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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूप अवतार वरिष्ठ या कृष्णाय तो कल हमने देखा कि किस तरह से स्वामी जी अपनी कैलिफोर्निया यात्रा समाप्त करके कैलिफोर्निया के जो दिन है कैलिफोर्निया में जो उनको मैसेज देना था व समाप्त करके अभी ईस्ट कोस्ट की ओर वापस आ रहे हैं अभी ईस्ट कोस्ट का अर्थ यानी कि न्यूयॉर्क शिकागो वगैरा अभी न्यूयॉर्क में एक बात थी कि अभेदानंद जी महाराज को स्वामी जी न्यूयॉर्क में रख कर के गए थे कि न्यूयॉर्क वेदांता सोसाइटी है तो उसका तुम जिमा लो इसकी तुम रिस्पांसिबिलिटी लो ऐसा करके स्वामी जी अभेदानंद जी महाराज को रख कर के गए थे अभेदानंद जी महाराज अर्थात की काली महाराज स्वामी विवेकानंद के गुरु भाई श्री राम कृष्ण देव के सन्यासी शिष्य तो अभी किंतु क्या है कि देखिए कि जिस तरह से यह बहुत बार हमने देखा है कि कोई एक पार्टिकुलर सेंटर किसी एक स्वामी के द्वारा जब संचालित होता है तो जो उस सेंटर में आने वाले डिवोटा है वॉलंटस स्वामी की किस तरह की बात करने की स्टाइल है उनका जो विचार सरणी किस तरह के है उन उनके आईडियाज किस तरह के हैं उसके साथ में एक तरह का ट्यूनिंग हो जाता है फिर वो स्वामी चले जाते हैं फिर नए स्वामी आते हैं तो फिर उनके साथ में थोड़ा सा ट्यूनिंग में प्रॉब्लम होता है ऐसा कभी-कभी देखने में आता है तो यहां पर भी आप देखिए कि स्वामी जी का जो लाइफ था स्वामी जी के जो आइडियाज थे स्वामी जी का जो पर्सनालिटी था वो उसकी कंपेयर में तो अभी कोई भी नहीं आने वाला है इवन काली महाराज भले ही चाहे इतने ज्ञानी हो इतने आध्यात्मिक साधना में इतने आगे बढ़े हुए हो सिद्ध हो ठाकुर के भले चाहे वह सन्यासी शिष्य भी हो किंतु स्वामी जी के तो स्वामी जी की लेवल की तो बात ही अलग है तो अभी जैसे ही काली महाराज आए तो स्वामी जी के जो दूसरे शिष्य थे खास करके ये फ्रांसिस लगेट वगैरह इनके साथ में इनका थोड़ा सा अनबन हो गया और फिर ये लोग जो कि रेगुलरली न्यूयॉर्क वेदांत सोसाइटी में आते थे उन्होंने आना बंद कर दिया अभी जैसे ही ऐसा हुआ वैसे ही सभी जो भी ठाकुर स्वामी जी के जो डिसाइल थे खास करके सारा ली बुल है जोसेफाइन मैक्लाउड है उन्होंने स्वामी जी को लेटर लिखना शुरू कर दिया स्वामी जी उस समय कैलिफोर्निया में थे कि या आपने जिस तरह से वेदांत सोसाइटी को चलाया या तो आप जिस तरह से हमको इंस्ट्रक्शन देते थे हमारे साथ बात करते थे तो अभेदानंद जी ऐसा नहीं करते तो अभी क्या किया जाए देखिए कि सेम इशू त्रिगुणा तीता नंद जी के समय में भी हुआ था जब स्वामी जी ने रयान अमेरिका में स्वामी जी ने अपने तीन गुरु भाइयों को बुलाया था एक तो अभेदानंद जी महाराज तुर्या जी महाराज और त्रिगुणा तानन जी महाराज तुर्या जी महाराज को स्वामी जी स्वयं अपने साथ में सेकंड विजिट में लेकर के आए थे अभेदानंद जी को बाद में बुलाया था और त्रिगुणा तीता नंद जी को अमेरिका में तब भेजा गया था जबकि स्वामी जी की महासमाधि हो गई थी और फिर रयान जी यह समाचार सुनक के उनकी कार्य करने की पूरी इच्छा समाप्त हो गई और वह भारत में आकर के परमानेंटली रहने लगे तो फिर कैलिफोर्निया में कोई नहीं था तो कैलिफोर्निया वेदांता सोसाइटी को संभालने के लिए त्रिगुणा तिता नंद जी को भेजा गया था अभी देखिए कि सेम कंट्रास्ट अभेदानंद जी और स्वामी जी में था न्यूयॉर्क वेदांत सोसाइटी में सेम कंट्रास्ट यह नॉर्दर्न अभी तो यह सब नाम है वेदांत सोसाइटी ऑफ नॉर्दर्न कैलिफोर्निया सदर्न कैलिफोर्निया उस समय आई थिंक कैलिफोर्निया वेदन सोसाइटी ना कि ऐसा ही कुछ नाम होगा जो भी है तो सन फ्रांसिस्को तो सैट फ्रांसिस्को में या लॉस एंजेलिस सन फ्रांसिस्को अभी एक ही तो स्वामी है तो उन्हीं को सब कुछ संभालना है तो कैलिफोर्निया में जब दर्यान जी थे तो उनका एक आध्यात्मिक भाव था एक जब ध्यान करने का एक इंट्रोवर्ट नेचर था और उनका बड़ा ही स्निग्ध स्वभाव था और कार्य को लेकर के बहुत ज्यादा कुछ वो ये नहीं कर करते थे कि नहीं यह वेदांत सोसाइटी को खड़ा करना है यहां पर जमीन लेनी है यहां पर बिल्डिंग बनाने है ऐसा वगैरह उनका कुछ नहीं था जो कुछ भी है शांति से रहो एक जगह पर और वह शांति आश्रम अभेदानंद जी की एक डिसाइल ने डोनेट की एक बहुत बड़ी जगह तो वहां पर अपने डिसाइल्स को जाकर के वो रहते थे ले जाकर के उसमें आइड अनसेल भी थी यह स्वामी अतुला अंद जी महाराज गुरुदास महाराज इतने फेमस है अपने ऑर्डर में तो वो भी थे फिर वो ऐसे काफी डिसाइल्स थे स्वामी जी के भी उस समय के वो सब रयान जी के साथ में शांति आश्रम में जाकर के रहते थे तो इतना एक सुंदर जैसे कि भारत का एक गुरुकुल ही वहां पर विदेश की धरती पर ना बनाया हो ऐसा एक वातावरण शांति आश्रम में बनता था तो वो थे तुर्या अंद जी किंतु जब तुर्या अंद जी भारत चले गए और त्रिगुणा तीता नंद जी को भेजा गया तो त्रिगुणा तीता नंद जी का नेचर है थोड़ा सा कार्यक्षम कार्य करने वाला तो उनको ऐसा लगा कि चलो थोड़ा सा जमीन लिया जाए वहां पर हिंदू मंदिर बनाया जाए जो फर्स्ट हिंदू टेंपल इन अमेरिका आपने शायद उसके फोटोस देखे होंगे अभी तो बाद में अशोकानंद जी ने एक बहुत बड़ा नया मंदिर एक बनाया है किंतु जो पुराना मंदिर है वह अभी भी है और बड़ा ही वो देखने में अद्भुत लगता है वो अभी सैन फ्रांसिस्को का एक लैंडमार्क है क्योंकि देखेंगे कि विभिन्न तरह के गुंबज वहां पे वो है डोम जिसको बोलते हैं इंग्लिश में तो विभिन्न तरह के व अभी व तुर्किश स्टाइल के ना कि वो के इंडियन स्टाइल के ना कि व वेस्टर्न स्टाइल के इस तरह के विभिन्न विभिन्न डोम्स उन्होंने बनाया है तो बड़ा ही सुंदर लगता है वैसे दिखने में तो ये सब जो आइडियाज थे उसके बाद में शांति आश्रम में फिर केबिन बनानी है फिर जो वहां पे जाएंगे रहने के लिए उनको एक स्ट्रिक्ट रूटीन फॉलो करना है खाने के समय में स्त्री और पुरुष अलग बैठेंगे जो कि वो कि वेस्टर्न ट्रेडिशनल जो है वो एक्चुअली इंडियन ट्रेडीशन है मंदिर में भी आप जाकर देखेंगे अपने मंदिरों में इंडिया में तो स्त्रियों के बैठने के लिए एक साइड प और पुरुषों को बैठने के लिए दूसरे साइड पे वेस्ट में इस तरह से चर्च में नहीं होता तो यह सब इंडियन आइडियाज जो थोड़ा सा एक्स्ट्रा जो वहां पे इंप्लीमेंट किए त्रिगुणा तीता नंद जी ने इससे कि क्या हुआ कि कुछ कुछ लोगों को इससे ये ऐसा लगा कि त्रिगुणा तीता नंद जी तुर्या अंद जी और स्वामी जी के जो ट्रेडिशनल आ रही है उसको भंग कर दे रहे हैं अदर वाइज इतना नया बिल्डिंग बनाना नई जमीन लेना नई कोटेज बनाना सभी को एक रेजिमेंटेशन में रहना यह सब कहां ये तो वेस्टर्न आइडियाज नहीं है इस सब चीजों को आप यहां पे क्यों इंप्लीमेंट करते हैं तो जो भी है तो ये जो कंफ्लेक्स कभी-कभी होता है कि जब एक स्वामी चले जाते हैं नए स्वामी आते हैं तो पुराने जो डिसाइल होते हैं तो उनको लगता है कि नहीं यह तो बहुत ज्यादा कुछ डिफरेंट हो रहा है यहां तक कि आइड अनसेल और ये गुरुदास महाराज अतुला अंद जी महाराज यह दो लोग भी त्रिगुणा तिता नंद जी से धीरे-धीरे दूर चले गए थे आइड अंसल का मन में था कुछ किंतु क्या है कि उसका डेडिकेशन भी काफी था वेदांत के प्रति तो वह तो वहां पर रहने लगी इनके साथ में किंतु फिर गुरुदास महाराज भारत में आ गए थे अतुला नंद जी और मायावती में काफी साल रहे थे तो यहां पर न्यूयॉर्क वेदांत सोसाइटी में भी ऐसा ही कुछ चल रहा है कि अभेदानंद जी की कार्यशैली से कुछ लोग नाराज स् जी के डिसाइल और स्वामी जी को पत्र लिख रहे हैं उस समय स्वामी जी कैलिफोर्निया में थे तो स्वामी जी ने कैलिफोर्निया से ही कहा बड़ा ही स्पष्ट कहा कि देखिए मैंने न्यूयॉर्क वेदांता सोसाइटी का चार्ज काली को दे दिया है अभेदानंद जी को दे दिया है अभी वह जैसा ठीक समझे वैसा ही वह चलाएगा मैं इसमें इंटरफेयर नहीं करना चाहता और फिर जब स्वामी जी न्यूयॉर्क वापस आए कैलिफोर्निया से अभी यह अंतिम चरण है उनकी विदेश यात्रा का इसके बाद में वह कभी भी अमेरिका वापस आने वाले नहीं थे तो जो आखिरी दिन थे उस समय यह अभेदानंद जी एक बार स्वामी जी को दो-तीन बार बोले कि तुम्हारा न्यूयॉर्क है तुम अभी इसको वापस ले लो तो अभी क्या है कि अभेदानंद जी के मन में भी शायद ऐसा कुछ उनके अहम को आघात पहुंचा होगा कि स्वामी जी के डिसाइल सब मिलकर के मेरे अगेंस्ट में ग्रुप बना रहे हैं ऐसा कुछ शायद उनके मन में लगा होगा मैं तो अनुमान करके कह रहा हूं तो स्वामी जी को दो तीन बार ऐसा कहा कि न्यूयॉर्क तो तुम्हारा है क्योंकि यहां के डिसाइल तो तुम्हारे हैं वो तो मेरी बात तो सुनते नहीं है मेरे अगेंस्ट में तुमको लेटर लिखते हैं तो न्यूयॉर्क तुम्हारा है तुम तुम्हारा न्यूयॉर्क वापस ले लो तो दो तीन बार अभेदानंद जी ने जब ऐसा कहा तो स्वामी जी थोड़े से नाराजगी के सूर में बोले कि न्यूयॉर्क तुमको दे दिया तो फिर दे ही दिया अभी वापस लेने की कोई बात नहीं मेरे लिए पूरा विश्व पड़ा है यानी कि लंडन से लेकर के कैलिफोर्निया से लेकर के ये जापान चीन भारत सब जगह पर जाकर के स्वामी जी तो प्रचार करते हैं उसमें एक शहर मेरा दूसरा शहर तुम्हारा यह सब डिवीजन किस चीज का तो जद ठीक ठीक ठाकुर के संतान है तो सब हमारा है एट द सेम टाइम हमारा कुछ भी नहीं है यह दोनों भाव रहने चाहिए पूरा जगत मेरा है इस अर्थ में कि सभी चीजों के भीतर में सभी व्यक्तियों के भीतर में सभी मनुष्य के भीतर में ईश्वर है ब्रह्म है यह ब्रह्म दर्शन सभी सर्व भूत के भीतर में करना चाहिए यह तो एक है दूसरा कि माया से किसी का संबंध हमारा नहीं है माया जनित संबंध हमारा किसी के साथ नहीं यह मेरा डिसाइल है मैं इसका गुरु हूं वो सब क्या है अभी साथ में इकट्ठा हुए तो दो तीन बातें बता दी ठाकुर ने जो बताई थी वेदांत में जो है अपनी ट्रेडिशनल थिंकिंग अपना खुद का कुछ क्रिएटिव थिंकिंग वो बता दिया शेयर कर दिया और मामला खत्म हो गया इसमें ये मेरा डिसाइल ये मेरा गुरु यह सब क्या है तो न्यूयॉर्क मैंने तुमको दे दिया तुम ही रखो मेरे लिए पूरा जगत पड़ा है तो ऐसा यह अभेदानंद जी के साथ में कुछ वार्तालाप हुआ उसके बाद में एक दूसरा एक है निवेदिता का देखिए कि निवेदिता स्वामी जी के साथ में भारत आई थी साथ में आई थी अर्थात स्वामी जी के साथ में नहीं किंतु स्वामी जी के बुलाने पर आई थी अभी भारत में रुकी और स्वामी जी की बड़ी इच्छा थी कि कन्या शिक्षण के लिए कन्या शिक्षा के लिए वह कुछ ना कुछ प्रयास करें क्योंकि ऑलरेडी निवेदिता का एजुकेशन फील्ड में बड़ा ही इंटरेस्ट था वो खुद एक स्कूल में टीचर थी वहां लंडन में तो फिर स्वामी जी ने सोचा कि यही कार्य विदेशी जो एक आइडियाज है उसको भारत में इंप्लीमेंट करना चाहिए स्वामी जी ने ऐसा नहीं कहा कि हमको वेस्टर्नाइज्ड थिंकिंग प्रोसेस जिसकी मदद से हम लोग नेचर या तो प्रकृति के जो रहस्य है उसको उद्घाटित करके प्रकृति को हाउ टू हार्नेस इट फॉर द बेनिफिट ऑफ मैनकाइंड यह जो मडल मेथड ऑफ एग्रीकल्चर है हॉर्टिकल्चर है ये स्टीम इंजन है ये टेलीकम्युनिकेशन टेलीग्राफ है ये फिर ये समुंदर यात्रा है ये उस समय के जो मॉडर्न मेडिसिन है उस समय के जो पूरे लेटेस्ट साइंस जो कहा जाता था उसको अपनाना है एट द सेम टाइम अपनी वेदांतिका रखना है तो स्वामी जी वहां पर गए थे एक महाकाली पाठशाला बोलकर के एक कन्या शिक्षण के लिए कोलकाता में में एक थी उसकी जो संचालिका थी उन्होंने स्वामी जी को बुलाया था स्वामी जी उस पाठशाला के दर्शन करने के लिए उसका इंस्पेक्शन करने के लिए गए थे बाद में जब वापस आते हैं तो शरद चंद्र चक्रवर्ती उनके साथ में था पूछता है कि स्वामी जी आपको कैसा लगा तो स्वामी जी कहते हैं कि प्रयास बहुत ही अच्छा है बस एक ही बात है कि स्त्रियों की शिक्षा के लिए पुरुष टीचरों को यहां पे क्यों रखा है जद स्त्रियों को लड़कियों को शिक्षा देनी है तो अच्छा है कि लेडी टीचर को ही रखा जाए पुरुष टीचर को वहां पर रखने की क्या आवश्यकता है ऐसा स्वामी जी का स्पष्ट मत था तो जब निवेदिता ने स्वामी जी को अपने गुरु के रूप में अपने मास्टर के रूप में स्वीकृत किया तब स्वामी जी ने कहा कि तुम भारत आओ और भारतीय लड़कियों को शिक्षा दो तो निवेदिता गई भी सही यह कार्य प्रारंभ भी किया किंतु पता है ना कि देखिए कि एक और हम लोग भारत इतना मतलब गड्ढे में गिरा हुआ था इतनी बुरी अवस्था थी आर्थिक दृष्टि से सामाजिक दृष्टि से राजनीतिक दृष्टि से सभी तरह से हम लोग विदेशी सत्ता के पेर के नीचे में उ चढते जा रहे थे इतना होने के बावजूद अपना ये जो कास्ट है अपनी जात है उसका अभिमान इतना भयानक था कि निवेदिता को अपने घर में प्रवेश नहीं करने देते थे ये ब्राह्मण जितने भी थे निवेदिता को अपने घर में खाना नहीं खाने देंगे फिर यह निवेदिता मां के घर में जाकर के रुकी तो मां ने तो बड़े ही मुक्त हस्त से बड़े ही उदार हृदय से उसको आमंत्रण दिया कि चलो तुम मेरे साथ में रहो किंतु मां के साथ में जितनी ये दूसरी ब्राह्मण जो सब उनकी संगी निया थी उनके मन में कुछ ना कुछ चल रहा है क अरे ये तो मलेच्छ है इसको ब्राह्मण लोगों के साथ में क्यों रहने देना तो ये जाति अभिमान है कुछ दिनों के बाद में निवेदिता को पता चला कि उसने अपना सर्वस्व कुछ त्याग करके स्वामी विवेकानंद के पदानु सरण होकर के भारत में आई है भारतीय कन्याओं को शिक्षा देने के लिए किंतु यही भारतीय लोग उसको ठुकरा रहे हैं यही भारतीय लोग उसके साथ में खाना खाने को एक साथ में बैठने को एक घर में रहने को तैयार नहीं है तो नेचरली उसको कष्ट तो हुआ ही होगा तो अभी यह तो एक प्रॉब्लम था निवेदिता के साथ में चल रहा था दूसरा कि अर्थ संग्रह इतना अच्छे से नहीं हो पा रहा था कि जितनी अपेक्षा रखी थी अभी एक छोटी सी जगह पर 1015 लड़कियों को लेकर के रहना अभी निवेदिता की तो एक एंबिशन भी तो एक बहुत ज्यादा थी ना कि पूरे भारत वर्ष में इस तरह से ज्ञान और विज्ञान का प्रकाश फैलाना है अपने गुरु के जो वचन है वो पूरे भारत में फैलाने हैं ऐसा तो उसके मन में था एक रिवोल्यूशन स्पिरिट था एक छोटी सी जगह पर 1015 लड़कियां उसको भी बड़ी जबरदस्ती लाकर के रखा गया है और यह जो हाई कास्ट लोग हैं पता नहीं उसके पीछे पीछे में क्या बोल रहे हैं तो अर्थ संग्रह नहीं हो पा रहा है तो यह सब समस्याओं से निवेदिता काफी ग्रसित थी उसमें भी यह मिस मलर ने जो सब पागलपन चालू किया था यह भी एक फैक्टर था शायद तो यह सब चीजों को लेकर के स्वामी जी ने कहा एक काम करो तुम चलो मेरे साथ में सेकंड टाइम में जा रहा हूं फॉरन तो तुम भी मेरे साथ चलो तो तुमको मेरे जितने भी डिसाइल है मैं तुमको परिचय करवा दूंगा और देखो तुम अपनी पाठशाला के लिए लड़कियों के लिए यदि कुछ तुम अर्थ संग्रह डोनेशन कलेक्ट कर सकती हो कि नहीं तो ऐसा बोल कर के निवेदिता को लेकर के अमेरिका आए तो सही पहले लंडन बाद में अमेरिका किंतु अनफॉर्चूनेटली निवेदिता जहां पर भी जाती है सब जगह से उसको एक तरह से रिजेक्शन ही प्राप्त हुआ क्योंकि देखिए कि दो चीज है यह जो रेसिजम जो होता है ना एक तरह से विदेशी लोगों ने काफी लोगों ने स्वामी जी को अपना एक रिस्पेक्ट एडमिरेशन दिया था कोई किसी किसी ने उनको अपने गुरु के रूप में स्वीकार भी किया था तो वह तो एक चीज है किंतु एक गोरी विदेशी महिला स्वामी जी को अपना गुरु बना कर के उन के उनसे दीक्षित होकर के भारत में जाए ये कन्वर्जन कि क्रिश्चियनिटी से हिंदुइज्म में कन्वर्जन हो फिर भारत में जाए और भारत से विदेश में आकर के स्वामी जी के नाम पर पैसा मांगे तो यह जो वाइट सुप्रीम सुपीरियोर जो है उनकी वो शायद इतना बर्दास्त नहीं कर पाई यह भी एक विचित्र साइकोलॉजी है स्वामी जी को तो अपना लिया किंतु स्वामी जी की जो वाइट डिसाइल है उसको अपनाना मुश्किल हो जा रहा है क्योंकि इससे ऐसा लगता है कि वाइट वैसे मन में तो है कि ये जो काले जितने भी हिंदू है वो सब इनफीरियर क्वालिटी के है उसमें सिर्फ एक विवेकानंद एक है जो कि हम अपना इक्वल थोड़ा बहुत समझ सकते हैं किंतु अभी ये काले लोगों की ये जो रेस है उसमें कन्वर्ट हो कर के वहां पर जाकर के रहना दिस वाज अ स्टेप टू मच ये जो ईटी स्टडी को स्वामी जी के साथ में प्रॉब्लम्स थे उसमें से यह पॉइंट उसने भी यह भी एक था निवेदिता को निवेदिता बड़ा ही उत्साह पूर्वक जैसे ही लंडन आई व अमेरिका गई स्वामी जी के जितने भी डिसाइल है उनको लेटर लिख रही है उनको उनके मुलाकात कर रही है उनके पास में सहाय की अपेक्षा कर रही है तो उसको सबसे पहला जो शौक लगा ईटी स्टडी का स्टडी ने मुंह पर बोल दिया कि देखो कि आई एडमायरीन इतना सर पर बिठा करके रखती हो इतना हाई रिगार्ड सम्मान देती हो तो इतना तो मैं नहीं दे पाऊंगा क्यों क्योंकि मैं स्वामी जी के साथ में रहा हूं और मैंने उनकी लग्जरियस लाइफ स्टाइल देखी है वो मेरे से बेटर नहीं है मैं भी हिमालय जाकर के तपस्या करके आया हूं तो स्वामी जी स्वामी जी से ज्यादा ऑस्टेरिटी तो मैं करता हूं मैं वेजिटेरियन खाना खाता हूं मैं चट नहीं पीता मैं जिस तरह से रहने को मिलता है वैसे ही रहता हूं तो एक हाउसहोल्डर अपनी स्वामी जी के साथ कंपेयर कर रहा है तो भले चाहे वो करे तो बोलने में हमको व क्या करेंगे हम लोग तो किंतु ये दैट वाज फर्स्ट शॉक कि निवेदिता को पता चला कि हालांकि जो लोग स्वामी जी को वर्बल रिस्पेक्ट देते हैं उनके हृदय में थोड़ा सा भी झांक करके देखेंगे तो यह वेस्टर्न सुपीरियोर या तो यह रेशल सुपीरियर है उसकी दीवार फट कर के सामने खड़ी हो जाएगी भले ही चाहे वे लोग इसके बारे में शब्दों में ना वर्णन करते हो आज देखिए कि हमारा स्वामी रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर में यह वेस्टर्न सुप्रीमस या तो फिर यह रेशल सुपीरियोर इसकी बात बड़ी ही रेयरली आपको पढ़ने को मिल लेगी जिन लोगों ने स्वामी जी के साथ झगड़ा किया जो लोग स्वामी जी को तिरस्कृत करते थे पहले से ही हमने कहीं पर भी ऐसा नहीं लिखा स्वामी जी ने भी ऐसा नहीं कहा रेयरली कहा होगा कि उन लोगों के भीतर में एक रेशल सुपीरियोर है किंतु आज मैंने विद द हेल्प ऑफ हिंड साइट जिसको हम कहते हैं ना पीछे दृष्टि डालने से बहुत इतना सारा जो 100 साल से भी ज्यादा का जो हिस्ट्री बीत गया और बाद में य अमेरिका में देखिए कि यह जो वाइट सुप्रीम मसी है वे लोग किस तरह से जो इमीग्रेंट है उनको चाहते हैं कि इमीग्रेंट सब चले जाए और सिर्फ वाइट लोगों के ही कंट्रोल में यह लंडन यूरोप अमेरिका रहे तो यह सब पढ़कर के हमको लगता है कि आज स्वामी जी के 150 साल के बाद में भी यदि यह परिस्थिति है तो पता नहीं स्वामी जी के समय यह रेशल सुपीरियोर कितनी पावरफुल होग उसमें भी भारत तो गुलाम देश तो यह सब था यह स्वामी जी खुद तो दो चीज है कि उनकी ये जो स्पिरिचुअल अ अवेयरनेस इतनी पावरफुल थी कि ये छोटी मोटी चीजों को वो बिल्कुल ही इग्नोर कर देते थे उसको बिल्कुल ही उसके बारे में केयर नहीं करते थे किंतु निवेदिता जो थी उसकी सेंसिटिविटी यह सब इश्यूज के प्रति काफी थी क्योंकि एक तो वोह स्वामी जी के प्रति काफी डेडिकेटेड थी और एक तरह से निवेदिता का अपमान करना या तो फिर निवेदिता को तिरस्कृत करना वो तो स्वामी जी को ही तिरस्कृत करना हो गया क्योंकि वो तो स्वामी जी की डिसाइल है एक चीज दूसरी की शी वाज इन आयरिश तो ब्रिटेन ने आयरलैंड पर हमला करके काफी कुछ जैसे भारत में किया था उतना सारा तो नहीं किंतु काफी एक्सप्लोइटेशन किया था तो यह सब चीजों से निवेदिता का एक रिबेलियस नेचर तो था ही फर्स्ट टुवर्ड्स ब्रिटिश एंपायर और फिर धीरे-धीरे करके यह पूरा जो वेस्टर्न लाइफस्टाइल माइंड सेट है कि वी आर सुपीरियर टू ऑल अदर रेसेस एंड दिस गिव्स अस अ सॉर्ट ऑफ एन अथॉरिटी टू एक्सप्लोइट देम द सॉर्ट ऑफ डिवाइन कमांड टू एक्सप्लोइट देम तो मैंने इस चीज के बारे में निवेदिता का काफी गुस्सा था तो जब निवेदिता पहले तो टी स्टडी के बात से उसको काफी शौक लगा फिर अमेरिका में आई तो पहले तो शुरू के कुछ दिनों में रिजली मैनर में स्वामी जी के साथ में रह रही थी अभी रिजली मैनर में रह रही थी तब तक तो ठीक था अभी जोसेफाइन मैक्लाउड है बेटी लगेट है सारा ओली बुल है ये तीन लोग स्वामी जी के सबसे ज्यादा डेडिकेटेड वेस्टर्न डिसाइल थे उस समय ये मिसेस सेवियर को यदि छोड़ दे तो मिसेस सेवियर उस समय भारत में थी तो मिसेस सेवियर को छोड़ कर के यह तीन क्लोजेस्ट डिसाइल ऑफ स्वामी जी इन अमेरिका उसके बाद में वेस्ट कोस्ट पे थे मिसेस एलिस सस ब्रो वगैरह किंतु उनके साथ में निवेदिता की मुलाकात उस समय नहीं हुई थी तो ये तीन तो वैसे निवेदिता को काफी सपोर्ट करते थे किंतु स्वामी जी एक बार रिजली मेनर छोड़ कर के कैलिफोर्निया चले गए और निवेदिता को कहा कि तुम यहीं पर न्यूयॉर्क बोस्टन शिकागो ये सब जगह पर जाकर के तुम थोड़ा सा फंड कलेक्ट करो तो एक के बाद एक निवेदिता को शौक लगने लगे यहां तक कि ये जो मेरी हेल इजाबेल मै केटली वगैरह जो स्वामी जी की जो स्वामी जी जिस समय अमेरिका आने के समय पहली बार जहां पर रुके थे मिस्टर एंड मिसेस हेल उनकी जो चार दो लड़कियां दो भतीज आं इन लोगों ने भी निवेदिता को कह दिया कि स्वामी जी के प्रति हमारी भक्ति है किंतु स्वामी जी का जो भारतीय कार्य है उसमें भी यह जो काले भारतीय है उनके उत्थान के लिए देना यह सब तो हमारे से नहीं हो पाएगा ऐसा मुंह पर बोल दिया था तो एक के बाद एक शोक लगते गए कि स्वामी जी को वैसे जो वर्बल काफी कुछ रिस्पेक्ट करते थे स्वामी जी भी उनको रिस्पेक्ट करते थे किंतु स्वामी जी के कार्य के लिए रुपया देना और वह भी एक विदेशी नहीं औरत को जो कि स्वामी जी के पदानु सरण होकर के भारत में गई है यह तो कभी भी संभव नहीं होगा तो यह सब शोक निवेदिता को लगे उसके बाद में एक समय ऐसा आया देखिए कि अमरनाथ की की यात्रा से ही निवेदिता के मन में जो संदेह जो प्रश्नों का एक एक भीतर में एक तूफान चल रहा था वो तो एक था ही था दूसरे में यह सब कुछ हो रहा है तो अभी स्वामी जी जब कैलिफोर्निया से न्यूयॉर्क वापस आए तो निवेदिता के मन में था कि क्या मैं स्वामी जी के प्रति मेरी जो भक्ति और श्रद्धा थी जो फर्स्ट टाइम सिमी क्लब जहां पर लंडन में उनकी बात सुन कर के उनके प्रति इमीडिएट एक श्रद्धा का उदय हुआ था वो अभी श्रद्धा बरकरार रहेगी कि नहीं स्वामी जी को क्या मैं धीरे से अपने मन से भी उनके प्रति एक तरह से यह हो जाएगा मन भेद हो जाएगा कि नहीं किसको पता तो निवेदिता उस समय न्यूयॉर्क में आई और किसी को बिना बताए स्वामी जी जहां पर प्रवचन पहला देने वाले थे न्यूयॉर्क में वहां पे हॉल में जाकर के बैठ गई और मन में यह संदेह सतत चल रहा है निवेदिता खुद अपने हाथों से लिखती है कि मेरे मन में यह संदेह चल रहा है कि स्वामी जी जब होल में प्रवेश करेंगे और यह जो इतनी सारी घटनाएं हुई है तो अभी उनके प्रति मेरी श्रद्धा मेरा फेथ डेडिकेशन रहेगा कि नहीं किंतु देखिए कि जिस क्षण वो खुद मेंशन करती है इस बात को खुद उसका विवरण देती है जैसे ही स्वामी जी ने होल में प्रवेश किया तो उनकी यह जो एक आध्यात्मिक प्रभा है उससे यह पूरा होल जैसे कि प्रकाश मय हो गया और निविता के म मन में भी हृदय में भी जितनी भी आशंकाएं थी प्रश्न थे संदेह थे जैसे कि एक सूरज प्रकट होता है और अंधेरा के से क्षण भर में गायब हो जाता है ठाकुर की वह कहानी है कि एक कमरे के भीतर में शायद हजार साल से अंधेरा हो किंतु जब आप उसमें प्रकाश जब डालेंगे तो क्या वह धीरे-धीरे करके वो अंधेरा जाएगा कि एक क्षण भर में अंधेरा गायब हो जाएगा तो वैसे ही जैसे ही स्वामी जी उस कमरे में प्रवेश किए वैसे ही क्षण भर में सब संदे मिट गए स्वामी जी की बात स्वामी जी का प्रवचन बड़ा ही ध्यान से सुना बड़ा ही फोकस अटेंशन से बाद में स्वामी जी के साथ में बात भी की और फिर जब स्वामी जी न्यूयॉर्क छोड़ कर के यूरोप गए तो स्वामी जी के साथ में वह यूरोप भी गई किंतु उस समय संदेह देखिए कि चीज ऐसी है प्रश्न वगैरह चीज ऐसी है और खास करके निवेदिता तो इतना पावरफुल उसका नेचर था ना कि कभी-कभी क्या होता है जिसका खुद का पर्सनालिटी होता है वो अभी जैसे स्वामी जी को ही देखिए ना जब निवेदिता स्वामी जी को बारबार प्रश्न कर रही है वह कश्मीर की यात्रा के दौरान तो स्वामी जी के ही कोई वेस्टर्न डिसाइल उससे परेशान होकर के स्वामी जी को कहते हैं कि यह निवेदिता आपको इतना प्रश्न कर रही है तो आप परेशान नहीं हो जा रहे क्या तो स्वामी जी ने कहा कि नहीं आई माइसेल्फ फट माय गुरु एवरी स्टेप ऑफ द वे ट इज वई आई एम एबल टू लिसन टू हर विथ पेशेंस एंड रिप्लाई टू हर आंसर मैंने अपने खुद के गुरु का मैंने खुद ने अपने गुरु का प्रति प्रति पद शेप प्रत्येक चरण पे मैंने उनका विरोध किया है उनको प्रश्न किया है और जितना पेशेंटली उन्होंने मुझे सुना मुझे उत्तर दिया इसी की वजह से मैं इस निवेदिता को शांति से सुनता हूं और प्रश्नों का उत्तर देता हूं तो यह स्वामी जी खुद वैसे तो कम नहीं थे जिनकी स्ट्रांग पर्सनालिटी होती है वे लोग इजली किसी के वश में नहीं आते तो स्वामी जी ने जिस इस तरह से ठाकुर के साथ में आखिरी घड़ी तक उनके मन में एक प्रश्न था ठाकुर कैंसर की वजह से मृत्यु शैया पर लेटे हुए थे महासमाधि के कुछ ही दिन बाकी थे उस समय स्वामी जी के मन में यह प्रश्न हुआ कि यह परिस्थिति में शरीर ठाकुर का शरीर पूरा कंकाल सार हो गया है हड्डियां दिख रही है वो शौच जाने के लिए बिस्तर से उठ भी नहीं सकते वो लाटू महाराज उनको वहीं पर बिस्तर पर ही शोज करवा करके उनको क्लीन करते हैं इस परिस्थिति में खाना खाते हैं तो गले में जो कैंसर का जो घाव हुआ है वहां से खाना निकल जा रहा है तो इस परिस्थिति में यदि वह कहे कि मैं अवतार हूं तो मैं मानू तो उसी क्षण ठाकुर ने उनके मन की बात समझ करके क्या कहा जय राम जय कृष्ण श्री राम कृष्ण किंतु तो वेदांत दिख दिए नए जो राम थे जो कृष्ण थे वही राम कृष्ण है किंतु तुम्हारी वेदांत की दृष्टि से नहीं यह आखिरी स्टेटमेंट क्यों ठाकुर ने दिया क्योंकि वेदांत की दृष्टि से हम सबके भीतर में वही ब्रह्मण है वही राम है वही कृष्ण है तो वेदांत की दृष्टि से नहीं एक अवतारवाद की दृष्टि से ठाकुर अवतार है तो स्वामी जी भी आखिरी घड़ी तक ठाकुर को प्रश्न किए थे क्योंकि स्वामी जी का पर्सनालिटी इतना स्ट्रांग था कि किसी के सहज में वश होने वाले नहीं थे तो निवेदिता भी ऐसा ही था निवेदिता जब यूरोप गई तो उसके मन में ये संदेह प्रश्न चलते ही रहे उस समय मिसेस ओली बुल वह भी वहां पर जाकर के अभी स्वामी जी गए हैं पेरिस इन लोगों के साथ में मिस्टर एंड मिसेस फ्रांसिस लगेट के साथ में स्वामी जी गए पेरिस पहले तो और फिर पेरिस में जितने भी धनी व्यक्ति है यह आर्ट आर्टिस्ट है यह साइंटिस्ट है यह फिलोसोफर है यह थिंकर्स है ये एजुकेशनिस्ट है इन जो कि ऑथर्स है यहां तक कि चर्चमन जो है उन सबके साथ में वो स्वामी जी एकदम हाईली इंटेलेक्चुअल डिस्कशन कर रहे हैं दूसरी ओर मिसेस ओली बुल उस समय ये जो फ्रांस का जो समुंदर का किनारा है वहां पर ब्रिटेनी बोलकर के एक जगह है वहां पे वो रह रही है और उसने निवेदिता को बुलाया कि तू एक काम कर स्वामी जी के साथ में रह कर के स्वामी जी को प्रति संदेह प्रश्न वगैरह करने की बजाय तुम यहां पर आकर के मेरे साथ में रहो शांत समुंदर का किनारा है कुछ शांति से रहेंगे हम लोग दोनों रहेंगे तो हो सकता है कि तुम्हारे मन में कुछ अच्छा एक लगे तो यह बात सुन कर के निवेदिता वहां पर चली गई ब्रिटेनी उसके बाद में मिसेस ओली बुल स्वामी जी को बार-बार लेटर लिखती है कि आप भी यहां पे आइए पेरिस में इतने सारे लोग हैं इतनी बातें चर्चा विचारणा चलती रहती है इतना घूमना फिरना होता है तो आपसे निवेदिता के साथ में शांति से बैठ कर के बात करने का समय नहीं मिल रहा था तो आप भी यहां पे आ जाइए यहां की समुंदर के किनारे की शांति में निवेदिता के साथ में वार्तालाप कीजिए यदि उसके मन के कुछ प्रश्न है तो प्रश्नों का उत्तर दीजिए तो स्वामी जी भी इस बात से सहमत होकर के ब्रिटेनी गए ब्रिटेनी में मिसेस ओली बुल ने कुछ कॉटेजेस रेंट पे ली हुई थी एक कॉटेज में निवेदिता रहती है एक में स्वामी जी एक में ओली बुल मिसेस ओली बुल और स्वामी जी निवेदिता की कोटेज में जाकर के कुछ दिनों तक उस वार्तालाप करते हैं प्रश्नों का उत्तर देते हैं और अभी इस बात का किंतु कितना परिणाम आया यह सब कहना मुश्किल है क्योंकि देखिए कि जो निवेदिता है उस जो उस लेवल प उसका जो माइंड था उस लेवल पर इनसाइट पाना कि क्या चल रहा है हम लोगों के लिए बड़ा ही दुष्कर है निवेदिता ने जब वो अपनी मास्टर एस आई सो हिम पुस्तक लिखी है उसमें इतना सुंदर उसने अपना जो इवोल्यूशन है उसको ट्रेस किया है उसमें वो एक है दूसरा की निवेदिता के लेटर्स से विता के लेटर्स पढ़ेंगे उसमें स्वामी जी के प्रति उसकी जो श्रद्धा भक्ति प्रकट होती है स्वामी जी के प्रति जो रिस्पेक्ट प्रकट होती है वो अद्भुत है स्वामी जी ने एक बार एक पोयम लिखी पोयम पढ़ कर के सबको सुना रहे हैं ये वही रिजली मैनर की ही बात है तो सबको सुना रहे हैं फिर स्वामी जी एक लेटर में लिखते हैं कि मेरी पोयम का मुझे कैसा फीडबैक मिला फिर कहते हैं कि निवेदिता कहती है आपकी पोयम बहुत अच्छी है किंतु वो निवेदिता की बात पर मैं विश्वास नहीं करूंगा क्योंकि निवेदिता की दृष्टि से मैं जो कुछ भी करता हूं सब कुछ बेस्ट ऑफ द बेस्ट ही है तो यदि पोयम अच्छी भी नहीं होगी तो भी शायद निवेदिता ने ऐसा कहा है कि भाई पोयम बहुत अच्छी है इसलिए इसके फीडबैक प मुझे विश्वास नहीं यानी देखिए कि ऑन वन हैंड ये जो रिस्पेक्ट ऑन द अदर हैंड ये प्रश्न परंपरा ये दोनों पैरेलल एजिस्ट कर सकती है ह्यूमन माइंड इतना कॉम्प्लिकेटेड है इतना कॉम्प्लेक्टेड ता का मन उसके मन में क्या चल रहा था बिल्कुल परफेक्टली कहना मुश्किल है किंतु आखिरी दृश्य का निवेदिता ने जो सुंदर वर्णन किया है कि स्वामी जी जाने वाले हैं निवेदिता संध्या का समय था व लैटन लेकर के निवेदिता खड़ी है और स्वामी जी वो जो कार्ट होता है घोड़ा गाड़ी उसमें कुछ तो स्वामी जी बैठे थे और व जो चल रहा है और उस निवेदिता को देख कर के ऐसा करके हाथ करते हैं गुड बाय करते हैं तो दैट वाज द लास्ट सीरियस डिस्कशन बिटवीन देम उसके बाद में स्वामी जी जब भारत जाते हैं तो उनकी अवस्था धीरे-धीरे करके बड़ी ही खराब से खराब होती जाती है स्वास्थ्य भंग होता जाता है और उनकी महासमाधि से कुछ ही समय पहले निवेदिता के मन में शायद कुछ होगा कि अभी स्वामी जी का आखिरी समय है उनका आखिरी दर्शन करना है तो यही एक समय है तो उस समय निवेदिता भारत आई थी किंतु स्वामी जी का स्वास्थ्य उस तरह का था कि अभी किसी के साथ में किसी भी तरह का सीरियस डिस्कशन करना संभव नहीं था तो निवेदिता आती थी स्वामी जी को प्रणाम करती थी दर्शन करती थी और चली जाती थी वो कोई सीरियस डिस्कशन बाद में हुआ नहीं ये ब्रिटेनी में जो दिन बिताए वही एक तरह से यदि कहे तो निवेदिता और स्वामी जी के जीवन का एक लास्ट चैप्टर है इसके बाद में हमको पता है कि स्वामी जी को पता चल गया कि निवेदिता के जो विचार है सिर्फ रिलीजियस फील्ड तक आबद्ध नहीं है पॉलिटिकल थिंकिंग भी उसके साथ में मिक्स हो रहा है खास करके एक प्रोफेसर गेडे बोलकर के एक फ्रेंच था जिसके विचारों से सोशियोलॉजी से प्रभावित होकर के निवेदिता ने उसके साथ में कुछ समय बिताया था तो स्वामी जी को लगा कि अभी धीरे-धीरे करके उसकी जो विचार सरणी है दूसरी डायरेक्शन में जा रही है किंतु स्वामी जी की ओर से निवेदिता को हालांकि परफेक्ट फ्रीडम था ऑन द अदर हैंड स्वामी जी के माइंड में यह आईडिया भी बड़ा क्लियर था कि राम कृष्ण मिशन इज डेडिकेटेड ओनली टू रिलीजन एंड ओनली टू द सर्विस ऑफ गॉड नॉट टू एनी अदर एक्टिविटी स्पेशली नॉट पॉलिटिक्स पॉलिटिक्स में तो कभी भी एक एक कदम भी नहीं रखना है उस साइड में कभी भी व मुड़ करके भी नहीं देखना है पॉलिटिक्स की ओर तो स्वामी जी ने यह बात शायद राजा महाराज को बताई होगी निवेदिता जब स्वामी जी को आखिरी आखिर में मिली थी उस समय लेटर में शायद स्वामी जी ने लिखा है कि आई रिकमेंड यू इन द बेलूर मठ ओनली राजा राजा महाराज नो वन एल्स एंड विद दिस माय कॉन्शियस इज क्लियर बेलूर मठ में तुमको यदि किसी से सलाह मशवरा करना है किसी से परामर्श करना है तो मैं तुमको रिकमेंड करता हूं राजा को इसके अलावा और किसी को भी नहीं और यह कह कर के मेरी जो अंतरात्मा है अभी शांत है क्योंकि और किसी के चक्कर में पड़ कर के और किसी से सलाह लेकर के और कुछ जद उसके मन में हो जाए बेटर है कि जद सलाह लेनी है तो सिर्फ राजा महाराज से लो राजा महाराज जो डिसीजन लेंगे दैट विल बी द कमांड ऑफ श्री रामकृष्ण हिमसेल्फ और यही राजा महाराज ने डिसीजन लिया था कि निवेदिता को रामकृष्ण संघ से बाहर निकाल दिया जाए क्योंकि उसकी एक्टिविटीज पॉलिटिकल हो रही थी तो वो पूरा जो चैप्टर था निवेदिता का आखिरी समय मठ में उस समय के सभी डिसीजन राजा महाराज क थे किंतु यह देखिए कि स्वामी जी ने बड़ा ही स्पष्ट रूप से निवेदिता को कहा है यदि किसी के भी साथ में सलाह मशवरा करना है सलाह लेनी है तो सिर्फ राजा की लो और किसी की नहीं तो स्वामी जी की ही जो एक तरह से जो विश होगी कि अपने ऑर्डर को पॉलिटिक्स से कोई भी संबंध नहीं होना चाहिए उसी का पालन करके राजा महाराज ने निवेदिता को संध से निकाला था तो यह पूरी निवेदिता की कहानी ये यूरोप भ्रमण में पेरिस में जब थे स्वामी जी उस समय की यह पूरी घटना होली तो उसके बाद में स्वामी जी ये मैडम एमा कालब वगैरह के साथ में वो यूरोप भ्रमण में गए विएना कांस्टेंटिनॉपल एथेंस इजिप्त इजिप्त में एकाक स्वामी जी को लगा कि नहीं अभी भारत की ओर जाया जाए अभी भारत की सफर करनी चाहिए क्योंकि उनको पता चलने लगा था कि अभी पृथ्वी पर उनके दिन जो है उसकी उल्टी गिनती काउंटडाउन शुरू हो गया है अभी जो होगा उनके साथ में मृत्यु के समीप यदि जाना ही है तो भारत में जो कार्य है उसको एकदम मजबूत उसको पावरफुल फाउंडेशन पर रख दिया जाए तो एक एक हम एक अपने कल्पना की दृष्टि से सोच सकते हैं कि ये जो पुराने पिरामिड है 10000 साल पुराने ना कि 8000 साल पुराने जो भी हो इजिप्त में उसके सामने स्वामी विवेकानंद खड़े हैं क्योंकि वो जो किंग्स वैली जो कहते हैं एरिया जहां पर यह सब पिरामिड्स वगैरह है तो वहां की मुलाकात स्वामी जी ने ली थी तो एक किस तरह से एक तो मोस्ट एंसेट सिंबल ऑफ मैनकाइंड यह पिरामिड और उसी एंट ट्रेडीशन को ही मॉडर्न एज में प्रसारित करने वाले प्रचार प्रसार करने वाले स्वामी विवेकानंद य गिजा के पिरामिड के सामने यदि स्वामी जी का कोई फोटो लिया गया होता तो सच में ही बड़ा ही एक क्या कहेंगे कि इ हिस्टोरिकल एक डॉक्यूमेंट हो जाता किंतु खैर लिए भी गए होंगे तो अभी अपने पास में नहीं है आखिरी आखिर में आई थिंक 2001 या दो में ही हमको स्वामी जी के कुछ फोटोग्राफ मिले थे 2000 की बात है ना कि 1990 की बात है जो भी है तो इस तरह से स्वामी जी के कुछ-कुछ फोटो कहां पर छुपे भी होंगे हमको पता नहीं भविष्य में हो सकता है कि मिल जाए तो जो भी है इजिप्त से फिर स्वामी जी ने बेलून मठ की यात्रा की भारत की यात्रा की और भारत में आए तो वैसे तो किसी को पता नहीं था स्वामी जी ने किसी को बोला नहीं था न्यूज़पेपर में कोई समाचार नहीं स्वामी जी का फर्स्ट टाइम भारत में आगमन और सेकंड टाइम भारत में आगमन इन दोनों के बीच में कंट्रास्ट हम लोग मैंने कितना बड़ा कंट्रास्ट पहली बार जब भारत आए कोलंबो में उतरे पदार्पण किया कितने लोग स्वामी जी का अकार करने के लिएने उनको उनका यह करने के लिए वेलकम करने के लिए खड़े थे सेकंड टाइम स्वामी जी आए चुपचाप बंबई बंबई में उतरे वहां से से ट्रेन में जा रहे हैं कलकाता तो मनमत नाथ बोलकर के एक डिसाइल उनका एक परिचित था वो उ उनके साथ में मुलाकात हो गई तो वो भी एकदम आश्चर्यचकित हो गया स्वामी जी आप यहां पे है हमने तो सोचा विदेश में है भारत में आएंगे तो क्या सब धूमधाम होगी कुछ नहीं हमको पता ही नहीं है तो जो भी है स्वामी जी पहुंचे वहां पे बेलून मठ रात को पहुंचे रात का खाने का समय चल रहा था और स्वामी जी ने देखा जाकर के कि गेट बंद है तो गेट जंप लगा कर के जंप लगा कर के गेट को क्रॉस करके वो वहां पे मठ की ओर जा रहे हैं और कपड़े तो विदेशी पहने हैं तो वहां पे साधु लोग खाना खाने को बैठे हैं तो एकदम किसी ने आकर के समाचार दिया कि एक साहब आ रहे हैं एक ब्रिटिश ऑफिसर कोई आ रहा है तो सब लोग सोच रहे हैं कि मठ में इतनी देरी रात को कोई ब्रिटिश आदमी यहां पे क्यों आएगा क्योंकि वो कोर्ट पेंट वगैरह शायद स्वामी जी ने पहना होगा विदेशी कपड़े तो ये लोग दो-तीन साधु बाहर खड़े रह कर के देख रहे हैं कि कौन है ये विदेशी आदमी इतनी देरी रात को मठ में आए आकर के सामने आकर के देखा तो स्वामी जी स्वयं उस मठ में एकदम हल्लागुल्ला हो गया कि अरे स्वामी जी आए स्वामी जी आए किसी को कुछ पता नहीं फिर स्वामी जी को लेकर के वहां पर खाने को बैठे रात को खिचड़ी था व खिचड़ी खाया स्वामी जी ने सबके साथ में मिलकर के और फिर वो जो गप लगाने का जो एक सिलसिला अपने गुरु भाइयों के साथ में मिलकर के अपने शिष्यों के साथ में तो रात की रात वह स्वामी जी गप लगाते रहे तो वो यहां से मने दिस इज द एंड ऑफ स्वामी जी सेकंड विजिट टू द वेस्ट और अभी आखिरी जो समय बचा है दिसंबर से लेकर के जुलाई 1902 यानी कि 1900 1901 और यह जुलाई माने ढाई साल का आखिरी समय यभ स्वामी जी के साथ में बचा है तो इसके बारे में अभी हम कल बात करेंगे आज श्याम श्याम ा तेही अरे सत श्री रा अभी देखिए कि सबसे ज्यादा सैड स्टोरी कौन सी है पता है निविता के लेटर्स जो मैंने पढ़े मुझे इतना अच्छा लगे लेटर्स वो लेटर्स अभी शंकरी प्रसाद बसु वो रिसर्च कर रहे हैं निवेदिता के ऊपर में शारदा मठ नहीं कर रहा नहीं हम कर रहे हैं और कहीं से एक दिन पता चला कि किसी के घर जाइए निवेदिता के लेटर की कलेक्ट करने है ना किसी के घर में मिलेंगे लेटर तो अभी शंकरी प्रसाद यानी की कोलकाता यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और अपने एक अच्छे डिवटी है तो गए वहां पे तो कोई एक एक वृद्ध सज्जन वहां पर रह रहे थे शायद तो उनके साथ में कुछ बात कि अभी पूरा घर अभी वृद्ध सज्जन भी मृत्यु के किनारे पर बैठे हैं घर भी ऐसा लगता है अभी गिर जाएगा धूल है मिट्टी है यह सब है और अभी उनके साथ में बात कर रहा अभी शंकरी प्रसाद सोचते हैं यहां पे मुझे क्या मिलने वाला है कब बिना मतलब में यहां पे आक के बैठा हूं तो ठीक है अभी एक तो एक एक ये तो रहती है ना मैनर्स रहती है कि आ कर के देखा कि कुछ नहीं है तो खड़े होकर चले गए ऐसा भी तो नहीं है भी आए हैं बैठे हैं तो चाय बाई तो पीनी पड़ेगी तो उसके बाद में वो सज्जन कहते हैं कि वो देखिए वो कार्टून है उसमें यदि आपको कुछ मिल जाए तो वो कार्टून वो पूरा धूल मिट्टी से भरा हुआ उसको खोल के देखा तो अद्भुत पूरा निवेदिता के लेटर से भरा हुआ था ओरिजिनल हैंड रिटन लेटर्स और ये कहां से आए वो कहते हैं कि शायद जोसेफाइन मैक्लाउड ने इसको कलेक्ट किया होगा और उसके बाद ने हो सकता है शायद कि निवेदिता स्कूल में इसको रखा होगा फिर निवेदिता स्कूल से इधर या मैंने एक कंफ्यूज है पूरा क्रोनोलॉजी एनीवे यहां पे इट एंडेड अप हियर मैंने और फिर उसको लेकर के य इसने वो जो दो वॉल्यूम में निवेदिता के लेटर्स पब्लिश किए अब यहां तक कि मैं जब टीसी में था मुझे पढ़ने थे मुझे कहीं नहीं मिल रहा है सेम स्टोरी मेरे साथ में रिपीट हुई मुझे निवेदिता के लेटर्स चाहिए हालांकि लाइब्रेरी में तो मुझे मिल गए लाइब्रेरी में तो मैंने पढ़ा किंतु मुझे पर्सनल कॉपी चाहिए थी वो कहीं नहीं मिल रही तो मैं लिमडी में था उस समय पहली बार मैं राजकोट गया तो राजकोट के बुक स्टोल में मेरा बैचमेट था वहां पर संजय महाराज तो संजय को मैंने बात-बात में कहा कि मैं निवेदिता के लेटर्स खोज रहा हूं मुझे कहीं पर नहीं मिले लाइब्रेरी के अलावा कहीं नहीं मिलते हैं मुझे अपना पर्सनल कॉपी चाहिए नोट्स वगैरह रखने के लिए तो वो मुझे बोलता है अच्छा निविद का लेटर चाहिए ठहरो ठहरो मैं देखता हूं वो भीतर में गया जहां पे वो जो सब रिजेक्टेड किताबें रखी की वय पूरा ढक बना कर के धूल मिट्टी के भीतर में उसमें से निवेदिता के दो लेटर लेटर्स की एक कॉपी मिली वो बोला कि ये आखिरी कॉपी है ले जाओ तो यहां से और उसमें भी वो जो उदय जो होती है ना वो होल बना देती है पेपर के भीतर में ऐसा सब था व वो कॉपी मेरे पास अभी भी है मैं अभी भी क्योंकि अभी नोट्स मेरी है तो अभी उसको निकालना मुश्किल है बाद में अद्वैत आश्रम ने रिसेंटली पब्लिश कि है किंतु अभी तक ऐसा था कि यही एक कॉपी अवेलेबल थी यू आर राइट इन अ वे किने रामकृष्ण मिशन तो ठीक है शारदा मठ ने भी ऐसा कुछ ज्यादा कुछ नहीं किया यू आर राइट शी इ सॉर्ट ऑफ एन ऑर्फन इन इंडिया और यह देखिए कि हम लोग शरद चंद्र चक्रवर्ती को दो डिसाइल को मैं हमेशा कंट्रास्ट करता हूं एक है शरद चंद्र और दूसरी है निवेदिता तो यह जो स्वामी शिष्य संवाद का अपने संग में जो स्थान है उससे उसका थ भी ये मास्टर एज आई सो हिम का नहीं है बड़े रेयरली किसी ने उस किताब को पढ़ा होगा और पढ़ा होगा तो उसके बारे में कुछ चिंतन किया होगा सो दिस इज अगेन कि स्वामी जी का एक पूरा जो एस्पेक्ट है वो हम मिस कर रहे हैं ये एक एस्पेक्ट ट्रेडिशनल एस्पेक्ट हम समझ रहे हैं किंतु एक रेडिकल एस्पेक्ट भी था स्वामी जी का व्हिच इज वेरी डिफिकल्ट फॉर अस टू अंडरस्टैंड माने यह भी समय आना बाकी है स्वामी जी का वो एस्पेक्ट उसको समझने का भी समय आना अभी बाकी है किंतु क्या है ना देखिए यह सब लिप सर्विस जैसे निवेदिता ने खुद नेय डिस्कवर किया कि स्वामी जी के कई सारे लोग हैं जो कि स्वामी जी को लिफ सर्विस तो देते हैं किंतु उनके कहे अनुसार कुछ करने की बात आती है तो सब कोल्ड फिट हो जाता है सबके माने वो सब लोग पीछे पड़ जाते हैं तो ऐसा अपने ऑर्डर के बारे में ऐसा तो नहीं कहूंगा किंतु फिर भी जो निवेदिता को पढ़ कर के आईडिया समझने वाली बात है दैट इज समथिंग कंपलीटली डिफरेंट भले उसको हम ऑनर करें उसकी स्मृति को उसके स्टेच्यू वगैरह कोलकाता में जाए कितने सारे हैं हमने तो स्कूल की किताबों में भी निवेदिता का नाम पढ़ा है तो ऐसा नहीं है कि उसको कंपलीटली हम लोग इग्नोर कर दे रहे हैं किंतु मेन थिंग इज द मैटर ऑफ आइडियाज स्वामी जी का निवेदिता के साथ में जो वार्तालाप था जो कोरस पेंस था वो एक डिफ एक बिल्कुल एक डिफरेंट एस्पेक्ट स्वामी जी का हमारे सामने लाता है जोक हम शायद अभी इतना नहीं समझ पाए माने दोनों दृष्टि से स्वामी जी का वो एस्पेक्ट और निमता के खुद के आइडियाज दिस इज व्हाट आर इगनोरिंग ऐसा मुझे लग रहा है देखिए कि आप ऐसा तो हम लोग नहीं कहेंगे कि उसको निकाल दिया गया है दूसरा कि निवता ने खुद ने छोड़ा नहीं है निवता टिल द लास्ट डे शी वुड ऑलवेज साइन निवेदिता ऑफ राम कृष्ण विवेकानंद उसने फॉर्मली कभी रिजाइन किया नहीं है शी ट ऑन देखिए उन्होंने फॉर्मल रेजिग्नेशन तो दिया नहीं है शी वेंट ऑन वर्किंग ऑन हर ओन स्वामी जी की महासमाधि के बाद में उसने अपने हिसाब से कार्य करना शुरू कर दिया फिर हम ही लोगों ने है कि न्यूजपेपर में यह ऐड दिया था कि निवेदिता के साथ में हमारा ऑर्गेनाइजेशनल कोई संपर्क नहीं हा मुझे नहीं लगता कि देखिए 100% मुझे भी देखना पड़ेगा रेफर करना पड़ेगा किंतु मैं अनुमान करके यहां पर कह रहा हूं कि हां व थ मुझे देखना पड़ेगा कि एक्जैक्ट क्या था किंतु मुझे ऐसा देखिए एक्चुअली मेरा भी प्रॉब्लम क्या है ना कि मैंने निवेदिता को इंडिपेंडेंटली स्टडी नहीं किया अभी स्वामी जी के जाने के बाद में निवेदिता के साथ में क्या हुआ वो सब किताबें मैंने पढ़ी है किंतु इतना डिटेल में नहीं मेरा निवेदिता का स्टडी इज रिलेटेड टू स्वामी जी स्वामी जी के साथ में निवेदिता का जो इंटरेक्शन है उन्होने काफी डिटेल में काफी इंटरेस्ट से पढ़ा है तो स्वामी जी के जाने के बाद क्या हुआ इसके बारे में मैंने इतना ध्यान नहीं दिया सो आई एम आल्सो गिल्टी ऑफ द सेम प्र और ठाकुर की कहानी है ना कि एक हिंदू को किसी ने साधक को किसी ने पकड़ करके वो अल्ला मंत्र दे दिया तो अल्लाह अल्ला जब करते करते काली आ जाता है तो मुला लोग पकड़ के ले गए तो बोले कि क्या करूं मैं गले तक काली आ गया है अल्लाह बोलते बोलते ही काली आ जाता [हंसी] है जैसे ठकुर ने जैसे कहा ना कि सारे गामा पधान नी पे अब ज्यादा नहीं रह सकते क्योंकि नी बड़ा ही तीव्र स्वर है तो आपको फ सारे गामा के पर में आ ही जाना पड़ेगा तो वैसे ही यह अद्वैत भूमि पर विचरण की मन संपूर्ण रूप सेय चित्त वृत्ति शून्य हो गया है उस अवस्था में आप समाधि में 21 दिन में ही मृत्यु हो जाएगी उसके बाद में आपको वापस आना ही पड़ेगा यह जो इस राज्य में माया के राज्य किंतु जब वापस आते हैं तो यह अपना मन सोने का हो जाता है उसके बाद में अहम विद्या का अहम रहता है बालक का अहम रहता है संतान का रहता है उस अहम से फिर माया के व चक्कर में आप फसते नहीं तो यह तीन आप कह सकते हैं कि पहले तो हम साधन करते हैं नेती नेती करके फिर सिद्धि प्राप्त करते हैं फिर इति इति करके वापस आते हैं ऐसे तीन स्टेज आप कह सकते हैं मुझे लगता है कि ठाकुर को समझने के लिए कोई नया वाद निकालने की जरूरत नहीं है वो जो अपना ट्रेडिशनल द्वैत और अद्वैत है उसी से ठाकुर को आप बड़े ही आसानी से समझ सकते हैं ठाकुर वो बताते हैं कि किस तरह से आप कौन से लेवल पर रह सकते हैं जहां तक मन में माया है या तो मोह है तब तक आप अद्वैत में है जैसे ही मोह भंग होगा आप जब तक मोह है तब तक द्वेत में है जैसे ही मोह भंग होगा अद्वैद में पहुंच गए किंतु अद्वैत की सर्वोच्च भूमि है वहां पर आप ज्यादा दिन नहीं टिक पाए पाएंगे तो उसके बाद में वापस आना है तो यह ठाकुर की थिरी इतनी क्लियर है इतनी स्पष्ट है अपना प्रॉब्लम यहां पर क्या आता है कि द्वैत और अद्वैत के जो आचार्य है ना उन्होंने अपने आइडियाज को एक्सक्लूसिव बनाने का प्रयास किया कि अद्वैत ही सही है या तो फिर धत ही सही है ये इसी वजह से अपने मन में ये कंफ्यूजन होता है वरना आप इन लोगों की एक्सक्लूसिविटी को छोड़ दीजिए शंकराचार्य द्वैत की निंदा करते हैं या तो फिर द्वैत वाले रामानुजाचार्य मधवा चार्य जद त की निंदा करते होंगे यह सब चीजों को छोड़ कर के प्योर उनके आईडियाज को समझे और ठाकुर को लीजिए तो मुझे नहीं लगता कि कहीं पे थोड़ा सा भी कंफ्लेक्स का पथ स्थापित करने के लिए हमने दूसरों के साथ में कंफ्लेक्स कि पाकिस्तान का आइडेंटिटी क्या है तो भारत के साथ में दुश्मना वट है अभी भारत के साथ में दुश्मना वट चली जाएगी तो पाकिस्तान ही पूरा खत्म हो जाएगा उसके अलावा पाकिस्तान का एक्जिस्टेंस ही नहीं है इंडिपेंडेंट यदि कहा जाए तो उनका पूरा आइड टी है एमटी विथ इंडिया तो यदि आप एक्सक्लूसिव पथ बनाते हैं तो आपका आइडेंटिटी ही हो जाता है कि दस लोगों के साथ में मेरा एमिटी है यह मेरा आइडेंटिटी है अदर वाइज एमिटी चला जाएगा तो आपका एक्सक्लूसिविटी नहीं रहेगा आप फिर वो एक जनरल हिंदुइज्म की जो ट्रेडीशन उसमें आ जाएंगे किंतु अपने चेले को बनाना है चेलो को कहना है कि इधर मत जाओ उधर मत जाओ सिर्फ यहां पर आओ तो ठाकुर ने भी वैसे मास्टर महाशय को कहा था किंतु खैर दैट इज अ डिफरेंट टॉपिक किंतु ये जो एक्सक्लूसिविटी मुझे जब तक बनानी है तब तक मैं दूसरों के साथ में उनकी निंदा करूंगा एंड देन द प्रॉब्लम विल स्टार्ट यह जो सीजनल माइग्रेशन जैसे कि वो पंखी कैसे वो हट सीजन में कोल्ड क्लाइमेट की ओर जाते हैं कोल्ड सीजन में हॉट क्लाइमेट की ओर आते हैं हम लोग खुद कैसे वो वेकेशन के लिए ल स्टेशन में जाते हैं तो वो जिस तरह की क्लाइमेट है जिस तरह से मन का भाव है उस तरह से वि विच मतलब साधन पद्धति ल्स उसमें कौन सी एक बहुत बड़ी बात है यह जो ट्रेडिशनल बोलो ज्यादा स्टडी करते हैं उनके मन में ये सब कंफ्लेक्स कभी स्टडी किया नहीं तो मेरे मन में तो ये कंफ्लेक्स लोग प्रश्न करते हैं यहां पे ऐसा है तो वहां प ऐसा है तो मैंने कहा अरे यार छोड़ो ना उस सब चीजों को तु स्वामी जी को पढ़ो ठाकुर को पढ़ो ये सब क्या लेकर के बैठे हो कन्फ तो तुमने अपने माइंड में खड़े करके रखे हैं अननेसेसरी मैं ये सब बहुत सारी चीजों से बच गया हूं क्योंकि मैंने स्टार्ट ही ठाकुर म स्वामी जी से की है बाद बाद में तो पता चला इतना बड़ा वेदांत है उसको पढ़ना पड़ेगा तो अभी तक तो मैंने इतना डिटेल में कुछ भी पढ़ा नहीं है यह प्रश्न भी मेरे खड़े नहीं होते यह जो ठाकुर कहते हैं ना कि संध्या गायत्री में ल होती है गाय फिर ओंकार में लय होता है फिर यह जो कीर्तन व कीर्तन चलता है ना हा यह जो कीर्तन करते करते नीताई हमार माता हाथी तो ऐसा व कीर्तन चल रहा है तो फिर थोड़ी देर के बाद में निताई हमार माता हाथी फिर माता हाथी फिर हा फिर हा करते ही समाधि तो यह स्थूल से सुक्ष्म की यह जो यात्रा है यह तो बड़ी स्पष्ट रूप से अपने शास्त्रों में भी लिखी गई है ठाकुर मा स्वामी जी भी इसके बारे में बोलते हैं प्रॉब्लम कहां पे होता है आप जब यह कहेंगे कि नहीं स्थूल जगत ही सत्य है और भगवान कृष्ण के साथ में हमारा माने भक्ति भगवान का संबंध हो सकता है भक्त भगवान का किंतु भगवान कृष्ण में लय नहीं हो पाएंगे ये वे लोग जब ये बाउंड्री वॉल बनाते हैं वहीं से तो ट्रेडिशनल प्रॉब्लम चालू होते हैं फिर वो लोग कहेंगे कि नहीं कृष्णा और मेरे में कोई फर्क नहीं है और फिर मैं कृष्णा में लय हो सकता हूं तो फिर ये लोग कहेंगे स्थूल जगत को नहीं अपनाएंगे तो आप यहां पे बीच में बाउंड्री क्यों बनाते हैं कि मैं आप संध्या से गायत्री में जाऊंगा किंतु गायत्री में से ओमकार में नहीं जाऊंगा दूसरे लोग बोलते हैं मैं ओमकार में ही रहूंगा फिर उसमें से गायत्री या संध्या में नीचे नहीं आऊंगा ऐसा आप क्यों बीच में क्यों आप इस तरह से बैरियर खड़ा करते हैं दैट इज द प्रॉब्लम अदर वाइज आप येय स्मूथ रखिए संध्या टू गायत्री टू ओमकार ओमकार टू गायत्री टू संध्या ये तो अप डाउन अप डाउन से चलता रहेगा ऐसा जब हम स्वीकार कर लेंगे तब सब कंफ्लेक्स जाएंगे जिसको जद साधना करनी है ना तो राम कृष्ण विवेकानंद साहित्य इज कंप्लीट इन इट सेल्फ दूसरा कि इंटेलेक्चुअल एक्सप्लोरेशन भी करना है बहुत सारे लोग बोलते हैं यार स्वामी जी को क्या पढ़ना है तो पैट्रियोटिज्म के बारे में बोलते हैं हम तो पेट्रियट नहीं है हम तो साधु है हमको तो फिलोसोफी पढ़नी चाहिए अरे इवन इन ऑर्डर टू प्रॉपर्ली अंडरस्टैंड फिलोसोफी यू विल हैव टू रीड राम कृष्ण विवेकानंद अदर वाइज यदि आप डायरेक्ट फिलोसोफी में जाएंगे तो कंफ्यूजन के अलावा और कुछ नहीं मिलेगा क्योंकि ट्रेडिशनल फिलोसोफी में बहुत सारे प्रॉब्लम्स थे फिलोसोफर अपने आप में परफेक्ट है किंतु पता नहीं क्यों उन्होंने यह सब बैरियर बीच-बीच में खड़ी कर दी है कि इस फेज में से दूसरे फेज में आप नहीं ये फेज ट्रांजिशन है वो नहीं होगा एक ही फेज सही है दूसरे फेज गलत है तो यहां से प्रॉब्लम चालू होगा आप खुद और फिर यह बैरियर खड़ी करने के लिए वे लोग आर्टिफिशियल सब कंस्ट्रक्ट खड़े करेंगे यह जो अज अर्थात की जिसका जन्म नहीं हुआ है वह अज तो शंकराचार्य इस तरह से डिफाइन करेंगे दूसरा अज को डिफाइन करेंगे बकरा के रूप में अभी संस्कृत लैंग्वेज भी ऐसी है कि इसके बहुत सारे इंटरप्रिटेशन है य टेक्स्ट टॉर्चर करके आर्टिफिशियल बैरियर खड़ी करके सब भाष्य का ने लिखा है तो जब तक अपनी खुद की कांसेप्चुअल क्लेरिटी नहीं हो जाती तब व हम वहां पर जाएंगे तो कंफ्यूजन के अलावा कुछ नहीं मिलेगा m