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आध्यात्मिक यात्रा || Milestones on our Spiritual Journey || 21 Jul 2025

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ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः आज एक टॉपिक पर डिस्कस करते हैं थोड़ा सा वैसे तो इस सप्ताह कथामृत स्टार्ट हो रहा है किंतु जैसे कभी-कभी हम किसी स्पेशल टॉपिक को ले डिस्कशन करते हैं। कभी-कभी मैं किसी टॉपिक के बारे में सोचता हूं कि अच्छा यह किस तरह से है क्या है और फिर कभी कोई कंक्लूजन उस टॉपिक में मिलता है तो उस पे हम बात करते हैं। तो यहां पे भी अ एक ऐसा क्वेश्चन जो कि मेरे माइंड में काफी लंबे समय से वो घूम रहा था। अ बहुत शुरू में जबकि मैं ऐसा सोचा था कि मुझे करियर नहीं बनानी यानी जनरली जिस तरह से सब लोग जीते हैं उस तरह से नहीं जीना कुछ और करना है। उस समय मेरे माइंड में यह क्वेश्चन था कि सबसे पहले तो कि यह पॉवर्टी क्या है? क्योंकि नजरों के सामने जब दूसरों का दुख देखता था तो फिर मैं सोचता था कि इसका कुछ तो कुछ सॉल्यूशन होना ही चाहिए। यदि भगवान ने मुझे एक फॉर्चूनेट आई आई आई एम आई कंसीडर मयसेल्फ टू बी वेरी फॉरर्चूनेट इन द सेंस कि एक लविंग फैमिली में पेरेंट्स के पास में मेरा जन्म हुआ था और मेरे जितने भी रिलेटिव्स थे उनसे उनके पास में से काफी प्रेम मिला काफी हेल्प मिला काफी केयर मिला और काफी अपने जीवन को आगे बढ़ाने के लिए अपना चरित्र घटतर करने के लिए काफी मुझे मार्गदर्शन मिला गाइडेंस मिला तो तो फिर मैं जितना फॉर्चूनेट था हूं तो इतने फॉर्चूनेट दूसरे लोग क्यों नहीं है? तो यह एक सबसे पहला क्वेश्चन जिसको कि एक अवेकनिंग कहते हैं ना छोटे होते हैं तो क्या है स्कूल में जाते हैं घर में रहते हैं तो खेलते हैं भाइयों के साथ में और फिर या तो मित्रों के साथ में घूमने के लिए जाते हैं कहीं मां-पिताजी के साथ में तो वो एक लाइफ रहता है किंतु पहली बार जब अपना एक सर्टेन एज एज तक हम पहुंच जाते हैं 13 14 जिसको कि जनरली टीनएज इयर्स कहते हैं तो क्या है कि अपना एक हायर हायर कॉन्शियसनेस अवेक होता है। एक अपना एक हायर थिंकिंग वह अपने मन में जन्म लेता है। तो इस तरह से जब हायर थिंकिंग मेरे मन में सबसे पहली बार ये सब चल चलना शुरू हुआ कि सबसे पहला क्वेश्चन था मेरे मन में कि यह क्यों लोग गरीब है? लोग दुखी क्यों हैं? उनके पास में इक्वल अपॉर्चुनिटी जो कि मुझे मिली वो उनके पास में क्यों नहीं है? वहां से यह जो मेरा इंक्वायरी या तो फिर मेरा एक क्यूरियोसिटी प्रारंभ हुआ तो मैं उसके बाद में मैंने इन लोगों को सहाय करने का भी यथाशक्ति प्रयास किया जो लोग गरीब है किंतु साथ-साथ में इसका एक जो थ्योरेटिकल एस्पेक्ट है उसके बारे में भी मैं सोचता गया। बात सिर्फ यह नहीं है कि मैं उनको यथासंभव सहाय करूं क्योंकि मेरी सहाय करने की कैपेसिटी बड़ी ही लिमिटेड है। ज्यादा से ज्यादा मैं इन लोगों के लिए क्या कर सकता हूं? जब मैं अपने घर में था तो उनके वहां पर जाकर के झोपड़पट्टी में जाकर के 101 लड़कों को पढ़ा दिया करता था। जब मैं रांची में था तो वह दिव्यान से जो प्रोजेक्ट चलते थे वह गांव में जाकर के इसको इंप्लीमेंट करता था। किंतु एक एज एन इंडिविजुअल मेरा जो देने का सहाय करने का कैपेसिटी है वह हमेशा लिमिटेड रहेगा। ऑन दी अदर हैंड सामने यह जो चैलेंज है चैलेंज ऑफ पॉवर्टी चैलेंज ऑफ सफरिंग चैलेंज ऑफ सोरो वो इतना बड़ा है कि मेरे जैसे शायद हजार 1 लाख लोग भी आ जाएंगे इस तरह से हेल्प करने के लिए तो वह हम लोग कम पड़ जाएंगे। तो फिर मैंने साथ-साथ में ही एक इंटेलेक्चुअल एक थ्योरेटिकल एस्पेक्ट को भी डेवलप करना शुरू किया अपने माइंड में कि व्हाट इज द रूट रीजन ऑफ पॉवर्टी रेदर देन अब जैसे कि एक अच्छे डॉक्टर के पास में जाएंगे तो वो आपके सिम्टम्स जो है उसको वो सप्रेस करने का दवाई लिख देगा एक जनरल डॉक्टर के पास में जाएंगे कहेंगे बुखार हो रहा है तो वह बुखार वो एक एंटीबायोटिक ने ऐसा कुछ दे के आपको वह छोड़ देगा किंतु एक अच्छे डॉक्टर के पास जाएंगे स्पेशलिस्ट के पास जाएंगे तो आपके पास में 100 तरह के टेस्ट करवाएगा और फिर खोज निकालेगा। यह जो बुखार हो रहा है उसके पीछे में बेसिक डिजीज क्या है? वो डेंगू है ना कि चिकनगुनिया है ना कि मलेरिया है ना कि यह कोरोना यह कोविड है। क्या है इसके पीछे में? तो वह खोज करके फिर उसके जो पार्टिकुलर डिसीज की पार्टिकुलर दवाई देगा जिसकी वजह से यह डिसीज अपनी जड़ से निकल जाए। वैसे ही पॉवर्टी है तो पॉवर्टी को हटाने के लिए आपको कुछ करना होगा जो कि करना उचित है। किंतु फिर व्हाट इज द रूट कॉज ऑफ पॉवर्टी? वो जब मैंने सोचना शुरू किया तो एक दूसरा टॉपिक मेरे हाथ में आया। इसी का एक हायर वर्जन कि पॉवर्टी क्यों है? इसी टॉपिक का एक हायर वर्जन है कि व्हाट इज द रीजन बिहाइंड दी राइज एंड फॉल ऑफ द सिविलाइजेशन? क्योंकि हमको कुछ गरीब लोगों को ही नहीं देखना है। हमको तो पूरी एक सिविलाइजेशन को देखना होगा। अपनी भारतीय सिविलाइजेशन एक समय था कि हमारा सुवर्ण युग था। गोल्डन एज था। सतयुग के बारे में काफी कहानियां हमने पढ़ी है। किस तरह से ऋषि मुनियों की तपस्या थी। किस तरह से स्त्रियों का चरित्र था। किस तरह से क्षत्रियों का शौर्यवीर्य था। किस तरह से ब्राह्मणों का तेज था। किस तरह से देवताओं के आशीर्वाद थे। किस तरह से यह हमारी भूमि सब समय यह हरे खेतों से भरी रहती थी। तो यह सब हमने सुना है। उसके बाद में पता नहीं क्या हमारे साथ में हुआ। नसीब फूटा ना कि क्या हुआ। हम इस तरह से एक नोच डाइव लगाया हमने। इस तरह से हमारा सिविलाइजेशन क्रैश हुआ। वो आजकल वो प्लेन जैसे क्रैश होते हैं उस तरह से कि सब कुछ जैसे कि तहसनहस हो गया। और अभी भी हम वह जो एक गिरे हमारा क्रैश जो हुआ है उसमें से अभी तक हम अपने को रिकवर नहीं कर पाए हैं। मुश्किल से अभी हम बेबी स्टेप्स ले रहे हैं अपने को रिकवर करने के लिए। तो यदि आपको थ्योरेटिकल एक अंडरस्टैंडिंग चाहिए तो सबसे बड़ा प्रश्न आएगा कि हम हमारा राइज हुआ कैसे? क्योंकि हमको तो पता है इवोल्यूशन और यह ह्यूमैनिटीज हमको सिखाता है। हिस्ट्री हमको सिखाता है कि हमारा हम लोग जो थे कि वो जंगल में रहते थे। हंटर गैदरर थे। ट्राइब्स में रहते थे। ट्राइब्स बना के रहते थे। फिर वहां से इवॉल्व होकर के यह जो अपने वो जो फार्म लैंड्स विलेजेस डेवलप किए और फिर सेटलर्स फज़ स्टार्ट हुआ। फिर वहां से सिटी स्टेट्स बने और फिर वहां से यह जनपद बने और फिर वहां से यह बड़े-बड़े राष्ट्र बने। तो ऐसा तो नहीं है कि एक इतिहास के प्रारंभ से ही सतयुग था। वही वो ट्राइबल लेवल से डेवलप होकर के यह एग्रीकल्चर सेटलमेंट से डेवलप हो के फिर हमारा वो गोल्डन एज प्रारंभ हुआ था। तो भारत में ही वह क्यों हुआ? अपने आसपास में देखते हैं यह अफगानिस्तान ये पाकिस्तान यह सब उनका यदि उस जगह का अभी यह देश तो अभी नए-नए हैं किंतु उस जगह का इतिहास देखेंगे तो आपको ऐसा नहीं लगेगा कि वहां पर उस तरह का कोई गोल्डन एज था। तो यह जो अपना यह जो गंजेटिक वैली सिविलाइजेशन है यह गंजेटिक वैली सिविलाइजेशन में ही यह गोल्डन एज और वहां से ही यह वेद और उपनिषद और यह वेदांत यह सब जो प्रारंभ हुआ। तो व्हाट इज द रीजन बिहाइंड द राइज ऑफ इंडियन सिविलाइजेशन? फर्स्ट ऑफ ऑल वैदिक सिविलाइजेशन की उन्नति के पीछे क्या रहस्य था? और वैदिक सिविलाइजेशन का जब पतन हुआ तब उसके पीछे का क्या रीजन था? तो वह हो गया एक हायर फॉर्मुलेशन ऑफ दिस क्वेश्चन कि व्हाई देयर इज अ पॉवर्टी? और फिर यही क्वेश्चन को आप और ज्यादा डिटेल में आप स्टडी करते जाएंगे कि रीजन बिहाइंड द राइज एंड फॉल ऑफ द सिविलाइजेशन। तो मेरे पास में दो इंटेलेक्चुअल्स मुझे स्टडी करने का सौभाग्य मिला। एक तो है कि आर्नोल्ड टोयन भी इसके बारे में हमने पहले भी एक बार डिस्कस किया था हिस्ट्री को लेकर के वो हिस्ट्री को सिविलाइजेशंस में बांट देता है ह्यूमन हिस्ट्रीज को कहता है कि जब यूनिट ऑफ हिस्ट्री इज नॉट एन इंडिविजुअल इफ यू रियली वांट टू अंडरस्टैंड हिस्ट्री यू विल हैव टू अंडरस्टैंड अह सिविलाइजेशन नॉट इवन ए नेशन नॉट इवन अ सोसाइटी नॉट इवन जस्ट कल्चर और इंडिविजुअल बट सिविलाइजेशन एज ए होल आपको स्टडी करना होगा। सिविलाइजेशन क्या है? वह एक डेफिनेशन देता है। इसको डिफाइन करता है और फिर अपनी हिस्ट्री में रिसेंट हिस्ट्री में कितनी-कितनी सिविलाइजेशन माने रिटन हिस्ट्री जब से प्रारंभ हुई तब से कितनी सिविलाइजेशन हुई है और प्रत्येक सिविलाइजेशन के साथ में क्या हुआ। यह काफी सीरियस स्टडी करने के बाद में उसने यह स्टडी ऑफ हिस्ट्री बोल के जो सीरीज ऑफ बुक्स लिखी उसका कंक्लूजन इज वेरी सरप्राइजिंग। देखिए मुझे ठाकुर की इच्छा कहो ना कि कुछ भी कहो। मैं जैसे ही यह इसका कंक्लूजन पढ़ा था। यह कंक्लूजन आर्नोल्ड टोयनबी का आता है कि रिलीजन इज द की फॉर द सर्वाइवल ऑफ द सिविलाइजेशन। जहां से धर्म का प्रारंभ होता है तभी ये अच्छा सिविलाइजेशन वैसे राइज तो होती है चैलेंज को फेस करके और सक्सेसफुली फेस करके किंतु सिविलाइजेशन ग्रेटनेस तक पहुंचती है लंबे समय तक टिके रहती है धर्म के आधार पे तो यह कंक्लूजन जिस समय में पढ़ रहा था देखिए कि नेचुरली अपने मन में एक दूसरा क्वेश्चन आएगा देन व्हाट इज रिलीजन तो अभी यह प्रश्न उसके बारे में मैं सोचूं उसके बारे में मैं कोई दूसरी किताबें पढूं। हालांकि धर्म के बारे में कुछ-कुछ पढ़ना मैंने शुरू कर दिया था। किंतु फिर भी एक सीरियस स्टडी प्रारंभ करूं। उस समय ही मेरे हाथ में स्वामी जी का यह लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा किताब आ गया। यह विधि का विधान कैसा है? जिस समय यह सीरियस क्वेश्चन मेरे मन में प्रारंभ हुआ कि व्हाट इज रिलीजन? उसी समय यह स्वामी जी का लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा मेरे हाथ में आया। देखिए कि आप क्योंकि मैंने उसी समय आर्नोल्ड टोयनबी को पढ़ा था। स्वामी जी को पढ़ने के समय मुझे ऐसा लग रहा था कि स्वामी जी जैसे कि यह टोयनबी के ही विचार को जहां पर उसने छोड़ा वहां से ही प्रारंभ करके उसके लॉजिकल कंक्लूजन तक ले जाते हैं। हालांकि स्वामी जी का महासमाधि हुआ 1902 में और टोयनबी जो था उसने सीरियसली लिखना शुरू किया ये सेकंड वर्ल्ड वॉर के आसपास में 1930 के आसपास में शायद इफ आई रिमेंबर करेक्टली तो स्वामी जी का निश्चय टोयनबी के पहले ही आए हुए थे। किंतु ऐसा होता है ना कि जो ग्रेट क्वेश्चन होते हैं उसके बारे में आप सीरियसली सोचते हैं। कोई ग्रेट मनुष्य तो यह ग्रेट लोगों का थिंकिंग एक ही डायरेक्शन में जाता है। तो यहां पे भी ऐसा लग रहा है कि हालांकि भले ही टोयन बी ने स्वामी जी के आने के बाद में यह सब कुछ सोचा होगा। उसके कंक्लूजन है। वहां से मुझे ऐसा लग रहा था कि स्वामी जी ने वहां से टेक ओवर कर लिया है और फिर रिलीजन क्या है? उसकी डिटेल में गए हैं। जब स्वामी जी को पढ़ा पहले तो धर्म के बारे में अपनी किस तरह की सब अवधारणाएं होती है। मैं कोई पर्टिकुलरली रिलीजियस पर्सन था नहीं और मंदिर वगैरह में जाना और साधुओं के ऊपर में भगवान पर विश्वास करना यह सब मेरे में ऑलमोस्ट बिल्कुल नहीं था। तो वहां से प्रारंभ करके रिलीजन को यदि समझना है तो जनरली लोगों के मन में क्या होता है कि मंदिर में जाना भगवान की पूजा करना यही तो सब रिलीजन है। यही तो सब धर्म है। हां आपकी ड्यूटीज होगी। आपको मोरल और एथिकल होना है। निश्चय एथिक्स और मोरालिटी, नैतिकता या तो फिर यह वैल्यूस ये सब धर्म के इंपॉर्टेंट फैक्टर्स अवश्य हैं। किंतु यह फैक्टर होने से भी धर्म इस तरह से लग रहा है कि हमारे ऊपर में एक बाहर से डिसिप्लिन बिठा दिया गया है और यह डिसिप्लिन जैसे कि हमको पूरे जीवन भर पालन करना है। भले ही चाहे हमको यह ना पसंद हो किंतु सोसाइटी में रहते हैं तो धर्म का पालन करना पड़ेगा। जैसे कि जोर जबरदस्ती करके करते हैं। अब जैसे कि ये दो बच्चे होते हैं। अब स्कूल में ही देखिए एक क्लास है। क्लास में मान लीजिए कि 20 बच्चे पढ़ रहे हैं। उसमें से पांच बच्चे ऐसे होंगे जिनको कि स्टडी करना उनको उनके अच्छा लगता है। या तो वो स्टूडियोस है। वे लोग इंटेलिजेंट इतने हैं कि अपने स्टडी में आगे अच्छे से बढ़ जाएंगे। किंतु बाकी 15 बच्चों को आप देखेंगे कि स्टडी करना अच्छा भी नहीं लगता और ना ही उनको यह स्टडी करना उनका इंटेलेक्चुअल कैपेसिटी है कि वो कुछ ज्यादा समझ पाए। मैथमेटिक्स यदि टीचर समझाते हैं तो पांच बच्चे समझ लेंगे बाकी 15 नहीं समझेंगे। तो बाकी 15 को किस तरह से आपको मैथमेटिक्स सीखना है? क्योंकि मां-बाप स्कूल में भेज रहे हैं, धमक दे रहे हैं। कह रहे हैं कि तुम यदि बड़े होगे और यदि तुम स्टडी नहीं करोगे, तुमको मजदूर का काम करना पड़ेगा। खेत में जाकर के काम करना पड़ेगा। यहां कंस्ट्रक्शन साइट पर लेबर का काम करना पड़ेगा। और यदि पैसे ज्यादा चाहिए तो क्रिमिनल बनना पड़ेगा। कोई लेजिटमेट रास्ते से, कोई अच्छे रास्ते से तुम्हारे पास में पैसा नहीं आएगा। ऐसा सब कह के कह के धमकाते हैं। बोल के यह बच्चा स्टडी करने के लिए जाता है। तो धर्म भी क्या ऐसा कुछ है कि हमको धमकाया जाता है कि यदि हम लोग धर्म का पालन नहीं करेंगे तो यह समाज पूरा बेर बिखेर हो जाएगा। क्रिमिनालिटी जो क्रिमिनल है जिन लोगों की नेगेटिव टेंडेंसी है उनके ऊपर में कंट्रोल करने वाला कोई नहीं रहेगा। देखिए कि आप पुलिस को बिठा सकते हैं। किंतु ज्यादातर जो वायलेंस होता है उसको आजकल कहते हैं डोमेस्टिक वायलेंस। स्त्रियों के ऊपर में जो अत्याचार होते हैं 70 टू 80% अत्याचार या तो वायलेंस घर में ही होता है और उनके जो रिलेटिव्स हैं, हस्बैंड है या तो फिर दूसरे कोई है वही लोग उनके ऊपर में सबसे ज्यादा अत्याचार करते हैं। तो फिर प्रश्न होगा कि यह हस्बैंड है या दूसरे रिलेटिव्स हैं। वे लोग धार्मिक नहीं होंगे तो यह स्त्रियों पर अत्याचार करेंगे। तो बेटर है कि धार्मिक हो क्योंकि यह डोमेस्टिक वायलेंस के मुश्किल से 10% केसेस पुलिस में जाकर के रजिस्टर होते हैं और मुश्किल से उसमें से 1% केस पे काम होता है। क्योंकि इतना सारा वायलेंस नहीं पुलिस कुछ इसके बारे में कर सकता है ना ही कोर्ट इसके बारे में कुछ कर सकता है। तो ज्यादातर जो क्राइम होते हैं उसमें से मुश्किल से 10 टू 15% पर्जीक्यूट होते हैं। उसमें से 10 टू 15% जो क्रिमिनल होते हैं या तो वायलेटर्स होते हैं उनको पनिशमेंट होता है। बाकी सब वैसे ही निकल जाते हैं वो क्योंकि ये लॉ एंड ऑर्डर इतना स्ट्रांग है ही नहीं। कहीं पे कोई भी सोसाइटी में नहीं हो सकता। तो फिर क्या है कि यदि लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखना होगा तो आपको धर्म का पालन करना होगा। तो अभी आप यू आर ए गुड बॉय तो फिर आप धर्म का पालन करेंगे कि हां यह मेरा धर्म है कि यह मेरे मेरा ड्यूटी है कि मैं धर्म का पालन करूं। यदि मैं अपना ड्यूटी ठीक-ठीक निभाऊंगा तो समाज ठीक से चलेगा। यदि मैं अपना ड्यूटी ठीक से नहीं निभाऊंगा तो समाज टूट जाएगा। यह सोच करके एक लॉजिकल थिंकिंग बिठा करके हम लोग धर्म का पालन करने को जाते हैं। तो यह धर्म के बारे में यह एक थिंकिंग हमको मिलता है। दूसरा एक थिंकिंग होता है कि देखिए भगवान है और फिर हमारे जीवन में जितने भी कष्ट आते हैं वह कष्टों का समाधान यदि भगवान नहीं निकालेंगे तो और कहां से आने वाला है? यदि मैं सीरियसली बीमार हो गया तो डॉक्टर तो हो सकता है जितना हो उतना करें। किंतु उसके बाद में क्या डॉक्टर लोग आप कोई भी हॉस्पिटल में जाइए आप कोई भी डॉक्टर ऐसा क्लेम नहीं करेगा कि वह कहेगा कि सीरियस रोगों को मिटाने का 100% कैपेसिटी उसमें है वो दवाई दे देगा मिटेगा तो मिटेगा और होगा तो होगा वरना तो फिर गए सीधे अपने वो वैुंठ लोक तो यानी कि मृत्यु अवश्यभावी है बहुत सारे केसेस में कोई मृत्यु को स्टॉप नहीं कर सकता है अभी अपना मृत्यु हो गया तो तो भी फिर भी ठीक है किंतु तो अपने जो प्रियजन है, परिवारजन है उनका मृत्यु होता है तो और भी बड़ा कष्ट होता है। फिर यह जो माने यह चैलेंजेस जो है अपने जीवन में जो आती है अपने वर्क प्लेस में चैलेंज आती है। अपने एकेडमिक लाइफ में चैलेंज आती है। डोमेस्टिक लाइफ में चैलेंज आती है। मित्र और रिलेटिव्स के साथ में जो प्रॉब्लम्स खड़े होते हैं। यह स्ट्रेस आजकल जो लोगों के सर के ऊपर में इतना सवार है। यह स्ट्रेस जब अपने सर पर बैठ जाता है, तो फिर कौन हमारी रक्षा करेगा? कौन तारणहार है? कौन भीड़ भंजक है? कौन है जो भवसागर में हमारा हाथ पकड़ कर के भवसागर पार करवाएगा? तो वह है भगवान। तो चलो भगवान की आराधना करें। तो फिर यह सब मुसीबतों से, कष्ट से छुटकारा पाए और फिर क्या है? तो यह एक हो गया एक दूसरी अवधारणा हो गई धर्म के बारे में। एक तो है कि मुझे अपनी ड्यूटी अपना धर्म निभाना होगा वरना तो फिर समाज बेर बिखेर हो जाएगा। यह एक थिंकिंग है। दूसरा एक थिंकिंग है कि भगवान की आराधना करते हैं। पूजा करते हैं। उनको खुश रखते हैं। जिससे कि यदि सामने आई हुई विपद है, संकट है, उससे हम मुक्त हो पाए। उसमें वह हमारी सहायता कर पाए। यह एक है और तीसरा एक हम धर्म के बारे में क्या सोचते हैं? तो हम लोगों ने पाप किया है। अभी पाप का अर्थ कि झूठ बोलना यह सब छोटा-मोटा तो हमने बहुत कुछ जीवन में कर दिया है। तो फिर ऐसा लगता है कि अभी चलो मृत्यु होगा तो फिर कहीं नरक में ना जाना पड़े। मृत्यु होगा और फिर कहीं हमारा जितने भी पाप है वह हमको कहीं ले ना डूबे। और यदि पुनर्जन्म में विश्वास है तो फिर अगला जन्म यदि अच्छा नहीं होगा और भी गरीब घर में होगा तो क्या होगा? तो यह मृत्यु के बाद का जो जीवन है उसके लिए अभी से चलो हम एक भातू बांध दें। ये भाथू ये गुजराती शब्द है। इसका अर्थ है टिफिन बनाना। घर के बाहर में यदि जाते हैं तो कैसा वह मां आपके लिए वह रोटी और आलू की सब्जी ऐसा बना के देती है। वो आपका वो एक टिफिन बना करके एक बॉक्स पैक करके उसमें आपको देती है। तो वैसे ही अभी एक यहां पे एक अच्छा सा वो एक सब पुण्य जुगाड़ कर ले। इसी जन्म में मंदिर में जाकर के फिर पूजा पाठ करके तीर्थ क्षेत्र में जाकर के दान दक्षिणा करके कथा वगैरह सुनकर के कुछ विधि वगैरह करवा करके कुछ ग्रह शांति वगैरह करवा करके ऐसा सब करके एक थोड़ा सा पुण्य का भांध देते हैं जिससे कि जो परजन्म परलोक है या फिर पुनर्जन्म है जिसमें भी आप विश्वास करते हो उसमें हमको यह सब चीजें सहाय करें। ऐसा एक धर्म के बारे में चलता है। किंतु जो लोग फिर रैशनलिस्ट है, जो लोग कि फिर यह होते हैं, बड़ा ही अपने पे गुमान गुरूर होता है। जिनको अपना बड़ा सेल्फ कॉन्फिडेंस होता है। वे लोग कहेंगे कि मुझे एथिकल और मोरल तो होना ही है। किंतु उसके लिए मुझे कोई धर्म की जरूरत नहीं। तो उस वो जो एक कांसेप्ट है कि मैं एथिकल नहीं होऊंगा। एथिकल होने के लिए मुझे धार्मिक होना पड़ेगा। वह कांसेप्ट मैंने उड़ा दिया। मुझे धार्मिक होने की कोई जरूरत नहीं है। मैं वैसे ही एथिक और मोरालिटी का पालन करूंगा। मैं वैसे ही नैतिकता का पालन करूंगा। मैं वैसे ही सत्य वचन बोलूंगा। मैं वैसे ही किसी चोरी नहीं करूंगा या दूसरों पर अत्याचार नहीं करूंगा। दूसरों पर अत्याचार मैं ना करूं उसके लिए मुझे धर्म फॉलो करना है। उसका ऐसी कोई मुझे जरूरत नहीं। तो वो एक उड़ा दिया। दूसरा है कि जीवन में दुख कष्ट आएंगे तो भगवान को प्रार्थना करेंगे तो फिर भगवान मेरी सहायता करेंगे। इसके लिए भी मुझे भगवान की जरूरत नहीं। मेरे खुद के पास में इतनी इंटेलेक्चुअल कैपेसिटी है। इतना धन वैभव है कि मेरे साथ में इस जगत में जो कुछ भी होगा मैं अपने से अपने बलबूते पर इसका सामना कर लूंगा। तो चलो वह कांसेप्ट भी उड़ा दिया धर्म का। फिर रह गया परलोक या तो फिर पुनर्जन्म। तो मुझे ना ही पुनर्जन्म में विश्वास है ना ही परलोक में विश्वास है। तो फिर मुझे धर्म करने की जरूरत ही कहां रह गई? जो एक जनरल कांसेप्ट रहता है कि धर्म हम इस सब चीजों के लिए करते हैं। वही उसी को आप उड़ा देंगे तो फिर आपको धर्म की जरूरत ही कहां रह गई। तो अभी देखिए कि मैं यह जो ओरिजिनल मेरा जो इंक्वायरी जो धर्म के बारे में था वो इसलिए नहीं ही स्टार्ट हुआ था कि मुझे दुख कष्ट से भगवान मुझे बचाए या तो फिर मैं परलोक या तो पुनर्जन्म में बहुत ज्यादा विश्वास करता हूं। इसके लिए मुझे भगवान के पास जाना है और एथिक्स और मोरालिटी तो मेरे में ऑलरेडी था। इसलिए तो मैं घर छोड़कर के गांव में जाकर के काम कर रहा था। तो फिर मुझे धर्म की क्या आवश्यकता पड़ गई? तो वह एक सीरियस क्वेश्चन मेरे माइंड में चल रहा था। देखिए कि दोनों ओर से एक और कहते हैं यह हिस्टोरिकल स्टडीज हमको कहता है कि धर्म है जो कि सिविलाइजेशन को बचा के रखता है। धर्म है जो सिविलाइजेशन को ग्रेटनेस की ओर ले जाता है और फिर जब इस धर्म में करप्शन प्रारंभ होता है तो यह सिविलाइजेशन क्रैश हो जाता है। यह तो एक थिंकिंग एक थ्योरेटिकल अंडरस्टैंडिंग मेरा हुआ। किंतु जब मैं खुद धर्म को फॉलो करने जाता हूं तो एक वॉल जैसे कि मेरे सामने खड़ी हो जाती है। एक बड़ी सी दीवार मेरे सामने खड़ी हो जाती है। मैं क्यों धर्म का पालन करूं? एथिक्स और मोरल एथिक्स और मोरालिटी ही यदि मुझे चाहिए तो मैं वैसे ही एथिकल और मोरल हूं। वैसे ही मैं नैतिक हूं। वैसे ही मैं सेल्फलेस हूं। वैसे ही मैं लोगों के कल्याण के लिए कार्य कर रहा हूं। उसको मुझे कोई भगवान को मुझे सिखाने की या किसी ऋषि मुनि को मुझे सिखाने की जरूरत नहीं है। लाइफ में जो चैलेंज आएगी मैं ही सामना कर लूंगा। उसके लिए अगेन मुझे ना ही किसी भगवान की जरूरत है ना ही ऋषि मुनियों की। यदि परलोक है यदि पुनर्जन्म है तो मुझे यदि भगवान की सहाय चाहिए। उस सब जगह पर जाकर के किंतु उस सब चीजों पर विश्वास ही नहीं है। तो फिर ऑन वन हैंड धर्म चाहिए। ऑन दी अदर हैंड धर्म का कोई प्रयोजन नहीं है। इस परिस्थिति में मैं जब कुछ समय के लिए था उसी समय यह स्वामी विवेकानंद का आइडियाज, थिंकिंग, थ्यरी मेरी नजर के सामने आया। और एकदम सडनली मुझे यह क्लियर हो गया कि धर्म जिसको कि हम यह सब एक्सटर्नल जो चीजें गिनते हैं वो नहीं है। धर्म तो हृदय के भीतर में है। अंतर्मन के भीतर में है। और एक बेटर वर्ड है स्पिरिचुअलिटी। योग और वेदांत यह है सीक्रेट जो कि हमको एक्चुअल स्पिरिचुअलिटी क्या है वह समझाते हैं। जैसे ही मुझे यह कांसेप्ट मेरा क्लियर हो गया कि हां यह धर्म भले ही चाहे तुम ना करो क्योंकि धर्म करने के लिए जो जो कुछ आवश्यकताएं हैं वो आवश्यकता मैं महसूस ही नहीं कर रहा तो धर्म करने की क्या जरूरत है? फॉरगेट इट। वो पूरा मामला ही भूल जाओ। फॉरगेट द धर्म। यहां पे और एक हायर कांसेप्ट है वो है स्पिरिचुअलिटी। स्पिरिचुअलिटी क्या है? उसको समझो। स्पिरिचुअलिटी को फॉलो करो। फॉलो स्वामी विवेकानंद। क्योंकि स्वामी जी का हिस्टोरिकल अंडरस्टैंडिंग है वो इतना शार्प था। ऐसा लग रहा था कि यह जो भारत का जो इतिहास है उसको आप देखिए। यहां पर धर्म के या तो फिर आध्यात्मिकता के माध्यम से ही भारत का यह जैसे कि उत्थान हुआ है। भारत की रगरग में यह योग और वेदांत प्रवेश किए चुके हैं और भारत की यह जो मिट्टी है प्रत्येक धुली कना के भीतर में यह आध्यात्मिकता है। तो ये जो आर्नोल्ड टोयनबी का जो हिस्टोरिकल अंडरस्टैंडिंग था वही अंडरस्टैंडिंग यहां पर स्वामी जी का है। स्वामी जी कहते हैं कि यह जो वेस्टर्न कंट्रीज है उन्होंने यह एक्सटर्नल नेचर को एक्सप्लोर करने के लिए अपनी प्राणशक्ति लगाई है। और यह जो खास ईस्टर्न कंट्रीज में खास करके भारत जो है हम लोगों ने अपनी प्राणशक्ति लगाई है इनर कॉस्मोस को एक्सप्लोर करने के लिए और बीच-बीच में क्या होता है? कि ये दोनों स्ट्रीम जैसे कि एक दूसरे के संपर्क में आती है। जितनी बार यह वेस्टर्न कॉकरर्स एक्सप्लोरर्स किंग्स एंड एपेरर्स उन्हों उन लोगों ने यह जो मर्चेंट है इन लोगों ने ट्रेडिंग के लिए या तो कॉनक्वेस्ट के लिए इष्ट का संपर्क किया। इष्ट के साथ में भारत के साथ में एक चैनल्स ऑफ कम्युनिकेशन डेवलप की। उस उस समय भारतीय आध्यात्मिकता उसी चैनल्स के माध्यम से उन देशों में गई और उन देशों में आध्यात्मिकता का असली स्वरूप क्या है वह प्रकट करवाया। स्वामी जी का जो बड़ा ही स्टार्टलिंग स्टेटमेंट है कि क्रिश्चियनिटी इज बट ए डिस्टेंट ऑफ शूट एंड बुद्धिज्म इज अ रेबेल चाइल्ड। व्हाट इज हिंदूइज़्म? हिंदूइज़्म इज सच अ रिलीजन ऑफ वि क्रिश्चियनिटी इज अ डिस्टेंट ऑफ शूट एंड बुद्धिज्म इज अ रेबेल ऑफ शूट। अर्थात कि हिंदूइज़्म की महिमा क्या है? तो क्रिश्चियनिटी जो है उसी में से कहां एक विशाल विराट वटवृक्ष है। उसका एक सैपलिंग लगा के एक जगह पर लगाएं छोटा सा एक दो फुट का और उसको देखकर के आप एडमायर करें। तब आपको पता चलेगा कि यह सैपलिंग ही यदि इतना सुंदर और अच्छा है तो फिर विराट वटवृक्ष जिसमें से कि यह काट करके लगाया है वह कितना विशाल होगा। तो बुद्धिज्म और क्रिश्चियनिटी इसको यदि आप एडमायर करते हैं तो समझ लीजिए कि जो ओरिजिनल फाउंटेन हेड है जो ओरिजिनल गंगोत्री है जहां पे यह धर्म का आध्यात्मिकता का उद्भव हो रहा है वह कितना भव्य होगा। तो यह जब स्वामी जी के आइडियाज मैंने पढ़ना शुरू किए इमीडिएटली मुझे लगा कि नहीं धर्म क्या है? देखिए लॉजिकल कंक्लूजन तक पहुंचना है ना कोई भी इंक्वायरी के पॉवर्टी क्या है? क्यों होती है? उसका यदि लॉजिकल कंक्लूजन हमको मिलता है एक हायर क्वेश्चन में कि राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन। सिविलाइजेशन जब राइज होती है तो सभी लोगों का एक अच्छा सा उसके सिटीजंस का एक लाइफ रहता है। सिविलाइजेशन जब क्रैश होती है तो बहुत सारे लोग गरीब होते हैं। बहुत सारे लोग सफर करते हैं। ओके? अभी ये लोग उसका प्रश्न का उत्तर क्या है कि व्हाई सिविलाइजेशन राइज एंड फॉल? तो उत्तर है रिलीजन। फिर उसका उत्तर क्या है कि व्हाट इज रिलीजन? इस प्रश्न का उत्तर है स्पिरिचुअलिटी एंड स्पेसिफिकली योग एंड वेदांत। तो अभी जब हम इस लेवल तक पहुंच गए उसके बाद में और एक सीरियस क्वेश्चन होगा कि व्हाट इज योग एंड वेदांत? आप पढ़ते तो हैं बहुत कुछ किंतु क्या हमने इंटरनल कोई अनुभूति की है? इंटिव कोई अंडरस्टैंडिंग प्राप्त हुआ है कि नहीं? तो यहां तक मैं जब पहुंचा स्वामी जी के पास में इसके बाद में इससे भी एक उच्च रास्ता हायर एक रास्ता खुला अपने सामने वो है मां और ठाकुर। ठाकुर और मां को जितने-जितने पढ़ेंगे उतना ही समझ में आएगा कि आध्यात्मिकता के दो फाउंडेशन है। एक तो है त्याग अर्थात कि त्याग वैराग्य यानी कहेंगे कि ब्रह्मचर्य और दूसरा है भाव। ब्रह्मचर्य और भाव देखेंगे कि जितना ठाकुर और मां को पढ़ते जाएंगे जितना ही उनके साहित्य में गंभीरता से हम प्रवेश करते जाएंगे जितने ही उनके जो टीचिंग्स है उनके जो उपदेश है उसके बारे में सोचते जाएंगे और फिर आप कहेंगे कि इस पूरे टीचिंग्स को आप डिस्टिल करके हमारे सामने रखिए तो दो शब्दों में या दो उस कांसेप्ट में हम इसको डिस्टिल कर सकते हैं। एक तो है सर्वप्रथम तो है कि ब्रह्मचर्य बिना ब्रह्मचर्य के या तो फिर कहेंगे ब्रह्मचर्य इज अ वेरी स्पेसिफिक कांसेप्ट और थोड़ा सा जनरलाइज करके और वो ब्रह्मचर्य बड़ा ही वो एक हार्ड कांसेप्ट लगता है। थोड़ा सा सॉफ्ट करके कहे थोड़ा सा तीन चार स्टेप नीचे आकर के कहे तो वह है त्याग और वैराग्य। जब तक हम इंद्रियों के विषयों का त्याग नहीं करेंगे तब तक हम आध्यात्मिकता के क्षेत्र में आगे बढ़ेंगे ही नहीं। हां, हम बेबी स्टेप्स लेंगे। जैसे-जैसे आप सत्संग वगैरह सुनते जाते हैं, साधु संग करते जाते हैं, मंदिरों का दर्शन करते जाते हैं, भगवान का दर्शन करते जाते हैं। यह पाठ है, पारायण है वगैरह करते जाते हैं। स्वाध्याय करते हैं, तो आपको एक श्रद्धा भक्ति आपके मन में जन्म लेगा। किंतु दिस आर ओनली बेबी स्टेप्स। ये जो अपनी ये जो इंद्रियां है वो विषयों के पीछे जितना दौड़ती है उतनी ही स्पीड से उतना ही हार्ड वो दौड़ती ही रहेगी दौड़ती ही रहेगी तब तक फिर हम आध्यात्मिकता के क्षेत्र में ज्यादा आगे नहीं बढ़ेंगे। हमको कैसे भी करके धीरे-धीरे करके स्टेप बाय स्टेप बाय स्टेप हमको अपनी इंद्रियों को विषयों से रिवर्स करना है। रिट्रीव करना है। रिट्रीट करना है। जैसे कछुआ अपना सर और अपने पैर वो कैसे वह शेल के भीतर में डाल देता है। जब उसके सामने कोई खतरा आता है तो वैसे ही यह इंद्रियों को धीरे-धीरे करके हमको रिवर्स करना है। उसकी गति प्रश्न यह होगा कि ये इंद्रियां जो है वो क्यों दौड़ रही है? तो वो दौड़ रही है सुख के लिए। तो सुख से यह जो सांसारिक सुख है ये जो सांसारिक ये जो ये सब वासनाएं हैं उससे मुक्ति पानी है। इसको हम थोड़ा सा करेंगे। ग्रेटर डिस्कस करते हैं। तो यह हो गया एक ब्रह्मचर्य। दूसरा है कि यह भाव। देखिए भाव क्या है? सबसे पहले तो हमारी इंद्रियों के विषय क्यों इंद्रियां क्यों विषय के पीछे दौड़ती है? क्योंकि हमको ना सुख चाहिए। हमको चाहिए आनंद। देखिए और एक बड़ा ही डीप कांसेप्ट है। एडम स्मिथ बोलकर के एक इकोनॉमिस्ट था। उस समय तो यह इकोनॉमिस्ट इकोनॉमिस्ट शब्द नहीं था। किंतु खैर आज की लैंग्वेज में यदि कहे तो वह एक अर्ली इकोनॉमिस्ट था। उसने एक किताब लिखी वेल्थ ऑफ दी नेशंस अर्थात कि कोई भी एक देश की संपत्ति क्या है? तो अभी उसकी दृष्टि में यह वेल्थ क्या है? तो यह जो मिनरल वेल्थ जो होती है उसके बाद में यह जो मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स जो होती है वो सब है जैसे कि वेल्थ नहीं कि यह गोल्ड कितना है आपके पास में ना कि ऑइल कितना है वह नहीं। आप कितना अमाउंट आप कितना प्रोडक्ट आप मैन्युफैक्चर कर सकते हैं। यह इंडस्ट्रियलाइजेशन का वो युग था और इंडस्ट्रियलाइजेशन के युग में जितना मैन्युफैक्चर बढ़ाएंगे उतना ही आप यह मैन्युफैक्चर प्रोडक्ट को सेल करके रिटर्न आप यह फॉरेन एक्सचेंज कलेक्ट कर सकते हैं। ये तो इंटरनेशनल कॉमर्स ये ग्लोबलाइजेशन ये इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन ये सबका वो जो जैसे कि एक एक थ्योरिटिकल फ्रेमवर्क जिसको देना था वो एडम स्मिथ ने दिया तो फिर वहां से यह कांसेप्ट प्रारंभ हुआ कि कोई भी एक देश है उसकी वेल्थ क्या है तो यह उसकी यह प्रोडक्ट है आजकल आप देखिए यूनाइटेड नेशंस के जितने भी कंट्रीज रजिस्टर्ड है 100 7080 जितने भी होंगे उन सबका अपना-अपना एक जीडीपी होता है। ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट और इसके बेस के ऊपर में यह कंट्री का रैंकिंग होता है। आज सबसे वेल्थीएस्ट कंट्री है अमेरिका। 30 ट्रिलियन का कुछ उसका जीडीपी है। उसके बाद में आता है चाइना ऑलमोस्ट 15 ट्रिलियन के आसपास में है। उसके बाद में यह जर्मनी और जापान। यह 5 ट्रिलियन के आसपास और उसके बाद में अभी आ गया है भारत। भारत का प्रॉब्लम यही है कि हमारे पास में 4.5.5 ट्रिलियन डॉलर का जीडीपी तो अवश्य है किंतु पर कैपिटा जीडीपी में अर्थात कि 150 करोड़ की पपुलेशन है तो तो एवरेज करने को जाएंगे तो हम सीधे थर्ड वर्ल्ड कंट्री की कैटेगरी में आ जाते हैं। तो खैर जो भी है तो किंतु यह कांसेप्ट है कि किसी भी की वेल्थ क्या है देश की उसके ऊपर में सब कुछ निर्भर करता है। आज आप अमेरिका के पास में या चाइना के पास में जाकर कहेंगे कि हमारी 10,000 साल पुरानी सिविलाइजेशन है। हमारे यहां पर पतंजलि है, वेदव्यास है, वाल्मीकि है। इस तरह के ऋषि मुनियों का जन्म हुआ है। हमारे यहां पर राम और कृष्ण जैसे अवतार आ चुके हैं। स्वामी विवेकानंद जैसे एक ग्रेट फिलॉसोफर शंकराचार्य जैसे फिलॉसोफर आ गए हैं। मीराबाई है, नरसी मेहता है। यह चैतन्य महाप्रभु है। इस तरह से महान संत प्रकट हुए हैं। हमारा इतना सुंदर लिटरेचर है, पुराण है, उपनिषद है, वेदांत है, फिलॉसोफी है। तो हमारा यह वेल्थ है। तो वे लोग बोलेंगे वो सब वेल्थ अपने पॉकेट में रखिए। हमको आप यह बताइए कि आपकी इंडस्ट्रियल कैपेसिटी क्या है? आपका मिलिट्री के पास में कितने फाइटर जेट है? कौन से जनरेशन के है? फोर्थ जनरेशन, थर्ड जनरेशन ना कि फिफ्थ, सिक्स्थ जनरेशन। तो यहां पे क्या है? जब इंटरनेशनल कंपटीशन करने को जाएंगे तो अपना कल्चर, अपना रिलीजन, अपना साहित्य, अपने संत वह सब किसी काम के नहीं है। वहां पे तो एक ही चीज काम करती है वो है आपका जीडीपी। जीडीपी यदि आपका जिस लेवल का रहेगा, उसी लेवल पर आपको यह लोग ट्रीट करेंगे। फिर हम लोग हवा में कितना ही उड़ते रहिए विश्वगुरु बोल के अपने को बीच-बीच में यह लोग गुब्बारे में जैसे पिन मार करके हमको ठंडा कर देंगे तो और फिर हमको कष्ट भी बड़ा होता है। इतने ऋषि मुनियों की ये धरती है और हमारे साथ में यह मिसट्रीटमेंट हो रहा है। किंतु क्या है यह जगत का नियम ही यही है। जीडीपी के बेस पर ही कंट्री का पहचान होता है। मनुष्य के बीच में भी आप देखिए कोई बहुत बड़ा एक साधु संत है। कोई बहुत अच्छा कलाकार है। कोई बहुत अच्छा यह लेखक है, कोई बहुत अच्छा साहित्यकार है और दूसरा एक डॉक्टर है, लॉयर है। तो आप बोलेंगे कि आपका किसका वैल्यू ज्यादा है? इंस्टिंक्टिवली लगेगा कलाकार है, साहित्यकार है, लेखक है, संत है, उसी का तो वैल्यू ज्यादा होना चाहिए। किंतु ऐसा तो होता नहीं। जगत में ऐसा देखते नहीं है। क्या देखते हैं? डॉक्टर के पास में 10 करोड़ का बैंक बैलेंस है। वह साहित्यकार के पास में हो सकता है मुश्किल से दो3 लाख का बैंक बैलेंस होगा। तो फिर इसका बैंक बैलेंस इतना है। इसका इतना है। यानी इसी के ऊपर में आपकी कंपैरिजन होगी। अर्थात क्या कहना चाहते हैं कि जगत में आपका वैल्यू क्या है? वह है पैसा। पैसों के माध्यम से ही ज्यादातर चीजों को आप मेजर करते हैं। इवन मेरे पास में यदि विद्या भी है तो विद्या का उपयोग करके मैं पैसा कमाने के लिए करूंगा। विद्या को लिवरेज करके मैं पैसा कमाऊंगा। जो कुछ भी है उसको लिवरेज करके पैसा कमाना है। जब तक मेरे पास में जो है टैलेंट है, स्किल है, नॉलेज है, जो कुछ भी है उसको मैं मनी में कन्वर्ट ना कर पाऊं। तो फिर वह टैलेंट और स्किल का क्या अर्थ है? आजकल तो बहुत सारे संत भी देखते हैं कि कथा करते हैं और उनके लाखों फॉलोअर्स होते हैं और वो बड़े-बड़े वो अच्छे घर में रहते हैं। करोड़ों का उनका बैलेंस होता है। एक-एक कथा सुनना अभी उनको बुलाएंगे कथा करने के लिए कि आइए यहां पर कथा कीजिए तो वो सीधा बोल देंगे कि 10-15 करोड़ से कम में आपका होगा नहीं कथा। तो क्या है? सभी लोगों को अपना यह जो विद्या है उसको करेंसी में वह कैश में कन्वर्ट करना चाहते हैं, मनी में कन्वर्ट करना चाहते हैं। क्योंकि उनको यह पता है कि जगत में पैसों के माध्यम से ही सब कुछ मेजर होता है। तो यहां पर कहेंगे कि आध्यात्मिक जगत में वह कौन सा करेंसी है? मैं कहां पर पहुंचा हूं? मेरा वर्थ क्या है? मेरी अटेनमेंट क्या है? उस कौन सा एक मेजरमेंट स्केल है? जिसके माध्यम से मैं सब कुछ मेजर करूंगा। तो वह मेजरमेंट स्केल है आनंद। जितना आनंद हमको प्राप्त होता है सा आध्यात्मिक साधना में उतना ही हम आगे बढ़े हुए हैं। और जितना आनंद कम प्राप्त होता है तब तक हम यह सिर्फ एक प्राइमरी लेवल पर नोवििस लेवल पर ही है। धर्म का मैं क्या अर्थ करता हूं? मेरी ड्यूटी है। भले चाहे मुझे अच्छा लगे ना लगे मुझे मंदिर में जाना होगा। मैं अपनी सोसाइटी में रहता था। मैं पूर्वाश्रम की बात कर रहा हूं। काफी लोगों को मैं देखता था। सुबह को बाइक पर बैठ के वह जो सफेद कपड़े धोती वगैरह पहन करके पुरुष लोग वो बाइक में बैठकर के वह सुबह-सुबह को देरासर जाएंगे। देरासर में प्रणाम करके आकर घर आएंगे। फिर वह अपना बाकी का कार्य चालू करेंगे। पूछेंगे कि अच्छा सुबह-सुबह आपके पास में टाइम मिलता है देरासर जाने का। इस तरह से धोती वगैरह सब कपड़े पहन करके तो बोलते हैं देखो भाई यह तो अपना ड्यूटी है। यह तो अपना धर्म है। उसको तो निभाना ही पड़ेगा। तो क्या है? देहरासर जाना यह ड्यूटी है। मंदिर में जाना यह ड्यूटी है ना कि उससे आपको आनंद आ रहा है। तो यह एक बहुत बड़ी बात है। जब तक मुझे आनंद मिलना शुरू नहीं होता तब तक वो सिर्फ एक विधि विधान एक ड्राई होकर के रह जाएगा। जिसको कि मैं अपने विल पावर से ही खींच करके या तो मेरे डिजायर के भरोसे ही खींच करके मैं कर रहा हूं। किंतु जिस क्षण मुझे आनंद आना शुरू होगा वैसे ही आध्यात्मिकता मेरे लिए सहज हो जाएगी। मैं कथा सुनता हूं। क्यों? क्योंकि मुझे आनंद आता है। मैं मंदिर में जाकर बैठता हूं। क्यों? क्योंकि वह पवित्र वातावरण है। मेरे मन को शांत कर दे रहा है। मैं साधु संतों की वाणी सुनता हूं। क्यों? क्योंकि उनकी वाणी मेरे अंतर्मन को जैसे कि शीतल कर देती है। मैं कोई भी साधना करता हूं बैठकर के। यह कथामृत का पाठ करता हूं। मैं बैठकर के जप करता हूं। क्यों? क्योंकि जप करने से कथामृत का पाठ करने से मेरे मन को शांति मिलती है। मुझे आनंद आता है। तो यह आनंद जो है यह धार्मिक जगत की आध्यात्मिक जगत की करेंसी है। सब कुछ जैसे कि जैसे कि अपने बाहर के जगत में मैं चाहे संत हूं। संत तो नहीं शब्द मैं यूज़ करूंगा। मैं यदि चाहे कथाकार हूं ना कि चाहे मैं लॉयर हूं ना कि चाहे मैं डॉक्टर हूं। मेरे पास में जो कोई स्किल है मैं क्रिकेटर हूं ना कि मैं सिंगर हूं ना कि मैं यह आर्टिस्ट हूं ना कि मैं कुछ भी हूं। आई विल ऑलवेज यूज़ माय स्किल टू लिवरेज इट। मैं अपनी स्किल को लिवरेज करूंगा ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने में। और हमेशा हम लोग देखते हैं कि ऐसी स्किल अर्जन की जाए जो स्किल हमको ज्यादा से ज्यादा पैसा दे सके। तो यहां पर भी आध्यात्मिक जगत में जो कोई भी हम साधना करते हैं, जो कुछ हमारी बिलीफ है, उसको लिवरेज करना है आनंद प्राप्ति के लिए। यदि वो स्किल, वो साधना, वो लाइफस्ट, वो तपस्या, वो फिलॉसोफी यदि आनंद में कन्वर्ट नहीं होती है तो हम लोगों को उसका त्याग करना होगा क्योंकि वह ज्यादा किसी काम की है नहीं। तो यहां पर देखिए कि आनंद है एकमात्र करेंसी। तो त्याग हम क्यों करते हैं? हमारा क्या टॉपिक था कि आध्यात्मिकता को यदि हम डिस्टिल करें। आध्यात्मिकता क्या है? उसके बारे में समझने का प्रयास करें तो एक शब्द हमको मिलता है। एक कांसेप्ट हमको मिलता है वह है ब्रह्मचर्य। दूसरा कांसेप्ट हमको मिलता है भाव। अभी भाव क्या है? भाव है। यह जो आनंद है जो कि प्योर स्पिरिचुअल आनंद है, उस तक पहुंचने के पहले हम उस आनंद को थोड़ा सा रिफ्लेक्ट करते हैं बाह्य जगत में। देखिए आध्यात्मिकता अल्टीमेटली क्या है? बाहर से भीतर जाने की जर्नी है। बाहर में हम लोगों के साथ में डीएल करते हैं। कांसेप्ट्स के साथ में डीएल करते हैं। मटेरियल ऑब्जेक्ट के साथ में डीएल करते हैं। और सभी चीजों में हम कुछ ना कुछ आनंद प्राप्त करते हैं। मुझे याद है मैं जब छोटा बच्चा था। कोई नया खिलौना मुझे कोई किसी ने दिया तो मुझे इतना आनंद आता था। अरे वाह यह नया खिलौना मेरे पास में आया है। मैं कभी-कभी पिताजी के साथ में वह दुकान वगैरह में जाया करता था। नए कपड़े खरीदने के लिए। तो यह नए कपड़े मिलते हैं तो कितना एक मजा आता है, आनंद आता है। अरे वाह मैं नए कपड़े पहनूंगा आज। और फिर जब वेकेशन पड़ता है स्कूल में तो एक नया उस वेकेशन का आनंद कि बस अभी यह 2 महीने डेढ़ महीने जितना भी है अभी पढ़ाई लिखाई नहीं करनी है। जो चाहे वह कर सकते हैं। फिर हम लोग मैं अपने गांव में जाता था। जहां पर हमारा एक एक्सटेंडेड फैमिली था मां के पिताजी के घर में। तो वहां पर जब जाते हैं तो अपने जो रिलेटिव्स हैं, मेरे कजिंस थे पूरा एक साल के बाद में मैं मिल रहा हूं उनको। लास्ट वेकेशन में मैं यहां पे आया था। अभी यह दूसरा एक साल के बाद में जब वेकेशन हुआ तो उनको मिल रहा हूं। तो यह मामा है। फिर यह मासी है। ये मेरे नाना है, नानी है। इन लोगों को मिलकर के अरे एकदम हृदय खुश-खश हो जाता था। मैं राह देखता था कि कब वेकेशन पड़े, कब मैं वो ट्रेन में बैठकर के अपने गांव जाऊं। तो यह ट्रेन का जर्नी जितना वो गांव पास में आ रहा है उतनी वो भीतर में से यह जो उत्सुकता है भीतर में जो एंटीिसिपेशन है वो बढ़ता जाता है। फिर दूर से देखते हैं अरे वो घर आ गया। हमारा घर रेलवे स्टेशन के सामने में ही था। यानी कि जैसे ही ट्रेन वो रेलवे स्टेशन पर आएगी वहीं से आप वो घर देख सकते थे। तो जैसे ही ट्रेन आके लगी वो खिड़की में से देखा वह तो अपना घर है तो एकदम भीतर से आनंद आना शुरू हो गया। तो क्या है कि बाहर बाहर का भी जो जगत है उसमें हम जिसको कि जनरली इंद्रियों के विषय कहते हैं वह और कुछ नहीं है। वही आनंद को प्राप्त करने की एक हमारी चेष्टा है। किंतु प्रॉब्लम यही है कि यह जो सब आनंद है बाहर के जगत के वो सब क्षणभंगुर है। आज अभी मैं अपने गांव जाऊंगा तो मुझे शायद हो सकता है इतना आनंद नहीं आएगा। आनंद आएगा शायद शायद इसलिए क्योंकि मैं बहुत बहुत लंबे समय से वहां पे नहीं गया हूं। आई थिंक 15 इयर्स से उससे भी ज्यादा टाइम हो गया होगा कि मैं अपने गांव में नहीं गया हूं। आज मुझे यदि जाना हो तो कुछ समय के लिए मुझे आनंद आएगा। 15 इयर्स का गैप है तो किंतु यदि रिपीटेडली वहां पर जाना होगा जैसे मैं बचपन में जाता था तो फिर वो आनंद नहीं आएगा। रिलेटिव्स को यदि मैं मिलता हूं अभी फिर से बहुत सारे तो अभी स्वर्ग चले गए हैं। बहुत सारे लोग पूरे बिखर गए हैं पूरे जगत में। किंतु मान लीजिए बाय सम मिरेकल वे लोग उसी घर में आकर के रहना शुरू कर दे तो मैं पहली बार शायद हो सकता है थोड़ा बहुत खुशी हो। किंतु उतना खुशी नहीं होगा। इतना लंबे समय तक नहीं होगा जितना मुझे अपने बचपन में होता था। क्या? क्यों? क्योंकि अभी बड़े हो गए हैं। अपनी प्रायोरिटीज चेंज हो गई है। अपने डिजायर्स चेंज हो गए हैं। अपनी होप्स एंड एस्पिरेशंस चेंज हो गई है। और हम जिस चीजों में से आनंद प्राप्त करते हैं, वह चीजें बदल गई है। बोलकर के अभी वह इतना आनंद उसमें नहीं आएगा। तो बाहर के जगत के जितने भी आनंद हैं वह सब क्षणभंगुर है और फिर वह शाश्वत रूप से टिकते नहीं है। इसके लिए हम अपनी नजर को भीतर में पर रिवर्स करते हैं। यह जो आवृत्त चक्षु या तो फिर यह प्रत्याहार क्या कांसेप्ट है? इसके पीछे में प्रति आहार इंद्रियों का आहार है। बाहर के विषय उसको आप भीतर में मोड़ दीजिए। भीतर में से आनंद प्रकट करना शुरू कीजिए। तो यह जो हम पहला जो स्टेप है बाहर का आनंद को भीतर में रिफ्लेक्ट भीतर में रिफ्लेक्ट नहीं भीतर में खोजने के लिए बाहर का जो आनंद है या तो फिर कहेंगे कि आनंद जो हम बाहर खोज रहे थे बेटर वर्डिंग यही होगा आनंद को जो हम बाहर खोज रहे थे उस आनंद को जैसे-जैसे हमने भीतर में खोजना शुरू किया तो पहला स्टेप आता है यह भाव भाव क्या है ईश्वर के साथ में कोई भी एक रिलेशन बनाना वह चाहे फिर वह मातृ भाव हो चाहे संतान भाव हो चाहे दास्य भाव हो चाहे शांत भाव हो किसी भी हिसाब से किसी भी कीमत पे एक रिलेशनशिप बनाना जो जो रिलेशनशिप जो कि मुझे वहां पर मेरे गांव में आनंद देता था मेरे मामा को देख के मासी को देख के नाना को देख के नानी को देख के मेरे कजिंस को देख के वो जो एक उनके साथ में वार्तालाप करके उनके साथ में खेल के उनके साथ में रह के जो आनंद आता था। गांव में जाने का जो ट्रेन जर्नी था, वह एक एंटीिसिपेशन खड़ा करते था। वही सब चीजों को इन अ वे हमको भीतर में रिफ्लेक्ट करना है। जैसे कि मन के चक्षुओं से देखना है कि मैं कोलकाता से मास्टर महाशय की तरह वो बोट में बैठकर के नौका में बैठकर के दक्षिणेश्वर की ओर जा रहा हूं। वही जो एंटीिसिपेशन जो मेरे माइंड में बचपन में प्रकट होता था वही एंटीिसिपेशन जैसे कि मास्टर महाशय के मन में प्रकट हो रहा है। जैसे-जैसे वो दक्षिणेश्वर के मंदिर का वो शिखर दिखाई देता है। फिर जैसे पास में आते हैं तो पहला वाला नब दिखाई देता है। फिर यह द्वादश शिव मंदिर दिखाई देते हैं। शिव मंदिरों के परे जो मंदिर का शिखर दिखता है। फिर पास में आएंगे तो चांदनी का घाट है। वहां से यदि हम उतरेंगे घाट के ऊपर में भीतर में जाएंगे तो एक ओर मां काली का मंदिर है। दूसरी ओर ठाकुर का कमरा है। उस उसके परे हमको पता है कि पंचवटी है। बकुलतला है। बेलतला है। नहबत है। दूसरा नहबत मां वाला नहबत है वहां पे। तो यह एक एंटीिसिपेटरी आनंद। उसके बाद में ठाकुर के साथ में मुलाक ठाकुर का दर्शन हुआ। ठाकुर के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं। ठाकुर के साथ में रह रहे हैं। तो वही वाला जो आनंद था जो कि मुझे गांव में आता था मेरे रिलेटिव्स के साथ में उससे कई गुना ज्यादा आनंद मुझे यह भाव प्रकट करने से आएगा। ठाकुर के साथ में यह दास्य भाव का संतान भाव का संबंध रखने से आएगा। तो यही यह पहला स्टेप है भाव साधना। और उसके बाद में यदि आप और ज्यादा से ज्यादा आगे बढ़ेंगे तो क्या होगा पता है? एक प्योर निर्मल आनंद अपने मन में जैसे कि सवार हो जाएगा। वो किसी चीज के ऊपर में डिपेंडेंट नहीं है। मुझे कोई कल्पना नहीं करनी कि यहां पे एक ईश्वर है। मां काली है और मैं मां काली का संतान हूं। यहां पर मां शारदा नहबत में है। मैं उन वो मां मेरे लिए रोटी बना रही है और मैं रोटी खाते-खाते मां का प्रेम का भी अनुभूति मैं प्राप्त कर रहा हूं। या ठाकुर के कमरे में बैठा हूं। ठाकुर कीर्तन कर रहे हैं। मैं सुन रहा हूं या तो फिर मैं भी कीर्तन में गुरु भाइयों के साथ में योगदान देकर के मैं भी नृत्य कर रहा हूं। वो एक डिपेंडेंसी है। एक डिपेंडेंसी इस अर्थ में कि फिर भी वहां पे दो है। एक मैं हूं एक ठाकुर है। मैं हूं मां है। मैं हूं मां काली है। वो डिपेंडेंसी भी चली गई। सिर्फ मैं हूं और एक अनंत आनंद है। ये जैसे-जैसे हम अद्वैत की ओर जाना शुरू करते हैं। वैसे-वैसे ही देखिए कि यह पूरा जर्नी है। बाहर से जगत से द्वैत साधना और द्वैत साधना से अद्वैत साधना। यह जर्नी क्या है? आनंद प्राप्त करना है। आनंद के पीछे के जितने भी डिपेंडेंस है उन सबको धीरे-धीरे करके हमको हटाते जाना है। इवन इसमें भी व्याघात होता है। ठाकुर खुद कहते हैं ईश्वर दर्शन में भी ईश्वर दर्शन से प्राप्त होते हुए आनंद में भी बीच-बीच में व्याघात होते हैं। डिस्टरबेंस होते हैं। बीच-बीच में इंटरप्शन होता है। ठाकुर कहते हैं इस तरह का आनंद दो जिसमें किसी भी तरह का इंटरप्शन नहीं है। तो वह आनंद है अद्वैत आनंद। सिर्फ मेरे भीतर में जो मेरा सही स्वरूप है आत्मन या ब्राह्मण उसमें से जो प्योर निर्मल आनंद प्राप्त होता है वह प्राप्त करना ही मनुष्य जीवन का चरम उद्देश्य है चरम लक्ष्य है और जितने मनुष्य उस सिविलाइजेशन में रहेंगे इस तरह के मनुष्य जिन्होंने यह चरम आनंद प्राप्त किया है अद्वैत आनंद प्राप्त किया है वही लोगों का आनंद फिर धीरे-धीरे करके आउटवर्ड होगा। आउटवर्ड किस फॉर्म में होगा? कंपैजन के रूप में। करुणा के रूप में। इस तरह के मनुष्य के आप सामने यदि चले जाएंगे तो श्रद्धा भक्ति से सीधे हम उनके चरणों में पदानत हो जाएंगे। क्यों? क्योंकि हमारे प्रति उनकी जो करुणा है, हमारे प्रति स्नेह और प्रेम है, वह इतना अनंत होगा कि हम वो जैसे कुत्ते को भी आप रोटी डालते हैं तो वो कुत्ता दूसरे दिन आकर के आपके सामने बैठकर के वो आपका यह वो अपनी पूंछ जो है वह यह करता है, हिलाता है। इस आशा में कि आप उसको रोटी देंगे। क्यों? क्योंकि पहले दिन उसको पता लगा कि आप उसको थोड़ा बहुत स्नेह करते हैं तो वह स्नेह का भूखा हो के दूसरे दिन आपके पास में आता है। तो यहां पर हम लोग तो मनुष्य है। वह अवतार है या तो वो ऐसे हैं जिनका कि अनंत आनंद अनंत करुणा में या तो अनंत कंपैजन में अनंत प्रेम में कन्वर्ट हुआ है। तो यह जब आनंद अनंत प्रेम में कन्वर्ट होता है तब यह अनंत प्रेम जो है पूरे समाज के जितने भी लोग हैं उन सबका हृदय निर्मल कर देता है। आर्नोल्ड टोयनबी का यह जो कांसेप्ट है रिट्रीट एंड रिटर्न अर्थात कि कोई भी एक साधु संत महापुरुष अवतार होते हैं। सबसे पहले तो वह जगत से दूर चले जाते हैं। किस अर्थ में जीसस जैसे कि डेजर्ट में जाकर के मरुभूमि में जाकर के तपस्या कर रहे हैं। शैतान आकर के प्रकट हुआ। एक के बाद एक प्रलोभन दे रहा है। जीसस ने प्रलोभन स्वीकार नहीं किए। आखिर में उसको ज्ञान प्राप्ति हुई। समाज फिर वो रिटर्न आया। पहले था रिट्रीट फिर है रिटर्न। रिटर्न आकर के समाज में उन्होंने उनका प्रेम इतना था कि समाज में जितने भी लोग थे जो लोग जेनुइन साधक थे सब जैसे कि स्नेह से उनके गुलाम हो गए। यही कहानी जैसे भगवान बुद्ध की और यही कहानी श्री रामकृष्ण देव की। जब वह पंचवटी के तले में तपस्या कर रहे थे तब जैसे कि संसार के साथ में ठाकुर का कोई नाता नहीं था। किंतु जैसे ही तपस्या में साधना में सिद्धि प्राप्त हुई ठाकुर फिर मां शारदा देवी की शक्ति के रूप में आराधना किए और फिर उस शक्ति से शक्तिमान होकर के कोलकाता में घरघर जाकर के वो जिस आनंद को अद्वैत आनंद को उन्होंने प्राप्त किया था घरघर जाकर के साधक साधक को मिलकर के वो आनंद जैसे कि प्रेम के माध्यम से उनके साथ में बांट रहे हैं। तो, यह है आध्यात्मिकता, सही-सही आध्यात्मिकता। सर्वप्रथम तो आता है रिट्रीट यानी कि हो गया ब्रह्मचर्य। उसके बाद में आता है साधना। यानी कि यह भाव साधना हम एक के बाद एक करते हैं और उसके बाद में आता है प्रेम। शुद्ध सात्विक प्रेम। आनंद। साधना के अंत में हमको आनंद मिलता है और आनंद के बाद में यही आनंद जो कि हम सिर्फ अपने भीतर में कॉन्शियसनेस में अनुभव कर रहे थे। आखिर में वही आनंद जब हम रिटर्न होते हैं समाज में वापस आते हैं। यही आनंद अनंत प्रेम में परिणत होकर के सबको जैसे कि अपना अपना गुलाम बना देगा। सब लोग जैसे कि अपनी बात सुनेंगे। सब लोग जैसे कि हमसे श्रद्धा भक्ति करेंगे। क्यों? क्योंकि सभी तो वह प्रेम के भिखारी है। सभी तो वह प्रेम के भूखे हैं। सभी को पता चलता है कि इंद्रियों का आनंद जो मैं प्राप्त करने का प्रयास कर रहा था इतने सालों से इतने जन्म जन्मांतर से उसके सामने यह अवतार पुरुष का प्रेम जो हमको प्राप्त हो रहा है। उसके सामने बाकी सब जैसे कि फीका पड़ गया है। बाकी सब जैसे कि निकम्मा हो गया है। अभी यह अवतार का प्रेम ही हमको चाहिए। और उस प्रेम को प्राप्त करके जैसे कि वह अब स्कूटर को किक लगाते हैं तो कैसा वह इंजन चालू हो जाता है। गाड़ी का की ऑन करते हैं तो कैसा वो गाड़ी का इंजन चालू हो जाता है। हमारे भीतर में भी जो साधन रूपी भठी है तो हमारे भीतर में भी साधन रूपी इंजन जो है वह ऐसे ठाकुर का प्रेम प्राप्त होने से जैसे इग्निशन होगा और फिर इग्निशन लगने से यह अपना भी इंजन साधना का स्टार्ट हो जाएगा। तो यह है एक्चुअली आध्यात्मिक साधना का। यह जो मुझे मेरे मन में जो प्रश्न था कि अल्टीमेटली धर्म क्या है? तो धर्म है यह सबसे पहले तो यह जो जितना भी कचरा है हम जो बाहर के जगत में से प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं उसको हटा दीजिए। साधना कीजिए। भाव साधना है, ब्रह्मचर्य है उसको कीजिए। और फिर जैसे ठाकुर कहते हैं ना कि बहुत सालों से एक वहां पर मिट्टी पड़ा हुआ था। उसके नीचे में एक फवारा था। अब जैसे ही मिट्टी हटा दिया तो फटाक करके फवारे में से पानी निकलना शुरू हो गया। तो वैसे ही ऊपर ऊपर में अपने हृदय में जो कचरा पड़ा है उसको जैसे ही हटाएंगे वैसे ही उसके भीतर में जो प्रेम है वह फवारे की तरह निकलना शुरू होगा और हमारे अंतर्मन को शुद्ध स्निग्ध पवित्र कर देगा। और फिर यह फवारे को आप थोड़ा सा बाहर की ओर ले जाएंगे तो जगत के प्रति जो अपना प्रेम है, कंपैशन है, एंपैथी है, करुणा है उससे कि जैसे पूरा जगत अपने वश में आ जाएगा। पूरा जगत को हम जैसे कि यह जो किसान जो है मिट्टी के भीतर में फर्टिलाइजर डालता है। मिट्टी को फर्टाइल करता है। जिसमें से ये अच्छे से फसल हो। तो हम लोग भी यह सिविलाइजेशन को फर्टाइल करेंगे। सिविलाइजेशन राइज कब होती है? सिविलाइजेशन के पीछे की शक्ति क्या है? तो वो है सिद्ध महापुरुषों का प्रेम। यही प्रेम जो है सिविलाइजेशन को स्ट्रांग बनाता है। उनको ग्रेट बनाता है। और जैसे ही यह महापुरुषों का प्रेम सूख जाता है साथ-साथ में ही यह सिविलाइजेशन जो है वह भी क्रैश हो जाएगी। वह भी हो जाएगी करप्ट। तो यह मेरा जो एक पूरा इंटेलेक्चुअल जर्नी था वह थोड़ा सा मैंने आपके साथ में शेयर किया। तो आज यहीं तक अभी कल मिलते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम