Transcript
ओ स्थापक च धर्मस्य सर्व करमा स्वरूप अवतार वरियो राम कृष्ण आज सुबह ठाकुर का कथामृत पढ़ रहा था तो उसमें एक इंसिडेंट वैसे तो कथामृत तो हम प्रतिदिन ऑलमोस्ट पढ़ते ही है और सभी इंसिडेंट जितने भी होते हैं वह सब इंसिडेंट भी हमको जनरली पता ही होते हैं किंतु पता है ना कि जैसे जैसे अपना एक्सपीरियंस जीवन का बढ़ता जाता है जैसे-जैसे अपनी साधना आगे बढ़ती जाती है वैसे-वैसे ही ठाकुर के प्रसंग ठाकुर की वाणी का एक डीपर मीनिंग वह हमको नजर में आता है एक गहरा अर्थ और भी ज्यादा गहरा पहली दृष्टि से जो हमको समझ में आया हो दूसरी दृष्टि से तीसरी दृष्टि से जितनी भी बार इसको पढ़ेंगे उतनी ही बार जितना अपना एक्सपीरियंस बढ़ेगा लाइफ का जितना हमारा अनुभव बढ़ेगा जितनी अपनी साधना आगे बढ़ेगी उतना ही हमको लगेगा कि ठाकुर इस इस छोटे से इंसिडेंट में या छोटी सी वाणी में और भी कितना कुछ कहते हैं जैसे कि मैंने वह बेल वाली बात बताई थी कि जब बेल स्वामी जी के सामने वो दौड़ता हुआ आ रहा है तो स्वामी जी उसको रोक देते हैं उसके सामने खड़े होकर के यह वैसे कहानी तो वैसे मैंने बहुत पहले पढ़ी थी किंतु जब तक मैंने अपनी नजरों से मेरी नजर के सामने मेरे सामने इस तरह के बेल को दौड़ते हुए आते हुए नहीं देखा तब तक मैं इसका जो डीपर एक सिग्निफिकेंट है वो अप्रिशिएट नहीं कर पाया था डीपर मीनिंग ये मतलब मतलब फैक्टर यह भी एक है कि स्प्लिट सेकंड में आपको डिसीजन लेना है यह स्प्लिट सेकंड डिसीजन मेकिंग तभी संभव है जबकि यह करेज या तो फिर यह आत्मज्ञान हमारे डीएन लेवल प पहुंच गया हो अपने डीएनए को रिप्रोग्राम कर दिया हो तभी कहीं जाकर के यह सब स्प्लिट सेकंड डिसीजन एक ही सेकंड में सेकंड के दसवें हिस्से में हमको डिसाइड करना है वो उस समय होता है तो ऐसा ही एक इंसिडेंट ठाकुर का आज पढ़ा तो मुझे लगा कि हां अरे यह तो उसका कितना डीप मीनिंग है ठाकुर वो ब्रह्मो समाज में गए हैं वहां पे जिस तरह से ब्रह्मो समाजी ठाकुर को बुलाते थे तो वैसे ही एक बार ठाकुर को निमंत्रण दिया गया किंतु हुआ ऐसा कि जो वहां के जो घर के मुखिया थे उनका मृत्यु हो चुका था और उनके जो लड़के थे जो कि सबसे ज्यादा ठाकुर को श्रद्धा करते थे उनका मृत्यु हो गया था पिताजी का और उनके लड़के सब ब्रह्म महोत्सव कर रहे थे और लड़कों का तो होता है कि मतलब जद आध्यात्मिकता के प्रति दृष्टि नहीं होने से वे लोग क्या करेंगे कि किसके पास में ज्यादा पावर है किसके के पास में ज्यादा इन्फ्लुएंस है उन लोगों को यह लोग ज्यादा प्राधान्य देंगे तो जब महोत्सव वगैरह सब कुछ हो गया खाने की बारी आई तो यह लड़के लोगों ने क्या किया जो लोग वीआईपी है मने तथाकथित वीआईपी समाज की दृष्टि से ऐसे सब लोगों को लेकर के पहले तो बिठाना शुरू किया ठाकुर को बुला ही नहीं रहे हैं तो ठाकुर राखल राखल महाराज भी अपने राजा महाराज भी ठाकुर के साथ में थे तो ठाकुर ने कहा कि अरे कोई हमको बुला क्यों नहीं रहा है तो अभी खं महाराज तो उस समय यंग थे और यंग लोगों को ऐसे बड़ा ही इमीडिएट ईगो पे लग जाता है तो उन्होंने कहा कि अरे महाशय चलो यहां से चलते हैं यहां पर जद अपनी कदर नहीं है यहां पर अपनी रिस्पेक्ट नहीं है तो यहां पर रुकने से कोई लाभ नहीं तो ठाकुर बड़े ही हंसते हंसते कहते हैं शांति से कि अरे रोस गाड़ी भाड़ा तीन टाका के दे मैंने अरे शांति रखो यह गाड़ी भाड़ा जो है दक्षिणेश्वर से यहां पर जो आए हैं ₹ रप वो कौन देगा और इतना ही नहीं ये तो रात्र आर के खावा इतनी रात को और कहां खाने को मिलेगा रात हो गई थी तो दक्षिणेश्वर में तो कह के आए थे कि वहां पे मैं खाऊंगा वहां प ब्रह्मो समाज में जा रहा हूं तो फिर खाने का तो ऐसा कोई बंदोबस्त शायद नहीं होगा जैसे कि वो उनके वहां पर गए थे ना ठाकुर गोपाल नेर मां गोर मणि देवी वहां पर कुछ भूत दिखाई दिए उन्होंने कहा ठाकुर को कि आपके आगमन से आपके यहां पर आने से हमारे शरीर को बड़ा बड़ी ज्वाला हो रही है है हम लोगों को ऐसा लग रहा है जैसे कोई आगन में हमको डुबा दे रहा है आप यहां से कृपा करके चले जाइए तो ठाकुर हंसते हंसते चले आए अभी जैसे ही ठाकुर दक्षिणेश्वर में आए तो वहां पर वह सब वो गेटमैन है उसको पुकार करके बुलाने लगे और फिर हमने अपने कमरे में आकर के वह ताली बजाते बजाते वो भगवान का नाम लेने लगे उस समय मां नबत में थी तो बेचारी बड़ी परेशान हो गई मां बोलती है सोचती है कि ठाकुर को तो सोचा था कि खाना खाके आएंगे देरी से आएंगे जो जदी इतने जल्दी आ गए हैं तो अभी खाने का क्या करें क्या सब कुछ खाना फिर से बनाना पड़ेगा उसी समय ठाकुर ने जोर से कहा कि अरे मैं खाके आया हूं ठाकुर को भी पता है कि मां बेचारी चिंता करेगी तो ठाकुर यह सब चीजें बड़ी प्रैक्टिकल सब मैनेज करते थे यदि कह के गए हैं दक्षिणेश्वर से कि खाना खाके आएंगे यहां पर मत बनाना तो फिर यह सब वो देखते थे जैसे कि मां हो ना कि मां नहीं है तो उनके जो कोई भी वहां पर हो लोगों को अननेसेसरी कष्ट ना पहुंचे तो ठाकुर ने ये मने अभी देखिए कि कैसा सिचुएशन है हमारे साथ में यदि ऐसा कोई भी अपमान होता तो अपने ईगो प कितना इमीडिएट लग जाता है अभी यहां पर राखल महाराज ने इमीडिएट राजा महाराज ने कह दिया कि चलिए महाशय यहां से चलते हैं तो ठाकुर ने कहा नहीं अरे गाड़ी फड़ा ₹ रुपया कौन देगा दूसरी बात कि इतनी रात को खाना कौन खिलाएगा उसके बाद में जब वो खाने का ठाकुर को भी बुलाया गया जैसे कि सबको जनरली सबको बुलाया जाता है ठाकुर को भी बुलाया गया एक कोने में बिठाया गया जहां पे गंदा था परिष्कार जगह नहीं थी स्वच्छ जगह नहीं थी वहां पर ठाकुर को बिठाया गया और एक राधुनि बामुन माने एक जो खाना बनाने वाली ब्राह्मणी उसने आकर के कुछ तरकारी परोसी तो ठाकुर को यह तरकारी खाने की इच्छा नहीं हुई तो लची यानी कि पूरी थोड़ी सी खा कर के चले आए तो अभी देखिए बाद में ठाकुर मजाक भी करते हैं कि उसके पास में गाड़ी भाड़ा मांगने को गए तो पहले तो भगा ही दिया कि नहीं मिलेगा करके चले जाओ यहां से फिर दो रुपया न कि ऐसा कुछ दिया और फिर कहा कि इसी से चल जाएगा चला लो तो देखिए कि मास्टर महाशय इसके बारे में लिखते हैं कि ठाकुर कितने कृपालु दया सिंधु है कि जद बिना आहार किए जद वहां से चले जाते ठाकुर को तो ऐसा नहीं है कि आहार की कोई कमी है दक्षिणेश्वर जद देरी रात से भी जाते आहार नहीं किया है तो भोजन की व्यवस्था तो कुछ ना कुछ हो जाएगी वो तो कोई बहुत बड़ी बात नहीं है किंतु यह गृहस्वामी जो छोकरा लड़के लोग जो है वोह लड़के लोगों को पता नहीं है कि ठाकुर की महता क्या है तो ठाकुर की महत्ता नहीं समझ कर के ठाकुर को जो सम्मान देना उचित था वह नहीं दिया तो ठाकुर कि तो दया सिंधु है यदि इन लोगों के ऊपर में क्रोध करके बिना खाए चले जाएंगे तो इनका अमंगल होगा और आखिर में यह सब आयोजन तो आखिर तो ईश्वर के लिए ही हुआ है ईश्वर के आयोजन ईश्वर की आराधना करने के लिए उपासना करने के लिए ही तो सब लोग इकट्ठा हुए हैं तो इसमें इतना नाराज कीी यदि छोटा छोटा छोटा मोटा कुछ इंसल्ट अपना हो जाए तो उससे इतनी नाराज कीी क्यों होनी है यह जो अपना अहम है अहंकार यह इतना सूक्ष्म और इतना गहराई से अपने भीतर में गया हुआ होता है कि हम लोगों को स बहुत सारे लोग मैं खुद मैं अपनी खुद की बात करो तो हमको यह बड़ा बोलने के लिए बड़ा अच्छा लगता है अरे नहीं अहंकार वगैरह से तो हम लोग कितने ऊपर उठ चुके हैं ये घमंड तो हम लोग रखते ही नहीं है अरे यह सब तो क्या है छोटी मोटी चीज है किंतु यदि सही सही में हमारे साथ में ऐसी कुछ चीज हो जाए अब आज सुबह की ही बात है यहां पे अभी तो मैं तो नया आया हूं इस आश्रम में आश्रम के जो नीति नियम है जो वैसे तो रामकृष्ण संघ के जितने भी आश्रम पे सब जगह पे एक ही तरह के रूल्स जनरली होते हैं किंतु फिर भी जब वो जो वो महंत महाराज जो होते हैं उनकी इच्छा के अनुसार किस रूल्स को कितना ज्यादा प्राधान्य देना देना चाहिए कि किस कितने नियमों को थोड़ा सा कम प्राधान्य वह सब बड़े महाराज की इच्छा के ऊपर में महंत महाराज की इच्छा के ऊपर में निर्भर रहता है तो यहां पर बड़े महाराज जो है उन्होंने ऐसा ठीक किया है कि सुबह को मंगल आरती के बाद चैटिंग हो और सभी साधु उसमें पार्टिसिपेट करें तो अभी क्या है मैं तो नया आया हूं और मेरे पास पास में वो किताब भी नहीं चेंट का और यहां पर तो सब किताबें तेलुगु में है तो मैं सोच रहा हूं कि अभी यह हिंदी किताब वगैरह कहां से मिलेगा चैटिंग के लिए कुछ उसका आयोजन करना पड़ेगा तो वह सब मैं सोच रहा था तो अभी आज सुबह चैटिंग हो रहा था बड़े महाराज चैटिंग कर रहे थे देखा कि मैं वैसे ही बैठा हूं तो सबके सामने मुझे कह दिया कि अरे तुम चैटिंग क्यों नहीं कर रहे तुमको तो चैटिंग करना चाहिए तो अभी अभी मैं सबके सामने बोलना नहीं चाहता था कि महाराज मैं किताब की राह देख रहा हूं वगैरह मैंने ठीक है मैंने कहा कि हां महाराज मैं प्रयास करूंगा कि किताब जल्दी से जल्दी आ जाए मेरे पास तो देखिए कि वैसे य घटना लगती है बड़ी छोटी जब किंतु इस तरह से महाराज कोई बोलते हैं हमको सबके सामने तो ऐसा एक इंसल्ट जैसा लगता है ऐसा लगता है कि जैसे अपने अहंकार के ऊपर में किसी ने आगात किया और वो उस समय क्रोध भी बढा आता है किंतु देखिए कि एटलीस्ट मैंने यह कहते हुए मुझे खुशी हो रही है कि महाराज जब ऐसा मुझे कहे बड़े महाराज महंत महाराज तो मेरे मन में ऐसा कुछ भी हुआ नहीं रिएक्शन जैसा बाद में थोड़ा सा लगा कि सबके सामने बोलने की क्या जरूरत थी बाद में भी तो पूछ सकते थे कि भाई तुम्हारे पास किताब क्यों नहीं है तो मैं उत्तर देता कि यहां पर हिंदी किताब नहीं मिल रही तो मुझे कहीं से मंगवानी पड़ेगी राजकोट वगैरह से कहीं से वो तो थोड़ा सा समय लगेगा तो मैं उत्तर दे सकता था ऐसा कि सबके सामने भी बोल सकता था और बाद में भी मैंने सोचा कि महाराज क्यों ऐसा किए किंतु ठीक है अभी जो हुआ सो हुआ यह सब तो छोटी मोटी चीजें अपने जीवन में चलती रहती है किंतु बिकॉज कि हम लोग यह सब फिलोसोफी पढ़ते हैं ठाकुर मां स्वामी जी को पढ़ते हैं ठाकुर मा स्वामी जी की बातों का चिंतन मनन स्मरण करते हैं तो देखिए कि जीवन के प्रत्येक छोटे छोटी घटनाओं में जीवन के प्रत्येक छोटे-छोटे पल में हमको यह बात याद रखनी है कि हमारा आचरण हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए वरना तो ऐसा होगा मैं एक उदाहरण और एक उदाहरण देकर बताता हूं ट्रेनिंग सेंटर हम लोगों का ट्रेनिंग सेंटर होता है तो क्या होता है कि ट्रेनिंग सेंटर एक बेलूरमठ में होता है दो साल हमको रहना पड़ता है वो एक प्रेशर कुकर जैसी परिस्थिति होती है वहां पर सभी भारतवर्ष से पूरे दुनिया से सब यंग लड़के लोग इकट्ठा हुए होते हैं ब्रह्मचारी और अपने जीवन को संपूर्ण रूप से परिवर्तन करने के लिए क्योंकि आप जॉइन होते हैं किसी सेंटर में आप दो-तीन साल रहते भी है बाय दैट टाइम आपका वो जो घर से वो जो सब बेड हैबिट लेकर आए हैं मेरा एक बेड हैबिट था देरी से उठने का तो उसको मुझे सुबह को अर्ली मॉर्निंग उठना उसके लिए मुझे बड़ा ही कष्ट करना पड़ा किंतु यह सब जो भी हमको जो मॉडिफाई करना है अपना जीवन अपने संग साधु जीवन ये संघ जीवन में उसको ढालना है वो दो-तीन साल में हो जाता है बाय द टाइम हम लोग ट्रेनिंग सेंटर जाते हैं किंतु फिर भी वो इनफ नहीं है क्योंकि यह तो अपने को डिसिप्लिन करने की अपने मन को पूरे एक नए ढाचे में डालने की यह जो यात्रा है ये तो जन्म जन्मांतर की है वो तो थोड़ी ना दो-तीन साल में समाप्त होने वाली है तो और ट्रेनिंग सेंटर में होता क्या है आश्रम में और ट्रेनिंग सेंटर में क्या फर्क है आश्रम में सीनियर साधु होते हैं कोई जूनियर साधु होते हैं कोई रिटायर साधु होते हैं कोई ब्रह्मचारी होते हैं तो पूरा एक एज डिफरेंट डिफरेंट एज के लोग होते हैं तो क्या है कि एक यरार की एक बड़ी क्लियर होती है जो जूनियर होगा वह सीनियर से कुछ अपेक्षा करेगा कि कुछ अच्छी बातें कहे और सीनियर साधू अपेक्षा करेंगे कि जूनियर साधू हमको रिस्पेक्ट दे हमारा छोटा मोटा कुछ सेवा करें तो यह सब बड़ा क्लियर रहता है टीसी में क्या होता है सभी लोग जितने भी ब्रह्मचारी है एक ही जज के होते हैं तो एक ही उम्र के मोर और लेस और एक ही लेवल पे रहते हैं सीनियरिटी के तो फिर वहां पे प्रेशर कुकर जैसी एक परिस्थिति बनती है कभी पियर प्रेशर ना किय कंपटीशन ना ईगो क्लेश यह सब बड़ा ही होता रहता है और यह सब चीजों में जो प्रिंसिपल महाराज होते हैं हमारे उनकी एक बड़ी ही कठिन भूमिका होती है यह जो सब साधु बनने के लिए जो आए हैं उनको डांट करके उनको डिसिप्लिन करना उनको बताना कि उनकी गलती कहां पे हो रही है व्हिच इज वेरी अनप्लेज्ड यहां पे आते हैं वो वो तो बड़े सिंसियर होते हैं घर छोड़ कर के आए होते हैं हाईली क्वालिफाइड होते हैं कोई पीएचडी कोई इंजीनियर कोई एमटेक कोई फॉरेन रिटर्न कोई बड़ी-बड़ी कंपनियों में ऑफिसर रह चुके होते हैं ऐसे लोग सब आते हैं तो ो कुछ कहना कि भाई तुम ऐसा मत करो वैसा करो ये थोड़ा बड़ा ही मुश्किल रहता है तो जो भी है अभी एक ब्रह्मचारी था वहां पे उससे मेरी अच्छी मित्रता थी तो उसके साथ में मैं प्रतिदिन वेदांत के बारे में कुछ ना कुछ डिस्कशन किया करता था क्योंकि ये वेदांत के जो ग्रंथ है वो बड़े ही मने डिफिकल्ट होते हैं उसमें प्रवेश करना और उसका अध्ययन करने के लिए बहुत लंबा समय चलता है लगता है तो इस ब्रह्मचारी ने काफी कुछ अध्ययन किया था तो मैं उसको सब समय कुछ ना कुछ प्रश्न पूछता रहता था कि अच्छा यह पंचदशी में क्या है ना कि अवेद सिद्धि मूल के ग्रंथ है उसके बारे में कुछ बताओ ना कि यह जो जितने भी ये भाषी टीका ग्रंथ वगैरह जो है वो काफी कुछ उसने स्टडी किया था तो उसके साथ में काफी मेरा को लेकर डिस्कशन चलता था किंतु जैसे ही हमारा डिस्कशन समाप्त होता है य वेदांत को लेकर के और जनरल कुछ बातों पर आते वो ब्रह्मचारी सीधा प्रिंसिपल महाराज को क्रिटिसाइज करना शुरू कर देता क्योंकि क्या है इसका वो थोड़ा बड़ी उम्र में जवाइन किया था इस ब्रह्मचारी ने और कहीं बाहर में अच्छी पोस्ट प था हाईली क्वालिफाइड भी था तो क्या होता है कि जो लोग एक अच्छी पोस्ट पर होते हैं क्वालिफाइड होते हैं उन लोगों का लाइफ स्टाइल थोड़ा डिफरेंट टाइप का हो जाता है वो ट्रेनिंग सेंटर का ला लाइफ स्टाइल यानी कि पूरा मिलिट्री आर्मी जैसा वहां पे आपको एगजैक्टली इसी टाइम पे यह करना ही पड़ेगा क्लास में टाइम पे आना ही पड़ेगा भोजन के लिए टाइम पे जाना ही पड़ेगा जो ड्यूटी दी है एज इट इज जैसा आपके सीनियर ने बताया है कि ऐसे करना है तो एगजैक्टली ऐसे करना है अपनी बुद्धि वहां पर नहीं चलानी तो इस तरह के हाईली रेजिमेंटेड एनवायरमेंट में रहने के इनको थोड़ा तकलीफ होता है तो प्रिंसिपल महाराज के साथ में उसका दो-तीन बार हो गया था कुछ महाराज को उसको कुछ कहना पड़ा कि भाई तुम ऐसा मत करो वैसा मत करो तो उसको बड़ा लग गया था इस ब्रह्मचारी को तो जैसे ही हमारी वेदांत के बारे में डिस्कशन समाप्त होगा वैसे ही वो प्रिंसिपल महाराज को लेकर के कुछ ना कुछ आलोचना चालू कर देगा तो वैसे तो मैं जनरली सुनता था क्योंकि मुझे पता था कि इसका प्रॉब्लम कहां पर चालू होता है प्रिंसिपल महाराज के साथ तो जो भी है एक दिन मैंने उसको बात बात में पूछा कि अच्छा हम लोग यह जो सब बातें करते हैं वेदांत की उसके अनुसार तो ब्रह्म तो जगत तो पूरा मिथ्या ही है सब कुछ तो ब्रह्मण है प्रिंसिपल महाराज के भी भीतर में वही ब्राह्मण है जो कि तुम्हारे भीतर में है तो तुम उनको इतना क्रिटिसाइज क्यों करते हो तो जैसे ही मैंने उसको यह कहा व बड़ा ही नाराज हो गया और फिर बोता मुझे बोलता है तुमको पता नहीं है व्यवहार और परमार्थ यह सब मने ऐसा वो वेदांत के सिद्धांतों को लेने लेकर के जस्टिफाई करता है कि हां मैं यदि किसी का क्रिटिसिजम करता हूं तो जस्टिफाइड है विदान की दृष्टि से भी जस्टिफाइड है किंतु वो नहीं है आप जितने भी वेदांत को अच्छे से पढ़ ले जितने भी वेदांत की थिरी को आप अच्छे से समझ ले उसको लेकर के आप अपना गलत काम जस्टिफाई कभी भी नहीं कर पाएंगे क्योंकि वेदांत जिसने ठीक ठीक समझा है वह समझता है कि अपना अहंकार अपना ईगो अपनी वासना एं अपनी कामनाएं इसको संपूर्ण रूप से दमन करना है तभी कहीं जाकर के स्पिरिचुअल लाइफ में आध्यात्मिक जीवन में आपने प्रवेश किया है जैसे कि राजा महाराज कहते हैं कि समाधि इज द बिगिनिंग ऑफ स्पिरिचुअल लाइफ माने ये डिसिप्लिन वर तो दूर की बात है कहां पर समाधि तक आप और समाधि तक जद पहुंचना है तो यह डिसिप्लिन यह जो अपना अहंकार का ये जो संपूर्ण रूप से उसको श्री राम कृष्ण के चरणों में समर्पित कर देना यह तो बिल्कुल ही फर्स्ट स्टेप है इसके बिना तो आप साधना चाहे जितनी भी करेंगे वो जो ठाकुर का उदाहरण है ना कि वो एक स्क्विरल एक स्क्विरल जिसने कि वो राम सेतु में वो जो पत्थर रखे थे छोटे-छोटे राम सेतु बनाने के लिए स्क्विरल वो हिंदी में क्या कहेंगे मैं भूल गया तो जो भी है एक स्क्विरल वो जो दीवाल गिलहरी गिलहरी यस यस यस गिलहरी तो एक गिलहरी एक दीवाल पर चढ़ने का प्रयास करती है किंतु एक नटखट लड़के ने एक तूफानी लड़के ने उसकी पूंछ पे एक दोरी से एक पत्थर बात दिया है तोय गिलहरी जितना भी प्रयास करेगी दीवाल पर चढ़ने का ऊपर उठने का वो पत्थर उसको खींच करके जमीन पर लाकर के प टक देगा तो ऐसा ही अपना अहंकार है यदि हम यह सेल्फ रिफ्लेक्ट करना नहीं सोचेंगे उस समय देखिए कि मैं यदि पूर्वा श्रम में होता यह सब चीजें मुझे नहीं पता होती और कोई सबके सामने मुझे ऐसा कुछ कहता जो कि मुझे इंसल्ट जैसा लगता व इमीडिएट उसका प्रतिवाद कर देता कि आप तो कुछ परफेक्ट नहीं है आप क्यों वो ऐसा कर रहे हैं और ऐसा हुआ भी सही ये बड़े महाराज खुद आज देरी से आए थे आरती में तो आरती चालू हो गई थी उसके बाद में वो आए और जनरली मैं बड़ा ही नियमित होता हूं आरती चालू होने से पहले ही दरवाजा खुलने से पहले ही मैं जाकर के बैठ जाता हूं तो मैं तो यदि पूर्वा श्रम में होता या तो फिर यह सब चीजें नहीं समझता तो मैं मुंह पर बोल देता कि अच्छा यदि ऐसा नियम है कि सबको चैटिंग करना है तो ऐसा भी नियम है कि सबको टाइम पे आना है आप देरी से क्यों आए बोलना क्योंकि देखिए कि यहां पर तो ऐसा कॉर्पोरेट वर्ल्ड जैसा नहीं है कि आप जद आपके जो सीनियर है उसका अपमान करेंगे तो आपका वो प्रमोशन अटका देंगे ना कि आपका सैलरी नहीं बढ़ाएंगे यहां पर तो हम लोग सब वॉलंटरी आए हैं और ऐसे बोलने वाले लोग है भी सही ये मैंने मुह पे बोल देने वाले सीनियर जूनियर की अपेक्षा ना करके ऐसे लोग है भी सही वो चाहे कैसे भी हो तो ऐसा बाद में मुझे लगा कि मैं ऐसा बोल सकता था उस समय किंतु मेरे माइंड में कुछ भी नहीं देर इज एब्सलूट नो रिएक्शन मैंने इस बात की मुझे खुशी हो रही है भले ही चाहे ऐसा लगता हो कि मैं अपनी बढ़ाई कर रहा हूं किंतु देखिए कि बिकॉज कि मैं आपके साथ में सब कुछ शेयर करता हूं बिना किसी विधा के तो इसके लिए मैंने इस बात को शेयर किया बाद में मैंने इस बात के बारे में काफी कुछ सोचा कि इसका किस तरह से इस चीज को समझा जाए सोचा चाहिए कि ये जो सेल्फ रिफ्लेक्शन है जो जो कुछ भी हम पढ़ते हैं ठाकुर माहा स्वामी जी के जीवन में वेदांत में हमेशा यह बात याद रखनी है कि अपना जो बिहेवियर है वो इस बात को कितना रिफ्लेक्ट करता है क्या मैं सही सही अभी संपूर्ण रूप से काम कांचन से मुक्ति और फिर जब आंख बंद करके बैठेंगे तो घंटे के घंटों भर तक समाधि में चले जाएंगे एक के बाद ईश्वर का दर्शन होगा कभी राम का कभी काली का कभी दुर्गा का यह सब तो अपने लिए संभव नहीं पता नहीं यह सब होने के लिए कितने जन्म जन्मांतर हमको पृथ्वी पर फिर से आना पड़े फिर से ठाकुर के चरणों में हमको शरणागति लेनी पड़े वो तो जन्म जन्मांतर की यात्रा है किंतु ये जो बेबी स्टेप्स है छोटे-छोटे कदम है वो तो एटलीस्ट हम इस जन्म में यदि इतना भी नहीं हो पाया मेरे से तो फिर तो क्या अर्थ है कि मैंने सब कुछ त्याग करके मैं ठाकुर के पास में आया हूं क्योंकि यह जो डाकोटार है कि हम पढ़ते हैं सोचते हैं समझने का प्रयास करते हैं और फिर आचरण तो ये आचरण और यह विचार यह दोनों में जो विरोधाभास मैंने बहुत बार अपने खुद के जीवन में देखा है और हमेशा यदि आचरण के समय स्प्लिट सेकंड होता है तो किसी ने मेरा इंसल्ट किया तो उसी समय डीएनए लेवल प यह सब प्रोग्रामिंग होना चाहिए कि मैं फट करके रिएक्ट नहीं कर रहा हूं उस समय जद यह मेरे विचार तक ही सीमित रहता कि अच्छा ठीक है ऐसा होना चाहिए ऐसा होना चाहिए तब जब स्प्लिट सेकंड डिसीजन लेना होता है तब वो सब बातें याद नहीं रहती बहुत सारे लोग ऐसे होते हैं कि ग्रोथ के आवेश में कुछ ना कुछ बोल जाते हैं जो कि बाद में उनको खुद को पछतावा होता है मैंने अपनी नजरों से देखा भी है ऐसे किसी साधु को सीनियर के पास में जाकर के क्षमा मागते हुए कि महाराज मुझे क्षमा कर दीजिए मेरा ऐसा बोलना उचित नहीं था यह ऐसी एक घटना मैं बताता हूं कोरोना का समय चल रहा था उस समय तो नेचरली कि सभी को कोरोना कोविड का टेस्टिंग करना पड़ेगा और यदि आप टेस्ट में पॉजिटिव होए तो आपको तो क्वारंटाइन करना ही पड़ेगा वरना क्या है कि आश्रम में सब सीनियर साधु रहते हैं तो फिर उनको यदि इंफेक्शन लग गया तो तो फिर बड़ा ही मुश्किल है तो मैं जिस आश्रम में रह रहा था बिना नाम दिए बता रहा हूं वहां पे ऐसा नियम बनाया गया कि सभी साधु कोरोना कोविड का टेस्टिंग करेंगे और जो पॉजिटिव होगा वो सबको क्वारंटाइन होना ही पड़ेगा उस समय वहां के जो पुजारी महाराज थे उन्होंने सोचा कि यदि मुझे क्वारंटाइन कर देंगे तो पूजा कौन करेगा बाकी सब काम आप छोड़ सकते हैं पब्लिकेशन ये वो सब जितना भी काम अकाउंट किचन सब कुछ आप बंद कर सकते हैं उसके लिए किंतु ठाकुर की पूजा तो कैसे बंद होगी तो बड़ा ही लॉजिकल था उनका थिंकिंग कि मैं टेस्टिंग नहीं करवाता और टेस्टिंग करवाने से क्योंकि पॉजिटिव आ गया तो फिर ठाकुर की सेवा को असर होगा वो बड़ा ही लॉजिकल थिंकिंग है तो जब यह बात हुई वहां पर एक स्वामी जी थे जो कि डॉक्टर थे तो डॉक्टर महाराज ने सबको कहा कि सभी को आना पड़ेगा इस समय टेस्टिंग करवाना है तो इस पुजारी महाराज ने जाकर बोल दिया महाराज मैं नहीं आऊंगा क्योंकि फिर वरना तो ठाकुर ना करें मैं यदि पॉजिटिव हो गया तो ठाकुर की सेवा ही बंद हो जाएगी और वहां पर तो सब लॉकडाउन था कोई डिवटी नहीं आ रहा था और कोई साधु अवेलेबल नहीं है तो यह तो बड़ा ही मुश्किल हो जाएगा तो डॉक्टर महाराज ने कहा कि देखो वो सब ठाकुर की पूजा वगैरह वो तो बड़े महाराज को देखना है महंत महाराज को देखना है तुम इसकी चिंता मत करो तुम टेस्टिंग करवा दो तो यदि तुमको यदि कुछ ब बढ़ चढ़ कर के कुछ हो गया तो बाकी सबको तकलीफ है ना ये तो कोरोना का समय ही ऐसा था कि किसी को कुछ पता नहीं कि क्या होगा ये तो ठाकुर की उपा है कि हम लोग बच गए वरना तो वो स्पेनिश फ्लू 1905 में आया था भारत में थ पॉपुलेशन को उड़ा दिया था उसने भारत की 10 प्र जनसंख्या को उसने मार दिया था और कोरोना में भी पता नहीं कितने लोग मरे होंगे वो तो गंगा के भीतर में कितनी वो जो डेड बॉडीज घूम रही थी वो नदी के भीतर में सब तो ये सब हमने न्यूज़पेपर में पड़ा है तो उस समय तो बड़ा ही एक भय का वातावरण था पता नहीं क्या होगा पता नहीं क्या होगा क्या नहीं हो जाएगा तो उस समय ठाकुर की सेवा को भी इतना प्राधान्य नहीं देना है जितना कि अपनी सेफ्टी को देना है तो अभी इस तरह के मामले में जो चीज को लेकर के हम यहां पर आए हैं कि अपना जीवन प्राण मन धन तन सब कुछ ठाकुर के चरणों में समर्पित तो यदि ठाकुर की सेवा को यदि हानि हो ठाकुर की सेवा में यदि ये हो कुछ कुछ ना कुछ डिस्टरबेंस हो वो तो हम नहीं सन कर पाएंगे ऑन द अदर साइड पडेम ऐसा चीज है कि पता नहीं हो सकता है सभी साधु को मार डाले किसको पता शुरू शुरू बिल्कुल पहली बार जब यह स्टार्ट हुआ था तब कैसा भय का वातावरण था वो अपने प्राइम मिनिस्टर ने सीधा टीवी पर अनाउंस कर दिया कि पूरा लॉकडाउन हो जाएगा यह वो सब तो अभी डॉक्टर महाराज और पुजारी महाराज में एकदम यह हो गया थोड़ा सा डॉक्टर महाराज ने थोड़ा जोर से कहा वो सीनियर थे तो जो चिल्ला करके क उठे कि भाई तुमको करना ही पड़ेगा और यह नियम मैंने नहीं बनाया है मुझे कुछ मत बोलो बड़े महाराज ने नियम बनाया बड़े महाराज को तो हेड क्वार्टर से से नियम आते हैं वो नियम हम लोग नहीं बनाते हम लोग तो सिर्फ फॉलो करते हैं तुम भी फॉलो करो तो अभी ये पुजारी महाराज गुस्से में क्रोध में कुछ ना कुछ बोल उठे और सीनियर साधु डॉक्टर महाराज को बाद में उनको बड़ा दुख हुआ कि ऐसा तो मुझे नहीं बोलना चाहिए था ठाकुर की सेवा का जिम्मा सिर्फ मेरे सर पर नहीं है वो तो पूरे संघ के सर पर है जो संघ डिसाइड करेगा वही तो मुझे फॉलो करना है ना अपनी खुद की बुद्धि थोड़ी ना चलानी होती है है सभी चीजों में तो बाद में जाकर के उन्होंने डॉक्टर महाराज की क्षमा मांग ली तो डॉक्टर महाराज के साथ में मेरी बात हो रही थी तो उन्होंने कहा कि देखो वह उसके बारे में मैंने देखा है यह जो था ये कि क्रोध होने से कुछ भी बोल देता है बाद में किंतु क्षमा मांगने के लिए आता है किंतु क्रोध के समय सिर्फ यह बात नहीं इस बार नहीं आगे भी ऐसा कई बार हुआ है तो देखिए कि हम लोग अभी किसी की निंदा करने का आशय नहीं हम सब लोग तो पथिक है आध्यात्म मार्ग हम सब तो लोग नौ सखिए यहां पर सीखने के लिए आए हैं हम लोग यहां पर कोई ऑलरेडी गुरु ना कि मास्टर हो कर के नहीं आए वो यदि हम होते तो अपना सब अपना अपना एक आश्रम खोल कर के सभी लोग एक एक महामंडलेश्वर हो जाते हैं वो तो वो तो बात है नहीं और ऐसा हुआ भी है जो लोग अपने को ऑलरेडी गुरु मानते हैं राम कृष्ण संघ में वो छोड़ कर के बाहर जाकर के आश्रम चालू करके लोगों को उपदेश और आशीर्वाद देने वाले लोगों की कमी नहीं है बहुत सारे हैं ऐसे तो किंतु हम ऐसा नहीं मानते हम मानते हैं कि हम अभी भी विद्यार्थी है अभी भी शिष्य है ठाकुर के सीनियर साधुओं के अपने बिहेवियर को मॉडिफाई करने का य सेल्फ रिफ्लेक्शन करने का यह पूरा जीवन भर हमको करना है तो ऐसी सब घटनाएं में बाहर में देखता हूं और फिर मैं सब समय इसके लिए मैं चौकन्ना रहता कि हम लोगों को अपना बिहेवियर यहां पर ऐसा है ना कि एक पल भर के लिए भी आप अपने को बे ध्यान नहीं होने दे सकते दो मिनट के लिए एक मिनट के लिए आप बे ध्यान हुए अपने बिहेवियर के ऊपर में से सेल्फ रिफ्लेक्शन चला गया तो पता नहीं यह जो जन्म जन्मांतर का कचरा जो हमारे भीतर में पड़ा हुआ है कब वो किस रूप में बाहर आ जाएगा अपने को हानि करेगा संघ को क्षति करेगा इस बात का कुछ ठिकाना नहीं है इसीलिए ये सतत टू बी ऑन अवर टिप टोस इंग्लिश में जिसको बोलते हैं या तो फिर कहेंगे कि ऑलवेज बी अलर्ट यह अपने साधु जीवन का एक फंडामेंटल एक आयाम है एक फंडामेंटल एस्पेक्ट है इस बात को जैसे ही हम लोग भूल गए वैसे ही पता नहीं इसके बाद में क्या होगा अपने साथ तो ये है और और यह सब आज सुबह को ही हुआ और देखिए कि यह सब कैसे योगायोग है कि आज सुबह को ही मैं कथामृत पढ़ रहा था और ठाकुर का यह घटना वो पढ़ने में आ गया ठाकुर के डीएनए तक चला गया है उनके जो सबकॉन्शियस लेवल तक यह सब चला गया है कि ये अहंकार को किस तरह से खत्म कर व कथ को थान बांगला दे जेमन बोले कि यह सब बा बातों की बातें नहीं है बेत की बातें नहीं है यह सब ठाकुर ने अपने पूरे अपनी लाइफ को 100% मोडिफाई करा हालाकि प्रश्न हो सकता है कि अवतार को फिर क्या है तो किंतु जद सब समय अवतार करेंगे तो वो तो कर सकते हैं वो तो अवतार है उससे हमको क्या लेना देना इसलिए यहां पर मैं ठाकुर को अवतार के रूप में नहीं एक मनुष्य रूप में ही देख रहा कि किसी भी मनुष्य को इस तरह का इंसल्ट हो कि आपको बुलाया गया है आहार करने के लिए प्रवचन या मने बातें करने के लिए ठाकुर तो प्रवचन या वो सब तो नहीं देते थे वो सब हम लोग जैसे आम आदमी देंगे ठाकुर तो बातें करते थे तो बातें अमृतम वाणी ठाकुर की तो वो सुनने के लिए उनको बुलाया गया और फिर जब खाने का समय आ ठाकुर को बुलाते ही नहीं है राजा महाराज जैसे राजा महाराज क्रोधित हो गए चलिए महाशय चलते हैं यहां से तो उस समय ठाकुर हंस कर के कहते देखिए बहाने तो दो बनाते हैं कि इतनी रात को खाना पन खिलाएगा या तो फिर गाड़ी भाड़ा कौन देगा किंतु ठाकुर को कोई खाने का गाड़ी भाड़े का तो अभाव नहीं था और भी कितने शिष्य थे ठाकुर के वो सब कुछ बंदोबस्त कर लेते यह सब मुंह से सब बहाने बनाए हैं भीतर में से यदि ठाकुर सही सही क्रोधित हो जाते तो वो तो उसी क्षण खड़े होकर चले जा सकते थे ठाकुर को पैसा या कि खाना यह सब चीज कभी ठाकुर को रोक के रख पाई है क्या वो जो हृदय ने जब मथुर बाबू व जो त्रैलोक्य बाबू की लड़की की कुमारी पूजा की थी तो उन्होंने नाराज हो कर के कह दिया कि उसको कहो हृदय को कि यहां से चला जाए अभी हृदय ठाकुर का भांजा ठाकुर की सेवा करता था और उसका घमंड बहुत बढ़ चुका था और उ अच्छा ही हुआ कि वह वहां से जाया माने वो गया ये तो मां काली की ही इच्छा थी तो जो आदमी ये त्रैलोक्य बाबू का संदेश लेकर उसको बोलने की के लिए आया हृदय को बाद में उसने ठाकुर को देकर ठाकुर को भी बोल दिया कि आप भी जाइए तो ठाकुर ने गमछा कंधे पर डाला और सीधा वो गेट की ओर निकल पड़े उनको कोई लेना देना नहीं कि कौन माछ माथा और पाय सेर बाटी वो मां कहती है ना कि जो तपस्या करने के लिए कुछ लड़के जाते थे काशी तो माने कहा कि ठाकुर माछ माथा पायर बाटी माथुर जुगा तो तो देर के करवे मैंने अर्थात की ठाकुर के लिए मछली का सर और मछली का माथा और यह पायस अर्थात की खीर की कटोरी ये खाने के लिए तो चाहिए कुछ यह तो मथुर बाबू दे देते तो तुम्हारे लिए जद भिक्षा करके खाओगे तो धूप में कहां कहा घूमो अच्छा है कि मठ में वापस जाओ और वहां से वो जो भिक्षा में जो मिलता है खाना मठ में वो खा कर के आराम से वो बैठ कर के जब ध्यान करो तो यहां पर ठाकुर को वैसे तो है कि चलो मथुर बाबू है तो मथुर बाबू तो चले गए थे त्रैलोक्य बाबू थे मथुर बाबू के लड़के की काली मंदिर के उस समय मालिक थे तो अभी किंतु ठाकुर जब गमछा कंधे पर डाल कर के निकल रहे हैं गेट की ओर तभी एक सेकंड के लिए भी यह सोचा नहीं कि मछली का माथा और खीर की कटोरी कौन देगा वह सब चीजें वो वहीं पर गंगा में ही फेंक के निकल गए तो ठाकुर की जो पवित्रता है जो त्याग है जो वैराग्य है उसके लिए गाड़ी भाड़ा या तो फिर खाने की चेता यह सब तो बड़ी ही तुच्छ बातें है यह बहाना देख कर के किंतु जो असली रीजन है जो मास्टर महा से बाद में लिखते हैं कि यदि क्रोध करके चले जाएंगे तो फिर वोह जो गभ स्वामी है जिसने भगवान के लिए ही तो सब आयोजन किया है उसको हानि होगी क्षति होगी उसको श्राप लगेगा इसलिए ठाकुर अ हेतु कृपा सिंधु जो मास्टर महाशय यह शब्द यूज करते हैं पहली बार पढ़ कर के मुझे थोड़ा सा एक हंसी आई थी क्योंकि क्या है कि हम लोगों को तो ऐसे बड़े-बड़े शब्द या तो फिर ऐसे अलंकृत शब्दों पढ़ने की हेमेट नहीं होती है तो पूर्वा श्रम में हम तो टेक्स्ट पढ़ के ना कि न्यूजपेपर पढ़ते यह सब करके यहां पर आए हैं तो ये अहे तो कृपा सतु य कैसा एक शब्द है तो किंतु अभी देखिए कि यह सब चीजों का गंभीर तात्पर्य क्या है समझ में आता है यह फिलोसोफी या आइडियाज इसके बारे में सिर्फ बातें करने से नहीं होगा यह आपके डीप आपका जो मन है आपका विचार है आपका वर्तन है उसके जो सबसे जो बेसिक लेवल है सबसे फाउंड है वहां तक इसको जाना पड़ेगा तब कहीं जाकर के हमारा तो असली यह सब आचरण स्टार्ट होगा यह जो फॉलो कर रहे हैं उसका कुछ अर्थ होगा वरना जहां तक वो वाणी और विचार तक ही सीमित है वर्तन या तो बिहेवियर तक नहीं पहुंचा तब तक इसका कोई वैल्यू नहीं है हां आप विचार कीजिए श्रवण कीजिए अच्छी बात है इसके बिना तो आप अपने बिहेवियर को चेंज भी नहीं कर पाएंगे सतत जो विचार करते हैं वही तो आखिर में अपनी एक्शन या तो कर्मा के रूप में में परिणत होते हैं तो किंतु यह विचार तक ही सीमित मत रह जाइए विचार को वर्तन में कन्वर्ट करने की यह जो फिलोसोफी है उसको एक्शन में कन्वर्ट करने का प्रयास कीजिए तभी यह अपनी जर्नी जो है वो सार्थक होगी और यह ऐसा एक तो यह बात है दूसरा कि कभी गिल्ट फीलिंग नहीं करना है वो भी एक बहुत बड़ी बात है यह मैं अपने खुद के अनुभव से बता रहा हूं शरू शरू में जब मैं इस तरह से जो पढ़ता था और यह सोचता था कि अरे इस तरह से कहा गया है लेकि तो मेरे से होता नहीं है जैसे कि एक उदाहरण देता हूं ट्रेनिंग सेंटर में वो सैटरडे को जप यज्ञ होता है तो जप यज्ञ क्या है तो जप यज्ञ है कि पूरी रात जप करके आपको जप ध्यान करना है राइट तो मैंने अभी ऐसा तो है नहीं कि आप पूरा कर पाएंगे यथाशक्ति करना है तो कुछ कुछ ब्रह्मचारी होते थे ऐसा मतलब सीधे होकर के बैठते थे और पूरा रात को 9 बजे से लेकर के अपने नजरों से मैंने देखा है देखा नहीं होता तो मैं विश्वास नहीं करता 3:30 तक उसके बाद में तो 4:00 बजे मंगल आरती होती है तो 3:30 को तो वो जो हमारा चैटिंग हॉल है जहां पर सब बैठ कर के जब ध्यान करते थे वहां से चले जाना पड़ेगा तो क्तु ये नजरों से देखा है मैंने कि रात के 9:00 से सुबह 3:30 सीधे होकर के बैठते हैं और जप करते हैं तो मैं तो आधा घंटा बैठता था तो बाप रे ऐसा लगता था कि अभी मर ही जाऊंगा अभी खड़ा ही यहां से अभी चैटिंग न में से सीधी मेरी लाशी बह निकलेगी डेंट बड़ी बा निकलेगी ऐसा लगता था कभी-कभी तो ये गिल्ट फीलिंग एक बड़ा हो गया था मुझे शुरू शुरू में खास करके इसके पीछे का रीजन यह भी था कि हम लोग जो वेस्ट इंडिया से या नॉर्थ इंडिया से जो आते हैं तो वो बंगोल का खास करके गंगा किनारे का जो ह्यूमिड एटमॉस्फियर है वहां पे एडजस्ट होने में बड़ा ही तकलीफ होता है वो ड्राई एरिया से सब आते हैं तो क्लाइमेट इज वेरी एक को मतलब एडजस्ट करने में पूरा अपना एनर्जी खा लेती है तो ये एक मेरा मेन रीजन था दूसरा कि बेलून मट का जो खाना था वो एडजस्ट नहीं हो पा रहा था शुरू शुरू में तो ये खाना और क्लाइमेट यह दोनों की वजह से मुझे शोरूम में बहुत तकलीफ उठानी पड़ी ट्रेनिंग सेंटर में तो अभी किंतु देखिए कि इस तरह से बहाने करके मैं यह सोचना शुरू कर दूं कि मैं उन लोगों की तरह पूरी रात भर नहीं बैठ पाऊंगा तो फिर मैं यहां पर आया ही क्यों बहाने बनाना तो वो तो अच्छी बात है वो तो बड़ा इजी है मैंने बहाने को तो आपको यू विल हैव टू ट्रांस ना यह जो क्लाइमेट है यह फूड है ये अपना जो बॉडी है जद इसको ट्रांसलेट नहीं करेंगे तो साधु जीवन में आपने किया क्या यानी ये तो एकदम बड़ा क्राइसिस हो गया था मेरे सामने मैं यहां पर रे भी पाऊंगा कि नहीं रह पाऊंगा क्योंकि बिना टीसी के तो आपको कहीं पर रखेंगे नहीं टीसी तो आपको करना ही पड़ेगा और टीसी तो बेल मट में ही होगा और तो कई होने वाला नहीं है तो ये जो किंतु उस समय एक जो गिल्ट फीलिंग मेरे मन में आ गई थी कि अरे मेरे से यह नहीं होता वो नहीं होता तो वो गिल्ट फीलिंग की वजह से मैंने बहुत कुछ सफर किया बाद में मुझे लगा कि नहीं इस तरह से गिल्ट फीलिंग भी नहीं होनी चाहिए अपने से जितना होता है ट्रांसडक्टिव हैंड वी शुड ट्राई अवर बेस्ट टू करेक्ट अवर बिहेवियर वन थिंग एंड द सेकंड कि कभी भी गिल्ट फीलिंग को अपने मन में प्रवेश नहीं होने देना है अरे मेरे से यह नहीं हो रहा वो नहीं हो रहा वो बाबूराम की मां वो जो मातंगिनी देवी ठाकुर के पास जाकर के कहती है कि मैं तो सभी के हाथ का खाना नहीं खा पा रही वैष्णव लोगों का जो होता है ना कि इसके हाथ का खाना खाना ब्राह्मण के ही हाथ का खाना खाना दूसरे लोगों का नहीं खाना तो अभी ठाकुर ने जैसे कि यह सब साधनाएं की कि ये जो अपने जो जन्म जात संस्कार है ब्राह्मण संस्कार उससे उर्ध्व परर में उठने की तो फिर वह जो रसिक मैतर जो था उसका जो टॉयलेट था उसका अपने बालों से क्लीन किया जिससे कि ब्रह्मण तोव का अहंकार भी ये चला जाए तो यह मातंगिनी देवी भी ऐसा प्रयास कर रही थी तो ठाकुर को कहा जाकर के मैं तो अभी भी सभी के हाथ का खाना नहीं खा पा रही ह तो ठाकुर ने इमीडिएट कहा कि सभी के हाथ का खाना खाने से कोई ईश्वर प्राप्ति नहीं हो जाने वाली है ईश्वर प्राप्ति तो होगी शरणागति से प्रार्थना से तो उसके ऊपर ध्यान दो बाकी सब चीजों को इतना प्राधान्य मत दो तो यह दोनों को ख्याल में रखना है प्रयास भी करना है और फिर मायूस भी नहीं हो जाना है कि अरे नहीं क्या होगा ईश्वर की कृपा से धीरे धीरे करके सब तो आज यही तक अभी कल तो आई थिंक सैटरडे है तो मिलेंगे फिर से मंडेम