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Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life and Teachings 24 Jun 2025

prayer

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः स्वामी विवेकानंद का जीवन उसको हम किसी किताब में से नहीं बहुत सारी किताबों में से कलेक्ट करके उसका हम स्टडी कर रहे हैं। आज पहले मैं एक ओवरऑल आउटलाइन

श्रीरामकृष्ण भावधारा के प्रारंभिक दिनों की एक रूपरेखा (1836 - 1920): श्रीरामकृष्ण, स्वामी विवेकानन्द, माँ सारदा

आपके साथ में शेयर करता हूं। यह है अपना संघ। अपने संघ की जो एक आउटलाइन आप देखिए कि किस तरह से अपने संघ का इवोल्यूशन हुआ है। खास करके ठाकुर मास्वामी जी का जो रोल है रामकृष्ण संघ के विकास में वह हमको यहां पर पता चलता है। आप देखेंगे कि यह एक ग्रीन लाइन है। यहां पर देखिए कि 1836 ठाकुर का जन्म हुआ और कामार पुकुर में ठाकुर की बाल्य लीला हुई। यह एक पीरियड है। उसके बाद में अप टू 18 अह ठाकुर कोलकाता आए 1852 में और 1855 में काली मंदिर का क्सिक्रेशन हुआ। ठाकुर वहां पर रहने लगे और फिर मां काली को अपने हृदय से पुकारने लगे। तो वह जो ठाकुर की दक्षिणेश्वर काली मंदिर में साधना है वह 1855 से प्रारंभ होती है। चलती है अप टू 1873। देखिए 1873 की सबसे बड़ी घटना क्या है? वो है शोडशी पूजा। मां शारदा देवी का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ। ठाकुर ने मां की पूजा की और फिर मां की शक्ति से शक्तिमान होकर के धर्म चक्र प्रवर्तन प्रारंभ किया। यहां से ठाकुर का यदि क्रिश्चियन लैंग्वेज में कहे तो ठाकुर श्री रामकृष्णस मिनिस्ट्री मिनिस्ट्री अर्थात कि लोगों को धार्मिक उपदेश देना लोगों के आध्यात्मिक कल्याण के बारे में कार्य प्रारंभ करना इसको कहेंगे मिनिस्ट्री तो ठाकुर श्री रामकृष्णास मिनिस्ट्री इट बिगेन विद शोडशी पूजा 1873 ठाकुर का यदि गुरु भाव कहे है तो यहां से प्रारंभ होता है। ऑफकोर्स जिन लोगों ने लीला प्रसंग पढ़ा है उनको तो पता है कि शरद महाराज ने गुरु भाव जो ठाकुर का है उसको दो चैप्टर में विभाजित किया है। दो खंड में विभाजित किया है। एक्चुअली प्रथम खंड है गुरु भाव पूर्वार्ध और दूसरा खंड है गुरु भाव उत्तरार्ध। गुरु भाव पूर्वार्ध में क्या है? अच्छा गुरु भाव उत्तरार्ध में क्या है? तो यह शोडशी पूजा के बाद की जो सब घटनावली है यह रामचंद्र दत्त आते हैं। ठाकुर के पास में नरेंद्र आता है, मास्टर महाशय आते हैं। वह जो सब फेमस घटनावली है वह गुरु भाव उत्तरार्ध में है। जो कि जिसको कि हम यहां पे ठाकुर मिनिस्ट्री के रूप में देखते हैं 1873 के बाद में। किंतु इससे पहले भी गुरु भाव पूर्वार्ध में शरद महाराज कहते हैं कि देखिए ठाकुर के जो सखा थे जो मित्र थे ठाकुर के जो गुरु थे उनके प्रति भी ठाकुर ने गुरु भाव में उनके ऊपर में कृपा की थी। सब उदाहरण जग जाहिर है कि किस तरह से तोतापुरी शक्ति को स्वीकार नहीं करते थे। किंतु आखिर में उनको शक्ति को स्वीकार करना पड़ा। किस तरह से भैरवी ब्राह्मणी का ठाकुर के ऊपर में आसक्ति हो गई थी। सबको जाकर ऐसा कहती थी कि ठाकुर की आज की जो आध्यात्मिक सिद्धि है वह मेरी ही वजह से है। मैं नहीं होती तो ठाकुर का कुछ नहीं होता। इस तरह का उनके मन में एक घमंड सवार हो गया था। तो फिर किस तरह से भैरवी ब्राह्मणी का उनकी मुक्ति के लिए जो एक आखिरी बैरियर है उस बैरियर को भी पसार करवा करके उस बैरियर को एक आखिरी बंधन जो ठाकुर के गुरुओं पर रह गया था हो सकता है कि यह जैसे वो ठाकुर कहते हैं ना कि भागवत पंडित को मां जगदंबा एक पाश देकर के एक बंधन डालकर के उनके ऊपर में संसार में रखे रहती है। इससे क्या होगा कि ये लोग लोगों को भागवत सुना पाए। तो वैसे ही ठाकुर के गुरु जो थे खास करके यह भैरवी ब्राह्मणी और तोतापुरी यह दोनों आध्यात्मिक इस शिखर पर सवार थे। आध्यात्मिक इस ऊंचाई को प्राप्त हो चुके थे कि उनको मुक्ति प्राप्त करने में बस एकद कदम ही और आगे बढ़ना था। किंतु हो सकता है कि जगदंबा ने उनको एक-एक पाश देकर के बांध के रखा था। जिससे कि वे ठाकुर को उनके जो उनका जो मार्ग है तोतापुरी का अद्वैत मार्ग भैरवी ब्राह्मणी का शाक्त मार्ग उसमें ठाकुर को वह शिक्षा दे पाए। ठाकुर की साधना में सहाय कर पाए। जैसे ही ठाकुर ने उन साधनाओं में सिद्धि प्राप्त कर दी वैसे ही अभी उनकी मुक्ति के पथ में अभी कोई बंधन रहा नहीं है। आखिरी बंधन भी छिन्न हो गया और उन्होंने ठाकुर की मदद से उनका आखिरी बंधन छिन्न हुआ और फिर उन्होंने मुक्ति प्राप्त की। तो वह हमको पता है कि शरद महाराज इसको गुरु भाव पूर्वार्ध कहते हैं। किंतु फिर भी अपने एनालिसिस को थोड़ा सा सिंपलीफाई करने के लिए मैं शोडशी पूजा के बाद में ठाकुर का गुरु भाव प्रारंभ हुआ है। इस तरह से मैं यहां पे कैलकुलेट करता हूं। तो यह जो गुरु भाव शोडशी पूजा के बाद में प्रारंभ हुआ 1873 तो 1886 ठाकुर की महासमाधि तक चला। कितने साल चला ठाकुर का गुरु भाव तो 13 साल। इसके बाद में देखिए कि स्वामी जी पे साथ-साथ ही सब तरह की जिम्मा जवाबदारी आ गई थी संघ की। इनफैक्ट हमको तो पता है कि ठाकुर नरेंद्र को अपने कमरे में अकेले बुला करके उसको इंस्ट्रक्शन देते थे। नरेंद्र खुद कहता है कि ठाकुर ने मुझे कहा है कि सब गुरु भाइयों को इकट्ठा करके रखना है। तो यह जो जिम्मा था ठाकुर की महासमाधि के साथ-साथ में ही संघ के जो भविष्य का जिम्मा संघ की जो एक्टिविटीज है, संघ के जो साधक है, उनकी आध्यात्मिक चिंता सब स्वामी जी के ऊपर में आन पड़ी थी और स्वामी जी ने उस जवाबदारी को निभाया था। अप टू 16 इयर्स 1902 में स्वामी जी की महासमाधि हुई वहां तक स्वामी जी ने स्वामी जी का गुरु भाव रहा था। अभी देखिए कि इसका अर्थ अगेन यह नहीं है कि 1886 के पहले स्वामी जी में गुरु भाव नहीं था। किंतु जब तक ठाकुर थे तब तक अब देखिए कि बहुत सारी घटनाएं हैं। नरेंद्र किस तरह से हाजरा का जिम्मा लेता है। किस तरह से यह जो इन्वेस्टिगेशन करता है कि ठाकुर इसके हाथ का पानी क्यों नहीं पीते वगैरह यह जो नरेंद्र के भीतर में यह जो आध्यात्मिक क्यूरियोसिटी थी वो सिर्फ अपने तक सीमित नहीं थी। ठाकुर की खुद की परीक्षा करता था। क्यों? नरेंद्र को यह मतलब यह श्योर होना है कि ठाकुर फ्रॉड नहीं है। ठाकुर जेनुइन है। तो यह सिर्फ अपनी आध्यात्मिक उपलब्धि के लिए नहीं होता है। जगत कल्याण यदि जिस फाउंडेशन के ऊपर में आपको करना है वह फाउंडेशन ही यदि कमजोर हो तो कल भविष्य में कहीं जाकर के उसके ऊपर में आप महल बनाएंगे। तो महल कहीं ना एक ना एक दिन अर्थक्वेक होगा। तब वो वो टूट करके पूरा ढस धस जाएगा पूरा गिर जाएगा। तो यह नरेंद्र को तो श्योर होना है। हालांकि नरेंद्र यह सब कॉन्शियसली सोचता होगा कि नहीं। वी डू नॉट नो बट यह जो नरेंद्र ठाकुर की बार-बार परीक्षा करता था। जिस भक्तों को ठाकुर खुद एक तरह से रिजेक्ट कर देते थे। उन लोगों को भी नरेंद्र ठाकुर के पास ले आ के ठाकुर की जो कृपा है उनके ऊपर में बरसे इस तरह से प्रार्थना करता था तो नरेंद्र का गुरु भाव तो ठाकुर के रहते रहते ही धीरे-धीरे करके प्रस्फुटित हो रहा था ठाकुर हो स्वामी जी हो ना की मां तीनों का जन्म ही हुआ है लोक कल्याण के लिए यानी कि ऐसा कहना इस पार्टिकुलर पीरियड में ही उनके गुरु भाव का विकास हुआ वह तो पैराडॉक्सिकल हो गया कंट्राड डिक्टरी हो गया। किंतु फिर भी बिकॉज़ कि हम जब कोई भी हिस्टोरिकल एनालिसिस करते हैं, हम उसको सिंपलीफाई करते हैं हमारी अंडरस्टैंडिंग के लिए। तो इसीलिए शोडशी पूजा से जो ठाकुर का गुरु भाव क्योंकि उसके पहले जो ठाकुर का गुरु भाव था, वह बहुत सीमित लोगों तक था। ठाकुर के मित्रों तक काली मंदिर में यह जो कुछ लोग रहते थे वहां पर वह जो टॉयलेट क्लीन करता था जो गार्डनिंग करता था वहां का जो चौकीदार था ठाकुर के खुद के जो गुरु थे वहीं तक जो कि ठाकुर के आसपास में रहते थे वहीं तक सीमित था किंतु उसके बाद में सोडशी पूजा के बाद में जो व्यापक प्रचार हुआ व्यापक प्रसार हुआ उसको हम यहां पर कैलकुलेट कर रहे हैं। तो स्वामी जी का भी ठाकुर के रहते-रहते ठाकुर की जो भक्त मंडली है सब में पता है कि नरेंद्र जैसे कि सबके हृदय का दर्द समझता है। नरेंद्र जैसे कि एक तरह से सबके आध्यात्मिक कल्याण के लिए ठाकुर के पास में जाकर के प्रार्थना कर सकता है। किंतु वह तो रामकृष्ण भक्त मंडली तक ही सीमित था। किंतु बाद में जो संघ को पूरे विश्व में प्रचार करने का जो उन्होंने प्रारंभ किया स्वामी जी ने उस पर्टिकुलर पीरियड को हम स्वामी जी का गुरु भाव कहेंगे या तो कहेंगे स्वामी विवेकानंदास मिनिस्ट्री तो वो कितना चला 16 साल देखिए ठाकुर का गुरु भाव चला था 13 साल नरेंद्र का रहा 16 साल और जब स्वामी जी की महासमाधि हुई तब जैसे कि सं अभी देखिए कि स्वामी जी का जो पर्सनालिटी था इट वाज़ लार्जर देन लाइफ जैसे कि स्वामी जी पूरे विश्व में विजय करके भारत में आए थे। राजा महाराजा वे लोग भी स्वामी जी के आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए दर्शन प्राप्त करने के लिए आतुर रहते थे। तो इतनी बड़ी पर्सनालिटी का संघ में से चले जाना बहुत सारे लोगों को बाहर के जो ऑब्जर्वर है उन लोगों को जो कि हिंदू धर्म का अच्छा नहीं चाहते हैं। उन लोगों को ऐसा लगा कि यह रामकृष्ण मिशन है। बस वह अभी मिट्टी में ही मिल जाने वाला है। क्योंकि स्वामी जी जैसा दूसरा पर्सनालिटी इस तरह का दूसरा युग पुरुष कहां दिन प्रतिदिन जन्म ग्रहण करने वाला है। ऐसे लोग तो सेंचुरी में एक सदियों में एक बार आते हैं तो रामकृष्ण संघ क्या इस तरह की दूसरी पर्सनालिटी स्वामी जी के महासमाधि के फौरन बाद थोड़ी ना वो प्रोड्यूस करने वाला है। किंतु इन लोगों को पता नहीं है कि एक ऐसी पर्सनालिटी, एक ऐसा व्यक्तित्व रामकृष्ण संघ में मौजूद था उस समय जो कि स्वामी जी और ठाकुर से भी जैसे कि उनकी आध्यात्मिक सिद्धि और भी ज्यादा थी और वो है श्री मां शारदा देवी। जैसे ही स्वामी जी की महासमाधि हुई। देखिए मां के जीवन में एक बड़ी ही महत्वपूर्ण घटना होती है। जबकि 1900 की साल है 1900 में और फिर जब ला राधु का जन्म होता है तब वो जैसे कि ठाकुर ने आकर के मां को दर्शन देकर के कहा कि यही है योग माया इसका आश्रय लेकर के तुम जीवन धारण करो और फिर मां को तो यह पता ही था गंभीरानंद जी की मां की जीवनी है उसमें अभी हम जो भार स्वीकार जो चैप्टर पढ़ रहे हैं उसमें हमको पता है कि मां को मां खुद जैसे की यह बात से बड़ी उनको अच्छे से पता था कि ठाकुर ने मातृभाव का प्रचार करने के लिए उनको पृथ्वी पर रख के गए हैं। और जो बड़ा ही ब्यूटीफुल पैसेज जिसका कि हम पाठ कर रहे थे कि ये जो साधक है वो देवी को अपना एक जननी के रूप में प्राप्त करना चाहता है। देवी के साथ में आप करना चाहता है। मान अभिमान करना चाहता है। अपनी जो साधना की ये जो चुनौतियां है साधना की जो निष्फलता है वो पूरा दोषारोपण अपनी जग जननी के ऊपर में करना चाहता है मां जगदंबा के ऊपर करना चाहता है क्यों क्योंकि साधक को पता है कि उसकी ना ही शक्ति है ना ही भक्ति है ना ही तपस्या है उसमें तो फिर साधना का क्षेत्र क्या उसके लिए हमेशा के लिए बंद होकर रह जाएगा नहीं जननी के ऊपर में संपूर्ण भरोसा ऐसा करके यदि हम साधन क्षेत्र में पदार्पण करते हैं तो 100% पॉसिबिलिटी है कि हमको एक ना एक दिन मुक्ति मिल जाए। तो वो जो जननी और संतान यह जो पूरा डायनेमिक्स हम स्टडी कर रहे थे उसको जगत में प्रचार करने के लिए ठाकुर ने मां को तैयार किया था। और ठाकुर और स्वामी जी दोनों ने जैसे कि रामकृष्ण संघ रूपी यह जो इंस्ट्रूमेंट है यह इंस्ट्रूमेंट मां के हाथ में रखा था समर्पित किया था जिससे कि इस इंस्ट्रूमेंट को मां सही दिशा दे पाए और नेचुरली है कि यदि हम यह कहेंगे कि 1902 के बाद में मां का गुरु भाव प्रारंभ होता है वह तो बड़ा ही गलत होगा क्योंकि हमको पता है कि यह पहले से ही जैसे जैसे कि मां ठाकुर के प्रति ठाकुर की जैसे शिष्या भी थी। ठाकुर उनको शिक्षा भी देते थे। किंतु साथ-साथ में ठाकुर के प्रति मां का मातृभाव भी था। इस अर्थ में कि ठाकुर जब बचपना करते थे तो फिर मां को फिर उनको धीरे से उनको लाइन पर लाना पड़ता था। बच्चा यदि बहुत ज्यादा वो ये करता है वो प्रॉब्लम खड़ा करता है उसका कान पकड़ करके मां कैसे उसको ठिकाने ला देती है तो वैसे ही मेटाफोरिकली नॉट लिटरली इस तरह से ठाकुर का कान पकड़ करके उनको सीधे रास्ते पर ले जाना कि यह दूध नहीं पी रहे हैं दूध पीना पड़ेगा प्रोटीन तो देह को चाहिए वरना तो फिर यह जो महत कार्य करना है वह कैसे होगा तो वह सब मां जैसे कि ठाकुर की इस तरह से जननी अपने संतान की रक्षा करती है। जननी अपने संतान की सेवा करती है। इस तरह से मां ठाकुर के साथ में करती थी। तो वहां से मां का वह मातृभाव प्रारंभ होता है। और फिर एक के बाद एक कितनी ही फेमस घटना है कि एक ऐसी स्त्री जिसका चरित्र अच्छा नहीं था। मां के पास में से खाने का थाला लेकर के ठाकुर के पास जाती है। तो ठाकुर जाकर के मां को डांटते हैं। कहते हैं कि क्यों उसके हाथ से तुमने मेरा खाना भेजा? तुमको पता नहीं है उसका चरित्र कैसा है? तो फिर मां ने क्या उत्तर दिया था? मां बोले ऐसे दांडा ले किंतु आ थकते पारबो ना। कोई यदि आकर के मां पुकार करके मेरे पास में कोई भी प्रार्थना करेगा तो मैं उसको पूर्ण करूंगी। तो यह मां का मातृभाव गुरु भाव उसी समय से प्रदर्शित हो रहा था। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। यहां तक कि 5 साल की जो बच्ची शारदा थी हमको पता है कि जयराम भाटी में उसके आसपास के अंचल में जब आसपास के विस्तार में जब यह अकाल पड़ा था, ड्रोट हुआ था। उस समय हमको पता है कि वह रामचंद्र मां के पिताजी सबके लिए खिचड़ी बनाते थे और जितने भी भूखे लोग हैं उनके घर में आते थे खिचड़ी खाने के लिए और तभी यह छोटी बच्ची शारदा अपने छोटे-छोटे हाथों से हवा करके खिचड़ी को ठंडा करती थी जिससे कि यह लोग उनकी भूख की यह जो यह है कष्ट है वह सहन नहीं कर पाएंगे कि खिचड़ी गर्म है। फिर भी खाना चाहेंगे क्योंकि भूख का दुख इतना है, कष्ट इतना है तो वह खिचड़ी यदि ठंडी हो जाए तो फटाफट करके वे लोग खा सके। तो तब से मां का देखिए कि अपने संतानों के प्रति जगतवासियों के प्रति करुणा है, दया ममता है वो प्रकाशित हो रही है। किंतु अगेन फॉर द सेक ऑफ हिस्टोरिकल एनालिसिस हम ऐसा कहेंगे कि मां का जो मातृत्व शक्ति था वो प्रथम तो जयराम भाटी गांव के जो आसपास के लोग थे उसी में प्रसारित हुआ था और बाद में ठाकुर की भक्त मंडली तक सीमित था। किंतु फिर जैसे ही स्वामी जी की महासमाधि हुई उसके आसपास में जो दो-तीन घटनाएं बनती है प्रथम तो राधु को मां स्वीकार करती है अपनी बिटिया के रूप में और फिर यह उद्बोधन भवन का निर्माण होता है। मां नियमित रूप से कोलकाता आकर के रहने लगती है। वहां पर जयराम भाटी में क्वालपाड़ा आश्रम की स्थापना होती है। वहां के लड़के सब मां के पास जाना शुरू करते हैं। और क्वालपाड़ा आश्रम का जो एक दूसरा बड़ा बेनिफिट था कि जो लोग कोलकाता से जयराम भाटी यात्रा करते थे उन लोगों के लिए फिर वर्धमान में मां के भक्त हैं क्वालपाड़ा में मां के भक्त हैं तो उनको यात्रा करने में सुविधा होती थी तो कोलकाता से काफी भक्त एक रेगुलर वो वहां पे जय राम बाटी जाकर के मां का दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करना प्रारंभ किए थे तो मां की महिमा जो स्वामी जी के रहने तक जैसे कि रामकृष्ण भक्त मंडली तक ही सीमित थी। वह धीरे-धीरे करके विस्तृत होती गई और फिर कोलकाता में जनसाधारण है। जयराम भाटी के आसपास के गांव है। यहां तक कि रांची है, बांग्ला आज का बांग्लादेश है उस समय का ढाका वगैरह इतने दूर-दूरांतर से फिर भक्तगण मां के पास में आना शुरू हुए। तो यह जो मां का गुरु भाव था मां की मिनिस्ट्री जो थी वह प्रारंभ हुई स्वामी की स्वामी जी की महासमाधि के बाद में 1902 से 1920 मां की महासमाधि तक देखिए कि ऑलमोस्ट 18 साल का यह मां का गुरु भाव रहा है। तो, यहां पे देखिए कि इसको हम यदि ओवरऑल देखें, तो ठाकुर का गुरु भाव, फिर स्वामी जी का गुरु भाव और फिर मां का गुरु भाव। किस तरह से एक के बाद एक फॉलो होते हैं एक दूसरे को। और इस चार्ट को देखकर के ही हमको एकदम क्लियर पता चल जाता है कि जैसे कि ठाकुर ने जो संघ की रचना की स्वामी जी ने उसको परिपुष्ट किया और इन दोनों ने इसका संचालन मां के हाथों में सुप्रत किया जिससे कि मां इसका महत्व रूप से विकास कर पाए। किंतु पता है हमको कि बहुत कम लोग मां की महिमा को इस अर्थ में समझते हैं। मां संघ जननी है। यह सिर्फ बातों की बातें नहीं शुद्ध कथार को थानो बांग्लादेश बोले यह सिर्फ बातों की बातें नहीं है। यह सही सही में वास्तविक सत्य है। आज का जो संघ है देखिए कि हमारे संग में मां का जो यह मां का जो भाव है यही आज हमारे संग में सबसे ज्यादा प्रबल है ना ही हमारे संघ में आज ठाकुर की तरह प्रचंड तपस्या होती है ना ही स्वामी जी की तरह हमारे साधु देश विदेश गांवगांव जाकर के वेदांत और यह कर्म योग का प्रचार करते हैं। हम लोग किस तरह से कार्य करते हैं? यूजुअली एक आश्रम होता है। इस आश्रम में हम लोग चार पांच 10 15 जितने भी साधु हैं इकट्ठा होकर के रहेंगे। हम लोगों में भ्रातु भाव होगा और सब मिल बांट के यह जो ठाकुर और स्वामी जी का कार्य है वो करेंगे। यानी कि एक स्टेडी मॉडरेट एंड स्टेडी प्रोग्रेस आज रामकृष्ण संघ में हो रहा है। धीरे-धीरे करके हम लोग ऐसा नहीं है कि हम लोग कोई प्रचंड आध्यात्मिक शक्ति हमारे में है। ना ही स्वामी जी की तरह प्रचंड मेधा शक्ति है। और इस मेधा शक्ति से हजारों लाखों लोग प्रभावित हो रहे हैं। स्वामी जी की तरह आज कुछ-कुछ हमारे पॉपुलर स्पीकर हैं। किंतु हम सबको पता है कि कहां स्वामी जी की मेधा शक्ति और कहां ये तो कोई कंपैरिजन ही नहीं बनती है। तो आज का जो पूरा लाइफ है हमारा एक मॉडरेट स्पिरिचुअल और कर्म योग हमको करना है और साथ में मिलकर के रहना है। स्पष्ट रूप से समझना है कि यदि हम यह सोचे कि ठाकुर की तरह 12 साल तपस्या करेंगे तो मुक्ति प्राप्त हो जाएंगी। एक के बाद एक दर्शन मिलना शुरू हो जाएंगे। तो ऐसा होने नहीं वाला है। इस तरह की यदि अपेक्षा भी रखेंगे तो यह अपेक्षा हमारे लिए आखिर में डिसअपॉइंटमेंट और डिप्रेशन लेकर के आएगी। मैंने ऐसे कुछ-कुछ साधकों को देखा है। बहुत ही सीरियसली अपने फिलॉसोफी और यह मेडिटेशन की प्रैक्टिस को लेते हैं। किंतु धीरे-धीरे करके उनके स्वभाव में एक तरह की विकृति आती जाती है। वे लोगों का स्वभाव है। दूसरों के ऊपर में घृणा, दूसरों के ऊपर में द्वेष, दूसरों के ऊपर में तुच्छता इस तरह का उनका भाव प्रकट होने लगता है। मैं साधना करता हूं। मैं विद्वान हूं। दूसरे लोग सब निकम्मे है। दूसरे लोग सब आलसी है। दूसरे लोग सब काम कांचन में डूबे हुए हैं। ऐसा एक भाव उनके भीतर में प्रकट होता है। तो आप साधना करते हैं जो सर्व प्रेम स्वरूप जो ईश्वर है इष्ट है अपने श्री रामकृष्ण जो आनंद स्वरूप आत्मन है। यह प्रेम स्वरूप इष्ट और आनंद स्वरूप आत्मन। इनकी आराधना करते-करते दूसरे साधकों के प्रति आपके मन में द्वेष प्रकट हो तो फिर इस आराधना किस काम की आप इष्ट की आराधना कर रहे हैं ना कि शैतान की आराधना कर रहे हैं तो यह मैंने ऑब्जर्व किया है और इसीलिए इतना जो मेरा 20 साल जो मैंने यहां पर बिताया और मैंने दूसरे साधुओं को भी देखा यह जो अपनी एक्सपेक्टेशन है उसको मॉडरेट रखना है। कोई बहुत ज़्यादा मेधाशक्ति, बहुत ज़्यादा तपस्या, बहुत ज़्यादा यह विज़ंस, यह जो आध्यात्मिक कुछ ना कुछ यह जो प्राप्ति है, ऐसा कुछ नहीं होने वाला। मॉडरेट रूप से जो होना है, सो होगा। जन्म जन्मांतर की यात्रा है। रूटीन को फॉलो करते जाना है। तो, यह जो सिस्टम है, वो कौन सी सिस्टम है? यह जो अपना हिंदू जॉइंट फैमिली सिस्टम थी वैसी ही यह सिस्टम है। सब लोग अपना-अपना कार्य करते हैं। यह मामा, मामी, काका, काकी, चाचा, चाची जो भी साथ में रहते हो हमारे वो सब ये मां, पिताजी, नाना, नानी, दादा-दादी ये पोता, पोती, ये भांजा, भतीजा जो भी है सब मिलकर के अपना-अपना कार्य करते हैं और उसमें यह जॉइंट फैमिली चलता है। मैं बचपन में जॉइंट फैमिली में बड़ा हुआ हूं। तो मुझे ऐसा ही लगता है कि ये रामकृष्ण मिशन भी एक हिंदू जॉइंट फैमिली की तरह है। तो एग्जैक्टली वही जो स्ट्रगल होती है वही स्ट्रगल यहां पे है। वहां पे जो आनंद मिलता था वही आनंद यहां पे है। बस वही है कि ठाकुर जैसे कहते हैं विद्या का संसार और अविद्या का संसार। वो जो जॉइंट फैमिली था उसको मैं अविद्या का संसार नहीं कहूंगा क्योंकि वह थोड़ा सा जागती हो जाएगा। किंतु एटलीस्ट मैं कह सकता हूं कि वह विद्या का संसार भी नहीं था क्योंकि पैसा है, प्रेस्टीज है, यह पावर एंड पोजीशन है। वह तो वासना सबके मन में रहती ही है। किंतु रामकृष्ण मिशन है। थ्योरेटिकली एटलीस्ट यह विद्या का संसार है। यहां पे हमारा लक्ष्य एकमात्र होना चाहिए। इष्ट के प्रति प्रेम और आत्मन का जो आनंद है उसका भोग करने की वासना। मुमुक्षुत्व यह है हमारे जीवन का केंद्रवर्ती विचार। यह है हमारे जीवन का मुख्य बिंदु। तो यह हो गया एक विद्या का संसार आज का रामकृष्ण मिशन। देखिए कि इसको हम मां के जीवन के साथ में मां की वाणी के साथ में परफेक्टली मैच करवा सकते हैं। किस तरह से मां यह सब पागल लोगों को साथ में रहकर के रहती थी और किस तरह से मां इन सबसे साथ में रहने के बावजूद मां के मन में ना ही कभी क्रोध होता था, ना ही घृणा होती थी, ना ही द्वेष भाव इनके प्रति होता था। यह जो सोशल लाइफ है यह जैसे कि हमारे आज के जीवन का मैं अपने एक्सपीरियंस से कह रहा हूं कि यह स्पिरिचुअल लाइफ है। यह वर्किंग लाइफ है। उससे भी ज्यादा हमारे जो साइकोलॉजी को इफेक्ट करता है ना, हमारी यह जो मेंटल हेल्थ को जो इफेक्ट करता है, वह है हमारी सोशल लाइफ। यदि आप बहुत अच्छा कार्य भी कर लेंगे, बहुत अच्छे से रेगुलरली साधना भी कर लेंगे। किंतु जिन लोगों के साथ में आप रहते हैं, उनके साथ में यदि वैमनस्य प्रकट हो गया, द्वेष भाव प्रकट हो गया, तो उसका बड़ा ही नेगेटिव इंपैक्ट अपनी साइकोलॉजिकल हेल्थ के ऊपर में होता है। कभी-कभी मैं सोचता हूं कि मैं जो कर रहा हूं रामकृष्ण मिशन में वह सब चीजें मैं बहुत अच्छे से कर पाता। यदि मैं नर्मदा के किनारे ना कि ऐसी कोई जगह पे अकेले रहता। यदि ऐसा हो पाए कि एक ऐसा पोर्टल बना दे। पोर्टल पता है ना कि आप एक जगह से दूसरी जगह पर इंस्टेंटली ट्रैवल कर सकते हैं। साइंस फिक्शन वो कहानियां जो होती है इसमें यह सब पोर्टल बने होते हैं। तो अभी मैं यहां पर रह रहा हूं। बड़े शहर में कार्य करने के लिए आया हूं। वो चाहे पब्लिकेशन हो ना कि चाहे यह वो जो रूरल डेवलपमेंट हो व्हाटएवर फिर यह करके संध्या जैसे होती है पोर्टल को पार करके मैं नर्मदा के किनारे गंगा के किनारे कहीं चला जाऊं हिमालय में वहां पर अकेले बैठकर के मैं रहूं। यह जो जितने लोग पास में रहते हैं वो वही लोग तो सब समस्या खड़ी करते हैं। दूसरे दिन जैसे ही सुबह हुआ फिर से मैं यह पोर्टल क्रॉस करके अपने कार्य क्षेत्र पर आ जाऊंगा। ऐसा मैं कभी-कभी सोचता था। किंतु देखिए कि यदि ऐसा हम करेंगे तो रामकृष्ण संघ का जो आज का कैरेक्टरिस्टिक है, आज का जो हमारा प्रोफाइल है उससे विरोध में जाना हुआ। ठाकुर को यदि आप सिर्फ पढ़े होंगे, पढ़ते होते तो यह थोड़ा सा लॉजिकल लगता। यदि सिर्फ स्वामी जी को पढ़े होते तो ऐसा लगता कि यह रूरल डेवलपमेंट के अलावा जगत में और कुछ नहीं है। मैं वहीं रांची में जैसे मेरा आखिर आखिर में प्लान चल रहा था। गांव में जाकर के रहूंगा। वहां पे कुटिया बनाऊंगा। रात भर साधना करूंगा। पढ़ाई लिखाई करूंगा और दिन में यह बच्चों को पढ़ाऊंगा। यह हुआ स्वामी जी का असली यह जो मैसेज है मैंने अपने जीवन में इंप्लीमेंट किया है। सब कुछ छोड़ करके मैं यहां पर रह रहा हूं। तो सैक्रिफाइस भी किया है, साधना भी कर रहा हूं, सेवा भी कर रहा हूं। इससे ज्यादा और क्या चाहिए स्वामी जी को? किंतु यह ठाकुर और स्वामी जी को ही यदि हम पढ़ते तो यह सब चीजें ठीक लगती, ठीक लगती। किंतु जब हम मां को ले आते हैं इस इक्वेशन में तो यह जो संसार में एक साथ में रहना है यह जो माया के संसार में एक माया के परे का एक संसार विद्या का संसार क्रिएट करना है वि इज यूनिक मैसेज ऑफ श्री मां शारदा देवी रामकृष्ण संघ का एक यूनिकनेस है। तो इस तरह से यदि हम देखें तो यह पूरा चार्ट इट मेक्स अ वेरी लॉजिकल सेंस कि हां आज का जो संघ है वह जनरली इसी चार्ट को फॉलो कर रहा है। तो यह एक आउटलाइन हमारे जीवन का हुआ। तो अभी देखिए कि हम इस चार्ट में कहां पर आए हैं। स्वामी जी की क्योंकि हम जीवनी हम पाठ कर रहे हैं। अभी हम कहां पर आए हैं? ठाकुर की महासमाधि हो चुकी है। स्वामी जी की मिनिस्ट्री प्रारंभ हुई है। स्वामी जी का गुरु भाव जो कि 16 साल चलने वाला है, वह अभी प्रारंभ हुआ है। तो अभी हम उसके बारे में थोड़ा सा देखते हैं कि हम कहां तक पहुंचे हैं। तो अभी यह देखिए कि यह सब पर्व मैंने डिसाइड किए हैं। हमको पता है कि बाल्य पर्व, साधन पर्व, ठाकुर की यह आनंद पर्व है वहां पे और यह आत्म प्रकाश पर्व है। ठाकुर की यह जो मिनिस्ट्री है उसके साथ रिलेटेड है। तपस पर्व, भारत पर्व, विजय पर्व, उद्योग पर्व। यह है स्वामी जी का गुरु भाव और यह मातृ पर्व है। वह है मां का गुरु भाव। इसमें हम यह जो ठाकुर की महासमाधि के बाद में जो तपस्या का प्रारंभ हुआ है वहां तक अभी हम पहुंचे हैं। देखिए कि यह जो फर्स्ट चैप्टर था उसको हमने पाठ ऑलरेडी कर लिया है। महासमाधि के बाद में क्या चैप्टर का नाम है? आफ्टर द महासमाधि ऑफ श्री रामकृष्ण लास्ट डेज इन काशीपुर 16 से 30 अगस्त 1886। तो इसका हमने पाठ करके देख लिया कि ठाकुर की महासमाधि की रात को ही मां को ठाकुर का दर्शन हुआ था। उसके बाद में नरेंद्र को भी ठाकुर का दर्शन हुआ था। इन दोनों दर्शन की वजह से जो साधक जो ठाकुर की भक्त मंडली है उनके हृदय में एक गंभीर विषाद एक गंभीर निराशा जो व्याप्त हो गई थी। इन दोनों दर्शन की वजह से वह ऑलमोस्ट दूर हो गई। सबको पता चल गया कि ठाकुर भले ही चाहे पंचमहाभूत के देह में विराजमान ना हो किंतु सूक्ष्म देह से अपने जो भक्त हैं उनके हृदय में विराजमान है। तो यह हमने देखा और उसके बाद में महासमाधि के बाद के दिनों की कुछ घटनाएं उसके बाद में ठाकुर की अस्थि को लेकर के जो सब नाटक चला था वह सब देखा हमने। फिर जन्माष्टमी के दिन 23 अगस्त 1886 को काकुड़गाची योगोद्यान में ठाकुर के जो कुछ अंश थे अस्थियों के उसको स्थापित किया गया। इसके बाद में मां जैसे कि नॉर्थ इंडिया पिल्गिमेज के लिए निकल गई और फिर यह जो पूरा चैप्टर है उसका अंत हमने लाया था। एक नॉर्थ इंडियन साधु की कहानी से एक रामायित साधु दक्षिणेश्वर आया। ठाकुर के दर्शन प्राप्त करने की बड़ी इच्छा। किंतु आकर के जब यह देखा कि ठाकुर ऑलरेडी चल बसे हैं तो बड़ा दुखी हो गया था। दक्षिणेश्वर में पंचवटी के नीचे बैठा था। तब कहीं एकाएक ठाकुर गंगा से प्रकट होकर के उसको खीर खाने को दी। तो यह साधु बड़ा ही खुश हो गया था। तो देखिए कि ठाकुर ने महासमाधि के बाद इनफ इंगित दिए हैं। इनफ हमको यह मैसेज दिए हैं। साइन हमको दी है कि वह भले ही चाहे सदैव वर्तमान ना हो पृथ्वी पे हमारे हृदय में हमारी आशा आकांक्षा प्रार्थनाओं की पूर्ण करने के लिए हमेशा वर्तमान है। तो इसके साथ में यह चैप्टर समाप्त हुआ था। और फिर से मैं कह दूं कि यह सब चैप्टर जो है वह मैंने बनाए हैं बहुत सारे सोर्सेज को कलेक्ट करके और फिर इसके बाद में जो दूसरा चैप्टर हमने

श्रीरामकृष्ण की महासमाधि के बाद उनके त्यागी संतान क्या करेंगे?

प्रारंभ किया था अर्ली डेज ऑफ वराह नगर मठ वराह नगर मठ की स्थापना और उसके जो प्रारंभ के दिन थे यह चैप्टर में बहुत सारी कहानियां हैं। हम एक के बाद एक सबका पाठ करेंगे। अक्टूबर 1886 से लेकर के समवेयर इन 1888 1888 में 1888 में स्वामी जी नॉर्थ इंडिया उत्तर भारत जो है उसमें वो यात्रा करने के लिए जाते हैं। तो वहां तक की घटनावली इस चैप्टर में है। और देखिए कि यहां पे यह जो फर्स्ट पॉइंट है यह फर्स्ट पॉइंट कौन सा है कि ठाकुर की महासमाधि से लेकर के वराह नगर मठ की स्थापना हुई। यह जो पीरियड था वहां तक की घटनावली इसमें है अगस्त से अक्टूबर 1886 यानी कि अगस्त में ठाकुर की महासमाधि हुई 16 अगस्त को और अक्टूबर में यह यहां पे है कि 19 अक्टूबर को वराह नगर मठ की स्थापना हुई। तो यह जो 16 अगस्त से 19 अक्टूबर का यह जो ऑलमोस्ट 2 महीने का जो अगस्त से सितंबर, सितंबर से अक्टूबर यह जो ऑलमोस्ट 2 महीने का पीरियड है उस पीरियड के बारे में अभी हम देख रहे थे। देखिए कि इसका तो थोड़ा बहुत पाठ हमने ऑलरेडी कर लिया है। किस तरह से यहां पर हम देखते हैं कि अगस्त मास जो जैसे ही समाप्त हुआ था उसके बाद में काशीपुर का जो उद्यान है उद्यान वाड़ी उसको छोड़ देना हुआ और उसके बाद में देखिए हमने यह जो पूरा पैराग्राफ था वैसे तो पढ़ ही लिया है। यहां तक हमने पढ़ लिया है। जैसे वो हमको पता है कि उसमें क्या था काशीपुर उद्यान मंदिर का त्याग करना हुआ और उसके बाद में जो गुरु भाई यह जो त्यागी संतान है वह सब बेर बिखेर हो गए। ठाकुर ने तो सबको एक साथ में इकट्ठा करके रखा था। सबके हृदय को प्रेम के सूत्र से बांध करके रखा था। किंतु ठाकुर के जाने के बाद में यह लोग इकट्ठा होकर के कहां रहेंगे? ना ही दक्षिणेश्वर रह सकते हैं। वहां का जो त्रैलोक्य बाबू है वह तो जैसे कि एक तरह से उसने दगा ही दे दिया रामकृष्ण भावधारा को और फिर यहां पे काशीपुर जहां पे आखिरी आखिरी दिन बीते थे तो ये जो प्रवीण भक्त हैं जो भक्त यह पैसा देते थे उन्होंने कह दिया कि अभी सब अपनेप घर चले जाइए और यह जो ₹80 ना कि इतना कुछ जो महीने यहां पर देते थे वह अभी हम बंद कर देंगे। तो सब जो त्यागी संतान है अपनेप घर चले गए। किसी किसी के पास में घर जाने के लिए भी जगह नहीं है। कोई-कोई लोग हैं रामबाबू के वहीं पर रह गए। कोईकोई है काली है। लाटू महाराज है। मां शारदा के साथ में वह वृंदावन वगैरह उत्तर भारत पर्यटन तीर्थ यात्रा के लिए निकल गए। तो इस तरह से उस समय के ये दिन है और उस समय की बात को याद करके स्वामी जी राजा महाराज को बाद में पत्र लिखते हैं कि देखो कि उस समय तुम दिन तुमको याद है तो कि कोई ये जो कुछ-कुछ भक्त थे वो हमारे ऊपर में द्वेष भी करते थे। हम लोग कुछ मूर्ख और आलसी लड़के हैं जो कि जॉब नहीं करना चाहते। कार्य कर्म कुछ नहीं करना चाहते। पैसा नहीं कमाना चाहते क्योंकि उसमें तो कष्ट है ना पैसा कमाना यानी कि जो जिसने भी पैसा मेहनत करके कमाया है पता है कि क्या-क्या सब करना पड़ता है तो यह लोग सब आलसी है निकम्मे हैं ऐसा करके ये काम नहीं करना चाहते वैसा बैठकर के खाना चाहते हैं इस तरह की उनको हैबिट हो गई है बोल बोल कर के ऐसा ऐसा बोलते बोलते क्या-क्या सब दुष्प्रचार हमारे सामने कर रहे थे उस समय जैसे यहां पर स्वामी जी कहते हैं केवल बोलोराम सुरेन मास्टर और चुनी बाबू एरा शोकले विपदे आमादे बंधु यह सिर्फ बलराम सुरेन मास्टर मास्टर महाशय कथामृत के लेखक और यह चुनी बाबू यही कुछ लोग थे कि जिन्होंने हमको सहाय की थी और तो एदे रूण आमरा कखनो परिशोध करते पारबोना इसलिए इनका जो ऋण है हमारे ऊपर में इनका यह जो हमारे ऊपर में यह एक तरह से यह जो ऑब्लिगेशन है वह हम कभी भी नहीं कर पाएंगे। कभी भी हम रिपे नहीं कर पाएंगे। और साथ में स्वामी जी ने यह भी कहा था कि उस दिनों में कुछ-कछ लोग हमारे विरोध में विद्वेष भाव भी रखते थे। तो यह सुनकर के हमको थोड़ा सा आश्चर्य भी हुआ था। हमारे संघ की कहानियों में इस तरह से विद्वेष भाव की घटनाएं ज्यादा देखने को नहीं मिलेंगी। किंतु यदि यहां पर स्वामी जी कहते हैं कि रीति मतो अत्याचार आरंभ होईल सिस्टमेटिकली हमारे ऊपर में अत्याचार प्रारंभ हुआ तो यह पढ़कर के हम लोगों को लगता है कि अरे ऐसा तो क्या हुआ होगा कि स्वयं स्वामी जी को यह बात कहनी पड़ी तो जो भी है उस दिनों की घटनावली खास करके इस सेंटेंस को जस्टिफाई करें ऐसा कुछ ज्यादा प्रूफ हमारे पास नहीं है या तो फिर मुझे पता नहीं है व्हाटएवर तो किंतु इस तरह से वह दिन कटे थे। इसके बाद में स्वामी जी आखिर में एक बात कहते हैं कि यह जो मास्टर चुन्नी बाबू वगैरह तो थे ही थे। किंतु सर्वोपरि और एक थी जिनका कि आशीर्वाद हमको प्राप्त था। जिनके पास में ना ही धन था ना ही वो घर भाड़ा करने की शक्ति थी कि जहां पर ये लोग इकट्ठा होकर रह पाए। जिनके पास कुछ नहीं था। किंतु जिनका आशीर्वाद इतना अमोग था कि यह जितनी भी समस्या है जगत की सबको चूरमार कर दे। तो वो कौन? तो यहां पे यहां पे स्वामी जी क्या लिखते हैं? एक जो छाड़ा के होई सहानुभूति जाना लोना। एक को छोड़कर के एक व्यक्ति को छोड़कर के और किसी की सहानुभूति नहीं थी। तो वह कौन? तो यहां पर महाराज क्या लिखते हैं? श्री एक जो श्री माता ठाकुरानी तहार कथा परे बोली वो वो एक ही मां ठाकुरानी इनके बारे में बाद में बात करेंगे तो यहां तक हमने पढ़ा था इससे आगे पढ़ते हैं शुद्ध अल्पस को बोलिया जे

श्री रामकृष्ण के वरिष्ठ शिष्यों ने युवा शिष्यों द्वारा मठ की स्थापना का विरोध किया

बोस को दे नेतृस्थानीय व्यक्तिरा नरेंद्र कथा उया दिया छिले ता न एकटा आदर्श गोत विरोध छिलो यह जो नरेंद्र जो करने का प्रारंभ सोच रहा था। नरेंद्र जो बार-बार रिक्वेस्ट कर रहा था कि काशीपुर जो उद्यान है उसको हम रखे रहे। ठाकुर की सेवा चलती रहे। मां शारदा देवी भी वहां पर रहे और यह जो बाकी त्यागी संतान है वह भी वहां पर इकट्ठा होकर के रहे। इस विचार के सामने सिर्फ यह एक प्रॉब्लम नहीं था कि जो पैसा दे रहे थे वह लोग उम्र में बड़े थे तथाकथित उनके भीतर में ज्यादा समझ थी। समाज के बारे में, संसार के बारे में और यह सब बच्चे अनपढ़ है। आधे तो माने क्या है? पढ़ाई लिखाई में तो इतना कोई ध्यान था नहीं किसी का और फिर आलसी है, निकम्मे है, नासमझ है। तो यह जो एक एज गैप होता है जिसको आजकल हम जनरेशन गैप कहते हैं। तो सिर्फ यह जनरेशन गैप ही नहीं था इन दोनों के बीच में। किंतु साथ-साथ में ही आइडियोलॉजिकल आदर्शगत विरोध भी था। यह एक संसार का आदर्श जो कि ठाकुर ने यथेष्ठ उसको प्रचारित किया है। यह जो विद्या का संसार, अविद्या का संसार ऐसा करके जो ठाकुर बार-बार कहते हैं, यह गृहस्थ भक्तों को कहते हैं कि तुम लोगों के लिए साधना है। ताली लगाते लगाते हरि नाम करना। ताली जैसे लगाएंगे वैसे ही पाप पंखी उड़ जाएंगे और फिर यह सबको इकट्ठा होकर के यह नृत्य कीर्तन करना यह जो सब जो साधना ठाकुर ने ये गृहस्थ भक्तों को बताई थी मास्टर महाशय जिसका कि जिनका कि वो पोर्शन अभी हम कथामृत में पाठ कर रहे हैं कि वह 1883 की वो जो क्रिसमस की छुट्टियों में वहां दक्षिणेश्वर रहने के लिए आए रिट्रीट के लिए आए तो वहां पे आखिर में रिट्रीट कैसे समाप्त होती है? ठाकुर भाव में चले जाते हैं। फिर भाव में से वापस आकर के मास्टर महाशय को कहते हैं तुम अभी घर जाओ किंतु यह समझना कि घर जैसे तुम्हारा नहीं है। बीवी बच्चे तुम्हारे नहीं है। उनके प्रति जो तुम्हारा ऋण है इनके प्रति जो तुम्हारा धर्म है उसका तुम पालन करना। किंतु समझना कि यह इसमें से कोई भी तुम्हारा अपना नहीं है। ऐसा बोलकर के मास्टर महाशय को घर भेजा था। मास्टर महाशय को ठाकुर और भी एक बड़ी सिग्निफिकेंट बात कहते हैं। कहते हैं कि तुम्हारे मन का जो है भाव वह भी पूर्ण हो जाएगा। तो अभी वहां पर ऐसा तो नहीं लिखा मास्टर महाशय ने कि उनके मन का क्या भाव था। किंतु मास्टर महाशय का बाद का जो जीवन है ठाकुर की महासमाधि के बाद यह जो 1910 1920 के जीवन मास्टर महाशय का उस समय का जो पढ़ते हैं तो वह ऐसा लिखते हैं कि मैं एक भक्त के घर जा रहा हूं या अपने खुद के घर जा रहे हैं। कह रहे हैं मैं एक भक्त के घर जा रहा हूं। कभी-कभी वो भिक्षा मांगने के लिए भिक्षुक लोग थे। उनके साथ में बैठ जाते थे। तो यानी कि मास्टर महाशय एक त्यागी का जीवन जीना चाहते थे। किंतु ठाकुर को समझ में आ गया कि त्याग करने के लिए जो प्रचंड वैराग्य है अभी तक उनमें जन्म नहीं लिया है। और फिर जो दूसरा जो फेमस रीजन है कि वो भागवत पंडित को एक पास देकर के मां रख देती है। मास्टर महाशय को कथामृत भी लिखना था। यदि वह वराह नगर मठ में यह अद्वैतानंद जी की तरह बूढ़ो गोपाल की तरह ज्वाइन कर लेते तो शायद उनसे यह कथामृत नहीं लिखा जाता। यानी कि देखिए कि हमको यह भी नहीं सोचना है कि ठाकुर ये उम्र के अनुसार ये जो छोटे हैं लड़के वो त्यागी होंगे। ये जो उम्र में बड़े हैं वो त्यागी नहीं हो सकते। उनको गृहस्थ आश्रम ही करना है। ठाकुर का ऐसा नहीं था। ठाकुर का पूरा स्पेक्ट्रम था। यह पढ़े लिखे ही लड़के ज्वाइन करेंगे ऐसा नहीं है। उसका ये जो आउटलाइयर एग्जांपल है लाटू महाराज अपने फेमस अद्भुतानंद जी ठाकुर उनको वो ये अल्फाबेट सिखाते हैं। कहते हैं क तो लाटू महाराज कहते हैं का। ठाकुर कहते हैं अरे का नहीं रे क। तो लाटू महाराज फिर से कहते हैं का। तब ठाकुर नाराज हो जाते हैं। बोलते हैं तू क को ही का कहेगा तो का को क्या कहेगा? ऐसा बोल के कहते हैं कि रहने दे तुमको अक्षर ज्ञान की जरूरत नहीं है। तो वो फेमस निरक्षर लाटू महाराज यानी कि यह आपको प्रूव होता है कि नरेंद्र या तो काली महाराज की तरह मेधावी होने की कोई जरूरत नहीं है। साधु होना है। दूसरा दूसरे आउटलाइयर है अपने बूढ़ो गोपाल महाराज अद्वैतानंद जी नॉट नेसेसरी कि आप उम्र में छोटे हैं तभी आप सन्यास ले सकते हैं। अद्वैत अद्वैतानंद जी का तो विवाह भी हुआ था। बीवी बच्चे भी थे। वह सबका देहांत हुआ। बोल के यहां पर आए थे। और तीसरा कि ना ही आपको इस तरह से बाल ब्रह्मचारी होना है। बड़ा कठिन वो मार्ग है। इनफ एग्जांपल जो राजा महाराज स्वयं एक आउटलाइयर है। इस एग्जांपल में उनका विवाह भी हुआ था और उनका बच्चा भी हुआ था। तो यह देखिए कि ठाकुर के सामने इस तरह के कोई क्राइटेरियाज़ नहीं है कि उसको आज के जो रामकृष्ण मिशन में है आपको अनमैरिड होना है। आपका जो एज लिमिट होना चाहिए 28 ना 25 जो भी है और आपको ग्रेजुएट होना है। तो यह सब जो क्राइटेरिया है ठाकुर के समय नहीं थे। जो भी आता है उसके हृदय में क्योंकि देखिए आज कोई यहां पर आता है जॉइ करने के लिए उसके हृदय में देखकर के उसका वैराग्य कितना प्रचंड तीव्र है यह सब असेसमेंट करना मुश्किल है। उस समय ठाकुर के वो तो ठाकुर स्वयं थे। माने वो असेसमेंट करने की शक्ति जो थी, दूसरों के हृदय में देखने की शक्ति वो भी उनकी तो थी अद्भुत और दूसरा कि मुट्ठी भर चंद मुट्ठी भर लोग उनके पास में आते थे। तो सबको इंडिविजुअल लेवल पर वो एसएस कर पाते थे। तो आज ऐसा नहीं हो सकता है बोलकर के कुछ जनरल क्राइटेरिया रख दिए हैं। ठाकुर के समय ऐसा नहीं था। तो देखिए कि ये जो एक पूरा था कि एक स्नेह के सूत्र में सबको बांध करके एक संघ की रचना करना और इस संघ की आगेवानी नरेंद्र को देना। सम हाउ यह जो पूरा ड्रामा चल रहा था ठाकुर के आखिरी जीवन आखिरी समय में यह रामचंद्र वगैरह जो प्रवीण भक्त थे उम्र में बड़े वे लोग वहां पे आते तो थे आते तो थे काशीपुर में सम हाउ दे मिस दिस एंटायर इवेंट एंटायर ये जो घटनावली है उन्होंने मिस कर दी और इसीलिए जब ठाकुर की महासमाधि के बाद में नरेंद्र ने यह कहना चालू किया कि इकट्ठा होकर के रहना है साधना करनी है संसार त्याग करना है, सन्यास ग्रहण करना है। तो यह बात यह रामचंद्र दत्त जैसे भक्तों को इतना आश्चर्यजनक लगी कि उन्होंने स्वामी जी का विरोध करना शुरू कर दिया। इसलिए यहां पे यह महाराज जी लिखते हैं कि यह जो नरेंद्र वगैरह जो थे उनके साथ में सिर्फ जनरेशन गैप नहीं था। आदर्श का भी एक बहुत बड़ा विरोध था। आमरा पूर्व उल्लेख कोरिया छ प्रवीण देर काहार काहारो मते सन्यास ग्रहण श्री रामकृष्ण अनुमोदितो छिलोना सुतरान मठ स्थापन ओ निरर्थक हमने पहले ही कहा है कि जो बड़े थे प्रवीण यानी कि उम्र में बड़े उनके मत अनुसार सन्यास ग्रहण ठाकुर की ठाकुर का अनुमोदित नहीं था अर्थात कि सन्यास ग्रहण के प्रति ठाकुर का कोई मंतव्य अच्छा नहीं था। ठाकुर का मंतव्य नहीं था। इसलिए मठ स्थापन करना निरर्थक है। कथामृत एक स्थाने आे कथामृत में एक जगह पे मास्टर महाशय ने लिखा है आज महिमा चरण शहीद ठाकुर कथा वार्ता शून्य कोनो भक्त भाव छे ठाकुर तो संसार त्याग कर ते बोलले ना बरम बोले छ संसार केला स्वरूप ए केलाए थे केके काम क्रोध इत्यादि शंगे युद्ध करते पारा जाए अत ए एक रकम में बला होलो श्री जीवन मुक्त संसारे थकते पारे आद आदर्श केशव सेन यहां पे मास्टर महाशय महिमाचरण के साथ में ठाकुर का वार्तालाप हो रहा था। उसको रेफर करके कहते हैं कि ठाकुर ने तो संसार त्याग करने के लिए कहा नहीं है। उसके उन्हें ऑन दी अदर हैंड ऐसा कहा है कि संसार तो किले की तरह है। किले में रहकर के काम क्रोध वगैरह जो शत्रु है उनके साथ में अच्छे से युद्ध कर सकते हैं। इसलिए एक तरह से यदि कहे कह सकते हैं कि जो जीवन मुक्त है वह संसार में रह सकता है। आदर्श है केशव सेन। हालांकि यहां पर उन्होंने क्वेश्चन मार्क लगाया है कि केशवसेन सही में आदर्श है कि नहीं। देखिए मास्टर ठाकुर एक बार यह जो किले का जो उदाहरण दिया है ठाकुर एक बार कहते हैं एक वही ब्राह्म भक्तों को ही कहते हैं कि देखो तुम लोग तो किले में से युद्ध कर रहे हो। बड़ा अच्छा है। मैं खुले मैदान में युद्ध कर रहा हूं। बोल के मुझे बड़ा ही कष्ट सहन करना पड़ा है। ऑब्वियसली किले में युद्ध करेंगे तो यह तीर है वगैरह से आप आराम से अपने को बचा सकते हैं। और जो बाहर मैदान में जो खुले में जो शत्रु सेना है उसके ऊपर में आप आसानी से वार कर सकते हैं। आसानी से उनके ऊपर में तीर वगैरह छोड़कर के उनको मार सकते हैं। किंतु यदि आप किला छोड़कर के बाहर आकर के वह जो खुले मैदान में शत्रुओं के साथ युद्ध करेंगे तो फिर तो आपके पास में प्रोटेक्शन नहीं है। किंतु ऐसा कब करना है? जब हमारी ईश्वर प्राप्ति की एंबिशन इतनी हाई हो, इतनी बड़ी हो कि फिर अभी किले का भी प्रोटेक्शन नहीं चाहिए। साधन क्षेत्र में कामना वासनाओं के साथ में युद्ध करते-करते यदि जीते तो स्वर्ग प्राप्त होगा और यदि मरे तो फिर हमको यश प्राप्ति होगी। यह जो गीता में कृष्ण करते हैं नावा प्राप्त से स्वर्गम। यदि हत्या होगी तो स्वर्ग प्राप्त होगा और यदि जीत जाओगे तो इस धरा को तुम भोगोगे। यह जो अर्जुन को यह भगवान कृष्ण कहते हैं तो यहां पे भी ऐसा है कि यदि खुले में युद्ध करतेकरते यदि मर जाएंगे तो स्वर्ग प्राप्त होगा। जीत जाएंगे तो पृथ्वी को भोगेंगे। तो वैसे ही यहां पे ठाकुर इनको कहते हैं ब्राह्मण भक्तों को। दूसरा है कि यह जो किले का जो उदाहरण दिया है वह वही आज का रामकृष्ण मठ जैसे कि हमने ऑलरेडी डिस्कस किया कि ठाकुर की जो समय की जो प्रचंड साधना थी इवन ठाकुर की साधना को तो छोड़ ही दीजिए। यह जो वराह नगर मठ के जो प्रसंग है एक के बाद एक हम पाठ करेंगे तो हमको लगेगा कि कंपेयर टू दैट आज के युग में हम कुछ भी नहीं कर रहे हैं। आज के रामकृष्ण मिशन दूसरे साधुओं की बात नहीं कर रहा। मैं खुद की बात कर रहा हूं। वो जो वराह नगर मठ की जो तपस्या है बाद में ये जो परिवराजक दिनों की जो तपस्या है उसके सामने मेरा जीवन की तपस्या कुछ भी नहीं है। माने 100 जो स्वामी जी यदि 100% किए होंगे वराह नगर मठ में गुरु भाई तो यह0001% भी तपस्या मैंने नहीं की अपने जीवन में। तो यहां पर ठाकुर एक तरह से देखें तो भविष्य का जो रामकृष्ण मिशन है उसका भी एक एक यह दे रहे हैं एक इंगित कर रहे हैं। जैसे कि एक पूर्वाभास दे रहे हैं कि हां भविष्य में एक दिन आएगा कि जबकि यह जो यंग लड़के जो यहां पर आएंगे उनकी तपस्या करने की शक्ति बड़ी मॉडरेट होगी। तो उनको इस तरह से किले में बैठकर के ही लड़ना है। आज का जो रामकृष्ण संघ है हम इतने सेफ है। हम लोग रूटीन फॉलो करते हैं। सुबह को मंगल आरती में जाना है। इवनिंग संध्या आरती में जाना है। दिन के दौरान बैठकर के ऑफिस में कार्य करना है। और फिर अर्ली मॉर्निंग लेट इवनिंग मंगल आरती और संध्या आरती के बाद जो आधा एक घंटा मिलता है वह नाम स्मरण करना है। और तो यही है हमारा जीवन। इससे कोई बहुत बड़ी तपस्या हम लोग नहीं एटलीस्ट मैं नहीं करता हूं। एकादशी का उपवास शायद किया तो किया। सप्ताह में एक दिन पूरी रात बैठकर के जग करके जप यज्ञ किया तो किया। इसके अलावा बीच-बीच में एक आध महीना छुट्टी लेकर के कहीं तपस्या के स्थान पर गए भिक्षा मांग करके रहे। जैसे कि यह उत्तरकाशी वगैरह वहां पर सत्र चलता है तो हमारे साधुओं वहां जाकर के रहते हैं। दिन के दौरान कोई शास्त्र चर्चा हो रही है, शास्त्र पाठ हो रहा है तो वह अटेंड करेंगे। सत्र में से भिक्षा ग्रहण करेंगे और वहीं वह गंगा का जल पान करेंगे। कुटिया में रहते-रहते ऐसा एकाद दो महीने कर लेंगे। बहुत ज्यादा तपस्या करने की इच्छा हुई तो यह नर्मदा परिक्रमा कर लेंगे। यही तो मैंने सुना है, यही मैंने देखा है, यही मैंने किया है। इससे ज्यादा मुझे पता नहीं है कि हम लोगों में करने की शक्ति है कि नहीं। तो यह भविष्य का जो रामकृष्ण संघ है उसका इंगित एक पूर्वाभास स्वामी ठाकुर यहां पर दे रहे हैं। किंतु ये भविष्य के रामकृष्ण संघ का स्थापन करने के लिए जो प्रचंड तपस्या जो करनी पड़ेगी जिस तपस्या के फाउंडेशन पे यह भविष्य का संघ खड़ा रहेगा। वो तपस्या करनी थी इन 18 लोगों को। यह 16 डायरेक्ट डिसाइपल और मां और ठाकुर इन 18 लोगों की तपस्या है। प्रचंड तपस्या है। बोल करके आज हम एक मॉडरेट लाइफ स्पिरिचुअल लाइफ लीड कर पा रहे हैं। सो दिस इज द फाउंडेशन। यह फाउंडेशन है बोल के भविष्य का संघ सिक्योर होगा। किंतु बाकी जो है यह जो रामचंद्र वगैरह वे लोग बोलते हैं आज से ही वह चालू हो जाए तो वह तो होने वाला नहीं है। रामकृष्ण मठ आज का जो रामकृष्ण संघ है उसका उसका एक माने उसको उसकी कल्पना वे लोग बोल रहे हैं कि आज से ही प्रारंभ हो गई। ठाकुर की महासमाधि से ही प्रारंभ हो गया। किंतु नहीं अभी भी बहुत सारी तपस्या करनी है। बाद में यह सब प्रारंभ होगा। इसलिए यहां तक कि यह मास्टर महाशय स्वयं एक भ्रम में पतित हुए हैं कि ठाकुर चाहते हैं कि सबके लिए यही है कि केशव सेन की तरह रहे। हालांकि उन्होंने केशवसेन के बाद में क्वेश्चन मार्क लगाया है। यानी उनको पता है कि केशवसेन कोई आदर्श नहीं हो सकता। किंतु फिर भी उनके मन में यह सब विचार अवश्य थे। अच्छा इसके बाद का जो है अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु