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ग्रामवासियों की सेवा कर के मैंने क्या सीखा || Self Reflection || 8 Jan 2026

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ओम स्थापकाय च धर्मस्य [संगीत] सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः हम लोग बीच मेंबीच में खास करके मैं थोड़ा सा सेल्फ एनालिसिस करता हूं। सेल्फ एनालिसिस का एकेंस स्पिरिचुअल लाइफ में है कि हम आध्यात्मिक जीवन में यदि आगे बढ़ना चाहते हैं तो हमारी लाइफ में बाहर में जितनी भी बैरियर्स आती है बाहर में जितने विघ्न होते हैं उससे कहीं ज्यादा विघ्न हमारे भीतर में से हमारा मन प्रकट करता है। तो मन के द्वारा प्रकट किए गए इन विघ्नों को यदि हम नहीं पहचानेंगे तो क्या होता है कि हम उनको एड्रेस नहीं कर पाएंगे। हम उसका कोई सॉल्यूशन नहीं ला पाएंगे। तो आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करना है तो सेल्फ एनालिसिस या तो सेल्फ रिफ्लेक्शन एक जितनाेंस हमारे लिए जब ध्यान का है, मेडिटेशन का है, यह महावाक्य विचार का है, स्मरण मनन निधि्यासन का है। तो इन सबके साथ में यह सेल्फ एनालिसिस एकदम क्लोजली कनेक्टेड है। सेल्फ एनालिसिस में खास करके मैं क्या करता हूं? यह जीवन की जितनी भी घटनाएं हैं, उनके ऊपर मैं एक दृष्टिपात करता हूं और फिर मैं सोचता हूं कि यह जो पर्टिकुलर इवेंट थी जहां पर मैंने इस तरह से बिहेव किया वो सही था ना कि गलत था। यह जो अपना जीवन जो होता है साधक का एथिक्स और मोरालिटी से वह नियंत्रित होता है। यम और नियम जिसको कि योग की भाषा में कहे गए हैं। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, तप, शोच, संतोष, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान। यह 10 है यम और नियम और साथ में ही है चित्त प्रसाद, मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा। तो क्या है कि इस एथिक्स और मोरालिटी के बेस पर साधक का जीवन होना चाहिए। यदि हम अपने जीवन में सत्य को पकड़ कर के नहीं चलेंगे। ठाकुर ने कहा है कि कलयुग में दो तपस्याएं हैं। सत्य और ब्रह्मचर्य। यह दोनों के बिना आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ना ज्यादा संभव नहीं है। यथाशक्ति दोनों का पालन करना है। तो मेरा बिहेवियर क्या सत्य पे आधारित है? क्या मेरा बिहेवियर एथिक्स और मोरालिटी के ऊपर में आधारित है? यम और नियम पे आधारित है? यह मुझे सतत अलर्ट होकर के सोचना होगा। यदि मेरा बिहेवियर मैं आंख जब बंद करता हूं अपने मन को अंतर्मुख करता हूं तब तो मैं भगवान का बहुत बड़ा भक्त हो जाता हूं भगवान से प्रार्थना करता हूं भगवान का ध्यान करता हूं या आत्म चिंतन करता हूं जो भी मेरा थ्यरी है जो भी मेरा मार्ग है भक्ति हो ना कि ज्ञान हो कर्म हो ना कि योग हो जो भी मेरा मार्ग है उसको मैं जिसको कि अंतरंग कहा जाता है अंतरंग योग बहिरंग और अंतरंग योग साधना में इस तरह से दो डिवीजन किए गए हैं। बहिरंग अर्थात कि हम लोगों के साथ में शरीर के साथ में किस तरह से बिहेव करते हैं और अंतरंग अर्थात कि हम अपने मन को किस तरह से कंट्रोल करते हैं। तो मन को कंट्रोल करने के लिए किंतु आपको पहले तो लोगों के साथ में अपना जो बिहेवियर है उसको नियमन करना पड़ेगा। उसको कंट्रोल में लाना पड़ेगा और फिर अपने देह को कंट्रोल में लाना पड़ेगा। इसलिए आप देखिए कि पतंजलि का जो अष्टांग योग है सर्वप्रथम दो स्टेप है यम और नियम अर्थात कि बाहर के जगत के साथ में हमको किस तरह से बिहेव करना है या तो फिर हम यदि अकेले भी रहते हैं तो हमारा बिहेवियर किस तरह से होना चाहिए। इंडिविजुअल बिहेवियर या तो सोशल बिहेवियर और फिर आसन प्राणायाम यह दो आते हैं। अर्थात किस तरह से हमको कंट्रोल में लाना है। उसके बाद में ही प्रत्याहार और फिर धारणा ध्यान समाधि यह अंतरंग योग है वह प्रारंभ होता है। तो देखिए बाहर के जगत में हम चीटिंग करते हैं। बाहर के जगत में हम असत का आसरा लेते हैं। बाहर के जगत में लोगों को एक्सप्लइट करते हैं। बाहर के जगत में दूसरों के साथ में बिहेव करने के समय अपना घमंड दिखाते हैं। लोगों को नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं। तो यह सब हमने बाहर के जगत में कर लिया और फिर मंदिर में बैठकर सोचेंगे कि अभी मैं भगवान को थोड़ा बहुत चढ़ावा दे दूंगा। यह बड़ा एक डोनेशन दे दूंगा। कोई बड़ा सा विधि करवा लूंगा। पूजा ना की यज्ञ न की यह कथा बिठवा दूंगा मेरे घर में तो मैंने बाहर के जगत में जो पाप किए हैं सब धुल जाएंगे। वैसे पाप धुलते हैं कथा का यज्ञ का पूजा का इन सब का तो महिमा है ही है। यह तो जग जाहिर है। किंतु फिर क्या है? पता है मैंने बाहर में पाप किया। फिर भीतर में मैं पुण्य करना चाहता हूं। पुण्य ने आपके पाप काट दिए। इतना ही बैलेंस तो फिर आपका जीरो ही हो गया। तो फिर यह जो पॉजिटिव बैलेंस बनना चाहिए वो पॉजिटिव बैलेंस तो बना ही नहीं। इसलिए हमेशा जो साधक होता है उनको एक सेल्फ रिफ्लेक्शन करने की आवश्यकता है। सतत अपने भीतर में झांकने की आवश्यकता है। अभी देखिए बहुत बार ऐसा होता है ना कि हम लोग लाइव तो इंटरेक्ट करते हैं ना लोगों के साथ में। आज मुझे मैं आज एक कल कल की ही बात बताता हूं। कल हम लोग कॉलेज है यहां पे एक बहुत बड़ा उसके सामने एक पार्क है जहां पे पार्क के सामने एक बहुत बड़ी सी जगह है ओपन स्पेस है वहां पे हमको सुबह को इकट्ठा होना था 5000 स्टूडेंट इकट्ठे हुए हैं तो क्या है कि हाई प्रेशर एटमॉस्फियर है जिम्मा जब अपने सर पे होता है और फिर ट्रैफिक पुलिस और फिर यह 20 कॉलेज से 5000 स्टूडेंट और फिर उनके साथ में आए हुए टीच टीचर या तो फिर ये एनसीसी कैडेट्स ये एनसीसी एनएसएस कोऑर्डिनेटर्स इतने सारे लोग फिर ये डिग्निटरीज आएंगे एक वाइस एडमिरल आए थे इंडियन नेवी के विशाखापटनम क्या है कि ईस्टर्न नेवल कमांड है उसका हेड क्वार्टर है तो यहां पे एडमिरल वाइस एडमिरल वगैरह का पोस्टिंग होता है तो हमारे प्रोग्राम में हम लोग जनरली प्रेफर करते हैं किसी वाइस एडमिरल को बुलाना उन लोगों का एक फ्लैग ऑफिसर होते हैं तो वाइस एडमिरल उनका का एक स्टेटस होता है और हमारे साथ में उन लोगों का बड़ा सहानुभूति भी होता है। आर्मी, नेवी एयरफोर्स में देखेंगे रामकृष्ण मिशन के साथ में इन लोगों का अच्छा पड़ता है। तो इस तरह से डिग्निटरीज आते हैं तो हाई प्रेशर एनवायरमेंट में हम लोग काम करते हैं। उस समय किसी से कुछ गलती हो गया तो फटाक करके मैंने गुस्से से कुछ बोल दिया। हालांकि मैंने ऐसा कुछ किया नहीं था कल। किंतु यदि ऐसा हो भी गया तो क्या होता है पता है? उस जो लाइव जो यह सब प्रेशर में जब हम रहते हैं, हम क्या बोलते हैं, किस तरह से बिहेव करते हैं, उस पे कभी-कभी कंट्रोल नहीं रहता। तो इसीलिए हमेशा एक सेल्फ रिफ्लेक्शन करना है कि कल की घटना थी, परसों की घटना थी, पिछले साल की घटना थी, वह सबको सोचिए और ठीक कीजिए कि मैंने यह जो बिहेव किया था उस समय वो ठीक था कि नहीं था। एथिक्स और मोरालिटी पे बेस करके देखिए कि मेरा बिहेवियर सही था कि गलत था। उस बिहेवियर ने उस जिस तरह से मैंने जो कहा, मेरा जो वर्तन था, मैंने जो कर्म किया, उसने क्या कर्म के बंधन बांधे हैं मेरे ऊपर में कि तोड़े हैं। यही तो अल्टीमेटली जीवन का लेखाजोखा है। इस तरह से रैली है, प्रोसेशन है। वह तो हजार आएंगे जाएंगे। यह तो कोई हमारे सक्सेस का मेजरमेंट नहीं है। सक्सेस का मेजरमेंट क्या है एक साधक के? वो तो वही है ना कि मैंने कर्म के बंधन कितने बंधे, कितने टूटे। तो यही तो मेरे जीवन का अल्टीमेट बैलेंस शीट है। तो इसलिए यह सेल्फ रिफ्लेक्शन करना बड़ा आवश्यक है। तो अभी मैं रिसेंटली कुछ समय से सेल्फ रिफ्लेक्शन जो कर रहा हूं उसमें एक थीम जो बार-बार आकर के उपस्थित हो रही है। इस थीम को मैंने नाम दिया है एक्सपेंशन इज लाइफ। कॉन्ट्रक्शन इज डेथ। अभी यह तो स्वामी जी का एक कोटेशन है और स्वामी जी ने उसको एक अर्थ में कहा है कि स्पिरिचुअल एक्सपेंशन होना चाहिए। यदि भारत की स्वामी जी का फेमस है कि इंडिया मस्ट कॉनकर द वर्ल्ड विथ आवर स्पिरिचुअलिटी। हमको भारत को अपनी आध्यात्मिकता से जगत पर विजय प्राप्त करना होगा। नथिंग लेस देन दैट। तो उस अर्थ में जो स्वामी जी कह रहे हैं मैं जो इस जिस तरह से इस स्टेटमेंट का अर्थ कर रहा हूं। देखिए मैं सेल्फ एनालिसिस कर रहा था तो मैं रांची के दिनों के बारे में सोच रहा था। रांची के दिनों में आपको पता ही है शायद कि मैं वहां पर था रांची आश्रम में मोराबादी आश्रम में वहां पे ट्राइबल डेवलपमेंट का बहुत सारा काम होता है। तो क्या है कि मेरा जिम्मा क्या था कि खास करके जिसको कि फील्ड कोऑर्डिनेटर कहते हैं। हमारा वहां पे केवी है कृषि विज्ञान केंद्र और कृषि विज्ञान केंद्र में बहुत सारे एक्सपर्ट्स होते हैं। रिसोर्स पर्सन तो रिसोर्स पर्सन कोई बी कीपिंग का है, कोई फ्लोरीिकल्चर का है। किस तरह से फूल उगाए जाए? फूलों का बड़ा मार्केट है। शादी ब्याह सब जगह पे फेस्टिवल में फूल चाहिए। तो फ्लोरीकल्चर एक बड़ा ही प्रॉफिटेबल बिजनेस है। तो बी कीपिंग एक प्रॉफिटेबल बिजनेस है। क्योंकि हनी मद जो होता है काफी कॉस्टली होता है। तो इस तरह से फिर यह शॉप है, मशीन शॉप है, मोबाइल रिपेयर है, बांबू क्राफ्ट है, इंसेंस मेकिंग है। बहुत सारे कोटेज इंडस्ट्रीज हम लोग सिखाते थे। वो सभी के रिसोर्स पर्सन होते थे। मेरा प्राइमरी वर्क था कि गांव के लेवल पर एक विवेकानंद सेवा संघ की रचना हुई है। उस सेवा संघ में एक प्रेसिडेंट, एक सेक्रेटरी, एक ट्रेजरर और तीन-चार मेंबर ऐसा करके एटलीस्ट छह से सात लोग रहते हैं। इस सेवा संघ के माध्यम से सब सर्विस एक्टिविटीज होगी। और इस गांव में जैसे कि हमने तीनचार प्रोजेक्ट दिए हैं। एक इंसेंस मेकिंग का प्रोजेक्ट है। एक फ्लोरीकल्चर का है। एक है कि वो जो एनिमल हस्बेंडरी का प्रोजेक्ट है। ऊंची किस्म के जो बकरे होते हैं वो हम देते थे। चिकन फार्मिंग जो होता है चिकन्स देते थे। म मुर्गी वगैरह मुर्गी पालन का व्यवसाय ये तो ट्राइबल लोग हैं। वे लोग तो खाते हैं। तो वहां पे ये सब चलता है। तो मुझे वहां से दिव्यायन से हमारा केवी के वहां से एक्सपर्ट्स को लेकर के गांव में जाना है। फिर हमारे जो कमेटी मेंबर होंगे वो और फिर यह एक्सपर्ट यह दोनों मिलके जितने भी प्रोजेक्ट चलते हैं वह प्रोजेक्ट के लोकेशन पर जाएंगे, इंस्पेक्ट करेंगे और फिर उनको रिलेवेंट एडवाइस देंगे। तो मेरा काम कोई एक्सपर्ट तो मैं नहीं हूं क्योंकि मेरा काम है ओवरऑल कोऑर्डिनेशन का। कब कहां पे जाना है, किस एक्सपर्ट को ले जाना है, किस सेवा संघ के साथ में कोऑर्डिनेशन करना है, फिर वहां से फीडबैक लेना है, वगैरह-वगैरह जो कि कोऑर्डिनेशन में होता है। एक चीज मैंने वहां पे देखना शुरू किया था कि धीरे-धीरे करके ना कुछ-कुछ लोगों पे लोगों के ऊपर में मेरी नाराजगी बढ़ना शुरू हो गई थी। क्यों? क्योंकि मैं सब कुछ सैक्रिफाइस करके वहां पर गांव में गया हूं गांव में काम करने के लिए और यह जो विलेज लेवल जो कुछ कोऑर्डिनेट ये जो प्रेसिडेंट या सेक्रेटरी या ट्रेजरर होते हैं उन लोगों को ना जैसे कि कुछ पड़ी ही नहीं है। यदि उनको खुद को प्रोजेक्ट दिया जाए तो वे लोग उसको ठीक से चलाएंगे। किंतु उनको आप जाके यह पूछेंगे अच्छा आपके पड़ोसी के वहां पे जो चल रहा है उसका क्या फीडबैक है? तो वो सीधा-सीधी बोलने पता नहीं क्या मुझे वो वो मेरे से बात नहीं करता या मेरा उसके साथ कोऑर्डिनेशन नहीं है। उसको प्रोजेक्ट मत दीजिए। मेरा एक रिलेटिव है उसको दे दीजिए। वो ऐसा मुंह से तो नहीं बोलेगा मेरा रिलेटिव है। किंतु जब वो किसी को रिकमेंड करेंगे और मैं थोड़ा बैकग्राउंड चेक करूंगा तो पता चलेगा वो उसका रिलेटिव है। तो देखिए कि इन लोगों में जब मैं सेल्फिशनेस देखता था मैं बड़ा ही इरिटेटेड हो जाता था कि मैं इतना सैक्रिफाइस करके यहां पे आया हूं इनके कल्याण के लिए और वो अपने खुद के कल्याण के लिए थोड़ा सा भी एक सेल्फलेसनेस नहीं दिखा सकते क्या? थोड़ा सा भी उदार हृदय नहीं दिखा सकते क्या? तो क्या है? यह मेरा एक इरिटेशन मेरे मन में बिल्ड अप होना शुरू हुआ था। कुछ-कुछ विलेज लेवल कोऑर्डिनेटर्स के अगेंस्ट में, कुछ-कुछ ये रिसोर्स पर्संस के अगेंस्ट में कि वो गांव में जाने से ही कतराते थे। क्योंकि बड़ा हार्ड जर्नी है। गांव वो तो ट्राइबल एरिया में रोड वगैरह का तो कोई अस्तित्व ही नहीं है। प्लस हमारा जो जीप जाता था उसमें वो ऐसा वो जंपर जैसा कुछ था ही नहीं। नामोनिशान ही नहीं था। छोटा सा भी ये वो ये होगा पत्थर उसके नीचे आएगा तो पूरी जीभ ऐसा उछलेगी आपका फुल बॉडी मसाज करवा देगी तो इस तरह की जीप में वहां जाना दिन भर धूप में ठंड में सर्दी में ये बारिश में घूमते रहना गांवगांव और फिर ट्राइबल लोगों का बिहेवियर भी आपको जचा तो जचा नहीं जचा तो नहीं जचा ऐसा है तो कुछ-कुछ लोग कतराते थे तो फिर मुझे उनको गुस्सा हो के नाराज होकर करके डांटना पड़ता था। चलो चलो जाना पड़ेगा। इतने दिनों से आप नहीं गए हैं। मिनिमम इतना रिक्वायरमेंट है वगैरह-वगैरह। तो क्या है कि मुझे एक समय ऐसा लगने लगा कि मैं आया हूं लोगों का कल्याण करने के लिए। तो मेरे मन में इस तरह से लोगों के प्रति जिन लोगों का मैं काम कर रहा हूं। कुछ-कुछ ट्राइबल लोगों के प्रति, कुछ-कुछ कोऑर्डिनेटर्स के प्रति यह जो क्रोध जो प्रकट हो रहा है, वो मुझे नहीं लगता कि यह ठीक हो रहा है। यह मेरे आध्यात्मिक जीवन के लिए भी और इन जनरल वो कर्म के बारे में भी। हालांकि कर्म के बारे में मेरा बड़ा ही अच्छा एक हो गया था प्रेस्टीज कि ये महाराज अच्छे से सब काम करवाते हैं। किंतु देयर इज मोर देन दैट ना। हम लोग भले ही चाहे मैं ऑफिशियली साधु नहीं था। मैं वॉलंटियर ही था। साधु के कपड़े पहनता था कि था तो वालंटियर किंतु फिर भी ठाकुर मां स्वामी जी को फॉलो करते हैं तो इनर लाइफ क्या है उसके बारे में एक अंदाज तो हमको आता ही जाता है तो फिर क्या है कि मैं भीतर में से मुझे ऐसा लगने लगा कि यह जो पीरियड है मेरे जीवन का यह अभी स्टॉप होने को आया है। नाउ आई हैव टू थिंक समथिंग एल्स और ठाकुर की कृपा से मैं रामकृष्ण संघ में मुझे एंट्री मिल गई। ऑफिशियली साधु हो पाया मैं ठाकुर की कृपा के अलावा और कुछ नहीं। किंतु देखिए यहां पर आने के बाद में भी ना मुझे कभी-कभी ऐसा होता था यह जो आदमी है ना वो ठीक से काम नहीं करता है। यह जो है वो ऐसा है। एक तरह का दोष दृष्टि मेरे भीतर में आ गया था। तो मैं कभी-कभी क्या सोचता हूं कि दोष दृष्टि मेरे में क्यों है? क्योंकि मैं परफेक्शन चाहता हूं क्योंकि मैं आइडियल चाहता हूं। हाईएस्ट आइडियल होना चाहिए। हाईएस्ट परफेक्शन होना चाहिए। इसके लिए ना मैं लोगों में दोष देखता हूं कि हाईएस्ट आइडियल को नहीं फॉलो कर पा रहा है या यह व्यक्ति जो है वो 100% उसका जो यह देना चाहिए उससे जो पॉसिबल है देना वो नहीं दे रहा है। बोल करके परफेक्शन की मेरी एक्सपेक्टेशन है। आइडियल की मेरी एक्सपेक्टेशन है। बोल करके मैं दूसरों पे थोड़ा सा नाराज सा रहता हूं। यह जो पूरा मेरे जीवन का एक दौर चला है अप टू राजकोट मैं बता सकता हूं रांची से लेकर के राजकोट की मेरी अभी तक की जो यात्रा है बहुत बार मुझे ऐसा लोगों पे इरिटेशन होता था होता है अभी तक होता था कि यह जो आदमी है इंपपरफेक्ट है। यह जो पर्सन है वह अपना हाईएस्ट आइडियल फॉलो नहीं कर रहा है। यह जो पर्सन है ठाकुर मां स्वामी जी की बातें तो करता है किंतु इसके भीतर में ना ठाकुर मां स्वामी जी के आइडियल को फॉलो करने की कोई क्षमता नहीं है। बस मुंह से बात ही करता है। कार्य में कुछ नहीं है। ऐसा एक नेगेटिव एटीट्यूड कुछ-कुछ लोगों के ऊपर में मेरा बहुत ही इजीली बन जाता था। अभी यह जो मैं सेल्फ एनालिसिस कर रहा था उसमें यह जो बार-बार आ रहा है कि ऐसा क्यों हो रहा है? इसका कुछ ना कुछ तो सॉल्यूशन मुझे खोजना होगा। मां की वो जो कहानी है ना मां कहती है कि नहबत में बैठकर के मैं चांदनी रात को चांद के सामने देखकर के प्रार्थना करके कहती थी कि मेरी दोष दृष्टि जो है संपूर्ण रूप से यह निवारण कर दो उसका जिससे कि मैं किसी के भीतर में दोष ना देखूं। मेरा मन संपूर्ण रूप से निर्मल पवित्र कर दो। मां ने खुद ने कहा है कि मेरे भीतर में एक दोष देखने का एक आ गया था एक समय तो मैं सोचता था कि मां के भीतर में यदि आया है तो फिर हम लोग किस खेत की मूली है तो इसका क्या सॉल्यूशन होना चाहिए किंतु फिर मैं थोड़ा और ज्यादा डिटेल में अपना एनालिसिस करने का प्रारंभ किया पता है मुझे क्या लग रहा है मेरा जो एनालिसिस क्या है हम लोग जब एक इंटेंस काम करते हैं ना एक इंटेंस एक्टिविटी करते हैं ना तब हम लोग खास करके मैंने अपने बारे में देखा बहुत ही ज्यादा इंट्रोवर्ट हो जाते हैं। इंट्रोवर्ट होने के बाद में क्या होगा कि बहुत कम खास करके मैं अपनी बात करता हूं कि मैं लोगों के साथ में बहुत कम बातें करता था। अभी भी बहुत कम बातें करता हूं। काम हुआ तो बात की। या तो फिर इस तरह से कोई आध्यात्मिक डिस्कशन चल रहा है तो मैंने बात की। वरना जिसको कि स्मॉल टॉक कहते हैं जिसको कि एक सोशल गैदरिंग में एक जनरल एक वार्तालाप करना होता है। ये सब मैं थोड़ा सा भी नहीं कर पाता हूं। एक प्लेजेंट्री एक्सचेंज जो होता है कैसे हो? क्या है? क्या कर रहे हो? वो मेरे से होता ही नहीं है। ऑर्डिनरी लेवल का वार्तालाप हमेशा मैं आइदर एक फिलॉसोफिकल थिंकिंग में रहूंगा या तो कुछ ना कुछ मैं प्रोजेक्ट लेके रहूंगा। और इसके रिलेटेड यदि कुछ बोलना है तो बहुत अच्छा है। किंतु इन जनरल स्मॉल टॉक क्या करना? इन जनरल लोगों के बारे में क्या बात करना? वो एक फेमस एक कोटेशन है कि ग्रेट मैन डिस्कस आइडियाज। अ जनरल पीपल दे डिस्कस इवेंट्स एंड इंफीरियर पीपल दे डिस्कस पीपल। अर्थात कि जो लोग ग्रेट होते हैं ना वे लोग आइडियाज के बारे में बात वार्तालाप करते हैं। जो लोगों का स्टेटस नॉर्मल लेवल का होता है वे लोग घटनावली के बारे में बात करते हैं। इवेंट्स आज क्या न्यूज़ में क्या है? क्या हो रहा है? अमेरिका में क्या हुआ? यहां पे क्या हुआ? या तो फिर अपने आसपास में क्या हो रहा है? और फिर जो इनफीरियर इनफीरियर क्वालिटी के लोग होते हैं ना वो दूसरों के बारे में बात करते हैं। अच्छा वो क्या करता है? ये क्या करता है? है वह क्या करता है? अर्थात कि आइडियाज के बारे में बात करें तो आपका लेवल हाईएस्ट है। यदि घटनावली के बारे में इवेंट्स के बारे में बात करें तो आप नॉर्मल लेवल पे हैं। और यदि आपका अधपतन हुआ है तो आप हमेशा दूसरों की चिंता करेंगे। पर निंदा पर चर्चा अपने ऑर्डर में इसको कहते हैं पीएनपीसी पर निंदा पर चर्चा। दूसरों की निंदा करना। दूसरों की यह क्या कर रहा है? वो क्या कर रहा है? हमेशा इस तरह की बातें सुनने को अच्छा लगता है, बोलने को अच्छा लगता है। तो मुझे पहले से ही था कि इस तरह के लोगों की बातें मुझे कभी नहीं करनी। इवेंट्स के बारे में बात नहीं करनी। पीपल के बारे में बात नहीं करनी। हमेशा आइडियाज को लेके रहना है। प्रॉब्लम यह है कि हमारे रिलेट हमारे आइडियाज के साथ में रिलेट कर पाए। ऐसे लोगों की संख्या बड़ी कम रहती है। तो फिर क्या है कि अब [गला साफ़ करने की आवाज़] खास करके मेरा जो सोशल सर्कल है, फ्रेंड सर्कल जो है धीरे-धीरे करके कम होता गया ओवर अ लॉन्ग पीरियड ऑफ टाइम। बहुत कम लोगों के साथ में मैं बात करता हूं और बहुत कम टॉपिक है कि जिसके बारे में मैं बात कर सकता हूं। तो ये तो मैंने अपने बारे में सोचा कि अपने बारे में मुझे ऐसा लगा कि बिकॉज़ कि मैं धीरे-धीरे करके सोशली रिट्रीट हो रहा हूं बोल के मेरे भीतर में ना दूसरों के प्रति एक तरह की नाराजगी बढ़ती जाती है। किंतु देखिए मैं मैं मेरे साथ में यदि ऐसा हो रहा है। इसका दूसरों पे क्या असर होता है? पता है मैं हमेशा यह सोचता हूं कि यह जो दूसरा आदमी है ना वह मेरी निंदा करता है। वह जो आदमी है ना वह मेरी जो सक्सेस है या तो फिर मेरे भीतर में जो टैलेंट है वह सहन नहीं कर पाता। वो ईर्षान्वित होकर के वह भी मेरी निंदा करता है। धीरे-धीरे करके फ्रेंड सर्कल यदि कम होगा ना तो अपना निंदुक सर्कल दुश्मनों का सर्कल बढ़ने लगेगा। ऐसा एक ऑब्जरवेशन मैंने किया है। वो क्यों मेरी निंदा करता है? वो मेरे बारे में ऐसा क्यों कहता है? यह मेरे बारे में ऐसा क्यों सोचता है? तो दोनों तरह से एक तो मुझे ऐसा लग रहा है कि इन लोगों के भीतर में ना ही सत्व है ना ही कोई आध्यात्मिक क्षमता है। बोलकर के उनका मन हमेशा निंदा में लगा रहता है। और वे लोग भी मैं जितना उनके बारे में इतना ज्यादा सोचूंगा कि क्यों वे लोग निंदुक ही है क्योंकि वे लोग निम्न कक्षा के हैं। उतना ही कुछ-कुछ लोग उतना ही ज्यादा मेरी निंदा करेंगे। यानी कि मेरी एक्सपेक्टेशन है उनसे। मेरा उनके बारे में असेसमेंट है कि यह निंदुक है। यह पर निंदा पर चर्चा करता है। और वह सही-सही में वह मेरी निंदा करेगा। मेरे बारे में चर्चा करेगा। यह जैसे कि ना एक विशियस फीडबैक लूप जैसा व्हिच इज वेरी सरप्राइजिंग। मैं सोचता हूं मैं अपने माइंड में किसी के बारे में कोई एक असेसमेंट करता हूं तो उसको पता कैसे चलता है कि मैंने उसके बारे में ऐसा असेसमेंट किया। अभी किसी के साथ में मेरा अच्छा रिलेशन है। किंतु कुछ समय के बाद में ना उसके प्रति मेरा जो असेसमेंट है ना वो धीरे-धीरे करके कम होता गया। मुझे ऐसा लगने लगा कि अरे उसका तो इतना हाई स्टैंडर्ड मैंने सोचा था कि है किंतु अभी देखता हूं कि ऐसा कोई हाई स्टैंडर्ड जैसा नहीं है। एकदम वो इस तरह से बिहेव करता है कि जैसे उसके जीवन में आइडियल ही नहीं है। तो एक ओर मेरा उसके बारे में असेसमेंट कम होता गया। दूसरी ही ओर देखा कि मेरी ओर फ्रेंडली बिहेव करने की बजाय वह मेरी निंदा करना शुरू कर देता है। या तो मेरे से झगड़ना शुरू कर देता है या तो फिर मेरा अपमान करना शुरू कर देता है। यह दोनों एक साथ में चलता है। वि इज वेरी सरप्राइजिंग। मैं तो कोई ऐसा मूर्ख नहीं हूं कि जाकर के उसको कहूंगा कि अच्छा तुम्हारा जो दिमाग है उसके भीतर में सब ये वर्ल्डली आइडियाज ही भरे हुए हैं। सांसारिक विचार ही सब भरे हुए हैं। तुम्हारे जीवन में आदर्श जैसा कुछ है ही नहीं। ठाकुर मां स्वामी जी की बातें करते हो। उनका एक भी आदर्श फॉलो नहीं करते। मैं ऐसा मूर्ख थोड़ी ना हूं कि मैं जाके उसको कहूंगा कि भाई तुम ऐसा करते हो। यह तो मेरा असेसमेंट मैं अपने मन में रखता हूं। इसके बावजूद इसका जो बिहेवियर मेरे साथ में था वो फ्रेंडली बिहेवियर से नेगेटिव बिहेवियर की ओर क्यों जाता है? व्हिच इज वेरी सरप्राइजिंग। क्या वो मेरा मन पढ़ सकता है? एक तरह का टेलीपथी काम करता है क्या यहां पे कि जिस जैसे-जैसे मेरा उसका ओपिनियन उसके बारे में डाउन होता गया। वैसे-वैसे ही उसका मेरे साथ में बिहेवियर भी डाउन होता गया। व्हाई ऐसा क्यों होता है? ये मैं सोच रहा था रिसेंटली एक ऐसा हुआ कि मैं एक ऐसे व्यक्ति को मिला जिसका बिहेवियर ना एग्जजेक्टली मेरे जैसा है इस अर्थ में कि बहुत ही ज्यादा इंट्रोवर्ट है और बहुत ही कम लोगों के साथ में यह बात करता है। तो उसको देख के ना पहले तो उसके साथ में मेरा अच्छा फ्रेंडली रिलेशन था। किंतु मैं जितना उसको देखता हूं कि यह इतना इंट्रोवर्ट मेरे साथ में बात क्यों नहीं करता? रास्ते से जाता है तो मुंह घुमा लेता है। एक फ्रेंडली ग्रीटिंग भी क्या नहीं देख दे सकता? मेरे से बात करता है तो ऐसा मुंह चढ़ा करके बात करता है। थोड़ा सा भी एक स्माइलिंग फेस से बात नहीं करता। क्या बात है? माजरा क्या है? क्या अपने को इतना सुपीरियर समझता है? क्या वो मेरे बारे में इतना लो ओपिनियन रखता है? क्या माजरा क्या है? तो अभी मैं उसके बारे में ऐसा सोच रहा हूं। मेरा उसके साथ में बहुत अच्छा रिलेशन था। किंतु धीरे-धीरे करके डिटरेट होता गया और उसके प्रति मेरे मन में काफी एक इरिटेशन खड़ा हो गया। अभी देखिए उसने मेरे साथ में और कुछ नहीं किया। इतना ही है कि मुझसे बात करना अवॉइड करता है। बात करता है तो चेहरा जो है बड़ा ही चढ़ा करके बात करता है। जैसे कि भीतर में कितना ही उसके भीतर में नाराजगी हो मेरे प्रति। तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] ये जैसे-जैसे उसका यह बिहेवियर है मेरे प्रति और मेरा ओपिनियन उसके प्रति दोनों धीरे-धीरे करके डाउन होने लगे। फिर मैं जब यह एनालिसिस कर रहा था ना अपने बारे में अपने खुद के जीवन के बारे में रांची के दिनों के बारे में बेलूर मठ के बेलूर मठ के मेरे दिनों के बारे में राजकोट के मेरे दिनों के बारे में नागपुर मैं वहां पे था। लिमड़ी में था तो मैंने देखा कंसिस्टेंटली मेरे साथ में जो हो रहा है एग्जजेक्टली वही चीज मैंने इस पर्सन के साथ में देखी और तब पता है दोनों जैसे कि मिल गए मैं लोगों के प्रति इस तरह से जो देखता हूं लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं लोग मुझे किस दृष्टि से देखते हैं तो देखिए कि लोग मुझे उसी दृष्टि से देखते हैं जैसे कि मैंने इस पर्सन को देखता हूं यह इस तरह का एक व्यक्ति है जो कि बात करना अवॉयड करता है। यह इस तरह का एक व्यक्ति है जो कि अपने को बड़ा सुपीरियर समझता है। यह इस तरह का एक व्यक्ति है जो कि बड़ा घमंड से भरा हुआ है और मुझे बड़ा ही निम्न तरह का समझता है। तो जैसे ही उसके मन में मेरे बारे में यह धारणा बैठी साथ में ही उसके मन में मेरे प्रति इरिटेशन होना शुरू हो गया और फिर उसके साथ में मेरा रिलेशन है डिटेरेट होना शुरू हुआ। तो देखिए ये जो मैं अपने मन में दूसरों के प्रति जो सोचता हूं जिस तरह से दूसरों के प्रति एक निम्न धारणा रखता हूं। साथ-साथ में ही लोग मुझे देखकर के यही समझते हैं कि बिकॉज़ कि यह मेरे बारे में निम्न धारणा रखता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि वह आदर्श से भरा हुआ है। इसका अर्थ यही वे लोग समझते हैं कि आदमी घमंडी है। अभी देखिए किस तरह से यह कंट्रास्ट चलता है। मैं सोचता हूं कि मैं बहुत बड़ा आदर्शवादी हूं और मेरे आदर्श के अनुसार वह फिट नहीं हो रहा है। उसके जीवन में मुझे आदर्श नहीं दिखता है। ये मैं उसके बारे में सोचता हूं और वो मेरे बारे में क्या सोचता है कि ये आदमी इतना घमंडी है या तो फिर इतना ये विषैला है विद्वेष रखता है दूसरों के साथ में कि मेरे साथ में बात करने का भी एक सेकंड बात करने का भी उसके पास में टाइम नहीं मुझे अवॉइड करता है। मुझे इग्नोर करता है और हो सकता है कि मन में ही मन में मेरी निंदा करता हो। बहुत किस तरह से मैं अपने को देखता हूं। दूसरे को दूसरे लोग मुझे देखते हैं। तो देखिए कि इसकी वजह से यह जो मेरा एटीट्यूड है कि हाईएस्ट आइडियल की अपेक्षा रखना। मेरे खुद के प्रति मैं अपने से हाईएस्ट आइडियल की अपेक्षा रखता हूं। मैंने यदि घर बार छोड़ा है मां-पिताजी को इतना कष्ट दिया है। बोल के मैं जब यहां पे आया हूं मेरा जीवन हाईएस्ट आइडियल से बड़ा होना चाहिए। तो व्हिच इज गुड। अदरवाइज फिर यहां पे मार्ग भटकने का बड़ा ही इजी है। किंतु मैं जब वही हाईएस्ट आइडियल की अपेक्षा दूसरों के पास रखता हूं तो दूसरे लोग जो है उस हाईएस्ट आइडियल को नहीं पहुंच पाएंगे मेरी दृष्टि से। तो फिर उनके प्रति इरिटेशन होगा और दूसरे लोग जो है मुझे इस तरह से देखना शुरू करेंगे कि यह आदमी इतना घमंडी है। इतना घमंडी है कि इसके पास में हमारे साथ में बात करने का भी समय नहीं है। बात करने की भी इच्छा नहीं। बोल के वे लोग मेरे प्रति विद्वेष भाव रखना शुरू करेंगे। अभी देखिए यह किस तरह का कंट्रास्ट मैंने अपने साथ में लाके खड़ा किया है। मैं हाईएस्ट आइडियल को फॉलो करना चाहता हूं वि द रिजल्ट कि जैसे कई लोगों के साथ में मेरी दुश्मनावट हो गई है। अब मैं तो ना ही उनके बारे में कोई निंदा वाक्य मेरे मुंह से कभी निकला है। ना ही उनके प्रति मैंने कोई नेगेटिव एटीट्यूड रखा है इस अर्थ में कि उनका बुरा हो। मैंने तो कभी ऐसा नहीं चाहा कि उनका बुरा हो। मैं तो सब यही चाहता हूं कि मैं अपने जीवन में हाईएस्ट आइडियल फॉलो करूं। बट विथ अ वेरी सरप्राइजिंग रिजल्ट कि मैं दूसरों को इरिटेट करता हूं। ये जो आइडियल के पीछे की मेरी दौड़ है उससे दूसरे लोग नाराज हो जाते हैं। हाउ इज दिस पॉसिबल? ठाकुर मां स्वामी जी को आप फॉलो कर रहे हैं तो लोग तो प्रसन्न होने चाहिए। लोगों को खुशी होनी चाहिए कि अरे वाह ये तो इतना अच्छा कार्य कर रहा है। उसकी सराहना करो। उसको अच्छे से उसको एप्रिशिएशन के दो शब्द कहो कि भाई तुम बहुत अच्छा करते हो। तो चलो एप्रिसिएशन तो छोड़ ही दो। वह तो अपेक्षा रखता ही नहीं हूं मैं। किंतु विद्वेष क्यों रख रहे हैं आप मेरे से? यह तो कहां से यह मेल पड़ रहा है? तो यह पूरा मैं सोच रहा था। किंतु जैसे मैंने कहा कि वो जो एक सेकंड पर्सन को मैंने देखा जो कि एग्जजेक्टली मेरी तरह बिहेव करता है। तब ना जैसे कि एवरीथिंग क्लिक इंटू इट्स प्लेस। देखिए होता क्या है कि भारत रहा है गुलाम। हजारों साल से 1000 साल से मिनिमम। ज्यादातर भारतवासियों के भीतर में ना एक तरह का इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स घर कर गया है। अब यह इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स घर करने की वजह हम लोगों को ना हमेशा एक तरह का वैलिडेशन चाहिए। एक तरह का एप्रिसिएशन चाहिए कि हां भाई तुम ठीक कर रहे हो। एप्रिसिएशन इज अ रॉन्ग वर्ड। एप्रिसिएशन जो चाहते हैं ना उनको हम नार्सिसिस्ट कहते हैं। प्रशंसा जो लोग चाहते हैं ना उन लोगों को हम नार्सिसिस्ट कहते हैं। किंतु मुझे प्रशंसा नहीं चाहिए। मुझे सिर्फ एक वैलिडेशन चाहिए कि भाई मैं कुछ गलत तो नहीं कर रहा जो मैं कर रहा हूं कोई बिल्कुल तो खराब कार्य तो नहीं खास करके जब आदर्श के रास्ते पर हम लोग चल रहे हैं बाहर के जगत में तो चलो वैलिडेशन हो ना हो कोई फर्क नहीं पड़ता किंतु खास करके जो आदर्श के रास्ते पर चल रहे हैं उनके मन में हमेशा एक तरह का संदेह प्रकट होता रहता है कि जो आदर्श मैं फॉलो कर रहा हूं जो मेरा बिहेवियर है जो मेरी एक्शन है वो सही है है कि गलत है। कोई यदि दूसरा पर्सन आकर के मुझे वैलिडेट करे कहे कि हां भाई तुम ठीक कर रहे हो तो फिर क्या है? मुझे एक सधेहरा मिलता है कि हां मैं इतना सैक्रिफाइस करके जो थोड़ा बहुत यथासंभव यथाशक्ति एस पर पॉस एस पर माय कैपेसिटी मैं जिसको फॉलो कर रहा हूं वो ठीक है। गलत नहीं है। एक तरह का वैलिडिटी हमको चाहिए। यह जो सेल्फ कॉन्फिडेंस होना चाहिए वो भारत में भयानक अभाव है। हमको वैलिडेशन किसी ना किसी तरह से चाहिए। तो अभी मैं और एक पर्सन को देखता हूं जो कि मुझे वैलिडेट करने की बजाय मुझे अवॉइड करता है। मेरे मुझे एप्रिसिएशन के दो शब्द तो चाहिए ही नहीं। भूल जाओ। प्रशंसा तो मुझे चाहिए ही नहीं। भूल जाओ। किंतु एक बार हंस करके मेरे साथ बात करें भाई कैसे हो? अच्छा किया तुमने। कोई प्रसंग हुआ किसी ने कुछ काम किया बहुत अच्छा अभी जैसे कि किचन है यहां पे तो भंडारी महाराज उत्सव का दिन होता है सुबह से रात लेकर के उनका तो पूरा पसीना निकल जाता है उनका तो वो एक अपेक्षा तो रखेंगे ना हां भाई बहुत अच्छा बहुत माने आज का दिन बड़ा अच्छा बीता बिना किसी इंसिडेंट के बीत गया आज का दिन तो उनको एक सध्यारा मिलता है चलो भाई आज पूरा दिन मैंने मेहनत किया वो पूरा मैंने कहीं बहुत बड़ा गलती नहीं कर दिया एटलीस्ट बहुत अच्छा नहीं किया तो पता नहीं क्यों बहुत बड़ा बड़ा गलती भी नहीं कर दिया। मुझे यह वैलिडेशन चाहिए। तो अभी यह वैलिडेशन ना लोगों को मुझसे मिलता नहीं है। क्योंकि मैं इतना सेल्फ सेंटर्ड हूं। मैं अपने बिहेवियर में मुझे अपना हाईएस्ट आइडियल फॉलो करना है। मुझे अपना हाईएस्ट आइडियल फॉलो करना है। यह कंटीन्यूअस मेरे माइंड में ऐसा चलता रहता है कि दूसरों के सामने देखना। वे लोग क्या कर रहे हैं वो समझना और एप्रिसिएशन के वैलिडेशन के दो शब्द बोलना वो ये बात ही जैसे मेरे मन में कभी नहीं आती क्योंकि मुझे वैलिडेशन नहीं चाहिए मुझे एप्रिसिएशन नहीं चाहिए आप लोगों को क्यों चाहिए मुझे नहीं चाहिए अर्थात कि मैं सही रास्ते पे जा रहा हूं आपको यदि वैलिडेशन चाहिए आपको यदि एप्रिसिएशन के दो शब्द चाहिए हार्ड वर्क करने के बाद में उसका अर्थ समझ लीजिए कि आप लोग आदर्श को फॉलो नहीं कर रहे क्योंकि सन्यास का आदर्श है कर्मण्यवा ही धिकारस्ते मा फलेशु कदाचनम कर्म करना है फल की अपेक्षा नहीं रखनी तो यह वैलिडेशन के एप्रिशिएशन के प्रशंसा के स्मान के दो शब्द की अपेक्षा रखना वो भी तो गलत है हाईएस्ट आइडियल के अनुसार तो मैं यदि यह अपेक्षा नहीं रखता अपने बारे में मैंने रांची में इतना काम किया किसी ने ऐसा नहीं कहा कि तुमने बहुत अच्छा काम किया कोई कहता तो भी मैं इसको स्वीकार नहीं करता क्योंकि वह मेरा आइडियल था। आइडियल को मैंने फॉलो किया है। तो आप क्यों रखते हैं इस तरह की अपेक्षा जो कि मेरा इरिटेशन वो गांव वालों के साथ में था कि इतना सैक्रिफाइस करके मैं यहां पर आया हूं। अपना घर वगैरह सब सैक्रिफाइस करके मैं इतना काम कर रहा हूं। और आप लोग जो है आप ही के पड़ोसी आपके घर के ही बगल में जो रहता है आदमी उसको सहाय नहीं करेंगे क्या? तो यह जो था मेरा उसके प्रति इरिटेशन वो क्या सोचता है पता है कि वे लोग जो इतना काम करते हैं जो कि जितना भी उनसे हो सकता है वे लोग जो करते हैं मेरी ओर से प्रशंसा के दो शब्द भी उनको कभी सुनने को नहीं मिलते। मेरी ओर से जो एक वैलिडेशन उनको मिलना चाहिए क्योंकि ये लोग भी तो आइकोनोक्लास्ट है ना गांव जो ट्राइबल एरिया जो है ना इतना मतलब क्या कहेंगे सोशियली कंजर्वेटिव है हमको हंसी आएगी ये सब सुनकर के कभी-कभी स्वामी जी का एक रेमिनेशंस है वो स्वामी जी बेलूर मठ बन गया है स्वामी जी अभी सेमी रिटायरमेंट रह रहे हैं वहां पे सेकंड टाइम अमेरिका से आ चुके हैं महासमाधि बस अभी सामने ही है हमको पता है फोर्थ ऑफ जुलाई 1902 1902 की 4 जुलाई को स्वामी जी ने महासमाधि ली। तो उसी महासमाधि के 5 छ महीने पहले की ही ये घटना है कि बेलूर मठ में कंस्ट्रक्शन काम चल रहा है। तो इसके लिए कुछ मजदूरों को लगाया गया है। अभी देखिए कि सोशल स्टेटस जहां पे होता है वहां पे ये मजदूरों का स्टेटस तो कितना नीचे आता है। हम लोग भले ही चाहे मुंह से ना बोले भीतर भीतर में हम सब समझते हैं कि इनका स्टेटस क्या है। तो इस तरह से कुछ मजदूरों को वहां पे काम में लगाया था। अह संथाल उन लोगों की जाति तो यह संथाल मजदूर है। वहां पे काम कर रहे हैं। सावताल बांग्ला पे बोले तो [हंसी] ये लोग काम कर रहे हैं वहां पे स्वामी जी अभी देखिए स्वामी जी तो दरिद्र नारायण चंडाल नारायण मूर्ख नारायण वो सब तक जगत में उपदेश दे रहे हैं। बेलूर मठ में ही ये लोग काम कर रहे हैं मजदूर। तो स्वामी जी क्या करेंगे? वो कोपिन पोपिन पहन करके वो वहां पर जाकर खड़े रहेंगे और फिर वे लोग काम कर रहे हैं बड़ा इंटरेस्ट पूर्वक देखेंगे और वहां पे एक खास करके एक था मजदूर तो उसके साथ में स्वामी जी का एक अच्छा रिलेशन कैस्टो उसका नाम तो यह कैस्ट्टो के साथ में स्वामी जी का एक अच्छा कनेक्शन बैठ गया था तो थोड़ा वृद्ध था कैस्ट्टो उम्र में तो स्वामी जी उसके पास में जाकर के सब तरह का वार्तालाप अच्छा तुम्हारे गांव के बारे में बताओ तुम्हारे घर में किस तरह से परिस्थिति है तुम्हारे गांव में तुम्हारा जो एरिया है वहां पे लोग किस तरह से रहते हैं वगैरह वगैरह तो ये केस्टो थोड़ा सा बीच-बीच में डर जाता था क्यों क्योंकि वो बूढ़ो बाबा अर्थात कि स्वामी सच्चिदानंद जी उस समय तो उनको सभी लोग बूढ़ो बाबा कहते थे तो बूढ़ो बाबा आएगा और बूढ़ो बाबा थे वो सुपरवाइजर थे तो काम नहीं करेंगे तो वो तो डांटेंगे ना तो एक्टो बेचारा डरतेडरते स्वामी जी को कहता कि बाबा तुम यहां पर आकर के जो हमको यह इस तरह से प्रश्न प्रश्न करते हो हमारा काम रुक जाता है। फिर बाद में वो बूढ़ो बाबा आकर के हमको डांटेंगे। तुम चले जाओ यहां से। तो फिर स्वामी जी बड़े ही वो उन्हें सहानुभूति पूर्वक कहते हैं नहीं नहीं बूढ़ो बाबा आपको डांटेगा नहीं मैं उनको मना कर दूंगा। ऐसा बोलकर के फिर उन्हें इतना उनके साथ में अच्छा रिलेशन हो गया। कोई वीआईपी भी आएगा उस समय बेलूर मठ में दर्शन के लिए और स्वामी जी को मैसेज जाएगा कि अरे बहुत बड़ा वीआईपी आया है। बहुत बड़ा डिग्निटरी आया है। आपसे मिलना चाहता है। तो स्वामी जी बोल देंगे भगाओ उसको यहां से। मैं किसी के साथ अभी बात करना नहीं चाहता। स्वामी जी का महासमाधि अभी पास में ही है। पूरा जीवन तो काम किया। अभी वीआईपी वीआईपी किया उनके लिए। तो अभी इन लोगों के साथ में इतना अच्छा हो गया। फिर एक दिन स्वामी जी ने ठीक किया कि मैं मुझे सबको खिलाना है। पेट भर के बहुत अच्छे-अच्छे आइटम बना करके मठ में सबको मैं बिठा करके खिलाऊंगा। हम लोग सर्व करेंगे। तो ये केस्टो क्या कहता है पता है? अरे हम लोग यदि आपके बनाया हुआ खाना खाएंगे ना नमक खाएंगे ना नमक डाला हुआ खाना तो हमारी जात जाएगी। तो अभी [हंसी] ये मैंने पढ़ा तो मुझे हंसी आया ऑलरेडी मजदूर है। वो सोशल लेवल जो है वो बॉटम लेवल पर बैठे हैं और फिर भी उनको यह डर है कि इससे भी ज्यादा नीचे गिरेंगे। इससे ज्यादा कहां नीचे गिरने वाले हैं? मजदूर से नीचे क्या होने वाला है? और इनके साथ में किंतु फिर भी यह नात जात यह सोशल स्ट्रेटिफिकेशन इतना स्ट्रांग है इंडिया में कि इवन वे लोग भी यह डरते हैं कि यह साधु के हाथ से नमक खाया तो हमारी जात जाएगी। तो स्वामी जी ने स्वामी जी का तो हृदय तो इतना विशाल है तो अपमानित नहीं होकर के निवेदिता के साथ में तो हमको पता है ना निवेदिता जब किसी के घर जाएगी कहने के लिए कि हमने यह कन्याशाला प्रारंभ की है आप अपनी लड़की को दीजिए तो कभी-कभी तो वे लोग उसको घर में भी नहीं घुसने देते थे और कोई कोई घर में आकर के बिठाएगा तो जैसे ही वह वहां पर जाएगी गोबर डालेंगे जहां पर वह बैठी थी गंगाजल छिटकेंगे और मां ने खुद ने कहा है कि देखो अनदेखा करते देख के भी अनदेखा करती। जैसे कि निवेदिता ने देखा ही नहीं है। उसके जाने के बाद में वे लोग जहां पर बैठी थी वहां पर गोबर और गंगाजल छिड़कते हैं। इतना ये स्ट्रेटिफिकेशन था। तो स्वामी जी ने इन लोगों को कहा अच्छा ठीक है डरो मत। [हंसी] मैं आप लोगों के लिए खाना बनाऊंगा इस तरह से कि जितने में वो नमक नहीं डालेंगे। ऐसा बोल करके फिर वे लोग मान गए और फिर सबको बिठा करके स्वामी जी ने भरपेट खिलाया। तो देखिए अभी गांव की बात, रांची की बात जो लोग हमारे साथ में काम करते हैं वे लोग ऑलरेडी उनके समाज की जो रिस्ट्रिक्शन है ना उससे ऊपर उठकर के हमारे साथ कोऑपरेट करते हैं। ऑलरेडी लोगों का उनके रिलेटिव्स का उनका जो समाज है, उनकी जो अपेक्षा है, उसको तोड़ करके हमारे साथ में वे लोग एसोसिएट हुए हैं। तो थोड़ा सा भी वैलिडेशन जैसे कि उनको मेरी ओर से नहीं मिलता। मेरी ओर से हमेशा उनसे अपेक्षाएं रहती है। तुमने यह क्यों नहीं किया? तुमने वो क्यों नहीं किया? यह मैसेज इस दिन इनको पहुंचाना था। क्यों नहीं पहुंचाया? यह बात जो उनको उस दिन करनी थी। क्यों नहीं की? यह रिपोर्ट इस तारीख को मुझे जमा होना है रांची में ऑफिस में। क्यों तुम रांची नहीं आए? क्यों यह रिपोर्ट ठीक नहीं बनाया? रिपोर्ट देखो कितनी गलतियां है। तुमने घर में बैठ के रिपोर्ट बनाया ना कि सही में तुमने फील्ड में जाकर के सर्वेक्षण किया है। और किसी को भेजो। जब रिपोर्ट ठीक है कि नहीं वो देख के आओ। उसने गलत गलत रिपोर्ट तो नहीं बनाया तो सब समय मेरी ओर से उनको एक तरह की डांट सुनने को मिलती है। काम परफेक्ट क्यों नहीं हो रहा है? काम परफेक्ट क्यों नहीं हो रहा है? देखिए अभी किस तरह का कंट्रास्ट होता है। मैं चाहता हूं कि हाईएस्ट आइडियल फॉलो हो। रामकृष्ण मिशन का काम है। एक पैसा भी इधर से उधर नहीं होना चाहिए। रामकृष्ण मिशन का काम है। ठाकुर मां स्वामी जी का काम है। कहीं पर भी किसी का भी स्वार्थ नहीं होना चाहिए। कहीं पे भी ऐसा नहीं होना चाहिए कि हम लोग फेवरेटिज्म कर रहे हैं। कहीं पर भी ऐसा नहीं होना चाहिए कि मेरे जो एसोसिएट हैं उन्हीं को प्रोजेक्ट मिलते हैं और मेरे ग्रुप में जो लोग नहीं है उनको प्रोजेक्ट नहीं मिलते। सब लोगों के लिए समान सेवाएं होनी चाहिए। सब लोगों को इक्वल अपॉर्चुनिटीज मिलनी चाहिए। जिनको प्रमोशन मिलता है हमारे ऑर्गेनाइजेशन में वो किसी नेपोटिज्म पे ना हो उनको टैलेंट पे प्रमोशन हो। तो वे लोग को जो काम करते हैं एकदम उसको म बिल्कुल ही सूक्ष्मता से उसको स्टडी करना है। यह मेरा है एटीट्यूड और वे लोग मुझे किस तरह से देखते हैं पता है मुझे एक तरह से राक्षस की तरह देखते हैं कि उनके पास में जाएंगे ना हमको डांट ही सुनने को मिलेगी। उनके पास में जाएंगे ना हम कुछ भी करते हैं ना वो इनफ नहीं है। हम लोग जितना भी मेहनत करते हैं ना ज्यादा से ज्यादा डिमांड किए जाते हैं। ऐसा क्यों नहीं किया? वह बेचारा आदमी संसारी आदमी है, ट्राइबल आदमी है। किस तरह के समाज में रहता है और फिर उसमें से निकल कर के जो थोड़ा बहुत करता है मेरे पास में जैसे ही आएगा वैसे ही मेरे मुंह से पहला ही शब्द निकलेगा। बस इतना ही इससे ज्यादा और कुछ नहीं। जाओ वापस जाओ और कुछ लेके आओ। तो क्या है? वो मुझे किस तरह से देखता है और मैं उसको किस तरह से देखता हूं। देखिए मेरे जीवन में मैंने कंसिस्टेंटली देखा कि हाईएस्ट आइडियल की अपेक्षा रख के मैं दूसरों के प्रति एक तरह का बड़ा ही निम्न तरह का एक ओपिनियन क्रिएट कर लेता हूं। और वे लोग मुझे किस तरह से देखते हैं कि यह इतना घमंडी आदमी है, इतना सेल्फिश आदमी है, इतना यह सेल्फ सेंटर्ड पर्सन है कि वो एक शब्द भी एप्रिशिएशन का मुझे नहीं कहता कि जो मैं कर रहा हूं वो तुमने ठीक किया है। तुमको और भी अच्छा करना है। स्वामी जी की बात कि मैन नेवर ट्रेवल्स फ्रॉम एरर टू ट्रुथ। मैन ऑलवेज ट्रेवल्स फ्रॉम लोअर ट्रुथ टू हायर ट्रुथ। मनुष्य कभी भी गलती से सही की ओर यात्रा नहीं करता। मनुष्य हमेशा जो सही करता है और फिर निम्न जो ठीक करता है उससे और उच्च सही करना है और उच्च सही करना है लोअर ट्रुथ टू हायर ट्रुथ यह मनुष्य की जर्नी है तो यह लोअर ट्रुथ तक पहुंचा उसके बारे में उसको वैलिडेट करना कि हां भाई चलो आज जो किया तुमने किया अच्छा ही किया किंतु आई नीड समथिंग मोर और थोड़ा सा मुझे अपेक्षा है तुम्हारी आज तुम यहां पर रेस्ट करो कल तुम निकलना चलना यहां से रांची से गांव की यात्रा वैसे किलोमीटर में कम दिखती है किंतु वो जो रास्ता इतना भयानक होता है कि आपको नॉर्मल जो 10 किमी क्रॉस करने में आपको ज्यादा से ज्यादा 20 मिनट आधा घंटा लगेगा वहां पे आपको 3 घंटा इजीली निकल जाएगा तो ट्रांसपोर्ट नहीं है रास्ता डेंजरस है वगैरह-वगैरह तो चलो आज थोड़ा रेस्ट कर लो अच्छे से खाना खाओ कल जाना तो ये जो मुझे उसको वैलिडेट करना है। मैं वैलिडेट मैं नहीं किसी किसी को मैंने किया है। जिनके प्रति मेरा मेरा एक फेवरेबल ओपिनियन बन गया था। हां यह बहुत अच्छा काम करता है। तो मैं सबके सामने उसकी प्रशंसा करूंगा। यह मगरू है अखिलेश है। दो लोग थे हमारे तो मेरे गुड बुक में थे ये दोनों क्योंकि सही में हार्ड वर्क करते थे। किंतु दो-तीन लोग थे मेरी बेड बुक में थे। तो सब समय उनको मैं सबके सामने कहूंगा ये देखो दोनों जा के आए हैं। पता नहीं क्या गड़बड़ करके आए हैं। तो देखिए कि हाईएस्ट आइडियल को फॉलो करते-करते मैं अपने बारे में लोगों के मन में इस तरह का एक नेगेटिव इंप्रेशन बना दिया कि जो लोग हैं कुछ-कुछ लोग मुझे सतत एक तरह से नेगेटिव दृष्टि से देखते थे। और इस तरह का बिहेवियर ने मैंने थ्रूउ कंसिस्टेंटली मेरी लाइफ में ऑब्जर्व किया है। एक सेल्फ सेंटर्डनेस और दूसरा देखिए पता है आज मैं जब इस बात को एनालाइज करता हूं ना कि मेरे में एक तरह का सेल्फ सेंटर्डनेस आ गया है तो फिर मुझे एक दूसरा एक प्रश्न होता है कि हाउ इज इट पॉसिबल कि मैं सेल्फ सेंटर्ड हूं। मैंने जो कि घर छोड़कर के ट्राइबल एरिया में गया हूं काम करने के लिए। घर छोड़ना तो वह एक है। मैंने संघ को छोड़ दिया है। आज आप रामकृष्ण मिशन में साधु होकर रहते हैं तो आपके पास में बहुत सारी फैसिलिटी होती है। बहुत सारे कंफर्ट होते हैं। मैंने रामकृष्ण मिशन में साधु जो फॉर्मल मेंबरशिप थी वो छोड़ दी थी रांची में काम करने के लिए। हाउ इज इट पॉसिबल कि आई एम सेल्फिश और सेल्फ सेंटर्ड? इससे ज्यादा सेल्फलेसनेस क्या हो सकती है? इनस्पाइट ऑफ दैट? यह सेल्फलेसनेस या सेल्फ सेंटर्डनेस धीरे-धीरे करके ना मुझे अभी समझ में आ रही है। अभी क्या है पता है? इसका एक मैं क्या इसका मैं ये करूंगा कंक्लूजन क्या निकालूंगा कि लोगों को वैलिडिटी चाहिए। क्यों चाहिए? क्योंकि भारत गुलाम था। लोगों में इनफिरिटी कॉम्प्लेक्स है। लोगों को अपने को इंप्रूव करना है। यदि ये एक एक कंक्लूजन हो सकता है कि क्यों आपको वैलिडिटी चाहिए। मुझे किसी से वैलिडिटी नहीं चाहिए। मुझे किसी के प्रशंसा के दो शब्द भी नहीं चाहिए। मैं इरिस्पेक्टिव के निंदा ना स्तुति जो भी मेरे भाग्य में हो मैं हाईएस्ट आइडियल को फॉलो करता रहूंगा। कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई मेरी निंदा करे ना कि स्तुति करे। कोई मुझे एप्रिशिएट करे ना कि अनए्रीएट करे। द्वेष करे मेरे प्रति वैलिडेट करे ना कि ना करे। कोई फर्क नहीं पड़ता। आई एम गोइंग टू फॉलो माय हाईएस्ट आइडियल। यह मैं यदि अपने बारे में ऐसा सोचता हूं कि व्हाई नॉट अदर्स थिंक द सेम वे। किंतु देखिए कि इस तरह की अपेक्षा रख के यदि मैं बैठा रहूंगा ना तो पता है क्या है कि अब दूसरे लोग सोचते हैं कि मैं बड़ा घमंडी हूं तो क्या पता मैं घमंडी हूं। मेरा एनालिस हमारा मन जो है ना हमेशा हमको मूर्ख बनाने का प्रयास करता है। क्या मेरा घमंड आज मुझसे यह कहलवा रहा है कि मैं हाईएस्ट आइडियल को फॉलो करता हूं। हु नोस कि घमंड है ना कि हाईएस्ट आइडियल फॉलो करना है किसको पता ठाकुर के अलावा सही राजा महाराज की बात है राजा महाराज जब शुरू शुरू में ठाकुर के पास में आते थे स्वामी ब्रह्मानंद ठाकुर के मानस पुत्र रामकृष्ण संघ के प्रथम प्रेसिडेंट तो ठाकुर के पास में प्रथम प्रथम आते थे तो ठाकुर के साथ में इतना बालक भाव उनका ठाकुर के प्रति ठाकुर का इनके प्रति मातृभाव इतना सुमधुर भाव हो गया था ठाकुर की गोद में बैठते थे। ठाकुर का स्तनपान करते थे। जैसे कि बिल्कुल बाल गोपाल मां यशोदा की गोद में बैठकर स्तनपान करता है। सुमधुर दृश्य जिन्होंने देखा है सब लोग अभिभूत हो गए। यही राजा महाराज धीरे-धीरे करके बाकी त्यागी संतान ठाकुर के पास में आने लगे। उनके मन में एक तरह की ईर्ष्या खड़ी हुई कि ठाकुर का तो मैं ही मानस पुत्र हूं। ठाकुर ने तो स्पष्ट कहा है कि राखाल में मानस पुत्र है। तो फिर ठाकुर इन लोगों को इतना स्नेह क्यों करते हैं? तो ठाकुर के प्रति दूसरे लोगों के प्रति ईर्ष्या और धीरे-धीरे करके ठाकुर के प्रति शायद थोड़ा सा द्वेष प्रकट हुआ होगा। तो उस समय मां ने अर्थात कि मां काली ने राजा महाराज को वहां से निकाल दिया। तो उस समय ठाकुर मां को प्रार्थना करते हैं कि देखो अरे हृदय की तरह इसको संपूर्ण रूप से मत भगा देना। वो वृंदावन गया है तो उसका दिमाग थोड़ा सा ठिकाने लाओ। फिर वापस यहां पे भेजो उसको। तो सही में तो राजा महाराज का स्टेटस कहां वो हृदय का कहां हृदय ठाकुर का भांजा ठाकुर की सेवा करता था उसके मन में भी ईर्ष्या द्वेष बहुत था तो उसको तो मां ने वहां से भगा ही दिया मां काली ने तो राजा महाराज को वापस लाई ट्रांसफॉर्म करके संपूर्ण रूप से ट्रांसफॉर्म करके अभी काशीपुर की ही बात है ठाकुर कहते हैं एक एक दिन बैठकर के कि किसी के मन में इस तरह का एक नेगेटिव भाव था किंतु अभी सभी के मन में से यह भाव दूर हो गया तो ऑब्वियसली इशारा है राजा महाराज की ओर। राजा महाराज वहां पर बैठे थे। तो राजा महाराज ने थोड़े से कंप्लेन के स्वर में कहा कि नहीं नहीं मेरे मन में ऐसा कोई भाव नहीं था ईर्ष्या और द्वेष का। तो ऑब्वियसली जो कोई अपने को डिफेंड करेगा तो सामने ही बैठे थे रामबाबू तो राम रामचंद्र दत्त रामदत्त तो उन्होंने साथ-साथ में ही कहा तुम्हारा मन तुम ठीक समझोगे ना कि वो समझेंगे। तो व्हिच इज सो सरप्राइजिंग राखाल बिल्कुल चुप हो गया और मुझे भी बड़ा रामबाबू को वैसे हम लोग सभी कोसते रहते हैं। वो अस्थि का लेकर के जो कुछ हुआ किंतु फिर ये तो सब तो ठाकुर के डिसाइपल है ना। सबके जीवन में अनुभूति तो सबके जीवन में है। तो इतना इंसाइट पूर्ण उन्होंने कहा है। हमारा मन कौन ठीक समझेगा? हम समझेंगे कि ठाकुर समझेंगे। तो क्योंकि क्या है ना मन का ये होता ही है। हैबिट ही होता है। अपनी खुद की आंखों में धूल झोंकना। उसका जो शैतानीपन जो होता है ना उसको वो बहुत अच्छे ये ये पोशाक मास्क पहना देता है। दिव्य एक दैवी मास्क पहना करके शैतान जो है उसके भीतर में खेलता है। यह मन है। मन हमेशा अपनी आंखों में धूल झोंकने का प्रयास करेगा। तो सेल्फ एनालिसिस करके मैं अपने को सही प्रूव कर रहा हूं। दूसरों को गलत प्रूव कर रहा हूं। मुझे आइडियल को फॉलो करना है। बोल करके मैं लोगों का द्वेष करता हूं। लोग इंफीरियर कॉम्प्लेक्स से पीड़ित है। हजार साल की गुलामी की वजह से बोलकर के वे लोग मेरे से ईर्षान्वित होते हैं। ये तो मेरा एनालिसिस है। हु नोस कि मैं सही में घमंड से भर के लोगों के बारे में ऐसा बोल रहा हूं। किसको पता राइट? तो ये सॉल कंक्लूजन निकालना पूरी कहानी का कि लोगों के भीतर में इनफीरिटी कॉम्प्लेक्स है। बोल के वे लोग आइडियल को समझ नहीं पाते। इससे बेटर कंक्लूजन क्या है कि मुझे हमेशा लोगों को एप्रिशिएशन के दो शब्द कहने हैं। यदि मैं लोगों को वैलिडेट नहीं कर पाता हूं। लोगों को एप्रिसिएशन के दो शब्द ऐसा नहीं है कि मैं उनकी चमचागिरी करता हूं। वो एक फिर दूसरा एक कैटेगरी आ जाता है ऑब्सक्यूसनेस। इंग्लिश में कहते हैं उसको कि अपने को नीचा दिखा के पावरफुल लोगों की प्रशंसा करना जिससे कि मुझे पावर और पोजीशन मिले। नहीं जो कि अपने से छोटे हैं अपने समवयसी है। ऐसे लोगों को बड़े लोगों की प्रशंसा करें ना करें वह एक पूरा दूसरा मामला हो जाता है। किंतु हमसे छोटे हैं उम्र में टैलेंट से जो कम है जो स्ट्रगल कर रहे हैं हमारे इक्वल जो है उनको हमेशा प्रशंसा या तो फिर एप्रिशिएशन के दो शब्द कहना यह हमारा फर्ज है। इससे दो चीज होगी। उनके मन के भीतर में हमारे प्रति द्वेष भाव नहीं होगा और दूसरा कि यदि मेरे में घमंड है इफ एट ऑल आइडियल को फॉलो कर रहा हूं कि घमंड को फॉलो कर रहा हूं आई डू नॉट नो इफ एट ऑल घमंड है तो मैं इस तरह से यदि विनम्र होकर के किसी को एप्रिशिएशन के दो शब्द कहूंगा ना तो मेरा घमंड भी हो सकता है कि धीरे-धीरे करके कम होना शुरू हो जाए तो एक्सपेंशन इज लाइफ अपने को एक्सपैंड करो बी ए गिव नॉट ए टेकर ऐसा नहीं है कि मैं आइडियल को फॉलो कर रहा हूं। दूसरे से कुछ नहीं चाहिए। अभी हो सकता है कि मैं दूसरों से प्रशंसा की अपेक्षा रखता हूं और प्रशंसा या वैलिडेशन नहीं मिल रहा तो मेरे मन में क्रोध प्रकट हो रहा है। यह भी एक हो सकता है। यह भी तो एक पॉसिबिलिटी है। सो डोंट बी ए टेकर। बी ए गिवर। लोगों को ऑब्जर्व करके लोगों को दो एप्रिशिएशन के शब्द कहिए। लोगों को दो प्रशंसा के शब्द कहिए। कोई भी उत्सव, कोई भी कार्यक्रम कुछ भी होता है। ऑब्जर्व कीजिए कि किसने क्या किया है। और फिर जाकर के उसको कहिए कि भाई तुमने यह किया बहुत अच्छा किया। मुझे बहुत अच्छा लगा। तो क्या है पता है? उसको एक वैलिडेशन मिलता है और उसके मन में हमारे प्रति एक सहानुभूति का भाव खड़ा होता है। और यह जो भाव जो है ना परस्पर जो पॉजिटिव भाव खड़ा होना वि इज व्हाट नरिशेस वि इज व्हाट नर्चरर्स आवर सोल। अपना जो मन है उसको यह नर्चर करता है। इसको यह नरिश करता है। वरना यह विद्वेष भाव विद्वेष भाव यदि हमारे आसपास में बना रहेगा ना हम भीतर में से सिकुड़ जाएंगे। हम भी भीतर में से ना जैसे कि जल जाएंगे भीतर में से हमारे मन में भी यह वाइब्रेशन कैच करके करके नेगेटिविटी ही खड़ी होती रहेगी। हमको आपस में पॉजिटिविटी खड़ी करनी है। जिससे कि यह मेरे भीतर में रिफ्लेक्ट हो। अपनी शक्ति कहां है? जब ध्यान करने की जो थोड़ी बहुत शक्ति है उसको यह नेगेटिविटी को काटने में लगा दी तो फिर मैं ऊपर कहां से जाऊंगा और ज्यादा। तो बेटर है कि आसपास का एनवायरमेंट है उसको न्यूट्रलाइज कर दें जिससे कि वो हमारे पथ में बाधा ना बने और यदि हो सकता है तो एक पॉजिटिव एटमॉस्फियर खड़ा करें हमेशा जाकर के दूसरों को दो शब्द कहिए अवॉइड मत कीजिए किसी को प्रशंसा नहीं हो सकती है तो इन जनरल जिसको कि हम निम्न कक्षा की बातें कहते हैं तो निम्न कक्षा के लोग हैं दे डिस्कस पीपल तो इवन लोगों के बारे में पर निंदा पर चर्चा भी जाकर के कर लीजिए। यदि जरूरत आन पड़ती है। मेरे जीवन का जो 100% मेरे अपनी लाइफ का जो पूरा एक फाउंडेशन है कभी भी पीएनपीसी नहीं करना। कभी पर निंदा पर चर्चा नहीं करनी। वो भी अभी रिसेंटली मैंने तोड़ना शुरू किया है। इसलिए नहीं कि मुझे पर निंदा पर चर्चा करना अच्छा लगता है। किंतु इसलिए कि मैं लोगों के साथ में बेटर मिक्स हो पाऊं। एक पॉजिटिव एटमॉस्फियर में अपने आसपास में खड़ा कर पाऊं। जिससे कि मेरे आध्यात्मिक यात्रा में यह सब डिस्टरबेंस क्रिएट ना हो। सो एक्सपेंशन इज़ लाइफ। लोगों के साथ में पॉजिटिव रिलेशन बनाइए। लोगों को प्रशंसा के दो शब्द कहिए। लोगों को एप्रिशिएट कीजिए। लोगों को वैलिडेट कीजिए और बाहर का एनवायरमेंट न्यूट्रलाइज हो जाएगा। फिर जो अपना स्ट्रगल है वह भीतर का संस्कार का स्ट्रगल है। व्हिच इज अनदर स्टोरी। किंतु ये संस्कार के स्ट्रगल में ही हमको पसीना निकल रहा है। ऊपर से बाहर के जगत से ये सोशल सिचुएशन झूठमठ का यदि ऊपर से हम पर बर्डन डाले तो हमारी क्या हालत होगी। सो दिस इज वन ऑफ माय एनालिसिस। तो नेक्स्ट क्लास अभी कल से करेंगे और स्वामी जी का जो है लेक्चर फ्रॉम कोटमा टू अल्मोड़ा वो कल देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम