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ओ स्थापक यच धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नम राम कृष्ण लीला प्रसंग में से हम लोग देख रहे थे कि किस तरह से कल्पतरु के दिन की घटना शरत महाराज हमारे सामने विवरण करते हैं तो शरत का कहना है कि आत्म प्रकाश से अभयदान यह इस दिन का टाइटल होना चाहिए रदर देन कल्पतरू तो यह बात बाद में महाराज कहते हैं हम देखेंगे तो यहां पर मैं कथामृत का और लीला प्रसंग का यह लास्ट चैप्टर है तो अब हम समझ सकते हैं कि इतना बड़ा महत ग्रंथ जो है इसका अंतिम चैप्टर होने की वजह कि इसका इंपॉर्टेंस इस घटना का इंपॉर्टेंस शरद महाराज के सामने कितना होगा तो कल हमने जो पाठ किया था उसका एक पार्ट में फिर से रिपीट कर रहा हूं ठाकुर हमको पता है कि अपने कमरे में थे ठाकुर को एक नया तरह का मेडिसिन दिया गया था जिसकी वजह से ठाकुर थोड़े से ज्यादा सुस्त महसूस कर रहे थे ठाकुर को कैंसर की जो बीमारी से जो पेन और जो पीड़ा हो रही थी उसमें उस दिन लाइकोपोडियम 200 यह मेडिसिन देने से उनको थोड़ा सा पीड़ा में राहत मिली थी तो वह उस दिन सुबह को 1 जनवरी को अपने कमरे में से नीचे आए और गार्डन में घूमने लगे अभी वह जिस तरह से होता है कि ब्रिटिश साम्राज्य का प्रभाव था तो यह क्रिसमस से लेकर के न्यू ईयर ईव इन लोगों को यह बड़े दिन की छुट्टी ऐसा करके वे लोग सेलिब्रेट करते थे उस समय तो उस दिन बाकी सब जगह प छुट्टी थी रजा थी और जो लोग जॉब करते थे वहां पे तो बहुत सारे डिवोटा इकट्ठा हुए थे महाराज जी ने लिखा है कि 30 के आसपास डिवोटा दोपहर के बाद इकट्ठा होना शुरू हुए थे तो जब उन्होंने देखा कि ठाकुर अपने कमरे में से नीचे उतर कर के गार्डन में टहल रहे हैं सब उनके सामने इकट्ठा हो गए और फिर दो हाथ जोड़ कर के उनको प्रणाम करके उनके साथ बात करने की शुरुआत करें किंतु कुछ बोले उससे पहले ही ठाकुर ने सीधा गिरीश को पूछा क्या रे गिरीश तुम मेरे अभी मैं ऐसा शब्द उन्होंने यूज ही नहीं किया है ठाकुर कहते हैं तुम यह जो सब लोगों को बोलते घूमते हो तो इसका क्या कारण है तुमने क्या देखा है क्या महसूस किया है तो ठाकुर तो सीधा इतना ही पूछते हैं किंतु हमको तो बैकग्राउंड पता है हमको पता है कि गिरीश घोष लोगों को क्या कहता घूमता था वोह कहता था कि ठाकुर अवतार है और इस घटना के पीछे गिरीश की ये जो स्वीकृति के पीछे कौन-कौन सी घटनाएं थी उसका भी एक अंदाज हमने कल देखा तो गिरीश सबको बोलता घूमता है कि ठाकुर अवतार है और ठाकुर एकाएक जब उनको पूछने लगे तो गिरीश ने जैसे महावीर की जो मूर्ति है भगवान श्री राम के सामने अपने घुटनों के बल बैठे हुए हैं और दो हाथ जोड़ के भगवान के सामने देख रहे हैं ऐसे ही गिरीश ने इस तरह से बैठा और दो हाथ जोड़ कर के भगवान राम कृष्ण को कहने लगा कि जिनका अंत जिनके गुणों की महिमा व्यास और वाल्मीकि गाते गाते थक जाते हैं जिनके गुणों की महिमा उनके गुणों की महिमा का वर्णन मैं करने वाला कौन हूं जैसा ही गिरीश ने कहा वैसे ही ठाकुर भावा विट हो गए और भाव में जाकर के उन्होंने कहा कि मैं तुम लोगों को और तो क्या कहूंगा तो मादर श कोलेर चैतन्य हो तुम सबको चैतन्य प्राप्ति हो जैसे ही ठाकुर ने ऐसा कहा कि वैसे ही क्या हुआ स्वार्थो गंदो हीन तहर सेई गभीर आशीर्वाद प्रत्येक अंतरे प्रबल आघात प्रदान पूर्वक आनंद स्पंदने उल कोरिया तु लीलो ठाकुर की यह आशीर्वाद समुंदर की एक प्रच तरंग की तरह उनके सीने में उनके हृदय में जाकर के टकराई और इस तरंग के प्रचंड आघात से तरंग के आनंद से उनका हृदय एक दिव्य भाव से भरपूर हो गया तरा देश काल भूली लो ठाकुरे व्याधि भूली लो व्याधि आरोग्य ना होआ पर जंतो ताहा के स्पर्श ना करी बार तहादेर इति पूर्वे प्रतिज्ञा भूली लो एवं साक्षात अनुभव करते लागलो जेनो ताहा देर दुखे यथ तो होया कौन एक अपूर्व देवता हृदय अनंत जात और करुणा पोषण पूर्वक बिंदु मात्र निजो प्रयोजन ना थाकी लेओ मातारिकी हा चले आश्रय प्रदान करते त्रिदिब होते सम्मुख अवती होया तहा दिग के सस्नेह आहवान करते छन एक पूरे पैराग्राफ जितना लंबा सेंटेंस है शरद महाराज जब लिखते हैं तो फिर साहित्य की दृष्टि से सर्वोच्च रचना कही जाए इस तरह से वह लिख सकते हैं मेरा तो बंगोली लिटरेचर का और कोई अनुभव नहीं है जैसे जिनको की क्लासिकल बंगोली ऑथर्स कहा जाता है बंकिम चंद्र या तो फिर रवींद्रनाथ और मैंने उनको किसी को पढ़ा नहीं है बंगोली का मेरा बैकग्राउंड भी नहीं है किंतु फिर भी मैं समझ पा रहा हूं कि इस एक सेंटेंस की रचना करने के लिए शरत महाराज को कितना चिंतन करना पड़ा होगा कितना एक एक भाव में आकर के यह लिखा होगा प्रत्येक सेंटेंस वैसे देखें तो उन्होंने भाव में आक के लिखे हैं वो वैसे वहां पर आप सबने देखा ही होगा कि किस तरह से उद्बोधन में उनका एक फोटोग्राफ है एक डेस्क है डेस्क के सामने वह बैठे हैं अपनी ऑफिस में तो वैसे ही वहां पर ही बैठ कर के लीला प्रसंग भी लिखते हैं रामकृष्ण संघ को चलाने के लिए जो कॉरेस्पोंडेंस करना है जो पत्र व्यवहार करना है व भी साथ में करते हैं जो कहीं एक अकाउंट है क्या हिसाब किताब है उसका रजिस्टर है वो भी वहीं पर सामने पड़ा होगा सभी चीजें उनके सामने खुली पड़ी है अभी अकाउंट देखते हैं अभी कोस्पेसस लिखते हैं माने कितना प्रैक्टिकल उनका माइंड है एक डिविली और इस वर्ल्डली निस वर्ल्डली निस अर्थात की यह मटेरियल वर्ल्ड का जो सब ट्रांजैक्शन है यह दोनों के बीच में दोनों की बॉर्डर लाइन पर रह कर के दोनों को वह संभालते थे एक हाथ से प्रैक्टिकल पूरे प्रैक्टिकल संघ के जनरल सेक्रेटरी दूसरे हाथ से पूरे डिवाइन प्रोफेट लीला प्रसंग की रचना कर रहे हैं अभी यहां पर व्यास और वाल्मीकि का जो उल्लेख है तो व्यास और वाल्मीकि के साथ-साथ में शरद महाराज को भी हमको रख देना चाहिए उन्होंने इस ग्रंथ की रचना की तो क्या कहते हैं यहां पर इतना लंबा सेंटेंस थोड़ा सा टुकड़े टुकड़े करके देखते हैं जब ठाकुर ने उनको स्पर्श किया तब क्या हुआ इसका वर्णन है महाराज जी लिखते हैं तहरा देश काल भूली लो समय और अवकाश को भूल गए भक्त लोग जैसे ही ठाकुर ने उनको स्पर्श किया ठाकुरे व्याधि भूली लो ठाकुर को इतना एक जान लेवा एक बीमारी हुई है एक इतना कष्ट करर कैंसर का रोग हुआ है यह बात यह लोग भूल गए व्याधि आरोग्य ना होवा परच तो तहा के स्पर्श ना करी बार तहा देर इति पूर्वे प्रतिज्ञा भुली लो जब तक ठाकुर का यह बीमारी ठाकुर की बीमारी आराम नहीं हो जाती ठाकुर पूरे सुस्त नहीं हो जाते तब तक हम ठाकुर को स्पर्श नहीं करेंगे ऐसी उन्होंने प्रतिज्ञा की थी क्यों की थी क्योंकि पता है कि ठाकुर ने दूसरों के कर्म दूसरों के पाप अपने सीने पर ले लिए हैं उनको मुक्ति देने के लिए अवतार वरिष्ठ ने उनके पाप अपने सर पर ओढली लिए है उसकी वजह से ठाकुर को कैंसर हुआ है वरना जिसका देह अापद है पाप से कभी विद्ध नहीं हुआ ऐसा देह जिनका है उनके शरीर में व्याधि आई कहां से वोह जगदंबा दासी की बात हमको पता है कि माथुर बाबू ने कहा ठाकुर को आकर के प्रार्थना की कि देखिए कि मेरी पत्नी वह तो रानी रासमुल वाड़ी का जितना भी ये अथॉरिटी है कालीवाड़ा रामनी का जो वार वारसा है वो पूरा मेरे हाथ से जाएगा उसके बाद में राणी रामनी की दूसरी पुत्रियां जो है उनकी सब पुत्रियां ही थी पुत्र नहीं थे तो उनकी दूसरी पुत्रियों के जो जमाई है उनके हाथ में यह दक्षिणेश्वर मंदिर का वहि वट जाएगा तो मंदिर का वही वट जो जाएगा उसकी मुझे फिक्र नहीं है मथुर बाबू आकर के ठाकुर को कहते हैं किंतु आपकी सेवा से मैं वंचित हो जाऊंगा इस बात का मुझे गम है तो कैसे भी करके मेरी पत्नी का आरोग्य लाभ करवा दीजिए तो जिससे कि यह कालीबाड़ी पर वही वट का दायित्व मेरे ही सर पर हो और आपकी सेवा का भार भी मैं ही उठा पाऊं तो ठाकुर ने इनकी बात मान कर के अभी तो निर्विकल्प समाधि में से बाहर आए हैं अभी तो सब साधनाएं समाप्त की है तो कहां सुख चैन की सांस लेंगे ना कि वह मथुर बाबू की पत्नी की जितनी बीमारी है अपने सर पर ले ली और छ महीने छ महीने से भी ज्यादा समय उन्होंने जो भुगता है वो अनब सोच करके देखिए कि जो निर्विकल्प समाधि में से नीचे आता है उसके लिए तो वह तो जगत का राजा है वो जो चाहे वह प्राप्त कर सकता है तो वो नहीं किंतु अपने जो एक प्रिय शिष्य है अपना जो प्रिय संतान है उसकी बात सुनकर के उन्होंने उसकी पत्नी की बीमारी को अपने सर पर लिया तो यह थे ठाकुर जब भी भक्त लोग आकर के दो हाथ जोड़ कर के प्रार्थना करते हैं ठाकुर इस भवसागर से हमको पार करवाइए तो ठाकुर वैसे ही उनके पाप अपने सर पर ले लेते हैं अपने कंधों पर ले लेते हैं और हमको इस भवसागर से पार करवा देते हैं तो भक्तों ने प्रतिज्ञा की थी यह जो अंतरंग भक्त है कि जब तक ठाकुर का कैंसर ठीक नहीं हो जाता तब तक हम ठाकुर को फिर से स्पर्श नहीं करेंगे किंतु जैसे ही ठाकुर ने उनको एक बार कह दिया कि तो मादर चैतन्य हो इस बात का जो प्रभाव इस प्रचंड आशीर्वाद से जो एक तरंग दिव्य तरंग उनके हृदय में उत्तल होती है उससे सब भूल गए देश काल भूल गए ठाकुर को कैंसर हुआ है ठाकुर को व्याधि हुई है वह भूल गए जब तक ठाकुर का कैंसर ठीक ना हो तब तक ठाकुर को स्पर्श नहीं करना है उन्होंने ली हुई यह प्रतिज्ञा भूल गए एवं साक्षात अनुभव करते लागलो जेनो तहादेर दुखे यथ तो होया कोनो एक अपूर्व देवता हृदय अनंत जात ना और करुणा पोषण पूर्वक और साथ-साथ में ही अनुभव करने लगे कि जैसे उनके दुख से दुखित होकर के उनके दुख से व्यथित होकर के कोई एक अपूर्व देवता उनके हृदय में करुणा का सागर लिए हुए उनके हृदय में अनंत यातना और करुणा पोषण पूर्वक अनंत यातना और करुणा उनके हृदय में पालिक करके अपने संतानों की अपने भक्तों के प्रति अनंत करुणा और उनकी यह जो यातना है उसका अनुभव करते हुए बिंदु मात्र निजो प्रयोजन ना था किले ओ अपना खुद का तो कोई भी प्रयोजन नहीं है ईश्वर को क्या पड़ी है कि पृथ्वी पर पंच महाभूत का शरीर ग्रहण करें उनको क्या पड़ी है हमारे दुख में सहभागी हो हमारे साथ में रोए हमारे साथ में हंसे हमारे साथ में नृत्य कीर्तन करें ईश्वर को क्या पड़ी है कहां वह अपने ईश्वरीय राज्य में महा समाधि में मग्न होकर के बैठेंगे समाधि का आनंद प्राप्त करेंगे ना कि ये मृत्य लोक में आकर के हमारे दिन प्रतिदिन की ये जो कामना वासना दुख कष्ट यातना दर्द यह सब में हिस्सा लेंगे उनको क्या पड़ी है अपना खुद का बिंदु मात्र प्रयोजन नहीं है फिर भी माता न्याय तहा दिगर स्नेहा चले आश्रय प्रदान करते एक मां की तरह अपने भक्तों को अपने स्नेहमयी प्रदान करने के लिए त्रिदीप होई ते सम्मुख अवती होया स्वर्ग में से पृथ्वी लोग में हमारे सामने अवती ण होकर के ताहा दिग के ससने हे आहवान करते छन भक्तों को स्नेह पूर्वक आह्वान कर रहे हैं बापरे ये एक सेंटेंस को यदि हम ठीक ठीक समझने को जाए तो हम इसके ऊपर में पूरा पीएचडी लिख सकते हैं लीला प्रसंग जैसा एक दूसरा ग्रंथ लिख सकते हैं देखिए कितने सारे इसमें पॉइंट्स से शरत महाराज ने लिखे हैं एक के बाद एक फिर से हम इसको देखते हैं कि सबसे पहले तो भक्तों ने पहले तो ठीक किया था भक्तों को सबको पता था पता था कि ठाकुर को व्याधि क्यों हुआ है तो उन्होंने प्राण एक एक नियम किया एक उन्होंने प्रतिज्ञा ली कि ठाकुर को हम फिर से स्पर्श नहीं करेंगे किंतु इस प्रतिज्ञा के बावजूद जब ठाकुर अपने हृदय में उनके प्रति एक सहानुभूति उनके प्रति एक मातृत्व की एक भावना लेकर के प्रकट हुए और अपने हृदय के अंतर से कोई एक दिव्य उच्च राज्य पर विराजित होकर के उन्होंने जब यह कहा कि तो मादर चैतन्य हो तुम सब चैतन्य प्राप्त करो ऐसा कहने से ही भक्त लोग अपनी सब उन्होंने जो प्रॉमिस किया था अपने को उन्होंने जो नियम बनाया था उन्होंने जो प्रतिज्ञा ली थी सब सब भूल गए और ठाकुर के सामने नतमस्तक हो गए व क्योंकि ठाकुर को जब ठाकुर इस समय भाव में चले जाते थे ठाकुर इस समय जब एक उच्च समाधि में चले जाते थे तब उनके भीतर में जो व्याधि है उसके सब लक्षण अदृश्य होकर के कहीं भगवान शिव भगवान विष्णु भगवान राम भगवान कृष्ण उनका आविर्भाव उनके श्रीर देह में होता था मां काली मां दुर्गा जितने भी देव देवी है सर्व देव देवी स्वरूपाय तो भगवान राम कृष्ण है तो जितने भी देव देवी उनका आविर्भाव जो भक्त जिस इष्ट को मानता हो किसी का इष्ट है मां काली किसी का इष्ट है मां दुर्गा किसी का इष्ट है भगवान कृष्ण तो जिनका जो इष्ट हो उस इष्ट देवता का दर्शन सबको भगवान रामकृष्ण में हुआ होता जब ठाकुर इस तरह से समाधि के उच्च राज्य में चले जाते थे भाव में आ जाते थे और भाव में आकर के लोगों को अपना आशीर्वाद देते थे तो उस समय ठाकुर जब भाव में आ गए तो यह पंचमहाभूत का शरीर थोड़ी ना उनका है यह हमारी तरह व्याधि आधि व्याधि उपाधि यह सहन करने वाला यह ठाकुर का शरीर थोड़ी ना है त्रता जिसको कहते हैं त्रि ताप से तो हम लोग सफर कर करेंगे हमारे सर पर यह सब है त्रता तोव ठाकुर के लिए कहां यह सब कुछ है एक बार वह भाव में चले जाएंगे एक बार अपना सही स्वरूप का प्रकाश उनके भीतर में प्रकट होगा तो यह शरीर के जितने कष्ट है यातनाएं है जितने लिमिटेशंस है उससे कहीं उर्ध्व के कहीं ऊपर वह उठ जाएंगे ईश्वर स्वयं बन जाएंगे जिनकी मूर्ति बना कर के हम मंदिर में उनकी पूजा किया करते हैं जहां जहां पर इस विश्व में ईश्वर बोल कर के भगवान बोल कर के जिनकी पूजा की जाती है वही ईश्वर स्वयं ठाकुर के श्री देह में श्री अंग में हमको लक्षित होते हैं हमको दिखाई देते हैं तो ऐसी परिस्थिति जब आ जाएगी तो फिर ठाकुर को कैंसर हुआ है व ठाकुर को दूसरों के पाप ग्रहण करके उनको कष्ट हो रहा है वह बात ही कहां च ली जाएगी जो गिरीश घोष ने कहा था ना मुझे यदि पता चलता कि मेरे पाप फेंकने के लिए मुझे इतना बड़ा गड्ढा यदि मिल जाता ऐसा मुझे पता होता कि भविष्य में मेरे पाप को डालने के लिए इतना बड़ा गड्ढा मुझे मिलने वाला है तो मैं और कितना पाप कर लेता ऐसा गिरीश कहता था तो ठाकुर के लिए तो हमारे क्षुद्र शुद्र छोटे मोटे पाप वो कोई पाप थोड़ी ना है जैसे सूरज में आप एक बिजली एक एक मोमबत्ती जला करके आप सूरज के भीतर में डाल दीजिए सूरज स्वयं इतना प्रचंड अग्नि से प्रज्वलित है 1015 मोमबत्तियां जला कर के हमने उसके भीतर में डाल दी तो क्या कुछ फर्क पड़ने वाला है कुछ नहीं हालांकि जब इतना छोटा सा कमरा है यहां पर जली हुई मोमबत्ती गिर जाएगी तो यहां पर शायद मेरी किताब को जला दे इस वस्त्रों को शायद जला दे तो इस छोटे से कमरे में छोटी सी मोमबत्ती कुछ जला सकती है मोमबत्ती की जो ज्योति है उसका कुछ डर है सूरज के भीतर में आप लाखों मोमबत्तियां डाल दे उसकी खुद की जो आग है सूरज की खुद की जो प्रचंड अग्नि है उसमें इतनी हजारों अग्निया फेंक दे सूरज को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला वैसे ही अपने अपने पाप अपने ताप अपनी आधि अपनी व्याधि अपने त्रता यह जो कुछ भी है वह तो हमारे लिए है ठाकुर इतने प्रचंड पवित्रता की एक होमाग नहीं है कि उसमें जो कुछ भी हम अर्पित कर दे सब कुछ स्वाहा हो जाएगा सब कुछ पवित्र हो जाएगा ठाकुर को तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला ईश्वर को तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला जब तक हम ठाकुर को एक इंसान के रूप में एक मानव के रूप में देखते हैं तभी तक हम इनको जो कुछ नियम के दायरे में बांधते हैं कि हां ठाकुर ने हमारे पाप ग्रहण किए कि हां ठाकुर ने हमारे पाप ग्रहण करके कैंसर को निता दिया यह सब तो ठाकुर जब मनुष्य रूप में होते हैं तब यह सब नियम लागू होते हैं जब ठाकुर एक बार ईश्वरीय रूप में आ जाते हैं तो हमारे क्षुद्र क्षुद्र छोटे मोटे पाप ऐसे लाखों पाप करके लाखों पाप उनके श्री चरणों में अर्पित कर दे तो होमाग नि में जैसे हम बिल्व पत्र डालते हैं और एक शुद्ध पवित्र भाव उसमें से प्रकट होता है तो वैसे ही होने वाला है उससे कोई ठाकुर को फर्क नहीं पड़ने वाला ऊपर से हमारे सब पाप उसमें स्वाहा हो जाएंगे ठाकुर रूपी होमा अग्नि में अर्पित करके तो यह ठाकुर का एक है मानव स्वरूप और ठाकुर का एक है ईश्वरीय स्वरूप मानव स्वरूप में जब ठाकुर है तब तक हम सब विधि विधान का पालन करेंगे ठाकुर को स्पर्श नहीं करेंगे जिससे कि हमारे पाप उनमें ना चले जाए ठाकुर को हम बड़े ही अच्छे से हम उनकी सेवा करेंगे ठाकुर के सामने नतमस्तक होकर के किंतु जैसे गिरीश घोष था वो ठाकुर को गाली भी दिया करता था मनुष्य के रूप में जब ठाकुर होते थे किंतु इसी गिरीश को जब पता चला कि ठाकुर के भीतर में दो स्वरूप है एक है ईश्वरीय स्वरूप और एक है मानवी स्वरूप तो मानवी स्वरूप में थे तो उसने ठाकुर को अपशब्द कहने का साहस कर दिया किंतु जब उसको पता चला कि ठाकुर के के भीतर में ईश्वरीय स्वरूप भी है तो महावीर की तरह नत जानू होकर के नतमस्तक होकर के उनके सामने दो हाथ पैला करके वो उनकी स्तुति कर रहा है दो हाथ जोड़ कर के स्तुति कर रहा है तो यह गिरीश को बिल्कुल ठीक-ठीक पता है ठाकुर कब किस भाव में है ठाकुर का मनुष्य स्वरूप है एक मानव स्वरूप है और एक है दिव्य ईश्वरीय स्वरूप और यहां पे एक दिन एक ऐसा हुआ वैसे तो शरद महाराज बाद में विवरण हमको देते हैं कि दक्षिणेश्वर में तो ऐसा कई बार हुआ है कभी-कभी ठाकुर भाव में चले जाते थे और किसी किसी भक्त को स्पर्श करते थे और उस स्पर्श से उस भक्त का जितना भी कर्म संस्कार है सब वो मिट जाता था और भक्त किसी ना किसी एक आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त करता था ऐसी घटनाएं तो उन्होंने दक्षिणेश्वर में बार-बार देखी है कि तु यह सब क्या है कि एक एक जहां पर कोई नहीं है भक्त है और भगवान है भक्त भगवान की आराधना करता है और भगवान प्रसन्न होकर के भक्त को आशीर्वाद देते हैं एक इंडिविजुअल लेवल पर प्रतिदिन दक्षिणेश्वर में किसी ना किसी भक्त के साथ में यह घटना होती थी किंतु यह तो एक अंगत घटना है भक्त और भगवान के बीच का रिलेशन है किंतु यहां पर क्या है प्रकाश में एक जाहिर में एक पब्लिक इवेंट की तरह ठाकुर ने सबको एक साथ में बोल दिया जाओ तुम सबको चैतन्य प्राप्त हो तो यह एक यूनिक घटना हो गई वहां पर हमको पता है कि ठाकुर ने नरेद्र को स्पर्श कर दिया नरेंद मजाक कर रहा है वो हजरा के साथ में बैठ कर के अरे यह घटी हुई ब्रह्मा है यह बाटी ई ब्रह्म है सब कुछ ब्रह्म है तो माने जद सब कुछ ब्रह्मा होगा तो ठाकुर का ठाकुर जो जिस तरह से कहते तो यह कटोरी यह बर्तन य ये सब भी ब्रह्म हो गए क्या ये मने जिसको अद्वैत वेदांत नहीं पता है मैं भी जब शुरू शुरू में आया था और जब अद्वैत वेदांत समझ रहा था मैं भी सोचता था यह कैसी बात कर र है कि सब कुछ ब्रह्मण है ऐसा कभी हो सकता है क्या तो नरेंद्र भी इस तरह से मजाक कर रहा है उस समय देखा कि ठाकुर अपने वस्त्र अपने बगल में डाल कर के जैसे बिल्कुल छोटा बच्चा होता है निव स्त्र हो जाता है उसको मने उसने धोती पहनी है नहीं पहनी है क्या फर्क पड़ता है तो धोती गिर गई तो अपने बगल में डाल दी और जैसे छोटे बच्चे की तरह आकर के पूछने लगे हंसते हंसते क्या रे तुम लोग क्या बात कर रहे हो ऐसा करके नर को स्पर्श कर दिया जैसे नरेण को स्पर्श किया नरेण अपने शब्दों में बताता है कि तीन चार दिन ऐसे गए कि जब मैं होश में ही नहीं हूं मैं खा रहा हूं तो मैं कितना खा रहा हूं उसका मुझे परिमाण ही नहीं समझ में आता मां पूछती है अरे तू इतना क्यों खा खा रहे हो तो अच्छा मैं इतना खा लिया मुझे समझ में नहीं आया फिर लेट गए लेट गए तो लेट ही गए पता ही नहीं कि वो बैठे हैं लेटे हैं वो रास्ते से जा रहे हैं वो रेलिंग है उसके ऊपर में अपना सर पटक हैं देखते हैं कि मेरे भीतर में कोई फीलिंग भी है कि नहीं वो रास्ते से गाड़ी आ रही है तो यह भी नहीं कि चलो रास्ते से हट जाए वरना गाड़ी आक के मुझे इजा पहुंचाएगी मेरे साथ में एक्सीडेंट होगा क्यों क्योंकि आहार ये रेलिंग ये गाड़ी सब कुछ ब्रह्मण है मैं भी ब्रह्मण हूं तो मेरे साथ में इसका रिलेशन क्या है जैसे वह अष्टावक्र मुनि वो जनक राजा के पास गए बोले कि अद्वैत वेदांत की शिक्षा दो तो जनक राजा ने कहा पहले गुरु दक्षिणा दीजिए बाद में सब बात क्योंकि एक बार अद्वैत का ज्ञान होने से अद्वैत अनुभूति होने से कौन चहला कौन शिष्य तो इस तरह से अद्वैत अनुभूति जिसको होती है उसके लिए पूरा जगत बदल जाता है तो ऐसी घटनाएं तो दक्षिणेश्वर में दिन प्रतिदिन होती थी किंतु यह एक है पहली जनवरी को आत्म प्रकाश पूर्वक अभयदान जिस तरह से शरत महाराज इस घटना का वर्णन कर रहे हैं सबके सामने उन्होंने आत्मप्रकाश किया दक्षिणेश्वर में एक भक्त है जिसके सामने आत्मप्रकाश कर रहे हैं दूस दूसरे दिन दूसरे भक्त के सामने किंतु ये भक्त और भगवान का रिलेशन है भक्त आकर के भगवान के सामने दो हाथ जोड़ कर के प्रार्थना करते हैं भगवान उसको आशीर्वाद सुनाते हैं उसके सर पर कभी हाथ रख देते हैं कभी उनके सीने पर हाथ पैर रख देते हैं तो इस तरह से भगवान सबके ऊपर कृपा करते हैं किंतु जाहिर में सबके सामने इस तरह से एक ईश्वरीय स्वरूप धारण करना यह तो एक यूनिक घटना है और इस यूनिक ने से ही एक एक अद्भुत घटना की वजह से ही इसका एक अतिव महत्व अपने संग में है इसीलिए इस घटना को शरत महाराज कहते हैं आत्म प्रकाश पूर्वक अभयदान य एक ही घटना ऐसी है कि मने एक ही सेंटेंस ऐसा है देखिए कि शरत महाराज इसमें कितना सब कुछ बताते हैं ताहा के प्रणाम और तहर पद धुली ग्रहण जन्नो तारा एकन व्याकुल होया उठ लो ठाकुर को प्रणाम करने के लिए और ठाकुर की पद धुली चरण रज ग्रहण करने के लिए भक्त गण अभी व्याकुल हो उठे एवम यरबे दिक मुखरी तो कोरिया एके एके आशिया प्रणाम करते आरंभ करी लो जय रव जय श्री राम कृष्ण जय श्री राम कृष्ण ऐसे जयकार लगाते हुए एक के बाद एक आकर के ठाकुर के श्री चरणों में भूमि होकर के उनको प्रणाम करने लगे ओई रूपे प्रणाम करि बार काले ठाकुरर करुणा धी आजी बेला भूमि अतिक्रम्य एक अ दृष्ट पूर्व व्यापार उपस्थित करी लो इस तरह से प्रणाम करने के समय ठाकुर की करुणा आज सब सीमाओं को लांघ करके एक अद्भुत एक घटना एक अद्भुत एक इवेंट हमारे सामने उन्होंने खड़ी की है कोनों कोनो भक्ते प्रति करुणा ओ प्रसन्नता आतो हारा होया दिव्य शक्ति पूतो स्पर्शे ताहा के कृतार्थ कोरीते आमरा इति पूर्वे दक्षिणेश्वर ठाकुर के प्राय नित्य देखिया छला यहां पर शरत महाराज कहते हैं कि किसी किसी भक्त के ऊपर करुणा से प्रवश होकर के उसको आशीर्वाद देने की घटना हमने दक्षिणेश्वर में प्रायः हमेशा से देखती हुई देखी हुई है दिव्य शक्ति शक्ति पूत स्पर्शे तहा के कृतार्थ कोरीते अपने दिव्य शक्ति पूर्ण स्पर्श से उस भक्त को कृतार्थ करने वाली घटनाएं हमने दक्षिणेश्वर में हमेशा देखी है अर्ध दशा तिनी समवेत प्रत्येक भक्त के ई भावे स्पर्श करी लागि लेन जिस तरह से हमने दक्षिणेश्वर में देखा है कि दिव्य भाव के आरोप में दिव्य भाव में आरूढ़ होकर के वह भक्तों को शक्ति पूर्ण स्पर्श जो करते हैं इस तरह की घटना आज सबके सामने हुई सबको वो स्पर्श करने लगे बोला बाहुल्य तहर ओई रूप आचरण भक्तो गणे आनंदे अवधि रही लो ना बोलने की जरूरत नहीं है कि ठाकुर के इस तरह के आचरण से भक्तों के आनंद की अवधि नहीं रही भक्तों का आनंद जैसे कि इतना आनंद बढ़ गया है कि इस आनंद को वह अपने भीतर में समा भी नहीं पा रहे तहरा बुझलो आजी होते तिनी निज देवत्व कथा श तो ताहा दिगर निकटन किंतु संसारे कहारो निकट आर लुकाई तो राखी बेना एवं पापी तापी सकले एकन होते समवेत भावे तहर अभय पदे आश्रय लाभ करीबन भक्त लोगों को समझ में आया कि ठाकुर अब इस देवत्व और मानवत्वम पर जो खड़े हैं देवत्व और मानवत्वम भूमि पर जो खड़े हैं जो हम मां की जीवनी पढ़ रहे थे तो वहां पर गंभीरानंद जी महाराज ने लिखा है दो-तीन दिन पहले ही हमने देखा कि मां का जब पृथ्वी पर अवतरण हुआ तो छोटी बालिका है अभी तो तो ठीक नहीं कर पा रही कि अपना मानवत्वम है और देवत्व का प्रकाश कितना करना है बैलेंस किस तरह से रखना है बहुत ज्यादा मानवत्वम को सामान्य बालिका ही समझेंगे और बहुत ज्यादा देवत्व का प्रकाश करेंगे तो लोग इतने अभिभूत हो जाएंगे इतने डर जाएंगे कि उनके साथ में जो मृत्य लोक पर लीला करनी है वह लीला नहीं कर पाएंगे यह दिन प्रतिदिन की घटनाएं वोह काली मामा से कुछ झगड़ा हो गया वह पागली मामी से कुछ हो गया वह राधू कुछ पागलपन कर रही है यह जो दिन प्रतिदिन की सुमधुर घटनाएं जो हो रही है उसका लाभ हमने नहीं पाएंगे उनके जो भक्तगण हैं वो लोग इस लीला से वंचित हो जाएंगे यदि बहुत ज्यादा देवत्व का प्रकाश कर दिया तो देवत्व और मानवत्वम क्षण जो है जो संधि जहां पर होती है उस भूमि पर मां खड़ी थी और ठीक नहीं कर पाई थी बालिका स्वरूप में जब बालिका थी तब कि कितना मानत्व मानवत्वम करना कितना देवत्व का प्रकाश करना तो वैसे ही किंतु जब जैसे-जैसे मां की समय बीतता गया मां भी सीखते गई कि कितना प्रकाश करने से लोगों को कितना लाभ होता है तो यहां पर तो ठाकुर अपने जीवन के अंत पर खड़े थे अंतिम छोर पर खड़े थे पूरे जीवन भर का अनुभव ठाकुर के पास था ठाकुर को पता था कि अभी तक उन्होंने दक्षिणेश्वर में रह कर के जो एक किसी भक्त विशेष के सामने कोई करुणा से विगलिंक होकर के एक भक्त शरणागत जब होता है उसके सामने ठाकुर अपनी दिव्यता का प्रकाश करते थे किंतु जनरली अपना मानवत्वम दिखाते थे तो कितना मानवत्वम कितना देवत्व का प्रकाश करना ठाकुर को सिद्ध हस्त था ठाकुर उसमें माहिर थे ठाकुर एक्सपर्ट थे किंतु जीवन के अंतिम छोर पर के आकर के ठाकुर ने ठीक किया है कि अभी मान मानवत्वम हो गया अभी घड़ी आ गई है क्षण आ गई है उनके भीतर जो दिव्य सत्ता विराजमान है जगत के सामने संपूर्ण रूप से उसको उजागर करने का जगत के जितने भी भक्त हैं सबके सामने संपूर्ण रूप से इस दिव्य सत्ता का प्रकाश करने का समय आ गया है तो देवत्व सबके सामने ठाकुर ने प्रकाशित किया है सभी भक्तों को उस समय दक्षिणेश्वर में रहकर के कुठी बाड़ी थी जहां मथुर बाबू का कमरा था उसकी छत पर जाकर के भक्तों को पुकारते थे आय रे कोथा या ीश आए कहां हो भाई आओ सब तुम ये संसारी लोगों की बातें सुन सुन कर के मेरे कान जल गए आओ तुम सब भक्तों तो तुम सबके सामने ईश्वर और भक्ति की बातें करो ऐसा करके ठाकुर एकएक भक्तों को पुकारे हैं कभी रामचंद्र दत्त आए तो कभी राखल आया कभी नरेण आया तो कभी मास्टर महाशय आए तो एक एक करके भक्त तो वहां पर दक्षिणेश्वर में आते थे किंतु यहां पर उन्होंने जाहिर में आह्वान किया है वो एक कोथा आशीष आय रे कुठी वाड़ी पर चढ़ कर के कुठी वाड़ी की छत पर से ठाकुर ने आह्वान दिया था कहां पर हो आओ सब आओ वो एक आह्वान और यह दूसरा आह्वान तो मादे चैतन्य हो तुम सबको चैतन्य हो यह दूसरा आह्वान पहला आह्वान था कि कुछ अंतरंग शिष्यों को ठाकुर ने पुकारा था जिससे कि उनकी लीला में जन ये युग युग तक उनकी लीला चलती रहे उसके लिए कुछ मुट्ठी भर शिष्य को जरूरत थी जिनको कि वह धीरे-धीरे तपस्या मय उनका जीवन गठन करें तो वह एक आवश्यकता थी और अब आवश्यकता है जन साधारण के बीच में जितने पापी तापी है इस पृथ्वी पर सबके सामने अपने सही स्वरूप की घोषणा करें तो वो एक आह्वान था कुठी वाड़ी पर दक्षिणेश्वर में ठाकुर ने अपने अंतरंग भक्तों को बुलाया था और यह एक आह्वान है काशीपुर ने इस विश्व में जितने भी मनुष्य है सबको अपने पास बुलाया है इस दो आह्वान के बीच में ठाकुर की पूरी लीला है और हमारे भक्तों के लिए ठाकुर की लीला तो ऑफकोर्स जन्म से ही प्रारंभ हो गई है किंतु भक्तों के सामने ने प्रकाशीय लीला इन दो पॉइंट के बीच में है कहां वो वहां पर अंतरंग भक्तों का आगमन शुरू हुआ और कहां यहां पे जनसाधारण का आगमन शुरू हुआ स्वामी जी ने एक पत्र में बहुत सुंदर बात लिखी है जब दक्षिणेश्वर में ठाकुर की महासमाधि की बात है स्वामी जी अमेरिका में थे दक्षिणेश्वर में ठाकुर का जन्मोत्सव का पालन हो रहा था उस समय किसी एक भक्त ने स्वामी जी को अमेरिका में पत्र लिखा पत्र में लिखा कि देखिए ठाकुर का जन्मोत्सव तो बहुत ही दिव्य घटना है बहुत ही भद्र लोक अर्थात कि ये सब जेंटलमैन जो अच्छे घर के परिवार वाले जो महिलाएं हैं वो वहां पर जाती है किंतु हम लोग देख रहे हैं कि कुछ ऐसी कुछ महिलाएं उस समय जाती है जिनका चरित्र समाज की दृष्टि से अच्छा नहीं है तो ऐसी महिलाओं के वहां पर जाने से अच्छे घर की महिलाओं का वहां पर जाना वो थोड़ा सा संकोच महसूस करती है ये अच्छे घर के जो जो पुरुष है वह वहां पर जाने से थोड़ा सा द्विधा महसूस करते हैं तो ठाकुर ने स्वामी जी ने उस लेटर के रिप्लाई में क्या लिखा जो अच्छे घर के लोग हैं वह वहां पर नहीं जाए तो भी कोई आपत्ति नहीं है ठाकुर पापी तापी पद दलित लोगों के लिए आए हैं नहीं कि तुम लोग अच्छे घर के अच्छे संस्कार वालों से तुम लोगों के पास में तो ठाकुर ने सब कुछ दे ही दिया है वो लेकर के शांति आनंद करो जिनके पास कुछ नहीं है उनके लिए ठाकुर का आगमन हुआ है तो यह आगमन और यह आह्वान का शुभ उद्घाटन यह उद्बोधन यह सबको आह्वान उस दिन 1 जनवारी को ठाकुर ने सबके सामने रखा था वो इन्विटेशन ठाकुर ने जब दिया है तो उस इन्विटेशन को लेकर के यह ऐसी महिलाएं जिनका चरित्र आपकी दृष्टि में अच्छा नहीं है उस आह्वान को सुनकर के दक्षिणेश्वर जा रही है वो इन्विटेशन लेटर आप बोलेंगे ठाकुर ठाकुर का उत्सव हो रहा है हमको तो इन्विटेशन लेटर मिला नहीं कैसे जाएंगे तो उस दिन काशीपुर में पहली जनवरी को ठाकुर ने सबको इन्विटेशन लेटर भेज दिया है वो एक इन्विटेशन लेटर भेजा था वो नरेंद्र के लिए राखल के लिए मास्टर महाशय के लिए जो कुछ चुनिंदा भक्त थे दक्षिणेश्वर में और काशीपुर में जो इन्विटेशन लेटर भेजा है वो हम सबके लिए है हम सबके लिए अभी ये अधिकार है हम सबके लिए अभ ये कर्तव्य है कि धीरे-धीरे एक के बाद एक हम सब ठाकुर के श्री चरण में जाए और उनके शरणागत हो तो आज यही तो कल फिर से मिलते कल मां की तिथि पूजा है य और इसी का ही पाठ करेंगे और बहुत ही शुभ क्षण रहेगा ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु