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एक्ली देखि की जो वेदांत वर्क्स ठाकुर ने कहा ना कि पहले तो नेती नेती करके पर जाना है और फिर जब आप आध्यात्मिक जीवन के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान हो जाएंगे साधना करते-करते त्याग करते करते तो आपको पता चलेगा कि जिस चीज का जो ब्रह्मण जो है ब्रह्मण जो सच्चितानंद ब्रह्मण का स्वरूप किस तरह से वर्णित किया गया है सत चित आनंद तो वही सत चित आनंद का सब कुछ बना हुआ है यह शरीर मतलब पहले मैं सोचता था यह पंच महाभूत का शरीर में नहीं हूं इसके पीछे में जो मन बुद्धि चित्त अहंकार है वो भी मैं नहीं हूं आई एम समथिंग व्हिच इज बियोंड एवरीथिंग तो वो जो इवन जो बियोंड एवरीथिंग है अभी इती इती करके नीचे आना है ये जो सत मन बुद्धि चित्त अहंकार रूपी जो अंतःकरण है वो भी वही सच्चित आनंद का बना हुआ है पंच महाभूत का शरीर है वो भी वही सच्चित आनंद का बना हुआ है ये घर ये मनब लोग ये मतलब जो कुछ भी बोले यह जो मैं काम कर रहा सब कुछ वही सत् चित आनंद का बना हुआ मास्टर महाशय ने बड़ा ही सुंदर वर्णन किया है कि दक्षिणेश्वर में गए और देखा कि शौक की जन मोमर बना मोम अर्थात की वेक्स ये जो वेक्स के खिलौने है ना वो कभी-कभी हम लोग पहले के अभी तो क्या है मोबाइल और वगैरह अभी की आज की जनरेशन को तो यह सब पता भी नहीं होगा कि अभी खिलोना मतलब डिजिटल टॉय डिजिटल के अलावा कुछ समझते नहीं है पहले हम लोग वो जो मेले में जाते थे तो वो वेक्स का बना हुआ मोंग का बना हुआ वो सब बन वो जो सफर्जन होता था एप्पल होता था वगैरह लेके आते थे तो उस मास्टर महाशय कहते सब कुछ जैसे कि उस वेक्स का बना हुआ बम का बना हुआ अर्थात कि ये जो जो बिल्डिंग है काली मंदिर का ये जो मंदिर है यह जो पेड़ है उदे है गंगा नदी बह रही है ये पंखी जो कलर कर रहे हैं डाल के ऊपर में बैठ के सब कुछ जैसे कि वही सद चत आनंद का बना हुआ है वही अनंत समुंदर यह जो अपने हृदय में है वही चारों ओर प्रवाहित हो रहा है तो यह जो है यह है साधक का जर्नी अभी यह जर्नी हम जब देखेंगे तब हमको यह प्रश्न होगा कि एक्चुअली हम क्या रिनाउंस करते हैं ये जो जिसने अंतिम पा जिसको कि हम स्थित प्रज्ञ कहेंगे जद गीता की भाषा में वेदा की भाषा में जिसको हम जीवन मुक्त कहेंगे इस जीवन मुक्त या स्थित प्रज्ञ और यह जो सामान्य साधक या तो सामान्य आदमी है जैसे कि हम हम में और उसमें फर्क क्या है वो वो सब कुछ करता है जोक हम करते हैं ठाकुर का ही जीवन ले लीजिए स्वामी जी का ही जीवन ले लीजिए मैं जब नया नया आया था एक साधु के साथ मेरी बात हो रही है तो वो साधु वैसे काफी लर्नेट है व आर्टिकल वगैरह बहुत कुछ लिखते हैं तो साधु अपने खुद के बारे में बता रहे हैं कि उन्होंने जब पहली पहली बार स्वामी जी के लेटर्स पढ़ने शुरू किए और जितना इंटीमस यह शब्द वैसे ठीक नहीं होगा यूज करना किंतु इन व्यू ऑफ एनी अदर वर्ड कि कितना क्लोज स्वामी जी का रिलेशन निवेदिता के साथ में है जोसेफाइन मैक्लाउड के साथ में है और फिर यह जो मिसेस एसप्रो वो जब कैलिफोर्निया गए थे उनके उनके साथ में एक ही घर में रहते हैं व मैंने वो महाराज जी कहते है जिनके साथ में मेरी बात हो रही थी वो कहते हैं कि मेरा फर्स्ट इंप्रेशन है कि स्वामी जी जो बोलते हैं क्या उन्होंने खुद उसका पालन किया है क्या अब जब नए नए जब हम आते हैं हमको महिमा पता नहीं होती है ठाकुर मा स्वामी जी की जैसे योगानंद जी महाराज योगानंद जी ने देखा कि ठाकुर रात को अपने कमरे में न कीी है तो उनको बड़ा ही संशय हो गया वैसे तो ठाकुर कामिनी काचन की त्याग करने की बात करते हैं रात को क्या अपनी पत्नी के साथ में जाकर सोते हैं क्या वो जाकर के नौबत के सामने खड़े हो गए फिर आज देखा कि ठाकुर तो ौ ददा से वो आ रहे हैं जहां पे श के लिए गए थे ठाकुर ने देख कर के समझ लिए बोला कि साधु के दिने देख ई रात्र देख तब साधु को भरोसा करनी तो साधु को दिन को देखो रात को देखो फिर साधू में भरोसा करो तो ये महाराज जी मुझे बोल रहे है कि स्वामी जी पे एक समय उनको शुरू शुरू में एक इस तरह का संशय हो गया था कि इतना क्लोज जद आप किसी के साथ में रहते हैं और मन थोड़ा सा भी विचित ना हो ये क्या हो सकता है इस हमने तो ह्यूमन नेचर देखा है तो देखिए कि हम जो कि सामान्य साधक है और ठाकुर मा स्वामी जी वो जिस कक्षा में पहुंच गए निर्विकल्प समाधि से उतर कर के वो जिस तरह से जगत में रह रहे हम में और उनमें फर्क क्या है वो लोग तो वो सब कुछ करते हैं जो कि हम करते हैं स्वामी जी ने जैसे आपने ही कहा था कि साधुओं को क्या उद्देश दिया कि एक क्षण तुमको मंदिर में बैठ कर के गीता व्याख्या करने के लिए तैयार रहना है दूसरी ही क्षण आदेश मिले तो यह जो खेत है खेत में खुदाई करने के लिए बीच बोने के लिए उसके लिए भी तुम लोगों को तैयार र है तो यह जो यह तो हम लोग भी करते हैं एक आम किसान भी करेगा एक सामान्य जो वक्ता होगा आजकल मोटिवेशनल स्पीकर्स का कोई कमी नहीं है तो कोई भी मोटिवेशनल स्पीकर आज गीता को लेकर के 10 15 श्लोक मुख करके बीच-बीच में वो बोलता रहता है लोगों को इंप्रेस करने के लिए तो यह मोटिवेशनल स्पीकर कहो कि एक आम किसान कहो उसमें और उन लोगों में जो कि निर्विकल्प समाधि से लौट के आ गए फर्क क्या है लोग वो सब कुछ कर रहे हैं जोक हम करते हैं किंतु डिफरेंस है कि भीतर में से सोने का हो गया है जैसे कि तोतापुरी ने ठाकुर को कहा कि यह पीतल का लोटा है उसको रोज-रोज घिसना पड़ेगा तभी कहीं जाकर के यह स्वच्छ रहेगा तो ठाकुर ने कितना सुंदर उत्तर दिया कि पीतल यदि सोना हो जाता है परश मण स्पर्श करके तो क्या उसको प्रतिदिन धोने की आवश्यकता रहेगी नहीं रहेंगे तो यह जो है अपनी साधना एक्चुअली क्या है ये भीतर का त्याग यह कामिनी कांचन या तो फिर यह काम क्रोध मद लोभ मोह मत्सर जो कि शड रिकु कहे जाते हैं वेदांत में इसका त्याग करना है या तो फिर योग शास्त्र में जिसको पंच क्लेश कहा गया है अविद्या अस्मिता राग द्वेष और अभिनिवेश इसका त्याग करना है और यह त्याग करके किंतु जब हम त्याग कर रहे हैं हमको पता है कि मैं जो काम कर रहा हूं ना वो यह काम मुझे घमंड या तो अहंकार देगा ही देगा अभी मैं वहां पर एडिटर था अभी एडिटर होने का घमंड ना आए ऐसा हो ही नहीं सकता है हम लोग तो आम आदमी है तो अभी क्या करना है वो घमंड त्याग करने के लिए एडिटर शिप त्याग करनी है हालाकि मैंने की है ट इ अनदर मैटर दूसरे रीजन किंतु ट वो त्याग करने से नहीं होगा ऐसा करेंगे तो देखिए शुरू शुरू में यह भी करना पड़ता है सन्यास का रास्ता क्या है सन्यास का रास्ता कि जो चीज हमारे मन में यह विकृत विकृत तो नहीं कहेंगे किंतु यह जो संसार की ओर ले जाने वाली या तो यह भी नहीं कहेंगे बेटर वर्ड होगा कि कर्म के बंधन में डालने वाली जो भी क्रियाएं है उसको त्याग करें क्योंकि तभी तो हम इसके साथ में एसोसिएटेड इमोशंस को त्याग कर पाएंगे यदि मैं एक बहुत बड़ा ऑफिसर हूं और मुझे चा अभी आजकल तो क्या है ऑफिसर की ऐसी कोई कीमत नहीं है आजकल तो वो सी होते हैं टेक सीओ उन सबकी कीमत है किंतु मान लीजिए कि बहुत बड़ा एक आदमी हूं जिसका समाज में बड़ी प्रतिष्ठा है तो अभी में प्रतिष्ठा का मोह छुड़ाने के लिए मैं मानसिक तपस्या कर सकता मैं ऐसा कर सकता हूं कि मन से सब कुछ त्याग करो मन से इसको छोड़ दो कि ना जो मुझे रिस्पेक्ट मिल रहा है यह पंचमहाभूत के शरीर को मिल रहा है कथामृत में ठाकुर का वर्णन है कि कुछ लोग वहां पे गए थे वो भास्करानंद जी के वहां पर ना कि वो वहां पर वो काशी में जो वो है वो देखा कि ठाकुर का फोटो वहां पर दीवाल पर टंगा हुआ है अभी वो जो तैलंग स्वामी थे कि भास्करानंद जी थे दो में से एक में एकट नाम भूल गया तो उनके वहां पर दीवाल प वो फोटो टंगा हुआ था तो ब्राह्मण समाज ने आ कर के दक्षिणेश्वर में ठाकुर को कहा कि महाशय हम हम देख कर के आए कि उनकी कुटिया में आपका फोटो टन रहा है माने कि आप आपका इतना रिस्पेक्ट है वहां प तो ठाकुर ने क्या कहा ल् यानी कि ये बाह्य आवरण ये बाह्य आवरण का फोटो वहां पे टन रहा है मेरा फोटो नहीं है वहां पे मैं तो मां का लड़ मैं तो मां का संतान हूं मेरा फोटो क्या मां का फोटो रखो या तो फिर बाह आवरण का रखो तो देखिए कि जद मैं मानसिक तपस्या करके अपने मन से सब कुछ त्याग करके जदी प्रतिष्ठा के बीच में रहते हुए भी जैसे कि कमल ये कादो में खिलता है किंतु फिर भी उससे लिप्त नहीं होता इस तरह से यदि रह पाऊ तो अच्छा है किंतु देखिए कि ठाकुर के खुद के जीवन में हमने देखा कि ठाकुर ने जो चीज का त्याग करते हैं वह सिर्फ मानसिक त्याग नहीं किया उन्होंने शारीरिक त्याग किया है यह शच एक है कि जो लोग ब्राह्मण परिवार में जन्म लेते हैं जैसे कि यह नलिनी दीदी है मां की वह पति जीी उसका वह शची भाई शची भाई एक बंगाली शब्द है उसका एकट क्या करेंगे अभी हिंदी में मने एक मने मने जो भी कुछ भी चीज को स्पर्श कर लिया तो मैंने कि ये हो गए वो मतलब भी स्नान करना पड़ेगा तो अभी ये नलिनी दीदी एक बार कहती है कि मैं मैं तो जब भी एक दिन क्या हुआ वो रात को कहीं से आई करके किसी काम के लिए गई होंगी विष्ठा को स्पर्श हो गया अभी तो वो घर में जाने से पहले स्नान करना पड़ेगा किंतु अभी क्या करेंगे कि इतना ठंडी है और अभी यदि स्नान करेंगे तो ठंडी लग जाएगी बीमार हो जाएंगे ये तो बहुत सीरियस डर है उनको तो वो मां के कमरे के सामने बैठ कर के रो रही है कि मां अभी मैं क्या करूं अभी मुझे स्नान किए बिना घर में भी नहीं जा सकती और जद स्नान करूंगी तो मैं बीमार हो जाऊंगी तो मां ने कहा अरे इतना सब क्या टेंशन लेना थोड़ा सा गंगाजल स्पर्श कर दो ये अभी नलिनी दीदी ऐसा उनका टेंपरेचर है टेंपरामेंट है और जद वो जो कुछ लोग लेकर कुछ आते हैं ना सब्जी वगैरह वो बेचने के लिए आते हैं तो बंगाल में गोम बोल कर के एक जाति है जिनको की उस समय में उनको निम्न जाति का गिना जाता था अभी डोम कुछ स्पर्श कर देगा ब्राह्मण के घर में तो फिर वो जगह को धोना पड़ेगा ये वो ऐसा सब नाटक करना चलता था उस समय में तो ऐसे ही एक डोम आया और मां के घर के वो जो बराता में कुछ चीजें रखी तो भा बड़े अभी उसको पता है कि किस तरह से यह ब्राह्मण लोगों का कुछ कुछ परिवारों का है तो बड़े ही जत्न पूर्वक दूर खड़े रहकर एक हाथ लंबा करके उसने इस बरामे में ची को रखा बड़ा ही केयरफुल कि उसका हाथ रामदे को स्पर्श ना हो जाए मां के घर को स्पर्श ना हो जाए अब मां को फर्क नहीं पड़ता किंतु वो नली नहीं दीदी बड़े ध्यान से देख रही है और जैसे ही उसने वो चीज रखी वो एकदम जोर से चिल्ला उठी अरे ये जो स्पर्श हो गया ये स्पर्श हो गया अभी सब कुछ धोना पड़ेगा सब कुछ धोना पड़ेगा ऐसा जोर से चिल्लाने लगी बोली कि तुम डोम हो कर के तुम्हारा साहस कैसे हुआ इसको स्पर्श करने का ये वो और डंग बेचारा इतना डर गया कि अरे ये ब्राह्मण लोग नाराज हो गए अभी क्या होगा तो मां ने फिर उसको ठंडा किया भाई तो ऐसा कुछ नहीं तो वैसे वो डोम को साल दोना दी उसको प्रसाद वगैरह दिया अभी ये नलिनी दीदी क्या कहती है पता है कि ये जो स्पर्श करके अशुभ चीज को स्पर्श करके ये स्नान करना ये वो करना मां का कुछ नहीं है मां तो जद बाहर से भी आएगी तो वैसे ही अपने पैरों को बिना धोए बिना स्नान किए घर में चली आएगी माने वो कंप्लेन करती है मां के बारे में और जिस दिन मां कहेगी कि बेटा थोड़ा सा गंगाजल लाओ तो उस दिन हमको समझना है पक्का कि माने को स्पर्श किया है इसलिए गंगाजल मांग रही है तो देखिए कि ये जो ब्राह्मण लोगों में उस समय के खास एक कुछ एक छोटे से वर्ग में इस तरह का बड़ा इसको स्पर्श नहीं करना उसको स्पर्श नहीं करना तो ये जो जाति अभिमान जो होता है ब्राह्मण होने का अभिमान अभी ठाकुर ने इसको कैसे त्याग किया ठाकुर ने ऐसा मन से मन से सोचा कि नहीं मैं ब्राह्मण मैंने अच्छा एक तो चीज किया ठाकुर ने वो जो यज्ञ पवित्र उता उठ करके फेंक दिया और हृदय बड़ा नाराज हो गया था बोल रहा है कि अरे मामा आपने यज्ञो पवित्र फेंक दिया कितने जन्मों के पुण्य से ब्रामीण शरीर धारण होता है ब्राह्मण शरीर प्राप्त होता है और आपने ये साहस किया यज्ञो पवित्र फेंक दिया तो ऑलरेडी ये तो यज्ञो पवित्र निकाल दिया छोटी सी चीज अपनी दृष्टि में आज वो इतनी बड़ी दिखती थी उन लोगों को तो ठाकुर ने किस हद तक गए अपने भीतर से ये जो शची वाई बंगाली शब्द है ये जो छुआछूत इसको निकालने के लिए वो जो रसिक मेहतर था उसका जो टॉयलेट था अपने बालों से साफ किया अभी ये पैसों का मोह छोड़ना है तो हमने जैसे हम लोग जो है मेंटली सोचेंगे अरे भाई पैसा क्या है पैसा तो आता रहेगा जाता रहेगा ठाकुर ने क्या किया पैसा हाथ में लेकर के गंगा में फेंकना शुरू किया कि टाका माटी माटी टाका हालांकि ठाकुर का प्रैक्टिकल सेंस भी बड़ा है बाद में कह दिया कि जद मा लक्ष्मी नाराज ना हो जाए इसलिए कहा कि मेरे हृदय में रहो वो प्रैक्टिकल सेंस भी था किंतु एटलीस्ट उन्होंने फिजिकल त्याग किया तो ये जो कि हम लोग मैं जब लीला प्रसंग पढ़ रहा था ना तो यह बात मुझे बार-बार मन में आती थी कि ठाकुर इस एक्सट्रीम तक क्यों जाते हैं त्याग करने के लिए मतलब फिजिकली उसको त्याग करना ही है मन में ऐसी इच्छा हुई कि जरी वाले कपड़े पहनेंगे और बड़ा सा वो जो वो सिल्वर वाला वो ये कुक्का होगा उसमें वो कुक्का पिएंगे और गद्दी पे तकिए पे बैठेंगे बढ़िया मजे से ऐसी एक वासना ठाकुर के मन में प्रकट हुई तो ठाकुर के मन में जैसी वासना प्रकट हुई बाबू ने सब कुछ जुगाड़ करके रख दिया ठाकुर ने वो जरी वाले कपड़े भी पहने जोक उस समय के जमींदार राजा लोग पहना करते थे वो जो वो जो सिलवर का जो नल होता है ऐसे पक्के में वो जो पुक्का भी पिया सब कुछ किया फिर आखिर में बोला कि मन से त्याग ये जो मैंने मन की वासना थी वो वासना पूरी हो गई तब ठाकुर ने क्या किया वो कपड़ा फेंका और उसके ऊपर में जोर-जोर से पैर मारने लगे तो अी इतना महंगा कपड़ा है आप तो सिरत उतार करके दे सकते थे कि भाई चलो हो गई मन की वासना पूरी क तो ये नहीं उसको पूरा पेर से उसको रगड़ दिया मथुर बाबू भी देख रहे है बोल रहे है सबको कि जो करते हैं उनको करने दो छोटा बटा चाज महाश का वैसा ही जैसे मुड़ में आते हैं उनको करने देना है तो ये जो एक्सट्रीम लेवल प जाते हैं ठाकुर त्याग करने के लिए सिर्फ मन से सोचते नहीं है कि मुझे यह छोड़ना है वो छोड़ना है फिजिकली करते हैं तो देखिए कि अभी यदि हम इस दृष्टिकोण से अब साधक की देखे पूरी जर्नी तो यदि कोई उच्च कक्षा का साधक होगा जिसको कि अपने बहुत बड़ा उसको यह है भरोसा है तो वह संसार में भी रह कर के मन से सब चीजों का त्याग करेगा कि मुझे जो प्रतिष्ठा मिल रही है वो भी इस पंचमहाभूत के शरीर को मिल रही है यदि वह घर में पत्नी के साथ में रहता है या पति के साथ में रहता है तो वो मने ये जो कुछ भी है वो मुझे स्पर्श नहीं करता मैं यहां पर जैसे कि मेहमान की तरह रह रहा हूं जैसे कि मास्टर महाशय का था वह जब अपनी स्कूल में से जाएंगे अपने घर तो कहेंगे कि एकत के घर जा रहा तो वो एक भक्त कौन यानी कि उनका खुद का घर व वो जो एक डिसोसिएशन बना देना है अपने को इस शरीर के से वो यदि कर पाए तो हम सब कुछ चीजों से घिरे रह कर के भी त्याग कर सकते हैं और फिर जब सर्वोच्च शिखर पर पहुंच जाए जाएंगे निर्विकल्प समाधि प्राप्त होगी या ऐसा कुछ प्राप्त होगा तब फिर भी हम वही कर रहे हैं जो कि पहले करते थे किंतु पहले हम मेहनत करके त्याग करते थे बाद में त्याग सहज हो जाता है ठाकुर ने कहा कि साधक बेताले पाक कोनो पड़े ना जो कि सही सही परमहंस है गलती से भी गलती नहीं कर पाएंगे तो ये तो हो गया कि एक आइडियल सिचुएशन किंतु हमको पता है कि इस आइडियल सिचुएशन हमारे साथ में होती नहीं हमको यदि त्याग करना होगा तो ठाकुर ने खुद ने बताया है कि फिजिकली तो थोड़ा सा तो त्याग करना होगा तब कहीं जाकर के उसके साथ में एसोसिएटेड इमोशन से उसको हम छोड़ पाए तो अभी मुझे पैसों का त्याग करना है तो सिर्फ मन से बोल कर के कि मैं मुझे पैसों से कोई लेना देना नहीं है यह वो ऐसा नहीं पैसों का सही सही त्याग करो फिर यह जो भावना दृढ़ हो जाए एक बार मन में कि नहीं पैसा से मेरा कोई लेना दे ना नहीं मैं पैसों से मतलब निर्लिप्त हूं तब कहीं जाकर के पूरा साइकिल रिवर्स करो फिर तुम पैसों के साथ में रहो जैसे कि राम कृष्ण मिशन आज आज राम कृष्ण मिशन के पास में ज्यादातर डिवटी के पास में जितना रुपया है उससे ज्यादा डोनेशन राम कृष्ण मिशन में आता है किंतु बात यह है पक्का कि मैं जब राजकोट से निकला तो एक बैग लेकर के निकला था वो जितना भी पब्लिकेशन का वो जो पाछ करोड़ का पब्लिकेशन 10 12 करोड़ का वो सब कुछ वहीं का वही रख कर के आया तो हमारा वो नहीं है उसके साथ में कोई लेना दे किंतु फिजिकली त्याग करना पड़ेगा शुरू में क्योंकि तभी तो यह भावना दृढ़ होगी क्यों क्योंकि हम लोग वो सर्वोच्च उत्तम अधिकारी नहीं है कि जो कि मन से ही त्याग करके सब कुछ छोड़ दे तो हम लोग यदि अपने को मध्यम या निम्न अधिकारी समझते हैं थोड़ा सा फिजिकल त्याग करना पड़ेगा फिर यह त्याग की भावना दृढ़ हो जाएगी तब कहीं जाकर के हम फिर से उसी चीज को अपनाएंगे किंतु उस समय उस चीज के साथ में अप रिलेशन नहीं रहेगा तो आइडिया ने स्पिक बॉटम लाइन क्या है कि चीज का त्याग करना अपने आप में कोई फैक्टर नहीं है बात ये कि उसके एसोसिएटेड जो इमोशंस है उसका त्याग करना यदि आप मेंटली कर पाए तो बहुत अच्छा है मेंटली ना कर पाए तो फिजिकली कुछ समय के लिए ठाकुर कहते हैं ना कि मने वने और पने मन में वन में और किसी कमरे की कोने में जाकर के बीच-बीच में त्याग कर लेना चाहिए तो यह फिजिकल त्याग का महिमा तब आता है किंतु अल्टीमेटली देखिए कि हाईएस्ट सिचुएशन क्या है अपना वेदांत क्या कहता है वो आदमी कि जिसने सब कुछ त्याग करके वन में चला गया है या तो फिर वो जो कि सभी चीजों के बीच में रह रहा है किंतु कुछ भी उसको स्पर्श नहीं अपना वेदांत बड़ा क्लियर है कि ब्रह्मण जिस चीज सत चित आनंदमय जो गुण है व संसार भी सत चित आनंद का ही बना हुआ है जब भगवान राम को त्याग करना था तो वशिष्ठ को बुलाया गया वो जैसे वो टेररिस्ट आ जाता है तो वो हवालदार से नहीं होता वो आपको एनएस जी को बुलाना पड़ता है तो भगवान राम का त्याग उस लेवल का है व माताजी पिताजी उनको समझा नहीं पाएंगे वो वशिष्ठ को बुलाया गया तो वशिष्ठ ने आ कर के कहा कि अच्छा आप बताइए कि कौन सी चीज का आप त्याग करेंगे संसार में ऐसा क्या है जो कि ब्रह्मण के अलावा कुछ बना हुआ है कि जिसका आप त्याग करेंगे तो भगवान राम ने सोचा सब कुछ जद ब्राह्मण का बना हुआ है तो करके वन में जाने से क्या लाभ है व यहां पर भी रह कर के मैं वही प्रमा आनु भूति कर सकता हूं तो यह आइडियल है अपना कि सब कुछ चीजों से घिरे रहे किंतु कुछ भी हमको स्पर्श ना हो किंतु वहां तक जाने का रास्ता है वो दो रास्ते है एक तो है कि सर्वोच्च रास्ता जहां पर हम मानसिक रूप से त्याग करें और दूसरा है मध्यम या निम्न कक्षा का रास्ता जहां पर हम फिजिकली एक बार त्याग कर दे और फिर प्रयास करें कि धीरे-धीरे करके उसके साथ एस मेंटल जो यह है वो भी धीरे-धीरे चला जाए यदि इस दृष्टि से देखेंगे तो संसारी का जो रास्ता है वो सन्यासी के रास्ते से ज्यादा कठिन है यदि आप सही सही साधक है और जद संसार में रहते हैं तो संसारी का रास्ता साधन के संन्यासी के रास्ते से बड़ा कठिन है क्योंकि संन्यासी ने एक बार फिजिकली त्याग कर दिया तो टेंटेशन तो आएगा नहीं टेंटेशन आएगा तो फिर उसके साथ में एसोसिएशन होगा छोड़ ही दिया फिजिकली टेंटेशन नहीं होगा और फिर हम उससे धीरे-धीरे करके एक समय आएगा कि मन दृढ़ हो जाए सो दिस इज द लेआउट अभी यह जो पाथ दो हमने डिस्कस किए कि एक तो संसार का रास्ता है जद साधक संसारी संसारी साधक है तो टेंटेशन के बीच में रह कर के भी मन से इन सब चीजों का त्याग करने का प्रयास करेगा और एक सन्यास का रास्ता है च इ बिट इजियर थोड़ा सा इजियर है कि जो चीज हमको टेंटेशन दे रही है उसी चीज का ही त्याग कर फिर अपने मन में त्याग की भावना दृढ़ हो जाए फिर कहीं जाकर के फिर से वो उस चीजों से घेरे रहोगे तो कोई आपत्ति नहीं है ये दो अपने ट्रेडिशनल रास्ते है एक सन्यास का रास्ता और संसार का रास्ता अभी प्रश्न होता है कि स्वामी जी ने जो रास्ता बताया खास करके वो भारत में बताया वो भी अमेरिका में ये नहीं कहा अमेरिका में जो कर्मयोग है उन्होंने बड़ा ही ट्रेडिशनल कर्मयोग का उन्होंने उपदेश दिया है भारत में खास करके आकन के उन्होंने जब यह बात बताई कि साधु होना है यानी त्याग करना है किंतु त्याग करके ट्रेडिशनल सन्यासी की तरह संसार से दूर जाकर के कहीं वन में कहीं जंगल में जाकर के समाधि साधना या तपस्या नहीं करनी इसी संसार में ही रहकर के संसार के उद्धार के लिए प्रयास करना है स्वामी जी ने यह बात क्यों कही अभी बात यह है कि उस समय की जो परिस्थिति थी उस को नजर में रख के स्वामी जी ने यह बात कही है क्योंकि पूरा भारत देश तमस में डूबा हुआ था ये सब अनोर तमस कि जैसे कि यह जो सनातन ऋषियों की यह जो भूमि है वह जैसे कि पूरे पाताल में चली जाएगी नरक में चली जाएगी ऐसी परिस्थिति आ गई थी अभी देखिए ना आजकल की मैंने उस समय की तो बात छोड़ी दीजिए आज की ही बात बताता मेरे एक रिलेटिव के साथ में अभी बात हो रही थी तो उन्होंने अमेरिका वो गए हैं इमीग्रेशन करके मने इमीग्रेशन प ग्रीन कार्ड प तो उन्होंने कहा कि जब वो कॉल आता है वहां से वो जो एंबेसी में से आपका एक इंटरव्यू वगैरह कुछ लेंगे टेलीफोन के ऊपर में उस बहुत सारी प्रोसेस है किंतु टेलीफोन पर इंटरव्यू लेंगे तो टेलीफोन प ऐसा होता है कि आपका लाइन ऑन करके आपको वह कान पर फोन रख के बैठे रहना है कि वह कब वो रा देख के कि वह कब काउंसलर आएगा कब आपको इंटरव्यू लेगा तो उन्होंने मुझे बताया कि उन्होंने तकरीबन सात आ न 10 घंटे तक इस तरह से फोन कान पर रख के राह देखी है कि कब वो काउंसलर आएगा कब उसका इंटरव्यू होगा और कब कहीं जाकर के प्रोसेस आगे बढ़ेगी यह जो अमेरिकन एंबेसी है वहां पर विजा लेने के लिए जो लाइन लगती है वह पूरी लंबी लाइन वह देख कर के ही अभी भी देखिए कि भारत की भूमि किस तरह की है माने इस सब छोटे-छोटे उदाहरण से पता चलता है तो यह जैसे निवेदिता ने कहा कि स्वामी जी पहले ऐसे ऋषि होंगे कि जिन्होंने भारत समग्र भारत में ध्यान किया रदर देन कि ब्राह्मण के ऊपर में हालांकि हमको पता है कि स्वामी जी ने ब्रह्मण पे तो ध्यान किया ही है सत भारत की भूमि प विद्यान के तो वो पार्टिकुलर सिचुएशन जो कि 1893 में स्वामी जी ने देखी 92 93 में और जो कि आज भी बहुत हद तक चल रही है और स्वामी जी ने कहा है कि ये 1500 साल तक चलेगी यानी कि अब हम ऐसा नहीं चाहते कि 1500 साल तक भारत गरीब रहे किंतु ये जो आम आदमी को जो जरूरत है कि लोग आकर के उनकी सेवा करें अभी हमको आजकल बहुत सारे लोग कहते हैं कि देखो कि आजकल तो रिलीफ करने की जरूरत नहीं है गवर्नमेंट रिलीफ करती है यह वो वगैरह आजकल वो पॉवर्टी जैसा कुछ रहा नहीं है हम लोग कल्चरल एक्टिविटी करते हैं मेरा यहां पे कहना है कि देखिए मैं तो गुजरात में था हर जगह प मैंने देखा है सिर्फ एक स्टेट का कहा कि एजुकेशन सिस्टम इतनी करप्ट है कि बच्चों को व टीचर्स को वो जो हजारों हजारों रुप का सैलरी देते हैं उसके सामने बच्चे को एक्चुअली कितना पढ़ाते हैं वो कोई प्रोपोर्शन ही नहीं है तो वो जो इन द फील्ड ऑफ एजुकेशन इन द फील्ड ऑफ मेडिकल साइंस जहां पर की भयानक करप्शन हो रहा है तो यह सब जगहो पर भी आज भी सर्विस की जरूरत है हम लोग कभी भी यह नहीं कह पाएंगे कि अभी भारत में इतना पैसा आ गया है कि सर्विस एक्टिविटी की जरूरत नहीं लेटस वर्क ओनली इन द कल्चरल फील्ड तो ये असेसमेंट गलत होगा स्वामी जी ने खुद ने कहा है कि 1500 साल तक चलेगा 1500 साल तक क्या चले माने ये कल्चरल एक्टिविटी जो कि स्वामी जी ने यहां पर स्टार्ट करके गए थे ऐसा नहीं है कि कल्चरल एक्टिविटी यानी कि विधांत व्याख्यान देना बच्चों में यह वेदांत की शिक्षा देना व सब नहीं होगा किंतु साथ-साथ में सर्विस एक्टिविटी भी जो स्वामी जी स्टार्ट करके गए है वो भी 1500 साल तक रिलेवेंट रहेगी तो यह जो स्पेसिफिक सिचुएशन है भारत की उसके लिए स्वामी जी ने यह मैसेज दिया है कि तमस से पहले तो रजस में जाओ फिर रजस में जाकर रजस में आ गए हो तो साधना करके धीरे-धीरे सत्व की ओर जाओ तो यह जो एक तीसरा रास्ता एक स्वामी जी ने ओपन किया है संसार का रास्ता है कि यदि आप सात्विक है मन से त्याग करते हैं सन्यास का रास्ता है कि जद आप वहां पर भी आपको सात्विक तो होना ही पड़ेगा तभी तो आप सन्यास ले पाएंगे तो सात्विक है और ब्रह्म साधना करते हैं ब्रह्म साक्षात्कार के लिए किंतु यदि आप तामसिक है या तो फिर राजसिक है तो पहले तो तमस में से रजस फिर रजस में से सत्व में आपको आना पड़ेगा तब तो कहीं जाकर के आप ये जो ट्रेडिशनल दो साधनाएं है उसको आप कर पाएंगे तो वो तमस या तो फिर रजस में से सत्व में कैसे आना तो ये तीसरा रास्ता स्वामी जी ने बताया है अभी यह जो रास्ता लोग जिसको कि हम लोग फॉलो कर रहे है सबसे निम्न रास्ता है क्योंकि हमारे भीतर में मैं जब जॉइन करने को गया था तो वही सुहितानंद जी वो सुहितानंद जी हमको को कह रहे थे कि देखो तुम हम सबके भीतर में तमस मिश्रित रजस है तो इसके लिए हम लोगों को सब समय किसी ना किसी काम में मन को रखना पड़ेगा वो मा खुद कहते हैं ना कि मन ना की मतो गुस्ती मन है ना कि पागल हाथी है सब समय काम करके रहना है थोड़ा सा समय भी बिना काम के रहे तो इतनी वासना है इतना कचरा अपने मन में आ जाएगा कि अपने मन को पूरा खत्म करके रख देगा तो ये जो आज की परिस्थिति है तमस मिश्रित रजस या तो फिर रजस मिश्रित तमस उसके लिए यह निष्काम कर्म का बेस्ट रास्ता है निष्काम कर्म करते करते धीरे-धीरे मन जब सत्व की ओर आ जाएगा तब ये जो ट्रेडिशनल साधना का रास्ता है वो हमारे लिए ओपन ये तीसरा रास्ता हो गया है जिसको कि अधिकारी भेद के अनुसार ये जो सब रास्ते होते हैं तो पहले दो ट्रेडिशनल रास्ते थे जबकि हम सत्व में थे उस समय के लिए है और यह तीसरा रास्ता है जब ये तमस और रजस में मिश्रित है उसके लिए है ये जो स्वामी जी उत्तराखंड में गए थे ना एक साधु को देखा वो कंबल ऐसा पूरा सर पे डाल कर के फिर खराटे मार रहा है लोगों को लगेगा कंबल डाल के जम ध्यान कर रहा है खराटे मार रहा है स्वामी जी ने कहा कि इसके कंधे पर लंगल डाल दो लंगल यानी कि वो जो हल होता है ना इसके कंधे पर हल डाल दो हल जोते का तब कहीं जाकर के उसको अधिकारी होगा वो एक लड़का गया स्वामी जी के पास में मैं अपने घर के खिड़की दरवाजे बंद करके ध्यान करने का प्रयास कर रहा हूं किनको होता नहीं है तो स्वामी जी ने क्लासिक उत्तर दिया पहले तो खिड़की दरवाजे खोल दो फिर घर से बाहर आओ फिर जो घर के बगल में जो गरीब लोग बैठे हैं उसकी सेवा करो तब कहीं जा कर के यू विल बी एलिजिबल फॉर मेडिटेशन देखिए जद घर के दरवाजे खिड़की बंद करके आप जग ध्यान कर सकते हैं तो इससे अच्छा कुछ नहीं रे बुद्ध ने क्या किया पूरा राज्य का छोड़ कर के वन में चले गए वो इतना सा अल्प मुट्ठी भर कुछ खाना खाते थे खो ऐसा करके 12 साल तपस्या किया उन्होंने बुद्ध निर्वाण प्राप्त किया बुद्ध पद प्राप्त किया तो हमारे में वो ताकत है क्या हमारे में ताकत है ही नहीं कि वो म इंटेंस तपस्या जो चाहिए खाने पीने में सोचने में बातें करने में व्यवहार में सभी चीजों में एक प्रचंड त्याग हमको दिखे में से प्रकट हो मेरे में तो नहीं है मने आई डोंट नो अबाउट अदर्स मुझे तो यह कर्म करके रहना ही होगा तभी तो कहीं जाकर के मैं अपने मन को एंगेज र पाऊंगा किसी पॉजिटिव निष्काम कर्म में और निष्काम कर्म करने से फायदा यह है कि मैं कर्म करता हूं किंतु मिलता कुछ नहीं है तो फिरने कुछ मिला तो उसका एक लोभ ऐसा भी नहीं है तो निष्काम कर्म परफेक्ट एंटीडोट फॉर दिस डिज ऑफ वर्नेस अल्टीमेटली क्या है ना कि अध्यात्म का क्षेत्र इतना बड़ा है ना कि इसके कोई परफेक्ट आंसर होते नहीं है कि यह परफेक्ट आंसर है दूसरा है कि सभी एक का उत्तर दूसरे का उत्तर नहीं होता है हम लोग जभी भी कुछ भी पढ़ते हैं किसी से कुछ सुनते हैं तो वह हमको एक गाइड पोस्ट की तरह काम करता है यहां पर जाओ यहां पर आपको मिलेगा किंतु फिर उसके आगे फिर और कुछ नहीं जैसे कि सुबोधनंद जी की एक बात मैंने बताई थी शायद एक एक डिवोटा ने लिखा है कि ना सुबोधनंद जी ने ही लिखा है कि वो एक दिन लिखा नहीं कहा है किसी ने लिखा है कि एक दिन उनको ऐसा सपना आया कि उनकी मृत्यु हो गई है मृत्यु हो गई है और वो स्वर्ग के रास्ते प जा रहे हैं तो स्वर्ग के रास्ते प जाते जाते अंतिम मुकाम तक पहुंच गए अभी अंतिम मुकाम तक पहुंचे हैं और उनको पता है कि यह मुकाम जद पार करूंगा ना तो सामने ही ठाकुर मां स्वामी जी है किंतु यदि मैं ठाकुर मा स्वामी जी के पास चला जाऊंगा तो मैं मेरा देह मेरा मन उनमें विलय हो जाएगा फिर मैं वापस नहीं आऊंगा तो उन्होंने क्या सोचा पता है उन्होंने क्या कहा कि वोह कहते हैं कि मैंने ऐसा ठीक किया कि मैं यहां पर खड़ा रहता हूं अंतिम काम तक नहीं जाता हूं थोड़ा सा आगे तक मैं जाकर के खड़ा रहता हूं और खड़ा रहने करके मैं बाकी जो आते है ना यहां पर उनको मैं गाइड करता हूं उनको मैं बताता हूं कि देखो यहां से वहां जाना वहां से व वहां जाना वहां पे ठाकुर है ठाकुर मिलेंगे ऐसा करके सबको गाइड कर रहा है उसमें एक एक डिवोटा थी वो आई अभी वो उनको इनके ऊपर में बड़ी श्रद्धा थी सुबोधा नंद जी के ऊपर में तो वो कहती है कि चलिए आप भी चलिए आप भी चलिए मैं अकेली नहीं जाऊंगी हम दोनों साथ में चलते हैं तो सुबोधा अंद जी ने कहा कि अरे देखो मैं जद जाऊंगा ना तो मैं वापस नहीं आऊंगा संभव नहीं होगा मेरा वापस आना तो फिर भी वो कहती है कि नहीं नहीं हम तो पहले ही साथ में ही जाएंगे तो ठीक है दोनों साथ में गए ठाकुर महा स्वामी जी के पास में और जैसे ही ठाकुर मा स्वामी जी के पास गए सुबोधनंद जी के भीतर में विलीन ज व विलीन हो गए तो डिवटी पूछती है कि अरे सुबोधनंद जी कहां गए तो ठाकुर उत्तर देते हैं अभी सुबोधनंद जी ठाकुर के भीतर में है वो सुन रहे है व सुन र कि ठाकुर उत्तर देते कि अरे वो अभी कहां मिलेगा वो तो भीतर में विलीन हो गया ऐसा होने के बाद में सुधानंद जी का वो सपना टूट गया देखिए जो कुछ भी आप सुनते ऐसा लाइक गाइड पोस्ट आपको वो ले जाएगा यहां तक कि आप को पार करना होगा य विल फाइंड र न आंसर श्री राम