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Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life and Teachings 13 Nov 2025

Prayer

ओम स्थापकाय यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का लाइफ उसका हम स्टडी कर रहे हैं। विभिन्न सोर्स से इकट्ठा किया हुआ मटेरियल है। इसमें फिलहाल हम जो टॉपिक देख रहे हैं कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में वह कुछ घटनाएं जिसने कि भविष्य के रामकृष्ण संघ की नीव को सुदृढ़ किया एक बड़ा ही स्ट्रांग फाउंडेशन डाला तो उसमें से एक घटना विजा होम जिसके द्वारा विधिवत सन्यास गुरु भाइयों ने ग्रहण किया तो उसका हमने कुछ डिस्कशन किया। इसके बाद में अभी जो हम कल हम जिस

गेरुआ वस्त्र और दशनामी सन्यासी संप्रदाय के बारे में भ्रांत धारणाए

टॉपिक को डिस्कस करना प्रारंभ किए थे कि किस तरह से वीरजा होम करके विधिवत सन्यास ग्रहण करने के बावजूद यह जो डायरेक्ट डिसाइपल थे श्री रामकृष्ण के त्यागी संतान वे लोग जाहिर में पब्लिक में अपना गेरुआ वस्त्र पहनने से थोड़ा सा हिचकिचाते थे और यह जो सन्यास नाम उसका भी व्यवहार बड़ा कम ही करते थे। तो इसके पीछे के कुछ कारण हमने कल देखे कि किस तरह से बंगाली समाज में शंकराचार्य के द्वारा प्रवर्तित यह दशनामी संप्रदाय है जिसके कि भीतर में हम सभी आते हैं। रामकृष्ण संघ जो है शंकराचार्य के दशनामी संप्रदाय के भीतर आता है। उसके अनुसार जो नाम परिवर्तन होता है जो गेरुआ वस्त्र पहनना होता है। इसके साथ में वहां का बंगाल का उस समय का समाज परिचित नहीं था बोल कर के यह जो फिजिकली फिट मेंटली फिट यंग लड़के अपना घर छोड़कर के एक जगह पर मठ में आकर के रहते हैं। इसके सामने लोगों का विरोध था और देखेंगे कि आज भी इवन देखेंगे कि समाज में कहीं-कहीं पे इस तरह का अभी भी है कि क्यों जो जिन लोगों में फिजिकल और मेंटल फिटनेस है घर छोड़कर के त्यागी बनेंगे ही क्यों और इस तरह से भिक्षा पे क्यों जिएंगे अभी भी आप देखेंगे कि कहीं-कहीं पे इस तरह इस इस पूरी जो लाइफ स्टाइल है सन्यासी की उसके सामने विरोध रहता है तो वह सब कुछ हमने देखने का शुरू किया था। विजानंद जी महाराज हमको कहते हैं कि जब भी यह गुरु भाई जब वहां पर गंगा के किनारे स्नान करने को जाते तो वहां के उस समय के कुछ लड़के इतने दुष्ट थे कि इन लोगों की गुरु भाइयों की मजाक उड़ाते। अभी क्या है कि रामकृष्ण परमहंस के शिष्य है। तो रामकृष्ण परमहंस का नाम यह उस समय काफी पॉपुलर हो चुका था। बिकॉज़ कि अपना केशव सेन ने और फिर और भी जो उस समय के प्रतिष्ठित लोग थे वो लोग ठाकुर के चेले थे बोलकर के वो उनका नाम प्रसिद्ध हो चुका था तो अभी यह त्यागी लड़के उनके सेवक है या तो फिर ठाकुर के यह संतान है बोलकर के यह लोग उनको कहते कि यह देखो राजहंस जा रहे हैं। ऐसा करके मजाक उड़ाते और फिर यह जो उंगलियों से इशारा करके वह बतख ऐसा करके वह दिखाते यह वह पता है ना उंगलियों से इस तरह से होता है तो इस तरह से इशारा करके बतख दिखाते और फिर वह बोलते हैं कि यह देखो राजहंस जा रहे हैं और फिर ऊपर से बोलते पक पेंक ऐसा करके यानी कि क्या है कि देखो कि यह त्यागी संतानों की इस तरह से कटाक्ष पूर्ण वाणी से उनकी मजाक उड़ाया करते थे कि कहां वे लोग एक नॉर्मल लड़के की तरह नौकरी धंधे की फिक्र करें। शादी ब्याह की फिक्र करें। समाज में जो उसका एक स्थान होता है उस स्थान को ग्रहण करें ना कि कहां यह भिखारी बनके घूमते रहते हैं। पता नहीं वहां के उनका जो मठ है वहां पे पता नहीं किस तरह का अनाचार अत्याचार होता होगा। देखिए आज के भी समाज में अ जब हम किसी एक साधु के ऊपर में लांछन लगा हुआ देखते हैं तो पूरे साधु समाज के ऊपर में फिर हम लोगों का विश्वास उठ जाता है कि हां एक यहां पर मंदिर है यहां पे एक-एक आश्रम है वहां पे ऐसा कुछ गड़बड़ हुआ उसका अर्थ है कि भारतवर्ष के जितने मंदिर हैं जितने भी साधु हैं जितने भी आश्रम है सब लोग वहां पे इस तरह का भ्रष्टाचार करते होंगे और न्यूज़ेपर में भी क्या है कि इन लोगों को तो इस तरह का कोई एक सेंसेशनल न्यूज़ चाहिए ना तभी तो न्यूज़पेपर बिकेंगे। आप यदि न्यूज़पेपर में वेदांत विवेक चूड़ामणि में से एक-एक श्लोक और उसके ऊपर में शंकराचार्य की व्याख्या इस तरह से यदि आप न्यूज़पेपर में प्रिंट करना शुरू कीजिए। देखेंगे कि आपका पेपर का सर्कुलेशन बिल्कुल जीरो हो जाएगा। किंतु फिर यही शंकराचार्य के चेले ये शंकराचार्य का नाम लेकर के क्या-क्या सब भ्रष्टाचार करते हैं। यह सब न्यूज़ पेपर में छापिए। देखिए फटाफट करके आपका सर्कुलेशन बढ़ेगा। यानी कि क्या है कि समाज ने एक इस तरह से एक इस तरह की नेगेटिव क्यूरियोसिटी को जन्म दिया है। यह मास मीडिया जब से प्रारंभ हुआ है तब से किसी भी तरह का आदर्श को मेंटेन करके चलना वो बहुत ही मुश्किल हो गया है। यह जो लोग मीडिया वाले हैं या तो फिर इवन जनसाधारण है वे लोग यह नहीं देखेंगे कि उनका खुद का आदर्श कहां पे आता है। उनके खुद के जीवन में कहां तक वे लोग एथिक्स और मोरालिटी को पकड़ के बैठे हैं। खुद के जीवन का कोई ठिकाना नहीं। किंतु यदि कोई आदमी थोड़ा बहुत भी आदर्श के रास्ते पर चलने का प्रयास करें, एथिक्स और मोरालिटी को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। तो पूरा समाज जैसे कि उसके पीछे में लग जाता है। कैसे भी करके वो प्रूव करना चाहता है कि भले ही चाहिए एथिक्स है, मोरालिटी है, धर्म है, इस तरह की बड़ी-बड़ी बातें करता तो है किंतु उसके जीवन देखिए पूरा भ्रष्टाचारी है। होता क्या है कि कोई एक आदमी इस तरह से पब्लिक लाइफ में 99% भी अपनी ऑथॉरिटी है। अपनी मोरालिटी को मेंटेन करके रखेगा। किंतु एक गलती भी यदि हुई तो पूरा उसके ऊपर में लांछन लगाने के लिए लोग प्रस्तुत होंगे। इसी का परिणाम है कि भारत में खास करके जो भी पब्लिक लाइफ में जो होते हैं वे लोग कभी मोरालिटी के नाम पर ज्यादा कुछ बोलते ही नहीं है। यानी कि क्या है कि हमने एक इस तरह की सिस्टम को जन्म दिया है। वहां पे इमोरल होना उसमें कोई गलती नहीं है। आप खुलेआम बोलिए कि मेरे से सच नहीं बोला जाता है। मेरे से बिना भ्रष्टाचार किए नहीं रहा जाता है। मेरे से इस तरह का कोभांड या करप्शन किए बिना नहीं रहा जाता है। तो लोग स्वीकार कर लेंगे कि हां चलो मनुष्य मात्र का नेचर ही करप्ट है तो यह भी करप्ट है। तो ये करप्ट लोगों को हम बहुत ही इजीली स्वीकार कर लेते हैं। किंतु इस लोगों के बीच में यदि एक व्यक्ति खड़ा होकर बोलता है कि मैं करप्ट नहीं होने का प्रयास करता हूं। मैं भ्रष्टाचार नहीं करने का प्रयास करता हूं। झूठ नहीं बोलने का प्रयास करता हूं। पब्लिक मनी या तो पब्लिक रिसोर्सेज है उसको अपने बेनिफिट के लिए नहीं इस्तेमाल करने का प्रयास करता हूं। ऐसा जो कोई व्यक्ति थोड़ा सा सोचे भी बोले भी तो पूरा समाज उसके पीछे में लग जाएगा और उसको झूठा साबित करके रहेगा। इसी का परिणाम है पिछले 1000 साल में हम देखिए कि नेशनल लेवल पर ऐसा कोई लीडर खड़ा ही नहीं हुआ है। अब मुगल लोगों को देखिए या तो ब्रिटिश लोगों को देखिए खुलेआम भ्रष्टाचार लूटपाट प्रजा का शोषण यह लोग करते थे। तो इन लोगों को तो हमने स्वीकार कर लिया। किंतु अपना ही कोई एक हिंदू भाई यदि ऐसा कहेगा कि मैं राज करूंगा और सीधे रास्ते पर करूंगा तो पूरा समाज यह राह देखकर के बैठा है कि उसकी एक गलती कहां पर होती है और एक गलती होने से ही दुनिया भर का लांछन उसके ऊपर में डाल देंगे। प्रॉब्लम क्या है कि इस माया के राज्य में 100% परफेक्ट कोई नहीं है। भगवान राम भी पुरुषोत्तम मर्यादा पुरुषोत्तम राम भी जब पृथ्वी पर आए तो उनके कार्यों के ऊपर में संशय संदेह करने वाले लोगों की कमी नहीं थी। तो मुगल राज्य हम स्वीकार कर लेंगे। ब्रिटिश राज्य स्वीकार कर लेंगे। किंतु अपना ही हिंदू यदि कोई अच्छा कार्य करना चाहता है तो हम लोगों की वक्र दृष्टि उसके ऊपर में ऐसी गिरती है कि उसके चरित्र का हनन किए बिना हम नहीं रह पाते। यह हमारे समाज की एक बड़ी ही भयानक सच्चाई है। और यही चीज हमारे साथ में रामकृष्ण संघ के साथ में होना शुरू हो गया था। यह कहां यह 16 लड़के जो कि त्याग, वैराग्य, ईश्वर प्राप्ति, ईश्वर आराधना, सनातन हिंदू धर्म की यह जो भव्य प्रवाह है इसको फॉलो करने का प्रण लेकर के यह लोग अपने जीवन को न्योछावर करने को बैठे हैं। तो कहां उनको सराहना करना चाहिए? कहां जाकर उनको कहना चाहिए कि भाई पिछले 1000 साल से तो हम गड्ढे में गिरे हैं। यदि आप एक खड़े होकर के यदि हिंदू धर्म का कुछ कर पाए तो बहुत अच्छा है। कहां यह सब कह के उनको थोड़ा सा एनकरेज करेंगे। कहां उनको थोड़ा सा हेल्पफुल होंगे। तो ऐसा नहीं बस उनके पीछे में पड़ना, उनकी लांछना करना, उनके ऊपर में कटाक्ष की बारिश करना, उनके चरित्र के बारे में दुनिया भर के अपवाद रटना। बंगाली शब्द है अपवाद रटना। यहां पे हिंदी में कहेंगे कि अफवाहएं फैलाना। तो यही सब कुछ चलना शुरू हो गया था। बोल और फिर नरेंद्र के ऊपर में यह कोर्ट केस बैठा हुआ था। तो यदि कोर्ट में यदि गेरवा पहन के जाता है और यदि यह सन्यास नाम यूज करता है तो फिर वही प्रश्न खड़ा होगा कि आप तो सन्यासी है। आपको तो मिल्कत का या तो संपत्ति रखने का कोई अधिकार नहीं है। और वैसे ही उनकी मां तो स्त्री है और यह बच्चे भाई-बहन है। वह तो अभी एडल्ट नहीं हुए हैं। वह तो बच्चे हैं। तो वैसे ही स्त्रियों और बच्चों को तो कोई राइट नहीं संपत्ति का। तो आप ही एक एडल्ट पुरुष होने की वजह से सिर्फ आपको राइट है थोड़ा बहुत आपके पिताजी की संपत्ति का किंतु आपने सन्यास ले लिया बोल के आपका राइट भी चला गया तो नरेंद्र यदि यह गेरुआ पहन के कोर्ट में जाता तो उसका घर उसकी संपत्ति वैसे ही तो गया है पूरा हाथ में से जाता तो नरेंद्र भी थोड़ा सा रिलक्टेंट था और फिर यह गुरु भाई भी इस तरह से रिलक्टेंट थे कि बाहर में जब जाएंगे तो ना ही गेरुआ वस्त्र पहनना है ना ही गेरुआ नाम ये जो सन्यास नाम है उसका इस्तेमाल करना है। यही महापुरुष महाराज की वार्निंग जो कल हमने पढ़ी कि अखंडानंद जी को कहते हैं गंगाधर महाराज को कि देखो तुम जब हमको लेटर लिखोगे तो हमारे सन्यास नाम से एड्रेस मत करना कि लेटर इज एड्रेस टू स्वामी विविधानंद स्वामी जी का जो अपना नाम था या तो फिर यह स्वामी शिवंद या तो स्वामी ब्रह्मानंद फिर ऐसा ही लिखना यह नरेंद्र बाबू के नाम से लेटर है राखाल बाबू के नाम से लेटर है ऐसा ही करके तुम लेटर लिखना ना तो वह तो एक हमने देखा फिर यह एक देखा कि यहां के जो लड़के थे इस तरह से दुष्ट थे वराह नगर के आसपास के कि जब भी यह लड़के गुरु भाई जब स्नान करने को जाएंगे घर से बाहर निकलेंगे तो ऐसा करके मजा करेंगे कि देखो यह राजहंस जा रहे हैं और फिर वो बक दिखाते माने वो बतख की निशानी करते उनके सामने और पक पेंक ऐसा करके आवाज करते इंटरेस्टिंगली ठाकुर जब थे तो ठाकुर के रहते-हते ही किसी किसी ने बोलना शुरू कर दिया था कि ठाकुर के यह जो पार्षद है जो उनके फॉलोअर्स हैं तो वो जो ठाकुर के पीछे चलते हैं ना ठाकुर तो कोलकाता में बहुत सारे लोगों के घर जाना शुरू कर दिए थे तो सब समय तो छोटा-छोटा जो डिस्टेंस होता है तो घोड़ा गाड़ी में जाने की जरूरत नहीं है। फिर पैदल ही थोड़ा सा डिस्टेंस चले जाएंगे। तो वह पैदल जा रहे हैं। साथ में यह पूरे उनके जो भक्तगण है उनको आवरुत होकर के जा रहे हैं। तो कोईकोई ने बोलना शुरू कर दिया था कि यह देखो परमहंस जा रहे हैं और साथ में परमहंस की फौज जा रही है। तो ठाकुर ने खुद इस बात का उल्लेख किया है कि देखो लोग बोल रहे हैं कि पर एक बार ठाकुर इसी तरह पैदल जा रहे थे और उनके पीछेछे में पूरा उनका भक्तगण जा रहा था। तो ठाकुर बोल रहे हैं कि देखो लोकेश आलारा बोले ना कि परमहंसर फौज आश तो साले लोग कहते क्या है कि परमहंस की फौज आ रही है तो देखिए कि उसी समय से और फिर वो फेमस घटना तो हमको पता ही है पानीहाटी वाली कि ठाकुर ने जब ठीक किया कि सभी भक्तों के साथ में पानीहाटी जाएंगे वो चिडार उत्सव जो उत्सव था वो उत्सव में पार्टिसिपेट करने के लिए तो फिर मां ने मैसेज पहुंचाया ठाकुर को कि मैं क्या आऊं क्या सभी तो इतनी सारी लेडी डिवोटी जा रही है तो मैं भी उनके साथ में आऊंगी तो ठाकुर ने कहा कि उसकी यदि इच्छा है तो आए तो मां समझ गई कि ठाकुर की इच्छा नहीं है कि मैं उनके साथ में जाऊं यदि उनकी इच्छा होती तो वो सामने ऐसा रिप्लाई देते हां जावे की क्यों जावे ना माने हां हां अवश्य आए क्यों नहीं आएगी ऐसा करके ठाकुर कहते हैं किंतु ऐसा नहीं करके ठाकुर ने रिप्लाई दिया कि उसकी की इच्छा है तो आए। तो मां समझ गई कि ठाकुर की इच्छा नहीं है। बोल के इस तरह का रिप्लाई दिया है। तो फिर मां ने भी कहा अरे वो भीड़भाड़ होगी वहां पे। इसमें आना जाना बड़ा मुश्किल हो जाएगा। बेटर है कि मैं नहीं जाती हूं। फिर उस दिन जब रात को वापस आए। ठाकुर ने किसी लेडी डिवोटी को कहा कि देखा वह कितनी बुद्धिमती है। वह यदि मेरे साथ में आती तो लोग इस तरह से मजाक उड़ाते कि हंशोहंशी ऐसे छे हंस और हंसी आए हैं। तो देखिए कि ये समाज की दुष्ट दृष्टि जो है यह साधु सन्यासियों के ऊपर में हमेशा से पड़ती रही है। और देखिए यह भी तो एक बात है कि साधु सन्यासियों के कौभांड भी तो कम नहीं है। जो चाहे गेरुआ वस्त्र पहन करके घूम सकता है और गेरवा वस्त्र पहन करके जिस तरह का भ्रष्टाचार करना चाहे वो कर सकता है। यानी कि क्या है कि दोनों ओर से अभी यह है आप ऐसा तो कोई यूनिवर्सल इंस्टट्यूट भारत में नहीं है कि आप ठीक करें कि कौन क्वालिफाइड है गिरवा पहनने को। आज जिसकी भी इच्छा हुई चोर उचक के जिसकी भी इच्छा हुई साधु के कपड़े पहन करके घूमना शुरू कर दिया। चोरी करना शुरू कर दिया साधु के ही कपड़े में कौन उसको देखने को जाता है वो ठाकुर की ही कहानी है कि एक आदमी था एक बागान में गया चोरी करने के लिए तो लोग उसके पीछे में पड़े चौकीदार वगैरह तो यह चोर भाग करके उसने देखा एक पेड़ है तो उसके नीचे जाकर बैठ गया उसने सोचा मैं ज्यादा भाग नहीं पाऊंगा तो मैं साधु का वो एक भान करके मैं यहां पे बैठ जाता हूं ढोंगी में ढोंग करके साधु का यहां पे बैठ जाता हूं तो जैसे ही साधु का ढोंग करके वहां पर बैठ गया। तो देखा कि दूसरे दिन इतने सारे लोग आ गए। सोचे कि साधु महाराज आए हैं यहां पे। चलो उसको जाकर प्रणाम करते हैं। प्रणामी देते हैं। तो चोर सोचता है कि मैं ढोंगी साधु हूं फिर भी मुझे इतना रिस्पेक्ट मिल रहा है। तो मैं असली साधु हो जाऊंगा तो क्या होगा? तो मुझे और भी कितना रिस्पेक्ट मिलेगा। अभी उसका तो हृदय परिवर्तन हुआ। किंतु इस तरह की कहानी सुनकर के और 10 चोर लोग सोचेंगे कि बिना मतलब हम चोरी करके घूमते हैं। इतना रिस्क लेते हैं। बेटर है कि ढोंगी साधु हो जाते हैं। हमको बैठकर के खाने को मिलेगा। तो ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है और इस तरह के ढोंगी साधु और असली साधु के बीच में डिफरेंस समझने वाले लोगों की भी कमी नहीं है। डिफरेंस नहीं समझने वाले लोगों की भी कमी नहीं है। तो बोलकर के जो भी साधु के कपड़े पहने हैं, साधु का स्वांग जिसने भी रचा है, सबको ढोंगी यह लोग मान लेते हैं। बोलकर के सन्यास है, साधु संप्रदाय है। उसके बारे में बहुत सारी बुरी बातें चलती भी है। वराह नगर मठ में एक बार ऐसा हुआ कि

कहानी: सारदानंदजी की आवाज़ को लड़की समझ बैठे पड़ोसी -- और रंगेहाथ पकड़ने आ गए!

उसके आसपास के लोगों के मन में वैसे ही साधुओं के प्रति विद्वेष पनप रहा था। वैसे ही वे लोग बोल रहे हैं कि अरे यह यंग लड़के घर छोड़ के यहां पर क्यों रह रहे हैं? निश्चय कुछ ना कुछ कौभांड करेंगे। एक दिन निश्चय एक ना एक दिन कुछ ना कुछ गड़बड़ करेंगे। ऐसा बोलकर के वे लोग आपस में वार्तालाप कर ही रहे थे। तो उस समय एक दिन ऐसा हुआ कि वराह नगर मठ में से पता है हमको कि गुरु भाई तो बीच-बीच में यह संगीत वगैरह का आयोजन करते थे। तो जोर-जोर से वो कीर्तन वगैरह करना वो भी तो वहां पर बहुत चलता था। एक दिन की बात है स्वामी जी अब देखिए गुरु भाइयों में भी तो हंसी मजाक बहुत चलता था ना तो स्वामी जी एकाएक ऐसा बोलना शुरू ठाकुर का ढोंग करना शुरू कर दिए जैसे कि वो ठाकुर कैसे वो मुंह में रसगुल्ला ना कि ऐसा कुछ खाते फिर वो भाव में चले जाते ऐसा सब ठाकुर का था ना बीच-बीच में भाव में चले जाते हैं तो नरेंद्र ने भी ऐसा हंसी मजाक में ऐसा करना करना शुरू कर दिया तो रसगुल्ला की ऐसा कुछ आया था और फिर रसगुल्ला थोड़ा सा मुंह में डाला और फिर ऐसा भान करने लगे कि जैसे वो भाव में चले गए हैं। बिल्कुल ठाकुर की तरह ठाकुर की नकल कर रहा है। तो भाव में चले गए ऐसा करके खड़े रह गए। तो फिर उनको देखकर के वे एक गुरु भाई भी जैसे वो पता है ठाकुर जब ठाकुर का फेमस फोटो है ऐसा करके वो भाव में गए हैं समाधि में और हृदय उनको पकड़ के खड़ा है तो ठाकुर के साथ में जब खड़े-खड़े वो भाव में चले जाते तो कोई ना कोई डिसाइपल उनको इस तरह से पकड़ के रहता कि वो गिर ना जाए तो यहां पे स्वामी जी भी ऐसा भान कर रहे हैं नकल कर रहे हैं ठाकुर की कि वह भाव में चले गए हैं तो एक गुरु भाई फिर उनको पकड़ के खड़ा रह जाता है तो फिर सभी लोग हंसी मजाक करते हैं। तो बढ़िया सा हंसी मजाक चला था। एकाएक स्वामी जी ने रुद्र स्वर से वीर स्वर से कीर्तन करना शुरू कर दिया। जय श्री गुरु महाराज जय श्री गुरु महाराज ऐसा करके चिल्लाना शुरू कर दिया। माने जो हंसी मजाक भाव ये जो ठाकुर की नकल वो जो सब चल रहा था एकाएक इस तरह के रुद्र गुरु प्रति गुरु के प्रति शरणागति के भाव में प्रकट हुआ जिस तरह से एकाएक महावीर का जो भाव है इन लोगों के ऊपर में सवार हुआ कि सभी लोग जोर-जोर से गुरु महाराज जी की जय और खड़े होकर के उदाम नृत्य कीर्तन करना शुरू कर दिया और वो वो जो नृत्य कीर्तन और उसकी जो गर्जना उन लोगों की गुरु महाराज जी की जय तो रास्ते पर जो लोग चलते थे वे लोग रास्ता चलना छोड़कर के वहां पे वो नीचे में आकर के खड़े हो गए सुनने के लिए कि कौन है इतने वीर स्वर से महावीर के भाव से महा महादेव के भाव से जो कीर्तन कर रहा है कौन है ये कैसे लोग हैं ये देखना चाहते हैं दर्शन करना चाहते हैं तो उस दिन तो ऐसा भाव जमा था कि जिसने जिसने ये स्मृति कथा लिखी है। वो कहते हैं कि वो फर्स्ट फ्लोर पर था तो वराह नगर मठ ग्राउंड फ्लोर तो पता है हमको कि पूरा वो जंगल जैसा हो गया था। वहां तो ये सियाल है, सांप है वे लोग भी रहते थे। वो एक्चुअल मठ तो था फर्स्ट फ्लोर पे। तो ऐसा नृत्य कीर्तन करना प्रारंभ किया कि ऐसा डर लग गया किसी किसी को कि ये जो उसकी यह जो यह है फ्लोर फ्लोर टूटेगा और पूरे सब लोग जमीन पे आ जाएंगे। और ऐसी कहानी भी है ठाकुर ने खुद कही है कि वो सीहोड़ ना कि कहीं गांव में एक जगह पे फर्स्ट फ्लोर पर कीर्तन हो रहा है। तो एक मोटा सा वैष्णव सा एक आया और जोर-जोर से उछलउछल करके कीर्तन करने लगा। अभी वराह नगर मठ का जो फ्लोर था वह तो शायद हो सकता है वह पक्का वो बनाया होगा। किंतु गांव में यदि इस तरह से फर्स्ट फ्लोर सेकंड फ्लोर होता है तो फर्श जो होती है या तो ग्राउंड फ्लोर की जो सीलिंग होती है वो तो मिट्टी की ही बनाई होती है तो उसमें तो ज्यादा स्ट्रेंथ होती नहीं है। तो यह जो मोटी साइज का वो जो वैष्णव था ऐसा उछलउछल करके कीर्तन करना शुरू किया फर्स्ट फ्लोर के ऊपर में कि फर्श टूटी और भड़ाम करके सब कीर्तन वाले ग्राउंड फ्लोर पर आकर के पट पटक गए। तो ऐसे तो कहानियां भी तो है इंटरेस्टिंगली ठाकुर वो हाजरा के बारे में कहते हैं हाजरा नेचे छिलो माने कीर्तन हुआ था तो वो हाजरा आज उसने नृत्य किया था क्योंकि अभी हाजरा का तो थोड़ा निराकार भाव था और फिर ये ठाकुर के शिष्यों की मजाक भी उड़ाया करता था तो उस दिन उसने कीर्तन में नृत्य किया तो एक न्यूज़ हो गया ठाकुर वो किसी ने कहा हाजरा नेचे छिलो कि हाजरा ने नृत्य किया था ठाकुर कहते उसकी और भूड़ियों छो उसकी जो ये उसकी जो पेट है मोटा था ना उसका पेट बड़ा ज्यादा था तो हाजरा भी नाचा था और उसका पेट भी नाच रहा था सो ठाकुर ये सब मजाक कर दे थे सो यहां पे भी वराह नगर में फर्स्ट फ्लोर पे इतना उदाम नृत्य कर रहे हैं सब लोग किसी को यह डर लग गया कि यह फर्श टूटे नहीं और ग्राउंड पे आके सब लोग पटके नहीं किंतु देखिए ठाकुर की कृपा से ऐसा हुआ नहीं किंतु कहने का आशय है कि इस तरह से उदाम नृत्य कीर्तन तर्जन गर्जन गुरु महाराज जी की जय यह सब तो वहां पर लगा ही रहता था। अभी एक दिन हुआ ऐसा कि वह जो पड़ोसी लोग हैं उन्होंने एकाएक सुना कि मठ के भीतर में कोई लड़की गा रही है। माने भजन चल रहा है और एक लड़की के आवाज से यह भजन चल रहा है। तो उन्होंने सोचा कि देखिए आखिर में वही हुआ जिसका हमें डर था। था वो हिंदी मूवी का डायलॉग है ना आखिर में वही हुआ जिसका हमें डर था वो कल हमने वो देखा था ना कि किस तरह से मिस वर्ल्डो वो देख रही है कि किस किस दिन स्वामी जी के चरित्र की कमजोरी है बाहर आएगी किस किसी ना किसी दिन बाहर आएगी वो उसने इतने डिसेप बहुत सारे टीचर किए हैं मिस व्ल्डो ने और सभी टीचर के भीतर में चरित्र की कुछ ना कुछ कमजोरी उसको दिखी है कुछ समय के बाद में बोल के उसने उस टीचर को छोड़ दिया है तो उसको को यही डर था कि स्वामी जी के प्रति मेरी इतनी श्रद्धा आज तो है किंतु डर हमेशा बना रहा कि उनके चरित्र की कोई ना कोई कमजोरी एक फेटल एक वीकनेस होती है वो एक ना एक दिन बाहर आ जाएगी तो हुआ भी सही वो जो फ्लोर टू सीलिंग फुल स्केल जो मिरर है स्वामी जी टहल रहे हैं बार-बार अपनी ओर देख रहे हैं तो अभी मिस वोल्डो सोचती है कि बस अभी तो अपने खुद के प्रेम में पड़ गए हैं वेनिटी पर्सनल वैनिटी उनकी बहुत हो गई है। अभी वह बबल बस्ट होगा। नाउ द बबल विल बस्ट। नाउ द बबल विल बस्ट। ऐसा वह बैठकर के सोच रही है डर के मारे और सोच भी रही है कि स्वामी जी को त्याग करना हुआ तो मुझे बहुत कष्ट होगा। किंतु फिर कुछ समय के बाद में स्वामी जी उसकी ओर देख के कहते हैं कि एलन ट्राई एस आई माइट। मैं चाहे जितना ही प्रयास कर लूं। आई कैन नॉट रिमेंबर हाउ डू आई लुक? हाउ आई लुक लाइक? मुझे यह याद ही नहीं रहता कि मैं ये मैं कैसा दिखता हूं। जब मैं मिरर में देखता हूं तो वो तो ठीक है कि मेरा चेहरा मुझे पता है कि चलो यह मेरा चेहरा है। किंतु जैसे ही मैं मिरर की ओर से मिरर में देखना बंद कर देता हूं। मैं अपने चेहरे को ही भूल जाता हूं। तो तब मिस वर्ल्डो को थोड़ा सा भरोसा हुआ कि नहीं चलो अभी तक उनके भीतर में इस तरह का पर्सनल वैनिटी नहीं आया है। किंतु उनका जो डर था कि साधु महापुरुष या तो बड़े टीचर उनके चरित्र की वीकनेस एक ना एक दिन तो बाहर आएगी ही आएगी। तो वैसे ही मठ के आसपास में जो लोग रह रहे थे तो वह लोग भी आपस में बोल ही रहे हैं कि यह लोग साधु बनकर के रहते हैं तो एक ना एक दिन कौभांड करेंगे। एक ना एक दिन भ्रष्टाचार करेंगे ही करेंगे। तो अभी एकाएक सुनने में आया कि वहां पर कोई लड़की गा रही है। तो उन्होंने ठीक कर लिया उस समय के कोलकाता में भी और आज भी आप देखेंगे कि इस तरह से पुरुषों का मन लुभाने के लिए वो गायिका को लाया जाता है। फिर वह उस तरह के गीत गाती है। वो मुशायरा वगैरह होता है ना। तो इस तरह से तो काफी पॉपुलर था। पॉपुलर हमेशा रहेगा। तो यहां पे भी इस तरह की किसी लड़की को लाए हैं और साधु लोग अभी सब भ्रष्टाचार कर रहा है। तो बोल के वहां के जो पड़ोसी थे वो कुछ लड़के उन्होंने सोचा कि अभी इन साधुओं कोंगे हाथ पकड़ा जाए औरंगे हाथ पकड़ कर के इनकी पिटाई की जाए और फिर हम उनको कहेंगे कि तुम लोगों को शर्म नहीं आती है। साधु हो करके एक गायक एक गायिका को लाते हो। फिर यह मुशायरा वगैरह करते हो। क्या सब नाटक चालू करके रखा है? आप तो भ्रष्टाचारी हो। समाज को भ्रष्टाचार समाज को भी भ्रष्टाचार में डूबाते हो। यह वो ऐसा वो कुछ लोगों को और फिर आनंद भी आता है ना ये सब करने में। तो ये कुछ लड़के वो गए मठ मठ में जाने का प्रयास किया तो दरवा जो गेट होता है मेन गेट वो बंद था। तो फिर इन्होंने क्या किया? दीवाल जो थी वो कंपाउंड था। कंपाउंड का गेट बंद था। तो कंपाउंड की जो दीवार थी दीवाल के ऊपर में चढ़ गए। दीवाल को इस तरह से क्रॉस करके भीतर में गए और फिर धीरे से जाकर के मठ का दरवाजा बिल्डिंग का जो था वो दरवाजा खुला ही था। तो वे लोग फर्स्ट फ्लोर पर गए यह सोच के कि पकड़ेंगे इनको हाथों। वो जाकर के देखा क्या कि शरद महाराज गा रहे हैं। एक्चुअली शरद महाराज स्वामी शारदानंद रामकृष्ण लीला प्रसंग के लेखक और मां के सेवक एक्चुअली शरद महाराज का क्या था? एक रेमिनेशंस में है एक एक जो कि मां का भविष्य में त्यागी संतान होने वाला है। किंतु उस समय तो वो एक एज ए एक लड़के के रूप में ही प्रथम बार गया था। तो वो कहता है कि शरद महाराज को जब पहली बार देखा तो इतने मोटे-सोटे गणेश की तरह उनकी उनकी यह जो यह है पेट इतना मोटा था और व्यक्तित्व उनका था बड़ा ही प्रभावशाली था। में तो बड़ा ही आश्चर्यचकित हो गया कि इतने प्रभावशाली साधु वाह बहुत अच्छी बात है। किंतु जैसे ही शरद महाराज ने बोलना शुरू किया मैं इतना आश्चर्यचकित हो गया कि उनका गले का आवाज इतना पतला है कि यदि आप उनके सामने में नहीं देखते होते या तो फिर पहली बार सुनेंगे तो ऐसा ही लगेगा कि कोई स्त्री बोल रही है तो वो शरद महाराज का फोटोग्राफ भी आपने यदि देखा होगा तो ऐसे मोटे-सोटे हैं पूरे किंतु बोलते थे तो उनके गले का आवाज बड़ा पतला था तो उस दिन शरद महाराज वो गान गा रहे थे कीर्तन कर रहे थे और उनका आवाज ऐसा पतला था कि लोगों को ऐसा भ्रम हो गया कि कोई लड़की गा रही है। बोल कर के यह लोग गए तो सही भीतर में जाकर के और फिर देखा तो अरे यही सब लड़के लोग ही बैठे हैं। शरद महाराज भी तो लड़के हैं और वही गा रहे हैं तो बेचारे बड़े ही शर्मिंदा हो गए। ये गुरु भाइयों ने पूछा कि क्या हुआ? इतनी रात को आप लोग यहां पर क्यों आए हैं? तो अभी कुछ तो उत्तर देना पड़ेगा ना। ऐसा कहेंगे कि आपका कीर्तन सुनने के लिए आए हैं तो थोड़ी ना यह लोग मानने वाले हैं। अभी तक तो इनकी निंदा ही की है। एकाएक उनका कीर्तन सुनने को क्यों आ जाएंगे? तो फिर उन्होंने कहा कि हमने तो सोचा कि यहां पे कोई लड़की गा रही है तो आप लोगों कोंगे हाथ पकड़ने के लिए आए। अभी यहां पे आकर पता चला यह तो लड़का है, लड़की नहीं है। तो, जैसे ही यह एक्सप्लेनेशन सुनी, तो सब गुरु भाई जोर-जोर से हंसना शुरू कर दिए। उन्होंने गुस्सा नहीं किया। लगे ठीक है चलो अभी इस तरह की गलती तो होती है जाओ निकलो यहां से तो देखिए कि यह जो समाज का उनके प्रति विद्वेष था इसकी कुछ ही घटनाएं हमको पता है आज किंतु होगी तो बहुत सारी किंतु हमारा लिटरेचर क्या है एक पॉजिटिव लिटरेचर है नेगेटिव घटनाओं को एक दो घटनाओं को लिपिबद्ध किया गया है जिससे कि क्या हो कि हमको एक आईडिया आए कि किस तरह तरह का विरोध इन लोगों के सामने था। किंतु एक बार यह आईडिया आ गया तो फिर बहुत ज्यादा नेगेटिविटी में नहीं जाना है। ऐसा बोल के बहुत सारी बातें यहां पे नहीं है। तो यह एक बैकग्राउंड था। इस बैकग्राउंड के भीतर में मठ को प्रारंभ होना था। यह गुरु भाई लोग रह रहे थे और इनको अपनी साधन साधना भी करनी है और सिर्फ यह समाज के जो लोग थे पड़ोसी थे वह भी नहीं किंतु इवन रामकृष्ण संघ के जो अंतरंग शिष्य भी थे खास करके यह रामचंद्र दत्त वगैरह उन लोगों का भी जो विरोध है उनको सहन करना था। इसके भीतर में से यह रामकृष्ण संघ आज इतना बड़ा हुआ है। और देखिए कि विरोध या तो फिर विद्वेष या तो फिर एक तरह का कटाक्ष भाव हमारे प्रति आज भी है। मैं बहुत बार मैं मुझे याद है कि मैं जब चेन्नई में था उस समय चेन्नई में ज्वॉइ करने को गया था तो हम लोगों को कभी-कभी बाहर जाना पड़ता था परचेस करने के लिए। तो जब भी बाहर जाएंगे ना तो लोग बोलेंगे हरे राम हरे कृष्णा। एक्चुअली क्या है देखिए कि यह हरे राम या तो हरे कृष्णा वैसे तो इस ने पॉपुलर किया है किंतु इसके साथ में बहुत सारी नेगेटिव एक माइंडसेट जुड़ा हुआ है। जो लोग ड्रग्स लेते हैं, चरस लेते हैं उन लोगों के साथ में वो फेमस गीत जो है ना वो मूवी का सॉन्ग जो है वो वो सब इस हरे राम और हरे कृष्ण को ये ड्रग्स और चरस और इस तरह की यह जो दो नंबरी जितनी भी हरकतें हैं उसके साथ में पब्लिक के माइंड में सेट कर दिया गया है। तो हम लोग भी अभी पता है कि यह रामकृष्ण के डिसाइपल है। इस वाले नहीं है। फिर भी यह हरे राम हरे कृष्ण ऐसा बोलेंगे। क्यों? क्योंकि वे लोग दिखाना चाहते हैं कि हमारे प्रति उनके मन में एक तरह का कटाक्ष भाव या तो फिर एक तरह का उपेक्षा भाव ही है। तो यह सब तो मैंने भी देखा है। तो बोल कर के देखिए कि इस तरह से अपना संघ प्रारंभ हुआ है।

वराहनगर मठ का विवरण

अच्छा अभी थोड़ा सा वीरानंद जी महाराज की स्मृति से पाठ करते हैं। विजानंद जी महाराज किस तरह से वराह नगर मठ के प्रारंभिक दिनों की बात करते हैं। हालांकि हमको यह भी पता है कि विजानंद जी महाराज जब आए थे बाय दैट टाइम स्वामी जी ने मठ छोड़कर के चले गए थे। किंतु अनफॉर्चूनेटली जैसे कि हमने देखा है कि उस शुरू शुरू के दिनों का बहुत ज्यादा डिटेल डिस्क्रिप्शन हमारे पास में नहीं है। मास्टर महाशय का कथामृत का जो डिस्क्रिप्शन है वही एक मिलता है और फिर यह विजानंद जी 1891 में जो आए स्वामी जी के यह प्रवृज प्रारंभ होने के बाद में वह एक थोड़ा सा डिस्क्रिप्शन है। किंतु यह डिस्क्रिप्शन बड़ा ही रिलेवेंट है बोल करके हम प्रारंभ के दिनों में ही इसको ले लेते हैं। तो क्या कहते हैं विजानंद जी महाराज? मठ बराह नगरे पाराणिक घाटे घाट रोड़े टाकीर मुंशीदेर ठाकुर बाड़ी पश्चात भागेर भग्न जीर्ण बाड़ीर ऊपर तलार भीतर अंश छिलो यह मठ जो है वह वराह नगर एरिया के परामाणिक घाट घाट अर्थात कि गंगा के ऊपर में घाट जो होता है उसका नाम था परामाणिक घाट तो परामाणिक घाट उस रोड के ऊपर में टाकी के जो मुंशी जो थे वो जमींदार थे टाकी एक सिटी का नाम है एरिया का नाम है वहां के जो जमींदार थे उनकी एक ठाकुर बाड़ी थी ठाकुरबाड़ी अर्थात मंदिर वो उस मंदिर के पीछे के भाग में एक भग्न जीर्ण बाड़ी भग्न अर्थात कि टूटी हुई और जीर्ण ऐसा ही अर्थ होता है जीर्ण शीण यानी कि एक इसको कहते हैं ना कि खंडहर की तरह इस तरह का एक घर था एक इस तरह की एक बहुत बड़ा घर था। इसके फर्स्ट फ्लोर के ऊपर में उस समय मठ था। रास्तार ऊपर एकटा दरजा दिए ढुके एक खोला जमी पार होले शणी दिए उठे काठे रेलिंग ओ थाम वाला बारंडार दक्षिण दिके सामने बो घरटाए आमी आशार आगे भाड़ा छिलो रास्ते के ऊपर में एक दरवाजा था गेट था उस गेट में से प्रवेश करेंगे तो एक बाहर में एक चौगान जैसा था खुला जमीन जैसा था गार्डन जैसा वो क्रॉस करके फिर आप बिल्डिंग िंग में प्रवेश करेंगे। फिर वहां पे आपको सीढ़ी से उठ के इस सीढ़ी के ऊपर में लकड़ी की रेलिंग थी और वो लकड़ी की रेलिंग क्रॉस करके एक लंबे वरांडे में आपको जाना है। वरांडे में से आप दक्षिण की ओर में सामने एक बड़ा कमरा है। उसमें यह मकान था। वो वो कमरा जो था वो भाड़े पे लिया गया था। परे एम नहीं खोला पड़ा था। तो यह जो वरांडा और यह जो मकान वगैरह थे बाद में वैसे ही खुला पड़ा रहता भीतरे मठेर अंश बाहिर रास्ता होते देखा तो ना बाहर के रास्ते से मठ का जो पार्ट था वह दिखने में नहीं आता था खूब निर्जन छिलो बहुत ही निर्जन जगह थी एक शमोश तो बाटी थी भूमि होए छे बाशटी छाड़ा आज अर्थात कि मुझे लग रहा है कि यह वीरजानंद जी महाराज 2030 साल के बाद में लिखते होंगे। तो उस समय यह समस्त जो घर है भूमिस हो गया है, टूट पड़ा है और उसमें सिर्फ बाहर का एक अंश बचा है। आपको यदि वह फेमस फोटोग्राफ आपने देखा होगा वराह नगर मठ का तो जो भीतर में जो प्रवेशने का जो गेट है गेट के आसपास के जो पिलर है वही एक दिखता है और बाहर बिल्डिंग जो है बाहर का अंश दिखता है। बस इतना ही किंतु भीतर का जो अंश है वह पूरा गिर गया था उस समय में। ऑफ कोर्स अभी तो वराह नगर मठ हमारे हाथ में आ गया है। जितना हो सके हमने उसको रिस्टोर करने का प्रयास किया है। किंतु यह उस समय की बात है। भीतरे मठेर ओशटार कोनो फोटो पावा जाए ना मठ का जो अंदर का भाग था उसका एक भी फोटो आज मिलता नहीं है। पिछने

सब्ज़ी की चोरी और माली का गुस्सा — रामकृष्णानंदजी की मज़ेदार कहानी

दिखे शाक सब्जी बागान पीछे में सब्जी का बागान था। शजने गाज एकटी बेल गाज और कोयकटी नारिकल और आमेर गाज शजने बोलकर के एक सब्जी है उसका एक उसके कुछ पेड़ थे पौधे थे एक बेलगा अर्थात कि एक बिल्व वृक्ष था और कुछ-कुछ नारियल अर्थात कि कोकोनट और मैंगो के ट्री थे आम के पेड़ थे एक्ट पुष्करणियो छिलो एक तालाब भी था माने मठ के पीछे के जो बड़ा सा एक बागान था उसकी बात कर रहा है। उसके भीतर में एक तालाब भी था। बागान शाक सब्जी बोो विशेष किु होतो ना बागान में सब्जी वगैरह बहुत ज्यादा होता नहीं था। डेंगो डाटा दुचारटा कुमडो शशा कला इत्यादि माने यह जो सब ड्रम स्टिक होता है फिर यह होता है कुमडो शशा अर्थात कि एक कक्कुंबर एक कोला अर्थात कि केला बनाना वगैरह सब कुछ होता था एक उड़े माड़ी माली छड़ो एक उड़िया माली था माली अर्थात कि गार्डनर वहां पे वो गार्डन की थोड़ी बहुत रखवाली किया करता था तो वो था उड़िया उड़िया अर्थात कि उड़ीसा उड़ीसा वासी ताके केो बले डाक तो उसको लोग केो बोल के पुकारते तरकारी किछू ना थाकले शशि महाराज माझे माझे बागाने ढके डेंगो कुमडो शाक सजने डांटा बा पाता फूल जा पेते निमेशर मध्य छिड़े बाटी दिए केटे आते यदि मठ में खाने के लिए कुछ नहीं रहता था बाहर से यह सब्जी तरकारी वगैरह खरीद करना मुश्किल हो जाता था वेजिटेबल्स खरीद करना मुश्किल हो जाता था। तो उस समय क्या करते ये शशि महाराज अपने मटकी मां माने सब लोग उनको कहते थे मटकी मां अर्थात कि वो सबके लिए पहले तो ठाकुर को भोग लगाना है तो उन्हीं को तो खाने पीने की चिंता करनी है। फिर वह सभी गुरु भाई तो क्या है कि सब कहां वो जब ध्यान में पड़े हुए हैं तो उनके मुंह खोल करके वो जो राइस वगैरह है राइस का बोल बना के उनके मुंह में बिठा देते थे। तो इस तरह से वो शशि महाराज सबकी संभाल लेते थे। बोल के यहां पे भी जब बाहर से वेजिटेबल वगैरह खरीद करना मुश्किल होता तो शशि महाराज क्या करते इस गार्डन में जाते और वो जो वेजिटेबल कटिंग करने की जो एक बंटी जो होती है इस तरह एक तरह का चाकू उसको लेकर के वो फिर यह वेजिटेबल्स वगैरह जो कुछ भी मिलता उसको तोड़ करके लेकर आते उन्हें निमेशर मध्य क्षण भर में तोड़ कर के लेकर आते फटाफट जाते फटाफट तोड़ते और फटाफट चले आते आर केो माड़ी केो माली उड़े भाषाए आरे आरे की करो की करो वही सब खा दियोना नियोना बोले पिछू पीछू ताड़ा करतो और जब शशि महाराज इस तरह से वेजिटेबल की चोरी करते तो वो जो उड़िया माली था वो चिल्लाता अरे अरे क्या कर रहे हो क्या कर रहे हो सब कुछ तोड़ लिया सब कुछ तोड़ लिया लो ना मत लो मत लो ऐसा बोलकर के चिल्लाता चिल्लाता शशि महाराज का पीछा करता कखुन गाल पाड़ तो चेचा तो किंतु शशि महाराज किु ही भ्रुक्षेप करते ना गो भरे अपनार मोने चले आस्ते कभी-कभी गाली देता कभी-कभी चिल्लाता किंतु शशि महाराज उसको बिल्कुल ही उसकी अवज्ञा करते उसको बिल्कुल इग्नोर करते और अपने मन में ही मन में अपने ही वह भाव में मग्न रह के वो चले आते उसको पूरा-पूरा इग्नोर करके ए नहीं ये शकले मिले खूब हाशी स्फूर्ति हो तुम यह सब लेकर के कि शशि शशि महाराज देखते हैं कि उन्हें बाकी सब गुरु भाई तो देख रहे हैं कि शशि महाराज जाते हैं गार्डन में वेजिटेबल चोरी करके ले आते हैं और यह जो उड़िया माली है वह चिल्लाता रहता है गाली भी देता है बोलता है अरे क्या कर रहे हो क्या कर रहे हो मेरा सब वेजिटेबल चोरी कर रहे हो सब चोरी कर रहे हो और शशि महाराज उसके सामने देखते भी नहीं है पूरे अपने भाव में जाते हैं अपने भाव में आते हैं तो इसको देखकर के बाकी जो गुरु भाई थे वे लोग काफी हंसी मजाक किया करते मठेर जाई हो मठेर शकले संंगे केलो माली बेश प्रीति भाव छिलो किंतु जो भी है ये जो उड़िया माली था केलो ये केलो माली उसका भले ही चाहे शशि महाराज को गाली गलौज देता रहता भले ही चाहे चिल्लाता रहता किंतु मठ के गुरु भाइयों के साथ में उसका बड़ा प्रीति का संबंध था बड़ा मित्रता का भाव था जोखन सुविधा होतो ताकि प्रसाद मिष्ठान आदि देवा हो तो और जब ये बलराम बाबू है ना कि सुरेश बाबू है ना कि मास्टर महाशय है। उनकी कृपा से मठ में यदि कोई मिठाई मिठाई है, मिष्ठान है ऐसा कुछ आता था तो फिर उसमें से यह केो माली को भी देते थे। बोलकर के उसके साथ में अच्छा एक प्रीति का संबंध था। और यह केो माली भी वैसे तो चिल्लाता था मुंह से जोर-जोर से अरे चुरा लिया चुरा लिया करके किंतु सही-सही में वह शशि महाराज को रोकता नहीं था। कंप्लेन नहीं करता था। तो यह एक क्या कहेंगे कि एक मधुर संबंध इसके साथ में था। आगे वीरजानंद जी

वराहनगर मठ के आंतरिक भाग का विवरण

लिखते हैं माने यह सब विरजानंद जी की स्मृति कथा है तो नीचे तलाटार भीतर बाहु कालेर आबर्जनाय ओ जंगले ऐन भरे ग छिलो जे तो जे ता शयालेर और शापेर बाशा होए छिलो यह जो मकान था अभी हमको तो पता है कि मठ तो था फर्स्ट फ्लोर पे तो ग्राउंड फ्लोर था वो इस तरह से वह जंगल से भर गया था पेड़पधे घास वगैरह पेड़ तो नहीं पौधे और घास वगैरह से ऐसा भरपूर हो गया था कि वहां पे एक शियाल अर्थात कि भी रहते थे और सांप भी रहते थे क्यों भय शेदी के जेतना भय के मारे डर के मारे ग्राउंड फ्लोर पे कोई जाता नहीं था प्रभाद आ कहा जाता है बहु काल पुरबे टाकीर दुरदान तो जमींदार देर आमले शेखाने कतो नर हत्या होए छे कहा जाता है कि बहुत पहले यह टाकी के यह जो जमींदार हैं, वह इतने पैशाचिक उनकी यह जो वृत्तियां थी, उनका स्वभाव था कि उन्होंने बहुत लोगों की हत्या उस जगह पर करवाई है। वैसे भी तो कायदा कानून जैसा कुछ था नहीं। ब्रिटिश गवर्नमेंट ने क्या किया था? इन जमींदारों को पूरा पावर देकर रखा था। यह तुम्हारी जमीन है। इस जमीन में से इतना टैक्स वसूल करके तुमको हमको देना है। तो यह जमींदार लोग भी यह नहीं देखेंगे कि किसान के पास में कितनी उपज हुई है। कितना अनाज है। उनको तो बस टैक्स लेना है। तो किसान के पास में से जोर जबरदस्ती टैक्स लेंगे। और यदि यह किसान मना करता है कहेगा कि मैं सब कुछ आपको दे दूंगा तो फिर मेरा परिवार क्या खाएगा पिएगा तो इस तरह के किसानों की हत्या भी कर देते थे। यह भारतवर्ष में जंगल राज रियल बारबेरिटी चलती थी। तो कहा जाता है कि यह टाकी के जो जमींदार थे वे लोगों का जो स्वभाव था इतना भयानक था कि उन्होंने इस तरह के कितने लोगों को उस मकान में लाकर के उनकी हत्या की है शजन ओके भूतेर बाड़ी बोलतो वो क्यों भाड़ा नीतो ना और इसीलिए उसको भूतिया मकान कहा जाता भूते बाड़ी अर्थात कि भूतिया घर कहा जाता और कोई इसको लेता पता नहीं था। जहां पर नर हत्या हुई है, वहां पे इस तरह के जिसकी यह जो कष्ट पाकर के जिसका देह त्याग हुआ है, कहा जाता है वे लोग भूत होकर के वहीं पर भटकते रहते हैं। तो बोल के सबको पता है कि यहां पे नर हत्या हुई है। तो वहां पे भूत भी रहते होंगे। बोल के उस मकान को कोई लेता नहीं था और भूतिया मकान या तो भूत बंगला बोल के वह जाहिर में पहचाना जाता था। मठेर एरा ताई दोष टाका भाड़ी पे भाड़ा पे छिलो इसीलिए मठ के गुरु भाइयों को सिर्फ ₹10 में यह मकान भाड़े पे मिला था वरना यदि वो एक नॉर्मल मकान होता तो उसका जो भाड़ा है वह कितना ज्यादा होता किंतु बोलकर के यह भूत बंगला बोल कर के यह परिचित है और कोई नहीं ले रहा है बोल कर के इनको सस्ते में भाड़ापा मिल गया था और इन लोगों को तो भूत-बूत की चिंता नहीं है ना वह खुद तो अपने से एक-एक भैरव है खुद खुद तो वो शिव के भूत और राम के बंदर है। उनको भूत की क्या चिंता तो बोलकर के उन्होंने सस्ते पे ले लिया है। नीचे तलाटार भीतर बाड़ी दिखे बहु कालेर आबर जनाए ओ जंगल ऐमन भरे गच लो हां ये तो पढ़ लिया हां ऊपर तलाई शणी दिए उठे बाम दिखे काली तपस्वी घर आप यदि सीढ़ी से ऊपर उठेंगे तो लेफ्ट साइड पे आएगा काली तपस्वी का घर यानी कि अपने काली महाराज उस घर में बैठे रहते थे जब ध्यान साधन भजन स्वाध्याय करते रहते थे बोल के उसको नाम दिया था काली तपस्वी का घर परे छोट फोटो धाप दिए उठे ओ नेमे भीतरे दिखे पुजार जोगाड़े घोर उसके बाद में थोड़ा सा एक उठान जैसा है थोड़ा सा एक उठने वाला है राइज प्लेटफार्म जैसा है उसको उठ के फिर थोड़ा सा नीचे आना है और उससे आगे जाएंगे तो पूजा का जहां पे जुगाड़ होता है यानी कि पूजा की व्यवस्था होती है फूल वगैरह सिले करके रखा जाता है चंदन घिसा जाता है माला बनाई जाती है वगैरह-वगैरह जो पूजा की व्यवस्था का जो एक कमरा था वो पूजा का जुगाड़ घर एक था ज मध्य मेजेते एकटी एक हाथ बाय एक हाथ परिमित चौका माटीर होमकुंड छिलो और इसी जगह पे वन हैंड बाय वन हैंड अर्थात कि दो-तीन फुट बाय दो-तीन फुट एक होम कुंड भी था तार भीतर दिए ठाकुर घरे जाते हो तो और वहां से ही ठाकुर घर में अर्थात कि जो शराइन गृह था गर्भगृह था वहां पर जा सकते थे शोजागी दालान घर दिए सामने रानना घर बाम हाथ लंबा होल घर जाके दाना देर घर बला हो तो तार परे पासे खाबार और मुख हाथ पा धोबार घर तार पर एकू अंधकार गोली पार होए पखाना नीचे सीढ़ी नेमे बागानेर भीतर दिए पुकुरे जाबार पद और ठाकुर घर में से थोड़ा सा आगे गए तो फिर वहां पे सामने में खाना बनाने का किचन आएगा उसके बाद में एक लंबा होल घर आएगा होल या तो फिर यह लोग कहते हैं भूत भूतों का कमरा यानी दानादेर घोर अर्थात कि ये दानवों का कमरा दानवों का घर ये पता है ना सब लोग तो दैत्य पिशाच जैसे ही थे सब लोग तो इसलिए उसको कहते थे दानवों का घर जहां पे सभी गुरु भाई बैठकर के हंसी मजाक वार्तालाप स्वाध्याय ध्यान भजन वगैरह करते थे उसके पास में खाने का और हाथ पैर धोने का कमरा था और उसके बाद में एक अंधेरा पैसेज जैसा था। अंधेरा पैसेज था। उसको पार करके जाएंगे तो वहां पे लैट्रिन था और उसके बाद में सीढ़ी थी। तो सीढ़ी से नीचे आएंगे तो फिर वहां पे जो तालाब था तालाब की ओर जाने का रास्ता था। होल घरे दिवाले नाना देव देवी अवतार देर ओ कृष जेुर छवि टांगानो छिलो यह होल घर अथवा तो दानवों का कमरा वहां पे दीवाल पे विभिन्न देव देवियों के फोटोग्राफ्स अवतारों के फोटो और यह जो क्रुसिफाइड जीसस उनका भी फोटो टंगा हुआ था ठाकुर घरे धुनो दिए शेगुली सम्मुखे शशि महाराज संध्यार समय एक हाथ धुन चीते धुनो ज्वेले ओ अपर हाथ एकटी आलोय जय गुरुदेव जय गुरुदेव श्री गुरुदेव भले धुनो देखिए फिरते उसके बाद में ठाकुर घर में अर्थात कि जो गर्भगृह था उसमें ये जो धुना देते हैं तो धुना देकर के उसके सामने शशि महाराज संध्या के समय में एक हाथ में ये धुना देने वाला जो पात्र होता है वो और दूसरे हाथ में एक प्रकाश का कुछ साधन लेके मशाल हो ना कि यह जो लटन हो कुछ भी हो वो लेकर के वहां पे जय गुरुदेव जय गुरुदेव श्री गुरुदेव बोल के धुना देते देते फिरते यह जो आपने वो दुर्गा पूजा बेलूर मठ का देखा होगा यदि तो पता है दशहरा के दिन मां दुर्गा का विसर्जन होता है तो जिस दिन विसर्जन होता है तो धुनचित अर्थात कि एक पात्र जैसा एक होता है मटकी जैसा मतलब मिट्टी का उसके भीतर में यह कोयले वगैरह डालकर के यह जो अभी कबीर जो होता है ना सुगंध वाला जो पाउडर वो डालते हैं। इससे क्या है? धुना जलता है। बहुत ही सुंदर खुशबू आती है। यह जो मुस्लिम फकीर लोग होते हैं ना वे लोग मुझे याद है मैं जब छोटा था तो हमारे स्कूल के सामने इस तरह से एक कब्र जैसा था और उसके सामने एक मुस्लिम फकीर इस तरह से धुना जलाता था। बड़ी सुंदर खुशबू आती है। तो हमारे मंदिर में भी इवन आज भी संध्या आरती होने से पहले यह मिट्टी का एक पात्र उसमें कोयला डाला जाता है। फिर वो जो अीर जो गूगल उसको बोलते हैं गगड़ तो गूगड़ का पाउडर डाल के उसको बड़ा ही सुंदर धुआ उठता है खुशबू का। तो वह सब ठाकुर मां स्वामी जी को दिखाते हैं। पुजारी महाराज फिर मंदिर में से बाहर आएंगे। जितने भी फोटोग्राफ्स हैं डायरेक्ट डिसाइपल के उनको दिखाएंगे। चारों ओर घूमेंगे। तो इससे क्या होगा? पूरा वातावरण जो है यह गुगड़ की खुशबू से भरपूर हो जाएगा। तो शशि महाराज भी यहां पर क्या करते? वह ठाकुर का घर का शाइन था। उसके सामने इस तरह से गुगड़ पाउडर डाल के धुआं जलाते और फिर एक हाथ में बत्ती रखते और एक हाथ में यह जो पात्र जिसमें कि धुआं जल रहा है वो लेकर के पूरे मठ में घूमते जिससे कि क्या होगा संध्या के समय पूरे मठ में एक सुंदर पवित्र वातावरण खड़ा होगा और जब यह धुआ लेकर के यह धूप लेकर के घूमेंगे तब जय गुरुदेव जय गुरुदेव श्री गुरुदेव श्री गुरुदेव ऐसा बोल बोल के चिल्लाएंगे, चित्कार करेंगे। शशि महाराज की भक्ति भी तो ऐसी थी ना माने महावीर जैसी भक्ति तो उनको देखकर के ही यह जो सुमधुर जय गुरुदेव श्री गुरुदेव की वाणी है उसको सुनकर के ही और यह जो धूप है उसकी खुशबू से ही हमारा मन यदि हजार चीजों में भटकता भी रहे तो फटाक करके सब अदृश्य होकर के सीधा ठाकुर के ऊपर में आकर के एकाग्र हो जाएगा। तो इतना सुंदर वातावरण वहां पर बनता था। इसके बाद में भी मठ का फेस बहुत सारा डिस्क्रिप्शन जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

रामकृष्णानंदजी की कहानी: स्वास्थ्य की आहुति देकर माँ सारदा और ब्रह्मानन्दजी को दक्षिण-भारत लाये

उनका डेथ भी इतना ट्रेजिक है ना कि देखिए कि उनको वो टीबी टीबी ना कि अस्थमा वही जो लंग्स का एक बीमारी था मोस्ट प्रोबेबबली टीबी ही था। तो टीबी का ऑनसेट हो गया था। किंतु उनके मन में पक्का बैठा था कि राजा महाराज और मां दोनों को साउथ इंडिया लाना है। साउथ इंडिया के भक्तों को उनके चरणों में सौंपना है। एकदम ठीक करके बैठे थे। तो टीबी स्टार्ट हो गया है किंतु छुपा के रखा क्योंकि अभी वह प्लान चल रहा है। मां आएगी राजा महाराज आएंगे तो किसी को बताना नहीं है। वरना फिर यह लोग बोलेंगे अरे तुमको टीबी है और तुम इतना सब दौड़धाम करते हो बैठो एक जगह पे रेस्ट लो ये सब ट्रीटमेंट करो तो उन्होंने टीबी को छुपा के रखा और फिर मां की पूरी टूर करवाई। वो तो कितनी सुंदर कहानियां है। सब जगह मां के साथ में जाते थे। सब जगह वह सेवक की तरह मां के साथ में खड़े रहते थे। 108 सोने के बिल पत्र देकर के मां के हाथ में मां के हाथों से रामेश्वरम में पूजा करवाई थी। शिवलिंग पे चढ़ा चढ़ावा दिया था। राजा महाराज आए थे तो राजा महाराज के सामने बिल्कुल एक नौकर की तरह एक गुलाम की तरह उनके सामने खड़े रहते थे। उनकी सेवा करते थे। सब कुछ हो गया। राजा महाराज और मां चले गए। फिर और ये टीबी तो बढ़ता ही जा रहा है। फिर वो बोल बाद में वह बेंगलुरु गए ट्रीटमेंट लेने के लिए। उस समय डॉक्टर ने कहा कि अरे महाराज आपने थोड़ा पहले ट्रीटमेंट करवाया होता तो आपको तो ठीक हो जाता। ये आपने वेट क्यों किया इतने साल? माने इतना समय लंबा आपने क्यों छुपा के रखा? तब शशि महाराज ने ये सीक्रेट बताया कि मेरी इच्छा थी कि मां और राजा महाराज आए। मैं अपने हाथों से उनकी सेवा करूं। सब तीर्थ दर्शन उनको करवाऊं और सब भक्तों को उनके चरणों में सुप्रत कर दूं। बोल के मैंने इसको अभी तक छुपा के रखा। तब डॉक्टर ने कहा कि किंतु अभी यह हद से बाहर चला गया है। अभी आप रिकवर नहीं हो पाएंगे। तब कहीं जाकर के वो गए हैं उद्बोधन आखिरी समय में अपने और उद्बोधन में उन्होंने देह त्याग किया और एक बार हुआ ऐसा कि रांची के कुछ भक्त आए जय राम भाटी। जय राम भाटी ना कि वहीं पे बोला कि मां आपको रांची आना है। चलिए हमने सब व्यवस्था कर दी है। न्यूज़पेपर में एडवर्टाइज भी दे दिया कि मां यहां पे आ रही है। तो मां ने कहा कि क्या तुमने शरद को पहले बताया क्या कि मैं आ रही हूं करके शरद की परमिशन तुम मां ऐसा तो हमने नहीं किया तो मां बोलती है कि देखो शरद ही आज एक जन हमारे झक्की पोहाते पारे माने मेरे जो झमेला उसको जो सहन करना है झमेला उठाना है सर पे मेरा वो शरद ही उठा सकता है और कोई नहीं उठा सकता पहले तुम जाओ शरद की परमिशन लो शरद महाराज जो व्यवस्था करेंगे तभी मैं आऊंगी तो रांची तो मां का जाना हुआ नहीं तो अब देखिए कि शरद महाराज के बाद शशि महाराज जो है कि मां का जो झमेला उठा सकते हैं मां का जो एक डिग्निटी है वह मेंटेन करके चलना है ना और कोई भी होता वहां पे और जिन्होंने यदि मां को इनवाइट किया होता मां कभी नहीं जाती इस तरह से जहां पे भी मां गई है तो मां के ये जो विश्वस्त जो गुरु भाई है सन्यासी संतान उन्होंने सब व्यवस्था की है तभी मां गई है तो वो बिल्कुल ठीक बात है। यदि शशि महाराज साउथ इंडिया में नहीं रहते तो मां और राजा महाराज का शायद वहां पे जाना होता ही नहीं। मैंने आपने ये दधीची की उपमा दी ना बिल्कुल ठीक कहा। दधीची जी के हड्डियों से जो पूरा राक्षस का वध हुआ। यहां पे शशि महाराज की हड्डियों से मने ये पूरा साउथ इंडिया में ये फाउंडेशन डला है। नो डाउट स्वामी जी बहुत कुछ रेडी करके गए थे। किंतु जो उसको सस्टेंड बेसिस पर खड़ा करना है वो पूरा शशि महाराज की वजह से ही हुआ है। उनका इतना मोटा सा एक ये पब्लिश हुआ है। उन्हें 150 एनिवर्सरी हुआ ना शशि महाराज का अभी तो इतना मोटा एक वॉल्यूम पब्लिश हुआ है। म लेटर्स आर्टिकल्स और रेमिनेशंस बोल के वो है मेरे पास में पड़ा हुआ है। बहुत बहुत सुंदर है। पूरा वॉल्यूम बहुत सुंदर है। किंतु किंतु यहां पे ही यहां पे ही जो अपना वो असली वेदांत यहां से ही प्रारंभ होता है ना कि निस्वार्थ तो है असली स्पिरिचुअल लाइफ। आप अब जैसे देखिए काली तपस्वी और शशि महाराज ये दोनों के बीच का कंट्रास्ट देखिए काली महाराज जो थे वो हमेशा एक सेल्फ अब्सॉर्ब स्थिति में रहते थे। मेरा स्टडी, मेरी तपस्या, मेरा जप ध्यान ऐसा एक उनका पूरा रहता था। जबकि शशि महाराज अपनी ओर देखे भी नहीं है। अब ये ऊपर ऊपर से लगेगा कि कहां काली महाराज की तपस्या विध्वत्ता और कहां शशि महाराज का एक तरह का गवार भाव। किंतु हमको यह भी तो पता है कि अल्टीमेटली काली महाराज को संघ छोड़ के जाना पड़ा। यानी कि देखिए कि सेल्फ सेल्फिशनेस का एक कण भी रहने से आप ना वेदांत के रास्ते पर बहुत ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाइएगा। और यदि सेल्फलेसनेस आप लेके आते हैं पूरे-पूरा तो डज नॉट मैटर कि आप जब ध्यान करते हैं कि नहीं करते हैं आप संस्कृत श्लोक वगैरह आप आता है कि नहीं आता है सेल्फलेसनेस इटसेल्फ इट विल टेक यू टुवर्ड्स योर अल्टीमेट एम रामकृष्ण संघ के फाउंडेशन में ही है गुरु सेवा यह जो बहिरंग अंतरंग क्यों हो गए बहिरंग वाले सोचते हैं कि अपने को अपनी साधन भजन की जो मेथड थी वो मिल गई ठाकुर से अभी कहां उनको कैंसर हुआ है उनके साथ में जाकर रहेंगे। कहां उनके वह जो कपड़े धोने हैं उनके लिए खाना उनकी सब व्यवस्था करनी है वगैरह कहां करने को जाएंगे? हमको तो अपना जो साधन भजन के लिए आवश्यक था मिल गया। तो अभी ये सब मुझे करने की जरूरत नहीं है। तो वे लोग हो गए बहिरंग और अंतरंग रहे कौन? अंतरंग में भी दो डिवीजन कि गृहस्थ लोग हैं। वे लोग सेवा तो करते हैं किंतु वो दूसरे टाइप की उस तरह की कि सुपरविजन करना है, पैसों की चिंता करनी है वगैरह-वगैरह टाइप की सेवा जबकि गुरु भाई एक थे क्योंकि फिजिकल व्यक्तिगत सेवा करते थे। यानी कि एक तो अंतरंग अंतरंग के भीतर में भी दो डिवीजन कि एक थे सुपरवाइजर जनरल सेवा और एक पार्टिकुलर उनकी शारीरिक सेवा। तो यह शारीरिक सेवा करके ही तो इन लोगों को मोक्ष मिला है और वही तो अपने संघ का फाउंडेशन है ना। यस यस हां माने वो सब तो सेल्फिशनेस में आ जाता है कि मुझे मुक्ति चाहिए। मेरी मुक्ति बाद में पहले ठाकुर का ठाकुर की सेवा संघ के फाउंडेशन में ही यही है। तो शशि महाराज का जीवन इस तरह से देखें तो आश्चर्यजनक नहीं है। इट्स एक्चुअली मैनिफेस्टेशन ऑफ आवर कोर आइडियाज। गंगाधर महाराज देखिए कि अखंडानंद जी अखंडानंद जी ने जिस तरह से सेवा यज्ञ प्रारंभ किया था उनकी खुद की रेमिनेशंस में उन्होंने लिखा है कि 24-4 घंटे तक मैंने काम किया है मैंने नहीं खाना खाया नहीं मैंने विश्राम किया इतना मैंने काम किया है तो वो जो टोटल सेल्फलेसनेस है किसके लिए माने वो जो दुष्काल के पीड़ित लोग हैं उनके लिए जो अनाथ बच्चे हैं उनके लिए वहां जो गुजरात राजस्थान में घूम रहे थे ये जो वहां के ये जो वर्कर थे सर्फ माने भ्र क्या बोलते हैं उसको दास थे दास अर्थात कि जिनका कि स्लेवरी जैसा उनका पूरा लाइफ था कोई ह्यूमन राइट्स जैसा नहीं था उनके लड़कों के लिए यह सब उन्होंने संपूर्ण रूप से न्योछावर कर दिया राइट सो ये सेल्फलेसनेस जो है वो चाहे गुरु सेवा के रूप में शशि महाराज की वो मैनिफेस्ट हो ना कि फिर ये अपने अखंडानंद जी की यह लोक दशेर दशेर जन दशेर कल्याण में अखंडानंद जी के रेमिनेशनंस वगैरह पढ़ेंगे ना तो बार-बार कहते हैं कि निजे कल्याण जन नहीं दशेर कल्याण जन दश अर्थात कि 10 अर्थात किर 10 लोगों के कल्याण के लिए मुझे कार्य करना है तो वो दशेर कल्याण जन और 10 लोगों के कल्याण के लिए गुरु सेवा के लिए हो कि और 10 लोगों के कल्याण के लिए तो दैट इज रियल वेदांत ना आप जितना भी देखिए शंकराचार्य का जो एक इनडाइजेशन भारत में हुआ है। 1000 साल की गुलामी क्यों आन पड़ी है? यह सब हम लोग वेदांत को इतना स्वार्थी एक फिलॉसोफी बना दिए हैं कि वेदांती को देखकर के ही लगता है कि एक नंबर का स्वार्थी आदमी होगा। वो अपना व्रत है, अपनी तपस्या है, अपनी साधना है, अपना साधन भजन है। उसी को लेकर रहेगा। उसके पास में एक आदमी बेचारा भूखा नंगा पड़ा भी है तो उसकी कोई चिंता नहीं करेगा। बोलेगा उसके कर्म है जो कि उसको इस तरह से करवाते हैं या तो भी उसके भी भीतर में ब्राह्मण है तो ब्राह्मण सफर कर रहा है ना वो आदमी थोड़ी ना सफर कर रहा है इस तरह से उसको उड़ा देगा तो ये जो वेदांत का इनडाइजेशन बहुत ही चला है भारत में ओम