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Swami Vivekananda's Macrocosm & Microcosm ·

ज्ञान योग स्वामी विवेकानन्द Cosmos Microcosm 8 Jan 2024

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ओय धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूप अवतार षय राम कृष्णा यते नम कॉस्मस मैक्रो कजम में से हम पाठ कर रहे थे अभी इसको थोड़ा सा आगे बढ़ाते हैं इसके बारे में मैं थोड़ा सा सोच रहा था कभी-कभी हमको जो एक अंडरस्टैंडिंग होता है कि ठाकुर म स्वामी जी क्या कहना चाहते हैं उसके बारे में पता है किस तरह से कुछ कुछ चीजें फ्लेश होती है हम लोग पढ़ते हैं तब उसका शायद इंपॉर्टेंस नहीं समझ में आता किंतु जब कुछ मिस होता है माने पढ़ने से तो हमको कोई चीज समझ में आती ही है किंतु नहीं पढ़ कर के भी कुछ समझ में आता है जैसे कि रिसेंटली मैं अभी गुजराती ट्रांसलेशन देख रहा था मां की एक रेमसंस का तो ओरिजिनल रेमसंस बंगोली में लिखा है उसका गुजराती ट्रांसलेशन तो मैं थोड़ा सा देख रहा था तो ट्रांसलेशन बड़ा ही सुंदर है एक सन्यासी महाराज ने लिखा है उनका यह स्मृति है कि जयराम बाटी में रात का समय है और वहां पर तो आज की तरह इलेक्ट्रिसिटी सोशल मीडिया वगैरह सब कुछ नहीं है तो वहां पर एक दिया टीम टीम करता जल रहा है और एकदम शांत वातावरण आज की तरह ट्रैफिक भी नहीं पोल्यूशन भी नहीं एयर पोल्यूशन भी नहीं कुछ नहीं एकदम सुंदर शांत ग्राम्य वातावरण वह जो क्रिकेट जिसको कहते हैं हिंदी में गुजराती में कहते हैं सुनाई दे रहा है तो बस वही पला जैसे प्राकृतिक जो आवाज होती है आजकल तो क्या है कि हम लोग प्रकृति का जो साउंड है प्रकृति की जो आवाज है उसको भी तो सुनना भूल गए यहां पर कभी-कभी मैं बहुत अर्ली मॉर्निंग कभी उठ जाता हूं रात के 2 ढाई बजे तब वो आवाज सुनाई देती है कहीं वो जो पत्ता है वो थोड़ा सा हिलता है कहीं पे वो थोड़ा सा कोई पक्खी है उसकी कोई आवाज आ जाएगी या तो फिर ऐसे ही प्राकृति की रात की जो नाइट साउंड जिसको कहते हैं वो इतने सुंदर होते हैं बहुत ही धीरे से उसका आवाज आता है किंतु दिन भर के ये ट्रैफिक के आवाज में और सब नहीं सुनाई देता रात को सुनाई देता है किंतु वहां पर तो जयराम बाटी में ना ही ट्रैफिक था ना ही कुछ था तो यह सब सुंदर रात की ये जो आवाज है वह आ रही है मन को सुधन कर रहा है फिर मां अपने कमरे में बैठी है पास में एक कप में एक कटोरी में दूध रख रखा है कि मां का वो एक संतान कोई त्यागी संतान कहीं काम के लिए गया है किसी काम के लिए मां ने भेजा होगा वो पास वाले गांव में कुछ बाजार करने के लिए कुछ खरीदने के लिए या तो फिर और कुछ काम कर रहा है तो माने उसके लिए एक कटोरी में दूध रखा है और मां बैठी है पास में एक कटोरी भर दूध रखा है और मां का मन कहां वह एक अद्वैत राज्य में एक ईश्वरीय राज्य में विचरण कर रहा है किंतु गुजराती जो ट्रांसलेशन है वो यहीं पर रुक जाता है बहुत ही सुंदर एक सुहाना पिक्चर हमको बताता है रात का मां का मन कहां वह अद्वैत राज्य में विचरण कर रहा है उसके कुछ सुंदर विवरण है और फिर यहां पर कटोरी मां के पास में रखी हुई है और क्या इसका अर्थ क्या है कि देखिए कि मां की संतान का मां का जो संतान के प्रति प्रेम है वो किस तरह से अपने संतान की चिंता करती हुई हुई मां उसके लिए कटोरी में दूध बना बचा करके रखी और खुद वेट कर रही है कि कब मेरा लड़का वापस आएगा कब मैं उसको दूध पिलाऊंगी तो ऐसा सुंदर विवरण फिर उसको देखने के लिए टेली करने के लिए मैंने बंगोली में देखा तो बंगोली में एक सेंटेंस था जो कि गुजराती में मिसिंग था बंगोली में क्या लिखा है मां ने जो दूध की कटोरी रखी है उसके पास में ही एक लाठी या एक लकड़ी भी रखी हुई है क्यों क्योंकि जब बिल्ली आएगी और दूध में मुंह डालेगी तो उसको भगाने के लिए यह लाठी चाहिए अभी यह वाला सेंटेंस गुजराती में मिसिंग है अभी देखिए कि यह तो रेमसंस मैंने काफी समय पहले पढ़ा था और यह जो लास्ट सेंटेंस है वह तो ठीक है वह तो नेचुरल ही है यदि आप दूध की कटोरी रखेंगे तो बिल्ली से उसको तो बचाना ही पड़ेगा वो तो कोई मुझे पार्टिकुलरली स्ट्राइक नहीं हुआ किंतु जब गुजराती ट्रांसलेशन प बढा उसमें मुझे व एकदम इमीडिएट स्ट्राइक हुआ कि देखिए कि हमारी देवी किस तरह की देवी की जो कल्पना है वह किस तरह की है देवी है या तो ईश्वर है वह प्रेम स्वरूप है सबको अपने स्नेह के आंचल से बांध देते हैं किंतु यह कि पास में एक लाठी रखना कि जिससे कि वह बिल्ली को मार के भगा सके दिस इंट्रोड्यूस अ जारंग नोट इंग्लिश में जिसको कहेंगे इससे एक एक डिस्ट बंग एक भाव खड़ा होता है कि मां अपना जो मां के लिए तो सभी समान है एक त्यागी संतान वो जद काम करके आ रहा है तो उसको दद दूध पिलाना है तो बिल्ली भी तो वही मां की संतान है वो यदि दूध पीती है तो उसमें दिक्कत क्या है तो हम लोग जो एक वैष्णव भाव जो है कि सभी के प्रति दया प्रेम करुणा ममता रखनी चाहिए यही भाव देखिए किंतु वेदांत में तो है ही है किंतु साथ में ही वेदांत में शक्ति का तात्पर्य बताया गया है सभी की शक्ति एक जैसी नहीं होती सभी के भीतर में दिव्यता एक समान है बिल्ली के भीतर में जो दिव्यता है बिल्ली के भीतर में जो आत्मन है वही मां के त्यागी संतान के भीतर ही है किंतु दोनों में शक्ति का तफावत है इसीलिए ठाकुर ने जब ठाकुर जब ईश्वरचंद्र विद्यासागर को मिलने के लिए गए थे तो ठाकुर ने क्यों कहा कि मैं तुमको देखने के लिए क्यों आया हूं तुम्हारे में विद्वत्ता है तुम बारे में यह दया है करुणा है इसके लिए तो मैं तुमको मिलने के लिए आया हूं तुम्हारे सर के ऊपर में क्या दो सिंग निकले हुए हैं कि मैं तुमको मिलने के लिए आऊ ये जैसे इस तरह से कोई जिसी का एक विचित्र एक आकार रहता है कोई विचित्र डिफॉर्म रहती है शरीर में ऐसे लोगों को सर्कस में रखा जाता है जैसे कि कोई बहुत लंबा आदमी हो या तो कोई बहुत छोटा तो उसको देखने के लिए लोग सर्कस में आते हैं तो इस तरह से कोई विद्यासागर के सर पर बेल की तरह सिंह नहीं निकले कि ठाकुर उनको देखने के लिए गए हैं उनके भीतर में विद्या और करुणा दोनों का संगम था इसलिए ठाकुर उनको मिलने के लिए गए तो यह शक्ति ठाकुर कहते हैं कि शक्ति को स्वीकार करना हो तो यह देखिए कि यह तो एक इंटरप्रिटेशन है दूसरा है कि हमारे हिंदू धर्म में सृष्टि स्थिति और प्रलय तीनों अपने एक ही ईश्वर के हाथ में है जो ईश्वर इस संसार की सृष्टि करता है वही ईश्वर इस संसार का संहार करता है जबकि अब्राहम रिलीजन है खास करके क्रिश्चियनिटी वहां पर क्या है कि ईश्वर प्रेम स्वरूप है और जो कुछ भी बुरा होता है इस संसार में तो वो बुरा किस तरह से समझाएंगे तो बुरे को समझाने के लिए एक इवल या तो फिर सैतान उसकी एक रचना कर दी गई तो यह शैतान जो है वो संसार में जो कुछ भी संहार की अवस्था है या तो जो कुछ भी जैसे महामारी है महासंग्राम है गरीबी है जहां पर कष्ट है सफरिंग है यह सब शैतान देता है और जो कुछ भी अच्छा होता है सोसाइटी में यह सब भगवान देते हैं गॉड देते हैं तो उनके यहां पे इस तरह से गुड एंड इवल दोनों को समझाने के लिए एक ईश्वर और एक शैतान इस तरह से दो डिवीजन उन्होंने कर दिए कभी शैतान पावरफुल हो जाता है तो कभी ईश्वर पावरफुल हो जाते हैं यह उन का फिलोसोफी है किंतु हिंदू धर्म का क्या है कि यदि ईश्वर इनफाइनों देन वन नहीं हो सकते अर्थात कि ईश्वर एक ही है उसका एक शैतानी स्वरूप और एक अच्छा स्वरूप ऐसा नहीं है और यही एक ही ईश्वर सृष्टि स्थिति प्रलय तीनों को वही करते हैं जिस चीज का वो सृजन करेंगे उसी चीज का वह संहार करेंगे ठाकुर का वह कितना सुंदर वह दर्शन है देख बैठे थे देखा कि गंगा में से एक बहुत ही सुंदर एक स्त्री गंगा में से बाहर निकली उसने एक बच्चे को प्रसव किया फिर वही बैठ कर के उस बच्चे का भक्षण कर दी जैसे कि विकराल स्वरूप धारण करके एक भयावह स्वरूप धारण करके सुंदर देवी के रूप में प्रसव दिया और भयावह स्वरूप धारण करके बच्चे का भक्षण कर दिया तो यही एक ही ईश्वर है जो कि हमको खुशी भी देते हैं और वही ईश्वर हमको गम भी देते हैं जो ईश्वर हमारे जीवन में हैप्पीनेस एक आनंद यह हमको प्रदान करते हैं तो वही ईश्वर हमको आंसू भी देते हैं आनंद देने वाला ईश्वर और आंसू देने वाला ईश्वर एक ही है और वह आनंद और आंसुओं के माध्यम से वह हमारे मन में त्याग का वो प्रगट करवाते हैं क्योंकि ईश्वर की ओर आध्यात्मिक जीवन की ओर आखिर में तो हमको त्याग ही ले जाएगा जब तक त्याग अपने जीवन में नहीं आता तब तक किसी भी तरह की ईश्वर की ओर हमारी श्रद्धा हो या तो फिर हमारा कितना ही बालक भाव हो बालक भाव होने से हमको मां प्राप्त नहीं होती एक सुंदर इंसिडेंट मां के जीवन में है एक बार किसी एक भक्त ने मां को एक पत्र लिखा पत्र में लिखा पत्र लिखा या वो पर्सनल आ कर के बोला वो अभी मुझे याद नहीं किंतु उसने ऐसा कहा मां को कि मां आपके दूसरे संतान जिस तरह से आपके साथ में रह रहे हैं मैं आपके साथ में रह कर के आपकी सेवा नहीं कर सकता तो मुझे इस बात का बड़ा ही दुख है मुझे मातृ प्रेम नहीं मिला अपने जीवन में अपने साधक जीवन में तो यह बात सुनकर के मां किंतु थोड़ी सी नाराज हो गई और अब फिर वो भक्त को डायरेक्ट तो नहीं कहा किंतु बा पास में जो मां के संगी वगैरह बैठे थे उनको मां बोलने लगी कि देखो तो यह कैसी मातृ प्रेम नहीं मिला मातृ प्रेम नहीं मिला ऐसी बातें कर रहा है मातृ प्रेम से ही क्या सब कुछ होता है मन में जब तक त्याग तपस्या और निष्ठा और नियमित साधन भजन करने का डिसिप्लिन ना प्रकट हो तब तक मातृप्रेम किस काम का है तो वैसे ही ये ये जो बहुत ही डीप मीनिंग है ये हमारे वेदांत में और वेदांत को छोड़ कर के बाकी सब फिलोसोफी में बाकी सब जितनी भी फिलोसोफी देखेंगे बहुत तरह के वह ईश्वर की रचना करके रखे हैं कोई मा कोई कहां मां काली का स्वरूप है संहार करने वाला तो कहां यह सौम्य सरस्वती का स्वरूप है सबको ज्ञान और विद्या देने वाला तो वेदांत एकमात्र फिलोसोफी है व कहता है कि ईश्वर के ही यह विभिन्न विभिन्न गुण है ईश्वर के ही ये डिफरेंट डिफरेंट फंक्शंस है एक ही ईश्वर आपको प्रेम भी करता है और वही ईश्वर आपको कष्ट भी देगा और और प्रेम और कष्ट दोनों के रास्ते से चलकर के आपको अपने मन में त्याग प्रकट करना होगा जब तक संसार के ऊपर में वितृष्णा ना हो जाए जब तक यह जीवन असार है यह मन में दृढ़ ना हो जाए और जब तक मैं नियमित रूप से साधन भजन करना शुरू ना कर दूं तब तक तो हम आध्यात्मिक रास्ते पर पेर ही नहीं रखे तब तक तो सब बातों की बातें हैं ऑफकोर्स प्रश्न होगा कि क्या सबको सन्यास ले लेना है प्रश्न ही नहीं है गृहस्थ मार्ग और सन्यास मार्ग इन दोनों का प्रचलन तो अपने वेद में ही किया गया है गृहस्थ होकर के भी आप आध्यात्मिक रास्ते पर त्याग और डिसिप्लिन इन दोनों की नियमित साधना इन दोनों के रास्ते पर आप गृहस्थ आश्रम में रह कर के भी चल सकते हैं सन्यास आश्रम में रहकर भी चल सकते हैं वही है कि आपका खुद का एप्टिट्यूड क्या है उसके अनुसार आपको वह रास्ता सिलेक्ट करना है तो ये वेदांत का एक यूनिकनेक्ट स्थिति संहार एक ही ईश्वर के भीतर में है रदर देन कि एक ईश्वर है और एक शैतान है तो देखिए कि ये छोटा सा इंसिडेंट मैंने पढ़ा था बेंगोली में कि वहां पर वो लकड़ी भी रखी हुई है और बिल्ली जैसे आएगी तो वैसे ही मां उसके सर पर मारेगी तो बिल्ली भाग जाएगी तो ये इंसिडेंट मैंने काफी बार पढ़ा है किंतु जब तक मैं इसको मिस नहीं किया गुजराती में तब तक मुझे उसका तात्पर्य क्या है वह समझ में नहीं आया गुजराती में जिसने ट्रांसलेशन किया है वो उसने ऐसा सोचा होगा कि अरे भाई मां के संतान तो सभी लोग है जैसे वह त्यागी संतान उसके लिए मां दूध रखा है उसके लिए तो बिल्ली के लिए भी मां रखेगी तो बिल्ली को मार के भगा देना ऐसा जद मां के बारे में लिखेंगे तो भक्तों को अच्छा नहीं लगेगा बोलक के इस सेंटेंस को उड़ा दो तो जब तक मैंने यह नहीं पढ़ा तब तक मुझे इसका सिग्निफिकेंट नहीं समझ में आया था देखिए कि हम ईश्वर के बारे में किस तरह से अपनी कल्पनाएं ईश्वर के ऊपर में बिठा देते हैं यहां पर थोड़ा सा वैष्णव धर्म का यह प्रचलन ज्यादा है सब जगह पर वैष्णव धर्म वैसे तो सब जगह पर उसका प्रचलन ज्यादा ही है क्योंकि वह सहज ही मन को भा जाता है एक प्रेममय ईश्वर है उनकी आराधना करने से संसार के सभी कष्ट दूर हो जाएंगे यह कल्पना मनुष्य मन के लिए सहज स्वाभाविक है किंतु यही ईश्वर हमको डंडा भी मारेंगे बीच-बीच में जब तक मन में से एक बार त्याग प्रकट नहीं होता यह बात स्वीकार करना हमारे लिए थोड़ा सा मुश्किल हो जाता है हम लोग सोचेंगे कि मैं क्यों त्याग करो कि मेरे से तो त्याग संभव ही नहीं है तो त्याग छोटी-छोटी चीजों का ही करके हो सकता है ऐसा सोचेंगे कि जीवन भर का त्याग करके सन्यास ले लेना आप कभी वहां तक नहीं पहुंचेंगे किंतु छोटा-छोटा स्टेप बाय स्टेप त्याग करते जाइए अपने मन को डिसिप्लिन करते जाइए एक रूटीन में बंधते जाइए जैसे कि राजा महाराज ने कहा था उस दिन हमने पढ़ा था कि एक दिन आपने सैटरडे संडे वीकेंड है मेरे पास में छुट्टी है मैंने दिन भर बैठ कर के चलो एक मंदिर में गया मंदिर में बहुत सारा सुंदर फंक्शन हुआ सब कुछ अटेंड कर लिया वहां पर साधु सन्यासी जो है उनके साथ में बैठ कर के बात भी कर ली घर को रात को आकर के कथामृत का पाठ कर लिया और आधा घंटा एक घंटा जब भी कर लिया मुझे बहुत अच्छा लगा किंतु दूसरे दिन से जॉब चालू हो गया अपना बिजनेस चालू हो गया सब भूल गए तो ऐसे नहीं दिन प्रतिदिन के जीवन में आपको यह साधना है उसको बूंद देनी है साधना को वीव कर देना है जैसे कि एक धागे के भीतर में हम मोती को पोते हैं वैसे ही जीवन रूपी धागे के भीतर में प्रतिदिन की साधना हमको परो के रखनी है यदि 10 मिनट भी हो पाए तो भी बहुत है क्योंकि दिन प्रतिदिन हम 10-10 मिनट भी करते रहेंगे तो वो सर्कुलर वो इंटरेस्ट की तरह सर्कुलर डेट की तरह वो बढ़ता ही जाएगा बढ़ता ही जाएगा तो एक छोटा सा एक डायवर्जन अभी हम यह कॉस्मो माइक्रो कोसम स्वामी जी का लेक्चर है बहुत दिनों से इसका पाठ कर रहे हैं आज थोड़ा सा आगे बढ़ते हैं स्वामी जी ने इस प्रवचन में पहले ही प्रारंभ करके कहा कि यह सुंदर विश्व को देख कर के मनुष्य के मन में सहज ही प्रश्न होता है कि इस जीवन के अंत के बाद में क्या होता है मृत्यु के बाद क्या है क्या मैं ही एक आखिर सकता हूं मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है वगैरे प्रश्न होते हैं स्वामी जी क्या कहते हैं इज देर नथिंग परमानेंट इन दिस इनेसेंट ह्यूमन लाइफ इस मनुष्य जीवन यह जो क्षणिक मनुष्य जीवन है इनेसेंट ह्यूमन लाइफ क्षणिक मनुष्य जीवन है क्या उसके भीतर में कुछ भी परमानेंट नहीं है कुछ भी शाश्वत नहीं है इस देर नथिंग दे हैव आस्क वच डज नॉट डाई अवे व्हेन दिस बॉडी डाईज जब ये शरीर मृत्यु पाम होता है तब क्या ऐसा कुछ है जो कि रह जाता है जिसका मृत्यु नहीं होता जो कि अमर है जो कि जन्म मृत्यु जरा व्याधि के चक्र के ऊपर में विराजित है क्या ऐसा कुछ नहीं है मेरे भीतर में जदिया मरना इसका अर्थ क्या है इस शरीर के भीतर में एक ओजस्वी एक आत्मन है या तो ईश्वरीय सत्ता है एक डिवाइन पावर है जद यह स्थापित हो तभी तो यह जीवन का कुछ अर्थ रहता है वरना यदि मृत्यु के साथ साथ में ही यह चीता में जो भस्म हो जाता है शरीर तो मेरा सब कुछ यदि चीता के साथ में ही भस्म हो गया शरीर के साथ में तो फिर इस शरीर धारण करने का अर्थ ही क्या है देखिए कि बहुत बार जो लोग इस तरह के विचार करते हैं कथामृत में है कि मास्टर महाशय कहते हैं कि क्या जीवन का एक स सर्वोच्च आधार उद्देश्य नहीं है तो एक जर्मन फिलोसोफर शोपन ववर उसका उदाहरण मास्टर महाशय कथामृत में देते हैं कहते हैं कि शोपन होवर ने सोचा कि इस जीवन का कुछ अर्थ ही नहीं है इंद्रियों के भोग में डूबा हुआ यह जन्म मृत्यु जरा व्याधि में पिसता हुआ यह शरीर है इसको धारण करके क्या अर्थ है चलो मैं आत्महत्या कर लेता हूं बोलकर के वो आत्महत्या करने गया था तो मास्टर महाशय लिखते हैं है कि जदी एक उच्च ईश्वरीय आदर्श या तो ईश्वरीय सत्ता उसके बारे में हमारा विश्वास ना हो तो वह उस जर्मन फिलोसोफर की तरह होगा उसने जीवन से वो त्याग ये होकर के परेशान होकर के सुसाइड करने के बारे में सोचा तो मास्टर महाशय कहते हैं कि मुझे उसके जैसा नहीं होना मुझे ठाकुर के ऊपर में विश्वास है मुझे मां काली के ऊपर में विश्वास है मुझे यह विश्वास है कि हां मेरे जीवन में इस मृत्यु के बाद में भी इसका एक सारांश उसका जीवित रहेगा एक सारांश अमर रहेगा ऐसा मास्टर महाशय कथामृत में लिखते हैं तो यहां पर भी एक जनरल ह्यूमन टेंडेंसी है इस तरह के प्रश्न करने की पशु और मनुष्य दोनों में डिफरेंस क्या है मनुष्य में यह डिफरेंस है जो कि पशु है उसको खाना मिल जाए उसको शारीरिक सुख मिल जाए उसको कंफर्टेबल रहने की जगह मिल जाए तो उसी में उसको संतुष्टि हो जाती है जबकि हमारे लिए ब्रेड इज नॉट इनफ जैसे बाइबल में कहा है खाना रोटी कपड़ा और मकान हमारे लिए पर्याप्त नहीं है यह तीन सिर्फ मिलने से हमको संतुष्टि नहीं होने वाली हमारे भीतर में एक मुमुक्षु उव है वो मुमुक्षु उव हमेशा एक कुछ ना कुछ सोचता रहता है देखिए कि मुमुक्षु उव क्या है जब वो नहीं समझते हैं उसका एक लोअर स्वरूप है क्यूरियोसिटी ये क्यूरियोसिटी हमको साइंस और टेक्नोलॉजी के सभी इनोवेशन डिस्कवरी और या फिर यह डेवलपमेंट यह सब करने को प्रेरित करती है और यही मुमुक्षु उव का हायर स्वरूप है कि हम ईश्वर को खोजने के लिए जाते हैं तो जद ये मुमुक्षु उव नहीं रहता तो क्यूरियोसिटी भी नहीं रहती क्यूरियोसिटी नहीं रहती तो यह साइंस टेक्नोलॉजी ये डेवलपमेंट सिविलाइजेशन ये आर्ट्स कल्चर यह सब कुछ इतने सुंदर भजन इतने सुंदर पेंटिंग्स इतने सुंदर कलाएं इतने सुंदर लिटरेट सब कुछ कविताएं फिर किताबें कुछ नहीं रहता हमारे पास एक पशुव्रूला पे और मनुष्य से देवत्व के लेवल पर ले जाता है यह देखिए कि कोई बहुत सुंदर गान करता है तो उसके भीतर में तो वही देवी विद्या है देवी शक्ति है ठाकुर ने कहा है एक गाने वाला ठाकुर के पास में में आकर के वो बहुत सुंदर गान करता है फिर वो ठाकुर को सामने वो थोड़ा पश्चाताप करता है कि हां मैं तो इतना सुंदर गान करता हूं किंतु फिर वो साधना करने के लिए समय नहीं मिलता तो ठाकुर ने क्या कहा यह जो गान करते हो वो भी ईश्वर की ही देन है यह भी ईश्वर तोव का ही एक प्रकाश है स्वामी जी जब गान करते थे तो ठाकुर क्या कहते थे कि इस हृदय में जो है वो सर्प की तरह फैन धर कर के वो खड़ा होकर के सुनने लगता है एकाग्र होकर के सुनने लगता है तो यह गान के भीतर में भी वही ईश्वरीय तत्व वह झलकता है तो जो भी ह्यूमन अचीवमेंट्स है जद स्पोर्ट्स कहो ना कि ये लिटरेचर कहो ना कि ये साइंस कहो ना कि इंडस्ट्रियल इजेशन कहो ना कि इंजीनियरिंग कहो ये स्पेस शटल कहो सबके भीतर में ईश्वरीय का ही प्रकाश हमको दिखता है क्योंकि यदि वो हायर थिंकिंग मुमुक्षु क्व और क्यूरियोसिटी हमें नहीं होती तो इस सब में से कुछ भी नहीं होता हम शायद एक हायर लेवल के एप होकर के जैसे यह होमो इरेक्टस उसमें से होमो सेपियंस हम हुए तो ये होमो इरेक्टस में से होमो सेपियंस हम कभी नहीं होते वो होमो इरेक्टस हो कर के हम बैठे रहते हैं क्योंकि ही इट इज यदि आप ये कहेंगे कि व्हिच इज द बेस्ट बॉडी टू सरवाइव इन द वर्ल्ड तो ये होमो इरेक्टस का जो बॉडी है द बेस्ट बॉडी है ये बेस्ट फिजिकल फॉर्म है कि पृथ्वी पर सरवाइव करने के लिए वो आपको काम में लगता है डायनोसोर का जो फॉर्म है उसमें क्या है कोड ठंडा लहन था ठंडा लहू था कोल्ड ब्लड था तो क्या हुआ कि टेंपरेचर जब बढ़ने लगा तो डायनासोर का विनाश हो गया तो हमारे भीतर में तो गर्म खून है होमो इरेक्टस के भीतर में और एक थोड़ा सा एक कनिंग जैसा बुद्धि भी है कि किस तरह से टूल्स यूज करके हम लोग सरवाइव कर पाते हैं अभी एक बीच में एक स्टोरी मैंने पढ़ा था कि जब पडेम हुआ तो अभी क्या बंदर है कि बंदर तो क्या है कि बहुत सारे लोग बंदर को खाना खिलाते हैं और वैसे भी रास्ते में कुछ पड़ा है बाजार में दुकान में कुछ पड़ा है बंदर उसको फटा करके पकड़ के चला जाएगा किंतु पडेम के समय में सब कुछ लॉकडाउन था तो बंदर को खाना कहां प मिलेगा तो लिटरली ये ऑब्जर्व किया गया कि बंदरों ने ये जो टूल्स है टूल्स अर्थात कि किसी लकड़ी का इस्तेमाल करके किसी चीज को तोड़ करके उसमें से फल ले ले या तो पत्थर फेंक के ये फल निकाल ले ऐसे टूल्स का यूज करना बंदरों ने सीख लिया एक ही साल के पडेम के भीतर में तो ये बंदर है या तो ए जो एप की प्रजाति है उसके भीतर में इतना तो कनिंग है कि वह सरवाइव कर सकता है एक फैमिली उनका ग्रुपिंग भी रहता है बंदर के भीतर में देखेंगे कि बच्चे के प्रति मां की कितनी ममता है किंतु वो बंदर तक ही हम शायद सीमित हो जाते उसके आगे हमारा इवोल्यूशन ना होता अच्छा वो भी ऐसा भी बोलने वाले हैं कि बंदर में से हम कहां प्रकट हुए तो इसके आगे वाले लेक्चर में ही स्वामी जी ने कह दिया है कि हमको इवोल्यूशन वालों के साथ में कोई कोई झगड़ा नहीं है हम यह लोग बात स्वीकार करने को तैयार है कि होमो इरेक्टस में से ए में से मनुष्य आया है यदि आप यह स्वीकार कर ले इंटर्न इवोल्यूशन वाले कि ईश्वर में से सृष्टि का बीज प्रकट हुआ है इवॉल्व होकर के सृष्टि का बीज हुआ फिर वही सृष्टि का बीज इवोल्व होकर के आज सब कुछ जो हो रहा है वो दिख रहा है वो है अर्थात कि हमारे डीएनए में हमारे ब्लूप्रिंट में ईश्वरीय ईश्वरीय तत्व पहले से ही विद्यमान था इतना आप लोग स्वीकार कर लीजिए तो आपकी बात हम लोग स्वीकार कर लेंगे स्वामी जी का लॉजिक है तो स्वामी जी कहते हैं इज देयर नॉट समथिंग लिविंग वन दिस फ्रेम क्रम्बल्स इनटू डस्ट यदि यह पंचमहाभूत का शरीर मिट्टी में जब मिल जाता है तब क्या कुछ भी पीछे नहीं रहेगा इज देर नॉट समथिंग वच सर्वाइव्स द फायर वच बर्न्स द बॉडी इनटू एस चिता अग्नि जो हमारे शरीर को भस्मी भूत कर देता है तो तो भस्मी भूत होने के बाद में क्या शरीर कुछ भी पीछे नहीं छोड़ के जाएगा एंड इफ सो व्हाट इज इट्स डेस्टिनी वेयर डज इट गो वनस डिड इट कम यदि कुछ छोड़ के जाता है तो उसका डेस्टिनी क्या है उसका अंत क्या है वह कहां से आया और कहां जाता है यह प्रश्न मनुष्य सब समय पूछते रहते हैं दिस क्वेश्चंस हैव बीन आस्ड अगेन एंड अगेन एंड सो लंग एस दिस क्रिएशन लास्ट सो लोंग एज देयर आर ह्यूमन ब्रेंस टू थिंक दिस क्वेश्चन विल हैव टू बी आस्ड यह प्रश्न प्रत्येक युग में पूछे जा रहे हैं और जब तक हमारे पास में बुद्धि शक्ति रहेगी जब तक हमारे पास में यह ब्रेन रहेगा प्रश्न पूछने के लिए तब तक हम युग युगांतर तक यह प्रश्न पूछते ही जा आंगे यट इट इज नॉट ट द आंसर डिड नॉट कम किंतु यह भी नहीं है कि इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया गया इच टाइम द आंसर केम एंड एज टाइम रोल्स ऑन द आंसर विल गेन स्ट्रेंथ मोर एंड मोर प्रत्येक बार प्रत्येक युग में जब यह प्रश्न किया गया प्रत्येक युग में इसका उत्तर दिया गया है और जैसे यह समय की गति बढ़ती जा आती है वैसे ही यह प्रश्न का पावर प्रश्न के पीछे में जो उत्तर के पीछे में जो फोर्स है उत्तर के भीतर में जो प्रभाव है वह बढ़ता ही जाएगा बढ़ता ही जाएगा द क्वेश्चन वाज आंसर्ड वंस फॉर ऑल थाउजेंड्स ऑफ इयर्स अगो एंड थ्रू ऑल सबसीक्वेंट टाइम इट इज बीइंग रिस्टेटेड री इलस्ट्रेटेड मेड क्लीयरर टू अवर इंटेलेक्ट हजारों साल पहले हमेशा के लिए इस प्रश्न का उत्तर दे दिया गया है अभी रह क्या गया है प्रत्येक युग में इस उत्तर को उस युग के संस्कृति के अनुसार उस युग की भाषा के अनुसार उस युग् के कल्चर के अनुसार फिर से रिस्टेट करना पड़ता है रिस्टेट री इलस्ट्रेट फिर से उस भाषा में देना पड़ता है जैसे कि वेदांत में जो कहा गया है उसी अंतिम सत्य को भगवान बुद्ध ने पाली भाषा में व्यक्त किया जब बाद में जब पौराणिक युग प्रारंभ हुआ तो पुराणों की कथाओं के माध्यम से भगवान राम भगवान कृष्ण की कहानियों के माध्यम से वही अहम ब्रह्मास्मि महावाक्य इन कहानियों के माध्यम से कहा गया तुलसीदास ने इसी रामायण को भोजपुरी कौन सी लैंग्वेज है तुलसीदास की भोजपुरी ऐसी कोई लैंग्वेज है मैथिली या भोजपुरी उसी भाषा में उन्होंने रामायण को फिर से कहा जहां पर बंगोल में है कि वो क कृति वास रामायण इस तरह से उसका एक फिर से उसको लिखा गया तो सब समय यह प्रश्न है उसका उत्तर उस समय की लैंग्वेज में उस तरह की ट्रेडीशन में उस समय के कल्चर में फिर से दिया जाता है और आज के युग में भगवान रामकृष्ण ने आज की लैंग्वेज में उसका उत्तर दिया है ठाकुर ने बंगोली में कहा और स्वामी जी ने इंग्लिश में कहा तो आज की भाषा यह फिर से उत्तर दिया गया व्हाट वी हैव टू डू देर फर इज टू मेक अ रिस्टेटमेंट ऑफ द आंसर हमको क्या करना है नया उत्तर नहीं खोजना जो उत्तर हमारे वेद उपनिषद में है प्रस्थान त्रय जिसको कहा जाता है गीता उपनिषद और ब्रह्मसूत्र उसमें कहा गया जो एसेंस है महावाक्य अहम ब्रह्मास्मि यह महावाक्य को आज हमको आज की लैंग्वेज जज में फिर से हमको रिस्टेट करना है फिर से हमको ट्रांसलेट करना है वी डू नॉट प्रिटेंड टू थ्रो एनी न्यू लाइट ऑन दोज ऑल एब्जॉर्ब प्रॉब्लम्स बट ओनली टू पुट बिफोर यू द एंस एंट ट्रुथ इन द लैंग्वेज ऑफ मॉडर्न टाइम्स टू स्पीक द थॉट्स ऑफ द एशट्स इन द लैंग्वेज ऑफ द मॉडर्न टू स्पीक द थॉट्स ऑफ द फिलोसोफर इन द लैंग्वेज ऑफ द पीपल टू स्पीक द थॉट्स ऑफ द एंजल्स इन द लैंग्वेज ऑफ मैन टू स्पीक द थॉट्स ऑफ गॉड इन द लैंग्वेज ऑफ पुअर ह्यूम निटी सो दैट मैन विल अंडरस्टैंड देम फॉर द सेम डिवाइन एसेंस फ्रॉम व्हिच द आइडिया नेटेड इज एवर प्रेजेंट इन मैन एंड देयर फोर ही कैन ऑलवेज अंडरस्टैंड मम य ये शरत महाराज कहो ना कि स्वामी जी कहो ये लंबे-लंबे सेंटेंस फॉर्म करने का उनको बड़ा ही शौक था शरद महाराज लिखते थे स्वामी जी बोलते थे और यह स्वामी जी प्राणायाम करते होंगे यह पढ़ कर के ही हमको पता चल जाता है क्योंकि वो 100 लोग बैठे हैं वसा चिल्ला करके यह बात बोलनी है तो आपके लंग्स में कितना पावर चाहिए वो देख लीजिए तो ये लंबा सेंटेंस कितना किंतु कितना पोएटिक कितना सुंदर वी डू नॉट प्रिटेंड टू थ्रो एनी न्यू लाइट ऑन दिस ऑल एब्जॉर्ब प्रॉब्लम्स ये हमारे जीवन को संपूर्ण रूप से ये एब्जॉर्ब कर देते हैं हमारे जीवन को संपूर्ण रूप से ये खा जाते हैं कि हां अरे ये कंज्यूम कर जाते हैं जैसे वह न्यूटन के बारे में कहा जाता है ना कि किसी ने पूछा न्यूटन को कि यह लॉज ऑफ डायनेमिक्स है इतना कॉम्प्लिकेटेड साइंस आपने कैसे खोज निकाला तो उसने सोचा होगा कि कोई बड़ा ही उसको नलाइट निंग कोई बड़ा ही कॉम्प्लिकेटेड उत्तर मिलेगा तो न्यूटन ने क्या उत्तर दिया उस प्रॉब्लम के बारे में सोचते सोचते दिन रात उसके बारे में सोचते सोचते आखिर में मुझको उसका उत्तर मिला माने यदि आप एक प्रश्न को दिन रात सोचते रहेंगे ऑल एब्जॉर्ब आपकी पूरी प्राण शक्ति उसमें डाल देंगे तो आपको उत्तर मिलना ही है क्योंकि जैसे स्वामी जी कहते हैं आखिर में इस सेंटेंस के आखिर में वो डिवाइन लैंग्वेज इज देयर इन अवर डीएनए ये जो देवी भाषा हमारे हृदय में हमेशा विराजमान है वो वेदों और उपनिषदों का सत्य हमारे हृदय में है विराजित क्योंकि ईश्वर ही इवॉल्व होकर के सृष्टि का बीच बने हैं सृष्टि में से इवोल्व होकर के हम बने हैं तो ईश्वरीय नॉलेज हमारे हृदय में है ही है यदि हम इसको प्रॉपर्ली एनालाइज करें प्रॉपर्ली डिसेक करें प्रॉपर्ली इनसेमिनेट करें तो हमको उसका उत्तर मिलना ही मिलना है तो यहां पर स्वामी जी कहते हैं कि हम यह नहीं करने वाले हैं कि यह हमारे जीवन को संपूर्ण रूप से एब्जॉर्ब कर देने वाले प्रश्न प्रश्नों के ऊपर में नया उत्तर हम लोग नहीं देने वाले हम लोग क्या करने वाले हैं ओनली टू पुट बिफोर यू द एंट ट्रुथ इन द लैंग्वेज ऑफ मॉडर्न टाइम्स यह पुराना सत्य है हमारे पुरखों का ऋषि मुनियों का जो उत्तर है उसको आज की आधुनिक भाषा में हम आपके सामने रखने वाले हैं टू स्पीक द थॉट्स ऑफ द एशट्स इन द लैंग्वेज ऑफ द मॉडर्न हमारे ऋषि मुनियों का उत्तर आज के आधुनिक मनुष्य की भाषा में कहने वाले हैं टू स्पीक द थॉट्स ऑफ द फिलोसोफर इन द लैंग्वेज ऑफ द पीपल दार्शनिकों की भाषा का उत्तर मनुष्य आम आदमी जनसाधारण की भाषा में हम रखने वाले हैं टू स्पीक द थॉट्स ऑफ द एंजल्स इन द लैंग्वेज ऑफ मैन देवों की भाषा का उत्तर मनुष्यों की भाषा में रखने वाले हैं कितना पोएटिक है देवों की भाषा का टू स्पीक द थॉट्स ऑफ द एंजल्स देवताओं के देवताओं के जो विचार है मनुष्य की भाषा में व्यक्त करने वाले हैं टू स्पीक द थॉट्स ऑफ गॉड इन द लैंग्वेज ऑफ पुअर ह्यूमैनिटी एक ईश्वर है ईश्वर के विचार है ईश्वर की इच्छा है वो हम मनुष्य पुअर ह्यूमैनिटी स्वामी जी ने लिखा है हम तुच्छ मनुष्यों की भाषा में तुच्छ मनुष्यों के लिए व्यक्त करने वाले हैं सो दैट मेन विल अंडरस्टैंड देम जिससे कि हम उनको समझ पाए देवताओं की भाषा देवताओं के विचार ईश्वर के विचार हम तुच्छ मनुष्यों की भाषा में रखेंगे जिससे कि हम इसको समझ पाए फॉर द सेम डिवाइन एसेंस फ्रॉम चच द आइडियाज इनेट इज एवर प्रेजेंट इन मैन क्यों हम क्यों समझेंगे इसको क्योंकि वही ईश्वरीय तत्व वही डिविली वही आत्मन वही ब्रह्मण हमारे हृदय में बीज रूप में विराजमान है पोटेंशियली प्रेजेंट है एंड देयर फोर ही कैन ऑलवेज अंडरस्टैंड देम हमारे भीतर में वही ही ईश्वर विराजमान है इसलिए ईश्वर की भाषा हम हमेशा के लिए समझ पाएंगे ईश्वर भले ही चाहे कौन सी भाषा में बोल ले पाली में बोल ले ना कि वो वो भोजपुरी में बोल ले ना कि संस्कृत में बोल ले ना कि आज यहां पर जैसे कि वो नरसिंह मेहता के भजन बहुत पॉपुलर है नरसिंह मेहता ने लिखे थे आज से 200 300 साल पहले उनके भजन लिखे थे अभी जैसे मेरा गुजराती इतना पावरफुल नहीं है कि मैं उनके भजन को पढ़ कर के ही सीधा उसका अर्थ समझ लो मुझे थोड़ा सा ट्रांसलेशन चाहिए होता है तो मेरी ही भाषा है गुजराती लैंग्वेज 200 300 साल पुरानी उसी को अभी समझना मुश्किल है यह अक्षय कुमार सिन ने पुंथी लिखा है अभी वैसे तो मैं लीला प्रसंग वगैरह सब पढ़ लेता हूं किंतु पुंथी को समझने के लिए थोड़ा सा इंटरप्रिटेशन थोड़ा सा ट्रांसलेशन चाहिए क्योंकि वोह पोएटिक लैंग्वेज में लिखी गई है और लैंग्वेज भी थोड़ा सा वो बंगोली ढब की ज्यादा है तो अभी क्या है कि यह सब विभिन्न भाषाओं में विभिन्न तत्व प्रकट किए गए हैं अभी जैसे कि मनाचे श्लोक मैं जब नागपुर में मेरा पोस्टिंग हुआ था तो वहां पर रोज सुबह को मनाचे श्लोक बोलकर के एक पोयम है उसका पाठ होता था उसका चैटिंग होता था तो मैं पूछता हूं कि यह क्या है तो कहते हैं कि यहां पे ये तो बड़े पॉपुलर है ये मराठी लैंग्वेज में ये बड़े ही सुंदर श्लोक है एक के बाद एक आपको आध्यात्मिक जीवन के सुंदर तत्व समझाते हैं अभी मुझे मराठी लैंग्वेज नहीं समझ में आती थी किंतु उसका चैटिंग जो है उसका जो कैडेंस जो है उसका रिदम जो है मुझे इतना सुंदर लगता था मैं हमेशा बैठ कर के उनके साथ में चैटिंग करता था तो ये अभी मुझे श्लोक का अर्थ नहीं समझ में आ रहा है किंतु मेरे हृदय को स्पर्श करता है पहली पहली बार जब मैं बेलूर मठ में गया था और यह बंगोली काली कीर्तन मुझे काली कीर्तन अब देखिए कि मेरा बैकग्राउंड में कहीं प भी बंगोली कल्चर का कोई स्पर्श कभी नहीं हुआ काली कीर्तन बिल्कुल जन्म में पहली बार सुन रहा हूं और वहां पर एक बड़ा सा हॉल है सभी ब्रह्मचारी लोग इकट्ठा होंगे वहां पे क्या है कि दुर्गा पूजा के एक महीने पहले प्रैक्टिस स्टार्ट हो जाती है हम ब्रह्मचार्य के लिए क्योंकि क्या है कि मंदिर में सबके साथ में बैठ कर के गाना है और तो हम तो नए आए हुए ब्रह्मचारी है हमको तो यह काली कीर्तन गाने का अभ्यास नहीं है तो फिर क्या है कि जब सबके साथ में पहली बार गाना शुरू कर देंगे तो थोड़ा सा तो हमारा वो रिधम तो अच्छे से नहीं बैठेगा तो डिस्टरबेंस सबको होगा तो नए आए हुए ब्रह्मचार्य को एक महीने पहले से काली कीर्तन का अभ्यास करवाना स्टार्ट कर दो जैसे कि जब वो सेपरेट बिठा करके आया इससे क्या होगा जब मंदिर में सबके साथ में गाएंगे तो वो ऑलरेडी उनका रिदम वो बैठ गया होगा तो वहां पर एक बहुत बड़ा सुंदर हॉल है वहां पर बिठा कर के हमको काली कीर्तन सिखाते थे तो अभी नहीं मुझे बंगोली कल्चर का बारे में कुछ पता नहीं बंगोली लैंग्वेज के बारे में कुछ पता काली कीर्तन क्या है उसका महात्म भी नहीं पता बाद बाद में तो मैंने ये सब सीखा किंतु जब पहली बार सुना तो मेरे हृदय को इतना वो स्पर्श कर गया मैं इतना आकृष्ट हो गया कि ऐसा हो गया था कि एक दो सप्ताह के बाद में मुझे वो किताब लेने की जरूरत नहीं पड़ती थी आगमन संगीत में वैसे ही गा लेता था बिना किताब को देख के अर्थ नहीं समझ में आता था किंतु उसका रिदम उसका वो कैडेंस वो इतना सुंदर लगता था तो यह सब देवताओं की भाषा है यदि हमको शब्द समझ में आए ना आए इसके पीछे की जो डिविले हृदय को स्पर्श कर जाएगी तो स्वामी जी यहां पर कहते हैं कि हमको इस जो सनातन प्रश् है कि मनुष्य जीवन का सत्य क्या है मनुष्य का देहांत होने के बाद में चिता पर भस्मी भूत होने के बाद में कुछ बचता है कि नहीं बचता है यह सनातन प्रश्न का कोई नया उत्तर नहीं देना वही सनातन उत्तर जो है उसको आज की भाषा में ट्रांसलेट करके आपके सामने रखना है तो आज यही तक कल फिर से ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु