Prayer
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः
AI हमें स्टडी करने में कितना सहाय करता है!
स्वामी जी का जो भारत में प्रवचन है वो जो पूरा सीरीज हमने एक किताब के रूप में पब्लिश किया है। उस किताब का नाम है लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा। एक्चुअली इस सप्ताह हम जो प्रवचन को देख रहे हैं स्वामी जी के यह इसी लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा अर्थात कि अमेरिका से वापस आने के बाद में भारत में जो स्वामी जी ने व्याख्यान दिए हैं उसी सीरीज का एक लेक्चर माय प्लान ऑफ कैंपेन इस सप्ताह हम देखने वाले हैं। तो मैंने एक्चुअली क्या किया कि यह जो पूरा लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा है। यह पूरा किताब एआई में फीड किया और कहा कि एक पूरा स्लाइड बनाओ। तो इसने यह स्लाइड बनाया है और अच्छा है। बहुत ही अच्छा है। तो मैं आपके साथ में शेयर करता हूं। भारत में जो पूरे जितने भी प्रवचन दिए हैं, इस सभी प्रवचनों के सारांश एक इकट्ठा करके उसमें से मेनमेन पॉइंट इकट्ठा करके यह ए नोटबुक एलएम यह जो एआई है उसने यह स्लाइड बनाया है। और यह पूरा जो पॉइंट इकट्ठा करना, कौन सा स्लाइड का कौन सा डिजाइन, कौन सी स्लाइड में क्या टेक्स्ट यूज करना है, सब कुछ उसी ने ठीक किया है। मैंने तो कुछ नहीं किया। मैंने सिर्फ वो किताब इसमें डाल दिया है कि यह है पूरा किताब। इसके मेन पॉइंट उठा के स्लाइड बनाओ। मैंने सिर्फ इतना ही कहा है। बाकी का पूरा इस एआई ने अपने से किया है। तो काम भी बड़ा अच्छा किया है। देखिए समथिंग कि आज का जो एलएलएम टेक्नोलॉजी ना कि ये जो भी इसको आप कहना चाहे यह इतना धीरे-धीरे करके एडवांस हो रहा है। प्रत्येक स्टेज पर हम लोग कहते हैं कि अरे यह इतना ही तो है। इससे ज्यादा कहां कुछ करने वाला है। किंतु देखिए कि कल जो चीज हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे ये स्लाइड मैं बताऊंगा आपको इतना सुंदर रूप से स्लाइड्स बनाए हैं कि यदि मैं इस स्लाइड को बनाने जाता तो मुझे नहीं लगता कि मुझे 1 महीने से कम का टाइम लगता और पहली बात तो सब कांसेप्ट्स को समराइज करना है। उसके बाद में कौन सी स्लाइड में क्या कांसेप्ट लेना है? उसके बाद में उसकी डिजाइन क्या होनी चाहिए? ये सही में क्रिएटिव आर्ट वर्क है। और इसके लिए आपको मल्टी डायमेंशनल आपका स्किल होना चाहिए। मल्टीफेसेटेड स्किल होना चाहिए। कंप्यूटर का नॉलेज होना चाहिए। डिजाइनिंग और आर्ट की एक अच्छे से समझ होनी चाहिए। और उसके बाद में ऑफ कोर्स स्वामी विवेकानंद और वेदांत फिलॉसोफी या तो फिर रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर इसकी भी बड़ी गहरी समझ होनी चाहिए। तो अभी इतनी मल्टीफेसेसिटेड स्किल किसी एक पर्सन में हो वो तो है तो बड़ा ही मुश्किल। मैं जब राजकोट में था तो मैंने यह फोटोशॉप है, इलस्ट्रेटर है वगैरह डिजाइनिंग के सॉफ्टवेयर सीखे थे। तो मुझे पता है कि कहीं आपको एक अच्छे से अट्रैक्टिव कवर डिजाइन करना है किताब का या तो फिर मैगजीन था हमारा तो फोर कलर कलर मैगजीन था पूरा तो प्रत्येक पेज पे एक अट्रैक्टिव डिजाइन होनी चाहिए तभी तो यह कलर मैगजीन में लोगों को पढ़ने को आनंद आएगा और जो टॉपिक डिस्कस हो रहे हैं उसी के रिलेटेड ही वह डिज़ाइन होनी चाहिए। एग्जैक्टली उसी की तरह की दिखनी चाहिए। तो फिर इस तरह से करने में मैं देखता था कि एक डिजाइन यदि करनी है मुझे तो मेरा हाथ बैठ गया था डिजाइनिंग के ऊपर में। मेरे पास में बहुत ही अच्छे असिस्टेंट थे। बहुत सारा रॉ मटेरियल हमने इकट्ठा करके रखा था। इसके बावजूद एक अच्छी डिजाइन मेरा एक पूरा दिन खा जाती थी। तो यहां पर भी देखिए कि यहां पर आने के बाद में मैंने सोचा था कि मैं डिजाइन वगैरह जो है जो सीखा है भूल ना जाऊं बोलकर के कुछ ना कुछ प्रैक्टिस करता रहूंगा। किंतु अनफॉर्चूनेटली हुआ नहीं। यहां पे मेरा माइंड जो है अभी दूसरी डायरेक्शन एक्सप्लोर करने में लगा है। फिलॉसोफी में गहराई में जाना चाहता हूं। वगैरह-वगैरह एक नया डायमेंशन यहां पे मेरे जीवन का ओपन हुआ है। बोल के डिजाइनिंग को ऑलमोस्ट मैं भूल ही गया था। किंतु जब से यह एआई बेस्ड डिज़ ये चालू हुआ है तब से मैंने कहा मैं थोड़े से एक्सपेरिमेंट करके देखूं तो और सही में इतने सुंदर यह डिज़ बनाता है। एग्जैक्टली जो हम हमारी जो कांसेप्ट है हमारा एग्जैक्टली हो सकता है कि शायद इसको फॉलो ना करें। मैं यदि डिजाइन करूंगा यह 15 स्लाइड बनाई है तो मैं यह पूरा जो स्वामी जी का लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा है अर्थात कि यह जो जनवरी 1896 इस महीने में स्वामी जी अमेरिका से सर्वप्रथम भारत आए और जो श्रीलंका है वहां पे उन्होंने अवतरण किया जहाज में से तो वहां से प्रारंभ करके श्रीलंका में से साउथ इंडिया यानी कि यह तमिलनाडु है वगैरह से प्रवचन देते देते देते वो फिर कोलकाता आए। कोलकाता से फिर से उन्होंने भ्रमण किया। प्रवचन देते-देते अल्मोड़ा वगैरह गए। और यह फिर यहां पे यह वेस्टर्न इंडिया में भी आए। तो पूरे जो भारत का उन्होंने एक साल तक भ्रमण किया 1896 का पूरा 1897 का ना 1896 का पूरा साल। तो देखिए कि उन्होंने यह जो एक साल में जितने भी प्रवचन दिए उसमें इतना सारा उन्होंने टॉपिक्स कवर किए हैं कि अभी इतने सारे टॉपिक में से 15 टॉपिक लेकर के उसके ऊपर में इतना अच्छा डिजाइन करना मैं यदि मैनुअली करता तो मैं हो सकता है कि बड़ी अलग तरीके से करता एआई ने जो किया है वो उसने अपने तरीके से किया है। किंतु फिर भी मैं यदि अपने तरीके से करने को जाता तो मुझे 1 महीने से कम में टाइम कभी नहीं लगता और इतना मैं टाइम कभी नहीं दे पाने वाला हूं। तो देखिए कि इस तरह का स्लाइड यदि मुझे मैनुअली बनाना होता तो मैंने कभी नहीं बनाया होता। किंतु बिकॉज़ ऑफ एआई ये स्लाइड बने हैं 15 स्लाइड भारत में स्वामी जी ने जो कुछ कहा उसका सारांश लेकर के और काफी अट्रैक्टिव डिजाइन करके ये पूरा स्लाइड बना है। यदि मैं अपने से इस तरह का स्लाइड बनाने को जाता तो हो सकता है कि इतना ब्यूटीफुल भी ना होता और हो सकता है कि कभी बनता भी नहीं। तो एनीवे इस स्लाइड को देखते हैं। यहां पर 15 स्लाइड है और बहुत ही अच्छे से इसने सजा करके बहुत ही अच्छे से डिजाइन करके रखा है। देखते हैं पहले स्लाइड में क्या कहते हैं। एक्चुअली
स्वामी विवेकानन्द के सामने चुनौती — भारत को राजसिक तो बनाना है, पर राक्षसी नहीं -- भारत की भौतिक उन्नति तो करानी है, पर दुर्बल राष्ट्रों के शोषण से नहीं
देखिए कि पहली बात तो यह है कि भारत में जो स्वामी जी कहना चाहते हैं वो आईडिया तो बेसिकली हम सबको पता है। विदेश में यानी कि अमेरिका में स्वामी जी ने जो कहा वो चार योगों में जो बंटा हुआ है कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग और राजयोग। तो यह चार योग बेसिकली स्वामी जी ने अमेरिका में कहे हैं। और वहां पर क्या थीम था स्वामी जी का? स्वामी जी कहते हैं कि यह लोग रजस की इस सीमा के ऊपर में इस चरम शिखर पर बैठे हैं कि यहां से इन लोगों को सत्व में जाने की जरूरत है। तो वो स्वामी जी की थीम थी अमेरिका में रजस से सत्व की यात्रा अर्थात कि बाहर के जगत में आपने बहुत घूम लिया। बाहर के जगत में आपने सुख और उपभोग का प्रयास किया प्राप्त करने का और अभी देखिए कि एक हद के बाद में बाह्य जगत के सुख और उपभोग जो है आपको फिर डिप्रे आपको फिर रोग के अलावा और कुछ नहीं देंगे। देखिए जैसे कि रसगुल्ला है। आप एक रसगुल्ला खाएंगे आपको बहुत अच्छा लगेगा। दो खाएंगे हो सकता है आपको डबल आनंद आए। तीन खाएंगे तो हो सकता है कि तीन गुना आनंद आए। किंतु फिर चार खाने को जाएंगे तो हमें देखिए कि पेट बिगड़ेगा। यानी कि यह भोग से रोग जो है एक ही स्टेप दूर है। तो फिर यदि आप कहेंगे कि मनुष्य का स्वभाव जो है वह तो आनंद की प्राप्ति करने का ही है तो फिर मनुष्य के लिए क्या उपाय है भविष्य में? मुझे आनंद को मैक्सिमाइज करना है। अभी रसगुल्ला खाकर तो मैं आनंद को मैक्सिमाइज अप टू वन लिमिट ही कर पाऊंगा। इसके बाद में मैं पुश करूंगा तो भोग में से रोग में डूब जाऊंगा। तो मुझे इस तरह का आनंद चाहिए जिसको कि मैं मल्टीप्लाई करता ही जाऊं, करता ही जाऊं, करता ही जाऊं और वहां पर कभी भी मैं रोग का शिकार ना होऊं। आनंद के बाद महत आनंद, महत आनंद के बाद में उच्च आनंद की प्राप्ति मुझे सतत होती रहे। यह मनुष्य चाहता है और इसीलिए देखिए कि वह चाहे बाह्य जगत में हो वह कितना चारों ओर दौड़ता रहता है। भोग को कितना रिफाइन करने का ट्राई करता है। किंतु आखिर में बाह्य जगत में यह जो स्टोन वॉल जो है वो स्टोन वॉल उसके सामने यह जो एक बैरियर जो है भोग के पर्स्यूट में वो उसके सामने मटेरियलिज्म के पर्स्यूट में उसके सामने यह आ ही जाएगी और फिर मनुष्य जो है धीरे-धीरे करके इंट्रोवर्ट होगा। वो एक तरीका है इंट्रोवर्ट होने का। दूसरा है कि भोग के पर्स्यूट में जब डिजास्टर आता है, डिजास्टर आने ही वाला है तब फिर से मनुष्य इंट्रोवर्ट होगा। देखिए स्वामी जी ने उसी समय कहा था कि यूरोपियन वर्ल्ड जो है एक बहुत बड़े बारूद के ढेर के ऊपर में बैठा है। कब इसमें विस्फोट होगा कह नहीं सकते। विद इन 50 इयर्स विस्फोट हो सकता है। स्वामी जी ने कहा तो देखिए कि सही बात है कि यह फर्स्ट वर्ल्ड वॉर, सेकंड वर्ल्ड वॉर जो तबाही यूरोप और अमेरिका ने देखी है। उनके जो यंग जो उनके यह सोल्जर्स हैं, उनके सिटीजंस हैं जो लोग इस तबाही को उन्होंने अनुभव किया है। तो उनको पता चला है कि नहीं कि यह इसके परे भी मटेरियलिज्म के ब्लाइंड पर्स्यूट के परे भी एक जगत है। तो वह स्वामी जी उनको कहना चाहते थे कि आप लोग रजस में बहुत डूबे हैं। अभी आप सत्व में जाइए तो एक के बाद एक चार योग ज्ञान योग है, कर्म योग है, भक्ति योग है, राजयोग है। यह स्वामी जी ने अमेरिका और लंदन में यह बात स्वामी जी ने कही। किंतु जब स्वामी जी भारत में आए तो उन्होंने ऑलरेडी भारत की क्या परिस्थिति है। उनको पता ही था। अमेरिका जाने से पहले ही भारत भ्रमण करके स्वामी जी ने देख लिया था कि भारत पूरा तमस में पड़ा हुआ है और तमस में डूबे हुए भारत को रजस में लाने की जरूरत है। तो यह स्वामी जी को एकदम क्लियर आईडिया था कि ठाकुर के जो उपदेश है उसका जो सर्वोच्च भाग जो है वह भारतवासी शायद डायरेक्टली ग्रहण ना कर पाए। उनको इनडायरेक्ट वे में ठाकुर के पास में ले जाना है। किंतु देखिए कि यहां पर स्वामी जी को एक चीज बड़ी क्लियर रखनी थी। तमस में से रजस में जाने का आप उपदेश देते हैं। तो यह कौन सा मॉडल भारत को इस्तेमाल करना है? कौन से मॉडल को भारत को फॉलो करना है? क्या अमेरिका या यूरोपियन मॉडल को फॉलो करना है जो कि ब्लाइंड मटेरियलिज्म में घुस गए थे। यह वेस्टर्न वर्ल्ड में क्या हुआ था कि एक स्टेट और चर्च इन दोनों के बीच में स्प्लिट हो गया था और यह स्प्लिट होना आवश्यक था क्योंकि चर्च जो है वो मिडिल एजेस में वो इतना भयानक करप्शन में डूब गया था वहां का जो क्रिश्चियन रिलीजन है उसके जो प्रैक्टिशनर है देखिए धर्म कभी करप्ट नहीं होता धर्म के जो प्रैक्टिशनर होते हैं वो करप्ट होते हैं तो ये क्रिश्चियन चर्च के बहुत सारी ये जो ये जो ऑफिशियल्स थे ये पादरी कहो ना कि चाहे आर्च बिशप कहो ना कि बिशप कहो वगैरह-वगैरह इंक्लूडिंग पॉप इतना भयानक करप्शन घुस गया था कि बहुत सारे लोगों को धर्म के ऊपर में अश्रद्धा हो गई थी। अभी धर्म के ऊपर में अश्रद्धा होगी तो उपाय क्या है? तो भोग में डूब जाओ। धर्म ही तो आपको यह मटेरियलिज्म से थोड़ा बहुत बचा के रखता है। तो जैसे ही धर्म का कंट्रोल चला गया वहां का जो समाज है मटेरियलिज्म में इस तरह से डूब गया। और पता है मटेरियलिज्म किस तरह का यह आकार धारण करता है। हम लोग सोचेंगे कि मटेरियलिज्म का यह अर्थ है कि एक आम आदमी अपना जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य उसी को समझता है कि और ज्यादा पैसा चाहिए और ज्यादा चीजें चाहिए और ज्यादा यह चाहिए। इस तरह से हम समझते हैं। किंतु देखिए सोसाइटल लेवल पर लार्जर स्केल पर सिविलाइजेशनल स्केल पर मटेरियलिज्म किस तरह से मैनिफेस्ट होता है। यहां पे बात सिर्फ आम आदमी की नहीं है। बात है ऐसे लोगों की जिसके पास में सत्ता है जिनके पास में अधिकार है, पावर है जिन लोगों के पास में और ऑथॉरिटी है। इन लोगों के भीतर में जब मटेरियलिज्म प्रवेश करता है तब यह लोग क्या करेंगे? जनता का भयानक शोषण करने का प्रारंभ करेंगे। उस समय में जब ब्रिटेन में इंडस्ट्रियल रेिवोल्यूशन आया था। उस समय में ब्रिटेन की ये जो फैक्ट्रीज थी वहां पे ये छोटे-छोटे लड़के हैं या स्त्रियां हैं औरतें हैं उनको उनके पास में काम करवाते थे। और उनका जो परिस्थिति था इतना दयनीय था। यह फैक्ट्री वर्कर्स का इतना दयनीय था। इतना पिटिएबल था कि हम लोगों को देख नहीं सकते। इस तरह से उन लोगों के ऊपर में यह लोग अत्याचार करते थे। बस कैसे भी करके यह छोटे बच्चे हैं उनके पास में काम करवाओ काम करवाओ। यह छोटा बच्चा मर भी जाए तो कोई फिक्र नहीं है। यह प्रोडक्शन जो है वो नहीं अटकना चाहिए। और यही जो मटेरियलिज्म वैल्यू जो है वो जापान ने लिया और जापान यह सेकंड वर्ल्ड वॉर के पहले का जापान। जबकि जापान भी सोचता है कि हम लोग भी एक बहुत बड़े तमस में डूबे हैं। तो अमेरिका और यूरोप का अनुकरण करके हम लोगों को भी रजस में आना चाहिए। किंतु किस तरह का रजस अपनाया? वही रजस वही मटेरियलिज्म जो कि उस समय अमेरिका यूरोप में फैला था। तो वही फैक्ट्रियां बनाई और वही फैक्ट्रियों में यह बच्चों को उन्होंने बच्चों के पास में से काम करवाना शुरू किया। अभी हुआ क्या? एक स्टोरी मैंने पढ़ी थी। चाइना पे हमला किया। माने यह मिलिटरिज्म है। यह इंडस्ट्रियलाइजेशन है। यह वर्करों का, फार्मर्स का शोषण है। यह सब जो 19th सेंचुरी कैपिटलिज्म था 18th 19th सेंचुरी कैपिटलिज्म यह सब उसकी लाक्षणिकताएं थी। तो वही सब कुछ जापान ने अपना लिया। तो वहां पे भी इंडस्ट्रियलाइजेशन चालू हुआ। वहां पे भी बड़ी-बड़ी फैक्ट्री हुई। वहां पे भी यह मिलिटरलिज्म है। मिलिटरिज्म अर्थात कि मिलिट्री को और ज्यादा सशक्त बनाओ। और ज्यादा वेपंस बनाओ और ज्यादा जो कॉन्क्वेस्ट है कॉलोनाइजेशन है वो चालू करो और जिसको कॉलोनाइज करते हैं इन लोगों का शोषण चालू करो। स्वामी जी गए थे जापान। स्वामी जी ने जापान की प्रशंसा की है। किंतु एट द सेम टाइम स्वामी जी को यह पता था कि जिस इंडस्ट्रियलाइजेशन या तो जिस कहेंगे कि यह मॉडर्नाइजेशन की वो प्रशंसा कर रहे हैं। जापान में भी अमेरिका में भी और यूरोप में भी। यह जो को कैपिटलिज्म जो है, यह जो मटेरियलिज्म जो है, यह भोगवाद का यह जो पूरा जगत है, एक बहुत बड़े विस्फोट में इसके भीतर में एक बहुत बड़ा विस्फोट होने वाला है। और इन लोगों को सफर करना होगा। जापान की एक स्टोरी मैंने पढ़ी थी। चाइना के ऊपर में अटैक किया, चाइना में को कॉलोनाइज किया। कुछ-कुछ प्रोविंसेस को और फिर वहां पे फैक्ट्री एस्टैब्लिश की। अभी यह छोटे-छोटे बच्चे हैं। उनके पास में से जोर जबरदस्ती करके फैक्ट्री में काम करवाते हैं। तो एक छोटी बच्ची थी बेचारी मुश्किल से 10 12 साल की होगी। अभी यह हैवी मशीनरी ऑपरेट कर रही है। सोच के देखिए बेचारी को कुछ पता नहीं है मशीनरी के बारे में। फिर भी यह लोग उसको मार मार करके ऑपरेट करवा रहे हैं। अभी यह मशीन ऑपरेट कर रही थी। उसको तो पता नहीं कैसे क्या करना है। एकाएक मशीन में से कुछ निकला। वह सीधा उसकी आंख में चला गया। वह अंधी हो गई। एक आंख में खून निकल रहा है। पूरी आंख उसकी चली गई है। मशीन जो है उसकी आंख में घुसा हुआ है। तो भी देखिए कि वो बेचारी रो रही है। उसके बावजूद वहां का जो यह जापानीज जो सुपरवाइजर है उसके प्रति किसी भी तरह की सिंपथी नहीं रखता। क्यों? क्योंकि उसका एक ही काम है लड़की का कि वह मशीन को चलाए। वो यदि मशीन नहीं चला सकती तो वह मर जाए वह बेटर है। बिना मतलब मुफत में उसको खाना ना खिलाना पड़े। तो इस तरह की भयानक स्टोरीज ये जापान में भी इस तरह की है। ब्रिटेन में भी इस तरह की है। यह अमेरिका में यह काले लोग थे। निग्रो जो थे अफ्रीका में से पकड़ करके गुलाम बना करके लेके आते थे। उन लोगों पे जिस तरह का अत्याचार वहां पे अमेरिकन आजकल वो जो ह्यूमन राइट्स की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं ना यह अमेरिकन लोगों ने निग्रोस के ऊपर में इस तरह के अत्याचार किए हैं कि यदि हम ये कहानियां पढ़ेंगे तो हमारे रोंगटे खड़े हो जाएंगे। और फिर भारतवासियों को तो अपना ही इतिहास देख लेना है। देखिए कि यूरोपियंस भारत में आए तो किस तरह से उन्होंने भारत को एक्सप्लइट किया। भारत का यह जो वैभव है, भारत का अन्न है, भारत की यह जो प्रोडक्ट्स है, वो छीन करके यूरोप में ले गए और भारत में अकाल के बाद अकाल पड़ते रहे और लाखों लाखों नर नारी मरते रहे। इनके पेट में कोई पानी भी नहीं हिलता। यह गुजराती कहावत है। माने यदि आपको कोई फर्क नहीं पड़ता है किसी चीज से तो कहते पेट का पानी भी नहीं हिलता। तो देखिए कि यह एक कैपिटलिस्टिक मटेरियलिज्म था। तो स्वामी जी जब भारत को यह कहते हैं कि तमस से रजस में आओ तो स्वामी जी भारत को यह जापान वाला रास्ता इस्तेमाल करने को नहीं कहते या कि जापान ने अमेरिका का यूरोप का अंधा अनुकरण किया और वहां का जो मटेरियलिज्म है कैपिटलिज्म है जो कि लोगों के शोषण के ऊपर में बना है जापान ने भी जो किया इस तरह का मटेरियलिज्म कैपिटलिज्म भारत में स्वामी जी नहीं चाहते थे तो फिर अल्टरनेट उपाय क्या है? तमस में रजस में तो आना ही है और रजस में जैसे ही जाएंगे तो साथ में ही यह कैपिटलिज्म और कैपिटलिज्म के जितने भी एसोसिएटेड ईवल है वो सब भारत में आ जाएंगे। ये आरोनी ऑफ हिस्ट्री देखिए। हिस्ट्री इतिहास का कटाक्ष देखिए कि ये कैपिटलिज्म से बचने के लिए या कैपिटलिज्म का सामना करने के लिए मार्क्सिज्म है या ये जिसको कम्युनिज्म कहते हैं वो डेवलप हुआ। अभी ये जो कम्युनिज्म है जो कि रशिया में जो बड़ा ही विस्तृत हुआ था। सोवियत यूनियन की रचना हुई। यह कम्युनिस्ट प्रिंसिपल के ऊपर में इसी सोवियत यूनियन में इतना अत्याचार नागरिकों के ऊपर में हुआ है। वो पगले स्टालिन ने किया है कि जिसकी कहानियां पढ़ के ही हम लोगों की रात की नींद उड़ जाएगी। यानी कि देखिए कि यह फैक्ट्री ओनर्स जो है या तो यह जो कैपिटलिस्ट क्लास है वो वर्कर क्लास का एक्सप्लइटेशन करता था। उसके अगेंस्ट में एक दूसरी फिलॉसोफी स्टार्ट हुई। तो यह फिलॉसोफी कौन किंतु प्रॉब्लम क्या है कि जिस मटेरियलिज्म के ऊपर में यह कैपिटलिज्म बना था उसी मटेरियलिज्म के ऊपर में यह मार्क्सिज्म बना था। ये दोनों है फंडामेंटली मटेरियलिस्टिक फिलॉसोफी ही बस है कि एक दूसरे का अपोजिशन कर रही है। और उसी समय एक तीसरी फिलॉसोफी स्टार्ट हुई वो है फासिज्म। ये जर्मनी का हिटलर और ये इटली का वो मुसोलिनी ये दोनों महापगले और यह जापान उस समय का। तो यह फासिज्म स्टार्ट हुआ। एक है एक और है कैपिटलिज्म। एक महा भयानक राक्षस उसके सामने दूसरा राक्षस खड़ा हुआ। मार्क्सिज्म या कम्युनिज्म और इसके सामने तीसरा बड़ा राक्षस खड़ा हुआ। वो था फासिज्म। ये तीनों के तीनों राक्षस और तीनों मटेरियलिस्टिक फिलॉसोफी पर बने हैं। और तीनों एक दूसरे के साथ में झगड़ रहे हैं। और इसी में से यह फर्स्ट वर्ल्ड वॉर और सेकंड वर्ल्ड वॉर वगैरह-वगैरह स्टार्ट हुआ था। और जापान भी इसमें डूबा, यूरोप भी डूबा, अमेरिका भी डूबा। किंतु वही बात है कि सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद में उन लोगों में थोड़ा बहुत तो अकल आया और यूनाइटेड होकर के उन्होंने प्रोस्पेरिटी साधन का प्रयास किया। आज हमारे सामने उस समय जो स्वामी जी के सामने प्रॉब्लम क्या था? ना ही यह कैपिटलिज्म चलेगा, ना ही यह मार्क्सिज्म चलेगा और फासिज्म का वैसे उस समय कोई डेवलपमेंट नहीं हुआ था। किंतु फासिस्ट आइडियाज जो है वो कैपिटलिज्म के भीतर में भरे हुए हैं। यानी कि दोनों के भीतर में कैपिटलिज्म और मार्क्सिज्म के भीतर में। तो ये ये दोनों जो आइडियाज थे मेजर आइडियाज ये कैपिटलिज्म वाला और ये मार्क्सिज्म वाला ये दोनों आइडिया को स्वामी जी को फॉलो नहीं करना था। चाइना को देखिए। चाइना का सेम परिस्थिति जो कि जापान और भारत का था। उस समय आप देखेंगे कि यह जो एशिया जो है लंबी नींद से जग रहा था। सिर्फ भारत ही नहीं और एशिया में हमको तीन कंट्रीज दिखते हैं जो कि इस तरह से वे लोग सोच रहे हैं कि कौन सा रास्ता इस्तेमाल किया जाए। तो जापान जो है उसने यह हार्ड कोर कैपिटलिज्म का रास्ता चुना। वो भी भयानक ये मिलिटरिज्म में डूब गया। उसी ने तो चाइना पे अटैक किया था और चाइना का इतना एक्सप्लइटेशन जापान ने किया था। तो जापान वो मटेरियलिज्म के रास्ते पर चला। फिर चाइना भी सोच रहा है कि हमारे लिए कौन सा उपाय है? तो उन्होंने मार्क्सिज्म को चुना। अभी मार्क्सिज्म भी तो यह पूरा मटेरियलिस्टिक फिलॉसोफी है। तो यह जो माओजेदोंग था उसने अपने ही चाइनीस बांधवों के ऊपर में भयानक अत्याचार किए थे। तो वो भी इस तरह से वह ब्लड शेड में डूब गया। तो देखिए कि यहां पे सोवियत रशिया था। वह भी तो आधा एशियन ही है। उसको भी नींद से जगना था। तो उसने मार्क्सिज्म यूज़ किया। तो उस समय का परिस्थिति क्या था? एक था कि वेस्टर्न यूरोप और नॉर्दन अमेरिका जो कि काफी इंडस्ट्रियलाइज हो चुके थे और उन्होंने कैपिटलिज्म का कॉलोनियलिज्म का कॉलोनियलिज्म का रास्ता इस्तेमाल किया था। तो वो वो तो भयानक रास्ता था। एशिया पे अत्याचार करके अपनी संपत्ति बढ़ाई थी। एशियन के ऊपर में और अफ्रीकन के ऊपर में और जब यह एशिया और अफ्रीका जगे तो वे लोग कहते हैं कि हमको भी उन्हीं के जैसा होना है। तो ये मार्क्सिज्म ये कैपिटलिज्म रैंपेंट कैपिटलिज्म यह सब उन्होंने इस्तेमाल किया। यह पूरा जगत जो है वह एक ही डायरेक्शन में गोल घूम कर के जा रहा है और वह है कि जो धनपति है जो कि जिनके पास में पावर पोजीशन है वे लोग कमजोर लोगों का शोषण करेंगे। इस डायरेक्शन में पूरा जगत जा रहा था। उस समय स्वामी जी के सामने यह चैलेंज था कि भारत को एडवांस होना है। भारत को राजसिक तो होना है। एट द सेम टाइम भारत को राक्षसी नहीं होना है। राजसिक होना है और राक्षसी नहीं होना है। जो कि यह चाइना में भी हुआ, जापान में भी हुआ, सोवियत यूनियन में भी हुआ, इटाली में भी हुआ और जर्मनी में भी हुआ। उस समय के जितने भी देश नींद से जग रहे थे सबके साथ में। और जो ऑलरेडी जग चुके थे वे लोग ऑलरेडी महा भयानक राक्षस होकर के बैठे ही थे। जैसे कि फ्रांस है या तो फिर स्पेन और पोर्गल या तो फिर ब्रिटेन और अमेरिका। तो देखिए कि यह सब ऑलरेडी राक्षस हो के बैठे थे और जो उनका अनुकरण करना चाहते थे वे लोग उनसे भी बड़ा राक्षस होना चाहते थे। तो यह राक्षस होने की यह जो पूरी रेस थी उसमें से भारत को बचाना था स्वामी जी को और माने एडवांस भी होना है ना तमस रूपी निद्रा में सोते भी नहीं रहना है एट द सेम टाइम हमको राक्षस नहीं होना है राजसिक होना है राक्षसी नहीं होना तो कौन सा रास्ता अपनाए तो जो सात्विक रजस वाला रास्ता या तो फिर उपनिषद में जो निहित शक्ति है उसमें से रास्ता निकालने का स्वामी जी ने सोचा और यह जो उपनिषद का जो क्या आईडिया है पता है आत्मनो मोक्षार्थम अर्थात कि आत्म का मोक्ष जो है वही हमारा सर्वश्रेष्ठ यह उद्देश्य है। किंतु इसी आत्मनो मोक्षार्थम को आप यदि प्रैक्टिकल करने को जाएंगे प्रैक्टिकल वेदांत तो उसका सामने का समीकरण क्या होता है? वन हाफ ऑफ फार्मूला इज आत्मनो मोक्षार्थम जो कि हमको उपनिषद में मिलता है। किंतु इसी आत्मनो मोक्षार्थम को आप प्रैक्टिकल करने को जाएंगे तो व्हाट इज द सेकंड हाफ ऑफ द इक्वेशन दैट इज जगत हितायच। तो यह हो गया स्वामी जी का प्लान कि उपनिषद में जिस तरह से हमको यह कहा गया है कि हमारे भीतर में निहित जो सिंह जो सोया हुआ है इस सिंह को जगाना है। आत्मन रूपी जो महाशक्ति हमारे भीतर में निहित है। साधन भजन करके इस शक्ति को जागृत करना है। दैट इज़ वन पार्ट ऑफ द इक्वेशन और सेकंड पार्ट ऑफ इक्वेशन कि जब यह महाशक्ति जागृत हो जाए इसके बाद में समाज कल्याण में अपने यह जो अनफॉर्चूनेट भाई-बहन है उनके कल्याण में इस शक्ति को हमको लगाना है। तो यह टू पार्ट ऑफ द इक्वेशन e = mc² आत्मनो मोक्षार्थम जगत हिताय च यह था स्वामी जी का सॉल्यूशन भारत के लिए तो यह जो भारत में जो उन्होंने प्रवचन दिए हैं इसमें इतनी गहराई है इतनी फिलॉसोफिकल डेप्थ है कि अभी तक हम इसको समझ नहीं पाए हैं। जैसे देखिए कि ये कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो था। मार्क्स ने लिखा था जिसके बेसिस के ऊपर में यह बात का मार्क्सिज्म या फिर यह कम्युनिज़्म प्रारंभ हुआ। तो वैसे ही यह यदि भारत की फिलॉसोफी आप बोलेंगे कि भारत की कौन सा इज्म है? हम लोगों ने बहुत लंबे समय तक ये सोशलिज्म बोल कर के एक एक्सपेरिमेंट किया। जो कि कभी सफल नहीं होने वाला था। हमको पता ही था क्योंकि स्वामी जी के आइडियाज के ऊपर में यह बेस नहीं है। अपनी भारतीय जो यह प्रणाली है धारा जो है हमारी यह जो उपनिषदों की धारा उपनिषद गंगा एक टीवी सीरीज थी। तो इस तरह से यह जो उपनिषद गंगा जो है हमारी इसको फॉलो नहीं करता है तो फिर वह एक अलग डायरेक्शन में यह विदेश का एक एक्सपोर्ट इंपोर्ट किया हुआ एक होचप फिलॉसोफी सोशलिज्म हम फॉलो कर रहे थे जो कि कंप्लीटली वो फेल हो गया। यह जो पेमेंट क्राइसिस हुआ 1990 में हमको यह लिबरलिज्म लाना पड़ा। तो फिर यह देखिए कि लिबरलिज्म के बाद में यह जो मनमोहन के यह जो यह थे वह इंडियन इकोनमी को ओपन करने के ज्यादा कैपिटलिस्ट होने के तो यह जो अपना सेकंड जो एक्सपेरिमेंट प्रारंभ हुआ था 1990 में तो अभी यह मिड न 2020 है और मुझे नहीं लगता कि यह एक्सपेरिमेंट भी कोई बहुत ज्यादा सक्सेसफुल हो रहा है। हमने जिस जिस समय हम लोग लिबरलिज्म ला ला रहे थे उसी समय चाइना भी अपने मार्केट्स को ओपन कर रहा था। हमारे साथ में जो हुआ चाइना के साथ में जो हुआ रास्ता बड़ा ही क्लियर है। आज चाइना का पर कैपिटा जीडीपी भारत से ऑलमोस्ट पांच गुना ज्यादा है। और जब भी चाहे हमको धमकाता है और बेचारा मोदी भी इसके सामने कुछ नहीं कर पाता। तो फिर देखिए कि यह जो भारत की परिस्थिति है यह लिबरलिज्म भी जो है 1990 का वो हो चुका है धीरे-धीरे करके फेल। यदि हमको भविष्य में इस तरह की महासत्ता बनना है जिसके सामने कोई आंख उठाकर के देखने का साहस ना कर पाए। ना ही चाइना ना ही अमेरिका आज अमेरिका का प्रेसिडेंट जब भी चाहे इंडिया को कह सकता है कि डेड इकोनमी है। एक छोटा सा यह कतर है। छोटा सा सऊदी अरेबिया है। इसकी पॉपुलेशन यह विशाखापटनम से ज्यादा नहीं होगी। वो जाकर के वो ट्रंप के साथ में बड़ा मजे से बात करता है और यह जो 150 करोड़ का देश है उसका पीएम बेचारा वो मायूस हो के बैठा है कि ये ट्रंप सरकार हमको कब दावत देती है। तो देखिए कि और ट्रंप को चाहे तो वो पाकिस्तान को बीच में ले आएगा। हमको ह्यूमिलिएट करने के लिए। तो यह जो परिस्थिति में हमने अपने को आज लाके रखा है। थर्ड रेवॉल्यूशन की जरूरत है। और ये थर्ड रिवॉल्यूशन जो है स्वामी जी ने उसी समय दे दिया था। बिफोर इंडिपेंडेंट मूवमेंट इंडिपेंडेंस का जो मूवमेंट प्रारंभ हुआ उससे पहले ही स्वामी जी ने यह हमको सूत्र दे दिया था। अनफॉर्चूनेटली हमने इसको फॉलो नहीं किया बोलकर के आज हमारी यह दुरावस्था है। तो देखिए कि अभी भी समय है। अभी भी नींद से जग सकते हैं कि यह जो अपना यह स्वामी जी का जो मेनिफेस्टो है फॉर ए बेटर इंडिया फॉर ए फ्यूचर बेटर इंडिया। इस मैनिफेस्टो को हम समझे। इसको हम पब्लिक लाइफ में धीरे-धीरे करके अप्लाई करें। सो व्हाट इज दैट मैनिफेस्टो फॉर इंडिया फॉर ए फ्यूचर इंडिया फॉर ए हायर एंड बेटर इंडिया। यह पूरा मैनिफेस्टो स्वामी जी का यह जो पूरा थ्यरी जो है जो कि इंडियन सिविलाइजेशन को उच्च से उच्च स्तर पर ले जाएगा। यह पूरा यह लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा में बिठाया हुआ
भारतवासी स्वामी विवेकानंद का सम्मान करते हैं
है। तो यह जो 15 स्लाइड है एआई ने बनाया है वो देखते हैं। एक के बाद एक में देखिए ये फर्स्ट स्लाइड है। क्या कहता है? अवेकनिंग द जयंट यह जो महाशक्ति जो है उसको जागृत करना है। स्वामी विवेकानंदास को टू ए न्यू इंडिया। अभी यह जो पहला स्लाइड है टू बिकॉज़ के मैंने पूरा लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा किताब डाला था। आपको शायद पता होगा कि प्रत्येक लेक्चर के पहले एक मानपत्र यानी कि वहां के जो लोकल लोग हैं वहां के अभी जैसे कि कोलकाता गए तो कोलकाता के जो प्रतिष्ठित लोग थे उस कोलकाता के सोसाइटी के उन्होंने स्वामी जी को एक मानपत्र प्रदान किया कि हम आपको एप्रिशिएट करते हैं कि आपने अमेरिका जाकर के हिंदू धर्म का है अपनी संस्कृति का रिप्रेजेंटेशन किया। तो जहांजहां पर भी स्वामी जी गए तो स्वामी जी के ओनर में इस तरह से मान पत्र प्रदान किए गए हैं। तो यह फर्स्ट स्लाइड बिकॉज़ के प्रत्येक लेक्चर के प्रारंभ में प्रत्येक तो नहीं किंतु ज्यादातर लेक्चर के प्रारंभ में इस तरह से मानपत्र है। तो बोलकर के फर्स्ट स्लाइड उसने बनाया है। यह मानपत्र के बारे में ही। वी डिमिट ए प्रिविलेज टू बी द फर्स्ट टू वेलकम यू ऑन योर रिटर्न होम फ्रॉम योर ग्रेट मिशन इन द वेस्ट। मोस्ट प्रोबेबबली यह कहीं यह कोलंबो का ही यह होगा। पता नहीं देखना पड़ेगा ये कि ये हमारा प्रिविलेज है कि भारत में आने के बाद में आपको सर्वप्रथम हम वेलकम करें और फिर माने यह जो मानपत्र है उसमें से लिखा हुआ है और प्रोक्लेमिंग द हिंदू आइडियल ऑफ ए यूनिवर्सल रिलीजन हार्मोनाइजिंग ऑल क्रीड स्वामी जी ने क्या किया है विदेश में तो यह हिंदू आइडियल है यूनिवर्सल रिलीजन का और जितने भी पथ है एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं इस जो आइडियल जो है विदेश में प्रतिपादित किया है। फेसिंग प्लेसिंग द वेस्ट इन लिविंग कांटेक्ट विथ द स्पिरिचुअल जीनियस ऑफ इंडिया। और स्वामी जी ने क्या किया है? क्यों स्वामी जी को यह मानपत्र प्रदान करते हैं समाज के यह जो प्रतिष्ठित लोग क्योंकि यह जो अमेरिकन शक्ति जो है उसको इंडियन स्पिरिचुअलिटी के साथ में कांटेक्ट में स्वामी जी लाए हैं। डिलीवरिंग मेनी कंट्री मैन फ्रॉम द ग्लैमर ऑफ वेस्टर्न सिविलाइजेशन। और यहां पर भारत में हम सब लोग जो सोच रहे थे कि हम लोग काले गुलाम जीवन भर काले गुलाम ही रहने वाले हैं और वह गोरे राजा हमेशा राज ही करने वाले हैं। यह जो एक मेंटल मानसिक गुलामी जो थी जिसका कि हम भोग बन चुके थे। यह मानसिक गुलामी स्वामी जी ने सर्वप्रथम तोड़ी। इसके बाद में ही तो यह करेज आएगा। उसके बाद में ही तो हम एक्चुअल फ्रीडम स्ट्रगल स्टार्ट करेंगे। तो ये मानसिक गुलामी में से भारत को जो बचाने का कार्य स्वामी जी ने किया था। अनफॉर्चूनेटली देखिए ये पिछले 20 30 ना 40 साल में हम लोग फिर से उसी मानसिक गुलामी का भोग बन गए हैं कि हम काले लोग गुलाम ही है और यह गोरे रोग जो है वह हमेशा यह एडवांस ही रहने वाले हैं और यह मानसिक गुलामी में डालने का जो एक काम है इसमें बहुत सारे हमारे ही ये जो गद्दार जो होते हैं ट्रेटर होते हैं प्रत्येक देश में कोई ना कोई ट्रेटर होता ही है। अनफॉर्चूनेटली भारत में यह ट्रेटर्स की संख्या बाकी सबसे काफी ज्यादा है। तो, यह हमारे ही कुछ-कुछ लोग हमारे मन में डालते रहते हैं कि यह यूरोप अमेरिका में जो वे लोग जो कह रहे हैं सब सही और हम लोग जो कर रहे हैं सब गलत। तो एक तरह की मानसिक गुलामी का पहली बार स्वामी जी ने हमको जगाया था। हमको मुक्त किया था। उसी तरह से फिर से इस तरह की मानसिक गुलामी में से मुक्त होने का समय हमारे लिए आ गया है। और यह की टेक अवे क्या है? यह स्वामी जी का रिस्पांस है इसमें ये जो मानपत्र जो है उसका द ग्रैंड रिसेप्शन वाज़ नॉट फॉर ए पॉलिटिशियन सोल्जर और मिलियनर बट फॉर ए बैगिंग सन्यासी प्रो प्रूविंग दैट रिलीजन इज द बैकबोन ऑफ द नेशनल लाइफ इन इंडिया। स्वामी जी क्या कहते हैं कि यह जो मुझे इतना बड़ा सम्मान मिल रहा है। यह सम्मान कोई एक सोल्जर को नहीं मिल रहा। एक पॉलिटिशियन को नहीं मिल रहा। किंतु एक एक सन्यासी को मिल रहा है। वही तो सबसे बड़ी बात है। देखिए कि हम लोगों ने देखा कि स्वामी जी ने एक बार कहा था कि ये जितने भी विदेश में आप जाएंगे ना एक कार्डिनल भी होगा ना। तो कार्डिनल यह कहेगा कि देखिए कि मेरे जो पूर्वज थे ना वह कोई रोबर बेरोन थे। बैरोन अर्थात कि एक नोबल मैन यानी कि एक लोकल राजा और वह जो लूटने वाला एक राजा था वहां पे तो क्या है राजा कौन बनता है जो सबसे ज्यादा लूट पाए लोगों को तो यह लूटने वाला यानी कि एक शोषणकर्ता एक राजा उसके हम डिसेंडेंट है एक एक कार्डिनल भी ऐसा कहेगा कार्डिनल कौन है तो चर्च में जो बहुत बड़ा एक पोजीशन जिसका है उसका वो भी चाहता है माने ये जो चर्च के ये जो तथाकथित होली मैन है वे लोग भी कहना चाहते हैं कि हमारे पुरखे जो थे ना कि लुटेरे थे और वह लोगों पर शासन करते थे। क्यों? क्योंकि वेस्टर्न सोसाइटी में इस तरह के लुटेरे हैं या शोषणकारी है ना कि ये जिसको आजकल हम यह बाहुबली कहते हैं। यह बाहुबली जो है इन्हीं लोगों की बड़ी मान्यता है। जबकि भारत में स्वामी जी कहते हैं कि कोई चक्रवर्ती राजा भी होगा ना तो वह अपना एनसेेस्ट्री कोई एक जंगल में तपस्या करने वाले साधु की ओर वो साधु तक वो अपनी एनसेेस्ट्री ट्रेस करेगा। क्यों? क्योंकि भारत में सम्मान मिलता है एक साधु को, एक सन्यासी को, एक साधक को, एक ऋषि मुनि को। तो यहां पे देखिए ऑलरेडी स्वामी जी कह रहे हैं कि वो मटेरियलिस्टिक सिविलाइजेशन है। वहां पर सर्वोच्च सम्मान मिलता है यह बाहुबली को और यह भारतीय सिविलाइजेशन है। यहां पे सर्वोच्च सम्मान मिलता है सर्वत्यागी सन्यासी को। तो स्वामी जी कहते हैं कि यह जो आप लोग मेरा सम्मान कर रहे हैं, यह जो आप मुझे यह मान पत्र प्रदान कर रहे हैं, मुझे ओनर दे रहे हैं, तो याद रखिए कि यह ओनर एक सन्यासी को मिल रहा है। नहीं कि लोगों पर विजय करने वाले सेनापति के ऊपर सेनापति को या तो शोषण करने वाले राजा को। इसके बाद में स्वामी जी अपनी थीम चालू करते हैं। और देखिए कि यह जो थीम्स है वह स्वामी जी के सभी लेक्चर्स में से ली गई है। सो वि इज वेरीेंट इंडिया इज द
भारत है पुण्य भूमि
पुण्य भूमि द लैंड ऑफ स्पिरिचुअलिटी। भारत है पुण्यभूमि भारत है आध्यात्मिकता की धरती। और यहां पर देखिए यह एआई का जो पावर जो है ना देखिए यह जो सिंपल सेंटेंस है वो क्या है कि एआई का कंपोजशन है और वो जो कोटेशन के भीतर में है वो डायरेक्ट स्वामी जी का ये सेंटेंस है। स्वामी जी के जितने भी सेंटेंस है वो कोटेशन में रखे हैं और इसने जो समराइज करके पॉइंट्स दिए हैं वो एआई के हैं। तो यह जो ब्लैक लेटर में जो सेंटेंस है वो एआई ने कंपोज किया है। समराइज किया है स्वामी जी के आइडियाज को और उसको माने इसको ऑथेंटिकेट करने के लिए स्वामी जी का एक कोट उसके नीचे में रख दिया है। क्या है स्वामी जी का कोर्ट? इफ देयर इज एनी लैंड ऑन दिस अर्थ दैट कैन ले क्लेम टू बी द ब्लेसड पुण्य भूमि इट इज इंडिया। यदि इस पृथ्वी के ऊपर में ऐसा कोई देश होगा जो कि एक पवित्र पुण्य भूमि कहने का वह एक दावा करता है कर सकता है तो वह भारत ही है। हेंस हैव स्टार्टेड द फाउंडर्स ऑफ रिलीजन। भारत में से ही तो यह धर्म के प्रचारक निकले हैं। बुद्ध जो थे वही बुद्धिज्म आज देखिए कि विश्व में कितने सारे देशों में फैला है। और इसी बुद्ध स्वामी जी कहते हैं ना कि बुद्धिज्म इज अ रेबेल चाइल्ड ऑफ हिंदूइज्म एंड क्रिश्चियनिटी इज अ डिस्टेंट ऑफ ऑफशूट। अर्थात कि भारत में से सबसे पहले तो थोड़ा बहुत रेबेलियन करके बुद्धिज्म निकल गया। और यह बुद्धिज्म में से ही प्रेरणा लेकर के क्रिश्चियनिटी बना है। तो यह जितने भी फाउंडर्स हैं कह सकते हैं कि अपना एनसेेस्ट्री भारत की ओर ही ट्रेस करते हैं। हेंस हैव स्टार्टेड द फाउंडर्स ऑफ रिलीजंस एंड हेंस अगेन मस्ट स्टार्ट द वेव वि इज गोइंग टू स्पिरिचुअलाइज द मटेरियल सिविलाइजेशन ऑफ द वर्ल्ड। और यही भारत में से एक आध्यात्मिक तरंग फिर से प्रारंभ होगी जो कि यह मटेरियलिज्म में पूरा विश्व डूबा हुआ है। उसको फिर से आध्यात्मिकता की तरंगों से नहा दे। आध्यात्मिक तरंगों से उसको तरबोड़ कर दें। तो देखिए कि यह जो पिक्चर भी उसने ड्रॉ किया है भारत के आसपास जो समुंदर है उसमें से यह आध्यात्मिक तरंगे निकल रही है। सो पिक्चर भी कितना इंटरेस्टिंग है और बिल्कुल एप्रोप्रियट लग रहा है यहां पे। इंडियास मेथड अभी भारत की मेथड्स क्या होनी चाहिए? ईच नेशन हैड टू बी सॉक्ड इन अ डल्यूज ऑफ ब्लड बट इंडिया हैज़ फॉर थाउजेंड्स ऑफ इयर्स पीसफुली एकिस्टेड। एव्री वर्ल्ड एवरी वर्ड हैज़ बीन स्पोकन विथ अ ब्लेसिंग बिहाइंड इट एंड पीस बिफोर इट। यह भी स्वामी जी का ही कोटेशन है। बीच में थ्री डॉट्स दिए हुए हैं। व्हिच इज़ अगेन देखिए कि एआई का ये इतना तो अकल है कि यदि आप कोटेशन को तोड़ करके आप प्रेजेंट करते हैं तो जहां से वो सेंटेंस काटा है वहां पे थ्री डॉट्स देने चाहिए। आप डायरेक्ट कोट करते हैं तो कोटेशन मार्क होने चाहिए। और यदि डायरेक्ट कोटेशन में से आपने सेंटेंस काटा है तो वहां पर थ्री डॉट्स होने चाहिए जो कि एक एकेडेमिक ऑथेंटिक एकेडेमिक राइटिंग की यह जो सब कैरेक्टरिस्टिक है वो हमको यहां पे दिखती है और जहां पे डायरेक्ट उन्होंने उसने अपना ही एक सेंटेंस कंपोज किया है वह बिना कोटेशन के होना चाहिए। तो इसने जिस तरह से स्लाइड्स बनाया है कुछ-कुछ सेंटेंस कुछ-कुछ स्टेटमेंट उसके खुद के हैं जो कि स्वामी जी के आइडियाज की समरी है। फिर उसको ऑथेंटिकेट करने के लिए कुछ-कुछ कोटेशन डायरेक्ट दिए हुए हैं। कोटेशन में से सेंटेंस निकाला है। तो थ्री डॉट्स दिए हुए हैं। और इसके साथ में थर्ड एलिमेंट है कि एप्रोप्रियट एक डिज़ाइन दी है। सो तीनों एलिमेंट कि उसका समरी, डायरेक्ट कोटेशन और एप्रोप्रियेट डिज़ाइन कोई भी स्लाइड में होना चाहिए जो कि इसने इसमें रखा है। तो
हमें भारतीय संस्कृति का प्रचार करना चाहिए
यदि भारत पुण्य भूमि है और यदि भारत में से यह आध्यात्मिकता का प्रवाह पूरे विश्व में यदि फैलना है तो फिर यह प्रवाह कैसे फैलेगा? तो स्वामी जी कहते हैं कि एक तो वेस्टर्न कंट्रीज है जिसने कि पूरे जगत पे जब आक्रमण किया। पूरे जगत के ऊपर में राज करना चाहा तो किस तरह से किया? एलेक्जेंडर से चालू करके देखिए ईस्ट इंडिया कंपनी तक जहांजहां पे भी गए खून की नदियां उन्होंने बहाई है। लोकल कल्चर को तहसनहस कर दिया है। जो स्थानिक लोग हैं उनका उनका कत्लेआम किया है। उनका शोषण किया है। जबकि भारत को देखिए हजारों साल से भारतीय आध्यात्मिकता, भारतीय साहित्य, भारतीय संस्कृति विश्व में फैलती रही है। किंतु प्रत्येक यह जो तरंग भारत में से निकलती है उसके पीछे आशीर्वाद को छोड़कर के पीछे में आशीर्वाद है। आगे शांति है। यह पीस एंड ब्लेसिंग्स प्रत्येक तरंग के साथ में जुड़ा हुआ है। आज साउथ ईस्ट एशिया जाएंगे देखेंगे कि रामायण के कितने ही नाटक है। वह वहां पर वे लोग प्ले करते हैं। रामायण वगैरह का कितना प्रभाव है। हम लोग ये जो अपना कल्चरल ये जो प्राइड जो है ना वो हम लोग प्रमोट नहीं करते हैं। बहुत लंबे समय तक तो एक ही डर था कि हिंदूइज़्म को दबा करके रखो। क्यों? हिंदू हिंदुओं को ऊपर में आने देंगे। यह हिंदू धर्म हिंदू संस्कृति का प्रचार करेंगे तो फिर यह हम लोग इलेक्शन हार जाएंगे। इस तरह का एक झूठ-मूठ का सेकुलरिज्म बोल के यह विदेश में हिंदू संस्कृति जो ऑलरेडी बैठी हुई है उसको भी हम प्रमोट नहीं कर रहे थे। तो यह सब पागलपन हमने किया है अपने इतिहास में। अभी यह जरूरत है कि जहांजहां पे भी हिंदू संस्कृति है ये साउथ ईस्ट एशिया में इवन चाइना और जापान में जहां बुद्धिज्म बुद्धिज्म का रूट तो इंडिया ही है। तो फिर यह बुद्धिज्म जहां पे है या तो फिर ये रामायण वगैरह का कल्चर जहां पे भी है वो सबको हमको एक यहां से प्रमोट करना चाहिए। उसको बढ़ावा देना चाहिए। कहना चाहिए कि भाई आप लोगों को जो भी हेल्प चाहिए हम करने को तैयार हैं। सो और इसमें कोई सीनिसिज्म नहीं है। उन लोगों का शोषण करके अपने को बेनिफिट हो जाए वह भाव नहीं है। यह तो हजारों सालों से स्वामी जी ने पहले ही कह दिया है। जितनी भी यह सांस्कृतिक, साहित्यिक, आध्यात्मिक, तरंग भारत से फैली है, उसके सामने शांति है। पीछे आशीर्वाद है। आप ही का भला हो। इसी के लिए हम आपको हेल्प कर रहे हैं। नहीं कि हम लोग आपको एक्सप्लइट करके अपना कुछ बेटर कर दे अपने को। यह भाव सिसिज्म या तो फिर यह मुख में राम बगल में छुरी वो वाला भाव भारत का नहीं है। तो इसलिए जहांजहां पे भी हिंदूइज़्म या तो फिर बुद्धिस्टिक संस्कृति है भारत को उसको प्रमोट करना चाहिए। फिर
भारतीय संस्कृति और राष्ट्र का अमरत्व
क्या कहते हैं? इंडियास रेज़िलियंस माइटी एंपायर्स लाइक ग्रीस एंड रोम हैव वेनिश्ड द कैपिटोलाइन हील अ मास ऑफ रूइंस बट वी लीव एंड टू फाइंड द सेंटर ऑफ़ ऑल दीज़ द हार्ट फ्रॉम व्हिच द ब्लड फ्लोस इट इज़ हियर। देखिए फिर से स्वामी जी कंपेयर करते हैं यूरोप को और भारत को। यूरोप ने खास अब जैसे एंशिएंट यूरोप है उसने लोगों पे उसने फैला अपने को एक्सपैंड करने के लिए मिलिट्री का सहारा लिया। अब जैसे कि ये एलेक्जेंडर है ना एलेक्जेंडर द ग्रेट उसको कहते हैं। क्यों ग्रेट कहते हैं क्योंकि उसने बहुत लोगों की कत्लेआम की थी। यह उनका कांसेप्ट है कि उसको ग्रेट कहना है। तो यह एलेक्जेंडर बोलकर के एक हमारी दृष्टि से तो एक दानव ही था जो कि एक बड़ा सैन्य लेकर के विदेश में घूमता था। यह पर्शियन एंपायर है वगैरह वहां पे जाकर तहस-नहस वो तबाही करता था। भारत की सीमाओं पे आ गया था। और फिर यह वहां के और इवन हमारे भी इतिहासकार क्या कहते हैं कि भारत में आकर वो आगे नहीं बढ़ा क्योंकि उसका जो सैन्य है उनको घर की बहुत याद आ रही थी बोल कर के वो घर जाना चाहते हैं। ऐसा नहीं कहेंगे कि यहां पर आकर के उसकी पिटाई हुई थी बोल कर के वो वापस भागा है। तो हिस्ट्री को किस तरह से इवन हम लोग भी इस तरह से ट्विस्ट करते हैं। तो जो भी है वही एक एलेक्जेंडर है जहां पर और उसने इतना बड़ा साम्राज्य बनाया किंतु आज देखिए कि उस साम्राज्य का केंद्र बिंदु कैपिटोलाइन हिल यानी कि आज का हम साउथ ब्लॉक ना कि पीएम ऑफिस कहेंगे अमेरिका का ये वाइट हाउस ना कि कैपिटोल हिल कहेंगे तो माने जहां पे सत्ता का केंद्र है तो उस समय जो सत्ता का संस्कृति का केंद्र था यह ग्रीस देखिए कि वहां पे मकड़ी जो है अपना जाल बना रही है। अभी यह बात स्वामी जी के समय में थी। उस समय ग्रीस की हालत बहुत खराब थी। अभी यह यूरो यूरोप जो है एटलीस्ट फिर से प्रोस्पेरस हुआ है। और यह जो कैपिटोलाइन हिल वगैरह टूरिस्ट प्लेस कहे जाते हैं बोल के काफी मेंटेनेंस होता है। तो आज आपको वो मकड़ी का जाल नहीं दिखेगा। किंतु एटलीस्ट उस समय था। स्वामी जी जो बेसिकली कहना चाहते थे बात यह नहीं कि लेक ऑफ मेंटेनेंस को पॉइंट आउट कर रहे हैं। स्वामी जी कह रहे हैं कि उसका जो कल्चरल और एथ एक कहेंगे कि ये फिलॉसोफिकल रिलेवेंस था वो खत्म हो गया है। वहां से जो पावर निकलता था वो पावर आज खत्म हो गया है। जबकि भारत में आज देखिए कि मनु फिर से भी आ जाए तो भी देखेंगे कि वही पुरानी सभ्यता वही पुरानी संस्कृति, वही पुराने संस्कार, वही पुरानी प्रथाएं अभी भी भारत में जीवित है। यानी कि हमने जब एक्सपंड करना चाहा, एक्सपंड होना चाहा, एक्सपेंशन करना चाहा तो हमने शांति से किया है, आशीर्वाद से किया है। बोल के इतिहास का यह जो एक कहेंगे ना कि व्हाट गोज़ अराउंड? इट कम्स अराउंड। इतिहास का यह जो पनिशमेंट है वह हमको इसलिए नहीं मिला। माने हालांकि 1000 साल का गुलामी आ गया था। किंतु यदि इसको थोड़ा सा हम नजरअंदाज कर दें तो एटलीस्ट कहेंगे कि यह जो फिलॉसोफिकल स्पिरिचुअल और जो कल्चरल अथॉरिटी जो है भारत का वो अभी भी बना हुआ है। इसके बाद में और भी बहुत सारी स्लाइड्स हैं जो कि हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। आ जाइए। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।
प्रश्न: हम अपनी सेवा प्रवृत्तिओ को और भी कैसे बढ़ा सकते है?
अब अब जैसे देखिए एक बहुत ही वर्ल्डली एग्जांपल मैं दूं Google। राइट? अभी Google का सर्च इंजन है। जिस तरह से उन्होंने इसको फ्री बना के रखा है और इसको मेंटेन करने के लिए जो बड़े-बड़े वो जो उन्होंने डाटा सेंटर बनाए हैं और डेटा सेंटर को चलाने के लिए जो इंटेलेक्चुअल पावर चाहिए वो उन्होंने जो कलेक्ट किया है। अभी आप देखिए कि रामकृष्ण मिशन की 200 सेंटर में 200 लाइब्रेरी होंगी। यह 200 लाइब्रेरी जितना लोगों को हेल्प नहीं करती है लोगों को सीखने के लिए कोई भी पर्टिकुलर सब्जेक्ट में डीप में जाने के लिए उससे ज्यादा कहीं गुना ज्यादा Google का यह सर्च इंजन करता है। राइट? अभी पीछे में आईडिया तो मटेरियलिस्टिक ही है। प्रॉफिट मेकिंग ही आईडिया है। किंतु फिर भी आज Google का जो कल्चरल इंपैक्ट जो पूरे विश्व में पड़ा है। आज Google एक वर्ब हो गया है। कुछ भी आप डिस्प्यूट है। मैं Google करके देख लेता हूं। यह सही है कि गलत है। राइट? सो इंफॉर्मेशन गैदर करने के लिए अपना खुद का एक विकास करने के लिए ये जो Google की ये जो सर्विज है और आज का एआई एi अगेन इन लोगों ने फ्री में देना शुरू किया है। सो अब मेरे लिए तो एआई इज इनडिस्पेंसिबल। मैं सोच ही नहीं सकता कि बिना एआई के मैं अपने दिन कैसे काटूंगा। प्रत्येक स्टेप पे अच्छा इसको रेफर कर लेते हैं। इसको रेफर कर लेते हैं। सो इट इज़ सच अ पावरफुल सर्विस गिवन फॉर फ्री टू एवरीवन। और है प्रॉफिट मोटिव ही है। राइट? इसमें से ये पूरे जगत का डेटा कलेक्ट करते हैं। अब मैं चाहूं कि ना चाहूं मेरा पूरा डेटा कलेक्ट करके मेरा एक प्रोफाइल बना करके एआई को फीड करते हैं और इसी प्रोफाइल पे एआई को स्मार्टर बनाएंगे। यानी कि एक्चुअली आई एम वर्किंग फॉर देम। वेदर आई लाइक इट ऑ नॉट। दिस इज़ अ फैक्ट फॉर ऑल ऑफ अस। जितने भी यूजर हैं फ्री सर्विस के हम सब लोग अपना डाटा इनको देते हैं और डाटा पे ये ट्रेन होता है और ये मॉडल ज्यादा से ज्यादा स्मार्ट हो जाता है और हमको एडिक्टिव बनाता है। सो ये उनका गेम प्लान है। सो बट कीपिंग दैट असाइड हाउ मच यूज़फुल इट इज टू मी। आज रामकृष्ण मिशन की एक भी सर्विस का इस्तेमाल मैं नहीं करता ना ही मैं हमारी डिस्पेंसरी में भी जाना है तो साल में शायद एकाद दो बार जाने का होगा। हमारी स्कूल कॉलेज में जाने का मुझे कोई प्रयोजन नहीं है। हमारे रूरल डेवलपमेंट का कोई काम मुझे नहीं है। किंतु यह जो Google की सर्विज है, एआई सर्विज है, मुझे डेली यूज़ करनी है। रामकृष्ण मिशन हैज़ नथिंग इन कंपेयर टू दैट कि लोग माने एडिक्टिव हो जाए। डेली हो ये हमारी आरती वगैरह है। किंतु दैट इज़ अनदर क्वेश्चन। मैं लार्जर स्केल पे कह रहा हूं। सो देखिए कि आप सर्विस भी दे रहे हैं। एट द सेम टाइम यू आर स्ट्रेंथन भी कर रहे हैं अपने को। और यह प्योरली मटेरियलिस्टिक पॉइंट ऑफ व्यू से है। मान लीजिए कि आप स्पिरिचुअल सर्विसेज इस तरह की स्टार्ट करें जो कि अब जैसे हमारा इक्विवेलेंट क्या होगा? यह दैनिक संध्या आरती संध्या आरती में आप आते हैं तो देखिए कि जो लोग आते हैं धीरे-धीरे करके उन लोगों का यह स्पिरिचुअल बिल्ड अप होता है। अभी यह जिन लोगों का स्पिरिचुअल बिल्ड अप होता है, कैरेक्टर बिल्ड अप होता है, दे विल इंटर्न सम हाउ सर्व द नेशन। राइट? सो यह एक सर्विस भी प्रोवाइड कर रहे हैं। एंड सर्विस इज स्ट्रेंथनिंग आवर नेशन इंटर्न।
भारत की सॉफ्ट पावर
आप यह देखिए ना अपने तीर्थ स्थान कितने गंदे थे। हम लोगों ने अपने को रिजाइन करके ही रखा था। काशी वाराणसी माने जाना है वृंदावन यानी कि गंदगी में ही जाकर रहना है। तो उसको क्लीन अप करना माने तीर्थ स्थान क्लीन हो सकते हैं हिंदुओं के। यह कांसेप्ट ही तो हमने पहली बार देखा। वरना सोचते थे अब सऊदी अरेबिया जाइए यदि क्लीन तीर्थ स्थान देखने हैं या वेटिकन जाइए इंडिया में कहां देखने को मिलेंगे ये सपना भी देखना कि हिंदूइज़्म में कुछ अच्छा सा है और उसको आप बाहर निकाल सकते हैं माने रिलीजियस लेवल पे तो है ही है यू नो सोसाइटल लेवल पे आप उसको कुछ कर सकते हैं व्हिच इज कंप्लीटली अब जैसे देखिए ना योगा को एक इंटरनेशनल डे बनाना योगा को प्रमोट करना ये जो अपनी संस्कृति को प्रमोट करने की बात जहां पे ये बुद्धिज्म है वगैरह को प्रमोट करना तो तो ये योगा को प्रमोट करना इस सच ए इंडिया का जो सॉफ्ट पावर है राइट इसको आप प्रमोट नहीं करेंगे तो कौन करने वाला है आज इवन सऊदी अरेबिया है चाइना है पाकिस्तान है जो कि म कहे जाएंगे कि एंटायरली एंटी इंडियन है एंटी हिंदू है वहां पे भी वे लोग बिंदास योगा करते हैं। कहते हैं कि योगा का हिंदूइज़्म से क्या लेना देना है? [हंसी] किंतु पता है इसी तरह से सॉफ्ट पावर फैलता है। यह हॉलीवुड की मूवीस है। बहुत सारे लोग बोलते हैं हॉलीवुड की मूवी देखते हैं ना हम थोड़ी ना अमेरिका की प्रशंसा कर रहा है। बट दिस मूवीस आर द एंबेसडर कल्चरल एंबेसडर्स ऑफ अमेरिका। सॉफ्ट पावर जो है सबको चाहिए आजकल। क्योंकि हार्ड पावर जो नहीं कर सकता है ना बहुत बार आप देखें अमेरिका का सॉफ्ट पावर आज कितना है। एक कल्चरल डोमिनेंस कहेंगे अमेरिका का कितना है। आज ट्रंप भारत को हजार गाली भी देता है ना। बहुत कम लोग इन टर्न अमेरिका को गाली देंगे। क्यों? क्योंकि अमेरिका ने एक तरह से हमको एक हिप्नोटाइज करके रखा है। इज़ अमेरिका इज़ अ लैंड ऑफ़ ड्रीम, अमेरिका इज़ अ लैंड ऑफ़ सक्सेस, दैट शाइनिंग सिटी ऑन द हिल। यह अमेरिका है। भारत छोड़ के अमेरिका जाना है। कितने लोगों का सपना होगा यह?
महात्मा गाँधी का अवदान है भारत की एकता का गठन
देखिए, गांधी जी के सामने सबसे बड़ा जो टारगेट था ना, वह भारत को यूनाइट करने का था। नहीं कि ब्रिटिशरों को डिफिट करने का। क्योंकि गांधी जी और इवन स्वामी जी को भी देखिए स्वामी जी ठाकुर मां माने सरप्राइजिंगली जितने भी अवतार आए हैं वह उस समाज के कल्याण के लिए आए हैं। कृष्ण भगवान राम भगवान कृष्ण दोनों को देखिए कि दे वे वर मिलिट्री अवतार्स इस अर्थ में कि बाहर के जो दुश्मन थे ना उसका सामना इन लोगों को करना था। जबकि भगवान बुद्ध है या तो फिर ठाकुर है। ये लोग अवतार जब होके आए तब भीतर के जो दुश्मन है उनके साथ में इस अर्थ में कि एक तो संशय राक्षस हमारे हृदय में बैठा हुआ है। दूसरा कि समाज नाती जाति में बटा हुआ है। तो ये भीतर के संशय राक्षस को हटाना है और नाती जाति में बटे हुए समाज को एकजुट करना है। दैट वाज़ द वर्क बिफोर बुद्ध आल्सो एंड भगवान रामकृष्ण आल्सो। इन्होंने एक्सटर्नल एनिमीज़ के सामने कुछ बात नहीं की। व्हिच इज सो सरप्राइजिंग। ठाकुर का पूरा कथामृत लीला प्रसंग पढ़ लीजिए। कहीं पे भी उन्होंने ऐसा नहीं कहा कि ब्रिटिशर को मार के भगाओ। क्योंकि उनको पक्का पता था कि एनिमी है वो विधीन है। जैसे ही हमारे भीतर के एनिमी संदेह और नातज इसको हम जीत लेंगे तो बाहर का गुलामी फट करके भाग जाएगा। ब्रिटिशर में वो ताकत ही नहीं है कि भारत पे राज करें। वो एक ही बात है कि हम इतने बटे हैं कि वह डिवाइड एंड रूल ईजीली कर सकते हैं। गांधी जी का इंस्टिंक्ट कहां आता है? गांधी जी और सुभाष चंद्र बोस का आप डिफरेंशिएट करें। सुभाष चंद्र ने पहले से ही ठीक कर लिया कि ब्रिटिशर्स के सामने लड़ना है। बट दैट इज़ दैट डज़ नॉट फिट इन आवर ठाकुर का जो इंसाइट है उसमें ये बात फिट नहीं होती। ठाकुर का जो इनसाइट है कि सबसे पहले भीतर के दुश्मनों के सामने लड़ना है। तो गांधी जी ने पहले से ही यह बहुत बड़ा एम रखा था कि ये हरिजन जिसको वो कहते थे तथाकथित निम्न जाति को इनको समाज में एक देना है। स्थान देना है। भारत को यूनाइट करना है। हिंदू मुस्लिम को यूनाइट करना है। अभी ये निम्न वर्ण के लोगों को एक अधिकार देना और हिंदू मुस्लिम में यूनिटी प्रकट करना। यह जो जितने भी प्रोविंसेस है भारत के आज देखिए कि जितनी भी लैंग्वेजेस है इतनी विविधपूर्ण लैंग्वेज में एक देश बनाना आप देखिए कि सरदार पटेल को आज हम बहुत एक सम्मान दे रहे हैं कि ये पिछ कितने 400 500 राजा रजवाड़े थे फटाक करके उनको इंडियन यूनियन में डिसॉल्व कर दिया। किंतु इसके पीछे तो लंबा एक फ्रीडम मूवमेंट का हिस्ट्री है ना कि भारत की प्रजा को यूनाइट करके एक गोल देना एंड दैट गोल इज नॉट टू अटैक ब्रिटिशर्स। राइट? बट टू सेल्फ डेवलप यह कितना बड़ा काम है जो कि गांधी जी ने किया। राइट? अहिंसा इज वन एस्पेक्ट ऑफ दैट टोटल वर्क जो कि उनका था टू यूनाइट इंडिया इन इंस्पाइट ऑफ दिस प्रोविंशियल लिंग्विस्टिक रेशियल रिलीजियस वर्ण ये जो डिवीजन है उससे परे जाके एक नेशन को निर्माण करना। दैट इज़ व्हाट गांधी जी ने किया। एंड ही फॉलो द इंस्टिंक्ट ऑफ ठाकुर मां एंड स्वामी जी। ठाकुर मां स्वामी जी के लिटरेचर में ठाकुर के लिटरेचर में तो है ही नहीं। मां ने सिर्फ एक दो जगह पे कहा है कि ब्रिटिश राज अभी उसका अंत आने वाला है। स्वामी जी जो कि सिविलाइजेशनल स्केल पर हमको उपदेश दे रहे हैं जो कि उनका होना चाहिए था। मेन पॉइंट वहां पे भी हमको यह नहीं देखना रेयर देखने को मिलता है कि स्वामी जी ब्रिटिश राज को क्रिटिसाइज करते हैं। यानी कि इन तीनों का इंस्टिंक्ट बड़ा ही क्लियर था। संदेह राक्षस को मारना है और भारत को एकजुट करना है। यही हमारे सामने सबसे बड़ा टारगेट है। वि इज व्हाट गांधी जी फॉललोड एंड वि इज व्हाट और सिर्फ सिर्फ क्रेडिट सिर्फ गांधी जी को नहीं जाती। देखिए भारत के जितने भी फ्रीडम फाइटर्स थे उस समय के सबका ये क्रेडिट जाता है कि उन्होंने ओके साउथ इंडियन अब मद्रासी है तेलुगु है ये बंगाली है ये पंजाबी है ये गुजराती है ये मराठी है ये हिंदी भाषी है और तो इस और फिर ये ब्राह्मण है ये निम्न जाति का है। सब ने मिलकर के तो ये फ्रीडम मूवमेंट फाइट किया है ना। तो पूरी भारतीय प्रजा को ये क्रेडिट जाना चाहिए कि इन्होंने इंस्टिंक्टिवली समझा कि अभी तक जो हम बटे हुए थे अभी बंटवारा बंद करके यूनाइट होना होगा। और जैसे ही यूनाइट हो गए हमको फ्रीडम भी मिल गया। नाउ देयर वेर सम प्रॉब्लम्स पार्टीशन हिंदू मुस्लिम वगैरह किंतु देखिए माया के जगत में सब कुछ तो परफेक्ट नहीं है। राइट? हम जिस तरह का परफेक्शन की आशा ठाकुरमा स्वामी जी से रखते हैं, कोई भी पॉलिटिकल लीडर से उस तरह का परफेक्शन की आशा नहीं रख पाएंगे। सो विद इन दैट इंपपरफेक्ट पैराडाइम जिसमें कि एक पॉलिटिकल लीडर काम करता है। गांधी जी और सिर्फ गांधी जी ही नहीं ये जो आचार्य कृपलानी है नकी किए फिर जितने भी आप फ्रीडम फाइटर्स का नाम ले सरोजिनी नायडू है, विनोबा भावे है। ईच ऑफ देम मेड ग्रेट कंट्रीब्यूशन टू इंडिया बाय यूनाइटिंग अस। हमारा प्रॉब्लम कहां पे स्टार्ट होता है? हमारा प्रॉब्लम यह 70 60 से स्टार्ट हुआ। जबकि एक झूठमूठ का सेकुलरिज्म और यह हमने अपने सर पर लाकर बिठाया। मतलब गांधी जी सो हिंदू माने वो प्रत्येक बार राम का नाम लेके वो मरने के समय भी उन्होंने राम का नाम लिया है। गा- गांधी जी के लेटर्स गांधी जी का जो आप पढ़ेंगे स्पष्ट रूप से पता चलता है कि हिंदू धर्म पे उनकी कितनी आस्था है। स्वामी गांधी जी ने ऐसा कभी सोचा ही नहीं कि मैं हिंदू धर्म को अपनी राजनीति से अलग करूं। सो दैट इज़ टू हिस क्रेडिट कि और अपना रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य ऑफ़ कोर्स धर्म और राजनीति सब कुछ एक साथ में ही चलना चाहिए। राजनीति में धर्म नहीं होगा तो कैसे काम चलेगा? प्रॉब्लम हमारा स्टार्ट हुआ है नेहरू और नेहरू के बाद के यह जो सब पगले कांग्रेसी आए हैं उन लोगों ने स्टार्ट किया है।
प्रश्न: शक्ति और शांति दोनों तो चाहिए देश के निर्माण के लिए
किंतु देखिए यह जो स्प्लिट जो है ना शक्ति और शांति का यह तो बुद्धिज्म से स्टार्ट हुआ है ना। अपने जितने भी प्रीवियस दो राम और कृष्ण दोनों को देखिए। कहां उन्होंने कहा कि दुश्मन का सामना नहीं करना है। हिंदू धर्म के वो ट्रेडिशन ही नहीं है। दिस इज ये ट्रेडिशन चालू हुई है बुद्धिज्म से। सो अह देखिए गांधी जी को आप यह बात कह सकते हैं कि गांधी जी एक्चुअल हिंदू ट्रेडिशन में शायद यह जो भगवान राम और भगवान कृष्ण वाली उसमें न प्रवेश किए हो और बुद्धिज्म का एक म्यूटेशन जो कि हिंदूइज़्म में जो वैष्णविज़्म जिसको खास करके हम कहते हैं। यह वैष्णविज़्म के ये सब कांसेप्ट है कि ये अहिंसा वगैरह-वगैरह और जैनिज्म, बुद्धिज्म वगैरह। खास गांधी जी वो जैनिज्म से काफी प्रभावित हुए थे। तो देखिए कि दैट इज नॉट हिंदूइज़्म ना गांधी जी का जो अहिंसा का जो कांसेप्ट आता है वो जो कौन से वो थे वो जैन मुनि वो उनसे वो हां हां हां है ना वो तो जैन थे ना तो वो वहां से थोड़े से प्रभावित हुए थे। सो दैट इज नॉट पार्ट ऑफ हिंदूइज़्म। आप ओरिजिनल हिंदूइज़्म आप भगवान कृष्ण को ही देख लीजिए ना। कहा उन्हों देखिए उन्होंने शांति के लिए पूरा प्रयास किया। राइट? कहा कि यह जो सुई की यह जो नोक जो है उसके ऊपर में रहने वाली जमीन भी दे दो तो युद्ध नहीं होगा। तो बोला इतना भी नहीं देंगे तो फिर ठीक है अभी पिटाई होगी तुम्हारी। [हंसी] यानी कि शांति का पूरा मौका भी दिया और जब लगा कि शांति काम नहीं करने वाली है तो अच्छे से पिटा भी सही उनको। सो दैट इज आवर हिंदूज़्म ना। देखिए सच अ कंट्राडिक्शन गीता का जो बेसिक उद्देश्य है कि युद्ध करने के लिए प्रेरित करना है हमको। और उसी गीता का हवाला देकर हम कहते हैं कि अहिंसा इससे सीखनी है। [हंसी] सच अ कंट्राडिक्शन। गांधी जी ने वो अनासक्ति योग लिखा है। एक्चुअली दिस इज अ कंप्लीट मिसअंडरस्टैंडिंग ऑफ गीता। गीता का हार्ट अनासक्ति नहीं है। गीता का हार्ट है शरणागति। ईश्वर पे शरणागत होकर के कर्मणीय वाही अधिकारस्ते। जो हमारा धर्म है उसका पालन करना है। धर्म का पालन दैट इज गीता का हार्ट। नहीं कि अनासक्ति।
संस्कृत साहित्य और दर्शन शास्त्र पे आधारित AI
ना बहुत अच्छा है। देखिए मैंने रिसेंटली एक दूसरा न्यूज़ पढ़ा था कि एक इंडियन एलएलएम बन रहा है ट्रेंड ऑन इंडियन सोर्सेज। यानी अब जैसे इंडिया का फिलॉसोफी है, स्क्रिप्चर्स है, संस्कृत सोर्सेस है वो जो एक मैनुस्क्रिप्ट प्रोजेक्ट है ना कि वो जितने भी मैनुस्क्रिप्ट है उसको डिजिटाइज करने का तो फिर उसके ऊपर में इसको ट्रेन कर रहा है। तो यदि होगा तो दैट विल बी मच बेटर। आज हमको वेस्टर्न कोई भी कांसेप्ट सीखना है तो ये ऐसे फटाक करके सीख लेते हैं। किंतु इंडियन कांसेप्ट्स के बारे में वो बड़ा ही सुपरफिशियल नॉलेज रखता है। कहीं विकपीडिया के पेजेस पढ़ के कुछ बोलेगा जिसमें कि कोई डेप्थ नहीं है। किंतु यदि जिसको संस्कृत देखिए संस्कृत और एआई इज अ नेचुरल एफिलिएशन। राइट? तो इस संस्कृत मैन्युस्क्रिप्ट को आप डिजिटाइज करके यदि उसको एआई में फीड करते हैं इट वुड बी वेरी गुड। ये एलएलएम प्रोजेक्ट चल रहा है इस तरह का। का एक मैंने सुना है। अभी आप सोचिए कि अपना जो यह सांस्कृतिक वारसा है यह पुष्टि मार्ग का कितना बड़ा लिटरेचर है। यह वेदांत की प्रत्येक स्कूल का कितना लिटरेचर है? ये जो चैतन्य महाप्रभु का ये जो गोस्वामी वगैरह गण उन्होंने कितना लिटरेचर डेवलप किया है। शक्ति साधना का क्या लिटरेचर है। माने लाखों लाखों ग्रंथ है भारत में जो कि उसको कि एकदम कोई बिना काम के पड़े हुए हैं। उसको डिजिटाइज कीजिए। उसको ऑनलाइन लाइए। एलएलएम को इसके ऊपर में ट्रेन कीजिए। फिर देखिए कि वह सही में वह आध्यात्मिक आपको जो पिपासा है ज्ञान पिपासा उसको मिटाने का कितना अच्छा आपको साधन मिलता है। म कथामृत में कथामृत में वो कहता है एक कोई एक डिवोटी ठाकुर को कहता है कि ये मैक्स मूलर था तो वेदों का उद्धार हुआ। वरना भारत देश में से तो वेद चले ही गए थे। किंतु मतलब ठाकुर के खुद के सामने मैक्स मूलर की प्रशंसा हुई है। अभी हां कथामृत की मैं बात कर रहा हूं। कथामृत में ठाकुर के सामने एक डिवोटी ने कहा कि मैक्स मूलर है तो वेदों की रक्षा हुई है। वरना इस देश में से वेद चले ही गए थे। अभी अभी यदि एलएलएम होगा तो वेदों की रक्षा होगी। ओम