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Ma Sarada Life ·

जयरामबाटी में जगद्धात्री पूजा || माँ सारदा और स्वामी विरजानन्द || 28 nov 2024

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ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः तो अभी आज के विषय की ओर चलते हैं देखिए विरजानंद जी महाराज का नाम तो आप सभी ने सुना ही होगा हमारे संघ के सिक्स्थ प्रेसिडेंट थे अपने संघ के छठे परमाद क् थे तो अभी देखिए कि उन्होंने वराह नगर मठ में वह जवाइन करने के लिए आए थे बिल्कुल नव युवान थे उनको तो ज्यादा कुछ पता भी नहीं था और यह रामचंद्र दत्त ठाकुर के जो गृहस्थ शिष्य है थे उनके जो नगर कीर्तन जो वह करते थे वह नगर कीर्तन के बारे में सुन करर के फिर रामचंद्र दत्त क्या करते थे कि सब वालों पर लिख देते थे एडवरटाइज करते थे कि हां यह काकड़ काछी बोलकर के आश्रम की स्थापना की है हमने जहां पर ठाकुर की अस्थि है और अस्थियों की नियमित पूजा होती है तो यह सब देख कर के सुनकर के विरजानंद जी महाराज उस समय के काली कृष्ण तो यह काली कृष्ण उनके पास में जाते थे और उस समय उनको ऐसा ही पता था कि जैसे कि रामचंद्र दत्त ही है जो कि ठाकुर के सही सही शिष्य और ठाकुर को ठीक-ठीक उन्होंने ही जैसे की समझा है किंतु देखिए कि विधि का विधान कुछ अलग ही था मास्टर महाशय अर्थात कि अपने जो महेंद्रनाथ गुप्त वह उनके टीचर थे जिन्होंने कथामृत की रचना की थी और अपने टीचर के पास में काली कृष्ण ने सर्वप्रथम सुना कि ठाकुर के त्यागी संतान भी थे और यह त्यागी संतान एकजुट होकर के वराह नगर में उन्होंने अपने मठ की भी स्थापना की थी तो यह खबर पाकर के फिर काली कृष्णा वहां पर गए वरा नगर में इतना अच्छा लगा वहां पर शशि महाराज के साथ में मुलाकात हुई तो शशि महाराज पहले ही पूछते हैं पढ़ाई लिखाई ठीक-ठाक करते हो कि ना कि स्कूल में से छुट्टी लगा कर के भाग कर के यहां पर आ गए हो बिना किसी को बताए तो शशि महाराज का था कि ये लड़के लोग ठीक-ठाक पढ़ाई लिखाई करें तो उस समय तो काली कृष्ण महाराज ने कह दिया कि नहीं पढ़ाई लिखाई भी करता हूं साथ-साथ में यहां पर भी आता हूं उसके बाद में जब स्कूल में छुट्टी हुई तो फिर शशि महाराज ने कहा कि एक काम करो तुम्हारा मैथमेटिक्स कच्चा है तुम यहां छुट्टी में आकर के यहीं पर रह जाओ मठ में मैं तुमको मैथमेटिक्स सिखाऊंगा तो काली कृष्णा कहते हैं अच्छा ठीक है तो इस तरह से वराह नगर मठ में आकर के रह गए और फिर जो मैथमेटिक्स की किताब थी किंतु मठ में आकर के कभी ना ही मैथमेटिक्स का नाम लिया शशि महाराज ने ना ही काली कृष्णा ने वह किताब को कभी खो बोला फिर वही मठ में आकर के ठाकुर की पूजा ठाकुर का भोग बनाना फिर जितना भी कार्य है साधन भजन जब ध्यान उसमें जो डूब गए तो फिर आखिर में वहीं पर रह गए तो वह उन दिनों की बात है कि रामकृष्ण संघ के बारे में ज्यादा कोई कुछ नहीं जानता था स्वामी जी अमेरिका गए थे उन्होंने वहां पर वर्ल्ड पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन में प्रवचन दिया था किंतु वह प्रवचन का वह जो एक इंपैक्ट है वह अभी भी भारत में नहीं पहुंचा था धीरे-धीरे करके भारत में वह संक्रमित होगा किंतु उस समय तो वे वराह नगर मठ और मठ के सन्यासी संतान सब ठाकुर के वह अनजाने जैसे ही थे उस समय एक बार ठीक हुआ शरत महाराज गोलाप मां योगेन मां और सान्याल महाशय एक अपने भक्त थे ठाकुर के इन्होंने ठीक किया कि जयराम बाटी जाएंगे वहां पर मां अपनी जगत धात्री करती है तो जगत धात्री पूजा में जो बहुत सारा काम होता है और मां को सहाय करने वाला तो उस समय ज्यादा कोई नहीं था तो चलो वहां पर चलते हैं मां को हेल्प भी करेंगे और मां के दर्शन भी प्राप्त करेंगे जगत धात्री पूजा भी देखेंगे मां के आशीर्वाद भी प्राप्त करेंगे तो फिर काली कृष्ण को पता चला तो उन्होंने कहा कि मैं भी आऊंगा तो ठीक है चलिए इन पांचों लोग निकले वहां से और फिर कामर पुकुर के रास्ते से जयराम बाटी पहुंचे वो जयराम बाटी की यह जो मुलाकात थी इस मुलाकात को काली कृष्ण महाराज बाद में स्वामी विरजानंद जी महाराज ने बड़ा ही सुंदर रूप से इस मुलाकात को लिपिबद्ध किया है यह जो यात्रा थी जयराम बाटी की बड़ा ही सुंदर उनका संस्मरण है तो देखते हैं कि फिर जयराम बाटी जाकर के क्या हुआ जयराम बाटी जैसे ही गए मां तो इतनी खुश खुश हो गई कि कहां पर अपने बच्चों को बिठाए गी क्या खिलाएगी कैसे उनकी सब सुविधा ठीक-ठाक हो यह चिंता में ही मां जैसे कि निमग्न हो गई जैसे अभी प्रतिदिन उन बच्चों का खाना मां ही बनाएगी अभी यह जो सुबह का नाश्ता है फिर एक बड़े थाल में मुरमुरा मुड़ी अर्थात कि मुरमुरा उसको रोस्ट करके उसमें से बहुत सारा घी उसमें डाल के फिर मिठाई यह सब देकर के बड़े थाल में यह मुरमुरा उनको नाश्ते में दिया जाता था तो काली कृष्ण महाराज कहते हैं कि इस तरह का मुरमुरा मैंने कभी नहीं खाया इतना सुंदर उसका टेस्ट इतना सुंदर रूप से उसको भुना गया है और जो घी डाला है उसमें उसका जो स्वाद है जैसे कि अमृत की तरह इस तरह का मुरमुरा मैंने जीवन में कभी नहीं खाया और फिर दोपहर होने से ही मां उनके लिए आहार प्रस्तुत करती वही चावल और वही सब तरकारी पोश्तो फिर यह चच फिर यह मछली की कोई ना कोई एक तरकारी रहेगी जो ठाकुर को जितनी भी सब चीजें पसंद थी खाने की वह सब मां इन लोगों के लिए भी बनाएगी और मां का खाना जैसे कि अमृत के समान इतना सुंदर उसका टेस्ट इतना सुस्वादु होगा कि खाते-खाते जैसे कि पेट आपका भरेगा नहीं और फिर मां भी वहां पर खड़ी रहेगी और सबको आग्रह करेगी और खाओ और खाओ ऐसा आग्रह करके करके महाराज जी लिखते हैं विरजानंद जी महाराज कि प्राय में प्रतिदिन मेरा जो परिमाण था खाने का उससे दो गुना में खा लेता था खाना पहले इतना सुस्वादु उसके बाद में मां का प्रेम और फिर मां वहां पर खड़े रहकर आग्रह करके करके इनको खिलाएगी तो प्रतिदिन डबल डबल यह लोग खाना खा लेते थे और फिर काम तो वहां पे कुछ था नहीं वहां पे देखिए कि जयराम बाटी में गए हैं तो मां के घर गए हैं मां ज्यादा तो उनके पास में से कुछ काम करवाएगी नहीं जैसे कि क्योंकि मां की खुद की प्रकृति थी अपने से ही सब कुछ जितना हो सके अपने हाथों से ही करना अपने संतानों की इस तरह से देखभाल रखना संभाल रखना तो विरजानंद जी महाराज काली कृष्ण महाराज क्या करते थे वहां अमोदर नदी है तो उसके किनारे घूमने को जाते थे कभी वह जो एक बास्केट में सब फूल तोल कर के ले आते थे फूल है बिल्व पत्र है इससे कि क्या है कि मां जो पूजा करती थी उसमें यह सब चीजों का व्यवहार होता था तो फिर कभी-कभी और फिर वह तो छोटे थे तो मां क्या करती थी यह शरद महाराज के सामने घुमता टान थी हालांकि शरद महाराज ठाकुर के संतान मां के द्वारी किंतु फिर भी मां की जो हैबिट थी सब जितने भी पुरुष उम्र में बड़े हैं तो घुमता टाना किंतु काली कृष्णा महाराज तो उम्र में बड़े छोटे थे अभी तो स्कूल में से ही पास होकर के आए थे तो फिर मां उनके सामने घुमता ज्यादा नहीं टान और फिर यह भीतर में भी जाते काली कृष्ण महाराज मां का जितना भी काम है सब करते हैं और छोटा-मोटा काम है पान सजा देना है मां के लिए या तो सबके लिए कुछ छोटा-मोटा कार्य करना है अभी जैसे कि यह शरत महाराज है सानियाल महाशय है वे लोग धुम्रपान करते हैं अभी धुम्रपान करने के लिए हुक्का या चिरू जो कुछ भी चाहिए उसमें यह तंबाकू को जलाने के लिए वह आ गुन लाना पड़ता है तो आगुण या तो कोयला होगा या तो चूहे में जो लकड़ियां जलती होगी उसका लकड़ी का जलता हुआ छोटा सा एक टुकड़ा तो फिर काली कृष्ण महाराज क्या करते थे वह तमाकू वगैरह सब अच्छे से सजा देंगे धुम्रपान करने के लिए शरद महाराज के लिए और फिर मां जब जहां पर खाना बनाती थी चूल्हा जहां पर था वहां पर जाते थे आगुण लेने के लिए अग्नि को लेने के लिए अभी यह जलता हुआ ये कोयला या जलती हुई लकड़ी जो है अभी गांव में ऐसी प्रथा है कि बच्चों के हाथ में जलता हुआ कोयला वगैरह कभी नहीं देना है यह अच्छा नहीं माना जाता तो फिर मां क्या करेगी चूल्हे में से जो लकड़ी जली हुई है अंगार जैसा वो जमीन प फेंक देगी और जमीन पर फेंके गी और फिर जमीन पर रख देगी और फिर एक चिमटा जो है वो काली कृष्ण महाराज के हाथ में देंगी अब ये जमीन पर रखा हुआ अग्नि जो है उसको चिमटे से उठा कर के लकड़ी जलती हुई उसको लेकर के विरजानंद जी महाराज आएंगे जहां पर हुक्का सजाया हुआ है और उसके भीतर में जलता हुआ यह लकड़ी का टुकड़ा रखेंगे देखिए गांव की यह जो सब प्रथाएं हैं कभी-कभी हमको लगता है कि अंधश्रद्धा है किंतु इसके पीछे में भी मां के हृदय का या तो फिर गांव में जो एक सरल श्रद्धा विश्वास जो होते हैं व कितना गहराई से इस प्रथा के भीतर में हमको छलकता हुआ दिखता है कि बच्चे के हाथ में आगन देना या तो फिर जलता हुआ अग्नि का टुकड़ा देना लकड़ी या कोयला यह अच्छी बात नहीं है उनका तो भविष्य आपको बनाना है उसके हाथ में आप मिठाई दीजिए उसके हाथ में खाना दीजिए ये जलता हुआ लकड़ी या कोयला यह सब क्यों देंगे तो देखिए यह गांव की प्रथा को यह मां भी इतना विश्वास करती थी और मां भी इस तरह से फॉलो करती थी अच्छा वहां पर दीदी मां भी थी दीदी मां अर्थात की श्यामा सुंदरी देवी मां मां शारदा की गर्भधारिणी मां तो वह भी वहां पर थी उस समय और उनका प्रतिदिन सुबह से लेकर के रात तक इतना व्यस्त रहती थी इतना कार्य करती थी वो गाय है बैल है उनकी संभाल रखना उनको खाना खिलाना फिर यह जो चाकर ये जो खेत है उनका छोटा सा खेत था तो उसमें जो मजदूर लोग जो कार्य करते थे तो उनके लिए खाने का बंदोबस्त करना घर में जितना भी छोटा-मोटा काम है सब कुछ उनको करना है जैसे यह जहां पर गाय को रखा जाता है गौशाला उसको भी परिष्कार करना पड़ता है उसको भी आपको क्लीन करना पड़ता है तो यह सब श्यामा सुंदरी देवी सुबह से लेकर के रात तक उनके कार्य का विराम नहीं किंतु देखिए कि चेहरे पे हमेशा ये हंसी लगी ही रहती है हमेशा सहस्य वदन हमेशा सस्त चेहरा कभी भी ऐसा नहीं कि काम करके करके थक गए नाराज हो गए या तो फिर यह जो मजदूर है जो उनके वहां पर कार्य करते हैं खेत में उनके ऊपर में चिल्ला दिए कभी भी नहीं कई बार ऐसा होता है जो लोग बहुत ज्यादा काम करते हैं उनका टेंपर भी बड़ा ही गर्म हो जाता है उनका दिमाग भी बड़ा गर्म रहता है छोटी-छोटी चीजों में वे लोग चिल्लाना शुरू कर देते हैं किंतु श्यामा सुंदरी देवी का जितना कार्य करेगी उतना जितना कर्म करेगी उतना ही देखेंगे कि उनका सर ठंडा रहेगा ये कर्म योग की ये उपमा यह कर्मयोग में जद आप सिद्ध होंगे तब ऐसा होगा वरना देखिए कि कोई कोई लोग बहुत काम करते तो है किंतु कर्म करके करके साथ में ही उनके भीतर में एक तरह का घमंड आ जाता है एक तरह का अभिमान आ जाता है ऐसा उनको लगने लगता है कि मैं अकेला काम करता हूं मेरे अकेले में काम करने की क्षमता है बाकी लोग सब निकम में है या तो मूर्ख है उनको कुछ समझ में नहीं आता तो ऐसा बहुत काम करने के बाद में सर के ऊपर में घमंड सवार हो जाए तो समझिए कि आप कर्मयोग का प्रथम स्टेप भी आपने लिया नहीं है जितना कर्म करेंगे उतना ही आपका हृदय उदार होता जाएगा उतना ही आपका टेंपरामेंट है उतना ही आपका सर है वह ठंडा होता जाएगा तो यह थी श्यामा सुंदरी देवी की बात और श्यामा सुंदरी देवी फिर उनके साथ में भी यह अपने व विरजानंद जी महाराज है मने काली कृष्णा है या तो फिर यह शरद महाराज है उनके साथ में कितना हंसी मजाक करते थे कितना गप लगाते थे और उनको जब दीदी मां करके पुकारते दीदी मां अर्थात की नानी या दादी अर्थात कि मां की मां तो वो अलादे आठ खाना होए जतन बंगाली ये शब्द प्रयोग है अर्थात कि आनंद से वो एकदम भरपूर हो जाती क्यों आनंद से भरपूर हो जाती उनका सब समय एक कंप्लेंट था जब ठाकुर थे तब कि मेरी मां मेरी बच्ची शारदा को मां बोल कर के बुलाने वाला कोई नहीं है बेचारी को मां शब्द सुनने का मां नाम डाक सुनने का उसको आनंद कभी प्राप्त नहीं होगा तो उस समय ठाकुर कहते थे ठाकुर तो त्यागी थे मां के साथ में तो कभी उनका संतान होने वाला नहीं था तो किंतु ठाकुर ने उनको श्यामा सुंदरी दीदी मां को कहा था कि देखेंगे कि एक समय ऐसा आएगा कि इतने सब संतान इकट्ठा हो जाएंगे मां शारदा के आसपास में कि मां नाम की वो डाक सुन कर के मां नाम वो सुन सुन कर के वो कभी त्रस्त हो जाएगी तो देखिए ये पांच संतान है मां शारदा के वह वहां पर आए हुए हैं योगिन मां गुलाप मां सान्याल महाशय शरद महाराज और काली कृष्ण महाराज तो जब भी यह लोग उनको दीदी मा करके पुकारते थे तो एकदम उनका हृदय शांति और आनंद से भरपूर हो जाता कि हां उनके जमाई ने जो बात कही थी ठाकुर ने जो कहा था कि इतने सारे संतान होंगे मां शारदा के तो सही सही यह बात ठीक निकली उस दिनों में एक अभी जैसे गांव में होता है ना आजकल की तरह तो एंटरटेनमेंट या तो फिर यह मनोरंजन के कोई साधन तो वहां पर थे नहीं जब यह लोग खेत में से काम करके या तो अपना दिनचर्या का जितना भी कार्य है समाप्त करके जब घर में बैठते आहार करने के बाद में तो क्या है कि नाटक मंडलिया जो होती है जात्रा जिसको कहते हैं जात्रा के जितने दल होते हैं व लोग गांव-गांव घूमेंगे कोई ना कोई पौराणिक नाटकों का अभिनय करेंगे या तो फिर यह वैष्णव पदावली या तो फिर यह शाक्त पदावली यह जो मने जो गीत है कीर्तन है वह सब वहां पर गाएंगे तो ऐसे ही उस समय एक वैरागी वहां पर उनके घर पर आया और वह जो एक सुंदर एक भजन गाने लगा कि की सुखेर कथा उमे गो लोकर मुखे सुनी सतो बोल शिवानी अन्नपूर्णा नाम तोर की काशी धाम यह कितने आनंद की बात है उमा मैं हमने लोग के पास में सुना है कि तुम्हारा काशी धाम में नाम है अन्नपूर्ण अर्थात देखिए कि हर गौरी भगवान शिव और मां पार्वती की यह कहानी है इसको कि यह पदावली कीर्तन के द्वारा उसको अमर बनाया गया है खेपा खेपा आमाई बोलतो दिगंबरा गंजना सोय छी कतो घरे गोरे एकन द्वारी ना की आछे दिगंबर धवारे दर्शन पायना इंद्र चंद्रो जमे अर्थात कि एक समय था कि भगवान शिव हे दिगंबर स्मशान में रहते हैं सर्प की माला पहनते हैं और यह भूत पिशाच उनके सहचर है ऐसे एक पागल जमाई के साथ में यह हमारी सोने का एक अपने हृदय का टुकड़ा यह मां पार्वती उनको इनके साथ में विवाह करवाया है स्मशान में रहेगी भिक्षा करके खाएगी यह क्या अपनी बच्ची का कोई भविष्य है क्या तो कितने लोग उनकी निंदा करते थे उनकी मां को कितना सब कुछ लोक निंदा सुननी पड़ती थी किंतु अब देखिए अब उनका नसीब पलट गया है अभी वही दिगंबर भगवान शिव उनके द्वार अर्थात कि उनके कमरे के सामने उनके महल के सामने द्वारपाल खड़े हैं और इंद्र चंद्र यम यह लोग भी उनका दर्शन नहीं पाते हैं तो यह जब कीर्तन हुआ समाप्त उस समय यह कीर्तन चल रहा था मां के ऊपर में यह दीदी मां के हृदय में इसका इतना गहरा असर हुआ क्योंकि देखिए कि मां की भी तो ऐसे ही कहानी है दीदी मां अर्थात श्यामा सुंदरी देवी कहती है कि हां हमारा भी एक ऐसा समय था कि जब सभी लोग कहते थे कि आपकी बिटिया शारदा इतनी सुंदर इतनी रूपवती इतनी उनमें टैलेंट है और कहां वह एक पागल जमाई के साथ में य ठाकुर के साथ में उसका विवाह करवाया है ठाकुर रहते थे दक्ष दक्षिणेश्वर काली मंदिर में कलकत्ता के पास में और वहां पर साधन भजन में ऐसा मग्ना हो गए थे कि जगत को भूल गए थे तो अभी जगत को भूल कर के आप साधन भजन करेंगे तो फिर तो आपका मन लोग क्या कहेंगे यह सब तो आपका मन उसमें से उठ जाएगा कभी दिगंबर होकर के मां का नाम लेते थे कभी यह जो मां काली का जो भोग का जो पूरी है वो बिल्ली को खिला देते थे क्या-क्या सब नहीं करते थे मां काली के शयन के लिए जो यह खाट बनाया गया था उसके ऊपर में वह जाकर के सो जाते थे ऐसी सब कहानियां काली मंदिर से यह गांव में आती थी और लोग फैलाते थे जो लोग भी दक्षिणेश्वर जाकर के आते वे लोग कहते कि अरे गदाधर तो पागल ही हो गया है तो यह सब लांचना है यह लोगों की निंदा है कि अरे यह पागल की स्त्री है ऐसा लोग मां को कहते थे तो यह सब श्यामा सुंदरी देवी कहते हैं कि हमको कितनी यह सब लांचना सहन करनी पड़े थी कितनी निंदा सुननी पड़ती थी तब हम मन में ही मन में जैसे कि मर जाते थे किंतु आज देखिए ठाकुर की महासमाधि के बाद में स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में जाकर के जो वर्ल्ड पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन में जो वक्त दी और फिर जब भारत आकर के बेलूरमठ की स्थापना की थी अभी यह समय तो वराह नगर का था स्वामी जी कौन थे इसके बारे में भी किसी को पता नहीं था किंतु ऑलरेडी देखिए कि कोलकात्ता के जो भक्तगण है वह धीरे-धीरे करके श्या एक जयराम बाटी आना शुरू हो गए थे और मां की पूजा जैसे कि वह साक्षात जगत धात्री है साक्षात महामाया जगदंबा स्वयं है इस तरह से करते थे तो श्यामा सुंदरी देवी कहती है कि देखिए वह एक समय था मेरी बिटिया शारदा का कि सबकी निंदा सुननी पड़ती थी और आज एक समय है कि शरत महाराज ये सानियाल महाशय जैसे कलकत्ता के भक्त वहां पर गांव में आते हैं और मां शारदा की साक्षात देवी ज्ञान से पूजा करते हैं अच्छा अभी उसके बाद में यह जगत धात्री पूजा का आरंभ होता है हमको तो पता है कि यह जगत धात्री पूजा जयराम बाटी में विशेष रूप से मनाई जाती है तीन दिन तक पूजा होगी और फिर बाद में विसर्जन भी होगा और उस समय मां शारदा और पूजा का प्रवर्तन किया था दीदी मां ने श्यामा सुंदरी देवी ने तो वो दोनों सदेव वर्तमान थे ऊपर में से शारदानंद जी महाराज स्वयं तो इन तीनों की उपस्थिति में वह जगत धात्री पूजा का जो आयोजन पूजा का जो एकदम एक आध्यात्मिक उसका जो गभीर तात्पर्य होना चाहिए इस तरह से हुआ था कि काली कृष्ण महाराज कहते हैं कि जैसे कि भाव का एक तरंग दिव्य आध्यात्मिक भाव का तरंग आसपास के सभी गांवों में फैल गया कहां-कहां से लोग आते थे पूजा में दर्शन करने के लिए और सबके लिए आहार की व्यवस्था है जो आएगा उसको वहां पर खाना मिलेगा और फिर मां शारदा स्वयं वह जब भी यह संध्या आरती होती या तो फिर जिस दिन संधि पूजा थी वह खुद मंडप में आकर के दोनों हाथ जोड़ कर के जगद धात्री देवी को प्रणाम करती और फिर कभी-कभी चामर लाती यह सब मां शारदा करती और फिर जब विसर्जन का दि आया तो महाराज जी लिखते हैं कि जितनी स्त्रियां सब रो रही है मां की आंखों में अविरल अश्रु धारा बह रही है रोते-रोते जैसे कि मां का ऐसा हाल हो गया कि अभी मां को विदाय करना है जगद धात्री देवी को विदाय करना है मां शारदा रो रही है अभी जगत धात्री पूजा समाप्त तो हुई किंतु देखिए कि हमको पता है कि आप इतना शुद्ध नहीं होता है यह मलेरिया वगैरह जो बीमारियां है गांव में आए दिन होती रहती है अभी जो लोग नियमित गांव में ही रहते हैं उनको क्या है कि एक तरह का इम्युनिटी भीतर से मिल जाता है तो फिर यह इम्युनिटी की वजह से यदि उनको मलेरिया वगैरह कुछ होता भी है तो वे लोग उसको सहन कर लेते हैं किंतु यह जो पांच लोग जो गए थे वो तो सब गए थे जैसे कि शहर से गए थे और उनमें उनके भीतर में में गांव के मलेरिया के विरुद्ध में ऐसा कोई इम्युनिटी जैसा भी नहीं था तो फिर कुछ ही दिन हुए जगद धात्री पूजा समाप्त हुई और सबको मलेरिया हो गया अभी मलेरिया हो गया है सभी लोग एक कमरे में सोए हुए हैं और मां बेचारी इतनी परेशान बार-बार उस कमरे के पास में आकर के दरवाजे के पास में खड़ी रहती कहती कि ओगो की हो गे गो एकल कि अरे क्या होगा मेरे संतानों का चेहरा करुण है और जो कुछ हो पड़ता है संतानों के लिए वह सब करेगी अभी यहां तक कि घर-घर जाकर के दूध मांगेगी अभी क्या है कि गांव में तो उस समय की जो प्रथा थी उसके अनुसार गाय की ऐसी कोई जरूरत नहीं थी गांव में जितनी गाय है वह सब कंकाल सार हड्डी पसली दिख रही है इतनी दुर्बल गाय और दूध भी देगी तो एक शेर न की ऐसा थोड़ा अल्प मात्रा में दूध देगी और वहां पर क्या है कि खेत में हल जोतना है तो आपको बेल चाहिए तो बेल है तो लोग जद बेल की थोड़ी बहुत केयर करेंगे और फिर क्या है कि जंगल में से यह जो ईंधन के लिए लकड़ी लानी होती है खाना पकाने के लिए तो फिर वह बेल गाड़ी में बिठा करके वह लकड़ियों को लाया जाता है तो बेल की जरूरत पड़ती है हल जोतने के लिए वो बेल गाड़ी चलाने के लिए तो बेल की थोड़ी बहुत कोई केयर करेगा किंतु गाय की कोई इतनी केयर नहीं करेगा तो क्या है दूसरा क्या है कि गाय का दूध जो है छोटे बच्चे ही उसका पान करेंगे दुध पान करेंगे बड़े लोगों को दूध का कोई ऐसा कुछ नहीं यह चाय वगैरह की जो हैबिट होती है वो सब शहर वालों को होती है गांव में जाएंगे चाय बाई कुछ नहीं सुबह को 9:30 10 बजे नाश्ता होगा नाश्ते में यह मुरमुरा उसको भुना जाएगा उसमें घी डाला जाएगा जद वो शक्ति है घी इकट्ठा करने की वरना तो फिर भुना मुरमुरा उसी को यह लोग खा लेंगे या तो फिर सीधा खाना ही बना करके खा लेंगे तो यह जो शहर की जो सब हैबिट होती है गांव वालों को नहीं है दूध मिलना दुष्प्रेरण एक पात्र लेकर के घर-घर जाएगी दूध भिक्षा करने के लिए कहेगी कि अच्छा मेरे बच्चे बीमार है उनको फिर दूध और दूध के भीतर में साबूदाना डाल कर के खिलाना है यह सब दूध में दिया हुआ साबूदाना वो क्या है कि पाचक शक्ति में सहायक होता है जब आप कमजोर हो जाते हैं तो यह दूध और साबूदाना सहज रूप से पाच है और पुष्टिकर भी है तो यह एक अच्छा उनको आहार कराने के लिए घर-घर मां जाती पात्र लेकर के और दूध की भिक्षा करती और जितना दूध मिलता सब ले आती उसमें साबूदाना डाल कर के अपने बच्चों को खिलाती तो ऐसा करके मां इनकी संभाल रखती थी अभी कुछ दिन हुए तो फिर देखा कि धीरे-धीरे करके इनका जो मलेरिया है वह ठीक होने लगा अभी मलेरिया से यह लोग उठ तो गए और मां कहती है कि अभी जब तक आप पूर्ण रूप से स्वस्थ नहीं होते हैं तब तब यहीं पर रह जाइए किंतु इन लोगों को पता था देखिए दुर्बलता बहुत आ गई है गांव की जो इम्युनिटी है वह तो है नहीं किंतु यह लोग जितना गांव में रहेंगे उतना वे लोग देखते हैं कि मां को कितना कष्ट होता है मां अपना पूरा दिन जैसे कि बच्चों की देखभाल करने में लगा देती है अभी ऐसा ना हो जाए कि इतना कार्य करते-करते इतना कर्म करते-करते मां खुद कहीं मलेरिया के बुखार में ना आ जाए मां खुद कहीं निर्बल ना हो जाए दुर्बल ना हो जाए तो इन लोगों ने सोचा कि नहीं अब यहां से जाना चाहिए बहुत मां को कष्ट दे दिया तो फिर अभी वह विदाई की घड़ी आ गई मां उनको बार-बार कहती है मत जाओ मत जाओ किंतु फिर भी उन्होंने देखा कि जाना तो पड़ेगा ही तो ठीक है वहां से वे लोग विदाई लेने के लिए तैयार हुए प्रस्तुत हुए अभी वह बेलगाड़ी में सब लोग बैठे हैं और तो कोई वाहन की व्यवस्था नहीं है पैदल चलना इतना लंबा संभव नहीं बेलगाड़ी की व्यवस्था की गई गोलाप मा योगिन मा सानियाल महाशय शरत महाराज और काली कृष्ण महाराज सभी लोग बेलगाड़ी में बैठे दो-तीन बेलगाड़ी जितनी भी होगी उसमें बैठे और फिर जब प्रारंभ हुआ यात्रा का देखा कि सभी यह मां के जो भाई थे उनके घर जो परिवार थे मां स्वयं सभी लोग आकर के चारों ओर उनको घिर कर के खड़े हैं और सब रो रहे हैं मां रो रही है मां का रोते-रोते चेहरा लाल हो गया है इतना अविरल अश्रु दरा मां की आंखों में से निकल रही है और काली कृष्ण महाराज कहते हैं कि मां को छोड़ कर के जाना हमको ऐसा लगता है कि जगत में अंधेरा छा गया है जैसे कि हमको कुछ दिखाई नहीं देता इतना विषाद इतना एक एक तरह का एक क्या कहेंगे हमारे सर के ऊपर में छा गया जिससे कि अंधेरा जिससे कि हमको लगा कि जैसे भविष्य में क्या होगा मां का इस तरह से त्याग करके जाएंगे और किंतु क्या करेंगे अभी यदि ज्यादा दिन रहेंगे फिर मां को ही कष्ट है तो जाना तो पड़ेगा ही तो बेलगाड़ी चलने लगी और साथ साथ में मां भी उनके पीछे आ रही है तो उन्होंने कहा मां आप पीछे पीछे क्यों आ रही है आप घर में रुक जाइए तो मां यह सुनेगी नहीं पीछे पीछे चलती ही जाती है चलती ही जाती है गांव के बाहर तक आए वहां पर ताल फुकुर बोलकर के तालाब है उसके किनारे तक आए फिर वहां तो गांव समाप्त हो जाता है फिर यह खेत है यह मैदान है वह सब शुरू होंगे और खेत में से रास्ते में ये बेल गाड़िया जाएगी तब मां वो व तालाब के किनारे पर खड़ी रह गई और अश्रु भरी नयनों से आंखों से अपने संतानों को जाते-जाते देख रही है उनको उनका वो जा रहे हैं वह देख रही है महाराज जी कहते हैं कि जब तक हम उनकी नजरों से ओझल नहीं हुए उनकी नजरों से अदृश्य नहीं हुए तब तक मां वहां पर खड़ी-खड़ी उनको देखती रही और अश्रु धारा बहाती रही और इस तरह से इसका समाप्ति हुई और देखिए कि इसके आखिर में काली कृष्ण महाराज क्या कहते हैं कि शून्य हृदय लैया बराह नगर मठ फिरिया आशिला शून्य हृदय लेकर के हम लोग वराह नगर मठ में वापस आए शून्य हृदय बा बोली के मुन कोरिया और कैसे मैं कहूंगा कि शून्य हृदय लेकर के आए हैं मायर उ पार्थी भलो भाषा प्रेम मई जगन माता असम भालो भाष भरा हृदय लैया फिरिया आशिला मा का यह दिव्य प्रेम मां का यह करुणा इसको हृदय में भर कर के वापस आए हैं शून्य हृदय लेकर के नहीं हृदय में मां का प्रेम भर कर के वापस आए हैं मायर कथा जहा सामान्य सुन्या छि लाम तहते के जानी तो जे मां रूप मा मां के बारे में जो थोड़ा बहुत सुना था पहले वह सुनकर के किसको पता कि मां इस तरह की मां है रकम कोरिया मोन प्राण काया लो अपनार होते हो अपनार कोरियानी बहन इस तरह से मन प्राण से प्रेम करके हमको अपने से भी ज्यादा अपना बना लिया य रकम करिया मन प्राण काया लया अपना होते हो अपना करियानी बहन बाबा के देखी नहीं पटे मां के तो पाइला बाबा को अर्थात की पिताजी को तो देखा नहीं है ठाकुर को तो देखा नहीं है किंतु मां को तो प्राप्त किया है निर्गुण अधम संताने की ओ हेतु की कृपा ओ हेतु की भालो भाषा यह निर्गुण अधम संतान जो है उसके ऊपर में मां की क्या यह अघात असीम कृपा जे ना पाइया छ जे मां के ना देखि छ से बुझीते पारी मेना जिन्होंने मां को पाया नहीं है जिन्होंने मां का दर्शन नहीं किया वे लोग मां को कभी भी समझ नहीं पाएंगे तो ठीक है हम लोगों ने मां का दर्शन नहीं किया हम लोगों ने को इस तरह से प्राप्त नहीं किया किंतु हमारे पास में यह विरजानंद जी महाराज की स्मृति कथा है उसका पान करके हम अपने हृदय में जो मां की जो करुणा है उसका एक अंदाज हमको मिल सकता है तो फिर आज यहीं तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत