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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठा राम पनाय ते नम तो आज फिर से स्मृति कथाओं का सिलसिला चालू रखते हैं कल हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर माहा स्वामी जी के जो सन्यासी संतान है उनके जीवन की छोटी-छोटी घटनाएं भी हमारे हृदय को छू लेती है हो सकता है कि उसमें से फिलोसॉफिकल डेप्थ बहुत ज्यादा हम न खोच पाए होता है बहुत बार क्या होता है कि हमको समझ में नहीं आता है कि इसमें क्या फिलोसोफी है बहुत बार ऐसा होता है कि सालों साल यह सब घटनाएं अपने हृदय में हम बंद करके रखते हैं और कहीं ऐसा कुछ हम हमारे साथ में कोई ऐसी एक परिस्थिति आ जाती है कि एकाएक यह पार्टिकुलर घटना या पार्टिकुलर इंसिडेंट के माध्यम से हमको ठाकुर क्या बताना चाहते हैं वह एकाएक हमारे सामने वह खुल कर के स्पष्ट हो जाता है तो इस तरह की घटना परंपरा और थोड़ा सा आगे देखते हैं बाबूराम महाराज के बारे में बाबूराम महाराज अर्थात स्वामी प्रेमानंद ठाकुर के एक सन्यासी शिष्य अभी स्वामी प्रेमानंद का जिस तरह से नाम है उसी से हमको पता चलता है स्वामी जी स्वामी विवेकानंद ने विरजा होम के बाद में वरा नगर मठ में सबको अपने अपने सन्यास नाम दिए थे तो सन्यास नाम देने के समय एक देखा था कि किसका क्या स्वभाव है उस स्वभाव के अनुसार स्वामी विवेकानंद ने सबको नामकरण किया था इंटरेस्टिंग स्वामी जी ने अपने को खुद को नाम दिया था स्वामी विविध नंद विवि दिशा का अर्थ क्या है कि वह साधक कि जो कि अभी भी साधक अवस्था में है उसको अभी भी सन्यास जीवन की सर्वोच्च प्राप्ति नहीं हुई है हालांकि स्वामी जी को काशीपुर में ही निर्विकल्प समाधि प्राप्त हो गई थी स्वामी जी के भीतर में ठाकुर ने शक्ति संचार कर दिया था ठाकुर ने रोते-रोते कहा था मेरे भीतर में जो कोई भी शक्ति है सब देकर के मैं आज भिखारी हो गया हूं भिक्षुक हो गया हूं इसके बावजूद भी स्वामी जी ने अपने को विविध सानंद नाम दिया था और बाद में जब स्वामी जी सन्या एज ए परिव्राजक रखे हैं आप तो ऑलरेडी सिद्धों के सिद्ध है तो इस तरह का नाम रखना आपको उचित नहीं है और उन्होंने स्वामी जी को विवेकानंद नाम दिया था तो अभी इसके बारे में कोई कंफर्म बताना मुश्किल है किंतु तो ये एक स्वामी जी के नाम के बारे में अच्छा स्वामी जी ने यह भी एक सोचा था कि मैं राम कृष्णानंद नाम रखूं अपने को राम कृष्णानंद नाम क्योंकि वह तो ठाकुर के प्रधान शिष्य तो वही थे किंतु फिर भी उन्होंने राम कृष्णानंद नाम शशि महाराज को दिया क्यों क्योंकि शशि महाराज ने ठाकुर की जिस तरह से सेवा की थी उस सेवा की म और कोई दूसरी मिसाल मिलना मुश्किल है यहां तक कि रामचंद्र दत्त स्वयं जो कि इन त्यागी संतानों की विरोधी थे कुछ-कुछ बातों में उन्होंने भी अपनी एक ठाकुर के बारे में एक किताब लिख कर के उसमें उन्होंने लिखा है और नरेंद्र के बारे में या और किसी के बारे में कोई अच्छा प्रशंसा वगैरह कुछ नहीं की त्यागी संतानों के बारे में किंतु सिर्फ शशि महाराज के बारे में उन्होंने कहा है कि शशि ने जिस तरह से सेवा की है ठाकुर की इस इस सेवा के माध्यम से ही शशि को मुक्ति सब मिल गई है शशि अमर हो गया है तो इतना बड़ी ही सुंदर प्रशंसा रामचंद्र दत्त ने स्वयं की थी तो स्वामी जी ने क्या किया था कि राम कृष्णानंद नाम उन्होंने शशि महाराज को दिया था तो वैसे ही बाबूराम महाराज थे उनको स्वामी जी ने नाम दिया था स्वामी प्रेमानंद तो प्रेमानंद अर्थात की प्रेम के अवतार स्वयं उनका जो हृदय था उस हृदय में लोगों के प्रति इतना करुणा था इतना मैत्री था इतना प्रेम था कि जैसे कि बेलूरमठ में उस समय लोग आते थे तो उनकी प्रेम से वे लोग गदगद हो जाते थे उनके प्रेम से बाबूराम महाराज के प्रेम से वे लोग विभोर हो जाते थे एक दिन की घटना है कि वहां पर यदि आप बेलूरमठ गए होंगे तो आपने वहां पर गंगा नदी देखी होगी गंगा नदी ऑलमोस्ट 2 किलोमीटर के आसपास उसकी चौड़ाई है तो सामने के किनारे से कुछ लड़कों ने गंगा तेर करके बेलूरमठ के घाट के ऊपर में आए सोचा कि हम लोग मां मंदिर में जाकर के ठाकुर को प्रणाम करेंगे अभी यह इतनी लंबी गंगा तैरना और फिर पता नहीं किस समय उन्होंने प्रारंभ किया होगा दिन में तो जब तक वह बेलूर मठ में आ पहुंचे तब तक क्या हुआ था कि बेलूरमठ में मंदिर बंद हो चुका था साधुओं का भक्तों का आहार समाप्त हो चुका था और भंडार घर को ताला लगा कर के रसोइया जो थे खाना बनाने वाले वे लोग विश्राम के लिए चले गए थे तो बाबूराम महाराज को जैसे ही पता चला कि इस तरह से लड़के आए हैं इतना लंबा तैर करके 2 किलोमीटर गंगा में तैरना बड़ी ही मतलब ताकात और बड़ा ही सशक्त शरीर चाहिए उसके लिए आपकी पूरी एनर्जी एग्जॉस्ट हो जाएगी तो यह लोग निश्चय थके भी होंगे और भूखे भी होंगे तो इमीडिएट बाबूराम महाराज ने स्वामी प्रेमानंद जी ने भंडार गृह का किचन का ताला खोला अपने हाथों से इन लोगों के लिए खिचड़ी वगैरह बना बनाया और अपने हाथों से इनको खिलाया परोसा तो यह देख कर के वह लड़के इतने अभिभूत हो गए देखिए कि यह जो आश्रम में आए हुए भक्तों की इस तरह से स्वागत करना यह परंपरा बाबूराम महाराज के समय से ही चली आई है तो यह यह है हमारे बाबूराम महाराज एक दिन की इसी तरह की एक दूसरी घटना है उस समय तो जैसे हम सबको पता है कि बेलूरमठ के ऊपर में यह ब्रिटिश सरकार का यह गुप्तचर भाग की एक बड़ी कड़ी नजर रहती थी क्यों क्योंकि ऐसा माना जाता था कि बहुत सारे विप्लव है यह गुप्तचर लोग जिस जिस विप्लव को उनको गिरफ्तार करते थे उनको अरेस्ट करते थे देखते थे कि सभी के पास में स्वामी जी के पत्र है या तो फिर यह स्वामी जी की कोई नहीं कोई किताब है सब इन लोगों के पास में मिलेगा तो अभी यह किताबें देख कर के यह गुप्तचर विभाग को सीआईडी को यह संदेह हुआ कि यह बेलूरमठ वा ले जानबूझ कर के स्वामी जी का सीडी शियस लिटरेचर सीडियस लिटरेचर अर्थात कि लोगों में अ लोगों के मन को लोगों के मन में असंतुष्ट प्रकट करने वाला लिटरेचर जिससे कि लोग ब्रिटिश गवर्नमेंट के अगेंस्ट में वह रिबेलियस करें इस तरह का लिटरेचर बेलूरमठ जानबूझ कर के फैला रहा है और इसीलिए बेलूरमठ के ऊपर में यह गुप्तचर विभाग की बड़ी कड़ी नजर थी और वे लोग क्या करते थे बीच-बीच में कोई भी एक गुप्तचर आकर के बेलूरमठ में बैठा रहेगा और बैठ कर के सब कुछ नोट करेगा कि यहां पर कौन आता है कौन जाता है कौन किसके साथ में बात करता है वगैरह वगैरह अभी एक दिन की बात है कि दोपहर थी सभी बेलूर मठ में साधु ब्रह्मचारी भक्त लोग खाना खाने के लिए बैठने वाले थे और उस दिन धूप बहुत था गर्मी की सीजन थी बहुत भयानक धूप थी तो अभी जैसे कि खाना खाने का समय है और बेलर मट में बाबूराम महाराज स्वयं उपस्थित है तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि मठ में कोई भी कोई भी हो उस समय कोई कहां से भी आया हो कोई भी अनजाना आदमी क्यों ना हो बिना प्रसाद ग्रहण किए उसको चले जाना पड़े बाबूराम महाराज के रहते रहते तो हो ही नहीं सकता तो बाबूराम महाराज ने एक बार नजर रख दी एक बार नजर डाल कर के देख लिया कि वहां पर प्रांगण में और कोई भक्त तो नहीं है तो जिसको कि आमंत्रण नहीं दिया गया है बहुत बार ऐसा होता है कि खाना खाने की घंटी बजती है तो कोई भक्त लोग अपने डाइनिंग हॉल में आने से संकोच संकोच अनुभव करते हैं उनको लगता है कि अरे हमको तो किसी ने निमंत्रण नहीं दिया सीधा जाकर के खाने को कैसे बैठ जाए तो बाबूराम महाराज सबको पकड़ पकड़ के ले आके खाना खिलाते थे तो ऐसा आखिरी नजर डाल रहे हैं देख रहे हैं कि सभी लोग बैठ गए हैं एक आदमी खड़ा है पेड़ के नीचे में और बेचारा बिल्कुल परेशान है धूप की वजह से पसीना हो रहा है भूख भी लग होगा पता नहीं कब से वहां पर है तो बाबूराम महाराज ने इस व्यक्ति को देखा और व्यक्ति को देख कर के उन्होंने एक ब्रह्मचारी को कहा कि जाओ व जो व्यक्ति खड़ा है पेड़ के नीचे में उसको बुला के ले आओ उसको भी आहार प्रसाद खिलाओ ग्रहण करवाओ तो एक ब्रह्मचारी महाराज गए कहा कि महाराज जी आप बाबूराम महाराज स्वामी प्रेमानंद आपको आमंत्रण दे रहे हैं कृपया आकर के प्रसाद ग्रहण कीजिए तो यह व्यक्ति ने कहा कि देखिए मैं तो गुप्तचर हूं यहां पर जासूसी करने के लिए आया हूं और यह मेरा कर्तव्य है कि मैं कर्तव्य का पालन कर रहा हूं मैं कैसे आपके साथ में बैठ कर के खाना खाऊं मैं तो आपकी आपके बारे में कुछ ना कुछ गलत है अभी यह गुप्त चोर लोग भी होते हैं ना कि आधा तो गलत रिपोर्ट करते हैं पता नहीं यह ब्रिटिश गवर्नमेंट का उनके ऊपर में प्रेशर रहता है कि साबित करो कि यह लोग सब चोर है यह लोग यह है यह लोग कुछ ना कुछ गलत काम करते हैं ये जो पूरा जो गुप्तचर विभाग है उसमें उस समय ऐसा ही सब चलता था जितने भी अच्छे लोग हैं कैसे भी करके उनके ऊपर में संदेह का आवरण फेंको जैसे कि ये अच्छे लोग डर जाए और ब्रिटिश गवर्नमेंट की बात सुने तो यह गुप्तचर बोलता है कि मैं तो गुप्तचर हूं यहां पर जासूसी करने के लिए आया हूं आप लोगों के बीच में मैं बैठ कर के आहार कैसे करूं तो यह ब्रह्मचारी ने जाकर के बाबूराम महाराज को कहा कि वह व्यक्ति कहता है वोह तो यह है सीआईडी का एजेंट है तो बाबूराम महाराज ने उसको फिर से बुलाया खुद बाबूराम महाराज उसके पास में गए और कहा कि देखो भाई तुम आओ हमारे साथ में बैठो खाना खाओ यहां पर प्रसाद ग्रहण करोगे तो शरीर में भी बल आएगा हमारी बात सुनोगे तो तुम्हारे मन को भी शांति मिलेगी उसके बाद में तुमको जितनी भी जासूसी करना हो करना तुमको कौन मना कर रहा है कि एक बार हमारा अन्न ग्रहण कर लिया उसके बाद में तुम हमारे बारे में गलत गलत रिपोर्टिंग नहीं कर पाओगे जाओ जो भी करना है करो किंतु एटलीस्ट प्रसाद का समय हो गया है यहां पर बैठ कर के प्रसाद ग्रहण करो तो वो गुप्तचर भी बेचा इतना अभिभूत हो गया उसको वह सोच रहा है कि सबको पता है कि मैं उनको हानि पहुंचाने के लिए यहां पर आया हूं किंतु फिर भी मैं यहां पर धूप में खड़े रह कर के मैं इतना परेशान हो रहा हूं पसीने से भीग जा रहा हूं सुबह से खड़ा हूं तो आहार नहीं मिला है तो कमजोरी आ गई है शरीर में तो यह सब चीजों की चिंता इन लोगों को है यह नहीं सोचते कि भले मैं उनको हानि पहुंचा हंगा खाना खा कर के नमक हराम करूंगा किंतु फिर भी इन्होंने मुझे खाना खाने के लिए बुलाया और यह गुप्तचर इतना अभिभूत हो गया था कि बाबूराम महाराज का वह अनुरागी हो गया था बाबूराम महाराज के प्रति बड़ी ही श्रद्धा उसकी उत्पन्न हो गई थी बाद में बाद में बाबूराम महाराज का ऐसा एक दूसरा भी एक है बड़ी सुंदर घटना है छोटी सी कि उस समय बेलूर मठ में ट्रस्टी मीटिंग होने वाली थी तो ट्रस्टी मीटिंग उस समय में तो अपने ठाकुर के सभी सन्यासी संतान स्वामी जी के गुरु भाई वही लोग सब इकट्ठा होंगे और वो ट्रस्टी माने असली जिन लोगों के भीतर में ब्रह्मज्ञान है इस तरह के सब अपने संघ के जितने भी वरिष्ठ साधु है ये लोग तो अभी शरत महाराज यानी कि स्वामी शारदानंद वे रहते थे कलकाता में यहां पे उद्बोधन में मायरवार्ड्स सन्यासी संतान थे जीवित उस समय सभी लोग मठ में इकट्ठा हुए हैं और यह इतने सारे ब्रह्म ज्ञानियों का एक जगह पे वह मेला देख कर के किसका हृदय एकदम प्रसन्न नहीं हो जाएगा क्योंकि उनकी उपस्थिति ही जैसे कि एक ब्रह्मानंद की लहर फैलाने वाली उनकी उपस्थिति है तो यह उपस्थिति है और अभी वहां पर एक ब्रह्मचारी महाराज यदि आप बेलूरमठ में गए होंगे पुराना मंदिर देखा होगा तो देखा होगा कि आप ने कि फर्स्ट फ्लोर पे मंदिर है ग्राउंड फ्लोर पे उस समय यह सब ऑफिस वगैरह थी किचन वगैरह था तो वहां पे ग्राउंड फ्लोर पे सीढ़ी के पास में एक ब्रह्मचारी महाराज खड़े हैं शरद महाराज वहां पे आकर के महाराज को पूछते हैं कि बाबूराम महाराज कहां पे है बताओ तो ब्रह्मचारी महाराज ने कहा कि बाबूराम महाराज वहां पे ठाकुर घर में ठाकुर श्राइन में है ध्यान कर रहे हैं तो शरत महाराज ने कहा ठीक है शरत महाराज तो एकदम मोटे सोटे थे सीढ़ी चढ़ कर के ऊपर में गए फर्स्ट फ्लोर पे देखा कि बाबूराम महाराज सही में ठाकुर के पट के सामने ठाकुर के फोटोग्राफ के सामने बैठ कर के ध्यान कर रहा है तो जैसे ही ध्यान करते हुए देखा शरद महाराज ने क्या किया बाबूराम महाराज को उठा लिया अप पूरा व अपनी गोद में क्योंकि बाबूराम महाराज थे दुबले पदले और शरद महाराज थे मोटे छोटे तो ध्यान मुद्रा में बैठे थे तो वैसे ही ध्यान मुद्रा में ही उनको उठा ले आए और फिर उठा कर के नीचे में सीढ़ी उतर कर के ग्राउंड फ्लोर पे वहां पे बड़ा सा मैदान है आज जहां पर काली कीर्तन वगैरह होता है वहां पर लेकर आए उस समय वहां उस मैदान में दुर्गा पूजा होती थी आज दुर्गा पूजा बाहर के बड़े मैदान में होती है तो वहां पे ग्राउंड फ्लोर पे वहां पे जो चौक है वहां पे ले आए और जैसे ही वहां ग्राउंड फ्लोर प आए बाबूराम महाराज के ध्यान ध्यान में से वह बाहर आए ध्यान में से उत्थ हुए देखा कि जितने भी गुरु भाई हैं सब वहां पर खड़े हैं तो वैसे ही बाबूराम महाराज ने नृत्य करना प्रारंभ कर दिया देखिए हृदय के भीतर में कितना आनंद था कि बहुत बार ऐसा होता है ना कि आप दूसरों को देखते हैं तो आपके मन में यही एक होता है कि अरे इसने मेरे साथ में यह अन्याय किया है इसने मेरे साथ में यह किया है मेरा इसके साथ में यह है कुछ ना कुछ दुश्मना आवट है तो लोगों को देख कर के मन में नेगेटिव भाव बहुत बार आता है वह कब होता है जबकि हृदय में आध्यात्मिकता का अभाव हो ब्रह्मानंद का अभाव हो तब किंतु गुरु भाइयों के देखिए कि हृदय इतना भरा हुआ था ब्रह्मानंद से आध्यात्मिक साधना के बल से ऐसा नहीं है कि आपस में झगड़ा नहीं था ऐसा नहीं है कि आपस में आपस में मतभेद नहीं था गुरु भाइयों के भीतर में भी यह डिफरेंस ऑफ ओपिनियन होते थे और किस तरह से होते थे इसका भी उदाहरण आज हम देखेंगे किंतु आध्यात्मिक शांति सर्वोच्च है और जब मिलते थे तो आध्यात्मिकता ही उनका सर्वोच्च भाव रहता था तो जैसे ही बाबूराम महाराज ने देखा कि बाकी सब गुरु भाई भी वहां पर हैं और बहुत सारे साधु इकट्ठा हुए हैं तो वैसे ही बाबूराम महाराज ने नृत्य करना शुरू कर दिया तो बाबूराम महाराज ने नृत्य करना शुरू किया तो फिर वहां राजा महाराज भी है महापुरुष महाराज भी है शरद महाराज भी है सब जितने भी गुरु भाई थे सब लोग साथ में इकट्ठा होकर के बाबूराम महाराज के आसपास में नृत्य कर रहे हैं और यह देखकर के वहां के साधु लोग भी नृत्य कर रहे हैं देखिए कि ये कितना एक सहज सरल इन लोगों का जीवन है कि ऐसी ही घटना ऐसी ही घटना मास्टर महाशय ने कथामृत में वर्णित की है ठाकुर की महासमाधि के बाद में जब मास्टर महाशय वराह नगर मठ में जाते हैं तो जा वरा नगर मठ में भी पता होगा ग्राउंड फ्लोर तो पूरा यह वो जंगल जैसा ही था धूल थी मिट्टी थी पेड़ पौधे हो गए थे पशु भी रहते थे पंखी भी रहते थे किंतु ग्र फर्स्ट फ्लोर पे ये बड़ा सा हॉल था जिसमें लिविंग रूम जैसा था अरेंजमेंट तो जैसे ही मास्टर महाशय ने फर्स्ट फ्लोर पर लिविंग रूम में प्रवेश किया सभी तारक द अर्थात कि महापुरुष महाराज वहां पे थे तो उन्होंने साथ में ही ताथ हैया ताथ या नाचे भुला वो गीत प्रारंभ किया क्योंकि क्या है कि मास्टर महाशय तो वो ठाकुर के साथ वाले वो पुराने भक्त है तो मास्टर महाशय को देख कर के ही ठाकुर के साथ में बिताए हुए वो सुमधुर दक्षिणेश्वर के दिनों की यात्रा हो गई और वैसे ही मास्टर महाशय को देख कर के ही व यह गान प्रारंभ कर दिया यह गान उस समय स्वामी जी ने उसी समय उसकी रचना की थी तो यहां पे महापुरुष महाराज ने गाना चालू किया और यहां पे ये राजा महाराज वगैरह जो बाकी सब गुरु भाई थे उन्होंने खड़े होकर के नृत्य करना चालू कर दिया तो देखिए कि हृदय के भीतर में कैसा ये आनंद आध्यात्मिकता सहज और सरलता का प्रवाह बह रहा है कि कभी भी ये लोग देखते हैं कि गाना गाना वो फिर भजन कीर्तन करना नृत्य गीत करना प्रारंभ कर देते हैं बहुत बार हम लोगों के जीवन में ऐसा होता है कि यह जगत के साथ में हमारा एक ऐसा वेर खड़ा हो जाता है कि मन हमेशा गंभीर गंभीर वो चेहरा उदासीन हृदय में निराशा के बादल यह सब बने रहते हैं और हमको देख कर के दूसरे लोग भी कभी-कभी डिप्रेसो जाते हैं अभी बात यह नहीं है कि जगत में या अपने जीवन में दुख अशांति या तो फिर रिग्रेट या तो फिर सेट बैक या तो फिर डिसीज या तो फिर यह अनफुलफिल्ड डिजायर यह सब ना हो सभी के जीवन में होते हैं ऐसा किसी का जीवन नहीं होगा जो कि परफेक्ट होगा यह जो अमेरिका के जो बड़े-बड़े बिलियोनेरा है अमेरिका के प्रेसिडेंट है यह यहां इंडिया में देखिए बड़े-बड़े एक्टर हैं आपको क्या लगता है कि यह लोग फेमस है धनपति है पॉपुलर है उनके पास में जो चाहे वह चीजें आ जाते हैं बोलकर के ये लोग उनके जीवन में उन के सभी उनके साथ में अच्छा हो रहा है उनके सभी डिजायर फुलफिल हो गए नहीं यह लोग भी सीक्रेट कितनी ही बातों के ऊपर में डिप्रेसो कितनी ही बातों से यह लोग नाराज होंगे तो यह जो नेगेटिविटी है मतलब जीवन के जितने भी ड्रॉबैक है उसके साथ में हम कैसे डील करेंगे अपने को नेगेटिव बना दे जिससे कि बाकी लोग हमारे से परेशान हो कर के रहे हमारे से दूर दूर रहे ना कि अपने हृदय को एक नंदन वन बना दे कि भले चाहे बाहर में हमारे साथ में जो कुछ भी हो रहा है या होगा हृदय के भीतर में हम अनंत शांति का प्रवाह बहा करके रखेंगे हृदय में यह कमल का बागान बनाएंगे जिसके ऊपर में ठाकुर को आमंत्रण देंगे कहेंगे ठाकुर आइए कमल पर विराजित होइए हम आपकी आराधना करते हैं यह चॉइस अपने पास में सभी के पास में है जीवन का ऐसा एक भी दुख नहीं है जो दुख हमारे हृदय के आनंद को मार दे हमको शारीरिक कष्ट दे सकता है हमको मेंटल डिप्रेशन भी शायद दे सकता है किंतु हृदय के आनंद को हृदय के सुख को खत्म कर दे नष्ट कर दे इस तरह का जगत में एक भी कार्य नहीं है इवन मृत्यु भी सामने आ जाए नचता का उदाहरण देखिए मृत्यु के देवता के पास में जाकर के उनको प्रश्न कर रहा है कि तो उनके पास में प्रश्न का उत्तर मांग रहा है तो यह साहस यह आनंद हम सब में होना चाहिए तो देखिए कि अभी दूसरी बात जैसे कि मैंने कहा कि जीवन किसी का परफेक्ट नहीं होता है किसी के मन में हमेशा एक ही सब समय आनंद बना रहता है ऐसा भी नहीं है जीवन के प्रतिकूल क्षणों में भी हम लोग अपने को किस तरह से आध्यात्मिक रख सकते हैं इसके उदाहरण दो उदाहरण बाबूराम महाराज के जीवन में ही देखेंगे बाबूराम महाराज के साथ में उस सम बाबूराम महाराज की अंतिम बीमारी थी और वह देवघर में थे उस समय उनके सेवक थे काना महाराज अभी काना महाराज उनकी जितनी जी जान से प्राण भर कर के सेवा करते थे और उस समय बाबूराम महाराज का खाने पीने में बड़ी ही कठोरता थी कि यह खाना खाएंगे यह आहार करेंगे यह आहार नहीं करेंगे वगैरह तो कहनाई महाराज को यह एक डर था कि शायद बाबूराम महाराज तपस्या करके करके ही शरीर त्याग ना कर दे तो सेवक के रूप में में उनका तो यह कर्तव्य बनता है कि उनकी जितनी भी संभाल ले सकते हैं वह ले तो वह क्या करते थे कि जितना भी दूध आता था वो दूध से ज्यादा दूध उन्होंने मंगवाना शुरू किया और ज्यादा दूध मंगवा करके दूध को घना करके उबाल करके गाढ़ा करके उसका परिमाण कम कर देते थे और फिर यह कम किया हुआ गाढ़ा दूध बाबूराम महाराज को खिलाते थे अभी जैसे कि दूध पतला होता है तो मान लीजिए एक गिलास दूध है उसको आपने उबाल करके गाढ़ा किया तो आधा गिलास हो जाएगा अभी बाबूराम महाराज कहते हैं मुझे आधा गिलास ही दूध देना तो ठीक है आधा गिलास ही दूध देंगे किंतु यह आधा गिलास दूध एक गिलास दूध को उबाल करके बनाया है तो वो पौष्टिक तत्व जो उसमें होंगे वो एक पूरे ग्लास जितने पौष्टिक तत्व प्रोटीन वगैरह इसमें होगा तो इस तरह से काना महाराज बाबूराम महाराज की सेवा करते थे एक दिन बाबूराम महाराज को थोड़ा सा संदेह हुआ उन्होंने काना महाराज को पूछा कि तुम मेरे लिए कितना दूध मंगवाते हो यहां पे जो पैसा खर्च करके दूध आता है वो कितना आता है तो अभी नाई महाराज को यदि सर सीधा प्रश्न हुआ तो वह तो झूठ उत्तर नहीं दे पाएंगे असत्य नहीं बोल पाएंगे उन्होंने सत्य सत्य कह दिया कि एक पूरा गिलास जितना दूध आता है तो वैसे ही बाबूराम महाराज क्रोधित हो गए बोले कि अरे इतना ज्यादा दूध आता है तुम मुझे दे रहे हो सिर्फ आधा गिलास तो बाकी के दूध का क्या हो रहा है क्या तुम अपने ऐसे पी जा रहे हो क्या तुम इसमें से मिठाई बना कर के खा रहे हो क्या हो रहा है बाकी के दूध का ऐसा करके बाबूराम महाराज ने क्रोध किया तो काना महाराज के हृदय में बड़ा ही आघात पहुंचा उन्होंने सोचा कि यहां पे मैं झूठ बोल कर के या तो फिर कैसे भी करके बाबूराम महाराज को तकलीफ ना हो उनका स्वास्थ्य बना रहे तो एक गिलास दूध उबाल करके आधा गिलास करके इनको पिलाता हूं और यह मेरे पे ही लांछन लगाते हैं कहते हैं कि मैं आधा गिलास दूध में ही पी जा रहा हूं बेचारे को बड़ा दुख हुआ और उन्होंने सोचा यह किस तरह के ब्रह्मज्ञानी है ना ही मेरे हृदय की बात समझ पाते हैं ना ही वह मुझे शांति से समझाते हैं शांति से पूछा होता तो मैं उत्तर भी देता कि महाराज आप ही के स्वास्थ्य के लिए मैं दूध को उबाल करके कम करके दे रहा हूं तो ऐसा उत्तर देने का भी मुझे मौका नहीं मिला सीधा मेरे सर पे यह यह लांछन लगा दिया यह आरोप लगा दिया तो यह दुखी हो गए उन्होंने सोचा कि आज रात को बस बाबूराम महाराज की आखिरी सेवा यहां से मैं चल पड़ता हूं उन को मेरी सेवा की जरूरत नहीं है मेरी सेवा से उनके मन में संदेह होता है तो यहां पर रहने की मुझे क्या जरूरत है तो ऐसा सोच कर के बाबूराम महाराज के जब वो बाबूराम महाराज उस समय बहुत ही बीमार थे अपने लिए कुछ भी नहीं कर पाते थे आखिरी समय था उनका तो इसी अवस्था में जो आखिरी सेवा उनकी करनी थी वह करके रात को काना महाराज वहां से मठ में से निकल गए अभी रास्ते से जा रहे हैं जा रहे हैं और मन में सोच रहे हैं कि अरे महाराज तो इतने बीमार हैं उनको तो रात को इस समय यह पार्टिकुलर चीज चाहिए कब वह खड़े होंगे बाथरूम जाने के लिए तो मैं तो हमेशा उपस्थित रहता हूं अभी मेरे जाने से हो सकता है और किसी सेवक को इन्होंने दिया होगा किंतु फिर यह सेवक है उसको तो ज्यादा कुछ पता नहीं महाराज के बारे में कैसे सेवा करनी है तो महाराज को तो कष्ट होता होगा तो यह सोच कर के है काफी दूर निकल गए थे काना महाराज किंतु वहां से वह वापस आए मठ में आकर के महाराज जहां पे शयन कर रहे थे बाय दिस टाइम एकदम अर्ली मॉर्निंग हो चुका था रात को निकल गए थे तो तो अभी पूरी रात चलते रहे किंतु फिर आधी रात को लगा होगा कि नहीं नहीं अभी वापस चले जाना चाहिए तो वापस आते-आते अर्ली मॉर्निंग हो चुका था आकर के सीधे बाबूराम महाराज जहां पर शयन कर रहे थे वहां पर गए तो बाबूराम महाराज सोए नहीं थे उनकी आंखें खुली ही थी जैसे ही उन्होंने कनाई महाराज को आते हुए देखा तो उन्होंने कहा कि अरे बेटा तुम आ गए वापस मेरा हृदय इस तरह से कर रहा था कष्ट के मारे सोच रहा था कि यह लड़का कहां जाएगा क्या करेगा क्या खाएगा कैसा उसकी क्या-क्या होगा उसका अवस्था तो तुम्हारे लिए मुझे पूरी रात भर नींद नहीं आई जैसे ही काना महाराज ने यह बात सुनी उनके हृदय में इतना एक एक कहते हैं ना अभिभूत हो गए कि अरे बाबूराम महाराज ठाकुर के संतान स्वयं एक ब्रह्मज्ञानी स्वयं मेरे लिए इतनी चिंता करते हैं तो बाबूराम महाराज पर जो क्रोध था जो अहंकार जन्मा था व वो सब उस समय वो विस्मृत हो गया वो सब पिघल कर के कहां पर चला गया तो देखिए कि कोई भी व्यक्ति परफेक्ट नहीं है कोई भी सिचुएशन परफेक्ट नहीं है कोई भी घटनाएं परफेक्ट नहीं है हमको लगता है कि बाबूराम महाराज को अभी जैसे बात-बात में नृत्य गीत कर रहे हैं वो गुप्तचर के ऊपर में उस उनको इतना प्रेम है तो बाबूराम महाराज के साथ में सब कुछ परफेक्ट होगा बाबूराम महाराज का नेचर भी परफेक्ट होगा नहीं परफेक्शन किसी में नहीं है ये इंपरफेक्ट जगत में इंपरफेक्ट स्वभाव को लेकर के हमको यह आध्यात्मिक प्रदीप है उसको प्रज्वलित रखना है ऐसी ही एक दूसरी बात प्रभ वानंद जी ने बताई है हमको प्रभ वानंद जी उस समय वहां पर कलकाता में थे और उद्बोधन मायरवार्ड्स प्रसन्न थे और प्रसन्नता पूर्वक उन्होंने प्रभ वानंद जी को कहा बाद में यही प्रभ वानंद जी अमेरिका जाकर के बड़ा ही सुंदर वेदांत प्रचार किए थे तो बाबूराम महाराज ने प्रभ वानंद जी को कहा उनकी सेवा से संतुष्ट होकर के कि तुम एक काम करो तुम यहीं पर रह जाओ मायरवार्ड्स क्लेरिक वर्क वहां पे होता है फाइलिंग होता है कॉरेस्पोंडेंस होता है मैसेज लेना देना होता है ऑर्गेनाइजेशन करना होता है कोई इवेंट होती है तो वगैरह कितना ही काम होता है तो बाबूराम महाराज ने प्र भवानंद जी को यह बात कही प्र भवानंद जी भी खुश हो गए मायरवार्ड्स के किसी साधु का कैसे हो सकता है बड़े खुश हो गए उस समय एकाएक वहां पे उड़ीसा से राजा महाराज का पत्र आया कि प्रभुवा ंद को इमीडिएट मेरे पास में भेज दो तो जैसे ही यह पत्र आया तो प्र भवानंद जी ने जाकर की यह पत्र बाबूराम महाराज को दिखाया कि कहा कि महाराज जी आपने तो कहा था यहां पर रहने को किंतु राजा महाराज मुझे वहां पर बुला रहे हैं उड़ीसा में तो कोठार में न की भुवनेश्वर जहां पे भी होंगे तो बाबूराम महाराज ने कहा देखो तुम एक काम करो तुम राजा महाराज को लिख दो राजा महाराज अर्थात स्वामी ब्रह्मानंद रामकृष्ण संघ के प्रेसिडेंट तो अभी अथॉरिटी के अनुसार प्रेसिडेंट महाराज जो होते हैं वह सर्वोच्च अथॉरिटी होते हैं तो उन्होंने तो प्र भवानंद जी को बुलाया है ना तो बाबूराम महाराज अभी भले ही चाहे ठाकुर के मानस पुत्र हो प्रेसिडेंट महाराज के सामने तो सबको झुकना पड़ेगा उनकी बात तो सबको स्वीकार करनी पड़ेगी किंतु फिर भी बाबूराम महाराज ने प्र भवानंद जी को कहा कि तुम एक काम करो तुम राजा महाराज को लेटर लिख दो कह दो कि मैं नहीं आ पाऊंगा मैं यहीं पर रहूंगा मैं यहां पर रहना चाहता हूं बाबूराम महाराज और शरद महाराज के साथ में प्र भवानंद जी ने कहा महाराज जी ऐसा कैसे हो सकता है राजा महाराज तो संघ के प्रेसिडेंट स्वयं ऊपर से मेरे दीक्षा गुरु तो वो यदि मुझे आदेश करेंगे मैं आदेश का उल्लंघन करूं ऐसा तो संभव ही नहीं है आप तो बाबूराम महाराज यह सुनक के बड़े ही क्रोधित हो गए चिल्ला करके बोलने लगे कि तुम मेरी बात नहीं सुनोगे मैं तुम्हारा चेहरा भी नहीं देखना चाहता चले जाओ यहां से जो करना है वो करो मेरी बात नहीं सुनोगे यह सब करके ऐसा क्रोधित होकर के उनको डांटा अभी प्रभुवा ंद जी महाराज जी स्मृति का था लिखते लिखते कहते हैं कि भले ही चाहे उस समय उनकी डांट सुनक के मुझे डर भी लगा हो थोड़ा सा दुख भी हुआ हो मेरे हृदय के अंतः कोने में तो यह बात थी पक्की कि भले ही चाहे बाबूराम महाराज मुंह से डांट रहे हैं हृदय में तो मेरे प्रति प्रेम ही है किंतु यह सब थिरी क्या है कि जब डांट सुनते हैं उस समय ये थिरी काम नहीं लगती तो उस समय वहां से दुखित होकर के चले गए किसी काम के लिए बाद में बाबूराम महाराज का क्रोध ठंडा हुआ और उन्होंने प्र भवानंद जी को फिर से बुलाया और फिर से बुला कर के कहा कि देखो बेटा कि अभी तो हम लोगों का जाने का समय हो गया है हम लोगों हम दोनों का यह आखिरी अभी हम लोगों का यह होगा मुलाकात होगी अभी इसके बाद में हम दोनों की मुलाकात होना संभव नहीं क्योंकि बाबूराम महाराज को लग गया था ऐसा पता कि अभी उनका देह जाने वाला है कुछ दिन में देह भी उनका चला गया था तो बाबूराम महाराज ने कहा कि अभी तो दूसरी बार हमारी मुलाकात होगी नहीं और हम जो ठाकुर के संतान है धीरे-धीरे हम सभी लोग अस्ताचल की ओर बढ़ते जा रहे हैं महानिर्वाण की ओर हम लोग बढ़ते जा रहे हैं अभी अपना संग का जो भविष्य है तुम जैसे युवकों के हाथ में ही है और तुम लोगों का ठीक-ठीक चरित्र गठन हो आध्यात्मिक तुम्हारा जीवन बने यही हमारी कामना है ऐसा करके आशीर्वाद देकर के बाबूराम महाराज ने प्र भवानंद जी को विदाय किया था वहां से तो देखिए कि ऐसी छोटी सी बात में बाबूराम महाराज दो हमने देखा कि सेवक के ऊपर में भी क्रोधित हो गए प्र भवानंद जी के ऊपर में भी क्रोधित हो गए यह सोच कर के कि या तो यह लोग मुझे सत्य नहीं बता रहे या तो फिर मेरी आज्ञा का उल्लंघन कर रहे तो बाबूराम महाराज जो कि अपने संघ में सेवा और प्रेम की प्रतिमूर्ति स्वरूप है सर्वोच्च आदर्श जिनको माना जाता है उनके जीवन में भी हम देखेंगे कि बात-बात में क्रोध करना छोटी बातों में नाराज हो जाना यह सब उनके जीवन में भी था किंतु यह होने के बावजूद उन्होंने हृदय में जो आध्यात्मिक मशाल जो प्रज्वलित रखी थी वह तो वैसी ही थी वो उसे क्रोध करेंगे किंतु हृदय में प्रेम रखेंगे यह चीज हमको इनके जीवन से सीखनी कि भले ही चाहे बाह्य जीवन में प्रतिकूलता हों के बीच में हम सबको रहना है ऐसा किसी के साथ में नहीं होगा कि उसके सब कुछ उसके अनुकूल चले प्रतिकूलता के बीच में रहना है प्रतिकूलता के बीच में में कभी क्रोध भी होगा निराशा भी आएगी किंतु यह हमारा साधन भजन का प्रवाह है वह कहीं रुक ना जाए सुबह को उठकर के ठाकुर का नाम जप जो करना है किताबें जो ठाकुर की पढ़नी है सत्संग जो करना है मंदिर में जो जाना है उत्सव में जो हिस्सा लेना है वह सब नियमित रूप से बना रहे ऐसा कभी नहीं होगा कि मैंने आज बैठ कर के तीन-चार घंटा जब ध्यान कर लिया तो बस एक महीने के लिए हो गया ऐसा खाने के बारे में ऐसा होता है कि आज मैंने बैठ कर के बहुत सारा खा लिया तो अभी मैं एक सप्ताह तक एक महीने तक नहीं खाऊंगा चलेगा ऐसा नहीं होगा मुझे प्रतिदिन आहार करना पड़ेगा तो क्यों यदि प्रतिदिन आहार करना पड़ता है तो प्रतिदिन साधना भी तो करनी पड़ेगी ऐसा नहीं होगा कि वीकेंड में थोड़ा बहुत मैंने कर लिया तो वीक डेज में चल जाएगा मैं बहुत बिजी रहता हूं वगैरह बहाने बनाने के लिए अपना मन हमेशा तैयार रहता है इस बहनों से हमको बच करके रहना है अभी कुछ कुछ बड़ी ही सुंदर घटनाएं हैं अपने विज्ञान महाराज के बारे में विज्ञानानंद जी महाराज ठाकुर के दूसरे सन्यासी संतान जिन्होंने बेलूर मठ में रहकर के अभी जो स्वा ठाकुर का जो मंदिर है उसका निर्माण किया था तो यह उनकी अमर कीर्ति है जब तक बेलूरमठ का मंदिर रहेगा मुख्य मंदिर तब तक विज्ञान महाराज का नाम भी उस मंदिर के साथ में जुड़ा रहेगा स्वामी जी ने खुद ने विज्ञान महाराज को बताया था कि किस तरह से मंदिर का ये जो कल्पना होती है ना कि पूरे भारत के जितने विभिन्न तरह के आर्किटेक्चर है वह सबका इसमें रिफ्लेक्शन होना चाहिए अपने ठाकुर के यूनिवर्सल टेंपल में इसका एक रिप्रेजेंटेशन होना चाहिए तो स्वामी जी की कल्पना के आधार पर स्वामी जी की यह विचारों के आधार पर मुख्य मंदिर की जिन्होंने निर्माण किया था वो विज्ञानानंद जी किंतु जब यह मंदिर वगैरह का काम जब धीरे-धीरे करके वो क्या है कि साधु लोग जो होते हैं ना उनके मन में इस धीरे-धीरे करके दो विभाग हो जाते हैं एक विभाग होता है जिससे कि वह बाहर के जगत के साथ में कार्य करते हैं और दूसरा एक विभाग होता है जिसमें वह ठाकुर के साथ में अनंत वार्तालाप चलाते रहते हैं ठाकुर के साथ में वार्तालाप ठाकुर का नाम चिंतन ठाकुर का गुणगान ठाकुर के भजन कीर्तन यह सब दूसरे भाग में चलते रहते हैं तो यहां पर एक और तो इतने बड़े म मंदिर का निर्माण विज्ञान महाराज कर रहे हैं दूसरी ही ओर उनके हृदय में उन ऐसी एक बालक सहज सुलभता है सरलता है उसका उदाहरण कुछ-कुछ घटनाओं से हमको मिलता है एक बार उस समय स्वामी जी जीवित थे तो स्वामी जी कहीं पर जा रहे थे तो विज्ञान महाराज ने सोचा चलो मैं जाकर के उनको प्रणाम करता हूं जनरली स्वामी जी से विज्ञान महाराज दूर ही रहते थे थोड़ा सा उनसे डरते भी थे और वो जब बेलूरमठ में आते थे तो स्वामी जी जिस कमरे में रहते थे उसी कमरे के बगल में उनको रहने को दिया जाता था कमरा तो वह जब स्वामी जी के कमरे को क्रॉस करके यदि और किसी काम के लिए जाना है तो बड़े ही सावधान पूर्वक जाते हैं कि जैसे कि उनके आने जाने के कोई आवाज ना हो स्वामी जी को डिस्टरबेंस ना हो तो उस दिन एकाएक ऐसा हुआ कि स्वामी जी जा रहे हैं विज्ञान महाराज के मन में हुआ कि जाकर के मैं उनको प्रणाम करता हूं तो दौड़ कर के गए स्वामी जी के पैरों को छू कर के प्रणाम किया एकाएक हाथ वापस ले लिया और बोल उठे अरे महा यह तो एक इलेक्ट्रिक शोक जैसा लगा मुझे यह क्या है तो स्वामी जी हंसते हंसते कहने लगे कि देखो कि जब मैं अमेरिका में था तो इससे भी कहीं ज्यादा मेरे पास में शक्तियां थी किंतु अमेरिका में सब शक्तियां खर्च हो गई है इसलिए अभी ज्यादा कुछ बचा नहीं है तो दोनों का एक बड़ा ही एक सुंदर रिश्ता है वोह एक फेमस कहानी तो है ही है विज्ञान महाराज और स्वामी जी की कि विज्ञान महाराज वो बेलून मठ में घाट का निर्माण कर रहे हैं गंगा के किनारे खड़े-खड़े बड़ी ही धूप पड़ रही है और स्वामी जी वहां पे अपने कमरे के सामने जो वरांडा है उसमें खड़े हैं देखा कि विज्ञान महाराज धुप के मारे बड़े परेशान है प्यास भी उनको लगी होगी तो उनको उनके लिए स्वामी विवेकानंद के एक सेवक ने वोह स्वामी जी को दूध एक का गिलास दिया था तो स्वामी जी ने दूध पी कर के आखिर में जो दो-तीन वो थोड़ा सा रह गया था दो-तीन ड्रॉप वो दूध का गिलास वो ब्रह्मचारी महाराज को कहा कि जाओ विज्ञान महाराज को देके आओ तो विज्ञान महाराज इतना धूप में कार्य कर रहे हैं यह गिलास लेकर के ब्रह्मचारी आया तो विज्ञान महाराज को लगा कि क्या स्वामी जी मेरी मजाक कर रहे हैं गिलास में है नहीं कुछ एक दो ड्रॉप सिर्फ दूध है तो ठीक है चलो स्वामी जी का प्रसाद है बोलकर के जैसे ही ग्रहण किया उनके मन में शांति हो गई तो ये यह था कि विज्ञान महाराज और स्वामी जी का रिलेशन तो जैसे ही स्वामी जी के पैर को स्पर्श किया वैसे उनको इलेक्ट्रिक करंट लगा तो स्वामी जी ने कहा कि अमेरिका में सब खर्च हो गया है वहां पर और भी ज्वलंत शक्ति थी एक बार महापुरुष महाराज उस समय रामकृष्ण संघ के प्रेसिडेंट थे और कुछ कुछ भक्त कलकाता से आए और कलकाता से जब भी साधु को मिलने के लिए जाते हैं तो कुछ लेकर के जाते हैं तो उन्होंने क्या किया व टीन के डब्बे में माखन और वहां पर एक बड़ी एक प्रख्यात होटल थी ग्रेट ईस्टन तो यह ग्रेट ईस्टन होटल में बनी हुई प्रख्यात मिल्क रोल पांव रोटी यह मि क्रोल बोल कर के पांव रोटी आती है तो यह दोनों लेकर के यह भक्त महापुरुष महाराज के पास में आए अभी इतनी सुंदर यह पांव रोटी है या बन कहेंगे आज की लैंग्वेज में और यह बड़ा ही टीन भर कर के माखन है तो ये दोनों को खाएंगे तो बड़ा ही आनंद आएगा तो यह सोच कर के यह भक्त लोग महापुरुष महाराज के पास में यह लेकर के आए अब जैसे ही महापुरुष महाराज ने देखा कि पांव रोटी भी है और मक्खन भी है तो महापुरुष महाराज ने कहा कि जाओ एक काम करो यह मक्खन का जो टीन है वो लेकर के तुम विज्ञान महाराज को दे दो विज्ञान महाराज यहां पर रह रहे हैं अभी जनरली इलाहाबाद में रहते थे वह बड़ा ही मुश्किल से कितना रिक्वेस्ट करेंगे तो बेलूरमठ आते थे उस समय की जो बात है तो यह विज्ञान महाराज आए हैं बेलूरमठ में बड़े ही तत्व ज्ञानी है तत्व चिंतक महापुरुष है गुप्त ब्रह्मज्ञानी है उनको मन खिलाओगे तो तुम लोगों को बड़ा ही आशीर्वाद मिलेगा तो यह भक्त लोग यह मक्खन का टीन लेकर के विज्ञान महाराज के पास में गए तो विज्ञान महाराज ने जैसे ये सुना कि महापुरुष महाराज ने इसको भिजवाया है मेरे पास तो बड़े ही खुश हो गए और सरलता पूर्वक बोल रहा है कि अच्छा मक्खन का टन तो भिजवा दिया किंतु पांव रोटी तो है नहीं मैं इसको किसके साथ में खाऊंगा जैसे ही विज्ञान महाराज ने ऐसा कहा ये भक्त लोग जाकर के महापुरुष महाराज को कहे कि विज्ञान महाराज कह रहे हैं कि पांव रोटी के बिना कैसे खाएंगे तो महापुरुष महाराज ने कहा ये पांव रोटी भी ले जाओ जाकर के विज्ञान महाराज को दो तो ये दोनों जब विज्ञान महाराज के हाथ में आया एक हाथ में पांव रोटी और एक हाथ में मक्खन का टीन वो लेकर के वो बड़े ही आनंद पूर्वक कहने लगे देखो कि यह जो मक्खन का टीन है वह है ब्रह्मा और यह पांव रोटी है वह है शक्ति यह ब्रह्मा और शक्ति हमेशा साथ में रहते हैं अभेद रहते हैं ऐसा ठाकुर की शिक्षा है ब्रह्म शक्ति अभेद तो वैसे ही यह मक्खन और पाव रोटी भी एक साथ में ही रहना चाहिए उनको य खुटा नहीं करना चाहिए तो ये देखिए कि एक बालक सुलभ सहजता और सरलता के साथ में उन्होंने यह बात कही और लोग भी वहां पर जो थे वो बड़े ही खुश हो गए अभी ऐसी ही एक दूसरी घटना है उस समय बेलूर मठ में विज्ञान महाराज रह रहे थे और मास्टर महाशय वहां पर आए तो मास्टर महाशय उस समय उनकी तो उम्र भी हो गई थी कथामृत का उन्होंने लेखन भी कर दिया था कथामृत पूरे विश्व में फेल भी गया और बहुत सारे साधु कथामृत पढ़ करर के मास्टर महाशय के बारे में उन्होंने जाना भी था और मास्टर महाशय को आकर के मिलते भी थे बहुत जितने भी उसमें इंपोर्टेंट उदाहरण है विरजानंद जी महाराज हमारे प्रेसिडेंट महाराज तो विरजानंद जी महाराज भी उस समय वो कथामृत पढ़ कर के अच्छा विरजानंद जी महाराज को यह नहीं पता था कि मास्टर महाशय ने कथामृत लिखा है किंतु मास्टर महाशय के व्यक्तित्व से इतने प्रभावित हो गए थे फिर मास्टर महाशय महाशय ने गिरजानंद जी को अर्थात काली कृष्ण महाराज को बेलर उस समय आलम बाजार में वराह नगर में मठ था तो वराह नगर में भेजा था तो यह थे अपने मास्टर महाशय जैसे ही मास्टर महाशय मठ में आए थोड़ी देर के बाद में विज्ञान महाराज के पास में गए तो विज्ञान महाराज ने खड़े होकर के हाथ जोड़ कर के सम्मान पूर्वक उनको बिठाया और क्या कहा उनको पता है कि देखिए कि मैं मठ में जितने भी साधु है उनको मैंने एक बार पूछा कि आप लोग मठ में किस तरह से आए किस बात से प्रेरित होकर के आए तो सब साधु लोग कह रहे हैं कि हम लोग विज्ञान महाराज कहते हैं कि यह जो 16 आना उस समय 16 आना होता था ना 16 आना का एक रुपया ना कि ऐसा कुछ होता था आज 100 पैसे के एक रुपया होता है तो 16 आना तो विज्ञान महाराज कहते हैं 14 आना ऐसे हैं जो कि मास्टर महाशय अर्थात आपको आपसे प्रभावित होकर के कथामृत पढ़कर के यहां पर आए हैं और दो आना ऐसे हैं जो कि बाकी हम जितने भी गुरु भाई हैं उनके साथ में बात करके हमारे से प्रभावित होकर के मठ में आकर के जॉइन किए हैं अर्थात की ऑलमोस्ट ऐसा होगा कि 80 पर साधु है मठ के जो कि कथामृत पढ़ के और मास्टर महाशय के साथ में वार्तालाप करके उनसे प्रभावित होकर के साधु हुए हैं और 20 पर ऐसे होंगे सिर्फ क्योंकि ये बाकी जितने भी गुरु भाई है उनको पढ़ के उनको सुनके मठ में आए हैं तो दो चीज है एक तो है कि जो जिनकी गरिमा है उस गरिमा को सम्मान देना और दूसरा कि देखिए कि कथामृत का अपने संघ में अपने भक्तों के हृदय में क्या स्थान है वह भी इस बात से पता चलता है अभी राजा महाराज की एक घटना है उस समय ठाकुर का उत्सव था ठाकुर का जन्मतिथि था 1912 की बात है और राजा महाराज उस समय बेलूर मठ में थे अभी राजा महाराज जब भी बेलूर मठ में आते थे तो बड़ा ही आनंद का प्रवाह जैसे कि मठ में फैल जाता था क्योंकि राजा महाराज ज्यादातर कहां पर भुवनेश्वर में रहते थे कहीं कोठार में रहते थे और यदि कलकाता में भी होंगे तो यह बलराम भवन में रहेंगे ऐसा मतलब राजा महाराज को बेलूर मठ में लाने के लिए बाबूराम महाराज इतने प्रयत्न करते थे इतने प्रयास करते थे तब कहीं जाकर के राजा महाराज मठ में आकर के रहेंगे तो ये 1912 की घटना एक तो है कि ठाकुर का महोत्सव दूसरा कि राजा महाराज स्वयं वहां पर उपस्थित सभी लोग बड़े ही आनंद में थे और राजा महाराज का ऐसा था कि एक बाल सुलभ उनका एक जो नेचर था तो एक हंसी मजाक करने का ऐसा एक था उनका तो उन्होंने क्या किया कि महापुरुष महाराज भी उस समय मठ में रहते थे तो महापुरुष महाराज के लिए एक सफेद धोती और पाजामा और कुर्ता इसका एक व्यवस्था किया और महापुरुष महाराज को बुला कर के कहते हैं कि आप एक काम कीजिए यह सफेद वस्त्र पहन कर के आप पूरे मठ में इतने सब जो भक्त है उन सब में एक चक्कर मार के आ जाइए आप देखते हैं कि लोग आपको पहचान पाते हैं कि नहीं तो महापुरुष महाराज कहते हैं अच्छा ठीक है यह तो ठाकुर के मानस पुत्र स्वयं है तो उनकी जो इच्छा है उसको तो पूरी करना ही पड़ेगा तो बाल गोपाल है बाल गोपाल की वो जो सब जो सब मिश्चीफ थी उससे तो हम सब वाकिफ है तो वही बाल गोपाल के प्रतिनिधि है अपने राजा महाराज तो उनके मन में जब इस तरह का मजा एक एक आया है आनंद करने का भाव तो उसके साथ में तो हमको ये वो अवश्य सहमति होनी चाहिए हमारी सहमत होना चाहिए तो जीवन भर जिन्होंने गेरुआ पहना है वो महापुरुष महाराज ने गेरुआ के बदले यह सफेद वस्त्र धारण किए और व वहां पे बैठ गए वहां पे एक जगह प जाकर और राजा महाराज अपने एक के बाद एक भक्तों को बुला कर के कहते हैं अच्छा वो जो महाशय है ना उनके पास जाकर के यह बात पूछ कर के आओ तो यह बात उनके साथ में यह चीज उनको दे कर के आओ तो जानबूझ कर के वो जो अपने पुराने भक्तों को महापुरुष महाराज के पास भेजते हैं यह देखने के लिए ये लोग महापुरुष महाराज को पहचान पाते हैं कि नहीं गरवा वस्त्र धारण किया हो ना कि सफेद वस्त्र धारण किया हो महापुरुष महाराज के चेहरे पर जो तेज है उनका चेहरा है यह इससे क्या कोई भ्रमित होगा कोई किसी को लगेगा कि ये महापुरुष महाराज नहीं है और कोई है किंतु जितने भी भक्तों को राजा महाराज य कह रहे हैं सभी लोग अभी राजा महाराज का तो मन रखना है तो वह महापुरुष महाराज के पास में जाते हैं उनके बाद साथ में बात करते हैं राजा महाराज के पास में आते हैं राजा महाराज पूछते हैं पता चला पहचाना कौन है तो भक्त लोग कहेंगे कि मा महाराज पता नहीं कौन है कौन है राजा महाराज तो महापुरुष महाराज है तो ये इन लोगों का ऐसा एक बाल सुलभ आचरण आध्यात्मिकता और यह बाल सुलभ सहज आचरण य यह सब कहानियां है यह हमारी एक धरोहर है अपना एक ट्रेजर हाउस है अंग्रेजी में वह एक किताब है चिकन सूप फॉर द सोल कर कर के अर्थात कि अपने मन को प्रसन्न करें अपने मन को थोड़ी सी प्रेरणा दे इसके लिए बड़ी सुंदर सुंदर कहानियों का संग्रह तो यह भी अपने संघ की ऐसी सब कहानियां कि हमको बल प्रदान करें हमको पोषक तत्व दे मन के आत्मा के इसके लिए यह सब कहानी तो आज यही तक अभी कल फिर से मिलते हैं ओम शांति श शति हरि ओम त श्री राम कृष्णम ठाकुर को ठाकुर को किसी ने बोला था कि आपने तो आपने तो पढ़ाई लिखाई की नहीं है आपको इतना सब कुछ पता कैसे है तो ठाकुर ने उत्तर दिया ओगो सुने च को तो अरे मैंने सुना कितना है तो ठाकुर ने खुद ने इसी तरह से ज्ञान ग्रहण किया था उनके गुरु जितने भी आते थे उनके पास में सुन कर के ठाकुर ज्ञान ग्रहण करते थे देखिए कि ये ये चब चीजें जो है ना अपने हृदय में स्टोर हो कर के रहती है फिर वो जब समय आएगा ना एकाएक ये सब बाहर आना शुरू हो जाएगा मैं अपने खुद के उदाहरण से कह रहा हूं कि मेरे जीवन में भी तो ऐसे सब समय आए है कि मैं सोच रहा हूं कि अरे मतलब क्या होगा क्या नहीं होगा संदेह संशय यह सब आ जाता है उसी समय यह घटनाएं कहां से आकर के एकदम जागृत हो जाती है नजर के सामने लगता है कि मुझे क्या यह घटना पड़ी थी यह भी मुझे याद नहीं आ रहा है किंतु फिर भी वह घटना मुझे उस पर्टिकुलर टाइम प याद आ गई तो जैसे कहते हैं ना कि वो जो एक बीज है ठाकुर ने उदाहरण दिया य कोई एक बीज एक खिड़की के ऊपर में किसी ने रख दिया अभी वह मकान भी है वह खंडहर हो गया मकान गिर गया खिड़की के ऊपर में से बीच मिट्टी में गिरा और वहां से एकाएक उसमें से वटवृक्ष खड़ा हो गया तो ऐसे ही यह सब बीज जो है वह हृदय में पड़े रहते हैं और फिर जब समय आएगा उसमें से वटवृक्ष खड़ा होगा