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ओम स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरू पिणे अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः मैंने बेलूर मठ में जवाइन किया था जैसे आपको पता होगा कि जब भी आपको रामकृष्ण संघ में एस ब्रह्मचारी आपको प्रवेश करना है साधु के रूप में तो आपको कोई भी एक जॉइनिंग सेंटर में आपको जॉइन करना होगा और फिर वहां पर आपको बेसिक ट्रेनिंग दी जाएगी उसके बाद में हमारा एक बड़ा ट्रेनिंग सेंटर होता है वहां पर भेजा जाता है तो मैंने जॉइन किया था बेलूरमठ में ही बेलूरमठ में नए आए हुए लड़कों के लिए बेसिक ट्रेनिंग की व्यवस्था है तो वहां पर मेरे पास में वहां पर अभी उनका फिलोसोफी क्या है कि रामकृष्ण संघ में जितनी भी आवश्यकताएं हैं जितनी भी विद्याओं की आवश्यकता है आपको क्या-क्या सीखना है सीखना चाहिए सीखना उचित है वह सब आपको उसका एक आउटलाइन सिखा देंगे पाछ महीना आठन महीना तकरीबन रहना होता है आठन महीने से 10 11 महीना तो 10 न महीने में तो आपको और तो कितना सिखाएंगे कोई भी एक विद्या में आपको पारंगत नहीं बना सकेंगे किंतु सभी विद्याओं का एक आभास अवश्य दे देंगे तो संगीत भी सिखाया जाएगा और फिर यह योगासन वगैरह भी सिखाते हैं जैसे कि शरीर स्वस्थ रहे और फिर साथ-साथ में ही संस्कृत है राम कृष्ण विवेकानंद साहित्य है गीता है श्रीमद् भगवत गीता यह सब जितने भी अपने बेसिक शास्त्र हैं उनका भी एक ऊपर ऊपर से आभास दे देते हैं कि इस सभी शास्त्रों में क्या है तो वहां पर मैंने देखा कि यदि रामकृष्ण संघ के लिटरेचर में प्रवेश करना है गहराई में तो हमको दो भाषाएं एकदम आवश्यक है सीखने के लिए तीन एक्चुअली एक तो है बंगाली फिर है संस्कृत और फिर है इंग्लिश संस्कृत इसलिए क्योंकि अपना जो क्लासिकल लिटरेचर जितना भी है उपनिषद और उनके ऊपर की भाष्य और वाख्या टिकाए वह सब संस्कृत में है तो संस्कृत अच्छे से आ जाने से अपने शास्त्रों को बड़ा अच्छे से अध्ययन कर पाएंगे इसके बाद में बंगाली इसलिए क्योंकि रामकृष्ण संघ की जितनी भी बेसिक किताबें हैं सब बंगाली में है श्री राम कृष्ण लीला प्रसंग श्री श्री राम कृष्ण कथामृत श्री श्री मायर कथा श्री श्री मायर श्री श्री मां शारदा देवी बाय गंभीरानंद जी बहुत सारी किताबें हैं वो कि बंगोली में और इंग्लिश इसलिए क्योंकि स्वामी जी का कंप्लीट वर्क्स और स्वामी जी ने जो कुछ भी लिखा है कंपोजिशन ज्यादातर इंग्लिश में है तो तीन लैंग्वेज यदि आपको आ जाती है तो उससे आप अपने साहित्य में गहराई से जा पाएंगे उसमें अभी देखिए मुझे इंग्लिश तो थोड़ा बहुत आता था अभी प्रश्न रह गया कि बंगाली और संस्कृत दो लैंग्वेज सीखनी है तो मैंने उस समय सोचा कि देखिए समय अल्प है करना बहुत कुछ है दो-दो लैंग्वेज एक साथ में सीखने को जाऊंगा तो पता नहीं कब इसका मेल पड़ेगा और संस्कृत क्या है मैंने स्कूल में थोड़ा बहुत सीखा ही था ऊपर ऊपर से आता था तो क्यों नहीं बंगाली ही सीखे जिससे कि रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य है उसके भीतर में मैं गहराई से जा पाऊं तो बेलूर मठ में मैंने बंगाली सीखना शुरू किया और फिर बाद में मेरा पोस्टिंग हुआ था नागपुर नागपुर में नए मंदिर का उद्घाटन होने वाला था कंजग होने वाला था तो वहां पर ठाकुर भंडार में कार्य करने के लिए किसी ब्रह्मचारी की आवश्यकता थी तो मुझे भेजा कि जाओ ठाकुर भंडार में काम करना तो मैं वहां पर बैठता था ठाकुर भंडार में और देखिए कि ठाकुर की कृपा ऐसी है कि मैं सोचता था कि मैंने बंगाली सीखा है बंगाली किताबें पढ़ना प्रारंभ किया है अभी पोस्टिंग हो रहा है महाराष्ट्र में महाराष्ट्र में मुझे बंगाली किताब मिलेगी कि नहीं मिलेगी पता नहीं कैसे होगा किंतु देखिए ठाकुर की कृपा कि वहां की जो लाइब्रेरी है इतनी सुंदर है और अपना रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य जिसने भी जिन महाराज ने भी उस लाइब्रेरी की रचना की होगी या तो फिर लाइब्रेरी के लिए किताबें इकट्ठी की होगी अपना पूरा बंगाली साहित्य वहां पर है और मैं क्या करता था तीन-चार किताबें एक साथ में ले लेता था और हम तो साधु है तो हमारे हमको ई टाइम पर रिटर्न करना है दो किताबें मैक्सिमम ले जा सकते वह सब तो रिस्ट्रिक्शन हमको नहीं है चार-पांच किताबें लेकर के मैं ठाकुर भंडार में फ्रिज के ऊपर रख देता था जब भी पुजारी महाराज भोग देने के लिए बैठते या तो फिर अपनी पूजा चालू करते तो मेरे पास टाइम रहता तो वहीं पर बैठे बैठे है मैं यह सब बंगाली किताबें पढ़ता रहता था तो ऐसा करके मैंने बंगाली साहित्य में अपने रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में मैंने प्रवेश किया था और वो जो दिन थे वो दिनों की याद मुझे अभी भी आती है व नागपुर में भी और बाद में मेरा पोस्टिंग हुआ था लिमडी में तो लिमडी में क्या था कि छोटा सा वैसे आश्रम बहुत बड़ा है छ एकड़ का आश्रम है और वहां पर क्या है कि एक्टिविटी इतना कुछ नहीं है दो ही साधु है वहां पर बड़े महाराज थे जिनको हम बापा करके पुकारते थे गुजराती में बापा का अर्थ होता है फादर पिताजी तो सभी साधु लोग उनको बापा महाराज करके ही पुकारते थे तो वह बापा थे और मैं था हम दोनों ही लोग थे पूरे आश्रम में काम सब कुछ मुझे करना है किंतु साथ-साथ में समय भी बहुत मिलता था और आश्रम शहर से थोड़ा सा बाहर था चारों ओर हरियाली अपना खुद का आश्रम इतना विशाल और वहां पर लाइब्रेरी थी उसमें बहुत सारी खिड़कियां थी सभी भी खिड़कियां देखेंगे गार्डन में खुलती थी और गार्डन हमारा बहुत बड़ा छ एकड़ का गार्डन बिल्डिंग वगैरह अभी कुछ थोड़ा बहुत हुआ है उस समय तो कुछ नहीं था तो यह मैं वहां पर टेबल रहता था लाइब्रेरी में जहां पर मेरा ऑफिस था लाइब्रेरी कम ऑफिस मेरा था तो वहीं पर मैं अपने टेबल पर बैठता था और लाइब्रेरी की खिड़कियों में कभी गार्डन देखता था और यह कभी यह किताबें पढ़ता था तो यह मैंने देखा कि फिलोसोफी है फिलोसोफी का करके हमको एक अपना एक अंडरस्टैंडिंग डेवलप होता है उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है ठाकुर ने खुद ने छोटो नरन बोलकर के एक आता था भक्त तो ठाकुर ने उसको पूछा कि अच्छा बताओ तुमको क्या अच्छा लगता है ज्ञान ना भक्ति तो छोटो नरन इमीडिएट कहता है मुझे चाहिए शुद्ध भक्ति तो ठाकुर कहते हैं अरे तुम ज्ञान नहीं होगा तो तुम भक्ति किसकी करोगे फिर मास्टर महाशय पास में ही बैठे थे तो मास्टर महाशय की ओर इशारा करके कहते हैं यदि तुम मास्टर महाशय को पहचानते ही नहीं हो तो उनकी भक्ति कैसे करोगे जिनके ऊपर भक्ति करनी है उनके गुण उनका नाम रूप उनकी स्वभाव उनका परिचय यह सब तो होना चाहिए तब तो कहीं जाकर के उनके ऊपर भक्ति आएगी किंतु जैसा छोटू नारायण को ऐसा कहा बाद में ही यह मास्टर महाशय को कहते हैं ठाकुर किंतु देखो कि शुद्धाओ बालक जब ऐसा कहता है कि मुझे शुद्ध भक्ति ही चाहिए उसका एक अर्थ है क्यों क्योंकि यह बच्चा उसका संस्कार पवित्र है ऑलरेडी उसके मन के भीतर में ईश्वर क्या है श्री राम कृष्ण देव कौन है उनका सही स्वरूप क्या है यह सब धारणा बैठ गई है श्री राम कृष्ण देव को अवतार के रूप में स्वीकार करना उसने प्रारंभ कर दिया है तब इसलिए उसका मन जद शुद्ध हो गया है शुद्ध ज्ञान परि हो गया है तब वो ज शुद्ध भक्ति की बात करें तो अच्छा है तो देखिए कि ज्ञान होना चाहिए ज्ञान का तात्पर्य क्या है कि हमको फिलोसॉफिकल एक क्लेरिटी अपने मन में आ जाए कि हां आत्मन क्या है जीवात्मा क्या है आत्मन और जीवात्मा का क्या संबंध है जगत क्या है जगत की सृष्टि स्थिति लय कैसे होता है अविद्या का स्वरूप क्या है ब्रह्मण का स्वरूप क्या है अवतार कौन है ईश्वर कौन है ईश्वर अवतार का क्या संबंध है क्या प्रयोजन है यह सब फिलोसोफी हमको एक बार जान लेनी चाहिए किंतु यदि हम एक बार साधन राज्य में प्रवेश करेंगे साधना की शुरुआत करेंगे उपासना की नियमित उपासना का प्रारंभ करेंगे उसके बाद में हमारा सबसे अच्छा साथी या तो हमारा सबसे मजबूत संबल क्या है तो व है यह स्मृति कथाएं स्मृति कथाओं का क्या अर्थ है क्या तात्पर्य है यहां पर ना ही कोई बहुत बड़ी फिलोसोफी है ना ही छोटे-मोटे जादू चमत्कार आपको देखने को मिल जाएंगे किंतु लीला प्रसंग में ठाकुर के साधना का जो वर्णन है उसमें जिस तरह की अद्भुत बातें हैं वो शायद यह सब स्मृति कथाओं में ना दिखे किंतु स्मृति कथा का तात्पर्य प्रयोजन क्या है कि यदि हम जप करने के लिए उपासना करने के लिए बैठे हैं तो अपने मन में जद यह चलता रहे कि हां ठाकुर ने एक दिन यहां पर वह सीधे रास्ते से मंदिर के पीछे में जो रास्ता है वहां पर मॉर्निंग वो के लिए जाते थे ठाकुर चल रहे हैं साथ में मैं भी रामलाल दादा की जगह में ठाकुर के साथ में चल रहा हूं ठाकुर के साथ में मॉर्निंग वॉक करने के लिए अभी एक और गंगा है यहां पर पास में ही काली मंदिर है सीधा रास्ता है और ठाकुर जैसे संगी है तो फिर और क्या चाहिए अपना मन कैसा शांति और आनंद से भर जाएगा अरली मॉर्निंग है बड़ा सुनहरा समय है तो यह सब इमेजिनेशन स्मृति कथाओं का चिंतन मनन वो गाय जो है गाय पहले तो वो खा लेती है पुवाल वगैरह उसके बाद में बैठी बैठी उसको चिबा रहती है गुजराती शब्द है वागड़ आई डोंट नो मैं हिंदी शब्द भूल गया तो वो जो है वो गाय पहले तो खाएगी फिर बैठे-बैठे उसको चि बाती रहेगी अच्छा अच्छा तो स्मृति कथाओं का भी यही एक सुंदर एक तात्पर्य है कि आप उसको पहले तो पढ़ लीजिए उसका श्रवण कर लीजिए फिर जब उपासना करने के समय उसका थोड़ा सा चिंतन मनन उस करते जाएंगे तो मन ऐसा शांति और आनंद से भर जाएगा पता नहीं यह मतलब किस तरह का यह पावर है स्मृति कथाओं में मैंने अपने अनुभव से यह मैं कह रहा हूं कि इतना सुंदर यह सब कहानियां छोटी-छोटी आपको लगेगा अरे इसमें तो कौन सी बहुत बड़ी बात है यह कहानी में इस तरह की कितनी ही कहानियां न्यूज़पेपर में चलती रहती है आती रहती है पढ़ते रहते हैं कौन सी बड़ी बात है किंतु ठाकुर महा स्वामी जी डायरेक्ट डिसाइल की ये जो कहानियां है उनका एक पावर ही अलग है अवतार स्वयं पृथ्वी पर आकर के लीला कर रहे हैं तो इस लीला का क्या तात्पर्य है लीला करके आके नृत्य कीर्तन करके बातें करके चले गए जैसे कि मां ने बौद्ध गया में जाकर के देखा कि सभी वहां पर बड़े-बड़े मठ है बौद्ध भिक्षुओं के और वह भिक्खू लोग बड़े आराम से मठ में रहते हैं उपासना करते हैं तब मां ने ठाकुर को प्रार्थना की कि ठाकुर आप आए नृत्य कीर्तन करके लोगों के साथ में हंसी मजाक गल्प कहानियां करके चले गए किंतु फिर अभी आपके बच्चे जो है अभी वह घर घर घूम रहे हैं गली गली शहर शहर भिक्षा करते करते तो आपके आने का तात्पर्य क्या है प्रयोजन क्या है क्या सिद्धि हुई इससे तो फिर माने इस तरह से प्रार्थना की तो कहीं जाकर के हमारा पहले तो वराह नगर मठ फिर लाराम बाजार मठ फिर व नीलांबर गार्डन और फिर अपना बेलूर मठ इस तरह से अपने मठों की स्थापना प्रारंभ हुई तो यह जो उनके आकर के बातें करके कहानियां बता कर के चले जाने का तात्पर्य सिर्फ यह नहीं है कि कहानियां ठाकुर के साथ में ही चली जाएगी सिर्फ फिलोसोफी रह जाएगी नहीं फिलोसोफी तो रहेगी ही रहेगी लीला प्रसंग में शारदानंद जी महाराज जितना सुंदर रूप से ठाकुर के जीवन की आलोचना करते हैं उसका जो हमको उसका जो प्राधान्य है अपने साधक जीवन में उतना ही प्राधान्य यह सब छोटी-छोटी कहानियों का है तो आज फिर से थोड़ी सी कहानियां देखते हैं एक के बाद एक रामलाल दादा से ही हम रामलाल दादा की कहानियों का ही हम करते रहेंगे अनुसंधान तो रामलाल दादा एक बार कहते हैं कि मैंने ठाकुर को कहा कि अभी तो पता है कि ठाकुर पहले तो हृदय ठाकुर की सेवा करता था फिर मां ठाकुर की सेवा करने के लिए आई किंतु मां सब समय वहां पर दक्षिणेश्वर में नहीं रह पाती थी पहले हमने जैसे कि मां के जीवन का आलोचना हम लोग कर रहे थे मां के जीवन की आलोचना उसमें भी हमने देखा मां या तो बीमार हो जाती है या तो फिर कुछ ना कुछ व्याघात कुछ ना कुछ ये उसमें ये आ जाता है जिसकी वजह से मां को ठाकुर को छोड़ कर के देश अपने देश जयराम बाटी जाना पड़ता था तो उस समय यह रामलाल दादा रहते थे ठाकुर की सेवा करते थे एक दिन रामलाल दादा ने कहा कि मुझे देश जाना है देश अर्थात कि कमार पुकुर कमार पुकुर में इन लोगों का जमीन भी था जमीन में धन धान्य वगैरह भी उत्पन्न होता था और वो जब घर का तो थोड़ा मरम्मत वगैरह करना पड़ेगा तो रामलाल दादा ने कहा कि मैं देश जा कर के आता हूं यहां पर बहुत दिन आप आपकी भी सेवा की फिर मां काली के भी तो वह पुजारी थे तो मैं थोड़ा दिन घर जाकर के आता हूं कामा को तो ठाकुर ने कहा कि अरे भाई तुम इस समय जाओग जाओगे तो मेरी सेवा कौन करेगा अभी ठाकुर का तो पता है कि कितने वो डिपेंडेंट हो जाते थे दूसरे लोगों के ऊपर में जो उनकी सेवा करते थे ठाकुर अपने से इतने भाव में रहते थे इतने वो दूसरे जगत में रहते थे कि ठाकुर को इस जगत में क्या हो रहा है क्या नहीं इसके बाद में बहुत सारी कहानियां आएगी ठाकुर का यह जो भाव है अन्य जगत में चले जाना छोटी-छोटी बातों में तो इसकी बहुत सारी कहानियां आएगी बाद में तो ठाकुर का यह भाव था ठाकुर कहते तुम चले जाओगे तो मेरी संभाल कौन रखेगा तो रामलाल दादा कहते हैं कि देखिए अभी तो इतने सारे भक्त यहां पर आ रहे हैं और रात को भी मैं देखता हूं कोईकोई रुक जाता है जैसे कि राखल है वगैरह तो आपकी सेवा करने के लिए भक्त तो है ही है तो मैं मुझे थोड़ा अनुमति दे दीजिए ठाकुर कहते हैं कि देखो तुमको जिस तरह से पता है कि मेरी सेवा किस तरह से करनी चाहिए ठाकुर समाधि में बार-बार जाते थे तो समाधि में उनको स्पर्श करना कि नहीं करना कौन सी समाधि में कौन से देवता का नाम सुनाना जिससे कि वह समाधि से व्यथित हो वापस आए यह सब एक तो कोई नया आदमी तो नहीं जान पाएगा ना मां जब पहली बार दक्षिणेश्वर आई थी ठाकुर के साथ में एक ही कमरे में निवास कर रही थी ठाकुर पूरी रात समाधि में रहते थे और मां बेचारी भई की मारी एकदम डर जाती थी नया-नया सब देखा है तो भाव समाधि वगैरह तो ठाकुर को पता चला कि मां को डर के मारे नींद नहीं आ रही है तो ठाकुर ने मां को सिखाया कि कौन सी समाधि में कौन से भगवान का नाम लेने से मैं सहज अवस्था प्राप्त करूंगा तो यह सब तो लंबा समय रह कर के तो यह सब सीखा जाता है भक्त लोग यह लड़के लोग तो अभी नए-नए आए हैं जब को कैंसर होगा तब तो यही लोग सेवा करने वाले हैं मां और यह त्यागी संतान किंतु अभी एक संधि समय है त्यागी संतानों का प्रारंभ आने का प्रारंभ अभी हुआ है और मां उस समय होगी शायद जयराम बाटी में तो ठाकुर ने कहा कि देखो तुम चले जाओगे तो मुझे बहुत ही तकलीफ होगी तो एक दिन क्या हुआ कि ठाकुर शौच के लिए जा रहे हैं दक्षिणेश्वर में आपको पता है कि झाऊ तला बोल कर के झाऊ वृक्ष वो उसके तले में सोच के लिए जाया करते थे तो ठाकुर गए हैं शोच के लिए साथ में रामलाल दादा वो लोटा लोटे में पानी लेकर के जाते थे तो रामलाल दादा ने उस समय ठाकुर को फिर से कहा फिर से रिक्वेस्ट की कि मैं जाना चाहता हूं आप मुझे अनुमति दे दीजिए तो ठाकुर ने क्या कहा ठाकुर थोड़ा सा भाव में चले गए और भाव में से आकर के क्या कहते हैं जैसे कि एक ईश्वरीय आवेश हुआ हो ना जैसे कि भविष्यवाणी करते हो कि इस बार तुम्हारा जाना नहीं होगा यह तुम कुछ भी कर लो तुम चाहे खजान जी के पास जाकर के उनकी अनुमति मांगो ना कि कुछ भी करो ऐसा बोल कर के ठाकुर ने हवा में ऐसा सर्कल ड्रॉ किया और उसके भीतर में कुछ लिख दिया और सर्कल दौरा भीतर में कुछ लिखा और फिर कहते हैं जाओ अभी तुम कुछ भी कर लो तुम जा नहीं पाओगे अर्थात ये जो सर्कल ठाकुर ने हवा में जो वर्तुल दोरा है उसके भीतर में से तुम बाहर नहीं निकल पाओगे तो रामलाल दादा सोचते हैं कि ठाकुर तो कुछ भी बोलते रहेंगे इस का अर्थ यह थोड़ी ना है कि वो मतलब मेरा जाना ना हो व जाए खजांची के पास में गए और खजांची को कहा कि मैं जाना चाहता हूं तो खजांची ने क्या कहा कि आपको मैं इस समय छुट्टी नहीं दे सकता काली मंदिर में बहुत सारा काम है और फिर यह सब काम करने के लिए भरोसे के जो डेडिकेटेड व्यक्ति जो होते हैं साधक यह सबका अभाव है तो अभी इस बार में आपको नहीं जाने दूंगा तो ऐसा जैसे ही कहा और फिर रामलाल दादा का वहां प जाना कैंसल हो गया तो देखिए कि यह जो ठाकुर की जो शक्ति थी उसको कभी-कभी हमको लगेगा क्या यह मिरेकल था कि ठाकुर ने एक बार सोच लिया एक बार ठाकुर ने जगन माता के साथ में बात कर ली तो फिर जगन माता ने ही जैसे कि ठाकुर के अनुसार कहे अनुसार पूरे जगत को तो जगन माता ही चलाती है तो ठाकुर ने उनको रिक्वेस्ट की और जगन माता ने सब कुछ जैसे कि वो ठाकुर की इच्छा के अनुसार करना शुरू कर दिया हमको लगता है कि य तो चमत्कार ही है कि मां स्वयं जगदंबा स्वयं ठाकुर की बात सुनती है किंतु देखिए कि हम लोग स्वामी जी का राजयोग जब स्टडी कर रहे थे तब वहां पर स्वामी जी हमको आकाश और प्राण के बारे में बताते हैं इस जगत के जितने भी पदार्थ है वह सब आकाश में से ही उत्पन्न हुए हैं आकाश का ही परिणाम होकर के सब पदार्थ प्रकट हुए हैं और जितनी भी एनर्जी है जितने भी विचार है जितने भी ये शक्तियां है वह सभी शक्तियां प्राण में से प्रकट हुई है या तो फिर प्राण का ही एक दूसरे तरह का ट्रांसफॉर्मेशन परिणाम है और देखिए कि स्वामी जी का वह जो कोटेशन था कि यदि नॉलेज एंड कंट्रोल ऑफ दिस प्राणा इज व्हाट इज मीट बाय प्राणायाम इस जो पूरे जगत को जो नियंत्रित करता है विचार शक्ति हो ना कि ये भौतिक शक्तियां जैसे कि इलेक्ट्रोम मैग्नेटिज्म न किए फिर ग्रेविटी स्ट्रांग वीक न्यूक्लियर फोर्स यह जितने भी फोर्सेस हो अपने मन के जितने भी विचार हो अपने भीतर में जो पंचप्राण कार्य करते हैं वह हो सभी का एक ही उनका उत्स है एक ही उनका वहां से प्रारंभ होते हैं गंगोत्री जिसको कहते हैं गंगोत्री में से गंगा प्रकट होती है तो य ये प्राण बोलकर के जो पूरे विश्व में छाया हुआ है उसी में से यह सभी शक्तियां गट होती है और यह प्राण का नियमन ही प्राणायाम है स्वामी जी क्या कहते हैं दिस ओपनस टू अस द डोर टू अनलिमिटेड पावर यदि प्राण का नियमन करना सीख ले तो हमारे पास में अनंत शक्तियां प्रकट होती है सपोज फॉर इंस्टेंस अ मैन अंडरस्टूड द प्राणा परफेक्टली एंड कुड कंट्रोल इट व्हाट पावर ऑन अर्थ वुड नॉट बी हिज यदि कोई मनुष्य प्राण को समझ ले उसको संपूर्ण रूप से नियम करना सीख ले तो पृथ्वी पर जगत में ऐसी कौन सी शक्ति होगी जो कि इस मनुष्य के आधीन ना होगी ही वुड बी एबल टू मूव द सन एंड स्टार्स आउट ऑफ देयर प्लेसेस यह व्यक्ति प्राण को जो नियमन कर सकता है सूर्य और तारों को अपनी ऑर्बिट में से धकेल सकता है अपनी अपने जो जिस रास्ते पे जिस पथ से ब्रह्मांड में यात्रा कर रहे हैं उस पथ से कर कर सकता है टू कंट्रोल एवरीथिंग इन द यूनिवर्स फ्रॉम द एटम्स टू द हाईएस्ट बिगेस्ट सनस बिकॉज ही वुड कंट्रोल द प्राणा जगत में जो कुछ भी है छोटे से छोटे अणु से प्रारंभ करके विराट से विराट सूर्य सितारे ग्रह तक यह सब कुछ अपने प्राण प्राण से कंट्रोल कर सकता है दिस इज द एंड एंड एम ऑफ प्राणायाम प्राणायाम का तात्पर्य ही यही है प्राणायाम का तात्पर्य सिर्फ यह नहीं कि आप ब्रीद इन और ब्रीद आउट एंड पूरक कुंभक और रेचक यह सब करते रहे य एक मैकेनिज्म है किंतु इस मैकेनिज्म से आपको प्राण को कंट्रोल करना है व्हेन द योगी बिकम परफेक्ट देयर विल बी नथिंग इन द नेचर नॉट अंडर हिज कंट्रोल जब योगी परफेक्ट हो जाता है तो जगत में ऐसा कुछ भी नहीं है जो कि उसके कंट्रोल में ना हो इफ ही ऑर्डर्स द और द सोल्स ऑफ द डिपार्टेड टू कम दे विल कम एट हिज बिडिंग जद यह योगी ईश्व देवताओं को यदि वह आदेश करता है मृता आत्माओं को यदि आदेश करता है तो देवता है मृता आत्माएं स्वयं योगी के सामने आकर के हाजर हो जाएंगे योगी के आदेश का पालन करेंगे ऑल द फोर्सेस ऑफ नेचर विल ओबे हिम एज स्लेव्स प्रकृति की जितनी भी शक्तियां है गुलाम की भांति योगी के आदेश का पालन करेगी व्हेन द इग्नोर एट सी दिस पावर्स ऑफ द योगी दे कॉल देम द मिरेकल जब अज्ञ व्यक्तियों योगी की इस शक्तियों को निहारते हैं उसको देखते हैं तब वह योगी की शक्तियों को मिरेकल या तो फिर जादू चमत्कार कहकर पुकारते हैं किंतु एक्चुअली देर आर नो मिरेकल्स इसके पीछे में यह प्राणायाम का विज्ञान है तो अभी देखिए कि ठाकुर ने जैसे हवा में एक सर्कल दौर दिया फिर उसमें लिख दिया जो कुछ भी लिखा हो और रामलाल दादा का वहां से जाना ना हुआ इसके पीछे की बहुत सारी व्याख्या एं आप दे सकते हैं एक तो है काक ताली न्याय अर्थात कि पेड़ के ऊपर में कवा बैठा पेड़ की डाल टूट गई अभी आप कह सकते हैं कि कोवे के बैठने से टूटी ना कि डाल पहले से ही भीतर से वो सड़ गई थी और उसका टूटना ही था और अकस्मात कोवा आ कर के बैठा तो फिर मने ये दोनों के बीच का क्या संबंध है अकस्मात है ना कि ये पूर्वा पर संबंध है वो कहना मुश्किल है तो ठाकुर ने ऐसा हवा में लिखा यह प्राणायाम की शक्ति थी जगन माता को उन्होंने रिक्वेस्ट की थी जगन माता ने उनकी बात सुनी ना कि फिर ये सही में उस समय व्यक्तियों का कार्य कर्मचारियों का अभाव था और खजांची रामलाल दादा को मनावे से भी करने वाला था जो भी है किंतु एनालिसिस नहीं करके सिर्फ इसका आनंद भी ले तो हमको पढ़ने में कितना अच्छा लगता है अच्छा एक बार गिरीश घोष आया ठाकुर को कहता है कि दक्ष यज्ञ नाटक का अभिनय हो रहा है थिएटर में मेरे थिएटर में आप अवश्य पधारिए नाटक का नाटक को देखिए तो ठाकुर खुश हो गए ठाकुर ने कहा कि रामलाल दादा को चलो चलो नाटक देखने के लिए जाते हैं तुम भी चलो मेरे साथ में तो रामलाल दादा दोनों गए ठाकुर साथ में और कोई भी होगा पता नहीं किंतु यहां पर तो रामलाल दादा ने इन दोनों का ही उल्लेख किया है अभी जाकर के थिएटर में पहली बार गए हैं तो पता नहीं कि कहां से प्रवेश करना है क्या करना है तो जहां एक ऐसे रास्ते एक ऐसे दरवाजे के पास में पहुंच गए थिएटर के वहां पर चारों ओर जमीन पर गंदा फैला हुआ था धूल थी मिट्टी थी और सब खाना खा के लोगों ने सब फेंका हुआ था वगैरह सब पड़ा हुआ था ऐसे एक दरवाजे के पास में पहुंच गए तो ठाकुर अभी थोड़े से ठाकुर पता है ना अधैर हो जाते थे तो ठाकुर ने व किसी एक देखा कि कोई एक व्यक्ति वहां पर खड़ा है तो ठाकुर ने कहा कि अरे जाओ गिरीश घोष को कहो कि ये सब दक्षिणेश्वर से सब लोग आए हैं तो क्या करना है अभी तो जैसे ही गिरीश घोष को पता चला वह आया दौड़ा दौड़ा अभी देखिए कि जमीन पर यह खाना खाके उच्छिष्ट जो है जमीन पर फेंका हुआ है वहां पर ठाकुर खड़े हैं वो सीधा आकर के ठाकुर के चरणों में दंडवत प्रणाम करता है और दो-तीन मिनट तक ऐसा ही लेटा रहता है ठाकुर फिर आखिर में कहते हैं अच्छा गिरीश उठो अभी तो गिरीश खड़ा हुआ उन्हो एकदम सफेद कलर का वह जो कुर्ता पहना था उसके ऊपर में वो उच्छिष्ट सब लग गया है तो ठाकुर ने अपने हाथों से उसको साफ किया और कहा कि देखो अरे तुमने ऐसे अच्छे कुर्ता पहन कर के जमीन पर क्यों लेट गए देखो तुमको ऐसा गंदा लग गया ठाकुर बोलते हैं किंतु गिरीश थोड़ी ना सुनने वाला है गिरीश ठाकुर को अभ्यर्थना करके अपने वो भीतर में ले गए थिएटर के भीतर में और फिर जितनी भी अभी तो पता है ना कि जो स्त्रियां काम करती है वो जो थिएटर में अभिनय करेगी वो मेकअप वगैरह करना पड़ता है दक्ष यज्ञ नाटक था तो उस समय के अनुसार सब मेकअप वगैरह करेंगे सजें दज तभी तो कहीं जाकर के वो रंग मंच पे वो अवतरण करेंगे जैसे ही ठाकुर को भीतर में जाकर के बैठाया गिरीश घोष ने सभी वो जो स्त्रियां थी काम कर रही थी उन सबको बुलाया कि आओ ठाकुर आए हैं सब उनके चरणों में लुट पड़ो उनके पैरों की धुली ग्रहण करो जन्म जन्मांतर पवित्र हो जाओगे तो सभी स्त्रियां आई कोई मेकअप कर रही थी सजधज रही थी अधूरा छोड़ कर के सभी आई और ठाकुर को प्रणाम करने लगी और ठाकुर कहते हैं कि अच्छा ठीक है ठीक है मां आनंदमई तुम लोग नाच गान करके लोगों के मन को आनंद देते हो तुम लोग हो आनंदमई की किरण आनंदमई स्वय ठीक है अभी जाओ और अपना साज धज जो भी करना है करो और फिर थिएटर में जो कार्य करना है वह करना देखिए कि ठाकुर बहुत समय ऐसा होता था कि यह जो थिएटर में काम करने वाली स्त्रियां होती थी उनका चरित्र शायद अच्छा नहीं रहता था कभी-कभी ऐसा होता था किंतु ठाकुर को देखिए कि ठाकुर सती है ना कि असती है सही चरित्र वाले है कि चरित्रवान नहीं है सबको किंतु ठाकुर किस तरह के सम्मान की दृष्टि से देखते थे उनके भीतर में मां आनंदमय मां जगदंबा स्वयं का दर्शन करते थे वह जो कहानी है ना विनोदिनी बोलकर के एक नटी मने एक स्त्री थी वो जो इस तरह से अभिनय करती थी तो ठाकुर को उस समय कैंसर हो गया था काशीपुर में थे और इसकी इच्छा हुई कि ठाकुर का दर्शन करें किंतु उस समय तो ठाकुर के भक्तों को ही प्रवेश नहीं था रामलाल राम रामचंद्र दत्त को ही उन्होंने प्रवेश नहीं करने दिया था और वो जो ये बैठे थे वो चौकीदार होकर के निरंजन महाराज निरंजना आनंद जी बाद में तो अभी एक अभिनेत्री को तो कैसे प्रवेश करने देंगे तो उसने क्या किया कि वो दाना काली है उसका संपर्क किया और दाना काली ने इस अभिनेत्री को एक गोरे ब्रिटिश साहिब की तरह एक ब्रिटिशर की तरह सजाया कोट पेंट पहन के और स्किन तो वाइट थी ही तो ऐसा लगेगा कोट पेंट पहनने से कोई ब्रिटिशर आया है तो ऐसा बोल करर के दाना काली ने निरंजन महाराज को कहा कि ठाकुर को दर्शन करने के लिए आए तो निरंजन महाराज ने सोचा कोई ब्रिटिशर आया है तो अच्छा है ठीक है चलो जाने देते हैं बोल कर के उनको जाने दिया ऊपर ठाकुर के पास में गए विनोदिनी ने वो कोर्ट पेंट वो टॉपी जो पहना था निकाल दिया और ठाकुर को प्रणाम किए तो ठाकुर तो समझ गए कि किस तरह से निरंजन महाराज को ठक करके ये लोग आए हैं तो ठाकुर भी हसते हसने लगे और फिर ये लोग भी हंसने लगे तो देखिए कि ठाकुर का इनके प्रति इनके सभी के भीतर में किस तरह से वही आनंदमय मां जगदंबा का साक्षात्कार करते थे अच्छा अभी नाटक प्रारंभ हुआ यहां पर दक्ष यज्ञ का और फिर यह गिरीश घोष है वो कोई राजा के वेष में सज करके आए और फिर आकर के चिल्लाने लगे कि धरा में से इस धरा ऊपर में से पृथ्वी के ऊपर में से शिव नाम में हटा दूंगा शिव नाम घु चाई बो धरा थे के मने पृथ्वी पर से मैं शिव नाम को समाप्त कर दूंगा तो सुन कर के ठाकुर बोल रहे अरे ये साला बोले की ये साला क्या बोल रहा है फिर जब गिरीश नाटक स अपना अभिनय था अब पात्र समाप्त करके ठाकुर के पास आए और पूछने लगे कि ठाकुर आपको कैसा लगा ये अभिन तो ठाकुर बोलते हैं अरे तुम ऐसी बेतुकी बातें क्यों करते हो कि पृथ्वी पर से शिव का नाम मिटा दोगे तो फर गिरीश कहता है कि मारे महाशय क्या करें पेट के लिए तो सब कुछ करना ही पड़ता है खाने के लिए सब कुछ करना ही पड़ता है तो ठाकुर ने कहा अच्छा ठीक है ठीक है पेट के लिए करना पड़ता है वो मुने आहार यदि जुगाड़ करना है तो इस तरह का पात्र का भी अभिनय करना पड़ेगा अब यह जैसे किंतु सब समय ठाकुर ये इस तरह की आर्गुमेंट स्वीकार कर लेते थे ऐसा भी नहीं था चरित्र भी भीतर का देखते थे वो जो माइकल मधुसूदन दत्त वो उस समय यह लोगों का जो कालीबाड़ी के जो कर्ता थे त्रैलोक्य बाबू उनका और यह जो पास में वो जो एक फैक्ट्री है ना वो जहां पे देखा होगा बेलतला है उसके पास में वो जो ब्रिटिश लोगों का एक फैक्ट्री है मिल है जो भी है तो उन लोगों के साथ में एक मुकद्दमा होने वाला था कोर्ट केस चल रहा था तो लोगों ने बाबू लोगों ने यह माइकल मधुसूदन दत्त उस समय का प्रख्यात यह कवि जिसकी कविता यह जो इंद्रजीत वध ऐसा ही कुछ नाम है इसका पाठ मैंने वो कविता स्वामी जी को बड़ी ही पसंद थी उसमें से बहुत बार आवृत्ति करके स्वामी जी सुनाते थे तो वही माइकल मधुसूदन को उन्होंने आमंत्रण दिया कि बाबू लो ये जो ब्रिटिश लोगों के साथ में कोर्ट केस चल रहा है तो हमको कुछ उसमें सलाह दीजिए तो ठाकुर को भी बुलाया जिस दिन यह दक्षिणेश्वर आया था वो जहां पर कचहरी थी जो खजांची वगैरह जहां पर बैठते थे ऑफिस थी तो ऑफिस में ठाकुर को भी बुलाया और साथ में ये एक पंडित भी था कोई एक था पंडित ठाकुर का भक्त तो ठाकुर ने जाकर के फिर ये पंडित जो था ठाकुर के साथ में था उसने माइकल मधुसूदन को पूछा कि तुमने धर्म परिवर्तन क्यों किया तो ये माइकल ने अपना पेट दिखा कर के कहा देखो पेट के लिए करना पड़ा है तो वो कहता है कि अभी मैं क्या बात करूं ऐसे लोगों के साथ में जिनको कि पेट के लिए अपना धर्म परिवर्तन कर दे फिर यह माइकल मधुसूदन ने ठाकुर को कहा कि आप कुछ बताइए तो ठाकुर बोलते हैं मेरी कुछ बोलने की इच्छा ही नहीं हो रही है तो देखिए कि यह जो पेट के लिए यदि कुछ करना पड़े तो ठीक है चलो गिरीश घोष जो करता था एक पात्र सज करके के कहेगा कि शिव का नाम पृथ्वी से मिटा दूंगा तो किंतु गिरीश घोष के भीतर में सत्व ता ठाकुर ने देखा था और यह जो माइकल मधुसूदन जो भी कारण हो वैसे तो बड़ा ग्रेट कवि था स्वामी जी स्वयं उसकी प्रशंसा करते थे उसकी कविता की बड़े ही मतलब वो ये थे उनके वो फैन थे तो किंतु पता नहीं ठाकुर ने उसके भीतर में क्या दिखा ठाकुर कहते हैं उसके साथ में बात करने की इच्छा नहीं हो रही तो अभी वो फिर थिएटर में वापिस चले आते हैं पहले तो गिरीश घोष का अभिनय हुआ उसके बाद में मां सती का अभिनय चल रहा है तो अभिनय जैसे प्रारंभ हुआ जो पात्री जो सती बनकर के स्टेज पर आती है यह सब देख कर के ठाकुर इमीडिएट समाधि में चले गए देखिए कि जिन्होंने यह सती का पात्र बाकी सब स्त्रियों का पात्र जो ये कर रहे होंगे अभिनय पता नहीं किसका चरित्र कैसा होगा किंतु ठाकुर कहते हैं कि सबके भीतर में मैं मां आनंदमय स्वयं को दर्शन करता हूं तोय जैसे ही ये पात्र का अभिनय आरंभ हुआ ठाकुर इमीडिएट समाधि में चले गए समाधि में जब पूरा नाटक समाप्त ना हुआ समाधि में ही रहे गिरीश घोष ने आकर के आखिर में पूछा ठाकुर आपको कैसा लगा नाटक किंतु ठाकुर कुछ बोल ही नहीं पा रहे बहुत देर के बाद में जब गाड़ी में बैठ कर के दक्षिणेश्वर आ रहे थे तब कहीं जाकर के ठाकुर को थोड़ी सी होश हुई थोड़े से सहज अवस्था प्राप्त हुए और फिर रामलाल दादा को पूछा कि कैसा था नाटक बाद में मैंने तो कुछ देखा ही नहीं तब रामलाल दादा ने कुछ कुछ कहा कि बाद में यह अभिनय हुआ था वो अभिन हुआ था तो ठाकुर कहते वाह बहुत सुंदर बहुत सुंदर किंतु उस समय ठाकुर ऐसे भाव में चले गए थे कि जैसे कि सब कुछ विस्मृत हो गए थे और एक दिन की बात है ठाकुर इसी तरह से गाड़ी में बैठ कर के कलकाता जा रहे हैं किसी भक्त के घर पर तो अभी एकाएक रास्ते में उनको भूख लगी ठाकुर तो बच्चे जैसे हैं तो भूख लग गई बच्चे को कैसे व जब कभी भी भूख लगती है कभी भी खाने को मांगता है तो ठाकुर रामलाल दादा को पूछते हैं ऐसा इशारा करके कि यह पैसा है क्या तुम्हारे पास में पैसा शब्द नहीं व्यवहार करते हैं बोलते यह है क्या अर्थात कि पैसा है क्या करके पूछते हैं तो रामलाल दादा कहते हैं कि हां मैं सब समय कुछ नाई रामलाल दादा वर्णन करते हैं कि मैंने कहा कि मेरे पास में पैसा है और क्यों पैसा है तो वह हमेशा ठाकुर रास्ते में जाते-जाते यदि कोई गरीब व्यक्ति को देखेंगे तो कहेंगे अरे इसकी तो इतनी गरी इतनी खराब अवस्था है दो उसको थोड़ा सा पैसा दो तो मैंने ठाकुर के साथ में जब भी जाते हैं तो थोड़ा सा रुपया तो रखना ही पड़ता है तो ठाकुर ने कहा कि भूख लगी है जाओ कुछ लेकर के आओ तो फिर रामलाल दादा कहते हैं की दुकान यहां पास में ही है अब यह फागू जो है उसका बड़ा नाम है अपने साहित्य में काफी उसका उल्लेख आता है कथामृत में भी उल्लेख है कि गिरीश घोष आया है काशीपुर की बात है गिरीश घोष ठाकुर का दर्शन करने के लिए आया है ठाकुर उसके लिए कचोरी मंगा देते हैं और फिर कहते हैं फागो की कचोरी है गरम गरम है खाओ तो ऐसा करके यह कचोरी है जलेबी है यह फागो की दुकान की ये ठाकुर बड़ी पसंद करते थे तो यहां पे भी रास्ते में जब ठाकुर ने कहा कि भूख लगी है तो इमीडिएट रामलाल दादा यह फागू की दुकान से कचोरी जलेबी लाने के लिए गए कचोरी लाने के लिए और फिर जैसे ही लेकर के आए देखा कि ठाकुर गाड़ी में नहीं बैठे हैं वो तो घोड़ा गाड़ी जदी दक्षिण बेलूरमठ में जदी गए होंगे आप तो ठाकुर का म्यूजियम है वहां पे म्यूजियम में घोड़ा गाड़ी रखी हुई है कि ठाकुर इस तरह की घोड़ा गाड़ी में बैठ कर के कलकाता जाते थे तो ऐसी घोड़ा गाड़ी में देखा कि ठाकुर बैठे नहीं तो कोचमन अर्थात कि जो घोड़ा चलाता है उसको रामलाल दादा ने पूछा कि अरे बाबू कहां गए हिंदी में बात की बाबू अर्थात की ठाकुर ये ठाकुर कहां चले गए तो वो कोचमन कहता है कि अरे वो तो अभी गाड़ी में से उतरे और फिर सीधे इस रास्ते प चले गए तो रामलाल दादा ने वोह कचोरी रखी गाड़ी में ही और दौड़े गए देखा कि ठाकुर दूर से दिख रहे हैं जा रहे हैं सीधे एकदम स्पीड से चल रहे हैं तो वोह दौड़ कर के ठाकुर के पास में गए और कहने लगे अरे आप कहां जा रहे हैं चलिए चलिए वापस चलिए आपने कचोरी मांगी थी मैं लेक आया हूं तो ठाकुर सुन ही नहीं रहे हैं जैसे कि कि उनके कणों में उनके कान में कोई आवाज ही नहीं जा रही तो आखिर में फिर रामलाल दादा ने उनका हाथ पकड़ा कहा कि अरे आप कहां जा रहे है बताइए तो बात क्यों नहीं सुन रहे तो एक ठाकुर ने उनकी ओर देख कर के कहा हैं हैं कौन हो तुम कौन हो तुम फिर थोड़ी देर के बाद में उनका पता नहीं किस तरह के भाव में चले गए थे पता नहीं किस डायरेक्शन में जा रहे हैं ने उनके मन में क्या चल रहा है उसका तो अंदाज ही हमको करना है किस तरह से हम एनालाइज करेंगे तो थोड़ी देर के बाद में भाव का उपशम हुआ सहज अवस्था में आए और फिर अपने सर पर ऐसा दो-तीन बार मारा ब्रह्म रंद्र है तो वहां प दो-तीन बार और मार कर के फिर ऐसा करके सहज अवस्था में आए और फिर रामलाल दादा को कहते हैं कि देखो तुम मुझे अकेला छोड़ कर के कभी मत जाना और यदि जाना है तो पहले मुझे कहना कि मैं जा रहा हूं आप अकेले हैं आप कहीं पर नहीं जाइएगा तो यहीं पर बैठिए तो और जब मैं हां कहता हूं तभी तुम जाना मुझे अकेले छोड़ कर के अदर वाइज वैसे मत चले जाना अभी हमको प्रश्न हो कि वैसे ही छोड़ कर के ठाकुर को चले गए और ठाकुर के पास में से स्वीकार करवा के गए कि आप कहीं पर मत जाइएगा यहीं पर बैठिए दोनों में फर्क क्या है तो फर्क यह है कि सत्य रक्षा ठाकुर जब कितने ही भाव में भी आ जाते हैं तब भी ठाकुर सत्य रक्षा करना छोड़ते नहीं थे जैसे कि वह है ना कि यह लो तुम्हारी भक्ति यह लो तुम्हारी अ भक्ति जो कुछ भी है सब कुछ ठाकुर ने मां के चरणों में अर्पण कर दिया था किंतु यह लो तुम्हारा सत्य यह लो तुम्हारा असत्य ऐसा करके ठाकुर ईश्वर के मां काली के चरणों में अर्पण नहीं कर पाए थे ठाकुर ने कहा बाद में कि सत्य में मां को नहीं दे पाया तो सत्य रक्षा ठाकुर समाधि में भी चले जाए यदि उच्च भाव अवस्था में भी चले जाए किंतु सत्य रक्षा ठाकुर हमेशा करेंगे इसलिए ठाकुर ने कहा कि तुम जहां पर भी जाओ मुझे अकेला छोड़ कर के मेरे मुंह से एक बार स्वीकार करवा के जाना मैं यहीं पर बैठूंगा और कहीं नहीं जाऊंगा फिर तुमको जहां पर जाना है तब तुम कहीं पर जाना तो यह मतलब ठाकुर का बार-बार समाधि में चले जाना बार-बार समाधि में जाकर के या तो उच्च भाव में जाकर के विचित्र आचरण करना बाहर से विचित्र दिखता है पता नहीं उनके मन के भीतर में किस तरह से चलता होगा एक बार केशव सेन कोलकात्ता से जहाज करके दक्षिणेश्वर आया और ठाकुर को मैसेज किया मैसेज पहुंचाया कि आप आइए जहाज के ऊपर में एक गोरा साहेब आया है कुक के मिस्टर कुक करके तो उसके वो बड़ा ही पंडित और भक्त है तो वह भी आपका दर्शन करेगा और आप भी हमको कुछ ईश्वरीय वाणी सुनाइए तो ठाकुर ने रामलाल को कहा कि चलो जहाज पर चढ़ कर के मैं घूम कर के आते हैं बोलक के दोनों जहाज में आए अभी यह बात देखिए कि कथामृत में केशव के सेन के साथ में जहाज में भ्रमण करने का बड़ा ही सुंदर एक च चटर है जिसका कि हम लोग पाठ और चर्चा कर रहे थे किंतु यह जो भ्रमण है वह उससे भिन्न है कथामृत में ही है कि मास्टर महाशय का दक्षिणेश्वर कब आगमन हुआ था तो केशव सेन के साथ में यह कुक साहिब मिस्टर कुक जब आए थे केशव सैन के साथ में ठाकुर ने जहाज पर भ्रमण किया था उसके कुछ दिनों के बाद की यह घटना है कि मास्टर महाशय का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ था प्रथम आगमन अर्थात कि यह जो भ्रमण है इसका संपूर्ण विवरण अपने पास में कहीं नहीं है यहीं पे एक ऐसा लिखा हुआ है कि ये रामलाल दादा ने जो छोटा सा एक विवरण हमको दिया है केशव सेन के साथ में और मिस्टर कुक के साथ में भ्रमण का यही एक अपने पास में अवेलेबल है बाद में जब सेकंड टाइम केशव सेन आया था और फिर मास्टर महाशय भी थे उसका तो इतना सुंदर वर्णन है अपने पास में इतना विस्तृत वर्णन है कथामृत में किंतु यह भ्रमण का विवरण और कहीं पर नहीं है तो यह रामलाल दादा ठाकुर के साथ में गए अभी ठाकुर का तो पता है कि वो जैसे ही भक्त लोग इकट्ठा होंगे वो पहले तो भाव में चले जाएंगे फिर नृत्य कीर्तन कुछ होगा और फिर ईश्वरीय बातें जैसे कि अमृतम प्रवाह की तरह गंगोत्री में से गंगा जैसे कि बहती है ठाकुर की ईश्वरीय वाणी प्रारंभ हो जाएगी किंतु ऐसा हुआ अभी यह सब तो रामलाल दादा ने तो कुछ लिपिबद्ध नहीं किया किंतु जो घटना एक सबके मन में कुछ ना कुछ जिनका जैसा चरित्र होता है जिनकी जो ग्रहण करने की कैपेसिटी होती है सबके मन में में उसी घटना का तो असर होगा ना तो रामलाल दादा का जिस तरह का माइंड सेट था बोलकर के जिस तरह की घटना उनके मन के ऊपर में छाप वो छोड़ी है जिस घटना ने उसका वर्णन वह करते हैं कहते हैं कि गाड़ी जब उनके जहाज जब बड़े बाजार के पास में बड़ा बाजार मतलब यह कोलकात्ता का एक विस्तार जहां से गंगा बहती है तो वहां के पास में पहुंची तो ठाकुर नेका कहा कि भूख लगी है जाओ जलेबी लेकर के आओ फागू की दुकान से अभी ठाकुर को ये राम दादा हमेशा तैयार ही रहते थे बोला कि ठीक है फिर ठाकुर कहते हैं केशव को कि तुम मत जाना रामलाल जाएगा तो रामलाल दादा गए फागू की दुकान से गरम गरम जलेबी ले आए और फिर ठाकुर तो हुक्का भी पीते थे तो हुक्का है फिर हुक्के में डालने के लिए कोइला है कोयले पर डालने के लिए तंबाकू है फिर उसको आग लगाने के लिए आगन का वह टीका है यह सब लेकर के रामलाल दादा आए फिर ठाकुर ने कहा कि जहाज का एक एक जगह दिखा करके कि इस जगह को गंगा दल से गंगा से अच्छे से धो दो फिर यहां प यह सब चीजें रखो तो गंगाजल से जगह को धो दिया गया वहां पर यह कचोरी ये जलेबी जलेबी लाए थे इस बार तो ये जलेबी है फिर ये हुक्का है ये सब रखा गया ठाकुर ने बैठे जलेबी खाई और आराम से हुक्का पिया फिर यह रामलाल दादा को क्या कहते हैं देखिए ये सब का प्रयोजन क्या है रामलाल दादा ने इस बात को क्यों याद रखा है ठाकुर कहते हैं कि देखो यह सब क्यों करना हुआ पता है यह जो दिनु खजांची है खजांची अर्थात कि वहां का मुख्य प्रभ प्रभारी प्रबंधक कालीवाड़ा उसने मुझे केशव के साथ में जहाज पर जाते हुए देखा था अभी उस समय की जो सब प्रथाएं थी वर्ण प्रथा जाति प्रथा नात प्रथा इस सबके अनुसार कौन किसके साथ में खाता है क्या खाता है यह सबका बड़ा ही एक महत्व था तो तो यह चीनू खजांची ने देखा कि दीनू खजांची ने कि मैं केशव के साथ में जा रहा हूं केशव का तो ब्राह्मण केशव तो खुद तो ब्राह्मण नहीं है कितना ही चाहे पॉपुलर हो धनी हो गण्य मान्य हो समाज में लब्ध प्रतिष्ठित हो य तो ब्राह्मण तो नहीं है और मैं ब्राह्मण हूं फिर महाकाली के मंदिर में रहता हूं तो फिर मैं उसके घर जाऊंगा उसके साथ में घूमू क्या-क्या मैं उसके हाथ से खाऊंगा इसके लिए वो इस तरह की बातें ना फैलाए इसके लिए मैंने तुम्हारे हाथ से यह सब मंगाया और मैंने यहां पर बैठकर इसको खाया और जो बात ठाकुर नहीं कहता है रामलाल दादा के मन में भी यह सब होगा कुछ ना कुछ और रामलाल दादा हीय बातें फैलाने वाला कौन है ये ब्राह्मण समाज के जो भक्त है ना कि केशव सेन है वो तो काली मंदिर में जाकर नहीं बोलने वाले हैं कि ठाकुर ने हमारे हमने जो खाना दिया ठाकुर ने खाया यह बातें फैलाने वाले तो रामलाल दादा ही होंगे जिसका जैसा चरित्र है तो रामलाल दादा के हाथ से ही यह सब खाना मंगाया जैसे पहले तो केशव को कह दिया कि केशव तुम मत जाना रामलाल जाएगा तो रामलाल दादा के हाथ से ही खाना मंगाया रामलाल दादा के हाथ से ही जगह धुवाई स्वच्छ करवाई वहां पर बैठ के खाया और रामलाल दादा को यह सब कह रहे हैं कि ये सब की पीछे यह तात्पर्य है वो जो था ना कि वो ठाकुर जब वो साधना करते थे उपासना उनका समय था साधन साधक भाव में थे वो जब तो उस समय व गिरिजा घर में ठाकुर के मन की एक ऐसी इच्छा हुई कि मैंने सोचा कि गिरिजा घर में लोग किस तरह से उपासना करते हैं वह मैं देखना चाहता हूं फिर वो ठाकुर ने मां को कहा एक बार कि मुझे गिरिजा घर में ले जाओ ऐसा मौका दो वहां पर जाना हो किस तरह से उपासना होती है देखूं फिर साथ-साथ में ही कहते हैं कि किंतु फिर मैं जाने से दिक्कत यह है कि फिर मुझे यह काली मंदिर में वापस नहीं जाने देंगे तो क्या होगा बोल कर के ये जब इस्लाम धर्म की उपासना करते थे तो उस तरह के जो खाना आहार जो करना है उन लोगों के जैसा कि भात के भीतर में प्याज वगैरह डाल कर के यह सब खाना है तो मथुर बाबू ने सोचा किसी मुसलमान जद ये पाचक या तो रसोइए को बुलाएंगे वो खाना बनाएगा ठाकुर खाएंगे ये तो जात जाएगी यह सब कैसा सब झमेला हो जाएगा तो मथुर बाबू ने कैसी व्यवस्था की एक ब्राह्मण रसोइए को बुलाया एक मुसलमान रसोइए को बुलाया मुसलमान रसोइया ब्राह्मण रसोइए को डायरेक्शन देगा वो बताएगा किस तरह से बनाना है उसके अनुसार ब्राह्मण रसोइए ने खाना बनाया और ठाकुर ने खाया जिससे कि ठाकुर मैंने ये उस समय का जो भाव था तो ठाकुर तो कोई भांग के लिए तो आए नहीं थे तोड़ने के लिए ग गड़ा जाजन ने ऐसे च मतलब कि कंस्ट्रक्ट करने आए हैं डिस्ट्रक्ट करने नहीं सोसाइटी जैसी है वैसी है गा देने से तो कोई लाभ नहीं है इसी के भीतर में से रास्ता निकालना है तो ठाकुर और मां भले ही चाहे यह सब चीजों में विश्वास ना करते हो किंतु समाज में रहना है तो सब कुछ ठीक-ठाक करके यह लोग चलते थे अच्छा अभी यह यात्रा समाप्त हुई व जहाज वापस दक्षिणेश्वर आया दक्षिणेश्वर में से ठाकुर अपने काली मंदिर में जाने के लिए नौका में उतर रहे हैं और भाव में है भाव में टल मल कर रहे हैं जैसे भाव में आ जाता है तो शराबी कैसे वो ठीक-ठीक सीधा-सीधा नहीं चल पता उसके पैर इधर-उधर पड़ते हैं गिरते हैं तो वैसे ही ठाकुर भाव में ऐसे टल मल कर रहे हैं तो वो जो कुक साहिब थे वोह हंसना शुरू कर दिया तो फिर केशव सेन उनको कुछ समझाता है और वो हंसना उन्होंने बंद कर दिया तो रामलाल दादा को थोड़ा सा ये क्यूरियोसिटी हुई तो उन्होंने विस्मय के मारे इसको पूछा य केशव सेन को कि वो क्यों हंस रहे थे तो केशव ने कहा कि यह लोग कह रहे हैं कि बाबू को क्या इतना पिलाना होता है कि जिससे वह चल भी ना पाए पिलाना क्या मैंने शराब इसको इतनी शराब क्यों पिला दी व ठीक से चल भी नहीं पा रहा है ऐसा करके ये लोग मजाक कर रहे हैं फिर मैंने उनको समझाया कि ईश्वर के आवेश में आकर के उनके पैर ठीक नहीं चल रहे हैं तब ये लोग आश्चर्य चकित हो गए तो ठाकुर उस समय तो भाव में थे व अपने कमरे में जब आए भाव का उपशम हुआ थोड़ा से सहज अवस्था प्राप्त हुई तब रामलाल दादा ने उनको यह सब बताया कि वो कुक जो था ये आपके बारे में ऐसा कह रहा था कि इतना शराब पी ली है कि ठीक से चल भी नहीं नहीं पा रहा है और फिर केशव ने उनको समझाया कि नहीं ईश्वरीय आवेश में ऐसा हो रहा है तो फिर ठाकुर ने यह बात सुनी तो ठाकुर खुद हंसना शुरू कर दिए कि अच्छा ऐसा हुआ था तो केशव एक बार आया था दक्षिणेश्वर कोजागरी पूर्णिमा का दिन था अभी कुछ ही दिनों पहले कोजागरी पूर्णिमा गई थी लक्ष्मी पूजा होती है उस दिन तो उस दिन केशव वहां पर आया और शाम के समय देर देरी शाम हो गई थी चंद्र का उदय हो चुका था आकाश में उस में चांद तारे आकाश में दिख रहे हैं यहां पर सुंदर गंगा है और चांदनी अर्थात कि गंगा के ऊपर में जो घाट है वहां पे यह केशव और ठाकुर और केशव के जो साथ में जो भक्त आए थे ये लोग टहल रहे हैं उस समय रामलाल दादा ने क्या किया यह जो एक बास्केट बांबू का एक जो बास्केट होता है वह भर कर के मुड़ी लेकर के आए मुड़ी अर्थात कि मुरमुरा या तो फिर पफ ड राइस तो ये लेकर के आए हैं फिर उसके भीतर में थोड़ा सा ये तेल डाला नमक डाला फिर यह हरी मिर्च डाली फिर यह थोड़ा नारियल के लड्डू वगैरह जो है वो सब थोड़ा सा डाला और फिर अच्छे से हिला करके सबको खाने को दिया यह सब कोजागरी पूर्णिमा को वहां बंगोल में ऐसा खाते हैं तो ऐसा सब बनाया अच्छे से और सबको खिलाया वो खाते-खाते फिर खाने के बाद में ठाकुर ने कहा कि केशव मुझे तुम्हारा प्रवचन सुनने की इच्छा हो रही है तुम प्रवचन करो यहां प खड़े रह कर के तो पहले तो केशव मना करने लगा लज्जा के मारे देखिए कि केशव पूरे जगत में प्रवचन देकर घूमता था व विक्टोरिया क्वीन विक्टोरिया के साथ में उसका परिचय हुआ था उसके साथ में मुलाकात हुई थी किंतु फिर भी यही केशव सेन ये ठाकुर के सामने कुछ भी बोलने से झिझक था क्योंकि पता है कि ठाकुर किस अवस्था में ठाकुर किस उच्च अवस्था में स्थित है उनके सामने कुछ भी बोलना अर्थात कि यह जो यह होता है ना कि स्मिथ उसकी दुकान में यह सोई बेचने के लिए जाना जिसकी कान में यह लोहे का सरंजम बनता है उसको आप सोई बेचने को जाएंगे नीडल ऐसा एक अवस्था हो जाएगी तो केशव उनके सामने कुछ बोलता नहीं था किंतु इस बार जब ठाकुर ने रिक्वेस्ट की तब कहीं जाकर के केशव ने वहीं चांदनी के गाट पर खड़े रहकर थोड़ा सा प्रवचन दिया था और इसी को लेकर के ना बाद बाद में केशव के जो शिष्य थे वह केशव की देह त्याग के बाद में उन्होंने सोचा कि यदि हम इस बात का कुछ प्रतिकार नहीं कर ंगे कि जितने भी भक्त ठाकुर के पास में आते थे जिन भक्तों ने ठाकुर का वर्णन सुना है सभी को पता है कि ठाकुर के सामने केशव बोलने से झक था और कभी नहीं बोलता था जब तक ठाकुर खुद कुछ रिक्वेस्ट ना करें तो फिर उन्होंने अपनी वो केशव के ऊपर में जो बायोग्राफी लिखी ब्राह्मण समाज से उसमें उन्होंने लिखा कि ठाकुर ने भी केशव के पास में से बहुत कुछ सीखा है पहले ठाकुर निराकार को स्वीकार ही नहीं करते थे फि केशव के साथ में मिलकर के उन्होंने निराकार श्वर को स्वीकार किया केशव ने ठाकुर के पास से क्या सीखा तो मां का नाम कीर्तन करना सीखा तो साकार केशव ने ठाकुर के पास से साकार सीखा तो ठाकुर ने केशव के पास में निराकार सीखा अभी कहां वह केशव का निराकार और कहां ठाकुर अद्वैत साधना में सिद्ध निर्विकल्प समाधि प्राप्त हुआ उसका कोई तुलना ही नहीं है किंतु क्या है सभी संप्रदायों को तो अपने नेता को बड़ा करना है तो इस तरह से केशव की बायोग्राफी में कुछ लोगों ने ऐसा लिखा अभी किंतु देखिए कि यह बायोग्राफी ठाकुर के रहते-रहते ही प्रकाशित हो चुकी थी और उसमें ऐसी दूसरी भी बातें थी जिसमें कि लिखा है कि ठाकुर सिर्फ सन्यास आश्रम को ही प्राधान्य देते हैं कहते हैं कि गृहस्थाश्रम में ईश्वर प्राप्ति होगी ही नहीं किंतु बाद में वह केशव के परिचय में आए और फिर स्वीकार किया कि ना गृहस्थ आश्रम में भी ईश्वर प्राप्ति हो सकती है वगैरह वगैरह काफी कुछ उन्होंने यह सब लिखा अभी ठाकुर उस समय काशीपुर में कि कहीं पर थे काशीपुर में नहीं शायद वो दक्षिणेश्वर से भक्त के घर गए थे जहां पर भी हो गिरीश घोष के पास में यह बायोग्राफी आई गिरीश घोष ने और बाकी सब भक्तों ने ठाकुर को यह दिखाया तो ठाकुर ने यह देख कर के हां वोह काशीपुर की घटना नहीं है उससे पहले की ही घटना है तो ठाकुर ने यह सब देख कर के फिर जब ब्राह्मण समाज के जो कुछ भक्त उसमें से वो व्यक्ति भी थे जिन्होंने यह सब बायोग्राफी लिखी है या लिखने में सहाय की है वह जब थे तो गिरीश घोष उस समय यह बायोग्राफी लेकर के फिर ठाकुर के सामने इन लोगों को प्रश्न करने का प्रयास कर रहा है तो ठाकुर भी इसमें योगदान देते हैं ठाकुर ये लोग लोग कहते हैं कि पहले तो गिरीश ने कहा पूछा कि क्यों आपने ऐसा लिखा कि ठाकुर कहते हैं गृहस्थाश्रम में ईश्वर प्राप्ति नहीं हो सकती ठाकुर तो सब कुछ स्वीकार करते हैं गृहस्थ आश्रम हो ना कि सन्यास आश्रम हो निष्ठा होने से ही हुई जब तक निष्ठा है तब तक सब कुछ प्राप्त होगा तो ये लोग कहते हैं कि क्या कह रहे हैं ठाकुर क्या ऐसा कह रहे हैं कि गृहस्थ आश्रम में ईश्वर प्राप्ति होगी तो ठाकुर कहते हैं देखो बात ये नहीं है कि गृहस्थ आश्रम में ही ईश्वर प्राप्ति होगी बात है कि जब तक निष्ठा है तब तक सब कुछ प्राप्त होगा एक चीज दूसरा कि तुम लोग सब समय गृहस्थाश्रम अच्छा है गृहस्थाश्रम अच्छा है यह क्या है तुम लोग त्याग का महिमा ही नहीं समझते हो बोल कर के ठाकुर ने उनको थोड़ा सा डांटना पड़ा था तो देखिए कि ऐसे बहुत सारे उदाहरण है कि केशव किंतु यह सबका प्रारंभ कहां से हुआ था वहीं से ही जबकि केशव हमेशा ठाकुर के सामने कुछ भी बोलने से वो झिझक था प्रश्न कुछ करेगा और कुछ वार्तालाप करेगा किंतु ईश्वरीय बातें वो ठाकुर को सुनाएगा ऐसा बहुत ही रेर देखने को मिलता है तभी होता है जब ठाकुर स्वयं आदेश करते हैं अच्छा तो आज यही त कल फिर से मिलते है ओ शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णा अर्पण मस्तु कर से तो गिरीश ने एक बार कहा था कि ठाकुर में ठाकुर को कहा कि मैं ये सब थिएटर बंद कर देता हूं अभी मुझे सिर्फ ईश्वर की बातों में ही रस है तब ठाकुर ने कहा कि नहीं नहीं इससे भी लोक सेवा होती है इसको तुम चालू रखो