prayer
ओम स्थापकाायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का जीवन चरित्र हम पाठ कर रहे हैं। हमने ऑलरेडी देखा कि वराह नगर मठ के जो चैप्टर्स है उसका प्रथम चैप्टर्स हमने देख लिया है। आफ्टर द महासमाधि ऑफ श्री रामकृष्ण। ठाकुर की महासमाधि 16 अगस्त को हुई। उसके बाद में 30 अगस्त तक यह लोग काशीपुर में रहे थे। उसके बाद में उसका रेंट समाप्त हो गया। तो फिर काशीपुर छोड़ देने की बारी आ गई। उसके भीतर में जितने भी पॉइंट्स थे वह सब पॉइंट्स भी हमने देख लिए। आखिर में जो एक कहानी थी कि एक नॉर्थ इंडिया का एक साधु रामायित साधु दक्षिणेश्वर आता है ठाकुर की बात सुनकर के और जब पता चला कि यही कुछ दिन हुए हैं ठाकुर की महासमाधि हो गई है तो बेचारा बड़ा दुखी होकर के बिना खाए पिए पंचवटी के नीचे पड़ा रहा और फिर उसको वहां पर ठाकुर ने आकर के दर्शन दिया और एक मिट्टी के पात्र में मिट्टी की कटोरी में बाउल में उसको खीर बना के दी। खीर ले ही आए थे ठाकुर गंगा में से प्रकट हुए दिगंबर जैसे कि छोटे बालक की तरह और फिर हाथ में एक मिट्टी का पात्र उसमें थी खीर और कहा कि तुमने बहुत दिनों से खाया नहीं है। इसको खाओ और रुष्टपुष्ट हो। तो फिर यह साधु ने खीर खाई। दूसरे दिन रामलाल दादा पूछते हैं कि अरे इतने खुश क्यों हो? अभी तो कल तक तो रो रहे थे कि ठाकुर के दर्शन हुए नहीं। तब उसने कहा कि देखिए ठाकुर ने खुद आकर के मुझे खीर खिलाई है। तो वह पात्र भी रामलाल दादा ने बहुत दिनों तक बचा करके रखा था। तो यहां पे वो पर्व समाप्त होता है काशीपुर का और फिर सबकी
श्रीरामकृष्ण की महासमाधि के बाद उनके त्यागी शिष्यों के भविष्य पर चिंतन
नजर के सामने एक बहुत बड़ा प्रश्न खड़ा होता है कि अभी इसके आगे हमको क्या करना है? तो क्योंकि क्या है कि देखिए कि ठाकुर ने सबको अंतर्मन से तो वैरागी बना करके गए ही थे। किंतु साथ-साथ में ही ठाकुर का खुद का जो जीवन था इन लोगों ने तो ठाकुर का जीवन देखा था कि उन्होंने अकेले दक्षिणेश्वर में रहकर के साधना की और एक के बाद एक ईश्वर दर्शन होते रहे। एक के बाद एक पथ के माध्यम से उन्होंने आध्यात्मिक साधनाओं में उस पथ की जो सर्वोच्च सिद्धि है उसको प्राप्त किया। तो यह इन बच्चों के सामने आध्यात्मिक जीवन का आइडियल था। किंतु हमको साथ-साथ में यह भी पता है कि देखिए ठाकुर ने ठाकुर की कहानी सुनकर के हमको जितना इजी लगता है कि चलो यहां पर भैरवी ब्राह्मणी आई। ठाकुर को साधना करवाई। शक्ति साधनाएं एक के बाद एक जितने भी तंत्र है उसमें लिखी हुई। सब साधनाओं में ठाकुर माहिर हो गए। सब साधनाओं में सिद्धि प्राप्त कर ली। फिर तोतापुरी आए। तोतापुरी ने ठाकुर को वेदांत साधना करवाई। ठाकुर उसमें भी सिद्ध हो गए। तोतापुरी गए तो ठाकुर छ महीने में निर्विकल्प समाधि में भी रह लिए। तो यह सब पढ़ने में लगता है कि यदि मान लीजिए कि मैं दक्षिणेश्वर में रहता होता और मेरे पास में भैरवी ब्राह्मणी या तोतापुरी जैसे गुरु आते तो शायद हो सकता है कि मैं भी इस तरह की साधनाओं में सिद्ध हो सकता था। किंतु हम सबको पता है कि इस तरह का स्पेककुलेशन करने से कोई लाभ नहीं है। ठाकुर की जो कैपेसिटी थी साधना करने की, त्याग करने की, अपने मन को संपूर्ण रूप से 100% वासना मुक्त कर देने की, उसका 1% कैपेसिटी भी हम में नहीं है। तो अभी प्रश्न होगा कि ठाकुर के आदर्श को सामने रखकर के आपने घर तो छोड़ दिया। मन से तो आप वैरागी हो गए किंतु फिर और क्या आपके पास में मॉडल क्या है? आप कौन से मॉडल को फॉलो करेंगे अपने जीवन के लिए? ठाकुर वाला मॉडल तो आपके लिए काम नहीं करने वाला है। हां आप तपस्या करेंगे। जैसे गृहस्थ लोगों ने उनका जो मॉडल था बड़ा स्पष्ट था। ठाकुर का जैसे कि कहना था राजा जनक की तरह बीच-बीच में मन में वन में और कोने में बैठकर के तपस्या कर लेनी है और फिर तपस्या करके अपना मन एक बार अपना माइंड फर्टिफाइड हो जाए तो फिर संसार में आकर के फिर से युद्ध करना शुरू कर देना है। तो यह रामबाबू है या मास्टर महाशय है ना कि बलराम बाबू है ना कि योगिन मां है गोलाप मां है उन लोगों के सामने तो उनका जीवन बड़ा स्पष्ट तरीके से दिख रहा था वही करते जाएंगे जो कि उन्होंने पहले किया है। बस वही है कि अभी उनके सर के ऊपर में ठाकुर का आशीर्वाद स्वरूप हस्त अभय हस्त हमेशा स्थापित है। और इसीलिए रामबाबू सबको कहते हैं कि ठाकुर के दर्शन यदि एक बार हो गए कल्पतरु दिन को आत्म प्रकाश अभयदान जिस तरह से शरद महाराज कहते हैं उस दिन को ठाकुर ने यदि हमको स्पर्श करके कह ही दिया है कि तो चैतन्य हो तो फिर आध्यात्मिक जीवन में और करने को बाकी क्या रह गया आप बहुत सारी तपस्या करेंगे बहुत सारा कठोर सब करेंगे ब्रह्मचर्य पालन करेंगे आखिर में आपको क्या आपका का लक्ष्य है ठाकुर का दर्शन प्राप्त करना तो ठाकुर का दर्शन तो ऑलरेडी हो चुका है और नई तरीके से दर्शन प्राप्त करने से क्या लाभ है यह सब तो हमारे लिए है सेकंड थर्ड जनरेशन जो कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में जैसे कि काली कृष्ण महाराज है बुद्धानंद जी है शुद्धानंद जी है ये लोग जो फर्स्ट जनरेशन जो सेकंड जनरेशन कहेंगे फर्स्ट जनरेशन यदि कहे कि डायरेक्ट डिसाइपल की तो फिर सेकंड जनरेशन में यह जितने भी लड़कों ने आना शुरू जरूर किया उनके लिए है कि हम जप ध्यान तपस्या करके ठाकुर का दर्शन प्राप्त करें और वह भी यदि आपकी इच्छा है तो किंतु यहां पे देखिए कि फर्स्ट जनरेशन को तो यह सब जरूरत नहीं है। आप रामकृष्ण मठ की स्थापना करेंगे ही क्यों? आप संघ होकर के रहेंगे ही क्यों? क्या यह भारतीय जो आध्यात्मिक साधना है उसके खिलाफ क्या नहीं है? देखिए कि राम भारत में संघ की स्थापना या मठ की स्थापना जो हुई थी यदि मतलब हिस्टोरिकली एटलीस्ट यदि हम देखें तो यह बौद्ध धर्म के भीतर में यह सर्वप्रथम बौद्ध संघों की स्थापना होनी शुरू हुई थी। उसके पहले निश्चय यह वैदिक युग में आश्रम वगैरह तो थे किंतु यह आश्रम जो थे वह कोई संघ नहीं थे। एक मंदिर की तरह मंदिर में सभी लोग जिस तरह से रहते हैं अपना कार्य शेयर करते हैं अपनी साधना करते हैं बैठकर के तो इस तरह से एक संघ या उसके एक संघ और एक मंदिर या मठ इन दोनों में काफी डिफरेंस है। संघ का अर्थ ही है कि एक हायरार्किकल स्ट्रक्चर। जबकि मंदिर में आप कह सकते हैं कि एक हेड प्रस्ट होगा, मुख्य पुजारी या महंत होगा। किंतु फिर विदिन दैट आपका कोई एक कॉरपोरेट बॉडी की तरह कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर की तरह कोई ऑर्गेनाइजेशन नहीं है। तो यह सब प्रश्न थे। अभी ऑर्गेनाइजेशन की बात तो फिर भी चलो बड़ी दूर की है। सर्वप्रथम तो कि बच्चों का भविष्य क्या? क्या किस मॉडल के अनुसार वे लोग अपना जीवन गठन करेंगे? तो यह एक बड़ा ही सीरियस प्रश्न इन लोगों की नजर के सामने आकर के उपस्थित हुआ और इस प्रश्न का किस तरह से निराकरण करते हैं। इन सब प्रश्नों के जो यह जो झंझवात था यह जो सब क्या कहेंगे कि चैलेंज एंड एक तरह से कहेंगे कि एडवेंचर इस एडवेंचर का जो मुख्य केंद्र था वह था नरेंद्र भविष्य के स्वामी विवेकानंद। तो नरेंद्र किस तरह से यह पूरी सिचुएशन का एनालिसिस करता है। नरेंद्र को पता है कि
ठाकुर ने कैसे अपने त्यागी शिष्यों का जीवन-गठन किया: 1) जो शिष्य जिस साधना का अधिकारी था उसे वह साधन-पद्धति सिखाकर उसे सिद्ध करवाया
ठाकुर ने वही काशीपुर में ही सबको दो कार्य ठाकुर ने किए हैं। ठाकुर ने जो यह जो त्यागी संतान है, उनके साथ में ठाकुर ने क्या-क्या किया? सर्वप्रथम तो एक सबसे इंपॉर्टेंट है कि सबके हृदय के भीतर में झांक करके उनकी क्या नेचुरल सहज साधन पद्धति है। उनकी क्या सहज इंक्लिनेशन है, वो उन्होंने जान लिया। अभी जैसे कि राजा महाराज ठाकुर के पास में आए तो ठाकुर को पहले से ही पता था कि यही यह वृंदावन का राखाल है जिसने कि भगवान कृष्ण के साथ में लीलाएं की थी। तो यह राखाल राज या तो फिर यह राजा महाराज स्वामी ब्रह्मानंद उनका पूरा कैरेक्टर उनका कॉन्शियसनेस उनका माइंडसेट उनका कर्म का प्रवाह यह भक्ति मार्ग की ओर था। जबकि स्वामी विवेकानंद जब आए ठाकुर के पास में तो ठाकुर पहले से ही समझ गए कि जो सात ऋषियों में से एक ऋषि पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं। अद्वैत वेदांत में सिद्ध आत्मज्ञान ब्रह्म साक्षात्कार जिनका हो चुका है। उस ऋषियों में वही ऋषि यह लड़के के भीतर में या तो उसी ऋषि ने इस लड़के के रूप में पृथ्वी पर जन्म ग्रहण किया है। तो उनकी यह जो निराकार या तो अद्वैत साधना करने की कैपेसिटी को ठाकुर ने समझ लिया। तो फिर जितने भी उनके पास में सिर्फ त्यागी ही नहीं गृहस्थ जितने भी आते थे ठाकुर के पास में सबका मन समझ करके सबके कर्मों का प्रवाह समझ करके सबके एक साधन भजन करने की कैपेसिटी को समझ करके ठाकुर ने पहले तो उनको उनके मार्ग में उपदेश दिया जो द्वैत साधन का एलिजिबल है उनको द्वैत साधना का उपदेश दिया जो निराकार कार या तो फिर अद्वैत साधना के लिए एलिजिबल है नेमली नरेंद्र तो नरेंद्र को अद्वैत साधना का उपदेश दिया साधना करवाई उन्होंने सुपरवाइज की जितनी भी बार इनकी साधना में कोई भी विघ्न आता है तो साधना के उस विघ्न को दूर करके उनके आध्यात्मिक पथ पर कितना ही आगे बढ़ा दिया तो यह कार्य ठाकुर ने सर्वप्रथम किया था जो रामकृष्ण कृष्ण विवेकानंद लिटरेचर पढ़ते हैं या समझते हैं। उनको यह बात बड़ी बखूबी पता है। बहुत अच्छे से पता है। क्योंकि यह डायरेक्ट डिसाइपल के जितने भी रेमिनेशन पढ़ेंगे ठाकुर के बारे में वह इस तरह की बातों से भरपूर है कि किस तरह से साधना में विघ्न आता है। ठाकुर विघ्न को दूर करते हैं। एक वह फेमस कहानी है। वो हम
ध्यान में बाधा उत्पन्न होने से क्या करे
सबको पता है कि नरेंद्र जब ध्यान कर रहा था तो बगल में एक मिल है मिल की जो विसल है वो बार-बार बजती है और नरेंद्र को ध्यान में भंग पड़ता है तो नरेंद्र ने जब जाकर के ठाकुर को कहा कि महाशय इस तरह से यह जो मिलकी विसल है उसकी वजह से मैं ध्यान ठीक से नहीं कर पा रहा तो ठाकुर ने क्या कहा कि उसी विसल के ऊपर में ही मन को एकाग्र करो देखो कि तुम्हारा मन मन ऑटोमेटिक एकाग्र हो जाएगा। तो देखिए कि स्वामी जी ने वह किया भी सही और वह करके वह सही-सही में उनको ध्यान में काफी बेनिफिट हुआ था। देखिए एक इंटरेस्टिंग बात
माया के जगत में परफेक्शन (पूर्णता) नहीं है
मैं बताता हूं। जनरली यह जो सिद्ध गुरु होते हैं और हम जो हमारी साइकोलॉजी कैसे काम करती है? हम आम आदमी की और यह सिद्ध गुरु की साइकोलॉजी कैसे काम करती है? अ जो चीज हमको साधना में खलेल पहुंचाती है। जो कोई भी इवेंट है, कोई भी घटना है जो कि हमारी साधना में किसी भी तरह का डिस्टरबेंस खड़ा करती है। हमारा एक आम आदमी का एक टेंडेंसी रहेगा। एक आम साधक का टेंडेंसी रहेगा कि वह डिस्टर्ब करने वाले एलिमेंट को हटा दे। तो और वह हट जाएगा। हम फिर से शांति से बैठेंगे और फिर से हमारा मन एकाग्र हो जाएगा। प्रॉब्लम यह है कि माया के राज्य में आपको कभी भी कोई भी शांति से बैठने नहीं देगा। यह हमेशा यह डिस्टरबेंस आता ही रहेगा। मेरा खुद का शुरू-शुर में सही बताऊं तो मेरे साथ में ऐसा काफी बार होता था कि अपना कमरा बंद करके चारों ओर से मैं जितना शांत हो सके उस तरह के वातावरण में ध्यान करने का प्रयास करता था। थोड़ा सा भी यदि डिस्टरबेंस हो जाए तो मुझे काफी गुस्सा भी आ जाता था कि अरे इन लोगों को क्या कुछ कामधाम नहीं है? यह इतना पवित्र समय है संध्या आरती के बाद का और कपड़े धो रहे हैं तो उसकी आवाज से मुझे डिस्टर्ब हो रहा है। तो ऐसा मेरे साथ में शुरू-शुर में होता था। किंतु फिर जैसे लिटरेचर समझता गया अपना मैं यह भी समझता गया कि जो चीज हमारे मन को डिस्टर्ब करती है उसी पर ध्यान करो और उसी को आशीर्वाद दो। यह बात हमने वो ध्यान करने की ये जो कुछ-कुछ पॉइंट्स डिस्कस किए थे उसमें किया था कि जो आपको डिस्टर्ब करता है जो आपके साथ में शत्रुता रखता है उसी को ध्यान प्रारंभ करने के पहले ही उनको इतना आशीर्वाद दो भगवान से प्रार्थना करो ईश्वर मेरी साधना का आज मैं जो जप ध्यान कर रहा हूं उसका पूरा फल उसका पूरा पुण्य इन लोगों को दे दो तो देखेंगे कि आपका मन शांत हो जाएगा किंतु फिर फिर भी ये अपना टेंडेंसी जो है कि आइडियल क्या है? तो संपूर्ण रूप से शांत जगह पर बैठना जहां पर किसी भी तरह का डिस्टरबेंस नहीं है। अगेंस्ट दैट ठाकुर का क्या टीचिंग है कि इस डिस्टरबेंस को जैसे कि अपना लेना इसको हमको फेस करना। यह फेस द ब्रूट जिस तरह से कहते हैं ना स्वामी जी की कहानी है। फेस द ब्रूट यू डील विथ इट। एंड देन यू वी विल ओवरकम दैट। तो इसका एक उदाहरण कि ट्रांसलेशन में देख रहा था क्योंकि यह लिटरेचर के साथ में मैं जुड़ा हुआ था एक समय तो यह ट्रांसलेशन वगैरह देख रहा था गुजराती ट्रांसलेशन इंग्लिश में से किया हुआ है स्वामी जी के लाइफ का स्वामी
माया के जगत में परफेक्शन खोजने की दो कहानियां
जी अमेरिका से वापस आए हैं बेलूर मठ में अपने कमरे में बैठे हैं और वह जो सुंदर वर्णन है यदि आप बेलूर मठ दर्शन किए होंगे स्वामी जी का कमरा देखा होगा तो आपको पता है कि फर्स्ट फर्स्ट फ्लोर पे है। गंगा के किनारे ही आप जैसे ही कमरे के बाहर में आएंगे तो बाहर में एक लंबा सा वरांडा है। वहां से आप सुंदर गंगा दर्शन कर सकते हैं। सुबह को वहां पर सूर्योदय होता है। वह भी आप दर्शन कर सकते हैं। और गंगा इतनी चौड़ी है। 2 कि.मी. के आसपास चौड़ाई है उसकी बेलूर मठ के सामने ऑलमोस्ट। तो फिर क्या है कि आपको सामने के किनारे क्या हो रहा है वो दिखाई ही नहीं देता। उसकी आपको कोई फिक्र ही नहीं है। तो यह बड़ा ही सुंदर दृश्य है। अभी यह डिस्क्रिप्शन ऐसा है कि यह सुंदर कमरे में स्वामी जी एक खाट पर बैठे हुए ध्यान मग्न हो रहे हैं। यहां तक गुजराती में लिखा है। किंतु ये ये यहां पे जैसे ही पैराग्राफ कंप्लीट हुआ मुझे एक बात का आश्चर्य हुआ क्योंकि इसका तो ओरिजिनल तो मैंने पढ़ा था। ओरिजिनल में और एक सेंटेंस है जो कि गुजराती में ट्रांसलेट नहीं हुआ है। तो आई वास वेरी सरप्राइज। फिर मैंने सोचा क्या मेरा भ्रम तो नहीं हो रहा है कि ओरिजिनल में जो चीज नहीं है उसको मैं कल्पना करके बिठा रहा हूं। तो फिर ओरिजिनल इंग्लिश खोला। वहां पे वो सेंटेंस था। किंतु यह जो अपना ह्यूमन साइकोलॉजी है वो ह्यूमन साइकोलॉजी ने उस इंग्लिश सेंटेंस को गुजराती में ट्रांसलेट नहीं किया था। वो सेंटेंस क्या था कि ऐसा लिखा है आखिरी वो जो पैराग्राफ इतना सुंदर डिस्क्रिप्शन देकर के कि स्वामी जी के जीवन का भी अस्ताचल हो रहा है। दिन भी उस दिन रात को अभी धीरे-धीरे सूरज अस्ताचल की ओर ढल रहा है। स्वामी जी ने अपना संपूर्ण मिशन समाप्त करके जीवन के आखिरी पड़ाव में आकर के बैठे हैं। हिस कंटेंट कि हां सभी गुरु भाई कार्य में लग गए हैं। पूरा वर्ल्ड वाइड रामकृष्ण मिशन कार्य करना शुरू कर दिया है। उनके जीवन की जो लक्ष्य रखा था समाप्त हो गया है। अभी वह अपने कमरे में अपने कोर्ट के ऊपर में बैठे हुए ध्यान मग्न हो गए हैं। बस अभी यहां तक गुजराती में है। फिर जो इंग्लिश में जो सेंटेंस है जो गुजराती में नहीं है। इंग्लिश में लिखा है कि बस एक ही डिस्टरबेंस है यहां पर इस समय स्वामी जी के पास में कि वह है कि गंगा में यह जो सब बोट चलती है ना नौकाएं तो अभी नई-नई ये मशीन वाली नौकाएं बननी शुरू हुई थी तो यह मशीन वाली नौका जब चलती है तो उसका जो घर करके जो शब्द होता है मशीन का वही एकमात्र डिस्टरबेंस है संध्या के समय संपूर्ण ओर चारों ओर पवित्र नीरव शांति है बेलून मठ का मंदिर फिर उसमें भी शंख घंटा वगैरह बज के आरती हो चुकी है। इस पवित्र शांति में सिर्फ एक ही डिस्टरबेंस है कि यह बोट का जो मशीन चलता है नौका का उसके अलावा और सब शांत है। तो गुजराती में जो ट्रांसलेट किया है तो यह नौका में वो मशीन है वो जो एक खलेल पहुंचाता है स्वामी जी को वो बात ही उड़ा दी है। क्यों? क्योंकि हम एक आइडियल पिक्चर अपने मन के सामने खड़ा करना चाहते हैं कि स्वामी जी के जीवन के अस्ताचल के समय ही इज परफेक्टली कंटेंट वह भी परफेक्ट है। जगत भी परफेक्ट है। बट वी ऑल नो कि यह ना ही जगत परफेक्ट है ना ही जब तक यह देह रहेगा हम लोग कभी परफेक्ट होने वाले हैं। ठाकुर की बात ही अलग है। उनके अलावा हम सबके लिए ठाकुर ने जो जिस तरह से साधना की जिस तरह से अपने को एक प्रचंड ईश्वर प्रवाह में झोंक दिया उतना हमारे से कभी नहीं होने वाला। किंतु फिर भी देखिए कि अपना माइंड किस तरह से यह आइडियलिज्म यह प्रोजेक्ट करने का प्रयास करता है। एग्जैक्टली यही चीज मां के साथ में भी मैंने देखा है। एग्जैक्टली इसी तरह का एक पैराग्राफ इसी तरह का ही उसका स्ट्रक्चर और इसी तरह से गुजराती ट्रांसलेशन में मैंने देखा कि उसमें आखिरी एक लाइन मिस कर दी है। वहां पर डिस्क्रिप्शन है कि जय राम बाटी में मां बैठी है। सब संध्या का समय है और चारों ओर पवित्र नीरव शांति मां अपने कमरे में बैठी है। वह जप कर रही है और पास में ही दूध की एक कटोरी मां ने रखी हुई है। क्यों? क्योंकि कोई त्यागी संतान आज हो सकता है कि दूसरे गांव गया है किसी कार्य के लिए तो हो सकता है कि उसको आने में देरी होगी। तो मां उसको खिलाने के लिए दूध की कटोरी को अपने पास में रख के बैठी है। तो देखिए कि कितना सुंदर कितना परफेक्ट पिक्चर। एक ओर है जगदंबा जिनका कि मन पूरे विश्व ब्रह्मांड के साथ में एकीकृत हो गया है। दूसरी ओर है जननी जिसका कि एकमात्र चिंतन है कि उनका संतान आएगा तो उनको दूध खिलाएगी। परफेक्ट पिक्चर ड्रॉ किया है। किंतु साथ में ही ओरिजिनल में जो एक लाइन है जो कि गुजराती में देखा मैंने कि उसमें नहीं थी और सिमिलरली मुझे डाउट हुआ कि मैं कहीं इमेजिन तो नहीं कर रहा ओरिजिनल वाला फिर से खोल के देखा कंफर्म किया एक लाइन में लिखा है कि बस एक ही बात है आखिरी कि मां के पास में एक लाठी है। अभी यह लाठी मां ने क्यों रखी है कि वह बीच-बीच में बिल्ली आकर के दूध में मुंह मारेंगी। तो बिल्ली को भगाने के लिए मां लाठी पकड़ करके जमीन पर पटकेगी तो बिल्ली डर के मारे भाग जाएगी। अभी जिन्होंने ट्रांसलेशन किया उन्होंने यह सोचा होगा कि यह जो परफेक्ट पिक्चर जो बनाया गया है कि जगत जननी माने जगदंबा और जननी यह दोनों का जो परफेक्शन हमने पेंट किया है अपने माइंड में उसमें एक बिल्ली को बिठा के इस परफेक्शन को क्यों हम डिस्टर्ब करें? किंतु हमेशा याद रखना है कि वह यह जगत माया के जगत में परफेक्शन होता ही नहीं है। और यदि यह परफेक्शन पेंट करने का प्रयास करेंगे ना तो हम लोग डिसअपॉइंटमेंट के अलावा हमारे मन में और कभी कुछ नहीं आएगा। मुझे लगेगा कि सब कुछ यदि मैं ठाकुर की तरह कर पाता तो मेरा साधक जीवन धन्य हो जाएगा। किंतु वह कभी नहीं होने वाला है। यदि मुझे डाउट है कि ठाकुर फिर से यदि वापस आए तो वह फिर से वही पुराने वाला जीवन जी पाएंगे। क्योंकि प्रत्येक युग में ठाकुर को नई लीला करनी है। तो इवन ठाकुर भी स्वयं खुद यदि पृथ्वी पर वापस आएंगे उनकी उस समय की भविष्य की लीला यह दक्षिणेश्वर की लीला से काफी भिन्न होगी। तो यह एक बैकग्राउंड है कि विदिन दिस बैकग्राउंड हमको पता है कि ठाकुर ने सर्वप्रथम काम किया अपने डायरेक्ट डिसाइपल को उनके उनके जो उचित एलिजिबल लेजिटमेट साधना पद्धति जिसके लिए वो एलिजिबल है उस साधन पद्धति में उनको काफी आगे बढ़ा दिया। वह फिर चाहे नरेंद्र हो ना कि मास्टर महाशय हो ना कि चुन्नी बाबू हो ना कि यह गौरी मां हो ना कि यह लक्ष्मी दीदी हो जो भी है मां शारदा देवी स्वयं जो भी ठाकुर के आसपास में रहते थे सबको ठाकुर ने सर्वप्रथम उनके आध्यात्मिक जीवन का घड़ किया है। यह सर्वप्रथम कार्य ठाकुर ने किया। दूसरा कार्य ठाकुर ने किया
ठाकुर ने कैसे अपने त्यागी शिष्यों का जीवन-गठन किया: 2) अपने शिष्यों को स्नेह-प्रेम के बंधन में बांधा
कि गुरु भाइयों के बीच में प्रेम का रिश्ता बनाना। देखिए ठाकुर ने खुद कहा है जिसका स्वभाव जिसके साथ में मैच हो जा लगता है कि यह दोनों का स्वभाव सिमिलर है तो मैं इन दोनों को मिला देता हूं। तो इससे क्या होगा कि दोनों के आध्यात्मिक जीवन की उन्नति होगी। तो देखिए कि वो शरद महाराज की फेमस कहानी है कि शरद महाराज शरद महाराज को ठाकुर ने कहा था कि तुम एक काम करना कि वहां पर जाना यह नरेंद्र है नरेंद्र बहुत अच्छा लड़का है ये बहुत अच्छे गंगाधर महाराज के सामने इस तरह से ठाकुर ने प्रशंसा की थी नरेंद्र की कि वो जा इच्छा ताई खाए 10 पान खाए किंतु तब वो वो और मनटा छे संपूर्ण पवित्र जो इच्छा वही खाता है नर नारायण किंतु फिर भी उसका मन 100% पवित्र है। ऐसा बोल के ठाकुर ने गंगाधर महाराज को अखंडानंद जी को स्वामी जी के पास में भेजा था। तो ऐसा ही कुछ कह के ठाकुर ने शरद महाराज को भी शारदानंद जी को भी स्वामी जी के पास भेजा था। नरेंद्र के पास भेजा। किंतु देखिए कि वह किस तरह का कंट्रास्ट यहां पर डिलीशियस एक स्टोरी खड़ी होती है। लीला प्रसंग पढ़ा होगा तो हम सबको पता है कि शरद महाराज ने जाकर के पहली बार नरेंद्र के साथ में मुलाकात की तो बड़े आश्चर्यचकित हो गए कि वही लड़का है जिसके बारे में मैंने इतना नेगेटिव ओपिनियन बना के रखा था। क्यों रखा था? क्योंकि एक बार हुआ ऐसा था कि शरद महाराज अपने एक मित्र को मिलने के लिए गए थे। तो वहां पर एक दूसरा लड़का बैठा हुआ था। अभी यह लड़का ऐसा लगा शरद महाराज को कि बड़ा अहंकारी है। मैं वहां पर जाकर बैठा हूं तो मेरे साथ में बात ही नहीं कर रहा है। बस अपने से कुछ ना कुछ गुनगुना रहा है। सबको नजरअंदाज कर रहा है। जैसे कि वह खुद एक बहुत बड़ा राजा हो और बाकी सब उसके चपरासी हो। इस तरह से वह सबको ट्रीट कर रहा है। यानी शब्द से नहीं वर्तन से नहीं किंतु सबको इग्नोर करके जनरली आप किसी के घर बैठे हैं अनजाने आपके मित्र के वहां पे और एक लड़का नया आता है तो आप सहज रूप से उसको पूछेंगे क्यों भाई यह मित्र जो मेरा है वो क्या तुम्हारा भी मित्र है तुम्हारा क्या नाम है क्यों आए हो वगैरह-वगैरह इट्स अ ह्यूमन क्यूरियोसिटी एंड आल्सो ए अब आप क्या कहेंगे एटीकेटी जिसको कहेंगे कि दूसरा जो व्यक्ति आता है तो उसके साथ थोड़ी सी बात करना थोड़ा सा संबंध बनाना यहां पे यह लड़का लड़का सबको इग्नोर कर रहा है। शरद महाराज को कंप्लीटली इग्नोर कर रहा है। तो शरद महाराज सोचते हैं कि होगा बड़ा घमंडी लड़का भले ही चाहे हो मुझे क्या है? अभी उस समय उनका मित्र वहां पर नहीं था। अभी जैसे ही वह मित्र कमरे में प्रवेश किया और उसने देखा कि शरद महाराज खुद बैठे हैं और वह दूसरा लड़का भी बैठा है तो उनके मित्र ने शरद महाराज को इग्नोर करके वो जो लड़का वहां पर बैठा था उसके साथ में बात करना शुरू कर दिया और जो बातें करता गया करता गया शरद महाराज कंप्लीटली वो चुपचाप साइड पर बैठे हुए थे तो ऑलरेडी उनके मन में एक बड़ी नेगेटिव इंप्रेशन पड़ गई थी इस लड़के के बारे में पहले तो मैं हम दोनों अकेले बैठे थे उस समय भी मुझे इग्नोर किया। फिर मेरा मित्र जिसको मिलने के लिए मैं आया हूं, जिसके घर में वह जब वहां पे आता है तो दोनों मिलकर मुझे इग्नोर कर रहे हैं। क्या बात है यह? तो अभी वो लड़का यदि शरद महाराज ने जाकर के नरेंद्र के साथ मुलाकात की तो पता चला वही लड़का यह नरेंद्र ही है। किंतु देखिए कि दूसरी मुलाकात पहली मुलाकात एक सांसारिक संबंध से हुई थी। उनका यह जो मित्र था वह म्यूचुअल मित्र था दोनों का तो उसकी वजह से मुलाकात हुई। दूसरी मुलाकात हुई थी ठाकुर की वजह से दोनों ठाकुर के संतान थे। ठाकुर के भक्त थे। तो वह जो मुलाकात हुई इसके बाद में शरद महाराज और नरेंद्र की जो मित्रता है इतनी गहरी होती गई इतनी गहरी होती गई वह बड़ा फेमस इंसिडेंट सबको पता है कि एक बार शरद महाराज नरेंद्र को मिलने के लिए गए फिर वह अपने घर वापस आते हैं तो नरेंद्र कहता है चलो मैं तुम्हारे घर तक तुमको छोड़ के आता हूं। फिर जैसे ही शरद महाराज के घर पहुंचे नरेंद्र आश्चर्यचकित होकर कहता है कि अरे मुझे ऐसा लग रहा है कि इस घर में मैं पहले कई बार आ चुका हूं। हालांकि पहली मुलाकात पहला विजिट था शरद महाराज के घर का। फिर भी लगता है जैसे कि यह घर मेरा कितना पुराना जाना पहचाना है। इसके प्रत्येक कमरे प्रत्येक चीजें कैसे है? कहां पे है? सब जैसे कि मुझे पता है। यह पहचान पूर्व पहचान इस घर के साथ में कैसे आ गई। तो देखिए कि जैसे यह जन्म जन्मांतर का संबंध था। स्वामी जी कहते हैं ना कि राम अवतार में हम सब बंदर थे। शिव अवतार में यह भूत थे। बस वही अभी इस बार आए हैं तो भूत की तरह वो चिल्लाते नहीं है। बंदर की तरह कुछ नहीं है। किंतु स्वभाव हमारा वही वाला है। तो यह देखिए कि इन लोगों के भीतर में एक प्रचंड प्रेम जागृत करना। एक दूसरों के लिए यह लोग मर जाएंगे। यह भाव प्रकट करना यह ठाकुर ने दूसरा बड़ा कार्य किया था। सबसे पहले तो इनको आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए पूरा प्रशिक्षण दिया। पूरा ऑन हैंड आज की लैंग्वेज में कहते हैं जिसको कि उनका जो ट्रेनिंग था आध्यात्मिक जीवन का वह सुपरवाइज किया। काफी आगे तक ले गए। नरेंद्र के केस में तो निर्विकल्प समाधि प्रत्यक्ष उनको प्राप्त करवा दी। तो यहां तक किया दूसरा कि सभी गुरु भाइयों में एक प्रेम का प्रगाढ़ संबंध बना दिया और तीसरा
ठाकुर ने कैसे अपने त्यागी शिष्यों का जीवन-गठन किया: 3) अपने शिष्यों को ह्रदय से संन्यासी बनाया
कार्य किया बड़ा ही इंपॉर्टेंट इनको हृदय से वैरागी करके गए। वही फेमस घटना कि वह बूढ़ो गोपाल भविष्य के स्वामी अद्वैतानंद उन्होंने कुछ गेरुआ वस्त्र और जपमाला कमंडलू परचेस किए थे गंगा सागर जो जा रहे हैं साधु उनको दक्षिणा में देंगे बोल के तब ठाकुर ने कहा कि अरे तुम्हारे सामने यह जो लड़के हैं इससे अलावा और ज्यादा पवित्र साधु सन्यासी कहां मिलने वाले हैं इन्हीं को दो तो फिर वह बूढ़ो गोपाल महाराज वो बड़े वह भी बड़े खुश हो गए और ठाकुर की आज्ञा से उन्होंने सब कुछ ठाकुर को दे दिया और ठाकुर ने यह सभी 11 10 लड़के थे उस समय 10 लड़कों को घेरुआ वस्त्र दिया था आई थिंक 10 ही है नंबर और यह माला दी थी जपमाला कमंडलू दिया था और फिर कहा जाता है कि एक वस्त्र गिरीश घोष के लिए रख दिया था तो जो भी है तो इस तरह से देखिए कि ठाकुर ने हृदय से तो इनको वैरागी करके गए थे किंतु भविष्य क्या फिर इन इन लोगों का ठाकुर के जाने के बाद में क्या यह लोग भी घर चले जाएंगे ये बावलेर दल ये लोग नाच लोग गाय लोग चले ग बस ये रकम ही हो जाएगा कि वो बाउल का दल आया नाच गान किया कीर्तन किया और फिर अदृश्य हो गया पीछे में जो लीला की थी वह भी जैसे कि हवा में मिल गई क्या ऐसा होगा ना कि कुछ सब्सटेंशियल इसका कुछ आउटकम होने वाला है क्या जिन लोगों को ठाकुर ने वैरागी करके गए थे जिन लोगों को ठाकुर ने यह घर से जाने का एग्जैक्टली ऐसा तो नहीं कि घर छोड़ के निकल जाओ किंतु घर या तो संसार के प्रति जो संबंध है वह तो संपूर्ण रूप से विच्छेद कर दिया था तो यह लोग अभी करेंगे क्या? और यह तो एक बात है कि चलिए कि आप इकट्ठा हो जाए। किंतु फिर आपकी नजर के सामने मॉडल क्या है? किस मॉडल के अनुसार आप अपना मोनेस्ट्री चलाएंगे? किस मॉडल के अनुसार आप लोग सब एक कम्युनिटी चलाएंगे। तो यह सब कुछ चिंतन नरेंद्र के मन में उस समय चल रहा था। उसके ही बारे में कि यह जो दो महीने देखिए कि अक्टूबर अगस्त में ठाकुर की महासमाधि हुई तो यह अगस्त से लेकर के दो महीने तक यह सब चिंतन चला था। उसके बाद में वराह नगर मठ की स्थापना हुई थी। तो यह जो दो महीनों का चिंतन है, दो महीनों का यह जो इंटेलेक्चुअल स्टम है, यह जो तूफान है, स्वामी जी के हृदय में जो बह रहा था, उसके रिलेटेड यह गंभीरानंद जी महाराज युगनायक विवेकानंद में क्या लिखते हैं? वो थोड़ा सा हम पढ़ लेते हैं। क्या लिखते हैं
ठाकुर के त्यागी शिष्यों के भविष्य पर चिंतन
महाराज? अगस्त मास शेष होवार शंगे शंगे काशीपुर रुध्यान बाटी छाड़िया देवा होलो। अगस्त मास समाप्त होने के साथ-साथ में ही काशीपुर उद्यान वाटी को छोड़ दिया गया। जे कोई जो युवक श्री माय पुरबे बांगे वृंदावन गिया छिलेन तारा छाड़ा आर शकले बाड़ी फिरिया पूर्वब पड़ा सुनाए बा अन अन्न काजे जे मन दिलन जो लड़के जो दो-तीन लड़के उसमें से योगानंद जी थे काल काली महाराज थे जो कि मां के साथ में वृंदावन गए थे उनको छोड़कर के बाकी सब घर चले आए और जो कर रहे थे पढ़ाई लिखाई ना जो कुछ भी उसमें उन्होंने मन दिया ठाकुर कोक जो के घेरवा वस्त्र दिया छिलन एवं शकल के त्यागे महिमा सुनाइया तहा दग के शंगबद्ध कर बार नरेंद्रनाथर हस्ते अर्पण करिया छिले ठाकुर ने उसमें से कुछ लोगों को कुछ लड़कों को गेरवा वस्त्र दिया था और सबको त्याग की महिमा सुना करके उनको संगबद्ध करने का भार नरेंद्रनाथ के हाथ में अर्पण किया था। किंतु ए रूप परिस्थिति ते श्री श्री ठाकुर देहो त्यागे ठीक परे से आदेश रूपायण संभावना देखा गैो ना किंतु जो परिस्थिति थी उस परिस्थिति में ठाकुर के उस आदेश का सही-सही में वास्तविक रूप में एक एप्लीकेशन उसकी कोई संभावना नहीं दिख रही थी क्योंकि इन लड़कों को पैसा कौन देगा किस तरह से इन लोगों का फाइनेंस चलेगा क्योंकि यह बात करना तो बड़ा बड़ा आसान है कि हम त्यागी वैरागी की तरह रहेंगे। किंतु जैसे मां ने कहा था वह लड़का एक दो-तीन लड़के बेलूर मठ से गए मां के पास में कहते हैं कि मां हम लोग काशी जा पैदल काशी जा रहे हैं तपस्या करेंगे तो मां ने कहा अरे ठाकुर का तो घी जो पाय शेर बाटी और माछेर मुंडो एटा तो माथुर जुगा तो देर के देवे माने ये ठाकुर के लिए खीर की कटोरी और मछली का माथा यह तो मथुर बाबू जुगाड़ करते थे तुम लोग कहां जाओगे घरघर यह भिक्षा करके के घूमोगे तो उसी भिक्षा करने में ही तुम्हारा मन रह जाएगा और तपस्या होगी नहीं इससे बेटर है बेलुरुर मठ जाओ जो ड्यूटी आपको दी जाती है सिंसियरली करो और फिर सुबह शाम ईश्वर का नाम गुण कीर्तन करना तो बोलना तो बड़ा सहज है कि चलो साथ में मिलकर के रहे एक जगह भी शायद मिल जाएगी किंतु यह जो पाए शेर बाटी और माछेर मुंडो यह कौन जुगाड़ करेगा खीर की कटोरी और मछली का माथा यह जुगाड़ कौन करने वाला है आप बड़ी ही तपस्यापूर्ण सादगी से भी यदि तो भी देखिए कि यदि 10 12 लड़के एक साथ में रहते हैं तो रहने का खाने का वो खर्चा जो होगा मेडिकल ट्रीटमेंट कभी बीमार हो गए कभी कुछ हो गया तो यह कौन जुगाड़ करेगा तो यह सब के लिए अब आईडिया तो बड़ा अच्छा लग रहा है किंतु इतना पैसा जुगाड़ करने का साहस किसी में नहीं था युवक देर संकल्पो बजोष्को देर शहानु अनुभूति पाइलो नाम जो लड़के थे उनका संकल्प था साथ में रहना वह बड़ों की सहानुभूति अर्जन न कर पाया प्रवीण ओ नवीन दे मध्य जे मतान को काशीपुर होते आरंभो कोरिया किु दिन जा चलिया छिलो एवं जहां काशीपुर व्ययाधिक्य चिता भस्म समाहितो करा प्रवृत्ति घटनावलंबने आत्म प्रकाश करते छिलो ताहा समाधान उपाय तखन युक दे आयता आयताधीन इन छिलोना काशीपुर में जिस तरह से बड़े और यह जो लड़के माने प्रवीण में खास करके यह रामबाबू और यह बच्चों में खास करके नरेंद्र इन लोगों में जो एक चल रहा था किसी ने कहा कि वहां पर जितना खर्चा हो रहा है वह तो ज्यादा खर्चा हो रहा है काशीपुर में। यह लड़के लोग दिन भर यहां पर क्यों रात पूरी यहां पर क्यों रहते हैं? ठाकुर की सेवा करनी है तो दिन को सेवा करो। रात को अपने घर जाकर के सो जाओ। खाना बनाना घर से खा के आओ। काशी काशीपुर में क्यों खाना खाते हो? यह तो पैसा आया है ठाकुर की ट्रीटमेंट के लिए। नहीं कि यह जो चंगे से सब लड़के हैं फिजिकली फिट उनके खाने के लिए पैसा आया है। तो यह सब हो रहा था झगड़ा वगैरह वाद-विवाद। उसी समय ठाकुर ने क्या कहा था नरेंद्र को कि तुम्हारे कंधे पर बिठा के मुझे जहां पर ले जाओगे मैं जाऊंगा। इन लोगों से पैसा लेने की कोई जरूरत नहीं। तो वहां तक बात आ गई थी। तो खैर भी आखिर में वह सब कुछ ठीक-ठाक हो गया। किंतु वह तो मतभेद जो है वह प्रारंभ हो गया था। आखिर में यह चिता भस्म वाला मामला रामबाबू कहते हैं मैं काकुड़गाची जाकर के इसको स्थापित करूंगा। अस्थियों को लड़ के कहते हैं कि नहीं भविष्य में एक ना एक दिन गंगा के किनारे ठाकुर का मठ बनेगा। तो वह सब ऑलरेडी जो प्रारंभ हुआ था वह फिर से यहां पर चलने लगा कि अभी ठाकुर के जाने के बाद में काशीपुर की लीज समाप्त होने के बाद में इकट्ठा यदि रहेंगे तो कौन पैसा देगा कौन यह सब चिंता करेगा प्राचीन देर ओ सहानुभूति शून्यता उल्लेख कोरिया स्वामी विवेकानंद परवर्ती काले दैट इज 1895 ख्रिस्ताब् स्वामी ब्रह्मानंद के एक पत्र लिखिया छिलेन राखाल ठाकुर देहो त्यागे पर मने आ शकले आ दे त्याग करे दिलले आते तार माने गरीब छड़ा गुलो मने कोे केवल बलराम सुरेन मास्टर आर चुनी बाबू एरा शकले विपदे आमादे बंधु अत ए ए रण हमरा कनो परिशोध करते पारबोना इस दिनों की बात याद करके स्वामी विवेकानंद ने 1895 अमेरिका से राजा महाराज को एक पत्र लिखा था उसमें में उन्होंने कहा था कि राखाल तुमको याद है कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में देहत्याग के बाद में सब लोगों ने हमको मूर्ख गरीब लड़के बोलकर के छोड़ दिया था। बस एक बलराम यह सुरेंद्र मित्र मास्टर महाशय और चुनी बाबू यह जो कुछ लोग थे जिन्होंने विपद में हमारी सहाय की थी। इसलिए इनका ऋण हम कभी भी परिशोध नहीं कर पाएंगे। ऋण कभी नहीं कर पाएंगे। तो यह स्वामी जी ने भविष्य में भी इस बात को राजा महाराज को इस तरह से बताया था। आरोप पर अमेरिका आर जीवन व्रत विषय वत्रता काले त बोलिया छिले आ दे बंधु बांधव केो विशेष केो छिलो ना एक बार भाबिया देखुन बारोटी बालक मानुष काछे बो आदर्श कथा बोलीते छे से आदर्श जीवन परिणतो करेते दृढ़ संकल्पो शकले हाशीतो हाशी हो ते क्रमे गुरुतर परिणति घटिलो रीति मतो अत्याचार आरंभ होइलो बालके कल्पनार प्रति के सहानुभूति तिखावे और इसी तरह से स्वामी जी ने भविष्य में मेरा जीवन और व्रत इस विषय में एक प्रवचन दिया था उस अमेरिका में उसमें उन्होंने कहा था कि हम लोगों का कोई सहानुभूति प्रदर्शक बंधु बांधव विशेष कोई नहीं था। अब अभी देखिए कि रामकृष्ण संघ तो उसी समय बड़ा विस्तृत था। यह विजय कृष्ण गोस्वामी हो ना कि यह मास्टर महाशय हो ना कि यह हीरानंद हो कितने ही लोग रामकृष्ण संघ के साथ मतलब ठाकुर की भावधारा के साथ में जुड़े हुए थे किंतु ये जो कुछ ये जो अल्पसंख्यक ये जो 10 12 सभी तो 16 डायरेक्ट डिसाइपल एक साथ में इकट्ठा नहीं हुए थे। विज्ञान महाराज तो काफी देर से आए। खोखा महाराज थोड़ा सा देरी से आए थे। ऐसा सब जो है तो ये जो 101 एक समय थे वो जो म सबसे नियरेस्ट ठाकुर के जिनका कि सबसे ज्यादा योगदान था काशीपुर में तो इन लोगों का इन लोगों के प्रति सहानुभूति रखने वाला ऐसा कोई नहीं था। सभी लोग तो यही कहेंगे कि ठाकुर ने ऐसा कहां कहा है कि आप लोग घर छोड़कर के साधु होकर के रहिए और वह भी ट्रेडिशनल साधु तो फिर भी ठीक है कि घर-घर जाकर भिक्षा मांग के रहता है या किसी मंदिर में रहता है इस तरह से एक संघ बनाना सबको एक साथ में रहना यह तो ठाकुर ने कभी नहीं कहा हमको तो आपको नहीं कहा ठाकुर की ये जो प्रॉब्लम एक था कि जिसको जो सुनने की आवश्यकता थी उसको वही सुनाते थे इससे ज्यादा और कुछ नहीं सुनाते थे तो बाकी सब लोगों के मन में यह भ्रम बैठ गया था कि हमको जो सुनाया है वही सही है और बाकी को जो सुनाया है एक्स्ट्रा वह उनके मन की मन की कल्पना है। तो जो भी है कि सब लोगों का बहुत कम लोगों का इनके प्रति एक सहानुभूति था। और आगे क्या कहते हैं स्वामी जी? थोड़ा सा सोच के देखिए। हम 12 लड़के थे। सबके सामने बड़े-बड़े आदर्श की बातें करते थे और उसी आदर्श के अनुसार अपना जीवन गढ़तर करने के लिए दृढ़ संकल्प थे। किंतु होता क्या था? सब लोग हंसते थे। हंसते-हंसते धीरे-धीरे करके क्या हुआ? रीति मतो अत्याचार आरंभ होइलो। लोग उनको परक्यूट करना शुरू किए। लोगों ने उनके प्रति विद्वेष भाव रखना शुरू किया। देखिए यह विद्वेष भाव की बात आज हमको आश्चर्यजनक लगती है कि इनके प्रति विद्वेष कौन रखेगा? आपकी सहानुभूति नहीं है। ठीक है? किंतु विद्वेष रखने की क्या जरूरत है? उन्होंने ठाकुर को जिस तरह से समझा है समझा है। हमारे इतिहास में इस तरह का खास करके बहुत कम हमको पाया जाता है कि साधुओं के प्रति कोई साधुओं मतलब संघ के भीतर में से ही कोई विद्वेष रखे। किंतु यह जो स्वामी जी के अपने लिटरेचर में इस तरह की घटनाओं को बहुत ज्यादा महत्व नहीं दिया गया है। हम लोग भी चाहे ना कि वही वाला कि यह जो बोट ये नौका जा रही है उसका मशीन ये जो आवाज कर रहा है तो नौका को हटा दो। इसको एयर ब्रश कर दो। फोटोशॉप में डाल करके आज वह फोटोशॉप में होता है ना कि आप फोटो है आपका उसमें से किसी को हटाना है। आप दो-तीन लोग पिकनिक पे गए हैं। वह अच्छे से मंदिर के सामने खड़े हैं। वहां पे चार लोग और साथ में आ गए फोटो के भीतर में। तो वह फोटोशॉप में डाला और बाकी चार लोगों को हटा दिया। बस जैसे कि मंदिर के सामने आप ही अकेले खड़े हैं। तो वैसे ही इसको जैसे कि यह जो इस तरह की घटना है जो कि हमारे मन को थोड़ा सा भी डिस्टर्ब करे इसको हटा दो। तो इसलिए हमारे साहित्य में यह जो स्वामी जी की यह बात सुनकर के कि हमारे पर अत्याचार प्रारंभ हुआ। लोगों ने हमको पर्जीक्यूट करना शुरू किया। तो आश्चर्य से साथ में हमको बोलना पड़ेगा कि कहां हमने तो ऐसा कुछ पढ़ा नहीं है ज्यादा। किंतु घटनाएं हैं। उसमें से एक छोटी सी घटना का उल्लेख स्वामी जी के जो छोटे भाई हैं महेंद्रनाथ दत्त उन्होंने किया है। उन्होंने लिखा है कि ये इवन सुरेश बाबू खुद जिन्होंने ये वराह नगर मठ के लिए पैसा दिया था। ठाकुर के इतने बड़े भक्त थे। उनकी इच्छा नहीं थी कि वहां पर कोई शराइन का निर्माण हो और नियमित रूप से पूजा हो। तो वह कटाक्ष करके कहा करते थे कि ज शीतला ठाकुर बोशावे और पुजुरी मतन पूजो कर पुजुरी गिरी कर यानी कि एक शीतला ठाकुर को बिठाएंगे और यह लोग पुजारीगिरी करना चाहते हैं। ऐसा वो हंसी मजाक ठट्ठा करते-करते सुरन ने कहा था। अभी इसके पीछे का अर्थ क्या है? देखिए कि यह जो धर्म को बेचने की जो बात है ना धर्म के नाम पर कुछ बेनिफिट ले लेने की बात तो ऐसा करने वाले लोगों की कमी नहीं है। एक छोटा सा शराइन बना दिया। कहीं पर रास्ते पर मंदिर बना दिया। वहां पर शीतला मां को बिठा दिया और फिर वहां पर पूजा करते रहेंगे और जो भी आसपास में आता जाता है कहेंगे लाइए आपका हाथ देखता हूं। आपके हाथ में क्या लिखा है? आपका भविष्य क्या है? तो यह हाथ देख के फिर यह क्या कहेंगे? अरे आपके भविष्य में तो इस तरह से लिखा है। आप एक काम कीजिए विधि करवाइए यहां पर मां के सामने तो आपका ठीक हो जाएगा। तो वह आदमी भी बेचारा सोचेगा अरे भविष्य में यदि दुर्घटना लिखी है छोटी सी विधि करवा के ₹105 देकर के छूट जाते हैं तो क्यों ना छूट ले तो ऐसा करके वो उससे पैसा पढ़ाएंगे। सर्वप्रियनंद जी का एक लेक्चर सुन रहा था। बड़ी सुंदर बात उन्होंने कही। एक प्रोफेसर के साथ में प्रोफेसर के बारे में वेद वेदांत के बड़े प्रकांड पंडित हैं और बड़े ही विद्वान शास्त्रों का उन्होंने अध्ययन किया है और उनके फील्ड में उनका काफी नाम है इस प्रोफेसर का। तो बहुत सारे लोग उनके साथ में यह शास्त्र चर्चा करने के लिए शास्त्र के बारे में जानने के लिए आते हैं। न्यूज़ पेपर वगैरह में आर्टिकल लिखते हैं। सभाओं में उनको बुलाया जाता है। सम्मान किया जाता है। बड़े ही जान प्रतिष्ठित व्यक्ति है अपने फील्ड के शास्त्र में। किंतु उनका साथ में एक शोक है एस्ट्रोलॉजी। ये ज्योतिष शास्त्र और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गणना करके लोगों का भविष्य बताते हैं। तो एक मुलाकात करने के लिए एक व्यक्ति गया एक गेस्ट और जाकर के उनको पूछता है बाय दिस टाइम ये जो पंडित थे उनका बड़ा उम्र हो गया है कान में सुनाई नहीं देता है ठीक से तो यह आदमी ने ये जो मुलाकाती जो था गेस्ट उसने जाकर के पूछा थोड़ा ऊंची आवाज में अच्छा पंडित जी बताइए तो आप इतना सब शास्त्र वेदांत उपनिषद की बातें करते हैं त्याग वैराग्य आत्मन का ईश्वर्य माया का अनस्तित्व वगैरह वगैरह तो आप साथ-साथ में यह ज्योतिष शास्त्र क्यों गणना करते वो पंडित जी तो बड़े सरल थे। बूढ़े हो गए थे तो तो सरलता से उत्तर दे दिया और बेहतर है टाका नहीं। माने ये शास्त्र वगैरह जो है वो चर्चा करने से उसमें टाका नहीं है। पैसा नहीं है उसमें। पैसा आपको यदि चाहिए तो ज्योतिष शास्त्र करना होगा। लोगों के हाथ की कुंडलिनी की गणना कर देनी होगी। तब पैसा मिलेगा। तो उन्होंने तो बेचारों ने बड़े सरल रूप से यह कर दिया कंफेस कि उसमें पैसा नहीं है। इसलिए वह भले ही आप चाहे जितना करते रहिए। साथ में आपको यह पुजारी गिरी थोड़ी सी करनी होगी। तो यह सुरेश मित्र भी इस तरह से ठट्ठा करके कहता है, मजाक करके कहता है ये शालारा कोबे की एक शीतला ठाकुर बसावे और एक पुजारीगिरी कर माने साले करेंगे क्या? ये शीतला ठाकुर को बिठाएंगे और पुजारीगिरी करेंगे। यानी कि बिना किसी काम के एक भंड का जीवन व्यापन करेंगे। निकम्मा एक आदमी होता है। आलसी आदमी उसकी तरह रहेंगे। ताम तामसी के रूप में और लोगों को ठग करके पैसा इकट्ठा करेंगे। तो देखिए कि यह इन इवन माने यह सुरेश मित्र जिसने खुद ने यह वराह नगर मठ के पैसे दिए थे तो उसने यह बात कही थी। तो इस तरह के कुछ-कुछ है अपने पास में एग्जांपल जो कि ये जो फोटोशॉप के बाद के ये जो एग्जांपल कुछ-कुछ हमको दिखाई देते हैं। इससे पहले और भी एग्जांपल होंगे वी डू नॉट नो। तो इसलिए यह जो स्वामी जी कहते हैं कि पहले तो लोग हमारी हंसी मजाक उड़ाते थे किंतु फिर हंसी मजाक में से धीरे-धीरे करके लोग हमारे पीछे लगना शुरू हुए। हमको परेशान करने लगे। रीति मतो अत्याचार आरंभ हो माने सही-सही में अत्याचार हमारे पे प्रारंभ हुआ। इस सेंटेंस का गुरुत्व जस्ट आप समझिए। क्योंकि अगेन यह सब घटनाएं डिस्टर्बिंग घटनाएं हम लोग साहित्य में से उड़ा देते हैं। तो कभी-कभी हमको स्वामी जी पर ही डाउट होना शुरू हो जाता है। क्या स्वामी जी अपनी जो महत्ता है उसको बढ़ा चढ़ा करके बोल रहे हैं? क्या स्वामी जी अमेरिका में लोगों की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए ऐसा कह रहे हैं कि नहीं हमारे साथ में इतना अत्याचार हुआ। फिर भी हमने इस अत्याचार को सहन करके संघ की स्थापना की तो 10 लोगों की सहानुभूति होगी तो और ज्यादा डोनेशन मिलेगा। जैसे वो एक और विदेश में यह टेंडेंसी है कि आप स्पिरिचुअल पर्सन है तो आपको अत्याचार सहन करना है। अत्याचार सहन किया है तो आप स्पिरिचुअल पर्सन है। किसी ने आकर के स्वामी जी को पूछा कि स्वामी जी यह तो कैसी बात हो गई कि बुद्ध को बेचारे को बुढ़ापे में बूढ़ी उम्र में मरना पड़ा था। बूढ़ी उम्र की वजह से मरना पड़ा था और कुछ बुद्ध को नहीं हुआ। जबकि देखिए कि हमारे जीसस को तो क्रुसिफाई किया गया। तो स्वामी जी कहते हैं कि क्रुसिफाई किया गया बोलकर के जीसस बुद्ध से महान है। ऐसा कुछ नहीं है। यहां पर आप यह देखिए कि हिंदू धर्म की उदारता कितनी है। जीसस जिस कम्युनिटी में जन्म लिए थे उसी कम्युनिटी वालों ने जीसस के विरुद्ध में जाकर के कंप्लेन की थी। जीसस को क्रुसिफाई किया गया था। यानी कि वो जिस कम्युनिटी को बिलोंग करते थे उन लोगों का हृदय बड़ा ही संकीर्ण था। यही तो जानने को मिलता है ना भगवान बुद्ध जिस कम्युनिटी में जन्म लिए थे उस हम कम्युनिटी हिंदू कम्युनिटी ने उनको सराहना ही दी है। हिंदुओं के मंदिर के सामने खड़े रहकर के भगवान बुद्ध ने हिंदू के धर्मों की निंदा की है। हिंदू के धर्मों को क्रिटिसाइज किया है और फिर भी वह बुढ़ापे की वजह से मरे हैं। नहीं कि उनको क्रुसिफाई किया गया। तो यह हिंदू धर्म की उदारता बताता है। तो जो भी है यहां पर हमको यह स्पष्ट देखने को मिलता है कि यह जो फॉरेनर्स है उनकी यह साइकोलॉजी है कि आपको यदि पर्सक्यूट किया जाता है आप पर अत्याचार होता है तभी आप तो एक धर्म के रूप में स्थापित होंगे ना। ये क्रिश्चियनिटी का हिस्ट्री तो देखिए जीसस को क्रुसिफाई किया गया। जीसस के जितने एपोस्टल है 12 के 12 को एक के बाद एक मृत्यु के घाट उतारा गया। सबका मर्डर हुआ है। और फिर इतना ही नहीं जो अर्ली क्रिश्चियंस थे एक बार पहले पहले तो उनकी संख्या कम थी। तो लोगों को लगता था अरे यह तो पागल लोगों का एक सेक्ट है। किंतु बाद में रोमन एंपायर में एक के बाद एक क्राइसिस होना प्रारंभ हुआ। तो वहां के जो रोमन एपरर है उनको एक बलि का बकरा चाहिए। एक स्केप गोट चाहिए। जिससे कि लोग उनके सर पर ना बिठा दें कि आपके मिसमनेजमेंट की वजह से गवर्नेंस में इतना प्रॉब्लम हो रहा है। तो स्केप गोट खोजते खोजते ये क्रिश्चियन लोग उनको मिल गए। तो ये बड़े पवित्र हैं, बड़े शांत है। किसी से झगड़ा नहीं करते। बड़ा आइडियल लाइफ लीड करने का प्रयास करते हैं। तो यह जो है आदमी इस तरह का ही इज़ अ मार्क्ड टारगेट इन एनी कम्युनिटी। जो आप बड़ा ही अच्छे से रहना प्रयास करेंगे तो 10 लोग आकर के आपको निंदा करेंगे ही करेंगे। दिस इज़ अ ह्यूमन नेचर। तो फिर एक के बाद एक क्रिश्चियन को पकड़ना शुरू किया जो राज्य के जितने भी प्रॉब्लम है इनके सर पर डालना शुरू किया उनको झूठमठ का उनके ऊपर में आरोप लगाया गया फिर उनको या तो फिर जलती चीता में जिंदा डाल के जलाया गया या तो फिर इस शेर के सामने फेंक करके शेर उसको खा जाता है और हजार लोग देखते हैं दर दर्शक इस सर्कस इसको बोलते थे तो एरीना वो एरीना में वो क्रिश्चियन लोगों को फेंकेंगे वहां से एक साइड से ये क्रिश्चियन लोग जाएंगे बहुत बड़ा ग्राउंड है। वह क्रिकेट स्टेडियम की तरह ही एक बहुत बड़ा ग्राउंड है और चारों ओर सब दर्शक बैठे हैं। पागल सब एक के बाद एक और यह क्रिश्चियन लोगों को छोड़ देंगे मैदान में। सामने की ओर से एक पिंजरे में से 10-15 शेरों को निकालेंगे और शेर आकर के क्रिश्चियनों का शिकार करेंगे और सब दर्शक ताली बजाएंगे। उसका आनंद लेंगे। यह थी उनकी मानसिकता उस समय की। तो यह क्रिश्चियन हिस्ट्री जिसने भी पढ़ी है, वेस्टर्न वर्ल्ड में जो कोई भी जीता है, सबको पता है कि इस तरह से खून का बलिदान देने से ही आपका धर्म हृष्टपुष्ट होगा। तो क्योंकि यह अर्ली क्रिश्चियन फादर्स ने इस तरह से सैक्रिफाइस किया बोलकर के ही तो बात-बात का क्रिश्चियनिटी पूरे जगत पर राज कर रहा है। वो स्वामी जी के समय तो वही था कि क्रिश्चियन लोगों का ही पूरी पृथ्वी पर राज था। तो यह लड़की स्वामी जी को इसी वजह से पूछती है कि माने यह कहने के पीछे का जो आशय था स्पष्ट रूप से नहीं करके अस्पष्ट रूप से कहती है कि बुद्धिज्म ने जगत पे विजय प्राप्त नहीं किया उसका कारण यही है कि बुद्ध बूढ़ी उम्र की वजह बुढ़ापे की वजह से मरे हैं नहीं कि उनको क्रुसिफाई किया गया। यदि उनको क्रुसिफाई किया जाता तो एक जो पावर उनके जो संघ में आता वह पावर से पूरी पृथ्वी पर राज करते हैं। किंतु यह बुढ़ापे की वजह से मरे हैं तो उनका संघ भी पूरे बूढ़े लोगों का संघ है। उनमें ना ही शक्ति है ना ही जगत जय करने की कैपेसिटी। तो ये उन लोगों का मानसिकता है। तो क्या इस तरह की मानसिकता वाले लोगों के साथ में स्वामी जी बात कर रहे हैं। बोल के उन्होंने थोड़ा सा बढ़ा चढ़ा करके कहा कि पहले तो लोग हमारी हंसीज़ाक करते थे। बाद में हमारे पीछे में पड़कर के हमारे पे अत्याचार प्रारंभ किया। माने यह इंसिडेंट्स जो पीछे वाले हैं वह हमको नहीं समझ में आएंगे तो हमारे मन में यह एक प्रश्न हो सकता है। किंतु वी नो इनफ खास करके ये सुरेश मित्र का जो उदाहरण है और वी नो के लोग इनके पीछे में पड़े थे। तो जो भी है बालके कल्पना प्रति वो बालकों की कल्पना है उसके प्रति सहानुभूति क्यों कौन दिखाएगा जो कल्पना के लिए उनके जो परिवारजन है उस परिवारजन को कष्ट मिल जाता है ये लोग बच्चे लोग सोचते हैं कि हम लोग
स्वामी रामकृष्णानन्द (शशी महाराज) के पिताजी के दुःख की कहानी
संघ होंगे तो परिवारजनों को तो कष्ट होगा ही होगा तो फिर बाकी गृहस्थ भक्त हैं वे लोग भी जाकर के बोलेंगे अरे अपने माता-पिता को क्यों कष्ट देते हो मास्टर महाशय की कहानी वराह नगर मठ में आए हैं देखा शशि महाराज के पिताजी प्रवेश किए गेट में से बाहर से तो शशि महाराज ने देख लिया कि पिताजी आ रहे हैं तो वो पीछे के दरवाजे से भाग खड़े हुए। अभी वो शशि महाराज के पिताजी वो आकर के इधर-उधर टहल रहे हैं। देख रहे हैं कि कहां है मेरा लड़का शशि तो शशि महाराज तो बाय द टाइम भाग गए थे। फिर उन्होंने देखा एक सज्जन जैसा एक आदमी खड़ा है यहां पे मास्टर महाशय। तो मास्टर महाशय के साथ में बात करना शुरू किया और कहते हैं कि देखो आप लोग तो बड़े सयाने हैं। आप तो बड़े चतुर हैं। यहां पे ठाकुर की बात भी सुन ली। ठाकुर के आशीर्वाद भी ले लिए और संसार भी कर रहे हैं। मैं अपने शशि को वही तो बोलता हूं ना। तुम भी संसार करो आप लोगों की तरह भले ठाकुर की बात लो मानो। भले ठाकुर के जो भी मतलब ठाकुर का ले नाम लेकर के पागलपन करना है करो किंतु घर में रह के करो। ये घर छोड़कर के क्या कर रहे हो? उसकी मां रो रही है, रो रही है। उसको कितना कष्ट हो रहा है, उसको पता नहीं चल रहा है। तो ये शशि महाराज के पिताजी नाराज होकर के बोल रहे हैं। बोल रहे हैं और मास्टर महाशय चुपचाप बेचारे खड़े हैं। वो बोल लिख रहे हैं कथामृत में कि मैं क्या उत्तर दूं इस बात का? मेरे पास इस बात का कोई उत्तर नहीं है। ठाकुर का नाम लेकर के हम लोगों में वह साहस नहीं हुआ कि घर छोड़ के आए। किंतु शशि महाराज में वह साहस हुआ है तो उनकी सराहना करने के अलावा हम और कर भी क्या सकते हैं? तो यह जो था कि सभी गृहस्थ भक्त भी कहते हैं मास्टर महाशय उनमें नहीं थे। ऑलरेडी स्वामी जी ने कह दिया कि बलराम सुरेश मास्टर महाशय उस दल के नहीं थे। वैसे तो मास्टर महाशय ने फिर उनका पक्ष लेकर के शशि महाराज को जाकर ऐसा नहीं कहा कि भाई तुम घर फिर जाओ। किंतु यह जो है कि जिस कल्पना की वजह से परिवार वर्ग को इतना कष्ट मिलता हो इस कल्पना के प्रति कौन सहानुभूति दिखाएगा? एक जो छाड़ा के हो सहानुभूति जाना लो ना एक व्यक्ति के अलावा और किसी ने सहानुभूति नहीं दिखाई और वह एक व्यक्ति कौन से एक जन श्री माता ठाकुरानी वही एक व्यक्ति श्री श्री मां शारदा देवी ताहार कथा परे बोली वो उनके बाद में उनके बारे में बाद में कहेंगे तो आज यहीं तक अभी इसके बाद में जब इसका नेक्स्ट क्लास होगा वहां से फिर से प्रारंभ करेंगे ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम
प्रश्न: आध्यात्मिकता में पूर्णता की हमारी खोज हमारे लिए परेशानी का कारण बनती है।
कृष्णपणमस्तु ये जो मास्टर महाशय पहली बार ठाकुर के पास में जाता है ना फिर एक के बाद एक ठाकुर उनका मोह भंग करते हैं के वो कि तुमने तुम्हारी पत्नी कैसी है तो के वो के अज्ञानी है तो तुम ज्ञानी हो तो एक के बाद एक मास्टर महाशय का वो जो क्या है के अहंकार भंग होता है तो मेरे साथ में भी ऐसा डिसअपॉइंटमेंट एक के बाद एक मेरे जीवन में मैं बताऊं मैं गुजराती जैन साधुओं के बारे में पता है सब पहली बार कथामृत पढ़ा था गुजराती में पढ़ा था ठाकुर को संदेश खाते देखा था फिर जैसे ही मैंने बंगाली सीख करके बंगाली पढ़ना शुरू किया बाय दैट टाइम मुझे यह तो पता चल गया था कि बेलूर मठ में साधु लोग तो खाते हैं नॉनवेज किंतु फिर मैंने सोचा कि ठाकुर तो ठाकुर है ना स्वामी जी हो सकता है खाते होंगे उनका पर्सनालिटी ऐसा ही ठाकुर तो मतलब साधक है वो तो ये जैन महावीर की तरह वो थोड़ी ना ये सब खाएंगे और फिर ये बंगाली खोल के देखना शुरू किया पता चला ठाकुर भी खाते हैं फिर फिर एक बताओ पीपीटीसी मैंने ज्वाइन किया था दैट इज के प्रथम जो जॉइनिंग होता है मेरा वो बेलूर मठ ही था तो बेलूर मठ उस समय समय शाम का वातावरण जो था गंगा का किनारा इतना सुंदर इतना शांत और इतना आनंद आता था बाप रे क्या बताऊं फिर टीसी में गया ट्रेनिंग सेंटर में अगेन सेम थिंग कि आप गंगा के किनारे सब मंदिर में प्रणाम करते हैं इतना पवित्र वातावरण तो यह सब मन में रखकर के मेरा जब बेल मठ में पोस्टिंग हुआ था सन्यास के बाद में तो मैं गया था और जाकर के मुझे वह जो झटका लगा ना सबसे पहला ही पहले ही दिन शाम को मैं गंगा के किनारे प्रणाम कर रहा था सोचा कि वही पुराने दिन वापस आ गए। संध्या आरती खत्म हुई। गंगा के किनारे एक के बाद एक मंदिर में जाकर प्रणाम करेंगे। बड़ा आनंद आएगा। बड़ा आनंद की अपेक्षा से मैं जैसे ही गंगा के किनारे आया देखा एक नया फिनोमिना स्टार्ट हुआ था उस समय। यह पार्टी बोट का। यह पार्टी बोट वहां कोलकाता से आएगी। बड़ी-बड़ी चारों ओर से झगमग लाइट होगी। जैसे वो नाइट क्लब में होती है और बड़े आवाज से वो म्यूजिक चलेगा पॉप म्यूजिक। और वे लोग आकर के बेल मठ के सामने खड़े हो जाएंगे। देखो बेल मठ। अरे राम, यह मैं यहां मां के मंदिर में प्रणाम कर रहा हूं। पीछे में वह पार्टी बोर्ड खड़ी है। आई वास सो डीपली एंग्री कुछ कर नहीं पा रहे हैं। क्या इस तरह का डिस्टरबेंस के बारे में? किंतु क्या करें? वो तो जाहिर जगह है। हमारी पर्सनल तो है नहीं गंगा कि ये सब बैन कर दे। सो दैट वाज़ रियली डिसअपॉइंटमेंट मेरे लिए। और फिर जैसे आपने कहा ना कि लोग क्या-क्या सब अपेक्षा लेकर के यहां पे आते हैं। वह एक इंटरेस्टिंग इंसिडेंट कि महापुरुष महाराज तो एक लेडी डिवोटी महापुरुष महाराज का नाम सुनकर के उनको मिलने को आई। तो महापुरुष महाराज बाय दैट टाइम प्रेसिडेंट थे। तो बेलूर मठ में आपको शायद पता होगा कि पहले जो सब अपना मोंग्स क्वार्टर तो वहीं था जो स्वामी जी का कमरा है फर्स्ट फ्लोर पे पुराना मोंग्स क्वार्टर वहीं पे सब लोग रहते थे। तो फर्स्ट फ्लोर पर जाकर के देखा महापुरुष महाराज का कमरा हमने देखा होगा वह ठाकुर का श्राइन के बगल वाला ही है तो खाट है, कुर्सी है, टेबल है, फैन है, सब कुछ है। तो वो महिला जाकर के देखती है अरे कहती है ये किस तरह के महापुरुष है? हमने तो सुना था महापुरुष पेड़ पे रहते हैं। ये तो खाट पे बैठते हैं। वो कुर्सी पे बैठते हैं। पेड़ पे कहां रहते हैं? ये माने बंगाली में महापुरुष होगा तो ये पेड़ पे रहेगा। सो देखिए कि दिस टाइप ऑफ ये ऑलवेज डिसअपॉइंटमेंट और जैसे आपने कहा वो पहली बार मुंबई मठ में गए थे। मैं पहली बार अपने मठ में आया था अपने सेंटर में वो लिमड़ी में तो रिलीफ के लिए मैं गया था 2001 तो अगेन वो सब जैन साधुओं को देखा था। मैं सोच रहा था साधु लोग रिलीफ कैसे करेंगे। यदि वह साधुओं की तरह सही-सही में रहते होंगे। तो जाकर के ही देखा एक बड़ा सा पुलिस गाड़ी पड़ा है और उस पर वह रामकृष्ण मिशन का नाम लिखा है। मैंने कहा क्या जैन साधु पैदल चलेंगे? वो मैं तो दिगंबर जैन साधुओं को पहचानता हूं। दिगंबर जैन साधु पैदल चलेंगे। वो जो जहां पे रहने को मिला रहेंगे। जो खाने को मिला खाएंगे। और ये कॉलिस में घूमते किस तरह के साधु है। फिर जाकर के ऑफिस में देखा कंप्यूटर पड़े हुए
प्रश्न: स्वामी विवेकानंद ने धर्म को रहस्य की मायाजाल से बचाया
हैं। पहले वह वाला पॉइंट खत्म कर दे। अह देखिए, अह यह यह जो है ना हमारा कि लोगों का हमारे बारे में क्या सोचना है? देखिए कि सबसे ओरिजिनल स्टोरी जो है कि कल्याणानंद जी ने वहां पे वो गरीब रोगियों की सेवा से करते थे। तो वहां के जो साधु समाज है कहते हैं साधु है। तो अभी देखिए रिसेंटली ही मैं बताता हूं। ये जो कुछ-कुछ घटनाएं हुई ना अभी पॉपुलर मतलब जो ये जो मीडिया इवेंट्स जो होती है यह मंदिर का उद्घाटन हुआ। फिर यह कुंभ मेला हुआ तो यह सब महामंडलेश्वर इन लोगों का ऐश्वर्य उन लोगों के भक्तों की संख्या उनका मीडिया में प्रेस्टीज वो सब मैं थोड़ा-थोड़ा देख रहा था वो YouTube पे फिर मुझे लगा कि देखिए कि रामकृष्ण मिशन इसमें कहीं पे नहीं है। यदि आप पॉपुलर इमेजिनेशन में देखेंगे कि साधु कौन है? संत कौन है? तो रामकृष्ण मिशन के साधुओं का प्रेसिडेंट महाराज का नाम आपको रेयरली देखने को मिलेगा। एटलीस्ट इन नॉर्थ इंडिया। तो मुझे ऐसा लगा कि यह बात बिल्कुल ठीक है। हम लोग हैं साधु। बिल्कुल एक तो गरीब रोगियों की सेवा करना अपना मिशन है। नहीं कि महामंडलेश्वर बनके करोड़पति चेले हैं। सोने की चैन पहनी है। जहां पे भी जाते हैं 10 लोग खड़े होके हमको रिस्पेक्ट देते हैं। दैट इज नॉट रामकृष्ण मिशन। दैट इज नॉट रामकृष्ण मक्स। वी आर हियर टू सर्व द सोसाइटी। चुपचाप शांति से सेवा करनी है। लोग हमको स्वीकारे ना स्वीकारे वह फर्क नहीं पड़ता है। कुछ साधु बेलूर मठ में आए थे तो मैं गुजराती हूं तो बोला कि जाओ उनको दिखाओ थोड़ा सा गाइड करो। तो मैं उनको लेकर के मंदिर में गया और फिर मैंने बात में कहा कि 4:00 बजे मंगल आरती होता है और विंटर सीजन में 4:30 को होता है। तो वे लोग जोर-जोर से हंसना शुरू कर दिए। यानी कि हमको इतना कंफर्ट चाहिए विंटर में कि आधा घंटा हमने मंगल आरती देरी से कर दी। तो अभी मैंने मुंह से तो कुछ बोला नहीं किंतु देखिए कि आपकी तपस्या किस काम की है यदि आप अपना जीवन बना करके लोगों को कुछ दे नहीं पाते। नो डाउट वे लोग बहुत कुछ देते हैं। सब कुछ है। बट ये जो छोटे-छोटे डिफरेंस है ना कि ये तपस्या फॉर द सेक ऑफ तपस्या कि अब समर सीजन में 4:00 बजे मंगल आरती है किंतु विंटर में हमने अपनी कंफर्ट के लिए 4:30 को कर दी है। क्यों आप 4:00 बजे नहीं उठ पाएंगे? ऐसा नहीं। थिंग इज दैट कि आपका जीवन का एक पवित्र जीवन जीना है और उसका एक समाज कल्याण में उसका यूज होना है। तपस्या फॉर द सेक ऑफ तपस्या ऐसा नहीं है अपना। सो दीज़ आर सम ऑफ द पॉइंट्स। और भी एक मैं बात करने वाला था। क्या था? भूल गया। एनीवे हां अभी आप प्रश्न कीजिए। क्या कर रहे थे? और एक पॉइंट इसी बारे में आपने जो कहा ना कि परफेक्शन की आशा रख के जो आता है तो वह भाग जाता है। स्वामी जी और ठाकुर के साथ में वही तो हुआ ना। माने ओरिजिनल अपनी कहानियों में यही तो सब है ना। कैंसर हुआ ठाकुर को तो ठाकुर को कैंसर हो गया। उनको अपनी खुद का कुछ नहीं कर पाए तो हमारा क्या करेंगे? ठाकुर खुद कहते हैं कि कैंसर के नो लोक बाछाई अर्जनो लोगों को फिल्टर करने के लिए। जिन लोगों ने देखा कि शरीर में कैंसर हुआ है। नहीं सके। और दूसरा स्वामी जी के साथ में वो ईटी स्टडी स्वामी वो हिमालय गया था। हिमालय के साधुओं को देख के एक प्रीकंसीव्ड नोशन लेकर के वह स्वामी जी के साथ में डिस्कस कर रहा है। देख रहा है स्वामी जी का जीवन हिमालय के साधुओं के साथ में मैच ही नहीं हो रहा है। एक-एक पाउंड का वो चिरूट में फूंकते हैं। वो मीट खाते हैं। अभी साधुओं को तो नहीं स्मोकिंग करना चाहिए। नॉन वेजिटेरियन खाना खाना चाहिए। किस तरह के साधु है? तो वो बोलकर के स्वामी जी के साथ में उसका जो झगड़ा हुआ। फिर स्वामी जी ने उसका जो लेटर लिखा रिप्लाई फेमस लेटर कि वह मुझे एक अंधेरे कमरे में तुम लोगों ने रखा था। अच्छे-अच्छे कमरे तुम लोगों ने रख लिए थे और फिर इस तरह से मेरा हेल्थ वहीं से बिगड़ना शुरू हुआ। फिर मैं जो स्मोकिंग करता हूं तो मैं अपने पैसों से करता हूं। तुम्हारे पास में से थोड़ी ले रहा हूं पैसे और तुम मुझे यह जो वेजिटेरियन खाना खिलाना खिला करके मेरे पास में से दिन में प्रतिदिन लेक्चर दिलवाते थे। यदि मैं यदि मीट नहीं खाता तो मेरा शरीर ही टूट जाता। तो देखिए कि ये ईटी स्टडी मिसमूलर ये दोनों का सेम प्रॉब्लम कि एक प्रीकंसिव नोशन बना लिया है कि साधु इस तरह से रहना चाहिए। स्वामी जी नहीं फिट हो रहे तो स्वामी जी साधु ही नहीं
प्रश्न: लोग साधुओं से कठोर तपस्या की अपेक्षा रखते हैं, लेकिन तपस्या ही पर्याप्त नहीं है।
है। ये ये जो आपने कहा ना बस की बात कही ना स्टार्टिंग में मुझे याद आया कि मैं एक बार वो राजकोट से अहमदाबाद जा रहा था। वो प्रेस के काम के लिए बीच-बीच में आना पड़ता था। तो इस तरह से वो कोच में आना जाना करना पड़ता था। तो एक बार मैं बैठा था। मुझे कैड चॉकलेट अच्छा लगता है। तो एक कैडबरी परचेस किया। फिर कोच में आकर के बैठ गया और खा रहा हूं। तो दो-ती मिनट के बाद में देखा सब लोग आसपास के जितने भी मेरे सामने देख रहे हैं। अरे साधु का कपड़ा पहना है कैडबरी खा रहा है सबके सामने वो खुद हजार कैडबरी खाएंगे। हम लोग खाएंगे तो देखेंगे। तो तमाल महाराज अच्छा कहते थे कि लोगों की दृष्टि से देखेंगे तो साधुओं को ना ही वो पेशाब करने के लिए जाना है ना ही वो शौच करने के लिए जाना है। कुछ नहीं करना है। एकदम पत्थर की तरह बैठे रहना है। ये है आइडियल साधु। इसके कारण भी है। इसके कारण भी है। मतलब स्कैंडल इतने हुए हैं। देखिए आए दिन न्यूज़पेपर में आप पढ़ेंगे। ये साधु ने ये स्कैंडल कर दिया। इस साधु ने वो स्कैंडल कर दिया तो लगता है कि यह माइक्रो जो डिफेक्ट है वो माइक्रो डिफेक्ट कब मैक डिफेक्ट में परिणत हो जाएगा वी डू नॉट नो। सो देखिए सन्यास जीवन कभी भी इजी नहीं रहेगा। किसी के लिए भी नहीं रहेगा। जो सन्यास ग्रहण करता है उसके लिए भी नहीं है। सन्यासी जिनके साथ में रहते हैं वो समाज के लिए भी नहीं है। दैट्स वी कैन नॉट डू एनीथिंग।
प्रश्न: ध्यान करते समय डिस्टर्बन्स होने से क्या करे?
देखिए इसका सिंपल आंसर यही है कि साधना को करते जाना है। इरिस्पेक्टिव के क्या होता है? जैसे मैंने पहले भी एक दो बार ये उदाहरण दिया था। बेल मठ में मैं ज्वाइन करने को गया था। तो नियम ऐसा है कि आपको आरती के बाद में एक घंटा पक्का बैठना है और वहां पर हमारा एक मॉनिटर रहेगा। हमारे पीछे में बैठेगा। वो मॉनिटर करेगा कि जो एक घंटे से पहले यदि खड़ा होकर के चला गया। एक दो बार ऐसा हुआ तो सुहिता जी हमारे इंचार्ज थे। जाकर सीधा उनको कंप्लेन करेगा। सुतानंद जी हमको बुला के कहेंगे जाओ तुम घर चले जाओ तुमको यहां पे रहने की जरूरत नहीं है तो वो डर के मारे एटलीस्ट वो सब एक घंटे बैठते थे अभी दिमाग में हजार चीजें चल रही है वो कमर में पेन हो रहा है पैर में पेन हो रहा है 10 चीजें दिमाग पूरा चारों हजार दिशा में जा रहा है उस समय मन में ऐसा होता है ये रेजीमेंटेशन किस काम का है वहां पे जाकर के कुछ पढ़ाई लिखाई करते हैं तो इट विल बी इवन मोर यूज़फुल टू अस आई मीन स्पिरिचुअली इट विल बी मोर बेनिफिशियल टू अस किंतु ऐसा नहीं कि आपको एक घंटा बैठना है तो बैठना ही है। रेजीमेंटेशन कहो ना कि आप कोई यह डिसिप्लिन कहो व्हाटएवर छोड़ना नहीं है। तो वो जो एक ट्रेनिंग हमारा शुरू में हुआ तो अभी देखिए कि अभी ये सब ट्रेनिंग बड़ा काम में लगता है। अभी अभी तो उम्र हुई है तो यह सब प्रॉब्लम तो फिजिकल प्रॉब्लम डिस्ट्रैक्शन ड्यूटी है इतना तो ये हजार चीजें तो और भी ज्यादा मैग्नीिफाई हो के आएगी। किंतु वो जो शुरू में तो मन में घुसा दिया है ना एक घंटा नहीं बैठ पाओगे तो घर चले जाओ साधु होने की जरूरत नहीं है। सो वो डिसिप्लिन बहुत बार हमको यह बिना किसी इच्छा के भी बिठा करके रखता है। तो एक बार आपको यह डिसिप्लिन तो बनाना पड़ेगा। आपने ठीक किया कि आधा घंटा मुझे जप करना है। तो भले ना चाहे दिमाग हजार दिशा में जाए। भले ना चाहे मोबाइल रिंग हो, भले चाहे कमरे में कोई आकर के डिस्टरबेंस खड़ा करें। भले चाहे बाहर में वो जो कुछ चल रहा है वो डीजे वगैरह तो वहां पे मैं गया था पोरबंदर रात को देखा कि वो सामने एक नाइट क्लब है वहां पर डीजे चालू हो जाता है तो हमारी यग्नेश महाराज वो एकदम मोबाइल हाथ में लेकर के रेडी होकर के रहेंगे वो 10:00 बजे ना कि ऐसा है ना कि फिर वो नॉइस पोल्यूशन नहीं होना चाहिए तो एग्जैक्ट जैसा वो 10:00 बजे का कि जो भी वो टाइम है वो फोन करेंगे वो क्लब वालों को कि आप बंद करो आपका टाइम हो गया है आप नहीं बंद करो मैं पुलिस में कंप्लेंट करता हूं तो फिर थोड़ी देर के बाद में वो बंद हो जाएगा अभी अभी मैं गया था पोरबंदर ये सोच के बड़ी सुंदर जगह है। शांति से जब ध्यान करेंगे किंतु वो डीजे चालू हो जाता है। सो थिंग इज दैट कि नो मैटर व्हाट कि आपका माइंड हजार दिशा में जाए। आपने यदि एक बार ठीक किया पहले तो यह नियम बनाना होगा। आधा घंटा पौना घंटा एक घंटा एस पर आवर कैपेसिटी कि हमको बैठना ही बैठना है और एक बार नियम बनाने के बाद में हजार डिस्ट्रैक्शन यदि आ भी जाए तो फिर ये क्वालिटी की चिंता नहीं करनी है कि ये डिस्ट्रैक्शन आया तो मेरा मन भंग हो गया तो मैं और कुछ करता हूं। बेटर क्वालिटी वाला काम करता हूं। नो एट दैट टाइम डोंट लुक एट द क्वालिटी कि भले ही चाहे क्वालिटी इतनी मतलब मैं और कुछ काम करता तो मेरा माइंड बेटर रहता। बेटर एकाग्र रहता इसकी बजाय कि मैं जप कर रहा हूं। सो दैट क्वेश्चन फिर हमको भूल करके एनी हाउ आधा घंटा कंप्लीट करना है। सो दिस एक बार पड़ जाएगा ना रूटीन जीवन में तो धीरे-धीरे देखेंगे कि अपना फिजिकल जिस तरह से डिसिप्लिन बनाया है तो मेंटल डिसिप्लिन भी बनता जाएगा और ये सब चीजों को इग्नोर करना सीख लेंगे या तो फिर डील करना सीख लेंगे। ऐसा सब समय तो होगा नहीं कि वो मोबाइल की रिंग बज रही है तो उसके ऊपर मैं ध्यान करूं। जैसा स्वामी जी ने किया था वो विसल के ऊपर में। इट्स नॉट गोइंग टू बी पॉसिबल। सो दीज़ आर सम अदर सॉलशंस। म क्वालिटी की चिंता नहीं करनी है शुरू में। पहले क्वांटिटी की देख लेना है। फिर जैसे क्वांटिटी आप उसके ऊपर में हाथ बैठ गया तो फिर क्वालिटी धीरे-धीरे करके आ जाएगी। क्योंकि हम हम लोगों का देखिए बहुत बार ऐसा होता है ना आजकल के युग में कि ये रेजीमेंटेशन ठीक नहीं है। जोर जबरदस्ती बच्चों के पास में से कुछ नहीं करवाना है। आजकल गुजरात में तो था मैंने सुना था एग्जामिनेशन कंडक्ट नहीं करते या तो फिर कंडक्ट करते हैं तो सबको पास कर देते हैं। इरिस्पेक्टिव कि क्या परसेंटेज आया है। यह सब डेंजरस टाइप का थिंकिंग है। किसी काम का लिबरल टाइप का थिंकिंग कि बच्चों पे प्रेशर नहीं डालना है। बच्चों पे टेंशन नहीं डालना है। अरे भाई टेंशन नहीं डालेंगे प्रेशर। आप स्कूल में उसको यूज्ड टू नहीं करवाएंगे, डीएल करना नहीं सिखाएंगे तो जब नौकरी करने के लिए जाएंगे तो क्या करेंगे? राइट? तो ये रेजीमेंटेशन नहीं होना चाहिए, डिसिप्लिन नहीं होना चाहिए। ये सब लिबरल आइडियाज हैं जो कि सही मायने में देखें तो किसी काम के नहीं है। हमारे लिए यदि आध्यात्मिक जीवन बनाना है। पहले रेजीमेंटेशन करके आधा घंटा, पौना घंटा, एक घंटा बैठना कैसे भी करके सीख लेना है। भले ही मन चाहे कितना ही डिस्ट्रैक्ट हो। सो वह एक बार सिद्ध हस्त हो जाना है। बाद में धीरे-धीरे करके होता जाएगा। बाकी सब कुछ।