Invocation
ओम स्थापकाय यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का माय प्लान ऑफ कैंपेन यह पूरे लेक्चर को हमने ऑलरेडी काफी कुछ
व्याख्यान के 3 विषय: निंदा का प्रत्युत्तर, भारत का विकास कैसे हो, वास्तविक देशभक्ति क्या है
देख लिया है। मद्रास में दिया हुआ स्वामी विवेकानंद का यह प्रथम प्रवचन है। विक्टोरिया हॉल में दिया था नाइंथ फरवरी 1897 को और जे जे गुडविन जो कि स्वामी जी का स्टेनोग्राफर था उसने इसको रिकॉर्ड किया है। जैसे कि आप स्क्रीन पर देख पाते हैं। मैंने इस पूरे लेक्चर को कुछ पॉइंट्स में बांट दिया है। एज यू कैन सी टोटल इतने पॉइंट हैं। 23 पॉइंट है। 23 पॉइंट्स आर देयर। तो अभी जैसे और यह 23 पॉइंट्स को भी मैंने तीन ग्रुप में बांटा है। सर्वप्रथम तो स्वामी जी के ऊपर में स्वामी जी पहले तो अपना जो प्लान ऑफ कैंपेन है कि भारत में उनको क्या करना है उसके बारे में बोलने से पहले विदेश में और भारत में भी कुछ-कुछ लोगों ने स्वामी जी पे जो आक्रमण किए थे शाब्दिक आक्रमण उसका स्वामी जी उत्तर देते हैं तो वो एक स्वामी जी के लेक्चर्स में रेयरली आपको ऐसा दिखने को मिलेगा कि स्वामी जी अपने विषय वस्तु जो है कि भारत का नवनिर्माण या तो फिर आत्मन का स्वतंत्र या तो फिर वेदांत का घर-घर प्रचार तो इस मेन पॉइंट को छोड़कर के रेयरली स्वामी विवेकानंद को आप और किसी टॉपिक पर बोलते हुए देखेंगे तो वो हमको इस प्रवचन में देखने को मिलता है कि किस तरह से स्वामी जी ने कहा कि यह थियोसोफिकल सोसाइटी या तो फिर क्रिश्चियन मिशनरीज या तो फिर यह रिफॉर्म सोसाइटी है। किस तरह से उन्होंने दो तरह से स्वामी जी पे आक्रमण किया। सर्वप्रथम तो है स्वामी जी को स्वामी जी की जो क्रेडिबिलिटी थी अमेरिका और यूरोप में उसको तोड़ने का प्रयास किया। बार-बार यह बात उन्होंने अमेरिका यूरोप में फैलाने का प्रयास किया। यूरोप में खास करके ब्रिटेन में कि स्वामी जी का चरित्र अच्छा नहीं है। या तो फिर वह हिंदू धर्म को रिप्रेजेंट नहीं करते हैं। या तो फिर वह कोई ऑथेंटिक सन्यासी नहीं है। या तो फिर वह कोई क्रेडिबल रिलीजियस प्रीचर नहीं है। ऐसा करके दूसरा भारत में भी स्वामी जी के बारे में स्वामी जी को बहुत ही बदनाम करने का प्रयास किया। साथ-साथ में ही स्वामी जी की जो सक्सेस है उसका क्रेडिट लेने का भी प्रयास किया। ऑन वन हैंड स्वामी जी को डिसक्रेडिट भी करते हैं। दूसरी ओर स्वामी जी को जो क्रेडिट मिल रही है उसको अब हथिया लेने का भी प्रयास करते हैं। तो उस उन लोगों को स्वामी जी ने डटकर के जो उत्तर दिया वो फर्स्ट ग्रुप में हमने देखा। उसके बाद में जो सेकंड ग्रुप है, उसमें स्वामी जी सर्वप्रथम तो भारत की अवनति, या तो भारत की अवदशा क्यों हुई, उसका एक एनालिसिस करते हैं और फिर साथ में ही भारत देश को किस तरह से अपनी पुरातन भव्यता पर स्थापित किया जाए, उसका प्लान बताते हैं। तो नंबर सिक्स नंबर पॉइंट में देखिए कि स्वामी जी प्रारंभ करते हैं। सर्वप्रथम तो रिफॉर्म सोसाइटीज को कहते हैं कि आप लोग जो भारत को रिफॉर्म करने का प्रयास कर रहे हैं। भारतीयों को कह रहे हैं कि आपके पुरखों की आपकी पुरातन संस्कृति, आपके पुरखों की वाणी, आपके शास्त्र, आपके ऋषि मुनि, आपके आराध्य देवता, आपकी भारत भूमि, आपके पूर्वज वे लोग सब फ्रॉड थे। सब निकम्मे थे। उस सबको छोड़कर के यह यूरोपियन अमेरिकन आइडियाज और आइडियल्स को होलसेल अपना लीजिए तो यह बिल्कुल गलत होगा। भारत की उन्नति रिफॉर्म से नहीं होगी। इस अर्थ में कि भारतीय संस्कृति को काट करके उसकी जगह पे यह विदेशी संस्कृति को बिठाया जाए। ऐसा कभी नहीं होगा। भारत का जो उत्थान होगा वह ग्रोथ से होगा। उन्नति से जैसे कि इवोल्यूशन जिसको कहते हैं क्रम विकास क्रम विकास से भारत का भविष्य उज्जवलतर होगा। नहीं कि रेवोल्यूशन से इवॉल्यूशन और रेवोल्यूशन दो कांसेप्ट है। रेवोल्यूशन कहता है पुराना सब तोड़कर के नया बनाओ। इवॉल्यूशन कहता है कि पुराना जो था उसी को फिर से शुद्ध परिशुद्ध करके फिर से उसका नया प्रारंभ करो। देखिए स्वामी जी यह कभी नहीं कहते कि भारत में कोई तकलीफ समस्या नहीं थी। पिछले 1000 साल में खास करके स्वामी जी कहते हैं कि जो भारत की अवनति हुई उसके पीछे का एक बहुत बड़ा रीजन था कि डिग्रेडेशन ऑफ बुद्धिस्ट एज यह बौद्ध धर्म में जो अवनति हुई है बौद्ध धर्म की अवनति की वजह से ही भारत का एक बहुत बड़ा एक पतन हुआ है। बौद्ध धर्म में उन्होंने सोचा कि जितने भी दूसरे धर्मी है विधर्मी है सबको कन्वर्ट कर लिया जाए। बोलकर के सम्राट अशोक ने जो चारों ओर मिशनरीज भेजे थे उससे एक फायदा यह हुआ कि भगवान बुद्ध की जो परिशुद्ध वाणी थी जो उनका जो एक डीप स्पिरिचुअल मैसेज था वो विश्व के कोने-कोने तक प्रसरा। एक बहुत अच्छा काम हुआ क्योंकि जगत में अवतार के आने से लोगों के कल्याण के लिए अवतार के मैसेज को फैलाना ही पड़ता है। किंतु जो कुछ-कुछ लोगों को बिना उनकी समझ के कन्वर्ट हो गए तो उन्होंने क्या किया? कन्वर्ट तो हुए नॉमिनली बुद्धिज्म उन्होंने अपना लिया। बौद्ध धर्म अपना लिया। बुद्धम शरणम गच्छामि धम्मम शरणं गच्छामि। संघम शरणम गच्छामि। ऐसा बोल तो दिया। किंतु साथ-साथ में ही उनकी जो सब मान्यताएं थी उनके जो भूत पिशाच पलीत वगैरह थे उनके धर्म के वह भी बौद्ध धर्म में लेकर के आए। बौद्ध धर्म में यह सब विचार इस तरह की विचार सरणी इस तरह का एक जो डिग्रेडेड कल्चर बौद्ध धर्म में प्रवेश किया उसकी वजह से पूरा बौद्ध धर्म अधोगति की ओर गया। विनाश की ओर गया और बौद्ध धर्म का ही विनाश हुआ या अधोगति हुई। सिर्फ इतना ही नहीं जो विकृत बौद्ध धर्म था उसने भारत में भी बड़े पैमाने पर विकृतियां फैलाई। स्वामी जी कहते हैं कि इस्लाम के आने के 200 300 साल पहले ही यह सब विकृतियां इतनी फैल चुकी थी भारत में कि जब विदेशी आक्रमण प्रारंभ हुए तो हमारी जनता में शौर्य वीर्य साहस तेज ब्रह्म तेज क्षत्रिय जो ये होता है तेज और ब्रह्मज्ञान ये दोनों की ऐसी कमी हो गई थी कि हम विदेशी आक्रमणों का मुकाबला ना कर पाए। तो वह स्वामी जी का एक डायग्नोसिस है भारतीय अवनति का और उसके बाद में स्वामी जी हमको एक के बाद एक आइडियाज देते हैं कि किस तरह से भारत की उन्नति फिर से की जाए। तो पहले तो कहा ग्रोथ नोट रिफॉर्म रेवोल्यूशन नहीं लाना है। भारतीय परंपरा को संपूर्ण रूप से ध्वंस करके उसके ऊपर में यह विदेशी परंपराओं की इमारत नहीं गठित करनी है। यह एक उन्होंने कहा। दूसरा कि एक बड़ा ही डीप और फिलॉसोफिकल पॉइंट स्वामी जी हमारी नजर के सामने रखते हैं। क्या कहते हैं? गुड एंड इवल आर टू साइड्स ऑफ द सेम कॉइन। ये अच्छाई और बुराई। गुड और इवल। एक ही सिक्के के दो पहलू है। किस तरह से? स्वामी जी कहते हैं कि माया के इस जगत में आप कभी भी 100% परफेक्शन नहीं खोज पाएंगे। यदि आप 100% परफेक्शन खोजने को जाएंगे तो आपको निराशा के अलावा और कुछ प्राप्त नहीं होगा। यह कुत्ते की पूंछ की तरह यह जगत है। आप इसको भीतर में कितनी ही अच्छाई लाने का प्रयास करें बुराई कहां से ना कहां से घुस प्रवेश ही जाएगी। यह स्वामी जी कहते हैं कि यह इवल या तो बुराई है या तो फिर यह अनिष्ट है या तो फिर सफरिंग्स है, पेन है इस जगत का भवसागर यह भवर रोग जो है वो रूमेटिज्म की तरह है। वात रोग की तरह है। यदि आपकी गर्दन में दर्द हो रहा है, गर्दन के लिए दवाई लगाई तो आपके घुटन में चला जाएगा। घुटन में से उसको हटाया तो कमर में चला जाएगा। अब तो यह रूमेटिज्म ओल्ड रूमेटिज्म जिसको होता है लंबे टाइम से जिसको यह वात का रोग है वो पता है उन लोगों को कि यहां से निकालेंगे तो वहां जाएगा वो शरीर छोड़कर के कभी जाने वाला नहीं है। तो पहले तो जब हम भारत के उत्थान की बात करते हैं तो हमको यह डीप फिलॉसोफिकल अंडरस्टैंडिंग सबसे आगे ध्यान में रखनी है कि इस जगत में परफेक्शन सिर्फ ब्रह्म ज्ञान में ही है। जगत का त्याग करके ईश्वर की ओर उर्ध्वगति करने में ही परफेक्शन है। परफेक्शन यदि खोजेंगे तो ईश्वर में ही मिलेगा। आत्मन में ही मिलेगा। ब्रह्मन में ही मिलेगा। जैसे ही माया के इस जगत में प्रवेश किया तो कितना ही अच्छा आपका स्कीम क्यों ना हो। कितना ही अच्छा आपका भव्य प्लान क्यों ना हो वह 100% सक्सेस कभी नहीं होने वाला है। तो वह एक आगे समझ लेना है। उसके बाद में स्वामी जी कहते हैं कि यदि भारत का उत्थान करना है तो भारत में शिक्षा का प्रचार करना होगा। बहुत सारे लोग खास करके यह जो पॉइंट है शिक्षा का प्रचार देखिए स्वामी जी का कितना डीप इनसाइट है। उस समय यह सोवियत यूनियन या तो फिर यह कम्युनिस्ट आईडियोलॉजी ये बहुत ही ये बलवर्ती हो गई थी। उसका बहुत प्रचार हो रहा था। और बहुत सारे लोग कहते थे यह जो कार्ल मार्क्स की जो थरीज है कार्ल मार्क्स ने क्या देखा कि दो तरह के लोग एक समाज में रहते हैं। एक तो है कैपिटलिस्ट जिनके पास में पूंजी है जिनके पास में मींस ऑफ प्रोडक्शन है। अर्थात कि जो लोग जमींदार हैं, जिनके पास में जमीन है, जो लोग फैक्ट्री के मालिक है, जिनके पास में ये मैन्युफैक्चरिंग की कैपेसिटी है, जो लोग ट्रेडर्स है, जिनके पास में बड़े-बड़े जहाज है, पूरे जगत में वे लोग ट्रेडिंग करते हैं। मरकंटाइल क्लास है, यह लोग को कैपिटलिस्ट है और जो लोग खेत मजदूर हैं या तो फैक्ट्री वर्कर्स हैं या तो फिर यह जहाज में काम करने वाले खलासी है वगैरह-वगैरह वे लोग प्रोलेटरिएट क्लास है। इनके पास में गुलामी के अलावा और कोई उपाय नहीं है। तो कार्ल मार्क्स क्या कहता है? जो प्रोलेटरिएट क्लास है उनको अपने मालिकों की गुलामी को उठा के फेंक देना चाहिए। उन ये मालिकों ने उनके हाथों में जो जंजीर पहना करके रखी है, जंजीरों को तोड़ देना चाहिए। वर्कर्स ऑफ द वर्ल्ड यूनाइट यू हैव नथिंग टू लॉस। बट योर यह जंजीर है। इसके अलावा आपको खोने के लिए कुछ नहीं है आपके पास में। तो सबको इकट्ठा हो के कैपिटलिस्ट क्लास को उठा देना चाहिए। तो यह बात उसकी है। तो उस आइडिया से बहुत सारे लोग प्रभावित हुए थे। यहां तक कि भारत में भी देखिए कि साम्यवाद तो नहीं किंतु उसका जो कजिन है ये जो समाजवाद सोशलिज्म यह भारत में लंबे समय तक रहा। बहुत लंबे समय तक हमने अपनी प्रजा की जो क्रिएटिविटी है उसको बोतल में बंद करके रखा। क्यों? क्योंकि यदि बहुत ज्यादा फैक्ट्री खोल देंगे, बहुत ज्यादा प्रोडक्शन कर लेंगे तो फिर यह खेत खेत मजदूर है या फैक्ट्री वर्कर है उनका अहित होगा। स्वामी जी इस पूरे झमेले में गए ही नहीं है कि समाज को दो क्लास में बांटो। यह प्रोलेटरिएट है। यह कैपिटलिस्ट है। वहां पे एक रेवोल्यूशन लाओ। प्रोलेटरिएट कैपिटलिस्ट को उठा के फेंक देगा। स्वामी जी इस पूरी झंझट में नहीं गए। स्वामी जी कहते हैं एजुकेट द पीपल एजुकेशन एजुकेशन एजुकेशन जैसा ही समाज में एजुकेशन फैलेगा वैसे ही समाज अपने आप जागृत होगा। आपको कोई एक कम्युनिस्ट पार्टी बना करके एक खूनामर की भरा रिवॉल्यूशन लाकर के क्रांति लाकर के लोगों को सहाय करने की जरूरत नहीं है। लोगों के भीतर में जैसे ही जागृति फैलेगी, जैसे ही आधुनिक शिक्षण उनको प्राप्त होगा, वैसे ही वे लोग अपनी उन्नति का मार्ग स्वयं प्रशस्त कर लेंगे, स्वयं खोज लेंगे। तो यह था स्वामी जी का अनेक अनदर एक आईडिया कि भारत का उत्थान कैसे करना है। उसके बाद में देखिए कि स्वामी जी हमको एक के बाद एक उदाहरण देते हैं। स्वामी जी ने कहा कि ये जो इवोल्यूशन है नहीं कि रिफॉर्मेशन या तो रेवोल्यूशन इसके उदाहरण कौन से हैं? तो यह शंकराचार्य है। देखिए कि शंकराचार्य ने भारत की यह जो पुरानी परंपराएं थी, पुरानी यह जो दर्शन शास्त्र थे, उनको कैसे पुनर्जीवित किया और इस पुनर्जीवित दर्शन शास्त्र के माध्यम से उन्होंने भारत का जो यह बौद्ध धर्म का जो डिग्रेडेशन प्रारंभ हुआ था, उसको अटकाया, उसको स्टॉप किया और गाड़ी को फिर से नए रास्ते पर उन्नति के रास्ते पर लेकर गए। तो शंकराचार्य वाला जो पॉइंट है उसमें यह जो एक स्टेटमेंट है स्वामी जी का बड़ा ही सुंदर है। स्वामी जी क्या कहते हैं कि हां द सडन चेंजेस कैन नॉट बी शंकराचार्य न्यू इट। सो रामानुजा द ओनली वे लेफ्ट फॉर देम टू स्लोली ब्रिंग अप टू द हाईएस्ट आइडियल द एकिस्टिंग रिलीजन। फटाक करके आप कोई भी चेंज नहीं कर सकते हैं। यदि समाज की उन्नति करनी है तो धीरे-धीरे करके एग्जिस्टिंग आइडियल्स को आपको उनकी चरम शिखर पे चरम सीमा पे ले जाना होगा। उसके बाद में स्वामी जी ठाकुर के बारे में कहते हैं। ठाकुर के बारे में कहते हैं कि देखिए यह जो आज के रिफॉर्मर है कहते हैं कि मूर्ति पूजा वगैरह को बंद कर दो। तो आपको पता है कि ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस देव स्वयं मूर्ति पूजा करके इतनी एक उच्च आध्यात्मिक अवस्था उन्होंने प्राप्त की थी। उन्होंने आत्म साक्षात्कार किया था। तो स्वामी जी कहते हैं कि यदि मूर्ति पूजा करके एक परमहंस जन्म लेता है तो आपको क्या चाहिए? यह हजार रिफॉर्मर चाहिए जिनका चरित्र किसी काम का नहीं है ना कि मूर्ति पूजा के माध्यम से सिद्ध हुए श्री रामकृष्ण परमहंस देव जिनका चरित्र युग युगांतर के लिए सुवर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। तो यह आइडोलेटरी फॉर क्रिटिसाइजिंग आइडोलेटरी फॉर द सेक ऑफ आइडोलेटरी। ये रिफॉर्मस्ट जितना भी चिल्लाते थे कि मूर्ति पूजा सब गलत है। सब इसको बंद कर दो। तो मूर्ति पूजा गलत है। बंद कर दो। बोलने से कोई काम नहीं लगेगा। आपको तो पहले यह देखना है कि मनुष्य की साइकोलॉजी क्या है? यदि मूर्ति पूजा करके मनुष्य के हृदय में शांति मिलती है। ईश्वर के प्रति श्रद्धा भक्ति का उदय होता है तो हजार मूर्तियों को बिठाकर के हजार पूजा करो। चरित्र की शुद्धता चरित्र की पवित्रता ही हमारी नजर के सामने सबसे बड़ा उद्देश्य है। नहीं कि यह हवा-हवा में फिलॉसोफी डालना कि यह गलत है। इसको बंद कर दो। यह यूरोपियन लोगों को अच्छा नहीं लगता इसलिए बंद कर दो। ये यूरोपियन लोग कहेंगे कि आपकी सब मूर्तियां गलत है। किंतु हमारी सब मूर्तियां अच्छी है। उनके जो चर्च जाकर के देखेंगे कितने ये एंज्स और यह मदर मेरी और जीसस क्राइस्ट की हजारों मूर्तियां आपको देखने को मिलेगी। यूरोप के जितने बड़े-बड़े चर्च है सब में जाकर के देख लीजिए। वो जो बड़े-बड़े उनके जो पेंटिंग्स होते हैं चर्च की छतों के ऊपर में उसमें वह फादर इन हेवन को दिखाया गया है। एडमम एंड इव को दिखाया गया है। तो उनकी जो माइथोलॉजीस है उनके जो लेजेंड्स है उसको आप चित्रांकित कर सकते हैं। उनकी आप मूर्तियां बना सकते हैं। किंतु हिंदू धर्म की मूर्तियां नहीं बना सकते। यदि भगवान गाय के रूप में आते हैं तो वह गलत है। किंतु भगवान या कबूतर के रूप में आते हैं तो वह अच्छे हैं। तो इस तरह से स्वामी जी कहते हैं कि विदेशी आइडियाज को भारत पर बिाने से कोई लाभ नहीं है। डू नॉट कर्स ओनली ब्लेस। यह एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट स्वामी जी का है मैसेज कि आप गाली देकर के, निंदा करके, क्रिटिसाइज करके भारत की उन्नति का मार्ग कभी भी प्रशस्त नहीं कर पाएंगे। यहां पर देखिए कितना सुंदर स्टेटमेंट है स्वामी जी का कि डिड इंडिया एवर स्टैंड इन वांट ऑफ रिफॉर्मर्स? भारत में कभी क्या रिफॉर्मर्स की कमी रही है? डू यू रीड द हिस्ट्री ऑफ इंडिया? भारत का इतिहास पढ़ते हो? हु वाज़ रामानुजा? हु वाज़ शंकरा? हु वाज़ नानक? हु वाज़ चैतन्य? हु वाज़ कबीर? हु वाज़ दादू? हु वेयर ऑल दिस ग्रेट प्रीचर्स वन फॉलोइंग द अदर अ गैलेक्सी ऑफ़ स्टार्स ऑफ द फर्स्ट मैग्नीट्यूड? कौन थे यह रामानुज? कौन था? कौन थे शंकर? कौन थे नानक, कौन थे चैतन्य, कौन थे कबीर और कौन थे दादू? यह सब एक से बढ़कर एक महान धार्मिक आचार्य थे जिन्होंने जैसे कि एक पूरा गैलेक्सी एक पूरा एक तारा मंडल भर करके यह सब ग्रेट सोल्स महात्मा भारत की भूमि पे अवतरित हुए। और भारतीय पुण्य भूमि को अपने लहू से अपनी तपस्या से उन्होंने इसका सिंचन किया।
भारत का नवनिर्माण कैसे होगा: भारत का प्राण है धर्म. यहाँ धर्म के आधार पर ही समाज, राष्ट्र, और अर्थनीति का नवनिर्माण होगा.
तो यह एक स्वामी जी का बड़ा इंपॉर्टेंट पॉइंट। इसके बाद का जो पॉइंट है कि ग्रो अकॉर्डिंग टू आवर नेचर। हमारा जो नेचर है उसी की तरह हम उसी के अनुसार हम डेवलप होंगे। यूरोप में देखिए बहुत सारे देशों में देखिए कोई कोई देश है उसकी प्राणशक्ति पॉलिटिक्स में होती है तो पॉलिटिक्स के माध्यम से ही वे लोग सब समझते हैं। स्वामी जी कहते हैं कि वहां पर मुझे धर्म भी वेदांत भी सिखाना है तो मुझे कहना पड़ेगा कि हां वेदांत सीखने से आपको यह पॉलिटिकल बेनिफिट होगा। कोई कोई देश होता है जहां पर आर्ट एंड कल्चर उस देश की प्राण है। जैसे कि फ्रांस फ्रांस में जाएंगे तो आपको पॉलिटिक्स भी यदि लोगों को समझाना है तो आपको बताना पड़ेगा कि अच्छा पॉलिटिक्स करने से या तो यह नई पॉलिटिकल पॉलिटिकल सिस्टम अपनाने से आपके आर्ट और कल्चर में इस तरह से डेवलपमेंट होगा। किंतु भारत का प्राण है धर्म। यदि भारत में आपको कोई नई पॉलिटिकल सिस्टम लानी है, भारत की उन्नति करनी है, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक उसका ग्रो करना है, उन्नति करनी है तो इन सभी के लिए आपको धर्म को बीच में लाना पड़ेगा। कहना पड़ेगा कि यदि आधुनिक अर्थव्यवस्था या तो फिर यह आधुनिक विचार सरणी अपनाने से आपके धर्म में इस तरह से उन्नति हो सकती है। तो स्वामी जी कहते हैं कि भारत का प्राण है धर्म। सब कुछ धर्म के आधार पर ही भारत में होगा। इसके लिए देखिए स्वामी जी का यह स्टेटमेंट है। इन इंडिया रिलीजन लाइफ फॉर्म्स द सेंटर द की नोट ऑफ द होल म्यूजिक ऑफ नेशनल लाइफ। भारत में देखिए यहां से हम फिर से पढ़ते हैं। यहां तक हमने पढ़ लिया है। थोड़ा सा एक दो पैराग्राफ रिपीट कर लेते हैं। स्वामी जी क्या कहते हैं? व्हाट इज माय प्लान देन? मेरा प्लान क्या है? अभी तक तो एक पूरा फिलॉसोफिकल थ्योरिटिकल बैकग्राउंड स्वामी जी ने बता दिया। अभी आफ्टर कंप्लीटिंग दिस बैकग्राउंड स्वामी जी का फ्यूचर प्लान क्या है? माय प्लान इज टू फॉलो द आइडियाज ऑफ द ग्रेट एंशिएंट मास्टर्स। ये हमारे पुरातन धर्म प्रचारक थे। जो हमारे अवतार मुनि ऋषि गण थे। उनके पदसरण को उनके पद चिन्हों को मुझे अनुसरण करना है। आई हैव स्टडीड देर वर्क एंड इट हैज़ बीन गिवन अनटू मी टू डिस्कवर द लाइन ऑफ एक्शन दे टूक। मैंने उनके कार्यों का उनके लेखनी का उनके जो वचन और वाणी का अभ्यास किया है और ठाकुर ने ईश्वर ने मुझे यह दिखाया है। ईश्वर ने मुझे शक्ति दी है कि जिस लाइन ऑफ एक्शन को उन्होंने फॉलो किया है उसको समझने का। दे वे द ग्रेट ओरिजनेटर्स ऑफ सोसाइटी। सभ्यता की किस तरह से रचना की जाए उनको बखूबी पता था। किस तरह सभ्यता के रचयिता थे वे लोग। सभ्यता के महान रचयिता थे। वे ही ये नानक दादू चैतन्य वगैरह जो भी नाम दिए स्वामी जी ने। दे वे द ग्रेट गिवर्स ऑफ स्ट्रेंथ एंड ऑफ प्यूरिटी एंड ऑफ लाइफ। वे लोग थे कि जिन्होंने हमको शक्ति दी। हमको पवित्रता दी। हमको जीवन दिया। दे डिड मोस्ट मार्वलस वर्क। वी हैव टू डू मोस्ट मार्वेलस वर्क आल्सो। उन्होंने भव्य कार्य किया। हमको भी अति भव्य कार्य करना है। सरकमस्ट्स सरकमस्ट्ससेस हैव बिकम अ लिटिल डिफरेंट एंड इन क्सक्यूुएंस द लाइंस ऑफ एक्शन हैव टू बी चेंट अ लिटिल एंड दैट इज ऑल। परिस्थिति थोड़ी सी बदल गई है। पुराने समय की जो परिस्थिति थी उससे आज की परिस्थिति थोड़ी सी अलग है। उस समय हमको यह वेस्टर्न कंट्रीज कौन थे? क्या थे इसके बारे में कुछ पता नहीं था। आज इस वेस्टर्न कंट्रीज यूरोप और अमेरिका उनकी टेक्नोलॉजिकल मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्रियल शक्ति से पॉलिटिकल मिलिटरी पावर से भारत के ऊपर में हावी हो गए हैं। तो आज की यह जो परिस्थिति है बदली हुई परिस्थिति उसके अनुसार प्लान को थोड़ा सा मॉडिफाई ही करना है। धन मूल्य से चेंज नहीं करना। फंडामेंटल चेंज नहीं करना। थोड़ा सा ऊपर ऊपर से चेंज करना है। आई सी दैट ईच नेशन लाइक ईच इंडिविजुअल हैस वन थीम इन दिस लाइफ वि इज इट सेंटर द प्रिंसिपल नोट राउंड वि एवरी अदर नोट कम्स टू फॉर्म द हार्मोनी। मैं देखता हूं कि प्रत्येक देश एक इंडिविजुअल की तरह एक व्यक्ति की तरह प्रत्येक देश में एक सेंट्रल थीम होता है। एक मुख्य उद्देश्य होता है। एक प्रिंसिपल नोट यानी कि मुख्य राग होता है। जिसके आसपास में सभी रागिणियां, रागराणियां, धुन, ताल, लय सब कुछ इसके आसपास में घूमते हैं और एक भव्य सुंदर संगीत की रचना करते हैं। इन वन नेशन पॉलिटिकल पावर इज इट्स वाइटालिटी एज इन इंग्लैंड, आर्टिस्टिक लाइफ इन अनदर एंड सो ऑन। कोई एक देश में उसका जो प्राणशक्ति है, वह है पॉलिटिकल पावर। जैसे कि इंग्लैंड कि कोई एक देश में देखेंगे कि आर्टिस्टिक लाइफ आर्ट एंड क्राफ्ट एंड नॉलेज एंड यह सब जो है उसका प्राण है। तो वो मोस्ट प्रोबेबबली स्वामी जी ने नाम नहीं दिया। अनुमान करके मैं कहता हूं फ्रांस। इन इंडिया रिलीजियस लाइफ फॉर्म्स द सेंटर द की नोट ऑफ द होल म्यूजिक ऑफ नेशनल लाइफ। भारत में धर्म ही भारतीय शक्ति का भारतीय जीवन का केंद्र है। द मुख्य राग है। जिसके ऊपर में भारतीय संगीत बुना हुआ है। जिसके आधार पर भारतीय संगीत गूंज रहा है युग युगांतर से। एंड इफ एनी रिल इफ एनी नेशन अटेमप्ट्स टू थ्रो ऑफ इट्स नेशनल वाइटालिटी द डायरेक्शन व्हिच हैज़ बिकम इट्स ओन थ्रू द ट्रांसमिशन ऑफ सेंचुरीज़ दैट नेशन डाइस इफ इट सक्सीड्स इन द अटेम्प्ट। और यदि कोई देश उसकी ये जो प्राणशक्ति है प्राणशक्ति का केंद्र है जिस डायरेक्शन में उसकी यह जो प्राणशक्ति सदियों से बह रही है उसको उठा करके फेंक देने का प्रयास करेगा तो वो देश उसका समाप्ति हो जाएगा। तहस-नहस हो जाएगा। वह देश यह समय की भीतर में वो समाप्त हो जाएगा। यह जो इतिहास के पन्नों से उसका नाम निशान मिट जाएगा। एंड देयर फॉर इफ यू सक्सीड इन अटेम्प्ट टू थ्रो ऑफ योर रिलीजन एंड टेक अप आइदर पॉलिटिक्स और सोसाइटी और एनी अदर थिंग्स एस योर सेंटर एस द वाइटालिटी ऑफ योर नेशनल लाइफ द रिजल्ट विल बी दैट यू विल बिकम एक्सटिंक्ट। और इसीलिए यदि आप अपने धर्म को फेंक करके धर्म को हटाकर के पॉलिटिक्स है या तो सोशल रिफॉर्म है वगैरह-वगैरह चीजों को अपनी प्राणशक्ति बनाना चाहे उसके ऊपर में अपनी प्राणशक्ति बहाना चाहे तो समझ लीजिएगा कि भारत देश नेस्तनाबूत हो जाएगा। एक्सटिंक्ट यानी कि संपूर्ण रूप से उसका खात्मा हो जाएगा। ये एक बहुत बड़ा स्टेटमेंट है। मैं अपनी खुद की बात करूं। मैं स्वामी जी को पढ़ने से पहले इतिहास है या तो फिर ये सोशल स्टडीज है, साइकोलॉजी है, ह्यूमन सिविलाइजेशन है, राइज एंड फॉल ऑफ ह्यूमन सिविलाइजेशन है। ये सब काफी स्टडी किया करता था। और और सब हर तरह से मैं देखता था कि यदि ह्यूमन स्टडीज है, सिविलाइजेशनल स्टडीज है। उसका फंडामेंटल फैक्ट है राइज एंड फॉल ऑफ द सिविलाइजेशन। ये एक सभ्यता का उत्थान होता है। जैसे कि ये हेलेनिक सिविलाइजेशन थी जो कि ग्रीस और रोम में उसका डेवलपमेंट हुआ था और यही हेलेनिक सिविलाइजेशन धीरे-धीरे करके काल के गर्त में नेस्तनाबूत हो गई। उसका वो धीरे-धीरे करके डिसइीग्रेट हो गई और उसके बाद में यह रोमन यह जो क्रिश्चियन सिविलाइजेशन थी उस समय की उसका प्रारंभ हुआ। तो मैं सब समय सोचता था कि ये सिविलाइजेशन का राइज कैसे होता है? उसका विकास कैसे होता है? उसकी जो अवनति कहां से प्रारंभ होती है? और उसका एक्सटिंशन कैसे होता है? सिविलाइजेशन का साइंस क्या है? क्योंकि यदि कोई एक स्टडी है यदि आप उसको सीरियसली पर्स्यू करना चाहे और उसको पर्स्यू करके आपको सही-सही में ह्यूमन नेचर में एक इंसाइट प्राप्त होती है तो वो है द स्टडी ऑफ द सिविलाइजेशन। द मोस्टेंट स्टडी इन द ह्यूमैनिटीज इज द स्टडी ऑफ द आत्मन। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है कि हमारे भीतर में मनुष्य ह्यूमन कॉन्शियसनेस। यह जो मानवीय यह जो मन है हमारा इसके भीतर में क्या चल रहा है? उसका स्टडी सर्वश्रेष्ठ है। किंतु इसी के साथ में लिंक है द सिविलाइजेशनल स्टडीज यानी कॉन्शियसनेस स्टडीज और ये सिविलाइजेशनल स्टडीज ये दोनों एक दूसरे के साथ में लिंक है। एक को समझना है तो आपको दूसरे को समझना होगा। एक इंडिविजुअल मनुष्य की कॉन्शियसनेस को स्टडी करने से साइकोलॉजी स्टडी करने से आपको मनुष्य के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानने को मिलेगा। क्योंकि मनुष्य का मन जो है वह इंडिविजुअल एंटिटी नहीं है। आइसोलेशन में किसी भी व्यक्ति का साइकोलॉजी काम नहीं करता है। वी आर पार्ट ऑफ लार्ज नेटवर्क्स। मैंने जिस सिविलाइजेशन में जन्म लिया है, जिस धर्म में मेरा जन्म हुआ है, जिस देश में मैं रह रहा हूं, जिस फैमिली में मैं रह रहा हूं, उन सबका मेरे मेरी साइकोलॉजी के ऊपर में बड़ा ही गहरा असर होता है। कोई भी मनुष्य उसके जो इन्फ्लुएंस है उसके ऊपर में वह जिस सिविलाइजेशन का पार्ट है, जिस देश का पार्ट है, जिस सोसाइटी का पार्ट है, जिस फैमिली का पार्ट है, जिस कॉरपोरेशन, बिजनेस उसका पार्ट है, उस जिस धर्म का वह पार्ट है, उससे अपने को 100% अलग करके कोई भी मनुष्य रह नहीं पाएगा। हमारी विचारसरणी, हमारा बिहेवियर, अपनी थिंकिंग सिस्टम, हम जिस परिस्थिति में जन्म ग्रहण किए हैं, उसी के साथ में मोर और लेस मैच होगी। यदि मेरा जन्म अरेबिया में होता, तो मैं उन लोगों की तरह ज्यादातर बिहेव करता। थोड़ा बहुत मैं अपने आप को सिविलाइजेशन से जो अपने आसपास जो हो रहा है वो उठा पाता। किंतु 100% अपने को आसपास की परिस्थितियों से सेपरेट कर देना वह तो निर्विकल्प समाधि के अलावा कभी भी नहीं होने वाला है। वो जो उदाहरण है ना योगेन महाराज का रिवर्स उदाहरण बताता हूं।
कहानी: स्वामी योगानंद को श्रीरामकृष्ण पर संदेह होता है
योगेन महाराज एक बार देखे कि ठाकुर बड़े चिंतित हो गए हैं। क्यों? क्योंकि काली मंदिर में भोग लगता है तो उसका फिर वो ठाकुर के लिए प्रसाद आता है। तो एक दिन काली मंदिर जो वो वहां की ऑफिस थी तो ऑफिस से यह सब प्रसाद सब जगह पर भेजा जाता है। तो वहां से देखा कि ठाकुर के कमरे के लिए भी जो प्रतिदिन प्रसाद आना था वो नहीं आया। तो ठाकुर बड़े चिंतित होकर के इधर-उधर टहल रहे हैं। कह रहे हैं कि अरे काली मंदिर से प्रसाद नहीं आया। इस समय तो आ जाना चाहिए। क्या बात हुई? तो योगेंद्र महाराज सोचते हैं कि देखिए आखिर में तो यह चाल कोला बाधा बामुन अर्थात कि यह जो दक्षिणा स्वीकार करके पूजा करता है ऐसे पुजारी ही तो है। भले ही चाहे वह अवतार हो गए ना कि ईश्वर हो गए हो कुछ भी हो उनका संस्कार तो यही है। इसीलिए बड़े चिंतित होकर के वह प्रसाद के लिए अपेक्षा कर रहे हैं। ठाकुर से रहा नहीं गया। वह ऑफिस तक गए। ऑफिस में जाकर के वो जो भंडारी था वहां का वो जो कोठारी कोठारी को पूछा कि अरे वहां के लिए प्रसाद क्यों नहीं भेजा इतने दिनों की यह प्रथा है उसको आप बंद कर देंगे तो ये तो बड़ा अन्याय होगा तो वो कोठारी भी थोड़ा ये शर्मिंदा हो गया कि ठाकुर को खुद को आना पड़ा बोल के वो बोलता है अरे नहीं नहीं मैं अभी व्यवस्था करता हूं बोल के तब ठाकुर वापस आ रहे हैं तो योगेंद्र महाराज का चेहरा देखकर के योगेंद्र महाराज के मन का भाव समझ गए कि उनके मन में ठाकुर के प्रति थोड़ा बहुत एक अश्रद्धा का भाव प्रकट हुआ है क्योंकि वह प्रसाद की इतनी चिंता कर रहा है। तो इमीडिएटली ठाकुर ने कहा कि देखो यहां पे जो पैसा आया है यहां पे जो दान दिया गया है जो फंड दिया गया है काली मंदिर में रानी रासमणि ने इसलिए दिया है कि साधु संतों की गरीब कांगालियों की सेवा हो। मेरे पास में जो प्रसाद आता है तो मैं यह जो धार्मिक जो लोग हैं साधक हैं उनको मैं खिलाता हूं। किंतु वहां जो ऑफिस में जाएगा प्रसाद, वह कहां-कहां पर कैसे-कैसे लोगों को खिलाएगा। यह जो वहां के जो थे कुछ-कुछ लोग, कर्मचारी, वो उनको तो दूसरी सब स्त्रियों के साथ में भी संबंध है। जाकर के उनको खिलाएंगे। यह सब उसका दुरुपयोग होगा, तो बेटर है मेरे पास में आए तो उस पैसों का सदुपयोग हो। रानी रासमणि ने जिस अर्थ के लिए, जिस पर्पस के लिए डोनेशन दिया था काली मंदिर में, उसका सदुपयोग हो। इसके लिए मैं इतना चिंतित था। तब योगेंद्र महाराज थोड़े शर्मिंदा हो गए कि देखिए कि उन्होंने ठाकुर के ऊपर में इस तरह से अविश्वास दिखाया। किंतु देखिए हमको यह बात यह जब हम यहां पे स्वामी जी कहते हैं ना कि हम जिस जो प्राणशक्ति जो है जिस देश की उस वो उसी डायरेक्शन में जाएगा। इस हिसाब से योगेंद्र महाराज का थिंकिंग ठीक ही था कि जो दक्षिणा लेकर के पूजा करते हैं चाल कोला बांदा बामुन वह वैसे के वैसे ही वह भले चाहे कैसे कहां पर भी चले जाए वो वैसे के वैसे ही रहेंगे। उनका जो बेसिक चरित्र है। किंतु हम सबको पता है कि ठाकुर की बात अलग है। अवतार स्वयं ईश्वर स्वयं नर देह धारण करके आए थे। वो जितना भारतीय संस्कृति का पार्ट थे। इतना गहराई से उन्होंने भारतीय संस्कृति के साथ में अपने को आइडेंटिफाई किया है। उतना ही इस संस्कृति से ऊपर उठकर के पूरे विश्व की वह चिंता कर सकते थे। वो सिर्फ भारतीय नहीं थे। हालांकि भारतीयों की तरह भारतीयों के सभी व्यवहार हमारे जितने भी यह प्रथाएं हैं जो चाहे अच्छी हो ना कि बुरी सबको उन्होंने होलसेल अपना तो लिया था। किंतु यह भारतीय संस्कृति, भारतीय परंपरा, भारतीय धर्म साधना से ऊपर उठकर के भी उन्होंने इस्लाम की साधना भी की थी। क्रिश्चियनिटी की भी साधना की थी और वो जो आखिरी आखिरी समय में जब ठाकुर काशीपुर में
कहानी: श्रीरामकृष्ण का एक दर्शन: वे एक ऐसे देश में चले गए हैं जहाँ हर कोई गोरा है
थे, एक उनको कैंसर हो गया था। सभी मां शारदा देवी और फिर यह जो त्यागी संतान थे, भक्तगण थे, सब लोग उनकी सेवा करने के लिए वहां पर रह रहे थे। एकाएक एक दिन देखा कि ठाकुर ने बात करना बंद कर दिया है। तो एकदम चारों ओर एकदम मायूसी का वातावरण फैल गया। क्या ठाकुर अभी देह त्याग कर देंगे? क्या करेंगे? अभी पता नहीं तो तो अभी मां शारदा देवी ठाकुर के कमरे में आकर के रो रही है। क्या करेंगे? किंतु कुछ समय के बाद में फिर ठाकुर ने किसी एक भक्त के साथ में बात की। उस भक्त ने जाकर के सबको यह शुभ समाचार दे दिया कि ठाकुर ने फिर से बात की है। तो फिर बाकी भक्तगण ठाकुर के कमरे में गए तो ठाकुर ने उस समय कहा था कि देखो मैं कहां पर चला गया था। एक ऐसा देश के जहां पे सभी लोग गोरे-गोरे हैं। तो देखिए कि यह गोरे लोगों का एक देश होना यह भी अभी मां तो क्या थी कि माने मां को पता तो था कि यह ब्रिटिश लोग का राज्य है। कोलकाता में यह गोरे लोग रहते हैं। किंतु मां का तो कोई जियोग्राफी और ये कोई हिस्ट्री वगैरह का तो इतना कोई डेप्थ इन डेप्थ नॉलेज नहीं था कि मां विजुअलाइज करें कि ब्रिटेन या लंदन जैसा एक सिटी है, शहर है। सभी लोग गोरे लोग रहते हैं। तो, यह देखिए, कि अह ठाकुर इंस्पाइट ऑफ बीइंग भारतीय, वह अपने को भारतीय परंपरा से हटा करके ऊपर ले जाकर के पूरे विश्व के बारे में सोच सकते थे। किंतु वह तब होगा जब कि हम अपने जितने भी पंचक्लेश है काय मनोवाक्य से संपूर्ण पवित्रता प्राप्त कर लेंगे। पंचक्लेश से मुक्त हो जाएंगे। जब हमको निर्विकल्प समाधि प्राप्त होगी। दग्ध बीज हो जाएंगे। हमारे पंचक्लेश तब तो वह कहीं जाकर के होगा। जब तक निर्विकल्प समाधि नहीं प्राप्त होती है कॉन्शियसनेस के इस ओर है हम तब तक तो हमको हम जिस परंपरा में हमने जन्म ग्रहण किया है उसी परंपरा में हमको आगे बढ़ना है उसको मॉडिफाई करना है युग के अनुसार किंतु उसको परंपरा का रोध करके उसको संपूर्ण रूप से उसको विच्छेद करके नई परंपरा जाकर के अपने पर बिठाएंगे तो वह हमारा अकल्याण ही करेगी तो इसके लिए यहां पर कहते हैं स्वामी जी का यह जो लास्ट सेंटेंस था कि इफ यू सक्सीड इन द अटेम्प्ट टू थ्रो ऑफ योर रिलीजन एंड टेक अप आइदर पॉलिटिक्स और सोसाइटी और एनी अदर थिंग्स एस योर सेंटर एस द वाइटालिटी ऑफ़ योर नेशनल लाइफ द रिजल्ट विल बी दैट यू विल बिकम एक्सटिंक्ट। यदि धर्म को छोड़कर के पॉलिटिक्स है या और किसी आइडियाज को आपने अपनी प्राणशक्ति का केंद्र बनाने का प्रयास किया तो आप एक्सटिंक्ट हो जाएंगे। नेस्तनाबुद्ध हो जाएंगे। टू प्रिवेंट दिस यू मस्ट मेक ऑल एंड एवरीथिंग वर्क थ्रू दैट वाइटलिटी ऑफ योर रिलीजन। यह हमारा एक्सटिंशन ना हो जाए। हम नेस्तनाबुद्ध ना हो जाए। भारतीय संस्कृति का खात्मा ना हो जाए। इसके लिए आपको धर्म के माध्यम से ही सब कुछ करना होगा। वाइटालिटी ऑफ योर रिलीजन धर्म प्राणवंत धर्म सीधा माने जो इस तरह का धर्म जो कि अपने मूल जो केंद्र है उसके जो फर्स्ट प्रिंसिपल्स है उसके साथ में जुड़ा हो नहीं कि देश देशांतर की जितनी भी अंधश्रद्धा है उसको आप धर्म का नाम लेकर के सबके भीतर में प्रचार करेंगे तो नहीं चलेगा भारत में धर्म हिंदू धर्म को किसको कहते हैं तो वह प्रस्थानत्रय उपनिषद श्रीमद्भगवत गीता और ब्रह्मसूत्र तो इन तीनों के आधार पर जो अपना सनातन धर्म है, प्राणवंत धर्म है, उसके माध्यम से उसको आधार बना करके आपको बाकी सब कुछ करना होगा। आई हैव सीन दैट आई कैन नॉट प्रीच आई कैन नॉट प्रीच इवन रिलीजन टू अमेरिकनंस विदाउट शोइंग देम इट्स प्रैक्टिकल इफेक्ट ऑन सोशल लाइफ। इसी पॉइंट को कि सभी देश की अपनी-अपनी एक प्राणशक्ति होती है। उसी पॉइंट को आगे बढ़ा करके स्वामी जी कहते हैं कि मैंने देखा है कि अमेरिकन लोगों को मैं धर्म तब तक नहीं सिखा पाऊंगा जब तक मैं उनको यह बता पाऊं कि धर्म के माध्यम से उनका ये जो सोशल लाइफ है वो कितना इंप्रूव होगा। उनका जो भी है सोशल लाइफ है उनका जो इकोनॉमिक लाइफ है हमको डॉलर डॉलर वरशिप अमेरिका में चलती थी। आज भी चलती है उस समय भी चलती थी। तो आप कितने ज्यादा डॉलर बना पाएंगे? आपका बॉटम लाइन जिसको कहते हैं बिजनेस का वो कितना इंप्रूव होगा? यदि आप वेदांत को स्वीकार करेंगे तो यदि स्वामी जी यह बता पाएंगे तब कहीं जाकर के स्वामी जी वेदांत का प्रचार कर पाएंगे। देखिए इसके यहां पर स्वामी जी ने किसी का नाम नहीं लिया। किंतु ये जो फ्रांसिस
कहानी: स्वामी विवेकानंद की फ्रांसिस लेगेट से मित्रता
लेगेट है, स्वामी जी का ये जो धनपति जो मित्र था तो इन दोनों के बीच में देखिए कि मित्रता बड़ी गहरी थी। एक बड़ा फनी इंसिडेंट है कि स्वामी जी रिजली मैनर में रहने को गए हैं और वो और ये रिजली मैनर तो फ्रांसिस लेगेट का है। उसने स्वामी जी को आमंत्रण दिया है और खुद तो स्वामी जी का बहुत बड़ा डिवोटी था ही किंतु यह जो दो बहनें थी जोसेफाइन मैक्लाउड और बेटी लेगेट। बेटी लेगेट यानी फ्रांसिस लेगेट की वाइफ। तो यह दोनों बहनें थी। यह दोनों भी स्वामी जी की बड़ी ही गहरी उनकी मतलब एडमायरर्स थी। वे लोग अपने को डिसाइपल नहीं कहेंगे। तो एडमायरर कहेंगे फ्रेंड्स एंड एडमायरर्स। ओके? तो वो दोनों स्वामी जी की बड़ी ही अच्छी फ्रेंड और एडमायरर थी। तो किंतु साथ-साथ में ही फ्रांसिस लेगेट के साथ में भी स्वामी जी का बड़ा अच्छा फ्रेंडशिप हो गया था। तो तीनों जो कि वहां के मालिक थे, मालिक, मालकिन वो उन तीनों के साथ में स्वामी जी का अच्छा फ्रेंडशिप था। अभी एक दिन हुआ ऐसा कि स्वामी जी वहां पे फ्रांसिस लेगेट के साथ में बैठकर के बात कर रहा है। अभी यह दोनों तो माने एंथूजियास्टिक और पौरुषत्व से भरे हुए हैं। तो उन्होंने पता नहीं कुछ उन्होंने कोई जिम्नेशियम ना कि रेसलिंग ने ऐसा कुछ करने को सोचा। तो स्वामी जी जो थे वो जमीन पर लेट गए और पैर उठाए हवा में और इन दोनों पैरों के ऊपर में यह फ्रांसिस लेगेट खड़ा रहा। देखते हैं कि स्वामी जी में कितनी शक्ति है। ऐसा करके दो खड़े थे। अभी हुआ ऐसा कि यदि आप पैर हवा में उठाएंगे तो नेचुरली है स्वामी जी जिस तरह का ड्रेस पहनते थे वो तो आपके पैरों को एक्सपोज कर देगा। वो नीचे गिरेगा पैर एक्सपोज हो जाएंगे। तभी यह दोनों ऐसा जब कर रहे थे जिम्नेस्टिक ने जो कुछ भी है उस समय कमरे में कोई नहीं था। एकाएक जोसेफाइन मैक्लाउड उस कमरे में उसने प्रवेश किया। तो स्वामी जी ने जैसे ही देखा कि वह लेडी का प्रवेश हुआ है और उनके पैर एक्सपोज है। इमीडिएटली उन्होंने अपने पैर नीचे कर दिए। अभी जो पैरों के ऊपर में खड़े थे फ्रांसिस लेगेट उनका क्या होगा? वो बेचारे भड़ाम करके जमीन पे गिरे। तो मतलब इन दोनों के बीच में इस तरह की फ्रेंडशिप थी। ये इंसिडेंट नहीं हुआ होता तो हमको पता नहीं चलता कि ये लोग यह सब भी करते थे। तो व्हाटएवर यहां पे देखिए फ्रांसिस लेगेट का जो पूरा मेंटालिटी था वो डॉलर वरशिप कि बिजनेस क्या है वो उसको बड़े अच्छे से पता था। स्वामी जी को यदि फ्रांसिस लेगेट को वेदांत भी समझाना है तो उसका जो यह बिजनेस है उसमें किस तरह से इंप्रूवमेंट होगा वह समझाना पड़ेगा। यहां पर मैं स्टूडेंट्स को मेडिटेशन सिखाता हूं। तो अभी मैं यह तो नहीं कह पाऊंगा कि ठाकुर का ध्यान कीजिए तो ठाकुर का आशीर्वाद आपको मिलेगा। ठाकुर को कौन पहचानता है? ठाकुर के ऊपर में किसकी श्रद्धा है? अच्छा और किसी देवता का ध्यान कीजिए, तो उस देवता का आशीर्वाद मिलेगा। किंतु ठीक है आप देवता का नाम लेंगे स्टूडेंट्स को इतना कोई इंटरेस्ट उसमें नहीं आएगा। मुझे क्या कहना पड़ेगा कि आप लोग स्टूडेंट्स हैं तो आपके लिए सबसे इंपॉर्टेंट क्या है? तो वह है कि मेमोरी पावर, क्रिएटिविटी, यह लीडरशिप क्वालिटीज, यह फ्रेंडशिप क्वालिटीज जो कि आपको आपके जो फ्यूचर जो है कॉर्पोरेट सेक्टर में, बिजनेस सेक्टर में या तो आप हाउसवाइफ होंगी वह सभी जगह पे यह सब क्वालिटीज आपको हेल्प करेगी। आपको क्रिएटिव होना है कि नहीं होना है? एआई के युग में एक समय था कि रोबोट आकर के यह ब्लू कॉलर वर्कर है, यह जो लेबरर्स है उनका सब हथिया लेते थे। उनकी जॉब अभी देखिए कि सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स का अभी एक के बाद एक वो बड़ी-बड़ी मल्टीीनेशनल कंपनी है वे लोग सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स को ये कर रही है नौकरी से निकाल रही है। क्यों? क्योंकि एआई अभी 30% कोड तो बड़ी-बड़ी कंपनी एक बार वो सुंदर पिचाईना की किसका मैंने इंटरव्यू पढ़ा था। कहता है कि 30% से ज्यादा कोड तो हमारा अभी एआई लिख लेता है। तो एआई कोडिंग करता है तो आपको ह्यूमन सॉफ्टवेयर इंजीनियर की क्या जरूरत है? तो सब जगह से आप देखिए आर्ट हो, साइंस हो ना कि यह फिर यह सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग हो सब जगह पर एआई अपना पैर फैला रहा है। यदि आपको आज के भविष्य के युग में अपना रिलेवेंस बनाए रखना है देन यू विल हैव टू बिकम मोर एंड मोर क्रिएटिव। और यह क्रिएटिविटी कहां से आएगी? तो ये मेडिटेशन करके। क्योंकि हमारे भीतर में क्रिएटिविटी का महासागर है। आत्मन रूपी महासागर है। यह जो स्वामी जी कहते हैं ना कि दो तरह के विचार होते हैं। एक तरह के दो तरह के आइडियाज होते हैं। एक तरह के आइडियाज है कि हम यह कॉन्शियस लेवल पे उसको सोचते हैं और यह अपनी कॉन्शियसनेस है। उसकी ये जो मेमोरी और संस्कार की लिमिटेशन है उसमें से यह प्रकट होते हैं और एक तरह के आइडियाज है आप सुपर कॉन्शियस लेवल पर चले जाएंगे। तो आपने जो पढ़ा है, जो सीखा है, जो देखा है, जो अनुभव किया है, जो सुना है, उसकी यह जो सीमित परिधि है, लिमिटेड सर्कल है, उसके बाहर से कहां-कहां से प्रचंड पावरफुल आइडियाज आपके माइंड में आना शुरू होंगे। जिसको कहते हैं क्रिएटिव आइडियाज। यह आइंस्टाइन है। एआई चाहे कितना ही डेवलप हो गया हो एज ऑफ टुडे आइंस्टाइन की तरह एक कंप्लीटली नया साइंटिफिक प्रिंसिपल उसने नहीं खोज निकाला है। भविष्य में हो भी सकता है। वी डू नॉट नो यह जो अल्फा गो गेम थी उसमें देखा लीडोल के साथ में अल्फा गो बोल के एi कंप्यूटर वो गो बोल के चेस जैसी ही एक गेम है। तो वह खेल रहा है। उसमें एक मूव ऐसा था कि जिसका कि पूरे गो की जो गेम है चेस की गेम चेस की तरह की गेम उसके पूरे इतिहास में इस तरह का मूव किसी ने नहीं देखा था जो कि यह एआई ने खोज निकाला ओली शैडोल उस समय का यह जो सबसे बड़ा वो जो वन ऑफ द बेस्ट चैंपियन जो था गो का वो हार गया उसके सामने गैरी कास्पारो को चेस ने वो डीप ब्लू बोल के एआई था उसने हरा दिया था। तो देखिए कि नए-नए आइडियाज एआई खोज सकता है। किंतु एज ऑफ टुडे उसकी लिमिटेशन है। तो हमको यदि अपना एक रिलेवेंस बनाए रखना है तो हमको सतत एक नए आइडियाज की खोज में रहना होगा। और यह कहां से होगा? दैट विल कम फ्रॉम मेडिटेशन। तो ये स्टूडेंट्स को मेडिटेशन सिखाना है। तो इस तरह से मुझे सिखाना पड़ेगा। तो सिमिलरली अमेरिक अमेरिकनंस को मेडिटेशन सिखाना है, वेदांत सिखाना है तो कहना पड़ेगा कि यह जो आपके ये जो बिजनेस की ये जो चेस है आपके अपोनेंट्स के साथ में आपकी ये जो वाद प्रतिवाद होते हैं चाल काउंटर चाल जो होती है सब मूव्स काउंटर मूव्स होते हैं उसमें मेडिटेशन विल गिव यू सच एन एज कि बाकी सब कंपटीिट को आप हरा करके आपका बिजनेस सबसे ज्यादा आगे बढ़ेगा। आपका मोनोपोली हो जाएगा। यह अमेरिका में उस समय आजकल बाद में तो यह एंटी ट्रस्ट आ गया किंतु उस समय मोनोपोली का बड़ा महत्व था। सबको अपने बिजनेस में मोनोपोली बिठानी है। तो आपके बिजनेस में भी मोनोपोली आ जाएगी। यदि आप मेडिटेशन सीखेंगे तो स्वामी जी कहते हैं कि जो देश की जो परंपरा है जो प्राणश है उसका प्राण का केंद्र बिंदु है उसी के अनुसार उनको सब कुछ सिखाना पड़ता है। आई कुड नॉट प्रीच रिलीजन इन इंग्लैंड विदाउट शोइंग द वंडरफुल पॉलिटिकल चेंजेस द वेदांता वुड ब्रिंग। इंग्लैंड में मैं वेदांत को सिखा नहीं पाता। जब तक मैं उनको बता नहीं बताता नहीं कि किस तरह से वंडरफुल चेंजेस अच्छे-अच्छे सब परिवर्तन आएंगे उनकी पॉलिटिकल सिस्टम में। उस समय इंग्लैंड में यह सोशलिज्म का प्रचार काफी हो रहा था। मार्क्स और एंजेल्स ये दोनों जो कि कम्युनिज्म के फाउंडर्स थे वो लंदन में ही रहते थे। और फिर उनके जो कम्युनिस्ट या तो सोशलिस्ट आइडियाज काफी फैल रहे थे। यह निवेदिता का खुद का एक सोशलिस्ट उसका एक था बेंट ऑफ माइंड कि यह जो समाज में गरीब लोग हैं या तो प्रोलेटरिएट है, फार्म लेबरर्स है उनका उत्थान होना चाहिए। समाज में रेवोल्यूशन आना चाहिए। तो स्वामी जी कहते हैं कि इंग्लैंड में यदि मुझे वेदांत सिखाना है तो मुझे बताना पड़ेगा कि किस तरह से यह रेवोल्यूशन आएगा आपके पॉलिटिकल लाइफ में। सो इन इंडिया तो इसी तरह से भारत में है। सोशल रिफॉर्म हैज टू बी प्री बाय शोइंग हाउ मच मोर स्पिरिचुअल अ लाइफ द न्यू सिस्टम विल ब्रिंग। यदि भारत में यह जो पुरानी जो सामाजिक प्रथाएं हैं जो कि भारत की प्राण शक्ति का गला बंद रंध रही है। प्राणशक्ति का वो जैसे कि एक तरह से फ्लो है उसमें रुकावट होकर के खड़ी है। तो हमको बताना पड़ेगा कि भारत की यह जो सामाजिक व्यवस्था में आप परिवर्तन लाइए और तब देखिए कि आपकी आध्यात्मिकता जो है आपका आध्यात्मिक जीवन जो है उसमें कितना सुंदर रूप से परिवर्तन आता है। अमेरिकन लोगों के लिए बिजनेस ही सबसे बड़ी बात है। ब्रिटिश लोगों के लिए पॉलिटिक्स ही सबके सबसे बड़ी बात है। तो वैसे ही भारत में धर्म ही सबसे बड़ा हमारा प्राण केंद्र है। तो यदि किसी भी क्षेत्र में आपको सुधार लाना है तो बताना पड़ेगा। अमेरिका में बताना पड़ेगा। कोई भी आपको नया आईडिया इंट्रोड्यूस करना है तो आपके बिजनेस में यह बेनिफिट होगा। सोशल लाइफ में यह बेनिफिट होगा। ब्रिटेन में यदि कोई भी सुधार लाना है, नए आइडियाज बिाने हैं तो कहना पड़ेगा कि पॉलिटिक्स में इस तरह से बेनिफिट होगा। भारत में कोई भी सुधार लाना है, कोई भी नए आइडियाज बिाने हैं तो कहना पड़ेगा कि भारतीय धर्म में आपके आध्यात्मिक जीवन में आपको यह बेनिफिट होगा। सो इन इंडिया सोशल रिफॉर्म हैज़ टू बी प्रीच बाय शोइंग हाउ मच मोर स्पिरिचुअल लाइफ द न्यू सिस्टम विल ब्रिंग। भारत में सोशल रिफॉर्म को भी यदि लाना है तो बताना पड़ेगा कि आपके आध्यात्मिक जीवन में कितना सुधार होगा यह नई सिस्टम से एंड पॉलिटिक्स हैज़ टू बी प्रीच बाय शोइंग हाउ मच इट विल इंप्रूव द वन थिंग दैट द नेशन वांट्स इट्स स्पिरिचुअलिटी और यदि कोई राजनैतिक नए विचार बिठाने हैं भारत में पॉलिटिकल नए आइडियाज को लाना है सोशलिज्म ना कम्युनिज्म ना जो भी इज्म है आपको नया भारत में लाना है तो आपको कहना होगा बताना होगा कि भारत जो चीज को सबसे ज्यादा चाहता है भारतीय आध्यात्मिकता उसमें कितना सारा इंप्रूवमेंट होगा। एवरी मैन हैज़ टू मेक हिज ओन चॉइस सो हैज़ एव्री नेशन। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के बारे में श्रेष्ठ चॉइस करनी है। तो इसी तरह प्रत्येक नेशन को अपने भविष्य के बारे में एक चॉइस करनी है। भारत का भविष्य भारत की चॉइस हजारों सालों पहले कर दी गई थी। अभी इस समय यदि आप जोर जबरदस्ती इस चॉइस को आध्यात्मिकता को हटा करके और कोई आईडिया को लाने का प्रयास करेंगे तो वह विफल ही होगा। वी हैव मेड आवर चॉइस एजेस एगो। हमने हमारी चॉइस हजारों सालों पहले युग युगांतर पहले कर दी है। एंड वी मस्ट एाइड बाय इट। और हमको इसको फॉलो करना ही होगा। एंड आफ्टर ऑल इट इज नॉट सच अ बैड चॉइस। और यह मत सोचिए कि हमने अपने को आध्यात्मिक बनाने का प्रयास किया। वह बहुत गलत बात हो गई। हमको पॉलिटिकल होना था ब्रिटेन की तरह, बिजनेस माइंडेड होना था, प्रैक्टिकल होना था। अमेरिकन की तरह। ऐसा मत सोचिए। आध्यात्मिकता भी अपने आप में एक सर्वश्रेष्ठ चॉइस है। इज इट सच अ बैड चॉइस इन दिस वर्ल्ड टू थिंक ऑफ थिंक नॉट ऑफ मैटर बट ऑफ स्पिरिट, नॉट ऑफ मैन, बट ऑफ गॉड। क्या यह बहुत बुरा काम है? क्या इस जगत में हम पदार्थ के बारे में नहीं किंतु आत्मन के बारे में सोचते हैं। हम मान मनुष्य के बारे में नहीं परंतु ईश्वर के बारे में सोचते हैं। यह जड़ जगत जो है जड़ जगत में हमको दूसरे देशों पर आक्रमण करना है। उस देशवासियों का हमको शोषण करना है। उनकी धन संपत्ति लूट लेनी है। उस देश पर हमको एक हथू राज करना है। या तो फिर मनुष्य को मुझे गुलाम बना करके रखना है। क्या ये इस ये सब करने की वजह यह अच्छा नहीं कि हम जड़ जगत की वजह हम आध्यात्मिकता के बारे में सोचते हैं। मनुष्य के बारे में नहीं सोच कर के ईश्वर के बारे में सोचते हैं। ये जो स्वामी जी कहते हैं कि एसेंटिसिज्म कि शरीर को कष्ट देना। यह जो धर्म में एक होता है, तो स्वामी जी कहते हैं एक बार कि यह जो यूरोपियन जो है, उन्होंने दूसरों को कष्ट दिया है। हिंदू जो है वो अपने को कष्ट देता है। यूरोपियन दूसरों को कष्ट देकर के कॉलोनियलिज्म है। ये एंपायर है। उसके माध्यम से लोगों का शोषण करते हैं और हिंदू अपने को कष्ट देकर के ईश्वर के समीप जाता है। ये दोनों देशों जो सभ्यताएं हैं, इन दोनों के बीच में यह एक बहुत बड़ा डिफरेंस है। तो यहां पे भी स्वामी जी कहते हैं जड़ जगत में विजय यह अच्छा है ना कि आध्यात्मिक जगत में विजय यह अच्छा है। मनुष्य को अपने वश में लाना यह अच्छा है कि हमको ईश्वर के वश में ले जाना वो बेटर है। यह कोई बहुत बुरी चॉइस नहीं है जो कि हमारे पुरखों ने हजारों साल पहले की थी। दैट इंटेंस फेथ इन अनदर वर्ल्ड। दैट इंटेंस हेट्रेड ऑफ दिस वर्ल्ड। दैट इंटेंस पावर ऑफ रनाउंसिएशन। दैट इंटेंस फेथ इन गॉड। दैट इंटेंस फेथ इन द इमोर्टल सोल इज इन यू। वो प्रचंड विश्वास दूसरे जगत में प्रचंड विश्वास आपके भीतर में है। इस जगत के प्रति अत्यंत वैराग्य का भाव इस इंटेंस पावर ऑफ रनाउंसिएशन त्याग का प्रचंड भाव ईश्वर में प्रचंड श्रद्धा और यह जो इमोर्टल सोल है अनंत आत्मन है उसके भीतर में अनंत श्रद्धा आपके भीतर में है। कितना सुंदर स्टेटमेंट है। इंटेंस फेथ इन अनदर वर्ल्ड, इंटेंस हेट्रेड ऑफ दिस वर्ल्ड, इंटेंस पावर ऑफ रनाउंसिएशन, इंटेंस फेथ इन गॉड, इंटेंस फेथ इन द इमोर्टल सोल इज इन यू। आई चैलेंज एनीवन टू गिव इट अप। मैं आप सबको चैलेंज देता हूं कि आप इससे मुक्त होकर के दिखा दीजिए। आप भले ही बहुत बड़े जड़वादी होने का दावा करेंगे, बहुत बड़े पॉलिटिशियन होने का दावा करेंगे, बहुत बड़े बिजनेसमैन होने का दावा करेंगे, क्रिकेटर, फिल्म स्टार होने का दावा करेंगे। किंतु आपके हृदय में यह धर्म आध्यात्मिकता सदा जागृत रहेगी। यू कैन नॉट आप आध्यात्मिकता से मुक्त नहीं हो पाएंगे। धर्म से मुक्त नहीं हो पाएंगे। यू मे ट्राई टू इंपोज अपॉन मी बाय बिकमिंग मटेरियलिस्ट बाय टॉकिंग मटेरियलिज्म फॉर ए फ्यू मंथ्स बट आई नो व्हाट यू आर। आप मेरे सामने आकर के दावा करेंगे कि मैं मटेरियलिस्ट हो गया हूं। जड़वादी हो गया हूं। आध्यात्मिकता में विश्वास नहीं है। ईश्वर पर विश्वास नहीं है। मैं नास्तिक हूं। ऐसा बोलकर के मेरे पास आकर के कितना ही दावा करें। किंतु मुझे पता है कि आप कौन है। मैं आपका हृदय देख पाता हूं। यदि आप भारतीय हैं तो यह आध्यात्मिकता आज ना कल कल ना परसों कभी ना कभी आपके हृदय में वो फिर से अंकुरित होगी ही होंगी। उसके बीज उसकी जड़ इतनी गहराई तक हमारी संस्कृति में हमारे हृदय में बैठ चुकी है कि चाह के भी हम उसको उठा के निकाल नहीं पाएंगे। इफ आई टेक यू बाय द हैंड बैक यू कम एस गुड थी स्टेज एवरवेयर बोर्न। यदि मैं आपका हाथ पकड़ करके ईश्वर की ओर ले जाऊं तो आपके भीतर की श्रद्धा भक्ति प्रचंड रूप से जागृत हो जाएगी। जो कि आपकी पुरखों में आपकी पुरखों की यह जो रग रग है उसके भीतर में बह रही थी। लहू के साथ में वही श्रद्धा भक्ति फिर से जागृत हो जाएगी। हाउ कैन यू चेंज योर नेचर? आप अपनी प्रकृति को कैसे बदल सकते? अच्छा तो यह पॉइंट समाप्त हुआ। इसके बाद का पॉइंट अभी हम कल देखेंगे। आज ही ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।
प्रश्न: जैसा कि आपने कहा कि हमें अपनी प्रकृति के अनुसार विकास करना चाहिए, लेकिन हमारे स्कूल में सभी को एक ही पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वेस्टर्न लिबरल वेलूइस सभी पर थोपे जाते हैं।
चार्ली चैप्लिन का एक मूवी है। उसमें असेंबली लाइन पर काम करता है। तो उसको दिन भर एक ही काम करना है। वह जो यह होता है उसको लेकर के वो स्क्रू फिट करना है। तो स्क्रू फिट करता जाता है। करता जाता है। घंटों के बाद घंटों दिन के बाद दिन फिर उसका दिमाग गड़बड़ हो जाता है। फिर वो स्क्रू लेकर के दूसरों को फिट करने को जाता है। एक आदमी खड़ा है उसका नाक ऐसा करके करता है। तो असेंबली लाइन का वो जो डी डीह्यूमनाइजेशन है कि ये जो मॉडर्न फैक्ट्री सिस्टम का के वो दैट वेरी नाइसली डन। सो यू आर राइट इन दैट वे कि ये इंडिविजुअल पर्सन हो ना कि ये फिर ये जो वेस्टर्न लिबरल डेमोक्रेटिक जो सबके ऊपर में बिठाने का प्रयास करते थे तो वो एक हो। अ दोनों में एक यूनिवर्सलाइज करने का प्रयास है। तो देखिए कि इसको दो है। एक तो है कि इंडिविजुअल लेवल पर डि्यूमनाइजेशन होता है। वन थिंग किंतु फिर क्या है ना कि हाउ ड हाउ डिड दिस कम अबाउट? अपने तो भीतर में डिग्रेडेशन प्रवेश किया था। बोल कर के ही तो फिर यह विदेशी लोगों को एक ओपनिंग मिला ना। स्वामी जी ने स्पष्ट कहा कि बुद्धिज्म के मतलब ये जो इस्लाम के आने के 200 300 साल पहले ही भारत का वो डिग्रेडेशन जो कि हो चुका था। तो इसके बाद में जब ये लोग आए तो फिर हम तो उनको ज्यादा ब्लेम नहीं कर सकते। अपना घर ही आग लगी हो अपने घर में। फिर अब बाहर से आकर के लोग एक्सप्लॉयटेशन करें तो क्या कहना अभी? सो दैट इज वन थिंग कि पुट आवर होम इन ऑर्डर फर्स्ट ऑफ ऑल। दूसरा है कि क्या है देखिए कि हम लोगों ने तो बाहर जाना छोड़ दिया था। यह स्वामी जी अमेरिका गए थे तो काला पानी क्रॉस किया है बोलकर के दक्षिणेश्वर मंदिर में उनको नहीं प्रवेश करने दिया था। इस हद तक हम लोग विदेशी इन्फ्लुएंस से अपने को बंद करके बैठे थे। जबकि यह जापान स्वामी जी ने देखा स्वामी जी इतने इंप्रेस हो गए हैं कि जापान ने अपनी संस्कृति को भी नहीं छोड़ा है और विदेशी जो बेस्ट एलिमेंट जो है इंडस्ट्रियलाइजेशन मैन्युफैक्चरिंग उसको अपना लिया है। तो स्वामी जी कहते हैं कि देखिए हम दोनों ओर से टूटने को बैठे हैं। अपनी जो जो उदात भारतीय परंपरा है उसमें हमने नाथ जात ये वो करके इस हद तक ले गए हैं कि यह जो केरल है वो पागलखाना है। लोग पागल हैं वहां पे। पूरे देश को उनको धिक्कारना चाहिए। इस तरह से जो तथाकथित नीची जात वाले हैं उनका शोषण करते हैं। तो उससे मुक्त हो। दूसरा कि एडप्ट द बेस्ट एलिमेंट ऑफ द वेस्ट। अभी स्वामी जी खुद सक्सेसफुल हुए। उसके पीछे क्या राज है? वो स्वामी जी भारत में हजार प्र वो प्रवरज्जा कर लेते हैं। एक गांव से दूसरे गांव, एक महल से दूसरे महल। उनको यह प्रसिद्धि कभी नहीं मिलती। जब तक ना कि उनको विदेश में सराहा नहीं जाता। तो हम लोग विदेश का बेस्ट एलिमेंट तो ले ही सकते हैं। विदेशी संस्कृति को बहुत ज्यादा क्रिटिसाइज किए बिना। जैसे हमारे सब पागलपन है। उनके भी पागलपन है। व्हाई डू वी टेक और व्हाई डू वी माइंड देयर वर्स्ट एलिमेंट? जैसे उन लोगों का है कि भारत है पुराना जाति में डूबा हुआ है। यहां पे वो जो ऊंची जाति वाले नीची वाले पे अत्याचार करते हैं। इसलिए भारत में यह जो लिबरलिज्म नहीं है। जैसे वे लोग हमारा वर्स्ट देखते हैं। व्हाई शुड वी आल्सो लुक द वर्स्ट इन देम? लेट अस एक्सेप्ट बेस्ट इन देम। हमारा योगा वो एक्सेप्ट करते हैं। हम लोग उनका यह जो मॉडर्न टेक्नोलॉजी है वह लेते हैं। सो दैट इज वन थिंग कि आदानप्रदान का एक बेटर तरीका है रेदर देन क्रिटिसाइजिंग ईच अदर। और अभी इन लोगों का लिबरलिज्म तो टूटने को बैठा है ना जब से यह ट्रंप आया है। अभी कहां वो दूसरों को अभी किस मोरल अथॉरिटी से सिखा पाएंगे जब उनके वहां पे ही यह सब हो रहा है। माने रिकॉर्निंग जो है हिस्टोरिकल रिकॉर्निंग वो हमेशा आता है। आपकी ये जो औकात से बढ़कर के जैसे हम कहते हैं ना हिंदी में औकात से बढ़कर के बहुत ज्यादा ऊपर उठेंगे तो वो भगवान जो है उसको उसका उसका दिखा देंगे कि तुम्हारी औकात क्या है। यह अमेरिका वाले आए दिन भारत की निंदा करते थे। ह्यूमन राइट नहीं है, यह नहीं है, वह नहीं है। अब करो निंदा। ट्रंप ने आ करके दिखा दिया। वे लोग हमारे से कहीं बहुत ऊपर नहीं है। देखिए ये साउथ कोरिया, ताइवान, जापान, सिंगापुर जैसे आपने कहा इजराइल, इवन फ्रांस। फ्रांस कोई 100% वह इंग्लिश स्पीकिंग कंट्री नहीं है। किंतु फ्रांस से इवन रशिया अप टू एन एक्सटेंट यह गल्फ कंट्रीज को देखिए ना आप। आज वह ट्रंप गया था वो वहां पे कतर में। तो जितने एआई के जो सुपरस्टार है वो जो सेम ओल्टमैन है ना कि वो एनवीडिया का सीईओ है। सबको लेके गया था। सबको क़तर के मनी से अपने एआई डाटा सेंटर बनाने हैं। अभी कहां वो फंडामेंटल इस्लामिक थियोलॉजिकल कंट्री और कहां जो कटिंग एेज एआई जो मल्टीनेशनल के सीईओ तो कैसे वे लोग ब्लेंड कर रहे हैं? नहीं उन्होंने इस्लाम छोड़ा है। एक हाथ से इस्लाम पकड़ा है। दूसरे हाथ से एआई पकड़ा है। ये जो सर्वप्रियनंद जी को मैंने कभी किसी को क्रिटिसाइज करते नहीं सुना। सिर्फ एक जगह पे वो एक मैंने उनके लेक्चर में सुना था। कहते हैं कि हावर में देखा कि एक इंडिया के स्टूडेंट ही ऐसे हैं जो कि अपने को कुल दिखाने के लिए इंडिया की निंदा मातृभूमि की निंदा करते हैं। और किसी देश का आप स्टूडेंट्स को देखेंगे ना कि अपने देश की निंदा नहीं करेगा। तो यह जो सेल्फ लोथिंग जो आपने कहा हम लोगों में बहुत ज्यादा है। है यू आर राइट दैट वे।
प्रश्न: एक NGO ने भारतीय आध्यात्मिक मूल्यों के आधार पर आदिवासी क्षेत्रों में सॉइल कंज़र्वेशन आदि की शिक्षा देना शुरू किया। वे बहुत सफल रहे।
देखिए एग्जैक्टली ऐसा अपने इतिहास में भी हुआ ना ये जो बेलूर मठ की स्थापना हुई तो ये आसपास के जितने भी ये हिंदू थे ब्राह्मण लोग थे मठ में नहीं आते थे। कहते थे ये बाबू लोगों का मठ है। सब खटिया पे सब साधु लोग सोते हैं। चेयर पर बैठते हैं। ऐसे साधु तो कभी देखे नहीं। गोरे लोग आते जाते हैं। नहीं नाथ जात प्रथा का पालन करते हैं। जात खो के बैठे हैं। क्या हिंदू धर्म के साथ में लेना देना है? ऐसा काफी चलता था। फिर जब बेलूर मठ में सर्वप्रथम दुर्गा पूजा हुई सभी हिंदुओं में जैसे कि एक ऐसा आध्यात्मिक श्रद्धा का वातावरण फैला क्योंकि वो जो ट्रेडिशन के अनुसार जो उसकी यह जो प्रॉपर मेथोडोलॉजी है उसके अनुसार दुर्गा पूजा रेयरली उस समय होती थी। तो सभी विधियों का पालन करके दुर्गा पूजा हो। उसका अर्थ है कि ये पक्का हिंदू ही ऐसा कर सकता है। तो वो रेजिस्टेंस था आसपास में वो टूट गया। म अदरवाइज हमको एक सेकुलर ही मान के बैठे थे ये लोग। ये ये देखिए उनकी जो शरणा देवी है मैं रांची में जाता था तो पहले तो मैंने देख लिया उनका पूछ-पूछ करके। क्या प्रॉब्लम क्या है ना कि ये म डॉक्यूमेंटेड नहीं है तो उनका रिलीजन एस सच कि कोई ग्रंथ है या तो फिर ये है आपका कोई स्पेसिफिक लेजेंड ऐसा कुछ नहीं है वो बिखरा सब कुछ पड़ा है तो कोई कुछ कहता है कोई कुछ कहता है तो सबसे थोड़ा-थोड़ा जान करके फिर बात में उल्लेख करना कि हां आपके शरणा देवी या शरणा धर्मों में ऐसा है तो ऐसा ही श्री रामकृष्ण भी ऐसा ही कुछ कहते थे जैसा इक्वेट कर दिया फटाक करके वे लोग स्वीकार
प्रश्न: इस विचार को व्यक्तिगत स्तर पर - विद्यार्थियों के लिए - कैसे लागू किया जा सकता है?
कर लेंगे हां हां एक्चुअली बहुत अच्छा इंटरप्रिटेशन है। देखिए ये जो अपनी जो एजुकेशन सिस्टम अब तक की है जो जिस एजुकेशन सिस्टम से मैं निकला हूं कि 50 लड़के थे हमारे क्लास में। हमारे टीचर को ज्यादातर लड़कों का नाम भी नहीं पता था। बोर्ड पे आकर लिख के चले जाते थे। तो उसमें 10 लड़कों को समझ में आया अच्छे से। 10 को थोड़ा-थोड़ा समझ में आया। बाकी को आधा कुछ समझ में नहीं आया। तो टीचर अभी 50 लड़कों को इंडिविजुअल तो अटेंशन नहीं दे पाएगा ना। तो ये जो स्टूडेंट टू टीचर रेशियो है ये वन टू 20 होना चाहिए एट द मोस्ट। ये तो अपनी स्कूलों में वन टू 50 वन टू 100 कभी-कभी हो जाता है गवर्नमेंट स्कूल ना कि ऐसा कहीं जाएंगे। तो वो जो स्टूडेंट्स की इंडिविजुअल कैपेसिटी क्या है सीखने की? एक मैथमेटिक्स का एक आप प्रॉब्लम सिखा रहे हैं। एक लड़का 1 घंटे में सीखेगा, दूसरा लड़का 2 घंटे में सीखेगा। तीसरे लड़के को एक सप्ताह लगेगा। सो द टीचर हैज़ टू कस्टमाइज टेलर हिज एप्रोच टुवर्ड्स एव्री स्टूडेंट वि इज नॉट एक्चुअली पॉसिबल प्रैक्टिकली स्पीकिंग। इसीलिए यह जो एआई बेस्ड लर्निंग सिस्टम है ना वो आजकल बड़ी पॉपुलर इसीलिए हो रही है। ये जो खान एकेडमी का एग्जांपल हमने पहले भी डिस्कस किया था कि ये वीडियो है। वीडियो देख के आप सीखिए। तो सभी स्टूडेंट अपनी-अपनी स्पीड के अनुसार वो वीडियोस देखते हैं। कोई स्टूडेंट 1 घंटे में 10 वीडियो देख लेगा। कोई एक कोई स्टूडेंट है 10 दिन में एक 10 घंटे में एक वीडियो देखेगा। बट दे आर एबल टू लर्न एट देयर ओन स्पीड। यह तो एक चीज हो गया। दूसरा कि सभी का इंटरेस्ट अलग-अलग है। वो आजकल मूवीज भी इस तरह की आ रही है। किसको क्रिकेटर होना है। मां-बाप जबरदस्ती उसको इंजीनियर बना दे रहे हैं। क्यों? क्योंकि सोसाइटी में ऐसा है कि शादी करनी है, अच्छी लड़की या अच्छा हस्बैंड चाहिए तो आपको एक स्टैंडर्ड डिग्री होना चाहिए। अच्छा फ्यूचर करना है। क्रिकेटर का कोई ठीक नहीं है। आईपीएल में खेलने को मिल गया तो ठीक है। वो 13 साल का लड़का 1 करोड़ ले लेगा 1 करोड़ का पैकेज। किंतु सभी का तो नहीं होगा चांस। तो फिर आप क्या करेंगे? तो क्या है ना कि ये इकोनॉमिक अनसर्टेनिटी भारत में ऐसी है ना कि जब स्टूडेंट्स को लड़के को अपना एक चार्ट एक अलग से चार्ट करना है अपना लाइफ। अभी कुछ समय पहले मैं एक डिवोटी की लड़की के साथ बात कर रहा था। वो अभी तो स्टूडेंट ही है। मुझे कहती है मुझे नवेल लिखना सीखना है। वो उसने नवेल लिख दी है। पोएट्री लिखती है और दिस इज व्हाट आई वांट टू डेवलप इनू। तो देखिए कि अभी उसके पेरेंट्स तो बड़े सपोर्टिव थे और इस तरह से किसी के अब मेरे पास ले आए थे कि बात कीजिए आप उसको सिखाइए कुछ अच्छा। तो वेरी सपोर्टिव स्टूडेंट होते हैं। पेरेंट्स होते हैं। कोई-कोई पेरेंट्स होते हैं कहेंगे अरे नवेल लिख के क्या बिना मतलब लाइफ वेस्ट कर रहे हो? सीए बनो, एमबीए करो। ऐसा करके उसकी एंबिशन है उसमें पानी डाल देंगे। सो सभी का अपना एक इंडिविजुअल वे ऑफ डेवलपमेंट होता है। वी शुड रिकॉग्नाइज इट एंड वी शुड अलाउ देम टू डेवलप इन दैट पर्टिकुलर डायरेक्शन। इवन वेदांत स्वामी जी कहते हैं कि डोंट फॉर्मुलेट यूनिवर्सल आईडिया ऑफ़ वेदांत। हैव एवरीवन फॉर्मुलेट हिज और हर ओन आईडिया ऑफ़ वेदांत। क्योंकि क्या है कि वेदांत के कुछ-कुछ पॉइंट्स होंगे। अब जैसे कि त्याग और वैराग्य है वह सभी को शायद फिट नहीं बैठेगा। गृहस्थ है तो उनको उनके अनुसार वेदांत को इंटरप्रिट करना होगा। कोई साइंटिस्ट है अभी यह निकोला टेस्ला है। वह स्वामी जी को सुनने के लिए खड़ा रहकर के सुनता था। जब पूरा क्लासरूम भर जाता था। वो तो देरी से आता था। उसको इतना काम था तो आखिर में आता था। बैठने की जगह नहीं मिलती थी। पीछे में खड़े रह के स्वामी जी का वह लेक्चर सुनता था। तो वेदांता फॉर अ साइंटिस्ट। तो उस हिसाब से वह अपने वेदांत को लेता है। वेदांत फॉर हाउसवाइफ, वेदांत फॉर स्टूडेंट, वेदांत फॉर फार्मर, वेदांत फॉर अ पॉलिटिशियन, वेदांत फॉर अ सोल्जर, वेदांत फॉर ए टीचर। तो वेदांत फॉर ए मक, वेदांत फॉर ए गृहस्थ। तो वी ऑल हैव टू इंटरप्रेट वेदांत अकॉर्डिंगली क्योंकि मुझे क्या चाहिए? मेरे जीवन में क्या रिलेवेंस है? आपका रिलेवेंस अलग है। तो भारतीय धर्म के बारे में देखिए स्वामी जी का जो पावरफुल ऑब्जरवेशंस होते हैं ना यह सब स्वामी जी क्या कहते हैं कि देयर इज़ अ वंडरफुल लिबरलिटी इन रिलीजन। भारत में आप किसी भी एक रिलीजन को फॉलो कीजिए। आपका हस्बैंड है वो विष्णु का भक्त है। वाइफ है वो भगवान शिव की वो डिवोटी है। लड़का वो निराकार में मानता है। वह मूर्ति पूजा में मानता ही नहीं है। एंड दे ऑल कैन लिव पीसफुली टुगेदर। जबकि अपनी सोसाइटी है बहुत ही ज्यादा रिस्ट्रिक्टेड है। विदेश में रिवर्स है। सोसाइटी इज वंडरफुली लिबरल। आपको जो करना है वह कर सकते हैं। इवन लेडीज को स्वामी जी कहते हैं ना कि अमेरिका इज अ हेवन फॉर मासिस एंड वीमेन। यह जनसाधारण और स्त्रियों के लिए अमेरिका स्वर्ग है। यह स्त्री और जनसाधारण या तो गरीब लोग। ये सभी सोसाइटी में उनको शोषण होता है। किंतु इन दोनों के लिए अमेरिका इज अ स्वर्ग। किंतु धर्म जो है वो आपका वो जो चर्च वाले जो कहेंगे एग्जजेक्टली उसी को फॉलो करना होगा। किसी भी तरह का आपका डिसेंट नहीं चलेगा। वरना सीधा आपको जिंदा जला देंगे। सो हाउ ये जो समय के सिचुएशन के अनुसार ये चेंज होता है। आइडियल शुड बी दैट द वेदांत इज़ लिबरल इन आवर रिलीजियस फील्ड। सिमिलरली वी शुड बी लिबरल इन सोशल फील्ड। तो स्वामी जी कहते हैं ना बेस्ट एलिमेंट ऑफ ईस्ट एंड बेस्ट एलिमेंट ऑफ वेस्ट दैट विल क्रिएट अ फ्यूचर सिविलाइजेशन।
प्रश्न: हम भारतीय व्यक्तिगत स्तर पर सफल हैं लेकिन एक देश के रूप में भारत अभी भी महान राष्ट्रों की पंक्ति में नहीं है।
इट विल टेक टाइम जैसे आप क्रिश्चियन चर्च का हिस्ट्री या बुद्धिस्ट संघ का हिस्ट्री देखेंगे। यह सेंट टॉमस एक्विनास है ना कि सेंट ऑगस्टाइन है। सेंट फ्रांसिस है। सेंट लोला है। सेंट ये है क्या वो टेरेसा है। अपनी मदर टेरेसा नहीं वहां की टेरेसा दे शी इज डिफरेंट। सो इन लोगों ने ओवर अ सेंचुरीज ऑफ टाइम एक यूनिक चर्च मॉडल डेवलप किया है। तो अपने यहां बुद्धिस्ट बुद्धिज्म में भी देखिए नागार्जुन वगैरह अपने वेदांत में देखिए कि एक के बाद एक आचार्यों ने आकर के शंकराचार्य रामानुजाचार्य एक यूनिक पर्सपेक्टिव दिया। सो दीज़ आर द वर्क्स ऑफ सेंचुरीज़। हम हमारा जो टाइम स्केल है रिलीजन या सिविलाइजेशन को देखने का इट शुड बी युग युगांतर माने मैं मिलेनियल्स कि ये पहले देखिए चर्च का कैसा आउटलुक कैसा है वो जो एक ये पॉप था वो कहता है कि इन द फर्स्ट मिलेनियम द फील्ड वाज़ यूरोप इन द सेकंड मिलेनियम द फील्ड वाज़ द न्यू वर्ल्ड एंड द थर्ड मिलेनियम द फील्ड विल बी ओल्ड वर्ल्ड। देखिए प्लान कैसा है कि फर्स्ट मिलेनियम यानी कि पहले 1000 साल में फील्ड यानी कि वो कन्वर्ज़ करने का जगह कौन सा था? तो दैट इज यूरोप दे सेकंड मिलेनियम यानी कि फ्रॉम 1100 ईयर टू दिस 2000 व्हाट इज द कन्वर्ट कहां करेंगे? तो न्यू वर्ल्ड यानी कि अमेरिका वो जो नॉर्थ अमेरिका साउथ अमेरिका जो कि नए-नए खोजे गए थे। और थर्ड मिलेनियम यानी कि 2000 साल के बाद में 1000 साल तक फील्ड कौन सा रहेगा? तो ओल्ड वर्ल्ड यानी कि यह एशिया है। एशिया है, अफ्रीका है। है ना? तो ऐसा वो सोचते हैं। फर्स्ट मिलेनियम, सेकंड मिलेनियम, थर्ड मिलेनियम। तो अपने को भी एटलीस्ट पहले दो मिलेनियम तो सच हुए हैं। किंतु किंतु देखिए इस तरह की सोच का बेनिफिट ये है कि आपके जो वर्कर्स जो है ना वो एंथूजियाज्म मिलता है कि यदि फर्स्ट मिलेनियम में यूरोप को कन्वर्ट कर दिया। सेकंड मिलेनियम में नॉर्थ साउथ अमेरिका को कन्वर्ट कर दिया। ऑस्ट्रेलिया को कर दिया तो व्हाई कैन नॉट वी कन्वर्ट एशिया? व्हाई कैन नॉट। देखिए
प्रश्न: इतिहास और काल-सीमा के बारे में व्यापक दृष्टिकोण रखना अपने आप में अद्भुत है।
मैं अपना ट्रांसफॉर्मेशन बताऊं पॉलिटिकल थोड़ा सा कि यह जो राम मंदिर वाला जो कांसेप्ट था ना पूरा अह कि राम मंदिर फिर से अयोध्या में बनाना है। मैं थोड़ा सा सेकुलर टाइप का था। पहले से ही था। सोशलिस्ट टाइप के मेरे आइडियाज थे। इसलिए मैं ट्राइबल एरिया में डेवलपमेंट करने के लिए गया था कि ट्राइबल एरियाज में या तो रूरल एरियाज में आपको डेवलपमेंट करना है। धर्म क्या है? आपको धर्म मंदिर क्यों बनाना है? मंदिर बनाने से क्या लाभ होगा? आप स्वामी जी का ठाकुर का मां का जो आईडिया है इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी दैट इज परफेक्ट कि आप सुबह शाम जप ध्यान कीजिए और दिन में आप रूरल वेलफेयर कीजिए ट्राइबल डेवलपमेंट कीजिए दैट इज द आइडियल लाइफ कि इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी होनी चाहिए और साथ में सोशल डेवलपमेंट होना चाहिए। ये पूरा राम मंदिर वाला कांसेप्ट ना मुझे एकदम माने बिना काम का लगता था। अननेसेसरी आप लोग ट्राइबल डेवलपमेंट का नहीं सोच करके झूठ-मूठ का एक मंदिर बनाएंगे। तो मंदिर बनने से क्या होगा? बेटर है कि जो पैसा आप वहां पे लगा रहे हैं रूरल डेवलपमेंट में लगाइए, गरीबों को दीजिए तो कुछ कल्याण होगा। ऐसा मेरा बहुत दृढ़ रूप से मानना था। किंतु अभी रिसेंटली ना मुझे ऐसा लग रहा है कि जो मंदिर बना है वो एक दैट इज अ सेमिनल इवेंट। ये जो मेरा एक पर्सनल ट्रांसफॉर्मेशन बताता हूं। पहले के विचार मेरे गए नहीं है। अभी भी मैं सोशलिस्ट सेकुलर मेरा बड़ा स्ट्रांग एक है मेरे भीतर में कि जो कुछ भी करना है आप गरीब लोगों के लिए कीजिए। झूठ-मूठ का आप वह जो करते हैं धर्म में खर्चा उसको कम कीजिए। दैट इज वेरी स्ट्रांग इन मी। किंतु साथ-साथ में मुझे यह लगता है कि यह जो पॉपुलर कलेक्टिव एक्सप्रेशन ऑफ रिलीजन है ना उसका एक बहुत बड़ी आवश्यकता है। क्योंकि इंडिविजुअल लेवल पर ना कभी-कभी हम हताश हो जाते हैं। कभी-कभी निराश भी हो जाते हैं कि हमारी साधना जो इंडिविजुअल कर रहे हैं वो कहां तक जा रही है। किंतु अभी अगेन मेरा एक है कि मैं कभी भी किसी भी कलेक्टिव रिलीजियस एक्टिविटी में नहीं जाता। जैसे कुंभ मेला है या तो वगैरह-वगैरह या तो पॉपुलर जो तीर्थक्षेत्र है मैं जनरली अकेला घूमने का अच्छा लगता है मुझे किंतु मैं साथ-साथ में अभी यह भी स्वीकार किया है कि ये महाकुंभ में जो इतने लोग गए इट इज नेसेसरी ये तो इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी के लिए कंफर्मेशन प्राप्त होती है कि हां इतने करोड़ों-करोड़ों लोग जब जिसको मानते हैं तो उससे मुझे जो एक बेनिफिट होता है स्पिरिचुअल बेनिफिट इट इज अनडिनायबल। कुछ-कुछ लोग जो है कि जो कि स्ट्रांगली वेदांतिक है, स्ट्रांगली ये है सेकुलर उन लोगों के लिए अलग है। बट ज्यादातर लोगों के लिए एक पॉपुलर एक्सप्रेशन ऑफ रिलीजन चाहिए। यह मेरा एक नया इवोल्यूशन है अभी और यह जो आपने वेस्टर्न हाइपोक्रेसी की बात की ना देखिए कि वे लोग क्रिश्चियनिटी में कैसा डीपली डूबे हुए हैं। आज हमारे यहां पे एक सिख प्राइम मिनिस्टर हो सकता है। एक मुस्लिम प्रेसिडेंट हो सकता है। अमेरिका में आप सोच के भी नहीं सोच सकते कि एक नॉन क्रिश्चियन है। वह वहां का प्रेसिडेंट होगा। यह जितने इंडियन वहां पर जाने का प्रयास करते हैं, सभी के सभी अपने को क्रिश्चियन में कन्वर्ट कर दिए हैं। एक आखिरी विवेक था विवेक रामास्वामी उसने सोचा कि मैं हिंदू होकर के अमेरिका का प्रेसिडेंट बनूंगा। बिल्कुल नहीं हो पाया। यह इस्लामिक कंट्रीज में जाइए। यह अपने साउथ ईस्ट एशियन कंट्रीज में जाइए। अपना रिलीजियस आइडेंटिटी को कभी नहीं छोड़ेंगे। अमेरिका में बैंक जो करेंसी नोट पे लिखा है इन गॉडवी ट्रस्ट। जब आप अपनी करेंसी पर राम का नाम लिखने को जाएंगे तो पूरा हल्लागुल्ला मच जाएगा कि यह पूरे देश का अधपतन होने को बैठा है। यह उनका हाइपोक्रेसी है।
प्रश्न: हमारी समस्या यह है कि हम बहुत सी बातें सुनते हैं, लेकिन वास्तव में ईश्वर पर विश्वास नहीं करते।
तो इसी लेक्चर में स्वामी जी कहते हैं ना कि आप कितना ही अगड़म बगड़म बोल दीजिए जड़वाद में जड़वादी हूं नास्तिक हूं। आई नो योर हार्ट। आपका हाथ पकड़ करके मैं मंदिर की ओर ले जाऊंगा तो आपकी रगों में जो युग युगांतर से जो राम का नाम घूम रहा है फट करके आ जाएगा। म कुछ महीनों तक आप अपने को मूर्ख बनाएंगे किंतु हमेशा के लिए नहीं। आई एम द बिगेस्ट एग्जांपल। मैं मींस मी इस हद तक सेुलर था। कभी भी रेयरली जब से छोटे थे मां-बाप ले जाते हैं मंदिर में तो जाना पड़ता है। जब से किंतु मेरे होश संभाले हैं मैं कभी कॉन्शियसली मंदिर में नहीं गया या तो साधु संतों के प्रति कोई रिस्पेक्ट रखी है कि धर्म के प्रति ऐसा कोई मेरा आकर्षण रहा है। ऐसा था ये जो सोशलिस्ट सेकुलर आइडियाज है ना कि या गरीबों का कल्याण होना चाहिए। जो कि पददलित है जिसका अधपतन हुआ है इनका कल्याण होना चाहिए। ये सब करना है। एथिकल लाइफ होना चाहिए। मोरल लाइफ होना चाहिए। कि हाई आइडियल होने चाहिए। बोले कहते हैं ना कि सिंपल लिविंग एंड हाई थिंकिंग सिंपल लिविंग तो ऐसा होना चाहिए। दैट इज अ आइडियल लाइफ। वहां से मैं ठाकुर ने मुझे वो ब्रेन वाश करके यहां पे ले आया। देखिए ये जो एंशिएंट एंड मॉडर्न बीच का जो ब्रिज है ना मुझे नहीं लगता कि मैं यदि स्वामी जी को नहीं पड़ा होता तो मैं धर्म के प्रति इतना आकर्षित होता। इवेंचुअली देखिए सम जीवन है ना मार मार करके सबको कुछ ना कुछ सिखा देता है। दैट इज अनदर मैटर कि आप फिर अंधश्रद्धा में डूब जाइए अंगूठी पहन लीजिए तो अभी यह हो रहा है प्रॉब्लम तो यह सॉल्व हो जाएगा। ऐसा कुछ हो जाता कभी। किंतु यह जो श्रद्धा है, भक्ति है, टोटल सरेंडर है हमारी हमारे अहंकार का, अपनी इंडिविजुअलिटी का, यह यदि मैंने स्वामी जी को नहीं पढ़ा होता, तो मुझे नहीं लगता कि और कोई मेरे में यह ला पाता। इन दैट सेस स्वामी जी इज अ रियली अ ब्रिज बिटवीन एंशिएंट एंड मॉडर्न। इवन ठाकुर तक भी यह स्वामी जी मुझे लेके आए हैं। तो दैट इज स्वामी जीसस यूनिक कंट्रीब्यूशन। और यह सब
प्रश्न: विवेकानंद हमें सचमुच विवेक सिखाते हैं। अपने धर्म के सर्वोत्तम तत्वों को स्वीकार करें और अंधविश्वासों को त्यागें।
चीजें है ना हम लोग कॉन्शियसली अब जैसे शुरू शुरू में ठाकुर मास्वामी जी को पढ़ते हैं ना शुरू शुरू में हमको कॉन्शियसली समझ में भी नहीं आता है कि हमको यह अच्छा क्यों लगता है मेरी प्रकृति के अनुसार 100% सब कुछ फिट बैठ जाता है किंतु क्यों ऐसा होता है मेरी प्रकृति क्या है वो क्या सिखाते हैं एक्चुअली यह सब मुझे धीरे-धीरे करके समझ में आया उस उस समय मैं यंग था मैं ऐसा अपने को सोशलिस्ट सेकुलर नहीं समझता था ऐसा समझ मतलब ये सब आइडियाज बाद में आए कि मेरा यह प्रकृति है और यह प्रकृति के लिए स्वामी जी एकदम फिट बैठ जाते हैं। सिंपल थिंक सिंपल लिविंग आई थिंकिंग यह सब के लिए तो वो सब बाद में समझ में आया। उस समय जब पढ़ते हैं ना उस समय तो ये सब फटाफट करके गरम-गरम हलवा खाते हैं तो कैसा फटाक करके वो भीतर में चला जाता है। वैसे धम धम करके वो भीतर में चला जाता है। उस समय समझ में भी नहीं आता कि यह कौन सा जादू चल रहा है। ये कोरोना से भी ज्यादा यह वायरल है ये।