Skip to transcript
ClassesSaradakosh

Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life and Teachings 1 Aug 2025

prayer

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिण अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का जीवन चरित्र वराह नगर मठ की आज स्थापना होने वाली है। सुरेंद्र मित्र को वो जो ठाकुर ने दर्शन दिया वो फेमस घटना युगनायक स्वामी विवेकानंद लेखक स्वामी गंभीरानंद उस पुस्तक में से यह पोर्शन हम थोड़ा सा पाठ करेंगे। अह क्या कहते हैं

सुरेश मित्र को श्रीरामकृष्ण का दर्शन: प्रथम रामकृष्ण मठ की स्थापना में सहाय करने का आदेश -1

गंभीरानंद जी महाराज? श्री श्री ठाकुर महासमाधि ठीक परवर्ती दिन गुली लोक दृष्टि ते विषाद व्याकुल विफलतामय और नैराश्य पूर्ण होलेले ओ ठाकुर स्वयं अलख्य निज उद्देश साधने उपाय स्थिर करते छिले श्री रामकृष्ण देव की श्री श्री ठाकुर की महासमाधि के बाद के कुछ दिन लोगों की दृष्टि से विषाद से व्याकुल विफलतामय अर्थात की निष्फलता से घिरे हुए और निराश पूर्ण निराशा से भरे हुए इस तरह से लोगों की दृष्टि से दिखते तो थे किंतु ठाकुर स्वयं अलक्ष्य अर्थात कि लोगों की दृष्टि से दूर अंतराल में अपने उद्देश्य साधन का उपाय स्थिर कर रहे थे। महाराज के जैसे कि वह एक लिटरेरी कवित्वमय भाषा है। ऐसे तो लगता है कॉम्प्लिकेटेड पढ़ने से किंतु है बड़ा ही सहज ऑलरेडी हमने देख लिया कि किस तरह से अवतार के अदर्शन से अर्ध अवतार की महासमाधि के बाद में उनके जो पार्षद होते हैं उन्होंने अपना घर है वह सब तो छोड़ दिया है। जो संसार है संसार के ऊपर में तो विरक्ति आ पड़ी है किंतु अभी यह जो अध्यात्म का रास्ता है उसके ऊपर में कैसे चला जाए वो अभी कुछ टिक नहीं कर पा रहे हैं। अभी दो चीज है यहां पे जहां तक इंडिविजुअल साधना का प्रश्न है। इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी का प्रश्न है। तो ठाकुर ने तो वह रास्ता सबको बता ही दिया है। सबका साइको एनालिसिस करके सबके लिए कौन किसके लिए कौन सा रास्ता उचित है नरेंद्र के लिए ज्ञान का तो राजा महाराज के लिए राखाल के लिए भक्ति का तो इस तरह से सबकी प्रकृति के अनुसार सबके संस्कार के अनुसार सबका जो प्रयोजन है अवतार लीला में वह समझ के साधना तो सबकी ठीक करवा दी है किंतु हमको यह भी पता है कि राम राम कृष्ण संघ भावधारा जो है वो उसके तीन पहलू है। तो इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी वाला जो पहलू जिसको कि ठाकुर एग्लीफाई करते हैं तो ठाकुर की महासमाधि तक यह पहलू जो है यह एस्पेक्ट जो है यह गुरु भाइयों की साधना वाला वह तो समाप्त हो गया। सभी लोगों ने साधना में कुछ ना कुछ सिद्धि तो प्राप्त की ही थी। इसीलिए यह लोग घर छोड़कर के यहां पर आकर के एक साथ में रह पाए थे। तो वह पार्ट तो समाप्त हो गया किंतु जो दूसरे दो एस्पेक्ट है कम्युनिटी एंड सिविलाइजेशन उन एस्पेक्ट्स को अभी अनफोल्ड होना बाकी था। तो किस तरह की कम्युनिटी की रचना होगी। किस तरह से यह लोग साथ में रहेंगे। इस सब चीजों को लेकर के जो मंथन चल रहा था, जो इनके भीतर में शंका कुशंकाएं या तो फिर यह व्याकुलताएं जो उनके हृदय में भरी हुई थी ठाकुर की महासमाधि के कुछ दिनों तक इसका तो हमने अच्छे से डिस्क्रिप्शन पढ़ा। किंतु इन सबको वैसे तो पता ही होगा। का हृदय में तो पता ही होगा कि ठाकुर अपने से कुछ ना कुछ कर रहे हैं। यह गुरु भाइयों के हाथ में शायद इतनी शक्ति ना हो कि वे लोग अपना किस तरह का भविष्य होगा ठीक पर कर पाए किंतु ठाकुर तो है सर्वशक्तिमान वो सबकी दृष्टि के अंतराल में जैसे कि वो नाटक चलता है ना तो क्या होता है स्टेज के ऊपर में तो हमको एक्टर्स दिखाई देते हैं वो ये एक्टर यह कार्य कोई हीरो का पात्र वो ये करेगा दूसरा है कोई विलेन का पात्र का अभिनय करेगा कोई है कि यह हास्य रस वाला हास्य विनोद वाला पात्र उसका अभिनय करेगा। तो यह अभिनय वगैरह जो स्टेज के ऊपर में चलते हैं उन सबको किंतु डायरेक्ट करने वाला है वह डायरेक्टर जो कि बैकग्राउंड में रहता है नैपथ्य में रहता है। पर्दे के पीछे रहता है। हमको आज लगता है ऑडियंस को कि अच्छा इसको आप हीरो का पात्र बनाया है तो उसकी इच्छा के अनुसार अनुसार शायद यह हीरो बना है। जिसको विलेन बनाया है वह शायद अपनी इच्छा से विलेन बना है। किंतु ऐसा नहीं है। डायरेक्टर ने कहा है इस एक्टर को कि तुम हीरो का पात्र का अभिनय करो। दूसरे एक्टर को कहा है तुम विलेन के पात्र का अभिनय करो। तो यह डायरेक्टर किसी को दिखता नहीं है किंतु स्टेज के ऊपर में जो कुछ हो रहा है वो डायरेक्टर की इच्छा अनुसार ही हो रहा है। उसके दिशा निर्देश अनुसार ही हो रहा है। तो यहां पे भी ये सबकी नजर के सामने यह गृहस्थ भक्त थे। वह अपना कुछ सोच रहे थे। काकुड़गाछी योगोद्यान बना के यहां पर मास्टर महाशय है जिनके खुद के मन में एक संदेह जैसा था उनकी गुरु भाइयों के प्रति तो बड़ी निष्ठा थी किंतु यह लोग एक कम्युनिटी बना के रहे और इस कम्युनिटी के माध्यम से शिवज्ञाने जीवन सेवा का प्रारंभ हो यह सब उनको अभी भी ठीक नहीं लग रहा था यहां पर मां शारदा है जिनको कि कामार पुुर जाकर के रहना है तो वह एक मां की लीला चल रही है। प्रत्येक गुरु भाई की अपनी-अपनी एक भूमिका है। अपनी भूमिका के अनुसार उनके पात्र का अभिनय चलना है भविष्य में। किंतु यह सब डायरेक्ट करने वाले थे श्री रामकृष्ण। इसीलिए यहां पर गंभीरानंद जी लिखते हैं कि लोगों की दृष्टि में इन ये जो गुरु भाइयों के त्यागी संतानों के और इवन गृहस्थ संतानों के दिन विषाद से व्याकुल तो थे। विफलतामय अर्थात कि निष्फलता से भरे हुए तो थे। नैराश्य पूर्ण अर्थात कि निराशा से भरपूर तो थे। किंतु ठाकुर स्वयं अलक्षीय लोगों के लक्ष्य के बहार में लोगों की दृष्टि से परे अपने उद्देश्य साधन का उपाय स्थिर कर रहे थे। किसी को पता नहीं या तो हृदय में तो पता है किंतु अभी क्या है ना कि जैसे कहते हैं आशा ही परम दुखम नैराश्य ही परम सुखम यदि आप कोई बड़ी आशा रख के बैठ जाएंगे अपने जीवन में कि हां मेरे साथ में ऐसा कुछ होने वाला है भविष्य में मैं बड़े अच्छे मार्क्स से पास हो जाऊंगा मुझे बड़ी अच्छी कॉलेज में एडमिशन मिल जाएगा आईआईटी में हो सकता है हावर्ड में हो सकता है हु नोस मेरा भविष्य कितना उज्जवल है। उसके बाद में कोई मल्टीीनेशनल कंपनी में वो ट्रिलियन डॉलर कॉरपोरेशन आजकल तो चलते हैं। तो उसमें मेरा नौकरी लग जाएगा और मैं बड़ा सुख पूर्वक शांति से रहूंगा। इस तरह की आशा का पोषण हम जितना करते हैं उतना ही जब हमको नहीं मिलते हैं अच्छे मार्क्स नहीं मिलता है अच्छी यूनिवर्सिटी में एडमिशन नहीं बनती है अपनी अच्छी करियर तो बड़ी ही ज्यादा निराशा होती है इसलिए बहुत सारे लोग मेहनत तो करते हैं किंतु यह आशा नहीं रखते तो गीता का वो जो ये है उपदेश कि कर्मणीवा ही अधिकारस्ते मा फलेशु कदाचनम कर्म पे अधिकार है फल की आशा पे नहीं फल की आकांक्षा पे नहीं तो बहुत सारे लोग इस तरह से रहते हैं तो यहां पे भी यह चाहे त्यागी संतान हो कि गृहस्थ संतान ठाकुर के हृदय में तो पता था कि हां ठाकुर तो अवतार है तो उनके भविष्य का कुछ ना कुछ तो दिशा निर्देश करेंगे ही किंतु इस आशा को वे लोग बहुत ज्यादा सीरियसली इसलिए नहीं लेना चाहते थे कि शायद यदि उनकी इच्छा अनुसार ना हो आशा अनुसार तो बिना मतलब का एक निराशा आकर के हृदय पे और ज्यादा निराशा सवार ना हो जाए तो जो भी है तहार भक्त और रशदार सुरेंद्रनाथ मित्रों ठाकुर जहां के सुरेश बोलिया डाकीतेन एक दिन ऑफिस होइते फिरिया पूजा गृहे ठाकुर ध्याने मग्नो आन किस तरह से ठाकुर अपना उद्देश्य साधन कर रहे थे उनके जो परम भक्त रसददार सुरेंद्रनाथ मित्र थे ठाकुर जिन जिनको कि सुरेश बोलिया पुकारते थे एक दिन ऑफिस होकर के आकर के अपने पूजा गृह में ठाकुर के ध्यान में मग्न थे ऐन समय एक दिव्य दर्शन पायलेन उस समय उनको एक दिव्य दर्शन प्राप्त हुआ अकस्मात देखले एकाएक देखा श्री रामकृष्ण ता सम्मुख आविर्भूत होया बोलते छेन तू कोश की श्री रामकृष्ण उनके सामने आविर्भूत होकर के कहे रहे हैं तू क्या कर रहा है हमार छेलेरा सब पथे पथे घरे बेड़ा छे तार आगे एक व्यवस्था को मेरे लड़के मेरे संतान सब पथ पे रास्ते पर भटक रहे हैं तुम पहले तो उनकी एक व्यवस्था करो शून्याय सुरेंद्र उन्मत्त बोत शमपल्ली बाशी नरेंद्रनाथ नरेंद्रनाथर गुरुहे ध्रुत उपनित होले जैसे ही सुरेंद्र बाबू को सुर सुरेश बाबू को यह दर्शन हुआ। वैसे ही वह उन्मत्तवत होकर के बावरे होकर के दौड़ते दौड़ते उन्हीं की गली में उन्हीं की शरी में जो रहते थे ठाकुर के दूसरे परम भक्त श्री नरेंद्रनाथ नरेंद्रनाथ अर्थात स्वामी जी उनके घर पे उपस्थित हुए एवं समग्र वृतांत पुनरावृत्ति कोरिया अश्रुशिक्त कुंठे शोकातरे बोलीले उनके घर उपनित हुए उपस्थित हुए और जो पूरा वृतांत उनको सुनाया कि कैसे मैं ठाकुर घर में ध्यान कर रहा था। एकाएक ठाकुर ने स्वयं आकर के मुझे दर्शन देकर के कहा कि मेरे लड़के भटक रहे हैं दर-बदर उनको इकट्ठा करके रहने के लिए कुछ व्यवस्था करो। तो फिर मैं इसलिए तुम्हारे पास में आया हूं। पुनरावृत्ति करके अश्रु सिक्त कंठे शोकात रे बोलीन अश्रु सिक्त कंठ उनकी आंखों में आंसू और आवाज में व्याकुलता कातरता इस स्वर में बोले कि भाई एकटा आस्ताना करो जे खाने ठाकुर छबी भस्मादि और तार वकृत जिनेश गुली रेखे रीति मतो पूजा अर्चना चलते पारे भाई एक एक अड्डा बनाओ आस्थाना अर्थात कि एक घर की व्यवस्था करो जहां पे ठाकुर की छवि भस्म और उनके जो व्यवहृत जो सब चीजें थी उसको रखकर के रीति मतो माने कि विधि पूर्वक पूजा और अर्चना चलते चलते रहे जे खाने तोमरा काम कांचन त्यागी भक्तरा एक जगह थकते पारो जहां पे तुम काम कांचन त्यागी भक्त एक जगह पे रह पाओ माझे माझे आमरा शेखाने गिए जुड़ते पारो बीच-बीच में हम लोग वहां पे रहकर करके अपने प्राणों में शांति प्राप्त करेंगे। हमको भी इकट्ठा होकर के ठाकुर की बातें करने का ठाकुर के दिन वो जो दक्षिणेश्वर के शुभ पवित्र दिव्य दिनों का स्मरण करने का एक सु अवसर प्राप्त हो आमी काशीपुर मासे मासे जे टाका दीताम एकनो ताई देवो मैं काशीपुर में महीने प्रत्येक माह प्रत्येक महीने जितना रुपया देता था उतना ही मैं तुमको भी दूंगा

कहानी: श्रीरामकृष्ण सुरेश मित्र का अभिमान भंग करते है

देखिए यह कितनी सुंदर बात यह सुरेश मित्र करता है। एक बड़ा सुंदर प्रसंग है। कथामृत में ही है कि सुरेश मित्र ने सुरेश बाबू ने एक बड़ा ही महंगा हार लेकर के ठाकुर उनके घर पधारे थे। नृत्य कीर्तन चल रहा था और क्या है कि सुरेश बाबू वैसे तो थे धनी ही तो कभी-कभी होता है ना कि धन का और यह तो ये जो ये है उसका प्रदर्शन करने का किसी किसी को एक भीतर में इच्छा होती है। जिससे कि लोग अपने को एक बड़ा आदमी गिने। लोग मुझे ज्यादा रिस्पेक्ट दें। मेरी प्रेस्टीज बढ़े कि हां मैं ठाकुर का इतना धनी भक्त हूं। ऐसा कुछ सोच के शायद हो सकता है कि सुरेश बाबू ने एक बड़ा महंगा हार लेकर के ठाकुर के गले में पहनाने को गए। किंतु हुआ ऐसा कि ठाकुर ने वह हार अपने गले से उतार करके साइड पर फेंक दिया। तो यह देखकर के सुरेश बाबू को बड़ा ही दुख लग गया और वह सोचने लगे कि अरे मैं तो इतना भक्ति से उनको पहना रहा था हार और उन्होंने फेंक दिया। तो बोलकर के फिर वह बड़े ही दुखित होकर के कमरे में से बाहर निकल कर के और किसी जगह पर बैठ गए और आंखों में से आंसू निकलने लगे। यह साथ में यह रामबाबू वगैरह भक्त भी गए। उन्होंने देखा कि यह सुरेश बाबू को बुरा लग गया है। उनके घमंड पर आघात किया है ठाकुर ने। तो अभी धनी व्यक्ति है तो धनी व्यक्ति को थोड़ा सा तो संभालना पड़ेगा। यह ठाकुर में यह प्रैक्टिकल सेंस थी नहीं। किंतु यह रामबाबू वगैरह में यह प्रैक्टिकल सेंस थी कि धनी भक्त है तो उसको इस तरह से नाराज हो जाए। यह भी तो ठीक नहीं। तो रामबाबू जाकर के उनको सांत्वना दे रहे हैं कि भाई इसमें इतना ज्यादा तुम दुखी मत हो। ठाकुर तो बालकवत है। उनके मन में कब क्या आए तुम कुछ कह नहीं पाओगे। तो फिर ऐसा मत अपने पर्सनली मत ले लेना इस बात को। ऐसा कुछ सांत्वना देते होंगे। यह उनके शब्द नहीं है। मैं बता रहा हूं। तो यहां पर इस तरह से लोग सुरेश मित्र को सांत्वना दे रहे हैं। सुरेश बोल रहा है कि अभी इस देह को धारण करके कोई लाभ नहीं है। मैं आत्महत्या कर लूंगा वगैरह-वगैरह। किंतु देखिए कि ठाकुर तो थे अंतर्यामी। तो पहले तो जब यह सुरेश हार पहनाने को आया उस समय उसके भीतर में उन्होंने घमंड का दर्शन किया होगा बोलकर के हार उठाकर के फेंक दिया। किंतु जब वहां पर सुरेश बैठकर के पश्चाताप कर रहा है आंखों के आंसुओं के द्वारा उसका जो घमंड है वह पिघलता जा रहा है धुलता जा रहा है तो वैसे ही ठाकुर को भी यहां पर समझ में आ गया अंतर्यामी थे तो दिव्य दृष्टि से देख लिया कि जिस सुरेश के घमंड की वजह उन्होंने हार नहीं पहना था तो वह घमंड तो अभी पिघलने लगा है तो फिर ठाकुर ने वो जो फेंक जो फेंका हुआ हार था। अपने से ही अपने गले में पहन लिया और नृत्य करते-करते गीत गा रहे हैं कि जगत चंद्र हार पहना है मैंने। तो यहां पर देखिए कि यह जो सुरेश के जो धन का जो अभिमान था ठाकुर ने इस तरह से उसको तोड़ा। जिस तरह से ठाकुर अपने पास

ठाकुर अपने भक्तों का अभिमान भंग करते है

में आते हुए सभी भक्तों का अभिमान तोड़ते थे। मास्टर महाशय की तो फेमस घटना है विद्या और बुद्धि का तो एक था ही उनके भीतर में फिर वो वृंदा जी को माने वो जो वृंदा दासी थी वहां पे उसको पूछते भी है कि अरे यह तो उन्होंने बहुत सारा अभ्यास किया होगा स्टडी किया होगा तो वृंदा क्या कहती है कि अरे सब कुछ तो उनके मुंह पे है। उनकी जुबान पे ही सब कुछ है। उनकी जुबान पे ही जैसे सरस्वती बैठी है। कोई फॉर्मल उन्होंने स्टडी वगैरह नहीं किया ना ही बीए एमए ऐसा कोई डिग्री इनके पास में है। तो मास्टर महाशय सुनकर के बड़े ही आश्चर्यचकित हो गए थे कि बिना किसी यूनिवर्सिटी की डिग्री के बिना आधुनिक शिक्षा के क्या किसी भी मनुष्य के भीतर में इतना एक आत्म श्रद्धा इतनी विद्या इतना तेज किस तरह से प्रकट हो सकता है तो वो जो मास्टर महाशय का अभिमान वहां पे ठाकुर ने खंडित किया था विद्या का अभिमान यहां पे सुरेश मित्र का धन का अभिमान खंडित किया। अभी जब अभिमान जब तक हमारे भीतर में रहता है तब तक हम चाहे मुंह से तो कितना ही अपने को आत्मसमर्पण करने को जाए किंतु वो सही-सही समर्पण होगा नहीं। यह गिरीश घोष की कहानी तो जग जाहिर है। ठाकुर जब उनके थिएटर में गए थे। नाटक देखने के लिए तो गिरीश ने पहले तो उनको बहुत गाली गलौज दे दिया और फिर किंतु ठाकुर जब वहां से चले गए तो उसको बहुत ही पश्चाताप हुआ। इतना पश्चाताप हुआ वह भी अपने घर जाकर के वहीं बैठकर के वह भी सोच रहा है कि इस देह को धारण करने का क्या आशय है? क्या उद्देश्य है? तो यहां पर ठाकुर दक्षिणेश्वर में बैठे थे। दक्षिणेश्वर जाकर के सबको कह रहे हैं कि देखो गिरीश ने इस तरह से मेरे साथ में दुर्व्यवहार किया। किंतु जितने भी लोग थे वो वो कोई-कोई लोग ऐसा कहते हैं कि अरे महाशय फिर से वहां पर जाने की जरूरत ही नहीं है। वह तो वैसे ही नाटक का नाटक मंडली का वह मैनेजर है। दारू पीता है। उसके संस्कार अच्छे नहीं। उसका चरित्र अच्छा नहीं। फिर कभी वहां पर मत जाइए। वगैरह-वगैरह उपदेश देने वाले तो बहुत लोग थे। किंतु रामबाबू एक थे कि उन्होंने कहा कि कालीय नाग जो है उसको तो जहर ईश्वर ने ही दिया है। भगवान कृष्ण ने ही दिया है। तो भगवान कृष्ण को तो वह जहर ही तो सामने अर्पण करेगा और क्या ऑफर कर सकता है? तो जैसे ही सुरेश रामबाबू ने ऐसा कहा वैसे ही ठाकुर कहते हैं अच्छा तो मैं जाता हूं उसको मिलने के लिए फिर से। तो अभी बात यह नहीं है कि रामबाबू के कहने से ठाकुर जाने के लिए तैयार हो गए। गिरीश को मिलने के लिए फिर से किंतु उनको यह दिव्य दृष्टि से अंतर्दृष्टि से पता चल गया था कि गिरीश का जो घमंड जो कुछ भी रहा होगा उसके भीतर में जो संताप रहा होगा वह अभी पिघल गया है। वह अभी सही-सही पश्चाताप कर रहा है। तो बोलकर के जैसे ही ठाकुर उसके घर गए गिरीश के और गिरीश ने दूर से देखा ठाकुर आ रहे हैं तो वह बावरा बना सा दौड़ा दौड़ा वो ठाकुर के चरणों में जाकर के गिरा और फिर कहने लगा कि आप यदि वापस नहीं आते तो मैं सोचता कि कोई एक सामान्य संत महापुरुष है। मैंने आपको जो जिस तरह से अपमान किया है वो अपमान खा करके आपने मेरे पर कृपा की है। मेरे पर करुणा बरसाई है। मुझे क्षमा कर दिया है तो यह एक अवतार के अलावा और कोई नहीं कर सकता। तो यह गिरीश घोष का भी यह जो एक मान था, एक अभिमान था, उसका खंडन हुआ। यह स्वामी जी के साथ में भी वही स्वामी जी के भीतर में जो रैशनलिटी थी, वह इतनी स्ट्रांग थी कि वह बैरियर को तो किसी ना किसी क्षण तोड़ना होगा। अदरवाइज स्वामी जी संपूर्ण रूप से ठाकुर के शरणागत नहीं हो पाते। तो वह रैशनलिटी की बैरियर भी जब स्वामी जी के पिताजी का निधन हुआ उसके बाद में जो कष्ट सहन करना पड़ा तो यह कष्ट सहन करके उनकी भी यह बैरियर टूट गई। देखिए हम

ठाकुर राखाल (स्वामी ब्रह्मानन्द) का अभिमान भंग करते है

सभी के जीवन में ऐसा ही होता है। मैंने अपने खुद के जीवन में यह बात अनुभव की है कि हम लोग जब पहली बार ठाकुर के पास आते हैं या कोई भी इष्ट के पास में जाते हैं, हम सबके भीतर में एक व्यवधान होता है। एक बैरियर होती है। वह चाहे विद्या का अहंकार हो, वह चाहे रैशनालिटी का अहंकार हो, वह चाहे धन का घमंड हो, ना कि चाहे वह एक तरह का स्केप्टिसिज्म हो, जो कुछ भी हो। यह मान अभिमान हम सबके भीतर में रहता है और इसको पहले तो आपको तोड़ना पड़ेगा। यह कैसे टूटेगा? यह सभी इंडिविजुअल साधक की अपनी-अपनी जर्नी है। यह राजा महाराज के भीतर में भी इस तरह से एक काम का बैरियर बच गया था। तो ठाकुर ने कहा कि जाओ अपनी पत्नी के साथ में रहो। यह बैरियर जब तक टूटेगा नहीं तब तक तुम अपने को संपूर्ण रूप से समर्पित नहीं कर पाओगे। तो राजा महाराज जब पहली पहली बार ठाकुर के पास में रहने को आए थे। उनके भीतर में बड़ी ही ईर्ष्या थी। ये ईर्ष्या रूपी बैरियर उनके भीतर में एक बन गई थी कि वही जैसे कि ठाकुर के सही संतान है। वही जैसे ठाकुर के ऊपर में सिर्फ उन्हीं का अधिकार है। जैसे कि ये छोटे बच्चों में होता है ना कि वैसे तो मां के साथ में बीच-बीच में झगड़ा करते हैं। मां के साथ में नाराज हो जाते हैं। किंतु जैसे ही अपनी मां या अपने पिताजी और किसी बच्चे के साथ में प्रेम से बात करें तो यह बच्चे को बड़ी ही जेलसी हो जाती है कि अरे मेरी मां है। मेरे पिताजी है दूसरे बच्चों के साथ में क्यों प्रेम से बात करने को जाते हैं? तो यह बच्चों के भीतर में ऐसा होता है। तो राजा महाराज भी वैसे ही थे। वो राखाल बालक जैसे ठाकुर उनको मातृवत स्नेह करते थे। ठाकुर का तो ठाकुर के तो वह मानस पुत्र थे। तो वो एक भीतर में ईर्ष्या रूपी बैरियर जन्म ले ली थी और इस बैरियर को जब तक टूटेगा नहीं तब तक फिर यह उन्होंने क्या किया? और किसी के साथ में ठाकुर वार्तालाप करते थे और किसी गुरु भाई यह त्यागी संतानों के साथ में तो उनको बड़ी ईर्ष्या होती थी और बीच-बीच में कुछ ना कुछ ऐसा कुछ प्रयास करते थे कि ठाकुर जैसे कि यह सब लड़कों के साथ में वार्तालाप ना करें। तो फिर काशीपुर की ही घटना है। ठाकुर कहते हैं राखाल का नाम नहीं लिया है। किंतु बिना नाम लिए कहते हैं कि वह यदि वहां पर रहता उस समय दक्षिणेश्वर में तो यह बाकी जो संतान है बाकी जो युवा भक्त है उनका मेरे पास में आना मुश्किल हो जाता। उतनी तीव्र उसकी ईर्ष्या थी। उसके बाद में मैंने उसको वृंदावन भेज दिया। वृंदावन से वह अपनी पत्नी के पास गया वगैरह-वगैरह ठाकुर एक बोल रहे हैं। तो उस समय अगेन वह राजा महाराज का नाम ले ही लिया है। किंतु वह कहते हैं राजा महाराज इन रिप्लाई में कहते हैं कि मेरे मन में तो ऐसा कोई आशय नहीं था। अर्थात कि वह अपना सेल्फ डिफेंस करते हैं। यह कह के कि मेरे मन में ऐसी कोई ईर्ष्या नहीं थी। तो उस समय रामबाबू वहां पर बैठे हुए थे। तो तो रामबाबू कहते हैं कि तुम्हारा मन तुम समझोगे ठीक ठीक ना कि वो समझेंगे तो फिर यह राखाल चुप हो गया क्योंकि रामबाबू की बात भी तो सही है राजा महाराज के खुद के मन में क्या चल रहा है वो खुद ठीक से समझेंगे कि ठाकुर समझेंगे तो देखिए कि वो राजा महाराज की भी यह जो एक बैरियर थी उसको तोड़ने की जरूरत थी और इसके बाद में जब वापस आए ठाकुर के पास में तब उनका मन संपूर्ण रूप से शांत हो गया था ठाकुर ठाकुर को संपूर्ण रूप से समर्पित हो गए थे। निवेदिता का जीवन हम कल डिस्कस

निवेदिता की शरणागति की और यात्रा

किया कि किस तरह से निवेदिता के खुद के मन में स्वामी जी के साथ में पहली बार जब भारत आई और उसके बाद में स्वामी जी के साथ में यूरोप अमेरिका की टूर की। उसने वह भ्रमण करने के लिए गई। उद्देश्य था कि कन्याशाला के लिए पैसों का संग्रह करना, फंड का संग्रह करना। किंतु वह हो नहीं रहा था और दूसरा ही एक इंटेलेक्चुअल फिलॉसोफिकल स्ट्रगल उसके मन में चल रही थी। तो वह स्ट्रगल चली चली स्वामी जी उसको यूरोप छोड़कर के आ गए भारत वापस यह निवेदिता यह प्रोफेसर गेडेस बोल के एक था उसके साथ में रही और फिर बहुत ही उसका भी लंबा एक चला मंथन। किंतु फिर स्वामी जी की महासमाधि के कुछ महीने पहले उसमें भी अकल आ गई। उसके भी यह जो रेजिस्टेंस था भीतर में वह धीरे-धीरे करके टूटता गया और जब वह वापस आई आखिरी में फोर्थ जुलाई को स्वामी जी की महासमाधि होती है 192 तो उसके कुछ महीनों पहले वह भारत वापस आई और फिर उस समय जब वापस आई तो स्वामी जी को उसने संपूर्ण रूप से आत्मसमर्पण किया स्वामी जी को अर्थात कि रामकृष्ण भावधारा को भले ही चाहे उसने बाद में संघ छोड़कर के अपने से फ्रीडम मूवमेंट में पार्टिसिपेट करना शुरू किया। किंतु हृदय में जितनी भी बैरियर्स थी समर्पण की वो सब टूट चुकी थी। और मुझे ऐसा नहीं लगता कि स्वामी जी के आशीर्वाद के बिना निवेदिता यह सब करती। शायद स्वामी जी ने भी भारत का भविष्य देख लिया था। स्वामी जी ने भी शायद यह अपने किसी मन के किसी एक कोने में यह सोच करके रखा था कि रामकृष्ण मिशन तो पॉलिटिक्स में जा नहीं पाएगा। तो अभी ये जैसे देखिए स्वामी जी का खुद का थिंकिंग कितना क्लियर था। जब स्वामी जी ये भारत का भ्रमण कर रहे थे तो अभी जैसे नॉर्थ इंडिया का भ्रमण किया उसमें तो यह सब ये सेठ लोग हैं वगैरह-वगैरह उनके संपर्क में आए थे। किंतु जैसे ही पश्चिम भारत का साउथ इंडिया का भ्रमण उन्होंने प्रारंभ किया। राजपूताना, गुजरात, यह बॉम्बे प्रेसिडेंसी, मैसूर, यह तमिलनाडु आजका यहां पर जैसे ही उन्होंने भ्रमण प्रारंभ किया, वैसे ही उस समय के राजाओं ने स्वामी जी को खुले हाथों से अपना लिया, और उनके बड़े ही भक्त हो गए थे। स्वामी जी प्राय देखेंगे कि या तो किसी दीवान के घर रहते थे या तो किसी राजा के घर रहते थे। तो युगनायक पुस्तक में भी और यह जो लाइफ ऑफ स्वामी विवेकानंद बाय ईस्टर्न एंड वेस्टर्न डिसाइपल यह पुस्तकों में स्पष्ट रूप से लिखा है कि कोईकोई लोग स्वामी जी की निंदा करना प्रारंभ कर दिए थे कि क्यों तुम इतना राजाओं के घर में रहते हो हम तो सन्यासी है अकिंचन सन्यासी हमारे पास में तो ऐसा कुछ भी मतलब यह सल नहीं रहना चाहिए यह धन मान वैभव महल में रहना रहना। यह सुंदरी स्त्रियों से घिर करके रहना। यह सब तो सन्यासी का धर्म नहीं है। यह सुंदरी स्त्रियों से घिर करके रहना। देखिए अमेरिका जब स्वामी जी गए थे तो वह किसी ने कहा स्वामी जी को कि स्वामी जी आप यहां पे जो अमेरिकन स्त्रियां हैं वो इतनी फॉरवर्ड है, इतनी फ्री है। उनके संपर्क में आप कैसे रह पाते हैं? तो स्वामी जी ने कहा कि देखो यह बात भी सही है। मैं जब भारत में था, भ्रमण कर रहा था, प्रवृज्या कर रहा था। उस समय कभी-कभी मैं किसी गरीब की कुटिया में भी रहता था। कभी-कभी मुझे भूखे भी रहना पड़ता था। तो किंतु कभी-कभी मैं महल में भी रहता था। और मैं सोया हुआ हूं तो मुझे वो पंखा हवा डालने के लिए। उस समय तो इलेक्ट्रिसिटी नहीं था। वो जो एक बड़ा पंखा आता है ना कुछ दास चाकरों को रखा जाता था हवा डालने के लिए। तो राजा ने सुंदरी स्त्री को इस तरह से मुझे हवा डालने के लिए पंखा देकर के वहां पर रखा था। तो इस तरह के दिन भी मैंने बिताए हैं। स्वामी जी कहते हैं तो उस समय यदि मेरे मन में टेंप्टेशन नहीं हुआ तो यहां पर कैसे होने वाला है? किंतु यह जो स्वामी जी का यह जो भीतर से त्याग था बहुत लोगों को समझ में नहीं आ रहा था। उनको लग रहा था कि स्वामी जी ने जैसे कि यह कठोरता का तपस्या का रास्ता छोड़कर के यह राजमहल में दीवान के घर में बड़े-बड़े उच्च लोगों के अधिकारियों के घर में जाकर के उनको भी जैसे कि यह सत्ता वैभव लग्जरी यह नेम एंड फेम उसका एक नशा हो गया है। तो ऐसा कुछ-कछ लोगों ने सोचना शुरू किया था। यह कुछ लोग कौन थे? उनका नाम तो नहीं दिया गया है किंतु हम लोग अनुमान करके कह सकते हैं कि शायद उन्हीं के कुछ गुरु भाई होंगे तो जो भी है यहां पे स्वामी जी का रेशनल क्या था स्वामी जी ने इसका उत्तर क्या दिया स्वामी जी कहते हैं कि देखो भाई भारत का नवनिर्माण करना होगा सोए हुए भारत को पुनः जागृत करना होगा तो यह पुनः जागरण के लिए भारत के ये जो 30 करोड़ लोग हैं उनको सबको जाकर के मैं मिलूंगा उनको उनको कुछ उपदेश दूंगा। यह तो संभव ही नहीं है विद इन वन लाइफ टाइम। तो उससे बेटर क्या है कि राजा महाराजा है, दीवान है, राज्य जो अधिकारी है राज्य के उनको जाकर के मैं कन्वर्ट करूं। उनको मैं अपने स्वप्न से उनको मैं उनको मैं प्रेरित करूं। तो जिससे कि यदि वह प्रेरित होते हैं तो वह अपने राज्य में उनकी जो प्रजा है उनका हित कर पाए। और हुआ भी तो ऐसा था ना कि अखंडानंद जी जब यह राजपूताना वगैरह भ्रमण कर रहे थे स्वामी जी के अमेरिका जाने के बाद में तो खेतड़ी में ना कि कहीं पर वह रुक गए और वहां के राजा को कहा कि यह जो सब लड़के हैं जिनको कि यह दास के लड़के हैं यह सो मतलब क्या है कि उनका तो शिक्षा दीक्षा का तो ऐसा कोई व्यवस्था नहीं है। नौकर के लड़के हैं, गरीब के लड़के हैं। तो उनके लिए शिक्षा कर देने के लिए कुछ पाठशाला खोलिए तो मैं उनको शिक्षा देता हूं। तो राजा ने कहा तो इस तरह से यह दास के लड़कों के लिए पाठशाला का भी निर्माण हुआ चलने लगा। तो क्या है कि देखिए यह गरीब लोगों तक आपको यदि यह कुछ ना कुछ बेनिफिट लेकर जाना है। आप यदि राजाओं को राज कर्मचारियों को यह ऑफिसर्स को आप यदि प्रेरित कर पाए तो यह बेटर हो पाएगा। यह स्वामी जी का रैशनल था, थिंकिंग था। स्वामी जी ने स्पष्ट रूप से कहा कि मैं राजाओं के साथ में यह प्राइम मिनिस्टर यानी कि उस समय के दीवान को प्राइम मिनिस्टर कहते थे। उनके साथ में यह राज कर्मचारियों के साथ में मैं इसीलिए वार्तालाप करता हूं। इसीलिए मैं उनके साथ में इस तरह से अच्छे संबंध रखता हूं। उनके घर रहने को जाता हूं। तो यह स्वामी जी का थिंकिंग बड़ा क्लियर था। तो मुझे ऐसा लग रहा है कि निवेदिता ने यह पॉलिटिक्स में प्रवेश करके यह पॉलिटिक्स में प्रवेश एस सच नहीं किंतु यह जो फ्रीडम फाइटर उस समय के जितने भी थे जितने भी यह गण्यमान्य भारतीय थे उन सबके पास में यह ठाकुर मां स्वामी जी का संदेश पहुंचाना निवेदिता के लिए जो संभव था वो शायद स्वामी जी ने सोचा होगा कि रामकृष्ण मिशन से संभव ना हो। एक तो बात है कि हम लोग सन्यासी हैं। घूमना फिरना लोगों के साथ में कितना आप मिक्स होंगे। वह सब चीजों के ऊपर में एक ऑटोमेटिक लिमिटेशन आ जाता है। स्वामी जी जिस तरह से भारत घूमे। अभी ये स्वामी जी के जाने के बाद और तो कोई सन्यासी इस तरह से भारत नहीं घूमने वाला है। आजकल के मैंने उस समय भी कि ज्यादातर सन्यासी को तो फिर स्वामी जी ने बेलून मठ बना तो कह दिया कि अपने-अपने मठ में रहो। मठ का विकास करो। बिना मतलब इधर-उधर भटकते मत घूमो। तो वह पॉलिसी तो स्टार्ट हो गई थी। तो उस समय स्वामी जी के मन में शायद यह बात रही होगी कि भारत के भविष्य के जो नेता है उनको इन्फ्लुएंस करने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है निवेदिता। एक तो वो क्या है कि स्त्री है दूसरी कि वो ब्रिटिश है। तो उसको क्या है ना बड़ा ही इजी एक्सेस मिल जाता है। वो ठाकुर ने कहा ना कि यह ज्ञान है पुरुष और भक्ति है स्त्री। ज्ञान किसी घर किसी के घर जाएगा तो बाहर के बैठक खाने तक ही उसको रखा जाएगा। किंतु भक्ति रूपी स्त्री वह अंदर महल तक जा सकती है यानी कि हृदय के भीतर तक जा सकती है। तो वह स्त्रियों को एक इजी एक्सेस होता है जो पुरुषों को इतना नहीं होता। दूसरी कि वो ब्रिटिश है तो उसका एक प्रेस्टीज है कि हां वो जो गोरे लोग हम पर राज कर रहे हैं उसी गोरों के देश से यह आई है निवेदिता और यह भारतीय संस्कृति का भारतीय ये संतों का भारतीय संतों की वाणी का प्रचार कर रही है। यानी कि निवेदिता के पास में जो एक अह क्या कहेंगे? एलिजिबिलिटी रही होगी, ऑथेंटिसिटी उसके पास में जो होगी, उसको यह जो एक जनरल एक्सेप्टेंस मिलेगा, वह शायद रामकृष्ण मिशन के साधुओं को ना मिले और हमारे लिए इस तरह से फ्रीडम फाइटर, राजनेता इनका संपर्क ज्यादा करना उचित नहीं होगा। ऑर्गेनाइजेशन चलाना है। यह क्रांतिकारियों के साथ में संपर्क रखेंगे तो हमको पता है कि जयराम बाटी में क्वालपाड़ा में बार-बार पुलिस वाले आकर के वो मां के भक्त कौन है? कौन मां के पास में दीक्षा लेने के लिए आया है? कौन वहां पर रह रहा है। सबका नाम पता लिख के जाते थे। तो फिर मां को तकलीफ ना हो। राजा महाराज को तकलीफ ना हो। क्योंकि ब्रिटिश लोग तो कुछ भी कर सकते हैं ना। तो इसलिए संघ को एक सेपरेटली बचा करके रखा जाए। किसी भी तरह का पॉलिटिकल इनवॉल्वमेंट ना हो किंतु जो लोग पॉलिटिक्स में है उनको प्रेरित करने के लिए निवेदिता को यहां से भेजा जाए। तो अभी इस तरह का थिंकिंग स्वामी जी ने कभी किया हो। मैंने तो कहीं पढ़ा नहीं है किंतु मैं अनुमान करके कह रहा हूं क्योंकि स्वामी जी को आप जितना पढ़ेंगे उतना ही समझ में आता जाएगा कि उनकी धुरंध दृष्टि बहुत थी। माने कितना भविष्य में देख पाते थे। खुद ने ही कहा है ना कि 1500 साल तक यह मिशन चलेगा। तो यह 1500 साल जो भविष्य में देख सकते हैं उनको नेक्स्ट 15 साल ना दिखे या तो ये जो भारत का ये जो फ्रीडम मिलने वाला है कुछ ही सालों के बाद में 1947 में ऐसा कुछ उनको ना दिखे ऐसा तो मुझे नहीं लग रहा। तो यह यहां पे भी यह निवेदिता को यह भारत के उद्धार का जो कार्य करवाना था बोल के उसका भी रेजिस्टेंस तोड़ना था। तो हमारी यह जो ओरिजिनल बात थी कि सुरेश मित्र जो आज उन्मत्तवत बावरा सा बना हुआ दौड़ा दौड़ा स्वामी जी के पास में आकर कहता है कि ठाकुर ने आदेश किया है मैं तुम लोगों को पैसा दूंगा मठ चालू करने के लिए तो वो सिचुएशन कब आई? जबकि ये सुरेश का अहंकार टूटा था। उसकी यह जो बैरियर थी संपूर्ण आत्मसमर्पण के बीच में वह बैरियर को ठाकुर ने तोड़ दिया था। बोलकर के सुरेश मित्र आज इतना पैसा अपना खुद का वह डोनेशन में दे सकता था। तो यहां पर एक जो एक समग्र रामकृष्ण मिशन और उनके जितने भी ओरिजिनल जो आप थे संत महापुरुष सबके जीवन में देखिए कि या तो ठाकुर ने उनके घमंड को तोड़ा है उनके भीतर की बैरियर्स को तोड़ा है या ठाकुर ने तोड़ा स्वामी जी ने तोड़ा है या तो फिर परिस्थिति इस तरह से खड़ी हुई है क्योंकि उन्हीं के निर्देश के अनुसार शायद कि उनके भीतर का यह रेजिस्टेंस टूटा और यह लोग संपूर्ण आत्मसमर्पण कर पाए।

वराहनगर मठ की स्थापना

तो अभी यह जैसे ही सुरेश मित्र ने यह पूरी बात कही कि मुझे ठाकुर ने आकर दर्शन दिया है। तुम लोग इस तरह से एक अपना एक घर बनाओ। एक मठ की स्थापना करो। हम लोग भी संसार ताप दग्ध संसार के ताप से हम लोगों जो दग्ध हो गए हैं। हम लोग वहां पर इकट्ठा हो गए। ठाकुर की इस पुण्य स्मृति को फिर से जीवंत रखेंगे। तो जैसे ही यह सुरेश मित्र ने कहा नरेंद्र ए दानेर कथा शून्या आनंदे आत्महारा होलेन नरेंद्र इस दान की बात सुनकर के आनंद से आत्महारा हो गया और एवं बाड़ी शधाने फरीते लाले और साथ-साथ में ही एक घर एक मकान की खोज में घूमने लगे वृंदावन गुरु भ्राता तारकनाथ के पत्र लिख लेन त जेो प्रस्तुतो थाकेन वृंदावन में उनके गुरु भाई तारकदा थे तारकनाथ उनको भी पत्र लिखा कि तुम तैयार रहना बाड़ी पायले तार करा हुई एवं ताहा के तत्णात आशिया नूतन मठेर कारोभार लेते होवे जैसे ही एक घर की एक मकान की व्यवस्था हो जाती है वैसे ही उनको तार करना किया जाएगा टेलीग्राम किया जाएगा वह जैसे ही टेलीग्राम मिलता है साथ-साथ में ही ततक्षणात आकर के नए मठ का कार्यभार उनको स्वीकार करना होगा। तारकनाथो तदनुसारे काशी धाम परंतु आशिया द्वितीय निर्देश अपेक्षाए रहले तारकनाथ भी वृंदावन से काशी तक आ गए और दूसरा निर्देश यानी कि दूसरा टेलीग्राम कब आता है उसकी अपेक्षा में रहने लगे। देखिए नरेंद्र के ओर से तो हम अनुमान कर ही सकते हैं कि कहां वह बेचारा सोचता था कि भविष्य में क्या किया जाए। ठाकुर ने तो मुझे आदेश किया है कि त्यागी संतानों को इकट्ठा करके रखना है। साथ में रहना है। सबको स्नेह के सूत्र में बांध के रखना है। तो वो कैसे मेरे से संभव है? यह सोच रहा था यह नरेंद्र और यहां सामने से सुरेश ने आकर के यह समाचार दिया। तो नरेंद्र के साथ में क्या हुआ? आनंद से आत्महारा हो गया। इतना आनंद कि वह बेचारा होश भी नहीं संभालने को पा रहा है। तो यह

महासमाधि के बाद त्यागी शिष्यों को ठाकुर के दिव्य-दिशा-निर्देश

देखिए कि ये नारायण के साथ में यह दूसरा एक दिव्य निर्देश हुआ ना पहला तो दिव्य दर्शन हुआ था। एक एक दिव्य उनको निर्देश मिला था ठाकुर की समाधि के बाद में ही महासमाधि के बाद में ही वह दिव्य कांत पुरुष का दर्शन हुआ था। प्रकाशमय देह का और यह दूसरा एक दो महीने के अंतराल में ही दो दिव्य दर्शन उनको मिल गए हैं। या तो दिव्य निर्देश नरेंद्र को मिल गए हैं कि ठाकुर अभी भी जीवित है। सूक्ष्म रूप से हैं और अभी भी सबको गाइड कर रहे हैं। यह ऐसा हो गया कि नाटक बढ़िया सा चल रहा था। पीछे वो पर्दे के पीछे में वह डायरेक्टर भी उपस्थित था। यहां पर सामने में सब अभिनेता भी अपना अभिनय कर रहे हैं। कहीं भी कुछ भी गड़बड़ है तो डायरेक्टर आकर के बीच-बीच में निर्देश दे देता है कि भ इस तरह से डायलॉग बोलो, इस तरह से अभिनय करो, इस तरह से फाइट करो। ये सब जो है वो डायरेक्टर आकर बोल देता था। एकाएक डायरेक्टर का हो गया निधन। तो अभी आप सोचेंगे कि यह नाटक जो चल रहा था अभिनेता इतना फ्लोलेसली अभिनय कर रहे थे। अभी इसमें कुछ ना कुछ गड़बड़ तो होना शुरू हो ही जाएगा। यह तो माने एक लॉजिकल एक थिंकिंग है। किंतु ऐसा नहीं हो के यह अभिनेता उतना ही फ्लोलेसली अभी भी अभिनय कर रहे हैं। अभी भी नाटक संपूर्ण रूप से कोऑर्डिनेट होकर के चल रहा है। यह डायरेक्टर के न रहते रहते तो फिर हम लोग क्या अनुमान करेंगे? मेरे डायरेक्टर शायद सदैव वर्तमान नहीं है। हो सकता है कि उसने अपना एक एआई क्लोन रख के गया होगा और यह एआई क्लोन जो है वह यह नाटक को चला रहा है। डायरेक्ट कर रहा है। ऐसा हम सहज रूप से आज के युग में अनुमान कर सकते हैं। तो यहां पर भी देखिए कि ठाकुर का यह एआई क्लोन कहो ना कि यह सूक्ष्म रूप से सभी के हृदय में वर्तमान थे और वहां से रहकर के उन्होंने यह नाटक को चला रहे थे। वो फेमस घटना कि जब यह अस्थि कुछ उन्होंने चुरा लिए निरंजन महाराज और शशि महाराज ने रामबाबू ने वह घड़ा रखा था जिस दिन ठाकुर की महासमाधि हुई शशान में से वो अस्थि लेकर के एक ताम्र के घट में लाकर के ठाकुर का जो शयन कक्ष था काशीपुर में वहां पर रखा था और फिर यह कमरे को ताला लगा दिया था रामबाबू ने उनको अंदाज आ गया था अंदेशा आ गया था कि यह गुरु भाई लोग कुछ त्यागी संतान कुछ गड़बड़ करने वाले हैं तो ऐसा करके ताला लगा के चले गए थे। तो यहां पर यह शशि और निरंजन ने ठीक किया कैसे भी करके उसमें से अस्थि चुरा लेंगे। तो वह स्काईलाइट के माध्यम से ना कि ऐसा कुछ भीतर में प्रवेश किया। अस्थि चुराए और नरेंद्र के पास में ले आए। अभी नरेंद्र ये सब चीजों में इतना यह नहीं इन्वॉल्व होना चाहता था। किंतु यह जब चोरी हुई तो नरेंद्र ने मना भी नहीं किया। अच्छा ठीक है चलो सबकी इच्छा है तो वैसे तो उसका कहना स्पष्ट था कि ठाकुर के उपदेश वाणी के अनुसार जीवन गठन करें नहीं कि उनकी अस्थियों को लेकर झगड़ा करें किंतु जो भी है जब अस्थि आ गई इनके पास में तो फिर नरेंद्र ने क्या कहा उसी दिन रात को महासमाधि के दूसरे दिन की रात को कि आओ हम सभी लोग यह अस्थि का एक-एक कण ग्रहण करें क्योंकि हम ही तो हैं ठाकुर की जीवंत समाधि तो ऐसा बोलकर के जो गुरु भाई वहां पे उपस्थित थे। उन्होंने उस अस्थि का एक-एक कण एक-एक अंश ग्रहण किया और फिर उस दिन रात को उनको इतनी गहन समाधि हुई, इतनी गहन ध्यान हुआ, इतना गहन ईश्वर चिंतन हुआ कि जिसका वर्णन वे लोग नहीं कर सकते थे। तो जैसे कि ठाकुर वैसे तो सूक्ष्म देह से विराजमान थे ही थे। किंतु इवन स्थूल देह से भी यह जितने गुरु भाई थे उनके अंतर्मन में हृदय में विराजित थे। तो इसीलिए ठाकुर का यह जो प्रेजेंस का एक दूसरा निर्देश इसको मिला नरेंद्र को आनंद से आत्महारा हो गया और घर का संधान करने के लिए चारों ओर दौड़ने लगा।

वराहनगर मठ का वर्णन

ए के नरेंद्रनाथ ताहार बराह नगर निवासी बंधु भवनाथ अदम्य चेष्टाए बराह नगरे गंगा तीरे निकटे भुवन दत्तेर एकटी झण उ्या उद्यान बाटी मासिक एगारो टाकाय भाड़ा पावा गैलो नरन के और उनके वराह नगर निवासी बंधु भवनाथ वही फेमस भवनाथ जो वरराजा बनकर के ठाकुर के पास में आया था इसी भवनाथ को ठाकुर ने ईश्वर कोटि बोलकर के निर्देश किया था। यही भना जिसके बारे में ठाकुर ने कहा था कि नरेंद्र पुरुष है तो यह उसकी प्रकृति है। तो इतना जो क्लोज था नरेंद्र के ठाकुर का जो इतना प्रिय था वह तो अपना घर त्याग नहीं कर पाया। वो शादी करके घर में रहने लगा। ठाकुर ने एक बार मजाक हंसीज़ाक में कहा था कि तुम अपनी स्त्री के साथ में थोड़ा सा आमोद आहात कर लेना। तो यह भवनाथ नाराज होकर के कहने लगा क्या हम लोग यदि ऐसा करेंगे हम लोग भी क्या ऐसा करेंगे अर्थात कि उनको तो एक आदर्श स्थापित करना है ठाकुर का संतान है तो बोलकर के तो उसने आदर्श स्थापित तो किया था किंतु इतना भी रामकृष्ण संघ के वो निकट नहीं आ पाया जितना कि बाकी ये लाटू महाराज हैं शशि महाराज हैं शरद महाराज है वे लोग आ गए थे तो जो भी है यह भवनाथ वो वराह नगर में ही रह रहा था तो इन दोनों की अदम्य ्य चेष्टा अदम्य उत्साह के परिणाम वराह नगर में ही गंगा तीर के पास में भुवन दत्त की एक जीर्ण उद्यान बाटी जीर्ण क्षण टूटी फूटी उद्यान बाटी अर्थात कि उद्यान गृह महीने के 11 में भाड़े पे मिला भुवन दत्तेर बाटी बाड़ीटी छिलो आशले टाकीर जमींदार मुंशी बाबू देर यह भुवन दत्त का जो घर था उद्यान गह वह असल में तो यानी कि ओरिजिनली टाकी के जमींदार मुंशी बाबू का था। कोई बाटी छिलो जीर्ण और परित्यक्त वो घर था जीर्ण शण और परित्यक्त यानी कि अबेंडोंड वहां पर कोई रह नहीं रहा था। टूटा फूटा हो गया था। भूतिया घर जिसको कहते हैं ना आजकल इस तरह से ह्टेड हाउस की तरह हो गया था। ए जन उहा के शकले पोो बाड़ी बोली तो इसीलिए लोग सब उसको पोड़ो बाड़ी अर्थात कि पोड़ो अर्थात कि जला हुआ जला हुआ अर्थात कि टूटा फूटा घर इस तरह से कहते थे कोई जीर्ण पोड़ो बाड़ी ते छखानी मात्र घर छोलो इस जीर्ण शण पोड़ो बाड़ी अर्थात कि टूटे फूटे घर में मात्र छह कमरे थे बाड़ी भाड़ा और टैक्स जन धकारो टाका छाड़ाओ पाचक ब्राह्मण वेतन मासिक छ टाका एवं मठ बासी देर अन्नान खर्च टाकाओ सुरेंद्रनाथ तो यह घर का जो रेंट है जो भाड़ा है ₹1 इसके अलावा जो एक ब्राह्मण को रखा था खाना बनाने के लिए रसोईय ब्राह्मण को रखा था तो उसके लिए महीने के ₹ और यह जो मठवासी गुरु बाई है उनके खर्च के लिए भी अलग से सुरेंद्र मित्र यह पैसा देते थे। तो यह ₹11 तो हो गया रेंट और दूसरा ₹6 हो गया कुक का। तो यह छ और 11 हो गए 17 और इसके अलावा भी यह गुरु भाइयों का जो खर्च होगा उसके लिए कुछ ना कुछ रुपया सुरेश देता था। ए रूप तहार मासिक दानेर परिमाण लोको वृद्धि शंगे शंगे वधित होया एक शतो टाका परजन तो उठिया छिलो इस तरह से उनके मासिक दान का जो ये है परिमाण है वह जैसेजैसे लोगों की संख्या बढ़ती गई तो बढ़ते-बढ़ते ₹100 तक चला गया था। आप देखिए सुरेश मित्र मटका यह जो प्रति महीने ₹100 करके देता था। यह कितनी बड़ी रकम है। आज के हिसाब से 10,000 ना कि इतना आराम से हो जाएगा। आज देखिए ना सोच ही लीजिए कि आज 101 लोग एक साथ में रहते हैं। वह भी यंग लड़के हैं। वह खाने की कैपेसिटी है। वह सब है। भले ही चाहे जितनी भी तपस्या करें तो ये 10 12 लड़के एक घर में रहेंगे तो 10 100 10 15000 इस 18000 इसके बिना तो चलने वाला नहीं है। तो यह ₹100 उस समय के इतनी बड़ी रकम थी। तो इतना यहां तक यह सुरेश मित्र देता था प्रति महीने। तहार ए सह हृदय तार कथा स्मरण करिया कथामृतकार लिखिया छ उनके इस सह हृदयता की उनकी यह उदार हृदयता की बात याद करके स्मरण करके कथामृतकार ने लिखा है मास्टर महाशय ने लिखा है धन्य सुरेंद्र ए प्रथम मठ तुम्हारी हाथर गड़ा यह प्रथम मठ तुम्हारे ही हाथों से बना हुआ है तोमार साधु इच्छा ए आश्रम हो लो तुम्हारी साधु इच्छा से यह आश्रम हुआ तोमा के जंत्र स्वरूप करिया ठाकुर श्री रामकृष्ण तहार मूल मंत्र कामिनी कांचन त्याग मूर्तिमान कर लेन तुमको यंत्र स्वरूप करके ठाकुर श्री रामकृष्ण उनका मूल मंत्र कामिनी कांचन त्याग मूर्तिमान किए देखिए कामिनी कांचन त्याग मूर्तिमान करने के लिए घर भाड़े करना होगा और घर भाड़ा करने के लिए एक गृहस्थ के हाथ से उन्होंने यह डोनेशन दिलवाया। इसलिए उनको यंत्र स्वरूप करवाया ठाकुर ने भाई तुम्हार गुण के भूलीबे भाई तुम्हारा गुण कौन भूलेगा मठेर भाईरा मातृहीन बालक के न्याय थाकीतेन मठ के भाई मात्रहीन बालकों की तरह रहते तुम्हार अपेक्षा को तेन तुम्हारी राह देखते तुम्हारी अपेक्षा करते तुम कोखन आशबे तुम कब आओगे आज बाड़ी भाड़ा दीते श टाका का गिया छे आज खाब किु नाई आज बाड़ी का भाड़ा देते देते घर का भाड़ा देते देते सब पैसा समाप्त हो गया है और आज खाने के लिए और कुछ नहीं है कोखन तुम आशीब बे आशिया भाई देर बंदोबस्त तो कोरियादी बे कब तुम आओगे आकर के भाइयों का बंदोबस्त कर दोगे खाने के लिए सब जुगाड़ कर दोगे फिर इतनी सुंदर बात यह मास्टर महाशय ये सुरेश बाबू को उद्देश करके कह रहे हैं। स्वामी विवेकानंद बोलिया छिले स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था सुरेश बाबू नाम सुने छि तो सुरेश बाबू का नाम सुना है तो यह बात वो उसको कह रहे हैं वो स्वामी शिष्य संवाद के प्रणेता शरद चंद्र चक्रवर्ती को बेलूर मठ की बात है। कहते हैं कि सुरेश बाबू का नाम सुना है तो तीन यही मठेर एक रकम प्रतिष्ठाता एक तरह से देखा जाए तो इस मठ के प्रतिष्ठाता वही है तीन वराह नगर मठेर सब खरच पत्र वहन करते वही वराह नगर मठ का सब खर्च पत्र वहन करते वही सुरेश मित्तरई आमादे जन तो बेश भाव तो वह सुरेश मित्र ही हम लोगों के लिए उस समय सबसे ज्यादा सोचता रहता था तो देखिए किस इस तरह से वराह नगर मठ की रचना हुई और इसमें भी यह जो एक मुख्य एक हमको एक कांसेप्ट समझने को आया है कि यह जो यंत्र स्वरूप करके ठाकुर ने यह जो सुरेश मित्र को अपना यंत्र बनाया अपना यह कार्यवाहन करने के लिए एक उपयुक्त साधन में परिणत किया तो उस साधन में परिणत कहने से पहले किस तरह से संघर्ष से मानसिक संघर्ष से उनको गुजरना पड़ा और किस तरह तरह से उनका घमंड, उनका अहंकार, उनकी अस्मिता चकनाचूर हुई। तब कहीं जाकर के ठाकुर को वह संपूर्ण समर्पित हो पाए थे। तो आज यहीं तक अभी स्वामी जी की कहानी स्वामी जी के नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न: हमें राम बाबू और गिरीश घोष का आभारी होना चाहिए। कालिय नाग की तरह, ठाकुर ने हमें केवल जहर दिया है, इसलिए हम केवल वही ठाकुर को अर्पण कर सकते हैं। आत्म-समर्पण की हमारी यात्रा यही से प्रारम्भ होती है

यह जो शरद महाराज इसका डिबेट का जो ठाकुर को पूछते हैं ना कि यदि सब कुछ ईश्वर की इच्छा के अधीन है तो हम साधन भजन करें ना करें वो भी तो इन्हीं की इच्छा के अधीन है ना तो ठाकुर बड़ा सुंदर उत्तर देते हैं। हमने डिस्कस किया था लीला प्रसंग में कि वो जो ये होता है वो किसान वो गाय को वो जो रस्सी से बांधता है। अभी जितना रस्सी है उस मतलब जितना एरिया गाय कवर कर सकती है वहां पे तो वह एटलीस्ट वह चारा उसका ग्रहण करें। फिर यदि क्या है कि किसान ही देखेगा कि उसके एरिया में इतना खत्म हो गया है घास तो अभी रस्सी बढ़ा दो। यानी कि यह जो जिनको हम फ्री विल कहते हैं या तो इंडिपेंडेंस जो कहते हैं वो भी ईश्वर ही देते हैं हमको। और वह भी हमको क्या है कि शरणागति एक ऐसी चीज है कि साधन भजन करके ही वह शरणागति कभी-कभी आएगी। अदरवाइज जैसे देखिए सभी के भीतर में तो रेजिस्टेंस था ना। रेजिस्टेंस कैसे टूटा? वो तो संघर्ष करके ही टूटा। स्वामी जी भी यदि पिताजी का निधन नहीं हुआ होता। वो कष्ट नहीं सहन करने पड़े होते तो पता नहीं कि वह इस हद तक ठाकुर को समर्पित हो पाते कि नहीं। निवेदिता वहां भी यूरोप में जाकर के वह प्रोफेसर गेडेस के पास में रही। खुद का बहुत स्ट्रगल चला। उसके परिणाम से जब वह वापस आई आखिरी बार स्वामी जी के पास तो स्वामी जी को संपूर्ण समर्पित हो गई। और यह थ्यरी को लेकर के ही मुझे अभी ऐसा एक डाउट हो रहा है कि वह पॉलिटिक्स में गई थी यानी कि फ्रीडम फाइटर्स के साथ में बात कर रही थी तो स्वामी जी के आशीर्वाद के बिना संभव ही नहीं होगा। क्योंकि थ्यरी बड़ी स्पष्ट है कि एक बार आपका यह बैरियर टूटता है तो संपूर्ण आत्मसमर्पण आ ही जाता है। उसके बाद में निवेदिता का खुद का थिंकिंग कहां रहेगा? तो यह नरेंद्र से गिरीश घोष से यह परंपरा चली आ रही है। तो निवेदिता इस आल्सो पार्ट ऑफ द सेम सिस्टम। देखिए जितना संग सिर्फ संघर्ष नहीं माने दोनों चीजें आवश्यक है। एक और आपकी साधना चलनी चाहिए। दूसरा आपका संघर्ष चलना चाहिए। जब यह दोनों पैरेलल चलेंगे ना देखेंगे कि धीरे-धीरे करके भीतर के सब अंकट बंकट जितना भी अपना घमंड है रेजिस्टेंस है सब टूटता जाएगा। किंतु ये दोनों साथ में चलने चाहिए। एस सच लोगों के जीवन में संघर्ष बहुत है। तो किंतु यह संघर्ष उनको और ज्यादा क्या कहेंगे कि यह रिएक्शनरी नेगेटिव बना देता है। तो संघर्ष इटसेल्फ इज नॉट इनफ। साधन अगेन लोग स्वामी ठाकुर कहते हैं ना कोलकाता में लोग लाखों लाखों जप कर लेते हैं। तो ऐसे लाखों जप करने से ऐसा कुछ होने वाला नहीं है। त्याग तो चाहिए ही किंतु संघर्ष इज अ व्हीकल फॉर त्याग। ये जो हमने डिस्कस किया था जब हम वलनेरेबल होते हैं उस समय हमारे पास में ऑप्शन आते हैं कि एक असत का सहारा लेकर के हम अपने को कुछ अच्छा करने का प्रयास करें। उस समय इस रेजिस्टेंस को आप उसके सामने बच पाएंगे तो फिर क्या है ना कि काम कांचन का जो यह है आकर्षण वो तो फिर छोटा हो जाएगा उसके सामने। सो ये त्याग को बढ़ाने का भी ये संघर्ष एक रास्ता है।

प्रश्न: इर्षा, संदेह, अभिमान हम मे भी है और राजा महाराज, निवेदिता में भी था. किन्तु वे इसे पार कर गए और आत्म-समर्पण कर पाए. हमारे साथ ऐसा क्यों नहीं होता? हम क्यों इसे पार नहीं कर पाते?

अब जैसे हमने उस दिन डिस्कस किया था एक तो एक हेल्दी अस्मिता होनी चाहिए। राइट? किंतु अस्मिता के साथ में आपको डिसोसिएशन करना होगा। एक वलनेरेबिलिटी का पीरियड स्टार्ट होगा। तो यह एक बहुत बड़ी बात है कि उन्होंने अपना ईगो है, अपनी अस्मिता है। उससे कॉन्शियसली अपने को सेपरेट करने का प्रयास किया है। और जब यह वनरेबिलिटी स्टार्ट हुई है तो फिर उन्होंने कोई नेगेटिव रास्ता का इस्तेमाल नहीं किया। अभी राजा महाराज चाहते तो ईर्षालु हो ही सकते थे। भले ही चाहे वो बाद में वो ठीक हो गया किंतु वो दूसरा रास्ता भी इस्तेमाल कर सकते थे। ईर्ष्या के रास्ते पे पूरा जीवन चल सकते थे। निवेदिता के साथ में निवेदिता चाहती तो फिर वह प्रोफेसर गेडेस के साथ में रह जाती और वैसे भी शी वाज़ वेरी टैलेंटेड। तो वो फिर जो वनरेबिलिटी का जो पीरियड इन्होंने सामने से चूज़ किया था। वो कभी चूज़ नहीं करते। यह एक बहुत बड़ा सैक्रिफाइस है कि मैं अपने को वनरेबल बना रहा हूं। यह अपना इवोल्यूशन है। वह हमेशा हमको सेल्फ डिफेंस करने के लिए कहता है। यह सेल्फ डिफेंस हमारे डीएनए तक प्रवेश कर गया है। किंतु सेल्फ डिफेंस नहीं करना यह कितनी बड़ी बात है जो ठाकुर इस वो कहानी में कहते हैं कि ब्रह्मचारी साहब को क्या कहता है कि तुमने अपने आत्मरक्षा क्यों नहीं की? तुमको अपनी आत्मरक्षा के लिए फूंक ये फूंस तो करना था। ये फूंक फुंकारा तो करना था। किंतु साथ-साथ में ठाकुर क्या कहते हैं? साधु को वो भी नहीं करना है। यानी कि साधक जो है उसको आत्मरक्षा नहीं करनी। आत्मरक्षा करने की कैपेसिटी है। फिर भी अपने को जानबूझकर के वलनेरेबल बना के रखना है। तो यह एक सबसे बड़ा लेसन है। जो लोग रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा के साथ में जुड़े हैं। यदि अपने को वनरेबल बनाने की कैपेसिटी नहीं तो हम लोग साधना में ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाएंगे। सब समय ढाल तलवार लेकर के अस्मिता रूपी खड़े रहेंगे। जो कोई भी मुझे कभी भी कुछ भी प्रॉब्लम होगा मैं जी जान से उसका म फाइट करने को तैयार रहूंगा। तो यह अस्मिता रूपी ढाल तलवार और यह आत्मश्रद्धा रूपी ढाल तलवार यह हम बहुत ज्यादा कंफ्यूजन कर देते हैं इन दोनों के बीच में। बहुत सारे साधक ऐसा सोचते हैं कि मेरे में आत्मश्रद्धा है बोलकर के मैं कभी वनरेबल नहीं होऊंगा। वो आत्मश्रद्धा है ही नहीं। वो वही जो अस्मिता जो आपके पूर्वाश्रम में थी आपने वही अस्मिता को आपने इस आश्रम में साधक आश्रम में साधन आश्रम में कैरी फॉरवर्ड करके ले आए हैं। फर्स्ट वी हैव टू बिकम वनरेबल। फर्स्ट वी हैव टू ले डाउन आवर आर्म्स। फर्स्ट वी हैव टू सरेंडर टू गॉड। और फिर जो यह वनरेबिलिटी का पीरियड स्टार्ट होगा तो वह हमको एकदम माने खींच लेना पड़ेगा। स्वामी जी चाहते मां पिताजी का पिताजी के देहांत के बाद में चाहते तो वह कहीं वह गया में एक जमींदार के वहां पर उसकी एसेंट में मैनेजर का काम मिल रहा था। वहां पर जाकर के स्वामी जी नौकरी कर सकते थे। स्वामी जी जैसे टैलेंटेड विद्यासागर की स्कूल में जब उनको टीचर का जॉब मिला तो वे विद्यासागर का जमाई स्वामी जी से इरशा कर रहा है। जाकर के विद्यासागर के साथ में कंप्लेन कर रहा है। अभी स्वामी जी की इतनी तो टैलेंट और कैपेसिटी थी कि ऐसे हजार जमाई को भगा दे वहां से। इतनी पॉलिटिक्स करने की भी क्षमता थी, इतना झगड़ने की भी क्षमता थी। किंतु फिर भी स्वामी जी ने झगड़ा नहीं करके अपने को वनरेबल रखा। कहा भले यदि विपरीत परिस्थिति है तो मैं यहां से चला जाता हूं। मैं फाइट नहीं करता हूं। फाइट कहां करनी है? जो महत उद्देश्य के लिए जो फाइट करनी है वह फाइट करेंगे। अब अब जैसे देखिए ना यह जमाई के साथ में फाइट कर सकते थे। नहीं की क्योंकि उससे अपनी खुद का यह बेनिफिट होने वाला था। जबकि वह ट्रेन में जा रहे टिकट चेकर कहता है वह गोरा आदमी कहता है कि आपको राइट नहीं है एक काले आदमी को यह कंपार्टमेंट में फर्स्ट क्लास में बैठने का तो स्वामी जी ने फाइट कर ली वो देश के लिए फाइट कर रहे थे एक महत उद्देश्य के लिए फाइट कर रहे थे तो फाइट करने की कैपेसिटी नहीं थी ऐसा नहीं किंतु अपने पर्सनल बेनिफिट के लिए फाइट नहीं करेंगे महत उद्देश्य के लिए करेंगे फेस द ब्रूट यह स्वामी जी को पता है फेस द ब्रूट वो क्यों नहीं फेस द जमाई कर दिया किंतु वो नहीं करेंगे सो दैट्स कि कहां पे अपने को वनरेबल बनाना है यह इनको पता था। निवेदिता भी चाहे तो कुछ भी कर सकती थी। इतनी टैलेंट थी। ऑलरेडी शी वाज़ अ स्कूल टीचर तो नहीं। अब ये राजा महाराज जमींदार के लड़के हैं। पिताजी के पास वापस चले जाते। बढ़िया मजे से जीवन गुजारते हैं। क्यों उन्होंने पूरा संघर्ष करके फिर से ठाकुर के पास आए। सो उन लोगों ने सबने पर्सनल बेनिफिट के लिए कुछ नहीं करेंगे। ढाल तलवार रख देंगे। अस्मिता का त्याग करेंगे। व्नरेबल होंगे। यह वनरेबिलिटी के पीरियड में अपना कुछ भी प्राप्त करने के लिए कोई भी शॉर्टकट नहीं आजमाएंगे। दैट इज द सीक्रेट ऑफ सक्सेस। इसको इसको इवोल्यूशन की लैंग्वेज में कहते हैं फाइट और फ्लाइट रिस्पांस। यानी जब चैलेंज आती है तो हम इंस्टिंक्टिवली यदि हमको लगता है कि जो हमको चैलेंज कर रहा है हमसे कमजोर है। इंस्टिंक्टिवली फाइट करेंगे। और ऐसा लग रहा है कि चैलेंज करने वाला हमारे से ज्यादा पावरफुल है। हम इंस्टिंक्टिवली फ्लाइट करेंगे यानी कि भाग जाएंगे। तो ये फाइट और फ्लाइट रिस्पांस इसको कहते हैं। वो स्प्लिट सेकंड में वो होता है। रास्ते से चल रहे गाड़ी आ रही जोर से हम एक सेकंड भी नहीं सोचेंगे। अपना ये जो प्रिमिटिव ब्रेन जो है इट विल टेक ओवर। फट करके हमारा शरीर जंप लगा के वहां चला जाएगा दूसरी ओर। हमको पता भी नहीं चलेगा कि मैंने यह कब डिसीजन लिया जंप लगाने का। क्योंकि यह जो हायर ब्रेन है और यह प्रिमिटिव लोअर ब्रेन है। तो यह फाइट और फ्लाइट रिस्पांस सर्वाइवल इंस्टिंक्ट यह सब अपने लोअर ब्रेन के भीतर में है। जो कि करोड़ों साल पहले वो इवोल्यूशन ने उसको डेवलप किया है। तो ये हायर ब्रेन है सीट ऑफ स्पिरिचुअलिटी सीट ऑफ फिलॉसोफी। किंतु उसको टेक ओवर करने में थोड़ा टाइम लगता है। जब इंस्टेंट जब आ जाएगा सामने शेर आ गया तो या तो आप उसको तलवार निकाल के उसको मारे या तो वहां से भागे उस समय फिलॉसोफी स्पिरिचुअलिटी सब हवा हो जाती है। सो टू टेक ओवर दैट लोअर ब्रेन बाय हायर ब्रेन दैट इज स्पिरिचुअलिटी। इसको फाइट और फ्लाइट रिस्पांस कहते हैं। जब भी सामने क्राइसिस आती है तो अपना जो लोअर ब्रेन है इंस्टिंक्टिवली डिसीजन लेता है। यह इंस्टिंक्ट जो है ना अपने बॉडी अपने पूरे बॉडी को इंस्टिंक्ट ही चलाता है। जैसे अपना रेस्पिरेटरी सिस्टम है। जैसे अपना यह कार्डियोवस्कुलर सिस्टम है। जैसे अपना यह नर्वस सिस्टम है। जैसे अपना यह ब्लड सर्कुलेशन सिस्टम है। स्वामी जी कहते हैं कि हमको लगता है कि यह इंस्टिंक्ट अपने से काम कर रहा है। किंतु आप प्राणायाम करेंगे। यह प्राण के विज्ञान को समझेंगे तो यह इंस्टिटक्टिव जो ऑपरेशन है यह वह सब ऑपरेशन को आप अपने कंट्रोल में ला सकते हैं। सांस रोक सकते हैं। आप अपने हृदय का ये धड़कन को रोक सकते हैं। यानी कि हायर ब्रेन जो है उस ब्रेन की मदद से साधन भजन करके प्राणायाम करके यह लोअर फंक्शनंस जो है इंस्टिंक्टिव फंक्शन है उसके ऊपर आप कंट्रोल प्राप्त कर सकते हैं। यह राजयोग में स्वामी जी हमको कहते हैं। सो ये जो व्हाट इज स्पिरिचुअलिटी? इट्स अ कॉन्क्वेस्ट ऑफ लोअर ब्रेन बाय हायर ब्रेन। ये जो फिलॉसोफिकल ब्रेन है, स्पिरिचुअल ब्रेन है जिसको कि प्री प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स कहते हैं। तो ये प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स में ये सब हायर फंक्शनंस चलते हैं। और यह जो लोअर ब्रेन जो है वो अपनी जो स्पाइनल कॉर्ड है उसके ऊपर में वो बना हुआ है। तो उसका नाम मैं भूल गया। उस समय एक ब्रेन साइंस मैंने वो स्टडी करता था उस समय एमिकडेला एमिकडेला हां एमिगडेला यस एमिकडेला सो ये वो वहां पे रहता है तो क्या है कि इन दोनों के बीच में यह संघर्ष है हमको इंस्टिंक्टिव जो रिएक्शन है उस पे कंट्रोल पाना है दैट इज ट्रू स्पिरिचुअलिटी जिसको कि हम बहुत ही नेगेटिव समझते हैं किंतु आध्यात्मिक जगत में अपना आत्मरक्षण नहीं करना वो जो बहुत ज्यादा कॉम्प्लिकेटेड थिंकिंग करने की जरूरत नहीं। कि वो सांप की कहानी जो है एकदम स्पष्ट है। जो गृहस्थ है ठाकुर कहते हैं कि इवन जो तो सांप तो साधक ही था ना तो साधक के भी दो कैटेगरी होती है। एक जनरल कैटेगरी के साधक को ठाकुर कहते हैं कि आत्मरक्षा करने दूसरों पे पहले तीन कैटेगरी में बांट सकते हैं। एक तो सांप का जो पूर्वा पूर्व स्वरूप था कि लोगों पर आक्रमण करता था तो वह एक कैटेगरी है। फिर वह साधना के क्षेत्र में प्रवेश किया तो लोगों पर आक्रमण नहीं करना है किंतु एटलीस्ट आत्मरक्षा करनी है। वो सेकंड कैटेगरी होगी। फिर आप साधना के गहन हायर लेवल पर प्रवेश करते हैं तो आपको आत्मरक्षा भी नहीं करनी है। तो ये तीन कैटेगरी में अपना जीवन है। देखिए देखिए देखिए इतना कंफ्यूजन कभी नहीं करना है। आप लोग जिस कैटेगरी में हैं एज ऑफ टुडे गृहस्थ आश्रम में रह रहे हैं। आत्मरक्षा करनी है। जो कि ठाकुर ने स्वयं कहा कि यह तो ब्रह्मचारी ने साधु को तो मंत्र दिया था ना। वो तो मंत्र जप कर रहा था। वह तो साधक था। वह तो कोई सामान्य नहीं था। तो उसको भी तो आत्मरक्षा करने को कहा है तो वह तो आत्मरक्षा करनी ही है। आत्मरक्षा कौन नहीं करेगा जो कि अभी पूरा पूरा आध्यात्मिक जीवन को समर्पित है वो नहीं करेगा। सो वो पूरा कैटेगरी ही अलग है। आपको आप उस कैटेगरी में नहीं है कि सब घर बार छोड़कर के पूरा साधना में लगे हैं। सन्यास जीवन में प्रवेश किया है। ऐसा तो नहीं है आपका। जहां जब तक आप गृहस्थ आश्रम में है थोड़ा बहुत आत्मरक्षा कर लेनी है। किंतु याद रखना है कि जब तक आप आत्मरक्षा करते रहेंगे तब तक आप साधक जीवन में बियों्ड वन पॉइंट नहीं जा पाएंगे। किंतु फिर इतना इससे संतुष्टि प्राप्त कर लेनी है। बहुत सारे लोग पूछते हैं कि अच्छा मैं वो कब मुझे ईश्वर दर्शन या तो फिर मन में संतुष्टि होगी। तो क्या है कि आप कितना करते हैं उसके ऊपर में है कि आप कितना प्राप्त होगा। तो दैट सॉर्ट ऑफ आप कहेंगे कि एक्सपेक्टेशन को मैनेज करना आवश्यक है अपने जीवन में। ऐसा एग्जैक्ट ऐसा जयराम भाटी में हुआ था। एग्जैक्टली ऐसा एक लड़का घर छोड़ के चला गया। तो फिर बहुत दिनों के बाद में वह वापस आया। तो अभी गांव की महिलाओं का तो है तो क्यूरियोसिटी होता है। फिर लड़कों के प्रति एक थोड़ा मातृभाव भी होता है। तो बहुत सारी महिलाएं घिर करके उसके आसपास में बैठी है। वो पूछ रही है अरे तुम कहां चले गए थे? क्या किया इतने दिनों तक? तुमको पता नहीं तुम्हारे घर में मां-पिताजी को इतना कष्ट हुआ वगैरह-वगैरह वो बहुत पूरा वो पुराण पूरा जैसा चलता है। चल रहा है। अभी यहां पे मां को पता चला कि वो लड़का चला गया था। अभी वापस आया है। तो मां को भी क्यूरियोसिटी हुआ कि जाकर देखूं तो क्या है? तो मां गई और वहां पर जाकर के खड़ी रहती है कुछ समय तो बिना कुछ बोले देख रही है लड़का कुछ बोल नहीं रहा है इतने जो लेडीज वहां पर बैठे थे प्रश्न वगैरह कर रहे हैं लड़का भी बिल्कुल चुपचाप है कुछ नहीं बोल रहा है मां उस लड़के को देख रही है कुछ समय तक उसको देखा फिर धीरे से पास में गई और धीरे से कहा बेटा तुम साधु हुए हो बहुत अच्छा किया है बहुत अच्छा किया है ऐसा बोल के मां चली आई ओम