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स्त्रियों के लिए सारदा मठ स्थापन 19 Feb 2024

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ओ स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते नमः तो स्वामी जी की किताब स्वामी जी का पत्र उसके ऊपर में हम चिंतन कर रहे थे कि अपने गुरु भाइयों को स्वामी जी इकट्ठा होने के लिए पत्र लिखते हैं और इकट्ठा होकर के संघ की स्थापना करने के लिए जो परिव्राजक हुए शहर शहर गांव-गांव चलते हुए भिक्षा ग्रहण करके बस सिर्फ ईश्वर के नाम में मग्न हो जाना वह समय अभी समाप्त हो गया अभी ठाकुर के पास से जो धन बटोरा है वह अभी अपने हृदय में जो संरक्षित रखा है उसको उसको अपने हृदय के दरवाजे खोल कर के सभी के बीच में वितरण करने का समय आ गया है तो इसके बारे में स्वामी जी सबको लिख रहे हैं नेक्स्ट लाइन में पढ़ता हूं यहां पर लास्ट टाइम जो पढ़ा था उसकी एक लाइन पढ़ लेता हूं जर मने साहस हृदय भालोबासा से अर संगे आसुक बाकी काके चाईना जिसके हृदय में साहस है जिसके मन में प्रेम और स्नेह है वह मेरे साथ में आए और किसी को मैं चाहता नहीं मार कृपा आमी एका एक लाख आछी 20 लाख हो वो मां की कृपा से मैं अकेला ही एक लाख के बराबर हूं और 20 लाख के बराबर होंगा तो स्वामी जी ने यह जो आजी यदि हमको कोई बड़ा कार्य करना है तो हृदय में तो एक यह भी चाहिए आत्मविश्वास भी चा चाहिए आत्म श्रद्धा भी चाहिए यह जो मैं जब स्टूडेंट डेज की मैं जद बात याद करूं तो हम लोग आपस में डिस्कस किया करते थे कि कौन पर्सनालिटी डेवलपमेंट क्लास अटेंड कर रहा है कौन इंग्लिश स्पीकिंग क्लास अटेंड कर रहा है हमारे सिटी में ऐसा एक दो क्लासेस थे कि बड़े ही पॉपुलर थे कि आप जैसे ग्रेजुएशन या तो कॉलेज में प्रवेश करते हैं या तो फिर ग्रेजुएशन का समय आता है तो बहुत सारे स्टूडेंट्स ये क्लासेस में जाते हैं पर पर्सनालिटी डेवलप करना है इंग्लिश सीखना है क्यों यह सब करना है जिससे कि यदि आप जॉब इंटरव्यू देने के लिए जाते हैं या तो कोई भी अभी बाहर जाकर के काम करना है ना अभी तो अभी तक तो पिताजी की पिताजी ने खिलाया पिलाया सब कुछ किया अभी तो अपने पैरों पर खड़ा होना है तो फिर अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए बाहर जाकर के बोलने के लिए जो साहस चाहिए भीतर से एक कॉन्फिडेंस चाहिए वो कहां से आएगा तो यह सब क्लास करके हम लोग लाते हैं यदि ये सब क्लासेस में स्वामी जी की किताब पढ़ाई जाए तो मुझे लगता है कि इनका सिलेबस विल बी इंप्रूव्ड अ लॉट क्योंकि स्वामी जी हमको जिस तरह से आत्म श्रद्धा सिखाते हैं वो इज अ यूनिक वे क्योंकि क्या है कि जयदिश बेसिकली में देखता हूं क्या करते हैं अपने ईगो का प्रोजेक्शन एक अग्रेसिव अप्रोच लेकर के दूसरों को अपनी पर्सनालिटी से यह कर देना दबा देना या तो फिर उनके ऊपर में हावी हो जाना इस तरह से एक अग्रेसिव एक उनका टेंडेंसी रहता है यह जब आप किताबें भी पढ़ेंगे तो इसी तरह की पढ़ेंगे स्टीव जॉब्स की स्टाइल्स थी फिर यह जो बिल गेट्स की स्टाइल थी या तो स्टीव बोलम जो कि माइक्रोसॉफ्ट का सीईओ था इन सब की स्टाइल क्या थी वो लोग बड़े ही अग्रेसिव थे काम करने में अपने को वर्कर से कलीग्स है उनके के साथ उनको डांट करके बात करते थे और उनको मैंने अपनी पर्सनालिटी से उनको अंजित कर देने का प्रयास करते थे तो अभी स्वामी जी का है कि इफ यू वांट टू मैग्नीफाई योर पर्सनालिटी देन यू हैव टू मैग्नीफाई प्रोजेक्ट द लव फ्रॉम योर हार्ट इससे क्या होता है कि मेरा मन भी शांत रहता है और आपके मन में भी ऐसा कोई हिंसा का उदय नहीं होता तो इसीलिए स्वामी जी वे ऑफ पर्सनालिटी डेवलपमेंट आत्म श्रद्धा आत्म साहस और सबके प्रति स्नेह और सहानुभूति अभी स्वामी जी क्या है कि एक स्ट्रीम ऑफ कॉन्शसनेस में लिखते हैं तो स्ट्रीम ऑफ कॉन्शसनेस एक इस तरह से एक फिलोसॉफिकल वर्ड है इसका अर्थ क्या है कि यदि आप कोई भी किताब या तो सिस्टमिकली लिखना चाहते हैं तो क्या करेंगे आपको जो पाच 10 टॉपिक के ऊपर में लिखना है वो टॉपिक के ऊपर में सब कुछ खोज लेंगे सब कुछ सोच लेंगे सब पूरा रिसर्च कर लेंगे और उसके बाद क्या करेंगे कि इस टॉपिक एक-एक टॉपिक को लेकर के आपके विचार रखते जाएंगे यानी एक टॉपिक लिया उसको संपूर्ण किया उसके बारे में आपको जो कुछ भी कहना है उसके बाद में दूसरा टॉपिक लिया और उसके बारे में आपने कहा किंतु स्ट्रीम ऑफ कॉन्शियस इज अ डिवाइस इज अ फिलोसॉफिकल लिटरेरी डिवाइस इसमें क्या होता है आप जो सोचते हैं वही बोलते हैं और सीधा वही लिखते हैं किसी भी तरह से इसको सिस्टेमेटाइज्ड बड़ा डीप होगा उस टॉपिक के ऊपर में आपका थिंकिंग शायद हो सकता है कि बड़ा ही गहन हो किंतु जब आप उसको एक्सप्रेस करते हैं आप उसको सिस्टेमेटाइज्ड सोचने में कोई टॉपिकल माने कैटेगरी इज करके हम लोग कुछ भी सोचते नहीं अपना ब्रेन जो है इज अ ग्रेट क्रिएटिव डिवाइस इसके भीतर में हजारों टॉपिक्स चलते रहते हैं एक दूसरे के साथ में परम्यूटेशन कॉमिनेशन होता रहता है वो एक टॉपिक से दूसरे टॉपिक की ओर एक क्रिएटिव जंप लगाता है अपना माइंड जिसको कि क्वांटम डिवाइस आज की लैंग्वेज में जद कहेंगे तो आवर ब्रेन इज अ क्वांटम डिवाइस इट डज नॉट फॉलो द क्लासिकल लॉज ऑफ कॉज एंड इफेक्ट अर्थात कि क्या है कि क्लासिकल फिजिक्स कहता है कि जदिया एक मान लीजिए कि केरम बोर्ड है हम लोग सब छोटे थे तो हम लोग सब केरम खेलते थे मैं भी जब वेकेशन होता था अपने गांव जाता था तो वो मेरी उम्र के जितने भी ये कजिन वगैरह थे मित्र थे सब मिलके केरम खेलते थे तो एक जद आपने स्ट्राइक किया केरम को एक जो होती है वो जो क्या बोलती है वो खेलने वाली वो जो ये होता है तो एक उसमें से दूसरे ने स्ट्राइक किया तो इमीडिएट पहले वाले की जो गति है और डायरेक्शन है वेलोसिटी एंड स्पीड एंड डायरेक्शन वो दूसरे वाले में शिफ्ट हो जाएगी यह बिलियर्ड बोर्ड जिसको आप देखते हैं इसमें भी ऐसा ही होता है यदि किसी के एक चीज से किसी चीज पर आघात किया जाए तो प्रथम चीज का स्ट्रेंथ एनर्जी वो दूसरी चीज में ट्रांसफर होता है ये है क्लासिकल लॉज ऑफ कॉज एंड इफेक्ट किंतु अपना ब्रेन इस तरह से कॉज एंड इफेक्ट प काम नहीं करता वो कहीं एक एक टॉपिक से दूसरे टॉपिक पे एक विचार से दूसरे विचार पे एक टाइमलाइन से दूसरी टाइमलाइन पे ऐसा जंप लगाएगा ऐसा एक क्रिएटिव आईडिया खड़ा करेगा तो अपना माइंड अपना ब्रेन जिस तरह से सोचता है नॉन लीनियर यदि दूसरा एक इंग्लिश वर्ड यूज किया जाए नॉन लीनियर एक लाइन में नहीं सोचता कभी यह शुरुआत में है लाइन के तो कभी मिडल मिडल में है तो कभी फिर से शुरुआत में आ गया तो कहीं वह एंड में जंप लगा दिया तो कहीं और किसी पोजीशन पर चला गया नॉन लीनियर थिंकिंग अपना ब्रेन नॉन लीनियर डिवाइस है या तो कहेंगे कि क्वांटम डिवाइस है तो यह क्वांटम डिवाइस हम जैसे-जैसे सोचते हैं वैसे-वैसे ही लिखते जाना या तो फिर वैसे-वैसे ही बोलते जाना इसको कहते हैं स्ट्रीम ऑफ कॉन्शसनेस जो मैं सोचता हूं वही लिखता हूं तो यहां पर देखिए कि स्वामी जी किस तरह से अपने पत्र में स्ट्रीम ऑफ कॉन्शसनेस डिवाइस के अनुसार एक टॉपिक से दूसरे टॉपिक में जंप लगाते हैं दोनों में रिलेशन भी शायद नहीं है एक ही पैराग्राफ में आप देखेंगे अभी स्वामी जी के लिए या तो गुरु भाइयों के लिए यह सहज होगा कि एक टॉपिक इतना एक मने एक कंप्लीट डिफरेंट टॉपिक दूसरा कंप्लीट डिफरेंट टॉपिक हमारे लिए प्रत्येक टॉपिक को रिकॉग्नाइज करना और उसको एनालाइज करना वो हमार हमारे लिए एक बहुत बड़ा चैलेंज होता है हम लोग इसको वैसे ही यदि जाने दे अच्छा ठीक है स्वामी जी अभी लिखते हैं कि वोह कोई कहता है कि अरे तुम अभी अमेरिका में जाकर के हल्लागुल्ला मचा रहे हो घर वापस आ जाओ यह सब क्या है फिर दूसरी ही टॉपिक में स्वामी जी कहते हैं कि जिसके हृदय में भालोबासा अर्थात कि स्नेह और प्रेम है वही मेरे साथ में आएंगे और तीसरा टॉपिक है कि स्वामी जी बताते हैं पूछते हैं कि सभी गुरु भाई अभी कहां-कहां पे है वो सब आकर के मिले क्योंकि अभी तो संघ की स्थापना करने का समय आ गया है तो यह एक टॉपिक से दूसरे टॉपिक पे स्वामी जी जब जाते हैं तो प्रत्येक टॉपिक को हमको रिकॉग्नाइज करना कि हां यहां से एक नई बात चालू हो रही है तभी अपना एनालिसिस कंप्लीट होगा मेरी किताब में देखिए कि मैंने सभी टॉपिक्स को मैंने डिमार्क पेंसिल से ये मार्क करके रखा है कि यहां से एक टॉपिक है यहां से दूसरा है यहां से तीसरा है तो ऐसे ही अभी इसके बाद में जो स्वामी जी कहते हैं इस कंपलीटली न्यू टॉपिक स्वामी जी क्या कहते हैं अर एकटी काज होए गेले आमी निश्चित मेरा एक काम हो जाने से ही मैं निश्चिंत हो जाऊंगा कौन सा काम होने से स्वामी निश्चिंत हो जाएंगे स्वामी जी राखल भाया तुम उद्योग करे शेटी कोरे देवे स्वामी जी कहते हैं कि राखल भाई तुम मेहनत करके उद्योग अर्थात की मेहनत महाभारत में है उद्योग पर्व अर्थात कि युद्ध का प्रारंभ करने से पहले युद्ध करने से पहले युद्ध के लिए जो तैयारी करनी होती है अस्त्र शस्त्र का इकट्ठा करना होता है जदी फंड कलेक्ट करना होता है वरियर्स यानी कि सैनिक लोगों को ट्रेन करना होता है कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम बनानी होती है तो उसको कहते हैं उद्योग तो स्वामी जी कहते हैं अपने गुरु भाई से कि तुम उद्योग करके उसको कर दो क्या करने से स्वामी जी का हद शांत होगा क्या करने से स्वामी जी निश्चिंत हो गए मां ठाकुरानीर जन्नो एकटा जाएगा मां के लिए एक जगह खरीद करना है यह स्वामी जी का इटरनल ड्रीम था कि पुरुषों का मठ उस होने से पहले स्त्रियों का मठ स्टार्ट हो क्योंकि देखिए स्वामी जी का एक वर्ल्ड विजन था कि उन्होंने जिस तरह से भारत में स्त्रियों की परिस्थिति देखी और अमेरिका जाकर के उन्होंने जो दिखा तो यह जब कंपेयर करके उनका मन बड़ा ही दुखित हो गया यहां पर भारत में देखिए कि स्त्रियों को किस तरह से उनको एक बंधन में डाल कर के रखा गया है मां का खुद का लाइफ देख लीजिए हालांकि मां का लाइफ यूनिक है किंतु फिर भी उनको लाइफ देख कर के हमको उस समय के रीति रिवाजों का पता चलता है कि किस तरह से एक छोटे से नबत में रहती थी पुरुषों के सामने नहीं आती थी किस तरह से बड़ी ही छोटी उम्र में विवाह हुआ था तो यह सब प्रथाएं मां के लिए तो ठीक है जगदंबा है आध्यात्मिक शक्ति का वितरण करना है उनके लिए ठीक है किंतु बाकी सब स्त्रियों के लिए इस तरह से बंधन में रहने से क्या है मन संकुचित हो जाता है मन कुंठित हो जाता है अभी इस तरह से कुंठित शरीर और मन को लेकर के जब वह बच्चे का लालन पालन करेगी तब वो तो ठीक तरह से हो नहीं जद मां में ही स्ट्रेंथ नहीं है मां के भीतर में ही कुपोषण है या तो फिर एक माइंड डेवलप करने की अपॉर्चुनिटी नहीं है तो यह मां अपने बच्चों को क्या सिखाएगी अपने बच्चे को क्या सिखाएगी एंड ऑलवेज रिमेंबर दैट मदर इज द फर्स्ट टीचर आप जब बच्चा जन्म लेता है तो न साल तक तो उसकी मां ही उसकी सबसे बड़ी टीचर है उसके बाद में आप किसे भी उसको को माने किंडर गार्डन में केजी माने किंडरगार्डन में डाले या तो फिर य किसी भी अच्छी स्कूल में उसको ले जाए बाल मंदिर बोलते हैं यहां पर इंडिया में तो कितने ही अच्छे बाल मंदिर में आप बच्चे को एडमिट कराए कितनी भी अच्छी स्कूल में लाखों रुपया फीस देकर के ये इंटरनेशनल आईबी स्कूल्स वगैरह जो होती है उसमें आप डाले किंतु उसका जो फॉर्मेशन पीरियड है वो तो एक से तीन साल का है यह जो मैं एक चार्ट देखा था एक बार ब्रेन डेवलपमेंट का कि ब्रेन जब डेवलप होता है जैसे हमारा बॉडी डेवलप होता है जब बच्चा जन्म लेता है तो जो 5 10 केजी उसका वेट होगा तब से लेकर के ये जो 30 40 केजी वेट वो बड़ा होने तक उसका होता है फर्स्ट सेकंड थर्ड फोर्थ स्टैंडर्ड तक तो यह जो बॉडी जिस तरह से डेवलप होती है ब्रेन भी डेवलप होता है किंतु अपना फिजिकल डेवलपमेंट अप टू दी एज ऑफ 17 18 19 20 तक चलता रहता है ब्रेन का किंतु क्या होता है वह चार्ट है ना पहले तो ऐसा सीधा ऊपर जाता है फिर ऐसा टेपर हो जाता है अर्थात कि बिल्कुल एक से 3 साल की उम्र में ब्रेन जो डेवलप होना था छोटी साइज से लेकर के बड़ी साइज का 90 पर डेवलपमेंट उस समय हो जाता है बाकी 10 पर डेवलपमेंट ओवर ए पीरियड ऑफ 10 15 इयर्स होता है अर्थात कि ब्रेन डेवलपमेंट जब एक्सपो एं शियल डेवलपमेंट अर्थात कि विस्फोटक उसमें विस्तार हो रहा है ब्रेन की साइज में वो समय बच्चा अपनी मां के पास में ही सबसे ज्यादा रहता है अर्थात कि मां के संस्कार मां का लर्निंग मां का चरित्र मां का स्वास्थ्य यह सब बच्चे के डेवलपमेंट पे बहुत बड़ा एक फैक्टर बनके होता है मैं जब राची में था तो हम लोग वहां पे इस तरह से मां के लिए पोषक आहार की व्यवस्था कर राज्य में अपना केवीके है कृषि विज्ञान केंद्र अपना आश्रम जो है उसको गवर्नमेंट ने एक कृषि विज्ञान केंद्र ग्रांट किया है कृषि विज्ञान केंद्र के रूप में रिकॉग्नाइज किया है उसका नाम है दिव्या यान तो यह अर्थात कि अपना आश्रम तो है ही है किंतु आश्रम के द्वारा चल रहा यह इंस्टिट्यूशन है इंस्टिट्यूशन का नाम है दिव्या यान तो यह दिव्या यान झारखंड गवर्नमेंट के साथ में मिलकर के गांव-गांव में ट्राइबल एरियाज में जहां पर प्राइमरी हेल्थ सेंटर नहीं है वहां हम लोग जाते थे हमारे ट्रे जाते थे और स्त्रियों को सिखाते थे कि गर्भवती स्त्री है तो इस उनको किस तरह से पोषक आहार मिलना चाहिए ऐसा होने से ही यदि मां को पोषक आहार गर्भावस्था में ही मिलता है तो बच्चे का जब जन्म होता है तो उसको कुपोषण का शिकार नहीं होता वरना तो वहां पर बहुत सारी जगह पर यह जो ट्राइबल एरियाज में हम लोग गांव-गांव जाकर के देखते थे कि किस तरह से मां और बच्चा दोनों कुपोषण का शि का है और कुपोषण अर्थात कि ये जो वाइटल विटामिंस मिनरल्स यह प्रोटींस यह वगैरह नहीं मिलने से फिजिकली आपका शरीर स्टंट हो जाता है अर्थात कि उसका ग्रोथ है वह प्रॉपर नहीं होता मेंटल ग्रोथ नहीं होता फिजिकल ग्रोथ नहीं होता अर्थात कि मां को पो पौष्टिक आहार देना यह एक बड़ा ही आवश्यक है तो इस तरह से हम लोग प्रोजेक्ट चलाते थे कि हमारे ट्रेनर्स हमारे एक् ऑफिसर्स ट्राइबल एरियाज में जाते थे और यह सब पौष्टिक आहार गर्भवती स्त्रियों को देते थे अभी तो प्राइमरी हेल्थ सेंटर बहुत सारी जगह पर ओपन हो गए हैं किंतु जब हमने यह काम स्टार्ट किया था आज से 70 इयर्स अगो 60 70 साल पहले तब हम रामकृष्ण आश्रम ही था जो कि इतना इंटीरियर में जाता था और इनके साथ में काम करता था तो अभी देखिए कि हमको पता है कि यह भारत जब गुलाम था आज से 100 सवा स 200 साल पहले स्वामी जी जब भारत भारत भारत में गांव-गांव शहर शहर घूमे थे तो उन्होंने देखा था कि स्त्रियों को लेकर के कितनी अंधश्रद्धा है उनका शारीरिक मानसिक विकास होने में कितनी सारी बाधाएं हैं और मां जद असु है या तो फिर उसका फिजिकल मेंटल डेवलपमेंट प्रॉपर नहीं हुआ है तो बच्चा भी इसी तरह से कुपोषण का शिकार होगा और यही बच्चा बड़ा होकर के भारत का नागरिक होगा तो कैसा नागरिक होगा नहीं वो ठीक से जद एक वॉरियर बन पाएगा नहीं ठीक से वो एक टीचर हो पाएगा नहीं वो ठीक से एक स्टेट्समैन हो पाएगा इतनी बड़ी पॉपुलेशन है 30 करोड़ की पॉपुलेशन उसमें से मुट्ठी भर लोग थे जो कि अपर मिडिल क्लास में थे जहां पर स्त्रियों को थोड़ा बहुत डेवलप होने की तक मिलती थी अपॉर्चुनिटी मिलती थी स्वामी जी के खुद के फैमिली में देखिए कि उनकी माता जीी की माताजी नानी ने वो एक ग्रंथ की रचना की थी उनकी माताज भी पढ़ाई लिखाई अच्छे से जानती थी और वह मने एक कल्चरड फैमिली था जहां पर स्त्रियों को भी इस तरह से विद्या अभ्यास करने का विद्या अर्जन करने का एक सुयोग मिलता था किंतु इस तरह के फैमिली कितने थे भारत में ज्यादातर फैमिली में इतनी अंधश्रद्धा है इतना यह ट्रेडिशनल ट्रेडिशनल के साथ में जुड़ा हुआ है कि ना ही स्त्रियों का डेवलपमेंट होता है ना ही बच्चों का और जिससे कि असर क्या होगा भारत के भविष्य के ऊपर में क्योंकि जितने भी भविष्य के नागरिक है वह सभी लोगों के बचपन में इनको प्रॉपर एक गाइडेंस मां के द्वारा नहीं मिला तो यह स्त्रियों की जो पूरी परिस्थिति है इसको पूरे समाज को स्वामी जी को अपलिफ्ट करना था और यह भी बात याद रखिए कि किस तरह से स्वामी जी की एक नेचुरल टेंडेंसी थी ना ठाकुर की महासमाधि के बाद में हमेशा वह सोचते थे कि मैं बस अभी समाधि में चला जाऊं और फिर मैं समाधि में ही रहूं बीच-बीच में थोड़ा सा नीचे आकर के पृथ्वी पर आकर के आहार वगैरह ग्रहण करके शरीर धारण करने लायक और फिर से मैं समाधि में चला जाऊं तो अल्मोड़ा जा कर के उन्होंने यह किया भी सही अल्मोड़ा गुफा में बैठे थे एक और ध्यान कर रहे थे और ध्यान में इतने मग्न हो गए जैसे शिव कैलाश के ऊपर में बर्फीले चट्टानों के भीतर में वो बर्फ की तरह फ्रीज होक के ध्यान करते हैं वैसे ही स्वामी जी इस तरह से फ्रिज हो गए थे स्थिर होकर के ध्यान कर रहे थे अल्मोड़ा में हिमालय में उस समय क्या हुआ उनकी बहन ने आत्महत्या की और यह समाचार उनके पास में आया और यह बात देख कर के स्वामी जी को इतना दुख हुआ कष्ट हुआ बात सिर्फ यह नहीं है कि अपनी लाडली बहना के साथ में इतनी बड़ी दुर्घटना हुई किंतु स्वामी जी तो शिव स्वरूप है शिव स्वयं है तो पूरे संसार की पूरे भारतवर्ष की उनकी बहनों के साथ में क्या होता होगा यह सोच कर के उनका मन बिल्कुल उनकी आंखें आंसुओं से भर आई और उन्होंने सोचा कि अभी चलो वापस भारत देश का भ्रमण करते हैं और देखते हैं कि स्त्रियों की पुरुषों की देश की राष्ट्र की क्या परिस्थिति है और उसके पुनरुत्थान के लिए क्या किया जाए दिस इज द टर्निंग पॉइंट इन स्वामी जीज लाइफ स्वामी जी के जीवन के जो कुछ कुछ टर्निंग पॉइंट्स मैंने देखे हैं उसमें सर्वप्रथम तो ठाकुर के पास आगमन उसके बाद में यह अल्मोड़ा की गुफा की घटना कि जबकि उनका पूरा मन ठाकुर के पास आने से ही आध्यात्मिक चेतना में आध्यात्मिक साधना में आध्यात्मिक जीवन में वह डूब गए थे उन्होंने यही सोच लिया था कि जिस तरह से ठाकुर भी एक दक्षिणेश्वर में अपने छोटे से कमरे में रहकर के साधना की बाद में भले ही उन्होंने भक्तों को आमंत्रित किया और उनके के साथ में बात करते रहे तो स्वामी जी भी शायद ऐसा ही कुछ करेंगे कि पहले तो जीवन भर साधना करेंगे समाधि में डूबे रहेंगे और फिर आखिर आखिर में कुछ-कुछ भक्त जो एक मने एक निष्ठ शिष्य यदि उनके पास में इकट्ठा होते हैं तो उनको वह त्याग वैराग्य वेदांत की शिक्षा देंगे ऐसा शायद उन्होंने अपने मन में सोचा होगा किंतु भाग्य विधाता की यह इच्छा नहीं थी स्वामी जी से एक बिल्कुल ही भिन्न कार्य करवाना था ठाकुर का जीवन देखिए और स्वामी जी का जीवन देखिए इससे बड़ा कंट्रास्ट दो लाइफ में आपको नहीं मिलेगा कहां ठाकुर का संपूर्ण अंतर्मुखी जी पूरे जगत में भारत वर्ष का वेदांत की प्रतिष्ठा करते हुए घूमे यह क्रिश्चियन मिशनरी हो ना कि वो मने फेनेटिक्स हो ईवन हिंदू धर्म के भीतर में कोई कोई फेनेटिक थे कोई कोई रूढ़ी चुस्त लोग थे जिनको कि स्वामी जी की बातें नहीं पसंद थी सबके साथ में फाइट किया संघ की स्थापना की तो स्वामी जी का जीवन और ठाकुर का जीवन कितना बड़ा कंट्रास्ट तो ये कंट्रास्ट पहले सबसे पहले प्रोनाउंस हुआ ये जो डायवर्जेंस स्टार्ट हुआ वो अल्मोड़ा की गुफा की घटना से कि जहां से स्वामी जी वापस आए और भारत में भ्रमण स्टार्ट किया तीसरा टर्निंग पॉइंट जद देखेंगे तो कन्याकुमारी में वह शीला खंड पर बैठे हुए थे और ठाकुर ने उनको प्रकट होकर के आदेश दिया था कि जाओ उनको पश्चिम की ओर यात्रा करनी तो मुझे लगता है कि स्वामी जी का जो जीवन और रामकृष्ण संघ बाद में जो बना उसके फाउंडेशन में यह तीन घटनाएं स्वामी जी के जीवन में हुई इसकी वजह से आज हम यहां पे हैं जिस पोजीशन में है वो इन तीन घटनाओं से तो मैंने यह जो स्त्रियों के अपलिफ्टमेंट की बात है स्त्रियों के कल्याण की जो बात है वो स्वामी वही एक्चुअली बात लेकर के ही तो स्वामी जी ने अपना भारत भ्रमण और जगत कल्याण के मिशन की शुरुआत की थी तो स्वामी जी जब यह बात कहते हैं कि मेरा एक काम हो जाने से ही मैं निश्चिंत हो जाऊंगा राखल भाई तुम उद्योग करके मेहनत करके मेरा यह काम कर दो मां के लिए एक जगह खोज लो मां के लिए एक जगह मिल जाएगी तो वहां पर स्त्रियों का मठ प्रारंभ होगा और फिर वही गारगी मैत्री जो अपने पुराण काल की ऋषिया ती वह फिर से भारत की इस धरा पर जन्म लेगी और भारत की संस्कृति और आध्यात्म फिर से आकाश को छूने लगेगा आगे स्वामी जी लिखते हैं आमार टाका कोड़ी सब मौजूद अर्थात की मेरे पास में टाका कड़ी अर्थात की पैसा वगैरा सब है खाली तुम उठे पड़े लेगे एकटा जमी देखे सुने केनो मेरे पास में पैसा वगैरह सब है तुम सिर्फ एक काम करो उठे पड़े ले गए अर्थात की उठ कर के चोटी बांध कर के शीखा बांध कर के कमर कस के जमीन देखने का शुरुआत कर दो जमीन और खास कर देखिए यहां पर स्वामी जी ने कहा है उठे पड़े लेगे अर्थात की मेहनत करके आर शने केनो अर्थात देखे सुने केनो माने ऐसा ही नहीं कि जमीन ले लो तो जैसे भी कहीं पर जमीन मिल गया नहीं मठ की स्थापना करनी है तो बड़ा ही सोच समझ करके जमीन लेना होता है गंगा के किनारे ही लेना होगा शुभ जगह देखनी होगी बड़ी साइज चाहिए आसपास में कोई डिस्टरबेंस नहीं चाहिए बहुत कुछ सोचना पड़ता है जिन लोगों ने जमीन खरीदने का काम किया है उनको यह बात पता है अभी यहां राजकोट की ही बात करूं तो पिछले साल पिछले साल तो क्या माने पिछले पांच एक साल से हम लोग प्रयास कर रहे थे कि अहमदाबाद बहुत अहमदाबाद यानी कि गुजरात का सबसे बड़ा सिटी गुजरात का कैपिटल है गांधीनगर और उसके पास में ही है अहमदाबाद तो एक्चुअली कैपिटल गांधीनगर है किंतु सबसे बड़ा सिटी कहा जाए इंडस्ट्रियली वगैरह तरह से धन संपत्ति की दृष्टि से तो वो अहमदाबाद है तो अहमदाबाद में रामकृष्ण मठ के लिए जमीन लेने की बात चल रही थी पिछले 5 साल से यहां से हमारे बड़े महाराज बाकी सब सन्यासी जाकर के कितनी जमीन देखे कितना घूमे तब कहीं जाकर के हमारे हाथ में एक जमीन हाथ में आई बजट भी तो देखना पड़ता है जगह देखनी पड़ती है सब कुछ यानी कि जो जमीन खरीद करता है उनको पता है कि यह कितना मुश्किल कार्य है तो इसलिए स्वामी जी कहते हैं कि उठे पड़े ले गए एक बार कमर कसके देखे सुने अर्थात कि ठीक से जांच पड़ताल करके एक जमीन खरीद लो जमीर जन्नो तीन चार अथवा 5000 पर जन तो लागे तो खती नाई माने उस समय की बात है स्वामी जी कहते हैं जमीन के लिए तीन चार या इवन 000 भी लग जाए तो कोई परेशानी नहीं है आज आपको तीन चार पा करोड़ में भी जमीन नहीं मिलेगी यदि आपको बड़ी साइज और अच्छी जगह पर चाहिए किंतु उस समय के अनुसार यह हजार अर्थात कि आज के करोड़ ही हुए तो देखिए कि अच्छा एक दूसरी बात है देखिए स्वामी जी ने ने खून का पानी किया ना लहू का पानी करके जो अमेरिका में जाकर के जो पैसे कलेक्ट कर रहे थे भारत में एक शुभ कार्य का प्रारंभ हो तो उसमें वह सक्सेसफुल हुए थे बाकी बहुत सारे लोगों का मेरा भी शुरू शुरू में एक इंप्रेशन था कि पैसा वगैरह ज्यादा नहीं मिला है क्योंकि स्वामी जी का एक टेंडेंसी ही था कि ये क्या है ना कि इवन स्वामी जी का ने ठाकुर का भी ये टेंडेंसी था ठाकुर से ही स्वामी जी के भीतर में ये आया होगा जब ठाकुर को वहां काशीपुर ले गए तो वहां पर ऐसा था ना कि बात ऐसी थी शुरू शुरू में यह सुरेश मित्र रामचंद्र दत्त वगैरा ने क्या सोचा था कि हम लोग घर से यहां पर आएंगे रात को घर चले जाएंगे दिन में यहां पर रहेंगे ठाकुर की सेवा करेंगे और वहां पर जो काशीपुर की जो उद्यान गृह है वहां पर ठाकुर रहेंगे मां रहेगी और शायद एक दो सेवक रहेंगे ऐसा सोच कर के वहां पर जमी भाड़ा घर लिया गया था और खाने पीने की व्यवस्था की गई थी किंतु ऐसा हुआ आखिर आखिर में कि यह त्यागी संतान ठाकुर के जितने भी थे वह सब धीरे-धीरे करके वहां पे इकट्ठा होने लगे और दिन रात वहीं पे रहने लगे तो इससे तो नेचुरली यह तो सब यंग लड़के हैं यह तो उनको तो आहार भोजन भी तो ठीक से चाहिए तो खर्चा थोड़ा सा बढ़ने लगा तो अभी ऐसी बातें होने लगी कि यह लड़के लोग यहां पर रहते हैं तो फिर हम लोग क्या इतना खर्चा कौन देगा तो यह बात सुनक के ठाकुर को बड़ा ही आघात लगा और ठाकुर ने कहा कि यदि इन लोगों के पास में खर्चा देने का साहस नहीं है तो ठाकुर ने नरन को क्या कहा था तोर कांधे बस जेखाने निए जाबी सेखाने आमी जाओ अर्थात कि तुम अपने कंधों पर बिठा कर के मुझे जहां पर भी ले जाओगे मैं जाऊंगा इन लोगों के पास में तुम लोगों के खाने के लिए पैसा नहीं है तो मुझे भी यहां पर रहने की जरूरत नहीं यहां तक ठाकुर ने कह दिया था किंतु फिर बाद में क्या हुआ कि कुछ लोगों ने और इसके साथ-साथ में ही दूसरा क्या चल रहा था कुछ-कुछ लोग चंदा इकट्ठा करने का सोच रहे थे कि ठाकुर के पास में जितने भक्त आएंगे उनको कहेंगे कि अच्छा ठाकुर के लिए पैसा दो तो यह बात ठाकुर को पसंद नहीं थी यह चंदा इकट्ठा करना या तो फिर कोई यह सोचे कि अरे भाई मैं पैसा नहीं दूंगा यह वो माने क्या होता है चंदे के रुपए से कौन खाना खाएगा ठाकुर को तो यह बात नहीं पसंद थी तो इसलिए ठाकुर ने यह गिरीश घोष है या तो उनको कहा था एक दो भक्तों को कि देखो यह लोग चंदा इकट्ठा करने के बारे में सोच रहे हैं किंतु मुझे इस तरह से चंदे के रुपए पर नहीं रहना तुम लोग एक मेरा तुम लोग यह जो यहां का खर्चा है उसका भार ग्रहण कर लो तो गिरीश ने कहा था कि अरे महाशय मैं अपना अपना जो थिएटर है उसको बेच कर के रुपया कलेक्ट करूंगा और आपका भरण पोषण करूंगा अर्थात कि ये काशीपुर उद्यान ग्रह का जितना खर्चा है उसका निर्वाह मैं करूंगा किंतु फिर आखिर में क्या हुआ कि ये सुरेश मित्र फिर उसने आकर के बहुत सारा जिम्मा अपने सर पर ले लिया अर्थात कि कोई ऐसा रसत दार देखिए कि रसत दार पैसा देता है व एक चीज है और चंदा इकट्ठा करना व दूसरी चीज है माने ये हमको आश्चर्य होता है कि इसमें कौन सी माने डिफरेंस क्या है एक धनी व्यक्ति पूरा म खर्चा दे देता है या तो दो तीन धनी व्यक्ति हो करके पूरा खर्चा दे देंगे और बाकी बाकी भक्तों से थोड़ा-थोड़ा करके कलेक्ट करेंगे उसमें क्या डिफरेंस क्या है किंतु यह डिफरेंस है ठाकुर के मन में था और स्वामी जी के मन में भी था और इसीलिए स्वामी जी जब अमेरिका में प्रवचन देते थे तो क्या होता था कि लेक्चर हॉल में जैसे अमेरिका के चर्च वगैरह होते है ना वहां पर ट्रेडिशनल अर्थात कि सर के ऊपर में जो टोपी पहनते हैं वो ठंडी के दिनों में तो वहां प तो ठंडी होती है तो सभी लोग टोपी पहनते हैं उसको हेट बोलते हैं तो हेट को ऐसा घुमाते हैं उल्टा करके तो जिनको चंदा देना होता है तो हेट में डाल देते हैं इसको कलेक्शन बोलते हैं चर्च में कलेक्शन होता है इस तरह से कि वो जो प्रिस्ट होता है वहां का जो बिशप होता है वो प्रवचन देगा वो वो जो मास या तो सर्विस ये सब वहां के कांसेप्ट है पूजा प्रार्थना जो भी है वो करेगा और फिर वो हेट घुमाएगा और जिसको कलेक्शन करना है उसमें च चंदा डालेगा तो इस तरह से स्वामी जी के प्रवचनों में भी इस तरह से पात्र घुमाया जाता था और इसमें पैसे डाले जाते थे किंतु स्वामी जी क्या करते थे पता है इसमें से बहुत सारे पैसे वो वहीं पर डिस्ट्रीब्यूटर देते जैसे ही उनकी नजर में कोई को ऐसी संस्था जैसे होम ऑफ ट्रुथ है या तो फिर ऐसा कोई गरीब व्यक्ति आया जैसे कि ये क्रिस्टिन ग्रीन स्टडर है जो कि बाद में सिस्टर क्रिस्टिन भगिनी क्रिस्टिन हुई स्वामी जी के साथ में भारत आई थी ऐसे उनके जो दरिद्र डिसाइल थे या तो ऐसी संस्थाए जो कि अच्छा काम कर रही है स्वामी जी ये जो चंदा का पैसा इकट्ठा हुआ है वो सब उनको दे देते थे फिर बाद में किंतु ये जब भारत में कार्य करने की बात आई तो उनके जो धनी जो डिसाइल थी मिसेस ली बुल है या तो फिर फ्रांसिस येय ये जो फ्रांसिस है उनका जो डिसाइल था ऐसे तीन चार डिसाइल ने ही वो ज्यादातर पैसा यहां पर दिया था बेलूर मठ की शुरुआत करने के लिए तो यानी कि वो पैसा भी किस तरह से इकट्ठा करते हैं ये लोग वो भी एक देखने की बात है तो यहां पर स्वामी जी कहते हैं कि जमीन के लिए तीन चार या तो फिर 5000 भी लगे तो कोई दिक्कत नहीं है द्वार घोर द्वार एक खोने माटर भालो एक तलाक कोठार चे माटी घोर ढेर भलो क्रम घर द्वार धीरे-धीरे उठबे अर्थात की यह जो घर है यह मकान जो जमीन के ऊपर में बनाएंगे मिट्टी का होने से सबसे अच्छा है एक मने एक पक्का मकान होने की बजाय सिर्फ मिट्टी का मकान होगा तो बहुत अच्छा होगा बाद बाद में धीरे-धीरे करके पक्के मकान बनते रहेंगे देखिए स्वामी जी ने जो ऐसा कहा इसके भीतर में बहुत लंबा लॉजिक है यहां पर वह क्या कहना चाहते हैं बहुत बार ऐसा होगा कि आपको जद रहने के लिए जगह खोजनी है तो जैसे कि ये काशीपुर उद्यान गृह था ठाकुर के रहने के लिए खोजा उसमें क्या था मकान जो था वो भवन जो था बड़ा ही सुंदर भवन था दो मंजिला भवन था सब फैसिलिटी ज्यादातर थी किंतु जमीन बड़ी छोटी थी अभी स्वामी जी क्या कहते हैं उल्टा कहते हैं स्वामी जी कहते हैं कि लंबे समय तक हमारा मिशन चलने वाला है तो हमको बड़ी साइज की जमीन चाहिए जिससे कि भविष्य में हम लोग एक के बाद एक बहुत सारा डेवलपमेंट कर पाए यदि वेद विद्यालय शुरू करना है तो भी वहां पर शुरू हो जाए उसके लिए जमीन वहीं पर हो यदि मंदिर बनाना है तो उसी के लिए भी वहां पर जमीन पर्याप्त हो यदि बहुत बड़ा भंडार गृह बनाना है जिससे कि उत्सव करने के समय बहुत सारे भक्त आते हैं उनके लिए भोजन पकाना और उनको बिठा करके आहार करने की व्यवस्था हो तो उसके लिए भी पर्याप्त जमीन हो बहुत बड़ा एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक बनाना है विद्यालय शुरू करना है इतने सारे प्रोजेक्ट स्वामी जी के माइंड में थे तो स्वामी जी कहते हैं कि तीन चर 5000 टाका जो है पैसा जो है वैसे लगता तो बड़ी रकम है किंतु यदि हम पक्का मकान खोजने को जाएंगे तो क्या होगा एक बड़ा मकान तो मिलेगा कि किंतु जमीन बड़ी छोटी हो जाएगी इससे क्या होगा कि शॉर्ट टर्म अपना काम तो चल जाएगा कि स्त्रियों को रहने के लिए आहार करने के लिए पूजा पाठ करने के लिए जो बेसिक फैसिलिटी चाहिए वो मिल जाएगा किंतु जमीन छोटी रहने से भविष्य में जो डेवलपमेंट होना है वह शायद नहीं होगा इसलिए स्वामी जी कहते हैं कि जमीन बड़ी ले लो फिर लंबे समय तक अभी तो 1500 साल तक मिशन चलने वाला है एक के बाद एक बहुत सारे इंस्टीट्यूशंस की स्थापना करनी है तो पर्याप्त जमीन एक प्राइम लोकेशन पे अपने हाथ में होने से हम भविष्य में बहुत कुछ करने को सोच सकते हैं इसीलिए जमीन बड़ी होनी चाहिए घर उसके ऊपर में भले ही चाहे मिट्टी का बना करके रहो और यही काम स्वामी जी ने कश्मीर में भी किया था कश्मीर गए थे वहां के महाराजा ने कहा था कि स्वामी जी आप यहां पर मठ बनाइए तो स्वामी जी ने कहा कि एक बड़ी जमीन दो वहां पर और कुछ कोई बिल्डिंग वगैरह नहीं चाहिए जितना आप पैसा हमारे लिए खर्च करना चाहते हैं मठ के लिए बड़ी जमीन दे दो तो बड़ी जमीन वहां के महाराजा ने हमको दी थी और स्वामी जी और यह मिसेस ओली बुल वगैरह वहां पर तंबू बना कर के रहे थे टेंट बना कर के टेंट डाल कर के रहे थे क्योंकि मकान वगैरह कुछ नहीं था तो इसका भी एक आनंद है अभी यह जो अहमदाबाद मठ हमारा हो रहा है बहुत बड़ी जमीन ली गई है उसके ऊपर में कुछ नहीं है एग्रीकल्चर लैंड ही है वहां पे एक ट्रेलर रखा हुआ है तो मैं तो वहां पर गया नहीं किंतु जो जो गए हैं सबसे रिपोर्ट सुना है कि वहां ट्रेलर में रहना चारों ओर खेत ही खेत है कितना मजा आता है कितना सुंदर है अभी कहीं शहर में एक बड़ा सा मकान ले लिया होता तो इमीडिएट शायद हमको रहने के लिए सुविधा हो जाती किंतु भविष्य का डेवलपमेंट वहां पे नहीं होता क्योंकि ये जो रेसिडेंशियल एरिया या तो फिर इंडस्ट्रियल एरिया में मठ बनाना मठ का जो एक धार्मिक आध्यात्मिक वाइब्रेशन वो बनता नहीं है इसलिए खुले खेत में एक बड़ी सी जमीन ले ली है कोई भी बिल्डिंग वगैरह कुछ नहीं है बिल्डिंग वगैरह धीरे-धीरे होते रहेंगे अभी ये लोग ट्रेलर एक डाला है उसमें यह लोग रह रहे हैं तो यह स्वामी जी का विचार है जब भी मठ की स्थापना करनी है तो जमीन पहले बड़ी देख करके ले लो उसके ऊपर में मकान के लिए इनिशियल जो फंड होता है अपना मठ स्टार्ट करने का मैक्सिमम फंड जमीन के में भीतर में डालना है मकान वगैरह बाद में होता रहेगा तो यह अच्छा यह काश्मीर की बात किंतु काश्मीर में स्वामी जी यह मिसेस सली बूल निवेदिता के साथ में टेंट में रहते थे किंतु अनफॉर्चूनेटली जो भारत के साथ में होता रहा है यदि कश्मीर में अपना मठ हो जाता ना उस समय तो पता नहीं यह बाद में भारत की कोई शक्ल ही कुछ अलग होती किंतु अनफॉर्चूनेटली अपने भारत के साथ की जो परिस्थिति है कि वहां का जो ब्रिटिश रेसिडेंट था उ उसको यह बात पसंद नहीं आई कि रामकृष्ण मठ वहां पर स्थापित हो क्योंकि उसको पता था कि स्वामी जी की आइडियो जीी वैसे तो धार्मिक है वैसे तो वेदांत के बारे में बोलते हैं किंतु स्वामी जी से प्रेरणा लेकर के बहुत सारे ये जो रेवोल्यूशन है वो अभी भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए आंदोलन चला रहे हैं तो रेसिडेंट ने जाकर के महाराजा को धमकी दी कि यहां पे यहां से इन लोगों को हटाओ इन लोगों को जमीन मत दो मठ बनाने के लिए और हमारा जो वो हिंदू महाराजा थे वो भी ऐसे कायर बोलो ना कि जो भी बोलो उसने ब्रिटिश रेसिडेंट की बात सुन कर के जमीन फिर से ले ली तो बोल कर के कश्मीर में अपना मठ नहीं हुआ तो दैट इज मैंने व्ट इफ कहते हैं ना इंग्लिश में यदि ऐसा होता तो क्या होता तो मैंने ये सोचने लायक है कि काश्मीर में यदि रामकृष्ण मठ की स्थापना हो जाती उस समय स्वामी जी के रहते रहते तो क्या होता बाद में तो जो भी है तो यहां पे देखिए कि स्वामी जी का किंतु प्रैक्टिकल सेंस जिस तरह से है एक तो कि स्त्रियों का पुनर उत्थान या तो फिर कहेंगे कि स्त्रियों का मानसिक संस्कार सिंचन यह स्वामी जी के मन में सबसे पहले था और इसके लिए जो एक प्रैक्टिकल उपाय भी बताते हैं कि मठ की जमीन पहले ले लो जमीन बड़ी होनी चाहिए मकान वगैरह मिट्टी का ही ठीक है बाद बाद में सब मकान धीरे-धीरे बनाते रहना जे नामे बा रको में जमी किनले अनेक दिन चलबे ताई उकल देर परामर्श करबे जिस नाम से या तो फिर जितना रुपया देने से जमीन खरीदने से बहुत दिन चले वैसा करना और इसके बारे में वकील अर्थात कि यह जो एटर्नी लॉयर वगैरह है उनका भी सलाह मशवरा ठीक-ठीक करना अर्थात ऐसा नहीं कि 100 इयर्स की लीज पे ली है और 100 इयर्स लीज खत्म हो गई तो वह बोले कि चलो दे दो जमीन हमको वापस अभी ऐसा करने से प्रॉब्लम यह है कि तो चलने वाला है 1500 साल तो बाद में क्या होगा और खास करके क्या है कि ये हेड क्वार्टर्स वगैरह शुरुआत के प्रारंभ के मठ बनते हैं आप सोचेंगे कि चलो 100 साल के बाद में अपने पास में इतने डिवोटा हो जाएंगे इतना हमारे पास में फंड हो जाएगा कि और बड़ी जगह ले लेंगे तो प्रॉब्लम क्या है देखिए यहां पर रामकृष्ण आश्रम राजकोट की 100 व जयंती अभी सेलिब्रेट होने वाली है आश्रम की स्थापना हुई थी 1927 28 में तो अभी यह 27 28 तो आ रहा है तो 100 इयर्स समाप्त होने हैं तो अभी हम लोगों की मीटिंग हुई थी इसके बारे में वहां पर चर्चा हुई थी कि आश्रम सबसे पहले कौन सी जमीन पर स्टार्ट हुआ था तो यह तो वोह जमीन नहीं है यह जमीन तो बाद में ली गई सबसे पहले जमीन जहां पे थी वहां पर तो ये विज्ञानानंद जी महाराज आए थे तो फिर अभी डायरेक्ट डिसाइल का आगमन जहां पर हुआ है वोह तो बड़ी ही पवित्र जगह है तो किंतु वो जगह तो बाद में हमने बेच दी और दूसरे किसी के पास में है और नई जगह ली तो क्या है कि वो तो एक मॉन्यूमेंट होता है ना डायरेक्ट डिसाइल का आना और यहां पर तो मां स्वयं आती आएगी यदि स्त्रियों के लिए मठ बनेगा तो मां का आगमन जिस जमीन पर होता है बाद में उस जमीन को बेच देना या तो फिर वह जमीन अपने हाथ से चली जाए तो कितना बड़ा मिसफॉर्चून होगा तो इसके लिए ही स्वामी जी ने बड़ा लंबा सोच करके कहा था बात ये नहीं है कि जमीन अपने हाथ में रहे ना ना रहे यह जो आध्यात्मिक वाइब्रेशन वहां पर जो फर्स्ट जनरेशन मां और उनकी सीनिया और प्रथम सन्यास निया जो वहां पर रहकर जब ध्यान करेगी वो वाइब्रेशंस कहीं वो बिखर ना जाए इसलिए स्वामी जी इतना माने केयरफुली परामर्श करने को बोल रहे हैं जो जमीन एक बार लेते हैं किस नाम से लोग और किस तरह से लोगे जिससे कि वह सब समय अपने पास में रहे तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम श हरि ओम श्री राम