल्टीकल्चरल एनवायरमेंट में ये हो जाते हैं थोड़े से अपसेट हो जाते हैं कि मैं जो कहता हूं वो सामने वाले को समझ में क्यों नहीं आ रहा है। जबकि हमको पता है कि मामा, काका, चाचा, चाची ये सबके साथ में डिफरेंट तरह से डील करना पड़ता है। वह लोगों का सो दैट इज आवर स्ट्रेंथ आल्सो वीकनेस आल्सो बट स्ट्रेंथ आल्सो और इसीलिए अमेरिकन मल्टीीनेशनल कंपनीज़ मैं बार-बार देखता हूं ना कि उनका स्ट्रेंथ क्या है? दैट इज रेशियल डायवर्सिटी। म सब तरह के नेशनलिटीज रिप्रेजेंट है। बेस्ट ऑफ द एंटायर वर्ल्ड। आप यह कहेंगे कि मेरे ही देश में टैलेंट है। मैं अपने ही देश बांधव मैं अपना ही रिलीजन, अपना ही लैंग्वेज, अपना ही रेस, अपना ही कल्चर को लेके रहूंगा। सो दैट विल बी अ सेल्फ डिफिटिंग प्रपोजिशन। इंडिया का सबसे बड़ा स्ट्रेंथ ही है अपना डायवर्सिटी। हमने जो देखिए पाकिस्तान का अगेन मैं उदाहरण दूंगा। उन्होंने ये सिंधी, पंजाबी ये सब लैंग्वेज है। किंतु उन्होंने क्या ठीक किया पागल की तरह कि उर्दू को सबके ऊपर में ठोप कर बैठा दिया। तो बंगाल यहां पे ये बांग्लादेश अलग हो गया। बोले हम लोग अपना बंगाली क्यों छोड़ेंगे? हम क्यों उर्दू अपनाएंगे? और अभी भी यह जो जो उनका ये जो इंटरनल चल रहा है प्रॉब्लम ये इसी की वजह से है। इंडिया में है कि हमने इस तरह का पागलपन कभी नहीं किया कि हिंदी ही सबको फॉलो करना है या एक ही कल्चर सबको फॉलो करना है। वी हैव इंक्रेडिबल डायवर्सिटी। वी शुड लिवरेज दिस डायवर्सिटी फॉर आवर प्रोग्रेस रेदर देन कि इसको अननेसेसरीली यूनिफॉर्म करने का प्रयास करें।