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कहानियों के माध्यम से माँ सारदा और श्रीरामकृष्ण का लीला विलास 21 Sep 2024

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ओम नमो भगवते राम कृष्णाय कुछ सालों पहले 2015 में मेरा सन्यास हुआ था उस समय मेरा दिल्ली आना हुआ था दिल्ली अर्थात मैं गया था कनखल हरिद्वार वगैरह तो दिल्ली तो रुकना पड़ता है तो दिल्ली रुका था कुछ दिनों तक और वहां पर जो अक्षरधाम वगैरा है वहां पर गया था दर्शन के लिए अपना मिशन जो है उसका बड़ा ही वहां पर सुनाम है तो इतना सुंदर सब व्यवस्था कर दिया था महाराज जी ने ऊपर से मैं गुजराती और व जो स्वामीनारायण जो पूरा है ज्यादातर गुजराती लोग है वहां पर तो जैसे ही गया तो वहां जो बड़े महाराज से उनके साथ बात करवाई पूरा दिन वहां पर मुझे रखा और बहुत अच्छा-अच्छा खाना खिलाया बड़ा अच्छा दर्शन वगैरह करवाया तो मैं जो अक्षरधाम देखकर के मुझे एक मेरे मन में हुआ था कि देखिए कि रामकृष्ण संघ राम कृष्ण मिशन इतने सालों से कार्यरत है 18971 फर्स्ट में स्वामी जी ने संघ का मने संघ को ऑफिशियल चालू किया था मैंने विधिवत रूप से वैसे तो ठाकुर ने जब सबको गरुवा वस्त्र दिए काशीपुर में तभी से तो संघ स्टार्ट हो गया था तो इतने सालों के बाद में हम कहां पर हैं और यह वैसे तो स्वामिनारायण संघ काफी पुराना है किंतु उनको देखेंगे तो उनका जो यह जो डेवलपमेंट जो दिख रहा है नजरों में वह सब रिसेंट ही है तो मुझे लगता था कि वे लोग कहां पर हैं हम लोग कहां पर हैं हमारे पास में वैसे हॉस्पिटल्स से हमारे पास में स्कूल्स है कॉलेजेस है किंतु उनके जैसे जो डिवोटा है इतने डेडिकेटेड डिवटी मैं वहां पर गया था सब वॉलंटिली वॉलंटिली जैसे शहर में बाकी सब जगह पर ठीक है यहां पर विशाखापट्टनम में अच्छे डिवटी है राजकोट में भी थे बेलूरमठ में भी है बेलूरमठ ना गढ़ है तो वता होंगे ही होंगे तो दिल्ली जैसे शहर में अपना जो कैपिटल है वहां पर हम कहां पर हैं तो किंतु देखिए मैं आज आप सबको जो देख रहा हूं तो इतने दिनों तक मेरे मन में एक था कि एक डेडिकेटेड डिवोटा एंड वॉलिंटियर फोर्स अपना एक होना चाहिए जो कि संघ का एक बैकबोन है संघ का एक फाउंडेशन है हम साधु लोग तो है ही है किंतु साधु लोगों से भी ज्यादा मैं देख रहा हूं जिस तरह से कार्य करना होता है या तो फिर प्रचार करना होता है या तो एवन साधन भजन करना होता है तो हम लोग तो करते ही हैं किंतु हमसे कहीं ज्यादा कंट्रीब्यूशन आप लोगों का है और इस तरह से जो आप लोग भगवत कथा सुनने के लिए इकट्ठा होते हैं वह देखकर के मुझे बड़ी खुशी होती है तो लाली दी को धन्यवाद और दिनेश जी को भी धन्यवाद आप लोगों से मेरी मुलाकात पहली ही बार हो रही है किंतु फिर भी मुझे बड़ा अच्छा लगा और दूसरी एक बात कि मैंने सुना है कि यहां बड़े सीनियर साधु लोगों का सत्संग आप सुना करते हैं सीनियर और विद्वान उसम मैं तो कहीं पर नहीं हूं मैं तो हूं वैसे बड़ा जूनियर और विद्वता की दृष्टि से भी ज्यादा कुछ नहीं मैं 12वीं में फेल हुआ था फिर घर छोड़कर भाग गया था साधु होने के लिए ये सब ठाकुर ने कहा स्वामी जी के पास में ले पहले स्वामी जी को पढ़ा फिर ठाकुर को पढ़ा और जैसे अपने सीनियर साधु कहा करते हैं ना कि स्वामी जी को पढ़ के लोग आते हैं आने के बाद में जब साधन भजन शुरू करते हैं तो ठाकुर के पास चले जाते हैं और जब साधन भजन थोड़ा बहुत भी आप मैच्योर होते हैं उसमें तो मां के चरणों में आते हैं तो ठाकुर की मां की मेरे पर बहुत बड़ी कृपा है मैं जब बिल्कुल पहली बार चेन्नई अपना एक आश्रम है टी नगर बोलक के जो चेन्नई मठ जो मेन मठ है वहां पर नहीं बुल टेंपल रोड पर जो है किंतु एक दूसरा अपना एक सेंटर है टी नगर बोल के आ तो वहां पर मैं गया था सबसे पहला जवाइन करने के लिए तो वहां पर एक वृद्ध साधु आकर के मेरे पास में बैठ गए भोजन का समय था तो ना अर्ली मॉर्निंग का समय था तो मुझे बोला गया कि तु बैठो अभी कोई आएगा तुमसे बात करेगा तो मैं बैठा था तो एक वृद्ध साधु एकदम शांत सरल आकर के बैठ गए मेरे बगल में वो मुझे पहला प्रश्न किया अच्छा तुम्हारा मातृभाषा कौन सा है तो मैंने कहा महाराज गुजराती तो उन्होंने मुझे सामने प्रश्न किया अच्छा तुम्हारी मां कौन है बताओ तो मैंने कहा अ इस प्रश्न का उत्तर तो थोड़ा मैंने कहा मां शारदा तो फिर उन्होंने कहा कि अब बोलो तुम्हारी मातृभाषा कौन सी है तो मैंने कहा बंगोली तो बोला आती है तुमको बंगोली मैंने कहा नहीं महाराज नहीं आती तो सीखना चालू कर दो दैट वाज द फर्स्ट थिंग ही टोल्ड मी और पता नहीं यह बात की मेरे पर ऐसी असर हुई कि उस दिन से ही मैंने बांगला सीखने की शुरुआत की और सच बताऊं तो देखिए कि मैं स्वामी जी को पढ़ा था मैंने ठाकुर को भी पढ़ा था गुजराती में पढ़ा था इंग्लिश में पढ़ा था किंतु मां को जब मैंने पढ़ने का प्रारंभ किया था हिंदी में या गुजराती में मुझे ऐसा कुछ प्रभावशाली उनमें कुछ नहीं दिखा ऐसा कुछ नहीं लगा कि हां अभी ठीक है चलो गुरु पत्नी है तो यह लोग बड़ा चढ़ा करके बोल रहे हैं अदर वाइज कहां स्वामी जी की विद्वता कहां ठाकुर बार-बार वो ध्यान समाधि में मग्न हो रहे हैं भाव में जा रहे हैं मां के साथ में तो कुछ नहीं है मां के पत्रों का एक संग्रह बीच में पब्लिश हुआ था अभी भी है सेकंड एडिशन आई थिंक आ गया होगा इंस्टिट्यूट ऑफ कल्चर से वो पत्र पढ़ेंगे तो बिल्कुल टिपिकल मां जैसे लिखते हैं बाबा जीवन तुम भलो आछो आशा करलो आलो भालो थाको ठाकुर आशीर्वाद कक नीचे लिखा तुम और तीन चार लाइन का लेटर जितने भी लेटर पढ़ेंगे नो वेरिएशन बेटा तुम अच्छे होंगे मैं आशा रखती हूं मैं भी अच्छी हूं और तुमको ठाकुर का आशीर्वाद मिले बस तुम्हारी मां इसे तो जब पब्लिश हुआ था पहली बार यह मां के पत्रों का संग्रह तो हमने तो यह सब रयान जी के पत्र सब पढ़े तो रयान जी के स्वामी जी के तो एकदम दौड़ा दौड़ा में गया था उस समय में ट्रेनिंग सेंटर में था बेलूर मठ में तो पहला ही एडिशन दौड़ कर के मैं लेके आया मैंने सोचा पता नहीं क्या सब चमत्कारिक बातें लिखी होंगी खोल के देखा तो यही सब चार पांच लाइन रिपीट हो रहा है हो रहा है रेयरली कुछ पत्र होंगे जिसमें आपको कुछ मेटा फिजिकल कुछ मिलेगा जैसे कि मायावती शेख महाराज जी ने लिखा कि मायावती में स्वामी जी ने ठाकुर का मंदिर है उसको हटाने के बारे में बोल रहे हैं तो क्या आपके मत से ये ठीक है कि नहीं तो मैंने उत्तर दिया था बेटा तु गुरु छले दत तुमरा अवती तो तुम लोगों के जो गुरु थे वह भी अद्वैत थे और तुम लोग भी अद्वैत हो तो ऐसा एक दो पत्र यदि छोड़ दिया जाए तो फिलोसॉफिकल ऐसा कुछ मिलेगा नहीं तो ऐसा मेरी बहुत पहले से धारणा थी किंतु यह जो महाराज ने मुझे कहा ना कि बांगला तुम्हारी मातृभाषा है और मैंने बांगला सीखने की शुरुआत की और फिर जब बेंगोली में मायर कथा अर्थात की मां की बातें इसको पढ़ना जब शुरू किया मुझे लगा कि एक पूरे मेरे जीवन की एक नई डायरेक्शन ओपन हो गई है कहां स्वामी जी का फिलोसॉफिकल जो ग्लोरी है ठाकुर का जो ये आध्यात्मिक विलास है वह सब है ही है किंतु मां का जो हृदय है वोह भी स्वामी जी के वैभव बौद्धिक और ठाकुर के आध्यात्मिक वैभव से तनिक भर भी कम नहीं है तो यह बात मैंने किंतु खास करके बंगोली सीखने के बाद समझी तो उस दिनों के बाद से ठाकुर ने मुझे बड़ी दया करके अपने संघ में रखा है वरना तो ग्रेजुएट होना पड़ता है बिना ग्रेजुएशन के रख लिया है ठाकुर ने मुझे यह उनकी बहुत बड़ी कृपा है और ठाकुर और मां को मैंने सालों साल भर तक पढ़ा है और मुझे ऐसा लगता है कि देखिए जब ध्यान साधन भजन हम जितना करें वो कम ही है अपने संग में ऐसे लोग हो गए कि उनके सामने अपना कोई जैसे कहां सूरज और कहां एक बत्ती एक छोटा सा ऐसा है अपना अपना साधन भजन ऐसा है कहां राजा महाराज और वहां पे वृंदावन में तपस्या कर रहे हैं कर रहे कर रहे हैं एक दिन आधी रात को सो पड़े थे शरीर खराब हो गया या जो भी है तो एक अशरीरी वाणी सुनाई दी अरे उठो टाइम हो गया है जब ध्यान करने का तो एकदम खड़े हो गए दूसरे दिन बताया किसी को कि देखो यह वृंदावन में यह सब बाबा जी है अशरीरी वो वे लोग ऐसा घूमते रहते हैं और जो सच्चे साधक होते हैं उन लोगों की साधना में यदि थोड़ी सी ये इधर-उधर चुक हो जाए तो उनको एकदम कान पकड़ कर के जगा देते हैं तो ऐसे राजा महाराज जैसे लोगों ने अपने संग में साधना की है उनके सामने हम लोग कुछ नहीं है हजार जब ध्यान कर ले उनके सामने हमारा कुछ होने वाला नहीं किंतु फिर भी मुझे लगता है मेरा जो पर्सनल आध्यात्मिक जीवन उसका फाउंडेशन है ठाकुर मा स्वामी जी की यह सब बातें सरल बातें ठाकुर एक बार एक साधु को मिला है वेदांत वादी साधु तो उसके साथ में जैसे ठाकुर का हैबिट है वह जैसे ही कोई आध्यात्मिक साधक दिखता है उसके साथ में बैठक गप लगाना शुरू कर देंगे तो जैसे ही यह साधू को देखे तो उन्होंने उसके साथ में गप लगाना चालू कर दिया फिर आखिर में क्या कहा एक बार शोहम उड़ाए दाओ ए बार विलास इस बार सोहम को उड़ा दो इस बार सिर्फ विलास यह लीला विलास यह साधक खास करके जो रामकृष्ण संघ के साथ में युक्त साधक है हम लोगों के लिए ठाकुर और मां का ये जो लीला विलास है यही है हमारी साधना का फाउंडेशन यह सब लीला विलास लीला कथा लीला वार्ताएं हमने हजारों बार सुनी होगी जो कोई साधु है हम लोग जब बोलते हैं तो यही तो सब दपर इंसिडेंट है गोल घुमा करके इन्हीं के बारे में तो बोलना है किंतु फिर भी जब इनको हम बार-बार सुनते हैं तो एक हथोड़े की तरह जो जन्म जन्मांतर के जो कर्मों का यह जो पूरा एक भार हम उठाकर घूम रहे हैं उसको ऐसा तोड़ देते हैं यह लोग कि हमको लगता है कि हां हल्के हो गए तो यह सब कहानियां कुछ कहानियां चंद कहानियां थोड़ा सा आपके साथ में शेयर करता हूं ठाकुर और मां की कहानी प्रारंभ कहां से हुई हमको तो वैसे पता है कि ठाकुर दक्षिणेश्वर में थे साधन भजन कर रहे थे और जैसे कि लोगों की हैबिट होती है हजार तरह की बातें चंद्रा मणि देवी के पास में पहुंचती थी कि हां आपका लड़का पागल हो गया है दिगंबर होकर के पता नहीं क्या करता रहता है और वह जैसे कि हलधार ने देखा था ठाकुर दिगंबर होक के पेड़ के ऊपर में बैठे हैं और वहां से मने वो जैसे कि हनुमान की तरह वो हलधार कहता है कि तुम्हारी शादी नहीं होगी तो ठाकुर नाराज हो गए तुम क्या सोचते हो कि इतना तुम यह आध्यात्म रामायण वगैरह जो पढ़ते हो उसके बाद में ऐसा तुम समझ रहे हो कि मेरा यह सब भोग विलास में मन जाने वाला है तो यह सब कहानियां बड़ी-बड़ी होकर के चंद्रवणी देवी के पास में आ रही थी तो जैसे 10 लोग सलाह देने वाले होते हैं कहा कि शादी करवा दो बहू आ आएगी तो बच्चे का सर अपने से ठिकाने आ जाएगा जब रोटी कपड़े की जब चिंता होगी सब ठीक हो जाएगा जैसे कि यह डॉक्टर सरकार ठाकुर को जब कैंसर हो गया था डॉक्टर सरकार ट्रीटमेंट ले रहे दे रहे थे उनको और डॉक्टर सरकार का लड़का आया ठाकुर के पास में अभी डॉक्टर सरकार के बारे में तो पता है कैसे सब हथोड़ा छाप वो सब बातें करते थे कि आपका यह सब भ्रम है यह वो वगैरह किंतु बैठे रहते थे सात आठ घंटे तक और क्या बोलते थे कि सिर्फ मेरे साथ बात करनी और किसी के साथ बात नहीं करनी गले में कैंसर है तो अपने से सात आठ घंटा बैठेंगे गप लगाएंगे तो यह डॉक्टर सरकार का लड़का आया तो ठाकुर ने उसके साथ बात की ठाकुर को बड़ा पसंद आया लड़का तो ठाकुर कहते हैं अच्छा देखिए आपसे तो यह तुम्हारा आपका लड़का अच्छा है तो डॉक्टर सरकार क्या कहते हैं उसको अभी तो नौकरी नहीं करनी है ना पैसा नहीं कमाना है बाप के पैसे पर खा रहा है इसलिए सब बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है एक बार पैसा कमाना शुरू करे ठिकाने आ जाएगा ये सनातन सत्य है तो चंद्रमणि देवी को भी बोला गया बच्चे की शादी कर दो सब ऑटोमेटिक ठीक हो जाएगा तो अभी ठाकुर को बुलाया गया कमर पुकुर और ठाकुर बड़े आनंद से देख रहे हैं जैसे कि और किसी की शादी हो रही है और किसी का सब हो रहा है अपने से निर्लिप्त और सामने इधर वो बात फला इधर बात कर रहे हैं कहीं उधर बात कर रहे हैं सबको पता है पागल को कौन यह अपनी बच्ची की शादी करवाएगा और सही में जो लोग एक बहुत बात की बात है ठाकुर की महासमाधि के बाद की मां जयराम बाटी में थी और और अभी इतने सारे भक्त मां के पास में आते थे तो उस समय तो सब कहां वह फल मिठाई क्या-क्या सब मां के पास में आता था तो वो एक भाविनी देवी बोलकर के एक महिला वहां पास में बैठी थी तो ये सब मिठाई फल देख रही है और उनकी मतलब वो जो लोभ जो प्रकट होता है मन में तो थोड़ी देर के बाद में बहुत सारे लोग बैठे थे भक्त लोग बैठे थे मां के जो सन्यासी शिष्य सब लोग बैठे थे तो सबके सामने यह महिला ने कह दिया कि वो परमहंस महाशय के साथ में तुम मेरी शादी होने वाली थी किंतु लोगों ने कहा कि पागल है उसके साथ में शादी मत करो इसलिए मेरी शादी नहीं हुई यदि हो जाती तो यह सब मेरे पास में आता आज माने कहा अरे उसमें तुमको क्या दिक्कत है तुमको क्या चाहिए ले लोय मिठाई चाहिए फल चाहिए ले लो जितना चाहिए ले लो तो यह उस समय ऑलरेडी बातें फेलना शुरू हो गई थी कि ठाकुर पागल है बच्ची का विवाह कौन देगा तो उस समय ठाकुर ने कहा था जयराम बाटी में पात्री कुटो बांधा फूटो बांधा एक ट्रेडिशनल पेड़ का जो प्रथम फल होता है देवता को अर्पित किया जाता है किंतु यह कोई पशु या पक्षी उसको खा ना ले इसके लिए किसी पेपर या प्लास्टिक में उसको रेप कर देते हैं जिससे कि वह सुरक्षित रहे फिर उस सुरक्षित फल को देवता को अर्पित किया जाता है तो ठाकुर के लिए सुरक्षित मां को रखा गया है तो फिर वहां पर जाकर संधान किया गया पता चला कि सही में मां शारदा है वहां पर और वहां पर उनके पिताजी ने हां भी कह दी हो सकता है कि यह जो अभी आजकल तो मोबाइल वगैरह है फटाफट न्यूज पहुंच जाता है उस समय तो जयराम बाटी में हो सकता है न्यूज नहीं पहुंचा होगा जो भी है व उनके पिता जी ने हां कह दी विवाह हो गया अच्छा हमको वैसे जनरली यह पता है कि यहां से ठाकुर और मां की कहानी प्रारंभ होती है किंतु साथ में दूसरी भी एक कहानी है जो राम कृष्ण पुंथी में अक्षय कुमार सेन क कि मां जब छोटी थी उस समय सि होड़ वहां पर बीच-बीच में संगीत भजन वगैरह कार्यक्रम हुआ करते थे तो मां एक बार बिल्कुल छोटी बच्ची है और वहां पर किसी एक कार्यक्रम में बैठी है सामने बैठे हैं अपने ठाकुर तो अभी जिस महिला की गोद में छोटी बच्ची मां को बिठाया गया है वह महिला मां को अभी जैसे वो हंसी मजाक करते ना छोटे बच्चों के साथ में तो महिला मां को पूछती है कि अच्छा देखो इतने सारे बैठे हैं सामने तुम किसके साथ में विवाह करोगी किसके साथ में शादी करोगी तो छोटी बच्ची शारदा ने हाथ उठा कर के ठाकुर के सामने दिखा कर के कह दिया कि हां अभी बच्ची को बोलना नहीं आता हाथ उठा कर के इशारा करके किंतु कह दिया है तो यह हुआ स्वयंवर ठाकुर और मां का जो विवाह है एक्चुअली वो स्वयंवर है पात्र जद पात्री का संधान करता है वो तो एक ठीक है किंतु पात्री जब पात्र को पसंद कर करती है यह अपनी सीधी रामायण की मां सीता की बात आ गई कि मां सीता किसको माला पहनाए गी तो यहां पर भी मां शारदा ने ठाकुर को स्वीकार किया है और देखिए कि इसका जो रिलेवेंट है वो बहुत बाद में हमको पता चलेगा एक बार थोड़ा सा जंप करके हम लोग ऐसा क्रोनोलॉजी नहीं जाके जंप करके करके बातें करते हैं तो इस तरह से एक बार दक्षिणेश्वर में ऐसी बात उठी कि मां बहुत खर्चा करती जो भी मां के हाथ में आता है मुक्त हस्त से सब कुछ बिला देती है जो भक्त आया जो लड़का आया जो कोई भी आए फल है मिठाई है खाना है खिला दो सबको तो ठाकुर भी थोड़े से डर गए ठाकुर है वैसे वैरागी पूरे वो पैसों बैसो के साथ में कोई लेना देना नहीं है ऐसे ठाकुर डर गए तो ठाकुर को डरा दिया होगा तो समझ लीजिए मां कितना खर्चा करती होगी तो ठाकुर ने मां को कहा अरे इतना खर्चा करने की क्या जरूरत है ऐसा करने से कैसे चलेगा व मां ने कोई उत्तर दिया नहीं और मां चुपचाप वहां से चली गई तो जैसे ही मां बिना उत्तर दिए चली गई ठाकुर और ज्यादा डर गए वो रामलाल को हृदय को बुला कर के कहा अरे जाओ जाकर के तुम्हारी उनके साथ में खड़ी के साथ में बात करो देखो वो रामलाल को बुला कर के तुम्हारी खड़ी के साथ जाकर के बात करो वो वो जदी नाराज होए जाए खानकार सब नष्ट होए जावे मां जदी नाराज हो जाएगी तो यहां का का अर्थात ठाकुर का साधन भजन सब नष्ट हो जाएगा तो यह मां का प्रभाव था यह मां का महात्म्य था तो मां ने ठाकुर को जो पसंद किया है विवाह करने के लिए उसके पीछे एक बहुत बड़ा तात्पर्य भी है तो यह हुई मां और ठाकुर की कहानी का प्रारंभ फिर विवाह के बाद में मां ठाकुर के घर आती है और मां को तो सब गहने वगैरह पहनाए गए थे शादी में जैसे 3 रप दहेज भी दिया गया था अभी दहेज की बात आती है तो हम लोग सोचते हैं कि कन्या पक्ष वाले वर पक्ष को देते होंगे किंतु यहां पर तो मां लक्ष्मी को आपको विवाह करके लाना है भाई तो दहेज दिया गया था मां को ठाकुर के परिवार ने मां के परिवार को 00 दहेज दिया था और इस तरह से गहने वगैरह पहना करके मां को लाया गया था घर किंतु ठाकुर का संसार यानी शिव का संसार कहां वो कुछ अभी मैंने भी कहा पैसा भी जो दहेज भी दिया है तो वह भी तो व सब उधार लेकर के दिया है और गहने दिए हैं तो वो लाहा बाबू के वहां से लाकर के वो गहने पहनाए हैं अभी गहने लौटाने का समय आ गया और मां तो सब गहने पहन के एकदम बच्ची है मां की उम्र थी 5 साल ठाकुर की उम्र थी 24 साल तो मां तो एकदम सुंदर बच्ची मां लक्ष्मी स्वयं सुंदर सुरूपा मां लक्ष्मी गहने पहन के बैठी है तो अभी किस मन से किस मुंह से मां को कोई बोलेगा कि ये गहने उतारने का समय हो गया है गहने लौटा देना है कौन बोलेगा चंद्रा मणि देवी बेचारी मन में इतना कष्ट पा रही है तो ठाकुर वैसे लगता है ठाकुर हवाहवा में उड़ते हैं ज्यादातर टाइम तो प्रैक्टिकल भी ऐसे है वो एक कहानी थी ना बाद में मास्टर महाशय छाता वो पंचवटी में छोड़ के आ गए फिर ठाकुर ने पूछा छाता कहां है तो मास्टर महाशय कहते अरे वो तो पंचवटी में छूट गया ठाकुर बोलते मेरा धोती नहीं रहता ठीक फिर भी मैं छाता नहीं भूलता हूं तुम लोग संसार करके बैठे हो छाता भूल के आ जाते हो तो ठाकुर जैसे थियोरेटिकल आध्यात्मिक जैसे थे ऐसे प्रैक्टिकल विध है और ठाकुर ने मां को कहा अच्छा चिंता मत कीजिए जब शारदा सो जाएगी तो मैं बड़े ही कौशल से मां के गहने उतार लूंगा हुआ भी ऐसा मां सोई हुई है और ठाकुर ने बड़े ही कुशलता से जैसे कि मां जग ना जाए सब गहने उठा उतार करके चंद्रा मणि देवी को दे दिए दूसरे दिन सुबह मां ने उठ कर के देखा कि अरे बच्ची है वैसे 5 साल की किंतु तो लक्ष्मी सरस्वती स्वयं तो भाई तो इशारा करके कह रही है मेरे जो यहां यहां गहने थे वो कहां गए तो वो फिर तो चंद्रा मणि देवी की आंखों में तो आंसू आ गए कहा कि बेटी तुम अभी चिंता मत करो तुम बाद में मेरा गदाई तुमको इतने सारे गहने लेकर देगा तुमको कि इसका कोई तुमको मतलब यह नहीं रहेगा इतना गहने तुमको लाकर के देगा तो देखिए ये बात भी सही है कि अ यह तो हमको पता है कि ठाकुर ने मां के लिए गहने बना दिए थे व मां के जो हाथ में पहनने की जो कंगन वगैरा जो है वह तो ठाकुर ने बना ही दिए थे किंतु ठाकुर सिर्फ अकेले तो नहीं है पूरा संघ है अभी तो जब राधु का विवाह हुआ था उस समय वर्णन है कि शरत महाराज ने और बाकी के भक्तों ने कलकत्ता से इतने गहने लाकर के राधू को पहनाए थे कि गहनों के बाहर से राधू चल नहीं पा रही थी तो इतने गहने मां के पैरों में आकर के बाद में हम लोगों ने रख दिए अभी मां को नाही ही गहनों का कोई कमी है ना ही वस्त्र का किंतु वह तो था शिव का संसार जिस समय की हम बात कर रहे हैं तो जो भी है कहानी आगे बढ़ती है ठाकुर कुछ समय के बाद में दक्षिणेश्वर वापस चले जाते हैं और बालिका मां भी जयराम बाटी चली जाती है ठाकुर साधन भजन करते करते विश्व साधन जगत में जो सर्वोच्च शिखर है अद्वैत अद्वैत निर्विकल्प समाधि की जो अनुभूति उसके ऊपर में विराजमान होते हैं और फिर आखिर में साधन समाप्त करके अपनी गुरु भैरवी ब्राह्मणी के साथ में कामर पुकुर वापस आते हैं तो जैसे ही कामर पुकुर आते हैं मां को भी जयराम बाटी से बुलाया गया और मां भी जैसे कि इतने सालों के बाद में ठाकुर के साथ में फिर से दर्शन हो रहा है ठाकुर की सेवा का उनको फिर से मौका मिल रहा है तो मां भी इतनी खुशी खुशी दिन रात ठाकुर की सेवा कर रही है उस समय मां कहती है कि हृदय में जैसे कि आनंद का पूर्ण घट बिठा कर के रखा हो इस तरह की अनुभूति मुझे सब समय होती थी तो यह मां और वहां पे थी भैरवी ब्राह्मणी और भैरवी ब्राह्मणी का टेंप थोड़ा सा ज्यादा था तो बेचारी मां उनको बिल्कुल अपनी सास की तरह सम्मान देती थी और उनसे डर के भी रहती थी अभी एक दिन हुआ ऐसा कि भैरवी ब्राह्मणी ने तरकारी बनाई अभी तरकारी बनाई तो उसमें इतना मिर्च इतना सब झाल दे दिया कि वो खाते-खाते आंखों में से आंसू आने लगे सबके तो अभी मां खाने को बैठी है साथ में ही बैठी है अपने रामलाल दादा की मां दोनों लोग खाने को बैठे हैं और भैरवी ब्राह्मणी पूछ रही है कि अच्छा बताओ तो कैसा हुआ है यह तरकारी तो रामलाल दादा की मां ने तो फट करके बोल दिया कि अरे जा झाला छ अरे इतना इसमें तीखा है कैसे खाएंगे तो और किंतु मां ने एकदम डरते डरते कहा आंखों में से आंसू आ रहे पानी गिर रहा है फिर भी वह बड़े डरते डरते संकोच पूर्वक कहती है बहुत अच्छी हुई है बहुत अच्छी हुई है तरकारी तो यह भैरवी ब्राह्मणी तो एकदम खुश होकर के रामलाल दादा की मां को कहती है देखो तु इतना मेहनत करके मैं तरकारी बनाती हूं फिर भी भी तुम्हारा कंप्लेन और कंप्लेन यह शारदा को देखो कितना सुंदर वह तरकारी खाके आनंद कर रही है वो कहती है अभी तरकारी बनाऊंगी तो इन्हीं को दूंगी तुमको नहीं दूंगी जाओ तो रामलाल दादा की मां बच गई और मां को बेचारी वो बरवी ब्राह्मणी की तरकारी खानी पड़ती थी एक दिन भैरवी ब्राह्मणी ने ठाकुर को इस तरह से सुंदर यह सब गले में माला सजा गले में माला पहना करके चंदन के लेप लगा कर के बहुत ही सुंदर रूप से सजाया और ठाकुर भी इस तरह से सजाने से तो भाव में चले जाते थे तो भैरवी ने मां को बुला कर के कहा कि देखो तो ठाकुर को कैसे दिख रहे हैं तो देखिए कि मां ने दर्शन करके इमीडिएट वहां से चली गई जैसे कि भयभीत हो गई हो और मां को यह भई तो थोड़ा सा तो लगेगा गांव की सरल महि बच्ची है वह तो अभी भाव क्या है समाधि क्या है दर्शन क्या है यह सब चीजों के बारे में तो कुछ पता भी नहीं है बाद में जब मां दक्षिणेश्वर गई थी ठाकुर के साथ में एक कमरे में शयन करती थी ठाकुर बार-बार रात को जब समाधि में चले जाते थे उस समय मां को रात को नींद नहीं आती थी बिल्कुल डर डर करके बैठती थी कि कब मां समाधि में चली जाएगी पता नहीं कब ठाकुर समाधि में चले जाएंगे पता नहीं क्या होगा तो उस समय फिर ठाकुर ने कहा कि यदि तुमको रात को नींद नहीं आती है इस तरह से तो जाओ नबत में जाकर के मेरी मां है चंद्रा मणि देवी उनके पास में सो तो यह बेचारी बच्ची को जब इस तरह से ठाकुर के दर्शन कराए गए तो बिना कुछ बोल कर के वो वहां से चली गई अभी ठाकुर का था ठाकुर को वैसे देखिए ठाकुर का दोनों है एक बचपना भी है और एक हाइपर मैच्योरिटी भी है उस अर्थ में कि वो तो नारायण स्वयं है जगत के नियंत्र वो तो है सृष्टि स्थिति प्रलय करने वाले हैं किंतु मानव शरीर धारण किया है बच्चे का भाव है तो बच्चे की तरह ही बच्चे के जो छोटे-मोटे जो शौक होते हैं ना ठाकुर ने कहा एक बार कि जो बड़े-बड़े जो वासना एं होती है उनका संपूर्ण रूप से त्याग कर दो और छोटी-मोटी जो वासना एं होती है उनको भोग करके छोड़ दो तो जैसे कि एक बार ठाकुर को लगा कि मैं अभी वो जरी वाले पोशाक पहनूंगी वो जो सोन सिल्वर जो नल है उस तरह के हुक्के से मैं तमाकू खाऊंगा तो वो इन्हें अपने मथुर बाबू ने सब व्यवस्था कर दी ठाकुर बैठे हैं यह सब बढ़िया सा जरी वाला पोशाक पहन के वो गद्दी तकिए पे और हुक्के में वो हुक्का पी रहे हैं और फिर जैसे ही एक दो ऐसा किया फूंक लगाई वैसे ही यह जो मन की वासना है मिट गई वो री वाले कपड़े निकाले फेंके जमीन पर उसको पैर भी मारा और वो हुक्का भी फेंक दिया और मन को कहा देखो मन यह है जरी वाले पोशाक पहन के जैसे जमींदार लोग करते हैं ना ऐसे पोशाक पहन के ये सो सोने के वो सिल्वर के नल वाले हुक्के में स्मोकिंग करना तो ऐसा करके तो ठाकुर का यह सब था तो ठाकुर को ऐसे जब वो जयराम बाटी गए थे कामर पुकुर में ठाकुर को यह जो वगार दिया हुआ तरकारी है वह खाने का उनको बड़ा शौक होता था बीच-बीच में तो ठाकुर कहते थे यह जो बांगला में जाकर बोले पांच फड़न पांच तरह के वगार देकर के जो तरकारी होती है जो शक वगैरह जो होता है तो ठाकुर कहते थे कि वह पांच फड़न दिए ममन तरकारी करो कि जिसकी इस तरह से उसकी बनाओ उसका शाक सब्जी वगैरह उसकी खुशबू से मन भर जाए तो ऐसा ठाकुर बोलते थे और यह रामलाल दादा की मां और अपनी मां शारदा यह दोनों खाना बनाते थे एक दिन रामलाल दादा की मां ने कहा कि अभी यह पांच फड़न तो है ही नहीं यह पांच तरह के वगार है नहीं तो क्या किया जाए इसके बिना ही बना दो खाना तो ठाकुर ने सुन लिया तो ठाकुर आए दौड़े दौड़े कहा कि अरे तुम्हारा यह जो ये वगार वाला जो खाना है उसको खाने के लिए मैं दक्षिणेश्वर में मछली का माथा और ये खीर की बाटी ये छोड़ के यहां पर आया हूं और तुम लोग कहते हो बिना वगार के बिना तरकारी खिलाओगे ऐसा नहीं चलेगा भाई इसमें तरका जो वगार पांच फड़न डालो और फिर बनाओ और यदि नहीं है तो पांच पैसों का ले आओ बाजार में से तो इस तरह से खाना बनाया गया ठाकुर और हृदय बैठे हैं खाने के लिए तो अभी जो दो-तीन तरह का तरकारी था तो एक खा करर के ठाकुर ने कहा कि यह तरकारी जिसने बनाई है वह है रामलाल वद्दी राम रामलाल वैद्य और यह तरकारी जिसने बनाई है वो है श्रीनाथ सेन छीना अर्थात श्रीनाथ सेन अभी इसके पीछे का अर्थ क्या है रामलाल था वैद्य यानी कि एक प्रॉपर डॉक्टर जिसको वो प्रॉपर ट्रेनिंग लिया होता है और श्रीनाथ सेन या या तो फिर जैसे ठाकुर कहते ठाकुर की जबान थोड़ी सी तोतली थी ना तो छी नाथ सेन ऐसा ठाकुर कहते हैं वो मधुर उनकी वाणी में तो ये है छीना हाथुर अभी हात उड़े अर्थात कौन कि जो हाड़ वैद्य जिसको किसी भी तरह की ट्रेनिंग नहीं होती है पशुओं का भी इलाज कर लेता है और आदमी का भी इलाज कर देता है तो एक तरकारी बड़ी सुंदर बनी थी तो वह है रामलाल वैद्य उसको बनाने वाला और एक तरकारी में ज्यादा दम नहीं था तो यह है छीना तुड़ है ये जो हड वैद्य तो हृदय ये सुनकर के वो भी आनंद कर रहा है अभी यह रामलाल वैद्य यानी कि सुंदर तरकारी बनाने वाला कौन था तो वो रामलाल की मां हमारे रामलाल दादा जो थे उनकी मां लक्ष्मी दीदी की मां और वो जो छीना हाथुर यानी यह जो हाड वैद्य वो अपनी मां शारदा तो मां कहती है कि वो रामलाल मां होलो वैदी और आमी होला तुड़ वो रामलाल जो की मां है वह हो गई वैद्य और मैं हो गई हाड वैद तो हृदय यह सुन कर के मजाक करते करते कहता है कि ये देखिए कि यह जो हार्ड वैद्य होता है वो तो आपका खुद का है जब भी इच्छा होगी उसको आप बुला सकते हैं जबकि यह रामलाल वैद्य है वो वैद्य तो बड़ा महंगा होता है वो विजिट करेगा तो पैसा भी बहुत ज्यादा लेगा बार-बार तो आपको उसको बुला नहीं सकते आपका ये हाड वैद्य जो है सब समय आपके पास में रहेगा जो चाहे वो बना देगा तो ठाकुर कहते हैं हां हां ता बटे है ता बट है बो ठीक ठीक है मां तो अपनी ही है वो तो जयराम बाटी में हो ना कि कामर पुकुर में हो ना कि दक्षिणेश्वर में मां सब समय साथ में रहने वाली है मां सब समय खाना बनाया करेगी जबकि रामलाल दादा की मां है वह तो वहां पर रहने वाली नहीं है तो ठाकुर थे इस तरह के व रसिक चूड़ामण तो यह हुई अपनी कामर पुकुर की कहानी इसके बाद में ठाकुर आते हैं दक्षिणेश्वर में वापस और फिर से साधन राज्य में डूब जाते हैं और फिर से वही घटना परंपरा चालू होती है जो कि चंद्रा मणि देवी को परेशान किया करती थी कलकत्ता से हजार बातें वहां पर जयराम बाटी कमार पुकुर अंचल में आती है कि ठाकुर पागल हो गए हैं पता नहीं क्या-क्या सब उटपटांग काम करते हैं वो वो मां को भोग की जो पूरी है वो बिल्ली को खिला देते हैं ऐसा सब नाटक करते हैं तो अभी ये मां भी बेचारी थी जयराम बाटी में और मां के कान में लोग आकर के कहते थे कि अरे ये वो शमार मेर पागला जमाय संगे बे हुए छ ये जो श्यामा सुंदरी देवी की बच्ची है शारदा उसका विवाह हुआ है एक पागल जमाई के साथ में ने और यह घटना को याद करके बहुत बाद की बात है जब तो ठाकुर की महासमाधि हो गई थी स्वामी जी जगत विख्यात हो गए थे रामकृष्ण संघ की स्थापना हो गई थी उस समय की बात है कि जब मां जयराम बाटी में थी अपने ये गिरीश घोष वगैरह कितने ही भक्त लोग वहां पर गए थे जयराम बाटी में एक भिखारी आकर के भगवान शिव का वह गाना गा रहा है कहता है कि यह शिव का तो यह जो संसार है और मा इतनी सुंदर है सुरूपा और कहां यह शिव के साथ में स्मशान में रह रही है तो यह गाना सुनकर के यह कीर्तन सुनकर के सभी की आंखों में आंसू आ गए सही में एक दिन ऐसा था सब लोग कहते हैं कि इतनी सुरूपा अपनी मां शारदा है और कहां इस पागल शिव जैसे जमाई के साथ में स्मशान में उनका विवाह हो गया है तो वह सब कहानियां चलने लगी मां को भी मां मां बेचारी क्या करेगी अपनी आंखों से जो देखेगी नहीं तो उसके बारे में कुछ बोल नहीं सकते एक दिन ठीक किया कि मैं भी जाती हूं कोलकाता मैं भी दर्शन करती हूं देखती हूं कि कैसा है उनका स्वभाव तो मां आई कोलकात्ता में देखा कि ठाकुर अभी भी वैसे ही है जैसे कि उन्होंने कमरपुर में देखा रसिक चूड़ामण जब बातें करेंगे तो ऐसी सुंदर सुंदर एक के बाद एक बातें करेंगे कि आपका मन भर जाएगा और ऐसे ठाकुर को देख कर के जो पागल बोलेगा जैसे वोह ठाकुर को किसी ने बोला था ना वो ब्राह्मण समाज जी लोग आए थे य ठाकुर बेहड़ हो गए हैं तो ठाकुर कहते हैं कि मैं ईश्वर की चिंता करके बेहड़ हो जाता हूं तुम लोग की संसार की चिंता करते करते बेहड़ हो जाते हो तो बोलो कौन सा अच्छा है तो बेहेड अर् हेड अर्थात कि अपना सर और बेहेड होना अर्थात सर चला जाना सर कट जाना तो पागल हो जाना ठाकुर बोलते हैं तुम लोग संसार की चिंता करते करते पागल हो जाते हो वो बुरा है ना कि मैं ईश्वर की चिंता करते पागल होता हूं तो यह थे ठाकुर और ठाकुर को देख कर के जो मां का जीवनी जिन्होंने लिखा है अपने गंभीरानंद जी महाराज अपने संघ के प्रेसिडेंट विद्वान प्रेसिडेंट उन्होंने मां के जीवन में बहुत ही यह जो घटना को देख कर के कि ठाकुर के साथ में जब दक्षिणेश्वर में प्रथम मुलाकात हुई तो मां के मन में जो हाश हुई वो देख कर के फिर मां ने क्या सोचा होगा तो गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं देवता देवता या छन माने देखा कि देवता देवता ही है वोह भी पागल नहीं हो गए हैं भूत नहीं हो गए हैं देवता देवता ही है तो अभी शुरू होती है मां की दक्षिणेश्वर की कहानी सुंदर सुंदर एक के बाद एक प्रसंग ठाकुर कभी भी मां को तुम ही छोड़ कर के तू ही नहीं कहते थे जनरली ऐसा होता है कि जो अपने से हम जिनको छोटा मानते हैं उम्र में या तो अकल में इनको तई करके पुकारते हैं जैसे कि मास्टर महाशय ठाकुर ने पूछा तुम्हारा परिवार कैसा है तुम्हारी बीवी कैसी है मास्टर ने कहा कहा अच्छी है किंतु अज्ञानी है तो ठाकुर भी इमीडिएट नाराज होकर बोल दिए या तुम ही ज्ञानी तुम ज्ञानी हो क्या मास्टर महाशय लिखते हैं कि तभी तक उनको पता नहीं था कि ज्ञान किसको कहते हैं अज्ञान किसको कहते हैं तो अभी जिन लोगों को ऐसा एक घमंड होता है कि हम लोग ज्ञानी है बाकी सब अज्ञानी तो वे लोग तुई तई करके बंगाली में तुई अर्थात की तुम से भी एक छोटा एक जो होता है जैसे हिंदी में दो ही उच्चारण वो होते हैं अ आप और तुम बांगला में तुम के बाद में तूही भी है तो मां कहती है ठाकुर कभी मुझे फूल से भी आघात नहीं किए हैं कभी तुई करके पुकारा नहीं है एक बार लक्ष्मी दीदी लक्ष्मी दीदी यानी कि ठाकुर के भाई की बच्ची और वो भी वहां पर दक्षिणेश्वर में रहती थी बच्ची थी तो ठाकुर ने एक बार सोचा कि किसने कोई पीछे से दरवाजा बंद करके जा रहा है तो उन्होंने सोचा लक्ष्मी होगी लक्ष्मी दीदी होंगी हमारे लक्ष्मी दीदी ठाकुर के लिए लक्ष्मी तो उन्होंने कहा दोर जाटा भेजिए जास अर्थात कि उनको तुई करके कहा किम दरवाजा जाओगी तो बंद करके जाना तो मां ने उत्तर दिया कि हां दरवाजा बंद करके जाती हूं तो इमीडिएट ठाकुर को लगा अरे यह तो मां है यह तो लक्ष्मी नहीं है तो उसके बाद में ठाकुर आकर के मां की माफी मांगते हैं कहते हैं मैं मुझे नींद नहीं आई मैंने तुमको तू ही क्यों कह दिया तो इतना ठाकुर मां को रिस्पेक्ट करते थे और साथ साथ में यह जो उनका जो एक मधुर स्वभाव था वह भी तो वहां पर था एक दिन ऐसा हुआ ठाकुर और एक भक्त के साथ में व ठाकुर ने कंपटीशन लगा दी किसका वर्ण ज्यादा गोरा है किसके शरीर का वर्ण ज्यादा सफेद है तो दोनों लोगों ने कंपटीशन लगाई अभी जज तो किसी को बनाना पड़ेगा जज कौन बनेगा तो ठाकुर तो कहेंगे कि मैं तुमसे ज्यादा गोरा हूं वो जो सामने वाला भक्त था वह भी कहेगा कि मैं तो आपसे ज्यादा गोरा हूं यह दोनों तो जज नहीं हो सकते कोई निष्पक्ष जज को बनाना पड़ेगा किसी को निष्पक्ष व्यक्ति को जो कि बिना किसी किसी के प्रभाव में आकर के वह अपना जजमेंट सुनाए तो ये निष्पक्ष जज कौन है तो वह है अपनी मां तो ठाकुर ने मां को कहा कि देखो हम दोनों लोग वहां पर पंचवटी की ओर पैदल चलते चलते जाएंगे तुम एक काम करना तुम नबत में जो रहती हो वहां से देखना हम दोनों को और फिर बताना दोनों को कंपेयर करके एकदम तटस्थ हो कर के किसका वर्ण ज्यादा गोरा है किसके शरीर का वर्ण ज्यादा सफेद है तो मां ने कहा ठीक है तो मां वहां पर नबत में खड़ी है छुप करके और यह दोनों लोग रास्ते से नबत के सामने से जा रहे हैं तो मां ने देखा कि ठाकुर का वर्ण जो है वह एकदम सोने जैसा है गोल्डन वर्ण और वो जो ताबीज उस समय पहनते थे ठाकुर सोने का उसके साथ में बिल्कुल मैच हो जा रहा है किंतु जो जो भक्त था जिनके साथ में ठाकुर कंपटीशन करते थे व वो उससे भी ज्यादा गोरा है ठाकुर से तो मां ने अपना निष्पक्ष जजमेंट दिया कि वह डिवोटा जो है भक्त वह ठाकुर से ज्यादा गोरा है तो देखिए कि यह बात सुन कर के हमको वह शंकराचार्य और मंडन मिश्रा की बात याद आ जाती है कि उस समय अपना जो भारतीय परंपरा है उसमें यह पति है यह पत्नी है यह मेरा फेवरेट है यह सब नहीं जो धर्म के आधार पर जो डिसीजन लेना है धर्म के आधार पर लिए जाएंगे तो शंकराचार्य और मंडन मिश्रा का डिबेट हो रहा है जज कौन होगा तो होगी उभय भारती मंडन मिश्रा की पत्नी और फिर ऐसा नियम बनाया गया है कि यदि शंकराचार्य हार जाए तो मंडन मिश्र गृहस्थ थे तो शंकराचार्य को गृहस्थ हो जाना पड़ेगा और शंकराचार्य सन्यासी है तो शंकराचार्य जीतेंगे तो मंडन मु मिश्र को सन्यासी हो जाना पड़ेगा यदि मंडन मिश्र हारते हैं सन्यासी होते हैं सन्यास ग्रहण करते हैं तो उभय भारती विधवा होगी क्योंकि सन्यासी तो जगत में से मृत्यु हो जाता है उसका पहले ही श्राद्ध क्रिया अपनी करनी है तो अभी उभय भारती यदि ऐसा कहती है कि उसका पति हार गया तो वह विधवा होगी और विधवाओं के लिए जो कठिन नियम जो है समाज में उ सबका उसको पालन करना होगा फिर भी उभय भारती निष्पक्ष जजमेंट देने के लिए तैयार होती है शंकराचार्य को और अपने पति को फूल की माला पहनाते है कहती है कि जिनके फूलों की माला पहले मुर्झा जाएगी वह हार जाएगा और इसके पीछे लॉजिक क्या है जो हारता है उसका मन क्रोध और विषाद से भर जाता है तो क्रोध और विषाद य फूलों को मुर्झा देंगे और जो जीतता है उसका मन आनंद पूर्ण होगा तो मन के इस आनंद से फूलों को पोषण मिलता रहेगा और फूल वैसे ही फ्रेश रहेंगे तो यह इसके पीछे का लॉजिक था जो 2021 दिन जो डिबेट चला आखिर में देखा गया मंडन मिश्र के फूलों की माला मुरझा गई है और शंकराचार्य के फूलों की माला वैसे की वैसी ही है तो उभय भारती ने दिया अपना जजमेंट कि मंडन मिश्र हार गए तो देखिए कि वह जो सनातन प्रथा है मां उसी सनातन प्रथा को पालन कर रही है अपने पति हार गए तो कोई दिक्कत नहीं है धर्म को फॉलो करना है उसके बाद में देखिए कि ठाकुर मां के ऊपर में कितना भरोसा करते थे एक बार ठाकुर कहते हैं कि मैंने मुझे बाहर जाना था कहीं पर तो मैंने मां को पूछा तो मां ने कह दिया नहीं जाने की जरूरत नहीं है तो ठाकुर ने कहा कि ठीक है चलो अभी उन्होंने कहा है तो मैं नहीं जाता हूं फिर किंतु एकदम उनको ये लगा कि अरे ठाकुर अपने भक्तों को कहते हैं कि देखो मैं सर्वत हूं फिर भी उसने जब कहा कि मत जाना तो मेरा जाना नहीं हुआ और तुम लोग संसार में है तो पता नहीं तुम लोग स्त्रियों से कितने परेशान होंगे अपनी पत्नियों से अच्छा यह भी एक बात थोड़ी सी याद रखनी है कि ठाकुर जब स्त्रियों की ऐसा निंदा करते करते कभी लगते हैं जैसे कामिनी कांचन शब्द प्रयोग करते हैं तो एक बात ख्याल में रखना है कि जब पुरुष लोगों के साथ में होते हैं तब इस तरह की बातें करते हैं व स्त्रियों को उनके जो स्त्री भक्त होते हैं तब वह इस तरह से पुरुषों के बारे में भी हंसी मजाक किया करते थे अनफॉर्चूनेटली ऐसा है कि मास्टर महाशय ने कथामृत लिखा किंतु कोई स्त्री भक्त ने अपने ठाकुर के साथ में जो अनुभव हुए उसको ज्यादा ऐसा कुछ लिख कर के नहीं गए हैं बोलकर के वो जो एक पूरा एस्पेक्ट था वो अभी हमारे सामने नहीं है कुछ-कुछ है इंसिडेंट एक स्त्री भक्त थी उसने लिखा है कि लोग लोग कहते हैं कि ठाकुर तो स्त्रियों को अपने पास में ही नहीं आने देते थे यह बात कुछ गलत है हम लोग तो ठाकुर को कहां-कहां मिलने जाते थे इतने कुलीन गृह की वह होने के बावजूद भी एक बार किसी के घर गए मोटा बामुन बोलकर के ठाकुर का एक भक्त था उसके घर में तो ठाकुर वहां पर उस समय अकेले बैठे थे तो यह दो स्त्री भक्त जाकर के जैसे ही उनको प्रणाम किए ठाकुर बड़े खुश हो गए तो बोला कि अरे इतना दूर तुम लोग कहां से आ गई बिना पुरुष के अकेले उस समय की जो था कि अकेले घूमना फिरना थोड़ा मुश्किल था तो किंतु ठाकुर किंतु बड़े खुश हुए अभी ये दोनों स्त्री भक्त ठाकुर के साथ में गप लगा रहे है उसमें जो मोटा बामुन जिसके घर प ये लोग बैठे थे वो कहीं से बाहर गया था वो एका एकक वापस आ गया तो ये दोनों स्त्री भक्त बड़ी घबरा गई बोली कि अरे ये तो ये आ गए पुरुष उनके सामने तो चेहरा दिखाना ठीक नहीं तो ठाकुर जी इस खटिया के ऊपर में बैठे थे जिस खाट के ऊपर में उसके नीचे में जाकर के छुप गई और अभी ठाकुर बैठे हैं उस खाट के ऊपर में सामने बैठा है वो मोटा बामुन अभी दोनों भगवत वार्तालाप कर रहा है और ये दोनों जो स्त्री भक्त है वो के नीचे में छुप कर के बैठी है फिर यह जो लिखती है कि वहां पर इतने मच्छर थे मच्छर ने काट काट करके पूरा शरीर फूल गया किंतु चेहरे की हासी जो है ना हास्य वो रुक नहीं रहा है वो पूरा जो एक सीन बनता है वो एक ऐसा एक हास्य जनक कि वो खाट के नीचे में छुप कर के बैठे हैं तो इसलिए वो कि कामिनी कांचन वगैरह शब्द प्रयोग पुरुषों के सामने करते थे स्त्रियों के सामने जो करते होंगे अभी कोई स्त्री भक्त कथामृत लिख केर जाता तो हमको पता चलता है तो ठाकुर एक बार किसी को कह रहे हैं कि देखिए मां जब पहली बार यहां पर आई थी तो मुझे यह डर था कि यह गांव की महिला है उसको तो यह जो शहर में रहने का कुछ अनुभव नहीं है तो कहां पर यह क्या करेगी क्या नहीं करेगी कहां पर वह शौच के लिए जाएगी किस समय जाएगी लोग जद देख कर के मेरी निंदा करेंगे तो मेरा क्या होगा तो ऐसा बोल कर के ठाकुर किसी को बोल रहे थे तो मां ने सुन लिया यह बात किंतु साथ-साथ में ठाकुर यह भी कहते हैं कि किंतु देखिए कि मां काली का कैसा आशीर्वाद है कि मां इस तरह से मां शारदा इस तरह से रहती है कि किसी को कुछ पता नहीं चलता वहां का खजांची तो था कालीवाड़ा वो कहता था कि उन्नी आन सुने जी किंतु कखन देखी नहीं मां है ऐसा सुना है किंतु मां को कभी देखा नहीं है तो ठाकुर इस तरह से मां की प्रशंसा कर रहे हैं तो मां ने यह सुन कर के कहा कि अरे बाप रे मैं मां काली तो ठाकुर को जो देखना ठाकुर जो देखना चाहते हैं मां काली दिखा देती है तो अभी इस बार जैसे ही मैं कमरे से बाहर निकलूंगा करु की नजर के सामने आना ही पड़ेगा तो यह बोलक के मां शारदा ने मां काली को प्रार्थना की कि कैसे भी करके मेरी इज्जत को बचा करके रखना और सही में दक्षिणेश्वर में मां इस तरह से रहती थी इतना सुंदर मां अपने को छुपा कर के रखती थी सब कार्य हो रहा है किसी स्त्री के अलावा किसी को पता नहीं है ठाकुर भी जब रामलाल दादा को ऐसा कहते थे कि वह पिंजरे में वह जो ये है तोता और मेना उनको जाकर के यह फल प्रसाद वगैरह दे आओ तो ये मास्टर महाशय खुद ऐसा सोचते कि सही सही में तोता और मेना है वो थी वो थे अपनी मां शारदा और यह अपनी लक्ष्मी दीदी और जो पिंजरा था वह था अपना नबत तो बहुत समय तक मास्टर महाशय को खुद को यह भ्रम था कि सही में ठाकुर ने कोई तोता और मेना पालकर के वहां पर रखे हैं और देखिए कि यह जो संयम में रहना शहर में यह सही में जो गांव की स्त्री थी उनके लिए मुश्किल तो था ही था बहुत बाद की बात है ठाकुर की महासमाधि के बाद की स्वामी जी की भी महासमाधि के बात की कि मां उस समय क्वाल पाड़ा से होकर के कलकाता आती थी जयराम बाटी कलकाता जब भी आना जाना होता है क्वाल पाड़ा रुकना पड़ता था और उस समय तो रामकृष्ण मिशन की स्थापना हो गई थी स्वामी शारदानंद जी महाराज मायर धवारी मां के रक्षक मां के सेवक तो जब भी मां को जयराम बाटी से कोलकाता आना होता था तो अपने महाराज जी किसी ना किसी साधुओं को भेज देते थे मां को एस्कोर्ट करने के लिए तो मां को इस तरह से कुछ साधु लोग एस्कोर्ट करके ले आ रहे थे कोलकाता और रुकना हुआ बीच में जयराम बाटी में अभी क्वाल पाड़ा में क्वाल पाड़ा में रुके हैं और वहां पर जो आश्रम था तो आश्रम के जो कर्ता दर्ता थे केदार बाबू उनकी मां ने कहा मां शारदा को आइए कुछ समय के लिए हमारे घर भी आप पधारिए तो मां पैदल गप लगाते लगाते इनके घर पर गई यहां पर जो महाराज जी जो स्वामी जी मां को रिसीव करने के लिए आए थे उनको पता चला कि मां को यह लोग पैदल लेकर गए हैं चला कर के बड़े ही नाराज हो गए जोर-जोर से गुस्सा करके वहां के भक्तों को कहने लगे तुम लोग बिल्कुल मूर्ख हो समझ में नहीं आता मां को पैदल चला कर के लेकर गए हो फिर उन्होंने पालखी लिया और फिर पालखी लेकर के केदार बाबू के घर गए मां को रिसीव करने के लिए बाय दैट टाइम मां वापस आ रही थी आश्रम में तो यह सन्यासी महाराज ने कहा मां देखिए यह लोग आपके साथ में कैसा अन्याय कर रहे हैं आपको पैदल चला कर के अपने घर पर लेकर गए पालखी में नहीं बिठा कर के तो उस समय तो मां पालखी में बैठ गई किंतु आश्रम में आकर के मां ने उस महाराज जी को बड़ा ही उनके ऊपर में क्रोध करते हुए कहा कि देखो तुम लोग तो मैं जब कलकाता आती हूं तो बिल्कुल एक पिंजरे में मुझे पूर के रखते हो यहां पे यह पाड़ा गांव एटा अ मादर पाड़ा गांव ये हमारा गांव है यहां पे उन्मुक्त होकर के मैं रहूंगी और यदि यह बात तुमको पसंद नहीं है तो जाओ तुम शरत को बोल दो कि मुझे कोलकाता नहीं जाना तो जैसे ही मां ने ऐसा कहा सन्यासी महाराज एकदम साष्टांग प्रणात हो गए कि मां मुझे क्षमा कीजिए मुझे ऐसा लगा कि मेरी गलती की वजह से आपको पैदल जाना हुआ इसलिए मैं पालखी लेकर आया था तो आपकी जैसी इच्छा है ऐसा आप कीजिए तो देखिए कि ये कलकाता में आकर के इस तरह से छोटी सी जगह पर रहना वह भी मां के लिए कितनी तपस्या थी एक जो कि गांव में बड़ी हुई है उन्मुक्त जब भी जलाशय में जलाशय के लिए जलाशय है वहां पर जाना है कुआ है वहां पर जाना है खेत में काम करने के लिए जाना है अपने जो छोटे-छोटे भाई थे तो मां तो उनकी संभाल लिया करती थी तो एक उन्मुक्त वातावरण में बड़ी हुई एक बालिका को एक वहां पे पिंजरा में एक पुर कर के रखना दक्षिणेश्वर में वो भी तो उनके लिए कितनी तपस्या थी अभी ठाकुर का ऐसा था देखिए कि ठाकुर को जो भी खाना उस समय पता है कि ठाकुर खाने पीने में बड़े ही संयमित थे बड़े ही सावधानी पूर्वक चला करते थे तो ठाकुर कहते थे कि देखो दूध वगैरह जो भी है थोड़ा-थोड़ा करके मुझे देना है तो यहां पर मां है मां की इच्छा है कि ठाकुर भर पेट खाए तो थोड़े से स्वस्थ रहे ठाकुर ने एक बार मां को कहा था कि मैं ज्यादा दिन जीने वाला नहीं हूं मैं बूढ़ा नहीं होने वाला हूं और मैं यंग उम्र में ही मेरा मैं मृत्यु होगा तो मां कहती है तो मां तो थोड़ी तो डर ही जाएगी मां कहती है कि क्यों लोग ऐसा थोड़ी ना कहेंगे कि उसमें क्या दिक्कत है बूढ़े होने में तो ठाकुर कहेंगे नहीं नहीं लोकेरा लोग कहेंगे कि वहां पे दक्षिणेश्वर में एक बूढ़े साधु है तो मां बोली कि जैसे बच्चे को मनाती है ना मां तो ऐसे बच्चे को मना ठाकुर को मना करके कह रही है कि लोकेरा बलवे श ओखाने एक जन पीर बन साधु आछ माकी तो गांव की भाषा थी पीर बीन साधु अर्थात कि एक प्रवीण साधु है दक्षिणेश्वर में तो ठाकुर हंस के थोड़ा सा ना बच्चे की तरह वो बिल्कुल बच्चा जैसे छोटा सा नाराज होकर मां के साथ में बात करता है ना तो ठाकुर कहता है तुम्हार पिर बन रबन होते जावो ना मैं तुम्हारा पिर बन प्रवीण साधु होने वाला नहीं हूं मां को पता था वैसे तो जगत नियंत्र है नारायण स्वयं किंतु स्वभाव है बच्चे का अभी दूध पीना है तो मां क्या करती थी दूध को बाल करके गाढा करके ठाकुर को देती थी अभी ठाकुर तो क्या देखेंगे छोटी कटोरी बोले हैं ठाकुर ने कटोरी में दूध देना है ज्यादा नहीं और माने उबाल करके गाढ़ा करके दिया है माने आधा करके दूध दिया यानी ठाकुर दूध पी रहे डबल पी रहे हैं किंतु उबाला है तो गाढ़ा हो गया है तो ठाकुर दूध पी रहे हैं अ ठाकुर वैसे तो बच्चे हैं किंतु बच्चों में भी तो चालाकी होती है ना तो ठाकुर थोड़ा सा गाढ़ा दूध के ऊपर में वो मलाई हो जाती है वो भी तो गाड़ी हो जाती है तो ठाकुर ने गाड़ी मलाई देकर के मां को पूछा कि इसमें कितना दूध हो बताओ तो तो मां कहती थी अरे तो एक शेर होगा दई छटाक एक शेर इतना कुछ होगा थोड़ा सा क्या है तो ठाकुर तो फिर वो मां के ऊपर में विश्वास करके चलने वाले थे तो भी किंतु मन में संदेह भी है मां पे विश्वास भी है तो इसका क्या सोल्यूशन है तो गुलाप मां एक दिन पकड़ में आ गई तो गुलाप मां को ठाकुर ने पूछा कितना दूध होगा बताओ तो तो गुलाप मां ने सही सही प्रमाण बता दिया कि मां इतना दूध है उसको गाढ़ा करके आधा करके आपको देती है वो ठाकुर एकदम नाराज हो गए बुलाओ बुलाओ ओके डाको ओके डाको मां शारदा को बुलाओ मां आई अपनी वहां पे तो ठाकुर ने कहा इतना दूध तुम मुझे पिलाती हो तुमको पता नहीं है मेरा पेट खराब हो जाता है तो मां ने कहा अरे गुलाब को तो कुछ पता नहीं है गुलाब को क्या पता यहां का मेजरमेंट कितना है मैं तो इतना स ही दूध देती हूं तो उस दिन के लिए तो ठाकुर थोड़े से वो बच्चा जैसे कैसा शांत हो जाता है मां मनाती है तो ठाकुर उस दिन तो शांत हो गए फिर किंतु मन में तो संदेह है फिर से गुलाप मां को पकड़ा कि बोलो तो कितना दूध है इसमें तोला मा भी वो बोल दिया कि मां के पास में जो एक बाटी जो है और वो जो काली मंदिर की जो बाटी वो समान उसका मेजरमेंट है ठाकुर बोले अरे इतना दूध इतना दूध डाको डाको बुलाओ उसको बुलाओ फिर से मां आई तो फिर से जब मां आई तो ठाकुर नाराज होकर बोलते हैं कि अरे तुमको पता नहीं है मुझे इतना दूध पिला दे रही हो तुम देखो इतना दूध मेरे से पीने भी क्या होगा और सही में सत्य संकल्प ठाकुर जैसे ही लगा कि दूध ज्यादा पी लिया है उस दिन उनको दस्त हो गया और बार-बार ठाकुर को वहां पर वो शौच के लिए जाना पड़ता है मां को जाकर के कहते हैं देखा थोड़ा-थोड़ा करके 15 बार मुझे जाना पड़ा तो मां कहती है कि कैसा दस्त होता है तो ठाकुर बोलते पतला दस्त होता है तो फिर कहते हैं कि इस तरह की सेवा नहीं चाहिए मुझे मत करो ऐसी सेवा किंतु देखिए यहां पर एक सुंदर एक कि ठाकुर कहते हैं कि सत्य और ब्रह्मचर्य कलयुग की दो तपस्या है ये दोनों को कभी भी भंग नहीं करना चाहिए और यहां पर मां है मां कहती है कि प्रियजन के स्वास्थ्य के लिए प्रियजन के उपकार के लिए यदि मिथ्या कथा भी कहनी पड़े मिथ्या भी कहना पड़े तो उसमें कोई दोष नहीं है यह है अपने ठाकुर और मां के भीतर में डिफरेंस ठाकुर का था टाका माटी माटी टाका यह पैसा मिट्टी है मिट्टी पैसा है ऐसा बोलकर पैसे गंगा में फेंक दिए और मां थी मां को यदि कोई पैसा देता प्रणामी वगैरह तो मां अपने सर पे स्पर्श करवा के बक्से में रखती यह दोनों के बीच में डिफरेंस है हालांकि ठाकुर थोड़े प्रैक्टिकल भी थे वो पैसा डाल दिया फिर बोलते हैं मां जद लक्ष्मी नाराज हो ग तो की होवे मां लक्ष्मी जद नाराज हो जाएगी तो क्या होगा खेड बंद कर देवे ये पैसा जो मिलता है उनको सैलरी वो बंद कर देगी फिर मां ने कहा कि मां लक्ष्मी तुम आमार हृदय थे को तुम मेरे हृदय में रहना तो ठाकुर में बचपना भी था प्रैक्टिलिटी भी थी और ये कहीं आध्यात्मिक ऊंचाई पर बैठते थे ऐसा एक सुमधुर दोनों का संबंध था और एक आखिरी बात ठाकुर के पास में मां भोजन लेकर के जाती थी तो एक दिन एक महिला ने आकर के मां के पास में से थाली ले ली मां ने उस महिला ने कहा स्त्री भक्त ने कि दो मां मैं ठाकुर के पास में जाती हूं थाली लेकर के ठाकुर को मैं खाना खिलाती हूं तो मां ने कहा ठीक है अब यह स्त्री भक्त गई ठाकुर के सामने थाली रख के चली गई अब ठाकुर ने मां को बुला कर के कहा कि अरे उस महिला को तुमने क्यों खाने का थाली मेरा दिया उसका चरित्र तो अच्छा नहीं है अभी इसका स्पर्श किया हुआ मैं कैसे खाऊंगा जब भी खाना लेकर आना है तुम लेकर आओ तुम और किसी को मत दो उस समय मां एक बड़ी ही सुंदर बात कहती है कहती है कि मां बोले ऐसे डाकले आमी किंतु थकते पारो ना कोई आकर के मां बोल कर के मेरे पास में कुछ मांगता है तो मैं रह नहीं पाऊंगी जो मांगेगा वो मैं दे दूंगी तो यह थी हमारी मां और यह थे हमारे ठाकुर और यहीं पर आज के प्रसंग करते हैं समाप्त