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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ या राम कृष्णाय ते नम मैंने पहले भी बताया था कि मैं लीमड़ी में कुछ समय था लीमड़ी रामकृष्ण आश्रम व गुजरात में है तो वहां पर एक्चुअली क्या है कि आश्रम वैसे है दो ही साधु थे मैं थे और वहां के बड़े महाराज थे और किंतु आश्रम अपने में बहुत बड़ा था मने छ एकड़ का जमीन है गांव से बाहर है और गांव इट सेल्फ जो शहर जो है शहर में भी ज्यादा कोई वस्ती वगैरह कुछ नहीं है और वहां पर शहर के सेंटर में कुछ आपको मकान वगैरह दिख जाएंगे किंतु जैसे-जैसे बाहर आएंगे रेलवे स्टेशन की ओर वहां पर बड़ी ही स् पार्स पॉपुलेशन है कम ही मकान है तो ऐसी जगह पे अपना आश्रम है वहां पे तो वहां पे ठाकुर की कृपा से लाइब्रेरी बड़ा ही सुंदर था और लाइब्रेरी में मैं बैठता था चारों ओर बड़ी-बड़ी खिड़किया वहां पर गार्डन दिखता है और वह कभी गार्डन देखता था कभी ये किताबें पढ़ता था अपने ही रामकृष्णा विवेकानंद साहित्य यही सब स्मृति कथाए यही सब जीवनी यही सब जीवन गाथा य तो यह पढ़ते पढ़ते ऐसा लगता था कि जैसे समय जैसे थम गया है कभी-कभी ऐसा होता है ना कि जैसे आइंस्टाइन आइंस्टाइन ने थिरी ऑफ रिलेटिविटी खोज निकाली तो अभी थिरी ऑफ रिलेटिविटी है इतनी कॉम्प्लिकेटेड और मैथमेटिक्स इतना उसका डेंजरस है कि कहा जाता था उस समय कि जगत में सिर्फ चार पांच लोग हैं यह थिरी ऑफ रिलेटिविटी समझते हैं तो एक न्यूज़पेपर वाला वो आइंस्टाइन का इंटरव्यू लेने के लिए गया व बोला कि हमको पता है इतनी बड़ी कॉम्प्लिकेटेड थिरी आप हमारे वाच कों के लिए बड़ा ही सहज रूप से समझा दीजिए कि इसका क्या अर्थ है तो आइंस्टाइन ने बड़े ही सहज रूप से उसको समझाया कि यदि आप अपने प्रिय पात्र के साथ में बैठे हैं कोई ऐसा व्यक्ति जो आपको बड़ा अच्छा लगता है तो एक घंटा ऐसे पसार हो जाएगा जैसे कि एक मिनट पसार हुई है और यदि मान लीजिए गरम गरम वो जो तवा होता है एक्सीडेंटली आप उसके ऊपर में बैठ गए तो एक सेकंड आधी सेकंड आप उसके ऊपर में बैठे रहेंगे बैठे होंगे वो आपको ऐसा लगेगा जैसे एक घंटा चला गया है आप चिल्ला कर के खड़े तो हो जाएंगे किंतु आधी सेकंड तक तो आप बैठे होंगे उसके ऊपर तो ऐसा लगेगा जैसे कि एक एक सेकंड आधी सेकंड एक घंटे के बराबर दिखेगी अर्थात कि समय का जो परसेप्शन है वो कैसा है कि अपना माइंड इसको कंस्ट्रक्ट करता है समय कोई एब्सलूट नहीं है फिजिक्स और मैथमेटिक्स की दृष्टि से भी समय एब्सलूट नहीं है और अपनी जो कॉन्शसनेस है कॉन्शसनेस के अनुसार भी समय एब्सलूट नहीं है फिजिक्स कहता है कि आप जितनी स्पीड से जैसे कि एक एक्सपेरिमेंट उन्होंने किया दो जुड़वा व्यक्ति है दो आदमी जुड़वा अभी जुड़वा पता है ना ट्विंस ट्विंस का क्या होता है दोनों का डीएनए भी सेम होता है एक ही साथ में उनका जन्म हुआ होता है एक ही साथ में बड़े होते हैं जनरली एक ही तरह का उनका फिजिकल एक होता है नक्शा उनका तो मान लीजिए कि एक ट्विन को एक जुड़वा भाई को पृथ्वी पर रखा और दूसरे जुड़वा भाई को एक स्पेस शटल में बिठा कर के स्पेसशिप में बिठा कर के आकाश में उसको उसको भेजा गया अवकाश यात्रा के लिए अभी मान लीजिए यह स्पेसशिप बहुत ही स्पीडली उड़ती है बहुत ही झड़प से उड़ती है बहुत फास्ट उसकी गति होती है जैसे कि प्रकाश की स्पीड की मान लीजिए % 40 पर स्पीड से यह स्पेसशिप जदी उड़ता है और -4 साल के बाद में 10 साल के बाद में मान लीजिए वो पृथ्वी पर पाछी वापस आती है अभी हमको तो ऐसा ही लगेगा ना कि ये दो जुड़वा भाई है तो उन दोनों का जो फिजिकल डेवलपमेंट है उनका एजिंग जो है उम्र जो बढ़नी चाहिए वो तो एक ही साथ में में ही होगा ऐसा कभी होगा क्या कि एक जुड़वा भाई जल्दी से बड़ा हो जाए दूसरा जुड़वा भाई थोड़ा सा कम जल्दी से बड़ा हो ऐसा तो असंभव है किंतु यह स्पेसशिप वाला भाई जद पृथ्वी पर वापस आएगा और दोनों जुड़वा भाइयों का मिलन होगा तो पता चलेगा कि पृथ्वी पर 10 साल बीते हैं किंतु स्पेसशिप में सात या आठ ही साल बीते हैं ऐसा क्यों क्योंकि यह समय जो है वह रिलेटिव है जितना स्पीड से आप स्पेसशिप में गति करेंगे या किसी भी चीज में बैठेंगे उतना ही समय धीमा होता जाएगा यह फिजिकल मैथमेटिकली प्रो फिनोमिना है तो मान लीजिए कि समय सही सही में रिलेटिव है तो कॉन्शियस निस के साथ में यदि समय को मिला दिया जाए तो हमारी कॉन्शियस निस भी समय को बड़ा ही डिफरेंटली वो मेजर करती है यदि अपने मन में दुख है कष्ट है शोक है रिग्रेट है या डिप्रेशन है तो समय कटेगा नहीं ऐसा लगेगा कि आप घर में बैठे हैं और बस आपने आपको ऐसा लगेगा एक घंटा चला गया क्या घड़ी में देखा तो पांच ही मिनट हुए हैं तो कभी-कभी स्कूल में ऐसा होता है ना स्कूल के बच्चों को क्लास नहीं अच्छा लगता स्कूल में टीचर पढ़ाते हैं तो नहीं अच्छा लगता तो क्या होगा वे लोग बार-बार घड़ी देखते रहेंगे उनको ऐसा लगेगा अभी तो क्लास खत्म होनी हो ही जाना चाहिए अभी तो 40 45 मिनट्स हो ही गया घड़ी के सामने देखेंगे पता चला पा पाच या छ ही मिनट हुआ है इतना माने और जदी मान लीजिए कि आप कोई अच्छा मूवी देखते हैं ना कि किसी मित्र के साथ में गप लगाने के लिए या पिकनिक के लिए गए हैं सुबह को गए पिकनिक पर और पता नहीं कब शाम हो गई पता नहीं कब समय लौटने का समय हो गया मुझे याद है कि हम लोग स्कूल से पिकनिक के लिए एक बार गए थे तो पूरा दिन कहां खत्म हो गया शाम हो गई वापस जाने का समय हो गया पता ही नहीं चला आश्चर्य की बात है और यही जद यही दिन हम जद स्कूल में बिताते तो हमको लगेगा अरे भाई कभी यह खत्म होगा कब स्कूल खत्म होगी तो ये दिस इज अ कॉन्शसनेस अपना जो मन है समय को अलग-अलग तरीके से प्रोसेस करता है तो स्पिरिचुअल लाइफ में भी यदि आपको जब ध्यान करने में आनंद आ जाए तो आपको समय कहां पर चला जाएगा पता ही नहीं चलेगा और यदि जब ध्यान करने में आनंद नहीं आता है आप मैकेनिकल आप ज करते रहते हैं तो हर 5 मिनट 6 मिनट के बाद में हर दो मिनट के बाद में आप घड़ी देखेंगे सोचेंगे अभी कब मैंने नियम करके जैसे हम लोग बेलूर मठ में हम लोगों ने जॉइन किया था प्री प्रोबेशनर ट्रेनिंग सेंटर वहां पर है तो वहां पर नियम ऐसा है कि सभी को सुबह की मंगल आरती के बाद में और शाम की मंगल आरती के बाद में एक एक घंटा नियमित रूप से बैठ कर के जप ध्यान करना है तो बेलूर मठ में सुबह की मंगल लती और उसके बाद में जो मेन टेंपल है वहीं पर बैठते थे और शाम को क्या होता था कि शाम को तो डिवटी वगैरह रहते हैं संध्या आरती के बाद में तो इसके लिए हम लोग गंगा के किनारे जैसे कि स्वामी जी का मंदिर है या तो ओल्ल्ड श्राइन है ना कि वो पुराना पुराना मंदिर है स्वामी जी का मंदिर स्वामी जी का ऊपर का समाधि मंदिर तो वहां पर जाकर के कहीं कहीं पर हम लोग बैठ जाते थे तो मैंने ऐसा कई बार देखा है कि जिस दिन मन नहीं लगता जप करने में उस दिन में लगेगा कि अभी नियम क्या है कि एक घंटा तो बैठना ही है और फिर नियम के अनुसार हमारा जो मॉनिटर होता था हम ट्रेनिंग ब्रह्मचार्य का हम ही ब्रह्मचार्य में से हमारे जो इंचार्ज स्वामी जी थे एक को एक ब्रह्मचारी को मॉनिटर बनाते थे जिसका रूटीन बुटीन थोड़ा पक्का हो और यह मॉनिटर हमारे पीछे बैठता था और वह घड़ी के सामने देखता रहता था कि एक घंटा हुआ कि नहीं हु हुआ यदि हुआ तभी हमको उठने देगा हम लोग रात देखते थे मॉनिटर कब खड़ा होता है तब हम लोग उसके साथ-साथ में खड़े होकर जाए यहां से और व यदि कोई उससे पहले खड़ा हो गया एक घंटे से पहले ना ऐसा कुछ तो इमीडिएट मॉनिटर आकर के बाद में हमारे कमरे में आता मिलने के लिए बोलेगा कि आप क्यों इतना जल्दी खड़े हो गए नियम तो है कि आरती के बाद में एक घंटा बैठना है तो कोई ना कोई बहाना निकालना पड़ेगा फिर कमर दर्द हो रहा है ना यह ना वो और यदि वह बहाना स्वीकार कर लेगा तो ठीक है यदि नहीं किया स्वीकार तो फिर हमारे जो बड़े स्वामी जी इंचार्ज स्वामी जी उनको जाकर के कंप्लेन करेगा और दो-तीन बार ऐसा हुआ तो फिर स्वामी जी बुलाएंगे बोल देंगे तुम घर चले जाओ तुम यहां पर नहीं रुक पाओगे क्यों क्योंकि संन्यास जीवन में यदि संध्या आरती मंगल आरती के बाद में एक घंटा नहीं बैठ सकेंगे जब ध्यान करने के लिए तो फिर यहां पर रहने का प्रयोजन ही क्या है तो यह जो सुबह और शाम बेलर में जो हम बैठते थे मुझे पक्का याद है कभी-कभी ऐसा लगता था कि अरे कब यह एक घंटा पूरा हो कब यह एक घंटा समाप्त हो और कभी-कभी ऐसा लगता था ऐसा होता था कि मन ऐसा कंसंट्रेटेड हो गया है चिंतन में ईश्वरीय आनंद में कि सब लोग उठकर के खड़े होकर के चले गए और मुझे पता ही नहीं आंख खोल कर के देखा तो मैं अकेले बैठा हूं तो ऐसे भी दिन गए हैं कि कहां एक घंटा खत्म हो गया एक घंटे के ऊपर में आधा घंटा बीत गया कुछ पता नहीं और कभी-कभी लगेगा कि 5 मिनट 10 मिनट भी मुश्किल से नहीं बीत है तो उस समय तो हम ब्रह्मचारी थे हमको तो वही फिक्स जगह पर जाकर के बैठना होता था तो हमारे हाथ में तो कोई ऑप्शन नहीं था बाद में जब सेंटर में पोस्टिंग होता है मेरा पोस्टिंग हुआ था नागपुर में और फिर और भी बाकी सब सेंटर में बाद बाद में पोस्टिंग होता रहा तो फिर मैंने क्या एक उपाय खोज निकाला यदि एक घंटा बैठना ही है कैसे भी करके तो कुछ ना कुछ तो ट्रिक हमको कुछ ना कुछ तो टेक्निक लगानी होगी यदि प्रतिदिन तो ऐसा होगा नहीं कि ईश्वरीय आनंद में मन मग्न हो जाए वो तो होगा शायद महीने में एक दो बार हो सकता है ठाकुर की कृपा से बाकी के दिन क्या करेंगे तो मैं क्या करता था ये कथामृत है या फिर यह स्मृति कथाएं हैं बाय दैट टाइम मैंने बंगाली एकदम पक्का सीख लिया था तो यह कोई ना कोई यह ठाकुर माहा स्वामी जी की स्मृति कथा है फिलोसोफी नहीं वेदांत नहीं फिलोसोफी नहीं यह कथामृत या तो फिर कथ उप कथन या तो फिर प्रसंग जिसमें हो यह सब स्मृति कथाए ऐसी एक ना एक कोई ना कोई किताब अपने पास में रखता था और फिर जब तक जप में मन लगेगा तब तक मैं जप करूंगा और जप में से मन उठ गया तो मैं किताब पढ़ना शुरू कर दूंगा अभी क्या है कि नाम और नामी अभेद हमने अभी कुछ दिनों पहले डिस्कस किया था तो नाम और नामी अभेद है जिसका आप नाम ले रहे हैं उन्हीं के प्रसंग का आप पाठ कर रहे हैं उन्हीं के प्रसंग का आप चिंतन मनन श्रवण कर रहे हैं अर्थात कि स्मरण मनन निदिद्यासन कर रहे हैं अर्थात कि मैंने अभी जप करने के समय हम क्या करते हैं जैसे कि मैं कर जप करता हूं तो मेरी दो उंगलियां जहां पर इकट्ठा होती है वहां पर मैं इमेजिन करूंगा कि मेरे जो इष्ट है उनके पाद पद्म वहां पे है या तो फिर उनका श्री मुख श्री वदन वहां पर है या तो फिर वह खुद पद्म रूपी कमल रूपी सिंहासन पर बैठे हैं यदि मैं कर जप करता हूं मानस जप करता हूं मन में यदि जप करता हूं तो मैं इमेजिन करूंगा कि मेरे हृदय में ईश्वर बैठे हुए हैं मेरे हृदय में मेरे इष्ट देवता बैठे हुए हैं उनको मैं नजर के सामने रख करके मैं जब ध्यान करूंगा और यह जो कल्पना की बात जो है ठाकुर ने भी य ऐसा ही कहा था कथामृत में एक प्रसंग है ठाकुर जप कर रहे थे कुछ समय के बाद में उन्होंने जप करना ध्यान करना छोड़ दिया और फिर कहा कि अरे मैं ध्यान कर रहा था किंतु मुझे अच्छा नहीं लगा यह तो एक कल्पना ही करनी हुई ना जैसे कि मैं ईश्वर की कल्पना करता हूं मां काली की उनके तो इष्ट देवता थे मां काली हालांकि सभी ईश्वर की उन्होंने आराधना की है भगवान विष्णु हो भगवान राम हो कृष्ण हो ना कि कोई भी हो तो उन्होंने अभी जो पार्टिकुलर देवता के ऊपर में वह ध्यान कर रहे होंगे तो ठाकुर ध्यान करते-करते वह खड़े हो गए कहा कि यह तो कल्पना ही करनी हुई यह तो कल्पना भाई तो आर किछु नहीं कल्पना के सिवाय और कुछ नहीं है ईश्वर फट कर के नजर के सामने आए और दर्शन दे दे तब तो बात हुई तो अभी देखिए कि ठाकुर के पास में तो यह ऑप्शन है कि ईश्वर का जप करते करते ध्यान करते करते उनका जो श्री मूर्ति है ईश्वर का जो स्वरूप है नाम रूप है उनकी कल्पना ना करें और ईश्वर स्वयं आकर के उनको दर्शन दे दे यह ऑप्शन उनके पास में है हमारे पास में तो ऐसा ऑप्शन नहीं है कि जप करने को बैठेंगे ध्यान करने को बैठेंगे और ईश्वर ही आकर के दर्शन दे दे हमको तो नाम रूप की कल्पना करनी ही होगी बहुत बार मैं मां के नाम का जप करता हूं मां ने एक जगह पर कहा है किसी ने मां को पूछा कि मां यदि आपका जप करना है तो मैं कौन से नाम से जप करो तो मां ने कहा कि मां बोल कर के भी जप कर सकते हो राधा बोल कर के कि मुझे पुकार सकते हो तो मैंने वह मा मंत्र जो है उसका भी मैं कई बार जप करता हूं मां ने खुद कहा है तो हम कर सकते हैं तो यदि मां के नाम का मंत्र जब हम जद करते हैं तो फिर हमको इमेजिन करना होगा कि हृदय में मां आकर के विराजित हुई है कमल रूपी आसन के ऊपर में या तो फिर हम जप करेंगे ध्यान करेंगे अनुमान करेंगे कि नजर के सामने जैसे कि मैं दक्षिणेश्वर में चला गया हूं मां और ठाकुर वहीं पर ठाकुर के कमरे में बैठे हुए हैं ठाकुर के कमरे का चित्र यदि देखा होगा या तो दर्शन जदी किया होगा तो पता होगा वहां पर दो खाट है एक खाट के ऊपर में ठाकुर शयन करते थे एक के ऊपर में बैठ कर के भक्तों के साथ में वार्तालाप करते थे तो मैं इमेजिन करूंगा कि मैं भी वही ठाकुर के कमरे में बैठा हुआ हूं और फिर बाकी की जितने भी त्यागी संतान है नरेण है ना कि तारक द है अर्थात कि महापुरुष महाराज राखल है ना लाटू महाराज है ना कि फिर ये योगेंद्र महाराज है वो सभी त्यागी संतान उसी कमरे में बैठ कर के ध्यान कर रहे हैं मैं भी उनमें से एक हूं बाहर में चांदनी का प्रकाश वो श्वेत प्रकाश चारों ओर फैल रहा है यहां पर गंगा कलकल करती बहती जाती है और फिर मैं भी उन्हीं सबके साथ में और खाट के ऊपर में मां और ठाकुर बैठे हैं और घर में धूप धुना दिया गया है तो यह धूप देना या धुना देना यह सब देखिए सब वर्णन आपको कथामृत में या तो फिर यह सब स्मृति कथाओं में मिल जाएंगे तो यही सब स्मृति कथाओं का सहारा लेकर के या तो फिर कथामृत का सहारा लेकर के हमको एक मेंटल पिक्चर खड़ा करना है कि हां इस तरह से एक बड़ा ही सुंदर रमणीय दक्षिण श्वर काली मंदिर है हम लोग भी वहां पर बैठे हैं कभी-कभी मैं इमेजिन करता हूं मैं ठाकुर के कमरे में बैठा हूं कभी-कभी इमेजिन करता हूं कि वहां पर गंगा के किनारे में टहल रहा हूं कभी-कभी लगता है कि मैं वही पंचवटी के तले में वह जो कुटिया है जहां पर बैठ कर के ठाकुर ने वेदांत साधना की थी वहां पर एक अग्नि जल रहा है उसके सामने ठाकुर भी बैठे हैं और मैं भी बैठा हूं देखिए हमको तो यह अधिकार है ठाकुर के साथ में दक्षिणेश्वर में जाकर के उनके साथ में जब ध्यान करने का क्यों क्योंकि ठाकुर ने हमको पुकारा है हम बिना बुलाए आने वाले मेहमान नहीं है बिन बुलाए मेहमान ठाकुर ने ही वोह कुठी घर पर जाकर के हम सबको पुकारा है तोरा कोथा या ीश आए रे तुम लोग कहां पर हो आओ तो उन्होंने पुकारा है उन्होंने बुलाया है तो बोलक के हम आए हैं हमारा पूरा अधिकार है कि ठाकुर के कमरे में बैठ कर के ठाकुर के साथ में जब ध्यान करना पंचवटी में जाकर के बेलतला में जाकर के जहां पर ठाकुर ने शक्ति साधना तंत्र साधना की थी या तो फिर गंगा के किनारे चांदनी के घाट जो है वहां पर बैठ कर के हमको जब ध्यान यह पूरा अधिकार हमको है और इस अधिकार का हमको पूरा बेनिफिट ले लेना है और देखिए कि यह जो स्मृति कथाएं है स्मृति कथाओं का जो माधुर्य है दिन प्रतिदिन की बातें हमको इसमें से जानने को मिलती है इसका बेनिफिट लेकर के हम अपनी इमेजिन जो है उसको बड़ी ही हम पूर्ण बना सकते हैं यदि जिस चीज के बारे में मुझे ज्यादा कुछ पता ही नहीं है जैसे कि मान लीजिए कि सिख धर्म है सिख धर्म के बारे में मैंने ज्यादा कुछ स्टडी नहीं किया है अभी कोई आज मुझे बोले कि कबीर है या नानक है उनके बारे में यदि मुझे जप करना है ध्यान करना है तो कैसे करें तो मैं कोई अपनी इमेजिनेशन में कलर नहीं डाल पाऊंगा डिटेल नहीं डाल पाऊंगा इमेजिन नहीं कर पाऊंगा कि कबीर संत कबीर कैसे रहते थे कहां पर रहते थे किस तरह से उनका जीवन है वह मैं नहीं कर पाऊंगा मुझे अपना खुद का अनुमान करके इमेजिनेशन करके चलाना पड़ेगा किंतु ठाकुर के बारे में तो ऐसा नहीं है इवन जो हमारे जितने भी अवतार है सभी अवतारों के बारे में देखिए कि इनकी लीला गाथाएं बड़ी ही विस्तृत रूप से वर्णित है वो चाहे तुलसीकृत रामायण हो ना कि चाहे फिर यह व्यास कृत भागवत हो तो ये जितने भी ग्रंथ है हमारे पुराण है भागवत है रामायण है देखिए कि महाभारत है किस तरह से कितना डिटेल में हमको यह ईश्वर की लीलाओं का वर्णन जानने को पढ़ने को मिलता है और यह वर्णन क्यों दिया गया है रासलीला का वर्णन इतना डिटेल में क्यों है भगवान राम का वर्णन व किस तरह से वन में गए किस तरह से वह राज्य करते थे किस तरह से युद्ध करते थे लीला वर्णन क्यों इतना डिटेल में है हम लोग उसी लीला वर्णन अपने उसमें अपनी कल्पना का रंग देकर के हम लोग इमेजिन कर सकते हैं जयदिश हूं तो मैं भी भगवान राम के साथ में वनवास कर रहा हूं वहां पर एक झोपड़ी है भगवान राम मां सीता लक्ष्मण सब वहां पर रह रहे हैं मान लीजिए हनुमान भी महावीर भी वहां पर उपस्थित है सब लोग संध्या के बाद में बैठे हैं अग्नि जल रहा है कोई ऋषि मुनि होंगे वहां पर और सबके साथ में मैं भी बैठा हूं भगवान राम की आराधना स्तुति गा रहा हूं तो यह कल्पना हम कर पाए इसके लिए इतना विषद वर्णन हमको जानने को मिलता है तो यही वर्णन हमको भगवान श्री राम कृष्ण देव के जीवन में भी मिलता है कल हमने डिस्कस किया था कि यदि भगवान राम या भगवान कृष्ण और भगवान राम कृष्ण में यदि हमको दो तीन डिफरेंस खोजने हैं तो हम किस तरह के खोजें तो पहली बात तो है कि उनकी साधना हों का वर्णन नहीं है यहां पे इनकी साधना का वर्णन है दूसरा कि उनके जीवन का जो विस्तृत वर्णन जो है उसमें बहुत सारे जादू चमत्कार या तो फिर जिसको कहेंगे सुपर नेचुरल एलिमेंट बहुत सारे मिलेंगे जबकि ठाकुर महा स्वामी जी के जीवन में इतने सारे सुपर नेचुरल एलिमेंट नहीं मिलेंगे कुछ-कुछ हमको दिखे हैं जैसे कि रामलाल ने छुट्टी मांगी तो ठाकुर ने ऐसा हवा में एक व सर्कल दौर करके उसके भीतर में कुछ लिख दिया और फिर कहा तुम्हारा यहां से जाना नहीं होगा और सही में रामलाल दादा गए खजांची के पास में परमिशन लेने के लिए कि मुझे आप छुट्टी दे दीजिए तो खजांची ने कहा कि नहीं देखिए अभी बहुत जरूरत है मां काली के सेवा करने की पूजा करने की और कोई अवेलेबल नहीं है तो मैं आपको छुट्टी नहीं दे पाऊंगा बोलक के उनका जाना नहीं हुआ ऐसे कुछ-कुछ सुपर नेचुरल एलिमेंट्स हमको दिखते हैं किंतु कंपेयर टू भगवान राम के सामने इतने सारे राक्षस राक्षसी आ जाते हैं उनका वत करते ऐसा तो कुछ यहां पर नहीं है तो यह जो दो तीन डिफरेंस है इसका रीजन मुझे ऐसा लगता है ऐसा डिफरेंस है ऐसा हमने ऑब्जर्वेशन कल किया था आज यदि देखे कि क्यों क्यों यह डिफरेंस है तो मुझे पर्सनली ऐसा लगता है कि जो सनातन युग जो था वैदिक युग सत्य युग द्वापर त्रेता अब जो भी कए उस समय के लोगों की जब ध्यान करने की कैपेसिटी इतनी स्ट्रांग थी कि यह ला या तो फिर यह कल्पना की सहाय उनको ज्यादा नहीं लेनी पड़ती होगी कंपेयर टू अस कि हम लोग कलयुग में रहते हैं मन को एकाग्र करना सहज नहीं है जैसे कि ठाकुर ने कहा था कि कोली दे अन्न गत प्राण कली में यह अनगतला है अर्थात कि मन जो है हमेशा यह शरीर और शारीरिक जो सब आधि व्याधि उपाधि या तो फिर उसका जो भी जो नीड्स एंड नेसेसिटी शरीर की जो आवश्यकता होती है उसी के इर्दगिर्द अपना मन घूमता रहता है यह अधोगामी मन को पकड़ करके चाबुक मार कर के उसको ऊर्ध्वगामी करना यह बड़ा मुश्किल है हमारे लिए इसीलिए भगवान ने ठाकुर ने जैसे कहा कि इस बार राजा आए हैं छद्म वेश में पहले के जमाने में ऐसा होता था राजा के पास आसपास में इर्दगिर्द बहुत सारे वो जो दरबारी है जो चमचे लोग हैं व इकट्ठा होकर के रहते थे और राजा को कहते थे राजा आपका राज्य बहुत अच्छा चल रहा है प्रजा आपकी बहुत प्रशंसा कर रहा है अभी जो राजा इस तरह के जो यह जो मोशा मोसा जद बांगला ते बोले माने ये जो चमचे लोग होते हैं उन लोगों की बात बातों में आ गया तो उस राजा का राज्य नष्ट हो जाएगा क्यों क्योंकि प्रजा को सब समय कुछ ना कुछ तो तकलीफ होती ही है यदि प्रजा की बात राजा के पास नहीं ले जाई गई तो फिर प्रजा वो रेवोल्यूशन लाएगी व कुछ ना कुछ राज्य में भांग तोड़ कर देगी व तो किंतु जो राजा जिसमें थोड़ा सा अकल है वह क्या करेगा छद्म वेश में राजा का वेश बदल कर के आम आदमी के कपड़े पहन कर के राज्य में भ्रमण करेगा और लोगों से मिलेगा बात सुनेगा डायरेक्ट वो इंफॉर्मेशन लेगा डायरेक्ट फीडबैक लेगा तब उसको पता चलेगा कि लोगों को यहां पर तकलीफ है यहां पर तकलीफ है दूसरे दिन वो यदि अपने राज दरबार में जाकर के अपने जितने भी यह है कर्मचारी दीवान वगैरह उनको कहेंगे कि इस समस्या का समाधान करो उस सम समाधान करो वगैरह वगैरह तो जो जिस राजा में अकल है वो छद्म वेश में अपना वेष बदल करके आम आदमी का स्वरूप धारण करके राज्य में घूमेगा सबसे फीडबैक लेगा तो ठाकुर कहते हैं इस बार राजा आए हैं छद्म वेश में अर्थात कि अवतार फिर से वापस आए हैं भगवान राम और भगवान कृष्ण की तरह ही किंतु छद्म वेश में किसी को पता नहीं है ही राक्षसों का संहार कर रहा है हैं नहीं वह कोई बहुत बड़ा जादू चमत्कार करके बड़ी सेना को खड़ी कर रहे हैं पूरा राज्य चला रहे हैं मैंने तो सोचा था कि यदि अवतार आएंगे तो ब्रिटिश साम्राज्य का खात्मा नहीं कर देंगे क्योंकि जितने भी राजा है अवतार है देखिए कि उन्होंने अन्याय के सामने युद्ध किया है जबकि रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का एक बहुत ही यूनिक बात है कि ब्रिटिश साम्राज्य भारत के ऊपर में अत्याचार तो कर ही रहा था उसमें कोई प्रश्न ही नहीं किंतु फिर भी ठाकुर माहा स्वामी जी के जीवन में आपको बड़ा रेर दिखने को मिलेगा कि यह लोग ब्रिटिश को गाली दे रहे हैं या ब्रिटिश साम्राज्य के ऊपर में कोप दिखा रहे हैं क्रोध कर रहे हैं हमेशा उनका जो पूरा एक रहता है फोकस मनुष्य के हृदय को कैसे परिवर्तित किया जाए यही एक उनका एक रहता है बातों का स्मृति कथाओं का फिलोसोफिया का एक ही उसका बॉटम लाइन तो ऐसा क्यों तो इसका उत्तर हमको गंभीरानंद जी महाराज मां शारदा देवी की जीवनी की जो अवतरण का है उसका जो इंट्रोडक्शन है उसमें कहते हैं कि बाहर के शत्रुओं का बाहर के राक्षसों का विनाश तो ईश्वर हर बार आकर के करते ही रहे इस बार उनका आगमन हुआ है हमारे भीतर में छुपे हुए शत्रुओं का विनाश करने के लिए काम क्रोध मद लोभ मोह मत्सर यह जो सब या तो फिर यह पंच क्लेश अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश इन सबका सफाया करने के लिए इन सबका संहार करने के लिए इनका आगमन हुआ है तो देखिए कि आगमन जिस परपस के लिए हुआ इसके लिए सबसे बेस्ट आयुध कौन सा है सबसे बेस्ट अस्त्र कौन सा है यदि रावण का विनाश करना है तो राम बाण है रावण का संहार करने के लिए राम बाण है यदि यह कंस का संहार करना है तो सुदर्शन चक्र है जद यह वो दुर्योधन को मारना है तो गदा है भीम की जद यह राक्षसों का शुंभ निशुंभ का संहार करना है तो देवी के पास में खड़ग है तो यदि अपने भीतर में रहे हुए यह शत्रुओं का संहार करना है तो शस्त्र कौन सा है वह है जप ध्यान और यह जप ध्यान में सुविधा हो सहज सरल हो जाए इसके लिए यह सब स्मृति कथाएं कथ उप कथन वार्तालाप वगैरह ये चाहे कथामृत हो ना कि यह कथामृत की तरह की जितना भी अपना साहित्य हो यह सब साहित्य देखिए कि आप यदि खाने को बैठते हैं आज सुबह ही क्या हुआ मैं गया था डाइनिंग हॉल में तो एक एक खास कर एक जो जैसे ढो सा होता है ना ढो सा बनाते हैं हम लोग ढो सा बड़ा अच्छा लगता है यहां पे एक दूसरी तरह का ढो सा बनाते हैं वो एक डिफरेंट तरीके से बनता है और मुझे नहीं अच्छा लगता तो अभी वोह रसोइए ने आकर के वो आकर के मुझे एक ढसा दिया व जो दूसरी तरह से बनाया हुआ जो कि मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता तो मैंने कहा अरे यार यह क्या दे दिया अभी मैं उसको खा रहा हूं बिना किसी इच्छा के खाना तो पड़ेगा थोड़ा बहुत तो खा रहा हूं तो उसमें उसने आकर के कहा क्या ब्रेड सेक दूं आपके लिए अभी मुझे ब्रेड अच्छी लगती है व खास करके ब्राउन ब्रेड उसके ऊपर में थोड़ा सा बटर वगैरह दे दे तो मैंने कहा हां हां सेको सेको भी क्या पूछना शुभ काम में देरी कैसी तो उसने फिर वो ब्रेड सेक करके दे दी तो वोने फटाफट खा ली देखिए वो वो जिस तरह का डोसा उसने बनाया था खाने की बिल्कुल इच्छा नहीं हो रही थी बड़ा ही मैं बिना किसी इच्छा के खा रहा था किंतु जैसे ही ब्रेड आई फटाफट करके मैंने खा ली तो देखिए कि ये जो स्मृति कथा है या तो फिर ये कथामृत बड़े ही सहज से अपना हम उसको पाचन कर सके हम उसको खा कर के उसको अपने चिंतन मनन में उसको परिवर्तित कर सके इतना आसानी से इसको ग्रहण कर सके इसके लिए इनकी रचना की गई है और इसीलिए ये स्मृति कथाओं को जितना पढ़ेंगे जितना उसके बारे में सोचेंगे उतना ही देखेंगे कि सबकॉन्शियसली अपना मन जो है उसका शुद्धीकरण होता जाता है यह सब एक एकदम पावरफुल वाशिंग मशीन की तरह काम करता है जिसके भीतर में हमने अपने संस्कार डाले यह स्मृति कथा रूपी वाशिंग मशीन के भीतर में और कुछ दिनों के बाद में देखा कि जैसे हम आंख बंद करके बैठते हैं वैसे ही यही सब चालू हो जाता है अपने मन के भीतर में कि हा ठाकुर वहां पर वह सीधे रास्ते से जा रहे थे देखा कि चौड़ा रास्ता देख कर के उन्होंने कहा कि यह तो साधुओं के मन के जैसा रास्ता है कभी हम इमेजिन करेंगे कि ठाकुर मां के घर में जाते हैं जैसे हमने देखा था कि मां के लिए एक अलग से घर शंभू मलिक ने बना दिया था और वहां पर मां कुछ दिनों तक रही थी और ठाकुर उनके घर जाते थे और कहते थे जैसे कालीवाड़ा ह्मण अपने घर कैसे चले जाते हैं रात को वैसे मैं भी तुम्हारे घर आया हूं एक दिन ऐसा हो गया कि इतनी जोरों से बारिश हो रही है कि ठाकुर को वहीं पर रुक जाना पड़ा और उसी दिन रात को वहां पर रुके और फिर दूसरे दिन अपने काली मंदिर में वापस आए देखिए मां की एक बड़ी ही सुंदर कथा है कहानी है एक बार एक वृद्धा मां के घर पे आई अभी क्या है कि कोआलपाड़ा है आरामबाग है वगैरह जो आसपास के जो शहर थे वहां के भक्त मां के पास में काफी चीजें भेजा करते थे पता है कि जयराम बाटी में यह तरकारी है दूध है धान है वगैरह कुछ ज्यादा मिलता नहीं है तो फिर यह लोग तरकारी वगैरह एक किसी मजदूर को देंगे मजदूर अपने सर पर लाकर के मां के पास में आकर के देगा तो ऐसे ही एक वृद्धा थी जो कि हमेशा इस तरह से कुछ ना कुछ तरकारी वगैरह टोकरा जो है बड़ा सा अपने सर पर ले आ कर के मां के घर पर आती वहां जो जहां पर रहती थी वहां के डिवोटा इस तरह से उसके माध्यम से पहुंचाते तो एक दिन दिन यह वृद्धा अपने सर पे यह तरकारी वगैरह लेकर के मां के घर पे आई जयराम बाटी में तो मां ने पूछा कि अरे मां जी आपको बहुत दिनों से देखा नहीं है आप कहां चली गई थी जनरली तो ऐसा होता है कि यह तरकारी वगैरह नियमित मां के पास में आता था और यही वृद्धा ही नियमित रूप से लेकर आती थी किंतु कुछ दिनों तक यह वृद्धा आई नहीं और किसी के माध्यम से भक्त लोग यह तरकारी वगैरह बेचते थे तो मां ने जैसे ही वृद्धा को देखा इमीडिएट वो कंसन जो है मा त्र ह्रदय इमीडिएट मां ने पूछ लिया कि अरे मां जी आप इतने दिनों से आई नहीं थी आप कहां चली गई थी तो जैसे ही मां ने इतना मतलब प्रेम से पूछा जनरली मजदूर आता है अपने घर पर तो हम क्या करते हैं उसके पास में काम करवाते हैं जितना रुपया होता है दे देते हैं और कहते हैं चलते बनो उसके साथ में किस तरह का रिलेशन कभी होता है क्या वो जनरली नहीं रखते हैं मजदूरों के साथ में किसी तरह का रिलेशन किंतु माने इस मांजी को इतने सहानुभूति से जेनुइन कभी अभी लोग बातें करेंगे किंतु जैसे मैं किसी के पूर्वा श्रम की बात है मैं एक जगह पर रह रहा था वह जगह थी एक बहुत बड़े एक गवर्नमेंट ऑफिसर की जगह थी तो वह आदमी बड़ा घमंडी भी था थोड़ा सा तो उसके घर पर जब भी कोई भी छोटा मोटा आएगा तो वो बड़ा दिखावा करेगा कि हां मतलब ये रिक्शा वाला आया यह आया वो आया क्या है सब कुछ ठीक-ठाक है तो तो बोलेगा हां साहिब सब कुछ ठीक-ठाक है तो फट कर के ऐसा रुपया फेंक दिया हाथ में भी नहीं देगा फेंके और वह जो आदमी है मजदूर है वगैरह जो भी है जमीन पर झुक कर के रुपया लेकर अपने पॉकेट में जाक जाएगा तो मुझे यह देख कर के ना हम लोगों ने जनरली मिडल क्लास वाले जो लोग होते हैं पावर और धन यह सब वैभव इतना देखा नहीं है और वैभव के साथ में जो घमंड आता है व भी हमने इतना नहीं देखा है तो यह गवर्नमेंट ऑफिसर बड़ा आदमी है बड़ा धनी व्यक्ति है पता नहीं एक नंबर दो नंबर कितना उसने किया होगा तो पैसा फेंकता है जमीन के ऊपर में और वोह जो मजदूर है जमीन पर झुक के पैसा उठाता है और बड़ा ही विनय पूर्वक कहता है हां साहब मैं ठीक हूं ऐसा देख कर के तो मुझे पता नहीं कैसा लगता था तो देखिए कि वो तो एक झूठ मुट का दिखावा है कि आप उसको पूछते हैं जैसे अपना बड़पन दिखाने के लिए कि मैं तुम्हारी केयर करता हूं मैं तुमको पैसा देता हूं यहां पर तो मां के हृदय में जो जेनन जो एक सही सही में एक वृद्धा मांजी के साथ में एक प्रेम का हृदय का संपर्क इंस्टेंट जो बन जाता है तो वृद्धा भी तो करेगी ना जो यह जो धनी व्यक्ति पैसा फेंकता है और जो मजदूर उसके सामने बड़े विनय पूर्वक कहता है कि हां साहेब मैं ठीक हूं उसको हृदय में पक्का पता है कि यह मुझे धिक्कार होता है भले चाहे मुंह पर कुछ भी बोले किंतु यहां पर तो मां शारदा जगत जननी स्वयं आपको पूछ रही है भीतर में किया जो प्रेम है तो वृद्धा की आंखों में आंसू आ गए यह सहानुभूति पा कर के और उसने बोल उठी कि मां मैं क्या करूं मैं बड़ी विपद में आ गई हूं कुछ दिन हुए मेरा जो जवान लड़का है जो रोजगार करता था उसका मृत्यु हो गया है अभी तो जीवन निर्वाह चलाना बड़ा मुश्किल हो गया है मुझे इधर-उधर मजदूरी के लिए जाना पड़ता है इसलिए जब बाबू लोग आते हैं यह तरकारी वगैरह यहां पर लाने के लिए तो मुझे घर में पाते नहीं है इसलिए मैं यहां पर नहीं आ पाती तो अब जैसे अभी देखिए कि वृद्धा का लड़का जद इस तरह का जवान लड़का मृत्यु हो जाए उसका तो उसको बेचारी को जो कष्ट होगा व तो हमको अनुमान कर सकते हैं यहां तो मां जगदंबा स्वयं मां के मां ने एकदम बोल उठी मां कि अरे क्या बात करती हो तुम्हारा लड़के का मृत्यु हो गया तुम्हारा बेटा मारा गया ऐसा बोल कर के मां खड़ी थी बैठ गई बैठ गई और एकदम रोने लग गई अब जैसे ही मां ने रोना शुरू किया तो वृद्धा तो एकदम इससे मन के भीतर में जो कष्ट है जो दर्द है किसको बताएगी इसका तो जगत में कोई नहीं एक लड़का था वो भी तो बेचारा चला गया तो उसने चित्कार करके रोना शुरू कर दिया वृद्धा ने मां ने रोना शुरू किया वृद्धा ने चित्कार करके रोना शुरू किया और जैसे वृद्धा ने चित्कार किया मां भी चित्कार करके रोना शुरू कर दी जैसे कि दो बहने हैं और दोनों एक ही परिवार की स्त्रियां हैं दोनों ने अपने प्रिय पात्र को गवाया है और भीतर में से जो दुख दर्द कष्ट बाहर में आंसुओं के माध्यम से व्यक्त होता है दोनों रो रहे हैं ऐसा जोर-जोर से चित्कार करके तो सब लोग दौड़ कर के आ गए जितने भी वह सन्यासी संतान थे मां के ये राधू माकू जितने परिवार वर्ग थे जितने डिवोटा थे सब दौड़े-दौड़े आए मां चित्कार करके रो रही है क्या हुआ क्या हुआ कौन सी बड़ी दुर्घटना हो गई तो देखा कि मां और यह वृद्धा दोनों पासपास में बैठे हैं और ऐसे रो रहे हैं जैसे कि उनका सर्वस्व लट गया हो वो सब लोग किंग कर्तव्य विमूव होकर के क्या बोले क्या ना बोले क्या हो रहा है कुछ पता नहीं सब लोग नीरव होक के देख रहे हैं कुछ समय चला बीता गया वृद्धा के मन को शांति मिली उसके आंसू थमे मां के भी आंसू थमे फिर मां ने किसी को कहा कि वृद्धा को साड़ी दो खाने के लिए कुछ मुड़ी वगैरह दो सर पर डालने के लिए तेल दो वगैरह उसको देकर के फिर आखिर में वृद्धा को विदाय किया और जो सन्यासी महाराज यह राममय महाराज थे ना कि वरदा महाराज दो में से एक जिनो ने यह स्मृति कथा लिखी है वो कहते हैं कि वृद्धा के जाने के समय में उसके च के ऊपर में जो संतोष जो एक शांति हमने देखी व अद्भुत थी जगदंबा की स्वयं सहानुभूति उसने प्राप्त की थी और मां ने ऐसा नहीं है कि उसको बहुत सारा रुपया दे दिया मां के खुद के पास में रुपया कहां से होने वाला था एक बार शरत महाराज ने मां को पत्र लिखा मां का तो संसार बढ़ता जाता है तो घर में रुपया वगैरह कहां से आएगा तो मां शरद महाराज के पास में से कलकाता से भक्त लोग जो पैसा देंगे प्रणामी वह सब शरद महाराज जयराम बाटी भेजते थे और व उस समय राधू का भी बीमारी इतना चल रहा है क्या करें और बीमारी में रुपया इतना खर्च हो रहा है तो एक दिन शरत महाराज ने मां को लिखा पत्र में कि सब जुगाड़ करके व्यवस्था करके पैसे भेजने में थोड़ा सा देरी हो रहा है ऐसा करके तो मां ने जैसे ही पत्र पढ़ा तो मां ने कहा तो कि शरत हाते टाका नहीं की शरत के पास में क्या रुपया नहीं है तो मैंने अब अब देखिए कि मां इसको बाद में कहती है कि देखो ठाकुर ने ने मुझे कहा था कि किसी के सामने हाथ फैलाना मत हाथ जैसे ही फैलाओ ग तुम्हारा मतलब अपनी जो एक इज्जत होती है अपनी एक डिग्निटी के साथ में रहते हैं वो चली जाती है तो मैंने तुम किसी के सामने हाथ मत फैलाना ऐसी बात ठाकुर ने कही थी तो मां ने कहा देखो राधी तुम्हारे लिए मेरा जब ध्यान सब कुछ गया सम्मान भी गया किस-किस के पास में अभी मुझे रुपए मांगने पड़ेंगे ऐसा करके फिर वहां पर जो सेवक महाराज थे उन्होंने कहा कि नारायण आयंगर बोलक के एक व्यक्ति एक डिवोटा उस कुछ समय जयराम बाटी में रुका था तो उसने कहा था जाने के समय बेंगलोर से आया था और बड़ा उच्च पदस्थ अधिकारी था तो उसने कहा था मां आपको जद पैसे की जरूरत हो बोलना मैं महीने महीने पैसा भेजूंगा किंतु फिर वो एक बार चला गया बेंगलोर वो अपने काम में काम में बिजी हो गया होगा पैसा वगैरह नहीं भेज रहा था तो माने कहा तो सेवक महाराज कहते हैं कि क्या नारायण आयंगर से रुपया मांगे तो माने इस समय कहा कि देखो ठाकुर ने कहा था किसी के सामने हाथ मत फैलाना अभी राधु के लिए मुझे यह भी करना पड़ेगा क्या तो मां का हृदय है राधु को अपनी बेटी बिटिया की तरह वह पालन पोषण कर रही है तो उसके लिए सब कुछ तो करना ही पड़ेगा अभी मां कुछ कहे ना कहे सेवक महाराज ने सोचा अपने से ही एक्शन ली जाए तो उस समय निर्मलानंद निर्मल तुलसी महाराज निर्मलानंद जी उस समय साउथ इंडिया में थे और ठाकुर के संतान तो अभी इन्होंने मां के पास में एक पत्र भेजा था विजया की ऐसा कोई उत्सव था तो आशीर्वाद मांगने के लिए तो इस पत्र के उत्तर में मां के आशीर्वाद के बारे में तो सेवक महाराज ने लिख ही दिया साथ-साथ में जो परिस्थिति थी वहां की जयराम बाटी घर की तो सब लिख दी कहा कि पैसा नहीं है मां को तकलीफ हो रही है शरद महाराज जुगाड़ नहीं कर पा रहे हैं समय के ऊपर में तो फिर जैसे ही यह पत्र निर्मलानंद जी के पास में गया तुलसी महाराज के पास में इमीडिएट उन्होंने यह नारायण आयंगर को कहा और तभी से नारायण अयंगर प्रति महीने कुछ ना कुछ रुपया भेज दिया करता था तो मां के खुद के घर की परिस्थिति ऐसी नहीं थी कि वो वृद्धा माता जी को इतना सारा रुपया देकर के उनके जीवन का कष्ट लाघव कर सके किंतु उन्होंने सिर्फ सहानुभूति ही जतन की और सहानुभूति के माध्यम से ही देखिए कि वृद्धा का हृदय जो है पूरा ही वो आनंद से दिव्य उल्लास से भरपूर हो गया बड़ी ही शांति से आनंद पूर्वक वह वहां से गई है तो यह जब भी हम आंख बंद करके बैठेंगे तो यह सब कहानियां जद सोचेंगे तो तो हमारा मन भी उस तरह के दिव्य उल्लास से भरपूर हो जाएगा हम रामलाल दादा की बात कर रहे थे रामलाल दादा हमको कहते हैं कि कल्पतरु होने के दिन की जो घटना है 1 जनवरी 18864 दक्षिणेश्वर कलकाता से थोड़ा सा दूर पड़ता था तो ठाकुर को काशीपुर उद्यान गुरु में रखा गया है उस दिन ठाकुर को थोड़ा सा सेहत ठीक लग रहा था फर्स्ट जनुअरी को ठाकुर ने रामलाल दादा को कहा अरे चलो थोड़ा सा नीचे घूम कर के आते हैं तो रामलाल दादा ने कहा अच्छा चलिए तो रामलाल दादा ने अपने हाथ में एक लोटा और एक गमछा ऐसा लिया ठाकुर को यदि हाथ मुंह धोना है गमछे की पानी की जरूरत पड़े तो लोटा और गमछा लिया और ठाकुर के हाथ पकड़ करके बड़े ही जत्न पूर्वक ठाकुर का कमरा यदि काशीपुर में देखा होगा तो फर्स्ट फ्लोर पर था तो धीरे-धीरे करके सिड़ी उतर कर के वहां पे गार्डन है बड़ा सा वहां पर टहलने लगे उसके बाद में क्या हुआ जगत प्रसिद्ध घटना हमको पता है कि क्या ये गिरीश घोष वगैरह भक्त एक जगह पर बैठे थे आम्र वृक्ष है वहां पे आम्र वृक्ष ना कि कौन सा भी एक वृक्ष है जिसके नीचे ये सब बैठे थे तो ठाकुर वहां पर गए और ठाकुर ने कहा कि क्या प्यारे गिरीश तुम सबको क्या सब कहते घूमते हो इसके बारे में यहां के बारे में अपना अपनी ओर इशारा करके अर्थात कि गिरीश क्या है सबको कहता घूमता था ना कि ठाकुर अवतार है अवतार है बोल कर के तो ठाकुर ने उसको पूछा कि यहां के बारे में तुम यह सब क्या कहते घूमते हो ऐसा तो तुमने क्या देखा है ऐसा तो तुमने क्या अनुभव किया है यहां के बारे में ठाकुर ऐसा तो नहीं कहेंगे मेरे बारे में यहां के बारे में तो अर्थात कि उनके बारे में गिरीश घोष ने क्या अनुभव किया है क्या जाना है कि लोग को वो अवतार करके प्रचार कर रहा है लोगों के भीतर में कि ठाकुर अवतार है तो जैसे ही गिरीश भक्त प्रवर गिरीश तो भैरव का व तो अंश से जन्म हुआ था एकदम सीधे होकर के साक्षात ठाकुर के चरणों में गिर गए दंडवत प्रणाम करके कहते हैं कि व्यास और वाल्मीकि जिनकी गाथा सुनाते सुनाते थकते नहीं है जिनके गुणों का वर्णन कर कर नहीं पाते हैं उनके बारे में मैं तो क्या कहूंगा व्यास और वाल्मीकि किनके गुणों का वर्णन कर थकते नहीं है भगवान राम और भगवान कृष्ण के तो जैसे ही गिरीश ने ऐसा कहा तो ठाकुर इमीडिएट भाव में चले गए और कहा क्या कहा कि आमी मैं तुमको आशीर्वाद करता हूं तो मादे चैतन्य हो तुम सबको चैतन्य प्राप्ति हो जैसे ही ठाकुर ने ऐसा करके लोगों को स्पर्श करना शुरू किया सभी के हृदय में एकदम एक अद्भुत आध्यात्मिक आंधी तूफान की तरह उठा किसी ने अपने इष्ट का दर्शन किया किसी ने कोई आत्म साक्षात्कार किया किसी ने क्या किया कोई पागल होकर के हंस रहा है तो कोई नृत्य कीर्तन कर रहा है ना कि ऐसा एक जैसे कि एक पागल लोगों का मेला ही जैसे ना लग गया हो जिसको जिसको ठाकुर स्पर्श करते उसको कोई ना कोई प्रचंड आध्यात्मिक अनुभूति होती है और वह एकदम उस अनुभूति में मगन होकर के आनंद के मारे पागल होता जा रहा है तो रामलाल दादा कहते हैं कि मैं ठाकुर के पीछे में खड़ा था और मेरे हाथ में यह लौटा और गमछा और मैं अपने मन में सोच रहा था कि चलो सभी भक्तों को तो कुछ ना कुछ मिला मैंने ठाकुर की इतनी सेवा की तो मेरे नसीब में क्या आया यह बस लोटा और गमछा बह कर के ले जाना उसको लेकर के इधर-उधर जाना लोटा मने वो बाटी गम छ बोआ की सार होलो उने रामलाल दादा अपने मन में सोचते हैं कि लोटा और गमछा लेना के जाने का यही क्या मेरे जीवन का सार है क्या तो जैसे ही उन्होंने यह सोचा अपने मन में ठाकुर को पता चल गया ठाकुर ने रामलाल दादा को कहा अरे रामलाल खाने आए सामने आओ सामने आओ फिर जैसे ही रामलाल दादा उनके सामने आए ठाकुर ने उनको भी स्पर्श किया रामलाल दादा कहते हैं कि वह जो दिव्य आनंद उसका वर्णन भी नहीं कर सकते थे इससे पहले मैं जब जब ध्यान करता था तो ईश्वर का लगता था जैसे कि एक निर्जीव छवि मात्र है किंतु जिस क्षण ठाकुर ने मुझे स्पर्श किया दिव्य उल्लास से मेरा मन भर गया तो ईश्वर संपूर्ण रूप से मुझे साक्षात्कार होने लगे सजीव ईश्वर सजीव इष्ट सिर्फ एक निर्जीव छवि मात्र नहीं सजीव इष्ट मेरी नजर के सामने प्रकट हुए और ऐसा लगा कि उनके आनंद से मैं भरपूर हो जा रहा हूं तो यह अनुभूति रामलाल दादा को उस दिन हुई थी अभी देखिए कि अ यह जो ठाकुर को अवतार अवतार करके बुलाने की बात है रामलाल दादा और एक दिन का वर्णन करते हैं कहते हैं कि ठाकुर को काशीपुर में रखा गया था और ऐसा एकदम नियम बना दिया गया था कि निरंजन महाराज हैं वहां पर सीढ़ी के पास में दरवा की तरह खड़े रहेंगे और किसी को ऊपर में नहीं जाने देंगे किंतु ठाकुर ने कह के रखा था जब भी रामलाल आता है दक्षिणेश्वर से उसको मेरे पास में आने देना तो एक दिन रामलाल दादा गए ठाकुर के पास में जाकर के बैठे एकाएक ठाकुर इस तरह से छटपटा नहीं लगे जैसे उनके पूरे शरीर में आग लग गई हो कहते हैं कि अरे मेरे हाथ पैर जल रहे हैं शीघ्र तुम गंगाजल लाकर के इसको धो दो तो रामलाल दादा भी आश्चर्य चकित होकर के गंगाजल लेकर आए ठाकुर के हाथ पैर के ऊपर में छिटका तब ठाकुर को कहीं शांति हुई फिर ठाकुर कहते हैं कि देखो यह रामचंद्र दत्त वगैरह जो है यह लोग जो चारों ओर कहते घूमते हैं कि मैं अवतार हूं मैं अवतार हूं मैं तो चुपचाप आया था दो-तीन भक्तों को लेकर के और मैं तो जान चाहता था कि बस मैं इन लोगों के साथ में अंतरंग लोगों के साथ में लीला वगैरह सब करूंगा आनंद करूंगा कहीं यह राम ने मेरा प्रचार करके ऐसे लोगों को मेरे पास में लेकर आ रहा है जिसका कोई संस्कार नहीं कोई आध्यात्मिकता नहीं ऊपर से मुझे विनंती करेंगे इसको स्पर्श कर दीजिए उसको स्पर्श कर दीजिए अच्छे से स्पर्श कीजिए ऐसे ऐसे नहीं तो इस स्पर्श करके इन लोगों का पाप मेरे भीतर में आ गया और देखो कि मुझे यह सब हो गया है यह सब अर्थात कि कैंसर तो देखिए कि ठाकुर ने खुद ने इस तरह से एक बार कहा था दोनों है ठाकुर का पृथ्वी पर आगमन ही हुआ है पापी ताप यों का पाप ग्रहण करने के लिए ताप ग्रहण करने के लिए यदि अवतार नहीं ग्रहण करेंगे तो और कौन करेगा इसीलिए एक और हम देखते हैं कि गिरीश को कहते हैं कि बोलो तुम मेरे बारे में जो अवतार अवतार करके प्रचार कर रहे हो क्या देखा तुमने तो गिरीश ने जैसे ही कहा जो राम जो कृष्ण वही राम कृष्ण तो वैसे ही ठाकुर एकदम आनंद में ईश्वरीय उल्लास में भरपूर हो गए आशीर्वाद देना शुरू कर दिया और यहां पर देखिए दूसरे ही प्रसंग में ठाकुर कहते हैं कि इनके पाप ताप लेकर के मुझे यह सब हुआ है तो ये लोग जब आते हैं तो यह नहीं देखते कि उनके साथ में क्या हो रहा है यह लोग बस वही देखते हैं कि जगत कल्याण के लिए जो आए हैं तो जगत कल्याण कैसे हो इसके बाद में रामलाल दादा कहते हैं कि ठाकुर का आखिरी दिन आ गया उस दिन रामलाल दादा दक्षिणेश्वर में थे वहां पर काशीपुर में नहीं थे आधी रात को यह अद्वैतानंद जी अर्थात की बूढ़ो गोपाल और कुछ कुछ लोग वहां पर एकाएक आ गए ठाकुर के कमरे में यह सो रहे होंगे तो एकदम उनके घर में आ गए और कहा उठाया रामलाल दादा को चलिए चलिए नरेंद्र बुला रहा है आपको तो रामलाल दादा उसी दिन मध्यरात्रि को के साथ में काशीपुर आए देखा कि ठाकुर एकदम समाधि में गंभीर समाधि में डूब गए हैं और नरेण वगैरह सब भक्त लोग वहां पर बैठे हैं नरेद कहता है कि देखिए देखिए यह तो हमको कुछ विचित्र तरह की समाधि दिख रही है हमको लगता है कि क्या यह महासमाधि में मग्ना हो गए हैं कि वोह यही वह जो डिफरेंट टाइप की समाधि है नरन कहता है रामलाल दादा को आपने तो ठाकुर की बहुत दिनों तक सेवा की है विभिन्न समाधिया देखी है तो आप हमको बताइए यह जो समाधि है ना कि महासमाधि है तो रामलाल दादा ने देखा कि ठाकुर स्थिर होकर के सोए हैं आंख खुली है नजर स्थिर है चेहरे पर प्रकाश दिव्य आनंद फैला हुआ है तो रामलाल दादा कहते हैं लगता तो है यह समाधि है किंतु आप एक काम कीजिए आप यह जो विश्वनाथ उपाध्याय जिसको कि ठाकुर कैप्टन करके पुकारा करते थे उसको पुकार के ले आइए उसको बुला के ले आइए उसको यह सब चीजों के बारे में बड़ा अच्छे से पता है तो फिर उसी दिन रात को ये कैप्टन को पुकारने के लिए बुलाने के लिए लोग गए कैप्टन आए उन्होंने देखा कि ठाकुर का मेरुदंड है वह अभी भी गर्म है थोड़ा सा उन्होंने कहा कि गाय का घी जो है उसके ऊपर में मालिश करना शुरू कीजिए तो ठाकुर के मेरुदंड के ऊपर में गाय का घी मालिश कर रहे हैं काफी समय तक बाकी सब कीर्तन भी चल रहा है यहां पे घी भी लगा रहे हैं कुछ दिन समय के बाद में पता चला कि मेरुदंड जो है संपूर्ण रूप से ठंडा हो गया है तब कहीं जाकर के यह उपाध्याय ने कहा कि नहीं ठाकुर ने शरीर त्याग कर दिया है यह समाधि अभी महासमाधि में परिणत हो गई है तो इसी तरह से ठाकुर का जो जीवन है उसका वहां पर अंत आया रामलाल दादा कहते हैं 12:30 के समय हमको लगता है रात को उनका उन्होंने महासमाधि में प्रवेश किया था अभी महासमाधि के कुछ दिनों की बात है अयोध्या से एक साधु दक्षिणेश्वर आया रामलाल दा वहां पे थे तो वह आकर के कह रहा है कि मैंने सुना है कि यहां पर एक परमहंस महाशय रहते हैं तो मैं उनसे उनका दर्शन करना चाहता हूं बताइए आपकी वह कहां पे है तो रामलाल दादा ने कहा कि भैया वोह तो महाराज जी वो तो कुछ ही दिन हुए कि उन्होंने महासमाधि ग्रहण कर ली है तो जैसे ही उन्होंने कहा तो यह जो रामाय साधु था रामाय अर्थात कि भगवान राम का उपासक वो तो एकदम जोर-जोर से उसने रोना शुरू कर दिया कहा कि अरे उन्होंने मुझे दर्शन देक के कहा था मैं कितना ही तकलीफ करके अयोध्या से यहां पर आया हूं उनका उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए और उन्होंने शरीर त्याग कर दिया अरे राम मैं क्या करूं बोलकर के इतना विमर्श होकर के वहां पंचवटी के आसपास में कहीं पर पड़ा रहा काफी दिनों तक और किंतु एक दिन बड़ा ही खुशी होकर के उसने आकर के रामलाल दादा को कहा देखिए मैं वहां पर पड़ा हुआ था नबत के पास में बकुल ला बोलकर के एक घाट है वहां पे एकाएक देखा कि ठाकुर गंगा में से बाहर आकर के मुझे कहते हैं कि अरे भाई तुम इतना बिना खाने खाए पिए इतने दिन से हो यहां पे तुम एक काम करो इस हांडी में मैं तुम्हारे लिए पायस लाया हूं खिर लाया हूं इसको खा लो बोलकर के ठाकुर ने उसको एक हांडी दी और उसमें खीर था और यह साधु ने खीर खाया और फिर ठाकुर अदृश्य हो गए वो साधु इतना आनंदित हो गया था बोलता है कि मेरे हृदय की जितने भी यह ताप संताप थे सब धुल गए यह पायस खा कर के ठाकुर का आशीर्वाद प्राप्त करके रामलाल दादा कहते हैं कि वह जो हांडी है वह हांडी या तो फिर बांगला में कहते हैं सरा तो बंगोली में उसको मैंने बहुत दिनों तक अपने पास में जतन करके रख दिया था कि हां यही सरा या यही हांडी है जो कि ठाकुर ने मिट्टी की जो कि ठाकुर ने उस साधु को दी थी अभी फिर पता नहीं किसी एक्सीडेंट से या किसी वजह से यह हांडी अदृश्य हो गई या या टूट गई या तो जो भी हुआ हो अभी एक प्रश्न होता है यहां पर कि साइकोलॉजिकल या कॉन्शसनेस सुपरकॉन्शसनेस लेवल पर दर्शन वगैरह होते हैं आशीर्वाद प्राप्ति होती है मन में आनंद होता है वह सब तो समझ में आ सकता है किंतु कोई एक पदार्थ कोई एक फिजिकल चीज आपको इस तरह से ईश्वर आ कर के दे यह तो माने चमत्कार ही तो है मैंने कोई भी चीज आपके हाथ में देना पदार्थ या भौतिक चीज कोई मटेरियल चीज ये तो चमत्कार के अलावा क्या है मानसिक लेवल पे सुपरकॉन्शियस लेवल पे आपको दर्शन हो आपको आशीर्वाद प्राप्त हो आपको उपदेश प्राप्त हो ना कि जो कुछ भी प्राप्त हो मेंटल लेवल प सब कुछ हम समझ सकते हैं सबकॉन्शियस कॉन्शियस सुपरकॉन्शियस ये सब डिविजन स्वामी जी ने हमको समझाए हैं हमने उसको पढ़ा भी है राजयोग में तो यह सब तो हमको समझ में आता है फिजिकल चीज प्राप्त करना ये तो चमत्कार से कम कुछ नहीं है तो यदि हमको यह प्रश्न होगा तो देखिए कि इसी तरह की एक दूसरी घटना भी अपने साहित्य में है मां जब जयराम बाटी आई थी बहुत ही बीमार थी तब मां के भाई ने कहा था कि यह सिंहवाहिनी के वहां पर हत्या दोगी क्या वहां पर धरना दोगी क्या तो वहां पे मां सिंहवाहिनी के मंदिर में पड़ी रही पता नहीं जो शरीर जाना है तो जाए और मां की कृपा होगी तो शरीर रह जाएगा मां की कृपा से जो होना है सो हो तो उसी दिन मां बहुत ही बीमार थी उस समय और औषध वगैरह कोई फायदा नहीं हो रहा था तो उसी दिन आकर करके मां सिंहवाहिनी ने मां को आकर के दर्शन दिया कहा कि यह फूल है उसका रस अपनी आंखों में डालना आंख फूल गई थी आंख खुल नहीं रही थी अपनी आंखों में डालना तो आंख ठीक हो जाएगी फिर यही सिंहवाहिनी ने आकर के मां की मां श्यामा सुंदरी देवी को दर्शन देकर कहा कि अरे तुम्हारी बिटिया वहां पर पड़ी हुई है सिंहवाहिनी के मंदिर में उसको घर ले आओ उसको वहां पर इस तरह से क्यों मंदिर में पड़े रहने दिया है बोल कर के कहा कि औषध है औषध लो उसको खिलाना तो अभी देखिए कि औषध मां सिंहवाहिनी ने श्यामा सुंदरी देवी को दिया था एक मेडिसिन और फिर मां कहती है कि जिस तरह से मां ने मां काली या सिंहवाहिनी ने आकर के जिस तरह से उपदेश दिया था उस तरह से फूल का रस आंखों में डाला तो आंख ठीक हो गई फिर मेरी मां को अर्थात कि श्यामा सुंदरी देवी को जो औषध दिया था उसका सेवन किया तो मेरा शरीर भी ठीक हो गया तो यहां पर एक दूसरा प्रसंग हमको मिलता है गंभीरानंद जी ने खुद उसका उल्लेख किया है कि मां ने आकर के कोई एक चीज भौतिक पदार्थ हमको दिए तो यह मतलब बिल्कुल यह जो वेदांत से लेकर के चमत्कार के बीच की यह जो बॉर्डर लाइन है उसको क्रॉस करने जैसा हो गया कि मां आकर के कोई चीज हमको देती है तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा परा वो भूत का आवेश होता है ना किसी किसी पे वो निरंजन महाराज वो भूत प्रेत तत्व में व पता है ना वो सियास वगैरह करते थे ठाकुर के पास आए ठाकुर ने कहा तुमको इस बार इस तरह के भूत ने पकड़ा है तुमको छोड़ेगा नहीं राजा महाराज के ऊपर में भार था कि सबको आमंत्रण देना वो उसके घर पर कीर्तन वगैरह रखा था आई थिंक अधर के घर पर तो किसी किसी को निमंत्रण देना भूल गया राखल राजा महाराज तो छोटे थे उम्र में तो फिर राम बाबू वगैरा के कहीं आमंत्रण नहीं मिला तो बड़ा अभिमान करके बोल रहे हैं कि वहां पर कीर्तन रखा और हमको आमंत्रण नहीं दिया तो ठाकुर समझाते हैं कि अरे ख ल तो बच्चा है उसका गला दबाओ के तो दूध निकलेगा ये बंगाली में वो जो छोटे बच्चे की वो उम्र समझाने के लिए ऐसा कहा जाता है दूध पीता है तो बच्चा गला दबाओगे तो क्या निकलेगा दूध निकलेगा और फिर ठाकुर क्या कहते हैं पता है कि जहां पर हरि नाम कीर्तन हो रहा है वहां पर आमंत्रण की जरूरत नहीं है वहां पर बिन बुलाए मेहमान की तरह भी जा सकते हैं ये दोनों है ठाकुर का आमंत्रण यदि हमने सुना है तो अच्छा ही है नहीं सुना फिर भी हम घुस मार सकते हैं गेट क्रशिंग कर सकते हैं ठाकुर ने ही कहा है बो यदि निमंत्रण नहीं मिला है तो गेट क्रशिंग भी कर सकते हैं जहां पर हरि नाम हो रहा है कोई चिंता की जरूरत नहीं यह कथामृत है इनविटेशन पत्र इटरनल स्टैंडिंग इनविटेशन देखिए किसी धनी व्यक्ति को माने नहीं बोला अभी तो यह हम लोग अनुमान करके कहते हैं क्योंकि स्मृति कथा तो यहीं पर रुक जाती है तो फिर जद सुदामा का उदाहरण देखेंगे वह पत्नी ने कहा जाओ जाओ कृष्णा आपके भाई बंधु है जाकर कुछ माग के आओ तो सुदामा जाए गए सब व सब कुछ किया गप लगाए किंतु मांग नहीं पाए कुछ बोला कि अभी क्या मांगेंगे किंतु वापस आके देखा तो देखा वो बड़ा महल है नौकर चाकर है धन धान्य है सब कुछ है तो अभी मां की कृपा इस तरह से उसके ऊपर नहीं होगी कौन कह सकता है मने मन का ही सांत्वना तो असली सांत्वना है बाकी तो भौतिक चीज आती रहेगी जाती रहेगी वोह सब तो मीनिंग लेस है किंतु अब जैसे वो हाजरा है ना हाजरा कहता है ठाकुर को कि भगवान को आप उपासना करेंगे तो आपको यह यह जप ध्यान ईश्वर प्राप्ति वगैरह भी तो होगी य भौतिक चीजें भी मिलेगी सब कुछ मिलेगा आजरा का जो भाव था तो मुझे लगता है वो भाव क बिल्कुल गलत भी नहीं था रामकृष्ण संघ को ही आज देख लीजिए कहां वो भिक्षा करने के लिए मारे मारे घूमते थे आज हमारी अवस्था देखिए मुझे भी देखना पड़ेगा मुझे भी इतना ही याद है कि नरेंद्र ठाकुर के पास लेकर आया था कहा कि आपको कृपा करनी ही पड़ेगी और जीत करके कुछ ना कुछ उनको प्राप्त करवाया था किंतु डिटेल अभी मुझे याद नहीं है देखना पड़ेगा अभी देखिए जो ठाकुर ने कहा ना यह राम वगैरह झूठ मूठ का प्रचार करके लोगों के मेरे पास में ले आकर कहते उसको स्पर्श करो उसको स्पर्श करो नरेंद्र भी कम दोषी नहीं था कोई भी कम दोषी नहीं थे यह जो अपने श्राइन में आप ठाकुर महा स्वामी जी का फोटो देखते हैं ना वो मेडिटेशन पोज में तो स्मरणा नंद जी ने कि कोई कहा करता था फिर स्वामी जी का देखिए कि नजर पूरी बंद है ठाकुर की अर्ध बंद है अर्ध नि निमित लोचन है और मां की आंखें पूरी खुली है अर्थात कि स्वामी जी जो है एकदम सोच समझ कर के चेले बनाएंगे ठाकुर है जनरली कृपा करेंगे किंतु सबके ऊपर नहीं करेंगे और मां की आंखें किंतु पूरी खुली है जो भी आएगा सबको आशीर्वाद सबके लिए खुला दरवाजा ये एक बार बेलूर मठ में उड़िया एक नौकर था कुछ चोरी बोरी की होगी स्वामी जी ने भगा दिया तो नौकर को पता है कि हाई कोर्ट में जाकर कंप्लेन करने से ठीक हो जाएगा सीधा उद्बोधन में मां के पास आकर कंप्लेन कर रहा है तो बाबूराम मरा जाए मां ने कहा जाओ इसको वापस ले जाओ बेचा रा गरीब आदमी है चोरी करेगा क्या है नरन तो साधु उसको समझ में नहीं आएगा कि संसार का क्या कष्ट तो बाबूराम महाराज को पता है कि नरन के पास लेकर जाएंगे तो क्या हालत होने वाली है तो व आर्गुमेंट कर रहे है कि मां नर ने भगाया है मैं कैसे लेकर जाऊं तो मां उत्तेजित होकर बोलती है मैं कहती हूं जाओ लेकर के अब मां ने ऐसा धमक देक कहा तो कुछ बोल नहीं सकते तो बाबूराम महाराज लेक आए वो स्वामी जी ने देखा गेट में से प्रवेश कर रहे तो चिल्ला कर के वो बोल उठे देखो बाबू राम कांड उने बाबूराम का कांड देखो व जिसको भगाया वापस लेकर आया है तो बाबूराम महाराज ने आकर कहा देखो भाई मां ने कहा धमक देकर कहा कि इसको लेकर जाओ तो मैं क्या करूं जैसा मां का नाम पड़ा स्वामी जी चुप हो गए य मां ने भेजा है तो फिर अभी कुछ बात नहीं रख लो इसको अपने संघ में कोई कोई लोग ऐसा कहते है कि यदि ठाकुर आज जवाइन करने को आ जाएंगे तो उनको रिजेक्ट कर देंगे ग्रेजुएट नहीं है यह नहीं है डिसक्वालिफाइड ठाकुर ने कहा ना कि 100 साल के बाद में वापस आ रहा हूं जद वापस आके जद राम कृष्ण संग में आएंगे तो डिसक्वालिफाइड जो अपने गुरु भाइयों को जो पत्र लिखे हैं ना हां अपने गुरु भाइयों को बंगाली में जो पत्र लिखे हैं उसमें सबसे ज्यादा मां के बारे में है और स्वामी जी कहते हैं खानी अमर गोंडा मी मने वहीं पर मेरा फेनेटिसिजम है स्वामी जी तो फेनेटिसिजम एकदम लिबरल थे तो मां के बारे में ही मेरा फेनेटिसिजम है बहुत वर्णन है मा के बारे में गुरु भाइयों को लिखे हुए पत्रों में किंतु इन जनरल यह बात सही है कि मां की महिमा का वर्णन किंतु व आपने ठीक ही कहा कि वॉल्यूम की दृष्टि से देखा जाए तो मुश्किल से दो-तीन परसेंट ही मां और ठाकुर के बारे में बोले होंगे तो राइट किंतु यहां पर ऐसा प्रॉब्लम क्या है पता है कि स्वामी जी का जो गोल्डन पीरियड था बोलने का उस समय यह अपना यह था गुडविन था उनकी बातों को नोट डाउन कर के लिए अनफॉर्चूनेटली जब स्वामी जी इंडिया में आए तो गुडविन को फिर वो पता है ना अंदर के अंदर झगड़े होने लगे और गुडविन को उटी भेज दिया फिर वहां पर उसका मृत्यु हो गया तो स्वामी जी की बातों को नोट डाउन करने के लिए ऐसा कोई था नहीं शरद चंद्र ने कुछ कुछ नोट डाउन किया है और फिर गुरु भाइयों ने फिर विरजानंद जी शुद्ध जी ने कुछ कुछ किया है किंतु वह जो एकदम डिटेल नोट रखनी चाहिए वह सब नहीं है तो वह है कि बहुत सारा कुछ लुप्त भी हो गया है वो गुडविन का जाना ना अपने संघ को बहुत ही एक बड़ा एक लॉस हो गया उन्होंने तो किया ही किया मां को देखिए वही मायावती से एक साधु ने जब मां को पत्र लिखा कि स्वामी जी ऐसा कह रहे हैं तो मां ने भी तो वही उत्तर दे दिया कि तुम्हारे गुरु अद्वैत थे तुम भी अद्वैत हो तो मैंने ठाकुर मा स्वामी जी तीनों और स्वामी जी वो लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा में बार-बार कहते हैं कि देखिए देयर आर टू टाइप्स ऑफ रिलीजन वन टाइप ऑफ रिलीजन इज बेस्ड ऑन पर्सनालिटी अबी इस रिलीजन में क्या होगा कि पर्सनालिटी का हिस्टोरिकल प्रूफ यदि डाउट में आ जाए तो पूरा रिलीजन ही खतरे में आ जाएगा जीसस नहीं थे ऐसा कुछ यदि प्रूव हो गया तो फिर क्रिश्चियनिटी खतरे में आ जाएगी बट हिंदुइज्म इज बेस्ड ऑन द प्रिंसिपल्स ऑन द ट्रुथ एज सो सीन बाय अवर ऋषिस तो यह प्रिंसिपल के बना हुआ रिलीजन कभी भी खतरे में नहीं आएगा क्योंकि प्रिंसिपल्स आर इटरनल फिर स्वामी जी कहते हैं कि कृष्ण की महत्ता यह नहीं थी कि वह अवतार थे कृष्ण की महत्ता यह थी उपनिषदों में रहे हुए सत्यों का उन्होंने प्रचार किया था सो हिंदुइज्म इज अ रिलीजन बेस्ड ऑन प्रिंसिपल अपऑन द प्रस्थान त्रय प्रस्थान त्रय इज द फाउंडेशन ऑफ हिंदुइज्म नहीं कि रामायण और भागवत या तो गीता दिस इज यूनिकनेक्ट मुख्य किताब तो बाइबल है टेस्टामेंट न्यू टेस्टामेंट राइट अपने यहां पे तुलसीकृत रामायण या तो भागवत नहीं अपने यहां पर प्रस्थान त्रय है और यह जो व्यास है या वशिष्ठ है वो सब नाम नहीं य पदवी है दिस आर द पोजीशंस जैसे इवन बाद बाद में शंकराचार्य भी एक पोजीशन हो गया किंतु हमको पता है कि आदि शंकराचार्य थे अभी कोई आदि व्यास या आदि वशिष्ठ थे इस तरह का सुनने में नहीं आता है