Swami Vivekananda
पिलग्राइमेज पीपल को तू पिंपल्स पीपल स्टडी दिस बुक्स एवरीथिंग दे ट्री तू डू इन दी एक्सटर्नल वर्ल्ड बट स्लोली और ग्रैजुअली व्हेन देवर सर्च मैच्योर व्हेन डर सर्च स्टेज ऑफ सिस्टम और स्पिरिचुअल अटेनमेंट डेट डियर विजन टर्म्स इन वर्ल्ड एस आईटी इस आईएफ डेट वेयर सो क्लोज बिफोर दिस इनर गेट्स ओपन इंटरेस्ट लाइट डिवाइन फ्रॉम इनसाइड स्टार्ट शाइनिंग सो देवर आर तू स्टेज इन अवर स्पिरिचुअल जर्नी डी फर्स्ट स्टेज ऑफ अवर हार्ट आर क्लोज्ड और दिस लाइट टी टी वाइन वे कैन नोट सी फ्रॉम आउटसाइड और देवर इस डी अंदर टेस्ट डेट व्हेन वे रिच इस सर्टेन स्टेज एन स्पिरिचुअल मेच्योरिटी स्पिरिचुअल विजडम और स्पिरिचुअल अटेनमेंट स्लोली और ग्रैजुअली दिस इनसाइड विच इसे मेड ऑफ आज आईएफ इमेजिन डेट देवर इस एन लैंप और आईटी इस लैंप इस पट इनसाइड एन से डेट एन आयरन लाइक कास्ट ऑफ आयरन और से डेट इनसाइड एन वेरी इनसाइड ए कंटेनर विच इसे मेड ऑफ आयरन सो ऑफ कोर्स व्हेन एन कंटेनर व्हेन वे पट इनसाइड ए कंटेनर वे कैन नोट सी डी लाइट बट स्लोली और ग्रैजुअली दिस कंटेनर आईटी टर्स नो आयरन इन थे ग्लास दिस दिस ग्रेजुएट दिस ग्रेजुएशन दिस इवोल्यूशन ऑफ दिस कंटेनर इस फ्रॉम डी आयरन तू ग्लास इस दिस ओवर स्पिरिचुअल जर्नी हर स्वामीजी यूजेस सिमीले तू एक्सप्रेस दिस आइडिया डेट हो ह्यूमन सोल्ड डेवलप सपोज तेरे इस एन लाइट इन मी हार्ट और मी बॉडी इस मेड ऑफ आयरन दें ऑफ कोर्स आई कनॉट सी व्हाट दिस लैंप दिस लाइट फ्रॉम मी हार्ट बट स्लोली और ग्रैजुअली आईएफ मी बॉडी फ्रॉम आयरन आईटी स्टार्टर्स टर्निंग इन ग्लास व्हाट बिल हैपन वे कैन सी एवरीथिंग डेट इस गोइंग ऑन इनसाइड मी हार्ट वे कैन सी एवरीथिंग डेट इस गोइंग ऑन इनसाइड मी बॉडी यू कैन सी डी फंक्शन ऑफ मी हार्ट और अलसो यू कैन सी दिस लाइट दिस लैंप विच इस पट डर विच इस दी लाइट ऑफ दी आत्मा गेट वे कैन सी सो टर्निंग ऑफ अवर बॉडी फ्रॉम आयरन तू ग्लास दिस टर्निंग ऑफ अवर मन फ्रॉम एन संस्कृत संस्कार तू संस्कृत संस्कार दिस लेसनिंग ऑफ डी बर्डन ऑफ अवर कर्मफल्स दिस इवोल्यूशन दिस प्रोग्रेशन इसे आईटी इस कॉल्ड दिस स्पिरिचुअल डेवलपमेंट और स्वामीजी यूजेस वेरी नाइस सिमाइल्स अमेजिंग बाय प्योरिटी और अंसल फिशनेस वीकेंड टेक डी ऑब्सरिंग मीडियम ली इन ली डेंस अंटील एटलस आईटी बीकमस ट्रांसपेरेंट इस ग्लास नो व्हाट इसे दिस ऑब्सरिंग मीडियम आईटी इस अवर एगो दिस आर ओवर बेड संस्कार ओवर शोल्डर रिपोर्ट डिजायर पर सेंशुअल प्लेजेस ईटीसेटरा दिस आर दी डांस मीडियम विच एक्चुअली टॉप्स दी लाइट ऑफ दिस लेंथ फ्रॉम शाइनिंग और डेट इसे वही स्वामीजी सेस व्हेन डी मोर अवर शाद एन रिप्लेस मोर ओवर संस्काराज आर लेसन मोर धी बर्डन ऑफ ओवर कर्म फल दिस बॉडी व्हाट दिस मीडियम इनसाइड विच दिस लैंप इस पट आईटी टर्स इन एन ग्लास श्री रामकृष्ण बाज लाइक डी आयरन क्लास ट्रांसफॉर्म इन एन ग्लास कास्ट थ्रू विच कैन बी सीन डी इनर लाइट इस आईटी इसे सो श्री राम कृष्णस बॉडी वज कंपलीटली मेड ऑफ ग्लास दिस श्री राम कृष्णा मन आईटी वज कंपलीटली ट्रांसपेरेंट कंपलीटली फ्री फ्रॉम अन्य इंपिरिटीज डेट इस वही वे कूद सी डी लाइट शाइनिंग इनसाइड हम सो क्लीयरली
स्वामी विवेकानन्द
यदि ऐसा कहेंगे की ये जो हमारे शरीर के भीतर में हमारे हृदय में यदि एक लैंप रखा है एक दिया रखा है तो हम क्यों देख नहीं सकते इस दिए को क्योंकि मेरा शरीर जो है वो तो सॉलिड है एक वह तो इसके जो हड्डियां हैं मांस है ये सब जो है फ्लैश ये सब चीजों से मेरा शरीर बना हुआ है तो किस तरह से मैं इस शरीर में रखें हुए लैंप है या दिया है इसको देख पाऊंगा किंतु यदि मेरा शरीर जो है धीरे-धीरे कांच शरीर हो जाएगा तो फिर मेरे हृदय में रखा हुआ जो दिया जो है वो आप देख पाएंगे मैं भी देख पाऊंगा यह जो स्वामी जी ये जो एक उदाहरण देते हैं एक एक स्माइल देते हैं तो इसका अर्थ क्या है की यदि हमारे मां के भीतर में भी ईश्वर का प्रकाश है या तो फिर ये आत्मा का प्रकाश है सब समय ये प्रगति ओ पी रहा है किंतु क्या है की हमारा मां जो है ये कम क्रोध मैड लाभ मो बोलकर के जो शाद रिपु है जिसको वेदांत की भाषा में शाद रिपु कहते हैं उसके द्वारा वो जो है उसे एक आवरण के भीतर में वो धक गया है जैसे ही ये आवरण है वो लोहे का आवरण है इस आवरण को अब धीरे-धीरे साधना कर करके ये जब ध्यान ईश्वर प्रणीठण स्मरण मनन निधि हसन ग्रंथ का पाठ है या तो फिर यह जो मंदिर में आरती अटेंड करना है यह सत्संग है वगैरा जो आध्यात्मिक क्रियाएं आध्यात्मिक साधनाएं बताई गई है उसका अनुष्ठान करके धीरे-धीरे लोहे का ये जो ये है एक कंटेनर लोहे का एक एक ऐसा चीज जिसके भीतर लिए लैंप को रखा गया है ये लोहा जो है वो कांच में परिवर्तन होगा और जैसे ही वो कांच में परिवर्तित होगा उसके भीतर का जो यह लैंप है उसका प्रकाश आप बहुत ही आसानी से देख पाएंगे यहां पे स्वामी जी क्या कहते हैं की श्री राम कृष्णा कौन थे श्री राम कृष्णा वो थे जिनके ये जो लोहे का जो आवरण है संपूर्ण रूप से कांच का हो गया था संपूर्ण रूप से ट्रांसपेरेंट हो गया था इसीलिए श्री रामकृष्ण के भीतर में यह जो ईश्वर का प्रकाश है हम सहज ही देख पाते थे अभी देखिए क्लियर होता है कंपलीटली ट्रांसपेरेंट होता है उसमें थोड़ी सी भी अशुद्ध नहीं रहती तो हमको पता ही नहीं लगेगा यह कांच है हमको सिद्धाराम होगा यह जब कोई भी व्यक्ति संपूर्ण रूप से अपने अहंकार को श्री भगवान के श्री चरणों में समर्पित कर देता है सुरेंद्र कर देता है तब अपना मैं मेरा हम ऐसा कुछ भी नहीं राहत इतनी भी इंप्योरिटी उसके भीतर में नहीं रहती इसलिए क्या होता है की वो संपूर्ण रूप से वो ट्रांसपेरेंट हो जाता है यह संपूर्ण रूप से ट्रांसपेरेंट होने की जो भीम है जैसे ही मेरे में थोड़ा सा भी अहंकार आया ये कांच है उसमें इंप्योरिटीज दिखाना शुरू हो जाएगा और अहंकार ज्यादातर लोगों में इतना बाढ़ जाता है की यह कांच पूरा लोहा बन जाता है मेरा शरीर लोहे का बना है तो फिर मेरे हृदय में ये जो दिया है उसका प्रकाशन कैसे देख पाएंगे यह जो किंतु धीरे-धीरे करके साधना करके यह जितनी भी अशुद्धियां हैं जितने भी मेरे संस्कार है उसे संस्कार है मच्छर सुंदर और निर्मल होते जाएंगे तो वैसे ही ये शरीर जो है संपूर्ण रूप से कांच का बन जाएगा संपूर्ण रूप से ट्रांसपेरेंट बन जाएगा और इसके बाद में दिया ऐसे दिखेगा जैसे की जो है की दिए और हमारे बीच में कोई व्यवधान नहीं है जैसे ठाकुर कहते हैं ना की भगवान राम मां सीता और लक्ष्मण जो है वो जंगल में से जा रहा है वो वन में से जा रहा है तो लक्ष्मण क्या कहते हैं मां सीता को की यदि आप रास्ता छोड़ दें क्योंकि सर्वप्रथम राम है उसके बाद में मां सीता है फिर आखिर में लक्ष्मण है तो लक्ष्मण क्या कहते हैं मां सीता को की मैं भगवान राम का दर्शन नहीं कर का रहा हूं क्योंकि आप बीच में खड़ी है आप दया करके थोड़ा साइड में हो जाइए तो मैं भगवान राम का दर्शन कर पाऊंगा तो यह सीता जो है वह है माया ये माया जो है हमको इस जगत में बांधकर के रखती है किंतु माया की जब हम उपासना करेंगे उनके हम उनको जो यह पूरा हम उसके स्ट्रेचरी चरणों में अपना जो अहंकार है संपूर्ण रूप से हम विलेन कर देंगे तब माया जो है प्रश्न होकर के रास्ता छोड़ देगी और ये जो भगवान है ये जो ईश्वर है यह जो आत्मा है या तो ब्राह्मण है उसका हमको दर्शन होगा अच्छा अभी ये प्रश्न हो सकता है की यहां पे स्वामी जी ने ऐसा क्यों कहा की आप ये जो ठाकुर जो है वो पूर्ण रूप से शुद्ध कांच के बने हुए हैं इसके भीतर में दिया रखा हुआ है ऐसा क्यों नहीं कहा की कांच भी अदृश्य हो गया और सिर्फ दिया बना रहा तो देखिए कांच अर्थात के शरीर जब तक आप शरीर धरण करते हैं तब तक आप ईश्वर जो भी बोलते हैं आपके मुंह से तो बोलते हैं वो आपके जो संस्कार है थोड़े बहुत तो र जाते हैं ठाकुर चाहे जितने भी अवतार क्यों ना हो वह बंगाल के एक गांव में बड़े हुए थे बंगाली भाषा जानते हैं बंगाली कलर जानते हैं वो बंगाल जो रीति-रिवाज है वहां के लोगों की रहने जी तरह से रहते हैं खाता हैं उसे उसे परिवेश में तो वो बड़े हुए हैं तो इस को लेकर के वो बात करेंगे अब कहानी जाकर के अमेरिकन लोगों को जब बात करने की बड़ी है आई ये जो वेदांत सीखने की बड़ी आई तो वो कम स्वामी जी को करना पड़ा क्यों क्योंकि ठाकुर खुद तो अमेरिका जाएंगे नहीं ठाकुर खुद तो इंग्लिश में बात करेंगे नहीं ठाकुर खुद तो जो है वो वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलिजन में पार्टिसिपेट करेंगे नहीं क्यों क्योंकि उनका संस्कार जो है जी संस्कार से उनके शरीर का गठन हुआ है उसे संस्कार उसे शरीर के ऊपर में इमिटेशन रखना है कोई भी कितना ही महान क्यों ना हो जाए कोई भी कितना ही अवतार जो है वो संपूर्ण रूप से वो आत्मज्ञान प्राप्त क्यों एन कर ले हमने जैसे कल देखा था ना आपको नेत्री नेत्री करके सर्वप्रथम जो है वो किसी जो मकान की छठ पर जाना है उसके बाद में आपको ईश्वर का दर्शन होगा या तो आत्म दर्शन होगा आप आत्मन में स्थित हो जाएंगे इसके बाद में जो है 21 अर्थात की आपको समाधि प्राप्त हुई ये जो है की निर्विकल्प समाधि इसको कहते हैं अब निर्विकल्प समाधि में क्या होता है की 21 दिन के बाद में शरीर का त्याग हो जाता है 21 दिन के बाद जो है ये शरीर चला जाता है क्योंकि फिर शरीर की आवश्यकता ही नहीं रहती शरीर एवं अध्ययन कल धर्म साधनम् ऐसा कहा गया है क्यों की शरीर जो है धर्म का धर्म प्राप्त करने का साधन है अभी जैसे धर्म हमने प्राप्त धर्म का जो अंतिम है ये जो है वो हमने प्राप्त कर लिया तो फिर ये जो साधनों की शरीर रखना की क्या जरूर है ठाकुर के पास में दो लड़के आते थे तो इतने उन लोगों के भीतर में वो जो इतनी श्रद्धा थी ठाकुर की और इस संसार के प्रति इतनी उदासीनता थी की ठाकुर ने अपने दूसरे अपने जो उनके साथ में रहते थे उन लोगों को का दिया की इस तरह का वैराग्य इस का ईश्वरीय भाव इस तरह का संपूर्ण निरंगकारिता यह इन लोगों में जो देखने को मिलता है तो देखेगा की इन लोगों का शरीर जो है ज्यादा टिकेगा नहीं फिर एक दिन एक लड़का आया उसने कहा की अभी मैं जा रहा हूं अभी मैं आपको फिर से मिलने के लिए नहीं आऊंगा जैसे ही उसने ऐसा ठाकुर को कहा ठाकुर भाव में चले गए समाधि में चले गए और समाधि में पता नहीं उन्होंने क्या दर्शन किया लड़के का जो भूतकाल था वर्तमान था भविष्य था सब कुछ देख लिया और फिर वो समाधि में ही उन्होंने कहा की अच्छा ठीक है उन्होंने अनुमोदन दिया उसको जो है उसको इनफॉरमेशन किया अभी ये लड़का जो गया उसके कुछ दोनों के बाद में खबर आया की उसने शरीर त्याग कर दिया है सुसाइड किया होगा शायद तो यह जब खबर आया तब ठाकुर के पास में जब दूसरे भक्ति बैठे थे वे लोग आपस में बातें करने लगे की यह जो है यह जो इस तरह से कोई शरीर त्याग करता है कोई आत्महत्या करता है यह सुनकर के हमको बड़ा डर करता है तो ठाकुर क्या कहते हैं की वैद्य जो है वो एक जो कांच का बोतल है उसके भीतर में मकरध्वज बनाते हैं तो मकरध्वज बनाने के लिए एक औषधि का नाम है बहुत ही मूल्यवान औषधि है तो मकरध्वज बनाने के लिए जितने जो इनग्रेडिएंट्स है जो वह सब इसके भीतर में दाल करके उसको बोतल को जो है वो गम किया जाता है जब मकरध्वज बनकर के तैयार हो जाता है तो बोतल को तोड़ देते हैं फिर तोड़ करके उसमें से भीतर में से मकरध्वज जो है वो निकाल लेते हैं तो ठाकुर कहते हैं की भीतर में जब वो चीज तैयार हो गई एक्टर जिनिस्टा तेरी हो गए टिंबर चले गए तब यह जो बोतल है उसको रखा ना की उसको तोड़ दिया क्या फर्क पड़ता है उसके भीतर की मूल्यवान औषधि तो हमको मिल गई वैसे ही यह जो है की अवतार के बड़े में जब हम कहेंगे की उनका जो शरीर धरण है वह कितने ही चाहे वह मतलब वह सर्वश्रेष्ठ अवतार क्यों ना हो उनके एक परी पार्श्विक स्थिति के भीतर में उनका संस्कार जो है उनका शरीर जो है उनकी ये जो लाइफस्टाइल है वो बनी हुई है तो उसे लाइफस्टाइल उसे संस्कार को छोड़कर के वो एक लेवल तक जा सकते हैं किंतु का उससे दूर कहां तक जाएंगे ठाकुर जो है हम हमको बंगाली लोगों को जो है बंगाली भाषा में उन्होंने कथामृत सुनाया किंतु अब जब मेरे जैसे लोग हैं की जिनको बंगाली नहीं आता था शुरु-शरो में तो मैंने तो पहले गुजराती में ही कथा पढ़ना पड़ा ट्रांसलेशन अभी जो लोग अमेरिका है जिन लोगों को एक भी इंडियन लैंग्वेज नहीं आई उनको तो इंग्लिश में ही पढ़ना पड़ेगा तो यह अवतार मतलब कितने ही चाहे सर्वश्रेष्ठ क्यों ना हो सभी लोगों को सभी लोगों की भाषा में बात नहीं कर पाएंगे विश्व में सब जगह पर नहीं जा पाएंगे मतलब 15:20 ठाकुर के 16 एसी शिष्य थे और मां लीजिए की 50-60 जो है वह गृहस्थ शिष्य थे अंतरंग इससे ज्यादा तो वह शिष्य नहीं कर पाएंगे हालांकि पृथ्वी का आज उन उसे समय का पापुलेशन एटलिस्ट 200 300 करोड़ होगा तो इतने लोगों को सीखना पूरे विश्व में जाना सभी भाषण में बात करना सभी लोगों को उसके खुद के कलर में सीखना यह सो तो अवतार के लिए भी संभव नहीं है अर्थात जब शरीर धरण होता है तो शरीर जो है आपके ऊपर में एक इमिटेशन रखना है तो ठाकुर का जो है की वह जो लोहे का शरीर नहीं था कांच का शरीर था किंतु कांच का भी तो शरीर था ये जो दिया जो है इसके भीतर की यह जो ये जो जोत जो है संपूर्ण रूप से मुक्त नहीं हो गई है संपूर्ण रूप से वो ईश्वरीय नहीं ठाकुर जो है संपूर्ण रूप से ईश्वर में नहीं प्रेरित हो गए जैसे की हम लोग जो रामायण महाभारत में पढ़ने थे की यह जैसे की भगवान कृष्णा ने अपना जो है यह जो विश्व रूप जो है उसका दर्शन करवाया भगवान कृष्णा के इतने मिरेकल्स थे वो भगवान कृष्णा कहानी पर भी जाकर के कुछ भी कर सकते थे ये जो अटरीब्यूट्स हम उन लोगों को देते हैं भगवान शिवा को जो एड्रेस वो भगवान शिवा जो है या भगवान विष्णु जो है तो ये जो अवतार जो होते हैं अवतार का इमिटेशन होता है और ईश्वर का इमिटेशन नहीं होता तो ये जो इमिटेशन जो शरीर जो है वो उसके ऊपर रहेगा ही रहेगा हां जब ठाकुर शरीर त्याग कर देंगे तब उनका जो प्रकाश है वो हम सबके भीतर में वो उसका प्रकाश का एक किरण प्रवेशित होगा और ये जो प्रकाश का एक एक किरण है उसके द्वारा ठाकुर जो है पूरे संसार में कार्य करेंगे किंतु यह बात उनके शरीर धरण रहते रहते नहीं हो शक्ति हां ठाकुर ने एक बार कहा था ठाकुर के गले में कैंसर हो गया खाई नहीं का रहे तो स्वामी जी ने पंडित ने स्वामी जी ने ही बोला की आप क्यों नहीं मां को बोलते की के गले का भी जो रोग है यह कैंसर जो है ठीक हो जाए अब तो कभी नहीं का रहे हैं तो ठाकुर ने जो सब भक्ति आसपास में बैठे थे उनके चारों और तो उनको दिखा करके का दिया की देखो आर्मी ये तो मुख ठेके तो खाची अर्थ की मैं इतने मुख से तो का रहा हूं अर्थात की ठाकुर के भीतर का जो ईश्वर की जो पुरी जो ज्वाला है ये जो होमग्नि है उसकी एक-एक किरण तो हम सब में ही है और ठाकुर को खुद वहां पे जाकर के कार्य करने की जरूर नहीं है उसे एक किरण से ही हम लोग पूरा कार्य करते हैं किंतु वो शरीर जो है उसका 1 इमिटेशन हमेशा रहेगा इसीलिए स्वामी जी यहां पे कहते हैं की ठाकुर जो है वो जो लोहे का ये जो शरीर है या तो लोहे का जो कंटेनर है जिसके भीतर में ये जो प्रदीप रखा गया है उसमें से कांच का कंटेनर तो हो गए इसलिए की हमको यह जो प्रदीप है संपूर्ण रूप से स्पष्ट देखने को मिलता है किंतु कांच का कंटेनर तो है है जब ठाकुर महासमुंद प्राप्त करेंगे यह जो मैग्नी उन्होंने प्रज्वलित की है वो पूरे विश्व में फेल जाएगी हम सबके हृदय में आकर के स्थापित होगी तब कहानी जाकर के वो जो है वो अग्नि उसको हम पूरे एस आईटी इस देख पाएंगे बिना किसी यह आवरण के बिना किसी यह जो है व्यवधान के किंतु जब तक शरीर धरण है तब तक व्यवधान रहेगा तब तक उसे शरीर के कुछ ना कुछ संस्कार तो र जाएंगे नीति नीति करके जब हम ऊपर जाएंगे सीधी चढ़ के और छठ पे पहुंच जाएंगे अर्थात की ईश्वर प्रताप या तो ब्रह्मज्ञान में स्थित हो जाएंगे तब सब संस्कार चले जाएंगे लोक कल्याण का कार्य कर सकते हैं इसलिए यह कुछ संस्कार उनको रखना पढ़ते हालांकि यह जो संस्कार रहते हैं शुद्ध होते हैं उससे किसी का कोई भी हनी नहीं होती
श्रीरामकृष्ण कथामृत : कोलकाता में ईश्वरचंद्र विद्यासागर के साथ
यह जो आध्यात्मिक साधना कैसे होती है इसके बड़े में ठाकुर ने हमको बताया की यह जो पुरी ट्रांजैक्ट यह जो पुरी जर्नी है वह कैसे होती है सर्वप्रथम हम संसार का त्याग करके एक के बाद एक हमारे जितने भी यह हमारी वासनाएं हैं हमारी इच्छाएं हैं हमारे द्वेष है हमारी यह जो सब राज अहंकार है उसे सब का एक के बार एक त्याग करते जाएंगे उसके बाद में हमारा मां जब शुद्ध हो जाएगा तो इस शुद्ध मां में ईश्वर के ज्ञान का प्रकाश जो है वह व्याप्त हो जाएगा वो फेल जाएगा किंतु फिर उसके बाद में जैसे की समाधि होती है जब हम एकदम समाधि प्राप्त करते हैं उसके बाद में जो है 21 दिन के बाद जो है मृत्यु होगी किंतु यदि मां की इच्छा है की इस शरीर के द्वारा यदि लोक कल्याण का कार्य होना है तो फिर मां आदेश देगी और जो है वो सड़क वो सिद्ध धीरे-धीरे करके वो आईटीआई करके वो जमीन पे वापस आएगा तो इसके लिए ठाकुर ने बहुत ही सुंदर जो दो-तीन उदाहरण दिए हैं जब तेल पाक रहा होता है तो उसमें से आवाज आई है फिर तेल पाक करके एकदम मुझे ग्राम हो जाता है तो आवाज नहीं आई फिर यदि उसमें आप पुरी डालेंगे तो फिर थोड़ा सा आवाज आएगा तो वैसे ही तेल पकाना अर्थात के साधन भजन करने का समय होना और तेल पूरा ग्राम हो जाना अर्थात यह ईश्वर ज्ञान की स्थिति में स्थित हो जाना और उसमें पुरी ढलना अर्थ की लोक कल्याण के लिए कुछ संस्कार को फिर से धरण करके फिर से पृथ्वी पर आकर के लोक कल्याण का कार्य करना अच्छा दूसरा उदाहरण देते हैं जब मधुमक्खी जो है फूल पर बैठकर के मधुबन नहीं कर रही है उसको प्यास लगी है तब तक वह भन-बन करती है अपना गण गति है किंतु जब मधु करके पान कर रही है तब संपूर्ण रूप से वो साइलेंट हो जाति है वो शांत हो जाति है और फिर जब मधुबन हो जाता है तब अपनी मस्ती में हो सकता है की वो अपनी खुशी से अपनी मस्ती से फिर से थोड़ा बहुत कर दे या तो अपना गेट तो यह अर्थात की जब मधुबन नहीं कर रही है तब वो जो गण ग रही है वो उसे साधना की स्थिति है सड़क की जबकि उसके संस्कार या तो उसके कर्म जो है उसके साथ में जुड़े हुए हैं मधु पान कर रही है तब वो शांत हो जाति है अर्थात ईश्वर दर्शन हो करके सड़क शांत हो जाता है और मधु पान करके मत और मस्त अवस्था में फिर से अपने मां की खुशी से वो गाना गति है मधुमक्खी अर्थात की ईश्वर दर्शन के बाद में यदि कोई संस्कार सड़क का या सिद्ध का र जाता है कोई कर्म र जाता है है की वह है सिर्फ लोक कल्याण के लिए उसमें उसका स्वार्थ तनिक भी नहीं है तो ठाकुर एक के बाद एक उदाहरण देकर के ये स्थिति हमको समझते हैं खीरे उदाहरण देते हैं तालाब में घड़ा भरने के समय वो भग-भग करके आवाज आई है किंतु घड़ा फिर भर जाता है तब बिल्कुल साइलेंट हो जाता है गधा किंतु हां एक खड़े से दूसरे खड़े में पानी डाला जाए तो फिर से वो पानी का आवाज आएगा घड़ा जब भारत जाता है अर्थात के साधन भजन होता है उसे समय कर्म र जाता है घड़ा भर जाता है तब की वो पूर्ण ज्ञान की स्थिति प्राप्त होती है संपूर्ण शांति और एक खड़े में से दूसरे खड़े में पानी डालना वह जो आवाज होता है आपकी एक बार मां की आजा प्राप्त करके लोक कल्याण के लिए जो कर्म किया गया लोक कल्याण के लिए जो संस्कार धरण किया गए यह उसका आवाज है जिससे की किसी को भी नुकसान नहीं होता जगत का जो उपकार ही होता है आवकर नहीं होता अभी ठाकुर आगे कहते हैं ऋषियों को ब्रह्मज्ञान हुआ था विषय बुद्धि का लेस मंत्र रहते यह ब्रह्मज्ञान नहीं होता ऋषि लोग कितना परिश्रम करते थे सवेरे आश्रम से चले जाते थे दिन भर अकेले ध्यान चिंतन करते थे और रात को आश्रम में लौटकर कुछ फल मूल खाता थे देखना सुना इन सब विषयों से मां को अलग रख देते थे तब कहानी जाके उनको ब्रह्मा का दिशा होता था अभी देखिए हम लोग थोड़ा बहुत करते हैं साधना थोड़ा बहुत कोई कथामृत पढ़ लिया थोड़ा बहुत हमने जब ध्यान कर लिया जो गुरु महाराज से हमने मंत्र प्राप्त कर लिया फिर एक दो सत्ता हुआ ना की एक-दो महीना हुआ हम लोग सोचना शुरू कर देते हैं अरे यह मेरे मां में यह जो अशांति है अरे मेरे मां में जो अशुद्ध है सब समय मेरे मां में टेंशन है एंजायटी से वह क्यों नहीं जा रहा तो हमको थोड़ा सा ही करके वह पूरा वह माल का लेना है तो थोड़ा सा ही मेहनत करके हमको पूरा फल ले लेना है किंतु ऐसा तो इस जगत में होता नहीं है देखिए एक छोटा सा ग्रेजुएशन का एक डिग्री जो है मां है या तो एमएससी है जो भी है उसको अपने के लिए आपको पहले कक्षा से लेकर के आखिरी तक जो है 12th स्टैंडर्ड है उसके बाद में कॉलेज के जितने भी साल है इतना आपको जो है 12 15 साल का आपको उसके लिए मेहनत करना पड़ता है एक छोटा सा कहानी इतिहास में ग्रेजुएशन कर लिया ना की वो जो केमिस्ट्री में ग्रेजुएशन कर लिया इसके लिए आपको 12-15 साल मेहनत करना पड़ा तो ईश्वर प्रताप क्या कोई ऐसी चीज है ना की फिट करके जो है आप का लेंगे ईश्वर प्रतीक है ऐसी कोई चीज है ना की 10-12 महीने हमने मेहनत किया थोड़ा बहुत और फिर सोचना शुरू कर दिया की अरे मैंने तो प्रतिदिन इतना जाप करता हूं प्रतिदिन इतना मैं ठाकुर को प्रार्थना करता हूं फिर भी क्यों नहीं मुझे कुछ प्राप्त हो रहा है तो क्या ब्रह्मा ज्ञान या तो ईश्वर ज्ञान का ऐसा कोई सोच चीज है की पटकर के प्राप्त हो जाए ठाकुर कहते हैं की ऋषि मनी कितने सालों साल तक तपस्या करते थे आश्रम छोड़कर के वन में चले जाते थे देखना सुना स्पर्श करना यह जो जितने भी विषय है उससे अपने को संपूर्ण रूप से दूर कर देते थे तब कहानी जाकर के उनके संस्कार की शुद्ध होती थी तब कहानी जाकर के उनका मां जो है उसमें संकल्प शक्ति का उदय होता था और उसे संकल्प शक्ति से उनकी एकाग्रता की शक्ति बढ़नी थी और उसे एकाग्रता से वे लोग चाहे ईश्वर के ऊपर में अपने मां को केंद्रित कर पाते थे तब कहानी जाकर के उनको सिद्धि प्राप्त होती थी उनको एक के बाद एक आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त होती थी ठाकुर वह जो देवेंद्र नाथ टैगोर के घर गए थे ना तो ठाकुर ने कहा की बताओ तुमने क्या क्या पढ़ा है तो देवेंद्र नाथ ने कहा की मैंने वेद में पढ़ा है की एक ऐसा वृक्ष है जिसके ऊपर में बहुत सारे प्रदीप जल रहे हैं और एक के बाद एक प्रदीप जो है यह मिट-मिट कर रहा है वह फ्लिकरिंग कर रहे हैं तो ठाकुर ने कहा अरे मुझे तो इस तरह का दर्शन हुआ था ये जो ब्रह्मा वृक्ष है उसमें जितने भी यह जो हम जीव हैं जितने भी ये जितने भी लोग हैं जैसे की वृक्ष के ऊपर में झूम रहे हैं और प्रदीप का उसमें से प्रकाश जो है वो निकाल रहा है जो ठाकुर को ये सब वेद में शायद उन्होंने सुना होगा उनके पास तो बहुत सारे शिक्षक हैं और जो गुरु आए थे उन्होंने बहुत साड़ी बात की थी ठाकुर ने खुद कहा था किसी ने कहा की आपने तो पढ़ाई लिखी की नहीं फिर भी आपने इतना ज्ञान प्राप्त किया था ठाकुर बोलते अरे मैंने सुना कितना है तो ठाकुर ने शायद यह बात सनी भी होगी हमको पता नहीं किंतु ठाकुर ने यह बात अवश्य दर्शन में उपलब्ध की थी उनको यह दर्शन हुआ था तो यह आध्यात्मिक दर्शन जो है एक के बाद एक किसी मनुष्य को होना किसी सड़क को होना वो तभी संभव है जबकि आप इतने सालों साल तक कठिन तपस्या करते हैं यदि हम घर में बैठे हैं बढ़िया मजे से सर पर पंखा चल रहा है आश्रम में जैसे की जब भी घंटी पड़ती है हम लोग को खाना मिल जाता है फिर दिन भर जो है यहां पर कर्म में व्यस्त रहते हैं तो फिर अभी मैं सोचूंगा की अरे मुझे इतने दिन हो गए 20 साल तो होने को आए यहां पे रहते रहते फिर भी मुझे क्यों नहीं ठाकुर के जैसे दर्शन हो रहे मुझे क्यों नहीं यह वृक्ष के दर्शन हो रहे वेद में जो बातें कहीं गई है वो आंख बैंड करके मुझे क्यों नहीं दिखती तो नहीं दिखेगी ठाकुर ने जी तरह से तपस्या की है या तो हमारे ऋषि मनी जी तरह से तपस्या करते थे वो करने की क्षमता मेरे में नहीं है क्यों नहीं है ठाकुर कहता है कलयुग में लोगों के प्राण एन पर निर्भर है देहात्मा बुद्धि जाति नहीं इस दशा में सोहन अर्थात की मैं ब्रह्मा हूं कहना अच्छा नहीं सभी कम किया जाते हैं फिर भी मैं ही ब्रह्मा हूं यह कहना ठीक नहीं जो विषय का त्याग नहीं कर सकते जिनका हम भाव किसी तरह जाता नहीं उनके लिए मदास हूं मैं भक्ति हूं यह अभिमान अच्छा है भक्ति पाठ में रहने से भी ईश्वर का लाभ होता है अर्थात की कलितेन कलाइट उन लोगों को प्राण ठाकुर के आने से तो युग संधि हुई है ठाकुर के आने से तो सत्य युग शुरू हो गया है तो फिर हम लोगों का जो है कलयुग का शरीर किस कहा जाएगा कलयुग तो चला गया युग संधि आरंभ हो गए किंतु यह है की वह पता है ना की वह ठाकुर खुद कहते हैं की जब वह निसार बांग्ला से बोले जब किसी ने नशा किया है तो फिर जब उन नशा का उसका वो जो ये उसका आनंद जो है वो लंबे टाइम तक चला है भले ही चाहे उसकी सिस्टम में से वो जो शराब जो है वो निकाल भी गया होगा किंतु शराब का जो असर है वो लंबे टाइम तक चला राहत है तो वैसे ही कलयुग जो है वो समाप्त हो चुका है कलयुग का भी वृद्धि नहीं होने वाला है कलयुग की जो असर है वो धीरे-धीरे कम होगी सतयुग की असर बढ़ेगी किंतु फैट करके विभिन्न वनडे यह जो है एक दिन में ही ट्रांजिशन नहीं होता ये युगल संधि का अर्थ यही है की एक युग में से हम दूसरे युग में प्रवेश करते हैं तो दूसरे नए युग में प्रवेश करने के समय जो है की पहले वाले युग के कुछ एलिमेंट्स र जाते हैं वह धीरे-धीरे कम होंगे और नए युग के सत्य युग के जो एलिमेंट्स हैं धीरे-धीरे बढ़ते जाएंगे ट्रांजिशन थोड़ा समय लगता है तो इसीलिए अभी कलियुग में हम लोग बेसिक टेक्निकल नहीं है ठाकुर के आने से तो कलियुग इस दिन समाप्त हो गया है 1836 में जी समय ठाकुर का इस पृथ्वी पे अवतारण हुआ था किंतु उसकी जो असर है वो अभी भी दिखाई दे रही है इसलिए हमारा जो शरीर है इस संधि युग में जन्मदरण किया हुआ है तो कलयुग के जो एलिमेंट्स इसमें रहेंगे ही रहेंगे सब संपूर्ण रूप से जो है हमारा मां जो है ईश्वर प्रताप ईश्वर साधना में मगन नहीं होगा कुछ ना कुछ तो अशुद्धियां रही जाएगी तो इसीलिए यह जो संपूर्ण रूप से अपने मां को बाकी सब विषयों से अलग करके विषयों से निरस्त करके ईश्वर में जो है संपूर्ण रूप से मगन हो जाना अभी हमारे लिए संभव नहीं जन्म जन्मांतर की साधना लगेगी तो इसीलिए हमारे लिए यह जो है की ठाकुर कहते हैं यहां पर की कुछ सालों में कुछ दोनों में कुछ मीना में होना नहीं है जन्म जन्म की साधना चलती रहेगी और कोई छोटी-छोटी चीजों में निरसा हो करके की मैंने ठाकुर का मंत्र लिया है तो फिर भी मेरे साथ में यह कष्ट क्यों हो रहा है अभी मेरे घर में कोई बड़ी समस्या ए गई मेरे घर में किसी का ऑपरेशन करना है या तुम मेरे ही कुछ ऐसी कोई बीमारी या व्यति ए गई की जो की मुझे परेशान कर देती है तो मां में प्रश्न आएगा की ठाकुर का मंत्र लिया है तो ठाकुर का मंत्र तो पूरा शुद्ध कर देता है ठाकुर का जब भी करता हूं तो फिर भी क्यों नहीं कोई उपलब्धि हो रही क्यों नहीं कोई डेवलपमेंट या तो कोई प्रोग्रेस दिखाई दे रहा तो उसे समय यह बात याद रखती है यह साधना जो है वह लंबा समय चलेगी और बहुत ही हमको मेहनत करनी पड़ेगी तब कहानी जाकर के हमको जो है रिजल्ट उसका धीरे-धीरे दिखाई देगा हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा