Transcript
ओम स्थापा का चित्र महाराज जैसे कहा था की तुम लोग यह स्वदेशी वगैरा कर रहे हो और हमारे विश्राम के लिए एक जगह बनाया है आश्रम बनाया है तो मैं वहां पर आऊंगी और ठाकुर का फोटो स्थापित कर दूंगी किंतु यहां पर मैन एक बात नहीं कहीं थी की वह अपना भी फोटो अपने से ठाकुर के साथ में स्थापित करने वाली थी तो टाइटल है 1911 अग्रहायन मां शेर प्रथम दिखे 1911 के अग्रहायन महीने के पहले की शुरुआत की बात है एक दिन खूब शक्ल बेला मां और राजू एक पाल काईट लकड़ी उमा को अपार ब्यूटी पालकी से एवं जमाई मनमत चतुर्थ पालकी ते आशा छैलें एक तीन बहुत सुबह को अर्ली मॉर्निंग मां और राजू एक पालकी में बैठकर के लक्ष्मी दी और लक्ष्मी दीदी यानी की ठाकुर की पथरी जी वह एक पालकी में बैठकर के मां को दीदी एक पालकी में बैठकर के और राधु का जो जमाई था मनमत वह चौथी पालकी में बैठ करके यहां से सभी लोग शाम को बैलगाड़ी में बैठकर के विष्णु पर जाएंगे और विष्णु पर से ट्रेन में बैठकर के कोलकाता जाएंगे यहां पर देखिए की बाकी सब पालकी में एक-एक लोग ही बैठे हैं एक पालकी में लक्ष्मी दीदी बैठी है ठाकुर की बद्री जी एक पालकी में मां को बेटी है एक पालकी में राधो का जमाई मां मत बैठा है किंतु मां के साथ में मां अकेली नहीं है मां के साथ में है तो राजू और मां का जो रिश्ता है उसके बड़े में हमने पहले भी चर्चा की थी वो सभी प्रसंग में इस तरह से वो छोटे-छोटे प्रसंग में वह हमको दिखता है की किस तरह से ठाकुर ने राजू की और इशारा करके कहा था राजू को दिखा करके कहा था यह है योग माया और इसका आश्रय करके तुमको पृथ्वी पर रहना है ऐसा ठाकुर ने मां को कहा था श्री श्री मां पूर्वी बोलियां छीलन श्री श्री मां ने पहले ही कहा था ग्वालपाड़ा आश्रम में श्री श्री ठाकुर के प्रतिष्ठा कारी बहन कल पड़ा आश्रम में ठाकुर की प्रतिष्ठा करेंगे पूजा का आयोजन हुआ है संक्षिप्त में मैंने अर्थात यह नहीं की बहुत अभी इन लोगों को बेचारे को पता भी नहीं है ना की पूजा वगैरा कैसे करना है विलुप्त सीखेंगे हो तो बाद में धीरे-धीरे करके मां से दिन बोलियां चिले मैन उसे दिन कहा था ठाकुर के दिए जो ठाकुर को मैं बिठाकर के जाऊंगी किंतु आमराजानी सशक्ति भगवान और पूजा ही भी थी किंतु हमको पता है की भगवान की पूजा शक्ति के साथ में ही होती है 100 शक्ति के साथ में ही ईश्वर की पूजा होती है इसीलिए हम लोगों ने ठाकुर और मां दोनों के फोटोग्राफ पूजा के लिए रखें थे मां तारा ताड़ी स्नान करने के बाद में ठाकुर का फोटो और अपना खुद का फोटो अपने सर पे स्पर्श किया और फिर सिंहासन पर बिताया और पुष्प वगैरा एवं शिष्य ब्रह्मचारी किशोरी के दिया सामान्य होम कर आयरलैंड आखिर में किशोरी को देखकर के थोड़ा सा ओम कराया देखिए अभी इसके छोटी सी घटना के भीतर में हम लोगों को पता है की मां ऐसा कभी बहुत रेयरली कहती है की हां मैं जगदंबा हूं या तुम्हें भागवत हूं या तो फिर ठाकुर की तरह ही शक्ति जो है ईश्वरीय शक्ति वो पृथ्वी पे धारा है शरीर धरण करके अवतरित हुई हूं ठाकुर ऐसे बार-बार जो ठाकुर के साथ में रहेगा जिसने कथामृत पढ़ा है इतने सारे इंगित उसमें मिलते हैं ठाकुर कब भाऊ समाधि में चले जाते हैं कब लोगों के लोगों को स्पर्श करके उनको मुक्ति दिवा देते हैं उनको भाव समाधि दिवा देते हैं ना ही ठाकुर की तरह कोई चमत्कारिक उपदेश दिए हैं ना ही ठाकुर की तरह उनके कोई चमत्कारी कायाकल्प है ना ही वो बार-बार भाव हिंदी में समाधि में चली जाति है ना ही उनको ईश्वर के दर्शन वगैरा होते हैं अभी यह बात दो बात है की ईश्वर के दर्शन होना और ईश्वर के दर्शन मां को हो रहा है वो बाहर में हमको समझ में आना जैसे ठाकुर ने कहा है ना की छोटा सा एक तालाब है उसमें यदि हाथी प्रवेश का तो तालाब का पानी इतना वो छल कूद करने लगेगा इतने सारे ये जो लहरें उसमें उठेगी क्योंकि तालाब छोटा है हाथी का साइज बड़ा है किंतु यदि महासमुंदर है उसके भीतर में हाथी प्रवेश करता है तो क्या होगा कुछ नहीं होगा समुद्र को पता भी नहीं चलेगा की हाथी ने प्रवेश किया है वैसे ही जैसे जिसका आधार छोटा है उसका उसके मां में उसके हृदय में भाव की तरंग उठाती है भाव प्रगति होता है तो एकदम वह समाधि वगैरा वो होने लगता है शुरू पलक कंपनी आंखों में से अश्रु होने लगता हैं शरीर में से वो कंपन रन लगता है पलक अर्थात की रोंगटे खड़े हो जाते हैं यह जो भाव के जो सब लक्षण दिखाई देने लगता हैं किंतु मां का हृदय था महासमुंदर की तरह मां का जो ये चैतन्य था चैतन्य की उनकी ये जो सीमा थी वो महासमुंदर की तरह चारों और विस्तृत हुई थी इसीलिए भाव रूपी हस्ती जड़ी उसमें प्रवेश भी करता तो यह अश्रु पलक फिर कंपन फिर समाधि वगैरा लक्षण ठाकुर में जो प्रकट होते थे वो मां में कभी बहुत ही रेयरली प्रगति होते थे एक इंसिडेंट के बड़े में हमने शायद चर्चा की थी की मां उसे समय कल पड़ा में थी और सोई के भीतर में वह धागा वह प्रो रही थी जैसे सी के भीतर में वह छोटा सा एक होल होता है ना ऊपर में उसमें धागा दिया जाता है और फिर इस सी से फिर अब कपड़े तो जो है संघर्ष जाता है तो मां उसमें सी में धागा दाल रही थी प्रो रही थी सुद्दनली मां को क्या हो गया की जैसे की वो चक्कर आया और सो गई ना की ऐसा कुछ हुआ तो सब लोग एकदम हल्ला करने लगे बोलने लगे की अरे मां को भाव समाधि हुई है मां को समाधि हुई है तो मैन कहा अरे नहीं नहीं कुछ नहीं हुआ है वो तो धूप की वजह से ऐसा हुआ किंतु फिर मां का जब अंतिम समय था अंतिम बीमारी थी उसे समय वर्धा महाराज को मैन कहा था की उसे दिन ये लोग सब बाकी सब औरतें अल्लाह कर रही थी इसलिए मैंने कहा नहीं की क्या हुआ था किंतु तुमको बताती हूं की मैंने देखा की बहुत धूप था देखा की ठाकुर धूप में से आकर के वरांडे में बैठ गए और कहा की मुझे तो ठाकुर जब बैठ गए तो मैन क्या किया अपने आंचल से उनको हवा देने लगी जैसे की ठाकुर का शरीर शीतल हो नेहा शीतल हो तो यह ठाकुर का कृष्णा मां को हुआ था किंतु यह सब उसे समय मां को वैसे ही हल्ला गला पसंद नहीं था वैसे ही तो इस तरह के दर्शन मां को होते थे तो बाहर में वैसे ही पता नहीं चला था उसे दिन पता चल गया की चलो किंतु मैन इस तरह से झूठ बोलकर के इस बात को ढाबा दिया की नहीं कुछ नहीं वो तो धूप की वजह से मुझे थोड़ा सा चक्कर ए गया इसलिए ऐसा हुआ है तो मां के जीवन में देखेंगे की बहुत ही रेयरली ऐसा होता है की मां अपना सही स्वरूप प्रकट करती है किंतु आज देखिए आज इन जब कल पड़ा आई बात थी की ठाकुर की फोटो की स्थापना ठाकुर की फोटो की स्थापना करेगी किंतु थे उनको पता है की सर शक्ति भगवान की पूजा ही वह हमारी हिंदू परंपरा की विधि है हिंदू परंपरा का नियम है तो उन्होंने ठाकुर का और मां दोनों का फोटो तैयार करके रखा था और मैन क्या किया मंदिर मैन ऐसा नहीं कहा की अरे यह मेरा फोटो क्यों यहां पर रखवा रहे हो वो भी मेरे हाथ से ये तो किसी ही मां है वो विडंबना है वो किंतु मैन सब कुछ नहीं कहा जैसे ठाकुर का फोटो अपने मस्ताक्स के पूरे स्पर्श करवा करके सिंहासन पर रखा वैसे ही मां का अपना खुद का फोटो अपने खुद के सर पे स्पर्श करवाया और सिंहासन पर ठाकुर के फोटो के साथ में रख दिया मेरे ख्याल से ये पहले बार ऐसा हुआ होगा की किसी अवतार या ईश्वर की शक्ति धरण कर किया हुआ किसी मनुष्य ने अपने ही फोटो की अपने ही प्रतिमा की अपने ही छवि की स्थापना की होगी पूजा के लिए मेरे ख्याल से ठाकुर ने बोला था की देखो उनका जो फोटो लिया गया था वह ध्यान मुद्रा में जो बैठे हुए हैं उसे फोटो को दिखा करके ठाकुर ने मां को कहा था की देखना की एक ऐसा समय आएगा की इस फोटो की घर घर पूजा होगी जो ठाकुर ने खुद ने अपने फोटो को पूजा करने के लिए स्थापित नहीं किया था यहां तक की ठाकुर जब काशीपुर में थे उनकी अंतिम बीमारी चल रही थी कैंसर से वह उनका अंतिम दिन ए गए थे किंतु ऐसा है की यदि जीवित व्यक्ति के फोटो की कोई पूजा करें तो बड़ा ही अजीत होने की संभावना है तो उसे समय क्या हुआ था कुछ भक्ति लोग दक्षिणी ईश्वर गए देखा की ठाकुर वहां पे नहीं है तो ठाकुर के फोटो की पूजा करके भोग दिया और फिर अपने घर वापस चले गए यह बात सुनकर के मां को बड़ी ही आशंका हो गई थी की अरे ठाकुर तो अभी भी सादे वर्तमान है पृथ्वी के ऊपर में और उनके फोटो की पूजा हुई है तो पता नहीं क्या अशुभ होगा क्या अब सुकन होगा ठाकुर के वैसे ही तो कैंसर की वजह से यह अंतिम दिन चल रहा है कितनी संघर्ष यह लड़के लोग मां यह डॉक्टर यह जो विद्यराज यह सब लोग ठाकुर जीवन रक्षा करने के लिए कितना संघर्ष कर रहे हैं किंतु क्या ठाकुर ने निश्चय कर लिया है की वो अभी पृथ्वी पर नहीं रहेंगे क्या उन्होंने ठीक कर लिया है की अभी वो महादी ग्रहण करेंगे तो इस तरह से आशंका मां के मां में इतनी उठ रही थी यह वर्णन लीला प्रसंग में है तो उसे उसे समय ठाकुर के फोटो की पूजा ठाकुर के रहते रहते होने से मां को इतनी आशंका हो गए किंतु यहां पे बिना कोई विदा के उन्होंने अपने खुद के फोटो की स्थापना की अपने शरीर रहते की उनकी पूजा हो तो यह वह खुद भगवती है मां जगदंबा स्वयं तीनों लोगों का तीनों लोकन की हर स्थिति और पालनपुर करने वाली मां जगदंबा स्वयं वह है वह उन्होंने इस छोटी सी घटना से हमको बताया है मां के जीवन में इस तरह की छोटी-छोटी घटनाओं को हमको खोजना के लिए जाना पड़ता है ठाकुर के साथ में ऐसा नहीं है वह अंतिम समय था नरेन पास में बैठा हुआ है और नरेंद्र सोच रहा है की इस समय यदि वो कहे की वह अवतार है तो वो मैं मानूंगा तो ठाकुर एकदम आंख खोल करके क्या कहते हैं जय राम जय कृष्णा श्री राम कृष्णा किंतु तोर वेदांतीर दिखे दिए नहीं अर्थात की जो राम थे जो कृष्णा थे वही आज रामकृष्ण और रूप में इस शरीर में वर्तमान है किंतु वेदांत की दृष्टि से नहीं वेदांत को कहता है की हम सभी के भीतर में वही राम मैं वही कृष्णमय वही रामकृष्ण मे अनंत ज्योतिर्मय ओजस मी आत्मन हमारे भीतर में विराजमान है और वही हमारा असली स्वरूप है और माया के इस मोोजाल में इस भोग के इस माया जल में हम लोग इस तरह से फैंस हैं की हमारी आंखों के सामने एक पर्दा ए गया है जैसे ही वह माया का पर्दा अहंकार का पर्दा है जाएगा चला जाएगा वैसे ही हमको अपना सही स्वरूप का दर्शन होगा ऐसा वेदांत कहता है तो उसे दृष्टि से ठाकुर के भीतर में राम और कृष्णा का अवतरण नहीं हुआ जो पुरनपुरुष राम और कृष्णा थे वही पुरनपुरुष भगवान विष्णु स्वयं देहधारण करके रामकृष्ण के रूप में अवतरित हुए हैं यह तो एक स्वयं स्पष्ट घटना उनके कथा बात उन्होंने अपने मुंह से स्वीकार किया उसके बाद में वो गिरीश घोष और नरेंद्र के बीच में झगड़ा लगा देते थे वो नरेंद्र को बोलते थे हरे देखो गिरीश कहता है की यह मैं ऐसा तो नहीं कहेंगे की वो कहेंगे की यहां पे अवतार खुद शरीर धरण करके उपस्थित हुए हैं अवतरित हुए हैं तो तुमको इसके बड़े में क्या कहना है तो नरेंद्र और फिर गिरीश घोष झगड़ा लेते थे फिर गिरीश आकर के ठाकुर को कहता था की महाशय मैंने नरेश नरेंद्र को हर दिया है डिबेट में फिर ठाकुर कहते हैं की अरे नहीं नहीं नरेंद्र तो आकर के ऐसा कर रहा है की जिसकी धड़कन हो की वो खुद अवतार ही है ठाकुर तो उसकी श्रद्धा के ऊपर में आघात नहीं करना चाहिए बोल करके नरेंद्र अपने से डिबेट में हर स्वीकार की है ऐसा ठाकुर देखिए किंतु वो फिर मास्टर महाशय को पूछते हैं वो तीसरी चौथी मुलाकात में ही की तुमि की मोना करो अमर को तो आना ज्ञान हो ज्ञान हो से की तुम क्या सोचते हो मेरे बड़े में मुझे कितना परसेंटेज नोट ज्ञान हुआ है तो फिर मास्टर महाशय कहते हैं की कितना आना ज्ञान कितना परसेंटेज कितना आना वह तो मैं नहीं समझना किंतु इतना आपके जितना प्रेम भक्ति त्याग तपस्या और ईश्वर का ईश्वर मे होना ईश्वर में ईश्वर करते-करते पागल हो जाना इस तरह का अद्भुत चरित्र मैंने दूसरा नहीं देखा है तो यह बात सुनकर के ठाकुर हंसने लगे अर्थात ठाकुर उनके पास में जो लोग आते थे उनकी परीक्षा करते थे सीधा प्रश्न करते थे की तुम मेरे बड़े में क्या सोचते हो और यदि कोई रहेगा की महाशय आपके तो बहुत ही अच्छे साधु संत त्यागी पुरुष है तो ठाकुर अच्छा ठीक है वो खुश होते थे और यदि कोई कहता था की आप तो वो जी तरह से राम थे जी तरह से कृष्णा थे जी तरह से चैतन्य महाप्रभु थे वैसे ही आप ईश्वरीय शक्ति का एक अंश शरीर पांच महाभूत का ये देख धरण करके पृथ्वी पर अवतरित हुआ है तो ठाकुर बड़े ही खुश हो जाते थे और ठीक करते थे की वह भक्ति उनका अंतरंग भगत है तो ठाकुर के जीवन में कार्यकलाप में वार्तालाप में बहुत-बहुत सारे उदाहरण मिल जाएंगे की वह सबको बता रहे हैं की वह अवतार है किंतु मां के जीवन में ऐसा बहुत ही कम इस तरह के प्रसंग है इस तरह के वार्तालाप है की मां स्वीकार करती है इसके बाद में एक प्रसंग आता है बाद में की रामेश्वर जाकर के मां वापी आई थी तो केदार बाबू मां को पूछ रहे थे की मां रामेश्वर शिवलिंग का भगवान शिवा का दर्शन कैसा हुआ तो मैन कहा की बेटा जैसा मैं रख कर के आई थी वैसा ही देखा तो उसे समय गुलाब मां वहां के पास में से गुर्जर रही थी तो उसने वो बोला मैंने पकड़ लिया अरे मां क्या कर रही हो तुमने सीता रूप में जब मां वहां पे गई थी तब मैन जी तरह से वो शिवलिंग की स्थापना की थी क्या वही शिवलिंग मैन फिर से उसे स्वरूप में देखा क्या तुम यह कहना चाहती हो की तुम ही सीता के रूप में उसे समय आई थी तो जैसे ही गुलाब मैन ऐसा कहा की मां एकदम अरे नहीं नहीं मैंने तो ऐसा मैंने वो अपने इम्मीडिएटली अपना भाव सम्मरण कर लिया किंतु देखिए की मां के जीवन में इस तरह से प्रसंग खोजना बड़ा मुश्किल हो जाता है हमको बड़ा ही चौकन्ना रहना पड़ता है की मां कब ऐसी कोई बात कर देगी और कब हम मां को पकड़ लेंगे किंतु ठाकुर के जीवन में ऐसा नहीं है ठाकुर बार-बार सीधा आपको क्वेश्चन करेंगे की तुम मेरे बड़े में क्या सोच रहे हो और जब हम कहेंगे महाशय आप अवतार है तो ठाकुर बड़े ही खुश हो जाते थे तो यह हो गया मां और ठाकुर के बीच में एक बड़ा डिफरेंस अच्छा तो आज यही तक कल फिर से मिलता है