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Swami Vivekananda's Teachings ·

Swami Vivekananda Hindi 23 May 2023

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स्वामी जी से डी होल यूनिवर्स इस ओनली मेक डी सबसीक्वेंट अरमानी मोर परफेक्ट इन डी यूनिवर्सल मेलोडी थ्री इतिहास और आउट फ्रीडम स्ट्रैंथ और स्वामी जी कहते हैं यह जो पूरा जो विश्व ब्रह्मांड है वो जो हमारी जो आत्मा है इस का एक वेरिएशन है हमको लगेगा की ये आत्मा जो है वो तो कुछ करता नहीं है आत्मा जो है वो तो निष्क्रिय है तो ये आत्मन से जगत कैसे बंता है हमको तो यह पता है की एक जगत है एक आत्मा है या तो फिर एक जगत है एक जीव है जीव अर्थात हम और एक है ईश्वर वैसे तो हम लोग जो है डिफरेंट डिफरेंट वेरिएशन इसके ऊपर में देखते आए हैं एक विश्व ब्रह्मांड एक ईश्वर और एक हम यदि हम चाहते हैं तो इस विश्व ब्रह्मांड के यह जो हम इसकी और हमारा जो अट्रैक्शंस है की हां यह जो मैंने जिसको कहेंगे की धन ऐश्वर्या मैन ये जगत तो क्या है ईश्वर का ऐश्वर्या ही तो है कालीबाड़ी में ठाकुर एक बार देखा मथुरा बाबू ने की विष्णुगढ़ मैन कालीबाड़ी में आपको पता होगा की वहां तो मां का मंदिर तो है मां काली का मंदिर किंतु साथ में ही द्वादश यह है आपके वो जो शिवलिंग है शिवा मंदिर है मैंने 12 शिवा मंदिर है और एक है राधाकांत का मंदिर अर्थात की भगवान कृष्णा और देवी राधा है तो यह राधाकांत के मंदिर में से भगवान विष्णु के यह जो यह है गने जो की उनकी मूर्ति को पहनाए गए थे एक बार चोरी हो गए तो माथुर बाबू को अभी मथुरा बाबू तो क्या है वो तो मैंने वो ये तो मैटेरियलिस्टिक परसों था एक व्यवसायिक आदमी था एक धन है ये रहना है उसकी उसके लिए तो कितनी ज्यादा वैल्यू है तो वो बड़े नाराज हो करके मंदिर में गया और भगवान विष्णु को ही भगवान कृष्णा को ही वो दांत करके खाने लगा की अरे भगवान आपके से भगवान है की आप खुद के गने नहीं उसकी रक्षा कर पे जब चोर आया और आपके बहाने चोरी कर रहा था तो आपने क्यों नहीं उसको मार गिराए ना आपने क्यों नहीं उसके ऊपर सुदर्शन चक्र फेंका ऐसा कुछ उलट-पुलट बोल रहा होगा भगवान कृष्णा के सामने में की आप यदि अपने खुद के गने जो है आपके आपको पहनाए हुए गने उसकी आप रक्षा नहीं कर पाते हैं तो आप हमारी रक्षा तो क्या करेंगे ऐसा करके कुछ बोल रहा तो हमको पता है की ठाकुर ने क्या कहा ठाकुर ने कहा की अरे महामूर्ख यह जो गने हैं वो तुम्हारे लिए ही ये गने है भगवान विष्णु जो की स्वयं सृष्टि के पालनपुर करता है ललन करता है उनके लिए तो ये मिट्टी के कुछ ये है पत्थर के समाज है मिट्टी और पत्थर के समाज है उससे ज्यादा उनके लिए और कोई वैल्यू नहीं जी लक्ष्मी स्वयं जिनकी दासी जिनकी पदसेवक करती हो उनके लिए ये चार-पांच सोनी के गने उसका क्या मूल्य है उनके लिए तो पूरा जगत संसार पड़ा हुआ है जिसमें जिनको की वह अपने संपत्ति वो का सकते हैं तो उनके लिए ये कर पांच कम के ऐसा करके अकुर ने उनको दांत था है तो देखिए की हमको पता है की इस तरह से जब हम सोचेंगे की एक र गया जगत संसार और एक है ईश्वर और ईश्वर की संपत्ति कहो ना की ईश्वर का ऐश्वर्या कहो तो ये ऐश्वर्या है ये संसार ये पूरा विश्व ब्रह्मांड और फिर हम है हम लोग जो है हमारा जन्म क्यों हुआ जैसे तो ईश्वर की स्तुति करने के लिए यदि मनुष्य जन्म है या तो फिर ये जीवात्मा जो है वो यदि ईश्वर की स्तुति नहीं करेगा ईश्वर के गंगा नहीं गाएगा तो फिर ये संसार चक्र में वो पिस्ता ही रहेगा वो जैसे वो एक एक्सपेरिमेंट में होता है ना एक बिल बना देते हैं और बिल के भीतर में चूहा को बिठा देते हैं तो चूहा दौड़ता राहत है बिल घूमता राहत है अभी चूहा चाहे कितना ही दौड़े वो जहां पे है वहां का वही रहेगा वो थोड़ा सा भी आगे नहीं जाएगा वो ठाकुर की कहानी है दो-तीन लोग जो है वो ठाकुर के नहीं महाराज ने कहा एक बार की दो-तीन आदमी शराब पीकर के एक बार वह नौका में बैठे हैं और बोला की चलो गंगा पर होते हैं अभी पुरी रात भर उन्होंने वो जो है वो ये जिसको की ये कहता है ना एन हेल सा गुजराती में शब्द है हलेश इंग्लिश में कहते हैं और जिसकी मदद से हम लोग जो है वो नोका को चलते हैं तो उन्होंने पुरी रात बैठ करके मेहनत किया की वो सामने की और चले जाए अभी रात भर तो शराब पिया था पता नहीं चला की वो क्या कर रहे हैं कहां जा रहे कहां तक है सुबह को उठ के देखा तो जहां पे थे जी किनारे पे इस किनारे है तो उन्होंने देखा शराब का नशा उतार गया है तो देखा की जो नौका है उसको रस्सी बंद के वो किनारे पे बंद दिया गया है अभी नौकर को रस्सी बंदी है ये लोग जो है वो हमेशा चला रहे हैं तो उससे तो कोई फर्क नहीं पढ़ने वाला वो पुरी रात भर शराब के नसे में उनको ऐसा लगा की वो मौका चल रही है हालांकि वो तो वही के वही बैठे थे तो ये जो जगत संसार में हम जो कुछ भी करते हैं जैसे हमको नाम यश विद्या संपदा संपत ऐश्वर्या यह सब की प्रताप के लिए हम चाहे जितना भी करते हो यहां तक यह सेवा का कार्य भी जो है स्वामी जी कहते हैं की सेवा ये जो जगत संसार में घर और इविल अच्छा और बड़ा ये दोनों का जो प्रमाण है वो 50-50 है 50% अच्छा है 50% बड़ा है अभी हम चाहे कितना ही अच्छा कम कोई क्यों ना कर ले हम 50% से ज्यादा वह जो गुडनेस जो है वो विश्व में नहीं बड़ा पाएंगे और हम चाहे कितना ही बड़ा कार्य क्यों एन कर ले किंतु यह 50% से आज ये 50% है जो 50% जो बुराई है उससे ज्यादा बुराई को नहीं बड़ा पाएंगे यानी की कोई भी किसी भी समय किसी भी आगे में किसी भी युग में कोई बहुत ही बड़ा आदमी क्यों ना ए जाए किसी भी युग में कोई बहुत ही अच्छा आदमी क्यों ना ए जाए ये 50-50 का जो प्रमाण है वो वैसा ही रहेगा बहुत अच्छा कार्य करने में भी 50% से ज्यादा जो अच्छाई है गुडनेस है वो नहीं बढ़ेगा और बहुत बड़ा कम करने से भी ये जो 50% इवॉल्व जो है 50% बुराई है वो नहीं बढ़ाने वाला तो ये आप एवं ये जो सेवा का कार्य भी जो है आप चाहे कितना ही कर ले उससे कोई फर्क नहीं पढ़ने वाला जगत संसार तो वैसे का वैसा ही रहने वाला है तो हम लोगों का क्या है हम लोग जो कुछ भी कर्म करते हैं वो कर्म होना चाहिए चित्र शुद्ध के लिए ईश्वर प्रताप की साधना के रूप में यदि हम ईश्वर प्रताप के साधना नहीं करेंगे तो इसके अलावा हम बाकी जो कुछ भी करें तो ये शराबी लोग वो शराब पीकर के एक ऐसी नौका में बैठे हैं जिसको वो चलाना का पर्यटन कर रहा है जो लोग आए रस्सी से बंद करके किनारे से वृद्धि हुई है रस्सी से किनारे से बंदी हुई ऐसी नोखा में बैठकर के हलेश करने के जैसा है ये अपना पूरा जीवन यदि हम साधना नहीं करेंगे तो आज हमने जितना ही चाहे संघर्ष करके हमने परीक्षा पास कर ली अभी हमने सोचा चलो अभी बढ़िया हो गया स्कूल खत्म हो गई परीक्षा का टेंशन खत्म हो गया अब हम आराम से जिएंगे तो वो नहीं अपने शादी की अभी घर संसार का सब टेंशन ए गया बच्चे हैं बच्चों की स्कूल चालू हो गई आपकी स्कूल खत्म हुई तो बच्चों के स्कूल चालू हो गई अच्छा आपको लगेगा की चलो अभी बच्चे क्यों पढ़ाई खत्म हो गई अब हम शांति से जिएंगे तब तक हम बूढ़े हो गए हैं या तो फिर हमारी जब जो है हमारी नौकरियां बिजनेस वहां पे दूसरी तरह का टेंशन चालू हो गया अभी जल्दी वो कहानी खत्म नहीं हुआ है हमको लगा चलो अभी हम रिटायर हो गए हैं अब शांति से जिएंगे तब कहानी जाकर के 10 तरक्की बीमारियों ने आकर के हमको घर लिया अभी वह जो स्वास्थ्य है वो बिगड़ा है फिर तो कुछ भी करने का साहस नहीं राहत जो ये जो एंजॉयमेंट है उसका इच्छा भी नहीं रहती करने की तो चलो अभी घर में बैठ करके मृत्यु की अपेक्षा करते हैं हम सोचेंगे चलो मृत्यु जब आएगा तब हम छूटेंगे चैन की सांस लेंगे किंतु नहीं फिर से नेक्स्ट जन्म में वही ये जो इस चक्र जो है जन्मभ्रुति जलव्य का फिर से चालू हो जाएगा इससे निस्तार नहीं है निस्तार तभी है जब हम ईश्वर के ईश्वर का नाम लेने की शुरुआत करें ईश्वर के शरणागत हो तब कहानी जाकर के ठाकुर कहते हैं ना की एक बेल है बेल को बांधकर के वो जो है खेत जोते हैं तब वो बेल को इतना कष्ट फिर अभी बेल का वध कर दिया फिर उसका वह जो चमड़ा है उसमें से वो जो है वो म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट बनाया तो जो म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट तभी वह हम्मा हम्मा कर रहा है जब वो बेल था वो खेत जोत रहा था तभी वो हम्मा हम्मा कर रहा है फिर वो आखिर में कहानी पर वह जो कॉटन है जो काटने के लिए वह जो तार बनाते हैं वायर वह जब वायर में से कॉटन को काटते हैं तब तू हूं तू हूं शब्द सुने देता है तब जब तू हूं तू हूं होगा तब कहानी जाकर के बेल का निस्तार है बेल को छुट्टी मिलती है वरना जब तक खेत में वो हाल जोतेगी फिर उसका उसकी कसाई उसका वध करेगा फिर उसका म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट बनाएगी ना की वो क्या-क्या करेगा वो ड्रम बनाएगी कहानी से भी उसका वो निस्तार नहीं है छुट्टी नहीं है आखिर में जब तो तू ही तू हूं कहता है तब उसकी छुट्टी है जब तक अम्मा अम्मा कहता है तब तक छुट्टी नहीं है तो हमारा भी ऐसा है हम लोग यदि यह सोच के बैठेंगे की ये धन संपत्ति मां यश ऐश्वर्या इसके लिए मैं जीवन जीता हूं तो हमारा जो है छुट्टी नहीं इस जगत संसार के कष्ट है हां ये बात नहीं है की हमको धन अर्जन नहीं करना है या तो फिर एक कंफर्टेबल लाइफ जिसको कहते हैं वो नहीं चाहिए ऐसा तो नहीं है मैं सब कुछ क्या है की जगत में रहने के लिए अभी ठाकुर ने कहा है ना की तुम लोग तपस्या अभी किसी ने कहा की हम लोग भी ठाकुर की तरह वो घर छोड़कर तपस्या करेंगे तो मैन कहा था की ठाकुर का वो जो पाया सर बाटी और मच्छर मुंडो माथुर योगा तो मार के योगा वे अर्थात ठाकुर को पिक खिलौने वाला और मछली का माता खिलौने वाला तो मथुरा बाबू था तुम यदि घर छोड़कर के मारे मारे फिरोगे भिक्षा करके तपस्या करने के लिए तो तुम्हारा यह सब जुगाड़ कौन करने वाला है वो दो-तीन लड़के चले गए थे मां के पास बोले की भिक्षा करके खाएंगे और ठाकुर की तरह वो भागवत भाव में मस्त रहेंगे तो ऐसा होता नहीं है यदि आप इस तरह से सोचेंगे की मैं भिक्षा करके खाऊंगा तो भिक्षा में ही आपका इतना वो समय लगा सब समय मां में वही चिंता रहेगी की मैं कहां जाऊंगा कितने भिक्षा मिलेगी क्या मिलेगा मिलेगा की भी नहीं मिलेगा इससे बटर है आने से एक हाथ में शरणागति लेकर के बाकी हद से कर्म कीजिए जो कर्म जो है वही और शरणाघाटी ये दोनों जब कंबाइन होते हैं तब हमारा आध्यात्मिक जीवन सही सही शुरू होता है इससे पहले जो है वो जो कहते हैं ना एन वो जो प्रवर्तक फिर सड़क फिर सिद्ध और फिर सिद्धू का सिद्धांत वो जैसे कथा अमृत्व में ठाकुर कहते हैं की ये कर्तव्य लोग हैं उन लोगों की कर कैटिगरी है तो सबसे पहले है प्रवर्तक मैन उसने अभी सुन के रखा है की इस तरह से ईश्वर है और ईश्वर की प्रताप करनी चाहिए किंतु क्या करना है कैसे करना है उसको नहीं पता उसके बाद में आता है सड़क मैन उसको पता चल गया है की हां इस तरह से साधना करनी है फिर आता है सिद्ध सिद्ध अर्थात की साधना करते करते उसको कोई अनुभूति हुई है और बाद में आता है सिद्धू का सिद्धांत अर्थात की उसने ईश्वर प्रताप करके ईश्वर को अपनी पॉकेट में रख दिया है या तो फिर अपने हृदय में बिठा दिया है अभी ईश्वर की आजा प्रकार के ईश्वर का आदेश प्रकार के वो जगत में निष्काम कर्म करता है उसका हृदय इतना विशाल हो गया है की जो कोई भी कर्म करेगा उसका जो फल मिलेगा वो सबको बट जाएगा उसके खुद के लिए कुछ नहीं बचेगा तो इस तरह से देखिए की जब तक आप साधना की शुरुआत नहीं करते हैं तब तक आप इस संसार में चाहे कितना ही करते रहिए इससे आपको कोई लाभ नहीं होने वाला बार-बार जो है आपको जन्म ग्रहण करना है तो अभी हमने देखा की तीन है ईश्वर है ईश्वर का ऐश्वर्या सम ये जगत संसार है और है हम खुद जीव जो की हमारा जन्म ही हुआ है ईश्वर प्रताप के लिए ईश्वर की आराधना के लिए ईश्वर के गुणगान गाने के लिए तो अभी आप सोचेंगे इस जगत में तो तीन चीज है ईश्वर है ईश्वर का ऐश्वर्या रूप जगत है और हम है तो यहां पर स्वामी जी क्यों कहते हैं की डी होल यूनिवर्स इसे ओनली डी सेल्फ विद वेरिएशंस दी वन तूने मेड बेयरेबल बाय वेरिएशन सोमेटाइम्स डी राइट डिस्कार्ड्स बट दे ओनली मेक डी सबसीक्वेंट हार्मनी मोर परफेक्ट यानी एक जो म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट है जैसे की सितार है सितारों में अलग-अलग जो है वो राज रागिनी बजा रहा हूं अभी आपको सुने देगा की विभिन्न विभिन्न राज है राज भैरवी है राज मल्हार है वगैरा जो कुछ भी है वो आपको अलग-अलग सुने देगा किंतु सितार तो एक ही है तो वैसे ही हमको चाहे आप एक वही दृष्टि से ऐसा दिखे रहा है की ईश्वर है ईश्वर का जगत है और हम है किंतु सही में ये तीनों एक ही है एक तीन एक अर्थात यह जो आगमन है या तो ब्राह्मण है उसका वह जो वही प्रकाश जो है वो तीन रूप से हमको दिखाई दे रहा है जी दिन हम जो है यह हिट में से अद्वैत में चले जाएंगे तब पता चलेगा हम ब्राह्मणी ये विश्व ब्रह्मांड कहो ना की ईश्वर कहो ना की मैं कहूं ये सब एक ही है तब जो है ये जो है डाइवर्सिटी जो है वो अदृश्य हो जाएगा और इसकी जगह रहेगा सिर्फ एक अखंड चैतन्य जिसके जो हम खुद वो अखंड चैतन्य स्वरूप है और मेरा जो अहंकार है जिसको की मैं कहता हूं यह शरीर मेरा मेरा मां मेरा बुद्धि मेरे जो मेमोरीज मेरी इंटेलेक्ट मेरा यह शरीर मेरी उपलब्धियां मेरी यह सिद्धियां ये जो सब मैंने अर्जेंट किया वो सब जो है जैसे की ठाकुर कहते हैं ना की जो ये जो नमक का पुतला नमक की गुड़िया और समुद्र की गहराई मापनी को गए अभी समुद्र में उसने जैसे ही चलांग लगे तो समुद्र तो बनाई है नमक का कोई की गुड़िया यदि वह समुद्र में जाएगी तो क्या होगा वो पिघल करके समुद्र मैं ही हो जाएगी तो वैसे मैं जिसको मैं अपना अपना कहता हूं मेरा मेरा कहता हूं ये सब जो है इस ब्रह्मा रूपी अखंड सच्चिदानंद रूपी जो ब्रह्मा समुद्र है उसके भीतर में विकल्लीत हो जाएगा पिघल जाएगा और फिर जैसे वो अष्टावक्र जो है वो गए भगवान राजा जनक के पास में आ अभी अष्टावक्र को समझ में ए गया की राजा जनक ब्रह्मज्ञानी है तो उससे हम ब्रह्मज्ञान प्राप्त करते हैं तो जनक राजा कहते हैं अच्छा मैं आपको ब्रह्म ज्ञान के बड़े में बताता हूं किंतु सबसे पहले आप गुरु दक्षिण दीजिए तो अष्टावक्र कहते हैं अरे ये ऐसा तो ठीक नहीं है अपने तो मुझे कोई शिक्षा दी नहीं मैं पहले से गुरु दक्षिण कैसे दे डन आप पहले कुछ बताएं तभी तो मैं दक्षिण डन मुझे क्या पता वो ठीक बताते हैं नहीं बताते हैं उसके अनुसार मैं दक्षिण दूंगा यदि मुझे अच्छा लगा की हां बहुत अच्छा बता दिया तो अच्छे से दक्षिण ए देंगे फिर आपने ऊपर ऊपर से बताया तो दो पांच डालकर की वहां पर चले जाएंगे हम ऐसा वो अष्टावक्र कहते हैं तो उसे समय राजा जनक क्या कहते हैं की जब ब्रह्मज्ञान होगा तब कौन गुरु कौन शिष्य ये होश नहीं रहेगा सब कुछ एकाकार हो जाएगा यदि आपको ये आपके मां में ऐसा हो गया की मैं ही गुरु हूं तो फिर मुझे दक्षिण कौन देगा इससे पहले दक्षिण निकालिए बाद में ब्रह्मा ज्ञान की बात करेंगे तो वैसे ही जब हम को ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है तब ये ये शरीर किसका है वो शरीर किसका है ये ठाकुर है यह प्रश्न चैतन्य है ये भगवान राम है यह भगवान महावीर है वो सब कुछ एकाकार हो जाता है हम ही जैसे की जितने जन्म-जन्मांतर से जितने भी संत महापुरुष अवतार गण हुए हैं उन सब की उपलब्धियां मेरे भीतर में ए जाति है यह जो भगवान बुद्ध के बड़े में है ना की जी रात को उनको निर्वाण मिलने वाला था उसे रात को आखिरी प्रहार से पहले उनके जितने कोई अगले जन्म है वह सब जनों की सभी बातें उनकी आंखों के सामने से जैसे चलचित्र प्रसार होता है वैसे उनकी आंखों के सामने से चली और एक के बाद एक सब संस्कार कैट गए और आखिर में जब आखिरी संस्कार काटा उनको निर्वाण प्रताप हो गई तो वैसे ही ये मेरे जितने भी मेमोरीज है मेरे जितने भी ये जो इंटेलेक्ट जन्मांतर से संचित किया हुए कर्म है ये मेरे चित में जो ये सब भारत हुआ वो सब एक के बाद एक कट जाएगा और फिर जो है निर्वाण रूपी महाश्रमण मुद्रा में हम प्रवेश कर जाएंगे मैं रहेगा नहीं ईश्वर ही रहेंगे से मैं नहीं तब सिर्फ तुम और मैं और तुमसे भी पैर हम ब्राह्मणी सोहन प्रज्ञानंम ब्रह्म वाक्य है उसकी हम साक्षात उपलब्धि करेंगे अभी स्वामी जी कहते हैं इन डी यूनिवर्सल मेलोडी थ्री आइडिया स्टैंड आउट फ्रीडम स्ट्रैंथ और सिमाइल्स देखिए ये जो हम जब साधना करते हैं हमको ये तीन गन जो है वो हमारे में होने ही चाहिए हमें ये फ्रीडम होना चाहिए की मैं अपने मां से जो कुछ भी साधना के बड़े में सोचता हूं मैं वो मेरे ऊपर में कितने ही चाहे ऑब्लिगेशन क्यों ना हो मैं जो है मैं जी तरह से मैंने सोचा है की मैं त्याग करूंगा और त्याग करके मेरे साथ ना करूंगा भले ही चाहे मेरे पे कितने ही पुरुषार्थ जो है धर्म अर्थ कम ये पुरुषार्थ जो है उसको त्याग करके जो मोक्ष मार्ग है मोक्ष मार्ग को मैं अपनाऊंगा यह जो है मेरा फ्रीडम है यानी की करेज जितना ही चाहे रास्ते में निराशा आई जाए 10 दिन मैंने ध्यान किया तो मुझे बहुत अच्छा लगा मुझे लगा की अभी मैं एक लेवल पे पहुंच गया हूं अभी जितने दिन भी ध्यान करूंगा पहले जैसा मुझे बहुत ही सुंदर एक अनुभूति होती थी हमेशा ऐसी होगी ऐसा मैं सोच कर के 11वें दिन ध्यान करने को बैठा और इतना उसे समय मां में निराशा ए गई हताशा ए गई थोड़ा सा भी मां को मैं केंद्रित नहीं कर का रहा हूं 10 तरह के वो टेंशन 10 तरह की चीज ए करके मेरे मां में बैठ गए हैं तो मुझे लगेगा अरे मैंने 10 दिन ध्यान किया ऐसा इतना अच्छा अनुभव हुआ अभी 11वीं दिन क्यों ऐसा हो रहा है चलो छोड़ो इस पुरी चीज को नहीं करना है ध्यान ऐसा करके मैंने छोड़ दिया तो वो नहीं ये जो ट्रेन जो है हमने वो स्ट्रैंथ रहनी चाहिए की वो जैसे वो जो ठाकुर कहते हैं ना की खानदानी वह किसान मैन वो ऐसा किसान की वो काल हो ना की दृष्टि हो ना की वो सुख पड़ा हो कुछ भी हो अतिवृष्टि हो कुछ भी हो वो खेती करता जाएगा वो ये नहीं सोचेगा की मैं अगर आज ने आज मेरे पे कृपा की है या नहीं की है यह बहुत ज्यादा कृपा करके बहुत ज्यादा पानी ला दिया है खानदानी किसान जो है उसका कम की है खेती करना वो बारिश गियर ना गियर तो वैसे ही हमको वो जो है वो खानदानी वो ध्यान करने वाला हो जाना है की वो हमको आज अच्छा अनुभव हो या ना हो हम जो है ध्यान करते ही जाएंगे भले ही चाहे उसे दिन ठाकुर की कृपा होकर के हमारे हृदय में कुछ खुशी प्रसन्नता आनंद के कुछ अनुभूति हमको दे दे या दूसरे दिन जो है निराशा और हताशा दे दे डिस्ट्रक्शन और डिस्पर दे दे भले जैसी ठाकुर की इच्छा किंतु मेरा जो कार्य है मैं निष्ठापूर्वक उसको करता जाऊंगा तो ये जब हम सोचते हैं वो हो या हमारा स्ट्रैंथ और सेमनेस क्या है जो विश्व ब्रह्मांड में जो कुछ भी है मैन आप ब्रह्म स्तंभ पर जनता संस्कृत में कहते हैं ब्रह्मा से लेकर के घास का एक तिनका भी जो है सबके भीतर में वही ब्राह्मण विराजमान है वह सब कुछ वही मां की है बोलकर के सबको एक दृष्टि से देखना ये जो शंकराचार्य का था ना उसे नान करके वो बाहर आएगा नदी के तट पर खड़े हैं एक चांडाल ने उनको ऊ लिया अभी शंकराचार्य उन्होंने इतनी ब्रह्मा विद्या के बड़े में वो जो है प्रस्थानित के ऊपर में उन्होंने टीका भाषण लिख दिए हैं खुद को ब्रह्मज्ञान प्रताप हुई है फिर भी जब चांडाल ने उनको ऊ लिया तो उनका बड़ा गुस्सा ए गया अरे तुमने मुझे ऊ लिया तुमको शर्म नहीं आई मैं आचार्य ब्राह्मण हूं अभी मैंने स्नान किया है अभी मुझे फिर से स्नान करना पड़ेगा तो वो चांडाल क्या कहता है की मेरे भीतर में जो आगमन है वही आपके भीतर में है तो फिर वो आपका वो विद्या आपका ये जो मैंने इंटेल अपने जो डिबेट करके इतने लोगों को हराया की हां ब्रह्मज्ञान की स्थापना करेंगे भारत में वो सब कहां चला गया मुझे छूकर के तो सुद्दनली शंकराचार्य को अकाल ए गया उनकी अकल ठिकाने ए गई की अरे हां मैं जो बोलना हूं उसका वास्तव में प्रैक्टिकल तो यही है है तो उसे दिन से उनकी वह जो मैंने कहता है ना की वो ब्राह्मण की तो वह जो एक रहती है की मैंने सूची बाई मंगलाते बोले मैन एक अचार निष्ठा वह जो है वो चली गई अब ये सनी है की आचार्य रिश्ता चली जानी चाहिए अच्छा निष्ठरे नहीं चाहिए जो बांग्ला में कहते हैं गोंडा में अर्थात की और थोड़े से या तो फिर ये बहुत ही ज्यादा बाढ़ चढ़कर के जो हम जो पालनपुर करते हैं वो चले जाना चाहिए अभी स्वामी जी इतने लिबरल थे स्वामी जी इतने उधर थे और प्रभु रजक थे जा रहे थे कहानी पे देखा एक रास्ते के किनारे पे एक आदमी बैठ करके हुक्का पी रहा है तो स्वामी जी का तो ऐसा ही था हुक्का पीने का बड़ा शौकीन तो बाद पास में जाकर के बैठ गया बोला मुझे भी दो मैं भी पिता हूं तो वो आदमी जो था हुक्का पी रहा था उसने देखा की ये तो सन्यासी है चेहरे पे तेज है अच्छे घर से आए होंगे तो उसने बड़ा संकुचित होकर के कहा की अरे भाई मैं तो हूं आप कैसे कैसे पियेंगे वो तो स्वामी जी कहते हैं अच्छा ठीक है ठीक है चलने लगे थोड़ी डर तक स्वयं श्री रामकृष्ण का प्रधान शिष्य मेरा तो जन्म ही हुआ है ये जो है जो वेदांत के जो ये जो टीचिंग्स है उसको पूरे संसार में वो ले आने के लिए स्वामी जी ने कहा ना की जंगल में से वन के वेदांत को जो है किसान की झोपड़ी में लेकर जाना है विद्यार्थी के वो जो क्लास रूम है उसमें लेक जाना है गुरुवाणी का वो जो किचन है उसमें लेकर जाना है वन के वेदांत को वो मैं और फिर यहां पे की चिलम में वो हुक्का नहीं पी सकता तो वो वापस गए और उसे जोर से उसके हाथ से छन करके वो हुक्का पीना शुरू कर दिया तो ये जो है की हमको कभी कभी ऐसा मां में हो जाता है जो सर वो श्रेष्ठ जो क्यों ना हो हम लोगों में से ये लोग भी ऐसा सोचना शुरू कर देते हैं की आई एम बटर दें आदर्श तो यह जो मैं दूसरों से ज्यादा अच्छा हूं या बटर हूं हम लोगों में भी यह जो सोशल सिचुएशन में हम लोग सोचते हैं मेरा ये रिलेटिव है उसके पास में कम पैसा है मेरा यह रिलेटिव उसके पास में ज्यादा पैसा है तो कम पैसे वालों के साथ में मैं नहीं बात करूंगा या तो फिर उसको है की उसकी अवधारणा करके या अभिमान ना करके उसको भाग दूंगा और जिसके पास में ज्यादा पैसा है उसके पास जाकर के बढ़िया से गैप लगाऊंगा तो ये हमारे ह्यूमन नेचर ही है की जिसके पास में जिसको सोशल कैपिटल कहते हैं ना ये आप तो फिर प्रेस्टीज कहो ना की धन संपत्ति को जिसके पास ज्यादा सोशल कैपिटल राहत है उसके पास में हम लोग नेचरली अट्रैक्ट होते हैं और जिसके पास में कम सोशल कैपिटल राहत है जो की समाज में वो दलित थे पिछड़ी हुए हैं पद दलित पिछड़ी हुए हैं जिनका की जो है की ये राइट्स जो है उनके हक हनान किया गए हैं या तो गरीब है या तो फिर किसी भी तरह से कुछ विचित्र दिमाग वाले होते हैं जिनका की सोशल कैपिटल कम होता है हम उनको अवॉइड करते हैं तो हमारा हृदय इतना उदार होना चाहिए की सबको हम एक दृष्टि से देखें फिर ये नहीं है की आपको सबके ने जाकर के वह बात करना ही है वह जो बाबूराम महाराज की मां जो थी मातंगिनी देवी ठाकुर के पास जाकर के एक दिन बोलती है की मुझे क्या हो गया है मैं अभी जो है सभी का खाना नहीं का शक्ति वो वैष्णव थी ना वैष्णव लोगों का है की किसका खाना का सकते हैं किसका खाना नहीं का सकते तो ठाकुर ने कहा अरे जी देश का खाना खाने से ही क्या हमारा हमको ईश्वर प्रताप हो गई ये सब चीजों में ज्यादा ध्यान मत दो पहले ईश्वर प्रताप करने के बड़े में सोचो फिर किसका खाना का सकते हैं नहीं का सकते वो बाद में देखा है ठाकुर का खुद का है की वो ब्राह्मण होगा जो खाना बनाएगी तभी उसका वो खाना का पाएंगे अर्थात अब व्यवहार जो है वो किसके साथ ऐसा करना चाहिए वो कीजिए किंतु जो अंतर्दृष्टि है किसको किस दृष्टि से देखना वो अलग है मैं सबको समाज दृष्टि से ही देखूंगा फिर चाहे व्यवहार में मुझे किस तरह का व्यवहार करना पड़े वह एक अलग बात हो गई किंतु अंतर्दृष्टि मेरी सबके प्रति भगवान रहेगी तो यह सड़क के तीन गन होने चाहिए फ्रीडम स्ट्रैंथ और ये फ्रीडम होना चाहिए की मैं मेरे सर के ऊपर में जितने भी डेल हुए जो रिस्पांसिबिलिटी टेस्ट ब्यूटी है उसको मैं तोड़कर के इस ड्यूटीज की झंझार को तोड़ करके मैं साधना करने के लिए मुक्त हो पाव यह मेरा फ्रीडम होना चाहिए स्ट्रैंथ हनी चाहिए की आज सुख पड़ा ना की आज वृष्टि हुई आज बारिश हुई आज मेरे हृदय में आनंद उत्पन्न हुआ की आज मेरे हृदय में निराशा उत्पन्न हुई मैं एक समाज रूप से साधना करता जाऊंगा ये मेरे पास स्ट्रैंथ हनी चाहिए और से ने कोई भी हो चांडाल भी हो एन की वो राजा भी हो ना की ब्राह्मण हो सबको मैं एक दृष्टि से देखूं ये तीन गन होने से साधना जो है हम बड़े ही अच्छी तरह से कर पाएंगे