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आनंद के 4 सोपान: विषयानन्द - भजनानन्द - ब्रह्मानन्द - सर्वभूत में ब्रह्मानन्द 22 Jul 2025

invocation

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः मनुष्य जीवन का उद्देश्य क्या है? यदि हम यह कहें कि हमको सक्सेसफुल होना है, हमको फेमस होना है, हमको पावरफुल होना है, हमको प्रेस्टीज चाहिए, हमको रिस्पेक्ट चाहिए, हमको बड़ा गाड़ी चाहिए, बड़ा मकान चाहिए। अल्टीमेटली कहें तो यह जितनी भी विभिन्न चीजें हैं जिसको कि ठाकुर काम और कांचन के रूप में कहा करते थे उसको भी यदि डिस्टिल करें तो अल्टीमेटली साइकोलॉजिकल लेवल पर ऐसा क्या है जो कि हम इन सब मटेरियल चीजों से चाहते हैं। क्योंकि यह गाड़ी है या तो यह प्रेस्टीज है या तो यह पावर है या तो यह बैंक बैलेंस है। अपने आप में वह तो हमको कुछ करने वाला नहीं है। हमको वो जो चीज है बाहर की चीज उसको अपने माइंड में उसको रिफ्लेक्ट होना है। अपने माइंड में वो किस तरह से रिफ्लेक्ट होता है उसके ऊपर में हम डिसाइड करेंगे कि वह चीज हमको अच्छी लगती है कि नहीं लगती। तो अपने माइंड की जो लैंग्वेज है, अपने माइंड की जो करेंसी है, वह है आनंद। जैसे कि जो लोग कंप्यूटर लैंग्वेज जानते होंगे प्रोग्रामिंग उनको पता होगा कि आप इंग्लिश में आजकल एआई को सब कुछ बोल सकते हैं कि मेरे लिए प्लेन का टिकट बुक करवा दो मेरे लिए यह एस्स लिख दो या तो फिर मेरे लिए जाकर के यह शॉपिंग कर दो। आप सब कुछ एआई को इंग्लिश में बोलते हैं। किंतु एआई इसको किस लैंग्वेज में समझता है? वह ना ही इंग्लिश समझता है, ना ही मंदारिन समझता है, ना ही वह अरेबिक समझता है, ना ही वह बंगाली या हिंदी समझता है। वो एआई तो समझता है सिर्फ एक ही लैंग्वेज वो है जीरो और वन बाइनरी लैंग्वेज। बाइनरी लैंग्वेज में ही पूरा कोडिंग होता है मशीन लेवल पर। तो वैसे ही अपने ब्रेन के भीतर में जो लैंग्वेज अपना ब्रेन समझता है वो है एक ही लैंग्वेज या जीरो और वन वाली वही वो बाइनरी लैंग्वेज आनंद और दुख या तो फिर कष्ट यही दो लैंग्वेज अपना ब्रेन समझता है। यदि कोई भी चीज उसको आनंद देती है तो वह चीज के पीछे में यह ब्रेन दौड़ेगा और जो चीज उसे कष्ट देती है उससे वह दूर रहने का प्रयास करेगा। इंटरेस्टिंगली ठाकुर ने एक बार कहा था कामरार पुकुर के दिनों की बातों को याद करके कहते हैं आमी सुखेर पायरा छिलू अर्थात कि मैं सुख का पंखी था। पायरा अर्थात पंखी या कबूतर तो मैं सुख का पंखी था। जिस घर में मैं आनंद देखता था उस घर में मैं आना जाना करता था अर्थात कि जिस घर में सभी परिवारजनों के भीतर में वो एक कोपरेशन है हार्मोनी है प्रेम है तो उस परिवार में हंसी खुशी का वातावरण रहता था और मैं वहां पर जाता था और जिस परिवार में देखता था दुख है कष्ट है वहां से मैं दूर चला जाता था वहां से मैं भाग जाता था तो क्या है कि देखिए कि यह अपने ब्रेन का यह फंडामेंटल बिहेवियर है। जो चीज हमें आनंद देती है, वह हम करना चाहते हैं और जो हमें कष्ट देता है, उससे हम दूर होना चाहते हैं। बहुत बार हम लोग सोचते हैं कि अरे लोग इस तरह का कार्य क्यों करते हैं जिससे कि उनको बहुत ज्यादा कष्ट मिले। अभी जैसे कि सैनिक है, एक सोल्जर है। अपने देश के लिए, अपने वतन के लिए वह सरहद के ऊपर में जान न्योछावर करने के लिए वह तैनात रहता है। वह खड़ा रहता है। जैसे ही दुश्मन आएंगे उनसे लड़ेगा। यदि उसमें अपनी जान भी चली जाए तो उसको उसकी फिक्र नहीं। तो आप कहेंगे कि क्या उस केस में यह रूल टूट नहीं जाता है? सैनिक अपने सामने से अपने हाथों से एक जो वीर योद्धा होता है अपने हाथों से कष्ट को निमंत्रण देता है। यह सियाचिन में पोस्टिंग होना यानी कि कितना खतरनाक है, कितना डेंजरस है। वर्ल्ड्स हाईएस्ट बैटल फील्ड दुनिया का सबसे उच्च अल्टीट्यूड पे सबसे ऊंचाई पे जो अल्टीट्यूड पे जो बैटल फील्ड है वो अपना सियाचिन है। वहां का जो ठंड है, इतना भयानक ठंड है कि वहां पे युद्ध करना तो छोड़ ही दीजिए। वहां पर डे टू डे सर्वाइवल इटसेल्फ बड़ा ही खतरनाक है। किंतु वहां पे भी अपने देश के जवान खुशी-खुशी तैनात रहते हैं। तो क्या इसके पीछे में क्या फिर यह रूल टूट नहीं जाता कि हम आनंद के पीछे दौड़ते हैं। कष्ट से दूर रहते हैं। किंतु देखिए कि हम बाह्य जगत में जिसको समझते हैं इन जनरल कि यह चीज मुझे आनंद देगी। अभी मैं मेरा प्रमोशन हुआ। मैं नई कार परचेस करने वाला हूं। लॉजिकली थिंकिंग कि यह मुझे आनंद देगा। यदि मुझे यह सियाचिन पर पोस्टिंग हो इतना भयानक ठंड में रहना है। वो फाइटिंग करने की तो बात दूर ही है। वो ठंड से युद्ध करना डे आफ्टर डे अपने परिवारजन कहां शहर में बैठे हैं। उनको छोड़कर के सरहद पर मैं वहां पर खड़ा हूं। मेरा पोस्टिंग है। तो लॉजिकली शायद ऐसा लगेगा कि यह मुझे कष्ट दे रहा है। तो मैं उससे उसको मैं सामने से क्यों वरण करता हूं। किंतु देखिए कि मनुष्य जो है उसकी प्रत्येक मनुष्य की अपनी-अपनी एक फिलॉसोफी होती है। बहुत सारे लोग होते हैं उनका फिलॉसोफी मटेरियलिस्टिक फिलॉसोफी होता है। अर्थात कि यह मटेरियल चीजें जो कोई भी है कुछ भी है वह उनको आनंद देती है। यदि वो नया कपड़े परचेस कर लिए, नए शूज परचेस कर लिए, शॉपिंग करने को गए, जितनी भी मटेरियल चीजें ज्यादा मिलती है, उतना ही उनको आनंद आता है। तो, यह उनका फिलॉसोफी उनको आनंद देता है। मटेरियलिस्टिक फिलॉसोफी। किसी किसी का पेट्रियोटिक फिलॉसोफी होता है कि हां, मैं देश के लिए प्राण न्योछावर करने के लिए अपना सेल्फ सैक्रिफाइस करने के लिए तैयार हूं। तो फिर वो सेल्फ सैक्रिफाइस करने में उनको आनंद मिलता है। आनंद कांस्टेंट है। हमारे मशीन लेवल जो ब्रेन का जो यह एनकोडिंग जो है उसमें यह आनंद कांस्टेंट है। वही सेम आनंद सब केस में काम करेगा। वही है कि हम सबका अपना-अपना फिलॉसोफी रहता है कि आप इसको पेट्रियोटिज्म उसके भीतर में है। पेट्रियोटिक फिलॉसोफी है। तो देश के लिए फाइट करना उसको आनंद देता है। इसका मटेरियलिस्टिक फिलॉसोफी है। इसका एक एंटरप्रेन्योर का फिलॉसोफी है कि बड़ी कंपनी एस्टैब्लिश करेगा और फिर उसके लिए दिन रात वहीं पे रह के खाना पीना सब भूल करके वह उसमें पड़ा रहेगा। वह जो ठाकुर एक डिवोटी के वहां पर गए थे। यह यदु मलिक ने ऐसा ही कोई यह मलिक ही था। उसका फर्स्ट नेम भूल गया। तो जो भी है वो ठाकुर देख रहे हैं कि वह खाना भी खाता है तो उसको यह होश नहीं रहता कि वह क्या खाना खा रहा है। ओन दी एक और तो है कि इतना धनवान आदमी है कि जिसको कि एक सामान्य आदमी जो कि रोटी के एक टुकड़े के लिए वह तरस रहा है। उसके सामने 56 भोग धराए हुए हैं। एक गरीब व्यक्ति यदि रोटी के लिए लालायित है तो उसके सामने इतना वैविध्यपूर्ण आहार प्रस्तुत है किंतु उसको उसमें इंटरेस्ट नहीं है। क्यों? क्योंकि पूरा बिजनेस माइंडेड मेंटालिटी है। वह पूरा बिजनेस ही उसके माइंड में सब समय चलता रहता है। तो क्या है कि इन लोगों का एंटरप्रेन्योर का मेंटालिटी रहता है। वह फिलॉसोफी है। उनका दिन रात एक करके प्रोडक्ट डेवलप करना या तो फिर यह से यह करना परचेसिंग या तो फिर यह जो आपका सेल है सेल कैसे इंप्रूव किया जाए? मार्केटिंग कैसे अच्छे से किया जाए? तो सबका अपना-अपना एक फिलॉसोफी है। मेरा फिलॉसोफी मुझे आनंद देता है। मटेरियलिस्टिक फिलॉसोफी हो जो कि काम कांचन में ही डूबा है। थोड़ा सा हायर टाइप का फिलॉसोफी हो। जैसे कि पेट्रियोटिज्म है, टीचर का फिलॉसोफी होता है। बच्चों को सिखा के उनको आनंद आता है। दो तरह के लोग होते हैं। कोईकोई लोग तो ऐसे होते हैं बच्चे उनको बिल्कुल पसंद नहीं है। कोई भी बच्चा उनके पास में खेलने को जाए तो यह लोग धमका करके उसको भगा देंगे। वो चंद्र की चंद्रमोहन की कहानी हमने देखी थी। मां का वो जो सेवक था उद्बोधन में उद्बोधन का वर्कर था। तो उसका घर मालिक जो था जिस घर में वह भाड़े से रहता था उसको बच्चे पसंद नहीं थे। तो इसके यह जो दो छोटे-छोटे बच्चे थे वह लड़का और लड़की वगैरह चंद्र के तो उनको वह धमकाया करता था। उनके खिलौने तोड़ दिया करता था। और फिर वह बच्चे इतने डर के रहते थे कि जैसे वो अपने घर से बाहर ही नहीं निकलते थे। फिर चंद्र ने आखिर में जाकर मां को कंप्लेन किया कि देखिए मां मेरे बच्चे अपने घर जो जिसके घर में हम भाड़े से रह रहे हैं उसके डर से यह लोग घर से बाहर ही नहीं निकलते। तो मां ने फिर कहा शरद महाराज को कि इसके लिए घर बनवा दो। तो फिर पूरा उद्बोधन की ही ओर से शरद महाराज के ही प्रयत्न से जमीन भी खरीद की गई। उसके ऊपर में घर भी प्रस्तुत हो गया। उसके सामने एक अच्छा सा एक गार्डन जैसा भी है। उसमें यह लोग सब्जी भी उगाते हैं। तो मां की कृपा से सब कुछ हो गया। तो यहां पर देखिए कि दो जो टीचर होते हैं उन लोगों को कोई-कोई टीचर को बच्चे बड़े पसंद है, बड़े प्रिय है, बड़े प्रेम से वह बच्चों को सिखाएंगे। तो उससे उनको आनंद आता है। कोईकोई होते हैं कि बच्चों से उनको कष्ट होता है। तो अपनी मेंटालिटी क्या है? अपनी फिलॉसोफी क्या है? उसके बेस पर हमको आनंद मिलता है। किंतु यह आनंद ही है जिसको कि हम सब लोग खोज रहे हैं। यदि कोई चीज मुझे आनंद नहीं देगी तो इमीडिएटली मैं उसको छोड़ दूंगा। ज्यादा देर तक आउट ऑफ द सेंस ऑफ ड्यूटी कि यह मेरा धर्म है। मुझे करना है। यह मेरा ड्यूटी है। बोलकर के मुझे करना है। यह बात मैं ज्यादा समय तक नहीं कर पाऊंगा। यह जैसे कि सभी करेंसीज कैसे वो डॉलर में कन्वर्ट होती है? आज इंडियन रूपीस आज जो है उसका डॉलर के अगेंस्ट में क्या रेट है? तो ₹80 ना ₹85 ना जितना भी उसका रेट है यह चाइनीस ये जो युवान है यह जो जापानीज युवान है या तो फिर यह यूरोपियन यूरो है या तो फिर यह कोई भी करेंसी है इस जगत की सभी करेंसीज को यह मेक्सिकन पैसो है सभी करेंसीज को वो डॉलर के अगेंस्ट में वह कन्वर्टेबल दिखाना होता है। हम लोग इंडिया का करेंसी यह जो मेक्सिकन पैसो जो है उसके साथ में क्या एक्सचेंज रेट है ऐसा नहीं कैलकुलेट करेंगे। हम लोग कैलकुलेट करेंगे कि इंडियन करेंसी का इंडियन रूपीस का अमेरिकन डॉलर के साथ में क्या कन्वर्ज़ रेट है और फिर यह अमेरिकन डॉलर का मेक्सिकन पैसों के साथ में क्या कन्वर्ज़ रेट है? उसके बेस पे इंडियन और मेक्सिकन करेंसी का कन्वर्शन रेट ठीक होगा। सब कुछ डॉलर के अगेंस्ट में कन्वर्ट करना है। तभी यह इंटरनेशनल कॉमर्स चलेगा। तो यहां पर भी है हम इस जगत में जो कुछ भी करते हैं वह सब अपनी फिलॉसोफी के लेंस के माध्यम से अपने ब्रेन के भीतर में प्रवेश करता है। अपनी कॉन्शियसनेस के भीतर में प्रवेश करता है और फिर यह कॉन्शियसनेस ठीक करती है कि यह जो पर्टिकुलर इवेंट है या तो फिर यह पार्टिकुलर सेंसेशन है वह मुझे आनंद दे रहा है कि फिर कष्ट दे रहा है। आनंद दे रहा है तो वो चीज करने को हम भीतर से स्वतः स्फूर्त अपने आप ऑटोमेटिकली प्रेरित होंगे और जो मुझे कष्ट दे रहा है ऑटोमेटिकली मेरा माइंड वहां से दूर चलता जाएगा फिर हम हजार प्रॉमिस करें एक मित्र है बचपन का अभी बहुत दिनों से मिले नहीं है उसको और फिर एकाएक एक दिन रास्ते में मिल गए अभी बचपन में तो बहुत प्रेम था बहुत उसके साथ में हंसी मजाक करते थे। किंतु इतने दिनों के बाद में जब मिले हैं तो हमको लगेगा कि अच्छा वह जो आनंद मुझे उस मित्र के साथ में बचपन में आता था तो अभी भी तो आना चाहिए। मित्र तो वही है किंतु क्या है? बड़े हो गए हैं। तो अभी यह पूरा हमारा पूरा मेंटालिटी चेंज हो गया है। अपना रिस्पांसिबिलिटी दूसरे टाइप का है। करियर दूसरे टाइप का है। तो फिर यह दोनों मित्र बातें तो करेंगे। मैं अपने मित्र के साथ में बात तो करूंगा। किंतु 10-15 मिनट में ही मुझे पता चल जाएगा कि अभी उसका लाइफ पूरा डिफरेंट हो गया है। मेरा लाइफ डिफरेंट हो गया है। तो फिर अभी हम विदाई लेने के समय प्रॉमिस तो एक दूसरे को हजार करेंगे कि अच्छा तुम अपना फोन नंबर दे दो। WhatsApp से कांटेक्ट में रहेंगे फिर से मिलना मुझे यहां पे मेरे घर पर आना। यह सब प्रॉमिस किंतु दूसरे दिन के बाद में कोई संपर्क नहीं। क्यों? क्योंकि बचपन में उसके संग से उसके बंधुत्व से जो आनंद मिलता था बड़े होकर के उसी बंधुत्व से किसी भी तरह का आनंद नहीं मिल रहा है। बोलकर के अभी आप हजार भी प्रॉमिस करेंगे तो फिर आप छोड़ देंगे उस प्रॉमिस को। उसका आप वहन नहीं करेंगे। उसको आप अप्लाई नहीं करेंगे। देखिए यह डिवोर्स जो बार-बार होते हैं बहुत बार ऐसा होता है। अब मैरिज जब हुआ तो पति-पत्नी में काफी प्रेम है। किंतु 10-15 सालों के बाद में पूरा मेंटालिटी डिफर होना शुरू हो गया। अभी भारत में ऐसा है कि आउट ऑफ द सेंस ऑफ ड्यूटी आउट ऑफ दी धर्म भले ही चाहे मैरिड लाइफ पूरा निरनंदमय हो गई हो। आनंद पूरा सुख गया हो। किंतु फिर भी अभी यह ड्यूटी है। म एक धर्म है तो वह लोग मैरिज को कैसे भी तरह के चलाते हैं। बच्चों का भी तो भविष्य देखना है। यह इस तरह से सोच करके किंतु विदेश में देखिए कि वहां पे थोड़ा सा शेमलेसनेस है। यदि म खास करके यूरोपियन अमेरिका वेस्टर्न कंट्रीज में विदेश यानी कि ये मिडिल ईस्ट वगैरह नहीं वे लोग तो शायद हमारे से भी ज्यादा कंजर्वेटिव है। किंतु ये खास करके वेस्टर्न कंट्रीज है। वहां पर देखिए कि एक तरह का शेमलेसनेस प्रवेश कर गया है। माने वो एकदम ओपनली वे लोग कहते हैं कि इसमें मुझे आनंद नहीं मिल रहा। इस मैरिड लाइफ में चलो डवोर्स ले लेते हैं। तो फटाक करके वो डवोर्स भी ले लेंगे। तो यहां पर देखिए कि मनुष्य का जो माइंड है हमेशा आनंद के पीछे ही दौड़ता है। जितना उसको आनंद मिलेगा उतना उसके पीछे वह ज्यादा से ज्यादा लालायित होगा। उस चीज के प्रति उसका लोभ बढ़ता जाएगा। किंतु हमको यह सब बड़ा ही अच्छे से पता है। जिन्होंने धर्मशास्त्र थोड़ा सा भी पढ़ा हो कि बाहर की चीजों से जो आनंद हमको मिलता है। जैसे मेरे बचपन में मैं बंधुओं के साथ में मित्रों के साथ में हंसी मजाक किया करता था। बचपन में मैं गांव में जाता था। तो वह जो ट्रेन जर्नी था उसका एक आनंद था। घर पहुंच गए तो सभी के साथ में प्रथम मुलाकात हो रही है। एक साल के बाद में वह एक आनंद था। दौड़ते दौड़ते एक घर में एक रूम में जाएंगे। वहां पर उसको ग्रीट करेंगे। उसके साथ में बात करेंगे। फिर दौड़ते दौड़ते दूसरे कमरे में जाएंगे। पता है कि कौन कहां पे है। यह मेरे एक चाची थी। तो वह वहीं किचन में रोटी बनाती होगी। इस समय यह मेरे चाचा है। वह दुकान हमारी थी एक छोटी सी। वहां पर काउंटर पर बैठे होंगे। यह मेरे मामा है तो वह वहां पर उनका एक छोटा सा जॉब है। वहां पर वह बैठे होंगे। तो पता है कि कौन कहां पे है। मेंटल लोकेशन पूरा तो वहां वहां पर जाकर के ग्रीट करना। यह जो आनंद था बचपन का आनंद बड़े होकर के यह जो सब बाकी आनंद है बाहर के जितने भी आनंद है उन सब में व्याघात है। ठाकुर की लैंग्वेज में कहे तो इंटरप्शन है। यह आनंद कंटीन्यूअस नहीं मिलता। दूसरा कि समय के साथ में डिमिनिश होता जाता है। अभी आज मुझे अपने गांव में फिर से जाना हुआ तो मुझे शायद वह आनंद नहीं आएगा। मेरा मेंटालिटी पूरा चेंज हो गया है। बाय एनी मिरेकल हमारे पूरे जगत में वह बिखरे हुए मेरे रिलेटिव्स हैं। सब एक जगह पे एक ही घर में फिर से आकर के रहने लगे तो भी शायद हो सकता है कि वह जो आनंद बचपन में जो कंटीन्यूअस रहता था वह अभी इतना ना आए। एक दो सप्ताह के बाद में लगेगा कि चलो भाई अभी यहां से निकलते हैं। तो क्या है कि विषयों के माध्यम से जो आनंद मिलते हैं वह क्षणभंगुर है और वह इंटरप्ट हो जाते हैं बीच-बीच में। बीच-बीच में कभी इन लोगों के प्रति द्वेष भी हो जाता है। कभी-कभी इन लोगों के प्रति घृणा भी हो जाती है। इवन मां और बच्चों के बीच में झगड़ा होता है। पति और पत्नी के बीच में झगड़ा होता है। भाइयों भाइयों में झगड़ा होता है। जो चीज आज मुझे बड़ी अच्छी लग रही थी। मेरा प्रमोशन, मेरा नया मकान, मेरी नई कार, यह मेरा नया मोबाइल, मेरी नई ज्वेलरी, मेरा यह फॉरेन ट्रिप, यह सब चीजें भी कभी-कभी हमको इसके ऊपर में घृणा हो जाती है। लगता है कि यह सब छोड़कर के और कहीं दूर निकल जाए। क्यों? क्योंकि इस जगत में कोई भी आनंद आपका परमानेंट नहीं रहने वाला है। यह जगत ही है। आपका क्षण क्षण बदलता रहता है। यह जगत में जो कुछ भी है सब कुछ बीच-बीच में यह जन्म मृत्यु जरा व्याधि का जो चक्र हमारे पर अप्लाई होता है, वही चक्र यह आनंद यह जगत से जो हमको जो सुख मिलता है, आनंद मिलता है, उस पे भी अप्लाई होता है। इसका भी जन्म है। उसका भी उसमें भी व्याधि आती है। उसका भी वो वृद्धावस्था आती है और उसका भी मृत्यु होता है। तो यदि हमको अनंत आनंद चाहिए तो धीरे-धीरे करके हमको समझ में आने लगेगा कि बाहर के विश्व में यह आनंद अनंत नहीं होता और एक लेवल से वह ज्यादा आगे बढ़ता नहीं। आप रसगुल्ला खाएंगे। पहला रसगुल्ला खाया बहुत अच्छा लगा। दूसरा खाया उससे भी ज्यादा अच्छा लगा। तीसरा खाया तो शायद हो सकता है उससे भी ज्यादा अच्छा लगा। चौथा खाया तो फिर पेट बिगड़ेगा। तो फिर यानी कि वो आप स्केल नहीं कर सकते हैं बाहर के आनंद को। आजकल ये एआई की लैंग्वेज में स्केलिंग बड़ा इंपॉर्टेंट है। सब कुछ स्केल करना है आपको। यदि आप डाटा स्केल नहीं करेंगे। यदि ये आप यह माइक्रोपर ये जो आपका कंप्यूट पावर है उसको स्केल नहीं करेंगे तो एआई डेवलप नहीं होगा। तो यहां पर भी ऐसा है बाहर का आनंद एक लेवल पर जाकर के वो रुक जाएगा। जैसे कि ऊपर में एक ग्लास सीलिंग है। इस ग्लास सीलिंग से ऊपर जाना है तो बाहर के जगत में संभव नहीं। इनफाइनाइट स्केलिंग जिसको कहते हैं बाहर के विश्व में संभव नहीं है। तो फिर उत्तर क्या है? उपाय क्या है? तो शास्त्र कहते हैं कि इसी आनंद को अपने हृदय में खोजना है। अपनी कॉन्शियसनेस में खोजना है। अपने भीतर में खोजना है। धीरे-धीरे करके आंतर जगत के एक के बाद एक सोपान पार करते जाएंगे। एक के बाद एक मंजिल अचीव करते जाएंगे। वैसे वैसे ही यह जो भीतर में जो आनंद मिलता है वह स्केल होता जाएगा। बढ़ता ही जाएगा, बढ़ता ही जाएगा और इसमें कोई इंटरप्शन नहीं है। अनंत शाश्वत आनंद यह यदि हमको चाहिए तो भीतर में ही प्राप्त होगा। बाहर कभी प्राप्त नहीं होगा। बाहर में मान लीजिए कि आपको हजार तरह का आनंद आता है। अभी शरीर ही खराब हो गया। मैं बीमार हो गया तो यह धन संपत्ति, वैभव, प्रेस्टीज, मान, सम्मान किसी काम का नहीं रहेगा। सब मिट्टी के समान हो जाएगा क्योंकि शरीर का ही व्याधि शरीर का ही कष्ट इतना है कि मैं उसको भोग उसका उपभोग करके नहीं पाऊंगा जबकि मन के भीतर का जो आनंद है ठाकुर सबसे बड़े उदाहरण है कैंसर हो गया है भयानक कष्ट है किंतु भीतर में आनंद अविराम बह रहा है आनंद की धारा अविराम बह रही है तो उसका किसी भी चीज के ऊपर में डिपेंडेंट नहीं है इंडिपेंडेंट आनंद हमको मिलता है। तो यह तरह का आनंद हमको भीतर के जगत में खोजना है। किंतु स्टेप्स क्या है इसके लिए? स्टेप्स है सबसे बड़ा स्टेप्स तो है कि बाहर के आनंद से अपने मन को रिट्रीट करना। अपने मन को रिट्रीव करना, पीछे ले जाना, पीछे खींचना। क्योंकि जब तक हम बाहर के विषयों के आनंद में पड़े रहेंगे तब तक हमारा मन जो है सीरियसली भीतर के भीतर में प्रवेश ही नहीं कर पाएगा। तो भीतर में यदि सीरियसली प्रवेश करना है तो सबसे बड़ा स्टेप है त्याग। और उसके बाद का स्टेप है यह भजनानंद। भजन में आनंद प्राप्त करना। साधनानंद। साधन के भीतर में आनंद प्राप्त करना। भाव आनंद यह ईश्वर के साथ में एक भाव का संबंध बनाना। जो मेरा मित्र मैं अपने गांव में मेरे मित्र भी थे, रिलेटिव्स भी थे, कजिन भी थे। तो वही रिलेशनशिप एज इट इज मैं दक्षिणेश्वर में उठा के बिठा दूंगा। जैसे मेरे चाचा और चाची थे। तो यहां पे भी आप देखेंगे कि यहां पे अपने यह वो गुलाब मां है। यह योगेन मां है। फिर यह अपने बाकी सब है। रामलाल दादा है। फिर यह वो अपना बलराम बाबू है। मास्टर महाशय है। जैसे वहां पर मेरे कजिन और मित्र थे। तो यहां पे भी अपने बंधु है। यही तारक है, लाटू है। वही अपना यह काली है, सुबोध है। यही नरेंद्र है, राखाल है। वहां पर जैसे नाना नानी हुआ करते थे, मम्मी पापा हुआ करते थे। तो वैसे ही यहां पे चंद्रामणि देवी है, मां शारदा है, श्री रामकृष्ण है। हम वहां पर जो आनंद प्राप्त करते थे उनके संग से वही आनंद को डिवाइन करके यहां पर प्राप्त करना है। ईश्वर के साथ में कोई एक रिलेशन एस्टैब्लिश करना है। या तो मैं उनका दास हूं, या तो मैं संतान हूं, या तो बंधु हूं, या तो उनका कजिन हूं, या तो उनका मित्र हूं। या तो फिर उनका प्रेमी हूं, प्रेमिका हूं। कोई भी एक संबंध ईश्वर के साथ में एस्टैब्लिश करना है। और इसी संबंध के माध्यम से हमको भीतर में आनंद प्राप्त करना है। तो यह हो गया अपना भजनंद। और जैसे-जैसे भजन में आनंद आता जाएगा, वैसे-वैसे क्या होगा? यह आनंद जब रिलीज होता है तो अपना चित्त भी निर्मल होना शुरू होता है। त्याग और भजन या तो त्याग और साधन का आनंद यह दोनों जब इकट्ठा होते हैं अपने चित्त के ऊपर में से जितना भी कूड़ा कचरा बिठाया था। इतने हजारों सालों की लाखों सालों की अपनी ये जन्म जन्मांतर की यात्रा है। उसमें जितना भी कूड़ा कचरा इकट्ठा हुआ था। धीरे-धीरे करके सब क्लीन होता जाएगा। अपना हृदय है स्वच्छ निर्मल पवित्र होता जाएगा। और इसके भीतर में धीरे-धीरे करते स्वतः स्फूर्त अपने से एक आनंद प्रकट होगा। वि इज वेरी डिफरेंट फ्रॉम भजनानंद या तो भाव का जो आनंद है इसमें फिर भी एक डलिटी है। यहां पर मैं एक आत्मन को एक इमेजिन कर रहा हूं। या तो फिर यह ईश्वर को इष्ट को इमेजिन कर रहा हूं। किंतु यह जितना भी इमेजिनेशन है सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट और रिलेशनशिप इसी के बेस पर बना है। किंतु यह जो सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट डवालिटी है इवन आप यह महावाक्य ये करेंगे विचार करेंगे अद्वैत वेदांत में मैं ब्राह्मण हूं। तो उसमें भी मैं और ब्राह्मण शुरू शुरू में तो सेपरेट ही रहते हैं। क्योंकि यह जो सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट एक मर्ज हो जाए वो कैपेसिटी अभी तक हमने डेवलप ही नहीं की है। शुरू-शुर में यह डलिटी या तो द्वैत बना ही रहेगा। किंतु

ठाकुर की कहानी: आध्यात्मिक आनंद का फव्वारा

जैसे-जैसे यह त्याग और यह भजनानंद या तो फिर यह भाव आनंद यह जितना हमारा डेवलप होता जाएगा उतना ही देखेंगे कि भीतर में जैसे निर्मल स्वच्छता फैलती जाएगी वैसे ही भीतर में से एक स्वतः स्फूर्त आनंद प्रकट होता है। सब्जेक्टिव आनंद प्योर सब्जेक्ट देयर इज नो ऑब्जेक्ट एट ऑल। आंख बंद करके बैठे हैं। एकाएक आनंद का ऐसा फवारा उठा कि पूरा जगत जैसे कि बह गया। यह कृष्ण किशोर के साथ में ठाकुर का वार्तालाप हो रहा था। कृष्ण किशोर ठाकुर को बोलते हैं। प्रश्न करते हैं कि यह तो ब्राह्मण जन्म है। इतने जन्म जन्मांतर के बाद में मिलता है ब्राह्मण देह, ब्राह्मण शरीर और तुमने यह उपनयन यह जो जनेऊ है उसको फेंक करके पैता जो है उसको फेंक करके तुम क्यों साधना कर रहे हो? तो ठाकुर कहते हैं देखो भाई मुझे उन्माद हो गया था। उन्माद अवस्था में कुछ समझ में नहीं आता। कहां एक अश्विनर झड़ेर मतो अर्थात कि अश्विन की झड़ यह भी एक कहानी है। वह ठाकुर मास्टर महाशय को पूछते हैं अच्छा वो अश्विन की झड़ याद है तो झड़ यानी कि आंधी अश्विन ये महीने का नाम है। उस समय एक एक समय एक समय ऐसा हुआ था कि अश्विन महीने में भयानक आंधी आई थी। तो ठाकुर ने एकाएक उस समय मास्टर महाशय छोटे थे बच्चे थे। तो ठाकुर ने उनको पूछा एक दिन वार्तालाप में बात में अच्छा तुमको वह अश्विन की झड़ याद है तो अश्विन महीने की आंधी याद है तो तो मास्टर महाशय हां मुझे याद है उस समय मैं अकेला था बच्चा था एक कमरे में बंद अकेला मैं अपने कमरा बंद करके मैं रो रहा था क्योंकि उस समय वहां पर और कोई नहीं था और भयानक जो आंधी तूफान ऐसा था कि कभी भी घर को तोड़ के ले जाएगा और मैं मर जाऊंगा मैं बड़ा डर गया था उस समय अभी मास्टर महाशय को जैसे यह बात याद आई वैसे ही मास्टर महाशय को लाइट हुई। अरे यह ठाकुर स्वयं तो शायद नहीं उस समय से मेरी रक्षा कर रहे हैं क्या? क्या इसीलिए मुझे वह रिमाइंड करवा दे रहे हैं कि तुमको वो अश्विन की आंधी याद है कि नहीं? तो वो अश्विन की आंधी एक था एक एक समय आया था और काफी डैमेज हुआ था और काफी लोगों को यह बात याद भी थी। तो यहां पर ठाकुर कृष्ण किशोर को उसी अश्विन की आंधी के बारे में कहते हैं कि देखो मुझे जब उन्माद हुआ था या उन्माद हुआ उसके बाद में यह अश्विन की आंधी की तरह आकर के सब कुछ मेरा यह कूल शील मान लज्जा घृणा भय मान अभिमान ये सब कूलशील जात ये सब मेरा कहां उड़ा के ले गया मुझे पता नहीं रहा तुमको यदि उन्माद होगा तो तुम समझना क्या होता है तो ठाकुर कहते हुआ भी वही कृष्ण किशोर को उन्माद हुआ एक घर में बैठकर के ओम ओम कर रहा है तो डॉक्टर को बुलाया गया तो कृष्ण किशोर कहता है कि भाई तुम मेरा सब कुछ मेरा जो जो भी रोग है उसको ठीक कर देना किंतु ये ओमकार जो है उसको ठीक मत करना यानी कि जब ये आंधी की तरह उन्माद होता है। ये आंधी की तरह आनंद जब प्रस्फुटित होता है। ठाकुर का फेमस एग्जांपल कि फवारा है गार्डन के भीतर में कचरा उसके भीतर में नल तो खुला ही है बस पाइप के भीतर में कचरा जमा हुआ है तो फिर जैसे ही कचरा हटाया तो फट करके वह पानी को जाने का रास्ता मिल गया और फड़ाक करके फवारे में से फवारे की तरह जोर से पानी निकलने लगा तो यहां पे भी यह जो जैसे ही यह भजन आनंद है, यह भाव आनंद है, त्याग है, ब्रह्मचर्य है। इसकी साधना करके जैसे ही अंतर्मन निर्मल होगा, वैसे ही एक नए तरह का डिफरेंट कैटेगरी ऑफ आनंद इसके भीतर में से प्रकट होना शुरू हो जाएगा। बैठे हैं तो एकाएक आपका मन ऐसा तन्मय हो गया। ऐसा तल्लीन हो गया। ऐसे भीतर में से यह उन्माद की तरह भाव तरंग आनंद तरंग आकर के अपने सर पर सवार हो जाती है। जैसे ठाकुर का पहला दर्शन मां काली के सामने रोते-रोते कहते हैं दर्शन दो वरना गला काट दूंगा। बोलकर के मां का खड़ग उठाया अपने गले पर वो डालना चाहते ही थे, काटना चाहते ही थे। एकाएक मां का दर्शन हुआ। और क्या दर्शन हुआ? लीला प्रसंग में शरद महाराज कहते हैं कि वो प्रकाश की तरंगे जैसे कि बड़े म बड़े जोर के साथ में ये पूर आता है ना ये ये आता है सुनामी आता है तो कैसे बड़ी-बड़ी वेव्स वो समुंदर की लहरें आकर के वो किनारे के ऊपर में टकराती है। तो यहां पर भी प्रकाश और आनंद की बड़ी-बड़ी लहरें आकर के पूर्ण जोश के साथ में ठाकुर के अंतर्मन में टकराई और ठाकुर जैसे कि मां के दर्शन में तल्लीन हो गए। मां के साथ में मिलित हो गए। मां के भीतर में जैसे कि गल गए। जैसे कि वह वो मीठा अर्थात कि साल्ट साल्ट की एक आप डोल बनाते हैं छोटी सी गुड़िया बनाते हैं मीठे की और उसको आप समुंदर में डालेंगे तो वह तो पूरा गल के वो मिक्स हो जाएगी क्योंकि समुंदर के भीतर में तो इतना यह नमक है तो नमक की गुड़िया समुंदर में डालेंगे तो क्या होगा वह तो गल के पिघल जाएगी यह गुड़िया थोड़ी ना फिर वापस आने वाली है तो यहां पे भी जब यह आनंद और प्रकाश की महा तरंगे ठाकुर के अंतर्मन के साथ में टकराई तो ठाकुर का जो अहम था वह भी यह नमक की गुड़िया की तरह विगलित होकर के आनंद के भीतर में वो जैसे कि मिश्रित हो गया गल गया तो यह हो गया आपका एक डिफरेंट कैटेगरी ऑफ आनंद अद्वैत आनंद सबसे पहला आनंद कौन सा देखा विषय का आनंद यह एक कैटेगरी है आनंद की दूसरा कैटेगरी कौन सा देखा आनंद का तो भजनानंद भजन साधन यह भाव इसका एक आनंद है। जितना जितना जप करते जाएंगे उतना ही देखेंगे कि जप में से रस प्रकट होता है। और यह अमृतमय रस जैसे कि अपने मन को इस तरह से खींच करके एकाग्र करके रखेगा कि इच्छा होने से भी जप बंद करके खड़े होकर के कहीं जाने की इच्छा नहीं होगी। वैसे तो बैठे हैं तो हम 10 बार अपने मोबाइल के सामने देखते हैं 1 मिनट में किंतु जप करतेकरते जप का जो आनंद मिलना शुरू हो गया तो यहां पर मोबाइल बजता ही रहेगा बजता ही रहेगा उसके सामने देखने की इच्छा भी नहीं होगी तो वह हो गया कि साधना का आनंद वो कुछ हायर कैटेगरी देन विषय आनंद और यह अद्वैत आनंद है इट्स अ प्योर आनंद किसी भी एक्सटर्नल उद्वैत डिवालिटी के ऊपर में वह डिपेंडेंट नहीं है। इवन भजनानंद में भी विघ्न होता है। ठाकुर की वह फेमस बात ठाकुर एक बार ध्यान करने को बैठे थे और फिर किंतु थोड़ी देर के बाद में ध्यान उन्होंने करना बंद कर दिया। और क्या कहते हैं कि देखो यह कल्पना के अलावा और कुछ तो नहीं है। इसके भीतर में भी व्याघात होता है। दूसरी एक जगह पर ठाकुर कहते हैं इस तरह का ध्यान करने में भी इंटरप्शन होता है भाव में। ठाकुर मां को कहते हैं एक दूसरी जगह पे कि मां जैसे अविराम निरव छिन्न आनंद मिलता रहे ऐसा कर दे। तो यहां पर भी यह ठाकुर मास्टर महाशय को कहते हैं कि देखो दप करे ज मां देख दे ता होले होलो ना होले ध्यान कोटा कल्पना भाई यार किु नाई अर्थात कि मां जैसे एक प्रकाश के वो उसके झपकारे में कुछ दिखा दे इन अ फ्लेश फ्लश करके कुछ दिखा दे आनंद दर्शन दे दे तो कुछ होगा और अदरवाइज ये बैठकर के ध्यान करना ये कल्पना के अलावा और तो कुछ नहीं है तो ये जो भजन का आनंद है साधन का आनंद है वह हायर कैटेगरी है विषय आनंद से किंतु यह भजन के आनंद से भी साधना भाव जप के आनंद से भी हायर कैटेगरी है पूर्ण निर्मल अद्वैत आनंद जिसमें किसी भी तरह का डिपेंडेंस नहीं है कि इवन अपने मन में भी आपको इष्ट की कल्पना नहीं करनी है। भीतर में से ही अपने सब्जेक्टिव रियलिटी के भीतर में से ही अनंत आनंद बहना शुरू होगा। तो यहां तक तो आ गए किंतु देखिए कि यह अंत नहीं है आध्यात्मिक जीवन का अद्वैत आनंद यह भी अंत नहीं है। इसके बाद में जैसे आप त्याग करतेकरते भजनानंद से अद्वैत आनंद की ओर गए वह नेति नेति का रास्ता था। फिर इति इति करके जगत में वापस आना है। जिस आत्मन जिस अनंत आनंद जो प्योर सब्जेक्टिव आनंद है जिसको कि हमने अपने हृदय के भीतर में प्राप्त किया है। उसी को पूरे जगत में व्याप्त होते हुए देखना है। तो प्रश्न होगा कि यह जब हम इति इति करके वापस आते हैं। यह जो साधक है उसका मन क्या जब सभी चीजों के भीतर में वही ब्रह्म दर्शन करता है। अर्थात सभी के भीतर में वो वही आनंद प्राप्त करता है। तो क्या हम ड्यूलिटी की ओर सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट की ओर वापस नहीं जा रहे हैं? क्या ठाकुर भी तो कहते हैं कि शंकराचार्य ने विद्या का अहम रखा था। नारद ने यह भक्ति का अहम रखा था। तो यह अहम एक आ गया। भले ही चाहे वह एक सात्विक अहम हो किंतु एक अहम तो आ गया। सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट डिवालिटी तो क्रिएट हो गई। तो फिर यह जैसे शुरू में जब हम भजनानंद में भजनानंद के समय में साधन में से उपासना में से आराधना में से तपस्या में से जो आनंद प्राप्त कर रहे थे भाव साधना करके ईश्वर के साथ में इष्ट के साथ में एक संबंध बना करके जो आनंद प्राप्त कर रहे थे वह एक डलिटी में से जन्मा हुआ आनंद था सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट सेपरेट है तो क्या वही चीज यहां पर फिर से नहीं आ गई है जब हम इति इति करके जगत में वापस आते हैं। ब्रह्म को सभी के भीतर में दर्शन करते हैं। तो फिर क्या वही डलिटी जो है वो डलिटी फिर से वापस नहीं आ गई? नहीं। देखिए यहां पर बड़ा ही एक सल डिफरेंस है। मैं जब नेति नेति करके साधना कर रहा था, उपासना कर रहा था तब मेरा जो अहम था या तो फिर मेरा जो आई था मैं यानी कि मेरा सब्जेक्ट वो छोटा सा सब्जेक्ट था और बाकी सब चीजों को मैं अपने छोटे से सब्जेक्ट से दूर करता रहता था। सभी ऑब्जेक्ट्स को मैं अपना जो मेरा सही स्वरूप है उससे दूर कर दे रहा था। जिससे कि मेरा सही स्वरूप बिना किसी वे कर्म या तो फिर संस्कार के कचरे से वह उसको सेपरेट कर पाऊं। किंतु जब मैं द्वैत आनंद प्राप्त करके जगत में वापस आता हूं इति इति करके तो मेरा यह जो छोटा सा आई है यह छोटा सा मेरा आत्मन या ब्राह्मण है वह इतना विस्तृत हो जाता है कि सभी को अपने भीतर में आवृत्त कर देता है। यानी कि मैं भी मैं हूं। आप भी मैं हैं। मैं और आप यह डिस्टिंक्शन ही उस समय चली गई। मैं भी मैं आप भी मैं भी ब्राह्मण आप भी ब्राह्मण। और जब वो परिस्थिति आती है कि पूरा विश्व मैं ही हूं। मेरा जो आत्मन है, मेरा जो सेल्फ ऑफ सेंस ऑफ सेल्फ है, मेरा जो एक अहम है, यह विद्या का अहम ना कि यह जो भक्ति का अहम, क्या डिफरेंस है? एक कच्चे अहम में और यह जो सात्विक अहम में क्या डिफरेंस है? यह सात्विक अहम आपके भी अपने भीतर में पूरे विश्व को आवृत कर लेता है। यही है असली ब्रह्म ज्ञान। यही है असली पूरे विश्व के सभी वस्तुओं में सभी भूतों में ईश्वर दर्शन करना या तो फिर ब्रह्म साक्षात्कार करना। मेरा यह अहम, मेरा यह सेल्फ, मेरी यह आत्मन इतना विराट विस्तृत हो जाता है कि पूरे विश्व ब्रह्मांड को अपने भीतर में आवृत्त कर लेता है। इसके बाद में वही जो अद्वैत आनंद था, जिसको कि मैं यह सिर्फ विदिन ये पंचमहाभूत के शरीर में अनुभूत करता था, उसी अद्वैत आनंद को जैसे में यह मेरा कॉस्मिक बॉडी है। यहां पे मेरा एक इंडिविजुअल बॉडी है। यह व्यष्टि मेरा शरीर है। व्यष्टि देह है। अद्वैत आनंद प्राप्त करने के बाद में अद्वैत रियलाइजेशन प्राप्त करने के बाद में एक समष्टि देह तैयार होगा। एक वैश्विक कॉस्मिक बॉडी तैयार होगा। जिसमें जो कुछ भी है सब उसके भीतर में है और सभी में से मुझे वही अद्वैत आनंद प्राप्त हो रहा है। इस तरह का महापुरुष इसका बिहेवियर कैसा होगा? तो मां शारदा की तरह श्री रामकृष्ण की तरह भगवान बुद्ध की तरह जो कोई भी इनके संपर्क में आएगा वे लोग अपने प्रति इनका अनंत सहानुभूति अनंत अपार करुणा और प्रेम स्नेह भालोबासा वे लोग फील करेंगे अनुभव करेंगे और सीधे इनके चरणों में नतमस्तक हो जाएंगे क्योंकि मनुष्य हमेशा प्रेम का भूखा का है। जहां पर भी उसको प्रेम मिलता है, वह अंधी दौड़ वहां पर लगाता है। क्यों? क्योंकि मनुष्य का दिमाग एक ही चीज समझता है। एट द एंड ऑफ द डे ब्रेन का यह जो बाइनरी लैंग्वेज है आनंद और कष्ट यही दो चीज वह समझता है। यहां पर वह नई घड़ी है। नए कपड़े हैं अपने मित्र रिलेटिव है। उसमें जो आनंद खोज रहा था जब यह अवतार के पास में या तो सिद्ध महापुरुष के समीप जाकर के उपस्थित होता है तो वही आनंद उसको मिलियन टाइम्स बिलियन टाइम्स मल्टीप्लाई होकर के इनमें दर्शन होते हैं और वह जगत छोड़कर के सीधा इनका चेला बन जाता है। तो यह हो गया एक पूरा सर्कल एक इंटेलेक्चुअल जर्नी है हमारा। हम लोग इंटेलेक्चुअली इस बात को अभी समझने में सक्षम हुए हैं कि मनुष्य का जन्म, मनुष्य का कॉन्शियसनेस, मनुष्य का पपस, मनुष्य का ब्रेन, अपनी यह आध्यात्मिक साधना इसका सीक्रेट क्या है? कौन सा एक फ्रेमवर्क है जिसके भीतर में हम यह इंडिविजुअल की जर्नी जो है उसको हम मैप कर सकते हैं। इसको हम समझ पाते हैं। यह इंडिविजुअल की जर्नी है। यह विषय आनंद से यह सर्वभूत में ईश्वर दर्शन या तो सर्वभूत में ब्रह्म दर्शन या तो फिर मेरा जो अहम है उसको पूरे विश्व में एक्सपैंड हो वो वाला आनंद जो है वो प्राप्त करने की यह मेरी जर्नी है। विषय आनंद में से भजनंद, भजनंद में से अद्वैत आनंद और अद्वैत आनंद में से सर्वभूत में ब्रह्म दर्शन का आनंद। यह है हमारे चार स्टेप्स। यह कोई भी मनुष्य है इसको इसी के माध्यम से सर्वोच्च जो अपना लक्ष्य है उसको प्राप्त होना है। किसी भी मनुष्य को अमरत्व और दिव्यत्व तक की यात्रा करनी है। पशु योनि में वापस नहीं चले जाना है। यदि मैं इस युग इस जन्म में विषय आनंद में ही मग्न रहूंगा। मैं यदि अपना यह जो हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर है उसको मैं भजनानंद वहां तक अपग्रेड नहीं करूंगा अद्वैतानंद तक अपग्रेड नहीं करूंगा प्रयास नहीं करूंगा एटलीस्ट तो फिर यह नेक्स्ट जन्म जो होगा और फिर पशु योनि में ही होने वाला है तो हमारे पास में वही एक ऑप्शन है या तो अपना आनंद है उसको अपग्रेड करते जाइए विषयानंद में से भजनानंद की ओर जाते जाइए वरना तो फिर पशुत्व की ओर हम जाएंगे तमस और भयानक मूढ़ता की ओर हम जाते जाएंगे। तो यह फ्रेमवर्क अपने सामने इंटेलेक्चुअल और थ्योरेटिकल फ्रेमवर्क क्लियर है। ठाकुर महा स्वामी जी का जब हम जीवन दर्शन उनका उपदेश उनकी वाणी और उसका जो हम अच्छे से ठीक से स्मरण मनन निधिद्यासन करते हैं। उनमें गहराई से प्रवेश करने का प्रयास करते हैं। तो यह जो साइकिल जो है यह फ्रेमवर्क जो है यह थ्योरेटिकल एक फिलॉसोफी जो है यह हमको बड़ा ही क्लियरली समझ में आने लगता है। हां, हम उसको प्राप्त करने के लिए फिर और कितने जन्म जन्मांतर लग जाए वह कहना अभी मुश्किल है। किंतु यह बात तो हमको पता है। देखिए आप यदि ठीक-ठीक साधन भजन करते हैं तो बीच-बीच में यह फ्लैश की तरह यह जो अद्वैत आनंद है उसकी अनुभूति होगी। यह निर्विकल्प समाधि को प्राप्त करते-करते तो वैसे बहुत समय लग जाएगा। निर्विकल्प समाधि का तो वही अर्थ है कि जितने भी पंच कक्लेश है जो पांच क्लेश है हमारे अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश या तो जो डरिपु है या तो फिर यह दो काम कांचन है या अष्टपाश है वो दगदबीज हो जाएंगे। अर्थात कि जड़ मूल से वो समाप्त हो जाएंगे। यह विषयों के प्रति जो हमारी वासना है संपूर्ण रूप से मिट जाएगी। एक इस तरह की मंजिल तक हम पहुंच जाएंगे कि वहां से यह स्लाइड बैक होना यह डिटेरियट होना या क्रैश लैंडिंग होना वहां से संभव ही नहीं है। तो वह तो एक अवस्था हो गई। किंतु यह अद्वैत आनंद का एक आभास जो है उसका एक हिंट जो है वह आपको ध्यान करते-करते जप करते करते कथामृत का पाठ करतेकरते या तो फिर यह ठाकुर की वाणी का श्रवण करतेकरते बीच-बीच में कभी-कभी हो जाएगा और जो वह हो जाएगा तभी यह हमारा मन जो है ठीक-ठीक संतुष्ट होगा और इस तरह के फ्लशिस यह जो फ्लशिस ऑफ रियलाइजेशन स्वामी जी उसको कहते हैं ठाकुर जी उसको कहते हैं दप करे देखिए देवा फटाक करके उसको दिखा देना। प्रकाश के वह एक पुंज की तरह एक हठात एकाएक हमारी नजर के सामने वो प्रदर्शित हो जाना। तो यह जो फ्लशिस ऑफ रियलाइजेशन बीच-बीच में हमको होंगे और यह होंगे। दिस इज अ साइन कि वी आर गोइंग इन द राइट डायरेक्शन इन आवर जर्नी ऑफ स्पिरिचुअलिटी। तो यह है एक पूरा फ्रेमवर्क जिसको कि मैं सोच रहा था और मैंने सोचा कि आपके साथ शेयर करूं। तो आज यहीं तक अभी कल फिर से ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

ठाकुर कहते हैं मैंने आपके लिए भोजन तैयार कर दिया है, आपको बस इसे खाना है। ठाकुर का भाव आत्मसात करना सहज साधना है.

एक्चुअली देखिए ठाकुर ने खुद ने कहा कि मैंने खाना बना दिया है। तुमको खाना बैठ के खा लेना है अभी। यानी कि वह जो सतयुग में ना कि वह द्वापर त्रेता में हजार साल तक ऋषि मुनि तपस्या करते थे। इस कलयुग में या तो फिर श्री रामकृष्ण युग में बेटर वर्ड है श्री रामकृष्ण युग। इस युग में ठाकुर का जो यह भाव है ना वो ग्रहण करने से ही हमारा चित्त निर्मल होना शुरू हो जाएगा। मेरा खुद का मैं अनुभव बताता हूं। ऐसा नहीं है कि मैंने कोई बड़ा साधना भजन वगैरह कर दिया है। विदिन मोनेस्ट्री रहते हैं तो यहां का रूटीन फॉलो करना है। किंतु आप यदि आर्मी में रहेंगे तो आर्मी का रूटीन फॉलो करेंगे। आप किसी जॉब करेंगे तो वहां का रूटीन फॉलो करेंगे। तो क्या है वह सबके साथ में वो फॉलो हो जाता है। उसके लिए फिर अलग से कोई एक्सरशन लगाने की जरूरत नहीं रहती। तो वह एक रूटीन फॉलो करते हैं और ठाकुर मां स्वामी जी का भाव जो है ना वह एक इंबाइप करते हैं हम अपने भीतर में। तो क्या है कि वो रेडीमेड खाना जो है ना अब घर में खाना बनाना कितना टाइम लगेगा होटल में जाकर खा लो। तो यह ठाकुर का भाव कथामृत पढ़ना ये होटल में खाने के बराबर है। रेडीमेड है आप खा लीजिए तो यह भाव सीधा अपने भीतर में चला आएगा। यदि हम इस तरह से सोचेंगे कि मैं लंबा टाइम तक मैं मेरे जीवन का सबसे बड़ा जो मोस्ट फॉर्चूनेट डिसीजन जो है ना वो मैंने पीपीटीसी में लिया था। अभी तक टू दिस डे आई आई कांग्रेचुलेट मयसेल्फ कि मेरे में इतनी अकल थी या ठाकुर ने इतनी अकल दी वो ये डिसीजन लेने की पीपीटीसी में हमको मैं जब बेलूर मठ ज्वाइन करने को गया था एकदम फ्रेश ब्रह्मचारी तो वो हमारे सुितानंद जी महाराज इंचार्ज थे पीपीटीसी के तो वो कहते थे कि देखो तुम लोगों को हम यहां पर सब कुछ बता देंगे। रामकृष्ण मिशन में सीखने के लिए जो कुछ है सबका एक ट्रेलर आपको दिखा देंगे। यह भजन है। फिर यह फिलॉसोफी है। फिर यह रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य है। यह काली कीर्तन है। सब कुछ हम आपको संस्कृत है। सब दिखा देंगे। फिर आपको किस चीज में आगे बढ़ना है। अब भविष्य में आप थोड़ा सा ठीक कर लीजिए। तो उस समय मेरे पास में वो एक था। इंटेलेक्चुअल था तो मैं तो ये भजन भजन में तो ज्यादा जाना नहीं है तो एक इंटेलेक्चुअल ही चीज को एक्सेप्ट करना है तो एक बड़ा टेंप्टेशन था कि संस्कृत और ये स्क्रिप्चर की ओर जाए क्योंकि संस्कृत मेरा ऑलरेडी काफी अच्छा था पढ़ाई उसी में 10थ स्टैंडर्ड तक संस्कृत था मेरा सब्जेक्ट और काफी अच्छे मार्क्स आते थे और वैसे पढ़ाई लिखाई भी काफी मतलब वो फिलॉसोफी पढ़ा था तो ऑब्वियस ऑप्शन है कि वेदांत और संस्कृत को लिया जाए किंतु उस समय सम हाउ मेरे माइंड में यह हुआ कि नहीं बंगाली और रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य को लिया जाए। बाकी का बाद में देख लेंगे। तो टू दिस डे आई कांग्रेचुलेट मायसेल्फ। क्योंकि रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य पढ़कर के यह रेडीमेड खाना हमको मिलता है। होटल में खाने की बराबर है। संस्कृत और स्क्रिप्चर सीखता ना तो मुझे अपना सारा खाना बनाना पड़ता। वो होता नहीं क्योंकि मैं आलसी हूं। मुझे पता है कभी नहीं होने वाला। मैं कुछ समय अकेला रहा था लखनऊ में तो सुबह को खिचड़ी बना करके चला जाता था। सुबह ब्रेकफास्ट में भी खिचड़ी दोपहर को थोड़ी देर के लिए आता था तो वह भी खिचड़ी खा लिया। रात को आता था वही खिचड़ी गम करके खा लेता था। तो कोई गेस्ट जब आता था ना उनको पता था इसका यह हैबिट है। दिन भर खिचड़ी वही सुबह की खाएगा। तो वो कहता है अभी आज हम तुमको हेल्प करते हैं। हम खाना बनाते हैं तुम्हारे लिए। इसलिए नहीं कि बड़ा प्रेम आ गया मुझ पे। उनको वो फ्रेश खाना खाना है। इसलिए तो मेरा टेंडेंसी मुझे पता था। तो सम हाउ कि दिस इज द बिगेस्ट बेनिफिट इन माय लाइफ। आप ठाकुर मां स्वामी जी को जितना पढ़ेंगे ना उतना ही रेडीमेड भाव अपने भीतर में आता जाएगा। तो वो एक है। दूसरा यह फ्लेशेस ऑफ रियलाइजेशन होता है। आई एम वेरी फॉर्चूनेट टू हैव अ फ्यू ऑफ़ देम। और मुझे ऐसा लग रहा है कि आप भी यह नियमित रूप से अपना साहित्य का सेवन करेंगे ना। आपको भी यह फ्लेशेस होंगे। तो क्या है ना कि हमको एक एक एंथूजियाज्म देते रहते हैं बीच-बीच में। मां ऐसा ही कहती है कि जो भी यहां पे आता है ना ठाकुर उसको पहले कोई रियलाइजेशन या कोई दर्शन या तो अनुभूति दिलवा देते हैं जिससे कि फिर यह लंबा साधना का रास्ता है उसमें यह बोर ना हो जाए उसमें यह उब ना जाए। सो ये फ्लशेस ऑफ रियलाइजेशन होंगे। दिस इज अ गारंटी ऑफ़ ठाकुर मां स्वामी जी। तो रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य के साथ में जो लोग जुड़े हैं कोई बड़ी कठिन बात नहीं है। जितना हो सके उतना ठाकुर मां स्वामी जी को पढ़िए। खास करके स्मृति कथाएं खास करके यह जो कन्वर्सेशनल लिटरेचर है रेदर देन कि वो कंप्लीट वक्स या फिलॉसोफी टाइप का वो भी पढ़ना है नो डाउट बट ये जो मां की स्मृति कथा है मेरा जो मेजर डाइट जो है वो जो कहते हैं ना कि वो आपका ब्रेड एंड बटर क्या है बाकी आप आचार है पापड़ है वो हजार आप खाएंगे किंतु ब्रेड एंड बटर क्या है तो अपना ब्रेड एंड बटर है मां की स्मृति कथा है वो जितना आप उसको पढ़ेंगे ना उतना ही देखेंगे कि इट विल बूस्ट आवर साधना ना एंड आवर प्रोस्पेक्ट।

प्रश्न: रामकृष्ण-विवेकानंद साहित्य का स्मरण-मनन-निदिध्यासन अध्ययन कैसे करें?

मैंने जब स्टार्ट किया था ना तो मैं माइंड में बहुत बनाता था इस अर्थ में कि अब जैसे ठाकुर का एक जो विद्यासागर वाला चैप्टर पढ़ लिया तो फिर अभी यहां पे ठाकुर एक्चुअली विद्यासागर को क्या कहना चाहते हैं। कैन आई रिप्रेजेंट इट ग्राफिकली? तो बोल करके चार्ट बनाता था। यह सब बनाता था। तो इससे क्या होता था? माइंड में सर्च करेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि कैसे वो एक कांसेप्ट्स को ग्राफिकली रिप्रेजेंट करना है। तो हम लोग ट्रेनिंग सेंटर में थे तो सर्वप्रियनंद जी हमारे आचार्य थे। तो उन्होंने एक बार माइंड मैप के बारे में बताया था कि किस तरह से वेदांत का माइंड मैप बनता है। 24 तत्व का माइंड मैप बड़ा फेमस है। वो पुरुष और प्रकृति यहां पे दो बॉक्स दिखाई देंगे। फिर नीचे में एरो आएगा। फिर महत है। फिर यह जो वो जो भी है सृष्टि का प्रकरण स्टार्ट होगा। तीन ये है गुण है। फिर ये महाभूत है। फिर ये ज्ञानेंद्रिय है। कर्मेंद्रिय है। बोल के वो 24 तत्वों का एक माइंड मैप बनता है। चार्ट बनता है। वेरी फेमस। तो इस तरह से उन्होंने एक बार सिखाया था। फिर मैंने इस कांसेप्ट को पकड़ लिया। मैंने अपना काफी कुछ इनोवेट किया। उस समय ट्रेनिंग सेंटर में बहुत सारे माइंड मैप बनाए थे। अभी बात यह नहीं है कि इतना एक्यूरेट आप ग्राफिकल और रिप्रेजेंटेशन कर पाते हैं या नहीं। बात है कि आपको बार-बार ओरिजिनल टेक्स्ट के पास जाना है। चंदन को जितना घिसेंगे उतना उसका खुशबू आएगा। जितना आप ओरिजिनल टेक्स्ट को बार-बार रेफर करते जाएंगे उतना ही आपका ये भीतर में वो शुद्धि होती जाएगी। सो दैट वाज़ वन सॉल्यूशन। मैं अभी जब मैं यहां पे अभी वो यंग स्टूडेंट्स के लिए अभी क्लासेस स्टार्ट किए हैं एव्री सैटरडे तो किसी किसी ने पूछा कि जो पढ़ते हैं स्टडी करते हैं वो याद नहीं रहता। तो मैंने कहा यह यूनिवर्सल कंप्लेन है। किंतु इसमें कोई मतलब आपको यह होने की जरूरत नहीं है। आप जो भी पढ़ाई लिखाई करते हैं उसको आप ग्राफिकली रिप्रेजेंट करते जाइए। देखेंगे कि आपको बार-बार ओरिजिनल टेक्स्ट को रेफर करना पड़ता है। दैट वे आपका बड़ा अच्छे से यह स्टडी हो जाएगा। एक डिवोटी था। उसको मैंने कहा कि जैसे ठाकुर का यह प्रसंग है। आप कहते हैं कि कथामृत पढ़ने के बाद में याद नहीं रहता। क्या करना है? ठाकुर का यह प्रसंग है कि वह एक जटिल बालक की कहानी हमने वह कथामृत में लास्ट टाइम देखी थी। वह जंगल में जा रहा है। डर लग रहा है। तो मां को कहता है कि मां जंगल में डर लग रहा है। तो मां क्या कहती है कि अपने मधुसूदन दादा को पुकारना। तो वो नेक्स्ट टाइम जब जंगल में जाता है वन से अपनी स्कूल तक तो फिर वो मधुसूदन दादा को पुकारता है। वो आकर के उसको हेल्प मतलब उसका हाथ पकड़ करके स्कूल तक ले जाते हैं। नाउ दिस इज अ वेरी गुड सीन। हाउ टू रिमेंबर दिस? ड्रॉ ए पिक्चर। भले ही चाहे वह कितना अच्छा ना भी हो किंतु बैठे-बैठे आप पिक्चर ड्रॉ कीजिए। देखिए कि वह वन है, बच्चा है, दादा मधुसूदन है, सामने स्कूल है, पीछे में मां है। जस्ट डू समथिंग क्रिएटिव फॉर योर ओन एंजॉयमेंट। तो क्या है ना कि हमने समय दिया है इसको इस कहानी को। जब ड्रॉ करते जाएंगे उतना ही उस कहानी आपके भीतर में घूमती जाएगी। तो यह आपके आत्मसात हो जाएगा। सो दिस इज हाउ मनन और निध्यासन कैसे करें? तो इस तरह से दिस इज वन ऑफ द वे मेनी वेज़ आर देयर बट आई फाइंड दिस वेरी इजी यस यस यस यस ये अपना ये जो क्लास है इसमें मेरा कितना रिवीजन हो जा रहा है ये रामायण महाभारत 10,000 साल से हम लोग सुनते आ रहे हैं कभी कोई बोर नहीं होता और 10,000 साल तक बोर नहीं होंगे

मानव जीवन में आनंद के सोपान

माने यह दोनों साथ में ही करना होगा त्याग और भजनानंद दोनों साथ में ही पैरेलल चलेगा हां तो माने फोर स्टेजेस होंगे। एक तो एक नॉर्मल स्टेज है विषयनंद का। सेकंड स्टेज होगा त्याग और भजनानंद का। थर्ड स्टेज होगा अद्वैत आनंद का। और फोर्थ स्टेज होगा सर्वभूत में ईश्वर दर्शन या सर्वभूत में आनंद।

प्रश्न: क्या "सर्व भूत में ब्रह्म दर्शन" एक सहज अवस्था है -- यह हमारी साधना जारी रखने पर स्वतः ही आ जाएगी, या जैसा कि स्वामीजी सिखाते हैं कि हमें "शिव ज्ञाने जीव सेवा" का अभ्यास करना होगा? जब हम "शिव ज्ञाने जीव सेवा" का अभ्यास कर रहे होते हैं, उस समय हम वास्तव में "सर्व भुत में ब्रह्म दर्शन" की स्थिति तक नहीं पहुँचे होते हैं।

ना ये बड़ा अच्छा पॉइंट ये इस पॉइंट को मुझे मेंशन करना चाहिए था। यह स्वामी जी का कंट्रीब्यूशन है। शिव्ञान जीव सेवा। यह जो हम सेकंड स्टेज पर जब आते हैं त्याग और भजनानंद तो साथ में शिव ज्ञान जीव सेवा एक आ जाता है। यहां पर हम दूसरों के भीतर में ब्रह्मण को सिर्फ फिलहाल तो इमेजिन ही करते हैं क्योंकि ओरिजिनल अनुभूति तो कब होगी जबकि अपना अहम विस्तृत हो जाएगा। वह तो अभी तो सिकुड़ा हुआ ही है। पंचमहाभूत के देह तक ही तो सीमित है। तो वह तो हमको इमेजिन ही कर जैसे ध्यान हम कल्पना करके करते हैं। भजन का जो आनंद है हम कल्पना करके करते हैं कि मैं दक्षिणेश्वर में बैठा हुआ हूं। श्री रामकृष्ण देव मेरे सामने भजन गा रहे हैं। या तो समाधि में मग्न है। मां शारदा वहां रोटी पका रही है या तो फिर मेरे साथ में वार्तालाप व्हाटएवर। यह मैं कल्पना जैसे कर रहा हूं वही कल्पना तो यहां पर भी है कि सर्वभूत में मुझे शिव का दर्शन करके सेवा करनी है। तो इट्स अ पार्ट ऑफ भजनानंद ओनली एंड अ न्यू मेथड ऑफ सेवा डिस्क्राइब बाय स्वामी जी। बट अल्टीमेटली जो सर्वभूत में जो आनंद प्राप्त होना इट विल कम ओनली आफ्टर अद्वैत वेदांत। तो यह एक हो गया। दूसरा जो एक आप जो शायद कहना पूछना चाहते थे कि यह जो सर्वभूत वाला जो स्टेज है वह ऑटोमेटिक आता है ना कि उसमें कुछ यूनिकनेस है तो यूनिकनेस है जहां तक अपने शास्त्र कहते हैं अगेन यह अपने लिए तो स्पेककुलेशन ही है जहां शास्त्र का जहां तक प्रश्न है वो कहते हैं कि 21 दिन में निर्विकल्प समाधि में मृत्यु हो जाएगा यूजुअली यह होता है किंतु ठाकुर को जैसे कि मां जगदंबा ने आकर के आदेश दिया था कि तू भाव मुख्य था तो फिर वो निर्विकल्प समाधि से वापस आकर के सर्वभूत में ईश्वर दर्शन कर रहे थे। तो व्हिच माइट बी कंसीडर्ड अ यूनिक स्टेज लिमिटेड टू ओनली अ फ्यू साधकास। बाकी जितने भी हम साधु संतों को देखते हैं ना कि लोगों के प्रति प्रेम है तो यह शिव ज्ञान जीव सेवा वाला ही मामला है उनका। क्योंकि भजन में आनंद आ रहा है तो फिर यह सिर्फ कल्पना नहीं रह जाएगी। वह तो आप तो बड़े हायर लेवल पर पहुंच गए हैं साधना के। तो ऑटोमेटिक स्नेह, करुणा, कंपैजन डेवलप होता ही जाएगा। बट स्टिल दिस इज नॉट दैट रियल ब्रह्मानुभूति इन ईश्वर सर्वभूत में ब्रह्मानुभूति वह नहीं है। इट्स डिस्टिंक्ट अद्वैत हो सकती है नहीं है ही

प्रश्न: कष्ट कोई नहीं चाहता. हर कोई आनंद ही चाहता है - कोई भौतिक सम्पत्ति में, कोई आध्यात्मिकता में।

ये ये क्या है? फिलॉसोफिकल लेंस के माध्यम से हम जगत को देखते हैं। अभी मेरा पेट्रियोटिज्म वाला फिलॉसोफी है तो मेरा आनंद है देश की सेवा में। मटेरियलिस्टिक फिलॉसोफी है तो कंज्यूमरिज्म मेरा आनंद है। स्पिरिचुअल फिलॉसोफी है तो भजनानंद है। तो जिस फिलॉसोफी के चश्मे मैंने पहने हैं उस चश्मे से जो मुझे आनंद दिख रहा है उसके पीछे में मैं जाऊंगा।

प्रश्न: विवेकानंद मृत्यु की प्रशंसा करते हुए कहते हैं, "संन्यासी को मृत्यु से प्रेम करना चाहिए" या "मृत्यु जीवन के स्वप्न को तोड़ देती है। मृत्यु से प्रेम करो।" क्या यह आपके इस सिद्धांत के विरुद्ध नहीं है कि हर कोई आनंद चाहता है? स्वामीजी की माँ काली की कविता भी ईश्वर के ख़ौफ़नाक पहलू का महिमामंडन करती है।

यह जो काली द मदर पोएम है क्लाउड्स आर कवरिंग बाय क्लाउड्स। डार्कनेस वाइब्रेंट सोनंट यह जो स्वामी जी का जो कालीद मधर वाला जो पोएम है कि एक भयंकरा काली यह प्रकृति का एक विकट स्वरूप या तो इष्ट का विकट स्वरूप एक्चुअली यह वैराग्यजनक ही है। आप यदि भयंकरा काली की उपासना करते हैं डजंट मीन कि आप दुख या कष्ट की उपासना करते हैं। यह आपको वैराग्य जनक है। यह जैसे कहा ना कि वैराग्य और भाव दो है साधना। तीसरा निश्चय यह शिव ज्ञान जीव सेवा है। किंतु यह वैराग्य उद्दीपन करने के लिए यह भयंकरा काली कि यह जगत का विषय आनंद जो है वो क्षणभंगुर है। आज है कल नहीं है। वो नारद की कहानी कि ये वो भगवान विष्णु को कहते हैं माया क्या है वो समझना है। अच्छा ठीक है। भगवान ने कहा वो पानी लेकर आओ। पानी लेने को गए गांव में सुंदरी स्त्री को देखा तो वहीं पर रह गए। शादी किया बच्चे हुए। फिर यह भयानक तूफान आया। झड़ वृष्टि आई। फिर यह ये फ्लड आया तो फ्लड में पूरा घर उसका जो है वो बह गया। बीवी बच्चे बह गए। आखिर में अकेले पड़े-पड़े रो रहे हैं। उस समय विष्णु आकर के कहते हैं क्या नारद क्या हुआ मेरे पानी का गिलास? तब वो चमक करके देखते हैं। बस वही कुछ क्षण गए हैं। उसी कुछ ही क्षणों में माया का खेल हो गया। तो यह जो पूर का आना, घर का बह जाना, बीवी बच्चों का मृत्यु होना यह वैराग्य की ओर हमको ले जाता है। ठाकुर की खुद की कहानी देखिए पिताजी का देहांत हुआ तो उनका मन ईश्वर की ओर जाने लगा। स्वामी जी की खुद की कहानी पिताजी के मृत्यु से उनका मन पूरा जैसे कि संसार से टूट गया। किंतु इसके अंडरलाइंग भी तो आनंद है। स्वामी जी जब ऐसा नहीं है कि स्वामी जी ने दुख या वैराग्य के पास में सीधे चले गए थे। जितना कथामृत पढ़ेंगे स्वामी जी का लाइव पढ़ेंगे। देखिए शुरू शुरू में जब नरेंद्र ठाकुर के पास आता था जैसे आनंद की हाट बैठ जाती थी। वो एक दिन की कहानी वो एक वर्णन है कथामृत में नरन आया है तो ठाकुर खुशख हो गए हैं कि नरन आया है नरन आया है और फिर वहां पर वो नरेंद्र के पास में एक के बाद एक डिमांड कर रहे हैं अभी यह भजन गाओ अभी यह भजन गाओ तो नरेंद्र गा रहा है और दिव्य आनंद पूरा फैल रहा है उसके बाद में खाना हुआ रात्रि का भोजन हुआ रात्रि के भोजन के बाट में बैठे हैं सभी लोग और हंसी मजाक वार्तालाप चल रहा है तो मास्टर महाशय लिखते हैं जैसे आनंदर हार्ट आठ बसे आनंद का बाजार जैसे कि बैठा है तो वो तो नर ने ऑलरेडी अनुभव कर दिया है इसके बाद में किंतु ये जो सांसारिक ड्यूटी भी तो एक होता है संसार का सुख कहीं ना कहीं अपने डीएनए में तो बैठा हुआ है तमस और रजस 1% तो है बोलकर के ही देह धारण हुआ है तो उससे जो मुक्ति पानी है उसके लिए यह भयावह काली की उपासना कि यह त्याग और वैराग्य दृढ़ रूप से बैठ जाए जिससे कि हम यह प्योर आनंद है उसमें आगे बढ़ पाए। एक नेगेटिव उपासना है, एक पॉजिटिव उपासना है। अभी देखिए यदि क्रोनोलॉजी उल्टा होता स्वामी जी बचपन से ही कॉलेज से ही अपने मन में दुख को लेते घूमते तो फिर हमको सोचना पड़ता कि अच्छा स्वामी जी का फिलॉसोफी क्या है? समझ में नहीं आ रहा है। किंतु क्रोनोलॉजी तो बड़ा क्लियर है कि ठाकुर के पास में अद्भुत आनंद प्राप्त किया है। बाद में कहीं जाकर दुख कष्ट का सामना हुआ और यह दुख कष्ट उनको संसार से वैराग्य दिलवाते हैं।