prayer
ओम स्थापकाय यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिने अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः स्वामी विवेकानंद का जीवन चरित इसका हम पाठ कर रहे थे और जिस तरह से हम इसको पाठ कर रहे हैं किसी एक पर्टिकुलर किताब में से नहीं किंतु स्वामी जी के ऊपर में जितने भी रिसोर्स अवेलेबल है उन सबको कंपाइल करके मैंने कुछ चैप्टर्स बनाए हैं। उस चैप्टर्स में से हम देख रहे हैं। अभी जो पॉइंट हम जिसकी हम चर्चा कर रहे हैं। ठाकुर की महासमाधि से लेकर के वराह नगर मठ की स्थापना। इन दो इवेंट के बीच में जो 2 महीने का समय था 16 अक्टूबर को 16th अगस्त को स्वामी ठाकुर की महासमाधि हुई और फिर 19th अक्टूबर को यहां पे वराह नगर मठ की स्थापना हुई। तो यह जो 2 महीने का जो पीरियड है, इस 2 महीने के पीरियड में क्या-क्या हुआ, वह थोड़ा सा हम देखते हैं। गंभीरानंद जी महाराज की किताब युगनायक उसमें से यह पैसेज मैंने लिया है। उसका पैसेज का हमने थोड़ा सा तो पाठ कर ही लिया है। आगे देखते हैं बेसिक थीम क्या है? गंभीरानंद जी
श्रीरामकृष्ण की महासमाधि के बाद उनसे प्रारंभ हुई गुरु परंपरा को लेकर मतान्तर
महाराज हमको यहां पर क्या कहना चाहते हैं कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में संघ होकर के रहना कि नहीं रहना इसके बारे में दो मत हो गए थे उसमें एक तो थे जो प्रवीण भक्त थे उम्र में बड़े थे जिनको कि ठाकुर ने संसार में रहकर के विद्या का संसार करने की प्रेरणा दी थी उपदेश दिया था आप लोग गृहस्थ ही रहिए बीवी बच्चों का लालनपालन कीजिए और एक विद्या का संसार बनाइए। इस तरह से उनको कहा था और यहां पर यह जो त्यागी संतान है अपने उनको अलग से बुला के अलग से शिक्षा देना शुरू किया था। जिसमें कि नरेंद्र के ऊपर में सभी त्यागी संतानों को एक साथ में रखने का जिम्मा ठाकुर ने दिया था। अभी यह जो ठाकुर ने नरेंद्र को जो कहा था यह बात शायद बाकी जो भक्त हैं उनको इतनी पता नहीं थी। देखिए ठाकुर ने नरन की जो महत्ता है नरेंद्र की जो आध्यात्मिक उपलब्धि है इसके बारे में यथेष्ठ इंगित दिए हैं। जब भी आप कथामृत में भी पढ़ेंगे कि ठाकुर बार-बार नरेंद्र की प्रशंसा कर रहे हैं। ठाकुर सभी भक्तों को कहते हैं कि यदि केशव सेन में इतनी कला थी तो नरेंद्र के भीतर में उससे भी ज्यादा गुण उससे भी ज्यादा टैलेंट उससे भी ज्यादा स्पिरिचुअल एटमेंट और स्पिरिचुअल टैलेंट है। तो यह सुनकर के अभी देखिए कि कथामृत में तो हम लोग यह सब चीजें देखते ही हैं। सम हाउ शायद यह जो कुछ भक्त थे उसमें रामचंद्र दत्त मुख्य थे। उनको स्वामी जी की महत्ता भले ही चाहे सुन ली हो किंतु इस महत्ता को सुनकर के ठाकुर के जाने के बाद में स्वामी जी को अपना आगेवान बनाना यह बात उनको शायद समझ ना आई या तो उनके भीतर में इतना घमंड होगा कि अभी ठाकुर गए हैं तो अभी मैं ही हूं जैसे कि भक्त मंडली का लीडर तो माने देखिए कि रामचंद्र दत्त ने यदि स्वामी जी की महिमा को नहीं समझा है तो उन्होंने मां की महिमा को भी इतना नहीं समझा था। हां ठाकुर इनके गुणगान गाते हैं। इनकी प्रशंसा करते हैं। यह सुन तो लिया था उन्होंने। किंतु फिर यह लोग गुरु पद में आसीन होंगे। जो गुरु और इष्ट का आसन ठाकुर ने त्याग किया था। इस आसन पर यह दो लोग विराजमान होंगे। यह शायद उन्होंने कल्पना नहीं कर पाए। वरना तो देखिए कि यह दक्षिणेश्वर के दिनों के दरमियान ठाकुर बार-बार मां की भी प्रशंसा करते हैं और नरेंद्र की भी प्रशंसा करते हैं। यह जो भार स्वीकार चैप्टर गंभीरानंद जी का मां का जीवन उसमें से हम पढ़ रहे हैं। हमको एकदम स्पष्ट पता चल जाता है। हालांकि मां ने अपने को अपने भक्तों की नजरों से ओझल अवश्य रखा था। भक्तों के सामने शायद इतनी नहीं आती थी। स्त्री भक्तों के साथ में मां का वार्तालाप होता था। किंतु इवन गोलाप मां का जो आचरण है वह देखकर के हमको लगता है कि जैसे कि ठाकुर ही सर्वस्व है और ठाकुर के जाने के बाद में ठाकुर की जो भावधारा है वह वहीं पर समाप्त हो जाएगी। ठाकुर यह जो गुरु परंपरा प्रारंभ करेंगे इस बात पे और किसी को शायद बहुत सारे लोगों को यह धारणा नहीं थी कल्पना नहीं थी। देखिए कि यह गुरु परंपरा का प्रारंभ होना एक बहुत ही इंपॉर्टेंट पार्ट है। अपनी भारतीय आध्यात्मिक हिंदू आध्यात्मिक इतिहास देख लीजिए। जब भी कोई एक महत गुरु का जन्म होता है तो उनके बाद में एक पूरी गुरु परंपरा प्रारंभ होती है। यह खास करके शंकराचार्य का यह जो मठ है सभी मठों में देखिए कि जो आदि शंकराचार्य से लेकर के वहां से फिर जितने भी मठाधिपति शंकराचार्य हैं उनकी लीनिएज यह लोग हमको काउंट करके दिखाते हैं। इस लीनिएज का हमको लिस्ट देखने को मिलता है कि हां यह प्रथम आदि शंकराचार्य थे। उसके बाद में यह जैसे कि फॉर एग्जांपल श्रृंगेरी मठ तो इसके मठाध्यक्ष यह शंकराचार्य हुए दूसरे तीसरे चौथे करके अभी जो करंट मठाधीश है वहां तक की एक लिनिएज देखने को मिलेगी। तो यह जो
कहानी : कांकुरगाछी में अनेक भक्तों का प्रणाम स्वीकार कर माँ शारदा को हुआ कष्ट
गुरु परंपरा ठाकुर ने प्रारंभ की थी या ठाकुर प्रारंभ करने वाले थे इस बात का अंदाज इन कुछ भक्तों को नहीं था। उन्होंने यह सोच लिया खास करके रामचंद्र कि उन्होंने यह सोच लिया कि ठाकुर तो भले ही चाहे अवतार थे किंतु उनके अंतर्ध्य होने के बाद में उनकी महासमाधि के बाद में अभी हम खुद गुरु बन जाएंगे। हमारे पास में ही अब यह गुरु शक्ति आ गई है और मैं ही सबको अभी जैसे कि उपदेश देना शुरू कर दूंगा और हमको यह भी पता है कि जब यह रामचंद्र ने यह काकुड़गाची काकुड़गाची मठ की स्थापना की तो उसमें एक स्वामी योग विनोद करके रहा करते थे और यही स्वामी अभी उन्होंने किस तरह से दीक्षा ली है यह सब तो मुझे इतना डिटेल नहीं पता उनके बारे में किंतु उनके बारे में एक घटना है देखिए यह जो राम रामचंद्र अपनी जो लीनिएज प्रारंभ करना चाहते थे और यह जो ठाकुर की जो प्रॉपर लीनिएज है इन दोनों में डिफरेंस क्या दिखता है हमको कि चलो उन्होंने मां की महिमा तो स्वीकार की काकुड़गाची उस समय के काकुड़गाची मठ ने किंतु फिर उनका ध्यान क्या है पता है उनका फोकस कहां पे है मां का मां से हमको क्या बेनिफिट प्राप्त होता है मां की क्या सुविधा है यह नहीं देखना है मां को अपने यहां यहां पर बुला करके हम क्या बेनिफिट ले सकते हैं? इसी चीज पर उनका ध्यान था। एक बार ऐसा ही कोई एक उत्सव वगैरह कुछ होगा। मां शारदा देवी को काकुड़गाची मठ में बुलाया गया। उस समय यह स्वामी योग विनोद जो कि यह रामचंद्र के अनुयाई थे। अभी रामचंद्र ने उनको दीक्षा दी नहीं दी। इसके बारे में मुझे नहीं पता। पढ़ना पड़ेगा। किंतु जो भी है इन्होंने स्वामी योग विनोद ने मां को बुलाया वहां पर काकुड़गाछी में बहुत सारे भक्त आए मां का दर्शन करने के लिए और मां का जो प्रथा था जो रीति थी भक्तों को दर्शन देने की कि पूरे शरीर को एक मोटी चादर से आवृत करके अपना चेहरा भी आवरत करके घुमटा टान करके मां बैठेगी सिर्फ उनके जो चरण है दो वही दिखाई देंगे भक्त लोग आकर करके लाइन बाय लाइन मां को प्रणाम करेंगे। अभी देखिए कि उद्बोधन में मां का कितना केयर किया जाता था। मां की कितनी संभाल रखी जाती थी। एक दिन की घटना है कि एक भक्त आकर के मां के सामने बैठकर के विधिवत न्यास पूर्वक मां की पूजा करना प्रारंभ कर दिया। अभी उस समय जनरली तो क्या होता है कि गोलाप मां वहीं पर खड़ी रहती थी। किंतु यह भक्त ने यह जो सब चालू किया ही है जब पूजा करना मां की तो उस समय गोलाप मां ने देखा कि अभी भक्त लोग तो आकर के सब पूजा प्रार्थना कर ही रहे हैं तो वो तो फटाफट करके चले जाएंगे तो सब ये व्यवस्थित चल रहा है देखकर के गोलापमा किसी काम के लिए गई कुछ समय के बाद में वापस आई तो देखा तो वह भक्त वैसे ही पूजा किए ही जा रहा है और मां जैसे कि स्थिर होकर के एक पत्थर की मूर्ति की तरह बैठी है तो अभी जैसे ही गोलाप मां ने देखा वैसे ही चिल्ला उठी अरे मूर्ख तुमको समझ में नहीं आता है क्या एटा की काठे ठाकुर पे छो अर्थात कि ये लकड़ी के ये जो देवता को तुमने पाया है क्या कि इस तरह से वो तुम पूजा कर रहे हो मां जोो घे में अस्थिर होए उठचे मां को यह पसीना हो जा रहा है मां अस्थिर हो जाती है तुमको समझ में नहीं आता ऐसा चिल्ला करके गोला मां ने उसका हाथ पकड़ करके इस भक्त का जोर से खड़ा कर दिया और वहां से भगा लगा दिया। तो देखिए कि यह ये जो उद्बोधन में मां का कितना ख्याल रखा जाता था। एक बार एक भक्त ने आकर के मां को माला पहनाई। हार पहनाया। अभी यह हार बना हुआ था। जनरली हार तो फूलों का बनता है किंतु यह जो धागों के ऊपर में हार को फूलों को परोया जाता है। जनरली इस मूर्ख भक्त ने क्या किया कि यह जो मेटल का वो जो वायर होता है उसके ऊपर में यह माला बना के ले आया और मां को पहना दिया। तो यह देखकर के वह गुलाब मां फिर से चिल्लाई। अरे मूर्ख समझ में नहीं आता है। यह मेटल का वायर है। तुम मां के गले में पहना रहे हो। वो फूल है। वह शायद यहां से प्रारंभ होते होंगे। गले पे जो लगता है वह वायर लग रहा था। तो फिर मां ने गोलाप मां को शांत किया कि अच्छा कोई दिक्कत नहीं है। मैंने तो यह घुमटा टाना हुआ है। उसके ऊपर में यह पहना है। यानी कि मां का जो गर्दन है और यह जो वायर है उसके बीच में वह वस्त्र है। तो मां ने तो ऐसा गुलाब मां को ठंडा करने का प्रयास किया। किंतु यह जो सब भक्तों के नाटक बढ़ते जा रहे थे। कभी-कभी उस समय मां ने खुद कहा था कि देखो यह जो लोग उद्बोधन में मेरी केयर इतनी करते हैं तो इसको किए बिना चलेगा भी नहीं। योगिन महाराज जब थे जब मां के सेवक तो किसी भक्त को वहां पर मां के चरण स्पर्श करने भी नहीं देते थे। मां जब वहां पर खड़ी रहेगी फिर वह चली जाएगी तो मां के चरणों की जो छाप है जमीन के ऊपर में इसको स्पर्श करके प्रणाम करना है। यहां तक के नियम बना के रखे थे। तो यह उद्बोधन में फिर यह जयराम भाटी में भी और फिर योगेंद्र महाराज जब थे भक्त लोग मां के प्रणाम करेंगे अवश्य करेंगे किंतु मां को किसी भी तरह की तकलीफ नहीं होनी चाहिए क्योंकि मां इष्ट और गुरु यह पदवी जो ठाकुर ने खाली की थी यह पदवी जो यह जो आसन है सिंहासन जो ठाकुर बना करके गए थे उस पर तो वह विराजमान थी भक्तों की जो नीड है भक्तों की भक्ति है वह बाद में पहले मां की सुविधा देखनी है क्योंकि देखिए कि मां स्वामी जी ठाकुर उन्होंने अपना जीवन संपूर्ण रूप से जैसे कि भक्तों के लिए समर्पित कर दिया है। अपने हृदय का खून का एक-एक बूंद जैसे कि भक्तों की सेवा में लगाया है। तो फिर भक्तों की भी तो यह एक फर्ज बनती है कि मां का जो है अननेसेसरी बेनिफिट लेना। मां की जो ममता है उसका एक बेनिफिट उठाना मां के ऊपर में हद से ज्यादा फिर यह आबदार करना मान अभिमान करना ऐसा ना हो जाए। देखिए राम प्रसाद के जो भजन हम देख रहे थे श्यामा संगीत तो उसमें हमने देखा कि किस तरह से राम प्रसाद जगत जननी के साथ में मान और अभिमान करते हैं। यह मान और अभिमान हम भी कर सके क्योंकि हम तो मां काली के उपासक इस तरह के तो नहीं है ना ही मां काली के ऊपर में हम लिप सर्विस देते होंगे किंतु वह जीवंत जागृत मां है और हम उनको पुकारेंगे और वह दर्शन देगी। इस तरह का जो कन्विक्शन है वह शायद हम में नहीं होगा। तो भले इस तरह का कन्विक्शन आए इसलिए वही मां काली वही जगत धात्री जगत जननी आध्या शक्ति मां शारदा का स्वरूप धारण करके पृथ्वी पर आई तो फिर उनकी यह जो लीलाएं हैं वह देख के सुनकर के श्रवण करके मनन करके उन पर हमारा भरोसा बने तो किंतु यह सब करना है मानस क्षेत्र में मानस राज्य में नहीं कि यह पंचमहाभूति मां है उसके सामने जाकर के यह सब आपदार नाटक मान अभिमान करें ऐसा नहीं चलेगा। तो यह मामला उद्बोधन में ठाकुर की यह जो लीनिएज थी उसमें बड़ा ही क्लियर था। किंतु यहां पर देखिए एक बार यही स्वामी योग विनोद मां को वहां पर ले गए काकुड़गाची और फिर मां को वहां पर एक जगह पर बिठा के पूरे शरीर को आवृत करके मोटी चादर से मां बैठी है और भक्तों के प्रणाम स्वीकार कर रही है। अभी वह भक्तों की लाइन तो लंबी होती ही जाती है। होती ही जाती है। मां एकदम स्थिर होकर बैठी है। प्रणाम स्वीकार कर रही है। पसीना पसीना हो रहा है। और मां का तो वृद्ध शरीर था तो शरीर के तो अपने गुणधर्म होते हैं, नियम होते हैं। मां एकदम भीतर से इतनी टायर्ड हो लगी। किंतु फिर भी इतना टायर्डनेस फील करने पर भी इतना परस्पिरेशन होने के बावजूद मां स्थिर होकर के बैठी रही। भक्तों के प्रणाम स्वीकार करती रही और स्वामी योग विनोद को मां ने कुछ नहीं कहा। बिल्कुल कंप्लेन नहीं की। किंतु जब मां उद्बोधन में आई तब यह गुलाब मां को पता चला कि मां को आज हद से ज्यादा कष्ट प्राप्त करना पड़ा है। तो देखकर के गुलाब मां किंतु बड़ी नाराज हो गई थी। किंतु यहां पे देखिए यो स्वामी योग विनोद को तो कोई डांटने को कंप्लेन करने को नहीं जाने वाला है। वह तो भक्तों की दृष्टि से देखते हैं। किंतु यह जो दो लीनिएज है कितना स्पष्ट रूप से हमको इस दोनों के बीच में डिफरेंस दिखाई देता है। यहां पे मां हमारे लिए अपनी लीनिएज है। श्री रामकृष्ण मां शारदा देवी स्वामी विवेकानंद लीनिएज। इसमें देखिए कि इनके प्रति हमारी श्रद्धा सबसे ज्यादा है। हम कष्ट स्वीकार करके करेंगे किंतु हम उनको कष्ट नहीं करने देंगे। क्यों? क्योंकि उन्होंने तो अपने रक्त का एक-एक बिंदु हमारे लिए जैसे कि न्योछावर कर दिया है। तो फिर क्या हम उन लोगों के लिए इतना भी नहीं कर पाएंगे? यह हमारे लिए नियज है। और वहां पर क्या देखा एक छोटे से इंसिडेंट में कि मां आई है तो भक्तों को बुलाकर के मां के पास में प्रणाम करवा लो। इससे फायदा क्या होगा कि भक्त लोग ज्यादा से ज्यादा काकुड़गाची मठ में आएंगे। मां का नाम लेकर के उन्होंने अपना बेनिफिट ले लिया। तो यह वो लीनिएज है। तो यह जो रामचंद्र दत्त वगैरह जो कुछ लोग थे उनके मन में ऐसा हो गया कि ठाकुर जैसे कि गुरु परंपरा प्रारंभ किए ही नहीं है। ठाकुर ने जैसे कि देह त्याग कर दिया तो अभी हम ही लोग गुरु हो जाएंगे। तो ऐसा करके उनका मन का भाव था और यहां पर स्वामी जी का था देखिए कि हमने रामकृष्ण भावधारा का जो 100 साल का इतिहास का जो विहंगावलोकन किया ओवरऑल ओवरऑल एक जो हमने एक ओवरऑल उसका जो देखा तो हमने क्या देखा कि ठाकुर का जो गुरु भाव है वह चलता है 1873 शोडशी पूजा से लेकर के 1886 अपनी महासमाधि तक ठाकुर की जैसे ही महासमाधि होती है नरेंद्र के ऊपर में पूरा भार आ गया। स्वामी जी का गुरु भाव प्रारंभ हुआ और वह चला 192 स्वामी जी की महासमाधि तक और उसके बाद में देखिए मां का गुरु भाव नहीं है ऐसा नहीं है। नरेंद्र स्वयं मां के सामने साष्टांग प्रणत होता था। नरेंद्र को पता था, स्वामी जी को पता था कि ठाकुर की यह जो सही-सही आध्यात्मिक उत्तराधिकारिणी है वह तो मां ही है। वह खुद तो कुछ है ही नहीं। किंतु मैं इस जस्ट एक सोशल दृष्टि से देख रहा हूं। लोगों की आम जनता की दृष्टि से देख रहा हूं कि जो प्रचार हुआ लोगों के भीतर में प्रसार हुआ वो ठाकुर की महासमाधि के बाद में स्वामी जी ने ही किया। स्वामी जी ने संघ की स्थापना की। स्वामी जी ने रामकृष्ण मिशन को एक ऑर्गेनाइज्ड एक कॉर्पोरेट बॉडी का एक स्वरूप दिया। और फिर जब स्वामी जी की महासमाधि हुई। फिर मां का गुरु और इष्ट भाव वहां से प्रकाशय होता है। नहीं प्रारंभ होता है। ऐसा नहीं प्रकाशय होता है। सबके सामने मां ने जैसे कि यह जो पूरा यह सिंहासन तैयार करके गए हैं ठाकुर और स्वामी जी मां आकर के सभी भक्तों के सामने इस सिंहासन पर विराजिता होती है। तो यह है अपनी गुरु परंपरा। यह है अपनी स्पिरिचुअल लीनिएज। तो ठाकुर ने यह लीनिएज प्रारंभ करके गए हैं। इसके बारे में सभी भक्तों का अंदाज नहीं था। अभी जैसे कि कुछ-कुछ भक्त हैं जो जैसे कि मास्टर महाशय स्वयं यहां पे गंभीरानंद जी महाराज हमको कथामृत में से यह सब कोटेशन देकर के कहते हैं मास्टर महाशय का ऐसा था कि नरेंद्र और मां इन दोनों के प्रति उनकी श्रद्धा और भक्ति तो थी क्योंकि उन्होंने ठाकुर को बड़े ही ध्यान पूर्वक सुना था। ठाकुर जहांजहां पर नरेंद्र की प्रशंसा करते हैं, जहां-जहां पर मां का गुणगान करते हैं, वह सब पैसेज मास्टर महाशय ने लिख करके गए थे। उन्होंने चिंतन मनन भी किया था। किंतु मास्टर महाशय को शायद यह समझ में नहीं आया होगा कि यह गुरु परंपरा ठाकुर के साथ में समाप्त नहीं हो गई है। ठाकुर के बाद में यह अखंड गुरु परंपरा प्रारंभ रहने वाली है। बहने वाली है। तो यह बात माने ये मास्टर महाशय मिडिल में आते हैं। स्वामी जी और मां के प्रति संपूर्ण श्रद्धा है। किंतु गुरु परंपरा के रूप में यह प्रारंभ होगा। यह शायद उनको समझ में नहीं आया होगा। यानी कि देखिए कि एक्चुअली कहें तो ठाकुर के महासमाधि के बाद में तीन ग्रुप हो गए थे। एक तो थे कि रामचंद्र जैसे जो कि अपने को ही गुरु मान के बैठ गए थे। जैसे कि यह विजय कृष्ण गोस्वामी है। आप देखेंगे कि विजय कृष्ण के ऊपर में ठाकुर का बड़ा ही स्नेह था। उनका भी ठाकुर के प्रति बड़ी भक्ति थी। किंतु विजय कृष्ण कभी भी रामकृष्ण संघ के साथ में ठाकुर की महासमाधि के बाद में मां या स्वामी जी के प्रति उनकी श्रद्धा भक्ति हो ऐसा कहीं मैंने पढ़ा नहीं है। होगा शायद मैंने पढ़ा नहीं है। तो देखिए कि इस तरह के एक पूरे भक्तों का दल था। ठाकुर से शिक्षा प्राप्त की और फिर ठाकुर के जाने के बाद में जैसे कि अपने से ही गुरु बनकर बैठ गए थे। तो वह एक दल था। दूसरा कि मास्टर महाशय जैसा कि उनको यह एकदम स्पष्ट समझ में आता है कि हम लोग गुरु नहीं है। यह जो काली कृष्ण भविष्य के स्वामी विरजानंद वह मास्टर महाशय के स्टूडेंट थे। मास्टर महाशय के पास में जाकर के वह ठाकुर के बारे में जानना चाहते हैं। और उस समय यह काली कृष्ण और उनके जो कुछ मित्र थे वो काकुड़गाची जाते थे। क्योंकि सबको पता है कि ठाकुर के बाद में यदि कोई एक गुरु है तो भी यह रामचंद्र ही है। वह काकुड़गाची मठ वाले। तो और वह भी रामचंद्र भी क्या करते थे? सब दीवारों के ऊपर में अनाउंस कर देते थे लिख के। यह जो आजकल का सोशल मीडिया पे ऐड चलता है तो उस समय दीवारों पर लिखा जाता था। तो क्या करते थे कि वह लिख देते थे कि आज इस दिन को इस समय को नगर कीर्तन होने वाला है। सभी को आमंत्रण है ऐसा करके। तो ऐसा ही कोई ऐड पढ़कर के ही यह काली कृष्ण वहां पर गए थे। किंतु फिर काली कृष्ण ने यह भी देखा कि उनके यह जो मास्टर महाशय है बड़े ही धीर गंभीर है रिसेस होती है तो बाकी सब टीचर की तरह इकट्ठा होकर के गप नहीं लगाते हैं किंतु छत पर जाकर के अकेले-अकेले बैठे रहते हैं तो उनका जो यह गंभीर्य है उससे प्रभावित होकर के काली कृष्ण एक बार उनके साथ बात करते हैं और उस समय मास्टर महाशय कहते हैं कि देखो भाई हम लोगों के पास में तुम ये ठाकुर की बात अवश्य सुन सुनो किंतु यह बात ध्यान में रखना कि ठाकुर की ये जो स्पिरिचुअल लीनिएज है उसके रिप्रेजेंटेटिव हम नहीं है। वो तो जो वराह नगर मठ के त्यागी संतान है ठाकुर के वही है। तुम वहां पर जाओ उनसे तुम फर्दर शिक्षा प्राप्त करो। तो फिर यह काली कृष्ण वराह नगर मठ आते हैं। वो जो स्टोरी ऑफ एन इपोक वो जो एकदम सुंदर किताब है अति तेर स्मृति बांग्लादेश वो इतनी सुंदर रूप से काली कृष्ण महाराज के जितने भी अनुभव है उनकी जो कहानी है वो लिखी गई है कि वह जाते हैं देखते हैं अरे भांगा टूटा यह घर है वहां पे फर्स्ट फ्लोर पे जाते हैं कुछ आधे नंगे ये साधु लोग बैठे हैं यंग लड़के कंपेयर टू दैट आप काकुड़गाची की कंपेयर करेंगे तो वहां पे सब सिस्टमेटिक ठीक-ठाक है सब सजाया हुआ राम रामचंद्र दत्त तो उस समय के म वो धनी भी थे और वो केमिकल एग्जामिनर ने मेडिकल एग्जामिनर ऐसा कुछ थे तो यानी कि उस समाज में उनका एक ये भी था पोजीशन भी था यहां पे ये आधे भूखे आधे नंगे ये बच्चे कुछ लोग बैठे हैं यंग बॉयज उनके पास में क्या लेना देना है हमारा किंतु फिर एक बार काली कृष्ण वहां पे गए वरा नगर उसके बाद में वह फिर कभी काकुड़ गाछ गए ही नहीं और यह जो किताब है स्टोरी स्टोरी ऑफ एन इपोक उसमें लिखा है कि वो काली कृष्ण को कभी-कभी यह थोड़ा सा लज्जा भी होती थी कि एक बार तो जाकर के मैं काकुड़गाची जाऊं रामचंद्र से एक बार तो बात कर लूं कि हां मैं ऐसे उनको ना लगे राम रामबाबू को कि वो मेरे पास में आता था लड़का अभी उन लोगों ने चुरा लिया ऐसा ना लगे बोल के मैं अभी एकद बार जाकर के आता हूं यह गिल्ट फीलिंग भी उनको होती थी तो देखिए कि यह जो है कि स्पिरिचुअल लीनिएज वो जो ठाकुर प्रारंभ करके गए थे और इन्हीं के जो अपॉइंटेड उनके यह जो उत्तराधिकारी है वही अभी हमारे गुरु और इष्ट है ठाकुर की जगह पे यह जो ज्ञान होना बड़े ही कम लोगों का था। इसीलिए वराह नगर मठ की स्थापना करना कि नहीं करना उसके लिए कोई पैसा देगा कि भी नहीं यह सब असमंजस जैसे कि कंफ्यूजन उस समय चल रहा था। अभी जो अपने संघ का इतिहास जिन्होंने पढ़ा है सबको पता है वो जो वर्ल्ड फेमस घटना कि वो सुरेश मित्र सोए हुए थे ठाकुर ने उनको सपने में आकर के कहा कि अरे मेरे बच्चे इधर-उधर भटक रहे हैं तुमको शर्म नहीं आती है वो साथ-साथ में ही वो सुरेश मित्र खड़े होकर के दौड़ते नरेंद्र के घर गए वो तो एक ही वो गली में रहते थे एक ही शेरी में रहते थे तो नरेंद्र के घर जाकर के कहते हैं कि भाई ठाकुर ने मुझे ऐसा कहा है तो मैं काशीपुर में जितना रुपया देता था ₹80 ₹ ना समथिंग इतना मैं तुमको देता हूं। तुम इस तरह से मठ की रचना करो। हम लोग भी आएंगे। हमारे प्राण जुड़ेंगे। आपको साथ में ठाकुर की वार्तालाप करके हमारे मन को भी शांति होगी। तो वो घटना हमको पता है। किंतु इससे पहले जो के दो ये दो महीने हैं। उसमें यह क्या-क्या सब कंफ्यूजन चल रहा था। इसका यह यहां पर गंभीरानंद जी महाराज जो लिखते हैं उसका हम आगे पाठ करते हैं।
ठाकुर की महासमाधि के बाद रामकृष्ण मठ की स्थापना का कुछ भक्तों द्वारा विरोध
अ पहले तो कथामृत में से एक कोटेशन गंभीरानंद जी ने हमको दिया। इसके बाद में एक दूसरा कोटेशन है ठाकुर कहा के ओ सनाशेर बाह्य चिन्हो धारण करते अथवा गृहीर उपाधि त्याग करते अनुरोध करे नहीं मास्टर महाशय कथामृत में क्या लिखते हैं यही एक स्पेसिमेन उदाहरण कि जैसे कि मास्टर महाशय भले ही चाहे मां के ऊपर में स्वामी जी के ऊपर में इंडिविजुअल भक्ति हो किंतु यह ठाकुर ने गुरु परंपरा प्रारंभ करके गए हैं यह बात शायद शायद अभी उनको समझ में नहीं आई है। इसलिए वह अपने कथामृत में लिखते हैं कि ठाकुर ने किसी को भी सन्यास की ये जो बाह्य चिन्ह है यानी कि गेरुआ वस्त्र मस्तक मुंडन करना वगैरह यह धारण करने को कहा नहीं है अथवा तो ये जो गृहस्थ है जो लोग उनको अपना घर त्याग करने को कहा नहीं है। अनुरोध किया नहीं है। अभी यह अनुरोध नहीं किया तो तो मास्टर महाशय को नहीं कि त्यागी संतान को किंतु त्यागी संतानों के साथ में ठाकुर की क्या बात हो रही थी इसके बारे में मास्टर महाशय को पता नहीं है इसलिए उन्होंने यह सब लिखा है किंतु ठाकुर तहा देर अंतरे त्यागी कोरिया गया छिले परंतु ठाकुर सबको अंतर से त्यागी करके गए थे अभी यहां पर मास्टर महाशय ऐसा कोई डिफरेंशिएशन नहीं करते कि यह त्यागी त्यागी लड़के और यह गृहस्थ भक्त सबको ठाकुर ने अंतर से त्यागी करके गए थे। वो चाहे संसार आश्रम संसार में रहते हो कि सन्यास आश्रम में रहते हो गृहस्थ आश्रम में ना कि सन्यास आश्रम में सभी लोग भीतर से तो त्यागी हो गए थे। एक इस तरह से एक इंसिडेंट भी है। तो ठाकुर एक जगह पर कहते हैं वही वह कथामृत में ही है कि जिसके मन ठाकुर कहते हैं कि जिसके मन की जो थोड़ी बहुत भी वासना थी वह अभी खत्म हो गई है और अभी उनके मन में यह त्याग का भाव संपूर्ण रूप से प्रज्वलित हो रहा है। तो यह सुनकर के और ठाकुर फिर देखते हैं किन की ओर देखते हैं? दो लोगों की ओर। एक तो राखाल दूसरे मास्टर महाशय। तो देखिए कि दोनों का मास्टर महाशय के लड़के हुए थे। राखाल का भी एक संतान हुआ था। किंतु फिर देखिए कि दोनों ने भीतर से त्याग ग्रहण किया था। अभी मास्टर महाशय के मन में शायद ऐसा हो सकता है कि राखाल और मुझ में डिफरेंस कहां पर है। उसने भी शादी की है। उसका भी लड़का हुआ है। मैंने भी शादी की है। मेरा भी लड़का हुआ है। किंतु जैसे ठाकुर ने कहा ठाकुर ने खुद जो प्रू माने वो जो ठाकुर का सर्टिफिकेट है तो अभी दोनों के पास में कि अंतर से तो दोनों त्यागी हो गए हैं। तो अभी उसमें और मुझ में डिफरेंस क्या है? तो यह मास्टर महाशय में शायद रहा होगा कि यह जो त्यागी संतान है उन लोगों की कैटेगरी ही पूरी डिफरेंट है। वे लोग यह गुरु परंपरा में आते हैं। यह जो लीनिएज है श्री रामकृष्ण लीनिएज उसके वे लोग पार्ट है। एस सच मास्टर महाशय या और कोई भी हो यह बलराम बसु ना कोई भी वे लोग एक तरह से देखें तो वह बहिरंग भाग हो जाते हैं इस लीनिएज के क्योंकि वे लोग उनको इस लीनिएज में इस संघ में फॉर्मली जुड़े हुए नहीं है। तो यह जो एक फाइन डिस्टिंशन था उस समय किसी को समझ में नहीं आता था। यहां तक कि यहां तक कि देखिए कि अ उद्बोधन की रचना हो गई। उसके बाद में यह जो ठाकुर की महासमाधि के बाद में यह त्यागी संतान इधर-उधर सब तपस्या के लिए जा रहे हैं। उस समय सानियाल महाशय बोलकर के एक थे। उन्होंने कुछ समय के लिए गेरुआ पहना था और यही त्यागी संतानों के साथ में वह भी घूम रहे थे। तो बहुत सारे लोग उनको जैसे कि ठाकुर के ही संतान के रूप में देखते थे। अभी देखिए कि आप किस तरह से डिस्टिंक्शन करेंगे। वो भी तो ठाकुर के पास आते ही थे। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु ही इज नॉट ए पार्ट ऑफ आवर फॉर्मल लीनिएज सिस्टम। किंतु फिर भी अब अब जैसे कि शरद महाराज शरद महाराज के साथ में उनकी बड़ी मित्रता थी और शरद महाराज के साथ काफी उन्होंने संग भी किया है। शरद महाराज के साथ में प्रवृजिया भी की है। उद्बोधन में भी रहते थे। किंतु भीतर में किसी ना किसी तरह की
कहानी: संघ के ऊपर में खतरा और ठाकुर के द्वारा रक्षा
वीकनेस थी। एक इंसिडेंट है कि उस समय जब बेलूर मठ हो गया बन गया और उसके बाद में बेलूर मठ के ऊपर में एक कोर्ट केस चालू हुआ। मतलब बेलूर मठ को ही कोर्ट केस करना पड़ा था क्योंकि यह बाली म्युनिसिपालिटी हमारे से टैक्स मांग रही थी। तो हमने यह दरख्वास्त की कि हम तो रिलीजियस ऑर्गेनाइजेशन है तो ब्रिटिश गवर्नमेंट के नियम के अनुसार जो भी नियम होंगे उस समय हमको टैक्स में से माफी दी जाए। तो जो कोर्ट केस चल रहा था उस समय हुआ ऐसा कि यह सानियाल महाशय को जुबानी देने विटनेस के रूप में बुलाया गया। अभी यह जो सामने वाला जो वकील है विरोध पक्ष का उसने सानियाल महाशय को क्रॉस एग्जामिन करना शुरू किया और पता नहीं सानियाल महाशय के साथ में उस समय क्या हो गया था कि जो यह विरोध पक्ष वाला वकील पूछ रहा है वह सब में हां से हां करते जा रहे हैं तो हमारे जो राजा महाराज ने कि जो कोई भी उस समय कोर्ट में हाजिर होंगे उनको बड़ा ही डर लग गया कि यह तो देखिए कि ठाकुर का संतान है सबको पता है सन्यासी है सबको पता है। रामकृष्ण संघ का पार्ट है। सबको पता है। और वह जो भी यह सामने वाला वकील लॉयर पूछ रहा है, क्रॉस एग्जामिनेशन कर रहा है, सब में यदि हां से हां बोलता जाएगा तो हम तो कोर्ट केस हार जाएंगे। तो हमारी ओर से अपने बेलूर मठ की ओर से जो लोग भी उपस्थित होंगे वहां पर सब ने ठाकुर को प्रार्थना करना शुरू किया कि ठाकुर देखिए कि अभी मठ का जो भविष्य है आपके हाथ में है। तो उस समय एकाएक ऐसा एक चमत्कार हुआ कि यह जो सानियाल महाशय बेहोश होकर के गिर गए। तो जैसे ही बेहोश हो गए तो वैसे ही जज हमारा जो वकील था उसने जाकर के इमीडिएटली जज को कहा कि वह मेंटली फिट नहीं है। उन्होंने जो वो जुबानी दी है उसको सबको रिजेक्ट कर दिया जाए। और ठाकुर की कृपा भी ऐसी हुई कि जज ने यह स्वीकार कर लिया कि हां ठीक है उसके जो पूरा क्रॉस एग्जामिनेशन हुआ उसको रिकॉर्ड से निकाल दिया जाए। तो ऐसा करके हम लोग बच गए थे। वरना तो यदि वह बेहोश नहीं होते ना कि ऐसा कुछ नहीं होता तो हमको शायद अभी तक टैक्स देना पड़ता। किसको पता? तो यह सब जो जादू चमत्कार जो सब है जिसको हम जादू चमत्कार नहीं कहेंगे ऑफिशियली किंतु मेरी दृष्टि से तो चमत्कार से कम नहीं है। तो ऐसा सब होता रहा है। यह सब जो ठाकुर ही जैसे कि एक इंगित करके एक इशारा करके हमको कह रहे हैं कि उनकी लीनिएज में कौन आता है, कौन नहीं आता। तो यह जो है कंफ्यूजन यह कंफ्यूजन उस समय मास्टर महाशय के भी मन में था और यह जो पैराग्राफ है उसका प्रारंभ में ही जैसे कि अपने गंभीरानंद जी ने कहा कि यह जो विरोध जो था स्वामी जी का जो कांसेप्ट कि सबको एक साथ में मिलकर के मठ बनाकर के रहना है। इस विरोध में सिर्फ बात यह नहीं थी कि यह बड़ी उम्र वाले थे। यह छोटे थे। उम्र में यह गृहस्थ थे। यह त्यागी थे। देखिए उम्र में अद्वैतानंद जी बड़े थे। ठाकुर से भी बड़े थे। उम्र में गृहस्थ बोले तो राजा महाराज और मास्टर महाशय दोनों को जैसे कि ठाकुर ने एक साथ कहा था कि जिसके मन की जो वासना थी संसार करने की वह अभी पूरी हो गई है। अभी दोनों अभी सब उनके भीतर में त्याग प्रकट हुआ है। तो इस दृष्टि से भी देखें तो ऐसा कोई डिस्टिंशन नहीं था। यह जो डिस्टिंशन था बड़ा ही सल था। जैसे कि जो उच्च आध्यात्मिक जिनको इंसाइट प्राप्त होती है वही लोग यह सब डिफरेंशिएशन कर पाएंगे। यह लक्ष्मी दीदी स्वयं यह रामलाल दादा स्वयं ठाकुर के इतने इंटिमेट क्लोज रिलेटिव होने के बावजूद वह वहां पे दक्षिणेश्वर में ही रहते थे। ठाकुर ने जो काली पूजक का आसन खाली किया उसके ऊपर में वही काली पूजा का भार यह जो रिस्पांसिबिलिटी रामलाल दादा को दी गई। लक्ष्मी दीदी वही मां के साथ में नबत में रहती थी। इसके बावजूद जब ठाकुर की महासमाधि हुई, मां जब कामार पुकुर रह रही है, दोनों ने मां को इग्नोर ही नहीं किया सिर्फ किंतु साथ-साथ में एक्टिवली मके मार्ग में बाधा स्वरूप बनके रहे थे। वो रामलाल दादा ने मां का पेंशन बंद करवा दिया और लक्ष्मी दीदी मां जो बागान बनाती थी उसको जैसे कि जाकर के डिस्टर्ब कर देती थी। तो ऐसा मतलब ठाकुर के भी जो इतने तकरीबी थे उनको भी शायद यह समझ में नहीं आया कि ठाकुर की यह जो गुरु परंपरा है यह जो लीनिएज है उनकी डिवाइन लीनिएज उसके जो ये जो टॉर्च बियरर्स है वो स्वामी जी फिर मां और यह डायरेक्ट डिसाइपल यह होने वाले हैं। तो उस कन्फ्यूजन के दिनों में मास्टर महाशय इस तरह से लिखते हैं कि ठाकुर ने किसी को बाहर से सन्यास के कोई चिन्ह धारण करने को नहीं कहा। किंतु ठाकुर ने सबको मन से त्यागी करके कर दिया था। रामचंद्र आदि
जिन शिष्यों को श्रीरामकृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था, क्या उन्हें तपस्या करनी होगी?
भक्तगण इहाओ बोलते जे जहारा श्री रामकृष्ण के देखिया छे तहा देर पखे अतिरिक्त साधना निष्प्रयोजन रामचंद्र जैसे कुछ भक्त यह भी कहते थे कि जिन्होंने श्री रामकृष्ण का दर्शन किया है। उनके लिए अभी किसी भी तरह की साधना करने का प्रयोजन नहीं है। देखिए कि इस सेंटेंस के ऊपर में हमको थोड़ा सा देखना होगा। अह अभी जैसे कि डायरेक्ट डिसाइपल ने तपस्या की। मां ने भी तपस्या की। किंतु यहां पे मामला सिर्फ तपस्या वाला नहीं है। मामला सिर्फ यह नहीं है कि आप घर में रहकर के गृहस्थाश्रम करके विद्या का संसार कीजिए। यह लोग मठ में इकट्ठा होकर के रहेंगे। मामला सिर्फ यहां तक नहीं है। यह तपस्या करेंगे। यह गृहस्थ ऐसा नहीं है। यहां पे है कि ठाकुर की जो डिवाइन लिनिएज है उसको आपको स्वीकार करना है। बहुत सारे भक्त हैं जैसे कि फॉर एग्जांपल मैं कहूंगा कि अघोरमणि देवी तो अघोरमणि देवी है या तो फिर यह गौरी मां है। इस तरह से कुछ-कुछ भक्तों को देखेंगे कि हां अब गौरी मां है। उन्होंने अपना आश्रम प्रारंभ किया और ऐसा नहीं है कि बाद में उन्होंने कोई ऐसा तपस्या ना कि ऐसा साधन भजन किया हो एटलीस्ट मुझे नहीं पता किंतु उन्होंने मां को स्पष्ट रूप से अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया था। अघोरमणि देवी उन्होंने मां और स्वामी जी को जो ठाकुर की जो पदवी थी उस पे आसित किया था। तो यानी कि उन्होंने स्पष्ट समझा था। यही लोग ठाकुर के रिप्रेजेंटेटिव है। हमको खुद को गुरु बन के नहीं बैठ जाना है। अच्छा यह
कहानी: माँ शारदा के प्रति गौरी माँ की भक्ति
गौरी मां की एक इंटरेस्टिंग कहानी है। गौरी मां का मां के प्रति जो श्रद्धा भक्ति है वह तो अद्भुत है और दोनों के बीच में मधुर संबंध भी था। एक बार गौरी मां जयराम बाटी जाती है। तो फिर क्या करती है कि अभी उनका भी एक थोड़ा सा नाटकीय स्वभाव था। तो वह वहां पे जो दामोदर नदी है उसके किनारे पर गई। जब किनारे तक पहुंची तो देखा कि अभी संध्या होने में थोड़ी सी देरी है तो वह वहीं पर रुक गई और वह जो भी है जप ध्यान वगैरह कुछ किया होगा। जैसे ही संध्या ढल गई दामोदर नदी क्रॉस करके जयराम बाटी गई मां के जो घर है उसके सामने जो वरांडा है वहां पे जाकर के खड़ी रह गई वो गेट जो होता था वहां पे और जाकर के पुकार करके कहती है कि मां क्या मुझे दो भिक्षा मिलेगी थोड़ी सी मुझे भिक्षा मिलेगी ऐसा करके वो पुकार रही है तो अभी ये बात ये जो उनकी पुकार सुनकर के वो जो पागली मामी है वो बाहर आई तो जैसे ही वो बाहर आई तो फिर से गौरी मां ने कहा मां दुटी भिक्षा पाई आमी रात भिखारी मां क्या मुझे थोड़ी सी भिक्षा मिलेगी मैं रात भिखारी हूं रात को भिक्षा करने के लिए निकलती है ऐसी भिखारी हूं तो जैसे ही गौरी मां ने ऐसा कहा अभी क्या है कि वो पगली मामी के फोबिया बहुत सारे थे तो उसमें एक फोबिया शायद यह भी होगा भिखारी का जो भी है वो चिल्ला करके दौड़ कर के कमरे में भाग गई और मां का नाम पुकार करके कह रही है कि मां वहां देखो कौन आया है तो अभी उनका डर देख के मां को लगा कि क्या कोई डकैती फकैती करने के लिए तो नहीं आ गया? तो मां ने फिर धीरे-धीरे करके मां अपने कमरे में से बाहर आई और दृढ़ स्वर से पूछा के रे कौन है रे? तो ऐसा जैसे ही मां ने कहा तो फिर से गौर दासी ने कहा कि मां दुटी भिक्षा पाई आमी रात भिखारी। मां थोड़ी सी भिक्षा मिलेगी। मैं रात भिखारी हूं। तो मां ने इमीडिएटली गौरदासी का आवाज समझ लिया। अच्छा गौरदासी अच्छा अच्छा ऐशो ऐशो। ऐसा ऐसा करके गौरसी को भीतर में बुलाया। सबको पता चला कि गौर दासी की आवाज से उनके जो भिखारी के स्वरूप से वो पागली मामी डर गई थी। फिर वो हंसीज़ाक चालू हो गया। तो इस तरह का मधुर संबंध गौरी मां का मां के साथ में था। किंतु यही गौरी मां मां के आखिरी समय में जब मां का दर्शन करने के लिए आती है तो मां का क्या है कि वो संसार के प्रति विराग जो बढ़ रहा है ना तो जैसे ही गौरदासी आती है तो मां ने कहा था कि यह जो राधु है वगैरह नलिनी उनको जय राम बाटी भेज दो। तो यह नलिनी वगैरह बड़े डर गए। उन्होंने जाकर के शरद महाराज के पास जाकर कहा कि महाराज हम लोग यदि इस समय घर भेज देंगे तो फिर लोग क्या कहेंगे गांव वाले कि मां को जब जरूरत थी मां का आखिरी समय था उस समय हम मां को छोड़कर के आ गए हैं। तो ऐसा करके शरद महाराज को कहा तो शरद महाराज ने आकर मां को बड़ा बड़ा ही विनम्र भाव से विनती किया कि मां ये लोग अभी चले जाएंगे तो उनके मन को तो कष्ट होगा किंतु साथ-साथ में समाज का भी सब सुनना पड़ेगा। तो मां आखिरी घड़ी तक किंतु मां का यह कॉन्शियसनेस है। उनके ऊपर में से विराग हो गया है। किंतु समाज में इस तरह से बिना मतलब की बातें चले वो मां को पसंद नहीं था। तो मां ने कहा ठीक है भले ही ये लोग रहे यहां पे कि तू मेरी नजर के सामने उनको मत लाना। तो मां का उस हद तक का जब उस हद तक का जब त्याग बढ़ गया था। उस समय ये गौरसी मां को प्रणाम करने के लिए आती है तो मां ने एकदम थोड़ा सा नाराजगी के स्वर से कहा कि क्यों यहां पर आती हो? क्यों मुझे परेशान करने को आती हो? चले जाओ यहां से। तो यह बात सुनकर के तो गौरी मां रोना शुरू कर दिया। रोते-रोते फिर अभी क्या करें? जा भी नहीं सकते। मां का जो आकर्षण है और कमरे में भी नहीं जा सकते क्योंकि मां ने आने को मना कर दिया है। किंतु गौर दासी की भक्ति ऐसी कि प्रतिदिन वो मां को प्रणाम करने के लिए आती। वहीं पर जो चौखाट होती है यानी कि दरवाजा का जो प्रवेश द्वार होता है वहीं पर बैठी रहती और मां का दर्शन करती रहती। घंटों घंटों भर तक और फिर वह वहां से जाती। तो देखिए कि जिन लोगों की यह जो आध्यात्मिक उपलब्धि थी उनको पता है कि ठाकुर की डिवाइन लीनिएज चल रही है। ठाकुर शायद अंतर्ध्य हो गए होंगे पृथ्वी से। किंतु उन्होंने अपने सक्सेसर को अपॉइंट करके गए हैं। तो ये जो था एक फाइन डिस्टिंशन उसको धीरे-धीरे करके स्वरूप धारण करना था। और यह स्वरूप धारण इसी कुछ दो-तीन महीनों में हो रहा था। इसलिए यहां पर यह सब ये डिस्कशन हुआ कि रामचंद्र जैसे कुछ भक्त कहते हैं कि ठाकुर ने कहा है कि मतलब उनका जो इंटरप्रिटेशन है कि ठाकुर का दर्शन हुआ है तो तपस्या करने की कहां जरूरत है? हम हम लोगों को तो ठाकुर के अवतार वरिष्ठ स्वयं जो है जय राम जय कृष्ण श्री राम कृष्ण उनका स्पर्श जो चैतन्य हो करके जो ठाकुर ने सबको स्पर्श करके आशीर्वाद दिया था फर्स्ट जनवरी को और जिसको कि रामचंद्र ने कल्पतरु के रूप में फेमस करना शुरू किया था जिनको उस दिन स्पर्श हुआ है उनका तो सब सात जन्मों का ना पिछले जितने जन्मों का है सब तो क्लियर हो गया है अकाउंट अभी क्या रह गया तो यहां पे किंतु मामला सिर्फ यह यह नहीं है कि जो ठाकुर की लीनिएज को एक्सेप्ट करेंगे, वे लोग तपस्या करेंगे, मामला यह है कि वे लोग अंतर मन से स्वामी जी और मां को अपने गुरु और इष्ट के रूप में स्वीकार करेंगे। यह जो फाइन डिस्टिंग्शन अभी धीरे-धीरे आकार धारण कर रही है। मठ के केंद्र करिया जुगो वार्ता प्रचार प्रयोजन तखनो स्पष्ट प्रतिमान हो ना नारायण ज्ञाने विविधो पंथावलंबने जीवो सेवा करार तो कथा तो तखनो कल्पनातीत मठ को केंद्र करके युग वार्ता प्रयोजन युग वार्ता प्रचार प्रयोजन अर्थात कि मठ को केंद्र करके ठाकुर ने इस युग के लिए जो संदेश दिया है युग वार्ता उसके प्रचार का प्रयोजन अभी भी स्पष्ट रूप से वह प्रतिमान नहीं हो रहा है। नहीं हुआ था। स्पष्ट रूप से प्रकाशमान नहीं हुआ था। ऑन द अदर हैंड नारायण ज्ञान विविध पंथावलंबने नारायण ज्ञान से विभिन्न जो पद्धतियां है उसका अवलंबन करके लोगों की सेवा करना। यह बात तो उस समय कल्पनातीत थी। किंतु शुद्ध चिंता हिसाब ओश विषय अस्पष्ट विचार तखनो चलितो एवं देखा जाए तो जे इहाते मतान क्यों आ छे किंतु ये मामला अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ था कि यह बेल वराह नगर मठ या तो उस समय एक मठ की रामकृष्ण मठ की स्थापना होगी और इस मठ के माध्यम से एक ऑर्गेनाइज्ड वे में धर्म प्रचार प्रारंभ होगा और शिव्ञानी जीव सेवा का सूत्रपात होगा। यह सब यह तो बड़ा ही स्पष्ट था। माने भविष्य में कब होगा पता नहीं होगा कि नहीं। किंतु इसके बारे में जो आइडियाज भी जो थे वो भी उस समय बड़े अस्पष्ट थे। वो फेमस घटना कि ठाकुर ने जब यह कहा कि तुम लोग सेवा करने वाले कौन होते हो? तुम लोगों को तो शिव ज्ञान से जीव सेवा करनी है। उस समय एक स्वामी जी को समझ में आया था। जैसे कि लीला प्रसंग में शरद महाराज कहते हैं कि कमरे से बाहर आकर के स्वामी जी ने कहा कि यदि मुझे ईश्वर शक्ति देंगे, क्षमता देंगे तो एक न एक दिन ठाकुर का यह जो विचार है मैं पूरे विश्व में फैलाऊंगा। तो उस समय किंतु यह जो विचार के रूप में भी यह जो बीज थे उसमें भी मतानैक्य था। मत अनैक्य अर्थात कि विभिन्न मत थे। दो मत थे। यहां तक कि जो लोग लीनिएज को नहीं स्वीकार करते थे उनकी तो बात छोड़ दीजिए। विदिन आवर लिनिएज गुरु परंपरा में जो यह त्यागी संतान आते थे, उनके मन में भी एक तरह से जैसे कि दुविधा का भाव था कि हमको क्या संघ होकर के रहना है कि नहीं रहना है या तो फिर यह जब भविष्य में स्वामी जी अमेरिका जाकर के यह जो सब नए-नए विचार फैला रहे हैं तो यह क्या ठाकुर के मत के अनुसार है कि नहीं स्वामी जी भारत आकर के मठ की स्थापना मिशन की स्थापना करते हैं। रिलीफ एक्टिविटी करने को कहते हैं। तो यह क्या ठाकुर के विचारों के विरोध में जाता है कि नहीं? गुरु भाइयों में भी एक तरह से डिस्कशन एक तरह से डिफरेंट ओपिनियन देखा जाता था। एक घटना है। दूसरे लोगों की तो बात छोड़ ही दीजिए। वही राजा महाराज जो कि स्वामी जी के सबसे तकरीबी थे। माने सबसे क्लोजेस्ट जो उनके थे आध्यात्मिक के क्षेत्र में भी और ठाकुर के स्नेह प्राप्त करने में भी। तो यही राजा महाराज एक बार कथामृत में विवरण है। आखिरी मतलब यह जो वराह नगर मठ में की ही बात है। राजा महाराज कहते हैं कि यह जो सन्यासी नगर की एक बात मैंने पढ़ी है। वो कौन सी एक किताब में उन्होंने पढ़ा था कि उसमें सन्यासी नगर का एक विवरण है तो वहां पे फिर जैसे कि सन्यासियों में इस तरह से इकट्ठा रहने से करप्शन प्रारंभ हो जाता है। तो यह सब करना ठीक नहीं है। उस समय राजा महाराज के मन में बहुत तपस्या का भाव त्याग का वैराग्य का भाव चल रहा था तो उनकी इच्छा थी कि वो मठ छोड़कर के प्रवज्जा के लिए निकल जाए वृंदावन जाए उनके भीतर में तो बालकृष्ण का भाव था ही था ठाकुर ने ही कहा था वो तो वृंदावन का राखाल है तो वृंदावन जाकर के वह तपस्या करें यह भाव उनके मन में था किंतु यही स्वामी जी उनको रोक रहे थे उस समय यह राजा महाराज इस तरह की बात करते हैं कि उस किताब में सन्यासी नगर की बात और हम सन्यासियों को एक साथ में रह के इकट्ठा होकर रहना उचित नहीं है। तो उस समय तो स्वामी जी का मत नहीं था किंतु समहाऊ बाद में स्वामी जी का मत परिवर्तन भी हुआ। सबसे पहले स्वामी जी ही निकल गए और फिर उसके बाद उनके बाद में बाकी सब सन्यासी उनके जो गुरु भ्राता है उन्होंने भी मठ त्याग करके प्रवृज्या प्रारंभ की। तो यह जो यहां पे महाराज जी लिखते हैं कि शुरू शुरू में इस तरह के डिफरेंस ऑफ ओपिनियन देखने में आते थे। वह सब तरह के ओपिनियन थे। माने दूसरे लोग जो कि लीनिएज को नहीं स्वीकार करते थे। मास्टर महाशय जो कि व्यक्तिगत तो इनको स्वीकार करते थे मां और स्वामी जी को किंतु संघ होने में उनका थोड़ा सा एक पता नहीं उनको समझ में आ नहीं रहा था। यहां तक कि गुरु भाइयों में भी एक तरह से कंफ्यूजन चल रहा था। कथामृत होते ही उद्भूति दी। कथामृत में से ही मैं एक उदाहरण देता हूं। रेफरेंस देता हूं। धर्म प्रचार कथा पढ़ लो। धर्म प्रचार की बात प्रारंभ हुई। अच्छा यह पैराग्राफ जो है वो थोड़ा सा लंबा है। थोड़ा सा ज्यादा डिस्कस करना होगा अच्छे से। तो आज यहीं तक कल से इसका डिस्कशन प्रारंभ करेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
स्वामी विवेकानंद के जीवन के प्रमुख मोड़
ठाकुर की महासमाधि के बाद में स्वामी जी के जीवन में जो मेजर टर्निंग पॉइंट आए जो मेजर माइलस्टोन थे नेचुरली कन्याकुमारी इज वन ऑफ द बिगेस्ट किंतु मैं जिस तरह से एनालिसिस करता हूं मुझे लगता है कि देयर इज ए इवन बिगर माइलस्टोन इन स्वामी जीसस लाइफ जो कि यह जो पूरा मिशन था उसके बारे में उनका कन्विक्शन कब से जागृत हुआ देखिए कि वराह नगर मठ से दो-तीन बार स्वामी जी निकले हैं प्रवृजजा के लिए किंतु हर बार वापस आ गए थे। अब आखिरी बार जब निकले वह अखंडानंद जी को साथ में लेके मां का आशीर्वाद लेके तो उस समय उन्होंने क्या ठीक किया था हिमालय जाएंगे समाधि में मग्न हो जाएंगे और वहां पे वो अल्मोड़ा गुफा में तपस्या करने का प्रारंभ किया किंतु वो जो भयानक न्यूज़ उनके पास में आया कि उनकी बहन ने सुसाइड कर दिया है तो सडनली स्वामी जी को लगा कि यह मैं क्या कर रहा हूं। मेरा खुद का जो मुक्ति है उससे मेरी बहन की यह जो हालत है तो यह करोड़ों बहनाएं हैं मेरी उनकी क्या हालत होगी। सो दैट टर्निंग फ्रॉम इनवर्ड टू आउटवर्ड दैट टूक प्लेस देयर। उसके बाद में जो था कि वह पीसेस स्टार्टेड फॉलिंग इन प्लेस। किंतु ये जो डायरेक्शन 180° जो चेंज हुई दैट इज अल्मोड़ा में हुई। दैट इज व्हाट आई बिलीव। यह जो मेजर माइलस्टोनस है ना स्वामी जी के जीवन के जैसे स्वामी जी का लाइफ हम स्टडी करते जाएंगे। वी विल डिस्कस एव्री माइलस्टोन एट अ ग्रेट डिटेल। अ कन्याकुमारी का मेजरेंस है। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। बट मुझे ऐसा लगता है कि रामकृष्ण मिशन की आज की दृष्टि से यदि देखें तो स्वामी जी का फर्स्ट कन्विक्शन और वो दैट वास इन अल्मोड़ा।