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ओम स्थापक य ज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः तो ज्ञान योग ऑफ स्वामी विवेकानंद कल हमने थोड़ा सा पढ़ा कि स्वामी जी क्या कहते हैं हम आज थोड़ा सा आगे देखते हैं स्वामी जी ने कहा कि जैसे ही मनुष्य का उद्भव होता है वह एक मैच्योरिटी ग्रहण करता है उसकी इंद्रियां हमेशा बाहर की ओर ले जाती है और वह एक सेंस ऑफ ब्यूटी डेवलप करता है कि प्राकृतिक सौंदर्य है तो फिर सौंदर्य है तो उसका आनंद उपभोग करने की उसके भीतर में एक वृत्ति प्रकट होती है और एक जिज्ञासा वृत्ति भी साथ-साथ में प्रकट होती है जो एक मनुष्य और एक पशु इन दोनों के बीच में जद एक फंडामेंटल डिफरेंस यदि हम कहे तो वो है क्यूरियोसिटी हम लोग आउट ऑफ द वे जाकर के आ बेल मुझे मार ऐसा कुछ करने को जाएंगे कहां वो हम लोग ये जमीन के ऊपर में अच्छे खासे बढ़िया मजे से रह रहे हैं कि चलो नौका बना कर के ना जहाज बना कर के पृथ्वी को एक्सप्लोर करो या तो फिर पृथ्वी पर बड़े सेफली है तो स्पेस शिप बना कर के चांद पर चलते हैं हमने जब पहली बार मनुष्य को चांद पर भेजा तो आपको पता है कि नासा वाले क्या करते हैं साथ-साथ में साइनाइड की गोली देते हैं कि यदि वहां पर वे लोग अटक गए रिटर्न आने वाला जो स्पेसशिप नासा का यदि चांद पर अटक गया तो फिर तो कुछ ही दिनों के बाद में आहार और ऑक्सीजन खत्म हो जाएगा तो चांद पे ही इनका मृत्यु हो जाएगा तो फिर फिर आखिरी घड़ी जब आ जाए कि खाना भी नहीं है या तो फिर ऑक्सीजन भी नहीं है तो फिर क्या करेंगे तो फिर बेटर है कि साइनाइड की गोली खा कर के वो सुसाइड कर ले माने देख लीजिए कि पृथ्वी पर बड़े सेफली थे किंतु फिर भी पृथ्वी छोड़ कर के चांद पर गए और मतलब एक सेंस ऑफ एडवेंचर सेंस ऑफ क्यूरियोसिटी यह हमारा है और अभी आजकल तो मार्स पर जाने की बात कर रहे हैं अभी पृथ्वी पर बड़े सेफली है फिर भी हम लोग क्योंकि क्या है कि एक्सपेंशन एकने जिजी विष मुमुक्षु यह हमारा डीएनए में है मनुष्य के इसलिए हम यह एक्सप्लोर करते हैं तो स्वामी जी कहते हैं कि हमेशा हम बाहर देख कर के अपनी इंद्रियां यह पता करने का प्रयास करती है कि यह जगत क्या है उसका उसके पीछर पीछे का जो सौंदर्य है इसके पीछे का जो रहस्य है वो रहस्य उद्घाटन वो करना चाहता है यह मनुष्य का बेसिक नेचर है द इंटरेस्ट इन द थीम जज नॉट डाइड यट नोर विल डाई सो लोंग एस ह्यूमन नेचर एसिस्ट यह मनुष्य जब तक जीवित रहेगा तब तक की यह क्यूरियोसिटी मुमुक्षु जागृत रहेगा यह फ्लेम यह ज्योत है वह कभी भी बुझने वाली नहीं है मुमुक्षु की वेरियस आंसर्स हैव बीन एक ही मिनट देर वाज रिवर गड स्काई गड क्लाउड गड रेन गड यह सब हमने पढ़ा कल की सभी तरह को यह जो प्राकृतिक सौंदर्य है उसको एक डिविटो हमने प्रदान किया एवरीथिंग एक्सटर्नल ऑल ऑफ व्हिच वी नाउ कॉल द पावर्स ऑफ नेचर बिकम मेटामिनडी मैसेंजर्स जो कुछ भी जगत में है इसको हमने ह्यूमनाए जैसे कि यह पृथ्वी है यह तो फिर नदी है तो नदी तो वैसे कलकल करके बहती है किंतु हमारे ही तरह मनुष्य जैसे एक देवता को बनाया जिसके दो हाथ है दो पैर है दो कान है दो नाक एक नाक है और दो आंख है तो इसको एंथ्रोपोमेट्रिक्स तरह से फादर इन हेवन को इमेजिन करते हैं कि एक बड़ा दाढ़ी वाला पुरुष बड़ा ही उम्र वाला वो तो कहीं आकाश में बैठा है और हमारी बात सुन रहा है ऐसा कुछ नहीं है ऐसा वो बोल रहा है था तो वो प्रश्न करना व जो सामने बैठा था प्रश्न करने वाला उसने पूछा कि आप किस तरह से यह प्रूव कर सकते हैं कि भगवान नहीं है माने जिस तरह से हम लोग मैं ये लोग तो धर्म अर्थात क्रिश्चियनिटी ही समझेंगे और कोई धर्म तो वे लोग समझते नहीं थे तो ये साइंटिस्ट कहता है कि देखो मान लो कि दूसरे किसी ग्रह पर जीवन है वहां पर डॉल्फिन जैसे प्राणी रह रहे हैं जिन्होंने मैथमेटिक्स डेवलप की और उन्होंने हायर इंटेलिजेंस डेवलप की डॉल्फिन जो कि पानी में रहती है तो वो अपने ईश्वर को किस तरह से इमेजिन करेगी तो वो तो डॉल्फिन जैसे एक ईश्वर को इमेजिन करेगी और किसी ग्रह पर ऑक्टोपस जैसे प्राणी है या तो फिर स्पीशीज है जिन्होंने हायर इंटेलिजेंस डेवलप की तो उनका जब धर्म डेवलप होगा मने इवोल्यूशन में जिस तरह से होता है वो धीरे-धीरे करके रिलीजन डेवलप करते हैं साइंस डेवलप करते हैं टेक्नोलॉजी डेवलप करते हैं फिर स्पेसशिप डेवलप करते हैं और फिर स्पेस ट्रेवल करते हैं तो वो एक पूरा एक मने आर्क है है मने सिविलाइजेशन के डेवलपमेंट का तो यह साइंटिस्ट कहता है कि मान लीजिए कि एक ऑक्टोपस जिस यह मनुष्य का जो देह है यह मनुष्य की जो आकृति है पृथ्वी पर रहने के लिए एकदम उपर्युक्त है उत्कृष्ट है सब तरह के जो फॉर्म है फिजिकल फॉर्म उसके साथ में नेचर ने इवोल्यूशन ने एक्सपेरिमेंट कर लिए डायनोसोर का जिस तरह का फॉर्म था घोड़े का जिस तरह से है बिल्ली का जिस तरह से है शेर का है पंखी का है व डॉल्फिन का है ना कि वेल का है इतने सारे हम देखेंगे कि करोड़ों करोड़ों फॉर्म्स एक के बाद एक प्रकृति ने इवोल्यूशन ने एक्सपेरिमेंट करके पृथ्वी के ऊपर में बेस्ट फॉर्म कैसा होना चाहिए जिससे कि इस स्पेसस की सर्वाइवल की चांसेस बढ़े तो वो ह्यूमन फॉर्म है आज जो हमारा शरीर है वो मान लीजिए कल कहीं जाकर के हम स्पेस फेयरिंग सिविलाइजेशन हो जाएंगे स्पेसशिप लेकर के आकाश में रहना शुरू कर दिया स्पेस में या तो फिर दूसरे ग्रह पर रहना शुरू कर दिया जैसे कि मार्स मंगल ग्रह पे तो क्या होगा मंगल ग्रह की ग्रेविटी तो पृथ्वी से कम है तो हमारा बोन डेंसिटी है बोन स्ट्रक्चर जो है वो बहुत ही लाइट हो जाएगा होलो हो जाएगा भीतर से स्पेस में भी रहते हैं तो यह बोन डेंसिटी की जरूरत नहीं है हमारे हड्डियां वो गलने शुरू हो जाएंगी डिटेरिटोरियलाइजेशन स्पेस स्टेशन में जाते हैं एक दो महीना जद रहते हैं वहां पे एकदम हैवी उनको एक्सरसाइज करनी पड़ती है प्रोटीन लेना पड़ता है और पृथ्वी प जब आते हैं तो पूरा बॉडी जैसे कि कोई हथोड़ा मार के तोड़ रहा है हड्डियां ऐसा पेन होता है क्यों क्योंकि वो ग्रेविटी के साथ में इमीडिएट बॉडी उन हमारा वो एडजस्ट होने की शुरुआत कर देती है तो ये ह्यूमन फॉर्म हमको लगता है कि ह्यूमन फॉर्म श्रेष्ठ है क्योंकि पृथ्वी का जो ग्रेविटी है पृथ्वी का जो एटमॉस्फियर है पृथ्वी की की जो एयर डेंसिटी है पृथ्वी का जो एक पूरा चेन फूड चेन जिसको बोलते हैं उसके लिए ये ह्यूमन फॉर्म इज द बेस्ट फॉर्म ऑफ सर्वाइवल तो हम यदि अपने ईश्वर की कल्पना करते हैं तो मनुष्य के जैसे ईश्वर की कल्पना करेंगे यदि ऐसा कोई ग्रह हो गया जैसा पूरा पानी से भरा हुआ है तो पानी वाले ग्रह पे तो हमारे जैसा शरीर ठीक से काम नहीं करेगा ऑक्टोपस जैसा फॉर्म है वो बेटर इवोल्व करेगा वहां पे उसका सबसे ज्यादा चांस है सर्वाइवल का तो यदि उसने हायर इंटेलिजेंस डेवलप की तो उसका ईश्वर कैसा होगा ऑक्टोपस जैसा होगा ये साइंटिस्ट कह रहा है कि भगवान क्यों नहीं है तो इस तरह से उदाहरण देकर के समझा रहा है कि मनुष्य भगवान की इमेजिनेशन करता है तो उसको दो हाथ दो पैर वाले भगवान दिखते हैं ऑक्टोपस जद भगवान का इमेजिनेशन करेगा तो उसको ऑक्टोपस जैसे भगवान देखेंगे इसको इस आइडिया को बोलते हैं इमोशंस से वह सब हम पूरे जगत के ऊपर में आरोप करके उनको समझने का प्रयास करते हैं नदी इस तरह से क्यों बह रही है तो क्योंकि नदी का एंबिशन है समुंदर के साथ जाकर के मिलने का जैसे हमारा एंबिशन होता है पैसा प्राप्त करने का या कोई भी प्रत्येक मनुष्य के जीवन में कोई ना कोई एंबिशन होती है तो नदी की भी एक एंबिशन है उसको समुद्र के साथ में जाकर के संगम करना है इसलिए वो बह रही ऐसा वो जो एक अपनी एंबिशन यह जो एक गुण है हमारा हमने नदी के ऊपर में आरोपित किया तो हम जगत को क्रम विकास हुआ वो स्वामी जी बताते हैं मने इस तरह का उस समय बड़ा ही रिवोल्यूशन था आज हम बात-बात में ईश्वर के ऊपर में थिंकिंग करते हैं ईश्वर के बारे में सोचते हैं उनको फिलोसॉफिकली समझने का प्रयास करते हैं किंतु सोसाइटी का जो नेचर है वो सब समय ये अलाव नहीं करता कभी-कभी सोसाइटी बड़ी ही लिबरल होती है जो लिबरल थिंकर्स होते हैं रेडिकल थिंकर्स होते हैं उनको स्वीकृत करती है उनका सम्मान भी करती है और कभी-कभी ऐसा होता है कि जो लिबरल रेडिकल थिंकर्स है उनकी अवगणना या तो फिर उनका फिर उनके ऊपर में कोई अत्याचार भी कर बैठे तो समय समय के अनुसार यह सब फिलोसोफी डेवलप होती है समय समय के अनुसार फिलोसोफी जब छुप जाती है फिर से वह अच्छा समय आने से फिर से वह सब निकलती है तो स्वामी जी के समय में एक लिबरल था अमेरिका भी लिबरल था भारत भी उस समय लिबरल था तो स्वामी जी इस तरह के रेडिकल विचार हमारे सामने रख पाए थे द क्वेश्चन वन डीपर एंड डीपर दिस एक्सटर्नल मेनिफेस्टेशंस फेल टू सेटिस्फाई द ह्यूमन माइंड एंड फाइनली द एनर्जी टर्न इन वर्ड जैसे-जैसे हम ज्यादा से ज्यादा सोचते गए जैसे कि साइंटिस्ट की तरह उसने कहा कि यदि मनुष्य भगवान की कल्पना करता है तो मनुष्य जैसे भगवान की कल्पना करेगा ऑक्टोपस जद भगवान की कल्पना करता है तो ऑक्टोपस जैसे भगवान की कल्पना करेगा उसका अर्थ क्या भगवान है ही नहीं या तो फिर भगवान के बारे में ईश्वर के बार बारे में हमारी जो धारणा है वह गलत है वो क्या एक सब्जेक्टिव धारणा है वो हमारी इमेजिनेशन है हमारी फैंटेसी है क्या तो यह सोचते सोचते धीरे-धीरे करके इसके ऊपर में चिंतन करते-करते हमारा मन अंतर्मुखी जी कहते हैं ना हमारी इंद्रियां बाहर जाना चाहती है तो यह इंद्रिया उसका खुराक बाहर का है आंख का खुराक है आहार है देखना दृश्य कान का खोराक है आहार है श्राव्य सुनना तो जदिया तो मन के ऊपर में अपनी इमोशन क्या है अपनी कॉन्शियस निस क्या है यह मन बुद्धि चित्त अहंकार एक के बाद एक यह जो हमारे कॉन्शसनेस के भीतर में जो डिफरेंट डिफरेंट एंटिटीज है या तो फिर डिफरेंट डिफरेंट फंक्शनालिस है यह सब फंक्शनालिस क्या है आजकल आप यदि थोड़ा सा भी कोई भी साइंटिफिक पब्लिकेशन पढ़ेंगे तो बीच-बीच में वह थोड़ा वो सब ब्रेन का एक चित्र दिया होगा उसमें जो ब्रेन के डिफरेंट डिफरेंट एरियाज को अलग अलग कलर में डिमार्केट किया होगा फिर लिखा होगा कि ये दिस इज द सेंटर ऑफ इमोशन दिस इज द प्री फ्रंटल कॉर्टेक्स दिस इज द सेंटर ऑफ हायर थिंकिंग लॉजिक एंड मैथमेटिक्स दिस इज द सेंटर ऑफ क्रिएटिविटी आई डोंट नो कि ये कहां तक सही है इन लोगों का ऐसा है कि ब्रेन के ऊपर में इलेक्ट्रोड लगा दे और फिर किसी भी मनुष्य को कोई भी तरह का पार्टिकुलर टाइप का थिंकिंग करने को बोले व जद क्रिएटिव थिंकिंग करता है और कोई पार्टिकुलर इलेक्ट्रोड एक्टिवेट होते हैं तो बोलते हैं कि यह पार्ट क्रिएटिव थिंकिंग करता है ऐसा उनका मेथोडोलोग्य भी हम लोग वे लोग इलेक्ट्रोड्स के थ्रू मेजर करते हैं हम अपनी इंद्रियों को अंतर्मुखी करते हैं अपने इलेक्ट्रोड है अपनी इंद्रिया किंतु अंतर्मुखी हुई इंद्रियां एंड द क्वेश्चन वास आस्क ऑफ मैनस ओन सोल मनुष्य की खुद की आत्मन है मनुष्य का खुद का आत्मन है उसके बारे में यह प्रश्न पूछा गया फ्रॉम द माइक फ्रॉम द मैक्रो कजम द क्वेश्चन वाज रिफ्लेक्टेड बैक टू द माइक्रो कजम फ्रॉम द एक्सटर्नल वर्ल्ड क्वेश्चन वाज रिफ्लेक्टेड टू द इंटरनल पूरा विश्व ब्रह्मांड घूम कर के आए आखिर में पता चला कि मेरी क्यूरियोसिटी है मेरी ज्ञान पिपासा है मेरा मुमुक्षु उव है वह विश्व ब्रह्मांड की सफर करने के बाद में भी संतुष्ट नहीं होता है उसकी जो जानने की जिज्ञासा वृत्ति है वो इससे भी नहीं मिटती है तो फिर ऐसा क्या है जो कि ऐसा कौन सा प्रश्न है जिसका उत्तर जानने से सब कुछ जाना जा सकता है ऐसा कौन सा उत्तर है जिसको जि कौन सा सोल्यूशन है जिसको समझ लेने के बाद में मेरे मन में संतोष होगा वो भगवान व्यास के बारे में कहते हैं वोह वेदों का विभाजन किया 18 पुराण की रचना की ब्रह्मसूत्र भाषा लिख दिया फिर भी उनके मन को संतोष नहीं मिला तो आखिर में श्रीमद् भागवत की रचना की भगवान कृष्ण के बालचरित का उन्होंने इमेजिनेशन या तो फिर चिंतन मनन करके उसके बारे में उन्होंने लिखा तब कहीं जाकर के उनको शांति मिली तो वैसे ही हमने एक एक पूरा इंटेलेक्चुअल वर्ल्ड जितना भी है पूरा पार करके आखिर में हम अपने ही खुद के ऊपर में रिफ्लेक्टेड बैक होते हैं मैंने उस समय कहा था वो मैक्रो कजम लेक्चर के समय इमेजिन करते हैं मैं कभी-कभी ऐसा सोचता हूं कि क्या होगा कोई एक साइंट एस्ट्रोनोवा रात को तारों तारे देख रहा है ऑब्जर्वेशन कर रहा है अभी उसने सोचा कि मेरा दूरबीन कितना दूर से दूर तक देखता है चलो मैं प्रयास करता हूं तो ब्रह्मांड का सबसे दूर का जो ऑब्जेक्ट होगा कोई क्वासर ना कि पलसर जो कि या तो फिर प्रोटो गैलेक्सी तो उसके ऊपर में मैं फोकस करके देखता हूं तो वह फोकस कर रहा है सडन उसको अपना खुद का चेहरा दिखा व कैसा भड़क जाएगा तो वैसे ही मने आप जितना दूर जाएंगे तो आखिर में देखेंगे कि मनुष्य ही हम ही वहां पर खड़े हैं या तो फिर हमारा जो एसेंशियल स्वरूप है यह अह का वाला स्वरूप नहीं हमारा जो सही स्वरूप है वह विश्व ब्रह्मांड के दूसरे छोर पर वही खड़ा है द क्वेश्चन वाज रिफ्लेक्टेड टू द इंटरनल फ्रॉम एनालाइजिंग द एक्सटर्नल नेचर मेन इज लेड टू एनालाइज द इंटरनल दिस क्वेश्चनिंग ऑफ द इंटरनल मैन कम्स विथ हायर स्टेट ऑफ सिविलाइजेशन विथ डीपर इनसाइट इन टू नेचर विथ हायर स्टेट ऑफ ग्रोथ एनालिसिस करके बाहर के नेचर का मनुष्य अपने खुद के मन का अपनी खुद की चेतना का एनालिसिस करना शुरू करता है विथ ए डीपर इनसाइट इनटू नेचर कम्स ए हाय ट कम्स विथ ए हायर स्टेट ऑफ सिविलाइजेशन विथ ए डीपर इनसाइट इनटू नेचर विथ ए हायर स्टेट ऑफ ग्रोथ जैसे-जैसे मनुष्य सभ्यता का इवोल्यूशन होता जाता है जैसे-जैसे हमारे पास में अपने जीवन धारण करने के लिए यह जितने भी साधन सुविधा साम ग्री है उसका बढ़ावा होता जाता है जैसे-जैसे हमको सेफ्टी मिलती जाती है वैसे ही यह हायर आर्ट है हायर लर्निंग है यह सबका डेवलपमेंट होता है जैसे आप जो लोग हिस्ट्री पढ़ते हैं उन लोगों को पता है कि किस तरह से हम लोग मनुष्य ह्यूमन सिविलाइजेशन को उसका डेवलपमेंट समझते हैं पहले तो ऐसे ट्राइबल सोसाइटी होती है जो कि हंटर गैदरर्स जिनको कहा जाता है वे लोग क्या करेंगे कि कुछ एक फैमिली है एक या दो सबसे पहले तो फैमिली में रहना वही एक बहुत बड़ी बात है किसी एक साथी के साथ में अपना जीवन व्यतीत करना इसके प्रति वफादार रहना फिर जो बच्चे आते हैं बच्चों की सार संभाल रखना यह एक फैमिली का भाव अपने जो जीवन साथी है उसके प्रति एक कंपैशन करुणा उसके प्रति एक प्रेम का भाव बच्चों के प्रति करुणा मातृत्व भाव यह सब हायर थिंकिंग हायर डेवलपमेंट के लक्षण है जैसे ही ये करुणा और प्रेम प्रकट हुआ वैसे ही जो फैमिली है वो फैमिली बढ़ता गया एक फैमिली दो फैमिली सब मिलकर के साथ में रहने लगे और यह हंटर गैदरर स्टेट था जो हमारा कि शिकार के पीछे हम लोग दौड़ते थे या तो फिर जंगल में जो कोई भी जड़ीबूटी या तो फिर व फल सब्जी वगैरह कुछ मिल जाए उसको खोज करके उसको उसको हम खाते थे तो हंटर गैदरर स्टेज से हम लोग फार्मिंग के स्टेज पर आए तो फार्मिंग अर्थात कि क्या है कि एक जगह पे सेटल हुए और सेटल होकर के प्रकृति के से हम जैसे हम प्रकृति के पीछे दौड़ते थे रदर देन रनिंग आफ्टर द नेचर हम नेचर को कल्ट वेट करना शुरू किया जिस पशु का हम शिकार करते थे उसी पशुओं को हमने डोमेस्टिक करना शुरू किया तो यह जो से हंटर गैदरर फेज में से सेटलर फेज फार्मिंग फेज उसमें से फिर सिटी स्टेट यानी कि रूरल कम्युनिटी में से ये अर्बन कम्युनिटीज आई और फ सिटी स्टेट में से नेशंस डेवलप हुए जो लोग यह सब स्टडी करते हैं उनको पता है कि विथ एव्री स्टेज इन द डेवलपमेंट ऑफ अवर ह्यूमैनिटी ये ह्यूमन साइकल कम्स हायर एंड हायर क्वेश्चंस यदि आप साथ में रहते हैं तो आपको यह सोचना होगा कि लेबर जो डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ लेबर आप कैसे करेंगे अदर वाइज तो क्या डिवीजन ऑफ लेबर आप कैसे करेंगे हंटर गैदरर्स है तो पति जदी जो है वो पुरुष जो है वो शिकार करता है तो स्त्री घर का संभाल रखती है खाना बनाती है या तो फिर वह कुछ कलेक्ट करेगी व फल वगैरह और बच्चों की संभाल रहेगी तो यह तो एक सिंपल डिवीजन ऑफ लेबर है किंतु यदि आप फार्मिंग कम्युनिटी में साथ में रह रहे हैं तो किसी को तो प्लान करना पड़ेगा कि अभी कौन सा क्रॉप लगाया जाए फिर कौन से समय में क्रॉप को काटा जाए कौन से समय में फेस्टिवल्स किए जाए फिर कोई होगा जो बीमार होगा कोई भी व्यक्ति तो किसी के पास जाएगा औषध या दवाई लेने के लिए यानी कि यह जो डिसीजन मेकर्स यानी कि नेता है उसका एक रोल डेवलप हुआ जो वैद्य है या तो समान है उसका एक रोल डेवलप हुआ फिर सभी तो फाइट नहीं कर सकते किसी ने आक्रमण कर दिया तो फाइट करने वाला कोई चाहिए कम्युनिटी की रक्षा करने वाला कोई चाहिए तो सैनिक या तो फिर क्षत्रिय क्लास का जन्म हुआ तो जैसे-जैसे हम लोग साथ में रहते गए वैसे-वैसे ही यह वर्ण व्यवस्था डेवलप होती गई कोई क्षत्रिय है कोई ब्राह्मण है कोई वैश्य है तो कोई शुद्र है यह वर्ण व्यवस्था यह हायर स्टेट ऑफ सिविलाइजेशन के साथ में डेवलप होती है और फिर वही ब्राह्मण धीरे-धीरे सोच करके सोचेगा कि हां यह बाह्य सौंदर्य तो है बाह्य जगत तो है किंतु साथ में ये आंतरिक सौंदर्य क्या है आंतरिक जगत क्या है तो यह ब्राह्मण या तो फिर य एकेडेमी या तो फिर ये टीचर या तो फिर ये इंटेलेक्चुअल फिलोसोफर क्लास ये लोग यह सब तरह का थिंकिंग करना शुरू करेंगे और हमको पता है कि खास करके वेदांत के बारे में क्षत्रिय क्लास है जिन्होंने यह हाईएस्ट लिप जो अल्टीमेट लिप लेना था कि अहम ब्रह्मास्मि व अल्टीमेट लिप वह क्षत्रिय क्लास की ओर से लिया गया है तो यह पूरा सिविलाइजेशन के डेवलपमेंट के साथ-साथ में ही यह हायर थिंकिंग हायर आइडियाज डेवलप होते हैं दिस क्वेश्चनिंग ऑफ द इंटरनल मैन कम्स विथ हायर स्टेट ऑफ सिविलाइजेशन मनुष के भीतर की चेतना का विश्लेषण करना सिविलाइजेशन अर्थात कि सभ्यता के उच्च स्तर के साथ में यह आईडिया डेवलप होता है विथ अ डीपर इनसाइट इनटू नेचर यह प्राकृति किस तरह से कार्य कर रही है उसके साथ में एंड अ हायर स्टेट ऑफ ग्रोथ यह धीरे-धीरे करके हंटर गैदरर से फार्मिंग कम्युनिटीज फार्मिंग कम्युनिटी में से सिटी स्टेट सिटी स्टेट में से नेशंस एंड सिविलाइजेशन जैसे जैसे डेवलप हो होता है वैसे-वैसे ही आंतरिक चेतना का विश्लेषण बढ़ता जाता है द सब्जेक्ट ऑफ डिस्कशन दिस आफ्टरनून इज दिस इंटरनल मेन आज दोपहर को मैं जिस विषय के बारे में चर्चा करना चाहता हूं वह यह हमारा आंतरिक मनुष्य है अंतर्मुखी या तो फिर यह इनर मैन जैसे इंटरनल मेन अपनी चेतना या तो अपनी कॉन्शसनेस है नो क्वेश्चन इज सो नियर एंड डियर टू मैनस हार्ट एज थट ऑफ द इंटरनल मैन मनुष्य के हृदय के सामने इतना प्रिय और कोई क्वेश्चन नहीं है जिसका उत्तर वह पाना चाहता है कि मेरा असली स्वभाव क्या है हमको लगेगा कि स्वामी जी यह किस तरह की बात कर रहे हैं य कोई न्यूज पेपर मैन है या तो फिर वह कोई गाय बकरी का पालन करता है ना कि कोई खेती करता है ना कि कोई सोल्जर है वो थोड़ी ना अपने इंटरनल नेचर के बारे में सोचता है य तो कुछ चंद लोग होंगे पूरे मनुष्य के सिविलाइजेशन में जो कि इंटरनल नेचर क्या है कॉन्शसनेस क्या है उसके बारे में सोचते होंगे किंतु एक तरह से देखा जाए तो जो सेल्फ डेवलपमेंट सभी को करना है कोई किसान है वह हमेशा यह सोचेगा कि मैं और भी अच्छे से अच्छी खेती करूं मेरा जो पाक है उसकी संख्या उसकी जो ये कल्ट वेशन है उसकी संख्या और भी उत्तर उत्तर वृद्धि पाए जैसे कि सैनिक है वह सोचेगा मैं उत्तर उत्तर सशक्त सबल और और ज्यादा स्ट्रांग होता जाऊं विद्यार्थी है वह सोचेगा मेरी इंटेलेक्ट हमेशा बढ़ती जाए वैद्य है वह सोचेगा कि कितने ही कठिन व्याधि दुरा जोग्य व्याधि है उसका मैं और अच्छे से उसका सलूशन उसका सारवान उसका आरोग्य लाभ करवा पाऊं पेशेंट को तो हम लोग हमेशा हमारे भीतर में एंबिशन होती है कि आई वांट टू डू बेटर कोई भी होगा इस जगत में ऐसा रेयरली ऐसा कोई मनुष्य मिलेगा कि व कहेगा कि मुझे कुछ भी नहीं चाहिए ठाकुर बोलते थे कि मैं भक्तों का राजा होना चाहता था स्वामी जी ने कहा है कि द वे बुद्धा हैज अ मैसेज फॉर द ईस्ट बुद्धा हेड अ मैसेज फॉर द ईस्ट आई हैव अ मैसेज फॉर द वेस्ट भगवान बुद्ध ने भगवान बुद्ध का जिस तरह से इष्ट के प्राच्य सभ्यता पूर्व की सभ्यता के बारे में उनका मैसेज था पूर्व की सभ्यता के लिए भगवान बुद्ध का मैसेज था तो मेरा मैसेज पश्चिमी सभ्यता के लिए है तो ये एक एंबिशन टू डू समथिंग बेटर एंड बेटर एंड बेटर वो हमारे सब में निहित है स्वामी जी का वो बिल्कुल ही आखिरी लेटर उन्होंने जोसेफाइन मैक्लाउड को लिखा था उसमें उन्होंने लिखा था कि मैं फिर अने वो जब जब एंबिशन सेटिस्फाई हो जाती है एंबिशन खैर स्वामी जी के बारे में एंबिशन शब्द यूज करना ठीक नहीं है वो तो एक डिवाइन इपेटुस डिविट्टो वर्ल्ड टू चेंज दिस एक्सटर्नल वर्ल्ड सो दैट वी कैन प्रे बेटर टू गॉड तो वो एक डिवाइन इपेटुस किंतु वो इंपे जब समाप्त हो जाता है उस समय स्वामी जी ने जोसेफाइन मैक्लाउड को लिखा है मैं फिर से वही नरेण हो गया हूं जो कि वो भारत के वही खुले रास्ते में जंगल से यह मैदान से गुजर रहा था भिक्षा माग करके एक केर फ्री भिक्षु की तरह या तो फिर वही पंचवटी में मनो मुग्ध होकर के भगवान रामकृष्ण देव की बातों को सुना करता था फिर से मैं वो नरेण हो गया वो विश्वविजय आचार्य विवेकानंद नहीं रहे फिर से वही नरेण हो गए बच्चे की तरह ठाकुर के आसपास खेलता रहता था मुग्ध होकर के विस्मित होकर के ठाकुर की बातों को सुना करता था हालांकि स्वामी जी उस समय लिखते हैं कि वो विस्मित होकर के मुग्ध होकर के सुनता था किंतु हमको पता है कि जब स्वामी जी सही सही बच्चे थे मने सही सही यंग थे तो ठाकुर की बातों के ऊपर में वो कितना क्वेश्चन किया करते थे किंतु क्या है ना देखिए समय समय के साथ में अप आपकी मेमोरीज आपके रेमसंस उसके ऊपर में गोल्डन एक शाइन एक गोल्डन एक यह लग जाता है एक एक लेयर लग जाता है गोल्डन पेंट लग जाता है लगता है कि हमारा वो वाला जीवन था बहुत अच्छा था आज मैं कभी-कभी सोचता हूं मैं उस बेलूरमठ में था बेलूरमठ में जैसे कि स्वर्ग की तरह में रहता था इतना सुंदर बेलूर मठ मुझे फिर से कब वहां जाने को मिलेगा कब रहने को मिलेगा ऐसा मैं यहां पर कभी-कभी सोचता हूं हालांकि उस समय में वो भूल जाता हूं कि बेलूरमठ में रहते समय मेरी कितनी समस्याएं थी बिना समस्या का कुछ भी नहीं होता जगत में और कहां प भी आप रहे कुछ नाना कुछ प्रॉब्लम आपको फेस करने ही पड़ते हैं बेलूरमठ में मेरे साथ में मेरे वो कुछ अलग प्रॉब्लम थे तो वो किंतु आज मैं उस दिन को याद करता हूं मुझे सब पॉजिटिव चीजें याद आती है नेगेटिव में संपूर्ण भूल जाता हूं दिस इज द ये जो मेमोरी जो अपने को रिफॉर्म करती है ना ओवर ए पीरियड ऑफ टाइम दिस इज अ वे ऑफ हीलिंग माइंड अपने को हील करना चाहता है जैसे स्ट्रेस हार्मोन होते हैं अपने साइनोसिस जो है ब्रेन सेल है उसको इंजर करते हैं उसको डिटी रेट करते हैं उसको डिस्ट्रॉय करते हैं तो ये जो गुड मेमोरीज है ये ड्रीम्स है बेटर ड्रीम्स अच्छे ड्रीम्स दिस इज अ वे ऑफ माइंड टू हील इट सेल्फ मन जो है अपने को इस तरह से अच्छी कल्पना करके हील करना चाहता है अपने को वो री रीजन करना चाहता है रिकवर करना चाहता है इसलिए जब भी दो मित्र मिलेंगे हमेशा भूतकाल की बातें करेंगे अच्छा वहां पर हम लोग गए थे यात्रा के लिए तीर्थ यात्रा के लिए तो कितना हमको मजा आया था कितने सुंदर-सुंदर अनुभव हुए थे वह किसी एक मंदिर में गए थे वहां पर प्राकृतिक सौंदर्य के बीच में बैठे थे कितना अच्छा लगा उस समय किंतु वो भूल जाएंगे कि वहां पर गए थे तो कितने मच्छर काटे थे या तो फिर ट्रेन छूट गई थी तो कितना हमको यह स्ट्रगल करना पड़ा था दूसरी ट्रेन पाने के लिए मैं खुद एक बार वहां पर जा रहा था उज्जैन से लेकर के इंदौर की ओर जा रहा था प्रॉब्लम यह है राजकोट से आप वहां पर जाएंगे तो उज्जैन आता है रात को तकरीबन ना कि एक 2 बजे ना कि ऐसा कुछ दोती बजे आता है तो अभी रात को तो सोना है पूरी रात तो आप जग नहीं सकते यह सोच करके कि सुबह को 3:00 बजे के आसपास उज्जैन उज्जैन आएगा तो मैं महाकाल महाकालेश्वर का दर्शन करूंगा उसके लिए मैं मुझे उतरना है यहां से वो तो हम तो सोच जाते हैं ये आशा रख करके उठ जाएंगे कोई अलार्म रखा है कुछ ना कुछ तो ऐसा व्यवस्था करके हम सो जाते हैं तो उस ऐसे भी मैं उस दिन सो गया रात को और सुबह को उठा सीधा 6:00 बज गए गाड़ी इंदौर की ओर जा रही है तो मैंने सोचा अरे भाई महाकालेश्वर का दर्शन नहीं होगा तो तो ठीक नहीं हुआ मैं तो ठीक करके आया था राजकोट से जब निकला था कि दर्शन तो करना ही है तो अभी क्या करूं तो फिर जो नेक्स्ट स्टेशन आया वहां पर उतर गया अभी वो स्टेशन ऐसा था कि मैंने उसका नाम भी किसी ने नहीं सुना हुआ एक बहुत विराट खेतर वाला जमीन था बहुत सारे खेतर थे चारों उसमें छोटा सा एक एक शेड जैसा था वहां पर गाड़ी कुछ चंद सेकंड के लिए चंद घड़ियों के लिए खड़ी रहती थी तो जैसे ही खड़ी हुई गाड़ी मैं उतर गया फिर उतर के देखा तो अरे कुछ नहीं है यह तो पूरा फार्म लैंड है ना ही कोई स्टेशन में कोई व्यक्ति है कोई मनुष्य है ना ही स्टेशन मास्टर जैसा कोई दिख रहा है अरे बाप रे मैं तो आधा घंटा वहां पे बैठा रहा तब कहीं जाके कोई ऑफकोर्स वहां स्टेशन मास्टर होगा वह इधर-उधर गया होगा थोड़ी देर के बाद आया मैंने पूछा अरे भैया मुझे वहां पे जाना है उज्जैन वापिस तो गाड़ी कब आएगी तो बोला कि अभी आप अपेक्षा कीजिए दोपहर को आएगी तो मैंने सोचा अरे यार इससे तो बेटर है कि मैं इंदौर चला जाता फिर रिटर्न जर्नी में चला जाता ह अभी वह पूरा आधे दिन वहां पे रहना ठीक है अच्छा लगा वह फार्मले है बहुत सुंदर लगा तो मैं अभी जब मैं वापस आ गया यात्रा से अभी इतने दिनों के कुछ दिनों के बाद में जिनको भी मैं बोल रहा हूं मैं ऐसा बोल रहा हूं कि बहुत अच्छा लगा ऐसे एक जगह प मैं उतरा था कि जहां पर प्राकृतिक सौंदर्य था खेत ही खेत थे जहां नजर जाए वहां खेत भारत में तो अभी इस तरह की जगह मिलना मुश्किल है ऐसा करके वैसे मैं बड़ी प्रशंसा तो करता हूं किंतु उस समय मैं वो भूल जाता हूं कि जो वो सब हैरेसमेंट है गाड़ी मिस हो जाने का या तो फिर स्टेशन मिस हो जाने का दूसरी गाड़ी के लिए अपेक्षा करने का वहां पर ही तो पीने का पानी था ही कुछ था वो कष्ट वगैरह हम लोग भूल जाते हैं तो वी ऑलवेज फॉर्म गुड मेमोरीज टू रिमेंबर अवर पास्ट डेज यह अपना मन अपने को जो हील करता है अपने को जो रिकवर करता है वह इस सब ट्रिक से इस सब तरीकों से करता है अच्छा तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओ वं शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु