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Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life and Teachings 24 Apr 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः

बेलूड़ मठ की कहानियाँ: सुबह ब्रह्ममुहूर्त में ध्यान का विशेष महत्त्व

स्वामी जी के अमेरिका से वापस आने के बाद की घटना है। अखंडानंद जी एक बार स्वामी जी के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं और फिर वो तो अपने सोने को चले गए। रात को देरी हो गई है। किंतु आधी रात भी बीत गई है। उनको इच्छा हुई कि चलो स्वामी जी के साथ में फिर से एक बार बात करते हैं। स्वामी जी का दर्शन करते हैं। एकदम मध्य रात्रि है और मठ में पूरा सन्नाटा है। सभी लोग सोए हुए हैं। स्वामी जी अमेरिका से आने के बाद में यह जो मठ की आज की जमीन है नीलांबर गार्डन और जहां पे आज का मठ है बेलूर मठ वो जमीन खरीद ली गई है और ये लोग या तो नीलांबर गार्डन में रह रहे हैं या तो फिर वो जो जहां पे आज की जमीन में जो मठ है वहां पे दोनों में से एक जगह की यह बात है। स्पेसिफाई नहीं किया। तो अखंडानंद जी को इच्छा हुई मध्य रात्रि के बाद में कि चलो स्वामी जी का एक बार दर्शन कर लेते हैं। तो उन्होंने हल्के से स्वामी जी के कमरे का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने सोचा कि यदि स्वामी जी सोए होंगे तो नेचुरली वह उत्तर नहीं देंगे। इतना हल्के से खटखटाया था जिससे कि उनकी नींद जो है उसमें डिस्टरबेंस ना हो। एट द सेम टाइम यदि स्वामी जी जगे हैं तो वो अवश्य उत्तर देंगे। तो जैसे ही अखंडानंद जी ने स्वामी विवेकानंद के कमरे का दरवाजा हल्के से खटखटाया इमीडिएटली स्वामी जी ने गाते हुए गीत गाते हुए कहा नोकिंग नोकिंग हु इज देयर वेटिंग वेटिंग ओ ब्रदर डियर यह एक इंग्लिश पोएम है तो स्वामी जी कहते हैं कि कौन नोक कर रहा है दरवाजे के ऊपर में इस समय कौन है जो मेरा प्रिय बंधु जो कि मेरे लिए दरवाजा खटखटा रहा है तो देखिए देखिए कि अखंडानंद जी कहते हैं कि स्वामी जी को हैबिट थी कि बिल्कुल अर्ली उनका जीवन बाल्य अवस्था से ही सुबह को अर्ली मॉर्निंग उठ जाना और फिर जप ध्यान या तो फिर पढ़ाई लिखाई कंटीन्यूस अर्ली मॉर्निंग से ही करना स्टार्ट कर देना। जब यह मठ का गठन हुआ बेलूर मठ का उस समय स्वामी जी ने नियम बनाया कि सबको सुबह को घंटा लगेगा सबको उठकर के वहां पर एक साथ में मंदिर में जाकर के जप ध्यान करना है। तो एक दिन की बात है त्रिगुणातिनंद जी नहीं आ रहे थे। चार दिन उनको हुए थे। बुखार हो रहा था चार दिन से और जैसे बुखार होता है तो यह जो डाइट उनको दिया जाता है बार्ली वाटर और यह जो साबूदाना है तो वह साबूदाना और बार्ली वाटर खा के जिससे कि डाइजेशन में हल सहज हो खाना इस तरह से खा रहे हैं और बुखार भी है चार दिन हो गए हैं तो सोच लीजिए कि वह शरीर तो जो है कितना वीक हो गया होगा तो स्वामी जी गए उनके के कमरे में एकदम अर्ली मॉर्निंग को और वो जाकर के उनको कहते हैं अरे चल जाकर के ध्यान करेंगे। बुखार हुआ है तो क्या है? तुम लोग यदि बुखार का बहाना करके सोते रहोगे ध्यान ना करोगे तो फिर तुम लोगों को देखकर के लोग क्या सीखेंगे? तो फिर त्रिगुणातीतानंद जी को वही दुर्बल है, बुखार है। ऐसी अवस्था में ही उनको उठा करके स्वामी जी अपने साथ में वहां मंदिर में ले आए। देखिए यह आइडियल कितना स्ट्रांग है। अभी अभी तो ऑफकोर्स आज मुझे यदि बुखार होगा इस तरह से चार दिन से और मैं यदि वीक होऊंगा तो मैं तो मंदिर में नहीं जाऊंगा। किंतु देखिए कि आजकल हम लोग क्या है उन लोगों ने जो मुड़ी इकट्ठा की है उसी के उसी को तोड़-तड़ करके खा रहे हैं ना उसी के इंटरेस्ट में से खा रहे हैं। कैपिटल जो जमा करके गए हैं यह अपने गुरु भाई है। ठाकुर मां स्वामी जी है तो उसी के इंटरेस्ट से हम खा रहे हैं। बोल के हमको आज इतनी चिंता नहीं। किंतु देखिए कि जब यह कैपिटल कलेक्ट हो रहा था स्पिरिचुअल कैपिटल स्वामी जी जमा कर रहे थे। उस दिनों की कैसी यह तपस्या थी। एक दिन की बात है। मठ उस समय नीलांबर मुखर्जी गार्डन में था। आप यदि बेलूर मठ गए होंगे तो आपने देखा होगा कि वहां पे वो जो आरोग्य भवन वाला गेट है जहां पे प्रेसिडेंट महाराज का क्वार्टर है वहां से एक गेट है तो गेट गंगा की ओर जाता है तो गंगा की ओर जाएंगे तो वहां पे बीच में अपना और एक कैंपस आता है वहां पे वेद विद्यालय है और यह जो नीलांबर मुखर्जी का वह एक कमरा है घर है वहां पे ओरिजिनली मठ था मां शारदा देवी स्वयं वहां वहां पर रही थी और उन्होंने वहीं पर पंचतपा भी किया था। तो वहीं पर मठ है और उस समय रात को अभी क्या है स्वामी जी है तो उत्साह आनंद ये एंथूजियाज्म चीयरफुलनेस साधुओं में तो होने वाला है और फिर स्वामी जी लोगों में झगड़ा लगा देते थे डिबेट करवा देते थे कि पुनर्जन्म है कि नहीं मृत्यु के बाद क्या होता है आत्मन की अवनत उन्नति ही होती रहेगी कि अधोगति भी होती है जीवात्मन की नहीं के आत्मन की तो जीवात्म क्या एक जन्म के बाद में दूसरा जन्म जो लेता है वह हमेशा उच्च से उच्च कक्षा का ही लेगा कि फिर से वो ईंट पत्थर तक आ जाएगा। वो जो डॉक्टर सरकार को कहा था ना किसी ने ये जो डॉक्टर सरकार ठाकुर के साथ में कंटीन्यूअस आर्गुममेंट करते रहता है। तो ठाकुर के एक डिवोटी को अच्छा नहीं लगा। तो उन्होंने कहा कि ये जो डॉक्टर सरकार जिस तरह से आर्गुमेंट करते हैं ना उनका अगला जन्म है पशु योनि में होने वाला है। पशु योनि में भी नहीं ईंट पत्थर से वो स्टार्ट करने वाला है। तो किसी ने डॉक्टर सरकार को कहा कि किसी भक्त ने आपके बारे में ऐसा कहा है कि आपका अगला जन्म ईंट पत्थर से होने वाला है। तो अह डॉक्टर सरकार हंसते-हंसते कहते हैं तो मैं पूरा जो इवोल्यूशनरी चक्र समाप्त करके ईंट पत्थर से फिर से पशु पशु में से बंदर बंदर में से फिर से मनुष्य बनूंगा और फिर से यदि ठाकुर के साथ मुलाकात होगी फिर से मैं वही आर्गुमेंट करना स्टार्ट करूंगा। तो फिर से मुझे ईंट पत्थर से स्टार्ट करना पड़ेगा। तो ये ये यहां पे भी स्वामी जी सबको आर्गुमेंट में लगा देते हैं और जिस पक्ष का जोर थोड़ा सा कम पड़ जाता है तो स्वामी जी उनको एक नया युक्ति दे देते हैं तो वो फिर से जोर से वो आर्गुममेंट करते हैं। तो रात को 2:00 बजे तक यह सब चला। फिर स्वामी जी ने कहा अच्छा चलो अभी सोने का टाइम हो गया। अभी आर्गुममेंट करो खत्म। बोल के सबको सोने के लिए भेज दिया। अभी मीन वाइल सुबह को 4:00 बजे स्वामी जी तो उठ गए हैं। उठकर के आराम से बढ़िया मजे से वो टहल रहे हैं वहां पे गंगा के सामने और वो गुनगुन करके गान भी गुनगुना रहे हैं। और सबसे पहले तो उन्होंने अखंडानंद जी को उठा दिया गंगाधर महाराज को और फिर कहा कि लगाओ घंटा मैं लोगों को सोते हुए नहीं देख पा रहा हूं। तो अखंडानंद जी ने बेचारे ने पहले तो कहा भी सही कि अरे स्वामी जी सब तो 2:00 बजे सोए हैं तो अभी तो 4 ही बजे 2 घंटे का नींद थोड़ा सा और सोने दीजिए ना उनको तो स्वामी जी एकदम क्रोधित हो गए एकदम कठोर स्वर से कहा कि क्या दो बजे सोए हैं इसका अर्थ ना कि 6:00 बजे तक वो सोते रहेंगे क्या दो मुझे मैं ही घंटा लगाता हूं मेरे रहते रहते ही ऐसा चल रहा है यह मठ क्या सोने के लिए बनाया गया है कि क्या ऐसा बोल के तो जब स्वामी जी ने यदि कठोरता पूर्वक ऐसा कहा तो अखंडानंद जी ने सोचा अभी तो घंटा लगाना ही पड़ेगा तो जहां पर बाकी सब साधु ब्रह सो रहे थे तो वहां पर जाकर के जोरजोर से घंटा लगाना शुरू किया तो सब लोग धड़मड़ करके उठ गए और उठ के ही चिल्ला रहे हैं। कौन है यह पगला? इतना अर्ली मॉर्निंग को घंटा बजा रहा है। तो अखंडानंद जी कहते हैं मैं यदि अकेला वहां पर खड़ा रहता तो ये लोग मुझे चीर ही देते। माने वो शेर कैसे शिकार को चीर देता है, फाड़ देता है तो मुझे चीर ही देते। ये किंतु मेरे देखा सबने कि मेरे पीछे में स्वामी जी स्वयं खड़े हैं और खड़े-खड़े हंस रहे हैं। तो फिर सब लोगों का गुस्सा ठंडा हुआ। सब लोग प्रातः कृत्य जो सुबह को करना है वो नित्य क्रिया समाप्त करके सब लोग वो शाइन में जाकर बैठे जप करने के लिए तो देखिए कि यह जो मठ है मठ का यह जो पूरा सिस्टम है इसके पीछे कितनी सारी कहानियां है जो कि आज हमको बल प्रदान करती है। आज हम यदि सुबह को ना भी उठ पाए और यदि यह कहानी भी सुनते हैं तो उससे भी जो चित्त को निर्मल करने वाला एक असर होगा वो इतना गहरा होगा इतना वो पवित्र होगा कि उसका भी देखिए कि कहानियों का भी यह एक गहरा तात्पर्य है। अच्छा अभी हम स्वामी जी के जीवन की ओर आते हैं। वराह नगर मठ का पीरियड है। वो था वहां बेलूर मठ वाला पीरियड। स्वामी जी अमेरिका से वापस आए थे। किंतु अभी हम टाइम मशीन में बैठकर वापस चले जाते हैं। ठाकुर की महासमाधि के बाद में 1886 में वराह नगर मठ की स्थापना हुई। फिर ये 87 ये 87 की यह सब घटनाएं हैं। मास्टर महाशय वराह नगर मठ आए हैं और उन्होंने नरेंद्र के साथ में जो वार्तालाप किया है वो कथामृत में लिपिबद्ध किया है। कथामृत में जो आखिरी जो ये है अपेंडिक्स इसमें यह वराह नगर मठ के कुछ-कुछ विवरण है। उसमें से यह एक विवरण गोपाल की बात चल रही है।

साधु सावधान : त्याग है आध्यात्मिक राज्य की नींव

यह जो नित्य गोपाल था जिसको कि ठाकुर ने कहा था कि इसकी परमहंस अवस्था है। उसको अश्रु पुलक रोमांच वगैरह होता था। जब कीर्तन होता था तो वह भाव में चला जाता था। तो यही गोपाल के बारे में बात चल रही है और इस गोपाल को माध्यम करके हमको एक स्वामी जी का जो विचार है या तो मैं कहूंगा कि रामकृष्ण भावधारा का जो फाउंडेशन है आर्ट जो है वो समझ में आता है। देखिए रामकृष्ण संघ का फाउंडेशन है त्याग तपस्या ये यही जो अभी हमने पढ़ा सुना कि स्वामी जी कहते हैं कि 2:00 बजे सोए हो बोलकर के क्या तुमको 6:00 बजे तक सोते रहना है 6:00 बजे उठोगे क्या 4:00 बजे का नियम बनाया है 4:00 बजे ही उठना है। एक और देखिए आप यहां पर गोपाल की अवस्था नित्य गोपाल की अवस्था जब भी कीर्तन होता है तो भाव में चला जाता है और ठाकुर को खुद को तो भाव होता था ना ठाकुर ने खुद ने तो कहा है ना इसकी बहुत उच्च अवस्था है तो भक्त लोग नित्य गोपाल से इतने प्रभावित हो गए थे कुछ-कुछ लेडी डिवोटी है वो गोपाल को अपने घर ले जाती थी वो फिर वह बालक ज्ञान से उसके साथ में मातृभाव का संबंध रखती थी मातृभाव संतान भाव वगैरह वगैरह चलता था। ठाकुर ने कहा था इसको कि तुम जाना मत किसी के घर में कभी-कभी जाना किंतु ऐसा नियमित रूप से जाना यह वात्सल्य भाव ही बाद में तत्सल्य भाव में परिणत हो जाएगा। ऐसा करके ठाकुर ने ही उसको वर्न किया था। तो देखिए कि तपस्या का फाउंडेशन नहीं रहने से सिर्फ एक सुकृति की वजह से पूर्व जन्म के सुकर्म के फल के हिसाब से हमको जो भाव होता है ये जो अश्रु रोमांच पुलक जो होते हैं देखिए यह ज्यादा दिन हमको टिकने वाले नहीं है। नशा करने के बाद में थोड़ी देर के लिए आप देखेंगे कि हमारा मन जो है बहुत ही एकदम आनंद से भर जाता है। किंतु जैसे ही नशा उतरेगा साथ में ही हैंगओवर स्टार्ट होगा। तो यहां पे है कि नशे का एक हाई है और यह हैंगओवर का लो है। तो हाई लो हाई लो हाई लो मैनिक डिप्रेसिव साइकोसिस जिसको कहते हैं। कभी-कभी वो मैनिक हो जाएगा। एकदम ओवर एक्टिव हो जाएगा। कभी एकदम डिप्रेस हो जाएगा। तो क्या है कि ये मैनिक और डिप्रेशन यह दो स्टेट से हमको बचना है। आध्यात्मिकता में स्टेडी प्रोग्रेस करना है तो तपस्या का सॉलिड फाउंडेशन चाहिए। स्वामी जी ने स्पष्ट कहा कि क्या सोने के लिए मठ बनाया है। मेरे रहते रहते ही यही अवस्था तो मेरे जाने के बाद में क्या होगा? तो यह लोग थे। वे लोग सोचते थे गोपाल की तरह कि ठाकुर ने तो अभी हमको स्पर्श करके वह चैतन्य प्राप्त करवा ही दिया है। भाव दर्शन वगैरह सब होते ही है। तो फिर अभी हमको मठ में जाकर के तपस्या करने की क्या जरूरत है? मूर्ख लोग मठ में जाएंगे। मूर्ख लोग तपस्या करेंगे। ऐसा भी किसी किसी के मन में होता था। इसलिए आप देखिए ये काली शशि हरि लाटू महाराज वगैरह का वर्णन इस तरह से नहीं है कथामृत में कि अरे देखिए वो नृत्य कीर्तन करतेकरते वो किसी को भाव हो जा रहा है। किसी को समाधि हो जा रही है। किसी की छाती लाल हो जाती है। एक राखाल के बारे में थोड़ा सा वर्णन है कि वो भाव में लेटा हुआ है और ठाकुर कह रहे हैं शांत हो जा शांत हो जा। और फिर मास्टर महाशय लिखते हैं कि उसकी प्रथम भाव समाधि। तो राजा महाराज की बात अलग है, स्वामी जी की बात अलग है। किंतु यह जो बाकी के गुरु भाई थे उन्होंने स्टेडी तपस्या करके अपना स्पिरिचुअल लाइफ बिल्ड किया है। तो यहां पे यही गोपाल के बारे में बात चल रही है। मास्टर महाशय कहते हैं कि उसको कितना भाव और इतना अश्रू और रोमांच होता था। तो नरेंद्र स्वामी ने साथ-साथ में ही कहता है कि उससे क्या कौन सा बड़ा उसने तोप मार दिया है। यह काली, शरद, शशि, शारदा यह सब गोपाल से कितने बड़े लोग हैं। उनका त्याग कितना है? उनकी तपस्या कितनी है? गोपाल जो ठाकुर को स्वीकार कहां करता था? तो जब स्वामी जी ने कहा ऐसा कि गोपाल ठाकुर को स्वीकार नहीं करता था। तो माने मास्टर महाशय कहते हैं कि किंतु मुझे एक घटना याद है कि भक्तों का दरबार टूट गया है। [हंसी] माने भक्तों का दरबार बिखर गया है। यह शब्द मास्टर महाशय यूज़ करते हैं। अर्थात कि ठाकुर के घर में भक्तों का दरबार बैठा हुआ है। अभी ठाकुर विश्राम थोड़े लेने के लिए खड़े हुए तो सब लोग इधरउधर जा रहे हैं। उस समय मास्टर महाशय ने देखा कि ठाकुर के कमरे के उत्तर साइड में जो उत्तर दिशा में जो वरांडा है उसके सामने जो उत्तर दिशा में जो एक लाल सुरकी का रास्ता सुरकी अर्थात लाल कलर की ईंट की मिट्टी इस तक इसका जो रास्ता है उसके ऊपर में गोपाल घुटनों के बल बैठा हुआ है हाथ जोड़कर के और सामने ठाकुर खड़े हैं। चांदनी चारों ओर फैली हुई है। ठाकुर जैसे कि गोपाल की शरणागति को स्वीकार करते हैं। तो यह नित्य गोपाल में यह भी था। ठाकुर को शरणागत भी हुआ था। एट द सेम टाइम भीतर भीतर में जो एक अहम होता है तपस्या नहीं करने का जो परिणाम होता है। अहम तो तपस्या करके ही आपका वह गलेगा। तपस्या करके ही तपस्या रूपी भट्टी में ही ये जैसे कि अ कोई भी ये होता है मेटल होता है जैसे कि लोहा लोहे को आप जमीन में से निकालेंगे तो साथ में ही आप उसको यूज करने के लायक नहीं होगा। पहले तो वह जो ओर कहते हैं उसको उस मेटल ओर को आयरन ओर को आपको भट्ठी में गलना पड़ेगा। भठी में जब प्रचंड गर्मी में यह आयरन ओर है वह पिघलेगा उसके भीतर की अशुद्धियां निकल जाएगी। जब शुद्ध आयरन होगा तब कहीं जाकर के उसको भट्ठी में से निकालेंगे और फिर उसमें से जो भी आपको औजार बनाने हैं आप बना सकते हैं। तो वैसे ही तपस्या रूपी भठी में हमको अपने को झोंकना होगा। वराह नगर मठ था। यह तपस्या रूपी भठी भले ही चाहे ठाकुर ने लोगों को स्पर्श करके कह दिया हो कि तुमको चैतन्य हो किंतु क्या है कि इस तरह से तो आपके जो कर्म का फल है वह तो कटने वाला नहीं है। कर्म के बारे में हमने देखा था कि तीन तरह के कर्म होते हैं संचित आगामी और प्रारब्ध। संचित कर्म अर्थात कि इस तरह के कर्म जो अभी स्टोर में पड़े हुए हैं। आगामी कर्म अर्थात कि इस तरह के कर्म जिसका कि फल जो है कर्म जो है फलीभूत होना भविष्य में होंगे। किंतु प्रारब्ध कर्म जो है अर्थात कि जो ऑलरेडी हमने कर्म किए हैं और उसका फल मैनिफेस्ट होना स्टार्ट हो गया है। वह प्रारब्ध कर्म जब तक रहेंगे तब तक तो यह संसार का फेरा चलता ही रहेगा। तो फिर क्या है? प्रारब्ध कर्म से भी यदि मुक्ति प्राप्त करनी है तो आपको यह तपस्या रूपी भट्ठी में अपने को जलाना ही पड़ेगा। तो यहां पे इसलिए मास्टर महाशय जब ऐसा कहते हैं कि मैंने तो इस तरह से गोपाल को देखा था तो फिर नरेंद्र कहता है कि कहां मैंने तो इस तरह से कुछ देखा नहीं। किंतु फिर मास्टर महाशय यह भी कहते हैं कि यह मुझे पक्का याद है कि ठाकुर ने उसको स्त्री भक्तों के साथ जाने का मना किया था और फिर अनेक बार सावधान भी कर दिया था। यह कह के कि साधु सावधान यह जो फेमस ठाकुर का वार्निंग है यही नृत्य नित्य गोपाल को ही यह बात कही थी। और फिर यदि नरेंद्र सामने कहता है कि मेरे सामने उन्होंने कहा है यहां से हमारा पढ़ना बाकी है मैं पढ़ता हूं नरेंद्र क्या कहता है आरती अमार का छे

अपने अंतरंग भक्तो के लिए श्रीरामकृष्ण की व्याकुलता

बोले छ और उन्होंने मेरे सामने कहा था उन्होंने अर्थात ठाकुर ने और यदि परमहंस होश था तब टाका के नो उसकी यदि परमहंस अवस्था है तो फिर पैसा क्यों अभी पैसा क्यों इसका अर्थ तो मुझे पता नहीं कि क्या यह नित्य गोपाल पैसों के पीछे दौड़ता था। लोगों को लोगों से पैसा मांगता था या तो फिर पैसों के प्रति उसका लोभ था। पता नहीं जो भी है। इतना तो पक्का है कि पैसों के साथ में उसका अटैचमेंट था। इसलिए ठाकुर ने स्वयं कहा है। यदि परमहंस अवस्था है तो पैसों के प्रति इतना मोह क्यों? आर बोले छ और भी ठाकुर ने आगे कहा था ओ एकानकार लोक नो वह यहां का लोग नहीं है एकानकार लोक अर्थात कि यहां का आदमी नहीं है अर्थात कि ठाकुर के जो अंतरंग वर्तुल है उसका वो मेंबर नहीं वो एक्सटर्नल है बहिरंग है जारा अमार आपनार लोक तारा एकने सर्वदा आशबे जो मेरे अपने थे वह हमेशा यहां पे ही आएंगे। यह जो ठाकुर ने मास्टर महाशय को कहा था ना कि दुर्गा पूजा का छुट्टी है और कुछ दिन किंतु मास्टर महाशय आए नहीं ठाकुर के पास में। अभी ठाकुर ये एक्सपेक्ट करके बैठे होंगे कि भले मास्टर है और छुट्टी के माने जब स्कूल चलता है तो नहीं आ पाता है। संडे ही आता है तो यदि दुर्गा पूजा का छुट्टी होगा तो तो अवश्य आएगा। तो मास्टर महाशय आए नहीं। जब वो गए आखिर में दक्षिणेश्वर तो ठाकुर ने पूछा कि अच्छा कहां गए थे? तो मास्टर महाशय ने कहा कि मैं केशव बाबू के वहां पर गया था ब्राह्मण समाज में। वहां पर मैं दुर्गा पूजा की एक चमत्कार व्याख्या सुनी। तो अच्छा ठाकुर कहते हैं तो मास्टर वहां से कहते हैं हां कि हृदय में यदि दुर्गा रूपी देवी को विराज आप कराएंगे माने प्रतिष्ठा करेंगे तो साथ में यह कार्तिक गणेश लक्ष्मी सरस्वती की तरह वो श्री विद्या बुद्धि मेधा धन सब कुछ आ जाएगा। तो ठाकुर ये सब सुन लेते हैं और फिर कहते हैं देखो जरा हमार आपनार लोग तारा शुद्ध एकानी याश में तुम एकानी यार को था जावे ना जो मेरे लोग हैं अपने वो सिर्फ यहीं पे आते हैं तुम यहीं पर आना और कहीं मत जाना तो मैंने जब पहली बार इसको पढ़ा था तो मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ था कि ठाकुर क्या उनको एक लोभ हो गया है भक्तों का बहुत सारे इस तरह के गुरु जो होते हैं ना उनके भक्तों के ऊपर में उनका बड़ा कड़ा शासन रहता है बड़ा ही डिसिप्लिन रहता है भक्तों के ऊपर में। यदि कोई भक्त दो-तीन दिन मिलने के लिए नहीं आया सामने बैठ के प्रणाम नहीं किया तो उनको फोन करेंगे। कहां हो भाई? चलो आओ इमीडिएटली मुझे मिलने के लिए। पूछेंगे उनकी खबर रखेंगे परिवार के सभी लोगों की। वो क्या कर रहा है? यह क्या कर रहा है? कहां पे गए थे? क्यों गए थे? पता चला दूसरे किसी गुरु के पास गए तो बड़े नाराज हो जाएंगे। अरे वहां पे जाने की क्या जरूरत है? वगैरह-वगैरह। तो एक सामान्य गुरु में इस तरह का घमंड या तो फिर एक ईर्ष्या एक पज़ेसिवनेस हम देखते हैं कि मेरे भक्त है और कहीं पर भी जाएंगे तो मुझे बड़ा ही क्रोध आ जाएगा। मैं गुरु हूं दूसरे गुरु के पास तुम क्यों गए? तुमको दूसरा गुरु करने की जरूरत क्या है? तो ऐसा एक घमंड जैसा उनके भीतर में दिखता है। तो क्या ठाकुर के भीतर में भी ऐसा था। माने जैसे ये योगेंद्र महाराज को किस तरह से वो संदेह हो गया था। आधी रात को उठकर के देखे देखा ठाकुर अपने बिस्तर में नहीं है तो एकदम उनका हृदय धकधक करने लगा सोचा कि ठाकुर मुंह पर तो कामिनी कांचन के त्याग की बात करते हैं तो क्या रात को छुपके छुपके अपनी पत्नी के पास जाकर सोते हैं ना कि क्या करते हैं मैं देखता हूं हाथ पकड़ता हूं ऐसा सोच कर के नौबत के सामने जाकर खड़े रह गए जहां की मां रहती थी कुछ समय के बाद में देखा झाऊला की ओर से ठाकुर आ रहा है तो इतने बेचारे लज्जित हो गए शर्मिंदा हो गए और ठाकुर भी उनके के चेहरे को देखकर के ही ठाकुर तो भाव राज्य के राजा है। अंतर्यामी है। एक सेकंड में पकड़ लिया कि क्यों वहां पर खड़े हैं। तो हंसते-हंसते कहा साधु के दिन देख भी और रातें देख भी। तब साधु ऊपर भरोसा करवी। साधु को दिन में देखो साधु को रात में देखो तब साधु पर भरोसा करो। तो ठीक है। तो इसको भी पढ़कर के मुझे एक क्षण के लिए ऐसा हो गया था कि क्यों ठाकुर ऐसा कहते हैं मास्टर महाशय को कि यहां पे ही आना और कहीं पे मत जाना। किंतु देखिए क्या है यदि आपने आध्यात्मिक जीवन में सीरियसली आगे बढ़ना है तो ठाकुर ने ही कहा ना कोई कोई आदमी है 10 जगह पर कुएं खोदते रहता है तो उसकी एनर्जी यदि 10 जगह पर डिस्ट्रीब्यूट हो जाएगी तो क्या होगा यहां पर थोड़ा सा खोदेगा वहां पे थोड़ा सा खुदाई करेगा अल्टीमेटली जितना डीप में जाना चाहिए जहां से पानी मिलता है उतना डीप में वो कहीं नहीं जा पाएगा इसलिए एक जगह पे कुआं खोदो इतना डीप में खोदो तो पूरा एनर्जी लगा दो कि आखिर में वहां से पानी मिलना शुरू हो जाए। तो ठाकुर कहते हैं कि ये वो गोपियों के बारे में गोपियां जब वृंदावन से मथुरा गई तो देखा कि ये पगड़ी बगड़ी पहन करके भगवान कृष्ण सिंहासन पर बैठे हैं। तो गोपियों ने लाच करना शुरू कर दिया। बोला कि यह तो हमारे मयूर पिच्छारी कृष्ण कहां है? यह पगड़ी वाले कृष्ण को देख के उनके सामने अपने चेहरे का यह हटा के लाज हटा के उनके सामने हम क्या द्विचारिणी होगी क्या द्वचारिणी अर्थात कि जिनको वो प्रेम करती है वो जैसे पति पतिव्रता नारी का क्या है पति के सा पति के प्रति ही उनका स्नेह प्रेम है पति के सामने ही घुमटा खोलती है अपना चेहरा पति को ही दिखाएगी और किसी पुरुष भक्त को नहीं द्वचारिणी होना अर्थात दूसरे पुरुष के प्रति यह घुमटा खोलना। तो यह गोपियां कहती है कि हमने तो मयूर पिच्छ धारी भगवान कृष्ण को देखा। यह पगड़ी वाले कृष्ण को देखकर के क्या हम अपना घुमटा खोलेगी? द्विचारिणी होगी क्या? अथ फिर भगवान कृष्ण उनके लिए फिर से वह मयूर पिच्छ धारण करके वहां पर आते हैं। तब गोपियां उनके साथ में वार्तालाप करती है। तो क्या है कि यह जो गुरु निष्ठा जो है सद्भाव सभी के प्रति है। निष्ठा जो है अपने इष्ट अपने गुरु के प्रति ही होनी चाहिए। यहां पे भी मैं देखता हूं। कोई आकर कहता है कि अच्छा मेडिटेशन सीखना है। तो मैं थोड़ा बताऊंगा कि हमारा क्लास चलता है इस तरह से। फिर ये मैं पूछूंगा कि अच्छा आप बताइए क्या-क्या किया? तो बोलेंगे पहले तो वहां पे गए थे। इस में गए थे उसके बाद में यहां पे गए थे। ईशा फाउंडेशन यहां पे तो है और ये 10 जगह का नाम देंगे तो फिर मैं समझ जाऊंगा कि ये यहां पे कोई ज्यादा रेगुलर आने वाले नहीं। क्यूरियोसिटी की वजह से कभी इस में जाएंगे, कभी वहां पे जाएंगे, कभी वहां पर जाएंगे। 10 जगह पर घूमते रहेंगे और मन कहीं पर भी स्थिर नहीं होगा। तो क्या है? स्थिर मन लेकर के हृदय में विश्वास लेकर के कोई एक संस्था है, कोई एक टीचर है, कोई एक गुरु है, कोई एक इष्ट है। उसके साथ में नियमित रूप से संपर्क रखना है। तभी क्या है कि भीतर में से इतना गहराई में जा पाएंगे कि भीतर में से फिर सोना मिलना शुरू हो जाए। भीतर में से आज की लैंग्वेज में कहे तो यह रेयर अर्थ मिनरल्स मिलना शुरू हो जाए। तो यहां पर भी देखिए ठाकुर कहते हैं कि वह यहां का आदमी नहीं है। जो मेरे अपने हैं वह हमेशा यहां पे आते जाते रहेंगे और कहीं नहीं जाएंगे। स्वामी जी आगे कहते हैं ताई तो अमुक बाबू ऊपर तनी राग करते इसीलिए तो अमुक बाबू के ऊपर में वो नाराज रहते थे। ठाकुर नाराज रहते थे। से सर्वदा शंगे थक तो बोले आर ठाकुर काछे बेश आस्तोना वो हमेशा साथ में रहता और ठाकुर के पास में ज्यादा आता नहीं देखिए यह जो सेंटेंस है थोड़ा सा क्रिप्टिक है म ठाकुर किसी के ऊपर में गुस्सा कर रहे हैं। क्यों गुस्सा कर रहे हैं? क्योंकि वह हमेशा साथ में रहता था और ठाकुर के साथ में ज्यादा आता नहीं था। अभी इसका क्या अर्थ हुआ? जितना हिस्ट्री मुझे पता है अपना उससे मैं अनुमान करके कहता हूं कि ये जो तारकदा जो है वो रामबाबू के घर रहते थे। अ क्योंकि तारकदा का अर्थात कि भविष्य के महापुरुष महाराज स्वामी शिवंद जी उनका खुद का तो रहने का घर नहीं था। तो वो जब ठाकुर जीवित थे तब वो राम रामदत्त के घर रहते थे और रामदत्त के घर यह नृत्य गोपाल भी रहता था क्योंकि वह रामचंद्र दत्त का कोई रिलेटिव था। तो यह दोनों का संग अच्छा था तारकदा का महापुरुष महाराज का और यह नित्य गोपाल का तो शायद हो सकता है कि महापुरुष महाराज के बारे में यहां पे ठाकुर कह रहे हो कि वो यहां पर आता नहीं है। वह हमेशा नित्य गोपाल का संग करता है। ऐसा कुछ ठाकुर शायद कहते हो। अभी मैं अनुमान करके कहता हूं रामबाबू के बारे में भी शायद ऐसा कह रहे हो और शायद महापुरुष महाराज के बारे में भी किंतु क्या है रामबाबू और महापुरुष महाराज यदि कुछ समय के लिए ठाकुर के पास में न भी गए हो तो अल्टीमेटली तो संपूर्ण रूप से ठाकुर को शरणागत थे। रामकृष्ण संघ की भावधारा में तो दोनों का ही बड़ा उच्च आसन है। महापुरुष महाराज का तो कोई प्रश्न ही नहीं है। स्वामी जी के गुरु भाई संघ के द्वितीय संघाध्यक्ष तो उनका तो कोई प्रश्न ही नहीं है। रामबाबू का भी ठाकुर के ऊपर में अनंत शरणागति था। तो किंतु मुझे यह पता नहीं कि इन दोनों को छोड़कर के और किसने यह इनका संग किया हो। ठाकुर की महासमाधि के बाद में एक बार यही नित्य गोपाल बहुत बीमार हो गया था। नहीं ठाकुर उस समय कामार पुकुर गए थे। लाटू महाराज जब पहली बार ठाकुर को मिले उसके कुछ दिनों के बाद में ठाकुर के साथ में उनका बहुत ही श्रद्धा और अपने माने आपन भाव जिसको बोलते हैं। बहुत ही स्नेह का नाता जुड़ चुका था। इसके बाद में ठाकुर गए थे कामार पुखुर। तो उस समय जो कुछ समय लाटू महाराज के पास में था उस समय की बात है मोस्ट प्रोबेबबली ये नित्य गोपाल बीमार हुआ था लाटू महाराज ने उसकी काफी सेवा की थी तो क्या एक सेवा भाव जिसको कहते हैं किस तरह से सेवा करनी लाटू महाराज सीखे थे फिर जब ठाकुर आए तो फिर से ठाकुर कामार कुकुर से दक्षिणेश्वर लौट आए तो फिर से ठाकुर के पास नित्य नियमित आना जाना और फिर आखिर में ठाकुर के साथ में ही रहना शुरू कर दिया था। किंतु इसको तो ऐसा नहीं कहेंगे कि बिकॉज़ कि लाटू महाराज नित्य गोपाल की सेवा कर रहे हैं। बोल के वह ठाकुर के पास नहीं आते या ठाकुर उनसे नाराज है। तो जहां तक मुझे याद है इन तीनों ने ही नित्य गोपाल का नियमित संग किया है और किसी का नाम मुझे नहीं पता। तो जो भी है अभी स्वामी जी कहते हैं कि ठाकुर और यहां पर जो अमुक बाबू करके लिखा है नाम काट दिया है मास्टर महाशय ने स्वामी जी ने निश्चय वो नाम लेकर के ही कहा होगा किंतु मास्टर महाशय ने नाम काट दिया है तो इसलिए नरेंद्र कहता है स्वामी जी कहते हैं कि अमुक बाबू के ऊपर में वह गुस्सा करते थे ठाकुर नाराज रहते थे वह हमेशा साथ-साथ में रहता और ठाकुर के पास में ज्यादा आता नहीं और आगे स्वामी जी कहते हैं आमाई बोले छिलेन मुझे कहा था गोपाल सिद्धो हठात सिद्धो गोपाल सिद्ध है एकाएक सिद्ध हो गया है तपस्या करके सिद्ध नहीं हुआ है यह पूर्व कर्म का पूर्व जन्म का सुकृति कहो ना किए मां पिताजी का आशीर्वाद कहो ना कि गुरु की गुरु का आशीर्वाद कहो जो भी आपका है खुद की तपस्या से सिद्धि नहीं प्राप्त की एकाएक सिद्ध हो गया है आशीर्वाद से मोस्ट प्रोब ली सिद्ध हुआ है वो एकानकार लोक नहीं वह यहां का नहीं है यदि आपनार हो तो ओके देख अर्जुन कादी नहीं केो वो यदि हमारा अपना होता तो उसको देखने के लिए मैं रोया क्यों नहीं देखिए ये ठाकुर समझ किस तरह से ये ठाकुर डिसाइड करते थे कि कौन अपना है कौन पराया पराया तो कोई नहीं चलो ठाकुर के लेक्सिकॉन में पराया वाला शब्द ही नहीं है किंतु कौन यहां का अपना है माने अंतरंग में है और कौन अंतरंग नहीं है इसका जो ठाकुर का मेजरमेंट था उसको देखने के लिए मन तलपापड़ होता था उसको देखने के लिए अब जैसे स्वामी जी का ही उदाहरण स्वामी जी ठाकुर को मिलने के लिए नहीं आएंगे कुछ दिनों के लिए तो ठाकुर बड़े ही व्याकुल हो जाते फिर वह मैसेज पहुंचाते नरेंद्र को कि अरे तुम आओ मिलने के लिए ठाकुर तुम्हारी राह देख कर के बैठे हैं रामलाल दादा को पूछेंगे देखिए ठाकुर का भी तरीका साइकोलॉजी कैसा यूज़ करते हैं। रामलाल दादा तो पता है ठाकुर के भतीजे ठाकुर के भाई के पुत्र काली मंदिर के पुजारी और ठाकुर की सेवा करते थे। किंतु क्या ठाकुर ने ही कहा था कि अभी वो मां काली का पुजारी है तो भीतर में थोड़ा सा घमंड बढ़ गया है और यह पुजारियों के काली मंदिर में तो ब्राह्मण लोग होंगे ना एंप्लॉय क्योंकि क्या है बहुत सारे मंदिर है मंदिर में बहुत सारा काम है तो बहुत सारे ब्राह्मण को वो नौकरी पर रखना पड़ता है तो इस तरह के ब्राह्मण लोगों का दल है उसमें ये अभी रामलाल मिक्स हो गया है मेरी देखभाल नहीं रखता तो ऑलरेडी रामलाल दादा ठाकुर से दूर जाने लगे हैं उस समय ठाकुर को दक्षिणेश्वर अह दक्षिणेश्वर से नरेंद्र को सिमुलिया स्ट्रीट में कोलकाता में मैसेज पहुंचाना है कि तुम आओ मुझे मिलने के लिए तो क्या करेंगे रामलाल दादा को बुला के कहेंगे अच्छा तुमको क्या कोलकाता जाना है क्या कोई तुमको काम है क्या तो रामलाल दादा समझ जाएंगे कि ठाकुर का दानत क्या है तो वो बोलेंगे कि आपकी इच्छा है तो मैं जाता हूं तो ठाकुर कहते हैं अच्छा अच्छा तुम जाओ ये पैसा लो वो नौका करके घोड़ा गाड़ी करके कैसे भी करके अच्छे से जाना पैदल जाने की जरूरत नहीं ठाकुर को तो अभी गरज है तो काम करवाना है तो पैसा ले जाना मां को मां जब दक्षिणेश्वर आई थी हृदय ने अपमान किया मां का कि क्यों आए हो क्या क्या करने के लिए आए हो किस लिए आए हो तो उस समय मां के साथ में यह श्यामा सुंदरी देवी थी मां की मां तो उन्होंने कहा कि मैं कहां पे यहां पे किसको अपनी लड़की को देकर जाऊंगी यह हृदय अपमान कर रहा है ठाकुर चुपचाप बैठे हैं बोल के वो अपनी पुत्री को साथ में ले चली गई। अभी मां का वहां पे है जयराम भाटी में और यहां पे ठाकुर ने अभी यह हृदय को तो भगा दिया गया है। अभी ठाकुर को सेवा की जरूरत है। तो ठाकुर मैसेज के बाद मैसेज पहुंच पहुंचाते हैं वहां पे जय रामबाटी में कि उसको कहो कि यहां पे आए मुझे सेवा की जरूरत है। पालकी करके आए यह बैलगाड़ी करके आए। जैसे भी करके आए ₹20 लगेगा। जितना भी लगेगा मैं दूंगा। किंतु आओ देखो [हंसी] कि पहली बार तो जब मां आई थी बेचारी पैदल आई थी। रास्ते में बुखार हो गया था। रास्ते में पड़ी हुई है और प्राण जाने की अवस्था है। उस समय उनका दर्शन हुआ कि एक काले कलर की स्त्री काले वर्ण की स्त्री आकर के उनके पास में बैठी है। तो मां पूछती है कि अच्छा मां तुम कौन हो? कहां से आई हो? तो उसने कहा ये काले वर्ण की स्त्री श्याम वर्ण की स्त्री ने कि मैं दक्षिणेश्वर से आई हूं। है ना? दक्षिणेश्वर से श्याम वर्ण की स्त्री कौन हो सकती है? मां काली। तो मां शारदा पूछती है अच्छा मैं भी सोचती हूं वहां पर जाऊंगी उनकी सेवा करूंगी। किंतु देखिए बुखार है। अभी प्राण संशय है। जा भी पाऊंगी कि नहीं? तो फिर यह मां काली आश्वासन देकर कहती है कि नहीं तुम जाओगी और तुम्हारे लिए ही मैंने उनको वहां पर अटका करके रखा है। तो, [गला साफ़ करने की आवाज़] यह पहली बार बेचारी आई थी मां इतना पैदल चढ़ के वग़ैरह और सेकंड टाइम सेकंड टाइम तो नहीं यह थर्ड फ़ोर्थ टाइम है शायद। तो काफ़ी बार माना मां का आना जाना हुआ था। तो नंबर्स ठीक रखना मुश्किल है। तो एनीवे तो अभी जब किंतु जब ठाकुर को जरूरत है तो ऐसा कहते हैं कि बैलगाड़ी में हो यह पालखी में हो ₹20 लगेगा जितना भी रुपया लगेगा मैं दूंगा। किंतु बोलो उसको आए मुझे सेवा की जरूरत है तो क्या है गरज होती है तब पैसा खुल जाता है तो माने पैसों का वो जो भंडार है वो खुल जाता है तो यहां पे भी ठाकुर वो रामलाल दादा को कहते हैं तुम जाओ कोलकाता जाओ पैसा लेकर जाओ और नौका में जाना घोड़ा गाड़ी करके जाना कैसे भी करके जाना और यह संदेश है संदेश जाकर के नरेंद्र को देना और उसको कहना कि वो तुमको देखने के लिए बड़े व्याकुल है तुम आओ उनको को उनका दर्शन करने के लिए ऐसा बोल के ठाकुर रामलाल दादा को नरेंद्र के पास भेजते थे। तो क्या है भीतर में जब व्याकुलता प्रकट होती है किसी लड़के को देखने के लिए त्यागी संतान को देखने के लिए तब ठाकुर कहते हैं कि हां यह मेरा अंतरंग है। तो यही ठाकुर कहते हैं कि यह गोपाल को देखने के लिए कहां मैं कभी रोया नहीं हूं। हृदय व्याकुल नहीं हुआ है। इसका अर्थ यही है कि वह अंतरंग नहीं है। साथ में ही स्वामी जी आगे कहते हैं केऊ क्यों ओके नित्यानंद बोले खाड़ा को छे कोई कोई गोपाल को नित्यानंद बोलकर के खड़ा कर रहा है। किंतु तीन कतो बार बोले छे किंतु तीन अर्थात ठाकुर ने कितनी बार कहा है आमी अद्वैत चैतन्यो नित्यानंदो एकाधारे तीन मैं ही हूं अद्वैत चैतन्य नित्यानंद एक आधार में तीन एकाधारे तीन एक आधार में अद्वैत चैतन्य नित्यानंद मैं ही हूं तो यह देखिए कि तपस्या तपस्या का फाउंड फाउंडेशन और फिर सिर्फ भाव होना सिर्फ इस तरह से अश्रुप पुलक रोमांच होना इससे ज्यादा कुछ होता नहीं है। और ये इस तरह के लोग भले ही चाहे क्षण भर के लिए आध्यात्मिक किसी ऊंचाई को स्पर्श कर ले ठाकुर के अंतरंग सर्कल में वे लोग नहीं आएंगे। [नाक से की जाने वाली आवाज़] इसके बाद में यह इस दिन का वर्णन समाप्त होता है। 8 अप्रैल का वर्णन स्टार्ट होता है। मास्टर महाशय फिर से एक दिन आते हैं। तो वह जो दिन है उसका वर्णन अभी हम स्वामी जी का जो नेक्स्ट क्लास होगा उसमें करेंगे। आ जाए ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम