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Swami Vivekananda's Macrocosm & Microcosm ·

ज्ञान योग स्वामी विवेकानन्द Cosmos Macrocosm 4 Dec 2023

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ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः अभी दो दिन छुट्टी था वीकेंड में तो मैं कभी-कभी ऐसा सोचता था कि यह जो मंडे से जो हम क्लास स्टार्ट करेंगे तो उसमें मुझे क्या बोलना है या कैसे वैसे जनरली मेरा ऐसा अ ऐसा है कि मैं कभी भी कुछ भी बोलना है मुझे क्लास या स्पीच तो मैंने कंसिस्टेंटली देखा है कि मैं जद प्रिपरेशन करता हूं किसी चीज के बारे में यह सोच करके कि हां मैं यह बोलूंगा या तो फिर मैं यह पार्टिकुलर स्टोरी बताऊंगा यह पार्टिकुलर पॉइंट रखूंगा तो मैं हमेशा देखा है कि वह एक बार सोच करके बोलने से ना मेरा वो एक नेचुरल फ्लो नहीं आता एक नेचुरल वह प्रेजेंटेशन नहीं होता ऐसा लगता है इवन आपको भी फील होगा कि एक आर्टिफिशियल हो रहा है जैसे कि मैं मेमोराइज करके वह तोता कैसे रट देता है मां के पास में एक तोता था गंगाराम बोल कर के तो मां बीच-बीच में उसको बोलती थी बेटा गंगाराम बोलो तो सीताराम सीताराम तो सीताराम सीताराम बोलता और फिर फिर जब उसको भूख लगती तोते को तो मां ओ मां ऐसा करके पुकारता तो मां बोलती कि अच्छा बेटा मैं आ रही हूं आ रही हूं फिर उसको जाकर के कुछ खाना खिलाती तो ऐसा तोते के रटने जैसा हो जाता है ऐसा मैंने पार्टिकुलरली देखा है मेरे साथ में तो मैं हमेशा जब भी क्लास लेना है या कभी स्पीच देनी है अपने माइंड को फ्री रखता हूं मैं सोचता हूं कि अरे पूरा लाइफ तो यह सब सब्जेक्ट का स्टडी किया है अभी जदी बोलने की बारी आ गई तो फिर वो लास्ट मिनट वो क्रेम करके व मैं ठीक से उसको नहीं बोल पाऊंगा बेटर है कि जो मुंह में आए जो नेचुरल फ्लो है तो वही बोलो तो मैं यह सब सोच रहा था किंतु साथ-साथ में ही मैंने एक दूसरी बात भी देखी कि देखिए कि जब कोई भी टीचर सिर्फ मैं नहीं जब वह क्लास लेता है खास करके मैं रिलीजियस टीचर की बात कर रहा हूं तो वह सिर्फ जिस टेक्स्ट के ऊपर में क्लास ले रहा है या तो फिर जो पॉइंट्स फिलोसॉफिकल पॉइंट्स वो जो बता रहा है क्लास सिर्फ उसी के बारे में नहीं होता क्लास जो है ये हमारा जीवन जो है हमारी वाणी से भी ज्यादा हमारा जो थिंकिंग हमारा जीवन है व एक सबसे ज्यादा दैट इज व्हाट कम्स गोज अक्रॉस टू यू दोस कि हमारा जो जीवन है वो सबसे ज्यादा दिखाई देता है वो सबसे ज्यादा उसका आवाज उसकी वाणी सबसे ज्यादा हमारी जीवन की होती है जैसे फॉर एग्जांपल मैं बताता हूं कि यहां पर ऐसा होता है कि आश्रम में हम लोग रहते हैं इतने सारे लोग और मेरा नेचर क्या है कि बहुत ही ज्यादा इंट्रोवर्ट है मेरे से यह पॉसिबल नहीं कि जो भी कन्वर्सेशन होती है उसमें मैं पार्टिसिपेट करूं ऐसा कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है कि अरे इसमें बोलने योग्य या तो इसमें पार्टिसिपेशन करने योग्य कुछ है नहीं क्या ये लोग बेकार की बातें करते हैं ऐसा भी एक कभी-कभी एक एटीट्यूड होता है मेरा और दूसरा है कि इंट्रोवर्टनेस इट सेल्फ इज द पार्ट ऑफ माय लाइफ तो अभी इंट्रोवर्ट होकर के जब य आप बहुत सारे एक्सट्रोवर्ट लोगों के बीच में रहते हैं तो आपके लिए ना कभी-कभी एक टॉर्चर जैसा हो जाता है आपको ऐसा लगता है कि सामने वाले लोग ग्रुप बना करके आपको इग्नोर कर रहे हैं या तो फिर आपके पीछे वह आपके आपकी निंदा फैला रहे हैं ऐसा आपको बार-बार होना लगना शुरू हो जाएगा अभी यह सही भी हो सकता है गलत भी हो सकता है किंतु जिसके विचार अपने मन में ही घूमते रहते हो सब समय कि अच्छा यह लोग मेरे बारे में क्या कहते हैं अच्छा वह मेरे बारे में क्या कहता है तो ये जो इंट्रोवर्टनेस है जो खुल कर के अपनी बात लोगों के सामने नहीं रख पाना एक बड़ा ही डेंजरस चीज है जो लोग इंट्रोवर्ट होते हैं वह लोग जदी अपनी एनर्जीस को ठीक ठीक चैनेलाइज करें तो वे लोग बहुत कुछ अपनी लाइफ में कर पाएंगे ये साइंटिस्ट है जितने भी ग्रेट साइंटिस्ट लोगों को आप देखिए उन सबका एक इंट्रोवर्ट नेचर रहता है उनको ऐसा लगता है कि यह उसके कलीग्स जो है उसके फ्रेंड्स जो है व कभी बेसबॉल ना कि क्रिकेट ना कि ऐसा कुछ खेलने के लिए जा रहे हैं या तो फिर इकट्ठा होकर के कहीं पर पार्टी मनाने के लिए जा रहे हैं तो मुझे यह सब पार्टिसिपेशन में यह सब एक्टिविटीज में पार्टिसिपेट नहीं करना या तो मैं अपने घर में रहूंगा कुछ पढ़ाई लिखाई करूंगा गा या तो फिर कुछ हायर थिंकिंग करूंगा हायर थिंकिंग सब समय होता नहीं है किंतु हम लोग मान लेते हैं कि हम लोग हायर थिंकिंग करते हैं तो इसी में से जब यू आर सेपरेटेड फ्रॉम योर सोशल एक्टिविटी सोशल लाइफ एंड योर आपके विचार आपके मन में ही सब समय घूमते रहते हो तब उसमें से कहीं जाकर के यह जितने भी ग्रेट साइंटिस्ट के जितने भी ब्रेकथ्रू हुए हैं व सब इसी में से हुए हैं तो एक और इंट्रोवर्ट होना बहुत अच्छी बात है कि यू कैन कंट्रीब्यूट समथिंग ग्रेट टू द सोसाइटी किंतु ज्यादातर लोग जो इंट्रोवर्ट होते हैं उन लोगों के साथ में यही होता है बेचार के साथ में कि वह सब समय या तो दूसरों के प्रति उनके मन में जहर भर जाएगा व सब समय सोचते रहेंगे कि अरे यह ऐसा कर रहा है वह ऐसा कर रहा है यह ऐसा कर रहा है निंद निंदा की दृष्टि एक अपने मन में आ जाएगी सबके प्रति एक निंदा होनी शुरू हो जाएगी कि आई एम बेटर देन अदर्स ऐसा एक सुपीरियोर का एक भाव भी आ जाएगा जितना ही इंट्रोवर्टनेस बढ़ती है इतना ही यदि इसको समझ करके चैनेलाइज ना किया जाए तो एक साथ-साथ में सुपीरियोर का भाव आता है सब समय ऐसे लोग सोचना शुरू करते हैं कि अरे मैं इतना प्योर लाइफ है मेरा और बाकी लोगों का देखो किस तरह से टाइम वेस्ट कर रहे हैं मैं हम लोग ट्रेनिंग सेंटर में जाते हैं तो हमारे एक सीनियर साधु हम सबको बुला कर के बात करते थे कि इंटरव्यू लेते थे हमारा तो वहां पर क्या है कि जो हमारा ट्रेनिंग सेंटर था उसके पीछे एक छोटा सा गार्डन था तो सुबह को मंगलारती के बाद में 5:30 के आसपास में वहां पर वॉकिंग करते-करते वह हमको पूछेंगे कि अच्छा बताओ तुम जिस सेंटर में से आ रहे हो वहां पर तुम्हारा क्या ड्यूटी था तुम क्या कर रहे थे तुम्हारे जो साधू थे साधु भाई जिनके साथ में तुम रहते थे उन के साथ में तुम्हारा एटीट्यूड कैसा था तुमको जो ड्यूटी मिली थी वह करने में तुमको अच्छा लगा कि नहीं लगा क्योंकि क्या है यह सब बेसिक क्वेश्चन है साधु जीवन के लिए मोनेस्ट्री मुझे लोगों के साथ में मिलकर के काम करने की कैपेसिटी ना हो ना अच्छा लगे या तो फिर मुझे जो ड्यूटी दिया जाता है जो काम दिया जाता है वह करना मुझे अच्छा ना लगे तो फिर तो संघ में कैसे रहेंगे तो ऐसा एक फ्रेंडली एक भाव से हमको प्रश्न करते थे तो व सब वो मुझे भी एक दिन बुलाया मैंने उनको महाराज को बात-बात में कहा महाराज जी मैंने ट्राई किया है कि मैं जितना भी समय हो पाए पढ़ाई लिखाई करके रहूं मेरा मंदिर में ड्यूटी था तो जैसे ही मैं मंदिर से वापस अपने रूम में आ जाता था मैं और कहीं नहीं जाता था और किसी एक्टिविटी में पार्टिसिपेट नहीं करता था सीधा रूम में आकर के पढ़ाई लिखाई स्टार्ट कर देता था क्योंकि क्या है मुझे पता है मुझे ट्रेनिंग सेंटर में जाना है तो ट्रेनिंग ट्रनिंग सेंटर में जाने से पहले बहुत सारी किताबें पढ़नी होती है तो मैं सब किताबें पढ़ूं और जाकर के ट्रेनिंग सेंटर में एक अच्छा मेरा परफॉर्मेंस हो ऐसा मैं अपने को करने का प्रयत्न किया है तो जैसे ही मैंने ऐसा कहा वो सीनियर सन्यासी उन्होंने इमीडिएट कहा देखो कि तुम ऐसा करोगे ना तो तुम्हारे भीतर में एक सुपीरियोर का भाव आ जाएगा दूसरों के प्रति दोष दृष्टि आ जाएगी दूसरे लोग गलत कर रहे हैं मैं मैं अच्छा हूं मैं बेटर हूं ऐसा तुम्हारे मन में यह बात प्रकट होगी तो तुम इस बात से साव चत रहना सावधान रहना तो मैं सोच रहा हूं कि उस समय तो मैं बिल्कुल नया था ट्रेनिंग सेंटर जाना यानी दो-तीन साल के बाद में ही हम लोगों का जाना होता है तो मैं सोच रहा हूं कि अरे हम लोग तो ठाकुर महा स्वामी जी को इतना पढ़े हैं ठाकुर को देखा है कि कालीवाड़ा किसी के साथ बात करते थे या ऐसा उनका ऐसा कोई खास रिलेशन था ठाकुर खुद वो कहते हैं जब नरेन वगैरह आए तो ठाकुर कहते हैं किय संसारी लोगों के साथ में बात करते-करते उनकी बात सुनते सुनते मेरे कान जल गए तो जो उनके मन के अनुरूप साधना ईश्वर भक्ति यह सब जिनके भीतर में हो उन्हीं के साथ में तो यह सब एक सोशल इंटरेक्शन होता है उन्हीं के साथ में तो आप वार्तालाप कर पाएंगे सब किसी के साथ में बातें करना यह तो साधु लोगों के लिए ठीक नहीं है तो ऐसा मैं उस समय सोचता था किंतु उस बात को आज ऑलमोस्ट 20 इयर्स होने को आए हैं 15 18 इयर्स होने को आए हैं कि वो ट्रेनिंग सेंटर में उन महाराज स्वामी जी के साथ में मेरी बात हुई थी और आज मुझे लगता है कि उन्होंने जो कहा वह बहुत हद तक सही है हम लोग मेरा बिकॉज कि मेरा इंट्रोवर्ट नेचर है मैं जहां पर भी गया हूं जिसी भी आश्रम में जिसी भी कार्य में मैं रहा हूं मैंने देखा है कि दूसरे लोग जब जो लोग एक्सट्रोवर्ट होते हैं तो वो लोग सब समय कुछ ना कुछ बातें करते रहते हैं या तो फिर वह साथ में मिलकर के कहीं पर घूमने के लिए जाते हैं तीर्थ यात्रा के जाते हैं कुछ भी करते हैं तो आई फील दैट के आई एम एक्सक्लूडेड फ्रॉम ऑल दिस एक्टिविटीज और जब यह मेरे मन में आता है तब मेरे मन में साथ में यह भी आता है कि हां वे लोग यह सब करेंगे क्यों क्योंकि उन लोगों में तो ना ही स्टडी करने की कैपेसिटी है ना ही मेडिटेशन करने की कैपेसिटी ना ही उन लोगों के पास में कोई फिलोसॉफिकल थिंकिंग करने की कैपेसिटी तो यह सब करते घूमे उससे मुझे क्या है तो मैं यह देखा है मेरे में कि बार-बार जब भी मुझे ऐसा लगता है कि दूसरों के प्रति द्वेष भाव आने की शुरुआत हो साथ-साथ में ही मेरे मन में एक सुपीरियोर का भाव आने की शुरुआत हो जाती है तो अब मैं यह सोचता हूं कि हमको तो यहां पर आकर के ठाकुर के पास में आकर के शरणागति स्वीकार करनी है अपना अहंकार जो है उसको तो संपूर्ण रूप से उसका बलिदान देना है तो अभी ये बलिदान अहंकार का देने के लिए मैं ये सब किताबें पढ़ रहा हूं अहंकार मेरा संपूर्ण रूप से विनाश हो जाए इसके लिए तो मैं जो भी है ठाकुर को पुकारना जितना भी अपने जीवन को संयम में रखना जितना भी तपस्या कर सकूं वो करना यह सब करता हूं और फिर यह तपस्या का ही यदि अहंकार आ जाए तो हम कहां जाएंगे तो यह बात ये मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि ये जो पिछले दो दिन गए यह दो दिन में मुझे ऐसा लगा कुछ लोगों के प्रति कि उनके प्रति मेरे मन में थोड़ा सा द्वेष भाव प्रकट हुआ और मैं सतत यह सोच रहा हूं कि अभी यह जो उनके प्रति द्वेष भाव प्रकट हो रहा है और साथ-साथ में ही एक अहंकार का भाव आ रहा है कि अरे मैं तो इतना इंटेलेक्चुअल हूं मैं इतने अच्छे आर्टिकल्स लिखता हूं मैं इतनी सारी किताबें पब्लिश करता हूं और वे लोग क्या करते हैं उन लोगों का तो कुछ वैसे काम नहीं है तो यह अहंकार साथ-साथ में आई हैव स्ट्रगल फॉर टू डेज लास्ट टू डेज आई हैव स्ट्रगल विद दिस थॉट पिछले दो दिन मैंने इस आइडियाज के साथ में स्ट्रगल किया और मैं साथ में यह भी सोचता था कि देखिए मैं जब मंडे मॉर्निंग को मुझे क्लास लेना है तो बात यह सिर्फ नहीं है कि मुझे स्वामी जी ने जो कहा है या स्वामी जी की किताब में जो लिखा है उसको एक्सप्लेन करना है मेरा ये जो लाइफ है वो लाइफ भी अपनी उसकी भी एक वाणी है जदिया मेरे मन में मैं झांक करके देख ना पाऊं एक मैं सेल्फ एनालिसिस ना कर पाऊं तो फिर मेरा मन जो है ना या तो फिर मेरा लाइफ वो मेरे शब्द एक चीज कहेंगे मेरी लाइफ एक दूसरी चीज कहेगी बहुत बार हम सोचते हैं कि हम लोग हमारा हमारे विचार हमारा जीवन हमारी लाइफस्टाइल वो चाहे कैसा भी हो हम लोग जब कुछ सिखाएंगे या जब कुछ बोलेंगे तो यह दोनों अलग-अलग चलेंगे ऐसा शायद फिजिक्स या केमिस्ट्री या मैथमेटिक्स या लैंग्वेजेस में ऐसा हो सकता है कि मैथमेटिक्स के टीचर है उसका चरित्र चाहे कैसा भी हो किंतु वो बहुत अच्छे से मैथमेटिक्स सिखा सकते हैं और ऐसे एग्जांपल भी है बहुत सारे कि इ अ ग्रेट टीचर उसका लाइफ इतना लाउज था इतना मतलब वह भ्रष्टाचारी था अपने पर्सनल लाइफ में किंतु वह जब क्लास लेता था बहुत सारे लोग इकट्ठा हो जाते थे तो ऐसे भी एग्जांपल हमारे सामने दिखते हैं किंतु यह जो धार्मिक शिक्षा है या तो फिर धार्मिक विचार है यहां पर जीवन और विचार एक दूसरे के साथ में बहुत ही क्लोजल वो साथ-साथ में चलते हैं पैरेलल चलते हैं वो और यदि जीवन एक तरह का रहेगा और वाणी या तो फिर विचार या तो फिर यह शिक्षा जो देता हूं वह अलग तरह के की रहेगी तो वो तमीडिया भले चाहे कॉन्शियसली आपको ना दिखाई दे किंतु सबकॉन्शियसली यह दिखाई देगा ही देगा तो मैं यह भी साथ में सोचता था कि यदि मैं दूसरों के प्रति ऐसा सोचता हूं कि अरे यह कुछ काम नहीं कर रहा या तो यह ऐसा कर रहा है तो इससे मुझे यह साव चत रहना है कि कहीं मेरे मन के भीतर में एक अहंकार ना प्रकट हो जाए एक चीज दूसरा कि अभी देखिए कि वोह जो एक एक कहानी है ना कि एक मुसलमान फकीर था तो उसके मन में एक दिन काम भाव जागृत हुआ और किसी एक स्त्री के घर वह चला गया शाम को तो उसके साथ में बैठा है किंतु उसका ये जो फकीर था उसका एक नियम था कि संध्या के समय एक पार्टिकुलर समय पर जाकर वो एक मजार थी वहां पर वह दिया प्रकट आएगा ऐसा उसने उसका नियम था और उसने इस नियम में कभी भंग नहीं किया तो अभी वो एक स्त्री के साथ में बैठा है एकाएक उसको याद आया कि अरे यह तो दिया प्रगनेंसी नहीं किंतु साथ में ही उसका जो कमिटमेंट था उसका एक जो प्रॉमिस था कि हां मुझे इस समय दिया जलाना ही है तो फिर उसने कहा कि चलो मैं एक बार दिया जला कर के वापस आता हूं तो ऐसा करके वो वहां से निकला और जैसे दिया जलाया वैसे ही उसको लाइट हुआ उसके मन में भी कि अरे मैं एक किस तरह का पाप करने कर रहा था किस तरह का पाप में करने वाला था तो देखिए कि यह जो उसका एक कमिटमेंट था उसने उसको पाप करते हुए रोका तो मैं यह दो दिन स्ट्रगल कर रहा था कि मेरे मन में अहंकार ना आ जाए मेरे मन में दूसरों के प्रति द्वेष भाव ना आ जाए मैं अपने मन को इतना हंबल रखूं कि जब भी किसी के साथ में झगड़ा होता है या तो किसी के साथ में नाराजगी होती है तो मैं अपने दोष देखूं दूसरों के दोष ना देखूं क्योंकि मैं तो साधु होने के लिए आया जद मैं उनके साथ में झगड़ा करके मैं प्रूव कर सकता हूं कि आई एम बेटर देन यू और आई एम राइट एंड यू आर रंग तो ठीक है मैं वहां पर तो सही हो गया माने उसको कहते हैं ना कि आई वन द बैटल बट लॉस्ट द वॉर इंग्लिश में ऐसा कहा जाता है कि मैंने एक वो जो किसी के साथ में यदि वो मारपीट होती थी तो वो तो उसमें तो मैं जीत गया किंतु एक जीवन का एक पूरा संग्राम है वो संग्राम में हार गया क्यों क्योंकि जीवन का संग्राम तो है ईश्वर को प्राप्त करना अभी दूसरों के साथ में झगड़ा करके या तो दूसरों के साथ में आर्गुमेंट करके या तो फिर दूसरों को ऐसा करके कि आई एम बेटर देन यू आई एम मोर राइट एंड यू आर रंग आई एम सुपीरियर देन यू तो वो वो झगड़ा तो मैं जीत जाऊंगा किंतु ये जीवन का संग्राम जो है वो मैं हार जाऊंगा तो ये दो दिन मैंने सही सही स्ट्रगल किया है क्योंकि एक ऐसा कुछ हुआ है जो कि मेरे मन को उसने बहुत विचलित कर दिया साथ में रहते तो ऐसा होने ही वाला है तो मैं जितना संग्राम कर रहा हूं और जितने ही यह नेगेटिव आइडियाज मेरे मन पे आ रहे हैं अरे नहीं वही गलत है वही गलत काम कर रहा है या तो उसी का गलती है तो मैं ये संग्राम में मैं ये एक मेरे मन में था कि नहीं मंडे मॉर्निंग को मुझे क्लास लेना है तो जब मैं क्लास ले रहा हूं तो फिर देखिए कि मैं सिर्फ स्वामी जी के बारे में बोलूंगा उससे नहीं चलेगा मेरा जो लाइफ है उसकी भी एक वाणी है यह वाणी भी लोगों को सुनाई देगी और यदि वह वाणी और एक बात कह रही है और मैं अपने मुंह से दूसरी बात कह रहा हूं तो यह दोनों का जो डायवर्जेंस है वह शायद आपको कॉन्शियसली ना दिखाई दे किंतु सबकॉन्शियसली अवश्य दिखाई देगा तो ये उस फकीर की तरह यह जो आईडिया है मंडे मॉर्निंग क्लास का इट सेव्ड मी सही सही में उसने मुझे बचा लिया ऐसा नहीं है कि मैं अपने नेगेटिव विचार से संपूर्ण रूप से मुक्त हो गया हूं किंतु आई एम प्राउड यह मतलब एक गर्व मुझे हुआ कि नहीं कि अल्टीमेटली मैंने इस सोच करके किसी भी तरह से अपने नेगेटिव विचारों को मैंने काबू में किया उसको कंट्रोल में किया अभी हालांकि एक दूसरा डेंजर प्रकट हो सकता है कि यह जो गर्व है उसका कहीं अहंकार ना हो जाए यह अहंकार एक ऐसा चीज है कि आप क्या करेंगे बहुत ज्यादा जब ध्यान करते हैं तो उसका भी अहंकार आ जाता है यह गर्व होगा कि हां मैंने अपने मन को कंट्रोल में कर लिया तो उसका भी एक अहंकार आ जाता है यह अहंकार कितना ही वह जो एक पेड़ है उसको आप कितना ही काटते रहे वह कहीं ना कहीं से उसकी नई नई वो जो पत्ते नई नई डालिया वो निकलती ही रहेगी तो पता नहीं कितने जन्म जन्मांतर जाएंगे तब कहीं यह अहंकार जाएगा फिर जितनी भी बार यह अहंकार को समाप्त करने के लिए कोई भी साधना करेंगे फिर उसका अहंकार खड़ा होगा यानी कि शरणागति के अलावा और कोई उपाय नहीं है पुरुषार्थ और परमार्थ हम चाहे कितना ही पुरुषार्थ कर ले कितनी ही साधनाएं कर ले जब तक ईश्वर का ठाकुर का आशीर्वाद नहीं मिलता यह आखिरी जो अहंकार है सोने की चैन ठाकुर कहते थे कि तमस की एक मने एक लोहे की चैन होती है एक सोने की चैन होती है सात्विक वो बंधन तो वो आखिरी सात्विक बंधन भी जब तक नहीं टूटता तब तक वह ईश्वर प्राप्ति नहीं होगी किंतु वह सात्विक बंधन तोड़ना वह ईश्वर के ही हाथ में है वह अपने हाथ में नहीं है हम लोग ज्यादा से ज्यादा लोहे की जो कड़िया है उसको हम सोने की कड़ियों में बदल सकते हैं किंतु सोने की कड़ियों को तोड़ना यह सिर्फ ठाकुर के ही हाथ में है तो जो भी है मैंने सोचा कि मैं ये शेयर करूं क्योंकि कभी-कभी क्या होता है कि कि ये सब शेयर करने से भी हमको एक बल प्राप्त होता है हमको एक क्या कहेंगे कि फर्द फाइट करने में हमको एक इनकरेजमेंट मिलता है भले ही चाहे लोगों को ऐसा लगे कि अरे इसके मन में अभी भी इस तरह के विकृत विचार या तो इसके मन में अभी भी इस तरह के एक नेगेटिव विचार चलते रहते हैं तो मैं कभी-कभी सोचता हूं भले लोग जाने भले ही लोगों को पता चले कि मुझे ऐसा कंटीन्यूअस संघर्ष करना पड़ रहा है किंतु ऐसा शेयर करके क्योंकि हम लोग तो एक साधक है ना हमारा तो एक साधक लोगों का ग्रुप है हम सभी लोग साधना करते हैं तो साधना करते-करते जो संघर्ष होता है इसके बारे में हम लोग आपस में चर्चा नहीं करेंगे तो ऐसा वो कोई सामान्य लोगों के साथ में थोड़ी ना जाकर के यह सब चर्चा करने वाले हैं उन लोगों को तो पता ही नहीं चलेगा कुछ कि ये मन के भीतर में किस तरह के कंटिन्यू संघर्ष चलते रहते हैं लोग सोचेंगे अरे यह तो स्वामी जी है अपनी कुर्सी पर बैठे हैं काम कर रहे हैं मंदिर में जाते हैं रूम में जाते हैं उनको तो सामने से इतना ही दिखेगा भीतर में क्या स्ट्रगल चल रही है वह किसी को पता नहीं चलता और बेटर है कि इसको शेयर करें जिससे कि हम एक दूसरे से कुछ ना कुछ सीख पाए तो स्वामी जी का कॉस्मस द मैक्रो कजम यहां पर हमने पिछली बार स्वामी जी का एक बहुत ही सुंदर पैसेज देखा जहां पर कहते हैं कि मतलब जो प्योर अद्वैद एक्सप्रेशन पोएट्री इन वर्स कविता को गद में प्रकाशित स्वामी जी ने यहां पर किया है इतना सुंदर रूप से अद्वैत वेदांत के आइडियाज उन्होंने इंग्लिश लैंग्वेज में उन्होंने प्रकट किए हैं क् इंग्लिश लैंग्वेज इट सेल्फ की क्या है ना कि आप देखेंगे कि मटेरियल िक लैंग्वेज है उस मटेरियल लैंग्वेज में ये संस्कृत इज अ स्पिरिचुअल लैंग्वेज तो संस्कृत के हाईएस्ट आइडियाज को आप इंग्लिश में ट्रांसलेट करना वो एक मतलब ट्रांसलेशन शाब्दिक हो जाएगा किंतु वो शाब्दिक ट्रांसलेशन में फिर प्राण संचार करना वह फिर इतना इजी नहीं होता है क्योंकि यह संस्कृत भाषा कैसे हुई प्रगट कि हमारे ऋषि मुनियों ने साधना की तपस्या की और फिर उन्होंने जो मंत्र देखे अपनी सुपर कॉन्शियस स्टेट में उस मंत्रों को आखिर में उन्होंने लिपिबद्ध किया और शुरू में तो लिपिबद्ध भी नहीं थे यह तो ओरल ट्रेडिशनल अपने शिष्यों के सामने मंत्रों का पाठ करते थे शिष्य साथ-साथ में पाठ करते करते उसको वोह उनके उनकी स्मृति में वह हमेशा के लिए अंकित हो जाते थे तो यह गुरु शिष्य ओरल ट्रेडिशनल यह हमारे मंत्र हमारे उपनिषद हमारे शास्त्र आए हैं तो उन शास्त्रों को आखिर में लिपिबद्ध अवश्य किया गया किंतु वह जो ट्रेडिशनल औरों सालों से कितने ही गुरुकुल में हजारों गुरुकुल में लाखों गुरु और शिष्यों ने सतत इसका पाठ किया है तब इस संस्कृत में वह किस तरह का एक प्राण का एक संचार प्राण का आवेग प्रकट हुआ है वही प्राण एक मटेरियल िक लैंग्वेज में डालना वह हम समझ सकते हैं कि कितना कठिन है बहुत सारे लोग सोचते हैं कि स्वामी जी ने अमेरिका जाकर के बहुत सारे प्रवचन दिए इसके लिए उनका स्वास्थ्य धीरे-धीरे करके कमजोर होता गया और भारत में आकर के बहुत ही छोटी उम्र में 39 इयर्स ऑफ एज उन्होंने समाधि उनकी हो गई उन्होंने महासमाधि में चले अभी यह हमको प्रश्न होता है कि ऐसा तो लेक्चर देने में क्या है मैं भी यहां पर क्लास ले रहा हूं बहुत सारे लोग साधु क्लास ले रहे हैं क्या है उसमें क्या है लेक्चर देने में हमारा तो जीवन कभी क्षय नहीं होता क्लास लेते लेते किंतु देखिए कि हम लोगों को तो सिर्फ वाणी ही ट्रांसमिट करनी है मेरे मुंह से सिर्फ शब्द ही निकलेंगे स्वामी जी को तो क्या है कि इस वाणी में साथ-साथ में प्राण संचार भी करना है उनको जीवंत बनाना है मैं तो स्वामी जी के शब्द सिर्फ पढ़ रहा हूं किंतु तो इन शब्दों को स्वामी जी ने सब जब पहली बार उनका उच्चारण किया होगा तो साथ-साथ में वह मंत्र शक्ति जो हजारों हजारों सालों की यह गुरु शिष्य परंपरा से प्रकट हुई यह जो आध्यात्मिक एनर्जी जो है आध्यात्मिक शक्ति है उसको भी उन्होंने इसके भीतर ट्रांसमिट किया है उस आध्यात्मिक शक्ति से जैसे कि यह कमल खिलता है वैसे ही वो मतलब कीचड़ में कमल खिलना वैसे ही अंग्रेजी भाषा में ये मंत्रों को एक एक तरह से कमल के रूप में खिलाना यह कितना कठिन है यह हम सोच कर के अंदाज भी नहीं लगा सकते हैं तो यहां पे स्वामी जी कहते हैं कि इट इज ही हु इज शाइनिंग एज द सन एंड द स्टार्स सूर्य और चंद्र के रूप में तारों के रूप में ईश्वर ही प्रकाशित हो रहे हैं ही इज द मदर अर्थ हमारी मातृभूमि पृथ्वी है वो भी ईश्वर है ही इज द ओशन हिमसेल्फ ये अनंत समुद्र ईश्वर स्वयं है ही कम्स एज जेंटल शॉवर्स यह वृष्टि होती है हमारे ऊपर में जो हमको जीवन देती है वह भी ईश्वर है ही इज द जेंटल एयर दैट वी ब्रीद इन एंड ही इज हु इज वर्किंग एज फोर्स इन द बॉडी यह प्राण जो हमारे जीवन को हमारे शरीर को जीवन देते हैं वह भी ईश्वर है यह हमारी वाणी वो भी ईश्वर है ही इज द मैन हु इज टॉकिंग ये स्वामी जी जो प्रवचन दे रहे हैं जो स्पीच दे रहे हैं वह भी ईश्वर है ही इज द ऑडियंस दैट इज हियर यह श्रोता लोग जो स्वामी जी की वाणी सुन रहे हैं वह भी ईश्वर है ही इज द प्लेटफार्म ऑन व्हिच आई स्टैंड ही इज द लाइट दैट इनेबल्स मी टू सी योर फेसेस यह प्लेटफॉर्म जिसके ऊपर मैं खड़ा हूं वह भी ईश्वर है यह प्रकाश जिससे मैं आपका चेहरा देख रहा हूं वह भी ईश्वर है इट इज ऑल ही यह सब कुछ ईश्वर है ही हिमसेल्फ इज बोथ द मटेरियल एंड द एफिशिएंट कॉज ऑफ दिस यूनिवर्स एंड ही इट इज ट गेट्स इवॉल्वड इन द माइनोट सेल एंड इवोल्स एट द अदर एंड एंड बिकम गॉड अगेन सृष्टि के शुरुआत में जो बीज था जो बिग बैंग था यदि मॉडर्न लैंग्वेज में कहा जाए उसके भीतर में ईश्वरीय शक्ति ही समाहित थी और उसी में से यह इवोल्यूशन होते-होते भगवान राम कृष्ण भगवान राम प्रकट हुए या तो फिर यह वैश्विक चैतन्य कहेंगे यह जो प्रकट हुआ वह भी इसी ईश्वर का इवोल्यूशन होकर के ही हुआ है इट ही इट इज ट कम्स डाउन एंड बिकम द लोएस्ट एटम एंड स्लोली अनफोल्डिंग हिज नेचर रिजॉस हिमसेल्फ यह कितना पावरफुल सेंटेंस है ही इट इज ट कम्स डाउन एंड कम्स द लोएस्ट एटम यह ईश्वर पूरा विश्व ब्रह्मांड में व्याप्त ऐसा तो नहीं कहेंगे यह भी तो ईश्वर को लिमिटेड करने की बात हुई विश्व ब्रह्मांड से परे समय और अवकाश से परे जो दिव्य सत्ता है उसने अपने को समय और अवकाश के बंधन में बांधा और यह समय और अवकाश के बंधन में बांधने के बाद में यह समय और अवकाश स्पेस और टाइम यह दोनों को एक्सपें किया और इस स्पेस और टाइम जब आज के विराट विश्व ब्रह्मांड में परिणत हुआ और यह परिणत विश्व ब्रह्मांड में जो ईश्वर हुए उनके साथ में वह मिलित हुए हैं माने विश्व ब्रह्मांड के परे जो ईश्वर है और विश्व ब्रह्मांड में समाहित जो ईश्वर है यह दोनों एक ही है इन दोनों का संगम हुआ माने देखिए ये द्वैत अद्वैत विशिष्ट अद्वैत जितनी भी फिलोसोफी है वो सब इसके भीतर में आ जाती है आप ईश्वर को किस तरह से देखते हैं खास करके यदि अद्वैद की दृष्टि से देखेंगे तो अद्वैद की दृष्टि से तो यह माया का जो चक्र है सृष्टि स्थिति प्रलय की ये साइकल वो तो चलती ही रहेगी ईश्वर कहो ना कि ब्रह्मण क हो ना कि आत्मन यह जो इससे परे है वो तो इस समय काल और अवकाश इसके बंधन में अपने को तो बांधने नहीं वाले हैं वो इन सबके परे हैं तो फिर स्वामी जी ऐसा कैसे कह दे सकते हैं कि यह सृष्टि स्थिति प्रलय की जो साइकल चलती रहती है उसके शुरू में भी ईश्वर थे आखिर में भी ईश्वर है ईश्वर में से प्रकट हुआ ईश्वर में समाहित हो गया यदि ब्रह्मण परे है तो ऐसे कैसा होगा किंतु फिर इससे भी एक बड़ा एक विचार आ जाता है कि परे और मने व्हाट इज बियोंड एंड व्हाट इज हियर एंड व्हाट इज बियोंड यह भी तो एक लिमिटेशंस है यह भी तो एक आपका मने एक सेपरेशन है अद्वैत मींस सब एक है जैसे कि रज्जू के ऊपर में हमको सर्प दिखाई देता है ऐसा नहीं है कि सर्प अलग से है रज्जू के ऊपर में ही वो आभास मात्र है ऐसा नहीं है कि रज्जू कहीं दूसरी गली में है उसका प्रोजेक्शन सर्प जो है वो इस गली में हमारे सामने दिखाई देता है दोनों दूसरे अलग-अलग जगह पे है एक ही जगह पे है एक ही के ऊपर में है सिर्फ हमारे भ्रम से वो दो अलग-अलग दिखते हैं तो ये प्योर अद्वैत यहां पर आ जाता है ईश्वर जो कि विश्व ब्रह्मांड के परे हैं और यह विश्व ब्रह्मांड समय और अवकाश यह सब ईश्वर के ऊपर में एक भ्रम मात्र है ऐसा नहीं है कि ईश्वर कहीं अलग बैठे हैं दूसरे कमरे में बैठे हैं और इस कमरे में वह प्रोजेक्शन चलकर वह पूरा हमको यह दिख रहा है मैं जब बहुत छोटा था तो मेरे पिताजी मुझे एक वो थिएटर में ले गए थे तो कुछ चल रहा था मूवी जैसा मैं आई थिंक फर्स्ट या सेकंड स्टैंडर्ड में होंगा तो अभी जब मूवी खत्म हो गया तो मैं सोच रहा हूं कि यह जो पर्दे के पीछे ये कार वगैरह जो दिखाई देता है इतने सारे लोग ये बातें करते हैं और निश्चय ये लोग पर्दे के पीछे में वो इकट्ठा हुए होंगे वो गाड़ी भी बहुत अच्छी लगी मुझे मैं जाकर के देखता हूं पर्दे के पीछे क्या है तो वो सही में वो जो स्क्रीन था स्क्रीन के पीछे में एक रूम था तो वो कमरा वो दरवाजा था वो दरवाजा खोल के मैं भीतर में गया दो-तीन लोग सही में बैठे थे मैंने कहा वो जो दिख रहा था वो गाड़ी वगैरह कहां है मैंने जैसे छोटा बच्चा होता है ना छोटा बच्चा क्या सोचता है स्क्रीन पर जो दिखाई देता है वो एक्चुअली स्क्रीन के पीछे ही होगा तभी तो हमको दिखाई देता है प्रोजेक्शन से वो प्रोजेक्ट होता है ऐसा वो अकल कहां उस समय आने वाली है तो ये जब हमारी जो आध्यात्मिक समझ जब विकसित हो रही है जब हम हम भी आध्यात्मिक बालक स्वरूप है तब हमको लगता है कि हां ये ईश्वर एक अलग कमरे में बैठे हैं और वहां पर यह जो ये पिक्चर वगैरह हो रहा है वो ईश्वर ही एक तरह से यहां पर प्रोजेक्ट कर किंतु इट इज नॉट लाइक दैट ईश्वर के ऊपर में ही यह ब्रह्मांड प्रकट होता है और उसी के भीतर में समाहित हो जा यह कंफ्यूजन मेरा खुद का बहुत समय तक था मैं जब यह अद्वैत वेदांत सोचता था और यह जिस तरह से यह उत्पत्ति वाद सृष्टि का उत्पत्ति वाद इसके बारे में मैं सोचता था तो मैं हमेशा यह सोचता था कि अरे ईश्वर तो ये समय और काल की सीमाओं से परे है तो यह प्रकृति और पुरुष यह तो अलग-अलग है प्रकृति अपना कार्य करे जा रही है और जै ज कि ये वो है ना कि जैसे मैं उदाहरण बार-बार देता हूं कि एक घड़ा है घड़े के भीतर में पानी है और श् वो जो सूरज है सूरज का प्रतिबिंब पानी में दिखाई देता है तो एक बड़ा ही सुंदर उदाहरण हो गया जैसे ही घड़ा टूट गया तो सूरज का प्रतिबिंब भी चला गया ऐसा नहीं है कि दूसरा सूरज है वो सूरज का प्रतिबिंब ही है किंतु यह जो एक्सप्लेनेशन है यह भी तो एक मिडल लेवल एक्सप्लेनेशन है माने यह भी एक कंप्लीट एक्सप्लेनेशन नहीं है यदि कंप्लीट एक्सप्लेन नेशन कहा जाए तो वह ऐसा होगा सूरज ही है सूरज के ही ऊपर में हमको घड़े का आभास होता है सूरज के ऊपर में ही हमको सूरज के प्रतिबिंब का आभास होता है ऐसा नहीं है कि पृथ्वी पर घड़ा है और पृथ्वी पर घड़े के भीतर में पानी भरा है और सूरज कहीं ब्रह्मांड में है एक्चुअली यह दो सेपरेशन है ही नहीं सूरज के ऊपर में ही सब भ्रम हो रहा है ये पृथ्वी इट सेल्फ यह सूरज के ऊपर में ही भ्रम होकर के हमको दिखाई देती है सो दैट इज अल्टीमेट अद्वैत तो यह जो अल्टीमेट अद्वैद थिंकिंग है हम बहुत सारी सिमाइल्स का यूज करते हैं बहुत सारे उदाहरण का हम अपने को खुद को एक्सप्लेन करने के लिए समझने के लिए दूसरों को एक्सप्लेन करने के लिए हम समझाते हैं किंतु अद्वैत वेदांत के साथ में प्रॉब्लम यह है कि ऐसा कुछ भी नहीं है जो कि अद्वैत वेदांत की वियर्डनेस जिसको कहते हैं ना कि उसकी स्ट्रेंज निस कहो या तो फिर उसकी अदर वर्ल्डली नेस कहो वो समझा सके जैसे कि क्वांटम डायनेमिक्स है जो क्लासिकल फिजिक्स जिन लोगों ने स्टडी किया है उन्हो जिन लोगों ने ये क्लॉकवर्क यूनिवर्स समझा है वे लोग हमेशा सोचते हैं कि क्वांटम डायनेमिक्स इज सो स्ट्रेंज सो वियर्ड सो अदर वर्डली कि वो सही हो सकता है ऐसा हम मान ही नहीं सकते तो मैं जब भी ये क्वांटम डायनेमिक्स के बारे में पढ़ता हूं तो मुझे य अद्वैत वेदांत की बात याद आती है ऐसा नहीं है कि ये दोनों के बीच में कोई कनेक्शन है फिजिक्स फिजिक्स है वेदांत वेदांत है किंतु इसका जो क्वांटम डायनेमिक्स का जो वियर्डनेस से उसकी जो विचित्र है अपनी लॉजिक को डिफाई जो करता है अब हमारी कॉमन सेंस के जो परे चला जाता है ऐसा यह अद्वैत वेदांत भी अपनी कॉमन सेंस से परे है यह अद्वैत वेदांत इतना स्ट्रेंज है इतना वियर्ड कभी-कभी आपको लगेगा कि उसको समझना उसके लिए आपको एक के बाद एक के बाद एक स्टेप्स लेने पड़ेंगे आखिर में पता चलेगा यह सब स्टेप गलत है उसके परे ही सत्य और ही कुछ है किंतु वो स्टेप्स लिए बिना हम वहां पर नहीं जा पाएंगे तो स्वामी जी का ये जो फाइनल सेंटेंस है इतना पावरफुल ही इट इज दैट कम्स डाउन एंड बिकम द लोएस्ट एटम एंड स्लोली अनफोल्डिंग हिज नेचर रिजॉस हिमसेल्फ ईश्वर के भीतर में से ही ईश्वर धीरे-धीरे करके अपने को बीज के रूप में इवॉल्व करता है इवॉल्व होकर के बीज बनते हैं बीज में से इवोल्यूशन होकर के फिर से अपने को प्रकट करते हैं एंड ही रिजॉस हिमसेल्फ अर्थात कि यह बीज होने की प्रक्रिया बीज में से वटवृक्ष होने की प्रक्रिया यह सब ईश्वर के ऊपर में ही भ्रम स्वरूप है एक्चुअली ब्रह्मण ना ही इवॉल्व होता है ना ही इवोल्व होता है जो कुछ भी होता है एक भ्रम सा हमको यह सब दिखाई देता है तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तस्त श्री राम कृष्णर्पण मस्तु